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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

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komaalrani

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग १२० -- अगला दिन - बुच्ची का दिन पृष्ठ १२५४

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग ११८ -रतजगे में धमाल
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मँजू भाभी बोल उठीं,

"इसीलिए कह रही हूँ बिन्नो, तुम सब भाईचोदों से... मेरी देवरानी के आने के पहले अपने भाई का, यानी दूल्हे का पूरा मज़ा ले लो!"

मुन्ना बहू तो हर बात एकदम खोलकर कहने में यकीन रखती थीं। वह बुच्ची को चिढ़ाते हुए बोलीं,

"अरे, तो हमरी ननदों को क्या समझे हो? बुच्चिया को खोल के देख लो, अभी तक बन्ना की मलाई बजबजा रही होगी! का हो बुच्ची,… भैया तोहार एक बार रगड़े कि दो बार?"

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और जिस तरह से बुच्ची शरमाई और उसके गाल सुर्ख लाल हुए, सब लोग ताड़ गए कि आज चिड़िया उड़ गई है और भरतपुर लूट चुका है!

लेकिन चुनिया ने बात सँभालने की कोशिश की और रुख गप्पू की ओर मोड़ दिया,

"अरे तो का हुआ, हमार सहेली आज अपने भाई का घोंटी है, तो कल हमरे भाई का घोंटेंगी। क्यों बुच्ची रानी?"

"और का! हमारी ननदों को समझती क्या हैं? अपने भाई और हमरे भाई में कोई भेद नहीं करतीं। और बुच्ची, खाली गप्पू का पप्पू लोगी, कि उसके दोस्त बेचारों का भी मन रखोगी?"

रामपुर वाली भौजी ने रस लेते हुए पूछ लिया। उनका सीधा निशाना बिट्टू की ओर था, जो बुच्ची के पीछे एकदम दीवाना था।

लेकिन जवाब सूरजु की ननिहाल की दूसरी भाभी, मंजू भाभी ने दिया, जो बुच्ची के बगल में ही बैठी थीं,

"अरे एकदम! कौन उसके लँड में काँटा लगा है? हमार बुच्ची हम सबके भाई का, भाई के दोस्त का, और दूल्हे के कुल ननिहाल वालों का लँड घोंटेंगी! जैसे उनकी माई अपनी भौजी के मायके वालों का मन रखती थीं, वैसे ये भी रखेंगी।"
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बुच्ची के ज़हन में दोपहर की वह बात ताज़ा हो गई, जब सूरजु भैया के मामा, उनकी बुआ कान्ति बुआ (जो बुच्ची की सगी बड़ी मौसी थीं) पर चढ़े गपागप चोद रहे थे और मस्ती में घोंटते हुए बुच्ची की माई का किस्सा सुना रहे थे—कि कैसे उनकी भाभी (सूरजु भैया की महतारी) के दोनों भाइयों ने उनकी छोटी बहन (बुच्ची की माई) की फाड़ी थी।

"सच में, बुच्चिया की माई के साथ बहुत मज़ा किए थे। दो दिन में छह बार हम दोनों भाई मिलकर पेले थे उसको!" सूरजु भैया के मामा बोल रहे थे।

"और गांड भी तो मारे थे!" पीछे से धक्का लगाते हुए सूरजु की बुआ बोलीं।

"तीन बार! दो बार हम और एक बार बड़के भैया।" सूरजु भैया के मामा ने जुगलबंदी पूरी की और याद करते हुए कहा, "और तब वह एकदम आज की बुच्चिया जैसी ही लगती थीं। वही शक्ल, वैसा ही गदराया जोबन! जैसे बुच्चिया को देख के लौंडों का लँड फनफना जाता है, एकदम वैसे ही!"

"लेकिन उमरिया में उससे पूरे चौदह महीने छोटी थी, जब तुम दोनों भाइयों का घोंटी थी!" कान्ति बुआ मदहोश होती हुई अपनी छोटी बहन का किस्सा सुनाती जा रही थीं।

लेकिन आज ननदों का पलड़ा भी भारी था।


वहाँ दो-चार बियाहता ननदें भी थीं, जिनमें सबसे आगे थी अहिराने की पूनम।

तो बुच्ची की तरफ़ से मोर्चा सँभालते हुए वह बोली:

"हे भौजी! लेकिन अपने गप्पू को एक बात समझा दीजिएगा। इस गाँव में लौंडेबाज़ भी बहुत हैं। कहीं हमरी छोट बहिन पर चढ़ने के लिए नेकर अपनी खोलें और पीछे से कोई लौंडेबाज़ धर के चाप दिया, तो अइसन हचक के भैया के सार की गांड मारी जाएगी कि चार दिन दोनों बहनें मिलकर अपने भैया के पिछवाड़े में मलहम लगाओगी!"
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अब तो सब लड़कियाँ इतनी ज़ोर से खिलखिलाकर हँसीं कि पूछो मत।

बुच्ची के साथ हल्ला मचाने में सिर्फ़ गाँव की सईदा, लीला, सुनीता और रंजीता ही नहीं थीं; ननिहाल वाली सूरजु की मौसेरी-ममेरी बहनें—रमा, संध्या, सोना, दीपा और आज दोपहर के बाद आई एकदम कच्ची उमरिया वाली सुशीला चाची की बुच्ची से भी छोटी, सबसे कम उम्र वाली मीना और चंदौली वाली की बेटी रीना भी ताली बजा-बजाकर हँस रही थीं।

मीना बोली,

"भाभी, हमारी पूनम दीदी एकदम सही कह रही हैं। हम लोगों के पीछे पड़ने से पहले अपने भाइयों से बोलिएगा कि अपना पिछवाड़ा बचा के रखें!"
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"अरे, बेचारों की बहनों का पिछवाड़ा तो बचता नहीं, तो वो अपना पिछवाड़ा क्या बचाएँगे? इस गाँव में जब गौने उतरती हैं, तो हफ्ते भर के अंदर गोल छेद में भी बाँस घुस ही जाता है!"

पूनम की पक्की सहेली और दूसरी बियाहता ननद, चननिया ने चुटकी ली और बगल में बैठी एक भौजी से पूछा,

"का भौजी, तोहार पिछवाड़े वाला बाजा गौने उतरने के कितने दिन के अंदर बज गया था?"

और अब जब गाँव की लड़कियाँ पूरे जोश में आ गईं, तो कान्ति बुआ भी तो इसी गाँव की बेटी थीं। वह अपनी भौजाई को कैसे छोड़तीं? उन्होंने दूल्हे की माई की ओर इशारा करके कहा,

"अरे, तोहार सब की भौजाई का तो हफ्ता भर में... पर हमार ये जो भौजाई बैठी हैं, दूल्हे की माई, इनसे पूछ लो! चौथी की रात को कितनी बार इनकी गांड मारी गई थी? चौथी लेकर जब इनके दोनों भाई आए थे, तो इनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। हम और बुच्चिया की माई (फिर मीना की ओर इशारा करके बोलीं) तेरी ही उमरिया की रही होगी बुच्चिया की माई... हम दोनों बहनिया भौजी को पकड़ के किसी तरह खड़ा किए थे, जैसे गांड में कोई लकड़ी का पच्चड़ ठोंक दिया हो! और वहीं सूरजु के दोनों मामा लोगों के सामने, इनके पिछवाड़े से बड़ा सा मलाई का थक्का सरक के नीचे गिरा था!"
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बात कान्ति बुआ की एकदम सच थी, लेकिन उसके पीछे खुद उनका और सूरजु के बाबू की भौजाइयों का भी हाथ था।

यहाँ तक कि सूरजु की माई की सास ने भी एकदम चढ़ाकर समझा-बुझा दिया था—

'अरे, गौने के चौथे दिन तो दुलहिनिया के पिछवाड़े का दिन होता है। उस दिन तो बुरिया की ओर देखना भी मत! हाँ, जितनी ताकत हो उतनी लगाना, भले चिचियाने देना, पर मन भर के गांड मारना!'

और हुआ भी यही था। सूरजु के बाबू ने जब उन्हें निहुराया, तो वह समझीं कि रोज़ की तरह गुलाबो में बाँस घुसेगा। घुसा भी, लेकिन थोड़ी देर में निकालकर सूरजु के बाबू ने गांड में पेल दिया—और दो-चार बार नहीं, पूरे छह बार!
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गाँव की बहुओं को भी सास की रगड़ाई का यही मौका मिलता है।

तो पूरब पट्टी की एक नई आई बहू ने अपनी सास जैसी दूल्हे की माई की ओर देखा और उन्हें चिढ़ाते हुए बोली:

"अरे, तो हमरे देवर को क्या समझती हैं? वह अपने बाबू से बीस नहीं, बाईस हैं! यह तो तय ही हो गया है कि परसों आम के बाग़ में मटमंगरा में आप हमरे देवर का हम सबके सामने घोंटिएगा, तो ज़रा बेचारे हमारे देवर को अपने चूतड़ का भी मज़ा चखा दीजिएगा! उनके बाबू, फूफा, मौसा, चाचा और जिससे-जिससे गांड मरवाई होंगी, सब भूल जाएँगी!"

"अरे, बहनचोद तो इस गाँव के कुल मरद हैं! असली मर्द तो वो है जो स्साला मादरचोद हो, और सबके सामने हो!"

पीछे से किसी अहिराने वाली बहू ने आवाज़ लगाई।

सूरजु की माई अब उतना शरमा रही थीं, जितना बुच्ची भी नहीं शरमाई थी जब मुन्ना बहू, मँजू भाभी और कुल भरौटी वाली भौजाइयों ने खुलकर उसकी चुदाई का हाल पूछा था। बात बदलने के लिए वह बोलीं,
 
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komaalrani

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मीना -रीना
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"तुम सब खाली चकर-चकर बतिया रही हो! अरे, शादी-ब्याह का घर है, कुछ नाच-वाच ना होई? अरे, दूल्हे की दर्जन भर बहनें बैठी हैं, ? चलो, बाँधो पैर में घुँघरू!"

कल की बुच्ची और चुनिया के नाच की आज दिन भर तारीफ़ हुई थी।

लेकिन एक तो बुच्ची को इतना कसकर, रगड़कर और निहुराकर सूरजु ने चोदा था कि उसकी टाँगें मुश्किल से ज़मीन पर पड़ रही थीं।

फिर मीना और रीना ने पहले ही कह दिया था कि आज वे डांस करेंगी। भैया की शादी में डांस के लिए वे दोनों बम्बई-लखनऊ से पूरी तैयारी करके आई थीं, और मीना ने तो बकायदा डांस का कोर्स भी कर रखा था।

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लेकिन पूनम दीदी ने साफ़ बोल दिया,

"मीना यार, फ़िल्मी गानों पे गाँव की शादी में डांस नहीं होता। यहाँ तो जितनी खुलकर मस्ती हो, उतना ही मज़ा है।"

मीना के सामने ही उसकी माँ, सुशीला चाची ने अपनी ननद कान्ति बुआ के पेटीकोट का नाड़ा खोला नहीं, बल्कि तोड़ दिया था और हाथ डालकर सीधे उनकी बिलिया पे हल्दी लगाई थी। तो समझ तो वह भी गई थी।

वैसे भी, शादी-ब्याह के घर में ऐसी कच्ची कलियों को सिखाने वाले बहुत होते हैं, और गाँव में रसीली भाभियों की कोई कमी नहीं थी।

मीना अभी कुछ दिन पहले ही दर्जा नौ में गई थी। चेहरा इतना भोला कि लगे अभी दूध के दाँत भी नहीं टूटे होंगे; खूब गोरा रंग, लेकिन लंबाई में अपनी क्लास की लड़कियों से पूरे दो इंच बड़ी—पूरी ५ फीट ३ इंच की! उभारों के मामले में भी वह अपनी सहेलियों से दो नंबर आगे थी—एकदम टेनिस की गेंदें, कड़ी-कड़ी! और खूब पतली कमर पर वह जोबन बेहद ज़बरदस्त और उभारदार लगता था। उस पर उसका टॉप भी एकदम टाइट और छोटा था, जिससे उसकी गोरी और खूब गहरी नाभि साफ़ दिखती थी।

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गाँव की भौजाइयां खूब खेली-खाई थीं, चाल देखकर लच्छन बता दें। सो, उसकी गहरी नाभि देखकर उन्होंने पक्का फ़ैसला दे दिया—

ननद रानी की बुर भी बहुत गहरी होगी, और एक बार बस दुकान खुल जाए तो फिर शटर डाउन नहीं होगा!’


लेकिन दुकान अभी खुली नहीं थी, माल एकदम सील-पैक था, यह भी सबने टटोलकर पता कर लिया था। बड़ी उम्र की औरतें भी उसे देख-देखकर रसीली हो रही थीं, क्योंकि इस उम्र की लड़कियों से चुसवाने-चटवाने का मज़ा ही कुछ और होता है।

मीना को यह गाना आज ही उनके पड़ोस की एक भाभी ने सिखाया था। मीना ने फ़र्श पर पड़ा एक दुपट्टा उठाया, उसका घूँघट बनाया और अपनी आने वाली भाभी की एक्टिंग करते हुए शुरू हो गई। ढोलक पर बुच्ची थी, साथ में रमा चम्मच से ढोलक की थाप काट रही थी।

गाने में रीना, चुनिया, रंजीता के साथ गाँव की भाभियाँ भी ज़ोर-ज़ोर से सुर मिलाने लगीं:

"तेरे भैया ने मसल डाली कली ये गुलाब की, खोल डाली बंद थी जो बोतल शराब की,

तेरे भैया ने मसल डाली कली ये गुलाब की, खोल डाली बंद थी जो बोतल शराब की।

ऐसा मसला है तेरे भैया ने मुझे, ऐसा मसला है तेरे भैया ने मुझे, बड़ा दरद मुझे, बड़ा दरद मुझे,
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ऐसा मसला है तेरे भैया ने मुझे, ऐसा मसला है तेरे भैया ने मुझे, बड़ा दरद मुझे, बड़ा दरद मुझे।

अरे ननद रानी, कल रात हुई बड़ी मुश्किल, अरे ननद रानी, कल रात हुई बड़ी मुश्किल!

पहले-पहले चोली खोली, चूस गया नारंगी हमारी, अरे चूस गया नारंगी हमारी, नारंगी हमारी!

लहंगे में फिर हाथ डाला धीरे से हमारे, धीरे से हमारे, धीरे से हमारे..."


और डांस करते हुए मीना ने अपने टॉप से छलकते उभारों को सहलाया, हल्के से दबाया और स्कर्ट को थोड़ा सा सरकाकर दिखाया, तो महफ़िल में क्या ज़बरदस्त सीटियाँ बजीं!

शीतल मौसी तो एकदम पागल हो गईं और खुद भी उठकर साथ देने लगीं। सूरजु की मौसी पुरानी लेस्बो थीं और ख़ास तौर से ऐसी कच्ची कलियों की शौकीन थीं, सो उनकी बुलबुल अंदर ही अंदर फुदकने लगी।
और शीतल मौसी बैठी तो रीना, मीना की चचेरी बहन, पक्की दोस्त, चंदौली वाली की बेटी उठ खड़ी हुयी और उन दोनों टीनेजर्स ने क्या धमाल मचाया, लग रहा था नाच नाच के आज छत तोड़ देंगी, कभी एक दूसरे से चिपक जातीं, जैसे दुलहा दुल्हन पहली रात में चिपके हों तो कभी दूर हट के रीना अपने छोटे छोटे जुबना मटका के ललचा के अपनी बहन को उकसाती जैसे पहली रात को आने वाली उनकी भाभी उनके भैया को तरसाती, दोनों डांस सीख भी रही थीं, और आज मिल के कई गाँव वाले गानों पे तैयारी भी की थी,
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सुधा भाभी ने मुंह में दो ऊँगली डाल के क्या जबरदस्त सीटी बजायी, आम के बगीचे को पार कर गयी होगी और ऊपर से बोलीं,

" जियो राजा बनारस, जियों मेरी छमिया, दालमंडी की सब पतुरिया मात "

मीना ने फिर अपनी आने वाली भाभी (सूरजु भैया की दर्जा दस में पढ़ने वाली दुलहिनिया) की एक्टिंग करते हुए चेहरे पर ढेर सारे दर्द के भाव लाए, एक ज़ोरदार चक्कर काटा और घुँघरू छनकाते हुए लाइन दुहराई:

"ऐसा मसला है तेरे भैया ने मुझे, ऐसा मसला है तेरे भैया ने मुझे, बड़ा दरद मुझे, बड़ा दरद मुझे..."

"अरे भौजी! मेरे भैया से मसलवाने के लिए ही तो तोहरे अम्मा-बाबू भेजे हैं। अब मसलवाना-रगड़वाना तो पड़ेगा ही!"

गाँव की एक लड़की सुनीता ज़ोर से बोली,


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तो सब ननदों ने आसमान सिर पर उठा लिया। लेकिन रमा ने गाने की अगली लाइन शुरू की और मीना ने फिर थिरकना शुरू किया:

"...लहंगे में फिर हाथ डाला धीरे से हमारे, धीरे से हमारे, धीरे से हमारे।

ननदी, मैंने उसे रोका कर के बहाना, कुण्डी तो लगा दे सैंया, ज़रा रुक जाना, ज़रा रुक जाना!

चोली मेरी खोल डाली, चला न बहाना, लहंगा मेरा खींच लिया, निकला सयाना, निकला सयाना!

फिर उसी तरह से ननदी मुझे निचोड़ा, कस-कस के चलाया तेरे भैया ने अपना हथौड़ा, अरे अपना हथौड़ा!
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ऐसा मसला है तेरे भैया ने मुझे, ऐसा मसला है तेरे भैया ने मुझे, बड़ा दरद मुझे, बड़ा दरद मुझे..."


खूब हल्ला-हंगामा हुआ।रीना अब आकर अपनी मम्मी चंदौली वाली के पास बैठ गयीं, .


लेकिन अगला गाना शुरू होने के पहले उत्तर पट्टी की एक बहू अपनी ननद का नाच में साथ देने के लिए उठ खड़ी हुई।

उसने अबकी लड़के का भेष बनाया—एक गिरी हुई साड़ी उठाकर उसकी पगड़ी बाँध ली और मीना के साथ आ गई।

वह थीं चंदा भाभी। गाँव की सब लड़कियाँ उनसे काँपती थीं, क्योंकि हर रतजगे में, चाहे वह दूल्हा बनें या दुल्हन, ननदों को बिना अच्छी तरह नँगा किए और निसुती नचाए छोड़ती नहीं थीं। जितना रात में मर्द नई दुल्हनों को रगड़ते थे, उससे ज़्यादा वे दुल्हनें और भाभियाँ उन मर्दों की बहनों (अपनी ननदों) को रगड़कर हिसाब बराबर कर लेती थीं; और उनमें सबसे आगे थीं चंदा भौजी!

गाना एक बार फिर रमा ने शुरू किया, लेकिन साथ में अबकी मँजू भाभी और रामपुर वाली भी थीं।

सीन वही था—आने वाली सूरजु की दुलहिनिया की पहली रात का। मीना नई नवेली भाभी का रोल कर रही थी और चंदा भौजी मर्द का।

गाना शुरू हुआ:

"धीरे-धीरे डालो राजा, तेल लगाय ले, धीरे-धीरे डालो राजा, तेल लगाय ले।

मेरी तो राजा छोटी सी डिबिया, छोटी सी डिबिया, इतना मत जोर लगा, राजा टूट जाएगी खटिया..."
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मीना मस्त डांस कर रही थी—कभी अपने छोटे से जोबन को उभारती, तो कभी कमर के धक्के लगाती, तो कभी स्कर्ट को पकड़कर कसके गोल चक्कर काटती। साथ में मर्द बनी चंदा भाभी भी पूरे रंग में थीं।मीना का भी टॉप खुला, और चंदा भाभी ने खुद अपनी चोली उतार के फेंक दी, देवर का बियाह जब तक निसुती हो कर खुली छत पर न नाचे, नंदों को नंगी न करे तो कौन देवर के बियाह क मस्ती, और एकदम पहली रात का मर्दों का एक्शन चंदा भाभी कर रही थीं मीना को चिपका के चंदा भाभी वो धक्के मार रही थी, कभी टाँगे अपनी ननद की लपेट लेती, कभी फैला देतीं, क्या सूरजु रगड़ेंगे पहली रात को अपनी दुलहिनिया को , जितना मर्द बनी चंदा भाभी, दुल्हिन बनी मीना को रगड़ रही थीं।


भरौटी की एक भौजाई ने चंदा भाभी से कहा, "अरे चंदा, ज़रा ननद की डिबिया तो दिखा दो!"

बस, एक हाथ से कसकर चंदा ने मीना की पतली कमरिया पकड़ी और इससे पहले कि वह कुँवारी शहरी ननद कुछ समझ पाती, चंदा ने उसकी स्कर्ट सीधे कमर तक उठा दी!

वहाँ बैठी खेली-खाई औरतों की धड़कन एक पल के लिए थम गई।

क्या मस्त डिबिया थी! एकदम सीलबंद, लेकिन पावरोटी की तरह फूली हुई। और साफ़ दिख रहा था कि झाँटें आज ही साफ़ की गई थीं—एक रोयाँ भी नहीं था। दोनों फाँकें एकदम ऐसे चिपकी थीं जैसे लाख ज़ोर लगा लो, अलग होने वाली नहीं हैं।


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चंदा समझदार और दमदार भौजाई थी; उसने असल देहाती दाँव मारते हुए पहले ही ननद की दोनों टाँगों के बीच अपनी टाँग डाल दी और उन्हें फैला दिया, जिससे वह लाख कोशिश करके भी अपनी जाँघें चिपका न पाए और सब लोग अच्छी तरह से उस बिन-चुदी चूत का नज़ारा ले सकें।

अहिराने की किसी भौजाई ने महुआ वाले पाउच की देसी दारू चंदा भाभी की हथेली में उड़ेल दी, और चंदा ने सबको दिखाते हुए धीरे-धीरे उस कच्ची अमिया की कली पर वह महुए वाली मसलनी शुरू कर दी।

"अरे, अंदर पेल!" सब भाभियाँ एक साथ चिल्लाने लगीं।

"आज सब ननदें चोदी जाएँगी! रोज़ इन सबके भाई हमें चढ़ाते हैं, तो आज हम सब चढ़ेंगी!" मँजू भाभी ज़ोर से बोलीं।

मुश्किल से दोनों फाँकें खुलीं, लेकिन चंदा भाभी की लाख कोशिश के बाद भी एक पोर मुश्किल से अंदर घुसा, और मीना की चीख और सिसकी एक साथ फूट पड़ी।

चार-पाँच मिनट की इस भयंकर मस्ती के बाद गाना फिर शुरू हुआ। स्कर्ट ने डिबिया को वापस ढँक लिया, लेकिन अब तो सबने उसे देख ही लिया था। मीना ने फिर से डांस शुरू किया और रमा ज़ोर-ज़ोर से ढोलक बजाने लगी:

"दोनों टाँगें मेरी राजा ऊपर उठाय ले, गोदी में लेके पूरा अंदर घुसाय दे, पूरा अंदर घुसाय दे।

जाँघों के बीच मेरा टपके पसीना, जाँघों के बीच मेरा टपके पसीना, दर्द से मेरा धड़के है सीना।

हौले-हौले कर ले राजा, तू अंदर घुसाई दे, धीरे-धीरे राजा तू पूरा अंदर धँसाय दे। धीरे-धीरे डालो राजा, तेल लगाय ले, धीरे-धीरे डालो राजा, तेल लगाय ले..."


भाभियों ने ज़ोरदार हंगामा काटा। अब ढोलक पूरी तरह से भाभियों के कब्ज़े में पहुँच चुकी थी और एक से बढ़कर एक गालियाँ ननदों का नाम ले-लेकर गाई जाने लगीं, यहाँ तक कि सास को भी नहीं छोड़ा जा रहा था!
 
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रतजगे की गारी

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मंजू भाभी पूरे रंग में आ चुकी थीं। उनका साथ देने के लिए न सिर्फ रामपुर वाली और ननिहाल की भौजाइयाँ आगे बढ़ीं, बल्कि आज भरौटी, अहिराने और नाऊ टोला की भी रसीली भौजाइयाँ आँगन में उतर आई थीं; और बबुआने वाली तो खैर सुर-में-सुर मिला ही रही थीं।

सब की सब भाभियाँ मिलकर अकेले बुच्ची के पीछे हाथ धोकर पड़ गई थीं, हालाँकि आज महफ़िल में दर्जन भर से ज़्यादा ननदें निशाने पर थीं। ढोलक की कड़क थाप पर सबने कोरस उठाया:

"बुच्ची तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी,

बुच्ची तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी।

एक यारी सोनरा से है भाभी, टाँच-टाँच बुर मारी,

बुच्ची तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी।

एक यारी लुहरा की कहियों, एक यारी लुहरा की कहियों,

एक यारी लुहरा की कहियों, एक यारी लुहरा की कहियों,

अरे, ठोंक-ठोंक बुर मारी, अरे, ठोंक-ठोंक बुर मारी!

मीना तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी,

रीना तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी।

एक यारी तेली की कहियों, एक यारी तेली की कहियों,

अरे, चुपर-चुपर बुर मारी, अरे, चुपर-चुपर बुर मारी
!"


यह सुनते ही शीतल मौसी ने रस लेते हुए चिढ़ाकर कहा,

"ये तो मीना बिटिया ने बहुत सही इंतजाम किया! अरे, ऐसी कसी हुई चूत बिना सरसों के तेल के चोदी भी नहीं जा सकती। चुदाई का मज़ा अलग और तेल एकदम मुफ़्त!"

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मंजू भाभी ने गाने की लय को और बढ़ाया, और अबकी बार निशाने पर खुद शीतल मौसी की बेटी रमा और बड़ी मामी की बेटी संध्या आ गईं:

"रमा तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी,

संध्या तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो nनद हमारी।

एक यारी पंडित की कहियों, एक यारी पंडित की कहियों,

अरे, बांच-बांच बुर मारी, अरे, बांच-बांच बुर मारी!

बिन्नो तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी।"
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तभी महफ़िल में से किसी ने कोने में दुबकी बैठी सईदा की ओर इशारा कर दिया।


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अब भला भाभियाँ कहाँ छोड़ने वाली थीं! लगे हाथ उन्होंने रूपा को भी लपेट लिया।

अब गाने का मोर्चा इमरतिया ने संभाल लिया था:

"सईदा तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी,

रूपा तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी।

एक यारी नउआ की कहियों, एक यारी नउआ की कहियों,

अरे, छील-छील बुर मारी, अरे, छील-छील बुर मारी!

बिन्नो तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी।

रंजीता तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी,

सुनीता तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी।

एक यारी दरजी की कहियों, एक यारी दरजी की कहियों,

अरे, गाँठ-गाँठ बुर मारी, अरे, गाँठ-गाँठ बुर मारी!

बिन्नो तेरी कौन-कौन से यारी, बताय दो ननद हमारी।"


अब महफ़िल की कमान मुन्ना बहू ने अपने हाथ में ले ली।


वह तो पहले दिन से ही बुच्ची की रगड़ाई करने के ताक में थीं, सो उन्होंने एक बेहद पुराना गाना, असली गाँव वाला, जिसे सुनते ही ननदें कान में ऊँगली डाल लेती थीं छेड़ दिया:



"लीपी-पोती ओखरिया हमारे बीर बलिया,

अरे, लीपी-पोती ओखरिया हमारे बीर बलिया,

अरे, उस पे रखी पिटारिया, अरे, उस पे रखी पिटारिया, हमारे बीर बलिया।

पिटारी उतारे चलें दूल्हे की बहिनिया, अरे, पिटारी उतारे चलें दूल्हे की बहिनिया,

अरे, पिटारी उतारे चलें दूल्हे की बहिनिया, अरे, पिटारी उतारे चलें बुच्ची छिनारिया, अ

पिटारी उतारे चलें बुच्ची छिनारिया, अरे, भोंसड़ी में घुस गयी लकड़िया, हमारे बीर बलिया!
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अरे, पिटारी उतारे चलें बुच्ची छिनारिया, अरे, भोंसड़ी में घुस गयी लकड़िया, हमारे बीर बलिया।

लीपी-पोती ओखरिया हमारे बीर बलिया, अरे, लीपी-पोती ओखरिया हमारे बीर बलिया,

अरे, उस पे रखी पिटारिया, अरे, उस पे रखी पिटारिया, हमारे बीर बलिया।

पिटारी उतारे चलें दूल्हे की बहिनिया, अरे, पिटारी उतारे चलें दूल्हे की बहिनिया,

अरे, पिटारी उतारे चलें दूल्हे की बहिनिया, अरे, पिटारी उतारे चलें रमा छिनारिया,

अरे, पिटारी उतारे चलें रमा छिनारिया, अरे, भोंसड़ी में घुस गयी लकड़िया, हमारे बीर बलिया।

लीपी-पोती ओखरिया हमारे बीर बलिया, अरे, लीपी-पोती ओखरिया हमारे बीर बलिया,


अरे, उस पे रखी पिटारिया, अरे, उस पे रखी पिटारिया, हमारे बीर बलिया।

पिटारी उतारे चलें दूल्हे की बहिनिया, अरे, पिटारी उतारे चलें दूल्हे की बहिनिया,

अरे, पिटारी उतारे चलें दूल्हे की बहिनिया, अरे, पिटारी उतारे चलें मीना छिनारिया,

अरे, पिटारी उतारे चलें मीना छिनारिया, अरे, भोंसड़ी में घुस गयी लकड़िया, हमारे बीर बलिया।"

मीना का नाम आते ही सब भौजाइयों ने मिलकर ज़ोरदार हुल्लड़ मचाया।

लेकिन तभी शीतल मौसी बोल उठीं, जो सुबह से ही इस शहरी मीन-मछरिया को अपने काँटे में फँसाने के फेर में थीं,

"अरे, बेचारी के बिल में तो अभी तक कोई सींक भी नहीं गई है! एकदम कच्ची, कसी हुई चूत है, खोल के दिखा भी दी है। तो इसकी भोसड़िया अभी से कहाँ से हो जाएगी?"

उन्हीं की एक बहू ने तपाक से कहा,

"अरे मौसी, हमारी ये ननद है ही पैदाइशी छिनार! अभी-अभी तो आई है, देखिएगा कल-परसों में ही अपने सगे भैया का लँड चबाएगी। बारात विदा होने के पहले सुबह-शाम लँड का भोग लगाएगी! और बारात विदा होने के बाद जब यहाँ 'नकटा' खेला जाएगा न, तो देखिएगा—एक साथ तीन उँगलियाँ इसके बिल में घुसाऊँगी मैं, और ये मीना रानी बड़े चाव से घोंटेंगी, वो भी बिना तेल लगाए!

क्यों मिनवा, घोंटोगी न अपने सूरजु भैया का लँड?"

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यह सुनते ही मीना का चेहरा शर्म के मारे कश्मीरी सेब की तरह सुर्ख लाल हो गया।

उसने कातर नज़रों से अपनी माँ सुशीला चाची की ओर देखा, लेकिन वह तो वहाँ सबसे ज़्यादा मुस्कुरा रही थीं। आखिर शादी-ब्याह के घर में इस बेबाक बतरस और खुलेपन का ही तो असली मज़ा था।

सुशीला चाची ने कान्ति बुआ की ओर उँगली उठाई और गारी गा रहीं मुन्ना बहू से लहककर कहा,

"अरे बहू, ज़रा इनका (कान्ति बुआ का) भी तो हाल-चाल सुना दो सबको!"

"अरे चाची, अपनी ननदों का हाल तो हम सुना ही रहे हैं, अब आप लोग अपनी ननद का कच्चा चिट्ठा खोल दीजिए!"
 
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मीना की माँ सुशीला चाची -

-बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं
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मुन्ना बहू हँसते हुए बोलीं और ढोलक सीधे मीना की माँ सुशीला चाची की गोद में थमा दी।

सुशीला चाची ने ढोलक थामते ही कान्ति बुआ और उनके साथ बैठी दूल्हे की बाकी बुआओं को आड़े हाथों लेना शुरू किया:


"उड़ि आवा दुप्पटा बनारस से, उड़ि आवा, उड़ि आवा दुप्पटा बनारस से, उड़ि आवा।

अरे, दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, सीना ताने खड़ी, जोबना उभारे खड़ी, उड़ि आवा!


दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, चुम्मा देने खड़ी, चुम्मा लेने खड़ीं, उड़ि आवा!

अरे, दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, बुर देने खड़ी, लँड लेने खड़ीं, उड़ि आवा!

अरे, दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, मीना के बाबू से चुदाने खड़ी, लँड लेने खड़ीं, उड़ि आवा!

अरे, दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, मीना के चाचा से चुदाने खड़ी, लँड लेने खड़ीं, उड़ि आवा!


अरे, दूल्हे की बूआ दरवज्जे खड़ी, मीना के मामा से चुदाने खड़ी, लँड लेने खड़ीं, उड़ि आवा!"

उनके ठीक बगल में बैठी रीना की मम्मी (चंदौली वाली) ने माहौल में और घी डाला। आखिर बुआ तो उनकी बेटी रीना की भी लगती थीं, सो वह बोलीं,

"अरे, ये रीना की बुआ अपने भाइयों से... यानी हमारे मरदों से खाली बुर चोदवाएंगी कि अपनी गांड भी मरवाएँगी?"

नौवीं क्लास में पढ़ने वाली, सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल की रीना ने लाज के मारे अपना सिर झुका लिया। तभी उसके बगल में बैठी एक भौजी ने ज़बरदस्ती उसका सिर ऊपर उठाया और उसके कान में बुदबुदाई,

"अरे ननद रानी, बिना लँड का स्वाद लिए कोई ननद यहाँ से विदा नहीं होती, तो काहे लजा रही हो? जब हाथ में मिलेगा तो गपागप घोंट ही लोगी!"
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जवाब में सुशीला चाची ने ढोलक की थाप तेज़ करते हुए अगली गारी शुरू कर दी, जो पहली वाली से भी ज़्यादा नंगी और धारदार थी।

अब उनके साथ उनकी देवरानी (रीना की मम्मी) की आवाज़ भी पूरी कड़क के साथ गूँज रही थी और बाकी बहुएँ भी इस सुर में शामिल हो चुकी थीं। ननद तो आखिर ननद ही ठहरी, चाहे अपनी हो या सास की!


"अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं, अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!"

गाते हुए उन्होंने अपनी लजाती हुई सुंदर और गोरी बेटी मीना को देखा, जिसके गाल लाज से लाल हो रहे थे।

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उसे प्यार से अपनी तरफ़ दुबकाते हुए सुशीला चाची ने बच्चों के नाम से रिश्ता जोड़कर गाने की अगली लाइन उठाई:

"अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं, अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!

मीना के बाबू की टूट गइल खटिया, जागेलीं मीना की बूआ मुँहवा चूँ! अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!

मीना के बाबू हचक के चोदले, चोदावें मीना की बूआ मुँहवा चूँ! अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!"

सुशीला चाची की ढोलक की थाप पूरे इलाके के दस गाँवों में मशहूर थी। मीना भले ही बनारस के सेंट मेरी कॉन्वेंट में पढ़ती थी, लेकिन ढोलक बजाने का यह हुनर उसने अपनी माँ से विरासत में सीखा था।

ढोलक पर सुशीला चाची की देवरानी चम्मच से कड़क ताल दे रही थीं और सब बहुएँ ज़ोर-ज़ोर से ताली बजा रही थीं। अब मीना और रीना भी शरमाना छोड़ इस मस्ती में झूमने लगी थीं।
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रीना को झूमते देख अपने देवर का फायदा करवाने के इरादे से सुशीला चाची ने आगे बढ़ाया:


"रात भर मुरुगवा चोंच हिलावे, रीना की बुआ नीचे पड़ी छटपटावे!

रीना के पापा ने हचक के मारा, रीना की बूआ की बुरिया से निकले 'सूँ-सूँ' कूं!

अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!"

वहीं से गाने की कमान रीना की मम्मी ने लपक ली:

"अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं! अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!

अरे केकरे गांड में जइहें तू, अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं?

रीना की बुआ की गांड में जाऊँगा, बोले मुरगवा मुँहवा चूँ!


रीना के बाबू मरिहें गांड, रीना की बुआ मरवाएँगी गांड, बोले मुरगवा मुँहवा चूँ!"

अब इस आँगन में बैठी बाकी भाभियों के हाथ भी खुजलाने लगे थे, क्योंकि महफ़िल में दर्जन भर से ज़्यादा मस्त, कुँवारी और जवान ननदें बैठी थीं।

रीना के बगल में सुधा भाभी बैठी थीं, जिन्होंने अभी कुछ देर पहले रीना को चिढ़ाया था।
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सुधा भाभी की शादी को मुश्किल से दो साल हुए थे; वह महज़ बीस-बाईस साल की गदराई हुई गोरी देह की मालकिन थीं। ,देह तो दुबले पतली एकदम छरहरी लेकिन जोबन जबरदंग, और जितना देवरों का रस लेती थी , उससे कम ननदों का रस नहीं लेती थीं।

उनकी ससुराल तो रीना के घर से एकदम सटी हुयी थी, जब गौने सुधा भाभी गौने उतरी थीं दो साल पहले तो उस समय रीना छोटी सी थी लेकिन रिश्ता तो ननद का ही था , पर अब तो एकदम तैयार माल हो गयी है , सुधा भाभी ने सोचा।

वह अपने पति के साथ बनारस में रहती थीं, जो रेलवे में टीटीई थे। वह शादी के लिए कल ही गाँव आई थीं और रूप-रंग के साथ-साथ गारी गाने में भी उस्ताद थीं।

सुधा भाभी ने रीना की मम्मी से ढोलक झपट ली और एक बार फिर कुँवारी ननदों यानी दूल्हे की बहनों पर तीखा हमला बोला। गाना वही था, पर अब निशाना कान्ति बुआ नहीं, बल्कि गाँव की ये नई कलियाँ थीं। उन्होंने अपनी कच्ची अमिया जैसी ननद रीना को चिढ़ाते हुए गाया:


"लखनऊ से आई हैं रीना दुलारी, पहनेली टॉप और नाभी उघारी!

अरे, हमरे भैया जो देखिहें त लँड फनफनाई, खोलिहें डिबिया, ना करिहें कूं!
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अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं! अरे रीना चुदवाये चूं-चूं चू,


अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं! अरे मीना चुदवाये चूं-चूं चू।"

तभी पीछे से किसी बहू ने आवाज़ लगाई,

"अरे, दूल्हे की बहनों और बुआ का हाल तो हो गया, पर क्या ये मुर्गा दूल्हे की माई के पास नहीं जाएगा? असली नंबरी छिनार तो वही बैठी हैं!"

यह सुनते ही सुधा भाभी ने अपनी खुद की सास (दूल्हे की माई) को नापना शुरू कर दिया, और बबुआने के सब लौंडों-मर्दों का नाम लेकर सुर चढ़ाया:


"पूरब पट्टी के मरदे और पच्छिम पट्टी के लौंडे,

सब ही खड़े हैं लेके अपने-अपने लौंड़े .

ससुइया छिनार आज सबको बुलाई,

अरे, दूल्हे की माई आज सबको बुलाई,

बारी-बारी पेले, कोई बोले ना कूं!


अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं! अरे बोल रे मुरुगवा कुक्कुडु कूं!"



अब कान्ति बुआ को अपनी भाभी (दूल्हे की माँ) की खिंचाई करने का सुनहरा मौका मिल गया। वह सुधा भाभी से हंसकर बोलीं,

"अरे बहू! तेरी सास बारी-बारी से नहीं, बल्कि एक साथ लेती है! एक लँड मुँह में, एक गांड में, और एक चूत में! दूल्हे के फूफा, चाचा और मामा तीनों का एक साथ संभालती है!"

कान्ति बुआ ने इस तरह हँसते हुए अपने मर्द और भाइयों का फायदा करा दिया।

लेकिन सुधा भाभी अभी अपनी ननदों को छोड़ने के मूड में नहीं थीं। बाकी भाभियाँ भी तालियाँ पीटकर उनका साथ दे रही थीं:


"अरे, बेसन के लड्डू कराकर होएं, अरे, बेसन के लड्डू...

अरे, हमरी ननदी छिनार के सत्तर भतार, पचहत्तर भतार!

अरे, हमरी रीना छिनार के सत्तर भतार, पचहत्तर भतार,

तीन सौ भतार संगे घूमे बाज़ार! अरे, बेसन के लड्डू कराकर होएं, अरे, बेसन के लड्डू...

अरे, हमरी मीना छिनार के सत्तर भतार, पचहत्तर भतार, तीन सौ भतार संगे घूमे बाज़ार,


अरे, बेसन के लड्डू कराकर होएं..."

तभी शीतल मौसी की बेटी रमा बीच में बोल उठी,

"अरे भौजी! यह तो अपनी-अपनी किस्मत है। कहिए तो दो-चार भतार हम ननदें आप लोगों को भी दान में दे दें?"

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बुच्ची, जिसकी चुदाई की गुल्लक दोपहर में ही फूट चुकी थी, वह भी अब पूरे जोश में थी।
उसने हँसते हुए रमा की बात का समर्थन किया,

"हाँ सुधा भाभी! वह सब आपके भी तो नन्दोई लगेंगे। काहे आपकी झाँटें सुलग रही हैं? सलहज का तो नन्दोई पर पहला हक होता है!"

रामपुर वाली भाभी ने हँसते हुए बुच्ची के गदराए उभारों को ज़ोर से भींचा और बोलीं,

"छिनार, हमसे इतनी बातें! कल हमारे भाई गप्पू से चुदवाओगी हंस-हंस के, तो क्या उसे भी नन्दोई बना दोगी क्या?"

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तभी पूनम ने आग में घी डालते हुए सुधा भाभी को चिढ़ाया,

"अरे सुधा भौजी! इस गारी में नमक एकदम कम है, और मिर्च तो एकदम नहीं है!"

"ठहर स्साली! अभी सुनाती हूँ तुझे असली वाली गारी। भैया की रखैल, ऐसी मिर्च लगेगी कि पिछवाड़ा परपराने लगेगा!" सुधा भाभी हँसते हुए बोलीं।

वह भले ही आजकल बनारस में अपने मर्द के साथ रह रही थीं, पर बहू तो इसी ठेठ गाँव की थीं और एक से बढ़कर एक गालियाँ उनकी ज़बान पर रटी हुई थीं। उन्होंने ढोलक पर थाप देकर नया सुर उठाया:


"चना बोई आई बा चटकल अँजोरिया में, चना बोई अयली चटकल अँजोरिया में।

अरे, दूल्हा अपनी बहिनी को ले भागे कोठारिया में, चना बोई आई बा चटकल अँजोरिया में।

अरे, सूरजु भैया पूछे अपनी बहिनिया से, अरे, पूनम से, बुच्ची छिनरिया से...

अरे, सूरजु भैया पूछे अपनी बहिनिया से, अरे, रमा से, मीना से, रीना छिनरिया से...

अरे, दूध पीबू बहिनी? ना भैया ना! अरे, चाय पीबू बहिनी? ना भैया ना!

अरे, शराब लेबू बहिनी? ना भैया ना! अरे, गहना ले ला बहिनी? ना भैया ना!

अरे, यार लेबू बहिनी? हाँ भैया हाँ! अरे, लँड लेबू बहिनी? हाँ भैया हाँ!


अरे, भौजी के भैया का लँड लेबू बहिनी? हाँ भैया हाँ, अरे शाबाश भैया हाँ!"

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गाली का यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा था। सुधा भाभी ने एक बार फिर अपनी बगल में बैठी रीना और मीना की रगड़ाई शुरू कर दी:

"लीला-लीला हो ननदी लीला हो लीला, लीला!

लीला-लीला हो रीना लीला हो लीला, लीला!

लीला-लीला हो मीना लीला हो लीला, लीला!

अट्ट लीला, पट्ट लीला, होई करवट लीला, लीला-

लीला हो रीना लीला हो लीला, लीला! लीला-

लीला हो मीना लीला हो लीला, लीला!

टंगिया उठाय लीला, जाँघिया फैलाय लीला, लीला-लीला! चू

तड़ उठाय लीला, बुरिया फैलाय लीला, लीला

-लीला हो रीना लीला हो लीला, लीला!

दूल्हे का लँड लीला, हमरे भैया का लँड लीला, लँड जबरदंग लीला, लीला-लीला!


लीला-लीला हो रीना लीला हो लीला, लीला! लीला-लीला हो मीना लीला हो लीला, लीला!"

अब तो आँगन में बैठी सब की सब भौजाइयाँ पूरे उफान पर थीं।

भरौटी वाली और कहरौटी वाली औरतें तो पूरे इलाके में अपनी सबसे गंदी गालियों के लिए मशहूर थीं; और आज बुच्ची, रमा, रीना और मीना की जमकर खाल खींची जा रही थी। साथ ही दूल्हे की माई को भी कोई बख्शने के मूड में नहीं था।

अगर किसी ननद का नाम गलती से छूट भी जाता, तो कोई न कोई उसे याद दिला देता।

एक बार जब भरौटी वाली भौजाइयाँ गारी गाकर गर्दा उड़ा रही थीं, तो मीना चुपचाप अपनी माँ के पीछे छिपने की कोशिश कर रही थी, जिससे उसका नाम छूट गया। यह देख खुद सुशीला चाची ने उस बहू से हंसकर कहा,

"अरे बहू! तुम्हारी एक छोटी ननद यहाँ पीछे भी छुपी बैठी है!"

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बस फिर क्या था, भरौटी वाली भौजाई ने सीधे मीना पर वार किया:

"मीना छिनार गदहवा चोदी, घोड़वा चोदी..."

लगभग घंटे भर से ऊपर तक गालियों और गानों के साथ नाच-गाने का यह दौर चलता रहा। लेकिन तभी, अचानक पूरे गाँव की बिजली गुल हो गई। एक झटके में अँधेरा छा गया। गनीमत बस इतनी थी कि कोने में एक-दो लालटेनें बहुत धीमी रोशनी के साथ जल रही थीं, जिससे औरतों के गदराए बदन की परछाइयाँ दीवारों पर काँपने लगीं।



वह छत खूब बड़ी थी, जिसके चारों तरफ़ ऊँचे-ऊँचे बारजे बने हुए थे।

बारजे के पार रात के सन्नाटे में भूतों की तरह खड़े पुराने पेड़ों की परछाइयाँ अँधेरे में और भी गहरी और डरावनी हो गई थीं। रात पूरी तरह काली नहीं थी, लेकिन आसमान में कुछ बदमाश बादलों ने आकर चाँदनी का मुँह ज़बरदस्ती छिपा लिया था; बस उस काली रात के तम्बू से दो-चार तारे किसी शैतान लड़के की तरह छुप-छुपकर नीचे की इस औरतों की रहस्यमयी दुनिया को झाँक रहे थे।

शहर से पहली बार गाँव की शादी का यह रंग देखने आई नई-नवेली लड़कियाँ इस अचानक हुए अँधेरे और माहौल से और भी सहम गईं।



इधर, महफ़िल की कुछ शैतान भौजाइयों ने जल रही दो-तीन लालटेनों की लौ को भी जानबूझकर एकदम धीमा कर दिया।

आखिर, अँधेरे का अपना एक अलग डर होता है, और जहाँ डर होता है, वहाँ इस रस का फ़ायदा उठाने वाली भौजाइयाँ भला कहाँ चूकने वाली थीं! जो भाभियाँ काफी देर से इन कंची उम्र की, शहर से आईं मेमसाहब ननदों को देख-देखकर भीतर ही भीतर गरमा रही थीं, उन्हें अब मनमाफ़िक मौका मिल गया था।

जैसे फुटबॉल के खेल में मँजे हुए खिलाड़ी दूसरी टीम के एक-एक खिलाड़ी की हर हरकत को पहले से भाँपकर उन पर अपनी नज़र गड़ाए रखते हैं, ठीक उसी तरह इन जवान और कुँवारी ननदों के पास पहले से ही रसीली भौजाइयाँ सटकर बैठी हुई थीं।



रीना के ठीक बगल में बैठी सुधा भाभी पहले से ही दाँव ताक रही थीं।

उनके साथ भरौटी वाली एक भौजाई भी मौक़े पर चौका मारने को तैयार थी। अँधेरा गहराते ही भरौटी वाली ने झटके से रीना की दोनों कलाई दबोच ली, और सुधा भाभी ने बिना कोई मोहलत दिए आराम से उसके जिस्म से कसी हुई टॉप ऊपर की तरफ़ उतार दी।

टॉप के फर्श पर गिरते ही दोनों भाभियों ने रीना की छाती पर उभरे एक-एक गदराए गुब्बारे को आपस में बाँट लिया और अँधेरे का फ़ायदा उठाकर उन्हें अपनी हथेलियों में कस-कसकर भींचने लगीं।



रीना लाज और सिहरन से छटपटाने लगी, तो सुधा भाभी उसके कान के पास अपने होठ सटाकर फुसफुसाते हुए समझाने लगीं,

"अरे, काहे घबरा रही है मेरी रसीली ननद? मैं हूँ न! कल को तेरे भैया और मेरे भैया तेरे इन गुब्बारों को अइसन ही हचक के दबाएँगे। चुपचाप मज़ा ले ले!"



उधर, दूसरी तरफ मीना को अहिराने की दो तगड़ी भौंजाइयों ने अपनी मज़बूत भौंजाइयों में दबोच रखा था। वे मीना के गालों को चूमते हुए अपनी जीभ होठों पर फेरकर कहने लगीं,

"अरे, जो असली मज़ा अपनी इस अल्हड़ ननद को दुहने में है, वो मज़ा तो पहली बार बियाई गाय को दुहने में भी नहीं आता!"



रमा के भरे-पूरे बदन पर मंजू भाभी ने हाथ मार दिया था, और रूपा पूरी की पूरी रामपुर वाली भाभी के हिस्से में आ गई थी।


कुछ ही देर में आँगन में कोई भी ऐसी ननद नहीं बची थी जो सिसक न रही हो और जिसके बदन का टॉप, फ्रॉक या कुर्ती सरककर फर्श पर न आ गिरी हो। महुआ की कड़क शराब, भाँग की तरंग और गालियों की मदहोशी का असर अब औरतों के सिर चढ़कर बोल रहा था।








तभी अचानक कुछ ऐसा हुआ कि सबकी साँसें जहाँ की तहाँ रुक गईं।
 
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komaalrani

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सुलाकी आ गई
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बारजे के ठीक पास में एक पुराना भारी तख़्त रखा हुआ था।


अँधेरे के उस धुंधलके में कोई पुरुष जैसी आकृति उस तख़्त की तरफ़ बढ़ती हुई दिखाई दी। साफ़-साफ़ कुछ दिख नहीं रहा था, बस एक परछाईं सी हिल रही थी—जिसके एक हाथ में जलती हुई लालटेन थी, दूसरे हाथ में एक लंबा सोटा (डंडा) और सिर पर मर्दों की तरह भारी मुड़ेसा (पगड़ी) बँधा हुआ था।



जैसे ही वह आकृति भारी क़दमों से तख़्त पर चढ़ गई, उसने मर्दों की पूरी ठसक के साथ अपनी बंडी (कुर्ते) के ऊपर के दो बटन झटके से खोल दिए। हाथ की लालटेन नीचे रखकर, उसने काजल से बनाई हुई अपनी घनी मूँछों पर एक उँगली से ताव दिया, अपनी गठीली छाती को आगे की तरफ़ उभारा और हाथ के लंबे सोटे को अपनी जाँघों के बीच एक लम्पट ज़मींदार की तरह नचाते हुए चारों तरफ़ देखने लगा।



यह देखते ही गाँव की मँजी हुई औरतों ने मानो आसमान सिर पर उठा लिया। जो लड़कियाँ पहले भी गाँव के इन रतजगों को देख चुकी थीं, वे भी ज़ोर-ज़ोर से चीखने-चिल्लाने लगीं; लेकिन शहर से आईं कान्वेंट की लड़कियों के लिए यह पहला और बिल्कुल अनोखा तमाशा था। उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है।


रीना के उभारों को अपनी हथेलियों में कसकर भींचते हुए सुधा भाभी ने उसके गाल पर एक कड़क चुम्मी ले के बोलीं,



"अरे बुद्धू, काहे डर रही है? देखती रह, अभी तो इस रात का असली खेल शुरू हुआ है!"



इस हुल्लड़ में दूल्हे की माई भी अपनी सुध-बुध भूलकर बाकी औरतों के सुर में सुर मिलाकर चिल्ला रही थी। पूरा आँगन एक ही आवाज़ से गूँज उठा—

"सुलाकी! सुलाकी! सुलाकी आ गई!"


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असल में, कांति बुआ (बुच्ची की बड़ी मौसी) ने ही हाथ में लालटेन उठाकर छत के उस ऊँचे बारजे पर चढ़कर 'सुलाकी' का रूप धरा था।

वह इस स्वांग की उस्ताद थीं। कांति बुआ ने लालटेन को ऊपर उठाया, अपनी आवाज़ को पुरुषों की तरह भारी, रौबीली और कानों में चुभने वाली बनाया और पूरे रोब के साथ सुलाकी का संवाद शुरू किया:



"अरे ओ नीचे बैठी छिनारों, कान खोल के सुनो रे...! आज सुलाकी आई है, तो सबकी सच्ची बात बताकर ही जाएगी रे...!"



सुलाकी बनी कांति बुआ ने अपनी कमर पर दोनों हाथ रखे, दाँतों के बीच दबे पान की लाल पीक को ज़ोर से आँगन के एक कोने में थूका और फिर नीचे बैठी दूल्हे की माई की तरफ़ देखकर एक लम्पट मर्द की तरह मुस्कुराईं। गाँव की सब बहुएँ, जो पहले भी सुलाकी का यहखेल देख चुकी थीं, एक स्वर में नीचे से चिल्लाईं,



"अरे सुलाकी! ऊपर खड़े-खड़े ऊपर ही ऊपर क्या देख रही हो? ज़रा नीचे का हाल हम सबको भी बताओ न!"



सुलाकी ने ऊपर से एक ज़बरदार और मोटा ठहाका मारा और बोली,



"अरे, मैं इस गाँव की जो सबसे बड़ी छिनार है, आज उसी का कच्चा चिट्ठा देख रही हूँ!"



तभी महफ़िल के बीच से मुन्ना बहू ने चुटकी लेते हुए आवाज़ लगाई,



"अरे सुलाकी! साफ़-साफ़ कहो न कि इस गाँव की सबसे बड़ी छिनार कौन है? उसने अब तक किस-किसका लँड घोंटा है, और आगे किसके लँड का भोग लगाने वाली है?"


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सुलाकी ने तख़्त पर खड़े होकर चारों ओर अपनी पैनी नज़र दौड़ाई और हँसते हुए बोली,



"अरे, मैं तो पूरा बाइस पुरवा घूम के देख आई हूँ ! दूल्हे की महतारी अइसन लँड-खोर और नंबर-एक की छिनार दूसरी कोई पैदा ही नहीं हुई। पूरे जिले और तहसील की रंडियाँ भी इसके आगे लँड घोंटने के हुनर में फेल हैं! पर क्या करूँ, इसके भोसड़े में जो जवानी की आग लगी है, वो आज तक बुझने का नाम ही नहीं ले रही है!"



मंजू बहू ने नीचे से ढोलक पर एक थाप दी और पूछा,



"अरे सुलाकी, फिर बताओ कि ऐसी ज़बरदस्त छिनार कौन है? और कैसे बुझेगी उसके उस भोसड़े की आग?"



सुलाकी बनी कांति बुआ ने बिना कोई देर किए अपने हाथ के लंबे सोटे को अपनी दोनों जाँघों के बीच में सीधे खड़े लँड की तरह सटाकर खड़ा किया और सीधे दूल्हे की माई की तरफ़ इशारा करके कड़ककर बोलीं,



"आज सगे बेटे का बियाह है, तो अइसन सती-सावित्री और पतिव्रता बनके बैठी हैं जैसे इनसे बड़ी सती तो पूरे बनारस मंडल में कोई है ही नहीं! पर सच तो यह है कि इस दूल्हे की माई को खुद दूल्हे के असली बाप का पता नहीं है!और दूल्हे की माई की भोसड़े की आग दूल्हे के लंड के पानी से बुझेगी, वरना ये प्यासी ही रहेगी। "


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यह सुनते ही छोटी मामी भला अपनी ननद की रगड़ाई करने का ऐसा सुनहरा मौका कैसे छोड़तीं! उन्होंने नीचे से आवाज़ ऊँची की,

"अरे सुलाकी! तो फिर बता ही दो कि इस दूल्हे का असली बाप कौन है?"



सुलाकी ने तख़्त पर खड़े होकर थोड़ा नाटक किया, चारों तरफ़ आँखें मटकाईं और फिर छोटी मामी की तरफ़ देखकर हँसते हुए बोली,

"अरे, और कौन होगा तोहार खुद का मरद... यानी इस दूल्हे का सगा मामा!"



आँगन में औरतों के ठहाके गूँज उठे। सुलाकी ने फिर चारों ओर देखा और अपनी बात बदलते हुए बोली,



"अरे नहीं-नहीं, ठहर रे!"



इसके बाद सुलाकी बनी कांति बुआ ने स्वांग को और गहरा करने के लिए सबसे पहले गधे की तरह ज़ोर-ज़ोर से रेंकने की आवाज़ निकाली। आवाज़ निकलते ही ढोलक वाली भाभी ने अपनी थाप बदल दी और ढोलक 'धिन-ताक, धिन-ताक' होकर गधे के दुलत्ती मारने की लय पर बजने लगी। फिर सुलाकी ने कुत्ते की तरह 'भौं-भौं' किया और अंत में अपनी जाँघों को ज़ोर-ज़ोर से पटककर घोड़े की तरह हिनहिनाने लगी, जिस पर ढोलक की कड़क थाप अखाड़े की ताल की तरह गूँज उठी।



रामपुर वाली भाभी ने अपनी छाती मटकाते हुए कहा,

"अरे सुलाकी, अब तड़पाओ मत! साफ़-साफ़ बताओ न कि दूल्हे का बाप आख़िर कौन है?"



सुलाकी ने अपने हाथ का सोटा हिलाते हुए कहा,



"अरे, यह दूल्हे की माई तो बनारस की मशहूर दालमंडी की रंडियों का भी कान काट के बैठी है! हम अपनी आँखों से देख रहे हैं कि यह छिनार अपने सगे मरद के अलावा, एक ही दिन में दस, बारह, यहाँ तक कि पंद्रह-पंद्रह मर्दों के साथ कोठरी में सोई है! दूल्हे के मामा के साथ तो सोई ही, और तो और—उसी रात इसने गधे, घोड़े और कुत्ते से भी अपना पिछवाड़ा और चूत पेलवाई है!"



इधर अँधेरे में रीना और मीना के साथ बैठी बुच्ची की उन दोनों से पक्की दोस्ती हो चुकी थी।



बुच्ची ने इस बात का रस लेते हुए हँसकर मीना के कान में फुसचुसाया,

"अब समझ में आया मिनवा कि हमारे इस सूरजु भैया का लँड गधे की तरह अइसन मोटा और लंबा काहे है! और काहे जब वो हम लड़कियों को कुतिया बना के पीछे से पेलते हैं, तो उनका लँड कुत्ते की तरह भीतर ही अटक जाता है? आधे घंटे से पहले बाहर निकलता ही नहीं!"



मीना ने अचरज और उत्सुकता से अपनी आँखें बड़ी कीं और दबी आवाज़ में पूछा, "बुच्ची? तूने भैया का लँड घोंट लिया है?"


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मीना उम्र में बुच्ची से साल भर ही छोटी थी, इसलिए दोनों सहेलियों की तरह बिना किसी परदे के बात कर रही थीं।



"और क्या यार!"

बुच्ची ने मीना की कमर में चिकोटी काटते हुए उसे फुसलाया,

"पहले-पहले तो मैं भी बहुत डरती थी कि नाजुक बिल इस मूसल को कैसे सहेगा। लेकिन हमारी इमरतिया भाभी ने मेरा सारा डर निकाल दिया। पहली बार में दर्द तो बहुत हुआ, पर स्साला क्या गज़ब का मज़ा आया! तू भी एक बार भैया से अपनी गुल्लक फड़वा के देख, बहुत आराम-आराम से करेंगे और मैं भी पास में ही रहूँगी!"



उधर, बड़ी उम्र की औरतें—चाची, मामी, बुआ और गाँव की कई अन्य औरतें अब तख़्त के पास आकर खड़ी हो गई थीं और सुलाकी से सीधे सवाल-जवाब कर रही थीं।



सुलाकी ने ढोलक की तेज़ होती थाप के साथ फिर से गरजना शुरू किया,

"और सुनो! वो लौंडा सूरज, जिसका लँड गधे जैसा मोटा है, उसकी माई खुद गधे से चुदवा के बैठी है, वो कोई कम छिनरा नहीं है। जब सूरज इसके पेट में पल रहा था, तब भी इस मादरचोद माई ने एक भी दिन नागा नहीं किया; रोज़ चार-पाँच मर्दों का कड़ा लँड अपनी चूत में घोंटती ही रही! तो बहनचोद तो वो है ही , मादरचोद भी बनेगा और पक्का मादरचोद बनेगा तो वो पेट में से सीख के आया है, वहीँ से देखता था उसकी माई नाऊ कहार कोई नहीं छोड़ती थी तो वो भी अपनी माई चाची मौसी किसी को नहीं छोड़ेगा। ""



यह सुनकर इमरतिया भाभी ने आगे बढ़कर पूछा, "अरे सुलाकी! तो फिर हमारे इस होने वाले देवर (सूरज) का क्या होगा? वो शादी के बाद क्या करेगा?"



सुलाकी ने हवा में अपना हाथ नचाया, अपने जाँघों के बीच दबे सोटे को अपनी कमर से सटाया और हवा में ज़ोर-ज़ोर से कमर के झटके मारकर संभोग की नंगी एक्टिंग करते हुए चिल्लाई,

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"अरे! तोहार देवर घोड़ी पर चढ़ने से पहले अपनी इसी महतारी पर चढ़ेगा! यह छिनार सूरजु के बाप का, चाचा का, मामा का, मौसा का और फूफा का लँड तो पहले ही घोंट चुकी है, अब अपने सगे बेटे का भी लँड घोंटेगी!"
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सुलाकी की भविष्यवाणी और दूल्हे की माँ

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सुलाकी ने एक बार फिर चारों तरफ़ देखकर अपने हाथ नचाए और लय बदलते हुए ऊँचे सुर में गाया:



"अरे ओ नीचे बैठी छिनारों सुनो रे...

आज सुलाकी आई है, सच्ची बात बताएगी रे...!

दूल्हे की माई रे... तू तो बड़ी बेटा-चोद छिनार है रे...!

जब बेटा छोटा था, तो उसकी नूनी पर तेल लगाती थी रे...!

अब बेटा बड़ा हो गया, उसका लँड मोटा हो गया...!

अब अपनी ही चूत में अपने सगे बेटे का लँड घोंटेगी रे...!


कांति बुआ ने खूँटे को अपनी जाँघों के बीच रखकर कमर हिलानी शुरू कर दी। पूरा शरीर ऊपर-नीचे करते हुए, सिसकियाँ भरते हुए बोलीं:

“ऐसे... ऐसे चढ़ेगी... बेटा का मोटा लंड माई की चूत में घुसेगा...

घुसा... और घुसा... पूरा घुसा...

अब मलाई निकलेगी... बेटा की गाढ़ी, गर्म मलाई माई की चूत में भर जाएगी...

राम राम साईं...!"

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यह सुनते ही सूरजु की माई शर्म और लाज के मारे अपने दोनों हाथों से अपना मुँह छिपाने लगी। मुन्ना बहू ने मौक़ा पाकर उन्हें पीछे से कसकर जकड़ लिया और ज़ोर से ठहाका मारते हुए बोलीं,

"सुन रही हो, महतारी? सुलाकी ऊपर से एक-एक बात सोलह आने सच बोल रही है!"

कांति बुआ ने तुरंत अपना स्वर बदला, हाथ का सोटा बुच्ची की तरफ़ तान दिया और उस पर सीधा हमला बोला:




"अब सुनो दूल्हे की बहन... ओ बुच्ची छिनार रे...!

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अपने भाई से चूत चुदवाया तूने, यह बात सच है कि नहीं रे?

अब अपनी भाभी के भाई-देवरों का भी लँड घोंट रे...!

तेरी उस छोटी सी बुर में ये लोग तीन-तीन कड़े लँड एक साथ घुसाएँगे रे...!

तुझे घोड़ी बनवाएँगे, कुतिया बनवाएँगे, और चारों खाने चित करके चोदेंगे रे...!

तेरी गांड भी तो अभी खाली है न छिनार... इस बियाह में उसे भी लँड के पानी से भर देंगे रे...!


राम राम साईं...!"



यह सुनकर पूरे आँगन में बैठी भाभियों ने हँसते-हँसते मानो आसमान सिर पर उठा लिया।

तभी सुधा भाभी ने रीना और मीना को ज़बरदस्ती घसीटकर लालटेन की रोशनी के ठीक सामने खड़ा कर दिया।



सुधा भाभी ने ऊपर की तरफ़ मुँह करके पूछा,

"अरे सुलाकी! ज़रा इन दोनों चमचमाते हुए शहरी माल का भी तो हाल बताओ! इन दोनों की चूत पर कौन चढ़ेगा?"


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सुलाकी ने तख़्त पर खड़े होकर एक बार फिर ज़ोर से पान की पीक नीचे थूकी, अपनी आँखें सिकोड़कर उन दोनों के नंगे उभारों और जिस्म को ध्यान से देखा और पूरी ताक़त से चिल्लाकर बोलना शुरू किया:

"अरे, सुलाकी आई है तो सबका पूरा कच्चा चिट्ठा सुनाकर ही जाएगी! ये दोनों अपनी माताओं के नाम पूरे जिले में डुबाने आई हैं। ई जो बम्बई और लखनऊ से पढ़ि के अइली हैं, ई सोचती हैं कि सारी अँगरेजी चूत के रास्ते बह जाएगी! तुम दोनों की माई —अपने कुँवारेपन में मायके के कोठारों में अपने सगे भाइयों से खूब चोदी गई थीं! तो तुम दोनों भी अगले अड़तालीस घंटे के अंदर इसी गाँव में अपने भाइयों से अपनी यह शहरी गुल्लक पक्का फुड़वाओगी! और एक बार तुम्हारी यह गुल्लक फूट गई न, तो गाँव के सब लम्पट लौंडे तुम्हारी सारी अँगरेजी की पढ़ाई को तुम्हारी गांड के रास्ते भीतर डाल के तुम्हारी ऐसी गांड मारेंगे कि सारा नखरा भूल जाओगी!"
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सुलाकी ने अपनी बात ख़त्म करते हुए कहा,

"अब सुलाकी यहाँ से जाएगी... लेकिन जाने से पहले एक सबसे ज़रूरी बात! ओ दूल्हे की महतारी, और दूल्हे की भाभियों, जरा आगे आओ!"



नीचे से सब औरतें एक सुर में चिल्लाईं, "हाँ सुलाकी, बोलो! तुम्हारी क्या बोली है, बोलो!"

सुलाकी बारजे के पास एक पैर रखकर, तख़्त पर पूरी तरह मर्दों की मुद्रा में खड़ी हो गई और कड़ककर बोली, "सुनो री सब की सब छिनारों, कान खोल के... बल्कि अपनी चूत और गांड सब खोल के सुन लो! यह बहुत ज़रूरी बात है। सब लोग इस लड़के के ब्याह में आए हैं, तो बियाह शुभ-शुभ संपन्न हो जाए, उसके लिए दो-चार काम बहुत ज़रूरी हैं!"



सब औरतें नीचे से बोलीं, "हाँ सुलाकी हाँ, बताओ क्या काम करना होगा?"



सुलाकी ने हाथ का सोटा हवा में लहराते हुए कहा,

"एक तो यह कि इस छिनार दूल्हे की माई का 'मटिया-मेट' बारात वापस आने के बाद नहीं, बल्कि बारात जाने के पहले से ही रोज़-रोज़ होगा, और इसी खुली छत पर सब औरतों के सामने होगा!


दूसरी बात—दूल्हे की मामी और दूल्हे की भाभियों की यह पक्की ज़िम्मेदारी होगी कि घोड़ी चढ़ने से ठीक पहले, यह दूल्हा सूरज अपनी सगी महतारी पर चढ़ेगा और सबके सामने उसे पेलेगा! अगर उसने ऐसा नहीं किया, तो आने वाली दुल्हन की चूत ऐसी लात मारेगी कि दूल्हे की माई और दूल्हे दोनों का खानदान उजड़ जाएगा! इसलिए दूल्हे को बारात प्रस्थान करने से पहले पक्का मादरचोद बनना ही पड़ेगा!"



नीचे बैठी सब औरतें जोश में चिल्लाईं, "पक्का बनेगा सुलाकी, एकदम पक्का!"



सुलाकी ने अपना मुड़ेसा सीधा किया और कहा,

"तो अब सुलाकी यहाँ से जाती है! इस आँगन में बैठी सब छिनारों, भाई-चोदों और बेटा-चोदों को सुलाकी का आखिरी राम-राम!"



इतना कहते ही कांति बुआ ने ज़ोर से फूँक मारकर अपने हाथ की लालटेन बुझा दी। लालटेन बुझते ही उस घाघ अँधेरे में एक पल के लिए ऐसा गहरा, आदिम और रहस्यमयी सन्नाटा छा गया मानो साठ का वह पूरा गँवई दशक और औरतों की वह उन्मुक्त आज़ाद दुनिया वहीं ठहर गई हो। लेकिन अगले ही पल, वह जादुई सन्नाटा टूट गया—एक झटके में पूरे घर की बिजली वापस आ गई।

दूधिया रोशनी आँगन में फैलते ही औरतें अचानक अपनी साड़ियाँ और आँचल सीधे करने लगीं, म सब कुछ सामान्य हो गया।




सुलाकी के जाने के बाद और जैसे ही लाइट आई, माहौल एकदम बदल गया था। जो भी थोड़ी झिझक थी, वो भी अब जैसे सुलाकी के साथ धुल गई थी। गाँव की औरतें तो और गरमा गईं थीं। दो-चार कहारिन बोल रही थीं, "अब आया असल रतजगा का मजा।"
 
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दूल्हे की महतारी

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लेकिन बड़ी ठकुराइन, दूल्हे की महतारी को औरतों ने घेर लिया था, और सब चिढ़ा रही थीं। उसमें कुछ उनकी गाँव के रिश्ते से ननदें थीं, कुछ उनकी बहुएँ, जो एकदम छनछनाई थीं; और आज मौका था सास की रगड़ाई का। बड़की ठकुराइन के घर के बगल की ही एक उनकी बहू और दूल्हे की भाभी, चांदनी बोली,



"अब तो सुलाकी भी बोल गई, सासु जी! अब तो मेरे देवर का घोंटना ही पड़ेगा।"



लेकिन दूल्हे की माई कम गरमायी नहीं थीं, और वो तो चाहती भी थीं कि इकलौते लड़के की शादी में एकदम खुलके मौज-मस्ती हो। बुच्ची और मुन्ना बहू भी उनके पास आ गयी थीं, तो वो बुच्ची के गाल पे मीठी सी चिकोटी काटके अपनी बहू, चांदनी से बोलीं,

"अरे तेरे उस देवर साले को, बहनचोद होने से और तुम्हारी जैसी मस्त जवान भाभियों से फुर्सत ही नहीं है।"


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कहारौटी की मुन्ना बहू की एक देवरानी, फुलवा थी, जो मुन्ना बहू से चार-पांच साल छोटी और गाने-मजाक में नंबर एक थी। वो एकदम पीछे पड़ गयी,



"अरे बड़की ठकुराइन, आपके जोबन जैसा जबरदंग तो दस-पांच गाँव में नहीं है। जितने गाँव के मर्द हैं, सबका खूंटा देखकर धोती में तना रहता है। तो ये बहाना मत बनाइए, हमारे देवर चढ़ेंगे सबके सामने। अब देखिए, सुलाकी की कुल बात सही होती है। छिनरपन जाकर अपने भैया के पास मायके में दिखाइयेगा, अब तो बिना हमारे देवर का मोटा मूसर घोंटे कोई बचत नहीं है।"


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"अरे फुलवा, उसके बाप का लौंड़ा तो पहले दिन से रोज बिना नागा घोंटती थी, तो उससे क्या डरूंगी? पहले भौजाई और उसकी बहन लोग उसको तैयार करें, चूस-चूस के खड़ा-वड़ा करें, फिर देखना तुम सबके सामने खुद चढ़के निचोड़ लूंगी। खड़ा तो करो तुम सब!"



हँसते-खिलखिलाते उन्होंने दूल्हे की भौजाइयों और बहनों को चिढ़ाया भी और चैलेंज किया, पर बुच्ची और मुन्ना बहू एक साथ बोल पड़ीं।


"अरे खड़ा नहीं करना पड़ेगा, वो हरदम खड़ा रहता है!"

बुच्ची और मुन्ना बहू एक साथ बोलीं, लेकिन बुच्ची धीरे से शर्मा गई।

बड़की ठकुराइन ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा। तभी उनकी छोटी ननद, नीतू भी उस झुरमुट में आ गयी और चांदनी तथा फुलवा से बोली,

"हमारी भौजी को कम मत समझना, सच में, सूरजु दूल्हे का, अपने बेटे का निचोड़ लेंगी।अपने भाइयों का बचपन में भौजी ने नहीं छोड़ा तो "



नीतू रिश्ते में ननद थी, उन्हीं की पट्टी की, एकदम बगल की।


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लेकिन जब बड़की ठकुराइन गौने उतरी थीं, तो वो गोद में थी, मुश्किल से साल भर की रही होगी। लेकिन पहले दिन से ही दोनों लोगों में दोस्ती हो गई। लेकिन ननद तो ननद, चाहे जो उम्र हो। तो पहली बार में ही जो उन्होंने गारी गायी, तो नीतू ननद को नहीं छोड़ा; और उसके बाद कहीं रतजगा हो, गाना हो, तो नीतू उनके साथ होती थी। और बिना नीतू ननद को गरियाए बड़की ठकुराइन का गाना पूरा नहीं होता था। और वो असल देहाती गारियाँ—गदहा, घोड़ा, भाई, बाप—कोई नहीं छोड़ती थीं बिना नीतू ननद पर चढ़ाए।

सूरजु से मुश्किल से डेढ़ साल बड़ी, लेकिन ननद तो ननद।



दो साल पहले ननद का बियाह था, तो सबसे आगे बड़की ठकुराइन थीं—काम-काज में भी और मंडप में गारी गाने से लेकर कोहबर छेंकने और कोहबर में दूल्हे की रगड़ाई करने में भी।

लड़के का नाम अर्जुन था, लेकिन देह भीम की थी, खूब तगड़ा कसरती। और बड़की ठकुराइन ने कोहबर में दूल्हे का नाम लेकर खूब चिढ़ाया,

"ननदोई जी, अर्जुन तो अपने मामा की बिटिया से, सुभद्रा से... तो तुम भी अपनी ममेरी बहन से... चलो, बियाह तो हमारी ननद से हो गया, लेकिन सुहागरात तो अपनी सुभद्रा के साथ,... वो मामा की बिटिया के साथ जरूर मनाये होंगे। अब लजाओ मत, बता दो।"



क्या-क्या दुर्गति नहीं की उन्होंने अपने नन्दोई की!
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लिपस्टिक, सिन्दूर, यहाँ तक कि अपनी ब्रा भी उसे पहना दी।





ननद सूरजु से डेढ़ साल बड़ी थीं, तो वो लड़का भी, अर्जुन भी, ज्यादा से ज्यादा तीन-चार साल बड़ा होगा। पर नन्दोई तो नन्दोई, ....सलहज तो साली से भी ज्यादा!



लेकिन बड़की ठकुराइन के नन्दोई ने बदला लिया खिचड़ी के समय।



खिचड़ी के समय दूल्हा रूठ गया। खिचड़ी सलहज खिलाती है, तो ये जिम्मेदारी भी बड़की ठकुराइन की थी और उन्होंने एक से एक गारी सुनाई। सब कुछ दिया गया था और वो खुद दूल्हे से पूछने लगीं,

"क्या चाहिए, दूल्हा, मुंह खोलकर बताओ?"



लेकिन दूल्हा एक चुप, हजार चुप।



सास आयी, फिर भी दूल्हा चुप।

लेकिन वो एकटक अपनी सलहज की ओर देख रहे थे, तो बड़की ठकुराइन ने फिर पूछा।



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तो दूल्हे ने मुस्कराकर इशारा किया कि वो अपनी सलहज के कान में कुछ बोलेगा, जो उसे मांगना है। बड़की ठकुराइन ने कान बढ़ा दिया, और जैसे-जैसे दूल्हा कुछ बोलता, पहले तो उनके गाल लाल हुए, कुछ शर्मायीं, कुछ मुस्करायीं, फिर हंसने लगीं।



मंडप का टेंशन उस हंसी में घुल गया। फिर वो दूल्हे से बोलीं,



"तुम्हारी महतारी कुछ सिखाके भेजी थीं कि अपने नए समधी को याद करके ऊँगली करने में लगी थीं? अरे, जो कान में कह रहे हो, वो एक बार सबके सामने अपनी दुलहिनिया, मेरी ननद के सामने मांगो, गांड काहे फट रही?"



और दूल्हे ने बड़ी ठकुराइन की ओर इशारा करके बोल दिया। उसे सलहज चाहिए थी। सब लोग मुस्कुराने लगे, लेकिन जवाब सलहज ने ही दिया, अपनी ननद के बगल में बैठकर,



"पहले तो आज रात ही हमारी ननदिया का गुल्लक फोड़ दीजिए, बेचारी बहुत दिन से इन्तजार कर रही है। एक बार अपनी सलहज के कहने पे कसके कचर दीजिए न इसको! बस उसके बाद तो, अब अगली बार ससुराल आओगे न ननदोई जी, ननद के पास नहीं जाने दूंगी। बस सलहज ही तीनों टाइम जेवनार कराएगी, और तुम्हें कहने की जरूरत नहीं है,... खुद निचोड़ लूंगी।"


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आज हल्दी की रस्म के समय वही नीतू ने अपनी भाभी को याद दिलाया,



"आपके नन्दोई भी आए हैं और आपका वायदा याद दिलाने के लिए बोलें हैं।"



हँसते हुए बड़की ठकुराइन बोलीं,

"अरे, मैं भी इन्तजार कर रही थी। पहले तो उनकी गांड में अंदर तक हल्दी लगाती हूँ और फिर देखती हूँ कितना दमदार मूसल है हमारे ननदोई का।"



तो आज नेछु के समय लड़कियों ने देखा था कि बड़की ठकुराइन भी थोड़ी थकी लग रही थीं और उनका पेटीकोट उलट गया था।

तो बस वही नन्दोई... बड़की ठकुराइन ने नीतू के दूल्हे के पिछवाड़े हल्दी तो जमके लगाई, अंदर भी ऊँगली की, लेकिन उनके नन्दोई ने भी पलटके चढ़ाई की,सूरजु दूल्हे के महतारी के ऊपर, जवान मर्द मोटा लौंड़ा कूच के रख दिया।
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और ननदोई-सलहज की पहली मस्ती एक बार में तो उतरती नहीं, और उन्होंने अपने नन्दोई से वादा किया था, तो बस अगला राउंड भी हुआ नीतू के दूल्हे के साथ।

और अबकी सलहज चढ़ी नन्दोई के ऊपर।

मूसल दमदार था, लेकिन बड़की ठकुराइन तो बड़की ठकुराइन—घोंटा भी, रगड़ा भी और जमके निचोड़ा भी। भले उनके बेटे से मुश्किल से दो-तीन साल बड़े थे वो, लेकिन ननदोई तो ननदोई, कौन सलहज नन्दोई को बिना रस निचोड़े छोड़ती है जो वो छोड़तीं!



नीतू ननदिया इशारे से वही बात कह रही थी, और तभी दूल्हे की दो बुआ, बड़ी ठकुराइन की गाँव की ननदें और आ गयीं। दोनों ही उनसे चार-पैसे साल छोटी होंगी, ३२-३३ के आस-पास की, जो भतीजे की शादी के लिए खास आईं थीं।



एक चंदा, पश्चिम पट्टी की, जिधर की सुशीला चाची और चंदौली वाली थीं; और बसंती, पूरब पट्टी की, जिधर की बड़की ठकुराइन।

और दोनों मिलकर बड़की ठकुराइन के पीछे पड़ीं, लेकिन तब तक सुशीला चाची और चंदौली वाली भी आ गईं बतरस का मजा लेने और अपनी जेठानी की रक्षा करने।



"हे भौजी, हम लोग बचपन में बहुत देखे थे जब हमारा भतीजा छोटा था, तब खूब उसकी नूनी में तेल लगाती थीं, मालिश करती थीं। अब मोटा लौंडा हो गया है, तो अब पकड़ने में काहे डर रही हो?"
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चम्पा ने चिढ़ाया, तो बसंती क्यों छोड़ती, वो पीछे पड़ी,



"अरे चम्पा, बचपन को छोड़ो, अब तो बहुत बड़ा हो गया ।"



"सरजू की, कि उसका लौंड़ा?"

चंदौली वाली ने अपनी ननद बसंती को छेड़ा।



"अरे भौजी, आप भी न! अरे एकदम कड़क फड़फड़ा रहा था, लेकिन हमारी भौजी..." वो बोली।



"अरे, हम तो सुने हैं कि तेल के साथ शिलाजीत और न जाने क्या-क्या मिलाकर आप लगाती थीं, है ना?" दूल्हे की भाभी, चांदनी ने अपनी सास को चिढ़ाया।



"फायदा तो बहन-भौजाई ले रही हैं ना!"



बुच्ची उनके बगल में चिपकी खड़ी थी, उसे दबोचते हुए गाल सहलाकर बड़ी ठकुराइन भी चिढ़ाते हुए बोलीं।


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लेकिन आज उनकी ननदें नहीं छोड़ने वाली थीं।



"अरे भौजी, जो पेड़ लगाया, पानी दे-देके, खाद डालकर इतना मोटा-लम्बा किया, तो वो नहीं फल खायेगा तो अच्छा लगेगा क्या?" चंदा बोलीं।



"अरे खायेंगी-खायेंगी, और जो ज्यादा छिनरपन की ना दूल्हे की महतारी, तो हम सब हैं ना—दूल्हे की भाभी, बहन, बुआ, जबरदस्ती चढ़ायेंगे इन्हें उसके ऊपर।" और अब मुन्ना बहू भी मैदान में आ गयी थीं और गाँव की एक-दो और बहुएँ भी आ गयी थीं, भरौटी और अहिराने की। रमुआ बहू अहिराने वाली और दुलारी भरौटी की।
 
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ननद-कच्ची अमिया

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और अब थोड़ी देर के लिए गाना रुक गया था।

सब औरतें-लड़कियाँ अपनी नई अलग गोल में थीं।

मीना पे शीतल मौसी की निगाह बड़ी देर से टिकी थी। बस आती हुई कच्ची अमिया, मुंह में खटरस का स्वाद उनके आ रहा था, उनसे न रहा गया।

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उन्होंने अपनी बेटी रमा को उकसाया और रमा मीना के पास आई। रमा पटा कर मीना को ननिहाल वाले झुण्ड में अपनी माँ के पास ले आयी। सूरजु के ननिहाल की नाउन देख रही थी और उससे ज्यादा समझ रही थी, वो भी शीतल मौसी के पास आई। मीना अब शीतल मौसी के पास थी, रमा के पास गाँव की और लड़कियों का झुण्ड इकट्ठा हो गया था।

रीना को सुधा भाभी ने अपने पास बैठा रखा था और वो लखनऊ की फैशन वाली, अंग्रेजी स्कूल वाली लड़की के साथ गाँव के मजों के बारे में बात कर रही थीं।


सुशीला चाची और चंदौली वाली औरतों के साथ खुलकर हंसी-मजाक कर रही थीं।



बड़की ठकुराइन ने रीना के टाइट अधखुले टॉप में उछलती दोनों गोलाइयों और छोटी सी स्कर्ट से झांकते गोरे-गोरे मांसल नितम्बों को मुस्कराके देखा और भरौटी वाली दुलारी को छेड़ा। (जब बत्ती गयी थी, तो दुलारी ने ही रीना का पीछे से हाथ पकड़ा था और सुधा भाभी के साथ मिलकर टॉप खींच दिया था, फिर दोनों भौजाइयों ने ननद के जोबन एक-एक बांट लिए और खूब मसला। उसी तरह अहिराने वाली रमुआ बहू ने मीना के उभारों को—क्या कोई मर्द रगड़ेगा—उस तरह रगड़ा।

रीना को देखते हुए दुलारी से वो बोलीं, "खूब ननद के गेंद का मजा ली हो, लेकिन अब अपने देवर लोगों को भी तो दिलवाओ।"


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"सच में एकदम स्पंज, मुलायम भी, कड़ी भी और गेंद की साइज। बस अब उसको मरद के हाथ की जरूरत है।"

दुलारी रीना की ओर देखकर बोली।



"अरे, मरद के हाथ की नहीं, लंड की जरूरत है! अरे, हमारी ननद होती ना, तो कल गुल्लक फुड़वा देते और देवर साले का नंबर तो लगता ही, अपने भाई को भी बुलाकर चढ़ा देती। लेकिन तुम सब आजकल की भौजाई..."

बड़की ठकुराइन, दूल्हे की माई आज खुल के मस्ती में थीं। उन्होंने अपनी बहुओं को चढ़ाया।



"अरे तो हमारे भाई कौन दूर हैं? हमारे और दुलारी दोनों का मायका तो बगल के ही गाँव में है," रमुआ बहू बोली।


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"पर ये सब शहर की लड़की, हो तो गयी हैं एकदम लेने लायक। गाँव में होतीं तो सच में जैसा कपड़ा पहनकर बैठी हैं, गोल-गोल चूँची झलका रही हैं, कोई पकड़कर गन्ने के खेत में मोटा गन्ना खिला दिया होता,"

दुलारी मीना और रीना को देखकर बोली।



"अरे, मेरा मानो तो गन्ना और अरहर के खेत का मजा जब तक ननद गाँव में आकर न ले ना, तो भौजाई की नाक कटने वाली बात है। अरे, ऐसा मुलायम चूतड़ जब तक भरौटी और अहिराने के लौंडे सब पकड़कर खुले खेत में दिन-दहाड़े न रगड़ें, और ये चूतड़ से रगड़-रगड़कर खेत का ढेला फूट जाए, गाँड़ से रगड़-रगड़कर धूल-मिट्टी न हो जाए... और एक साथ एक-दो नहीं, तीन-चार, एक का सटका अंदर निकले, तो दूसरा पहले से तैयार हचक के पेल दे।"

बड़की ठकुराइन फिर बोली।गाँव की अपनी बहुओं और उन लड़कियों की भौजाइयों को चढ़ाते, उकसाते बोलीं। और जब एक बार उनकी ओर से हरी झंडी मिल गयी तो फिर गाँव में लौंडो की कौन कमी।



"और गाँड़ अलग मारे ननदन की!"

हँसती हुई मुन्ना बहू बोलीं। वो भी एक बार फिर बुच्ची और इमरतिया के साथ आ गई थीं। दोनों गाँवों की लड़कियों को खूब चिढ़ा रही थीं।


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सूरजु भैया की महतारी ने बुच्ची को अपनी अंकवार में भरकर कसके दबा दिया और आँख मारकर दुलारी और रमुआ बहू से मुस्कराकर बोला,



"अब यह तुम्हारी छिनार ननद भी हम लोगों की बिरादरी में आ गयी है, क्यों रे भाई रखनी?"



पर मुन्ना बहू ने बुच्ची के चूतड़ पर कसके चिकोटी काटकर बोला,

"अरे बड़की ठकुराइन, ....अभी पिछवाड़े का बाकी है।"



सूरजु की माई ने बुच्ची की स्कर्ट उठाकर चूतड़ पर कसके एक हाथ मारा, और सीधे पिछवाड़े की दरार में अपनी एक ऊँगली ठेलते हुए बोलीं,

"अरे भाई चोद, ये किसके लिए बचा रखी है?" प्यार से दुलराके, रमुआ बहू और दुलारी को सुनाती हुई बुच्ची से बोलीं,

"अरे सुन, अभी तो पूरी रात बाकी है। आज तो तू पूनम और लीला कोहबर में ही रहोगी, तो बस जैसे गाना-बजाना ख़तम हो, तो पीछे वाला बाजा बजवा लेना।"

लेकिन शादी-बियाह में बहुएँ-कामवाली कोई भी सास को, दूल्हे की माई को रगड़ने का मौका नहीं छोड़तीं, तो मुन्ना बहू ने बुच्ची को गरियाते हुए बोला,



"हे छिनार, छिनरपन मत कर! उस छिनार के जने, अपने बहनचोद भाई से बोल देना, अगवाड़े का रास्ता तुम खोले हो तो क्या पिछवाड़े के लिए भौजी के भैया को बुलाऊँ?"



बड़की ठकुराइन की नजर सब लड़कियों पर फिसल रही थी और लीला पर रुक गई।

अहिराने की भौजाई उसके फ्रॉक में हाथ डालकर नाप-जोख कर रही थीं, तो बड़की ठकुराइन ने लीला को देखते हुए बुच्ची से बोला,

"लीलवा को मिलवायी थी अपने भैया से? आज रात से वो भी रहेगी तुम सब के साथ यहीं छत पे कोहबर रखाने।"



"हाँ, हम और इमरतिया भौजी लीला को मिलवा दिए थे। फिर शाम को पूनम दीदी के साथ भी वो गयी थी। और फिर गाना ख़तम होने के बाद मैं जाऊँगी ना भैया को देखने, तो लीलवा को भी साथ ले जाऊँगी।"

बुच्ची की आँखों में जो चमक थी, साफ़ था वो समझ रही थी कि लीलवा को 'क्या करवाने' ले जाना है भैया के पास।

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बड़की ठकुराइन ने रीना और मीना की ओर इशारा किया, बुच्ची को, और हल्के से मुस्कुरायीं।



मीना और रीना दोनों एकदम गर्म माल लग रही थीं।

रीना के छोटे-छोटे उभार टाइट टॉप से उभरकर बाहर छलक रहे थे। बुच्ची भी समझ गई और उसने बड़की ठकुराइन का ध्यान रूपा की ओर दिलाया, जो उनके मायके से आई थी। एकदम रीना की ही उम्र की होगी, वैसे देखने में भोली लग रही थी।

दूल्हे की माँ की बारी थी मुस्कराने की, बुच्ची को देखकर।



लेकिन गाँव की लड़कियों पर अब बड़की ठकुराइन की निगाह घूम रही थी और उनकी निगाह एक हल्की सांवली रंग की किशोरी पर पड़ी, जो लीला से हंसकर बतिया रही थी। उम्र में तो लीला से भी कम लग रही थी, लेकिन नमक जबरदस्त था।



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बड़ी ठकुराइन की निगाह अब उसी लड़की पर टिकी थी और दुलारी से उन्होंने पूछा,

"यह कौन है, मैं पहचान नहीं पा रही हूँ, जो लीलवा के साथ है?"

"अरे, कोयराने की है, इमली; जोखन बहू की बिटिया, । वो तो मायके गयी हैं, तो यही अकेले आयी है," दुलारी ने बताया।

बड़की ठकुराइन की निगाह उसी पर चिपक गयी थी, फिर धीरे से जैसे खुद से बोलीं, "अभी तो छोटी लग रही है।"



"अरे, छोटी-वोटी कुछ नहीं है, ठकुराइन!"

हंसकर रमुआ बहू बोली,

और दुलारी ने मामला साफ़ किया, "अरे, पूरब पट्टी के बबुआने के चार-पांच लौंडे पड़े हैं पीछे। असो फागुन के पहले अपनी पिचकारी से सफ़ेद रंग खिला देंगे पक्का,"

दुलारी ने गाँव का असली हाल बताया।


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और अब पूनम भी लीला और इमली के साथ बैठकर मजे से बतरस कर रही थी।



"दुलारिया एकदम सही कह रही है ठकुराइन, पूनम को मैं बोल दूंगी।"

"अरे हम दोनों हैं ना ठकुराइन! तुम्हारा बेटवा है लेकिन देवर तो हमारा भी है," दुलारी रमुआ बहू के कंधे पर हाथ रखकर बोली।

बिन कहे गाँव की औरतें और बुच्ची दूल्हे की माई का मन समझ गई थीं। मुन्ना बहू और इमरतिया से तो कल बड़ी ठकुराइन ने साफ़-साफ़ कह दिया था, और आज वो लीला को ले आई थी।

सबसे पहले तो बुच्ची का ही नंबर लगा।

पांच-छह दिन ही बचा था अब बरात जाने में। दुलहिनिया के आने के पहले सूरजु अगर पांच-छह एकदम कच्ची कुंवारियों की सील फाड़ दे, कसी बिल अच्छी तरह से रगड़-रगड़कर पेल दे, तो दुलहिनिया के आने पर उसकी झिझक एकदम ख़त्म हो जायेगी। और फिर वो...



सूरजु की माई की समधिन ने दस बार कम से कम कहा होगा,

"हमारी बिटिया पढ़ी-लिखी है, गाँव वाली नहीं; दसवीं का इम्तहान दिया है, तो ज़रा आप लोग भी संभलके। बस इस बात का ध्यान रखियेगा कि वो पढ़ाई वाली है।"



बड़की ठकुराइन के मन में ये बात जोर से उठी, "अरे, पढ़ाई कर रही है तो क्या चुदाई नहीं करवाएगी? तो फिर उसकी महतारी भेज काहे रही है, अपनी गोदी में बिठाये रखती।" लेकिन मारे शराफत के वो बोली नहीं। लड़की देखने में अच्छी थी—रंग-रूप सब। और इतनी मुश्किल से सूरज बियाह के लिए दो महीने पहले तैयार हुआ, और वो तो रामपुर वाली भौजाई थीं जो उसको समझा-बुझाके... फिर उन्हीं से सूरजु बोला, वरना तो वो ऐसा कसके लंगोट बांधा था।



तो सिर्फ बड़की ठकुराइन नहीं, सूरजु की सब भाभियाँ, बहनें, चाची, मामी, बुआ यही चाहती थीं कि जब वो दसवीं में पढ़ने वाली आये, तो सूरजु ऐसी जबरदस्त उसकी रगड़ाई करे। और पहले दिन तो टांग उठाने के पहले सब लड़कियाँ नखरा करती हैं, लेकिन महतारी की जिम्मेदारी है कि बिटिया को समझा-बुझाके भेजे। पर यहाँ तो महतारी खुद बार-बार दसवीं की दुहाई दे रही थी। और सूरजु इतना लजाधुर सीधा कि दुलहिनिया मना कर देती तो वो मान भी जाता।

लेकिन अब पांच-छह की सील अगर तोड़ देंगे बियाह के पहले, रगड़-रगड़कर उस दसवीं वाली से छोटी लड़कियाँ, ....तो वो ये बहाना नहीं दे पाएगी।



बुच्ची जब फड़वाके उतरी, तो ठकुराइन ने खुद देखा और उनका सीना गज भर का हो गया। उनके पूत ने जिस तरह रगड़ा था, एकदम अपने बाप पर गया था। और फिर लीला का भी...



रीना, मीना और रूपा को भी उन्होंने देख लिया था और ये इमली... लेकिन जिस घर में शादी-बियाह का काज होता है, मालकिन की आँख दस जगह होती है।



उन्होंने देखा कि गाना-बजाना हल्का हो गया था, महफ़िल का रंग ढीला पड़ रहा था, तो बस उन्होंने कलुआ की माई को बुलाया और उसके साथ बुच्ची, पूनम और मुन्ना बहू को लगाया—महुआ का एक दौर और।

गाते-गाते लगता है गला सूख गया है सबका, और जो शहर से आईं लड़कियाँ हैं ना, उनको तो दुहरा डोज।

और फिर उन्होंने दुलारी और रमुआ बहू को लगाया कि ज़रा अहिराने, भरौटी और कहारौटी से आयी औरतों को बोलें कि थोड़ा ढोलक टंकाएँ और नाच-गाना हो। और फिर उन्होंने मीना, रीना और शहर से आईं बाकी लड़कियों की ओर भी इशारा किया।



बस थोड़ी देर में ढोलक टनकने लगी, पायल खनकने लगी और महुआ की बोतलें खुल गईं। कुछ सीधे से कुछ को जबरदस्ती।

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इमली को मुन्ना बहू ने पूरी बोतल चढ़ा दी, और रीना को सुधा भाभी ने कुछ समझाकर, कुछ जबरदस्ती। मीना शीतल मौसी के पास बैठी थी, उनकी नाउन दुलारी ने मीना को भी एकदम अच्छी तरह से टुन्न किया।



गाने से ज्यादा नाच हो रहा था, एकदम गाँव की औरतें, गाँव के गाने और कोई बच नहीं रहा था रगड़ाई से। गाने भी एकदम खुलके, और नाच भी—नाच कम था, लड़कियों की रगड़ाई ज्यादा थी। कोई नहीं बची जिसकी स्कर्ट न उठी हो, शलवार का नाडा न टूटा हो, और ज़मकें ऊँगली न की गई हो।



और तब तक इमरतिया और मुन्ना बहू ने सब ननदों के लिए ख़ास ऐलान किया,



"एक ख़ास ऐलान! जितनी यहाँ बैठी कुँवारी लौंडियाँ हैं, सब कान, चूत, गाँड़ सब खोलके सुन लें और नहीं तो उनके बगल में बैठी भौजाइयाँ अपनी-अपनी ननदों का सब छेद ऊँगली से फैलाके खोल दें। कोई लौंडिया यह न कहे कि वो नहीं सुनी। बड़की ठकुराइन का हुक्म है। परसों एकदम भिन्सारे मुंह-अँधेरे आम की बाग़ में मटमंगरा होगा, और उसके पहले जितनी का दरवाजा नहीं खुला है, सब खुलवा लो। और नहीं तो भौजी लोग अपनी-अपनी मुट्ठी कोहनी तक पेलेंगी। सोच लो, लौंडों के लंड से झिल्ली फड़वानी है या भौजाई की मुट्ठी से!"



सब भौजाइयों ने जोर-जोर से हो-हो किया, महुआ का रस चढ़ रहा था सबके। सुधा भाभी ने रीना को दबोचके कहा, "तो सोच ले किससे चुदवायेगी।"



"अरे दूल्हे से, अपने भैया से चुदवायेगी और क्या! कुल ननदें यह गाँव की भैया रखनी हैं, और हल्दी में देखी नहीं थी कुल बहनें कैसे अपने भैया के खूँटे पे रगड़-रगड़कर हल्दी लगा रही थीं।" दुलारी बोली।



रीना मुस्कराने लगी। वो बाद में आयी थी, लेकिन देखा तो था ही नेकर में भैया का खूंटा; अरे गदहा-घोड़ा मात, और पूनम दीदी और बुच्ची दीदी आपस में बात कर रही थीं—बित्ते से बड़ा है भैया का।



दुलारी ने रीना के टॉप के अंदर हाथ डालकर उसके कड़े, निप्पल वाले उभारों को मसलते हुए कहा, “ये गेंद तो मरद के हाथ को तरस रही हैं।"



यह बात तो लड़कियों ने सुन ली, लेकिन अगली बात पर लड़कियों ने आसमान सर पर उठा लिया।



इमरतिया ने बोला था कि मटमंगरा में सब औरतें, लड़कियाँ सिर्फ साड़ी-ब्लाउज़ पहनकर आएंगी। अब शहर वाली तो सब टॉप-स्कर्ट में थीं, और गाँव में भी आधी लड़कियाँ या तो फ्रॉक या शलवार-कुरता पहनती थीं, तो साड़ी-ब्लाउज़ कैसे?



रमा, शीतल मौसी की लड़की, जो बम्बई से आयी थी और अंग्रेजी स्कूल में इंटर में पढ़ती थी, स्कर्ट-टॉप, तरह-तरह के ड्रेस और एक-दो शलवार-कुर्ती लायी थी, वही सबसे पहले चिल्लाई, "अरे, साड़ी तो चलिए मम्मी, मौसी, मामी, भाभी किसी की ले लेंगे, लेकिन ब्लाउज़, वो भी मेरे नाप का कहाँ से मिलेगा?"



"अरे तो मत पहनना ब्लाउज़, बिन्नो, मेरे देवरों का भला हो जाएगा," मंजू भाभी ने अपनी ननद को चिढ़ाया।



"और तेरे भाइयों के साथ तेरी भाभी के भाइयों का भी; बस साड़ी उठायी, झलक दिखला दी, लौंडों को भी आराम। आँचल हटाया, मसल दिया।"



रामपुर वाली को तो हरदम अपने भाइयों के फायदे की चिंता रहती थी—गप्पू और उसके दोस्तों की, तो वो और जोर से खुश होकर बोलीं।



लेकिन बड़ी ठकुराइन ने मामला सुलझा दिया, और बहुओं को डांटके बोलीं,



"तुम सब ना मेरी प्यारी-प्या प्यारी बेटियों को चिढ़ा रही हो। तुम सब अपने मायके में उघारे घूमती होगी? अरे, कल से दरजी लगेंगे, दुल्हन के और बाकी लोगों के कपड़े सिलने आएँगी दर्जिने, तो तुम सब भी अपने-अपने ब्लाउज़ सिलवा लेना, एकदम लेटेस्ट फैशन का, अपनी-अपनी नाप के कम से कम तीन-चार।"




लेकिन भाभियों का चिढ़ाना कम नहीं हो रहा था, "अरे, दरजी का लड़का तो हमारी ननद का यार है। उसको जोबन का उभार, नाप सब याद है, बिना नाप लिए बना देगा। हाँ-हाँ, चूँची के लिए सिलवाई में गुलाबो ले लेगा सिलवाई।"
 
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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग ११८- रतजगा में धमाल पृष्ठ १२३२

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