भाग 41-2: शर्त
विजय ने दोनों की तरफ देखा। नज़मा के नंगे चूचे अभी भी हल्के-हल्के काँप रहे थे। निप्पल गुलाबी, नुकीले और पूरी तरह कड़क। पसीने से दोनों चूचे चमक रहे थे।
विजय ने होंठो पर जीभ फिराते हुए कहा “शर्त यह है… एक बार दोनों चूचे चूस लेने दो। बस।”
नज़मा की आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं। उसने बाँहें छाती पर क्रॉस कर लीं, जिससे चूचे दबकर और फूल गए।
“अरे ये क्या… नहीं मैं नहीं चुसवाऊँगी?”
सान्या ने स्टूल से ही कहा, आवाज़ में हल्की हँसी और उत्तेजना दोनों थी, “अरे देख लिए, दबा किये, तो अब चूसवा दे ना। कौन सा चोदने को बोल रहा है।”
नज़मा कुछ पल चुप रही। जाँघें आपस में रगड़ रही थीं। चूत पहले से गीली थी। आखिरकार उसने धीरे से सिर हिलाया।
“ठीक है… लेकिन ज्यादा कुछ किया तो शोर मचा दूँगी। समझा?”
विजय ने सिर हिलाया और तुरंत आगे बढ़ गया। उसने दोनों हाथों से नज़मा के गोल, नरम चूचों को मजबूती से पकड़ लिया। एक निप्पल मुँह में ले लिया। पहले तो धीरे चूसा, जीभ से गोल-गोल घुमाया, थोड़ी देर में जोर से खींचने और दाँतों से हल्का काटने लगा।
नज़मा की कमर लचक गई। उसने उसके सिर पर हाथ रखा और सख्त आवाज़ में कहा, “आराम से करो… हड्डी-मांस की बनी हुई हूँ, गुड़िया नहीं हूँ। धीरे-धीरे चूसो।”
विजय ने रफ्तार तुरंत धीमी कर दी। अब वह जीभ की नोक से निप्पल को धीरे-धीरे चाटते हुए, कभी हल्के से चूसते हुए मज़े लेने लगा। दूसरी तरफ उंगलियों से दूसरे निप्पल को धीरे-धीरे मरोड़ रहा था, खींच रहा था। नज़मा की साँसें तेज हो गईं। आँखें बंद हो गईं। चूचों में बिजली-सी दौड़ रही थी।
थोड़ी देर बाद विजय का एक हाथ पीछे चला गया। उसने बुर्के के ऊपर से नज़मा की गोल गाँड से खेलने लगा। दोनों फाँकों को मसलने लगा, आटे की तरह गूँथने लगा। मस्ती में गांड की दोनों फांकों को खींचने लगा | चूतड़ की दरार पूरी फ़ैल गई और हवा गांड के छेद तक पहुँच गई।
नज़मा ने खीजते हुए कहा - "क्या कर रहा है, बोला ना आराम से कर, अलग करेगा क्या चूतड़ मेरे, चूतिये .... "
सान्या ने सिसकते हुए कहा - "भाई रहने दे, इसके चूतड़ पहले सी ही दो हो रखे हैं"
विजय ने धीरे से कहा - "सॉरी दीदी" और हाथ को नीचे सरकाकर पतले बुर्के के ऊपर से उसकी चूत पर फेरने लगा। बुर्का इतना पतला था कि उंगलियों को नंगी चूत की गर्माहट, नमी और थोड़ी सी बालों की खुजली साफ महसूस हो रही थी। चूत का रस बुर्के को गीला करने लगा था।
जब विजय ने बुर्का ऊपर उठाने की कोशिश की तो नज़मा ने झटके से उसका हाथ हटा दिया। “नहीं।”
विजय ने जिद्द नहीं की। उसे डर था की जो मिल रहा है, कहीं उससे भी हाथ ना धोना पद जाये ।
विजय फिर से बुर्के के ऊपर से ही चूत रगड़ने लगा। उंगलियाँ गीली दरार पर आगे-पीछे सरक रही थीं। नज़मा की जाँघें काँप रही थीं। मस्ती में उसका हाथ नीचे गया और उसने विजय के पैंट के ऊपर तने हुए मोटे लंड को पकड़ लिया। जोर से दबाया, हल्के से सहलाया। लंड इतना सख्त था कि पैंट के कपड़े से भी उसकी धड़कन और नसें महसूस हो रही थीं। प्री-कम से उसका अंडरवियर पूरी तरह गीला हो चुका था। नमी पैंट तक आ गई थी।
सान्या स्टूल पर बैठी यह सब देख रही थी। उसने एक पैर उठाकर सामने वाली कुर्सी पर रख दिया। स्कर्ट पूरी तरह ऊपर खिसक गई। पैंटी साइड करके वह दो उँगलियाँ अपनी चूत में अंदर-बाहर कर रही थी। रस की आवाज़ हल्की-हल्की सुनाई दे रही थी। दूसरे हाथ से अपने टॉप के ऊपर से ही चूचे सहला रही थी, निप्पल मरोड़ रही थी। उसकी खुली चूत कमरे में सबको साफ दिख रही थी – गीली, गुलाबी, उँगलियों से खुलती-बंद होती।
नज़मा की आँखें जब सान्या से मिलीं तो सान्या ने नज़मा को आँख मार दी | दोनों के चेहरे पर एक जैसी मुस्कान तैर गई। सान्या की आँखों में मस्ती थी, नज़मा की आँखों में खुमारी।
दस मिनट हो चुके थे। नज़मा की टाँगें काँप रही थीं। चूत में गर्मी चरम पर थी। वह लगभग झड़ने ही वाली थी। विजय अभी भी एक निप्पल चूस रहा था, जीभ से खेल रहा था, और दूसरे हाथ से बुर्के के ऊपर उसकी चूत को बेरहमी से रगड़ रहा था। नज़मा का हाथ उसके लंड पर और कस गया। प्री-कम की नमी उसकी हथेली तक आ गई थी।
तभी शटर के बाहर किसी के कदमों की आवाज़ आई। कोई बोल रहा था, “भैया… खोला है क्या? ब्रा चाहिए थी…”
तीनों एकदम हड़बड़ा उठे। विजय ने सँभालते हुए कहा - "बाद में आना, अभी लंच टाइम है, 5 बजे खुलेगी दूकान"
नज़मा ने झट से बुर्का नीचे खींच लिया। चूचे फिर से काले कपड़े में छिप गए, लेकिन निप्पल अभी भी नुकीले उभर रहे थे। विजय पीछे हटा, साँसें भारी। सान्या ने जल्दी से पैर नीचे किया, स्कर्ट ठीक की, लेकिन जाँघों के बीच नमी की चमक अभी भी दिख रही थी।
नज़मा ने कहा - "चल सान्या, बहुत देर हो गयी"
विजय ने गिड़गिड़ाते हुए कहा - "दीदी, थोड़ा रखिये ना, कितना मज़ा आ रहा था"
नज़मा - "बहुत ले लिया मज़ा, हिला ले मेरा नाम लेके रात को - नज़मा नाम है मेरा, चल अब जल्दी से अंडरगारमेंट्स दे, जाना है हमें"
विजय ने साँसें संभालते हुए पाँच लेस वाले मैचिंग सेट निकाले और नज़मा की तरफ बढ़ा दिए। हाथ काँप रहे थे। विजय ने नज़मा का हाथ पकड़ लिया और बोला "दीदी, ज़रूर आना, आपको इंतज़ार करूँगा"
नज़मा (मन में) - "चूतिये, मेरा इंतज़ार सारा बाजार करेगा तो क्या सबसे चुदवाने पहुँच जाऊँ"
नज़मा - "हाँ भैया, ज़रूर आउंगी, अब जल्दी करो, वो सेट निकल के दो, पांच"
विजय काउंटर के पीछे गया और सबसे बढ़िया क्वालिटी के लेस वाले जालीदार सेट निकल के नज़मा की तरफ बड़ा दिए - "लीजिये दीदी, आपके बदन पे बहुत खिलेंगे, मेरा व्हाट्सप्प नंबर है 987654321, एक फोटो खींच के भेजना, देखूंगा की की फिटिंग कैसी आयी है?"
सान्या ने नज़मा को निकलने का इशारा किय।
नज़मा ने सेट लेते हुए पूछा, आवाज़ में अभी भी हल्की काँप रही थी, “पैंटी का साइज क्या दिया है?”
विजय मुस्कुराया। आवाज़ में उत्तेजना और मज़ाक दोनों थे, “अरे अब भी भरोसा नहीं है क्या दीदी? इस बार तो हाथ से आपकी गाँड का पोर-पोर नापा है”
सान्या ने कहा - "भैया मुझे भी 2 सेट चाहिए थे"
विजय ने हँसते हुए कहा - “दीदी आपसे तो शो दिखाने के पैसे लेने चाहिए।”
सान्या ने आँखें चुराते हुए कहा, “भैया, अगली बार मैं भी बन जाऊँगी, हिस्सेदार.... अभी सेट तो दे दो”
विजय हँसते हुए दो सेट सान्या को भी दे दिए।
दोनों लड़कियाँ जल्दी से दुकान से निकलीं। बुर्का और स्कर्ट ठीक करते हुए भीड़ में गायब हो गईं।
विजय शटर के नीचे से बाहर आकर खड़ा हो गया। पैंट के ऊपर से ही अपने तने हुए, गीले लंड को सहलाते हुए वह दोनों को जाते हुए देखता रहा। आँखों में अभी भी भूख बाकी थी। लंड में दर्द हो रहा था। विजय के अंडरवियर में ठंडा-गीला अहसास बाकी था।