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Erotica साइको कविता (psycho Kavita)

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Chalakmanus

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Episode 10.4


जब कविता से मिलने के बाद रूपा वीरू के लिए डिनर लेकर गई. तब कविता की तो हालत बुरी हो गई. पर रूपा बहोत रोमांचित थी. वो भरी पूरी और ऐसा कहो की youngest MLF थी. रूपा को xforum पर कोमलरानी की कहानियाँ पढ़ने का सोख था. और वही से उसके दिल मे एक फैंटासी ने जन्म लिया हुआ था.

जिसमे स्टोरी की लीड हीरोइन अपने पाती हीरो से अपनी छोटी बहन का सेक्स करवाती है. अपनी मासूम बहन का सर अपनी गोद मे रख कर. प्यार दुलार करते हुए उसका बेराहेमी से अपने पति द्वारा सम्भोग होता है. रूपा ने कोमल रानी की कहानी मे ऐसे कई किस्से पढ़े. कही जवान नांदिया को भाभी देवरो से टांका भीड़वाती है. तो कही ननंद नन्दोई सहलज का कामुख सीन.

यह एक लेडी कक्स(lady cucks) फीकिंग्स थी. जो रूपा के जहन मे भी फेल चुकी थी. और कविता और वीरू के सम्भोग से वही फैंटासी पूरी हो रही थी. रूपा खाने की थाली लेकर वीरू के सामने खड़ी हो गई. पूरी तरह से नंगा और दोनों बंधे हुए हाथ. वो रूपा को थोड़ा नाराजगी वाले लहजे से बोला.


वीरू : इतना हस क्यों रही हो???


रूपा वीरू के कमर के पास बैठ गई. वीरू भी थोड़ाऊपर की ओर खिसक कर बैठ गया. रूपा ने बैठते ही उसे खिलाना शुरू किया.


रूपा : (स्माइल, शारारत ) तुम तैयार हो ना??


वीरू : (सॉक ) किस लिए.


रूपा : (सॉक, स्माइल ) अरे...... कमाल है. रूपा एक बार तेरा पिछवाडा. मुझे तो तुम छोड़ते नही थे. कितना रगड़ा तुमने मेरा पिछवाडा. अब लड़की तैयार हुई है तो तुम भाव खा रहे हो.


वीरू समझ गया की रूपा कविता के साथ अनाल सेक्स करने के लिए कहे रही है. भले ही वीरू कविता से दूर भाग रहा था. पर वो भी कविता की खूबसूरती से मुँह मोड़ नही पा रहा था. वीरू को गुस्सा भी आया. और उत्तेजना भी महसूस हुई. वो कविता के पूछवाड़े की कल्पना करने लगा. और उसका लिंग अपने आप तन गया.

साथ ही वो अपने मन मे बोलने लगा. ऐसा पेलुँगा की साली जिंदगी भर नही भूलेगी. वीरू कविता से कुछ हद तक बदला लेने वाले फील मे था.


रूपा : अममम खाओ ना. कहा खो गए. (स्माइल ) कही उसके बारे मे तो नही सोचने लगे. देखो कैसे तन गया.


रूपा ने बोलते हुए वीरू के लिंग को ही हाथो मे पकड़ लिया.


वीरू : ( सॉक ) ससस तू भी पागल हो गई है. उसके साथ रहकर.


रूपा वीरू को खाना खिला चुकी थी. वो ट्रे लेकर खड़ी हो गई.


रूपा : (शारारत, स्माइल) फिर तू भी पागल हो जा. मै आती हु उसे लेकर. और हा. आराम से धीरे से. तेरा झटका झेल नही पाएगी. आराम से करना. समझा.


बोल कर रूपा चली गई. वीरू चाहता था की कविता उस से नफरत करने लग जाए. और उसे वहां से जाने दे. इसी लिए वो कोसिस कर रहा था की खुद भी कविता से नफरत करें. रूपा वहां से जा चुकी थी. पर वीरू कविता के पिछवाड़े के बारे मे सोच सोच कर ज्यादा ही उत्तेजित हो रहा था.
Sach hai komal rani ki kahaniya ka koi jod nahi.or agar rupa unki kahaniyo ko padhthi rahi hai to...
Rupa bhi uss kahani ke kisi bhabhi ki tarah apna farz nibhana chahti hai.
Saitan g jitni tarif aapki karu wo kam hoga.
 
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Chalakmanus

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Episode 10.5


वीरू को डिनर करवाने के बाद रूपा ने कविता को कहे दिया की तैयार हो जाए. और वो खाली प्लेटस और बाकि कामों के लिए किचन चली गई. वही कविता तो पहले से डरी हुई थी. जब रूपा ने उसे तैयार होने को कहा तो कविता के मुँह का पानी तक डर से सुख गया.

कविता अपने डर का सामना ही कर रही थी की रूपा एक बार फिर डोर पर आकर खड़ी हो गई. इस बार उसके हाथ मे तेल की कटोरी थी. पर मज़े की बात यह की वो साड़ी मे नही थी. सिर्फ अपने ब्लाउज और घाघरे मे. चहेरे पर शारारत भरी मुस्कान. और एक नशीलापन.


रूपा : (स्माइल, शारारत, नशीलापन) चले मेरी रानी.


कद कठि से रूपा की बॉडी कविता से काफ़ी बड़ी थी. बूब्स 38 तो वही कविता परफेक्ट 34 और दोनों की हाईट भी थी. पर कविता ज्यादा ही लम्बी थी. बस रूपा के पेट पर थोड़ी चर्बी थी. सेक्स की चाह मे लीन रूपा कविता को बीबीजी के बजाए रानी बोलने लगी. जैसे वो उसकी बड़ी बहन या भाभी हो.


रूपा : क्या हुआ डर लग रहा है???


कविता ने डरे सहमे चहेरे से हा मे सर हिलाती है. रूपा कविता के करीब आई. और उसके पास बैठ गई. उसके चहेरे को अपनी तरफ किया.


रूपा : (स्माइल) देख मेरी रानी. कुछ पाना है. तो थोड़ा दर्द तो साहना पड़ेगा. और तू बता की तुझे दर्द के बाद मझा आया या नही.


कविता ने बस थोड़ी सी स्माइल की और हा मे सर हिलाया. लेकिन वो अभी भी डर रही थी.


रूपा : अगर उसे तेरी आदत लग गई. तो तुजसे चाह कर भी अलग नही हो पाएगा. बस उसे तेरी आदत लग जाए.


कविता ने हा मे सर हिलाया. कविता के मन मे भी सवाल थे. जो वो पूछे बिना नही रहे पाई.


कविता : (घबराहट) क्या फिर वो मुझसे प्यार करेगा.


रूपा बहोत इरोटिक फील कर रही थी. पर कविता की इस बचकानी बात से रूपा की स्माइल भी फीकी पड़ गई. वो समझ गई की कविता डर भी रही है. और सिर्फ वीरू को उस से प्यार हो जाए. इसी लिए वो दर्द झेलने को तैयार है. पर रूपा के पास कोई जवाब नही था.


रूपा : पता नही.....


रूपा कुछ पल के लिए रुक गई. वो बोले भी तो क्या. उसे समझ ही नही आ रहा था.


रूपा : बस उसे तुम्हारी आदत लग जाए. तुम कोसिस तो करो. पहेली बार थोड़ा दर्द होगा. फिर तुम्हे भी मझा आएगा.


कविता ने बस स्माइल की. रूपा उसका जवाब समझ गई. कविता तैयार है. पर अपने मज़े के लिए नही. सिर्फ वीरू को रिझाने के लिए. रूपा भी सब भूल कर आगे बढ़ी.


रूपा : अरे अरे... रुको मेरी रानी. ऐसे नंगीही जाओगी क्या??


कविता : (सॉक) पर क्या???


रूपा : (स्माइल शारारत) अरे तुम तो खजाना हो. उसे देखने के लिए थोड़ा तरसने तो दो.



रूपा दए बाए देखने लगी. उसने बेड की बदशीट ही खींच ली. और कविता को पूरी तरह से ढक दिया. अब कविता सिरद गर्दन के ऊपर तक ही दिखाई दे रही थी. रूपा कविता को लेकर वीरू जिस रूम मे था. उस रूम की तरफ चल दी.

IMG-20260806-111520
Kavita

IMG-20260722-170358
Rupa
Bohot hi achhe tarike se sath de rahi hai rupa.
Dekhte hai viru hard core kar pata hai ya nahi.ya issi kaam main kahin dono main pyar na ho jai.
Agle update ka intejaar rahega
Aapka niyamit pathak 🙏🙏🙏
 
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Sach hai komal rani ki kahaniya ka koi jod nahi.or agar rupa unki kahaniyo ko padhthi rahi hai to...
Rupa bhi uss kahani ke kisi bhabhi ki tarah apna farz nibhana chahti hai.
Saitan g jitni tarif aapki karu wo kam hoga.
कोमलजी को तो मै अपना गुरु मानती हु. मै एक ऐसे टाइम की उनकी रिडर हु जब कोमलजी xpossib पर कहानी लिखती थी. ऊस वक्त मेरा ac भी नहीं था. गूगल पर सर्च करके कहानी पढ़ती थी. अभी तो Xforum पर तो जबरदस्त दोस्ती हो गई. मेने उनसे बहोत सीखा है.

वैसे तो नज़रिया अलग हो जाता है. कोमलजी की कोई भी स्टोरी का एक ही किरदार कई रंग मे नजर आता है. घर की नई बहु. कभी भाभी तो कही की ननद. कही सहलज तो कही साली होती है. बस नज़रिया अलग पर मस्ती वही.

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Kavita

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Rupa
Bohot hi achhe tarike se sath de rahi hai rupa.
Dekhte hai viru hard core kar pata hai ya nahi.ya issi kaam main kahin dono main pyar na ho jai.
Agle update ka intejaar rahega
Aapka niyamit pathak 🙏🙏🙏
इसी sutarday रात या sunday सुबह पोस्ट हो जाएगा. बडा अपडेट.
 
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Episode 10.6


वीरू ने डिनर किया. उसके बाद वो ऊपर की ओर खिसक के बैठा था. उसके हाथ ही दोनों ऐसे बंधे हुए थे. या तो वो थोड़ा ऊपर को खिसक कर बैठ पता. या फिर सीधा लेट पता. वीरू को रूपा ने जो कविता के पिछवाड़े की लालच दी. उसके बाद से वीरू उत्तेजित था.

वीरू को यह पता थी की कविता का पिछवाडा कोरा है. क्यों की जब कविता ने वीरू के साथ सेक्स करते अपना कोमार्य भंग करवाया तो पिछवाडा तो कोरा होगा ही. वीरू अकेले अकेले बैठे भी मुस्कुराने लगा. पर तभि उसे याद आया की उसे तो कविता से नफरत करना है. वीरू ने अपने अंदर की नफरत को जगाया.

वो मन ही मन सोचने लगा की आज वो उसे कैद करके रखने का बदला लेगा. वो सोच मे डूबा हुआ था की तभि रूपा अंदर आई. वीरू ने रूपा की तरफ देखा. रूपा के फेस पर शारारत भरी मुस्कान थी. वीरू सिर्फ रूपा को देख कर थोड़ा परेशान हो गया. जिसे रूपा समझ गई.


रूपा : (स्माइल, शारारत) अरे परेशान मत हो. तेरी दुल्हन को मै लेकर आई हु.


तभि उसने एक हाथ डोर से बहार निकला. और कविता को रूम के अंदर खींचा. रूपा किसी भाभी की तरह वीरू से मज़ाक कर रही थी. वीरू कविता को भी देख कर थोड़ा हैरान हुआ. क्यों की कविता सर से निचे बेडशीट से ढकी हुई थी. रूपा कविता को वीरू के सामने उसके पाऊ की तरफ लेकर खड़ा कर देती है.

वीरू के सामने कविता किसी नई दुल्हन की तरह शर्माती उस बेडशीट मे ढकी हुई निचे देख रही थी. वीरू जिस पोजीशन मे बैठा हुआ था. भले ही हाथ बंधे हुए हो. पर फील किसी सहेनसा जैसा ही था. कविता को देख कर वीरू के फेस पर स्माइल आ गई.

पर जैसे वो रुआब मे अपनी हसीं रोक रहा हो. वो कविता को देखता ही रहा. तभि रूपा जैसे नजराना पेश कर रही हो. उसने कविता पर से वो बेडशीट खींच ली. कविता एकदम से सहम गई. उसने ऐसा अचानक होगा सोचा नही था. कविता ने किसी लाचार की तरह अपने दोनों हाथो और कोनियो से खुद को छुपाया.

वो ऊपर नही देखती. पर उसे अपने आप ही शर्म आ रही थी. वो एक हाथ से अपनी योनि. और दूसरे हाथ से अपने जोबन को छुपा लेती है. रूपा जो कर रही थी. उसमे वो कामयाब हो गई.

वो वीरू के अंदर कविता के लिए आकर्षण एक सेक्स अपीप पैदा करना चाहती थी. जो उसने बाकि किसी भी लड़की या औरत के अंदर ना महसूस की हो. कविता का ऐसे शर्माना वीरू को भा गया.

वीरू ने कविता को अब तक अपनी मन मानी करते ही तो देखा था. वो पहेली बार शरमाते देख रहा था. ऊपर से कविता नंगी भी थी. उसी समय वीरू का लिंग एक झटके के साथ अचानक खड़ा हो गया.

रूपा और ज्यादा खुश हो गई. वीरू के लिंग के तनाव को उसने भी देखा. वो वीरू के चहेरे को गौर से देख रही थी. रूपा ने कविता के हाथ को सकती से पकड़ा. और उसे सीधा खड़ी करती है.


रूपा : अस्स्स.. च... अरे सीधी खड़ी हो ना.


कविता थोड़ी जबरदस्ती पर मान गई. और दोनों हाथ सीधे किए किसी सिपाही की तरह सावधान खड़ी हो गई. रूपा ने थोड़ा जबरदस्ती जोर लगाकर कविता की ठोड़ी पकड़ी और फेस सीधा किया. और एकदम से सीधा होते कविता एकदम रुक ही गई.

वीरू और कविता दोनों की नजरें एकदम से मिली. वैसे तो कविता ने वीरू को कैद किया हुआ था. पर उस वक्त तो कविता ही उसकी कैदी बनी हुई थी. दोनों लगातार एक दूसरे को ही देखे जा रहे थे. ना दोनों मे से किसी के फेस पर स्माइल और ना ही कोई शिकन.

रूपा समझ गई की अगर कविता खुद से ही खुल गई तो वो आज़ाद होकर खुद ही वीरू पर चढ़ जाएगी. और रूपा जो चाहती थी. वो नही हो पाएगा. रूपा ने तुरंत कविता का हाथ पकड़ा. और तुरंत कविता को झटके से पलट दिया. जहा वीरू वासना छोड़ कविता मे खोने वाला था. वो अब कविता की काया को देखता ही रहे गया.

भले ही वीरू कविता को कई बार नंगा देख चूका था. पर जब कविता पलटी तो ऊपर से निचे तक मानो वो सांचे मे ढली हो. वो मृगणायनी की लम्बाई और कमर का काटव इतना ज्यादा था की वीरू को कल्पना सागर मे पहोंचा दिया. वीरू को जैसे यकीन करना मुश्किल हो गया हो. उस वक्त वो हिप्स का उठाव तो नही समझ पाया.

लेकिन कटीली कमर से जो मटके जैसा घेराव हो रहा था. वो एकदम अदभुत था. रूपा जो वीरू मे बदलाव देखना चाहती थी. वो हो चूका था. मुँह खोले आंखे फाडे वीरू बस कविता को ही देखे जा रहा था. रूपा ने एक हाथ से कविता की बाजु पकड़ी हुई थी.

जैसे वीरू कोई राजा हो. और कविता कोई गणिका हो. जो वीरू को खुश करने के लिए लाई गई हो. रूपा अपने दूसरे हाथ से कविता की पिठ को सहेलाती है. जिस से कविता को मानो करंट सा लगा. वो तो पहले से ही डरी हुई थी. रूपा ने जो माहौल तैयार किया. उस से वो अपना ही अस्थितवा भूल गई थी. दिल की धड़कने तेज़ हो गई. और वो सिसक पड़ी.


कविता : (बेचैनी, मदहोशी, उत्तेजना ) ससससस.. अहह...


कविता की सुरीली आवाज इतनी कामुख थी की वीरू के लिंग मे एक तनाव भरा झटका सा लगा. तुक निहालना मुश्किल हो गया. और गले मे ही फस गया. यह देख के रूपा खिल खिलाकर हस पड़ी.


रूपा : (स्माइल ) हे ना खूबसूरत मेरी गुड़िया.


वीरू जैसे होश मे तो आया. पर फिर भी होश मे ना रहना चाहता हो. वो एक बार रूपा को देखता है. और तुरंत ही नजरें हटाकर कविता को ही देखने लगा. रूपा अपना हाथ धीरे धीरे निचे सरकाने लगी. और उसका हाथ कविता के हिप्स पर पहोच गया. हाथ निचे जैसे जैसे सरका कविता उतना ही लम्बा सिसकती है.


कविता : सससससससस..............
..... रूपापापापापा.... आआ...


वीरू की तो इतनी लम्बी सिसक सुनकर मानो जान ही निकल गई हो. मगर झटका तो रूपा को लगा. क्यों की सिसकते हुए रूपा ने कविता के मुँह से अपना नाम सुना. वो समझ गई कविता उसके काबू मे नही है. उसकी जो भी हालत है. वो सिर्फ वीरू के लिए है.

पर फिर भी उसके चहेरे पर शिकन नही आई. रूपा का मकशद यह नही की वो कविता पर खुद के लिए काबू करना चाहती थी. उसका मकशद यह की वो वीरू के अंदर कविता के लिए एक्ट्रेक्शन पैदा कर सके. जिसमे वो कामयाब हो भी रही थी.

नुकसान बस यह हो रहा था की रूपा की खुद की फैंटासी पूरी नही हो पाएगी. लेकिन रूपा ने कोसिस फिर भी नही छोडी. और जो करना चाहती थी. वो जारी रखती है. वो कविता का हाथ पकड़ कर थोड़ा खींचते हुए वीरू के करीब साइड मे ले आई. और कविता को वीरू के बगल मे पेट के बल उलटी लेटा दिया.



कविता : अह्ह्ह ससस रूपा तुम क्या कर रही हो.


वीरू के तो होश उड़े हुए थे. ऊपर से रूपा कविता को उसके बिलकुल करीब ले आई. पर कविता की जान लेवा कामुख आवाज वीरू के अंदर कुछ अजीब सी सेक्स अपील पैदा कर रही थी. अचानक जब कविता उसके बगल मे लेटी वीरू उसे देखने के लिए खुद भी टेढ़ा हो गया. जिस से उसका हाथ खींचने लगा.

कविता भी उसकी तरफ मुँह किए हुए. उसका एक गाल तकिये मे दबा हुआ था. और कविता भी पालक झबकाए बिना बस उसे ही देख रही थी. तभि कविता शर्मकार हलका सा मुस्कुराई. और तुरंत अपना सर घुमाकर दूसरी तरफ कर लेती है.

उसकी इस अदाह ने वीरू को मानो घायल ही कर दिया. वीरू और ज्यादा कविता की तरफ झूक ने लगा. पर इसके हाथ बंधे हुए थे. तभि वीरू की दूसरी तरफ रूपा आकर बैठ गई. उसने बेड पर ही साइड मे कटोरी रखी. जिसमे तेल था. पर वीरू ने उसपर ध्यान ही नही दिया. वीरू को खुद नही पता था की वो कविता की तरफ इतना ज्यादा एक्ट्रेड क्यों हो रहा है. जबकि वो तो उसे भोग भी चूका है.

वीरू का ध्यान तो करीब से दिख रही कविता के ऊपर था. कविता की गोरी लम्बी पिठ. जिसपर कविता के काले बाल बिखरे हुए थे. कविता की नंगी नागिन जैसी कमर. और कमर के खत्म होते ही एकदम से उठते कविता के हिप्स. जो एकदम कसे हुए ही लग रहे थे.

तभि रूपा ने अपने दोनों हाथ तेल मे साने. और वीरू की टांगो को अपने हाथो से खोला. जैसे वीरू को उसने छुआ. वीरू ने भी गर्दन घुमाकर रूपा की तरफ देखा.


रूपा : (स्माइल, शारारत ) अरे तेरी ही है. आज तो फिर तेरी सुहागरात है. आराम से करना.


वीरू को करंट सा लगा. रूपा ने अपने दोनों तेल से सने हाथो के बिच वीरू के लिंग को दबा लिया. और अपने दोनों हाथो को आपस मे हलके हलके मशलने लगी. उसके दोनों हाथो के बिच लिंग भी था. मशलते हुए रूपा वीरू की आँखों मे ही देख रही थी. ऐसी हरकत से वीरू का भी मुँह खुल गया. और वीरू भी सिसक पड़ा.


वीरू : (मदहोश) ससससस अह्ह्ह्ह...


वीरू भी मदहोशी के आलम मे पहोच गया. पर दूसरा झटका रूपा को वीरू ने दिया.


वीरू : (मदहोश) ससस मेरे तो हाथ बंधे हुए है. ससस उसे तो खोल. ससससस...


वीरू जबतक कविता को देख रहा था. वो कुछ भी नही बोल पा रहा था. पर जब उसकी नजर कविता से हटकर रूपा पर गई तो उसे किस चीज की जरुरत है. वो खुद बोल रहा था. उसने अपने हाथ खोलने को कहा. जब की रूपा के हाथ मे तो वीरू का लिंग था. जिसे रूपा मथते हुए तेल लगा रही थी. रूपा समझ चुकी थी.

वो मदहोशी भरा एक्ट्रेक्शन सिर्फ कविता के लिए है. रूपा ने वीरू को कोई जवाब नही दिया. और वो खिड़ी हो गई. वो बेड से उठकर घूमती हुई बेड के दूसरी तरफ कविता के पास आ गई. मगर उस तरफ बैठने की जगह नही थी. उस तरफ कविता किनारे पर थी.

रूपा निचे ही घुटनो के बल बैठ गई. उसके हाथ मे वही तेल वाली कटोरी थी. पर कविता इस बार वीरू की बजाय रूपा को देख रही थी. रूपा उसे देख कर जरासा मुस्कुराई. लेकिन कविता शांत रही. उसके फेस ओर कोई प्रतिक्रिया नही थी. ना ही वो स्माइल करती है.

इस बार रूपा को बुरा भी लगा. जैसे दोनों उसे कबाब मे हड्डी समझ रहे हो. पर रूपा फिर भी अपना काम जारी रखती है. और तेल वाली कटोरी मे अपनी उंगलियां डुबोकर अपना हाथ आगे बढाती है.

वीरू बहोत ध्यान से देख रहा था. जो हो रहा था. और जो वीरू कपना कर रहा था. उसे अंदाजा होने के बावजूद भी वीरू का मुँह खुल चूका था. आंखे जैसे फटने वाली हो. जैसे उस नज़ारे के सिवा दुनिया ही पूरी खतम हो चुकी हो. रूपा का कविता की हिप्स की तरफ बढ़ा. और चार उंगलियां कविता के हिप्स की दरारो मे घुस गई.

वीरू की तो अह्ह्ह निकल गई. बिना कुछ बोले वो थोड़ा सिसक पड़ा. ऐसा लगा जैसे रूपा के बड़े आहिस्ता से चार ऊँगली घुसा दी हो. जैसे रूपा ने मक्खन के डिब्बे मे हाथ डाल दिया हो. दरसल वो चारो ऊँगली कविता की कस्सी हुई हिप्स की दरारो मे ही घुसी थी.

गहेराइयों मे नही. पर मदहोश वीरू को कुछ और ही महसूस हुआ. रूपा ने जब हाथ आगे बढ़ाया. कविता समझ गई की उसे क्या महसूस होने वाला है. कविता ने अपनी नजरें तुरंत हटा दी. वो पेट के बल लेटी हुई थी. इस लिए सामने मतलव वो सर के ऊपर देखने लगी.

अपनी आंखे बंद कर ली. और जैसे उसे टच हुआ. उसके मुँह से कमुख्ता का फवारा फुट पड़ा. एक मिट्ठी लम्बी और गहेरी अह्ह्ह निकल गई.


कविता : (आंखे बंद, मदहोश) ससससस आआआहहहहह.......


कविता को बहोत अच्छा भी लग रहा था. और वो रूपा की उंगलियों को अपने हिप्स की दरारो के बिच गुद गुदाते महसूस कर रही थी. वही वीरू भी यह सब देख पागल हो रहा था. हाथ बंधे हुए थे. फिर भी वो खींच रहा था. कविता को जैसे जैसे गुदगुदी होती. वो सिसकने लगती.


कविता : (मुँह खुला, मदहोश, आंखे बंद) ओओओ हहहह....


कविता के फेस पर कमुख्ता देख कर वीरू को ज्यादा तनाव होने लगा. वो अपने हाथो से कुछ नही कर सकता था. इस लिए वो बार बार अपने पेरो को आपस मे रगड़ता. वो अपने दोनों पेरो के बिच अपने लिंग को दबाने की कोसिस कर रहा था. जिसके वो नाकामयाब हो रहा था. और बार बार हिलने का एहसास कविता को भी हो गया.


कविता : (मदहोश, आंखे बंद) अह्ह्ह ससस रूपा... ससससस.. रूपा तुम बहार जाओ... ससस...


रूपा ने यह सुना तो उसे बुरा लगा. उसे कविता के पिछवाड़े से खेलने मे बहोत मझा आ रहा था. अचानक कविता ने उसे बहार जाने को कहा तो उसे लगा की कविता उसे कबाब मे हड्डी समझ रही है. पर कविता रूपा के सामने आगे बढ़ने से शर्मा रही थी.

रूपा को लगने लगा की कविता सिर्फ उस से अपना काम ही निकलवाना चाहती है. उसे उसकी कोई जरुरत नही. फिर भी वो वहां रहने के लिए कविता को रिझाने की कोसिस करती है. वो अपनी एक ऊँगली कविता के पिछवाड़े के छेद मे आहिस्ता से प्रेस करते हुए धीरे से घुसा देती है.


रूपा : (स्माइल, शारारत) अरेरेरे.... ऐसे कैसेसेसे.... अभी तो तुम्हे तैयार तो कर दूदूदूदू....


कविता ने अपना एक हाथ पीछे लेजाकर रूपा का हाथ पकड़ लिया. और रूपा को वही रोक दिया. वो सर झटकते हुए रूपा को देखती है. और थोड़ा सख़्ती से पेश आती है.


कविता : रूपा प्लीज... तुम बहार जाओ.


रूपा हक्की बक्की रहे गई. उसकी स्माइल एकदम से गायब हो गई. कविता ने भी यह महसूस किया. पर उसके अंदर जो वीरू के लिए जो फ्लो चल रहा था. वो उसे मिटने नही देना चाहती थी. इसी लिए वो रूपा को समझाना या मनाना नही करती. रूपा खड़ी हुई. और रूम से बहार चली गई.
 

Shetan

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Episode 10.7

रूपा के जाते ही कविता झट से उठी. और डोर क्लोज कर के लॉक कर देती है. और वापस बेड पर आकर वैसे ही लेट गई. वीरू उसे ऐसे न्यूड चहल पहल करते देख मचल गया. भले ही वीरू हर बार डिसाइड करता की वो अब कविता से एकदम दूर ही रहेगा.

पर वीरू से ऐसा हो नही पता. रूपा ने उसे कविता के पिछवाड़े को भोगने का सपना दिखाया. और वीरू तेवर दिखाते हुए भी बाहेक गया. वही वीरू के पास वापस आकर लेट ते ही कविता के दिल की धड़कन और ज्यादा ही तेज़ होने लगी. वो बेचैन हो गई

उसे अच्छा भी लग रहा था. और डर भी. वो दोनों ही यह नही समझ पा रहे थे की दोनों को एक दूसरे के साथ हर बार एक नया एहसास हो रहा था. जैसे दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हो.

कविता ने अब भी फेस दूसरी तरफ ही किया हुआ था. और वीरू उसे पूरी तरह से नंगा ही देख रहा था. अब कोई बिच मे रूकावट नही थी. कविता की खूबसूरत काया, उसकी बनावट सच मे अनोखी ही थी.

खूबसूरत गोरी पिठ पर कविता के काले घने लम्बे बालो का जाल उसकी हिप्स तक आ रहा था. नागिन जैसी पतली कमर तो कयामत ही थी. और उसके निचे मटके जैसा शेप. वीरू को सबसे ज्यादा खास तो कविता की हिप्स उसका पिछवाडा लगा. एकदम शेप मे. एकदम परफेक्ट उठाव था. वीरू से रहा नही गया. और वो कविता को पुकारने लगा.


वीरू : ए ए ए... सुनो... सुनो ना.


कविता सिर्फ सर घूमती है. और वीरू को देख कर बच्चों के जैसे मासूमियत से मुस्कुराती है.


वीरू : मै तुम्हे छूूँगा कैसे?? मेरे हाथ तो खोल दो.


कविता ने सिर्फ अपने फेस से अपनी स्माइल गायब की. और मुँह से कच की आवाज निकली. वीरू कविता को फुसलाने की कोसिस करने लगा.


वीरू : अरे.. कसम से. मै भागूँगा नही. मै तुम्हे छूना चाहता हु. देखो सिर्फ एक ही हाथ खोल दो.


वीरू का प्लान तो हमेसा से ही भागने का था. लेकिन उस वक्त कविता का रूप उसकी काया इतनी ज्यादा भा रही थी की उसे उस वक्त सच मे भागने का खयाल नही आया. पर सिर्फ एक हाथ खोलने की बात कविता मान गई. और वो एक हाथ खोलने लगी.

कविता भी वीरू के साथ पाने की लालच मे इतनी ज्यादा खोई हुई थी की वो खुद गन लाना भूल गई थी. वो हथकड़िया की कोई चाबी तो थी नही. वो तो बस पासवर्ड से खुलती थी.

जो अब रूपा और कविता दोनों को पता थी. कविता वैसे ही छिपकली के जैसे पेट के बल ऊपर को सरकती है. और वीरू का एक हाथ खोल देती है.

जैसे ही कविता ने वीरू का एक हाथ खोला. वीरू उतावला हो गया. और तुरंत कविता को उसकी कमर से जकड़ कर अपने निचे खिंच लेता है. और खुद पलट कर उसके ऊपर आ गया. कविता पेट के बल उलटी थी. वीरू भी कविता के ऊपर आ गया.

जैसे मादा छिपकली के ऊपर नर छिपकली चढ़ जाती है. जैसे मादा मगरमच्छ के ऊपर नर मगरमच्छ चढ़ जाता है. वीरू कविता को हाथो से दूसरी बार छू रहा था. पहेली बार तो वो नशे मे था. लेकिन होसो आवाज मे कविता को वो चौथे दिन छू रहा था.

बदन से बदन की छुअन हुई. बदन को वो कामुख गर्माहट मिली तो एक अलग ही नशा छा गया. आंखे बंद हो गई. और मुँह से सुकून भरी आवाज निकल पड़ी.


वीरू : (आंखे बंद, मदहोश, सुकून) ससससस अह्ह्ह्ह......


वीरू का लिंग हिप्स की दरारो मे सेट जरूर हुआ और झट से ऊपर लेटने के कारण प्रेस भी हुआ. पर सही रस्ता नही मिला था. वही कविता को अच्छा तो लगा. लेकिन उसे भी पता था की रूपा ने उसे किस सेक्स के लिए तैयार किया है. उसे उस पहले दर्द का डर था.

जिसका अंदाजा तो उसे रूपा की ऊँगली से ही हो गया. जब की कविता को वीरू का साइज अच्छी तरह से पता था. उतावला बीरु वैसे तो खिलाडी था. पर हड़बड़ट मे उसे अंदाजा नही रहा. उसने छेद तो ढूढ़ लिया. पर सब्र रखे बिना प्रेस कर दिया.

वीरू का लम्बा मोटा लिंग बिना चेतावनी के कविता के पिछवाड़े को चिरते अंदर घुस गया. कविता यह दर्द बरदास नही कर पाई. वो वीरू को रोकती. उस से पहले देर हो गई. कविता दर्द से फड़फड़ाने लगी. वो दर्द से तड़पने लगी. और दर्द बरदास नही हुआ तो वो बेहोश हो गई. वीरू यह बिलकुल भी नही समझ पाया.

वो अंदर डालने के बाद रुक गया. और कसे हुए पिछवाड़े की गर्माहट का आनंद लेने लगा. जैसे अपना लिंग माखन की टिकिया मे घुसेड़ दिया हो. कविता का पिछवाडा भी तो उसकी योनि से भी ज्यादा कसा हुआ था. वीरू को ऐसा स्वाद किसी और औरत लड़की मे नही आया था. वो तो मानो उसी पल मे खो गया.

वीरू आंखे बंद किए मुँह खोले अपनी कमर को ऊपर निचे कर रहा था. और मुँह से जोर से सांसे ले रहा था. उसकी साँसो के साथ बिच बिच मे आवाज भी निकलती. लेकिन उसे यह पता नही था की उसके निचे लेटी कविता बेहोश हो गई है. वीरू कब चरम पर पहोच गया उसे पता ही नही चला. कुछ देर बाद कविता को होश जरूर आया.

कविता को जब होश आया. तब भी उसे अपने पीछे बहोत दर्द हो रहा था. वो अपने अंदर कोई मोटी लम्बी चीज को महसूस करती है. कविता को बहोत गुस्सा आया. उसे बहोत दुख भी हुआ. यही सोच कर की क्या यही करने पर उसे मुझसे प्यार होगा.

कविता चुप चाप लेटी रही. उसने अपना मुँह गुस्से मे ही दबा लिया. और सब बरदास करते सब खतम होने का इंतजार करती रही. वीरू को होश ही नही. वो कविता को अपने एक हाथ से जकड़े कुछ आखरी झटके मार रहा था. उसे मझा भी इतना आ रहा था की उसे कविता की हकात का अंदाजा ही नही रहा. वो उन आखरी झटको मे लीन चरम पर पहोचते झडने लगा.


वीरू : (मदहोश, मुँह खुला, आंखे बंद) आअह्ह्ह..... ससससस.. .....


जब वीरू का गरम लावा कविता के अंदर गया. तब जाकर कविता को ठोड़ी राहत हुई. क्यों की कविता को अंदर दर्द के साथ जलन भी महसूस हो रही थी. वीरू वैसे बदला तो लेना चाहता था. मगर यह सब उसने बदले की भावना से नही किया था.

वो सब मदहोशी और हवस मे हो गया. जब कविता छट पटा रही थी. उस वक्त वीरू ने अपने एक हाथ से कविता की पिठ को पूरी तरह से दबाया हुआ था. और वीरू ने उस वक्त कविता पर ध्यान नही दिया.

उस वक्त वो आंखे बंद किए ऊपर देख रहा था. वीरू ने जब चरम सुख पा लिया. और वो खलित होते कविता पर ही निढल होकर उसपर ही पसर गया. कविता कुछ पल तो शांत रही. फिर गुस्से मे उसने वीरू को अपने ऊपर से धकेला.


कविता : (दर्द, बवुक, दुखी, रोते हुए) अह्ह्ह... दूर हटो मुझसे.


कविता के इस प्रकार धुत्कारने से वीरू ने जाब कविता के चहेरे को देखा तो वो हैरान हो गया. वो खुद भी भावुक एकदम दुखी हो गया.

कविता का खूबसूरत चहेरा इतना मासूम था की कोई निर्दय भी उसे रोता हुआ ना देख पाए. वीरू तो वैसे भी जिंदगी भर सिर्फ औरतों को खुश किया करता था. वो भला कैसे बरदास कर पाता.

की उसके कारण एक लड़की दर्द झेल रही थी. उसने किसी लड़की को दर्द दिया. वीरू भी दुखी अपना हाथ कविता की तरफ बढ़ता है तो कविता ने उसका हाथ झटक दिया. और बेड से खड़ी होने लगी.

कविता ने जैसे बेड छोड़ा. और जैसे अपना पाऊ फर्श पर रखा. उसे बहोत तेज दर्द हुआ. वो दर्द बरदास नही कर पाई. और निचे फर्श पर धड़ाम देकर गिर पड़ी. वो गिरे हुए भी ऐसे रो रही थी. जैसे कोई छोटा बच्चा कोई बड़ी चोट खाया हो. और वो बरदास ना कर पा रहा हो.

गिरते ही कविता की हिप्स फर्श पर टिक गई तो कविता की एक बार और ज्यादा चीख निकल गई. वीरू कविता का यह हाल देख कर बहोत ही दुखी हो गया. वो खुद खींचने लगा. पर बंधा हुआ था. इसी लिए कविता के करीब ना जा सका. वो कविता को पुकारता है.


वीरू : (भावुक) सुनो.. रुको.. मेरे पास आओ.


कविता बैठे बैठे ही वीरू की तरफ देख कर जोर से चिल्लाई.


कविता : (गुस्सा, रोते हुए) नही...............................


कविता इतनी जोर से चिल्लाई की वीरू उसके बाद कुछ बोल ही नही पाया. पर जब उसने कविता का चहेरा देखा तो वो अंदर तक दुखी हो गया. अंशू से तो पूरा चहेरा भीग ही चूका था. नाक से कफ तक बहार निकल गया था. चीखने के बाद कविता सिसक रही थी.

साथ जैसे हिचकी भी आ रही हो. कविता घुटनो के बल ही जैसे तैसे डोर तक जाने लगी. वो बच्चो के जैसे सिसकते रोती भी जा रही थी. दुखी वीरू बस कविता को देखता ही रहा. बड़ी मुश्किल से कविता डोर तक पहोचकर डोर के ही सहारे खड़ी हुई. और बहार निकल गई. कविता के जाने के बाद वीरू एकदम खामोश हो गया.

ना उसके पास पूरी रात फिर कोई आया. ना ही वो जा सकता था. पर वक्त बीत रहा था. रात के 12 बजने वाले थे. वीरू यह भूल गया की उसकी मोहलत का एक और दिन कुछ ही पलों मे खतम होने वाला था. Wednesday यानि की बुधवार का दिन भी बीतने की कगार पर था. और वीरू को एहसास ही नही था. की उसके पास अब तीन दिन ही बचे है. पैसे जुटाने के लिए.
 

Shetan

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Episode 10.8

वही जब कविता वीरू वाले रूम से निकली और अपने उसी दूसरे रूम की तरफ चल दी. वो चलते हुए लड़खड़ा रही थी. उसे दर्द भी बहोत हो रहा था. चलते हुए कविता ज्यादातर दीवार का सहारा ले रही थी.

कविता ने हर एक कदम पर दर्द महसूस किया. और वो जैसे तैसे रूम के डोर तक पहोच गई. डोर तो बंद था. पर कविता के हाथ लगते ही वो खुल गया. डोर पर ही सहारा लिए खड़ी कविता ने सामने देखा तो रूपा उस बेड पर सो रही थी. दूसरी तरफ करवट लिए.

रूपा ने करवट भले ही दूसरी तरफ ली हुई थी. पर वो जाग रही थी. उसकी आंखे खुली हुई थी. पीछे कोई है. इसका एहसास उसे हो गया. और वो समझ भी गई की वो कविता ही है. पर रूपा खुद भी कविता से नाराज थी. उसे लगा की सायद कविता उसे मानाने आई है.

रूपा इंतजार करती है. और कुछ बोले बिना वैसे ही पड़ी रही. कविता अपना दर्द किसी से नही बाटती थी. तभि तो रूपा और वीरू से पहले कोई उसका सच्चा दोस्त नही था. वो खुद अकेली घुटती रहती.

पर कभी किसी की कोई मदद नही लेती. कविता ने जब रूपा को देखा तो सिसकना रोक दिया. वो बिलकुल आवाज किए बिना जैसे तैसे बेड तक पहोची. और रूपा के ही बगल मे आकर लेट गई.

कविता भी रूपा की तरफ पिठ कर लेती है. कविता के पास ओढ़मे के लिए ब्लेंकेट नही था. क्यों की वो ब्लेंकेट रूपा ने ओढ़ा हुआ था. जबकि कविता पूरी तरह से नंगी थी. उसे ठंड भी लग रही थी.

पर जो तकलीफ उसने वीरू के साथ कुछ पल पहले झेली. उस तकलीफ के सामने ठंड कुछ भी नही थी. कविता ठंड से सिकुड़ने लगी. पर उसने रूपा से भी मदद नही मांगी. अब उसके आँखों के अंशू तक सुख गए थे. और वो एकदम शांत हो चुकी थी.

रूपा की उम्मीद से परे उसे कविता का कोई रिएक्शन नही मिला तो वो पलटी. और उसने कविता को ठंड मे सिकुड़ता देखा. रूपा ने तुरंत ही कविता को वो कम्बल उढ़ा दिया.


रूपा : अरे रे. बीबीजी कम से कम मुझे बोल तो देती.


रूपा ने भी नोट नही किया की कविता को ऐसी क्या प्रॉब्लम हुई. जो वो वापस आई है. वो कविता पर दया खा रही थी. पर ऐसी हालत मे उसे कविता पर ज्यादा ही प्यार आने लगा था. कविता बिलकुल भी नही हिल रही थी. जैसे वो सो गई हो. एक ही कम्बल मे रूपा कविता से चिपक कर सो गई. रात धीरे धीरे बीत गई.

और उसी रात के साथ वीरू की मोहालत का एक और दिन भी बीत गया. बुधवार खतम हो गया और गुरुवार स्टार्ट हो गया. Thursday जो वीरू के लिए ख़ामोशी भरा दिन होने वाला था.
 
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