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Incest नज़मा का कामुक सफर 2

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Pinky

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ये कहानी मैंने 2019 में शुरू की थी, पर कुछ कारणों से पूरी नहीं कर पायी। इस बार पूरा करने का प्रयास है।
यहाँ भी मैं पूरी कहानी दोबारा डाल रही हूँ

 
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Pinky

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भाग 27: दर्शन

उस दिन शाम को सब एक साथ खाना खा रहे थे। इरफ़ान ज़रुरत से ज़्यादा खुश दिखाई दे रहा था और बार-बार अपनी बहन की तरह देख के मुस्करा रहा था। नज़मा भी अपने भाई के इस रवैये से खुश थी लेकिन उसे डर था की कहीं उसकी माँ को कोई शक न हो जाये। उसने एक-दो बार इरफ़ान को नार्मल रहने का इशारा भी किया लेकिन शायद इरफ़ान समझ नहीं पाया।

नज़मा अपने भाई को अपने बोबों और आधी नंगी गांड के दर्शन करवा चुकी थी। अगले दिन नज़मा ने गेम को आगे बढ़ाने का सोचा। नज़मा ने प्लान किया की क्यों न आज इरफ़ान को अपनी कुंवारी चूत के दर्शन करवाए जाएँ। लेकिन वो अपनी चूत ऐसे दिखानी चाहती की जैसे ये एक गलती जैसा लगे। आज इरफ़ान थोड़ा लेट उठा था, ये नज़मा के प्लान के लिए बहुत बढ़िया था।

नज़मा पिछवाड़े में जाके नहा ली और एक सूखा पेटीकोट पहन के इरफ़ान का इंतज़ार करने लगी। नज़मा ने आज अपना सूखा पेटीकोट बाकी दिनों के अपेक्षा थोड़ा ज़्यादा ऊपर पहना था। पेटीकोट उसकी उतनी की जांघें ढक पा रहा था जितना एक माइक्रो स्कर्ट ढक पाती है। अगर वो सीधी खड़ी रहती तो पीछे से हल्का सा चूतड़ों का उभार दिखाई देता लेकिन अगर वो सामने की तरफ झुक जाती तो अच्छे अच्छों का पानी निकल जाता। झुकते ही उसकी पेंटी में छिपी चिकनी चूत उभर कर सामने आ जाती।

नज़मा आज अपने भाई पे कहर बरपाने वाली थी। नज़मा ने प्लान किया की जैसे ही उसका भाई पिछवाड़े में आएगा, वो झुक के अपनी गीली पैंटी उतारने लगेगी और ऐसे नाटक करेगी जैसे उसे भाई के आने का पता ही ना चला हो। जब वो झुक के अपनी पानी और कामरस से भीगी पेंटी उतारेगी तो उसके भाई को उसकी चमकती चिकनी कुंवारी चूत के दर्शन हो जायेंगे।

नज़मा कुछ देर अपने भाई का इंतजार करती रही लेकिन कोई नहीं आया। नज़मा ने सोचा की अब कल ही इस प्लान को किया जायेगा लेकिन तभी उसे किसी के आने की आवाज़ सुनाई दी। नज़मा तुरंत अपनी पोजीशन में आ गयी और अपने चूतड़ ड्राइंग रूम की तरफ करके झुक के अपनी पेंटी निकलने लगी। जैसे ही पेंटी नीचे हुई उसकी चिकनी चूत के होंठ और उसकी पूरी गांड सुबह की सुनहरी धुप में चमकने लगे। उसकी चूत ने भी रिसना शुरू कर दिया।



तभी नज़मा को अपनी माँ की आह सुनाई दी "या अल्लाह"।

ये क्या हुआ, परवीन???? नज़मा तो अपने भाई का इंतज़ार कर रही थी, ये उसकी माँ कहाँ से आ गयी? हूँ यूँ था की परवीन को कल रात ही कुछ अंदेशा हो गया था। आज सुबह जब इरफ़ान अपने कमरे से निकल के पिछवाड़े में जाने लगा तो अपनी माँ को ड्राइंग रूम में देख के थोड़ा ठिठका और वापिस अपने कमरे में चला गया जिससे परवीन का शक और गहरा हो गया। परवीन ने तब पिछवाड़े में जाने का फैसला लिया। जैसे ही परवीन पिछवाड़े में पहुंची तो वो उसे झुकी हुई नज़मा दिखाई दी। नज़मा की चूत और गांड नंगे चमक रहे थे। परवीन के मुंह से आह निकल गयी।

नज़मा ने अपनी माँ की आवाज़ सुन ली लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था। नज़मा को बड़े ठन्डे दिमाग से काम लेना था। नज़मा ने बिना हड़बड़ाए थोड़ा-थोड़ा करके पैंटी को नीचे लाना जारी रखा और आखिर में उसे टखनों तक गिरा दिया। इरफान भी अब ड्राइंग रूम में आ गया था और वहीँ से छुप के माँ बेटी को देख रहा था।

परवीन (चिल्ला के): नज़मा, ये क्या कर रही है तू?

नज़मा ने जैसे ही माँ की आवाज़ सुनी तो उसने चौंकने का नाटक किया और तुरंत घूम गयी लेकिन उसकी एड़ियों में पैंटी फसी हुई थी जिसके कारण वो गिर गयी।

गिरते ही नज़मा चिलायी: ओह, माँ मर गयी।

परवीन सब भूल के तुरंत भाग के अपनी बेटी को मदद देने के लिए आई।

परवीन: क्या हुआ बेटी, ज़्यादा चोट तो नहीं लगी?

नज़मा: हाय माँ, मेरा पिछवाड़ा। आपने डरा दिया पीछे से आवाज़ दे के।

परवीन अपनी बेटी को चूत की सरेआम नुमाइश के लिए डांटना चाहती थी लेकिन अब उसकी गलती से उसकी बेटी को चोट लग गयी थी। और कुछ दिन पहले भी वो नज़मा को बुरी तरह डांट चुकी थी इसलिए परवीन ने आराम से नज़मा को समझाने का मन बनाया।

परवीन: नज़मा तुम अपनी पैंटी क्यों उतार रही थी? तू पेंटी अपने कमरे में नहीं उतार सकती क्या?

नज़मा: माँ क्या है आपको? जब देखो तब मुझे डांटते रहते हो? मैं अब बड़ी हो गयी हूँ, मुझे पता है कैसे नहाना है। पहले पेटीकोट और अब ये पेंटी, आपको मेरे नहाने के तरीके में इतनी दिलचस्पी क्यों है?

परवीन: बेटी मैं तेरी भलाई के लिए ही पूछ रही हूँ, तू पेंटी अपने कमरे में नहीं उतार सकती क्या?

नज़मा: मैं गीली पेंटी पहन के कमरे तक जाउंगी क्या?

परवीन (मन में): बहुत मुर्ख है ये। अब इसे क्या बताऊँ की ये पेटीकोट के नीचे से पेंटी उतारते हुए छुपाती कम है, दिखती ज़्यादा है। ज़्यादा क्या दिखती है , पूरी नंगी ही तो हो गयी थी मुंदबुद्धि कहीं की।

परवीन: तू ऐसा कर ना। तू अपने कमरे में ही पेंटी उतार के आ और नहाने बाद रूम में जाके पेंटी पहन ले।

नज़मा: माँ, क्या कह रहे हो आप। मुझे बहुत शर्म आएगी।

परवीन: मुझे पता है की मैं क्या कह रही हूँ। तेरी दुश्मन नहीं हूँ, माँ हूँ तेरी। ज़्यादा सवाल जवाब ना कर मुझ से। आज से तू अपने कमरे में ही अपनी पैंटी निकाल के आएगी। बिना पैंटी के भी नहा सकती है, कोई आसमान नहीं टूट पड़ेगा। अभी तू पेंटी पहन के नहाती है, इसलिए तुझे अजीब लग रहा है, धीरे-२ आदत हो जाएगी बिना पेंटी नहाने की।

नज़मा: लेकिन मम्मी

परवीन: चुप, अब कोई बहस नहीं। जैसा मैं कहूँ वैसा कर। फिर से पानी डाल ले अपने पे, गन्दी हो गयी है नीचे गिर के।

परवीन वापिस अंदर चली गयी। माँ को अंदर आता देख इरफ़ान भाग के अपने रूम में चला गया।
 
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भाग 28: तौलिया

बात तो परवीन ने बिलकुल ठीक कही थी लेकिन नज़मा के शैतानी दिमाग ने क्या समझा ये तो नज़मा की जाने । इरफ़ान भी छुप के सारी बातचीत सुन चूका था, उसे भी अपने कानो पे यकीं नहीं हो रहा था । कैसे उसकी माँ नज़मा को पहले बिना पेटीकोट और तो बिलकुल नंगी, बिना कच्छी के? इरफ़ान को कुछ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन उसे समझ के करना भी क्या था, जो भी हो रहा था उसमें इरफ़ान का तो फायदा ही होने वाला था ।

दूसरी और नज़मा अपनी माँ के दिए नए निर्देशों से बहुत उत्साहित थी। उसकी माँ गलती से नज़मा को ऐसा निर्देश देती थी की नज़मा उसे आराम से अपने मतलब के लिए थोड़-मरोड़ सकती थी । परवीन ने नज़मा को दोबारा नहाने के लिए कहा था इसलिए नज़मा दोबारा नहाने लगी लेकिन इस बार बिना पेंटी, बिलकुल मादरजात नंगी ।

पांच मिनट बाद जब इरफ़ान अपने कमरे से बाहर आया तो उसकी माँ तब तक दूकान के लिए निकल चुकी थी । नज़मा अभी तक पिछवाड़े में ही थी इसलिए इरफ़ान भी पिछवाड़े में पहुँच गया।

नज़मा को इरफ़ान के आने की उम्मीद नहीं थी इसलिए नज़मा अभी अभी नहा के उठी ही थी और तौलिये से अपने नंगे बदन को पूँछ रही थी । अचानक से इरफ़ान के आने की आवाज़ सुन के नज़मा ने तौलिये से अपने बदन को स्वाभाविक नारी लज़्ज़ा के कारण छुपा लिया । इरफ़ान को साइड से नज़मा के उभरे हुए चूतड़ दिखाई दे रहे थे ।

इरफ़ान (मन में): तो दीदी ने मान ली माँ की बात, इतनी जल्दी, बढ़िया है, बढ़िया है

इरफ़ान नज़मा के पास आया और दोनों एक दूसरे की तरफ देखने लगे ।

इरफ़ान: कैसी हो दीदी?

नज़मा (रोने वाला मुंह बनाते हुए): मैं ठीक नहीं हूँ भाई

इरफ़ान: अब क्या हुआ मेरी प्यारी दीदी को? माँ ने फिर कुछ कहा क्या?

नज़मा: हाँ, फिर से । माँ नहीं दुश्मन है मेरी । पहले पेटीकोट अब तो ....

इरफ़ान: अब तो क्या?

नज़मा: माँ ने अब नहाते हुए कच्छी पहनने से भी मना किया है ...

इरफ़ान: क्या ...... क्यों ...... तो क्या तुम अभी ....

नज़मा: हाँ भाई .... बिलकुल नंगी नहा रही हूँ .... ये देख ...

नज़मा ने थोड़ा सा घूमके अपने भाई को अपने नंगे चूतड़ दिखा दिए |

इरफ़ान: आह .... हाँ दीदी ... आप तो सही में ... बिलकुल नंगी हो ...

इरफ़ान से रहा नहीं गया और उसने नज़मा के सामने की पजामे में तम्बू बनाते अपने लंड को मसल दिया | नज़मा तो आज इरफ़ान को वैसे भी अपनी कुंवारी चूत के दर्शन करवाना चाहती थी लेकिन अब ऐसे, एक दूसरे को देखते हुए, वो ये कैसे कर सकती थी | नज़मा अगर अब अपनी चूत दिखाती तो इरफ़ान को पता चल जाता की नज़मा ये सब जानबूज के कर रही है | लेकिन नज़मा अपनी चूत इरफ़ान को दिखाने के लिए तड़प रही थी|

आखिरकार नज़मा ने हिम्मत करके तौलिया अपने हाथों से गिरा दिया | आखिरकार नज़मा ने हिम्मत करके तौलिया अपने हाथों से गिरा दिया | लेकिन जैसे ही नज़मा के तौलिया गिराया वो भी बैठ गयी, नज़मा के ऐसा दिखाया जैसे गलती से उसके हाथ से तौलिया गिर गया हो और उसके बाद वो अपने बदन को छुपाने के लिए बैठ गयी | इरफ़ान को नज़मा की चूत तो दिखाई दी लेकिन सिर्फ एक पल के लिए | इससे पहले की इरफ़ान अपनी जवान बहन की चूत को अच्छे से देख पता वो नज़ारा तो गायब हो चूका था |

इरफ़ान को अपनी बहन के नंगे चूतड़, जांघें और पीठ सब दिखाई दे रहा था | इरफ़ान वासना से पागल हो रहा था | इरफ़ान ने साड़ी शर्म छोड़ दी और अपनी बहन के सामने की अपने लंड को मसलने लगा |

नज़मा: आआआह ...... मेरे साथ ही क्यों सब बुरा होता है ..... क्या यार ... भाई तूने मुझे बातों में लगा दिया ... देख तौलिया भी गिर गया मुझ से ...

इरफ़ान: तो क्या हो गया ऐसा? क्यों इतना टेंशन ले रही हो | मैं ही तो हूँ यहाँ | आप नहाओ ना आराम से ...

नज़मा: तू है इसी चीज़ की तो टेंशन है | मुझे सब पता है तेरा | कहाँ रहती हैं तेरी नज़रें आज कल |

इरफ़ान: क्या दीदी, आप भी न |

नज़मा: भाई, प्लीज मेरा एक काम कर दे | तू अंदर से एक सूखा तौलिया ला दे | तब तक मैं अपने बाल शैम्पू कर लेती हूँ | सुन आने से पहले दरवाज़ा खटखटा देना ताकि मुझे तेरे आने का पता चल जाये | ना जाने मैं कैसे नहा रही होंगी ...

इरफ़ान: आप भी ना दीदी, शर्म छोड़ोगी नहीं | अब हम दोनों के बीच कोई शर्म की जगह नहीं है |

नज़मा: हाँ हाँ ठीक है, तू तौलिया ला दे ... और सुन ... खटखटाना मत भूलना |
 
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भाग 29: टंकी की ओट

इरफ़ान: दीदी, मुझे थोड़ा काम भी है अपने कमरे में, आप आराम से शैम्पू करो, मैं दस मिनट में आपका तौलिया लेके आता हूँ | कोई और हुकम ?

नज़मा: और कुछ नहीं, ड्रामेबाज़ ...

इरफान अपनी बहन को देखते उलटे पाँव अंदर तौलिया लेने के लिए चला गया | इरफान ने तुरंत तौलिया उठाया और पिछवाड़े की तरफ चल दिया, वो अपनी जवान बहन के नंगे जिस्म के दीदार को एक सेकंड के लिए भी गवाना नहीं चाहता था | इरफ़ान को पता था की उसकी बहन सेक्सी है, लेकिन इतनी सेक्सी, ये तो सनी लियॉन से बड़ी वाली निकली | इरफ़ान पिछवाड़े में पहुँच और पानी की टंकी की ओट में खड़ा हो कर अपनी बहन की नंगेपन को निहारने लगा |

नज़मा खड़ी हुई अपने बालों को शैम्पू कर रही थी | नज़मा का मुंह दूसरी और था | इरफ़ान को अपनी बहन की नंगी गांड, पीठ, जांघें साफ़ नज़र आ रहे थे | इरफ़ान अपने लंड को अपने पजामे के ऊपर से लगातार रगड़े जा रहा था |

आवाज़ से नज़मा को अपने भाई के आने का पता लग गया था | लेकिन नज़मा ऐसे बर्ताव कर रही थी जैसे उसे कुछ पता न चला हो | नज़मा के हाथ शैम्पू करने के लिए उठे हुए थे इसलिए इरफ़ान को साइड से नज़मा के बोबे भी दिखाई दे रहे थे | नज़मा के हाथों के साथ उसके बोबे भी हिल रहे थे |

गांड तो नज़मा पहले भी दिखा चुकी थी अब वो इरफ़ान को अपनी चूत दिखाना चाहती थी | शैम्पू करते करते नज़मा अपने भाई की तरफ मुड़ गयी | शैम्पू करने के बहाने से नज़मा ने अपनी आँखें बंद कर रखी थी | कुछ देर के लिए नज़मा रुक गयी और बिलकुल कामदेवी की मूरत बन गयी | नज़मा चाहती थी की उसका भाई उसके बदन को अच्छे से निहार सके | नज़मा की चूत से पानी रिस रहा था और उसके निप्पल और बोबे कड़क हो गए थे |

इरफ़ान के लिए यह सब स्लो-मोशन में चल रहा था| अपनी जवान बहन को बिलकुल नंगी देख कर इरफ़ान को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था | गुलाबी धुप में चमकते नज़मा के ने इरफ़ान के दीमाग के फ्यूज उड़ा कर रख दिए थे | नज़मा अब धीरे-२ अपने बालों में हाथ चला रही थी |

अचानक से नज़मा ने झाग से भरा हाथ अपनी चूत पे रख दिया और अपनी चूत मसलने लगी | ये दृशय देखते ही इरफ़ान की हालत ख़राब हो गयी, उनके लंड की नसें फटने को हो आईं थी |

ओह, ये क्या | बहनचोद | नज़मा ने अपनी चूत में एक ऊँगली डाल दी और धीमे-२ उसे हिलाने लगी |
 
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भाग 30: मालिश

नज़मा को ऊँगली करते देख इरफ़ान भी बर्दाश्त नहीं कर पाया| इरफ़ान ने भी तुरंत अपने पाजामे का नाडा खोला और अपने लंड को मज़बूती से पकड़ के मुठ मारने लगा|

पानी की टंकी के एक पार नज़मा अपनी चूत को बेदर्दी से मसल रही थी और टंकी के दूसरी पार इरफ़ान अपने लंड को मुठिया रहा था| इरफ़ान चाहता था की समय यहीं रूक जाये और वो कयामत तक अपनी जवान बहन को नंगी निहारता हुआ और मुठ मारता रहे| इरफ़ान इस मस्ती को ज्यादा से ज्यादा समय जीना चाहता था लेकिन इरफ़ान के ना चाहते हुए भी इरफ़ान के हाथ की तेज़ी बढ़ती जा रही थी| नज़मा अपनी दो उँगलियों से अपने चूत के दाने को पकड़ के कभी खींच रही थी और कभी दबा रही थी| बीच-२ नज़मा अपनी चूत में उँगलियाँ सरका भी देती थी| अपनी बहन का ये कामुक रूप देख के इरफ़ान हैरान रह गया| इरफ़ान को समझ आ रहा था की उसकी बहन उतनी भी शरीफ नहीं ही जितना वो समझता आया था|

इतने में तो हद ही हो गयी| नज़मा ने मस्ती में अपनी मुनिया को हलके-2 दो तीन थप्पड़ जड़ दिए| इरफ़ान ये देख के पागल हो गया| ये बहन नहीं बहन की लोड़ी है| ये नज़मा तो मिया खलीफा से भी सेक्सी तरीके से ऊँगली कर रही थी| इरफ़ान के बदन ने झटका खाया और ना चाहते हुए भी उसके मुंह एक दबी हुई सिसकारी निकल गयी| इसी के साथ ही इरफ़ान के लंड ने ढेर सारा माल उढेल दिया| ये सारा वाकया सिर्फ २-३ मिनट में ही हो गया था| शायद आज पहली बार इरफ़ान का माल इतनी जल्दी छूटा था| सिसकारी की आवाज़ से नज़मा को पता चल गया की उसके भाई का काम हो गया है|

नज़मा (मन में): जल्दी ही झड़ गया भाई, हा हा, बेचारा बर्दाश्त नहीं कर पाया अपनी बहन के जिस्म की गर्मी .... हा हा

जैसे ही नज़मा ने इरफ़ान के फारिग होने की सिसकारी सुनी, नज़मा वापिस से अपनी पानी की बाल्टी की तरह मुड़ गयी और अपने बदन पर पानी डाल के शैम्पू हटाने लगी|

इरफ़ान इतनी बुरी तरह से झड़ा था की वो वहीँ जमीन पर बैठ गया| 2 मिनट में इरफ़ान ने अपने आप संभाला और खड़ा होकर अपनी बहन की तरफ चल दिया| जैसे ही इरफ़ान बहन के बिलकुल नजदीक पहुंचा तो

इरफ़ान (तेज आवाज़ में): धप्पा

नज़मा (मन में): मैं यहाँ जवानी के खेल खेलना चाह रही हूँ, इस चूतिये का बचपना नहीं जा रहा|

नज़मा तेजी से मुड़ी और अपने सीने पे हाथ रखते हुए बोली: क्या भाई, तूने तो मुझे डरा ही दिया था ...

नज़मा ने अपने अपना हाथ अपने एक बोबे पर रखा हुआ था लेकिन उसका दूसरा बोबा और चूत उसके भाई के सामने थे|

इरफ़ान: देखा, डरा दिया ना दीदी

नज़मा: डराना तो ठीक है, लेकिन तू बिना खटखटाये यहाँ आया कैसे? तुझे बोला था ना मैंने ..

इरफ़ान: दीदी, अब आप भी ना| क्यों शर्माती हो मुझ से इतना?

नज़मा: हाँ-२ ठीक बात है, अपने भाई से क्या शर्माना| तू तो ये ही चाहता है ना की मैं तेरे सामने बिलकुल नंगी घूमती रहूं?

इरफ़ान (धीमी आवाज़ में): चाहने से क्या होता है?

नज़मा: क्या बोला? सब सुन रहा है मुझे| बहुत बेशर्म हो गया है तू | कैसे बेशर्मी से घूर रहा है अपनी बहन को?

इरफ़ान की आँखें अपनी बहन की चूत पे जमी हुई थी| दूर से वो अपनी बहन की चूत को अच्छे से नहीं देख पाया था| उसकी बहन के चूत के होंठ आपस में बिलकुल चिपके हुए थे, जैसे किसी कुंवारी लड़की के होने चाहिए|

नज़मा: कमीने कम से कम बात करते हुए तो आंखों में देख ले| कहाँ कहाँ घूर रहा है, खा जायेगा क्या अपनी बहन को?

इरफ़ान (धीरे से): खाऊंगा नहीं सिर्फ चाटूँगा

नज़मा: या अल्लाह, कितना बेशर्म है ये लड़का| अब घूरना बंद कर और ये तौलिया दे

इरफ़ान ने हाथ बढ़ा के तौलिया नज़मा को दे दिया और नज़मा वापिस से उसकी तरफ अपनी गांड करके अपने बदन को पूंछने लगी | अपने सामने अपनी बहन की गोल मटोल गांड देख के इरफ़ान से रुका नहीं गया और उसका हाथ अपने आप ही जवान बहन की गांड के तरफ बढ़ गया| इरफ़ान ने हलके से अपनी बहन की गांड को दबाया| अपने भाई को हाथ अपनी गांड पे महसूस करते ही नज़मा की सिसकी छूट गयी|

नज़मा: आहhhhhhhhhhhh, भाईiiiiiiiiiiiii, क्या कर रहा है?

इरफ़ान: क्या हुआ दीदी?

नज़मा: भाई, बहुत दर्द कर रहा है यहाँ|

इरफ़ान (अपनी बहन की गांड सहलाते हुए): क्या हुआ दीदी?

नज़मा: आज मैं माँ की वजह से गिर गयी थी, बहुत चोट लगी यहाँ पर

इरफ़ान का लंड अब फिर से सर उठाने लगा था| इरफ़ान अभी भी अपनी बहन की गांड को मसल रहा था|

इरफ़ान: ओह, ये माँ भी ना| कहाँ लगी दीदी?

नज़मा: बताया तो, जहाँ तुम्हारा हाथ है?

इरफ़ान: कहाँ हाथ है मेरा

नज़मा: ओहफ़ो, मेरी यहाँ दर्द से जान निकली जा रही है और तुम हो की तुम्हारी मस्ती पूरी नहीं होती| चूतड़ों पे .... चूतड़ों पे| बस, हो गयी तसल्ली अब

इरफ़ान: क्या दीदी? आप तो छोटी सी बात से बुरा मान जाती हो| अच्छा सुनो अगर दर्द हो रहा है तो मैं मालिश कर दूँ?

नज़मा: तो अभी क्या कर रहे हो?

इरफ़ान: अरे ऐसे नहीं दीदी, अच्छे से, गरम तेल से

नज़मा: नहीं ... नहीं ... रहने दे ... तू टेंशन मत ले ... अपने-आप ठीक हो जायेगा एक-दो दिन में

इरफ़ान: आप भी ना दीदी, फिर कहते हो की कोई प्यार नहीं करता| मुझे कुछ नहीं सुनना, आप अपने कमरे में पहुंचो, मैं तेल गरम करके लाता हूँ|

नज़मा: भाई ये ठीक रहेगा? तू अपनी बहन की मालिश .... तू समझ रहा है ना, मैं क्या कहना चाह रही हूँ?

इरफ़ान: दीदी, सब सही है| अगर ज़रुरत में भाई ही बहन के काम नहीं आएगा तो कौन आएगा?

नज़मा: फिर भी भाई, सोच ले

इरफ़ान: इतना क्या सोचना है? मालिश ही तो करनी है ... या आपको कुछ और भी करवाना है?

नज़मा: हट बदमाश, कुछ भी बोलता है ...

इरफ़ान: चलो फिर आप कमरे में पहुंचो, मैं दो मिनट में आता हूँ

ये कह के इरफ़ान पिछवाड़े से अंदर की तरफ चल दिया| अचानक से इरफ़ान मुड़ा और बोला

इरफ़ान: दीदी, सुनो ... वो अभी कपडे मत पहनना ... मालिश अच्छे से नहीं हो पाएगी

नज़मा के उत्तर का इंतज़ार किये बिना इरफ़ान तेज़ी से अंदर चला गया|
 
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भाग 31: गर्म तेल

इरफ़ान जब गरम तेल की कटोरी लेकर नज़मा के रूम में पहुंचा तो नज़मा शीशे के सामने खड़ी अपने बालों में कंघी कर रही थी| नज़मा ने एक पेटीकोट पहना हुआ था जैसे वो नहाते हुए पहनती थी| नज़मा को पेटीकोट पहने देख इरफ़ान का मूड थोड़ा ऑफ हो गया|

इरफ़ान: दीदी, ये क्या यार? आपने पेटीकोट क्यों पहन लिया? अब मैं अच्छे से मालिश कैसे करूँगा?

नज़मा: भाई, मैं तेरी तरह बेशरम नहीं हूँ| करनी है तो कर वरना रहने दे|

इरफ़ान ये मौका अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता था|

इरफ़ान: दीदी, जैसी आपकी मर्ज़ी| अब चलो, बेड पर लेट जाओ, मैं मालिश कर देता हूँ| गरम तेल है, आपको आराम मिलेगा| जल्दी आओ, नहीं तो तेल ठंडा हो जायेगा|

नज़मा (मन में): बड़ी जल्दी है ठन्डे होने की भाई को ...

नज़मा ये सोचते हुए अपने बेड पे उलटी लेट गयी और इरफ़ान अपनी बहन की कमर के पास बेड पर बैठ गया| नज़मा ने सिर्फ पेटीकोट पहना हुआ था|

नज़मा: भाई, मेरे पैरों में भी दर्द हो रहा है

इरफ़ान अपनी बहन के पैरो के पास बैठ गया और अपने हाथों में तेल लेकर हलके हाथो से नज़मा के पैरो को दबाने लगा| इरफ़ान नज़मा के पैरों के पंजों को दबा रहा था| इरफ़ान को डर था की कहीं नज़मा बिदक ना जाए इसलिए वो धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहता था|

नज़मा: भाई मालिश कर ही रहा है तो अच्छे से कर ना| तू तो लड़कियों से भी नाज़ुक है| मुझे दर्द वहां नहीं है ऊपर है|

इरफ़ान ने थोड़ा ऊपर बढ़ते हुए नज़मा की पिंडलियों की मालिश शुरू कर दी| इरफ़ान का हाथ अपनी नंगी पिंडलियों पर महसूस करते ही नज़मा की सिसकी निकल गयी|

नज़मा: आह भाई, ये हुई न कुछ बात| ऐसे ही करता रह, बहुत अच्छी मालिश कर रहा है|

इरफ़ान: दीदी, मैं बहुत अच्छी मालिश करता हूँ, चाचा जी भी यही कहते हैं|

नज़मा (मन में): चूतिया है एक नंबर का, चाचा जी गांड में घुस जा

नज़मा: चल हट यहाँ से, जाकर चाचा जी की ही मालिश कर

इरफ़ान: अरे दीदी, नाराज़ क्यों हो रही हो, चाचा जी को छोड़ो| मैं आपकी मालिश इतनी मस्त करूँगा की आप हमेशा मुझसे मालिश करवाने के लिए मेरे पीछे भागती फिरोगी|

नज़मा: अच्छा-२, ठीक है, थोड़ा और ऊपर ..

इरफ़ान (मन में): बहुत चालू है दीदी| मैं तो दीदी को कितनी शरीफ समझता था| कितनी जल्दी है चुदने ही| खुदा ने चाहा तो आज मेरी पहली चुदाई हो ही जाएगी| पहली चुदाई? क्या दीदी वर्जिन है या फिर .... नहीं-२ इतनी भी हरामन नहीं लगती ... पूछूं क्या? बूरा मान गयी तो?

इरफ़ान ने अब अपने हाथ नज़मा के घुटनो पर रख दिए और घुटनो से लेकर जाँघों के निचले हिस्से तक हाथ चलाने लगा| नज़मा अपनी आँख बंद करके मुस्कुरा रही थी| नज़मा के पैर एकदम गोरे थे जैसे दूध में हल्का सा केसर मिला हो| इरफ़ान का लंड बुरी तरह से खड़ा हो चूका था| लंड के जोर से इरफ़ान की हिम्मत भी ज़ोर मारने लगी| अब अपने हाथ ऊपर ले जाते हुए इरफ़ान अपनी बहन की जाँघो के अंदर के हिस्से को भी दबाने लगा था| हर बार ऊपर जाते हुए इरफ़ान आगे बढ़ता जा रहा था| धीरे-२ इरफ़ान के हाथ अपनी बहन के पेटीकोट के नीचे तक पहुँच गए|

इरफ़ान: दीदी, ये पेटीकोट .....

नज़मा: हुंह ....

इरफ़ान: दीदी, पेटीकोट हटा दूँ, तेल से ख़राब हो जायेगा ...

नज़मा: हुंह ....

इरफ़ान ने अपनी बहन की सिसकी को अपनी बहन की रज़ामंदी माना और नज़मा का पेटीकोट उसके चूतड़ों से हटा दिया|

अपनी बहन के गोरे-२ गोल मटोल चूतड़ देखते ही इरफ़ान की आँखों में चमक आ गयी| उसने तुरंत अपने हाथों पर तेल लगाया और अपने दोनों हाथ अपनी बहन के चूतड़ों पर रख दिए| इरफ़ान पहले तो धीरे धीरे अपनी बहन के चूतड़ों को सहला रहा था लेकिन जब नज़मा ने कुछ भी रिएक्शन नहीं दिया तो इरफ़ान ने चूतड़ों को तेज़ी से दबाना शुरू कर दिया| इरफ़ान अब अपनी बहन के चूतड़ों को दबा नहीं बल्कि गूँथ रहा था जैसे आटे को गुंथते हैं|

दोनों बहन भाई पूरा आनंद उठा रहे थे| कोई कुछ बोल नहीं रहा था| बीच बीच में नज़मा की सिसकारी सुनाई पड़ती थी| इरफ़ान भी बुरी तरह से गरम हो चूका था| नज़मा की आँखें बंद थी| जब इरफ़ान से बर्दास्त नहीं हुआ तो इरफ़ान एक हाथ से अपनी बहन के चूतड़ों को रडता रहा और दूसरे हाथ से अपने लंड को मसलने लगा|

पजामे में इरफ़ान का लंड बुरी तरह मचल रहा था और बाहर आने के लिए बेताब हो रहा था| कुछ देर बाद इरफ़ान ने चुपके से अपना पजामा अंडरवियर के साथ नीचे सरका दिया और अपने नंगे लंड को मसलने लगा| इरफ़ान को बहुत मज़ा आ रहा था| अपनी बहन की तरफ से कोई विरोध ना देख के उसकी हिम्मत बढ़ती जा रही थी| इरफ़ान ने तेल की कटोरी उठायी और सीधे नज़मा के चूतड़ों की दरार में धार बना के तेल डालने लगा| तेल की धार सीधे नज़मा की गांड के छेद में पहुँच रही थी|

नज़मा: aaaaaaaaaahhhh, भाई .... बस ..... चद्दर ख़राब हो जाएगी .... और तेल ... हुंह

इरफ़ान अपनी बहन की बात समझ गया और उसने तेल की कटोरी साइड में रख दी|

इरफ़ान: ऐसे कैसे चद्दर ख़राब हो जाएगी| हम हाँ ना

ये कहते हुए इरफ़ान ने अपनी पूरी हथेली नज़मा की चूत पर रख दी| इरफ़ान ने तेल हथेली से रोक लिया ताकि तेल चद्दर पे ना गिरे| नज़मा की चूत बुरी तरफ से भबक रही थी और उसमे से कामरस चू रहा था| इरफ़ान ने धीरे से नज़मा की तपती चूत को दबाया और फिर अपने हाथ को ऊपर की और लाने लगा| इरफ़ान का हाथ नज़मा की गांड के छेद पर आ कर ही रुका| इरफ़ान अपनी बहन के चूतड़ों की दरार की मालिश कर रहा था| उसका हाथ अपनी बहन के चूतड़ों की दरार के शुरू होने से उसकी चूत तक चल रहे थे| बीच-२ में उसके हाथ अपनी बहन की गुदा पर रुक जाते थे|

इरफ़ान धीरे-२ अपनी उँगलियों से अपनी बहन के गांड के छेद को कुरदने लगा| नज़मा की हालत पतली होती जा रही थी| उसकी सिसकियाँ अब तेज हो गयी थी| इरफ़ान ने अपनी ऊँगली का दबाव थोड़ा सा बढ़ाया तो उसकी ऊँगली का एक पोर नज़मा की गांड में घुस गया| नज़मा एक दम से तेज़ सिसकी|

नज़मा के उलटे लेट हुए के कारण नज़मा के चूतड़ों के दोनों हिस्से आपस में दबे हुए थे| इरफ़ान ने थोड़ा और दबाव बनाया लेकिन उसकी ऊँगली ज़्यादा अंदर घुस नहीं पा रही थी|

इरफ़ान (धीरे से): दीदी, थोड़ा उठाओ ना ...

नज़मा: हुंह ... क्या ....

इरफ़ान: दीदी, अपनी गांड थोड़ी उठाओ ना ...

नज़मा: ......

इरफ़ान: दीदी, प्लीज ....

नज़मा: क्या है, कितना मज़ा आ रहा था| क्या करूँ, बोल?

इरफ़ान: दीदी आप अपने नीचे तकिया लगा लो ना, थोड़ा अंदर तक मालिश कर दूंगा ...

नज़मा की ऑंखें अभी तक बंद थी और वो उलटी लेती हुई मालिश का लुत्फ़ ले रही थी| नज़मा थोड़ा सा मुस्कुरायी और बोली|

नज़मा: अंदर तक ... हाँ ... ऐसे ही अंदर तक मालिश करता होगा चाचा जी की

इरफ़ान: हाहा, नहीं दीदी, ये स्पेशल मालिश तो सिर्फ आपके लिए है ...

नज़मा: स्पेशल मालिश, सही है, सुन तकिया रहने देते हैं, गन्दा हो जायेगा| मैं अपना हाथ अपने पेट के नीचे दबा लेती हूँ ....ठीक है

इरफ़ान: हाँ ये भी सही है दीदी

इरफ़ान (मन में): तकिया डाल या हाथ, तड़पा मत, अपनी गांड के छेद के दर्शन करा दे

नज़मा ने अपना एक हाथ अपने नीचे दबा लिया| ऐसे करने से नज़मा की गांड थोड़ा ऊपर उठ गयी| नज़मा के चूतड़ों की दरार खुल गयी और इरफ़ान को नज़मा की गांड का गुलाबी छेद दिखाई देने लगा| इरफ़ान का मन किया की उस छेद को चाट ले, चुम ले, खा जाये| लेकिन इरफ़ान ने अपने आप पर कण्ट्रोल करते हुए अपने हाथ आगे बढ़ाये और अपनी एक ऊँगली नज़मा की गांड में घुसा दी|

नज़मा: आह भाई .....

इरफ़ान: कितना सुन्दर है ये दीदी, दिल करता है इसे देखता रहूं ...

नज़मा (धीरे से): देखते रहना, करना कुछ मत ...

इरफ़ान ने अपनी ऊँगली नज़मा की गांड में अंदर बाहर करनी शुरू कर दी और अपने हाथ को थोड़ा घुमाया ताकि अपना अंगूठा नज़मा की चूत में डाल सके| जैसे ही इरफ़ान ने अपना अंगूठा नज़मा की चूत में डालने की कोशिश की तो उसे झटका लगा| नज़मा की तीन उँगलियाँ पहले से ही नज़मा की चूत की सेवा में लगी हुई थी|

इरफ़ान (मन में): बहुत चुदकड़ है, तकिया नहीं हाथ चाहिए, सही बात है, तकिये की उँगलियाँ थोड़ी होती हैं| जब इसे शर्म नहीं तो मैं क्यों चूतिया बन रहा हूँ|

इरफ़ान: दीदी, मैं थक गया ऐसे मालिश करते-२

इरफ़ान की ये बात सुनते ही नज़मा को गुस्सा आ गया| वो तुरंत पलटी और बोली|

नज़मा: चूतिया है क्या? अब यहाँ लाकर बोल रहा है की थक गया
 
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भाग 32: अनाड़ी

इरफ़ान: कहाँ लाकर? क्या हुआ आपको, इतना गुस्सा क्यों कर रही हो मुझ पर?

नज़मा ने तभी अपने भाई के लंड की तरह देखा| हवा में लहराता सात इंच का मोटा लंड, लेस से चमकता हुआ, सूपड़ा ऐसा जैसे आलूबुखारा, अपने भाई के लंड को देख कर नज़मा का गला सुख गया|

नज़मा (मन में): ये तो अपना लंड निकाले बैठा है| मन तो इसका भी कर रहा है आगे बढ़ने का, फिर ये भाव क्यों खा रहा है? क्या प्लान है इसका?

नज़मा ने अपनी नज़रें बड़ी मुश्किल से इरफ़ान के लंड से हटा की इरफ़ान के चेहरे की तरफ देखा और थूक गटकते हुए बोली|

नज़मा: भाई-२, तू सुन तो, बुरा क्यों मान रहा है| मैं कह रही हूँ की मेरा दर्द ठीक होने वाला है, बस थोड़ी देर और मालिश कर दे ना| प्लीज-२

इरफ़ान: हाँ ... करता हुआ, लेकिन ऐसे नहीं, मैं अपने दोनों पैर आपके दोनों तरफ रख के आपके ऊपर आ जाता हूँ, ठीक है

नज़मा: प्यारा भाई मेरा, जैसे तू कहे लेकिन कुछ देर और, है ना .... आजा ... आजा ...

इरफ़ान (मन में): लंड देख लिया लेकिन ऐसे पेश आ रही है, जैसे कोई फरक नहीं पड़ता हो| पहले से चुदने को तैयार बैठी है| चढ़वा ले, चढ़वा ले अपने भाई को अपने ऊपर

नज़मा अपना पेटीकोट थोड़ा और ऊपर किया| नज़मा का पेटीकोट अब एक माला बन के नज़मा के गले में लिपटा हुआ था| नज़मा के गले में पेटीकोट की माला ऐसे लग रही थी जैसे किसी ने नज़मा को अपने भाई के सामने नंगे रहने के लिए सम्मान दिया हो| नज़मा फिर से उलटी लेट गयी| इरफ़ान अपनी बहन की जाँघों पे बैठ गया और दोनों हाथों से अपनी बहन से चूतड़ों को मसलने लगा| सब फिर से सेटल| नज़मा ने भी अपनी उँगलियाँ अपनी चूत में घुसा दी और अपनी चूत घिसने लगी|

इरफ़ान ने एक दो मिनट इंतज़ार किया फिर वो थोड़ा ऊपर खिसक गया| अब इरफ़ान का लंड नज़मा की गांड के छेद को छू रहा था| इरफ़ान थोड़ा सा झुका और अपनी बहन के नीचे हाथ डाल के उसके दोनों बोबे पकड़ लिए| इरफ़ान अपनी उँगलियों और अंगूठे के बीच नज़मा के निप्पल उमेठ रहा था| साथ-२ इरफ़ान धीरे-२ ऊपर नीचे भी हो रहा था| हर धक्के के साथ इरफ़ान का लंड नज़मा की गांड को थोड़ा सा खोल देता था| बोल दोनों ही नहीं रहे थे लेकिन नज़मा की सिसकियों की आवाज़ कमरे में तेज होती जा रही थी|

इरफ़ान के लंड का लिसलिसा पानी नज़मा की गांड के छेद पर लग रहा था| अपने भाई के प्रीकम से और तेल से, नज़मा की गांड का छेद बिलकुल चिकना हो चूका था| इस बार जैसे ही इरफ़ान ने धक्का लगाया, उसका सूपाड़ा बहन की गांड में घुस गया|

नज़मा: ओह .... आह ..... भाई ...

नज़मा ने अब अपनी उँगलियों की तेजी बढ़ा दी| वो अपने ओर्गास्म पर पहुँचने वाली थी| अब हर धक्के से साथ इरफ़ान का सूपाड़ा नज़मा के गांड के छेद में घुस जाता था| इरफ़ान की हालत भी ख़राब होती जा रही थी| अचानक से नज़मा के शरीर से एक झटका खाया और नज़मा ने अपनी गांड हवा में कुछ ज़्यादा ही ऊपर उठा दी| इस बार इरफ़ान ने जैसे ही धक्का लगाया उसका आधा लंड नज़मा की गांड में घुस गया| नज़मा की गांड इतनी टाइट और गरम थी की ना चाहते हुए भी इरफ़ान अपने बदन को पीछे की बजाय आगे ही दबाता चला गया और अपनी बहन पर और झुकता चला गया|

इरफ़ान अपने लंड को पूरी ताकत से अपनी बहन की गांड पर दबा रहा था| उसका पूरा शरीर पसीने से लथपथ हो गया था| वो बहुत थक गया था लेकिन फिर भी उसने ज़ोर लगाना नहीं छोड़ा| धीरे-२ उसका पूरा लंड नज़मा की गांड में चला गया| इरफ़ान तब तक नहीं रुका जब तक उसका पूरा लंड नज़मा की गांड की गहराईयों में उतर नहीं गया|

अपने भाई के लंड को नज़मा अपनी गांड में घुसता हुआ महसूस कर रही थी| नज़मा को ऐसे लग रहा था की जैसे उसकी गांड फट जाएगी| उसकी गांड में बहुत तेज जलन हो रही थी, लेकिन जैसे-२ उसके भाई का लंड उसकी गांड में उतर रहा था, नज़मा को लग रहा था की जैसे आज वो पूरी हो गयी है| उसके ज़िन्दगी की खाली जगह को कोई भर रहा था|

इरफ़ान ने अपना लंड नज़मा की चूत में पूरा उतार दिया था और नज़मा पर लेट गया| उसका पूरा भार नज़मा पर था| इरफ़ान का सीना, नज़मा की पीठ से चिपक गया था| इसी के साथ नज़मा का शरीर कांपने लगा और उसकी चूत ने रस की बारिश चालू कर दी|

नज़मा: ooooooooooohhhhhhhhhhhhhhhhhhh ................... भाई ...................... aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhh

नज़मा की चूत और गांड पानी छोड़ते हुए बुरी तरह से फूल रही थी और सिकुड़ रही थी| गांड का इस तरफ से सिकुड़ना और फूलना जैसे इरफ़ान के लंड को चूस रहा था, जैसे कोई ब्रैस्ट पंप बोबों से दूध चूसता है| ये सब इरफ़ान के बर्दास्त से बाहर था, इरफ़ान के लंड ने भी वीर्य फेकना शुरू कर दिया|

दोनों बहन भाई झड़ते हुए उलटे लेते हुए थे| इरफ़ान ने अपनी बहन को बुरी तरफ से जकड़ा हुआ था और नज़मा ने पलंग को| वो दोनों एक जिस्म, एक जान हो गए थे| दोनों बहुत थक चुके थे, लेकिन बहुत संतुष्ट भी थे| जाने कितनी देर तक वो ऐसे ही पड़े रहे| फिर इरफ़ान उठा और अपना पजामा और अंडरवियर उठा के वहां से अपने कमरे में चला गया| नज़मा उसी पोजीशन में नंगी ही नींद के आगोश में चली गयी|
 
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भाग 33: नया शिकार

एक तरफ जहां नजमा की जिंदगी मस्ती के सागर में हिलोरे खा रही थी वहीं दूसरी तरफ परवीन आर्थिक तंगी और अपने पति के व्यवहार के कारण दिन-ब-दिन चिड़चिड़ी होती जा रही थी | परवीन और उसके पति, शहज़ाद, को चुदाई किये हुए एक साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका था| कई बार तो परवीन को ऐसा लगता था कि शायद उसी में कोई कमी है जिसकी वजह से शहज़ाद उसकी ओर देखता भी नहीं है|

आज भी देखने में परवीन बहुत ही सेक्सी लगती थी| उम्र के साथ-साथ उसके शरीर पर सही जगह पर सही मात्रा में मोटापा आ गया था| उसके बोबे और गांड पहले से बहुत ज़्यादा फूल गए थे| उसे बोबे 36 C साइज के थे और उसकी गांड बहुत ही जानमारू तरीके से बाहर निकली हुई थी| ऐसे मादक शरीर की औरत को तो दिन रात चुदाई की जरूरत होती है लेकिन प्रवीण जिंदगी में तो जुदाई थी ही नहीं| इस उम्र में उसे उंगली करना भी बड़ा अटपटा लगता था| इस वजह से परवीन बहुत परेशान और चिड़चिड़ी रहने लगी थी|

उस दिन नजमा बहुत देर तक सोती रही जब शाम को उठकर वह ड्राइंग रूम में आई तो उसने देखा कि उसकी मां सोफे पर बैठी कुछ पैकिंग कर रही थी| नजमा को देखकर परवीन बोली|

परवीन: उठ गई महारानी| कोई दिन में भी इतनी देर तक सोता है क्या?

नज़मा: क्या है मां? आपको तो बस बहाना चाहिए मुझे डांटने का|

नज़मा (मन में): जब देखो डांटना डांटना डांटना| खुद की जिंदगी तो झंड है ही, मेरी जिंदगी भी झंड करने में लगी रहती है|

परवीन: तुझे डांटू नहीं तो क्या करूं? पूजा करूं तेरी? काम की ना काज की, दुश्मन अनाज की|

नजमा: मां, आप तो मेरे पीछे ही पड़ी रहती हो| अब यह पैकिंग क्यों कर रही हो?

परवीन: अरे मेरी जिंदगी में वैसे ही दुख कम है क्या? अब देख, तेरे मामा को हार्ट अटैक आया है| उनकी दुकान संभालने के लिए वहां कोई नहीं है| इसलिए मैं इमरान को कुछ दिनों के लिए गांव, मामा की दुकान संभालने के लिए भेज रही हूं|

यह सुनते ही नजमा के सारे सपने जैसे चूर चूर हो गए| नज़मा का मुंह उतर गया|

नजमा: यह तो बहुत बुरा हुआ| मां, क्या इमरान का जाना जरूरी है?

परवीन: हां जाना तो जरुरी है| जरूरत के समय में अगर तेरे मामा के हम नहीं काम आएंगे तो कौन काम आएगा? वैसे भी तेरे मामा का लड़का, सैफ, अभी बहुत छोटा है| वह अभी दुकान नहीं संभाल पाएगा|

नजमा: लेकिन माँ, इरफान की पढ़ाई का क्या होगा? भैया की पढ़ाई भी तो जरूरी है|

परवीन: पता है मुझे| ज्यादा ज्ञान मत दे मुझे| कौन सा पूरी जिंदगी के लिए भेज रही हूं| आ जाएगा दो-चार दिनों में|

नजमा: मां, मैं आपकी कोई मदद करूं?

परवीन: हां ऐसा कर अपने भाई के लिए दो तीन पराठे बना दे| रास्ते में अगर भूख लगी तो खा लेगा|

शाम को इरफान गांव के लिए निकल गया| रात को नजमा अपने बिस्तर पर लेती हुई थी| उसका मन बहुत भारी हो रहा था| कहां तो नजमा ने सोचा था कि वह इरफान के साथ अब खुलकर मस्ती करेगी और कहां दूसरी तरफ उसे फिर से अपनी उंगली से काम चलाना पड़ रहा था| इरफान के बारे में सोचते सोचते नजमा को नींद आ गयी| अगले दिन नजमा देर से उठी| उसका पिछवाड़े में जाने का मन नहीं हो रहा था, जाती भी किसलिए, नहाती भी किस लिए, आज तो कोई देखने वाला भी तो नहीं था| फिर भी नजमा भारी कदमों से उठी और पिछवाड़े में जाकर नंगी ही नहाने लगी| नजमा नहा रही थी की अचानक से उसे लगा कि कोई उसके पीछे खड़ा है| उसने मुड़कर देखा तो उसके पापा उसे नहाते हुए घूर रहे थे| नजमा पहले तो अपने पापा को खड़ा देखकर घबरा गई लेकिन अगले ही पल उसे अपने पापा की नज़रें समझ आ गयी| अब वो वासना से भरी इन निगाहों को अच्छे से पहचानती थी|

नजमा: पापा, आप कब आए?

शहजाद: बेटी, मैं तो अभी आया हूँ लेकिन पहले से बता की तू पूरी तरह से नंगी होकर क्यों नहा रही है?

नज़मा: पापा .... वो .... वो मम्मी ने कहा है, ऐसे नहाने के लिए ... और कहा है की अगर मैं उनकी बात नहीं मानूगी तो वो मुझे बहुत मारेंगी

शहजाद: पागल हो गई है यह औरत| अजीब बातें करती है| मैं बात करूँगा उससे|

नज़मा: रहने दो पापा| अगर आप मां से बात करोगे तो मां बाद में मुझे भी डाँटेंगी| वैसे भी इसमें इतना परेशान होने वाली क्या बात है? यहां आप ही तो हैं| आप तो पापा है मेरे| आप से क्या शर्माना?

नजमा की यह बात सुनकर शहजाद हैरान रह गया|

शहजाद(मन में): तो क्या नजमा को मेरे सामने ऐसे नंगे रहने में कोई दिक्कत नहीं है? चल क्या रहा है ये माँ बेटी के बीच? कहीं नज़मा की जवानी तो फूट फूट के बाहर आने को मचल तो नहीं रही? क्या बात है, अल्लाह सुन ले तूने मेरी| क्या बुराई है अगर मैं अपनी बेटी की थोड़ी मदद कर दूँ| वैसे भी कहते ही हैं की जो पेड़ लगता है, पहला हक़ भी उसी का| लेकिन हो सकता है की मेरा अंदाज़ा गलत हो| लेकिन ये मौका छोड़ भी तो नहीं सकते| बड़े ध्यान से कदम बढ़ाना पड़ेगा|

शहजाद: ठीक है, बेटी जैसे तुम कहो, नहीं करूँगा तुम्हारी माँ से बात| वैसे भी तुम ठीक कह रही हो, यहाँ कोनसा कोई बाहर वाला है| अब तुम नहाओ, मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है|
 
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भाग 34: शाम की चाय

इरफ़ान को गए दो दिन हो चुके थे। घर में एक अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ था। नज़मा को दिन भर कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। पिछवाड़े में नहाने का मज़ा भी फीका पड़ गया था। कोई देखने वाला नहीं था तो नंगी घूमने का रोमांच भी कम हो गया था।

नज़मा मन ही मन सोच रही थी—माँ ने जीना हराम कर दिया है। जब देखो अपनी चलाती रहती है। अभी तो भाई के साथ मज़ा आना शुरू हुआ था। माँ जानती नहीं है मुझे… मैं भी देखती हूँ, कब तक चलती है माँ की घर में।

शाम के करीब पाँच बजे नज़मा ने तय किया कि आज से नया खेल शुरू करना है। उसने अलमारी से एक ढीला-ढाला हल्का गुलाबी कुरता निकाला। कुरता इतना पतला और पारदर्शी था कि अगर अंदर कुछ न पहना हो तो निप्पल तक साफ दिखाई दे जाते। और निप्पल ही तो नज़मा दिखाना चाहती थी। उसने ब्रा निकालकर एक तरफ रख दी। सिर्फ कुरता और नीचे एक पतली सलवार पहन ली। आईने के सामने खड़ी होकर उसने कुरते के गले को थोड़ा और नीचे खींचा। उसके 34B के बोबे बिना ब्रा के कुरते के अंदर स्वतंत्र थे। निप्पल हल्के से उभर आए थे।

नज़मा मन ही मन मुस्कुराई। “पापा अभी तक सिर्फ नहाते हुए देख पाए हैं… आज उन्हें और करीब से दीदार करवाऊँगी अपनी जवानी के। माँ को भूल जाएँगे। पता नहीं माँ पापा से चुदती भी होगी या नहीं? न जीती है, न जीने देती है ...”

शहजाद ठीक छह बजे ऑफिस से लौटे। उन्होंने जूते बाहर उतारे और सीधे अपने कमरे में चले गए। थकान चेहरे पर साफ थी। नज़मा ने रसोई में चाय बनाई। ट्रे में एक कप चाय और दो बिस्किट रखे। ट्रे उठाते समय उसके बिना ब्रा के चूचे आज कुछ ज़्यादा ही उछल रहे थे। उनका वजन अलग ही अहसास दे रहा था।

नज़मा ने कमरे का दरवाज़ा हल्के से खटखटाया। “पापा… चाय ले आई हूँ।”

“आ जा बेटी,” शहजाद की थकी आवाज़ आई।

नज़मा अंदर घुसी। शहजाद बिस्तर के किनारे बैठे हुए थे। उन्होंने कमीज़ के बटन खोल रखे थे। नज़मा ट्रे लेकर उनके पास गई। जब वह झुकी तो कुरते का गला और आगे सरक गया। उसके गोरे बोबों का गहरा क्लीवेज और हल्के गुलाबी निप्पल शहजाद को साफ दिखाई देने लगे। शहजाद की आँखें चमक उठीं। शहजाद ने जल्दी से नज़रें हटा लीं, लेकिन नज़मा ने देख लिया था।

नज़मा ने चाय का कप उनकी तरफ बढ़ाया। झुकते समय उसके बोबे और साफ उभर आए। “पापा, चाय गरम है… ध्यान से पीना।”

शहजाद मन में - (तेरे सामने चाय कहाँ गरम है?)

शहजाद ने कप लिया। उनकी उँगलियाँ नज़मा की उँगलियों से हल्की-सी छू गईं। उन्होंने एक घूँट लिया, फिर मुस्कुराते हुए कहा, “क्या कड़क चाय बनाई है बेटी…”
मन ही मन सोचा — (लेकिन चाय से कड़क तो तुम हो…)

“हाँ पापा।” नज़मा वहीं खड़ी रही। वह जाना नहीं चाहती थी।

थोड़ी देर चुप्पी रही। फिर नज़मा ने धीमी आवाज़ में कहा, “पापा… घर बड़ा सूना-सूना लग रहा है न?”

शहजाद ने चाय का एक और घूँट लिया। “हाँ… इरफ़ान चला गया है न। दो-चार दिन में आ जाएगा।”

नज़मा ने आँखें झुका लीं। आवाज़ में हल्की नमी लाई। “मुझे कोई प्यार नहीं करता पापा। एक भाई था जिससे बातें कर लेती थी… उसे भी माँ ने भेज दिया। माँ तो जब देखो डांटती रहती है। लगता है जैसे मैं इस घर में बोझ हूँ।”

शहजाद ने कप नीचे रखा। उनकी आवाज़ में नरमी आ गई। “अरे बेटी… ऐसा मत सोच। मैं हूँ न तेरा पापा। तुझे बहुत प्यार करता हूँ।”

नज़मा ने ऊपर देखा। आँखों में जानबूझकर हल्की नमी भर ली थी। “सच में पापा?”

“हाँ बेटी। आ… इधर आ मेरे पास।” शहजाद ने बिस्तर पर जगह बनाते हुए अपनी जाँघ पर हल्के से थपथपाया।

नज़मा के दिल की धड़कन तेज हो गई। उसने सोचा भी नहीं था कि इतनी जल्दी मौका मिलेगा। वह धीरे-से आगे बढ़ी और शहजाद की गोद में साइड से बैठ गई। उसने अपना एक हाथ उनके कंधे पर रख दिया। कुरता और ऊपर खिसक गया। शहजाद के हाथ से महज कुछ इंच की दूरी पर उसके बिना ब्रा के बोबे थे।

शहजाद ने हल्की मुस्कान दी। “देख… पापा की प्यारी बेटी कितनी उदास हो गई। ओ मेरी प्यारी बेटी…” यह कहते हुए शहजाद ने नज़मा के गालों को सहला दिया। उनकी खुरदरी उंगलियाँ उसके नरम गाल पर धीरे-धीरे फिर रही थीं।

नज़मा ने अपना सर उनके कंधे से सटा लिया। “पापा… आप ही तो हो मेरे। बाकी सब तो…”

जैसे ही वह झुकी, उसके कड़क चूचे शहजाद की चौड़ी छाती में दब गए। पतले कुरते के अंदर निप्पल सख्त होकर उनके सीने से सट गए। गर्माहट दोनों तरफ से फैल गई।

बातें चलती रहीं। सामान्य-सी बातें – ऑफिस की थकान, मामा की तबीयत, इरफ़ान का गाँव। लेकिन दोनों के मन में कुछ और ही चल रहा था। नज़मा की साँसें उनके कंधे पर गर्म लग रही थीं। शहजाद की छाती के नीचे दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

थोड़ी देर बाद शहजाद का खुरदरा हाथ अपने-आप नज़मा की जाँघ पर आ गया। पहले तो सिर्फ हल्का स्पर्श। फिर उन्होंने धीरे से उँगलियाँ फैला दीं। उनके मोटे, थोड़े खुरदरे हाथ की गर्माहट नज़मा की नरम-नरम जाँघों पर फैल गई। सलवार के पतले कपड़े के ऊपर से ही उनकी हथेली उसकी जाँघ की गर्माहट महसूस कर रही थी।

नज़मा ने कोई विरोध नहीं किया। उल्टे थोड़ा और उनके करीब सरक गई। उसके बोबे शहजाद के सीने से और कसकर छूने लगे थे। बिना ब्रा के निप्पल कुरते के कपड़े से सख्त होकर उभर आए थे।

शहजाद ने जाँघ पर रखे हाथ को धीरे-धीरे ऊपर-नीचे फिराया। खुरदरी हथेली की गर्माहट नज़मा की नरम जाँघों से होती हुई सीधी उसकी चूत तक पहुँच गई। एक हल्की-सी लहर उसके अंदर दौड़ गई और उसकी मुनिया ने एक गर्म बूँद चल्का दी। सलवार के अंदर थोड़ी नमी महसूस हुई।

शहजाद की साँस थोड़ी तेज हो गई थी। उन्होंने जाँघ पर रखे हाथ को हल्के से दबाया। “बेटी… तू बहुत प्यारी है हमारी।”

नज़मा ने आँखें बंद कर लीं। मन ही मन एक मुस्कान तैर गई। “पापा… आप भी बहुत अच्छे हैं।”

किचन से बर्तनो की आवाज़ आ रही थी, इसका मतलब, अभी तक परवीन किचन में ही थी । कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज़ और दोनों की हल्की साँसें गूँज रही थीं। नज़मा जानती थी कि यह सिर्फ शुरुआत है। आज पापा का खुरदरा हाथ जाँघ पर है… कल कुछ और होगा - कहीं और होगा। वह और जोर से चिपक गई। उसके कड़क चूचे शहजाद की छाती में और गहराई से दब गए।
 
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भाग 35: माँ की निगाह

अगले दिन फिर से नज़मा शहजाद की गोद में बैठी हुई थी। पापा का खुरदरा हाथ उसकी नरम जाँघ पर टिका हुआ था। दोनों की बातें धीमी आवाज़ में चल रही थीं। नज़मा ने जानबूझकर अपना सर उनके कंधे पर रख छोड़ा था। कुरता और सरक गया था। उसके बिना ब्रा के बोबे कपड़े के अंदर से साफ उभर रहे थे—निप्पल अभी भी सख्त थे और पतले कपड़े से हल्के से दबे हुए नज़र आ रहे थे। शहजाद की साँसें उसके कान के पास हल्की-हल्की लग रही थीं। जाँघ पर रखा हाथ कभी-कभी धीरे से दब जाता, और हर बार नज़मा के अंदर एक गर्म लहर दौड़ जाती।

बातें करते हुए शहजाद ने अपनी बायीं हथेली से नज़मा के मुलायम गालों को सहलाया। उनकी एक मोटी उंगली नज़मा के रसीले होठों के किनारे को छू गई। नज़मा के मुँह से हल्की-सी सिसकी फूट पड़ी। शहजाद ने उसके होठों पर हल्का दबाव बनाते हुए हाथ को थोड़ा नीचे खिसकने दिया। जब उन्होंने देखा कि नज़मा ने कुछ नहीं कहा और अभी तक वैसे ही चिपकी बैठी है, तो हाथ और नीचे ले आए। हथेली के पिछले हिस्से से उन्होंने नज़मा के कड़क निप्पल को महसूस किया। पतले कुरते के अंदर निप्पल पत्थर जैसे सख्त थे। जैसे ही खुरदरी त्वचा ने उसे छुआ, नज़मा के पूरे शरीर में एक तेज़ सिहरन दौड़ गई। शहजाद अब एक हाथ उसकी जाँघ पर दबाए हुए थे और दूसरे हाथ से उसके कड़क निप्पल का मज़ा ले रहे थे—धीरे-धीरे घुमाते, हल्के से दबाते।

तभी कमरे का दरवाज़ा अचानक खुला। परवीन खड़ी थी।

एक पल के लिए पूरा कमरा थम-सा गया। पंखे की आवाज़ भी जैसे रुक गई हो। परवीन की निगाहें पहले अपनी बेटी पर गईं—गोद में बैठी, ढीला कुरता ऊपर खिसका हुआ, बिना ब्रा के उभरे गोरे बोबे, पापा का एक मोटा हाथ जाँघ पर और दूसरा हाथ ठीक निप्पल पर टिका। फिर निगाहें शहजाद पर ठहर गईं। उनकी कमीज़ अभी भी आधी खुली थी, आँखें लाल थी, और चेहरा वासना से चमक रहा था।

परवीन का चेहरा तुरंत बदल गया। आँखों में गुस्सा, हैरानी और कुछ और था जो सालों से दबकर बैठा था। “ये क्या हो रहा है यहाँ?”

नज़मा हड़बड़ाकर गोद से उतरने लगी, लेकिन शहजाद ने उसके कमर पर हल्का हाथ रखकर रोक लिया। उंगलियाँ उसकी पतली कमर की गर्माहट महसूस कर रही थीं। “अरे कुछ नहीं… बेटी उदास थी तो बैठी हुई थी।”

परवीन की आवाज़ में गुस्सा साफ था, लेकिन उसके नीचे एक काँपती हुई बेबसी भी थी। “उदास थी तो कमरे में जाकर सो जाती। पापा को क्यों तंग कर रही है? ऑफिस से थककर आए हैं, चैन से बैठने भी नहीं देते।”

नज़मा ने मासूमियत भरा चेहरा बना लिया। आँखें थोड़ी नम कर लीं। “माँ… मैं सिर्फ चाय देने आई थी। पापा ने खुद बुलाया था।”

परवीन ने आँखें तरेर कर नज़मा को देखा। वह और कुछ कहना चाहती थी—बिना ब्रा, गोद में बैठना, जाँघ पर हाथ, निप्पल पर उंगलियाँ—लेकिन शहजाद के सामने मुँह नहीं खुल रहा था। पति के सामने इतनी खुली बात करने की हिम्मत उसमें नहीं थी। सालों से दबी हुई औरत थी वह। वो ज़ोर से चिल्लाना चाहती थी, नज़मा को एक थप्पड़ रसीद करना चाहती थी, लेकिन वो कुछ न कर पायी और मुठी भींच के रह गयी।

शहजाद ने हल्के स्वर में कहा, “परवीन, कोई बात नहीं। बच्ची है… थोड़ी देर बैठ गई तो क्या हो गया?”

परवीन के होंठ भींच गए। गले में कुछ अटक गया। वह कुछ और बोलने वाली थी, लेकिन रुक गई। सिर्फ इतना कहा, आवाज़ भारी पड़ते हुए, “नज़मा… तू कमरे में जा। अभी।”

नज़मा ने पापा की तरफ एक झलक देखी। शहजाद ने हल्के से सिर हिलाया। उनकी आँखों में एक छोटा-सा इशारा था—जा, अभी।

नज़मा को लग रहा था की शायद मुनिया की बरसात से उसकी सलवार गीली ना हो गयी हो। इसलिए नज़मा धीरे से खड़ी हुई। उठते समय कुरता और ऊपर खिसक गया। उसके बोबों का पूरा वजन कपड़े के अंदर से हिलता नज़र आया। परवीन की निगाहें एक पल के लिए उसकी छाती पर ठहर गईं—गोरे, गोल, बिना किसी सहारे के, निप्पल अभी भी सख्त—फिर उसने जल्दी से मुँह फेर लिया। गालों पर हल्की लालिमा तैर गई।

नज़मा कमरे से निकल गई। पीछे दरवाज़ा बंद होते ही उसकी साँसें थोड़ी तेज हो गईं। जाँघों के बीच अभी भी हल्की नमी बची हुई थी। निप्पल पर शहजाद की हथेली का अहसास अभी भी कायम था। नज़मा के होंठों पे हलकी सी मुस्कान तैर रही थी।

रात के करीब साढ़े दस बजे नज़मा अपने कमरे में लेटी हुई थी। दिमाग में शाम का पूरा सीन घूम रहा था। पापा का खुरदरा हाथ, उनकी गर्म साँसें, गोद की गर्माहट, जाँघ पर दबाया गया दबाव, और निप्पल पर घूमती उंगलियाँ… सब याद आकर शरीर में सिहरन पैदा कर रहा था। निप्पल अपने-आप सख्त हो गए थे। उसने चादर के अंदर हाथ बढ़ाकर हल्के से छुआ तो एक हल्की लहर पेट के नीचे तक पहुँच गई।

तभी दरवाज़ा धीरे से खुला। परवीन अंदर आ गई। चेहरे पर गुस्सा और बेबसी दोनों थे। आँखों के नीचे हल्की कालिमा, बाल बिखरे हुए। उसने दरवाज़ा बंद किया और नज़मा के बिस्तर के पास खड़ी हो गई। कमरे में पंखे की आवाज़ के अलावा सिर्फ उनकी साँसें सुनाई दे रही थीं।

“अब तू बिल्कुल बिगड़ गई है,” परवीन की आवाज़ कम लेकिन तेज थी। गुस्से के साथ उसमें एक काँपती हुई पीड़ा भी थी। “अब तक मैं तुझे बेवकूफ समझती थी… मासूम। लेकिन तू तो बेशर्म निकली।”

नज़मा ने चादर ओढ़ ली। आवाज़ में जानबूझकर डर मिला दिया। “माँ… क्या कर दिया मैंने?”

“क्या किया? बिना ब्रा के पापा की गोद में बैठना… जाँघ पर हाथ रखने देना… निप्पल छूने देना… तू अपनी इज़्ज़त की दुश्मन हो गई है क्या? तेरी उम्र में लड़कियाँ शर्म से मर जाती हैं, और तू…” परवीन की आवाज़ काँप रही थी। गुस्से के साथ कुछ और भी था—जलन, बेबसी, और सालों से दबी हुई अपनी हसरत। उसकी साँसें भारी हो रही थीं।

“आज के बाद पापा के कमरे में अकेले चाय लेकर मत जाना। समझी? अगर फिर से ऐसी हरकत की तो…”

नज़मा ने आँखें झुका लीं। आवाज़ में जानबूझकर डर मिला दिया। “माँ… मैंने कुछ गलत नहीं किया। पापा ने खुद…”

“चुप कर!” परवीन ने बीच में काटा। आवाज़ में एक दरार-सी आ गई। “मुझे अपनी सफाई मत दे। तू घर का माहौल खराब कर रही है, पता नहीं अल्लाह ने ऐसी गंदी औलाद मुझे ही क्यों दी।”

परवीन कुछ और सेकंड खड़ी रही। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। आँखों में कुछ ऐसा था जो नज़मा ने पहले कभी नहीं देखा था—जलन और डर का मिश्रण। फिर वह तेज कदमों से कमरे से निकल गई। दरवाज़ा बंद करते समय उसकी साँसें तेज चल रही थीं।

नज़मा अकेली रह गई।

उसने चादर हटाई। अँधेरे में अपने बिना ब्रा के बोबों को छुआ। निप्पल अभी भी सख्त थे। उंगलियों के हल्के स्पर्श से वे और सख्त हो गए। मन में एक अजीब-सी जीत का अहसास था। जाँघों के बीच हल्की नमी फिर से महसूस हुई।

“माँ गुस्से में तो क्या हुआ… पापा तो हैं मेरे साथ ना,” उसने मन ही मन सोचा। उंगलियाँ धीरे-धीरे निप्पल पर घूम रही थीं। वह मुस्कुराई और करवट लेकर लेट गई। शरीर में एक नई बेचैनी और उत्तेजना दोनों साथ-साथ चल रहे थे। नींद देर से आई, लेकिन आई तो बहुत सुकून की आई। सपनों में भी पापा का खुरदरा हाथ उसकी जाँघों और निप्पल पर घूम रहा था।
 
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Pinky

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भाग 36: थप्पड़

अगली सुबह नज़मा ने देर तक बिस्तर पर पड़ी रहने की कोशिश की, लेकिन नींद नहीं आई। माँ की रात वाली बातें बार-बार याद आ रही थीं। “बेशर्म… बिगड़ गई… घर का माहौल खराब कर रही है…”। गुस्सा भी आ रहा था और एक अजीब-सी जिद भी। छाती के अंदर कुछ गर्म-सा धधक रहा था। जाँघों के बीच हल्की नमी अभी भी बाकी थी।

वह उठी और सीधे पिछवाड़े चली गई। नहाने का सामान उठाया, लेकिन पानी तक नहीं डाला। सिर्फ खड़ी रही। आँखों में जानबूझकर आँसू भर लिए। बाल बिखरे हुए थे, चेहरा उदास। सुबह की ठंडी हवा उसके पतले नाइटी के अंदर से छू रही थी। निप्पल अपने-आप सख्त हो गए थे। नाइटी के पतले कपड़े से उनके गोल आकार साफ उभर रहे थे।

थोड़ी देर बाद शहजाद ऑफिस जाने की तैयारी करके निकले। उन्होंने पिछवाड़े की तरफ झाँका तो नज़मा को वैसे ही खड़ी देखा—कंधे झुके, आँखें नम, निप्पल ठंडी हवा में और कड़क। “बेटी? नहा नहीं रही?”

नज़मा ने मुँह फेर लिया। आवाज़ में रोना मिलाया, गला काँपता हुआ। “पापा… माँ ने मना कर दिया है। कहती है नहाऊँ तो मारेंगी। आपसे बात भी न करूँ, चाय भी न दूँ… तो फिर मैं क्या करूँ? मर जाऊँ क्या?”

शहजाद पास आए। उनकी भौंहें सिकुड़ गईं। आवाज़ में गुस्सा और चिंता दोनों थे। “क्या बकवास है यह? तू नहा… जैसे नहाना है नहा। मैं हूँ यहाँ। कोई कुछ नहीं कहेगा।”

नज़मा ने आँखें उठाकर देखा। आँसू अभी भी थे, लेकिन अंदर मुस्कान थी। “सच में पापा?”

“हाँ। जा, नहा ले आराम से।” शहजाद की आवाज़ में एक सुरक्षा थी जो नज़मा के शरीर में सिहरन पैदा कर गई। उनकी निगाहें एक पल के लिए उसके उभरे निप्पलों पर ठहरीं।

नज़मा ने धीरे से सिर हिलाया। शहजाद चले गए। नज़मा ने पानी खोला और नहाने लगी—आज फिर पूरी नंगी। ठंडा पानी उसके गोरे बदन पर बह रहा था। निप्पल और सख्त हो गए। उसने उंगलियों से अपने चूचों को धीरे-धीरे सहलाया, फिर हाथ नीचे ले गई। मुलायम चूत पर पानी की धार पड़ रही थी। उंगलियाँ धीरे से फिसलीं—अंदर हल्की नमी पहले से ही थी। मन में एक नई हिम्मत थी। पापा अब उसके साथ थे। हर स्पर्श के साथ अंदर की गर्मी बढ़ती गई।

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शाम को शहजाद ऑफिस से लौटे तो सीधे आवाज़ दी, “नज़मा… चाय ला।”

परवीन रसोई में थी। उसने सुना, लेकिन कुछ नहीं बोला। हाथ में चाकू था, लेकिन वह काटना भूल गई। नज़मा ने फिर वही ढीला पारदर्शी कुरता पहना—बिना ब्रा। ट्रे लेकर पापा के कमरे में गई। कुरते के अंदर उसके बोबे स्वतंत्र थे, हर कदम पर हल्के से काँप रहे थे। निप्पल कपड़े से साफ उभर आए थे।
शहजाद बिस्तर पर बैठे थे। उन्होंने जाँघ पर थपथपाया। “इधर आ।”

नज़मा बिना हिचकिचाहट के उनकी गोद में बैठ गई। आज और करीब। उसका एक जाँघ शहजाद की जाँघों के बीच आ गया। पापा का खुरदरा हाथ तुरंत उसकी जाँघ पर आ गया—पहले से थोड़ा ऊपर, सलवार के पतले कपड़े के ऊपर से गर्माहट सीधी चूत तक पहुँच रही थी। नज़मा की साँसें थोड़ी तेज हो गईं। शहजाद की पैंट के अंदर कुछ सख्त होता महसूस हुआ—उनका लंड हल्के से तन रहा था। नज़मा ने जानबूझकर थोड़ा और सरककर उसे अपनी जाँघ से दबाया।

बातें शुरू हुईं। नज़मा हँस रही थी, पापा भी। उनकी उंगलियाँ धीरे-धीरे जाँघ पर घूम रही थीं, कभी-कभी चूत के पास तक पहुँच जातीं। नज़मा के निप्पल कुरते से उभर आए थे। शहजाद ने दुसरे हाथ से निप्पल के खिलवाड़ शुरू कर दिया । नज़मा के मुँह से हल्की सिसकी निकल गई।

अचानक दरवाज़ा खुला।

परवीन खड़ी थी। ट्रे में पानी का गिलास था, लेकिन चेहरा तना हुआ। आँखों में गुस्सा, डर और जलन का मिश्रण। उसने देखा—बेटी गोद में, एक हाथ जाँघ पर, दूसरा हाथ निप्पल पर।

“फिर से?” परवीन की आवाज़ काँप रही थी। गला सूखा हुआ। “क्यों बिगाड़ रहे हो बेटी को? इतनी बड़ी हो गई है… शर्म नहीं आती?”

शहजाद की आँखों में गुस्सा आ गया। उन्होंने नज़मा को गोद से नहीं उतारा। उंगलियाँ उसकी जाँघ पर और कस गईं, निप्पल पर दबाव बना रहा। “तू चुप रह। बच्ची है, थोड़ी देर बैठी है तो क्या हो गया?”

परवीन आगे बढ़ी। कदम काँप रहे थे। “बच्ची? यह बच्ची नहीं रही। आप भी… आप भी उसे बिगाड़ रहे हो।” उसकी आवाज़ में सालों की दबी हुई पीड़ा फूट पड़ी थी।

शहजाद अचानक उठ खड़े हुए। नज़मा संभलकर किनारे हो गई। कमरे में हवा जैसे रुक गई। शहजाद ने एक कदम बढ़ाया। उनकी हथेली हवा में उठी और परवीन के गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया।

“फटाक !!!!!”

आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई। इतनी तेज़ कि दीवारें भी काँप उठीं। परवीन का सिर एक तरफ झटक गया। गाल तुरंत लाल हो गया, हथेली का निशान उभर आया। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। शरीर काँप रहा था।

“जीने दो बच्ची को!” शहजाद की आवाज़ कठोर थी, गले से निकलते हुए। “खुद तो दकियानूसी सोच रखती हो, वही सब पर थोप रही हो। अब से नज़मा जो करना चाहे करेगी। तू मुँह मत खोलना।”

परवीन काँप रही थी। गाल जल रहा था। आँखों में आँसू थे, लेकिन वह कुछ नहीं बोली। सालों की दबी हुई औरत एक पल में पूरी तरह टूट गई। उसके होंठ काँप रहे थे, साँसें उखड़ रही थीं। उसने गिलास टेबल पर रखा—पानी छलक गया—और चुपचाप कमरे से निकल गई। कदम डगमगा रहे थे।

नज़मा वहीं खड़ी थी। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। छाती के अंदर एक अजीब-सी गर्मी दौड़ रही थी। पापा ने माँ को थप्पड़ मार दिया था… उसके लिए। जाँघों के बीच हल्की नमी फिर से महसूस हुई। चूत में एक गर्म लहर दौड़ गई।

शहजाद ने लंबी साँस ली। कंधे ढीले पड़े। पैंट के अंदर उनका लंड अभी भी आधा तना हुआ था। फिर नज़मा की तरफ देखा। आवाज़ फिर नरमी भरी हो गई, लेकिन उसमें एक नई ताकत थी। “बेटी… तू डर मत। अब कोई तुझे कुछ नहीं कहेगा।”

नज़मा ने धीरे से उनके हाथ में अपना हाथ रख दिया। उनकी खुरदरी हथेली अभी भी गर्म थी। “पापा… आप… आपने…”
“जा चुप करवा अपनी माँ को। पानी दे दे। गला सूख गया होगा उसका।”

नज़मा कमरे से निकली। गलियारे में परवीन दीवार के सहारे खड़ी थी। आँखें लाल थीं, गाल अभी भी जल रहा था। नज़मा ने पानी का गिलास बढ़ाया। परवीन ने लिया, लेकिन नज़मा की तरफ देखा तक नहीं। उंगलियाँ काँप रही थीं।

नज़मा अपने कमरे में आई और दरवाज़ा बंद किया। पीठ टिकाकर खड़ी हो गई। शरीर में एक अजीब-सी गर्मी दौड़ रही थी—जाँघों से लेकर छाती तक। निप्पल सख्त थे। उसने कुरते के अंदर हाथ डालकर हल्के से छुआ तो एक लहर पेट के नीचे तक पहुँच गई। उंगलियाँ और नीचे चली गईं। पतली सलवार के अंदर चूत पूरी तरह गीली थी। उसने धीरे से दो उंगलियाँ अंदर डालीं और आँखें बंद कर लीं।

माँ अब पूरी तरह बेबस हो चुकी थी। पापा उसके साथ थे। उनका लंड आज कितना सख्त हुआ था… उसके लिए।
अब खेल की बागडोर पूरी तरह नज़मा के हाथ में थी।
 
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