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Incest नज़मा का कामुक सफर 2

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Pinky

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ये कहानी मैंने 2019 में शुरू की थी, पर कुछ कारणों से पूरी नहीं कर पायी। इस बार पूरा करने का प्रयास है।
यहाँ भी मैं पूरी कहानी दोबारा डाल रही हूँ

 
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1: गुप्त इच्छा

नज़मा एक 20 साल की चेन्नई में रहने वाली लड़की है | उसकी लम्बाई 5'6 " सुंदर गोरी त्वचा और दुबली पतली दिखाई देती है, कुछ-2 आलिआ भट्ट की तरह | उसके बोबे ना ज्यादा बड़े ना ज़्यादा छोटे, 34B साइज के हैं। उसकी गांड बहुत की गोल मटोल और शानदार है। देखने में एक दम माल लगती है | स्वभाव से बहुत ही शर्मीली और मासूम है। वह अपने परिवार के साथ रहती है। उसके परिवार में उसको छोड़ कर, उसके पापा, माँ और भाई है |

उसके पापा, शहजाद, एक निजी फर्म में एक अकाउंट मैनेजर हैं ।

उसकी माँ, परवीन, कपड़ों और मेकअप के सामन की शॉप चलाती हैं | उसकी माँ अपने व्यस्त जीवन शैली की कारन बहुत ही फिट है | बोबों और गांड को छोड़ के उसकी माँ का बदन भी पतला है | उसके बोबों का साइज 36C है और गांड बहुत ही बड़ी और जानमारु है | उसकी माँ इस उम्र में भी इतनी सेक्सी और फिट है की वो नज़मा की माँ की तुलना में नाज़मा की बहन ज़्यादा दिखती है ।

नज़मा का भाई, इरफ़ान, 18 साल का है और इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है | क्योंकि भाई-बहन एक ही उम्र के हैं इसलिए दोनों मैं झगड़ा भी बहुत होता है और प्यार भी बहुत है | दोनों की एक दूसरे को परेशान करने की तरकीबें बनाते रहते हैं ।

नाज़मा का परिवार एक रूढ़िवादी परिवार है | वह जब भी बाहर जाती है बुर्का पहनती है । इसलिए घरवालों और रिश्तेदारों को छोड़ कर बहुत कम लोग ही उसे पहचानते हैं | नज़मा एक बहुत ही शर्मीली, मासूम और शरीफ लड़की है लेकिन उसका एक और छुपा हुआ व्यक्तित्व भी है | उससे लोगों को नंगे देखना या सेक्स करते हुए देखना बहुत पसंद है | वो ये भी चाहती है की कोई उसके बदन को देखे, नंगा देखे लेकिन अचानक से | जैसे की गलती से देख लिया हो, वो नहीं चाहती थी लेकिन परिस्थिति ऐसी बन जाये | ऐसा सोच कर ही वो बुरी तरह से उत्तेजित हो जाती | इनकी सब कल्पनाओं के बारे में सोचकर वो ना जाने कब से ऊँगली करती थी और अपनी गर्मी निकलती थी ।

नज़मा को नहीं पता था की वास्तविक रूप में सेक्स कैसा होता है, उसकी फीलिंग क्या होती है | उसकी सील अभी तक नहीं टूटी थी | सील क्या उसने अपनी ज़िन्दगी में अभी तक किसी लड़के के साथ सेक्स के बारे में बात तक नहीं की थी |

धीरे-2 रोज़ कल्पना करते हुए मुठ मारने से वो उकता गयी थी | वो असल में कुछ करना चाहती थी लेकिन उसे अपनी कल्पनों को, अपने सपनो को साकार करने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा था | अब वो अपनी एक-दो फैंटसी को वास्तविकता में लाने का प्रयत्न करना चाहती थी | अब उससे लगने लगा था की एक बेजोड़ प्लान बनाया जाये और हिम्मत करके कुछ असल ज़िन्दगी में कोशिश की जाये, नहीं तो वो अपनी कल्पनों के भंवर में पागल हो जाएगी |
 
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भाग 2: पहला कदम

उसकी एक बहुत पुरानी फैंटसी थी, बुर्का के नीचे बिलकुल नंगे ही बाज़ार जाना | ऐसा सोचते ही उसके रोंगटे खड़े हो जाते थे | बुर्का ज्यादातर चूड़ीदार, सलवार-कमीज, साडी या फिर कभी-2 नाइटी के ऊपर भी पहना जाता है, और उसके नीचे अंडरवियर तो होते ही हैं | बुर्का ज्यादातर पतले कपडे का बना होता है, इसलिए उसमें से निप्पल की शेप दिखने का भी खतरा हो सकता है | इसलिए नज़मा ने काले रंग के बुर्के को चुना | वो बहुत डर रही थी लेकिन अब उसने ठान ली थी की ये फैंटसी तो पूरी करनी ही है | उसने पूरी योजना बना ली थी | वो नहीं चाहती थी की घर के किसी भी व्यक्ति को इसके बारे में भनक भी लगे, नहीं तो उसकी फैंटसी तो क्या पूरी होती, उसकी ज़िन्दगी ही नरक बन जाती | उसने अपने प्लान के लिए शनिवार का दिन चुना । उसके पापा शनिवार को भी ऑफिस जाते थे, माँ की दुकान पर शनिवार को थोड़ा ज़्यादा भीड़ रहती थी और भाई अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने सुबह ही निकल जाता था।

शनिवार को सब लोगों के जाने के बाद वो अपने कमरे में जाके सारे कपडे उतार के पूरी नंगी शीशे के सामने खड़ी हो गयी | उससे साफ़-सफाई बहुत पसंद थी | उसकी मुनिया बिलकुल सफाचट थी | वो आईने में अपने नग्न शरीर को निहारने लगी । जब भी वह कपड़े बदलती तो शीशे में अपने बदन को ज़रूर निहारती थी | उसने सोचा कि अगर वह इस तरह पूरी नंगी ही बाहर जाती है तो कैसा होगा । जैसे ही ये विचार उसके दिमाग में आया, उसकी मुनिया ने पानी बरसाना शुरू कर दिया | वो फिर से अपनी सपनो की दुनिया में पहुँच गयी |

लेकिन अब ये सपने देखने का समय नहीं था, अब तो सच में कुछ करना था | सपने देखना और सच करना दोनो अलग-अलग बातें है | उसके पेट में गुड़गुड़ होने लगी | एक बार तो सोचा की रहने दे लेकिन कभी तो करना है की | इसलिए उसने अपने प्लान पे आगे बढ़ने का फैसला किया |

उसने अपने मादरजात नंगे शरीर पर बुर्का पहना | ऐसे करने से ही वो बहुत ज़्यादा उत्तेजित हो गयी | उसके उभरे हुए निप्पल बुर्के के ऊपर से बिलकुल साफ़ दिखाई दे रहे थे लेकिन उसने अपने मन को समझाया की कोई इतनी पास से और इतने ध्यान से थोड़ा ना देखेगा | उसने दुपट्टे से अपना सिर ढक लिया और थोड़ा सा बोबों को छुपाने के असफल प्रयास भी किया ।

उसने जल्दी से अपना बैग उठाया और बाहर निकल गई ताकि कहीं उसके बुज़दिल विचार उससे कमज़ोर ना कर दें | जाने से पहले उसकी माँ ने उसे बाज़ार से कुछ सामान लाने के लिया कहा था | उसे पास की मंडी से सब्जी खरीदनी थी | इस मंडी में बहुत भीड़ रहती थी | वो गंदे गरीब लोग, एक-2 रुपए पे मोलभाव, गन्दगी, पसीने की बदबू, ये मंडी भी हमारे देश की बाकि सब्ज़ी मंडियों की तरह ही है |

नज़मा शर्मीली ज़रूर है लेकिन उसकी माँ ने उसे मोलभाव करना अच्छे से सिखाया है । हमारे देश में औरतें इस काम में बहुत कुशल होती हैं | वह तेज़-2 क़दमों से बाजार जाने लगी । उसके बोबे बहुत बड़े नहीं थे और बिलकुल सख्त भी थे इसलिए बिना ब्रा के भी बहुत ज़्यादा फुदकते हुए नहीं दिखाई दे रहे थे ।
 
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भाग 3: सब्ज़ी की दुकान

नज़मा अपनी पोशाक को लेकर बहुत टेंशन में थी | बाज़ार में बहुत भीड़ थी | जब भी कोई उसकी तरफ देखता है तो वह एकदम से सजग हो जाती थी | कहीं से कुछ दिख तो नहीं रहा, क्या इसे पता तो नहीं चल गया की मैं बुर्के के नीचे पूरी नंगी हूँ | बुर्के के नीचे से अगर थोड़ा सा पैर भी नंगा दिखाई दे जाता तो किसी को भी शक हो सकता था, क्योंकि बुर्के के नीचे ज्यादातर ऐसे कपडे पहने जाते हैं जो की टखने तक आते हैं |

वह बाजार पहुंची | सब्ज़ियां खरीदने से पहले उसने एक लम्बी सांस ली और अपने आप को रिलैक्स करने की कोशिश करने लगी |

उसने सोचा: अगर वो दुकानदार के सामने जाएगी तो दुकानदार को एक जवान लड़की ही तो दिखाई देगी | दुकानदार को थोड़ा ना पता होगा की वो लड़की बुर्के के नीचे नंगी है |

उसने अपने सीने से दुपट्टा हटा दिया | उसके निप्पल भी अब उतने नहीं दिखाई दे रहे थे | उसका मन अब पहले से अपेक्षा शांत हो चूका था | उसके बोबे उतने फुदकते हुए भी नहीं दिखाई दे रहे थे | अगर वो तेज़ चलती या फिर सब्ज़ी खरीदते हुए ज़्यादा हिलती तो थोड़ा बहुत मह्सूस होता की उसने ब्रा नहीं पहनी है लेकिन वो भी बहुत ध्यान से देखने वाले को |

पूरी तरह से आश्वस्त होने के बाद वो एक दुकान पर रुक गयी | दुकानदार का नाम असलम था | वो तकरीबन 60 साल की उम्र का बूढ़ा सा आदमी था | उसका मुंह पान से भरा हुआ था | उसने धोती और ऊपर सिर्फ एक फटी पुरानी बनियान पहनी हुई थी |

नज़मा पहले से कहीं ज़्यादा कण्ट्रोल में थी लेकिन फिर भी वो पूरी तरह से रिलैक्स नहीं थी | उसने जल्दी-2 सब्ज़ी लेनी शुरू की | वो कोई उतना मोलभाव भी नहीं कर रही थी | शातिर दुकानदार की नज़र से ये बात चुप नहीं पायी | असलम समझ गया की कुछ ना कुछ गड़बड़ ज़रूर है | अब क्या गड़बड़ है, ये असलम को अभी तक पता नहीं चला था |

"क्या हुआ बेटी? सब ठीक तो है, थोड़ा घबराई सी लग रही हो | कोई तुम्हे तंग तो नहीं कर रहा ना?" असलम ने टेढ़ी मुस्कान के साथ पुछा |

नज़मा: नहीं, कुछ नहीं | सब ठीक है |

नज़मा को लगा की शायद दुकानदार को उसकी हालत के बारे में पता चल गया है | वो वहां से भाग जाना चाहती थी | लेकिन अगर ऐसे अचानक से चली जाती तो दुकानदार का शक यकीन में बदल जाता | यही सोच कर वो चुपचाप सब्ज़ी खरीदने में ध्यान लगाने लगी |

असलम: और बेटी, अब्बा कैसे हैं तुम्हारे? शहज़ाद मियां दिखाई ही नहीं देते आजकल?

नज़मा की गांड ही फट गयी | ये मादरचोद तो जानकार निकला | अब्बा को भी जानता है | अब क्या होगा ?

नज़मा (घबराते हुए): जी ... जी ... अब्बा बहुत अच्छे हैं .... वो गर्मी से बड़ी बेचैनी हो रही है ... इसलिए थोड़ा जल्दी में हूँ ... आप प्लीज जल्दी से सब्ज़ी दे दें ....

असलम (गन्दी सी हंसी के साथ): हाँ, हाँ | क्यों नहीं | हमारा तो काम ही है, आपको देना .... ये लम्बे बैगन ले जाइये ... बहुत शानदार लगेंगे आपको

नज़मा उस दुकानदार की दोअर्थी बातें समझ रही थी लेकिन उसने दुकानदार से उलझना अच्छा नहीं समझा | वो बस उसकी दुकान से जल्दी से जल्दी निकल जाना चाहती थी | नज़मा ने चुपचाप सब्ज़ी ली और फटाक से निकल ली |

असलम जाती हुई नज़मा की गांड को बड़े गौर से घूरता है और बगल में पीक की पिचकारी मारता है |

असलम (मन में): क्या गांड है बहन की लोड़ी की | खूब जवानी चढ़ गयी है | कुछ तो चक्कर है साली का | अगली बार देखता हूँ कुतिया को

नज़मा थोड़ा आगे निकल कर चैन की सांस लेती है |

नज़मा (मन में): कमीना, पहचान गया था मुझे | अच्छा हुआ मुझे ही पहचाना, मेरे कारनामो को नहीं ...
 
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भाग 4: बुज़ुर्ग पड़ोसी

खरीदारी पूरी करने के बाद नज़मा पैदल ही घर की तरफ चल दी | घर जाने से पहले उसे कुछ सब्जियाँ अपने पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग अंकल-आंटी को देनी थी | उनके पडोसी बहुत समय से वहां रह रहे थे | वो बहुत बूढ़े थे और उनके घर नज़मा के परिवार का काफी आना जाना था | वो लोग इस बुढ़ापे में ज़्यादा बाहर नहीं निकल पाते थे इसलिए नज़मा का परिवार उनकी दैनिक चीज़ों में मदद कर देता था | नज़मा ने उनके घर पहुँच कर डोर बेल बजाई। आंटी ने दरवाज़ा खोला |

नज़मा: हेलो आंटी ... मैं आपके लिए सब्ज़ियां ले आयी

आंटी: अरे नज़मा बेटी, आओ, आओ ... हम तुम्हारी ही बात कर रहे थे | तुम ये सब्ज़ियां फ्रिज में रख दो | फिर आराम से बातें करते हैं ...

नज़मा ने सब्ज़ियां फ्रीज में रख दी और ड्राइंग रूम में अंकल-आंटी के सामने रखे सोफे पे बैठ गयी |

आंटी: थैंक्स बेटा | तू कितना ख्याल रखती है हम दोनों बूढ़ा-बूढी का |

नज़मा: अरे थैंक्स की क्या बात है आंटी | वो तो मुझे वैसे भी घर ले लिए सब्ज़ी लानी ही थी तो आपके लिए भी ले आयी |

आंटी: कितनी गर्मी है | देख तो कितना पसीना आ रहा है तुझे बेटा | ये मुआ बुरका क्यों पहन रखा है ? कम से कम घर में तो निकाल दे इससे |

एक पल को तो नज़मा को लगा की बात बिलकुल ठीक है, बुरका निकाल देती हूँ | फिर उससे याद आया की आंटी-अंकल से बातों में वो भूल ही गयी की वो तो बुर्के के अंदर नंगी है | अब बुरका उतार के अंकल को हार्ट अटैक थोड़ा ना देना था |

नज़मा: नहीं आंटी, मैं ऐसे ही ठीक हूँ | अच्छा मैं चलती हूँ, घर पे भी काम है |

आंटी: अरे रुक तो, मैं तेरे लिए कुछ ठंडा पीने के लिए लेके आती हूँ |

नज़मा: नहीं आंटी, आप क्यों तकलीफ कर रहे हैं | ठंडा फिर कभी, अभी तो मैं चलती हूँ |

आंटी नज़मा के साथ कुछ टाइम और पास करना चाहती थी | आंटी ने उससे रोको भी लेकिन फिर भी नज़मा वहां से निकल आयी |

वह अपने घर पहुँच गयी गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया । जैसा कि वो बाहर से आने के बाद हर बार करती है, वैसे ही उसने घर पहुँचते ही अपना बुर्का उतर कर दरवाजे के पास बने स्टैंड पे लटका दिया । फिर उसने एक लम्बी रिलैक्स मूड में सांस ली |

फिर से अपनी मुट्ठी को हवा में लहराया और ख़ुशी से चीख पड़ी: "यस, यस, ... I have done it .... कर लिया मैंने .... कर ली अपनी एक फैंटसी पूरी .... शाबास नज़मा" | ये कहते हुए उसने अपनी खुद ही पीठ थपथपाई | वो पूरी नंगी ही लिविंग रूम में कूद रही थी | अच्छा है की जाने से पहले वो सारी खिड़कियाँ बंद करके गयी थी |
 

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भाग 5: खुली हवा

उसे नंगे रहने में बहुत मज़ा आ रहा था | पूरे दिन ढकी रहने वाली नज़मा, ऐसी नज़मा जिस के बदन के ना जाने कितने अंगों ने कब से रौशनी नहीं देखी होगी, वो नज़मा दिन-दिहाड़े पूरी मादरजात नंगी ड्राइंग रूम में बेधड़क घूम रही थी | उसे ऐसा करते हुए कोई देख नहीं रहा था लेकिन उसे बहुत अच्छा लग रहा था | दोपहर के खाने से पहले कोई नहीं आने वाला था | उसके पास अभी बहुत टाइम था, मस्ती करने के लिए, नंगे रहने के लिए |

उसे बर्तन धोने थे | उसने सोचा क्यों ना ये काम भी नंगे ही किया जाये | उसने नंगे ही सारे बर्तन धोये और सेल्फ में सजा दिए | बर्तन धोते-2 वो पूरी तरह से गीली हो गयी थी | उसने एक तौलिया लिया और ड्राइंग रूम में लगे सोफे पे बैठ कर खुद को सुखाने लगी ।

उसके दिमाग में सुबह से हुई सारी घटनाएं दौड़ने लगी | सब याद करते-2 उसके बदन में सिहरन दौड़ने लगी | बदन से छूता हुआ तौलिया भी उसे रोमांचित कर रहा था | उसने अपनी चूत को छू के देखा तो पता लगा की उसकी चूत का तो झरना बना हुआ है | अब उससे और रुका नहीं गया | उसने अपनी दो उँगलियाँ चूत में घुसाड़ दी और वहीँ सोफे पे मुठ मारना शुरू कर दिया | आज ये पहली बार था जब वो इतने खुले में मुठ मार रही थी | आज से पहले उसने केवल अपने कमरे मैं, लॉक करके, बिना आवाज़ के, लाइट बंद करके ही अपनी मुनिया को हाथ लगाया था |

वो इतनी ज़्यादा उत्तेजित थी की ऊँगली करने के 10 सेकण्ड्स में ही उसने झड़ना शुरू कर दिया | शायद ये उसकी ज़िन्दगी की सबसे शानदार मुठ थी | वो इतनी तेज़ और इतनी ज्यादा झड़ी की वो वहीँ सोफे पे निढाल हो के लेट गयी |

कुछ समय बाद जब उसने आँखें खोली तो उसे गलानि ने आ घेरा | वो सोचने लगी "मेरे माँ बाप मुझे कितना शरीफ समझते हैं | कितनी इज्जत है उनकी समाज में | अगर उन्हें पता चल गया की उनकी बेटी ये सब कारनामे करती है तो क्या बीतेगी उनपे | नहीं, मैं आज के बाद ऐसा कुछ नहीं करुँगी |"

ये सोच के वो तुरंत नहाने चली गयी | नहा के उसने कपड़े पहन लिए | उसके भाई के आने का टाइम भी हो चला था | अपने मूड को फ्रेश करने के लिए वो टीवी देखने लगी |

जब उसके माँ और भाई लौटे तो नज़मा उनसे आँखें मिलाने में झिझक रही थी| लेकिन उसके भाई और माँ का बर्ताव बिलकुल नार्मल था| ये देख के नज़मा भी धीरे-2 रिलैक्स होने लगी और उसका कॉन्फिडेंस भी वापिस आने लगा| कुछ समय के बाद वो सामान्य होने लगी| सभी ने साथ में दोपहर का खाना खाया और फिर सभी अपनी-2 सामान्य दिनचर्या में लग गए|
 

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भाग 6: अंधेरे में बेपर्दा

दो दिन तक तो सब नार्मल रूटीन रहा लेकिन तीसरी रात को नज़मा जब सोने के लिए अपने बिस्तर पे लेटी तो उसके कामुक विचारों ने उसे फिर से उसे घेर लिया| उसे अब फिर से कोई रोमांच चाहिए था| उसने सोने के बहुत कोशिश की लेकिन वो बिल्कुल भी नहीं सो पा रही थी| उसे कुछ करना था, आज भी करना था, कल भी करना था, रोज़ करना था| कितना मज़ा आया था उस दिन सब्ज़ी लेने में| पहली बार उसे बर्तन धोना उसे अच्छा लगा था| नंगे होके घूमना, कुछ भी करना, कितना मज़ा आता है|

उसने अपने कपडे उतार दिए और नंगी हो गयी| नंगे होके अपने बिस्तर पर लेटने में उसे एक अलग सी मस्ती की लहर महसूस हो रही थी| आमतौर पर सुबह उसकी माँ उसे चद्दर खिंच कर जगाती थी इसलिए रात को नंगे सो जाना भी मुंकिन नहीं था| इसलिए नज़मा अभी सोना नहीं चाहती थी| उसे नंगे रहना बहुत अच्छा लग रहा था| वो बिस्तर से उठी और अपने कमरे में इधर-उधर नंगे ही घूमने लगी। उसने अपने कमरे में इधर-उधर कुछ-2 नार्मल काम करने शुरू कर दिए लेकिन ये सब नंगे करने में अलग ही आनंद मिल रहा था| अब उसने मन बना लिया की जब भी संभव हुआ वो नंगी ही रहा करेगी और नंगी ही सब काम करेगी|

कुछ देर में नज़मा थोड़ा बोर होने लगी| उसने अपने बेडरूम का दरवाजा खोला और बाहर झाँका। बाहर अंधेरा और सन्नाटा फैला हुआ था| उसका बाहर जाने का मन किया| वो घर में नंगे घूमना चाहती थी, वो भी तब जब सब लोग घर में ही हों| लेकिन अगर कोई जाग गया तो क्या होगा। क्या होगा अगर उससे शोर हो गया या कोई अनजाने में आवाज़ हो गयी कोई अपने रूम से चेक करने के लिए आ गया| वो क्या जवाब देगी? ऐसे नंगे घर में घूमने का क्या बहाना बनाएगी? वो मन में कुछ देर बहस करती रही और आखिर में दिमाग पे चुत की जीत हुई| उसने रिस्क उठा के बाहर जाने का फैसला किया|

नज़मा बहुत ही सावधानी से बाहर आई। उसने चुपचाप धीरे-2, बिना शोर किये, अपने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया| वो नहीं चाहती थी की कोई अगर अपने रूम से बाहर आये तो उसे नज़मा के रूम का दरवाज़ा खुला देख के कोई शक हो| लेकिन दरवाज़ा बंद करने का ये भी मतलब था की अब वो किसी खतरे के समय पर तुरंत अपने कमरे में नहीं जा सकती थी। उसका कमरा सीधे लिविंग रूम में खुलता है। वह धीरे-2 बिना आवाज़ लिए बिल्ली की तरह चल रही थी| उसे विश्वास नहीं हो रहा था की वो नंगी अपने घर के लिविंग रूम में पहुँच गयी है जबकि उसके मम्मी, पापा और भाई अपने बेडरूम में सो रहे हैं। उसे उत्तेजना और बेचैनी के मारे अपनी चुत में गीलापन महसूस होने लगा|

बाहर अँधेरा घना नहीं था | सड़क से खिड़कियों के रस्ते आती रोशनी ने लिविंग रूम में पर्यापत उजाला कर रखा था| उसके घर के सभी बैडरूम के दरवाज़े लिविंग रूम में ही खुलते थे| इसलिए, अगर कोई उठ के बाहर आता तो उसे जन्मजात नंगी घूमती हुई, घर की इज्जत, शरीफ और लाड़ली बेटी दिख जाती|

वो कुछ देर तक घर में इधर-उधर टहलती रही| उसे घूमते हुए 15 मिनट से ज़्यादा हो गया थे| लेकिन अभी तक उसका मन नहीं भरा था| उसने प्लान किया की वो एक घंटे तक ऐसे ही नंगी घर में घूमेगी और उसके बाद अपने कमरे में जाएगी| उत्तेजना से उसका गला सूख गया था और उसे बहुत तेज प्यास लगी थी।

वह रसोई में गई और फ्रिज खोला| लेकिन ये क्या, जैसे ही उसने फ्रीज खोला उसका नंगा बदन फ्रीज की रौशनी में नहा गया| ऐसा लग रहा था जैसे वो नंगी स्पॉटलाइट में खड़ी हो| उसने घबरा के तुरंत फ्रीज बंद कर दिया| वो घबरा गयी थी| उसने एक लम्बी सांस लेके अपने आप को शांत किया और मन-2 अल्लाह को याद करते हुए फिर से फ्रीज को खोल लिया|
 

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भाग 7: सोफे के पीछे

फ्रीज में एक ही पानी की बोतल भरी रखी थी| उसने बोतल से कुछ पानी पिया और कुछ पानी अपने ऊपर गिरा लिया| गर्मी बहुत हो रही थी| फ्रिज से आती ठंडी हवा उसे बहुत अच्छी लग रही थी| नज़मा वहीं ठण्ड का आनंद लेती हुई कुछ देर खड़ी रही| ठंड के कारण उसके निप्पल अब थोड़े-2 खड़े होने लगे थे| जो पानी उसने अपने शरीर पे डाला था वो पानी धीरे-धीरे रास्ता बनाते हुए उसकी चूत तक पहुँच गया और उसके नीचे वाले होंठों को और ज़्यादा गिला करने लगा|

कुछ देर बाद उसने फ्रिज बंद कर दिया और तफरी करते हुए आखिर में सोफे पर बैठ गई। उसका मन वहां मुठ मारने का हो रहा था| लेकिन उसे पता था की वो आज मुठ मारते हुए बिलकुल चुप नहीं रह पायेगी| कुछ न कुछ आवाज़ें तो उससे होंगी ही| इसलिए उसने मुठ मारने का प्लान अभी के लिए टाल दिया|

अचानक उसे दरवाजे के खुलने की आवाज आई। वो एक दम से अलर्ट हो गयी| नज़मा अभी अपने बेडरूम में नहीं जा सकती थी या कहा जाये तो वो इस समय पर नहीं जा सकती थी। उसने आव देखा न ताव और बस सोफे के पीछे कूद के वहां छिप गई। उसका भाई कमरे से बाहर आया था| उसके भाई ने लिविंग रूम की लाइट ऑन कर दी। हर जगह उजाला फ़ैल गया| उसका नंगा बदन रौशनी में नहा गया| अगर उसका भाई इस तरफ आ जाता तो उसके पास छिपने की कोई जगह नहीं थी|

"क्या घटिया प्लान था? माँ चुद गयी सारे प्लान की| आगे से बहुत ध्यान देके प्लान बनाना होगा|" नज़मा ने अपने मन में सोचा|

उसका भाई पानी पीने के लिए रसोई में गया। उसे पता था की उसके भाई को अच्छा-खासा टाइम लगने वाला है| फ्रीज में एक ही बोतल थी जो की नज़मा ने पूरी खाली कर दी थी| पहले तो नज़मा ने मज़े-2 में सारा पानी पी लिया था अब उसका पेशाब का तेज प्रेशर बन रहा था|

उनका घर काफी पुराने तरीके से बना हुआ था| घर में कोई अटैच्ड बाथरूम नहीं था क्योंकि उस ज़माने में इसे बहुत ही गन्दा और अस्वच्छ माना जाता था। उनके घर के पीछे एक खुला पिछवाड़ा था,बहुत बड़ा भी नहीं लेकिन छोटा भी नहीं| उसके दाहिने कोने पे एक शौचालय बना हुआ था| घर के पिछवाड़े को ऊंची दीवारों से हर तरफ से ढक दिया था ताकि कोई देख या कूद न सके।

पिछवाड़े के बिलकुल दूसरे छोर पर रसोई बनी हुई थी| यदि नज़मा की तरह उसके भाई को भी पेशाब करना होता तो उसे पूरा लिविंग रूम पार करके जाना पड़ता| अगर ऐसा होता तो पक्के से नज़मा नंगी पकड़ी जाती| नज़मा प्रार्थना करने लगी की उसका भाई सीधे अपने कमरे में वापिस चला जाये।

उसके भाई ने पानी पिया और लाइट बंद करके सीधे अपने कमरे में चला गया|

नज़मा मन ही मन में: शुक्र है अल्लाह का| जान बची तो लाखों पाए ......

इतनी देर से वो अपने पंजों पे ही बैठी हुई थी| अब रिलैक्स होते हुए वो सोफे से अपनी पीठ टिकाते हुए नंगी ही ही फर्श पर बैठ गयी|

जैसे ही ठन्डे-2 फर्श को उसकी गांड ने छुआ, उसके पेशाब का प्रेशर फिर से जोर मारने लगा| लेकिन वो अभी कोई चांस नहीं लेना चाहती थी, वो चाहती थी के मैदान पूरा साफ़ हो जाये| उसने थोड़ी देर और इंतजार किया।
 
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