Episode 10.6
वीरू ने डिनर किया. उसके बाद वो ऊपर की ओर खिसक के बैठा था. उसके हाथ ही दोनों ऐसे बंधे हुए थे. या तो वो थोड़ा ऊपर को खिसक कर बैठ पता. या फिर सीधा लेट पता. वीरू को रूपा ने जो कविता के पिछवाड़े की लालच दी. उसके बाद से वीरू उत्तेजित था.
वीरू को यह पता थी की कविता का पिछवाडा कोरा है. क्यों की जब कविता ने वीरू के साथ सेक्स करते अपना कोमार्य भंग करवाया तो पिछवाडा तो कोरा होगा ही. वीरू अकेले अकेले बैठे भी मुस्कुराने लगा. पर तभि उसे याद आया की उसे तो कविता से नफरत करना है. वीरू ने अपने अंदर की नफरत को जगाया.
वो मन ही मन सोचने लगा की आज वो उसे कैद करके रखने का बदला लेगा. वो सोच मे डूबा हुआ था की तभि रूपा अंदर आई. वीरू ने रूपा की तरफ देखा. रूपा के फेस पर शारारत भरी मुस्कान थी. वीरू सिर्फ रूपा को देख कर थोड़ा परेशान हो गया. जिसे रूपा समझ गई.
रूपा : (स्माइल, शारारत) अरे परेशान मत हो. तेरी दुल्हन को मै लेकर आई हु.
तभि उसने एक हाथ डोर से बहार निकला. और कविता को रूम के अंदर खींचा. रूपा किसी भाभी की तरह वीरू से मज़ाक कर रही थी. वीरू कविता को भी देख कर थोड़ा हैरान हुआ. क्यों की कविता सर से निचे बेडशीट से ढकी हुई थी. रूपा कविता को वीरू के सामने उसके पाऊ की तरफ लेकर खड़ा कर देती है.
वीरू के सामने कविता किसी नई दुल्हन की तरह शर्माती उस बेडशीट मे ढकी हुई निचे देख रही थी. वीरू जिस पोजीशन मे बैठा हुआ था. भले ही हाथ बंधे हुए हो. पर फील किसी सहेनसा जैसा ही था. कविता को देख कर वीरू के फेस पर स्माइल आ गई.
पर जैसे वो रुआब मे अपनी हसीं रोक रहा हो. वो कविता को देखता ही रहा. तभि रूपा जैसे नजराना पेश कर रही हो. उसने कविता पर से वो बेडशीट खींच ली. कविता एकदम से सहम गई. उसने ऐसा अचानक होगा सोचा नही था. कविता ने किसी लाचार की तरह अपने दोनों हाथो और कोनियो से खुद को छुपाया.
वो ऊपर नही देखती. पर उसे अपने आप ही शर्म आ रही थी. वो एक हाथ से अपनी योनि. और दूसरे हाथ से अपने जोबन को छुपा लेती है. रूपा जो कर रही थी. उसमे वो कामयाब हो गई.
वो वीरू के अंदर कविता के लिए आकर्षण एक सेक्स अपीप पैदा करना चाहती थी. जो उसने बाकि किसी भी लड़की या औरत के अंदर ना महसूस की हो. कविता का ऐसे शर्माना वीरू को भा गया.
वीरू ने कविता को अब तक अपनी मन मानी करते ही तो देखा था. वो पहेली बार शरमाते देख रहा था. ऊपर से कविता नंगी भी थी. उसी समय वीरू का लिंग एक झटके के साथ अचानक खड़ा हो गया.
रूपा और ज्यादा खुश हो गई. वीरू के लिंग के तनाव को उसने भी देखा. वो वीरू के चहेरे को गौर से देख रही थी. रूपा ने कविता के हाथ को सकती से पकड़ा. और उसे सीधा खड़ी करती है.
रूपा : अस्स्स.. च... अरे सीधी खड़ी हो ना.
कविता थोड़ी जबरदस्ती पर मान गई. और दोनों हाथ सीधे किए किसी सिपाही की तरह सावधान खड़ी हो गई. रूपा ने थोड़ा जबरदस्ती जोर लगाकर कविता की ठोड़ी पकड़ी और फेस सीधा किया. और एकदम से सीधा होते कविता एकदम रुक ही गई.
वीरू और कविता दोनों की नजरें एकदम से मिली. वैसे तो कविता ने वीरू को कैद किया हुआ था. पर उस वक्त तो कविता ही उसकी कैदी बनी हुई थी. दोनों लगातार एक दूसरे को ही देखे जा रहे थे. ना दोनों मे से किसी के फेस पर स्माइल और ना ही कोई शिकन.
रूपा समझ गई की अगर कविता खुद से ही खुल गई तो वो आज़ाद होकर खुद ही वीरू पर चढ़ जाएगी. और रूपा जो चाहती थी. वो नही हो पाएगा. रूपा ने तुरंत कविता का हाथ पकड़ा. और तुरंत कविता को झटके से पलट दिया. जहा वीरू वासना छोड़ कविता मे खोने वाला था. वो अब कविता की काया को देखता ही रहे गया.
भले ही वीरू कविता को कई बार नंगा देख चूका था. पर जब कविता पलटी तो ऊपर से निचे तक मानो वो सांचे मे ढली हो. वो मृगणायनी की लम्बाई और कमर का काटव इतना ज्यादा था की वीरू को कल्पना सागर मे पहोंचा दिया. वीरू को जैसे यकीन करना मुश्किल हो गया हो. उस वक्त वो हिप्स का उठाव तो नही समझ पाया.
लेकिन कटीली कमर से जो मटके जैसा घेराव हो रहा था. वो एकदम अदभुत था. रूपा जो वीरू मे बदलाव देखना चाहती थी. वो हो चूका था. मुँह खोले आंखे फाडे वीरू बस कविता को ही देखे जा रहा था. रूपा ने एक हाथ से कविता की बाजु पकड़ी हुई थी.
जैसे वीरू कोई राजा हो. और कविता कोई गणिका हो. जो वीरू को खुश करने के लिए लाई गई हो. रूपा अपने दूसरे हाथ से कविता की पिठ को सहेलाती है. जिस से कविता को मानो करंट सा लगा. वो तो पहले से ही डरी हुई थी. रूपा ने जो माहौल तैयार किया. उस से वो अपना ही अस्थितवा भूल गई थी. दिल की धड़कने तेज़ हो गई. और वो सिसक पड़ी.
कविता : (बेचैनी, मदहोशी, उत्तेजना ) ससससस.. अहह...
कविता की सुरीली आवाज इतनी कामुख थी की वीरू के लिंग मे एक तनाव भरा झटका सा लगा. तुक निहालना मुश्किल हो गया. और गले मे ही फस गया. यह देख के रूपा खिल खिलाकर हस पड़ी.
रूपा : (स्माइल ) हे ना खूबसूरत मेरी गुड़िया.
वीरू जैसे होश मे तो आया. पर फिर भी होश मे ना रहना चाहता हो. वो एक बार रूपा को देखता है. और तुरंत ही नजरें हटाकर कविता को ही देखने लगा. रूपा अपना हाथ धीरे धीरे निचे सरकाने लगी. और उसका हाथ कविता के हिप्स पर पहोच गया. हाथ निचे जैसे जैसे सरका कविता उतना ही लम्बा सिसकती है.
कविता : सससससससस..............
..... रूपापापापापा.... आआ...
वीरू की तो इतनी लम्बी सिसक सुनकर मानो जान ही निकल गई हो. मगर झटका तो रूपा को लगा. क्यों की सिसकते हुए रूपा ने कविता के मुँह से अपना नाम सुना. वो समझ गई कविता उसके काबू मे नही है. उसकी जो भी हालत है. वो सिर्फ वीरू के लिए है.
पर फिर भी उसके चहेरे पर शिकन नही आई. रूपा का मकशद यह नही की वो कविता पर खुद के लिए काबू करना चाहती थी. उसका मकशद यह की वो वीरू के अंदर कविता के लिए एक्ट्रेक्शन पैदा कर सके. जिसमे वो कामयाब हो भी रही थी.
नुकसान बस यह हो रहा था की रूपा की खुद की फैंटासी पूरी नही हो पाएगी. लेकिन रूपा ने कोसिस फिर भी नही छोडी. और जो करना चाहती थी. वो जारी रखती है. वो कविता का हाथ पकड़ कर थोड़ा खींचते हुए वीरू के करीब साइड मे ले आई. और कविता को वीरू के बगल मे पेट के बल उलटी लेटा दिया.
कविता : अह्ह्ह ससस रूपा तुम क्या कर रही हो.
वीरू के तो होश उड़े हुए थे. ऊपर से रूपा कविता को उसके बिलकुल करीब ले आई. पर कविता की जान लेवा कामुख आवाज वीरू के अंदर कुछ अजीब सी सेक्स अपील पैदा कर रही थी. अचानक जब कविता उसके बगल मे लेटी वीरू उसे देखने के लिए खुद भी टेढ़ा हो गया. जिस से उसका हाथ खींचने लगा.
कविता भी उसकी तरफ मुँह किए हुए. उसका एक गाल तकिये मे दबा हुआ था. और कविता भी पालक झबकाए बिना बस उसे ही देख रही थी. तभि कविता शर्मकार हलका सा मुस्कुराई. और तुरंत अपना सर घुमाकर दूसरी तरफ कर लेती है.
उसकी इस अदाह ने वीरू को मानो घायल ही कर दिया. वीरू और ज्यादा कविता की तरफ झूक ने लगा. पर इसके हाथ बंधे हुए थे. तभि वीरू की दूसरी तरफ रूपा आकर बैठ गई. उसने बेड पर ही साइड मे कटोरी रखी. जिसमे तेल था. पर वीरू ने उसपर ध्यान ही नही दिया. वीरू को खुद नही पता था की वो कविता की तरफ इतना ज्यादा एक्ट्रेड क्यों हो रहा है. जबकि वो तो उसे भोग भी चूका है.
वीरू का ध्यान तो करीब से दिख रही कविता के ऊपर था. कविता की गोरी लम्बी पिठ. जिसपर कविता के काले बाल बिखरे हुए थे. कविता की नंगी नागिन जैसी कमर. और कमर के खत्म होते ही एकदम से उठते कविता के हिप्स. जो एकदम कसे हुए ही लग रहे थे.
तभि रूपा ने अपने दोनों हाथ तेल मे साने. और वीरू की टांगो को अपने हाथो से खोला. जैसे वीरू को उसने छुआ. वीरू ने भी गर्दन घुमाकर रूपा की तरफ देखा.
रूपा : (स्माइल, शारारत ) अरे तेरी ही है. आज तो फिर तेरी सुहागरात है. आराम से करना.
वीरू को करंट सा लगा. रूपा ने अपने दोनों तेल से सने हाथो के बिच वीरू के लिंग को दबा लिया. और अपने दोनों हाथो को आपस मे हलके हलके मशलने लगी. उसके दोनों हाथो के बिच लिंग भी था. मशलते हुए रूपा वीरू की आँखों मे ही देख रही थी. ऐसी हरकत से वीरू का भी मुँह खुल गया. और वीरू भी सिसक पड़ा.
वीरू : (मदहोश) ससससस अह्ह्ह्ह...
वीरू भी मदहोशी के आलम मे पहोच गया. पर दूसरा झटका रूपा को वीरू ने दिया.
वीरू : (मदहोश) ससस मेरे तो हाथ बंधे हुए है. ससस उसे तो खोल. ससससस...
वीरू जबतक कविता को देख रहा था. वो कुछ भी नही बोल पा रहा था. पर जब उसकी नजर कविता से हटकर रूपा पर गई तो उसे किस चीज की जरुरत है. वो खुद बोल रहा था. उसने अपने हाथ खोलने को कहा. जब की रूपा के हाथ मे तो वीरू का लिंग था. जिसे रूपा मथते हुए तेल लगा रही थी. रूपा समझ चुकी थी.
वो मदहोशी भरा एक्ट्रेक्शन सिर्फ कविता के लिए है. रूपा ने वीरू को कोई जवाब नही दिया. और वो खिड़ी हो गई. वो बेड से उठकर घूमती हुई बेड के दूसरी तरफ कविता के पास आ गई. मगर उस तरफ बैठने की जगह नही थी. उस तरफ कविता किनारे पर थी.
रूपा निचे ही घुटनो के बल बैठ गई. उसके हाथ मे वही तेल वाली कटोरी थी. पर कविता इस बार वीरू की बजाय रूपा को देख रही थी. रूपा उसे देख कर जरासा मुस्कुराई. लेकिन कविता शांत रही. उसके फेस ओर कोई प्रतिक्रिया नही थी. ना ही वो स्माइल करती है.
इस बार रूपा को बुरा भी लगा. जैसे दोनों उसे कबाब मे हड्डी समझ रहे हो. पर रूपा फिर भी अपना काम जारी रखती है. और तेल वाली कटोरी मे अपनी उंगलियां डुबोकर अपना हाथ आगे बढाती है.
वीरू बहोत ध्यान से देख रहा था. जो हो रहा था. और जो वीरू कपना कर रहा था. उसे अंदाजा होने के बावजूद भी वीरू का मुँह खुल चूका था. आंखे जैसे फटने वाली हो. जैसे उस नज़ारे के सिवा दुनिया ही पूरी खतम हो चुकी हो. रूपा का कविता की हिप्स की तरफ बढ़ा. और चार उंगलियां कविता के हिप्स की दरारो मे घुस गई.
वीरू की तो अह्ह्ह निकल गई. बिना कुछ बोले वो थोड़ा सिसक पड़ा. ऐसा लगा जैसे रूपा के बड़े आहिस्ता से चार ऊँगली घुसा दी हो. जैसे रूपा ने मक्खन के डिब्बे मे हाथ डाल दिया हो. दरसल वो चारो ऊँगली कविता की कस्सी हुई हिप्स की दरारो मे ही घुसी थी.
गहेराइयों मे नही. पर मदहोश वीरू को कुछ और ही महसूस हुआ. रूपा ने जब हाथ आगे बढ़ाया. कविता समझ गई की उसे क्या महसूस होने वाला है. कविता ने अपनी नजरें तुरंत हटा दी. वो पेट के बल लेटी हुई थी. इस लिए सामने मतलव वो सर के ऊपर देखने लगी.
अपनी आंखे बंद कर ली. और जैसे उसे टच हुआ. उसके मुँह से कमुख्ता का फवारा फुट पड़ा. एक मिट्ठी लम्बी और गहेरी अह्ह्ह निकल गई.
कविता : (आंखे बंद, मदहोश) ससससस आआआहहहहह.......
कविता को बहोत अच्छा भी लग रहा था. और वो रूपा की उंगलियों को अपने हिप्स की दरारो के बिच गुद गुदाते महसूस कर रही थी. वही वीरू भी यह सब देख पागल हो रहा था. हाथ बंधे हुए थे. फिर भी वो खींच रहा था. कविता को जैसे जैसे गुदगुदी होती. वो सिसकने लगती.
कविता : (मुँह खुला, मदहोश, आंखे बंद) ओओओ हहहह....
कविता के फेस पर कमुख्ता देख कर वीरू को ज्यादा तनाव होने लगा. वो अपने हाथो से कुछ नही कर सकता था. इस लिए वो बार बार अपने पेरो को आपस मे रगड़ता. वो अपने दोनों पेरो के बिच अपने लिंग को दबाने की कोसिस कर रहा था. जिसके वो नाकामयाब हो रहा था. और बार बार हिलने का एहसास कविता को भी हो गया.
कविता : (मदहोश, आंखे बंद) अह्ह्ह ससस रूपा... ससससस.. रूपा तुम बहार जाओ... ससस...
रूपा ने यह सुना तो उसे बुरा लगा. उसे कविता के पिछवाड़े से खेलने मे बहोत मझा आ रहा था. अचानक कविता ने उसे बहार जाने को कहा तो उसे लगा की कविता उसे कबाब मे हड्डी समझ रही है. पर कविता रूपा के सामने आगे बढ़ने से शर्मा रही थी.
रूपा को लगने लगा की कविता सिर्फ उस से अपना काम ही निकलवाना चाहती है. उसे उसकी कोई जरुरत नही. फिर भी वो वहां रहने के लिए कविता को रिझाने की कोसिस करती है. वो अपनी एक ऊँगली कविता के पिछवाड़े के छेद मे आहिस्ता से प्रेस करते हुए धीरे से घुसा देती है.
रूपा : (स्माइल, शारारत) अरेरेरे.... ऐसे कैसेसेसे.... अभी तो तुम्हे तैयार तो कर दूदूदूदू....
कविता ने अपना एक हाथ पीछे लेजाकर रूपा का हाथ पकड़ लिया. और रूपा को वही रोक दिया. वो सर झटकते हुए रूपा को देखती है. और थोड़ा सख़्ती से पेश आती है.
कविता : रूपा प्लीज... तुम बहार जाओ.
रूपा हक्की बक्की रहे गई. उसकी स्माइल एकदम से गायब हो गई. कविता ने भी यह महसूस किया. पर उसके अंदर जो वीरू के लिए जो फ्लो चल रहा था. वो उसे मिटने नही देना चाहती थी. इसी लिए वो रूपा को समझाना या मनाना नही करती. रूपा खड़ी हुई. और रूम से बहार चली गई.