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Incest नज़मा का कामुक सफर 2

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Pinky

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ये कहानी मैंने 2019 में शुरू की थी, पर कुछ कारणों से पूरी नहीं कर पायी। इस बार पूरा करने का प्रयास है।
यहाँ भी मैं पूरी कहानी दोबारा डाल रही हूँ

 
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Funlover

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Baho
भाग 36: थप्पड़

अगली सुबह नज़मा ने देर तक बिस्तर पर पड़ी रहने की कोशिश की, लेकिन नींद नहीं आई। माँ की रात वाली बातें बार-बार याद आ रही थीं। “बेशर्म… बिगड़ गई… घर का माहौल खराब कर रही है…”। गुस्सा भी आ रहा था और एक अजीब-सी जिद भी। छाती के अंदर कुछ गर्म-सा धधक रहा था। जाँघों के बीच हल्की नमी अभी भी बाकी थी।

वह उठी और सीधे पिछवाड़े चली गई। नहाने का सामान उठाया, लेकिन पानी तक नहीं डाला। सिर्फ खड़ी रही। आँखों में जानबूझकर आँसू भर लिए। बाल बिखरे हुए थे, चेहरा उदास। सुबह की ठंडी हवा उसके पतले नाइटी के अंदर से छू रही थी। निप्पल अपने-आप सख्त हो गए थे। नाइटी के पतले कपड़े से उनके गोल आकार साफ उभर रहे थे।

थोड़ी देर बाद शहजाद ऑफिस जाने की तैयारी करके निकले। उन्होंने पिछवाड़े की तरफ झाँका तो नज़मा को वैसे ही खड़ी देखा—कंधे झुके, आँखें नम, निप्पल ठंडी हवा में और कड़क। “बेटी? नहा नहीं रही?”

नज़मा ने मुँह फेर लिया। आवाज़ में रोना मिलाया, गला काँपता हुआ। “पापा… माँ ने मना कर दिया है। कहती है नहाऊँ तो मारेंगी। आपसे बात भी न करूँ, चाय भी न दूँ… तो फिर मैं क्या करूँ? मर जाऊँ क्या?”

शहजाद पास आए। उनकी भौंहें सिकुड़ गईं। आवाज़ में गुस्सा और चिंता दोनों थे। “क्या बकवास है यह? तू नहा… जैसे नहाना है नहा। मैं हूँ यहाँ। कोई कुछ नहीं कहेगा।”

नज़मा ने आँखें उठाकर देखा। आँसू अभी भी थे, लेकिन अंदर मुस्कान थी। “सच में पापा?”

“हाँ। जा, नहा ले आराम से।” शहजाद की आवाज़ में एक सुरक्षा थी जो नज़मा के शरीर में सिहरन पैदा कर गई। उनकी निगाहें एक पल के लिए उसके उभरे निप्पलों पर ठहरीं।

नज़मा ने धीरे से सिर हिलाया। शहजाद चले गए। नज़मा ने पानी खोला और नहाने लगी—आज फिर पूरी नंगी। ठंडा पानी उसके गोरे बदन पर बह रहा था। निप्पल और सख्त हो गए। उसने उंगलियों से अपने चूचों को धीरे-धीरे सहलाया, फिर हाथ नीचे ले गई। मुलायम चूत पर पानी की धार पड़ रही थी। उंगलियाँ धीरे से फिसलीं—अंदर हल्की नमी पहले से ही थी। मन में एक नई हिम्मत थी। पापा अब उसके साथ थे। हर स्पर्श के साथ अंदर की गर्मी बढ़ती गई।

=====================

शाम को शहजाद ऑफिस से लौटे तो सीधे आवाज़ दी, “नज़मा… चाय ला।”

परवीन रसोई में थी। उसने सुना, लेकिन कुछ नहीं बोला। हाथ में चाकू था, लेकिन वह काटना भूल गई। नज़मा ने फिर वही ढीला पारदर्शी कुरता पहना—बिना ब्रा। ट्रे लेकर पापा के कमरे में गई। कुरते के अंदर उसके बोबे स्वतंत्र थे, हर कदम पर हल्के से काँप रहे थे। निप्पल कपड़े से साफ उभर आए थे।
शहजाद बिस्तर पर बैठे थे। उन्होंने जाँघ पर थपथपाया। “इधर आ।”

नज़मा बिना हिचकिचाहट के उनकी गोद में बैठ गई। आज और करीब। उसका एक जाँघ शहजाद की जाँघों के बीच आ गया। पापा का खुरदरा हाथ तुरंत उसकी जाँघ पर आ गया—पहले से थोड़ा ऊपर, सलवार के पतले कपड़े के ऊपर से गर्माहट सीधी चूत तक पहुँच रही थी। नज़मा की साँसें थोड़ी तेज हो गईं। शहजाद की पैंट के अंदर कुछ सख्त होता महसूस हुआ—उनका लंड हल्के से तन रहा था। नज़मा ने जानबूझकर थोड़ा और सरककर उसे अपनी जाँघ से दबाया।

बातें शुरू हुईं। नज़मा हँस रही थी, पापा भी। उनकी उंगलियाँ धीरे-धीरे जाँघ पर घूम रही थीं, कभी-कभी चूत के पास तक पहुँच जातीं। नज़मा के निप्पल कुरते से उभर आए थे। शहजाद ने दुसरे हाथ से निप्पल के खिलवाड़ शुरू कर दिया । नज़मा के मुँह से हल्की सिसकी निकल गई।

अचानक दरवाज़ा खुला।

परवीन खड़ी थी। ट्रे में पानी का गिलास था, लेकिन चेहरा तना हुआ। आँखों में गुस्सा, डर और जलन का मिश्रण। उसने देखा—बेटी गोद में, एक हाथ जाँघ पर, दूसरा हाथ निप्पल पर।

“फिर से?” परवीन की आवाज़ काँप रही थी। गला सूखा हुआ। “क्यों बिगाड़ रहे हो बेटी को? इतनी बड़ी हो गई है… शर्म नहीं आती?”

शहजाद की आँखों में गुस्सा आ गया। उन्होंने नज़मा को गोद से नहीं उतारा। उंगलियाँ उसकी जाँघ पर और कस गईं, निप्पल पर दबाव बना रहा। “तू चुप रह। बच्ची है, थोड़ी देर बैठी है तो क्या हो गया?”

परवीन आगे बढ़ी। कदम काँप रहे थे। “बच्ची? यह बच्ची नहीं रही। आप भी… आप भी उसे बिगाड़ रहे हो।” उसकी आवाज़ में सालों की दबी हुई पीड़ा फूट पड़ी थी।

शहजाद अचानक उठ खड़े हुए। नज़मा संभलकर किनारे हो गई। कमरे में हवा जैसे रुक गई। शहजाद ने एक कदम बढ़ाया। उनकी हथेली हवा में उठी और परवीन के गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया।

“फटाक !!!!!”

आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई। इतनी तेज़ कि दीवारें भी काँप उठीं। परवीन का सिर एक तरफ झटक गया। गाल तुरंत लाल हो गया, हथेली का निशान उभर आया। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। शरीर काँप रहा था।

“जीने दो बच्ची को!” शहजाद की आवाज़ कठोर थी, गले से निकलते हुए। “खुद तो दकियानूसी सोच रखती हो, वही सब पर थोप रही हो। अब से नज़मा जो करना चाहे करेगी। तू मुँह मत खोलना।”

परवीन काँप रही थी। गाल जल रहा था। आँखों में आँसू थे, लेकिन वह कुछ नहीं बोली। सालों की दबी हुई औरत एक पल में पूरी तरह टूट गई। उसके होंठ काँप रहे थे, साँसें उखड़ रही थीं। उसने गिलास टेबल पर रखा—पानी छलक गया—और चुपचाप कमरे से निकल गई। कदम डगमगा रहे थे।

नज़मा वहीं खड़ी थी। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। छाती के अंदर एक अजीब-सी गर्मी दौड़ रही थी। पापा ने माँ को थप्पड़ मार दिया था… उसके लिए। जाँघों के बीच हल्की नमी फिर से महसूस हुई। चूत में एक गर्म लहर दौड़ गई।

शहजाद ने लंबी साँस ली। कंधे ढीले पड़े। पैंट के अंदर उनका लंड अभी भी आधा तना हुआ था। फिर नज़मा की तरफ देखा। आवाज़ फिर नरमी भरी हो गई, लेकिन उसमें एक नई ताकत थी। “बेटी… तू डर मत। अब कोई तुझे कुछ नहीं कहेगा।”

नज़मा ने धीरे से उनके हाथ में अपना हाथ रख दिया। उनकी खुरदरी हथेली अभी भी गर्म थी। “पापा… आप… आपने…”
“जा चुप करवा अपनी माँ को। पानी दे दे। गला सूख गया होगा उसका।”

नज़मा कमरे से निकली। गलियारे में परवीन दीवार के सहारे खड़ी थी। आँखें लाल थीं, गाल अभी भी जल रहा था। नज़मा ने पानी का गिलास बढ़ाया। परवीन ने लिया, लेकिन नज़मा की तरफ देखा तक नहीं। उंगलियाँ काँप रही थीं।

नज़मा अपने कमरे में आई और दरवाज़ा बंद किया। पीठ टिकाकर खड़ी हो गई। शरीर में एक अजीब-सी गर्मी दौड़ रही थी—जाँघों से लेकर छाती तक। निप्पल सख्त थे। उसने कुरते के अंदर हाथ डालकर हल्के से छुआ तो एक लहर पेट के नीचे तक पहुँच गई। उंगलियाँ और नीचे चली गईं। पतली सलवार के अंदर चूत पूरी तरह गीली थी। उसने धीरे से दो उंगलियाँ अंदर डालीं और आँखें बंद कर लीं।

माँ अब पूरी तरह बेबस हो चुकी थी। पापा उसके साथ थे। उनका लंड आज कितना सख्त हुआ था… उसके लिए।
अब खेल की बागडोर पूरी तरह नज़मा के हाथ में थी।
Bahot badhiya

Jabardast

Lokhte rahiye.... Baap beti kaa naajuk bandhan ab shayad gathbandhan ban raha hai. Parvin ko bhi samajna chahiye.
 
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Bahot badhiya

Jabardast

Lokhte rahiye.... Baap beti kaa naajuk bandhan ab shayad gathbandhan ban raha hai. Parvin ko bhi samajna chahiye.
परवीन को समझना भी पड़ेगा, और समय ने चाहा तो हिस्सा भी बनना पड़ेगा
 
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भाग 41-1: क्रेजी मार्केट

दोनों एक बजे से दस मिनट पहले ही क्रेजी मतलब के.जी मार्केट पहुँच चुकी थीं। धूप तेज थी। मुख्य गली से अब भीड़ कम होने लगी थी।

नज़मा ने काला, पतला बुर्का पहना था। अंदर एक भी कपड़ा नहीं था। न ब्रा, न पैंटी। बुर्के का कपड़ा इतना पतला था कि धूप में उसके निप्पल साफ उभर आए थे। हर कदम पर उसके चूचे हल्के-हल्के काँप रहे थे।

सान्या ने बहुत छोटी काली स्कर्ट और सफेद टाइट टॉप पहना था। टॉप इतना कसा था कि उसके बड़े बोबों की गोल शक्ल और निप्पल की हल्की छाप साफ दिख रही थी। स्कर्ट इतनी छोटी की झुकते ही चूतड़ दिखाई दे जाते।

वे मार्केट की सबसे आखिरी संकरी गली में घुसीं। एक छोटी-सी ब्रा-पैंटी की दुकान के सामने पहुँचे तो एक दुकानदार शटर नीचे कर रहा था।

“भैया रुको!” नज़मा ने आवाज़ दी।

लड़का मुड़ा। उम्र इक्कीस-बाईस की होगी। गोरा-सा चेहरा, पतली मूंछ, पतली कमर। नाम विजय था। उसने दोनों को देखा। सबसे पहले नज़मा के बुर्के पर पड़ी निप्पल की साफ छाप पर निगाह अटक गई। फिर सान्या के टाइट टॉप पर। आँखें एक पल के लिए सान्या की जाँघों पर भी रुक गईं।

“लंच का टाइम है दीदी। पाँच बजे के बाद आना।”

“भैया, बस दस मिनट ही तो लगेंगे,” सान्या ने कहा। “हम आपको जल्दी फारिग कर देंगे, ज्यादा नखरे नहीं हैं हमारे।”

विजय ने दोबारा निप्पल की तरफ देखा। मन में एक बात घूमी –इसने अंदर कुछ पहना ही नहीं। निप्पल इतने साफ कैसे दिख रहे हैं नहीं तो। बुर्का इतना पतला…

“अच्छा… आ जाइए अंदर। मैं शटर थोड़ा नीचे कर देता हूँ। नहीं तो ग्राहक आते रहेंगे।”

वे अंदर घुस गईं। विजय ने शटर लगभग तीन-चौथाई बंद कर दिया। दुकान में थोड़ा अंधेरा था, बस एक ट्यूबलाइट ही जल रही थी। पंखा गर्म हवा फेंक रहा था।

“भैया, लेस वाले ब्रा दिखाइए। अच्छे वाले,” नज़मा ने कहा।

विजय ने एक हैंगर से कुछ ब्रा निकालीं। “ये लीजिए आपका साइज - 32C?”

“मेरा साइज तो 32B है।”

विजय ने सिर हिलाया। “नहीं। आपको 32C आएगा।”

नज़मा ने भौंहें उठाईं। “आपको कैसे पता?”

“दिन भर नापता हूँ दीदी। आँखों से अंदाज़ा हो जाता है। अगर 32C नहीं आया तो पाँच ब्रा फ्री।”

सान्या मुस्कुराई। “लग गई शर्त।”

विजय – “अगर आप हार गईं तो?”

नज़मा – “जो तुम कहो।” उसे अपने साइज का अच्छे से पता था।

सान्या ने भी कहा, “हाँ जो तुम कहो। इसे अपने चूचों का साइज नहीं पता होगा क्या?”

विजय ने टेप निकाला। पहले बुर्के के ऊपर से ही नापने लगा। टेप को छाती के सबसे उभरे हिस्से पर लगाया। उंगलियाँ जानबूझकर निप्पल के आसपास देर तक फिसलाईं। टेप खींचते समय उसकी हथेली ने एक बार निप्पल को पूरा दबा दिया। नज़मा की साँस थोड़ी भारी हो गई। नज़मा अपनी जाँघें आपस में रगड़ने लगीं।

सान्या पास वाली छोटी स्टूल पर बैठ गई थी। उसने जाँघें हल्की-सी खोल रखी थीं। स्कर्ट और ऊपर खिसक गई थी।

“भैया, ध्यान से नापना… जान-बूझकर ज्यादा साइज न निकाल देना। और ये बीच में से टेप उठी क्यों हुई है, अपनी उँगली डाल रहे हो क्या टेप के नीचे?” सान्या ने कहा।

विजय ने निप्पल पर उँगली फिराते हुए जवाब दिया, “नहीं, मेरी उँगली नहीं… ये तो दीदी का निप्पल पत्थर हो रहा है। गर्मी ज्यादा है ना हम जेन-Z में।”

नाप आया – 32C।

“यह हो ही नहीं सकता। मुझे पता है कि मेरा साइज 32B है। ये कैसे हो गया? भैया आपने ठीक से नाप लिया है ना?” नज़मा बोली। आवाज़ में हल्का कम्पन था ।

विजय – “अरे मैडम, रोज का काम है मेरा।”

नज़मा – “फिर तो ये पक्का बुर्के की वजह से है।”

सान्या – “ओहो … तो फिर बुर्का उतार के साइज ले लो भैया।”

नज़मा – “पागल हो गई है क्या?”

सान्या – “अरे क्या हुआ, कंफ्यूजन दूर हो जाएगा।”

नज़मा – “कंफ्यूजन दूर करने के चक्कर में भैया के सामने नंगी ना थोड़ी ना हो जाऊँगी।”

विजय मौका देखते हुए बोला, “अरे दीदी, नंगी कैसे? आपने नीचे तो कपड़े पहने होंगे ना। अरे और कुछ नहीं तो कच्छी तो होगी।”

नज़मा ने बहुत धीमे स्वर में कहा, “नहीं… नंगी हूँ पूरी नीचे।”

विजय की आँखें चमक गईं। “ओह, क्या बात है दीदी। चेन्नई की गर्मी भी आपके सामने कुछ नहीं। सबसे गरम तो आप ही हो।”

सान्या ने स्कर्ट के ऊपर से ही अपनी चूत को दबाते हुए कहा, “अरे तो क्या हुआ, कोई और थोड़े ना है यहाँ। बस भैया ही तो हैं।”

नज़मा ने सान्या की तरफ देखा। “तू हो जा नंगी। बड़ा शौक है मुझे नंगी करने का। पहले राशन वाले लड़के के सामने, अब यहाँ।”

विजय मन में सोच रहा था – अच्छा, तो ये दोनों नंगी होती रहती हैं। पुरानी चावल हैं।

फिर उसने कहा, “अरे दीदी, इतना क्या शरमाना। जल्दी करो, मुझे जाना भी है। अब जल्दी से नंगी हो जाओ ना।”

सान्या ने दोबारा कहा, “अरे भैया, आप नापो ना बुर्क़े के बिना”

विजय की आवाज़ में उत्तेजना साफ थी। “दीदी… आपको पूरा बुर्का तो उतारना पड़ेगा।”

नज़माकी आवाज़ में हल्की काँप रही थी “ना… कुछ भी हो जाए, मैं नंगी नहीं होऊंगी”

सान्या की आँखें चमक रही थीं। वह धीरे-धीरे अपनी चूत सहला रही थी।

थोड़ी देर चुप्पी रही। फिर विजय ने सुझाव दिया, “एक बेल्ट बाँध लीजिए कमर में, फिर बुर्का ऊपर की तरफ से सरका दीजिए। लटक कर बेल्ट पर अटक जाएगा। नीचे का हिस्सा ढका रहेगा। ऊपर का हिस्सा ही तो दिखेगा बस… और वो वैसे भी नाप लेने के लिए हमें नंगा करना ही है।”

नज़मा ने लंबी साँस ली। उत्तेजना की वजह से उसका पूरा बदन काँप रहा था। आखिरकार उसने सिर हिलाया।

विजय ने दुकान से एक चौड़ा काला बेल्ट निकाला। नज़मा ने उसे अपनी कमर में कसकर बाँधा। फिर दोनों हाथों से बुर्का पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर से सरकाने लगी। उसने दोनों हाथ बुर्के के अंदर से निकाले – बिल्कुल वैसे जैसे ब्रा उतारते समय हाथ निकाले जाते हैं। बुर्का कंधों से सरकते हुए, पेट की त्वचा, फिर नाभि, फिर पसलियाँ… बुर्का बेल्ट तक आकर अटक गया। अब कमर से ऊपर का पूरा हिस्सा नंगा था। गोरी त्वचा पसीने से चमक रही थी। दोनों गोल चूचे बिना किसी सहारे के बाहर थे। निप्पल गुलाबी और पूरी तरह कड़क। उत्तेजना की वजह से नज़मा का पूरा बदन हल्का-हल्का काँप रहा था।

विजय की साँसें साफ सुनाई दे रही थीं। उसने दोबारा टेप उठाया। इस बार सीधी नंगी त्वचा पर। टेप को बोबों के नीचे से फेरते हुए ऊपर ले गया। उंगलियाँ जानबूझकर निप्पल के आसपास घुमाईं। एक बार अंगूठे से निप्पल को हल्का सा दबा भी दिया।

“क्या मस्त चूचे हैं दीदी आपके… अगर एक बार चूसने को मिल जाए तो जिंदगी सफल हो जाएगी।”

“विजय नाप लेना लगभग भूल चुका था। उसकी उंगलियाँ अब सिर्फ नज़मा के चूचों को दबाने और निप्पल सहलाने में व्यस्त थीं।”

थोड़ी देर भी जब विजय नहीं रुका तो, नज़मा ने कहा - "भैया, अब आपको देर नहीं हो रही, जल्दी लीजिये नाप"

विजय - "हाँ दीदी, नाप ही तो ले रहा हूँ"

सान्या की साँस भी तेज हो गई। उसका हाथ अब स्कर्ट में घुस चुका था। वह भी खेल का पूरा मजा लेने के लिए तैयार थी। उसकी उँगलियाँ पैंटी को थोड़ा सरका चुकी थीं।

नाप आया – 32C से कम, लेकिन 32B से ज्यादा।

नज़मा ने लंबी साँस छोड़ी। निप्पल अभी भी कड़क थे। “चलो… मान लिया। पिछले कुछ दिनों में थोड़े बड़े हो गए हैं।”

विजय की आँखों में भूख थी। उसने टेप धीरे से नीचे रखा। आवाज़ में साफ उत्तेजना के साथ कहा, “अब भी फ्री दे दूँगा… बस एक शर्त।”

सान्या ने आगे बढ़कर पूछा, “क्या शर्त भैया?” उसकी आवाज़ में भी उत्तेजना साफ थी।

विजय ने दोनों की तरफ देखा। नज़मा के नंगे चूचे अभी भी हवा में काँप रहे थे। निप्पल नुकीले। सान्या की जाँघें खुली हुईं।

“शर्त… अभी बताता हूँ।”
 

malikarman

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भाग 41-1: क्रेजी मार्केट

दोनों एक बजे से दस मिनट पहले ही क्रेजी मतलब के.जी मार्केट पहुँच चुकी थीं। धूप तेज थी। मुख्य गली से अब भीड़ कम होने लगी थी।

नज़मा ने काला, पतला बुर्का पहना था। अंदर एक भी कपड़ा नहीं था। न ब्रा, न पैंटी। बुर्के का कपड़ा इतना पतला था कि धूप में उसके निप्पल साफ उभर आए थे। हर कदम पर उसके चूचे हल्के-हल्के काँप रहे थे।

सान्या ने बहुत छोटी काली स्कर्ट और सफेद टाइट टॉप पहना था। टॉप इतना कसा था कि उसके बड़े बोबों की गोल शक्ल और निप्पल की हल्की छाप साफ दिख रही थी। स्कर्ट इतनी छोटी की झुकते ही चूतड़ दिखाई दे जाते।

वे मार्केट की सबसे आखिरी संकरी गली में घुसीं। एक छोटी-सी ब्रा-पैंटी की दुकान के सामने पहुँचे तो एक दुकानदार शटर नीचे कर रहा था।

“भैया रुको!” नज़मा ने आवाज़ दी।

लड़का मुड़ा। उम्र इक्कीस-बाईस की होगी। गोरा-सा चेहरा, पतली मूंछ, पतली कमर। नाम विजय था। उसने दोनों को देखा। सबसे पहले नज़मा के बुर्के पर पड़ी निप्पल की साफ छाप पर निगाह अटक गई। फिर सान्या के टाइट टॉप पर। आँखें एक पल के लिए सान्या की जाँघों पर भी रुक गईं।

“लंच का टाइम है दीदी। पाँच बजे के बाद आना।”

“भैया, बस दस मिनट ही तो लगेंगे,” सान्या ने कहा। “हम आपको जल्दी फारिग कर देंगे, ज्यादा नखरे नहीं हैं हमारे।”

विजय ने दोबारा निप्पल की तरफ देखा। मन में एक बात घूमी –इसने अंदर कुछ पहना ही नहीं। निप्पल इतने साफ कैसे दिख रहे हैं नहीं तो। बुर्का इतना पतला…

“अच्छा… आ जाइए अंदर। मैं शटर थोड़ा नीचे कर देता हूँ। नहीं तो ग्राहक आते रहेंगे।”

वे अंदर घुस गईं। विजय ने शटर लगभग तीन-चौथाई बंद कर दिया। दुकान में थोड़ा अंधेरा था, बस एक ट्यूबलाइट ही जल रही थी। पंखा गर्म हवा फेंक रहा था।

“भैया, लेस वाले ब्रा दिखाइए। अच्छे वाले,” नज़मा ने कहा।

विजय ने एक हैंगर से कुछ ब्रा निकालीं। “ये लीजिए आपका साइज - 32C?”

“मेरा साइज तो 32B है।”

विजय ने सिर हिलाया। “नहीं। आपको 32C आएगा।”

नज़मा ने भौंहें उठाईं। “आपको कैसे पता?”

“दिन भर नापता हूँ दीदी। आँखों से अंदाज़ा हो जाता है। अगर 32C नहीं आया तो पाँच ब्रा फ्री।”

सान्या मुस्कुराई। “लग गई शर्त।”

विजय – “अगर आप हार गईं तो?”

नज़मा – “जो तुम कहो।” उसे अपने साइज का अच्छे से पता था।

सान्या ने भी कहा, “हाँ जो तुम कहो। इसे अपने चूचों का साइज नहीं पता होगा क्या?”

विजय ने टेप निकाला। पहले बुर्के के ऊपर से ही नापने लगा। टेप को छाती के सबसे उभरे हिस्से पर लगाया। उंगलियाँ जानबूझकर निप्पल के आसपास देर तक फिसलाईं। टेप खींचते समय उसकी हथेली ने एक बार निप्पल को पूरा दबा दिया। नज़मा की साँस थोड़ी भारी हो गई। नज़मा अपनी जाँघें आपस में रगड़ने लगीं।

सान्या पास वाली छोटी स्टूल पर बैठ गई थी। उसने जाँघें हल्की-सी खोल रखी थीं। स्कर्ट और ऊपर खिसक गई थी।

“भैया, ध्यान से नापना… जान-बूझकर ज्यादा साइज न निकाल देना। और ये बीच में से टेप उठी क्यों हुई है, अपनी उँगली डाल रहे हो क्या टेप के नीचे?” सान्या ने कहा।

विजय ने निप्पल पर उँगली फिराते हुए जवाब दिया, “नहीं, मेरी उँगली नहीं… ये तो दीदी का निप्पल पत्थर हो रहा है। गर्मी ज्यादा है ना हम जेन-Z में।”

नाप आया – 32C।

“यह हो ही नहीं सकता। मुझे पता है कि मेरा साइज 32B है। ये कैसे हो गया? भैया आपने ठीक से नाप लिया है ना?” नज़मा बोली। आवाज़ में हल्का कम्पन था ।

विजय – “अरे मैडम, रोज का काम है मेरा।”

नज़मा – “फिर तो ये पक्का बुर्के की वजह से है।”

सान्या – “ओहो … तो फिर बुर्का उतार के साइज ले लो भैया।”

नज़मा – “पागल हो गई है क्या?”

सान्या – “अरे क्या हुआ, कंफ्यूजन दूर हो जाएगा।”

नज़मा – “कंफ्यूजन दूर करने के चक्कर में भैया के सामने नंगी ना थोड़ी ना हो जाऊँगी।”

विजय मौका देखते हुए बोला, “अरे दीदी, नंगी कैसे? आपने नीचे तो कपड़े पहने होंगे ना। अरे और कुछ नहीं तो कच्छी तो होगी।”

नज़मा ने बहुत धीमे स्वर में कहा, “नहीं… नंगी हूँ पूरी नीचे।”

विजय की आँखें चमक गईं। “ओह, क्या बात है दीदी। चेन्नई की गर्मी भी आपके सामने कुछ नहीं। सबसे गरम तो आप ही हो।”

सान्या ने स्कर्ट के ऊपर से ही अपनी चूत को दबाते हुए कहा, “अरे तो क्या हुआ, कोई और थोड़े ना है यहाँ। बस भैया ही तो हैं।”

नज़मा ने सान्या की तरफ देखा। “तू हो जा नंगी। बड़ा शौक है मुझे नंगी करने का। पहले राशन वाले लड़के के सामने, अब यहाँ।”

विजय मन में सोच रहा था – अच्छा, तो ये दोनों नंगी होती रहती हैं। पुरानी चावल हैं।

फिर उसने कहा, “अरे दीदी, इतना क्या शरमाना। जल्दी करो, मुझे जाना भी है। अब जल्दी से नंगी हो जाओ ना।”

सान्या ने दोबारा कहा, “अरे भैया, आप नापो ना बुर्क़े के बिना”

विजय की आवाज़ में उत्तेजना साफ थी। “दीदी… आपको पूरा बुर्का तो उतारना पड़ेगा।”

नज़माकी आवाज़ में हल्की काँप रही थी “ना… कुछ भी हो जाए, मैं नंगी नहीं होऊंगी”

सान्या की आँखें चमक रही थीं। वह धीरे-धीरे अपनी चूत सहला रही थी।

थोड़ी देर चुप्पी रही। फिर विजय ने सुझाव दिया, “एक बेल्ट बाँध लीजिए कमर में, फिर बुर्का ऊपर की तरफ से सरका दीजिए। लटक कर बेल्ट पर अटक जाएगा। नीचे का हिस्सा ढका रहेगा। ऊपर का हिस्सा ही तो दिखेगा बस… और वो वैसे भी नाप लेने के लिए हमें नंगा करना ही है।”

नज़मा ने लंबी साँस ली। उत्तेजना की वजह से उसका पूरा बदन काँप रहा था। आखिरकार उसने सिर हिलाया।

विजय ने दुकान से एक चौड़ा काला बेल्ट निकाला। नज़मा ने उसे अपनी कमर में कसकर बाँधा। फिर दोनों हाथों से बुर्का पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर से सरकाने लगी। उसने दोनों हाथ बुर्के के अंदर से निकाले – बिल्कुल वैसे जैसे ब्रा उतारते समय हाथ निकाले जाते हैं। बुर्का कंधों से सरकते हुए, पेट की त्वचा, फिर नाभि, फिर पसलियाँ… बुर्का बेल्ट तक आकर अटक गया। अब कमर से ऊपर का पूरा हिस्सा नंगा था। गोरी त्वचा पसीने से चमक रही थी। दोनों गोल चूचे बिना किसी सहारे के बाहर थे। निप्पल गुलाबी और पूरी तरह कड़क। उत्तेजना की वजह से नज़मा का पूरा बदन हल्का-हल्का काँप रहा था।

विजय की साँसें साफ सुनाई दे रही थीं। उसने दोबारा टेप उठाया। इस बार सीधी नंगी त्वचा पर। टेप को बोबों के नीचे से फेरते हुए ऊपर ले गया। उंगलियाँ जानबूझकर निप्पल के आसपास घुमाईं। एक बार अंगूठे से निप्पल को हल्का सा दबा भी दिया।

“क्या मस्त चूचे हैं दीदी आपके… अगर एक बार चूसने को मिल जाए तो जिंदगी सफल हो जाएगी।”

“विजय नाप लेना लगभग भूल चुका था। उसकी उंगलियाँ अब सिर्फ नज़मा के चूचों को दबाने और निप्पल सहलाने में व्यस्त थीं।”

थोड़ी देर भी जब विजय नहीं रुका तो, नज़मा ने कहा - "भैया, अब आपको देर नहीं हो रही, जल्दी लीजिये नाप"

विजय - "हाँ दीदी, नाप ही तो ले रहा हूँ"

सान्या की साँस भी तेज हो गई। उसका हाथ अब स्कर्ट में घुस चुका था। वह भी खेल का पूरा मजा लेने के लिए तैयार थी। उसकी उँगलियाँ पैंटी को थोड़ा सरका चुकी थीं।

नाप आया – 32C से कम, लेकिन 32B से ज्यादा।

नज़मा ने लंबी साँस छोड़ी। निप्पल अभी भी कड़क थे। “चलो… मान लिया। पिछले कुछ दिनों में थोड़े बड़े हो गए हैं।”

विजय की आँखों में भूख थी। उसने टेप धीरे से नीचे रखा। आवाज़ में साफ उत्तेजना के साथ कहा, “अब भी फ्री दे दूँगा… बस एक शर्त।”

सान्या ने आगे बढ़कर पूछा, “क्या शर्त भैया?” उसकी आवाज़ में भी उत्तेजना साफ थी।

विजय ने दोनों की तरफ देखा। नज़मा के नंगे चूचे अभी भी हवा में काँप रहे थे। निप्पल नुकीले। सान्या की जाँघें खुली हुईं।

“शर्त… अभी बताता हूँ।”
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भाग 41-2: शर्त

विजय ने दोनों की तरफ देखा। नज़मा के नंगे चूचे अभी भी हल्के-हल्के काँप रहे थे। निप्पल गुलाबी, नुकीले और पूरी तरह कड़क। पसीने से दोनों चूचे चमक रहे थे।

विजय ने होंठो पर जीभ फिराते हुए कहा “शर्त यह है… एक बार दोनों चूचे चूस लेने दो। बस।”

नज़मा की आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं। उसने बाँहें छाती पर क्रॉस कर लीं, जिससे चूचे दबकर और फूल गए।

“अरे ये क्या… नहीं मैं नहीं चुसवाऊँगी?”

सान्या ने स्टूल से ही कहा, आवाज़ में हल्की हँसी और उत्तेजना दोनों थी, “अरे देख लिए, दबा किये, तो अब चूसवा दे ना। कौन सा चोदने को बोल रहा है।”

नज़मा कुछ पल चुप रही। जाँघें आपस में रगड़ रही थीं। चूत पहले से गीली थी। आखिरकार उसने धीरे से सिर हिलाया।

“ठीक है… लेकिन ज्यादा कुछ किया तो शोर मचा दूँगी। समझा?”

विजय ने सिर हिलाया और तुरंत आगे बढ़ गया। उसने दोनों हाथों से नज़मा के गोल, नरम चूचों को मजबूती से पकड़ लिया। एक निप्पल मुँह में ले लिया। पहले तो धीरे चूसा, जीभ से गोल-गोल घुमाया, थोड़ी देर में जोर से खींचने और दाँतों से हल्का काटने लगा।

नज़मा की कमर लचक गई। उसने उसके सिर पर हाथ रखा और सख्त आवाज़ में कहा, “आराम से करो… हड्डी-मांस की बनी हुई हूँ, गुड़िया नहीं हूँ। धीरे-धीरे चूसो।”

विजय ने रफ्तार तुरंत धीमी कर दी। अब वह जीभ की नोक से निप्पल को धीरे-धीरे चाटते हुए, कभी हल्के से चूसते हुए मज़े लेने लगा। दूसरी तरफ उंगलियों से दूसरे निप्पल को धीरे-धीरे मरोड़ रहा था, खींच रहा था। नज़मा की साँसें तेज हो गईं। आँखें बंद हो गईं। चूचों में बिजली-सी दौड़ रही थी।

थोड़ी देर बाद विजय का एक हाथ पीछे चला गया। उसने बुर्के के ऊपर से नज़मा की गोल गाँड से खेलने लगा। दोनों फाँकों को मसलने लगा, आटे की तरह गूँथने लगा। मस्ती में गांड की दोनों फांकों को खींचने लगा | चूतड़ की दरार पूरी फ़ैल गई और हवा गांड के छेद तक पहुँच गई।

नज़मा ने खीजते हुए कहा - "क्या कर रहा है, बोला ना आराम से कर, अलग करेगा क्या चूतड़ मेरे, चूतिये .... "

सान्या ने सिसकते हुए कहा - "भाई रहने दे, इसके चूतड़ पहले सी ही दो हो रखे हैं"

विजय ने धीरे से कहा - "सॉरी दीदी" और हाथ को नीचे सरकाकर पतले बुर्के के ऊपर से उसकी चूत पर फेरने लगा। बुर्का इतना पतला था कि उंगलियों को नंगी चूत की गर्माहट, नमी और थोड़ी सी बालों की खुजली साफ महसूस हो रही थी। चूत का रस बुर्के को गीला करने लगा था।

जब विजय ने बुर्का ऊपर उठाने की कोशिश की तो नज़मा ने झटके से उसका हाथ हटा दिया। “नहीं।”

विजय ने जिद्द नहीं की। उसे डर था की जो मिल रहा है, कहीं उससे भी हाथ ना धोना पद जाये ।

विजय फिर से बुर्के के ऊपर से ही चूत रगड़ने लगा। उंगलियाँ गीली दरार पर आगे-पीछे सरक रही थीं। नज़मा की जाँघें काँप रही थीं। मस्ती में उसका हाथ नीचे गया और उसने विजय के पैंट के ऊपर तने हुए मोटे लंड को पकड़ लिया। जोर से दबाया, हल्के से सहलाया। लंड इतना सख्त था कि पैंट के कपड़े से भी उसकी धड़कन और नसें महसूस हो रही थीं। प्री-कम से उसका अंडरवियर पूरी तरह गीला हो चुका था। नमी पैंट तक आ गई थी।

सान्या स्टूल पर बैठी यह सब देख रही थी। उसने एक पैर उठाकर सामने वाली कुर्सी पर रख दिया। स्कर्ट पूरी तरह ऊपर खिसक गई। पैंटी साइड करके वह दो उँगलियाँ अपनी चूत में अंदर-बाहर कर रही थी। रस की आवाज़ हल्की-हल्की सुनाई दे रही थी। दूसरे हाथ से अपने टॉप के ऊपर से ही चूचे सहला रही थी, निप्पल मरोड़ रही थी। उसकी खुली चूत कमरे में सबको साफ दिख रही थी – गीली, गुलाबी, उँगलियों से खुलती-बंद होती।

नज़मा की आँखें जब सान्या से मिलीं तो सान्या ने नज़मा को आँख मार दी | दोनों के चेहरे पर एक जैसी मुस्कान तैर गई। सान्या की आँखों में मस्ती थी, नज़मा की आँखों में खुमारी।

दस मिनट हो चुके थे। नज़मा की टाँगें काँप रही थीं। चूत में गर्मी चरम पर थी। वह लगभग झड़ने ही वाली थी। विजय अभी भी एक निप्पल चूस रहा था, जीभ से खेल रहा था, और दूसरे हाथ से बुर्के के ऊपर उसकी चूत को बेरहमी से रगड़ रहा था। नज़मा का हाथ उसके लंड पर और कस गया। प्री-कम की नमी उसकी हथेली तक आ गई थी।

तभी शटर के बाहर किसी के कदमों की आवाज़ आई। कोई बोल रहा था, “भैया… खोला है क्या? ब्रा चाहिए थी…”

तीनों एकदम हड़बड़ा उठे। विजय ने सँभालते हुए कहा - "बाद में आना, अभी लंच टाइम है, 5 बजे खुलेगी दूकान"

नज़मा ने झट से बुर्का नीचे खींच लिया। चूचे फिर से काले कपड़े में छिप गए, लेकिन निप्पल अभी भी नुकीले उभर रहे थे। विजय पीछे हटा, साँसें भारी। सान्या ने जल्दी से पैर नीचे किया, स्कर्ट ठीक की, लेकिन जाँघों के बीच नमी की चमक अभी भी दिख रही थी।

नज़मा ने कहा - "चल सान्या, बहुत देर हो गयी"

विजय ने गिड़गिड़ाते हुए कहा - "दीदी, थोड़ा रखिये ना, कितना मज़ा आ रहा था"

नज़मा - "बहुत ले लिया मज़ा, हिला ले मेरा नाम लेके रात को - नज़मा नाम है मेरा, चल अब जल्दी से अंडरगारमेंट्स दे, जाना है हमें"

विजय ने साँसें संभालते हुए पाँच लेस वाले मैचिंग सेट निकाले और नज़मा की तरफ बढ़ा दिए। हाथ काँप रहे थे। विजय ने नज़मा का हाथ पकड़ लिया और बोला "दीदी, ज़रूर आना, आपको इंतज़ार करूँगा"

नज़मा (मन में) - "चूतिये, मेरा इंतज़ार सारा बाजार करेगा तो क्या सबसे चुदवाने पहुँच जाऊँ"

नज़मा - "हाँ भैया, ज़रूर आउंगी, अब जल्दी करो, वो सेट निकल के दो, पांच"

विजय काउंटर के पीछे गया और सबसे बढ़िया क्वालिटी के लेस वाले जालीदार सेट निकल के नज़मा की तरफ बड़ा दिए - "लीजिये दीदी, आपके बदन पे बहुत खिलेंगे, मेरा व्हाट्सप्प नंबर है 987654321, एक फोटो खींच के भेजना, देखूंगा की की फिटिंग कैसी आयी है?"

सान्या ने नज़मा को निकलने का इशारा किय।

नज़मा ने सेट लेते हुए पूछा, आवाज़ में अभी भी हल्की काँप रही थी, “पैंटी का साइज क्या दिया है?”

विजय मुस्कुराया। आवाज़ में उत्तेजना और मज़ाक दोनों थे, “अरे अब भी भरोसा नहीं है क्या दीदी? इस बार तो हाथ से आपकी गाँड का पोर-पोर नापा है”

सान्या ने कहा - "भैया मुझे भी 2 सेट चाहिए थे"

विजय ने हँसते हुए कहा - “दीदी आपसे तो शो दिखाने के पैसे लेने चाहिए।”

सान्या ने आँखें चुराते हुए कहा, “भैया, अगली बार मैं भी बन जाऊँगी, हिस्सेदार.... अभी सेट तो दे दो”

विजय हँसते हुए दो सेट सान्या को भी दे दिए।

दोनों लड़कियाँ जल्दी से दुकान से निकलीं। बुर्का और स्कर्ट ठीक करते हुए भीड़ में गायब हो गईं।

विजय शटर के नीचे से बाहर आकर खड़ा हो गया। पैंट के ऊपर से ही अपने तने हुए, गीले लंड को सहलाते हुए वह दोनों को जाते हुए देखता रहा। आँखों में अभी भी भूख बाकी थी। लंड में दर्द हो रहा था। विजय के अंडरवियर में ठंडा-गीला अहसास बाकी था।
 
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Madam,
मेरा भी एक कहानी चालु है. मुझे बहुत ख़ुशी होगी अगर आप मेरी कहानी भी पढ़े और कमैंट्स दे. इंतज़ार रहेगा. बहुत धन्यवाद.
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It is also there in my signature as well. Look forward to your comments. Thanks.

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बहुत अच्छा लिखते हैं ...
 
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भाग 41-2: शर्त

विजय ने दोनों की तरफ देखा। नज़मा के नंगे चूचे अभी भी हल्के-हल्के काँप रहे थे। निप्पल गुलाबी, नुकीले और पूरी तरह कड़क। पसीने से दोनों चूचे चमक रहे थे।

विजय ने होंठो पर जीभ फिराते हुए कहा “शर्त यह है… एक बार दोनों चूचे चूस लेने दो। बस।”

नज़मा की आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं। उसने बाँहें छाती पर क्रॉस कर लीं, जिससे चूचे दबकर और फूल गए।

“अरे ये क्या… नहीं मैं नहीं चुसवाऊँगी?”

सान्या ने स्टूल से ही कहा, आवाज़ में हल्की हँसी और उत्तेजना दोनों थी, “अरे देख लिए, दबा किये, तो अब चूसवा दे ना। कौन सा चोदने को बोल रहा है।”

नज़मा कुछ पल चुप रही। जाँघें आपस में रगड़ रही थीं। चूत पहले से गीली थी। आखिरकार उसने धीरे से सिर हिलाया।

“ठीक है… लेकिन ज्यादा कुछ किया तो शोर मचा दूँगी। समझा?”

विजय ने सिर हिलाया और तुरंत आगे बढ़ गया। उसने दोनों हाथों से नज़मा के गोल, नरम चूचों को मजबूती से पकड़ लिया। एक निप्पल मुँह में ले लिया। पहले तो धीरे चूसा, जीभ से गोल-गोल घुमाया, थोड़ी देर में जोर से खींचने और दाँतों से हल्का काटने लगा।

नज़मा की कमर लचक गई। उसने उसके सिर पर हाथ रखा और सख्त आवाज़ में कहा, “आराम से करो… हड्डी-मांस की बनी हुई हूँ, गुड़िया नहीं हूँ। धीरे-धीरे चूसो।”

विजय ने रफ्तार तुरंत धीमी कर दी। अब वह जीभ की नोक से निप्पल को धीरे-धीरे चाटते हुए, कभी हल्के से चूसते हुए मज़े लेने लगा। दूसरी तरफ उंगलियों से दूसरे निप्पल को धीरे-धीरे मरोड़ रहा था, खींच रहा था। नज़मा की साँसें तेज हो गईं। आँखें बंद हो गईं। चूचों में बिजली-सी दौड़ रही थी।

थोड़ी देर बाद विजय का एक हाथ पीछे चला गया। उसने बुर्के के ऊपर से नज़मा की गोल गाँड से खेलने लगा। दोनों फाँकों को मसलने लगा, आटे की तरह गूँथने लगा। मस्ती में गांड की दोनों फांकों को खींचने लगा | चूतड़ की दरार पूरी फ़ैल गई और हवा गांड के छेद तक पहुँच गई।

नज़मा ने खीजते हुए कहा - "क्या कर रहा है, बोला ना आराम से कर, अलग करेगा क्या चूतड़ मेरे, चूतिये .... "

सान्या ने सिसकते हुए कहा - "भाई रहने दे, इसके चूतड़ पहले सी ही दो हो रखे हैं"

विजय ने धीरे से कहा - "सॉरी दीदी" और हाथ को नीचे सरकाकर पतले बुर्के के ऊपर से उसकी चूत पर फेरने लगा। बुर्का इतना पतला था कि उंगलियों को नंगी चूत की गर्माहट, नमी और थोड़ी सी बालों की खुजली साफ महसूस हो रही थी। चूत का रस बुर्के को गीला करने लगा था।

जब विजय ने बुर्का ऊपर उठाने की कोशिश की तो नज़मा ने झटके से उसका हाथ हटा दिया। “नहीं।”

विजय ने जिद्द नहीं की। उसे डर था की जो मिल रहा है, कहीं उससे भी हाथ ना धोना पद जाये ।

विजय फिर से बुर्के के ऊपर से ही चूत रगड़ने लगा। उंगलियाँ गीली दरार पर आगे-पीछे सरक रही थीं। नज़मा की जाँघें काँप रही थीं। मस्ती में उसका हाथ नीचे गया और उसने विजय के पैंट के ऊपर तने हुए मोटे लंड को पकड़ लिया। जोर से दबाया, हल्के से सहलाया। लंड इतना सख्त था कि पैंट के कपड़े से भी उसकी धड़कन और नसें महसूस हो रही थीं। प्री-कम से उसका अंडरवियर पूरी तरह गीला हो चुका था। नमी पैंट तक आ गई थी।

सान्या स्टूल पर बैठी यह सब देख रही थी। उसने एक पैर उठाकर सामने वाली कुर्सी पर रख दिया। स्कर्ट पूरी तरह ऊपर खिसक गई। पैंटी साइड करके वह दो उँगलियाँ अपनी चूत में अंदर-बाहर कर रही थी। रस की आवाज़ हल्की-हल्की सुनाई दे रही थी। दूसरे हाथ से अपने टॉप के ऊपर से ही चूचे सहला रही थी, निप्पल मरोड़ रही थी। उसकी खुली चूत कमरे में सबको साफ दिख रही थी – गीली, गुलाबी, उँगलियों से खुलती-बंद होती।

नज़मा की आँखें जब सान्या से मिलीं तो सान्या ने नज़मा को आँख मार दी | दोनों के चेहरे पर एक जैसी मुस्कान तैर गई। सान्या की आँखों में मस्ती थी, नज़मा की आँखों में खुमारी।

दस मिनट हो चुके थे। नज़मा की टाँगें काँप रही थीं। चूत में गर्मी चरम पर थी। वह लगभग झड़ने ही वाली थी। विजय अभी भी एक निप्पल चूस रहा था, जीभ से खेल रहा था, और दूसरे हाथ से बुर्के के ऊपर उसकी चूत को बेरहमी से रगड़ रहा था। नज़मा का हाथ उसके लंड पर और कस गया। प्री-कम की नमी उसकी हथेली तक आ गई थी।

तभी शटर के बाहर किसी के कदमों की आवाज़ आई। कोई बोल रहा था, “भैया… खोला है क्या? ब्रा चाहिए थी…”

तीनों एकदम हड़बड़ा उठे। विजय ने सँभालते हुए कहा - "बाद में आना, अभी लंच टाइम है, 5 बजे खुलेगी दूकान"

नज़मा ने झट से बुर्का नीचे खींच लिया। चूचे फिर से काले कपड़े में छिप गए, लेकिन निप्पल अभी भी नुकीले उभर रहे थे। विजय पीछे हटा, साँसें भारी। सान्या ने जल्दी से पैर नीचे किया, स्कर्ट ठीक की, लेकिन जाँघों के बीच नमी की चमक अभी भी दिख रही थी।

नज़मा ने कहा - "चल सान्या, बहुत देर हो गयी"

विजय ने गिड़गिड़ाते हुए कहा - "दीदी, थोड़ा रखिये ना, कितना मज़ा आ रहा था"

नज़मा - "बहुत ले लिया मज़ा, हिला ले मेरा नाम लेके रात को - नज़मा नाम है मेरा, चल अब जल्दी से अंडरगारमेंट्स दे, जाना है हमें"

विजय ने साँसें संभालते हुए पाँच लेस वाले मैचिंग सेट निकाले और नज़मा की तरफ बढ़ा दिए। हाथ काँप रहे थे। विजय ने नज़मा का हाथ पकड़ लिया और बोला "दीदी, ज़रूर आना, आपको इंतज़ार करूँगा"

नज़मा (मन में) - "चूतिये, मेरा इंतज़ार सारा बाजार करेगा तो क्या सबसे चुदवाने पहुँच जाऊँ"

नज़मा - "हाँ भैया, ज़रूर आउंगी, अब जल्दी करो, वो सेट निकल के दो, पांच"

विजय काउंटर के पीछे गया और सबसे बढ़िया क्वालिटी के लेस वाले जालीदार सेट निकल के नज़मा की तरफ बड़ा दिए - "लीजिये दीदी, आपके बदन पे बहुत खिलेंगे, मेरा व्हाट्सप्प नंबर है 987654321, एक फोटो खींच के भेजना, देखूंगा की की फिटिंग कैसी आयी है?"

सान्या ने नज़मा को निकलने का इशारा किय।

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विजय मुस्कुराया। आवाज़ में उत्तेजना और मज़ाक दोनों थे, “अरे अब भी भरोसा नहीं है क्या दीदी? इस बार तो हाथ से आपकी गाँड का पोर-पोर नापा है”

सान्या ने कहा - "भैया मुझे भी 2 सेट चाहिए थे"

विजय ने हँसते हुए कहा - “दीदी आपसे तो शो दिखाने के पैसे लेने चाहिए।”

सान्या ने आँखें चुराते हुए कहा, “भैया, अगली बार मैं भी बन जाऊँगी, हिस्सेदार.... अभी सेट तो दे दो”

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दोनों लड़कियाँ जल्दी से दुकान से निकलीं। बुर्का और स्कर्ट ठीक करते हुए भीड़ में गायब हो गईं।

विजय शटर के नीचे से बाहर आकर खड़ा हो गया। पैंट के ऊपर से ही अपने तने हुए, गीले लंड को सहलाते हुए वह दोनों को जाते हुए देखता रहा। आँखों में अभी भी भूख बाकी थी। लंड में दर्द हो रहा था। विजय के अंडरवियर में ठंडा-गीला अहसास बाकी था।
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