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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

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komaalrani

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग 219 -- बुच्ची और लीला -दोनों ने लीला, ----खेला चोर सिपाही का पृष्ठ १२४३

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komaalrani

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कोमल जी

शानदार अपडेट। विवाह और देशज गीतों का तो जवाब ही नहीं, पता नहीं कितने वर्ष पीछे चले जाते हैं। अबतो आप जैसे लोगों के पास ही ये सम्पदा उपलब्ध है।

सादर
बहुत बहुत आभार। आप ऐसे गुणग्राही कम ही हैं।

कहानी के इन हिस्सों में मेरी कोशिश यही है उन भूले बिसरे पलों को याद किया जाए और जो रीत रिवाज अश्लीलता और भदेस के नाम पर ख़त्म होते जा रहे हैं उन्हें भी लिपिबद्ध किया जाए

इस भाग में सुलाकी का जो जिक्र है ७०-८० के दशकों तक अवध और उसके आस पास के गाँवों में बहुत आम थी , और बरात के जाने के बाद कोई औरत खपड़े पर , छत पर या किसी ऊँची जगह पर चढ़ कर सुलाकी का रोल करती थी और भाषा उसकी जो मैंने लिखा है उसी तरह की बल्कि उससे भी दो हाथ आगे होती थी

इसी तरह मुर्गे वाला गाना, सुबह सबेरे गाया जाता था जैसा मैंने यू ट्यूब से ढूंढ कर पोस्ट किया

आप ऐसे दो चार और पाठक हों जो अपने मन की बात कहे तो कहानी शायद लम्बे अंतरालों से बचे।

जिंदगी की व्यस्तता लिखने वाले की भी होती है और पढ़ने वाले की भी, पर कमेंट बतरस का जो सुख देते हैं वही कहानी की प्राणवायु हैं।
 

Random2022

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मीना की माँ सुशीला चाची -

-बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं
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मुन्ना बहू हँसते हुए बोलीं और ढोलक सीधे मीना की माँ सुशीला चाची की गोद में थमा दी।

सुशीला चाची ने ढोलक थामते ही कान्ति बुआ और उनके साथ बैठी दूल्हे की बाकी बुआओं को आड़े हाथों लेना शुरू किया:


"उड़ि आवा दुप्पटा बनारस से, उड़ि आवा, उड़ि आवा दुप्पटा बनारस से, उड़ि आवा।

अरे, दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, सीना ताने खड़ी, जोबना उभारे खड़ी, उड़ि आवा!


दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, चुम्मा देने खड़ी, चुम्मा लेने खड़ीं, उड़ि आवा!

अरे, दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, बुर देने खड़ी, लँड लेने खड़ीं, उड़ि आवा!

अरे, दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, मीना के बाबू से चुदाने खड़ी, लँड लेने खड़ीं, उड़ि आवा!

अरे, दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, मीना के चाचा से चुदाने खड़ी, लँड लेने खड़ीं, उड़ि आवा!


अरे, दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, मीना के मामा से चुदाने खड़ी, लँड लेने खड़ीं, उड़ि आवा!"

उनके ठीक बगल में बैठी रीना की मम्मी (चंदौली वाली) ने माहौल में और घी डाला। आखिर बुआ तो उनकी बेटी रीना की भी लगती थीं, सो वह बोलीं,

"अरे, ये रीना की बुआ अपने भाइयों से... यानी हमारे मरदों से खाली बुर चोदवाएंगी कि अपनी गांड भी मरवाएँगी?"

नौवीं क्लास में पढ़ने वाली, सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल की रीना ने लाज के मारे अपना सिर झुका लिया। तभी उसके बगल में बैठी एक भौजी ने ज़बरदस्ती उसका सिर ऊपर उठाया और उसके कान में बुदबुदाई,

"अरे ननद रानी, बिना लँड का स्वाद लिए कोई ननद यहाँ से विदा नहीं होती, तो काहे लजा रही हो? जब हाथ में मिलेगा तो गपागप घोंट ही लोगी!"
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जवाब में सुशीला चाची ने ढोलक की थाप तेज़ करते हुए अगली गारी शुरू कर दी, जो पहली वाली से भी ज़्यादा नंगी और धारदार थी।

अब उनके साथ उनकी देवरानी (रीना की मम्मी) की आवाज़ भी पूरी कड़क के साथ गूँज रही थी और बाकी बहुएँ भी इस सुर में शामिल हो चुकी थीं। ननद तो आखिर ननद ही ठहरी, चाहे अपनी हो या सास की!


"अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं, अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!"

गाते हुए उन्होंने अपनी लजाती हुई सुंदर और गोरी बेटी मीना को देखा, जिसके गाल लाज से लाल हो रहे थे।

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उसे प्यार से अपनी तरफ़ दुबकाते हुए सुशीला चाची ने बच्चों के नाम से रिश्ता जोड़कर गाने की अगली लाइन उठाई:

"अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं, अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!

मीना के बाबू की टूट गइल खटिया, जागेलीं मीना की बूआ मुँहवा चूँ! अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!

मीना के बाबू हचक के चोदले, चोदावें मीना की बूआ मुँहवा चूँ! अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!"

सुशीला चाची की ढोलक की थाप पूरे इलाके के दस गाँवों में मशहूर थी। मीना भले ही बनारस के सेंट मेरी कॉन्वेंट में पढ़ती थी, लेकिन ढोलक बजाने का यह हुनर उसने अपनी माँ से विरासत में सीखा था।

ढोलक पर सुशीला चाची की देवरानी चम्मच से कड़क ताल दे रही थीं और सब बहुएँ ज़ोर-ज़ोर से ताली बजा रही थीं। अब मीना और रीना भी शरमाना छोड़ इस मस्ती में झूमने लगी थीं।
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रीना को झूमते देख अपने देवर का फायदा करवाने के इरादे से सुशीला चाची ने आगे बढ़ाया:


"रात भर मुरुगवा चोंच हिलावे, रीना की बुआ नीचे पड़ी छटपटावे!

रीना के पापा ने हचक के मारा, रीना की बूआ की बुरिया से निकले 'सूँ-सूँ' कूं!

अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!"

वहीं से गाने की कमान रीना की मम्मी ने लपक ली:

"अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं! अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!

अरे केकरे गांड में जइहें तू, अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं?

रीना की बुआ की गांड में जाऊँगा, बोले मुरगवा मुँहवा चूँ!


रीना के बाबू मरिहें गांड, रीना की बुआ मरवाएँगी गांड, बोले मुरगवा मुँहवा चूँ!"

अब इस आँगन में बैठी बाकी भाभियों के हाथ भी खुजलाने लगे थे, क्योंकि महफ़िल में दर्जन भर से ज़्यादा मस्त, कुँवारी और जवान ननदें बैठी थीं।

रीना के बगल में सुधा भाभी बैठी थीं, जिन्होंने अभी कुछ देर पहले रीना को चिढ़ाया था।
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सुधा भाभी की शादी को मुश्किल से दो साल हुए थे; वह महज़ बीस-बाईस साल की गदराई हुई गोरी देह की मालकिन थीं। ,देह तो दुबले पतली एकदम छरहरी लेकिन जोबन जबरदंग, और जितना देवरों का रस लेती थी , उससे कम ननदों का रस नहीं लेती थीं।

उनकी ससुराल तो रीना के घर से एकदम सटी हुयी थी, जब गौने सुधा भाभी गौने उतरी थीं दो साल पहले तो उस समय रीना छोटी सी थी लेकिन रिश्ता तो ननद का ही था , पर अब तो एकदम तैयार माल हो गयी है , सुधा भाभी ने सोचा।

वह अपने पति के साथ बनारस में रहती थीं, जो रेलवे में टीटीई थे। वह शादी के लिए कल ही गाँव आई थीं और रूप-रंग के साथ-साथ गारी गाने में भी उस्ताद थीं।

सुधा भाभी ने रीना की मम्मी से ढोलक झपट ली और एक बार फिर कुँवारी ननदों यानी दूल्हे की बहनों पर तीखा हमला बोला। गाना वही था, पर अब निशाना कान्ति बुआ नहीं, बल्कि गाँव की ये नई कलियाँ थीं। उन्होंने अपनी कच्ची अमिया जैसी ननद रीना को चिढ़ाते हुए गाया:


"लखनऊ से आई हैं रीना दुलारी, पहनेली टॉप और नाभी उघारी!

अरे, हमरे भैया जो देखिहें त लँड फनफनाई, खोलिहें डिबिया, ना करिहें कूं!
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अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं! अरे रीना चुदवाये चूं-चूं चू,


अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं! अरे मीना चुदवाये चूं-चूं चू।"

तभी पीछे से किसी बहू ने आवाज़ लगाई,

"अरे, दूल्हे की बहनों और बुआ का हाल तो हो गया, पर क्या ये मुर्गा दूल्हे की माई के पास नहीं जाएगा? असली नंबरी छिनार तो वही बैठी हैं!"

यह सुनते ही सुधा भाभी ने अपनी खुद की सास (दूल्हे की माई) को नापना शुरू कर दिया, और बबुआने के सब लौंडों-मर्दों का नाम लेकर सुर चढ़ाया:


"पूरब पट्टी के मरदे और पच्छिम पट्टी के लौंडे,

सब ही खड़े हैं लेके अपने-अपने लौंड़े .

ससुइया छिनार आज सबको बुलाई,

अरे, दूल्हे की माई आज सबको बुलाई,

बारी-बारी पेले, कोई बोले ना कूं!


अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं! अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!"



अब कान्ति बुआ को अपनी भाभी (दूल्हे की माँ) की खिंचाई करने का सुनहरा मौका मिल गया। वह सुधा भाभी से हंसकर बोलीं,

"अरे बहू! तेरी सास बारी-बारी से नहीं, बल्कि एक साथ लेती है! एक लँड मुँह में, एक गांड में, और एक चूत में! दूल्हे के फूफा, चाचा और मामा तीनों का एक साथ संभालती है!"

कान्ति बुआ ने इस तरह हँसते हुए अपने मर्द और भाइयों का फायदा करा दिया।

लेकिन सुधा भाभी अभी अपनी ननदों को छोड़ने के मूड में नहीं थीं। बाकी भाभियाँ भी तालियाँ पीटकर उनका साथ दे रही थीं:


"अरे, बेसन के लड्डू कराकर होएं, अरे, बेसन के लड्डू...

अरे, हमरी ननदी छिनार के सत्तर भतार, पचहत्तर भतार!

अरे, हमरी रीना छिनार के सत्तर भतार, पचहत्तर भतार,

तीन सौ भतार संगे घूमे बाज़ार! अरे, बेसन के लड्डू कराकर होएं, अरे, बेसन के लड्डू...

अरे, हमरी मीना छिनार के सत्तर भतार, पचहत्तर भतार, तीन सौ भतार संगे घूमे बाज़ार,


अरे, बेसन के लड्डू कराकर होएं..."

तभी शीतल मौसी की बेटी रमा बीच में बोल उठी,

"अरे भौजी! यह तो अपनी-अपनी किस्मत है। कहिए तो दो-चार भतार हम ननदें आप लोगों को भी दान में दे दें?"

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बुच्ची, जिसकी चुदाई की गुल्लक दोपहर में ही फूट चुकी थी, वह भी अब पूरे जोश में थी।
उसने हँसते हुए रमा की बात का समर्थन किया,


"हाँ सुधा भाभी! वह सब आपके भी तो नन्दोई लगेंगे। काहे आपकी झाँटें सुलग रही हैं? सलहज का तो नन्दोई पर पहला हक होता है!"

रामपुर वाली भाभी ने हँसते हुए बुच्ची के गदराए उभारों को ज़ोर से भींचा और बोलीं,

"छिनार, हमसे इतनी बातें! कल हमारे भाई गप्पू से चुदवाओगी हंस-हंस के, तो क्या उसे भी नन्दोई बना दोगी क्या?"

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तभी पूनम ने आग में घी डालते हुए सुधा भाभी को चिढ़ाया,


"अरे सुधा भौजी! इस गारी में नमक एकदम कम है, और मिर्च तो एकदम नहीं है!"

"ठहर स्साली! अभी सुनाती हूँ तुझे असली वाली गारी। भैया की रखैल, ऐसी मिर्च लगेगी कि पिछवाड़ा परपराने लगेगा!" सुधा भाभी हँसते हुए बोलीं।

वह भले ही आजकल बनारस में अपने मर्द के साथ रह रही थीं, पर बहू तो इसी ठेठ गाँव की थीं और एक से बढ़कर एक गालियाँ उनकी ज़बान पर रटी हुई थीं। उन्होंने ढोलक पर थाप देकर नया सुर उठाया:


"चना बोई आई बा चटकल अँजोरिया में, चना बोई अयली चटकल अँजोरिया में।

अरे, दूल्हा अपनी बहिनी को ले भागे कोठारिया में, चना बोई आई बा चटकल अँजोरिया में।

अरे, सूरजु भैया पूछे अपनी बहिनिया से, अरे, पूनम से, बुच्ची छिनरिया से...

अरे, सूरजु भैया पूछे अपनी बहिनिया से, अरे, रमा से, मीना से, रीना छिनरिया से...

अरे, दूध पीबू बहिनी? ना भैया ना! अरे, चाय पीबू बहिनी? ना भैया ना!

अरे, शराब लेबू बहिनी? ना भैया ना! अरे, गहना ले ला बहिनी? ना भैया ना!

अरे, यार लेबू बहिनी? हाँ भैया हाँ! अरे, लँड लेबू बहिनी? हाँ भैया हाँ!


अरे, भौजी के भैया का लँड लेबू बहिनी? हाँ भैया हाँ, अरे शाबाश भैया हाँ!"

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गाली का यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा था। सुधा भाभी ने एक बार फिर अपनी बगल में बैठी रीना और मीना की रगड़ाई शुरू कर दी:

"लीला-लीला हो ननदी लीला हो लीला, लीला!

लीला-लीला हो रीना लीला हो लीला, लीला!

लीला-लीला हो मीना लीला हो लीला, लीला!

अट्ट लीला, पट्ट लीला, होई करवट लीला, लीला-

लीला हो रीना लीला हो लीला, लीला! लीला-

लीला हो मीना लीला हो लीला, लीला!

टंगिया उठाय लीला, जाँघिया फैलाय लीला, लीला-लीला! चू

तड़ उठाय लीला, बुरिया फैलाय लीला, लीला

-लीला हो रीना लीला हो लीला, लीला!

दूल्हे का लँड लीला, हमरे भैया का लँड लीला, लँड जबरदंग लीला, लीला-लीला!


लीला-लीला हो रीना लीला हो लीला, लीला! लीला-लीला हो मीना लीला हो लीला, लीला!"

अब तो आँगन में बैठी सब की सब भौजाइयाँ पूरे उफान पर थीं।

भरौटी वाली और कहरौटी वाली औरतें तो पूरे इलाके में अपनी सबसे गंदी गालियों के लिए मशहूर थीं; और आज बुच्ची, रमा, रीना और मीना की जमकर खाल खींची जा रही थी। साथ ही दूल्हे की माई को भी कोई बख्शने के मूड में नहीं था।

अगर किसी ननद का नाम गलती से छूट भी जाता, तो कोई न कोई उसे याद दिला देता।

एक बार जब भरौटी वाली भौजाइयाँ गारी गाकर गर्दा उड़ा रही थीं, तो मीना चुपचाप अपनी माँ के पीछे छिपने की कोशिश कर रही थी, जिससे उसका नाम छूट गया। यह देख खुद सुशीला चाची ने उस बहू से हंसकर कहा,

"अरे बहू! तुम्हारी एक छोटी ननद यहाँ पीछे भी छुपी बैठी है!"

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बस फिर क्या था, भरौटी वाली भौजाई ने सीधे मीना पर वार किया:

"मीना छिनार गदहवा चोदी, घोड़वा चोदी..."

लगभग घंटे भर से ऊपर तक गालियों और गानों के साथ नाच-गाने का यह दौर चलता रहा। लेकिन तभी, अचानक पूरे गाँव की बिजली गुल हो गई। एक झटके में अँधेरा छा गया। गनीमत बस इतनी थी कि कोने में एक-दो लालटेनें बहुत धीमी रोशनी के साथ जल रही थीं, जिससे औरतों के गदराए बदन की परछाइयाँ दीवारों पर काँपने लगीं।



वह छत खूब बड़ी थी, जिसके चारों तरफ़ ऊँचे-ऊँचे बारजे बने हुए थे।

बारजे के पार रात के सन्नाटे में भूतों की तरह खड़े पुराने पेड़ों की परछाइयाँ अँधेरे में और भी गहरी और डरावनी हो गई थीं। रात पूरी तरह काली नहीं थी, लेकिन आसमान में कुछ बदमाश बादलों ने आकर चाँदनी का मुँह ज़बरदस्ती छिपा लिया था; बस उस काली रात के तम्बू से दो-चार तारे किसी शैतान लड़के की तरह छुप-छुपकर नीचे की इस औरतों की रहस्यमयी दुनिया को झाँक रहे थे।

शहर से पहली बार गाँव की शादी का यह रंग देखने आई नई-नवेली लड़कियाँ इस अचानक हुए अँधेरे और माहौल से और भी सहम गईं।



इधर, महफ़िल की कुछ शैतान भौजाइयों ने जल रही दो-तीन लालटेनों की लौ को भी जानबूझकर एकदम धीमा कर दिया।

आखिर, अँधेरे का अपना एक अलग डर होता है, और जहाँ डर होता है, वहाँ इस रस का फ़ायदा उठाने वाली भौजाइयाँ भला कहाँ चूकने वाली थीं! जो भाभियाँ काफी देर से इन कंची उम्र की, शहर से आईं मेमसाहब ननदों को देख-देखकर भीतर ही भीतर गरमा रही थीं, उन्हें अब मनमाफ़िक मौका मिल गया था।

जैसे फुटबॉल के खेल में मँजे हुए खिलाड़ी दूसरी टीम के एक-एक खिलाड़ी की हर हरकत को पहले से भाँपकर उन पर अपनी नज़र गड़ाए रखते हैं, ठीक उसी तरह इन जवान और कुँवारी ननदों के पास पहले से ही रसीली भौजाइयाँ सटकर बैठी हुई थीं।



रीना के ठीक बगल में बैठी सुधा भाभी पहले से ही दाँव ताक रही थीं।

उनके साथ भरौटी वाली एक भौजाई भी मौक़े पर चौका मारने को तैयार थी। अँधेरा गहराते ही भरौटी वाली ने झटके से रीना की दोनों कलाई दबोच ली, और सुधा भाभी ने बिना कोई मोहलत दिए आराम से उसके जिस्म से कसी हुई टॉप ऊपर की तरफ़ उतार दी।

टॉप के फर्श पर गिरते ही दोनों भाभियों ने रीना की छाती पर उभरे एक-एक गदराए गुब्बारे को आपस में बाँट लिया और अँधेरे का फ़ायदा उठाकर उन्हें अपनी हथेलियों में कस-कसकर भींचने लगीं।



रीना लाज और सिहरन से छटपटाने लगी, तो सुधा भाभी उसके कान के पास अपने होठ सटाकर फुसफुसाते हुए समझाने लगीं,

"अरे, काहे घबरा रही है मेरी रसीली ननद? मैं हूँ न! कल को तेरे भैया और मेरे भैया तेरे इन गुब्बारों को अइसन ही हचक के दबाएँगे। चुपचाप मज़ा ले ले!"



उधर, दूसरी तरफ मीना को अहिराने की दो तगड़ी भौंजाइयों ने अपनी मज़बूत भौंजाइयों में दबोच रखा था। वे मीना के गालों को चूमते हुए अपनी जीभ होठों पर फेरकर कहने लगीं,

"अरे, जो असली मज़ा अपनी इस अल्हड़ ननद को दुहने में है, वो मज़ा तो पहली बार बियाई गाय को दुहने में भी नहीं आता!"



रमा के भरे-पूरे बदन पर मंजू भाभी ने हाथ मार दिया था, और रूपा पूरी की पूरी रामपुर वाली भाभी के हिस्से में आ गई थी।


कुछ ही देर में आँगन में कोई भी ऐसी ननद नहीं बची थी जो सिसक न रही हो और जिसके बदन का टॉप, फ्रॉक या कुर्ती सरककर फर्श पर न आ गिरी हो। महुआ की कड़क शराब, भाँग की तरंग और गालियों की मदहोशी का असर अब औरतों के सिर चढ़कर बोल रहा था।








तभी अचानक कुछ ऐसा हुआ कि सबकी साँसें जहाँ की तहाँ रुक गईं।
Bahut hi badhiya ratjage ko bataya hai apne. Hum admi hokar kabhi is ko real life me to experience nahi kar payenge, apki kahani ke madhyam se hi iska anand le rahe hai. Dhanyawad
 

Shetan

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पिछवाड़ा -मामी
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चच्चू ने सुपाड़े तक लंड बाहर निकाला एक पल के लिए रुके, कमर को फिर एक हाथ से कस के पकड़ा और पूरी ताकत से धक्का और धक्का सीधे बच्चेदानी पर लगा।

मामी कांप गई, मजे से भी, दर्द से भी और उस हथौड़े के झटके से भी।

पूनम ने अब कस-कस के बुच्ची की सुरमेदानी को रगड़ना शुरू कर दिया था।

दोनों लड़कियां खूब गरमाई थीं। एक-एक चोट साफ़ दिख रही थी।



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लेकिन एक चीज जो दोनों नहीं देख पा रही थी लेकिन मामी महसूस कर रही थी, चच्चू जान रहे थे,

उन्होंने अंदर तक घुसी दोनों उँगलियों को चम्मच की तरह मोड़ कर अंदर की दीवालों को करोचना शुरू कर दिया, एक एक इंच अंदर का हिस्सा उनकी उँगलियों से रगड़ रहा था, दरेरा जा रहा था, कम से कम दस बार दाएं से बाएं और बाएं से दाएं

और दूसरा हाथ भी कमर छोड़ के जाँघों के बीच, घुस के अब कस कस के क्लिट को रगड़ रहा था, लंड भी अपने बेस से बुर के मुहाने पे रगड़ घिस कर रहा था।



मस्ती से मामी की आँखे मुंदी जा रही थीं। और उसी समय,....

पूनम और बुच्ची की आँखे फटी रह गयीं,

चच्चू ने पिछवाड़े जड़ तक घुसी दोनों उँगलियाँ निकाल के मंझली मामी के मुंह में ठेल दीं, जो हाथ क्लिट को तंग कर रहा था, उसे चाचू ने मम्मी के मालपुआ ऐसे गालों पर रख के बेरहमी से दबा दिया और चिरैया की चोंच की तरह मामी ने मुंह खोल दिया, और मामी की गांड से निकली ऊँगली मामी के मुंह में,....

और जब तक मामी समझे की ये उँगलियाँ कहाँ से निकल के आयी है वो हलक में, मामी के बालों की चोटी चाचू के हाथ में और उसे जोर से खींचते हुए, हड़काने लगे, मामी से कबूलवाने लगे,

" चूस स्साली छिनार कस के, लगा जोर, खूब थूक लगा ले, चूस और एक बात कान खोल के सुन लो, जबतक हो, रोज दोनों टाइम, बिना नागा, अगर एक बार भी नागा हुआ न तो ऐसी सजा मिलेगी, मेरा जहाँ मन करेगा वहां लूंगा, जैसे मन करेगा वैसे लूंगा, बोल हाँ "



मामी कैसे बोलती उनके मुंह में तो ऊँगली धंसी थी, पर सर हिला के उन्होंने हाँ में इशारा किया और जैसे ऊँगली बाहर निकली, हँसते हुए चाचू से बोलीं,

" स्साले अपनी बहिन महतारी के भंडुए, ...मेरी ननद की ननद के यार, तू क्या कहेगा, मैं खुद दोनों टाइम…"
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और एक बात साफ़ करती हूँ, मेरी माहवारी परसो ही ख़तम हुयी है तो अब उसका भी डर नहीं है, अगले बीस दिन के लिए, जैसे मन करे वैसे लेना, जितना मन करे उतना लेना, जहाँ बुलाओगे तो आउंगी, नहीं बुलाओगे तो भी आउंगी और तेरे ऊपर चढ़ के चोद दूंगी "

मुंह से निकली उँगलियाँ फिर पिछवाड़े लेकिन अबकी दो नहीं तीन और कैंची की तरह फैला के और वहां से निकल के थोड़ी देर बाद मुंह में, चार पांच बार ये हुआ

और पांचवी बार जब उँगलियाँ मुंह में थीं, चच्चू ने खूंटा अपना मामी की बिल से बाहर निकला और पिछवाड़े के छेद के मुहाने लगा दिया। एक हाथ जो खाली था, उससे गाँड़ का छेद थोड़ा फैलाया और लंड का सुपाड़ा उसमें सेट कर दिया।



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मामी जोर जोर से सर नहीं नहीं में हिला रही थीं।



पूनम और बुच्ची सांस थामे देख रही थीं। लेकिन चच्चू पूरी ताकत से ठेल रहे थे। और थोड़ी देर में जब सुपाड़ा पूरा अंदर पैबस्त हो गया तो उन्होंने मुंह से उँगलियाँ निकालीं।



वो समझ रहे थे और देखने वाली, पूनम और बुच्ची भी, की अब मामी लाख गाँड़ पटकें बिना गाँड़ मरवाये बचत नहीं है। जान तो मामी भी रही थीं, पर जैसे मुंह से ऊँगली निकली उंहोने चाचू की ओर सर घुमाके शिकायत की,

" हे उधर नहीं, बहुत दर्द होता है, ....एक तोहार महतारी गदहे से चुदवाय के गाभिन हुयी थी,.... और फिर पिछवाड़े,"

एक चांटा कस के लगा चूतड़ पे मामी के और चच्चू ने हँसते हुए चिढ़ाया,


" क्यों पिछवाड़ा, अपने किसी भाई के लिए रख छोड़ा है , हमरे स्साले के साले के लिए, लेकिन उस स्साले से बोल देना की अगर गाँड़ मरवाने का इतना ही शौक है न तो आ जाए, इस गाँव में लौण्डेबाज भी बहुत हैं, एक निकालेगा और दूसरा जाएगा और हम भी नहीं छोड़ेंगे "

और साथ ही दोनों चूँची पकड़ के इतना करारा धक्का मारा, की अबकी अंदर वाला छल्ला भी पार हो गया, मामी जोर से चीखीं, तड़पी, पूरी देह दर्द से दुहरी हो गयी। लेकिन मामी को गारी पड़ी थी तो वो बिना उन्हें गरियाये कैसे छोड़ देतीं,

तो उन्होंने भी नाप लिया,

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वाह मामी मतलब बुच्ची की मौसी के पिछवाड़े का तो तबला बजा दिया. मंजन भी करवा दिया. और बुच्ची अपनी बाहनिया के साथ गरमाती रही. पर क्या खुब खेला है. मौसी भी असली चुदक्कड़ है. पहले तो हलकी सी BDMS की झलक लगी. पर मामी खुद गुरराई तब मज़ा आया. लेकिन चन्नर चाचा ने तो मामी के पिछवाड़े की चटनी ही बना दी.

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Shetan

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बुच्ची की माई

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" अरे गाँड़ मारने क इतना शौक है तो हमरे ननद क ननद, बुच्ची क माई आएँगी दो चार दिन में, तोहार बहिनिया, मारना उनकी गाँड़ हचा हच। अब ये मत कहना की अपनी बहिनिया की,.... बुच्ची की माई की नहीं लिए हो "

धक्के अब धीमे हो गए थे, आधे से ज्यादा खूंटा अंदर घुस गया था और ये नहीं था की चाचू ने मंझली मामी का पिछवाड़ा पहली बार मारा हो, और मामी भी मजे से चूतड़ हिला हिला के मोटे खूंटे का मजा ले रही थीं , चाचू भी नंबरी चोदू उन्होंने दो उँगलियाँ मंझली मामी की बुर में ठेल दी और दोनों ओर का मजा देते, मामी से बोले,

" देखो, सच बोलूं तो मैं क्या यह गाँव का कोई मर्द कसम नहीं खा सकता कि बुच्चिया का माई का नहीं लिया है। अरे बुच्चिया भी एकदम उसी की शक्ल पायी है, एक बार तो हम भी सोचे की ये का हो गया है, घडी की सुई का उलटी घूम गयी।

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जिस उमर की बुच्चिया हैm,,,, उस उमर तक तो हम उसकी माई की दर्जनो बार ले चुके थे, और इतने प्यार से देती थी, कभी कहीं बुला लो, गन्ने के खेत में, आम का अमराई में, अरहरिया में , मक्के के खेत में, खुद अपने हाथ से नाड़ा खोलती थी, खुद बिना कहे अपनी टांग उठाती थी ,"
पूनम ने कस के बुच्ची के चूतड़ में चिकोटी काटी जैसे कह रही हो , " सुनो और समझो, काहें अब तक आपन चुनमुनिया बचाय के रखी है, कुछ नहीं तो अपनी माई से सीखो :


चच्चू बुच्ची की माई की याद में खो गए थे,


लेकिन वो मामी की चाल समझ गए तो हंस के बोले,

" लेकिन हमार बहिनिया, बुच्ची क माई तो अभी है नहीं तो तुम ही मरवाओ "

और फिर दोनों जोबन कस के रडते मसलते क्या गाँड़ मारी चच्चू ने मझली मामी की,


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थोड़ी देर घोड़ी बना के मारने के बाद उन्हें खड़ी कर दिया और उस कुठरिया की दीवाल से चिपका के, खड़े खड़े ही मारने लगे, मामी का जोबन दीवाल से कुचला जा रहा था,, पिसा जा रहा था। लेकिन मजा दूना मिल रहा था,

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पर वो भी सूद के साथ बात का जबाव देने में विश्वास रखती थीं, कस के पीछे से धक्के का जवाब धक्के से देते हुए बोलीं

" अरे तो बुच्ची क माई अभी नहीं है तो क्या, ,...आपन ताकत सम्हाल के रखो, भतीजे का बियाह है बिना भैया लोगो का लौंड़ा लिए बरात थोड़े बिदा करेंगी दुन्हा क बूआ। आएँगी वो भी,


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लेकिन हाँ बस दो चार दिन के लिए, निचोड़ लेना।

और दूसरी बात है, बुच्ची क माई नहीं है तो उनकी बिटिया तो है,…. लेने लायक तो वो भी हो गयी है , माँ नहीं तो बेटी सही "

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उनपर इस बात का क्या असर हुआ था , वो चच्चू के धक्के से पत्ता चला और पूनम ने कस के बुच्ची की बुलबुल दबोच ली जैसे बिन बोले कह रही हो देख तेरे कितने रसिया है।

" तू भी न , और आग लगाती है स्साली "

कस के चुम्मा लेते चच्चू बोले और अब तीन ऊँगली बुरिया में घुसेड़ दी, मामी झड़ने के कगार पे थी और फिर जोड़ा

"लेकिन बात छिनार सही कहती है, बिटिया एकदम माँ पे गयी है, ....वही रूप रंग बल्कि जोबन और जबरदंग हैं, नमक भी माँ से दुगना है, इस उमर में तो उसकी माँ ने पूरे बाईसपुरवा में कोई घर नहीं छोड़ा था।

मामी ने झड़ना शुरू कर दिया था, जोर जोर से सांस ले रही थीं, देह काँप रही थी, फिर जैसे ही थोड़ा थिर हुयी तो चच्चू को छेड़ा,

" अरे जबतक माँ नहीं है तो बेटी से काम चलाओ, और माँ आ जाये तो माँ बेटी साथ साथ , और तुम से न पटे तो मैं पटा दूंगी "


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यह सुन के या धक्क्को का असर, चच्चू एकदम मामी से चिपक गए और पूनम और बुच्ची ने देखा की बूँद बूँद कर के मामी के पिछवाड़े से बीर्य की धार रिस रही है। मलाई उनकी जांघ पे,
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लेकिन पुनम चालाक थी, बुच्ची से बोली, " अभी निकल चलो, उन लोगो के बाहर निकलने से पहले " और बुच्ची का हाथ पकड़ के एक दो तीन हो गयी।

बगल में भैंसे बंधी रहती थी, और पूनम बुच्ची को लेके वहीँ धंस गयी, और दोनों खिड़की से देख रही थीं की कैसे दीवाल का सहारा लेकर पहले मामी निकली और फिर चच्चू,। चच्चू बाहर के कुंए की ओर चले गए,

मंझली मामी किसी तरह सहारा लेकर रुकते हुए, गली की ओर मुड़ीं,



बुच्ची के कानों में मामी की बात गूँज रही थी।

क्या उसकी माई सच में, और अगर हाँ तो वही बेवकूफ है जो अबतक तोप ढांक के बैठी है और चच्चू उसकी कितनी तारीफ़ कर रहे थे, बुच्ची के जोबन तो उसके माई से भी जबरदंग हैं और नमक भी दूना,



तबतक अहिराने वाली पूनम ने बुच्ची का हाथ पकड़ के खींचा, वरना उसका पैर गोबर में पड़ जाता और बोली, "चल सब इन्तजार कर रहे होंगे "

और निकलते ही पूनम ने कस के बुच्ची के चूतड़ पे एक हाथ मारा और बोली, "सुन, शीलवा के,…"

लेकिन खिलखिलाते हुए बुच्ची ने बात काट दी और हंस के बोली, " दी, शीलवा क बात न करो, उसके एक एक यार का हिसाब मुझे मालूम है। सावन में मैं आयी थी तो पूरे महीने, चौकीदारी मैं ही करती थी और वो सब बेचारे इतना निहोरा करते थे शीला से, अरे अपनी सहेली की भी दिलवा दे, कुछ नहीं तो चुम्मा, या जोबन का ही रस ले लेने दे, सब के सब "

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" अरे तो दिया काहें नहीं, बेवकूफ, तेरा ननिहाल है कोई तेरा गाँव तो है नहीं जो स्साला तेरे पीछे पड़ जाएगा, या तेरी बदनामी करेगा। अरे बीस पच्चीस दिन बाद तू अपने गाँव वो अपने गाँव "

और चिढ़ाते हुए एक चांटा और जड़ा पूनम ने बुच्ची के चूतड़ पे।



बुच्ची भी यही सोच रही थी।

जो बात अभी चच्चू ने उसकी माई के बारे में कही थी, बुच्ची से साल भर छोटी थीं तभी पूरे गाँव का मन रख लिया था, किसी को मना नहीं करती थी। कल यही बात सूरजु भैया की माई कह रही थी तो बुच्ची ने सोचा ननद भौजाई का मजाक।

लेकिन अब जो ये बात चच्चू ने भी कही और पूनमिया ने भी सही बात कही, फिर वो एक साल से ज्यादा बड़ी है और कौन अपने गाँव में है। अपने ननिहाल में है, साल में एक दो बार आती है, तो किसके किसके आगे टांग फैलाई, उसके गाँव में किसी को क्या पता चलेगा।

तबतक बबुआने के दो लौंडे बगल के खेत से मेंड़ पे जा रहे थे, बुच्ची को देख के एक ने जोर से सीने पे हाथ मारा, और बोला,

" कबतक जवानी छुपाओगी रानी, कंवारों को कितना सताओगी रानी'

दूसरा ज्यादा साफ़ बोलने का हामी था, बोला, " अरे शीलवा से पूछ लो, दो पानी निकाल के उसका तब पानी छोड़ते हैं हम, तोहरो पोखर भर देब"

जवाब पूनमिया ने दिया, " अरे हमरी सहेली को का समझते हो, अकेले तुम सब का निचोड़ के रख देगी, तनी खाय पी के ताकत बनाओ तब आना इस के पास " और दोनों लड़कियां घर की ओर मुड़ गयीं। और पूनमिया ने बुच्ची से कहा,

" अरे यही मैं कह रही थी, शीलवा के बारे में, रोज दो चार लौंडो का कल्याण करती थी, तेरी सहेली। लेकिन अब उसकी पांच दिन की आज से छुट्टी शुरू हो गयी है, तो गाँव के कुल लौंडे उधिराये हैं। तो कईसन सहेली हो ? अरे कम से कम पांच दिन तो बेचारी के यारो का काम चलाओ।

" ठीक है है पूनम दीदी, अब जो लौण्डा सबसे पहले दिख गया न अब उसी का लौंड़ा घोंट लूंगी, कउनो न नखड़ा न छिनरपन, "


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हंसती हुयी बुच्चिया ने पूनम का हाथ पकड़ के पिछवाड़े के दरवाजे से कदम रखा और सामने नजर पड़ी

दूल्हा सूरजु पर, चौके पे बैठे और बुच्चिया को देख के ऐसे बिहँसे, जैसे सूरज को देख के सूरजमुखी खिल जाए।

सूरजु को देखते हिये पूनमिया, बुच्ची को चिढ़ाते उसके कान में बोली, " देख ले सामने कौन बैठा है। अब तो तय हो गया न सबसे पहले किसका लौंड़ा लेगी तू छिनार "



"एकदम आज ही " हँसते हुए बुच्ची बोली, पर पूनम बड़ी भी थी समझदार भी, उसने फैसला दे दिया,

" आज नहीं अभी,… बस ये रस्म ख़तम हो जाए "
वाह चाचू ने याद तो बुच्ची की मम्मी को किया पर याद बुच्ची का पिछवाडा आया.

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उसकी मौसी भी बुच्ची को चुदवाना चाहती है. और बुच्ची के पिछवाड़े की तारीफ भी बहोत हुई.

पूनमीया भी बुच्ची को छेड़ने का मौका नहीं छोड़ रही. अपनी 5 दिन वाली छुट्टी के बदले अपने यारो को बुच्ची के हवाले करना चाहती है. वही बुच्ची को भी अब लग रहा है की उसे अब तक छिनार बन जाना चाहिए था. मज़ा आ गया कोमलजी.

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बुच्ची की माई

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" अरे गाँड़ मारने क इतना शौक है तो हमरे ननद क ननद, बुच्ची क माई आएँगी दो चार दिन में, तोहार बहिनिया, मारना उनकी गाँड़ हचा हच। अब ये मत कहना की अपनी बहिनिया की,.... बुच्ची की माई की नहीं लिए हो "

धक्के अब धीमे हो गए थे, आधे से ज्यादा खूंटा अंदर घुस गया था और ये नहीं था की चाचू ने मंझली मामी का पिछवाड़ा पहली बार मारा हो, और मामी भी मजे से चूतड़ हिला हिला के मोटे खूंटे का मजा ले रही थीं , चाचू भी नंबरी चोदू उन्होंने दो उँगलियाँ मंझली मामी की बुर में ठेल दी और दोनों ओर का मजा देते, मामी से बोले,

" देखो, सच बोलूं तो मैं क्या यह गाँव का कोई मर्द कसम नहीं खा सकता कि बुच्चिया का माई का नहीं लिया है। अरे बुच्चिया भी एकदम उसी की शक्ल पायी है, एक बार तो हम भी सोचे की ये का हो गया है, घडी की सुई का उलटी घूम गयी।

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जिस उमर की बुच्चिया हैm,,,, उस उमर तक तो हम उसकी माई की दर्जनो बार ले चुके थे, और इतने प्यार से देती थी, कभी कहीं बुला लो, गन्ने के खेत में, आम का अमराई में, अरहरिया में , मक्के के खेत में, खुद अपने हाथ से नाड़ा खोलती थी, खुद बिना कहे अपनी टांग उठाती थी ,"
पूनम ने कस के बुच्ची के चूतड़ में चिकोटी काटी जैसे कह रही हो , " सुनो और समझो, काहें अब तक आपन चुनमुनिया बचाय के रखी है, कुछ नहीं तो अपनी माई से सीखो :


चच्चू बुच्ची की माई की याद में खो गए थे,


लेकिन वो मामी की चाल समझ गए तो हंस के बोले,

" लेकिन हमार बहिनिया, बुच्ची क माई तो अभी है नहीं तो तुम ही मरवाओ "

और फिर दोनों जोबन कस के रडते मसलते क्या गाँड़ मारी चच्चू ने मझली मामी की,


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थोड़ी देर घोड़ी बना के मारने के बाद उन्हें खड़ी कर दिया और उस कुठरिया की दीवाल से चिपका के, खड़े खड़े ही मारने लगे, मामी का जोबन दीवाल से कुचला जा रहा था,, पिसा जा रहा था। लेकिन मजा दूना मिल रहा था,

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लेकिन हाँ बस दो चार दिन के लिए, निचोड़ लेना।

और दूसरी बात है, बुच्ची क माई नहीं है तो उनकी बिटिया तो है,…. लेने लायक तो वो भी हो गयी है , माँ नहीं तो बेटी सही "

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उनपर इस बात का क्या असर हुआ था , वो चच्चू के धक्के से पत्ता चला और पूनम ने कस के बुच्ची की बुलबुल दबोच ली जैसे बिन बोले कह रही हो देख तेरे कितने रसिया है।

" तू भी न , और आग लगाती है स्साली "

कस के चुम्मा लेते चच्चू बोले और अब तीन ऊँगली बुरिया में घुसेड़ दी, मामी झड़ने के कगार पे थी और फिर जोड़ा

"लेकिन बात छिनार सही कहती है, बिटिया एकदम माँ पे गयी है, ....वही रूप रंग बल्कि जोबन और जबरदंग हैं, नमक भी माँ से दुगना है, इस उमर में तो उसकी माँ ने पूरे बाईसपुरवा में कोई घर नहीं छोड़ा था।

मामी ने झड़ना शुरू कर दिया था, जोर जोर से सांस ले रही थीं, देह काँप रही थी, फिर जैसे ही थोड़ा थिर हुयी तो चच्चू को छेड़ा,

" अरे जबतक माँ नहीं है तो बेटी से काम चलाओ, और माँ आ जाये तो माँ बेटी साथ साथ , और तुम से न पटे तो मैं पटा दूंगी "


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यह सुन के या धक्क्को का असर, चच्चू एकदम मामी से चिपक गए और पूनम और बुच्ची ने देखा की बूँद बूँद कर के मामी के पिछवाड़े से बीर्य की धार रिस रही है। मलाई उनकी जांघ पे,
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लेकिन पुनम चालाक थी, बुच्ची से बोली, " अभी निकल चलो, उन लोगो के बाहर निकलने से पहले " और बुच्ची का हाथ पकड़ के एक दो तीन हो गयी।

बगल में भैंसे बंधी रहती थी, और पूनम बुच्ची को लेके वहीँ धंस गयी, और दोनों खिड़की से देख रही थीं की कैसे दीवाल का सहारा लेकर पहले मामी निकली और फिर चच्चू,। चच्चू बाहर के कुंए की ओर चले गए,

मंझली मामी किसी तरह सहारा लेकर रुकते हुए, गली की ओर मुड़ीं,



बुच्ची के कानों में मामी की बात गूँज रही थी।

क्या उसकी माई सच में, और अगर हाँ तो वही बेवकूफ है जो अबतक तोप ढांक के बैठी है और चच्चू उसकी कितनी तारीफ़ कर रहे थे, बुच्ची के जोबन तो उसके माई से भी जबरदंग हैं और नमक भी दूना,



तबतक अहिराने वाली पूनम ने बुच्ची का हाथ पकड़ के खींचा, वरना उसका पैर गोबर में पड़ जाता और बोली, "चल सब इन्तजार कर रहे होंगे "

और निकलते ही पूनम ने कस के बुच्ची के चूतड़ पे एक हाथ मारा और बोली, "सुन, शीलवा के,…"

लेकिन खिलखिलाते हुए बुच्ची ने बात काट दी और हंस के बोली, " दी, शीलवा क बात न करो, उसके एक एक यार का हिसाब मुझे मालूम है। सावन में मैं आयी थी तो पूरे महीने, चौकीदारी मैं ही करती थी और वो सब बेचारे इतना निहोरा करते थे शीला से, अरे अपनी सहेली की भी दिलवा दे, कुछ नहीं तो चुम्मा, या जोबन का ही रस ले लेने दे, सब के सब "

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" अरे तो दिया काहें नहीं, बेवकूफ, तेरा ननिहाल है कोई तेरा गाँव तो है नहीं जो स्साला तेरे पीछे पड़ जाएगा, या तेरी बदनामी करेगा। अरे बीस पच्चीस दिन बाद तू अपने गाँव वो अपने गाँव "

और चिढ़ाते हुए एक चांटा और जड़ा पूनम ने बुच्ची के चूतड़ पे।



बुच्ची भी यही सोच रही थी।

जो बात अभी चच्चू ने उसकी माई के बारे में कही थी, बुच्ची से साल भर छोटी थीं तभी पूरे गाँव का मन रख लिया था, किसी को मना नहीं करती थी। कल यही बात सूरजु भैया की माई कह रही थी तो बुच्ची ने सोचा ननद भौजाई का मजाक।

लेकिन अब जो ये बात चच्चू ने भी कही और पूनमिया ने भी सही बात कही, फिर वो एक साल से ज्यादा बड़ी है और कौन अपने गाँव में है। अपने ननिहाल में है, साल में एक दो बार आती है, तो किसके किसके आगे टांग फैलाई, उसके गाँव में किसी को क्या पता चलेगा।

तबतक बबुआने के दो लौंडे बगल के खेत से मेंड़ पे जा रहे थे, बुच्ची को देख के एक ने जोर से सीने पे हाथ मारा, और बोला,

" कबतक जवानी छुपाओगी रानी, कंवारों को कितना सताओगी रानी'

दूसरा ज्यादा साफ़ बोलने का हामी था, बोला, " अरे शीलवा से पूछ लो, दो पानी निकाल के उसका तब पानी छोड़ते हैं हम, तोहरो पोखर भर देब"

जवाब पूनमिया ने दिया, " अरे हमरी सहेली को का समझते हो, अकेले तुम सब का निचोड़ के रख देगी, तनी खाय पी के ताकत बनाओ तब आना इस के पास " और दोनों लड़कियां घर की ओर मुड़ गयीं। और पूनमिया ने बुच्ची से कहा,

" अरे यही मैं कह रही थी, शीलवा के बारे में, रोज दो चार लौंडो का कल्याण करती थी, तेरी सहेली। लेकिन अब उसकी पांच दिन की आज से छुट्टी शुरू हो गयी है, तो गाँव के कुल लौंडे उधिराये हैं। तो कईसन सहेली हो ? अरे कम से कम पांच दिन तो बेचारी के यारो का काम चलाओ।

" ठीक है है पूनम दीदी, अब जो लौण्डा सबसे पहले दिख गया न अब उसी का लौंड़ा घोंट लूंगी, कउनो न नखड़ा न छिनरपन, "


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हंसती हुयी बुच्चिया ने पूनम का हाथ पकड़ के पिछवाड़े के दरवाजे से कदम रखा और सामने नजर पड़ी

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सूरजु को देखते हिये पूनमिया, बुच्ची को चिढ़ाते उसके कान में बोली, " देख ले सामने कौन बैठा है। अब तो तय हो गया न सबसे पहले किसका लौंड़ा लेगी तू छिनार "



"एकदम आज ही " हँसते हुए बुच्ची बोली, पर पूनम बड़ी भी थी समझदार भी, उसने फैसला दे दिया,

" आज नहीं अभी,… बस ये रस्म ख़तम हो जाए "
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उसकी मौसी भी बुच्ची को चुदवाना चाहती है. और बुच्ची के पिछवाड़े की तारीफ भी बहोत हुई.

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komaalrani

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वाह कोमलजी मान गए. बुची ने तो छुटकी की कमी पूरी कर दी.

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स्टार्टिंग मे कैसे छुई मुई सी थी. पर अब असली खुरापाती हो गई. भोजाईयो ने उसे अशली छिनार बना ही दिया. भले तन से ना चुदी हो. पर मन से तो उसने डिसाइड कर ही लिया है. किसी को नहीं रोकेगी. अपनी मौसी कांति बुआ का मंज़ले मामा से सीन देख कर. और उन्हें भी फल खाना है तो बुची.... टीन फ़क ओल्डमैन.

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और अब पूनम ने उसे दूसरा कांड भी दिखा दिया. कैसे सूरजवा की मौसी चुन्नू चचा के साथ... मज़ा आ गया कोमलजी.


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आपको यहाँ देख कर कितनी ख़ुशी हुयी कह नहीं सकती, आप फोरम में वापस आगयी हैं इसका पता आपकी नयी कहानी साइको कविता से चल गया था लेकिन यह भी मालूम था की आप व्यस्त नहीं अतिव्यस्त हैं।

ऐसे में आप का आना और कहानी को पढ कर एक लम्बा सचित्र कमेंट देना पुराने दिनों की महक लौटा देता है।

कोशिश करिएगा, जब भी थोड़ा टाइम मिले इस आंगन में झाँक झूँक लीजियेगा

मैं यहीँ मिलूंगी, चौखट पर पथ निहारते, पलक पाँवडें बिछाये,

राह जोहते,
 
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Luckyloda

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Bhut shandaar tarike se likh rahi hai aap.....


मज़ा आ गया.....surju ke to... bahanchod itni variety ki kuwari chut milne wali hai usse... aur sabse badhke 10 Me padhne wali ..... jiske liye wo man लगाकर chudayi ki taiyari kar rha hai.....
 

pprsprs0

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग ११८ -रतजगे में धमाल
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मँजू भाभी बोल उठीं,

"इसीलिए कह रही हूँ बिन्नो, तुम सब भाईचोदों से... मेरी देवरानी के आने के पहले अपने भाई का, यानी दूल्हे का पूरा मज़ा ले लो!"

मुन्ना बहू तो हर बात एकदम खोलकर कहने में यकीन रखती थीं। वह बुच्ची को चिढ़ाते हुए बोलीं,

"अरे, तो हमरी ननदों को क्या समझे हो? बुच्चिया को खोल के देख लो, अभी तक बन्ना की मलाई बजबजा रही होगी! का हो बुच्ची,… भैया तोहार एक बार रगड़े कि दो बार?"

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और जिस तरह से बुच्ची शरमाई और उसके गाल सुर्ख लाल हुए, सब लोग ताड़ गए कि आज चिड़िया उड़ गई है और भरतपुर लूट चुका है!

लेकिन चुनिया ने बात सँभालने की कोशिश की और रुख गप्पू की ओर मोड़ दिया,

"अरे तो का हुआ, हमार सहेली आज अपने भाई का घोंटी है, तो कल हमरे भाई का घोंटेंगी। क्यों बुच्ची रानी?"

"और का! हमारी ननदों को समझती क्या हैं? अपने भाई और हमरे भाई में कोई भेद नहीं करतीं। और बुच्ची, खाली गप्पू का पप्पू लोगी, कि उसके दोस्त बेचारों का भी मन रखोगी?"

रामपुर वाली भौजी ने रस लेते हुए पूछ लिया। उनका सीधा निशाना बिट्टू की ओर था, जो बुच्ची के पीछे एकदम दीवाना था।

लेकिन जवाब सूरजु की ननिहाल की दूसरी भाभी, मंजू भाभी ने दिया, जो बुच्ची के बगल में ही बैठी थीं,

"अरे एकदम! कौन उसके लँड में काँटा लगा है? हमार बुच्ची हम सबके भाई का, भाई के दोस्त का, और दूल्हे के कुल ननिहाल वालों का लँड घोंटेंगी! जैसे उनकी माई अपनी भौजी के मायके वालों का मन रखती थीं, वैसे ये भी रखेंगी।"
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बुच्ची के ज़हन में दोपहर की वह बात ताज़ा हो गई, जब सूरजु भैया के मामा, उनकी बुआ कान्ति बुआ (जो बुच्ची की सगी बड़ी मौसी थीं) पर चढ़े गपागप चोद रहे थे और मस्ती में घोंटते हुए बुच्ची की माई का किस्सा सुना रहे थे—कि कैसे उनकी भाभी (सूरजु भैया की महतारी) के दोनों भाइयों ने उनकी छोटी बहन (बुच्ची की माई) की फाड़ी थी।

"सच में, बुच्चिया की माई के साथ बहुत मज़ा किए थे। दो दिन में छह बार हम दोनों भाई मिलकर पेले थे उसको!" सूरजु भैया के मामा बोल रहे थे।

"और गांड भी तो मारे थे!" पीछे से धक्का लगाते हुए सूरजु की बुआ बोलीं।

"तीन बार! दो बार हम और एक बार बड़के भैया।" सूरजु भैया के मामा ने जुगलबंदी पूरी की और याद करते हुए कहा, "और तब वह एकदम आज की बुच्चिया जैसी ही लगती थीं। वही शक्ल, वैसा ही गदराया जोबन! जैसे बुच्चिया को देख के लौंडों का लँड फनफना जाता है, एकदम वैसे ही!"

"लेकिन उमरिया में उससे पूरे चौदह महीने छोटी थी, जब तुम दोनों भाइयों का घोंटी थी!" कान्ति बुआ मदहोश होती हुई अपनी छोटी बहन का किस्सा सुनाती जा रही थीं।

लेकिन आज ननदों का पलड़ा भी भारी था।


वहाँ दो-चार बियाहता ननदें भी थीं, जिनमें सबसे आगे थी अहिराने की पूनम।

तो बुच्ची की तरफ़ से मोर्चा सँभालते हुए वह बोली:

"हे भौजी! लेकिन अपने गप्पू को एक बात समझा दीजिएगा। इस गाँव में लौंडेबाज़ भी बहुत हैं। कहीं हमरी छोट बहिन पर चढ़ने के लिए नेकर अपनी खोलें और पीछे से कोई लौंडेबाज़ धर के चाप दिया, तो अइसन हचक के भैया के सार की गांड मारी जाएगी कि चार दिन दोनों बहनें मिलकर अपने भैया के पिछवाड़े में मलहम लगाओगी!"
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अब तो सब लड़कियाँ इतनी ज़ोर से खिलखिलाकर हँसीं कि पूछो मत।

बुच्ची के साथ हल्ला मचाने में सिर्फ़ गाँव की सईदा, लीला, सुनीता और रंजीता ही नहीं थीं; ननिहाल वाली सूरजु की मौसेरी-ममेरी बहनें—रमा, संध्या, सोना, दीपा और आज दोपहर के बाद आई एकदम कच्ची उमरिया वाली सुशीला चाची की बुच्ची से भी छोटी, सबसे कम उम्र वाली मीना और चंदौली वाली की बेटी रीना भी ताली बजा-बजाकर हँस रही थीं।

मीना बोली,

"भाभी, हमारी पूनम दीदी एकदम सही कह रही हैं। हम लोगों के पीछे पड़ने से पहले अपने भाइयों से बोलिएगा कि अपना पिछवाड़ा बचा के रखें!"
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"अरे, बेचारों की बहनों का पिछवाड़ा तो बचता नहीं, तो वो अपना पिछवाड़ा क्या बचाएँगे? इस गाँव में जब गौने उतरती हैं, तो हफ्ते भर के अंदर गोल छेद में भी बाँस घुस ही जाता है!"

पूनम की पक्की सहेली और दूसरी बियाहता ननद, चननिया ने चुटकी ली और बगल में बैठी एक भौजी से पूछा,

"का भौजी, तोहार पिछवाड़े वाला बाजा गौने उतरने के कितने दिन के अंदर बज गया था?"

और अब जब गाँव की लड़कियाँ पूरे जोश में आ गईं, तो कान्ति बुआ भी तो इसी गाँव की बेटी थीं। वह अपनी भौजाई को कैसे छोड़तीं? उन्होंने दूल्हे की माई की ओर इशारा करके कहा,

"अरे, तोहार सब की भौजाई का तो हफ्ता भर में... पर हमार ये जो भौजाई बैठी हैं, दूल्हे की माई, इनसे पूछ लो! चौथी की रात को कितनी बार इनकी गांड मारी गई थी? चौथी लेकर जब इनके दोनों भाई आए थे, तो इनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। हम और बुच्चिया की माई (फिर मीना की ओर इशारा करके बोलीं) तेरी ही उमरिया की रही होगी बुच्चिया की माई... हम दोनों बहनिया भौजी को पकड़ के किसी तरह खड़ा किए थे, जैसे गांड में कोई लकड़ी का पच्चड़ ठोंक दिया हो! और वहीं सूरजु के दोनों मामा लोगों के सामने, इनके पिछवाड़े से बड़ा सा मलाई का थक्का सरक के नीचे गिरा था!"
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बात कान्ति बुआ की एकदम सच थी, लेकिन उसके पीछे खुद उनका और सूरजु के बाबू की भौजाइयों का भी हाथ था।

यहाँ तक कि सूरजु की माई की सास ने भी एकदम चढ़ाकर समझा-बुझा दिया था—

'अरे, गौने के चौथे दिन तो दुलहिनिया के पिछवाड़े का दिन होता है। उस दिन तो बुरिया की ओर देखना भी मत! हाँ, जितनी ताकत हो उतनी लगाना, भले चिचियाने देना, पर मन भर के गांड मारना!'

और हुआ भी यही था। सूरजु के बाबू ने जब उन्हें निहुराया, तो वह समझीं कि रोज़ की तरह गुलाबो में बाँस घुसेगा। घुसा भी, लेकिन थोड़ी देर में निकालकर सूरजु के बाबू ने गांड में पेल दिया—और दो-चार बार नहीं, पूरे छह बार!
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गाँव की बहुओं को भी सास की रगड़ाई का यही मौका मिलता है।

तो पूरब पट्टी की एक नई आई बहू ने अपनी सास जैसी दूल्हे की माई की ओर देखा और उन्हें चिढ़ाते हुए बोली:

"अरे, तो हमरे देवर को क्या समझती हैं? वह अपने बाबू से बीस नहीं, बाईस हैं! यह तो तय ही हो गया है कि परसों आम के बाग़ में मटमंगरा में आप हमरे देवर का हम सबके सामने घोंटिएगा, तो ज़रा बेचारे हमारे देवर को अपने चूतड़ का भी मज़ा चखा दीजिएगा! उनके बाबू, फूफा, मौसा, चाचा और जिससे-जिससे गांड मरवाई होंगी, सब भूल जाएँगी!"

"अरे, बहनचोद तो इस गाँव के कुल मरद हैं! असली मर्द तो वो है जो स्साला मादरचोद हो, और सबके सामने हो!"

पीछे से किसी अहिराने वाली बहू ने आवाज़ लगाई।

सूरजु की माई अब उतना शरमा रही थीं, जितना बुच्ची भी नहीं शरमाई थी जब मुन्ना बहू, मँजू भाभी और कुल भरौटी वाली भौजाइयों ने खुलकर उसकी चुदाई का हाल पूछा था। बात बदलने के लिए वह बोलीं,
“”

"अरे, तो हमरी ननदों को क्या समझे हो? बुच्चिया को खोल के देख लो, अभी तक बन्ना की मलाई बजबजा रही होगी! का हो बुच्ची,… भैया तोहार एक बार रगड़े कि दो बार?"

“”
Wooow🔥🔥🔥
 
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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग ११८ -रतजगे में धमाल
33,31,310
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मँजू भाभी बोल उठीं,

"इसीलिए कह रही हूँ बिन्नो, तुम सब भाईचोदों से... मेरी देवरानी के आने के पहले अपने भाई का, यानी दूल्हे का पूरा मज़ा ले लो!"

मुन्ना बहू तो हर बात एकदम खोलकर कहने में यकीन रखती थीं। वह बुच्ची को चिढ़ाते हुए बोलीं,

"अरे, तो हमरी ननदों को क्या समझे हो? बुच्चिया को खोल के देख लो, अभी तक बन्ना की मलाई बजबजा रही होगी! का हो बुच्ची,… भैया तोहार एक बार रगड़े कि दो बार?"

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और जिस तरह से बुच्ची शरमाई और उसके गाल सुर्ख लाल हुए, सब लोग ताड़ गए कि आज चिड़िया उड़ गई है और भरतपुर लूट चुका है!

लेकिन चुनिया ने बात सँभालने की कोशिश की और रुख गप्पू की ओर मोड़ दिया,

"अरे तो का हुआ, हमार सहेली आज अपने भाई का घोंटी है, तो कल हमरे भाई का घोंटेंगी। क्यों बुच्ची रानी?"

"और का! हमारी ननदों को समझती क्या हैं? अपने भाई और हमरे भाई में कोई भेद नहीं करतीं। और बुच्ची, खाली गप्पू का पप्पू लोगी, कि उसके दोस्त बेचारों का भी मन रखोगी?"

रामपुर वाली भौजी ने रस लेते हुए पूछ लिया। उनका सीधा निशाना बिट्टू की ओर था, जो बुच्ची के पीछे एकदम दीवाना था।

लेकिन जवाब सूरजु की ननिहाल की दूसरी भाभी, मंजू भाभी ने दिया, जो बुच्ची के बगल में ही बैठी थीं,

"अरे एकदम! कौन उसके लँड में काँटा लगा है? हमार बुच्ची हम सबके भाई का, भाई के दोस्त का, और दूल्हे के कुल ननिहाल वालों का लँड घोंटेंगी! जैसे उनकी माई अपनी भौजी के मायके वालों का मन रखती थीं, वैसे ये भी रखेंगी।"
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बुच्ची के ज़हन में दोपहर की वह बात ताज़ा हो गई, जब सूरजु भैया के मामा, उनकी बुआ कान्ति बुआ (जो बुच्ची की सगी बड़ी मौसी थीं) पर चढ़े गपागप चोद रहे थे और मस्ती में घोंटते हुए बुच्ची की माई का किस्सा सुना रहे थे—कि कैसे उनकी भाभी (सूरजु भैया की महतारी) के दोनों भाइयों ने उनकी छोटी बहन (बुच्ची की माई) की फाड़ी थी।

"सच में, बुच्चिया की माई के साथ बहुत मज़ा किए थे। दो दिन में छह बार हम दोनों भाई मिलकर पेले थे उसको!" सूरजु भैया के मामा बोल रहे थे।

"और गांड भी तो मारे थे!" पीछे से धक्का लगाते हुए सूरजु की बुआ बोलीं।

"तीन बार! दो बार हम और एक बार बड़के भैया।" सूरजु भैया के मामा ने जुगलबंदी पूरी की और याद करते हुए कहा, "और तब वह एकदम आज की बुच्चिया जैसी ही लगती थीं। वही शक्ल, वैसा ही गदराया जोबन! जैसे बुच्चिया को देख के लौंडों का लँड फनफना जाता है, एकदम वैसे ही!"

"लेकिन उमरिया में उससे पूरे चौदह महीने छोटी थी, जब तुम दोनों भाइयों का घोंटी थी!" कान्ति बुआ मदहोश होती हुई अपनी छोटी बहन का किस्सा सुनाती जा रही थीं।

लेकिन आज ननदों का पलड़ा भी भारी था।


वहाँ दो-चार बियाहता ननदें भी थीं, जिनमें सबसे आगे थी अहिराने की पूनम।

तो बुच्ची की तरफ़ से मोर्चा सँभालते हुए वह बोली:

"हे भौजी! लेकिन अपने गप्पू को एक बात समझा दीजिएगा। इस गाँव में लौंडेबाज़ भी बहुत हैं। कहीं हमरी छोट बहिन पर चढ़ने के लिए नेकर अपनी खोलें और पीछे से कोई लौंडेबाज़ धर के चाप दिया, तो अइसन हचक के भैया के सार की गांड मारी जाएगी कि चार दिन दोनों बहनें मिलकर अपने भैया के पिछवाड़े में मलहम लगाओगी!"
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अब तो सब लड़कियाँ इतनी ज़ोर से खिलखिलाकर हँसीं कि पूछो मत।

बुच्ची के साथ हल्ला मचाने में सिर्फ़ गाँव की सईदा, लीला, सुनीता और रंजीता ही नहीं थीं; ननिहाल वाली सूरजु की मौसेरी-ममेरी बहनें—रमा, संध्या, सोना, दीपा और आज दोपहर के बाद आई एकदम कच्ची उमरिया वाली सुशीला चाची की बुच्ची से भी छोटी, सबसे कम उम्र वाली मीना और चंदौली वाली की बेटी रीना भी ताली बजा-बजाकर हँस रही थीं।

मीना बोली,

"भाभी, हमारी पूनम दीदी एकदम सही कह रही हैं। हम लोगों के पीछे पड़ने से पहले अपने भाइयों से बोलिएगा कि अपना पिछवाड़ा बचा के रखें!"
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"अरे, बेचारों की बहनों का पिछवाड़ा तो बचता नहीं, तो वो अपना पिछवाड़ा क्या बचाएँगे? इस गाँव में जब गौने उतरती हैं, तो हफ्ते भर के अंदर गोल छेद में भी बाँस घुस ही जाता है!"

पूनम की पक्की सहेली और दूसरी बियाहता ननद, चननिया ने चुटकी ली और बगल में बैठी एक भौजी से पूछा,

"का भौजी, तोहार पिछवाड़े वाला बाजा गौने उतरने के कितने दिन के अंदर बज गया था?"

और अब जब गाँव की लड़कियाँ पूरे जोश में आ गईं, तो कान्ति बुआ भी तो इसी गाँव की बेटी थीं। वह अपनी भौजाई को कैसे छोड़तीं? उन्होंने दूल्हे की माई की ओर इशारा करके कहा,

"अरे, तोहार सब की भौजाई का तो हफ्ता भर में... पर हमार ये जो भौजाई बैठी हैं, दूल्हे की माई, इनसे पूछ लो! चौथी की रात को कितनी बार इनकी गांड मारी गई थी? चौथी लेकर जब इनके दोनों भाई आए थे, तो इनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। हम और बुच्चिया की माई (फिर मीना की ओर इशारा करके बोलीं) तेरी ही उमरिया की रही होगी बुच्चिया की माई... हम दोनों बहनिया भौजी को पकड़ के किसी तरह खड़ा किए थे, जैसे गांड में कोई लकड़ी का पच्चड़ ठोंक दिया हो! और वहीं सूरजु के दोनों मामा लोगों के सामने, इनके पिछवाड़े से बड़ा सा मलाई का थक्का सरक के नीचे गिरा था!"
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बात कान्ति बुआ की एकदम सच थी, लेकिन उसके पीछे खुद उनका और सूरजु के बाबू की भौजाइयों का भी हाथ था।

यहाँ तक कि सूरजु की माई की सास ने भी एकदम चढ़ाकर समझा-बुझा दिया था—

'अरे, गौने के चौथे दिन तो दुलहिनिया के पिछवाड़े का दिन होता है। उस दिन तो बुरिया की ओर देखना भी मत! हाँ, जितनी ताकत हो उतनी लगाना, भले चिचियाने देना, पर मन भर के गांड मारना!'

और हुआ भी यही था। सूरजु के बाबू ने जब उन्हें निहुराया, तो वह समझीं कि रोज़ की तरह गुलाबो में बाँस घुसेगा। घुसा भी, लेकिन थोड़ी देर में निकालकर सूरजु के बाबू ने गांड में पेल दिया—और दो-चार बार नहीं, पूरे छह बार!
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गाँव की बहुओं को भी सास की रगड़ाई का यही मौका मिलता है।

तो पूरब पट्टी की एक नई आई बहू ने अपनी सास जैसी दूल्हे की माई की ओर देखा और उन्हें चिढ़ाते हुए बोली:

"अरे, तो हमरे देवर को क्या समझती हैं? वह अपने बाबू से बीस नहीं, बाईस हैं! यह तो तय ही हो गया है कि परसों आम के बाग़ में मटमंगरा में आप हमरे देवर का हम सबके सामने घोंटिएगा, तो ज़रा बेचारे हमारे देवर को अपने चूतड़ का भी मज़ा चखा दीजिएगा! उनके बाबू, फूफा, मौसा, चाचा और जिससे-जिससे गांड मरवाई होंगी, सब भूल जाएँगी!"

"अरे, बहनचोद तो इस गाँव के कुल मरद हैं! असली मर्द तो वो है जो स्साला मादरचोद हो, और सबके सामने हो!"

पीछे से किसी अहिराने वाली बहू ने आवाज़ लगाई।

सूरजु की माई अब उतना शरमा रही थीं, जितना बुच्ची भी नहीं शरमाई थी जब मुन्ना बहू, मँजू भाभी और कुल भरौटी वाली भौजाइयों ने खुलकर उसकी चुदाई का हाल पूछा था। बात बदलने के लिए वह बोलीं,


"अरे एकदम! कौन उसके लँड में काँटा लगा है? हमार बुच्ची हम सबके भाई का, भाई के दोस्त का, और दूल्हे के कुल ननिहाल वालों का लँड घोंटेंगी! जैसे उनकी माई अपनी भौजी के मायके वालों का मन रखती थीं, वैसे ये भी रखेंगी।"


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मँजू भाभी बोल उठीं,

"इसीलिए कह रही हूँ बिन्नो, तुम सब भाईचोदों से... मेरी देवरानी के आने के पहले अपने भाई का, यानी दूल्हे का पूरा मज़ा ले लो!"

मुन्ना बहू तो हर बात एकदम खोलकर कहने में यकीन रखती थीं। वह बुच्ची को चिढ़ाते हुए बोलीं,

"अरे, तो हमरी ननदों को क्या समझे हो? बुच्चिया को खोल के देख लो, अभी तक बन्ना की मलाई बजबजा रही होगी! का हो बुच्ची,… भैया तोहार एक बार रगड़े कि दो बार?"

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"अरे तो का हुआ, हमार सहेली आज अपने भाई का घोंटी है, तो कल हमरे भाई का घोंटेंगी। क्यों बुच्ची रानी?"

"और का! हमारी ननदों को समझती क्या हैं? अपने भाई और हमरे भाई में कोई भेद नहीं करतीं। और बुच्ची, खाली गप्पू का पप्पू लोगी, कि उसके दोस्त बेचारों का भी मन रखोगी?"

रामपुर वाली भौजी ने रस लेते हुए पूछ लिया। उनका सीधा निशाना बिट्टू की ओर था, जो बुच्ची के पीछे एकदम दीवाना था।

लेकिन जवाब सूरजु की ननिहाल की दूसरी भाभी, मंजू भाभी ने दिया, जो बुच्ची के बगल में ही बैठी थीं,

"अरे एकदम! कौन उसके लँड में काँटा लगा है? हमार बुच्ची हम सबके भाई का, भाई के दोस्त का, और दूल्हे के कुल ननिहाल वालों का लँड घोंटेंगी! जैसे उनकी माई अपनी भौजी के मायके वालों का मन रखती थीं, वैसे ये भी रखेंगी।"
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"सच में, बुच्चिया की माई के साथ बहुत मज़ा किए थे। दो दिन में छह बार हम दोनों भाई मिलकर पेले थे उसको!" सूरजु भैया के मामा बोल रहे थे।

"और गांड भी तो मारे थे!" पीछे से धक्का लगाते हुए सूरजु की बुआ बोलीं।

"तीन बार! दो बार हम और एक बार बड़के भैया।" सूरजु भैया के मामा ने जुगलबंदी पूरी की और याद करते हुए कहा, "और तब वह एकदम आज की बुच्चिया जैसी ही लगती थीं। वही शक्ल, वैसा ही गदराया जोबन! जैसे बुच्चिया को देख के लौंडों का लँड फनफना जाता है, एकदम वैसे ही!"

"लेकिन उमरिया में उससे पूरे चौदह महीने छोटी थी, जब तुम दोनों भाइयों का घोंटी थी!" कान्ति बुआ मदहोश होती हुई अपनी छोटी बहन का किस्सा सुनाती जा रही थीं।

लेकिन आज ननदों का पलड़ा भी भारी था।


वहाँ दो-चार बियाहता ननदें भी थीं, जिनमें सबसे आगे थी अहिराने की पूनम।

तो बुच्ची की तरफ़ से मोर्चा सँभालते हुए वह बोली:

"हे भौजी! लेकिन अपने गप्पू को एक बात समझा दीजिएगा। इस गाँव में लौंडेबाज़ भी बहुत हैं। कहीं हमरी छोट बहिन पर चढ़ने के लिए नेकर अपनी खोलें और पीछे से कोई लौंडेबाज़ धर के चाप दिया, तो अइसन हचक के भैया के सार की गांड मारी जाएगी कि चार दिन दोनों बहनें मिलकर अपने भैया के पिछवाड़े में मलहम लगाओगी!"
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अब तो सब लड़कियाँ इतनी ज़ोर से खिलखिलाकर हँसीं कि पूछो मत।

बुच्ची के साथ हल्ला मचाने में सिर्फ़ गाँव की सईदा, लीला, सुनीता और रंजीता ही नहीं थीं; ननिहाल वाली सूरजु की मौसेरी-ममेरी बहनें—रमा, संध्या, सोना, दीपा और आज दोपहर के बाद आई एकदम कच्ची उमरिया वाली सुशीला चाची की बुच्ची से भी छोटी, सबसे कम उम्र वाली मीना और चंदौली वाली की बेटी रीना भी ताली बजा-बजाकर हँस रही थीं।

मीना बोली,

"भाभी, हमारी पूनम दीदी एकदम सही कह रही हैं। हम लोगों के पीछे पड़ने से पहले अपने भाइयों से बोलिएगा कि अपना पिछवाड़ा बचा के रखें!"
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"अरे, बेचारों की बहनों का पिछवाड़ा तो बचता नहीं, तो वो अपना पिछवाड़ा क्या बचाएँगे? इस गाँव में जब गौने उतरती हैं, तो हफ्ते भर के अंदर गोल छेद में भी बाँस घुस ही जाता है!"

पूनम की पक्की सहेली और दूसरी बियाहता ननद, चननिया ने चुटकी ली और बगल में बैठी एक भौजी से पूछा,

"का भौजी, तोहार पिछवाड़े वाला बाजा गौने उतरने के कितने दिन के अंदर बज गया था?"

और अब जब गाँव की लड़कियाँ पूरे जोश में आ गईं, तो कान्ति बुआ भी तो इसी गाँव की बेटी थीं। वह अपनी भौजाई को कैसे छोड़तीं? उन्होंने दूल्हे की माई की ओर इशारा करके कहा,

"अरे, तोहार सब की भौजाई का तो हफ्ता भर में... पर हमार ये जो भौजाई बैठी हैं, दूल्हे की माई, इनसे पूछ लो! चौथी की रात को कितनी बार इनकी गांड मारी गई थी? चौथी लेकर जब इनके दोनों भाई आए थे, तो इनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। हम और बुच्चिया की माई (फिर मीना की ओर इशारा करके बोलीं) तेरी ही उमरिया की रही होगी बुच्चिया की माई... हम दोनों बहनिया भौजी को पकड़ के किसी तरह खड़ा किए थे, जैसे गांड में कोई लकड़ी का पच्चड़ ठोंक दिया हो! और वहीं सूरजु के दोनों मामा लोगों के सामने, इनके पिछवाड़े से बड़ा सा मलाई का थक्का सरक के नीचे गिरा था!"
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बात कान्ति बुआ की एकदम सच थी, लेकिन उसके पीछे खुद उनका और सूरजु के बाबू की भौजाइयों का भी हाथ था।

यहाँ तक कि सूरजु की माई की सास ने भी एकदम चढ़ाकर समझा-बुझा दिया था—

'अरे, गौने के चौथे दिन तो दुलहिनिया के पिछवाड़े का दिन होता है। उस दिन तो बुरिया की ओर देखना भी मत! हाँ, जितनी ताकत हो उतनी लगाना, भले चिचियाने देना, पर मन भर के गांड मारना!'

और हुआ भी यही था। सूरजु के बाबू ने जब उन्हें निहुराया, तो वह समझीं कि रोज़ की तरह गुलाबो में बाँस घुसेगा। घुसा भी, लेकिन थोड़ी देर में निकालकर सूरजु के बाबू ने गांड में पेल दिया—और दो-चार बार नहीं, पूरे छह बार!
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गाँव की बहुओं को भी सास की रगड़ाई का यही मौका मिलता है।

तो पूरब पट्टी की एक नई आई बहू ने अपनी सास जैसी दूल्हे की माई की ओर देखा और उन्हें चिढ़ाते हुए बोली:

"अरे, तो हमरे देवर को क्या समझती हैं? वह अपने बाबू से बीस नहीं, बाईस हैं! यह तो तय ही हो गया है कि परसों आम के बाग़ में मटमंगरा में आप हमरे देवर का हम सबके सामने घोंटिएगा, तो ज़रा बेचारे हमारे देवर को अपने चूतड़ का भी मज़ा चखा दीजिएगा! उनके बाबू, फूफा, मौसा, चाचा और जिससे-जिससे गांड मरवाई होंगी, सब भूल जाएँगी!"

"अरे, बहनचोद तो इस गाँव के कुल मरद हैं! असली मर्द तो वो है जो स्साला मादरचोद हो, और सबके सामने हो!"

पीछे से किसी अहिराने वाली बहू ने आवाज़ लगाई।

सूरजु की माई अब उतना शरमा रही थीं, जितना बुच्ची भी नहीं शरमाई थी जब मुन्ना बहू, मँजू भाभी और कुल भरौटी वाली भौजाइयों ने खुलकर उसकी चुदाई का हाल पूछा था। बात बदलने के लिए वह बोलीं,

"हे भौजी! लेकिन अपने गप्पू को एक बात समझा दीजिएगा। इस गाँव में लौंडेबाज़ भी बहुत हैं। कहीं हमरी छोट बहिन पर चढ़ने के लिए नेकर अपनी खोलें और पीछे से कोई लौंडेबाज़ धर के चाप दिया, तो अइसन हचक के भैया के सार की गांड मारी जाएगी कि चार दिन दोनों बहनें मिलकर अपने भैया के पिछवाड़े में मलहम लगाओगी!"

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