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Incest नज़मा का कामुक सफर 2

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Pinky

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ये कहानी मैंने 2019 में शुरू की थी, पर कुछ कारणों से पूरी नहीं कर पायी। इस बार पूरा करने का प्रयास है।
यहाँ भी मैं पूरी कहानी दोबारा डाल रही हूँ

 
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Mass

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Pinky

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भाग 42: लूंगी

रविवार था। ऑफिस की छुट्टी। शाम का समय था और गरम तेल की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। परवीन रसोई में पकोड़े बना रही थी। कढ़ाई में तेल तड़क रहा था, आटा गूँथा जा चुका था।

शहजाद हॉल के सोफे पर बैठे थे। आज उन्होंने सिर्फ एक ढीली सफेद सूती लूंगी बाँधी हुई थी। अंदर कुछ नहीं। लूंगी का कपड़ा पतला और पुराना था। बैठे-बैठे उनका लंड हल्के-हल्के हिल रहा था। लूंगी के बीचों-बीच साफ तंबू बना हुआ था। लंड सख्त होकर कपड़े को ऊपर उठाए हुए था। सिरा लूंगी के नीचे से उभरा लग रहा था।

नज़मा ने देखा। आज उसने कमाल ही कर दिया था। पतली सफेद फ्रॉक जाँघों से काफी ऊपर थी। बिना ब्रा, बिना पैंटी। वह गांड मटकाती हुई कमरे में आई और पापा के तंबू को निहारते हुए बोली, “पापा, क्या कर रहे हो?”

शहजाद मुस्कुराए। “तेरा इंतज़ार कर रहा हूँ बेटी। और तू पता नहीं कहाँ गायब है आज सुबह से।”

“कुछ नहीं पापा, अपने कमरे में सो रही थी। चलो पापा, टीवी देखते हैं।”

नज़मा ने रिमोट टेबल से उठाने का बहाना किया और सोफे के पास जाकर कमर से झुक गई।

जैसे ही वह झुकी, शहजाद का गला सूख गया। नज़मा ने नीचे कुछ नहीं पहना था। झुकने से फ्रॉक और ऊपर हो गई। उसकी गांड की गहरी दरार साफ खुल गई। शहजाद बिना पलक झपकाए नज़मा की गांड की दरार देखता रहा।

“बेटी, ढूँढ़ के कोई अच्छा सा चैनल लगा।” शहजाद चाहता था कि वह ज्यादा से ज्यादा देर तक नज़मा की गांड निहार सके।

नज़मा भी बहुत शातिर थी। उसने जानबूझकर रिमोट गिरा दिया। रिमोट ज़मीन से टकराकर खुल गया। बैटरियाँ और कवर अलग-अलग लुढ़क गए। वह धीरे-धीरे झुकी और ज़मीन पर घोड़ी बनकर कवर और बैटरियाँ उठाने लगी।

शहजाद की साँस रुक गई। उन्होंने लूंगी के ऊपर से ही अपने लंड को जोर से दबाना शुरू कर दिया। आँखें नज़मा की गांड पर चिपकी हुई थीं। कुत्ते की तरह जीभ मुँह से बाहर निकल आई थी।

झुकने से नज़मा की गांड और फैल गई थी। गांड का छेद साफ-साफ दिखाई दे रहा था। उसकी चूत भी पूरी तरह खुल गई थी। दोनों फाँकें थोड़ी अलग हो गई थीं और अंदर का गुलाबी नज़ारा अच्छे से दिख रहा था। चूत पर चमकता हुआ पानी शहजाद को साफ दिखाई दे रहा था।

शहजाद से रहा नहीं गया। उन्होंने हाथ लूंगी में घुसाया और लंड हिलाने लगे। आँखें नज़मा की गांड पर चिपकी हुई थीं।

अचानक नज़मा मुड़ गई। अब उसका चेहरा पापा की तरफ था। शहजाद हड़बड़ा गए और हाथ लूंगी से निकालने लगे। जल्दबाजी में लूंगी साइड हो गई और उनका गधे जैसा साढ़े सात इंच का मोटा लंड हवा में झूलने लगा। उन्होंने जल्दी से लूंगी से फुंकारते हुए लंड को ढक लिया और बोले,
“सॉरी बेटी… वो गलती से…”

नज़मा मुस्कुराई। “कोई बात नहीं पापा। आपने भी तो मुझे नहाते हुए नंगी देख लिया था। वो दूसरा सेल नहीं मिल रहा।”

शहजाद ने देखा कि नज़मा की फ्रॉक बहुत ढीली हो गई है और अब काफी नीचे खिसक चुकी है। उसका पूरा बदन दिख रहा था – भरे हुए गोल-मटोल चूचे, कड़क गुलाबी निप्पल, चिकनी जाँघें। नज़मा की पूरी जवानी नुमायाँ हो रही थी।

शहजाद ने थोड़ा झुककर अंदर का नज़ारा देखा फिर बोले, “वो देखो बेटी, वहाँ स्टूल के नीचे।”

नज़मा घुटनों के बल स्टूल की तरफ रेंगने लगी। जब वह घुटनों पर चल रही थी, उसकी जाँघें आपस में रगड़कर चूत की गर्मी बढ़ा रही थीं। उत्तेजना के कारण उसकी चूत से पानी बह रहा था। चलते समय उसका गांड का छेद भी हल्का-हल्का खुल रहा था।

यह नज़ारा देखकर शहजाद ने फिर से लंड पकड़कर हिलाना शुरू कर दिया।

नज़मा ने आखिरकार सेल निकाल लिया और रिमोट जोड़कर टीवी चालू किया। फिर वह पापा की गोद में जा बैठी – दोनों के आमने-सामने। बैठते ही उसने फ्रॉक ऊपर उठा ली। उसकी नंगी, गरम, गीली चूत सीधे पापा के लंड से ऐसे चिपक गई जैसे सालों बाद बिछड़े प्रेमी मिले हों।

टीवी पर नेशनल ज्योग्राफिक लग गया। एक तगड़ा घोड़ा छोटी-सी घोड़ी पर चढ़ा जोर-जोर से धक्के लगा रहा था।

शहजाद मुस्कुराए। “आज तो इसने भी घोड़ी को चढ़ा रखा है…”

नज़मा बोली, “ओह पापा, ये घोड़ी तो बहुत छोटी लग रही है। बेचारी कैसे झेल पाएगी?”

“अरे बेटी, बहुत जगह होती है। तेरी माँ भी तो झेल जाती है मेरा।”

“माँ की बात अलग है। वो तो खुद घोड़ी बन चुकी हैं। ये तो छोटी सी लग रही है… ऐसा लग रहा है जैसे ये इसकी बेटी हो।”

शहजाद ने लूंगी के तंबू को सहलाते हुए कहा, “हो सकता है। बेटियों पर तो बाप का हक़ होता है।”

नज़मा ने धीरे से जवाब दिया, “हक़ कुछ नहीं होता पापा। बेटी चाहे तभी होता है… और बेटी तब चाहती है जब पापा उसका बहुत ध्यान रखते हों।”

शहजाद ने उसे और अपनी तरफ खींचते हुए कहा, “मैं तुझे दुनिया भर का प्यार दूँगा बेटी… मौका तो दे।”

बातें चलती रहीं। नज़मा धीरे-धीरे कमर हिलाने लगी। चूत के होंठ लंड को सहला रहे थे। कामरस लूंगी को भिगोने लगा। शहजाद के दोनों हाथ उसकी कमर पर आ गए। वे उसे अपनी तरफ और खींच रहे थे।

नज़मा मुस्कुराई। आवाज़ में जानबूझकर मासूमियत थी। “पापा... आराम से बैठे हो न…”

नज़मा हल्के से कमर हिलाने लगी। चूत के होंठ लंड को सहला रहे थे। कामरस लूंगी को भिगो रहा था। पच-पच की गीली आवाज़ें आने लगीं। शहजाद के दोनों हाथ उसकी कमर पर थे।

थोड़ी देर बाद शहजाद ने धीरे से कहा, “बेटी… एक बार उठ तो। पैर सीधा कर लूँ। बैठे-बैठे अकड़ गया है।”

नज़मा जैसे ही उठी, शहजाद ने लूंगी एक झटके में नीचे सरका दी। उनका नंगा, गरम, साढ़े सात इंच का मोटा लंड हवा में तन गया। सुपड़ा चमक रहा था – लिसलिसा, गुलाबी। नसें फूली हुईं। अंडकोष तने हुए।

नज़मा की आँखें फटी रह गईं। पहली बार उसने इतने पास से पापा का लंड देखा।

शहजाद ने उसकी कमर पकड़कर वापस गोद में खींच लिया। इस बार कोई कपड़ा बीच में नहीं था। लंड का मोटा सुपड़ा सीधे उसकी नंगी, भभकती चूत से जा लगा। गर्म मांस का गर्म स्पर्श। नज़मा की सिसकी जोर से निकल गई।

“आह… पापा…”

लंड का मोटा सुपड़ा चूत के दोनों होंठों को फैलाते हुए बीच में फँस गया। जैसे ही सुपड़े ने गीले होंठों को छुआ, नज़मा की चूत ने कामरस का फव्वारा छोड़ दिया। पानी की तरह रस निकलकर शहजाद की जाँघ, अंडकोष और लूंगी तीनों को भिगो गया। नज़मा का शरीर कांप उठा। जाँघें काँप रही थीं।

शहजाद ने खुद पर नियंत्रण खो दिया। शहजाद ने एक हाथ से उसके चूतड़ भींचकर अपनी तरफ खींचे और दूसरे हाथ से कमर जकड़ ली। नज़मा को अपनी छाती से चिपका लिया। लंड चूत के होंठों के बीच दबा हुआ धड़क रहा था, लंड ने चूत की फांकों को पूरा फैला दिया था, लंड दोनों गीली फांकों के बीच रगड़ खा रहा था। लंड से उठती हर धड़कन नज़मा की चूत में महसूस हो रही थी।

नज़मा की आँखें बंद थीं। वह पापा के गले में मुँह छुपाए सिसक रही थी। शरीर अभी भी हल्के-हल्के कांप रहा था। चूत से रस लगातार टपके जा रहा था।
तभी उसकी आँखें खुलीं।

दरवाज़े के पीछे परवीन खड़ी थी। माँ-बेटी की निगाहें मिलीं। परवीन की आँखों में आँसू थे – बेबसी के, जलन के, और कुछ ऐसा जिसे वह खुद भी नहीं समझ पा रही थी। वह कुछ सेकंड तक देखती रही। बेटी बाप की गोद में नंगी चूत लंड से सटी हुई, शरीर काँपता हुआ, रस टपकता हुआ। फिर धीरे-से मुड़ी और रसोई की तरफ चली गई। उसके कदमों में कोई शक्ति नहीं बची थी। आँसू गालों पर बह रहे थे।

अचानक से नज़मा होश में आई। उसने पापा से खुद को थोड़ा अलग किया और उठने लगी। लंड उसकी चूत से चिपका हुआ अलग हुआ – बीच में लंबी, चमकदार लाइन कामरस की थी। लंड अभी भी तना हुआ, गीला और धड़कता हुआ खड़ा था।

शहजाद ने कांपती आवाज़ में कहा "क्या हुआ बेटी ...”

नज़मा ने ना में सिर हिलाया। आवाज़ में अभी भी काँप रही थी। “पापा ... नहीं ये नहीं… बस ऊपर-2 से ही ठीक है”

“अरे कितना मज़ा आ रहा था… थोड़ी देर और आ ना।”

“नहीं पापा, आज के लिए काफी है। मुझे नींद आ रही है।”

“मेरी नींद उड़ा के तुझे नींद आ रही है?” शहजाद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं पापा, समझा करो। माँ ने भी सब देख लिया…”

“अरे कुछ नहीं औकात है तेरी माँ की। हिम्मत नहीं कि कुछ बोल जाए।” उन्होंने हाथ खींचते हुए कहा।

“नहीं पापा, अब बहुत हो गया। कहीं माँ कुछ ऐसा-वैसा न कर बैठे। जाने दो, अब कल करेंगे।”

शहजाद ने उसका हाथ खींचकर अपने लंड पर रख दिया। “अच्छा सुन… हाथ से तो हिला दे।”

नज़मा को लगा जैसे लंड की गर्मी से हथेली जल जाएगी। कितना मोटा और लंबा था। नसें कैसे चमक रही थीं।

नज़मा मुस्कुराई। अपने दूसरे हाथ की दो उँगलियाँ चूत में डालकर अच्छी तरह गीला किया, फिर वे उँगलियाँ पापा के मुँह में ठूस दीं

“आप भी क्या याद करोगे पापा… हाथ से कर लो… बेटी के पानी का स्वाद लेते-लेते…”

शहजाद ने उसकी उँगलियाँ चूस लीं और आँखें बंद करके लंड हिलाने लगे। नज़मा धीरे से कमरे से निकल गई।

दूसरी तरफ परवीन का रो-रोकर बुरा हाल था। ये बाप-बेटी तो हद से पार जा चुके हैं। कहाँ जाऊँ, किसको सुनाऊँ अपना दुखड़ा… इरफ़ान… मेरे बेटे, कब आएगा तू…
 
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Mass

Well-Known Member
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Wonderful and sexy update....
Lagta hai ab irfan and parveen kaa "samay" aa gaya hai yaa phir jaldi hi aane waala hai :)

Pinky
 

vakharia

ℜ𝔬𝔪 𝔅𝔞𝔯𝔬
Supreme
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@Pinky जी।

आप २०१९ से लिख रहे हैं, पर इस कहानी पर मेरा ध्यान आज ही गया। समय निकालकर सारे अपडेट्स एक ही बैठक में पढ़ लिए। बहुत समय बाद किसी कहानी ने इस कदर सोचने पर मजबूर किया है। आपकी कहानी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह कोरी कामुकता से परे, एक गहरी मनोवैज्ञानिक उलझन को पकड़ती है। नज़मा का बुर्के के नीचे बिना कपड़ों के बाज़ार जाना सिर्फ एक शारीरिक रोमांच से बढ़कर उन थोपी गई पाबंदियों और घुटन के खिलाफ उसकी बगावत है।

बाज़ार वाला दृश्य बेहद सजीव बन पड़ा है। नज़मा की तेज़ धड़कन, उसका डर, बदबूदार सब्ज़ी मंडी और पसीने की गंध.. सब कुछ पाठक को महसूस होता है। बाहर सब कुछ लांघ जाने की ज़िद और घर लौटकर माँ के सामने मासूम बनने का जो विरोधाभास आपने दिखाया है, वह बेहतरीन है।

हालांकि, एक पुराने पाठक के नाते कहूँ तो कहानी के दूसरे भाग में.. खासकर माँ और इरफ़ान के आने के बाद.. चीज़ें थोड़ी जल्दबाज़ी में भागती नज़र आईं। शुरू में नज़मा का जो गहरा मानसिक द्वंद्व था, वह यहाँ थोड़ा सतही हो गया। शायद आप उसका पछतावा दिखाना चाहते थे, पर वो पहले वाले संघर्ष जितना असरदार नहीं लगा। कहानी ने जैसे ही अपनी पकड़ बनाई, वह बिना रुके आगे दौड़ पड़ी।

पापा का किरदार इस कहानी की सबसे डार्क और जटिल कड़ी है। पत्नी से अलगाव और बेटी की तरफ झुकाव का जो क्रमिक सफर आपने दिखाया है.. शुरुआती संकोच से लेकर उस हद तक गुज़र जाना जब वह नज़मा को अपनी गोद में बिठाकर उसकी चूत पर अपना लंड रखता है.. यह साफ तौर पर एक मझे हुए लेखक की ही निशानी है। यह हिस्सा पाठक को असहज ज़रूर करता है, पर यही इस किरदार की जीत है। उसे आपने एकतरफा विलेन बनने से बचा लिया।

इन सबके बीच माँ की खामोशी कहानी में सबसे ज़्यादा शोर मचाती है। पिछवाड़े में नज़मा-इरफ़ान को देखना हो या बाद में शहज़ाद की गोद में नज़मा को.. उसकी बेबसी दिल दहलाती है। वह इस कहानी की असली त्रासदी है.. एक ऐसी औरत जो खुद को सबसे कमज़ोर मानकर चुप है, जबकि उसकी जगह उसकी ही बेटी ले रही है।

सुझाव के तौर पर सिर्फ इतना कहूँगा कि इस कहानी की जान इसके साइलेंट टेंशन में है। इन खामोश पलों को थोड़ा और वक़्त दें। नज़मा का माँ के सामने से गुज़रते हुए कंधे झुका लेना या शहज़ाद का अपनी पत्नी को देखकर झेंपना.. इन्हीं छोटी-छोटी हरकतों में कहानी की असली गहराई है।

नज़मा असल में खुद से जुड़ी उस घुटन को मिटाना चाहती है। आपने इस आग को बड़ी ईमानदारी और बेबाकी से लिखा है। बस कहानी को उसकी अपनी लय और रफ़्तार में बहने दें।

लिखते रहिए..

सविनय

वखारिया
 
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