If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.
भाग -११५ बुच्ची,नेछु की रस्म और, किस्से बुच्ची की माई के
३९,९५,६०९
पूनम, मंझली मामी और, …
सूरजु के मामा ने ज़रा-सा दरवाजा खोलकर झाँका।
कोई नहीं था। पहले कांती बूआ और फिर वो निकल गए।
बुच्ची भी सम्हल-सम्हल कर पुआल पर से उतरी और उस कुठरिया से निकल कर बाहर।
उसके आँखों के सामने बार बार अपनी मौसी, कांती बूआ और मंझले मामा की चुदाई घूम रही थी, कैसे हचक के वो पेल रहे थे, क्या ताकत थी, हाथों में… धक्को में, और आधे घंटे तो कम से कम चली होगी। मंझले मामा की देह कितनी तगड़ी, और खूंटा भी एकदम तना था, कड़ा कितना होगा, बुच्ची की मौसी के चीथड़े कर दिए, मर्द हो तो ऐसा, और फिर हथौड़े की तरह मंझले मामा की बात दिमाग में घूम रही थी,
" अरे तो जो बीज लगाया हो ,...उसको पेड़ का फल खाने का हक नहीं है क्या "
एक बार नहीं बार बार और जैसे बुच्ची ने खुद से जवाब दे दिया,
" काहे नहीं है, …. एकदम है "
लेकिन बुच्ची गलियारे से आँगन में नहीं घुसी।
सूरजू भैया अभी भी आँगन के बीचों-बीच पीढ़े पर अकड़कर बैठे थे। हल्दी की रस्म का पीला हंगामा अभी-अभी थमा था—मिट्टी के फर्श पर हल्दी के छींटे ऐसे चमक रहे थे जैसे सरसों का खेत घर में ही उग आया हो। औरतों की खिलखिलाहट की गूँज अब भी हवा में तैर रही थी, कहीं कोई ढोलक की थाप पर उँगलियाँ आज़मा रहा था, तो कहीं बड़की चाची पान लगाते-लागाते अगली रस्म की खबर ले रही थीं।
पर बुच्ची समझदार थी। उसे मालूम था—भौजाइयाँ अभी थकी नहीं होंगी। हल्दी का बदला अभी पूरा कहाँ हुआ! कोई न कोई उसे पकड़ कर फिर से पीला कर देगी, या चुटकी काट-काट कर छेड़ेगी— “अरे, अगली बारी तेरी है रे!”
सो बुच्ची ने दाँव बदला।
गलियारे से फुर्र होकर वह दालान में पहुंची—सीधे मर्दों के इलाके में। वहाँ खटियों पर गाँव के बूढ़े-बाबा गमछा डाले बतिया रहे थे—किसान-सभा से लेकर बैलों की जोड़ी तक सब पर चर्चा। हुक्का गुड़गुड़ा रहा था।
घर की बेटी थी, उसका न कोई परदा था न घूंघट। वह हवा की तरह पूरे घर में घूम सकती थी।
दालान से वह आहिस्ता-आहिस्ता कुएँ की ओर खिसकी। कुएँ के पास रस्सी की चर्र-चर्र, पानी खींचती औरतों की बातों में घुली हँसी, और भीगी मिट्टी की सोंधी गंध—सब कुछ मिलकर जैसे कोई अलग ही दुनिया रच रहे थे। वहीं से घर की दीवार से सटी पतली गली निकलती थी, जो पीछे वाले दरवाज़े तक जाती। उसी दरवाज़े से काम करने वाली या पड़ोस की औरतें आया-जाया करती थीं।
बुच्ची उसी गली में बिल्ली-सी सरकती हुई पहुंची। उसका इरादा साफ था—भीतर भी रहना है, पर पकड़ में नहीं आना है। मौका देखकर किसी टोली में घुस जाएगी और ऐसे मासूम चेहरा बना लेगी जैसे अभी-अभी आई हो।
वह कभी कुछ सोचकर मुस्कुराती तो कभी कुछ इरादे करने लगती है।
बुच्ची को अपनी मौसी, कांती बूआ और मंझले मामा की बातें याद आ रही थी की कैसे बुच्ची की माई ने जब बुच्ची से साल भर से भी ज्यादा छोटी थीं तो अपने भौजी के भाई के साथ, ….और दो दिन में छह बार और चार बार पिछवाड़े भी, …और बुच्ची का अभी खाता भी नहीं खुला,
उसने इरादा कर लिया, सूरजु भैया के बाद गप्पू को पक्का,
वो स्साला डरेगा तो खुद चढ़ के और उसके बाद जो जो उसके पीछे पड़े हैं न सबको, बेचारे पिछले सावन से ललचा रहे हैं, शीलवा उसकी पक्की सहेली ने बीसो बार कहा, और एक बार अपने गाँव लौट गयी तो वहां तो बीसो मुश्किल
उधर सूरजू भैया की माई—यानी उसकी मामी—ने उसे दस बार समझाया था,
“अरे, खाली भौजाई उतार कर भाग जाने से काम ना चलेगा। रुको महीना-बीस दिन। गाँव का मजा लो। खेलो, कूदो, आम का बाग़ीचा घूमो, पोखरे पर जाओ। ननिहाल में ही तो असली मज़ा है! जो मन करे सो करो। न कोई मना करेगा, न रोके-टोकेगा। यही तो उम्र है जी भर के जीने की!”
अब इससे ज़्यादा खुली छूट कोई क्या देता! पर बुच्ची का मन भी बड़ा अलबेला था।
ननिहाल की आज़ादी उसे ऐसे भाती थी जैसे आम के पेड़ पर पहली बौर।
ऐसे माहौल में बुच्ची की खिलखिलाहट भी किसी चिड़िया की तरह पूरे आँगन में फुदकती फिरती—पकड़ी जाए तो हँस दे, बच निकले तो और हँसे। और आज तो घर में शादी थी—सो हर कोना कहानी बन जाने को तैयार था
लेकिन उसको सूरजु के मामा की बात याद आ गयी और वो धीमे धीमे मुस्कराने लगी,
" जो बीज लगाया है,... उसको तो फल खाने का हक सबसे पहले है",
तो क्या सूरजु के मामा भी नजर लगाए हैं उसपे?
अरे लगाए हैं तो लगाए रहे अब उन्हें और लचायेगी वो और पूनम दीदी ने तो बोला था की
" जिसे हम बड़े उमर वाला समझते हैं न वो और छिनरा होते हैं, ख़ास तौर से कच्ची उमर वालियों को देख के,... और मजा भी लेकिन उनके साथ आता है।"
सही बात है जिस तरह से रगड़ रगड़ के वो कांती बूआ को, …बुच्ची की मौसी को पेल रहे थे, बुच्ची एकदम गीली हो गयी थी।
उसने तय कर लिया, बहुत हो गया, अब ताला नहीं लगाएगी… खुला दरवाजा। आजाये जिस स्साले को आना है, उसके भैया, भौजी लोगों के भैया, और गाँव के यार। बहुत दिन उपवास हो गया, अब एक दिन भी नागा नहीं होगा और दोनों जून दावत होगी।
जैसे ही बुच्ची कुएँ से मुड़ी, उसकी नजर अहिराने वाली पूनम दीदी पर पड़ी।
दीवार से सटी खड़ी थीं—ईंटों के एक ढेर पर चढ़ी हुईं—और सामने वाले कमरे की खुली खिड़की से भीतर झाँक रही थीं। उनकी चोटी हवा में हल्की-हल्की हिल रही थी और पाँव की पायल ईंट से टकराकर छन-छन कर रही थी।
बुच्ची को देखते ही उन्होंने आँख दबाई, उँगली से इशारा किया— “ए इधर आ, चुपचाप!”
बुच्ची बिल्ली की तरह दबे पाँव पहुँची।
पूनम दीदी फुसफुसाईं—
“चल, तुझे खेल दिखाएँ। सूरज भैया की मंझली मामी, बहुत हम सबको गरिया रहीं थीं न! ज़रा उनकी हालत देख!”
दोनों खिड़की से सटकर झाँकने लगीं।
अंदर का नज़ारा देख बुच्ची की आँखें गोल।
मंझली मामी सचमुच गाँव की चर्चा थीं। लंबी, गोरी, गठीली देह—कमर ऐसी कि सच में मुट्ठी में आ जाए। चाल में लचक, बात में मिठास, और हँसी में ऐसी खनक कि सामने वाला अपना नाम भूल जाए। और दो दो मुट्ठी में भी न आएं ऐसे बड़े बड़े डबल डबल साइज के कड़े कड़े गदराये जोबन और उनसे भी जानमारु चूतड़। आगे कोई पड़ जाए तो जोबन जान मार लें उसकी, और पीछे से चूतड़ होश उड़ा दें।
माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी, बालों में चमेली का गजरा, और कलाई भर-भर के कड़े।उनकी चाल जब आँगन पार करती तो लगता है जैसे कोई नाचती हुई बेल लहराकर निकल गई। और बोल? अरे, जैसे शहद घोलकर रखती हों ज़ुबान पर। मज़ाक भी खुलकर, ठहाका भी खुलकर। मायके में भी वही रानी, ससुराल में भी वही शान। यहाँ तक कि उनकी ननद की ससुराल तक में उनके किस्से पहुँचते थे।
और हाँ—उनकी रसमलाई!
जिसने एक बार चख ली, बस उसी का मुरीद।वो सिर्फ दीवाना ही नहीं करती थीं, दीवानों का मन भी रखती
जोबन लुटाने में न उन्हें उमर का लिहाज था न रिश्तों का, और उमर अभी उनकी ज्यादा थी भी नहीं, बड़की ठकुराइन से पांच छह साल छोटी ही थीं,
तो वही और पश्चिम पट्टी वाले चन्नर चाचा, एकदम कसरती, तगड़े और नंबरी छिनरा,
पहली चीज बुच्ची ने नोटिस की, सूरजु की मामी के जाँघों के बीच मलाई पूरी तरह लिपटी थी, और अभी भी चुनमुनिया से चू रही थी बूँद बूँद,
साफ़ था दूसरे राउंड की तैयारी थी,
कमरे के एक कोने में चारा काटने की मशीन रखी थी, और आधे कमरे में चारे के बंडल बंधा रखा था, एक बांस चारपाई रखी थी, जो काम वालों के बैठने, सोने के काम में आती थी , फर्श कच्चा था और एक खिड़की थी काफी ऊपर थी और ठीक से बंद नहीं होती थी जहाँ से पूनम और बुच्ची सिनेमा देख रही थीं।
चन्नर चचा के सिर्फ सीने के नीचे का दिख रहा था, वो खड़े थे, ...उनका खड़ा था और मंझली मामी, घुटनो के बल बैठीं थी, साड़ी उन्होंने चरी के बंडल पे रख दी थी,
ब्लाउज सिर्फ खुला हुआ था, पेटीकोट कमर तक उठा और कमर में लिपटा, और अपने मेंहदी लगे हाथों से उन्होंने खड़े खड़कते खूंटे को पकड़ रखा था, और खुला मुंह एकदम पास, उनके लिपस्टिक लगे रसीले होंठ मोटे सुपाड़े से बस थोड़े दूर,
" काहें तड़पा रही है , चूस न "
चाचा तड़पते हुए बोले, और मुस्कराके मामी ने बस अपनी लपलपाती जीभ से सुपाड़ा छू भर दिया और खिलखिलाने लगीं। जैसे खील बताशा,
और चाचा तड़प के रह गए, बोले, " ले लो न मुंह में, बस थोड़ा सा,
और मामी ने अपना चेहरा उठाकर बड़ी बड़ी काली काली कजरारी आँखों से उन्हें देखा जैसे पूछ रही हों " सिर्फ थोड़ा सा क्यों, इतना मस्त खड़ा है "
और गप्प से पूरा सुपाड़ा गप्प, एकदम लीची ऐसा
और वैसे ही वो चूस रही थीं धीरे धीरे रस लेकर,
लेकिन अब चन्नर चाचा से नहीं रहा गया, कस के मामी का सर पकड़ के उन्होंने ठेलना शुरू कर दिया, और मामी भी कम छिनार नहीं थी। होंठों से उसे चिपका कर, रगड़ते हुए, नीचे से जीभ से सहलाते हुए, धीरे धीरे, तिल तिल कर चूसते हुए घोंट रही थी, जैसे किसी कुँवारी कच्ची चूत में मोटा लंड दरेरते हुए जा रहा हो,
चाचा का भी कसरती बदन, अपनी भौजाई की भौजाई, डबल भौजाई के मुंह में डबल ताकत से वो पेल रहे थे,
और आधा घुसने के बाद मामी गों गों करने लगी, लेकिन चच्चा नहीं रुके
चुसाई ख़तम हो गयी, चुदाई चालु हो गयी और मामी का मुंह चोदा जा रहा था,चाचा कस कस के पेल रहे थे और मामी भी अपने मायके की खिलाडी, हलक तक चला गया उनके होंठ लटके हुए दोनों रसगुल्लों से चिपक गए, गाल एकदम फूल गया, आँखे बाहर को निकल रही थी, होंठों के किनारे से लार टपक रही थी, फिर भी वो पीछे नहीं हटी।
जीभ उनकी उसी तरह मुंह के अंदर जहां सुपाड़ा लंड के डंडे से मिलता है उस जगह पे रगड़ रही थी, होंठ चाट रहे थे और वो पूरी ताकत से चूस रही थीं।
चचा ने भाला बाहर निकला करीब करीब पूरा फिर धीरे करके ८ इंच का मोटा अपना गन्ना, रस से भरा मीठा मीठा, मामी को खिला दिया। एक बार फिर जड़ तक, हलक तक ठूस दिया,
दो चार बार तो धीरे धीरे लेकिन फिर वो ये भूल गए की चूत नहीं मुंह है, ...और क्या हचक के चुदाई की मामी की मुंह की,
देखने वाली पूनम और बुच्ची दोनों गरमा गयी थीं,
बुच्ची चुदी भले न हो लेकिन इमरतिया ने उसे अपने सूरजु भैया के गन्ने का स्वाद मुंह में तो दिलवा दी दिया था, और पूनम तो घाट घाट का पानी पी, ब्याहता, दीवानी दोनों हो रही थीं मोटे लंड के लिए।
पहल पूनम ने की, बुच्ची की स्कर्ट के अंदर हाथ डाल के उसकी चिड़िया पकड़ ली और लगी कस कस के भींचने,
उधर मामी की हालत खराब थी,
मायके ससुराल में उन्होंने बहुत गन्ने घोंटे थे लेकिन चन्नर चाचा के गन्ने की बात ही कुछ और थी, जितना सख्त उतना ही मीठा। और इसलिए भी अपनी ननद के ससुराल में आने का उनका बहुत मन करता था, और सूरजु तो एकदम घर के लड़के से भी बढ़कर,.... इसलिए पूरे १२ दिन के लिए आयी थीं, लिपस्टिक का सब रस उतर गया, आँख में लगा काजल गाल पे आ गया, पर न चुसाई कम हुयी न मुंह की चुदाई,
और दस मिनट की जबरदस्त मुंह चुदाई के बाद जब चच्चा ने निकाला तो चाची को कुछ इशारा नहीं करना पड़ा,
वो खुद उसी बांस खटिया को पकड़ के निहुर गयीं, बुरिया में पहली चुदाई की मलाई थी,
और चन्नर चाचा ने ठीक दिया, कुछ मुंह चुसाई से थूक से लग के लंड चिकना हो गया था, कुछ गीली बुर और बुर में पहली चुदाई की मलाई लेकिन इन सबसे ज्यादा चाचा के कमर की ताकत, जैसे किसी ने तान के पूरे जोर से मुक्का मारा हो।
मामी ने पूरी ताकत से बँसखटिया पकड़ रखी थी फिर भी हिल गयीं,
लेकिन धक्के पर धक्के लगते गए, इंच इंच कर के करीब करीब मोटा खूंटा अंदर था,
मामी कभी दर्द के मारे कहरती, कभी मजे से सिसकती, कभी पीछे मुड़ के चच्चा को चिढ़ाते हुए मुस्करा के कह देती और चच्चा अगला धक्का और कस के मार देते। जब एक दो इंच बाहर रह गया तो धक्के रुक गए और एक हाथ से चच्चा ने मामी का ब्लाउज अब पूरी तरह उतार के दूर फेंक दिया।
सीधे चारे की मशीन पर जा के गिरा।
और अब दोनों जोबन चाचा की मुट्ठी में ,
जिन उभारों को देख के जिस का कब से खड़ा होना बंद हो गया हो,बैद हकीम हार मान गए हों, उसका भी फड़फड़ाने लगे, वो दोनों जोबन अब कस कस के रगड़े मसले जा रहे थे।
कभी लगता है दबा दबा के चच्चा बुरी हाल करेंगे तो वो को चूँची छोड़ के निपल पकड़ लेते और कस के उस घुंडी को नोच लेते
कभी झुक के कचकचा के चूँची का ऊपरी हिस्सा काट लेते, जोर से पूरी ताकत से दांत गड़ा देते, जैसे कच्ची अमिया कुतर रहे हों। सबको मालूम था की मंझली मामी एकदम ही लो कट ब्लाउज पहनती हैं, जरा सा झुकीं तो निपल तक साफ़ दिखता है और गाँव में ब्रा का ढक्क्न तो चलता नहीं और सादी बियाह के घर में तो एकदम नहीं। और ऊपर से मामी बात बात में आँचल ढलकाती हैं
साफ़ था ये दांत के निशान तो ब्लाउज के बाहर ही रहेंगे और जरा सा आँचल मामी ने ढलकाया तो चाचा के निशान दिख जाएंगे।
" क्या कर रहे हो, काटो नहीं," मामी ने मीठी मीठी शिकायत की और जवाब में सूरजु भैया के चाचा ने सूरजु भैया के मामी का मीठा मीठा गाल कचकचा के कस के काट लिया।
साफ़ था ये दांत के निशान तो ब्लाउज के बाहर ही रहेंगे और जरा सा आँचल मामी ने ढलकाया तो चाचा के निशान दिख जाएंगे।
" क्या कर रहे हो, काटो नहीं ," मामी ने मीठी मीठी शिकायत की और जवाब में चाचा ने मामी के रसीले गाल फिर से काट लिए।
" काटना हो तो हमारी ननद की ननदिया की काट लो , और कोई नहीं तो बुच्चिया की माई आने वाली हैं पांच सात दिन में, उनसे तो बहुत याराना था तुम्हारा "
गाँव के रिश्ते से तो बुच्ची की माई, चन्नर चाचा की बहन लगती हैं, लेकिन उसी पट्टी की हैं और सीधे रिश्ते में भी बुच्ची की माई उनकी चचेरी बहन ही लगती हैं, एकदम सगी जैसी।
मामी ने चिढ़ाया तो चाचू ने जवाब में दूसरी चूँची पे और कस के काटा और पूरा लंड निकाल के जोर का धक्का मारा।
अबकी मामी चीख न रोक पायीं,
पर ननद की ननद की बात अपने को रोक नहीं पायीं और चिढ़ाते बोलीं,
" बहन का नाम सुन के लगता है ज्यादा जोश में आ गए हो, अरे तोहार बहिनिया, बुच्ची की माई आयी होतीं सामने तो बिना निहुरा के पेले छोड़ते नहीं। अरे बहिन, नहीं, उसकी बिटिया तो आई है, बुच्ची,... उसके जोबन भी आग लगा रहे हैं।
लेकिन पता नहीं बुच्ची की बात सुन कर या बुच्ची की माई की बात सुन कर,
कुछ हुआ की चच्चू ने गियर बढ़ा दिया और एक जोबन छोड़ के, क्या करारा चांटा मामी के दाएं चूतड़ पे मारा,
झन्नाटेदार, लाल रंग का फूल खुल गिया,
मामी के चेहरे का दर्द साफ़ दिख रहा था लेकिन अबकी वो दर्द पी गयीं, चीखी नहीं,
दूसरा चांटा बाएं चूतड़ पे पड़ा, पहले से भी तगड़ा
पूनम और बुच्ची सांस थामे देख रही थीं,
गिन के पांच चांटे और हर चांटे के साथ लंड का भी करारा धक्का, दोनों चूतड़ एकदम लाल हो गए थे जैसे कोयला दहक रहा हो, और जैसे ही चीखने के लिए मामी ने मुंह खोला तो चच्चू जैसे तैयार थे, जिस मुंह में थोड़ी देर पहले उनका लंड था, अब उन्होंने पूरे हलक तक तीन ऊँगली जड़ तक ठूंस दी थी।
चूतड़ परपरा रहा था, गले में एक दो नहीं पूरी तीन उँगलियाँ ठुंसी हुयी थीं, गों गों कर रही थी, लेकिन देह से लग रहा था मामी कितनी गर्मायी हैं। चूँचिया एकदम पत्थर हो गयीं थी, रोयें खड़े थे, और कस के दोनों हाथों से उन्होंने बँसखटिया के बांस को पकड़ रखा था,
चच्चू ने उँगलियाँ निकाली, सीधे पूरी ताकत से दो ऊँगली मामी के पिछवाड़े ठूंस दी,
वो चीखती उसके पहले दूसरे हाथ से उन्होंने मामी के मुंह को भींच लिया और गोल गोल घुमाते दोनों उँगलियों को एक एक ऊपर एक चढ़ा के दो पोर तक ठेल दिया,
पूनम और बुच्ची दोनों सांस रोके ये खेला देख रहे थे,
और मुंह छोड़ने के बाद फिर उस हाथ से चाचू ने मामी की पतली कटीली कमरिया पकड़ ली और लगे धक्के पर धक्के मारने, उस जबरदस्त चुदाई से मामी गांड में घुसी ऊँगली भूल गयीं, वो बोलने लगीं
" हाँ राजा, हाँ ऐसे,… अरे का चोदते हो, जो जो तोहसे चुदाई है वो आज तक नहीं भूल पायी, ओह्ह उह्ह्ह"
बिना धक्को को रोके गोल गोल घुमाते अब उन्होंने मामी की गांड में घुसी उँगलियों को और अंदर धकेलना शुरू किया और थोड़ी देर में जड़ तक दो उँगलियाँ गांड में थीं।
" हे इधर नहीं " मामी चीखीं और चन्नर चाचा को छेड़ा,
" तोहरी बहिनिया का, बुच्ची क माई क पिछवाड़ा नहीं है, …जो न उसके मायके वाले भी डुबकी मारते थे और उनकी भौजाई के मायके वाले भी, पिछवाड़े गोता मारते थे, तुंहु तो जरूर पिछवाड़े का मजा लिए होंगे, "
करीब करीब सुपाड़े तक खूंटा पूरा निकाल के, चन्नर चाचा ने पूरी ताकत से पेला, और बोले,
" अरे अइसन गोल गोल चूतड़, कौन मज़ा नहीं लेगा। गोल गोल चूतड़ हो तो गाँड़ न मारने से पाप लगता है। "
पीछे से धक्के का जवाब धक्के से देते हुए मामी बोलीं " अरे गोल गोल चूतड़ तो उनकी बिटिया का, बुच्ची का भी है, खूब कसमसा कसमसा के चलती है , एकदम मारने लायक हो गयी है।"
लग रहा था चन्नर चाचा को बुच्ची की माई याद आ गयी
" सही कह रही हो , अरे हम बुच्ची को देखे तो लगा की उसकी माई आ गयीं हैं, अच्छी खासी जवान हो गयी है, जोबन तो अपनी समौरियों से दूने, यही हालत इसकी माई का भी था, इस उम्र में तो कोई हफ्ता नहीं बचता था जब मैंने उसके पिछवाड़े,… कभी गन्ने के खेत में, कभी अमराई में कभी आते जाते ऐसी ही खींच के सरपत के पीछे, और अगवाड़े की तो गिनती नहीं …. कभी वो मना नहीं करती थीं, बल्कि अपने हाथ से अपना नाड़ा खोलती थीं। “
बुच्ची ने भी मन में गाँठ बाँध ली।
वो भी किसी को मना नहीं करेगी, और अपना नाड़ा खुद खोल देगी, बस कोई इशारा कर दे।
चच्चू ने सुपाड़े तक लंड बाहर निकाला एक पल के लिए रुके, कमर को फिर एक हाथ से कस के पकड़ा और पूरी ताकत से धक्का और धक्का सीधे बच्चेदानी पर लगा।
मामी कांप गई, मजे से भी, दर्द से भी और उस हथौड़े के झटके से भी।
पूनम ने अब कस-कस के बुच्ची की सुरमेदानी को रगड़ना शुरू कर दिया था।
दोनों लड़कियां खूब गरमाई थीं। एक-एक चोट साफ़ दिख रही थी।
लेकिन एक चीज जो दोनों नहीं देख पा रही थी लेकिन मामी महसूस कर रही थी, चच्चू जान रहे थे,
उन्होंने अंदर तक घुसी दोनों उँगलियों को चम्मच की तरह मोड़ कर अंदर की दीवालों को करोचना शुरू कर दिया, एक एक इंच अंदर का हिस्सा उनकी उँगलियों से रगड़ रहा था, दरेरा जा रहा था, कम से कम दस बार दाएं से बाएं और बाएं से दाएं
और दूसरा हाथ भी कमर छोड़ के जाँघों के बीच, घुस के अब कस कस के क्लिट को रगड़ रहा था, लंड भी अपने बेस से बुर के मुहाने पे रगड़ घिस कर रहा था।
मस्ती से मामी की आँखे मुंदी जा रही थीं। और उसी समय,....
पूनम और बुच्ची की आँखे फटी रह गयीं,
चच्चू ने पिछवाड़े जड़ तक घुसी दोनों उँगलियाँ निकाल के मंझली मामी के मुंह में ठेल दीं, जो हाथ क्लिट को तंग कर रहा था, उसे चाचू ने मम्मी के मालपुआ ऐसे गालों पर रख के बेरहमी से दबा दिया और चिरैया की चोंच की तरह मामी ने मुंह खोल दिया, और मामी की गांड से निकली ऊँगली मामी के मुंह में,....
और जब तक मामी समझे की ये उँगलियाँ कहाँ से निकल के आयी है वो हलक में, मामी के बालों की चोटी चाचू के हाथ में और उसे जोर से खींचते हुए, हड़काने लगे, मामी से कबूलवाने लगे,
" चूस स्साली छिनार कस के, लगा जोर, खूब थूक लगा ले, चूस और एक बात कान खोल के सुन लो, जबतक हो, रोज दोनों टाइम, बिना नागा, अगर एक बार भी नागा हुआ न तो ऐसी सजा मिलेगी, मेरा जहाँ मन करेगा वहां लूंगा, जैसे मन करेगा वैसे लूंगा, बोल हाँ "
मामी कैसे बोलती उनके मुंह में तो ऊँगली धंसी थी, पर सर हिला के उन्होंने हाँ में इशारा किया और जैसे ऊँगली बाहर निकली, हँसते हुए चाचू से बोलीं,
" स्साले अपनी बहिन महतारी के भंडुए, ...मेरी ननद की ननद के यार, तू क्या कहेगा, मैं खुद दोनों टाइम…"
और एक बात साफ़ करती हूँ, मेरी माहवारी परसो ही ख़तम हुयी है तो अब उसका भी डर नहीं है, अगले बीस दिन के लिए, जैसे मन करे वैसे लेना, जितना मन करे उतना लेना, जहाँ बुलाओगे तो आउंगी, नहीं बुलाओगे तो भी आउंगी और तेरे ऊपर चढ़ के चोद दूंगी "
मुंह से निकली उँगलियाँ फिर पिछवाड़े लेकिन अबकी दो नहीं तीन और कैंची की तरह फैला के और वहां से निकल के थोड़ी देर बाद मुंह में, चार पांच बार ये हुआ
और पांचवी बार जब उँगलियाँ मुंह में थीं, चच्चू ने खूंटा अपना मामी की बिल से बाहर निकला और पिछवाड़े के छेद के मुहाने लगा दिया। एक हाथ जो खाली था, उससे गाँड़ का छेद थोड़ा फैलाया और लंड का सुपाड़ा उसमें सेट कर दिया।
मामी जोर जोर से सर नहीं नहीं में हिला रही थीं।
पूनम और बुच्ची सांस थामे देख रही थीं। लेकिन चच्चू पूरी ताकत से ठेल रहे थे। और थोड़ी देर में जब सुपाड़ा पूरा अंदर पैबस्त हो गया तो उन्होंने मुंह से उँगलियाँ निकालीं।
वो समझ रहे थे और देखने वाली, पूनम और बुच्ची भी, की अब मामी लाख गाँड़ पटकें बिना गाँड़ मरवाये बचत नहीं है। जान तो मामी भी रही थीं, पर जैसे मुंह से ऊँगली निकली उंहोने चाचू की ओर सर घुमाके शिकायत की,
" हे उधर नहीं, बहुत दर्द होता है, ....एक तोहार महतारी गदहे से चुदवाय के गाभिन हुयी थी,.... और फिर पिछवाड़े,"
एक चांटा कस के लगा चूतड़ पे मामी के और चच्चू ने हँसते हुए चिढ़ाया,
" क्यों पिछवाड़ा, अपने किसी भाई के लिए रख छोड़ा है , हमरे स्साले के साले के लिए, लेकिन उस स्साले से बोल देना की अगर गाँड़ मरवाने का इतना ही शौक है न तो आ जाए, इस गाँव में लौण्डेबाज भी बहुत हैं, एक निकालेगा और दूसरा जाएगा और हम भी नहीं छोड़ेंगे "
और साथ ही दोनों चूँची पकड़ के इतना करारा धक्का मारा, की अबकी अंदर वाला छल्ला भी पार हो गया, मामी जोर से चीखीं, तड़पी, पूरी देह दर्द से दुहरी हो गयी। लेकिन मामी को गारी पड़ी थी तो वो बिना उन्हें गरियाये कैसे छोड़ देतीं,
" अरे गाँड़ मारने क इतना शौक है तो हमरे ननद क ननद, बुच्ची क माई आएँगी दो चार दिन में, तोहार बहिनिया, मारना उनकी गाँड़ हचा हच। अब ये मत कहना की अपनी बहिनिया की,.... बुच्ची की माई की नहीं लिए हो "
धक्के अब धीमे हो गए थे, आधे से ज्यादा खूंटा अंदर घुस गया था और ये नहीं था की चाचू ने मंझली मामी का पिछवाड़ा पहली बार मारा हो, और मामी भी मजे से चूतड़ हिला हिला के मोटे खूंटे का मजा ले रही थीं , चाचू भी नंबरी चोदू उन्होंने दो उँगलियाँ मंझली मामी की बुर में ठेल दी और दोनों ओर का मजा देते, मामी से बोले,
" देखो, सच बोलूं तो मैं क्या यह गाँव का कोई मर्द कसम नहीं खा सकता कि बुच्चिया का माई का नहीं लिया है। अरे बुच्चिया भी एकदम उसी की शक्ल पायी है, एक बार तो हम भी सोचे की ये का हो गया है, घडी की सुई का उलटी घूम गयी।
जिस उमर की बुच्चिया हैm,,,, उस उमर तक तो हम उसकी माई की दर्जनो बार ले चुके थे, और इतने प्यार से देती थी, कभी कहीं बुला लो, गन्ने के खेत में, आम का अमराई में, अरहरिया में , मक्के के खेत में, खुद अपने हाथ से नाड़ा खोलती थी, खुद बिना कहे अपनी टांग उठाती थी ,"
पूनम ने कस के बुच्ची के चूतड़ में चिकोटी काटी जैसे कह रही हो , " सुनो और समझो, काहें अब तक आपन चुनमुनिया बचाय के रखी है, कुछ नहीं तो अपनी माई से सीखो :
चच्चू बुच्ची की माई की याद में खो गए थे,
लेकिन वो मामी की चाल समझ गए तो हंस के बोले,
" लेकिन हमार बहिनिया, बुच्ची क माई तो अभी है नहीं तो तुम ही मरवाओ "
और फिर दोनों जोबन कस के रडते मसलते क्या गाँड़ मारी चच्चू ने मझली मामी की,
थोड़ी देर घोड़ी बना के मारने के बाद उन्हें खड़ी कर दिया और उस कुठरिया की दीवाल से चिपका के, खड़े खड़े ही मारने लगे, मामी का जोबन दीवाल से कुचला जा रहा था,, पिसा जा रहा था। लेकिन मजा दूना मिल रहा था,
पर वो भी सूद के साथ बात का जबाव देने में विश्वास रखती थीं, कस के पीछे से धक्के का जवाब धक्के से देते हुए बोलीं
" अरे तो बुच्ची क माई अभी नहीं है तो क्या, ,...आपन ताकत सम्हाल के रखो, भतीजे का बियाह है बिना भैया लोगो का लौंड़ा लिए बरात थोड़े बिदा करेंगी दुन्हा क बूआ। आएँगी वो भी,
लेकिन हाँ बस दो चार दिन के लिए, निचोड़ लेना।
और दूसरी बात है, बुच्ची क माई नहीं है तो उनकी बिटिया तो है,…. लेने लायक तो वो भी हो गयी है , माँ नहीं तो बेटी सही "
उनपर इस बात का क्या असर हुआ था , वो चच्चू के धक्के से पत्ता चला और पूनम ने कस के बुच्ची की बुलबुल दबोच ली जैसे बिन बोले कह रही हो देख तेरे कितने रसिया है।
" तू भी न , और आग लगाती है स्साली "
कस के चुम्मा लेते चच्चू बोले और अब तीन ऊँगली बुरिया में घुसेड़ दी, मामी झड़ने के कगार पे थी और फिर जोड़ा
"लेकिन बात छिनार सही कहती है, बिटिया एकदम माँ पे गयी है, ....वही रूप रंग बल्कि जोबन और जबरदंग हैं, नमक भी माँ से दुगना है, इस उमर में तो उसकी माँ ने पूरे बाईसपुरवा में कोई घर नहीं छोड़ा था।
मामी ने झड़ना शुरू कर दिया था, जोर जोर से सांस ले रही थीं, देह काँप रही थी, फिर जैसे ही थोड़ा थिर हुयी तो चच्चू को छेड़ा,
" अरे जबतक माँ नहीं है तो बेटी से काम चलाओ, और माँ आ जाये तो माँ बेटी साथ साथ , और तुम से न पटे तो मैं पटा दूंगी "
यह सुन के या धक्क्को का असर, चच्चू एकदम मामी से चिपक गए और पूनम और बुच्ची ने देखा की बूँद बूँद कर के मामी के पिछवाड़े से बीर्य की धार रिस रही है। मलाई उनकी जांघ पे,
लेकिन पुनम चालाक थी, बुच्ची से बोली, " अभी निकल चलो, उन लोगो के बाहर निकलने से पहले " और बुच्ची का हाथ पकड़ के एक दो तीन हो गयी।
बगल में भैंसे बंधी रहती थी, और पूनम बुच्ची को लेके वहीँ धंस गयी, और दोनों खिड़की से देख रही थीं की कैसे दीवाल का सहारा लेकर पहले मामी निकली और फिर चच्चू,। चच्चू बाहर के कुंए की ओर चले गए,
मंझली मामी किसी तरह सहारा लेकर रुकते हुए, गली की ओर मुड़ीं,
बुच्ची के कानों में मामी की बात गूँज रही थी।
क्या उसकी माई सच में, और अगर हाँ तो वही बेवकूफ है जो अबतक तोप ढांक के बैठी है और चच्चू उसकी कितनी तारीफ़ कर रहे थे, बुच्ची के जोबन तो उसके माई से भी जबरदंग हैं और नमक भी दूना,
तबतक अहिराने वाली पूनम ने बुच्ची का हाथ पकड़ के खींचा, वरना उसका पैर गोबर में पड़ जाता और बोली, "चल सब इन्तजार कर रहे होंगे "
और निकलते ही पूनम ने कस के बुच्ची के चूतड़ पे एक हाथ मारा और बोली, "सुन, शीलवा के,…"
लेकिन खिलखिलाते हुए बुच्ची ने बात काट दी और हंस के बोली, " दी, शीलवा क बात न करो, उसके एक एक यार का हिसाब मुझे मालूम है। सावन में मैं आयी थी तो पूरे महीने, चौकीदारी मैं ही करती थी और वो सब बेचारे इतना निहोरा करते थे शीला से, अरे अपनी सहेली की भी दिलवा दे, कुछ नहीं तो चुम्मा, या जोबन का ही रस ले लेने दे, सब के सब "
" अरे तो दिया काहें नहीं, बेवकूफ, तेरा ननिहाल है कोई तेरा गाँव तो है नहीं जो स्साला तेरे पीछे पड़ जाएगा, या तेरी बदनामी करेगा। अरे बीस पच्चीस दिन बाद तू अपने गाँव वो अपने गाँव "
और चिढ़ाते हुए एक चांटा और जड़ा पूनम ने बुच्ची के चूतड़ पे।
बुच्ची भी यही सोच रही थी।
जो बात अभी चच्चू ने उसकी माई के बारे में कही थी, बुच्ची से साल भर छोटी थीं तभी पूरे गाँव का मन रख लिया था, किसी को मना नहीं करती थी। कल यही बात सूरजु भैया की माई कह रही थी तो बुच्ची ने सोचा ननद भौजाई का मजाक।
लेकिन अब जो ये बात चच्चू ने भी कही और पूनमिया ने भी सही बात कही, फिर वो एक साल से ज्यादा बड़ी है और कौन अपने गाँव में है। अपने ननिहाल में है, साल में एक दो बार आती है, तो किसके किसके आगे टांग फैलाई, उसके गाँव में किसी को क्या पता चलेगा।
तबतक बबुआने के दो लौंडे बगल के खेत से मेंड़ पे जा रहे थे, बुच्ची को देख के एक ने जोर से सीने पे हाथ मारा, और बोला,
" कबतक जवानी छुपाओगी रानी, कंवारों को कितना सताओगी रानी'
दूसरा ज्यादा साफ़ बोलने का हामी था, बोला, " अरे शीलवा से पूछ लो, दो पानी निकाल के उसका तब पानी छोड़ते हैं हम, तोहरो पोखर भर देब"
जवाब पूनमिया ने दिया, " अरे हमरी सहेली को का समझते हो, अकेले तुम सब का निचोड़ के रख देगी, तनी खाय पी के ताकत बनाओ तब आना इस के पास " और दोनों लड़कियां घर की ओर मुड़ गयीं। और पूनमिया ने बुच्ची से कहा,
" अरे यही मैं कह रही थी, शीलवा के बारे में, रोज दो चार लौंडो का कल्याण करती थी, तेरी सहेली। लेकिन अब उसकी पांच दिन की आज से छुट्टी शुरू हो गयी है, तो गाँव के कुल लौंडे उधिराये हैं। तो कईसन सहेली हो ? अरे कम से कम पांच दिन तो बेचारी के यारो का काम चलाओ।
" ठीक है है पूनम दीदी, अब जो लौण्डा सबसे पहले दिख गया न अब उसी का लौंड़ा घोंट लूंगी, कउनो न नखड़ा न छिनरपन, "
हंसती हुयी बुच्चिया ने पूनम का हाथ पकड़ के पिछवाड़े के दरवाजे से कदम रखा और सामने नजर पड़ी
दूल्हा सूरजु पर, चौके पे बैठे और बुच्चिया को देख के ऐसे बिहँसे, जैसे सूरज को देख के सूरजमुखी खिल जाए।
सूरजु को देखते हिये पूनमिया, बुच्ची को चिढ़ाते उसके कान में बोली, " देख ले सामने कौन बैठा है। अब तो तय हो गया न सबसे पहले किसका लौंड़ा लेगी तू छिनार "
"एकदम आज ही " हँसते हुए बुच्ची बोली, पर पूनम बड़ी भी थी समझदार भी, उसने फैसला दे दिया,
" ठीक है है पूनम दीदी, अब जो लौण्डा सबसे पहले दिख गया न अब उसी का लौंड़ा घोंट लूंगी, कउनो न नखड़ा न छिनरपन, " हंसती हुयी बुच्चिया ने पूनम का हाथ पकड़ के पिछवाड़े के दरवाजे से कदम रखा और सामने नजर पड़ी
दूल्हा सूरजु पर, चौके पे बैठे और बुच्चिया को देख के ऐसे बिहँसे, जैसे सूरज को देख के सूरजमुखी खिल जाए।
सूरजु को देखते हिये पूनमिया, बुच्ची को चिढ़ाते उसके कान में बोली, " देख ले सामने कौन बैठा है। अब तो तय हो गया न सबसे पहले किसका लौंड़ा लेगी तू छिनार "
"एकदम आज ही " हँसते हुए बुच्ची बोली, पर पूनम बड़ी भी थी समझदार भी, उसने फैसला दे दिया,
" आज नहीं अभी, बस ये रस्म ख़तम हो जाए "
पूनमिया बुच्ची को लेकर लड़कियों की गोल में धंस गई।
आँगन आज जैसे जाग उठा था। धूप भी चौखट पर आकर ठिठक गई थी, मानो पूछ रही हो — “काहे रे, का हो रहा है भीतर?”
लेकिन भीतर तो पूरा मेला सजा था।
आंगन में लड़कियों औरतों की भीड़ एक बार फिर जुटी थी,
लेकिन अबकी लड़कियां या ननदें एक साथ, एक झुण्ड बना के बैठी थी, चाहे सूरजु के गाँव की हों या उनके ननिहाल की, और हर टोले की, चाहे पठान टोली वाली सईदा हो, या अहिराने की पूनमिया या भरोटी की रज्जो, और उनके ननिहाल की भी।
शीतल मौसी बंबई से आयी थीं, उनकी इंटर में पढ़ने वाली लड़की रमा, असली बंबई वाली, बॉब कट बाल, टाइट टॉप और उससे भी टाइट जींस, मसकते मचलते चूतड़, बात बात में अंग्रेजी बोलने वाली, पहली बार गाँव में शादी में आयी थी, बड़ी मामी की बेटी संध्या और उन्ही की पड़ोस की निशा और पांच छह और लड़कियां ननिहाल से आयी थीं, लेकिन अब अन्तर करना मुश्किल था, कौन गाँव की कौन शहर की। रमा की तो रामपुर वाली भाभी और चुनिया से पहले ही पक्की दोस्ती थी और अब पहली बार यहाँ आयी तो एक दिन में ही सब इस गाँव की लड़कियों से भी, एकदम असली वाली,
और उसी तरह गाँव की भोज़ाइयां भी। कल तक तो ननिहाल वाली दो भाभियों ने, मंजू भाभी और रामपुर वाली भाभी, ने ही सब नंदों की खटिया खड़ी कर रखी थी, दूल्हे की महतारी तक का पेटीकोट उठा के सब को उन की बुलबुल दिखा दिया था। और आज अहिराने की दो भौजाइयों ने तो ऐसी ऐसी गारियाँ गयीं, ननदों का नाम ले ले कर, उनके भाइयों, अपने भाइयों को छोड़िये, गाँव घर का कोई मरद नहीं बचा जिसे न चढ़ाया हो, सूरजु सिंह के मायके से भी कुछ काम करने वाली, कुछ सूरजु की और भाभियाँ,
नेछु की तैयारी हो गयी थी भरे आंगन के बीच में सूरजु दूल्हा सजे धजे बैठे थे, अभी इमरतिया नाउन को आना था, नाख़ून काटेंगी, हाथ गोड़ का, पैर में रच रच के रंग लगाएगी , और उसके पहले दूल्हे की माँ से ठनगन करेगी, नेग लेगी। ढोलक टनक रही थी।
मुकाबला बराबर का था, लेकिन सिर्फ छेड़छाड़ ही नहीं दोस्ती भी थी, ख़ास तौर से बड़ी उमर की औरतों को लेकर और गाँव के लौंडो को लेकर।
मंझली मामी, बड़ी मुश्किल से दीवाल का सहारा लेकर बैठी थीं।
बुच्ची ने पूनम का ध्यान दिलाया. और देखा तो उन दोनों ने था कि कैसे चन्नर चाचा ने हचक के उनका पिछवाड़ा कूटा है।
दोनों मुस्कराने लगीं, और ये देख के अहिराने वाली भौजी भी,… और वो भी खेल समझ गयीं, और जोर से मुस्करा के बुच्ची और पूनम का ध्यान, सूरज के ननिहाल की, रिश्ते में मौसी लगती थीं, उनकी ओर दिलाया, और उनकी हालत तो मंझली मामी से भी ज्यादा खराब थी।
अब तो लड़कियों, बहुओं में होड़ लग गई। चाची, बूआ, ताई, मौसी, मामी में पहचाने में कितनी ठोंकीं गयी, कम से कम सात आठ निकली, एक मामी तो अभी तक दोनों जाँघे फैला के बैठी थीं और मलाई धीरे धीरे चू के उनके पैरो पे गिर रही थी।
लड़कियां सब खुल के खी खी कर रही थीं, एक दूसरे को चिकोटी काट रही थीं, भौजाइयां तो बहुये थीं तो वो बस आँचल में मुंह छिपा के हंस रही थी, तभी गाँव की एक बड़ी बूढी ने पूनम और बुच्ची को देखा और जोर से हड़काया,
" हे पूनमिया कहाँ गयी थी, और साथ ये बुच्चिया को भी लेकर भी, ...इतना काम पड़ा है, और लौट के कल की लड़कियों के साथ खी खी खी "
" अरे हमार दोनों ननद काम ही करावे गयी थीं, ....गन्ने के खेत में से साथ साथ चुदवा के आ रही हैं "
अहिराने वाली भौजी बोलीं
और सब भाभियाँ हंसने लगी, सबसे तेज बुच्ची को देख के रामपुर वाली,
लेकिन पूनम ने हिसाब चुकता कर दिया, बोली,
" अरे हमरे भौजी क मरद पंजाब कमाए गए हैं तो उन्ही के लिए भतार ढूंढने गए थे हम दोनों. चार चार मोट तगड़ा मरद ढूंढ के आये हैं, एक अगवाड़े, एक पिछवाड़े, ....दो इंतजार करेंगे अपना नंबर लगावे के लिए "
अब लड़कियों की बारी थी, हो हो करने की, और तभी दूल्हे की माई, बड़की ठकुराइन आयीं, और पूनम को दुलराते जो हड़का रहीं थी, अहिराने की ही कोई बड़ी बूढी, शायद गाँव के लिहाज से बड़की ठकुराइन की भी सास ही लगती हों, उन से बोलीं,
" अरे हमार छोट बिटिया है, याद है जब सूरजु छोट थे खूब झगड़ती थी। बियाह हो गया तो का, मायके में तो बिटिया का बचपना लौट आता है। और इमरतिया कहाँ गई, हे मुन्ना, बहु बुलाओ उसको, देर हो रही है, अभी दूल्हे का नेछु होना है। "
नेछु की रस्म को देर हो रही थी। सूरजु की माई बार-बार पुकार रहीं थीं—
“अरे इमरतिया! कहाँ हो? अपनी माई खातिर भतार खोजे चली गई क्या? रस्म अटकी पड़ी है!”
वो तो कोने में बैठी छोटी सी कटोरी में गुलाबी रंग घोर रही थी। कटोरी में जैसे फागुन उतर आया हो। एक-एक सुहागिन की एड़ी पकड़कर वह बड़े मनोयोग से रंग लगा रही थी। साथ में थी उसकी पक्की सहेली दुलारी — ननिहाल वाली नाउन। दोनों की आँखों में शरारत चमक रही थी।
दुलारी ने ऊँची आवाज में कहा—
“अरे इमरतिया यहीं है! पहले नेग कबूल जाए, तब नाखून कटेगा!”
बड़की ठकुराइन हँस पड़ीं—
“अरे शुरू तो करे! मुँह खोल के बोले — जउन नेग चाही, सब मिलेगा!”
बस फिर क्या था!
ठनगन के बिना रस्म कैसी?
लेकिन ननदें कहाँ मानने वाली थीं, चननिया बोली, " अरे इमरतिया भौजी को तो एक ही नेग चाहिए, लंबा लंबा, मोट मोट,"
और सब लड़कियों की खी खी शुरू हो गयी और आज हंसने वालों में खुल के मजाक करने वालो में सूरजु की ननिहाल की लड़कियां भी उनके गाँव की लड़कियों का साथ दे रही थीं और बबुआने वाली चमरौटी, भरौटी अहिराने की लड़कियों के साथ मिल के गलचौर कर रही थीं, भाभियों की टांग खींच रही थीं।
यहाँ तक कल की पैदा हुयी, भरौटी की लीलवा की समौरिया, रीना, चंदौली वाली चाची की बिटिया, जिसकी टांग भौजाइयां बच्ची समझ के नहीं खींचती थीं, आज वो भी उधरायी हुयी थी,
बुच्चिया से तो उसकी पुरानी दोस्ती थी, साल भर ही उससे छोटी थी लेकिन आज, अहिराने की पूनम, मंझली पट्टी की चननिया, सूरजु भैया के ननिहाल से आयी रामपुर वाली भाभी की छोटी बहन चुनिया , सूरजु भैया के ननिहाल की ही रमा, रूपा और रीमा सब से उसकी खूब मस्ती हो रही थी।
दूल्हे राजा चौके पे बैठे कभी बुच्चिया से नैन मटक्का कर रहे थे तो कभी पूनम से तो कभी कोई भौजाई छेड रही थी। हल्दी का हंगामा कब का ख़तम हो गया था, लड़कियां औरते भी हल्दी धो धा के, तभी अहिराने वाली भौजी ने पूनम से चुदाई का ऊँगली से इशारा करते बड़की ठकुराइन की ओर दिखा के पूछा .
इशारा साफ़ था, इनकी भी कुटाई हुई है कि नहीं।
लेकिन रामपुर वाली भाभी की आँख बहुत तेज थी, उन्होंने पूनम को सूरज की महतारी के पेटीकोट की ओर इशारा किया,
वो दूल्हे के बगल में बैठीं थीं, लेकिन साया थोड़ा-सा दिख रहा था, ...और साया उलटा था।
मतलब, सूरजु की महतारी भी घोंट के आ रही थीं, अब इतने दूल्हे के चाचा, फूफा , मौसा, सब तो दूल्हे के माई के देवर, ननदोई बहनोई लगेंगे, किसी ने मौका देख के निहुरा दिया हो, या क्या पता दो दो चढ़ गए हों। हल्दी का कटोरा लेकर वो भी अपने देवर नन्दोई को हल्दी लगाने निकली थीं।
गाने लगातार चल रहे थे, कभी लड़कियों का झुण्ड, तो कभी काम करने वालियों का और कब कोई रस्म होती है तो रस्म के गाने नहीं तो लड़कियां अक्सर शादी बियाह के, सुहाग के, बन्ने के गाने, और काम करने वालियां तो कभी नाच के तो कभी छेड़खानी के और कोई ननद दिख गयीं या कोई मेहमान आ गया तो फिर तो गारियों की बारिश।
अभी ढोलक लड़कियों की गोल में थी, और गाँव वाली शहर वाली सब मिल के गा रही थीं, और उन के साथ कांती बूआ जिन्हे हर तरह के पुराने गाने आते थे और लड़कियों को डांट भी पड़ रही थी, " अरे गाना साथ गाओगी तो सीख लोगी, और कहीं नहीं मिलेगा "
बाँसवा की कोठिया में दुई से घोडिलवा, एक बड़ा एक छोट रे
मैया की कोखिया में दुई रे जनमवा, एक बहनिया एक भाय
थोड़ी देर में बड़ी मामी की बेटी ने एक सोहाग गीत छेड़ दिया, और सब लड़कियां उसका साथ देने लगीं। बूआ , दूल्हे की माँ के पास चली गयी थी
उगते की सूरज बहुत निक लागे, अरे डूबते क लाल गुलाब रे ललनवा
शीतल मौसी की बेटी भले बंबई से आयी थी लेकिन दो चार गाने उसने भी सीख रखे थे, ढोलक भी जबरदस्त बजाती थी, तो ढोलक उसने अपनी ओर खींच ली और सूरजु सिंह को देखते हुए चालू हो गयी,
सोने के पलकिया चढ़ी चले सुन्दर दुलहा, सोने के पलकिया चढ़ी चले सुन्दर सूरजु भैया, ससुरु के दुवार
एक कोस गइले , दुलरुवा, दुई कोस गयले, मिल गइले देसवा क लोग
हम तोसे पूछिली, अरे देसवा क भैया, कौन हउवे ससुर जी के द्वार
तोहरे ससुर जी के ऊंच दरवजवा हो, अरे शीशा जड़ल हो किवाड़ हो
ननद-भौजाई की नोकझोंक अपने चरम पर पहुँच गई। गाँव की लड़कियाँ तालियाँ पीट-पीटकर हँस रही थीं।
और बीच में खड़ी थीं बड़की ठकुराइन — चेहरे पर संतोष की चमक।
एकलौते बेटे की शादी। आँगन भरा हुआ। गीत, हँसी, ठिठोली, भीड़, चहल-पहल।
यही तो चाहती थीं वे —
कि यह शादी सालों-साल गाँव की चौपाल पर याद की जाए।
आज सिर्फ नेछु नहीं होना था, —
आज आँगन ने हँसकर अपने कुल की नई शुरुआत का स्वागत किया था
आँगन में आज ऐसा लग रहा था जैसे पूरा मेला उतर आया हो।
ढोलक की थाप, कंगनों की छनक, औरतों की खिलखिलाहट — दूल्हा बेचारा बीच में ऐसे बैठा था जैसे पंचायत में फैसला होने वाला हो।
सूरजु की माई तीसरी बार चिल्लाईं—
“अरे इमरतिया! कहाँ मर गई? नेछु का टाइम निकल रहा है?”
कोने से आवाज आई—
“आत हईं ! बिना नेग के नाखून काट देंगे तो लोग कहेंगे — नाउनिया फोकट में सेवा करती है!”
बस, इतना सुनना था कि आँगन हँसी से गूंज उठा।
इमरतिया कटोरी में गुलाबी रंग ऐसे घोर रही थी दुलारी बगल में खड़ी फुसफुसाई—
“देखियो, आज बिना मोटा नेग लिए मत उठना। एकलौता बेटा है, मौका बार-बार नहीं मिलता!”
इमरतिया बोली—
“अरे हम तो आज नहन्नी नहीं, तलवार लेके आए हैं!”जोर का ठहाका मचा,
पूनम ने चिढ़ाया,
" हे भौजी, नाखून की जगह कुछ और मत काट लीजियेगा, नहीं तो हमारी नयकी भौजी क काम कैसे चलेगा "
इमरतिया की ओर से अहिराने की एक भौजाई जोर से बोलीं, " अरे बचपन क यारी हौ तोहार, हमार नयकी देवरान तो हफ्ता भर बाद आएँगी, ये सोच रही हो की तोहार काम कैसे चलेगा,… असल भाई रखनी हो "
" अरे ये अकेले थोड़े, यह गाँव की कुल लड़कियां, पक्की भाई चोद हैं, झांटे बाद में आती हैं भाई का लंड पहले गप करती हैं, "
रीना की माई, चंदौली वाली चाची, अपनी बहुओं का साथ देती बोलीं।
इमरतिया छोटी सी कटोरी में गुलाबी रंग घोर के सब सुहागिनों को एड़ी में रंग लगा रही थी, उसके साथ सूरजु सिंह के ननिहाल की नाउन दुलारी भी थी, इमरतिया की पक्की सहेली, छोट बहन की तरह।
इमरतिया की ओर से वो दुबारा साफ़ साफ़ बड़की ठकुराइन से खुल के बोली,
" अरे इमरतिया यहीं है पहले कुछ नेग कबूला तो नाख़ून कटी, "
" अरे एक बार नाख़ून काटना शुरू तो करे, मुंह खोल के बोले, जउन नेग चार चाहि, जउन वो कही कुल मिली " बड़की ठकुराइन ने खुश हो के कहा।
ठनगन के बिना रस्म रिवाज हो जाए तो मजा का, इमरतिया आपन नहन्नी और सब सामान लेकर पहुंची, पर ननदे क्यों छोड़ें, पूनमिया बोलीं
" हे काकी, इमरतिया भौजी ऊपर वाला मुंह नहीं नीचे वाला मुंह खोल के मांगेगी "
अब रस्म का गाना भाभियों ने शुरू किया, लेकिन सब लड़कियां, बाकी औरतें भी साथ दे रही थी,
एक थाली में नेग सब बड़ी ठकुराइन ने खुद रखा। नाउन का नेग होता है और कितने इन्तजार के बाद इस घर में यह घडी आयी थी, एकलौते बेटे का बियाह, कुल बंश बढ़ेगा, पुरखे खुश होंगे,
दूल्हे का पैर इमरतिया की गोद में रखा गया।
दूल्हा ऐसा सिमटा बैठा था जैसे स्कूल में मास्टर जी डंडा लेकर खड़े हों।
इमरतिया बोली—
“देख ल, हिले तो उँगली आधी रह जाएगी। फिर फोटो में चार ही उँगली दिखेगी!”दूल्हा एकदम सीधा।
इमरतिया ने अपनी गोद में दूल्हे का पैर रख के आराम से नाखून काटना शुरू किया और साथ में गाना भी , ढोलक टनक रही थी,
नोह् काटू नउनिया बचा के उँगरी,नोह् काटू नउनिया बचा के उँगरी
हार भी दूंगी , माला भी दूंगी हार भी दूँगी , माला भी दूँगी
संगवा में दूंगी सोने की मुनरी , नोह् काटू नउनिया बचा के उँगरी
औरतें सुर में, लेकिन बीच-बीच में अपनी लाइन भी जोड़ रही थीं—
“हार भी दूँगी, माला भी दूँगी…”
पीछे से आवाज— “पहिले दिखाओ, खाली मुँह से ना चलेगा!”
चोली भी दूँगी लहंगा दूंगी, चोली भी दूँगी लहंगा भी दूंगी,
संगवा में दूंगी लाली लाली चुनरी, , नोह् काटू नउनिया बचा के उँगरी
बड़ी मामी की बेटी रमा और उसकी सहेली निशा ने गाना रोक के तड़का लगाया," अरे इमरतिया भौजी, चोली क नाप कौन दरजी लिया, केतना सिलवाई लिया "
" अरे जोबन क सब रस ले लिया हमार भौजी क, अब सिलवाई भी लेगा का ? " अब लीला भी बोलने लगी थी।
नथिया भी दूंगी, पायल भी दूंगी, नथिया भी दूंगी, पायल भी दूंगी,
संगवा में दूंगी गले की सिकड़ी, नोह् काटू नउनिया बचा के उँगरी
इमरतिया के सूप में पहले सूरजु सिंह की माई , फिर उनकी बूआ, मामी, घर की, रिश्ते की सब औरते नौछावर कर रही थीं,
माई ने सोने की मुंदरिया डाली।
बूआ ने रूपया। मामी ने कपड़ा।
पूनमिया ने सूप में झाँक कर कहा—
“अरे अभी तो आधा भी नहीं भरा! इमरतिया भौजी उठने मत देना!”
चननिया बोली—
“भौजी! अगर नेग कम मिला तो नाखून आधा काट के छोड़ देना!”
" हे बहुत बोल रही हो, भैया की बहिनी, पूनम को चिढ़ाते हुए मुन्ना बहू बोली और जोड़ा, दूल्हे क बहनिया कौन नेग देंगी,
" वो सब आपन आपन जोबन लुटायेंगी "
मंजू भाभी हँसते हुए बोलीं,
अहिराने वाली रीना, वही चंदौली वाली चाची की बेटी जो हल्दी के बाद अभी अभी अभी आयी थी, बुच्ची से भी साल भर छोटी, उसके कच्चे टिकोरों को उसके टॉप के ऊपर से सहलाते पूछ बैठी,
" और जिन बहनों की कच्ची अमिया अभी आ रही है,.... वो का लुटायेंगी ? "
" अरे हम भौजाइयों के भाई हैं न , वो कुतर भी लेंगे कच्ची अमिया, और दबा दबा के बड़ा भी कर देंगे , ऐसे माल की तो बहुत कीमत है बाजार में " रीना की ओर देख के चिढ़ाते हुए रामपुर वाली भाभी बोलीं।
मुन्ना बहू और मंजू भाभी गा रही थी और साथ में बाकी लड़कियां औरते भी,
घर घर फिरइ नउनिया त गोतिन बुलायी
सखिया आज राम जी के नेछु, सब सखी आयहु हो , सब केहू आओ रे।
गोतिन सब आवे हो , आंगन सब बैठे हों,
केहू डारे सोने क मुंदरिया तो कोई डारे रूप कोई डारे रतन पदारथ
भर गए सूप
माई डाले सोने क मुंदरिया, बहिनी डारे रूप
बूआ डारे रतन पदारथ भर गए सूप
एक गाना ख़तम होता नहीं था दूसरा शरू हो जाता था और अब इमरतिया दूल्हे के एड़ी में गुलाबी रंग लगा रही थी और गाना फिर बदला,
अबकी बड़ी उमर की औरतों की ढोलक टनक रही थी, बाकी सब लोग साथ दे रहे,
आयी है आज शुभ मंगल घड़ी, अरे आयी है आज शुभ मंगल घड़ी
अरे नउनिया को दूंगी सोने की नहन्नी और नउआ को दूंगी सोने की छड़ी
अब लड़कियों से नहीं रहा गया, पूनमिया बोली,
अरे भौजी का काम नहन्नी से नहीं चलेगा, उन्हें तो मैं बांस दूँगी, तब भौजी का सही नेग होगा।"
" अरे वो भी एक नहीं दो दो, एक आगे से एक पीछे , हमरे भौजी को समझती का हो " चननिया ने जोड़ा।
' अरे हम तो इमरतिया भौजी के लिए मोटका गदहा का इंतजाम किये हैं, हमरे ओर से वही नेग है " हंसती हुयी पूनम बोली।
नेछु खतम हो गया था।
सूप भर गया था नेग से। और अब इमरतिया भौजी के बोलने का नंबर था, उनसे और मुन्ना बहू से कोई ननद पार नहीं पा सकती थी, चाहे कुँवारी हो या ब्याहता। वो सीधे पूनम, अपनी अहिराने वाली ब्याहता ननद से हँसते हुए छेड़ के बोलीं,
" अरे मोटका गदहवा तो हमार ननदोई है "
" अरे भौजी, ननदोई और सलहज का तो जबरदस्त रिश्ता है, कहते हैं न साली से सलहज अधिक प्यारी"
पूनम कौन चुप रहने वाली थी, और चननिया और पूनमिया दोनों की जोड़ी के आने से अब ननदो का पलड़ा भी भारी हो गया था, गाँव की लड़कियां खूब चहक रही थीं।
लेकिन सबसे ज्यादा खुस बड़की ठकुराइन थीं, दूल्हे की माई।
वैसे भी हंसी मजाक में उनका कोई जोड़ नहीं था, और यही वो चाहती थीं, आँगन में खूब भीड़ हो, सब लोग खूब खुस रहें, हंसी मजाक, हल्ला गुल्ला, बड़के घर के एकलौते लड़के की शादी पड़ी थी, सालों साल पूरे गाँव को याद रहे,
और उनसे भी ज्यादा खुश थे सुरजू बाबू, सबेरे सबेरे पहले बुच्ची के साथ मस्ती,
फिर इमरतिया भौजी को खुद पटक के पेले थे, वो भी एक नहीं दो बार, और दूसरी बार निहुरा के, कब से उनका सपना था, भौजी को पटक के निहुरा के लेने का, और इमरतिया भौजी भी मान गयी अपने देवर को, अब किसी की भी ले सकता है
और बुच्ची जिसको साथ ले आई थी। क्या मस्त माल था, कच्ची अमिया असल।एक बार बस स्साली मिल जाए, इमरतिया भौजी इतना कच्ची कली क बखान की हैं, स्साली को बिना पेले छोडूंगा नहीं चाहे जितना चिचियाये
एक बार मिल जाए वो।
पर अभी नैन मटक्का वो पूनम के साथ कर रहे थे, उन्हें बचपन याद आ रहा था, कैसे ग्वालिन चाची के साथ आती थी, रोज उससे झगड़ा करती थी, वो भी कभी उसकी चोटी खींच देते तो कभी गाल में चिकोटी काट लेते, और ग्वालिन चाची, पूनम की माई कैसे उसे चिढ़ाती थीं उसे, " दूध पियोगे इसका, देखो दूध देने लायक हो गयी है की नहीं " और वो लजा जाते थे। पूनम को सच में जोबन जबरदस्त आये, मन तो करता था लकिन तबतक अखाड़े में उतर चुके थे, मूसल लंगोटे में बाँध चुके थे और गुरु ने कसम धरा दी थी,
पर अब तो अखाड़े से भी हट गए हैं, लंगोट भी खुल गया, गुरु ने कसम से भी आजादी दिला दी और अब की असली गुरुआइन इमरतिया भौजी ने तो बोला है सीधे चूँची देखो, और मन आ जाए तो छोडो मत, न रिश्ता न उम्र,
और उनकी मामी और मौसी की लड़कियां भी,
बुच्ची तो एकदम उनसे चिपक के ही खड़ी थी।
और बड़की ठकुराइन ने हलकी आवाज में सीरियसली इमरतिया और बुच्ची को धीरे धीरे समझाया,
" आज का दिन बड़ा खास है, अब दूल्हे को हल्दी लग गई है, तो अब तुम दोनों के ऊपर पूरी जिम्मेदारी है। पंडित जी बोले हैं की भले ही ग्रहण ख़तम हो गया है, लेकिन आज जब तक सूरज डूबेगा नहीं, दूल्हे को न अकेले छोड़ना है न कोहबर वाले कमरे से बाहर निकलने देना है।
तो बस अब तुम दोनों जने, कोहबर में सुरजू के साथ, और हाँ खाना भी हम भेजवा देंगे, लेकिन तुम दोनों साँझ होने तक बाहर नहीं निकलोगी दूल्हे को छोड़ के, "
इमरतीया बड़की ठकुराइन को देख के मुस्कुरायी, और वो भी। इमरतिया समझ गयी थी, पूरे चार घंटे है उसके पास, और अपने देवर से उसकी फुफेरी बहन की बुच्ची की फड़वाने का बहुत अच्छा मौका है ४ घण्टे तक कोई ऊपर आएगा नहीं और सिर्फ वो और बुच्ची, सूरजु के साथ छत वाले कमरे में।
" सुन लीला, तू और पूनम दोनों लोग, दूल्हे का खाना लेके अभी ऊपर चली जाना। हाँ महराजिन से बोल देना, एक दूल्हे वाली खीर बनी होगी अलग से तो उसको एक बड़के कटोरे में ढंक के, और खिला के थाली बर्तन ले के आना " दूल्हे की माई , बड़की ठकुराइन ने लीला और पूनम को भी काम पकड़ा दिया , दूल्हे के खाने के बाद वो दोनों बरतन लेकर नीचे आएँगी और उसके बाद इमरतिया और बुच्ची, सूरज ढलने तक, दूल्हे के पास, कम से कम ४ घंटा
पूनम भी आ गई थी और उन दोनों ने बड़ी समझदारी से सर हिलाया।
उनके मायके की लड़कियां भी आ गयी थीं तो उन्होंने चुनिया, संध्या, निशा और रमा को भी काम पकड़ा दिया, " तुम लोग घर क बिटिया हो, तो जैसे दूल्हा ऊपर जाएँ आंगन साफ़ करवा के लड़को का खाना लगवा देना, सब भूख भूख चिल्ला रहे होंगे "
" अरे, हमरे देवरन को तो असली भूख कउनो और चीज की लगी है " पठान टोले वाली सैयादायिन भौजी ने चिढ़ाया।
बात एकदम सही थी, लौंडे तो कुछ न कुछ बहाना कर के अंदर आते थे और बस नैन मटक्का, इशारे बाजी, और ये हर शादी बियाह में होता था, यही सब तो याद रह जाता है। बड़की ठकुराइन को सब मालूम था और उन्हें अच्छा भी लगता था, हाँ गाँव की एक दो बड़ी बुढियां कभी लड़कों को डांटती, कभी लड़कियों को।
" और एक दिन लड़कियों के साथ खी खी नहीं करोगी तो कुछ घट नहीं जायेगा, आज सांझ तक एकदम भैया के साथ, " बुच्ची को डांट भी पड़ गयी और फिर वो अपने मायके की औरतों की ओर मुड़ गयीं, और आगे का काम समझाने लगीं।
" अब एक बार सब खाना पीना हो जाए फिर लावा भूजना है तो कांति बुआ तो ठनगन करेंगी थोड़ा बहुत "
हँसते हुए सुरजू की माई अपनी भौजाइयों से बोलीं, कांति बुआ भी वहीँ खड़ी थीं।
" अरे ननदे सब होती ही छिनार हैं, सब की सब भाई रखनी" मंझली मामी ने कांती बूआ को चिढ़ाते हुए कहा ( और असल में एक तीर से दो शिकार, दूल्हे की माई, बड़की ठकुराइन उनकी भी तो ननद थीं )।
लेकिन छोटी मामी एकदम साफ़ बात करती थीं,
" एक मुट्ठी आगे, एक मुट्ठी पीछे, कुल ठनगन गांडी में चला जाए, अरे नेग में अपने मायके ससुरारी क कुल मरद दूल्हे क बुआ के नाम, एक आगे से एक पीछे से "
और ये सब बातें खुल्लमखुल्ला लड़कियों के और दूल्हे के सामने हो रही थी , लड़कियां जोर से खी खी कर रही थीं, और बुच्ची को फिर डांट पड़ गयी और अबकी उसकी सगी बड़ी मौसी, कांती बूआ थी,
" हे बुच्ची का खी खी कर रही हो, अपने भैया को ले जाओ कोहबर में और सांझी तक निकलना मत और न हो तो छत वाला दरवाजा भी बंद कर लेना। "
बुच्ची और इमरतिया दूल्हे को लेकर ऊपर छत वाले कमरे में, थोड़ी देर में पूनम और लीला खाना लेकर आयी और जब वो दोनों लौटीं तो न सिर्फ सच में कमरे का दरवजा बंद हुआ बल्कि छत का भी।
शाम होने में अभी भी तीन चार घंटे थे और ऊपर दूल्हे के साथ दूल्हे की बहन और भौजाई, और वो खीर वाला बड़ा कटोरा।