मेरी माँ कामिनी -15

छत पर मूसलाधार बारिश हो रही थी।
कामिनी किसी मन्त्रमुग्ध मोरनी की तरह गोल-गोल घूम रही थी। उसका पल्लू गिर चुका था, बाल चेहरे पर चिपके थे, और वह अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। उसे याद ही नहीं रहा कि वह कहाँ है और किसके साथ है। वह बस अपनी आज़ादी को पी रही थी।
रवि, जो अब तक एक कोने में खड़ा था, कामिनी के इस कामुक और मादक रूप को देखकर खुद को रोक नहीं सका।
उसकी बर्दाश्त की हद पार हो गई।
वह धीरे-धीरे कदमों से कामिनी की तरफ बढ़ा।
कामिनी की आँखें बंद थीं, चेहरे पर बारिश की बूंदें गिर रही थीं

रवि उसके बिल्कुल करीब आ गया। उसकी गर्म सांसें कामिनी के भीगे गालों को छूने लगीं।
"आंटी..." रवि की भारी और नशीली आवाज़ ने कामिनी का ध्यान खींचा।
कामिनी ने धीरे से आँखें खोलीं। सामने रवि खड़ा था, बारिश में भीगा हुआ, उसकी टी-शर्ट उसके सीने से चिपकी हुई थी।
"आप कितनी सुंदर हैं..." रवि ने कामिनी की आँखों में गहराई से झांकते हुए कहा, "ऐसा लग रहा है जैसे कामदेव की पत्नी, रति खुद धरती पर उतर कर नाच रही हो।"
इस तारीफ ने कामिनी पर जादू कर दिया। उसका जिस्म स्थिर हो गया, कब उसने अपनी सुंदरता की तारीफ सुनी थी?
'काम की देवी रति...' एक जवान लड़का उसकी तुलना रति से कर रहा रहा.
आज तक उसे किसी ने इतनी खूबसूरती से नहीं सराहा था।
रमेश ने उसे 'रंडी' और 'गंवार' कहा था, लेकिन रवि ने उसे 'देवी' बना दिया।
कामिनी रवि की गहरी आवाज़ और नज़रों से इतनी मदहोश हो गई कि उसके पैर लड़खड़ा गए। गीले फर्श पर उसका संतुलन बिगड़ा और वह गिरने को हुई।
"आह्ह..."
लेकिन गिरने से पहले ही रवि के मजबूत, गठीले हाथों ने उसे थाम लिया।
रवि ने एक हाथ उसकी कमर पर और दूसरा उसकी पीठ पर रखकर उसे अपनी तरफ खींच लिया।
धप्प...
कामिनी का भारी, भीगा और नरम जिस्म रवि के सख्त, मर्दाना सीने से टकरा गया। कामिनी हैरान थी रवि ने उसे कितनी आसानी से थाम लिया.

दो भीगे बदन एक-दूसरे से चिपक गए।
कामिनी की छाती रवि की छाती पर दब गई, उसके कड़क निप्पल रवि की छाती में चुभने लगे।
कामिनी रवि की बांहों में कैद थी। उनकी नज़रें मिलीं।
बारिश का शोर था, लेकिन दोनों के बीच एक चुप्पी थी जो चीख रही थी।
रवि ने धीरे से अपना चेहरा झुकाया।
कामिनी चाहती तो उसे धक्का दे सकती थी, लेकिन उसने अपनी आँखें मूंद लीं और अपना चेहरा ऊपर उठा दिया। यह एक मूक सहमति थी। कामिनी के संस्कार, उसका माँ होने का भाव, उसकी उम्र, उसकी शर्म, लाज सब बारिश के ठन्डे पानी मे बह गए थे.
जवान मर्द की पकड़ ने उसे जवान कर दिया था, जांघो की बीच योनि खुल के बंद हो जा रही थी.
और फिर...
न जाने किस आवेश में, रवि ने अपने होंठ कामिनी के गुलाबी, भीगे होंठों पर रख दिए।
रवि के होंठ जैसे ही कामिनी के होठों से टकराए, कामिनी का बचा-खुचा संयम भी बारिश के पानी में बह गया।

वह रवि को रोक नहीं सकी। रोकना चाहती भी नहीं थी।
उसका जिस्म, जो बरसों से प्यार और स्पर्श के लिए तरस रहा था, आज रवि की गर्मी पाकर सुलग उठा।
कामिनी के होंठ रवि के लिए किसी प्यासे फूल की तरह खुल गए।
रवि ने मौका नहीं गंवाया। उसने अपनी गर्म जीभ कामिनी के मुंह के अंदर डाल दी।
जवाब में कामिनी ने भी अपनी जीभ आगे बढ़ा दी।
दो जीभें एक-दूसरे से लिपट गईं, लड़ने लगीं और एक-दूसरे का रस पीने लगीं।
कामिनी, जो आज तक सिर्फ़ एक 'भोग की वस्तु' बनी थी, आज पहली बार "प्रेमिका" बन गई थी। वह आगे होकर रवि की जीभ को चूस रही थी।
उसने ऐसा कभी नहीं किया था, उसे आता हूँ नहीं था, इसे kiss कहते है ये भी नहीं पता था.
वो मुँह खोले अपने बेटे के दोस्त की जीभ चूस रही थी, प्यासी कुतिया की तरह उसके होंठो को चाट रही थी.
चुप्प... सुड़प...लप... लप....
बारिश के शोर के बीच उनके चूसने की गीली आवाज़ें गूंजने लगीं।
रवि ने कामिनी को अपनी बाहों में कसकर भींच लिया।
उसका लंड पूरी ताकत से खड़ा हो चुका था और कामिनी के पेट और नाभि के निचले हिस्से (Pelvis) पर दबाव बना रहा था।
गीली साड़ी की वजह से कामिनी को वह सख्त, लोहे जैसा दबाव साफ़ महसूस हो रहा था।
यह अहसास उसे पागल कर रहा था।
वह पीछे हटने के बजाय, अपनी कमर को आगे धकेलने लगी।
वह अपनी चूत को उस खड़े लंड पर रगड़ना चाहती थी, उस गर्माहट को अपनी गहराइयों में महसूस करना चाहती थी।
दोनों एक-दूसरे में इस कदर खो गए थे कि उन्हें दुनिया की कोई सुध नहीं थी।
कामिनी अपना अस्तित्व भुला चुकी थी.
***************
तभी नीचे से बंटी आया।
उसने नीचे से आवाज़ दी थी— "मम्मी, रवि... हलवा...ठंडा हो रहा है, आ जाओ "
लेकिन जब कोई जवाब नहीं आया, तो वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया।
जैसे ही वह छत की दहलीज पर पहुंचा, उसके कदम ज़मीन पर जम गए।
उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
सामने बारिश में जो नज़ारा था, वह किसी भी बेटे के होश उड़ाने के लिए काफी था।
उसका दोस्त रवि और उसकी माँ कामिनी... आपस में गूंथम-गूंथा थे।
रवि ने कामिनी को दबोच रखा था और पागलों की तरह उसका मुंह खा रहा था।
और उसकी माँ?
वह विरोध नहीं कर रही थी।
बंटी ने देखा कि कामिनी की कमर रवि के लंड को महसूस करने के लिए आगे-पीछे (Grinding) हो रही है। वह अपनी गांड को हिला-हिलाकर रवि के लंड पर रगड़ रही थी।
रवि के दोनों हाथ कामिनी के भीगे हुए, भारी स्तनों को कस-कस कर भींच रहे थे। कभी वह स्तनों को मसलता, तो कभी उसका हाथ फिसलकर कामिनी की भारी गांड पर चला जाता और उसे आटे की लोई की तरह गूंथ देता।
यह दृश्य देखकर बंटी को गुस्सा आना चाहिए था, लेकिन उसकी उम्र और माहौल ने उसे धोखा दे दिया।
अपनी माँ का यह कामुक, जंगली रूप देखकर बंटी का अपना लंड भी पैंट के अंदर फनफनाने लगा।
वह वहीं खड़ा होकर, अपनी माँ को अपने दोस्त के साथ 'रासलीला' करते हुए देखने लगा।
इधर कामिनी और रवि को बंटी की मौजूदगी का कोई इल्म नहीं था। वे दूसरे लोक में थे।
करीब 10 मिनट तक यह खेल चलता रहा।
दोनों के भीगे जिस्म एक-दूसरे पर रगड़ खा रहे थे। घर्षण से आग पैदा हो रही थी। वैज्ञानिक नियम है.
लेकिन विज्ञानं ये नहीं बताता की दो जिस्म भी जब रगड़ते है तो गर्मी, आग पैदा होती है, लेकिन ये आग कैसी होती है इसकी परिभाषा किसी किताब मे नहीं लिखी किसी ने.
मै भी नहीं लिख सकता, ये सिर्फ महसूस किया जा सकता है.
कामिनी की चूत पूरी तरह से बह निकली थी।
उसकी योनि का चिपचिपा पानी (Lubrication) रिसकर उसकी जांघों पर आ गया था और बारिश के पानी के साथ बर्बाद हुआ जा रहा था,
कामिनी ने ऐसा Kiss अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं किया था।
"ईईस्स्स्स.... आअह्ह्ह..... उउउफ्फ्फ्फ़...."
कामिनी के गले से रवि के मुंह में सिसकियाँ निकल रही थीं। वह मचल रही थी।
रमेश के साथ उसे जबरजस्ती, बलात्कार जैसा ही महसूस हुआ था, लेकिन रवि के साथ वह 'प्यार की अनुभूति' कर रही थी।
यह गर्म चुम्बन उसे खींचकर वापस उसकी जवानी में ले आया था। उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा था।
उसे पहली बार पता चला कि प्यार और हवस के बीच एक "जुनून" भी होता है, जिसे आज एक 20 साल का लड़का उसे सीखा रहा था।
बदकिश्मती की ये अहसास बहुत देर तक सम्भव ना हो सका....
हवा का एक तेज़ झोंका आया।
छत का लोहे का दरवाज़ा, जो खुला था, हवा के दबाव से ज़ोर से दीवार से टकराया।
धड़ाम!!! भड़ाम्म्म्म......
वह आवाज़ किसी बम धमाके जैसी थी।
इस तेज़ आवाज़ ने कामिनी और रवि की तंद्रा तोड़ दी।
कामिनी को जैसे 440 वोल्ट का झटका लगा। वह होश में आई।
उसने झटके से रवि को धक्का दिया।
उसने चारों तरफ देखा।
सीढ़ियों का दरवाज़ा अब बंद हो चुका था (हवा से)।
बंटी, जो दरवाज़े के पास खड़ा था, आवाज़ होते ही और कामिनी के होश में आने से पहले ही वहां से खिसक लिया था। वह नीचे भाग गया था ताकि पकड़ा न जाए।
कामिनी का दिल मुंह को आ गया।
वह हांफ रही थी। उसका सीना ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके होंठ सूजे हुए थे और ब्लाउज अस्त-व्यस्त था। निप्पल भीगे ब्लाउज से साफ झलक रहे थे, बहार आने को बेताब थे.
या यूँ कहिये वो सम्पूर्ण नंगी ही खड़ी थी रवि के सामने.
उसे अहसास हुआ कि उसने क्या कर दिया।
उसने अपने बेटे के दोस्त के साथ, खुले आसमान के नीचे, अपनी सारी हदें पार कर दी थीं।
उसका जिस्म कांप गया, उत्तेजना हवास मे वो क्या कर गई.
शर्म, डर और उत्तेजना का एक मिश्रित भाव उसके चेहरे पर आ गया।
उसने रवि की तरफ एक बार भी नहीं देखा।
उसमें नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं थी।
वह अपना पल्लू समेटती हुई, नंगे पांव भागती हुई सीढ़ियों की तरफ लपकी और सीधे नीचे अपने कमरे में जा घुसी।
पीछे छत पर...
रवि अकेला खड़ा था।
बारिश अभी भी हो रही थी।
वह भीग रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक शैतानी और संतुष्ट मुस्कान थी।
उसने अपनी जीभ अपने होठों पर फेरी, जहाँ कामिनी की लार और लिपस्टिक का स्वाद अभी भी बाकी था।
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कामिनी अपने कमरे में बदहवास सी खड़ी थी।
उसकी सांसें फूली हुई थीं। उसकी चूत किसी खुले हुए नल की तरह बह रही थी। योनि के अंदर एक भयानक जलन और मीठा दर्द था, जैसे वहां कोई ज्वालामुखी फटने को तैयार हो।
उसने जैसे-तैसे खुद को संभाला। बाथरूम में जाकर उसने अपने भीगे कपड़े उतारे।
आज उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि आईने में अपने नंगे जिस्म और चेहरे को देख सके। उसे अपनी आँखों में वह 'हवस' साफ़ दिखाई दे रही थी।
उसने बदन पोंछा और कपड़े बदलने लगी।
उसने एक ढीला-ढाला सूती गाउन (Night Gown) पहन लिया।
लेकिन उसकी चूत इतनी गीली और संवेदनशील थी कि वह पैंटी का कपड़ा बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।
उसने फैसला किया— अंदर कुछ नहीं पहनेगी।
गाउन के नीचे वह पूरी तरह नंगी थी। आज़ाद।
बाहर से बंटी की आवाज़ आई— "जल्दी करो ना माँ... भूख लगी है।"
कामिनी ने गाउन ठीक किया और बालों पर तौलिया लपेटा। वह बाहर जाने के लिए मुड़ी, लेकिन उसके कदम भारी थे।
'कैसे सामना करूँगी रवि का? अभी छत पर जो हुआ... उसके बाद तो मुझे ज़मीन में गड़ जाना चाहिए।'
लेकिन पेट की भूख और बेटे की पुकार ने उसे बाहर खींच लिया।
वह डाइनिंग टेबल पर पहुंची।
रवि पहले से वहां बैठा था। वो भी कपडे बदल कार वहाँ आ बैठा था, उसका गठिला जिस्म कामिनी को आकर्षित कर रहा था,
उसने कामिनी को देखा, उसकी आँखों में वही तारीफ थी, वही चमक थी जो थोड़ी देर पहले छत पर थी.
"आओ ना आंटी..." रवि ने कुर्सी खींचते हुए कहा।
कामिनी नज़रें झुकाए, चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई।
उसके कंधे झुके हुए थे, जैसे कोई अपराधी कटघरे में बैठा हो।
"कैसा लगा माँ?" बंटी ने हलवे का चम्मच उठाते हुए पूछा। उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।
"कक्क.. कक... क्या कैसा?" कामिनी हड़बड़ा गई।
"अरे छत पर... बारिश में भीगना," बंटी ने बड़ी संजीदगी से कहा, "मैं देखता हूँ आप हमेशा परेशान रहती हो, घर के कामों में उलझी रहती हो। कभी-कभी खुद के लिए भी जीना चाहिए माँ।"
बंटी किसी परिपक्व (Mature) मर्द की तरह बात कर रहा था।
कामिनी हैरान थी। उसका बेटा उसे 'जीने' की सलाह दे रहा था? क्या उसे कुछ पता है? या वह बस अपनी माँ की खुशी चाहता है?
बंटी की इन बातों ने कामिनी के मन का बोझ थोड़ा हल्का कर दिया।
तभी... टेबल के नीचे हलचल हुई।
"तुझे पता है बंटी... आंटी तो खूब अच्छा नाचती हैं," रवि ने शरारती लहजे में कहा।
और उसी वक़्त, टेबल के नीचे रवि का नंगा पैर कामिनी के पैर पर चढ़ गया और उसकी पिंडलियों को सहलाने लगा।
कामिनी को करंट लगा।
"कक्क.... कककया... क्या तुम दोनों भी मुझे छेड़ रहे हो? अपनी माँ को? बिगड़ गये हो तुम लोग, हलवा खाओ, ठंडा हो जायेगा," कामिनी ने बात बदलने की कोशिश की।
"थैंक यू आंटी..." रवि ने एक बड़ा चम्मच मुंह में भरा और कामिनी की आँखों में झांकते हुए बोला.
"गाजर का हलवा बहुत स्वादिष्ट बना है... ऐसा 'माल' मैंने आज तक नहीं खाया।"
कहते हुए रवि के पैर की उंगलियां कामिनी की नंगी पिंडलियों से ऊपर चढ़ती हुई उसके घुटनों तक पहुंच गईं।

कामिनी शॉक्ड थी।
रवि की हिम्मत तो देखो! बेटा बगल में बैठा है और वह माँ को टेबल के नीचे छेड़ रहा है।
लेकिन कामिनी का डर और उसकी ख़ामोशी ही रवि की ताकत थी।
कामिनी की चूत, जो पहले से सुलग रही थी, इस स्पर्श से और भी गीली होने लगी।
रवि का पैर अब उसके गाउन के घेरे में घुस चुका था और उसकी नंगी जांघों पर रेंग रहा था।
कामिनी को उसे डांटना चाहिए था, पैर झटक देना चाहिए था।
लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया। वह बस कभी रवि को घूरती, तो कभी खांसी का नाटक करती।
असल में, वह उस स्पर्श से पागल हो रही थी। एक जवान लड़का, उसके बेटे के सामने, उसे उत्तेजित कर रहा था—यह जोखिम (Risk) उसे और भी ज्यादा मज़ा दे रहा था।
रवि के पैर का अंगूठा अब उसकी जांघों के बीच, ठीक चूत के मुहाने पर पहुंच गया था।
कामिनी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
उसे रुकना चाहिए था... लेकिन उसका जिस्म हार गया।
कामिनी कुर्सी पर थोड़ा आगे खिसक आई और टेबल के नीचे अपनी जांघों को चौड़ा कर दिया।
कामिनी की चुत पूरी तरह भीगी हुई चमक रही थी.
नतीजा?
पचचच...
रवि का मोटा अंगूठा सीधा कामिनी की गीली, फिसलन भरी चूत से टकरा गया।
"उईक्सस्स्स्स.... इस्स्स्स... आउच..."
कामिनी के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई। उसकी आँखें गोल हो गईं।
रवि को भी उम्मीद नहीं थी कि रास्ता इतना आसान और इतना गीला मिलेगा। उसे पता चल गया कि आंटी ने नीचे पैंटी नहीं पहनी है।
यह इशारा काफी था।
रवि का अंगूठा अब कामिनी की चूत की दरार को ऊपर से नीचे तक टटोलने लगा।
कामिनी के ज़हन में रवि का वह गुलाबी लंड घूमने लगा जो उसने सुबह देखा था।
उससे रहा नहीं गया। वह अपनी कमर को थोड़ा और आगे ले गई।
धप... धापक... पच...
एक सधे हुए दबाव के साथ, रवि का मोटा अंगूठा कामिनी की गीली योनि के अंदर धंस गया।
कामिनी चीखना चाहती थी, लेकिन उसने कसकर अपने मुंह पर हाथ रख लिया।
रवि धीरे-धीरे अपने अंगूठे को अंदर-बाहर करने लगा, उसे सहलाने लगा।
कामिनी चरम सीमा पर थी।
अपने बेटे के ठीक बगल में बैठकर, उसके दोस्त से अपनी चूत में उंगली (अंगूठा) करवा रही थी। इस 'हराम' अनुभूति ने उसे आग का गोला बना दिया था। उसे सिर्फ अपने जिस्म की आग को शांत करना था, इसके लिए ही तो वो अपनी मान मर्यादा त्यागी बैठी थी,
उसे सिर्फ अपनी चुत मे होती जलन याद थी.
वह खुद अपनी कमर हिलाकर उस अंगूठे को और गहराई तक लेने की कोशिश कर रही थी।
वह बेकाबू थी... पागल हो रही थी... उसकी चूत में ज्वालामुखी फूटने वाला था... वह इस लावे को बाहर निकाल देना चाहती थी...
"इसस्स.... उफ्फ्फ.... बस.... आह्ह्ह..." कामिनी बस चिल्लाने ही वही थी, उसका सब्र जवाब देने ही वाला था, गले मे दबी हुई आवाज़ चीख का रूप लेने ही वाली थी की.....
तभी...
ट्रिंग... ट्रिंग... ट्रिंग...
टेबल पर रखे कामिनी के फोन की घंटी बजी।
पच...
आवाज़ सुनकर रवि ने झटके से अपना पैर बाहर खींच लिया।
कामिनी को लगा जैसे उसकी आत्मा शरीर से निकलते-निकलते बची हो। वह हड़बड़ा कर सीधी हो गई।
उसकी सांसें अटक गईं।
"पापा का फोन है माँ..."
बंटी ने टेबल पर पड़ा फोन सरका कर कामिनी की तरफ बढ़ा दिया।
उसकी नज़रें टीवी पर टिकी थीं, लेकिन उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह सब कुछ देख कर भी अनदेखा कर रहा है।
बंटी कुछ अलग ही था। या तो वो अपनी माँ को ख़ुश देखना चाहता था या फिर उसे दर्शक होने का ही मजा था, खिलाडी बनने मे उसकी कोई रूचि नहीं थी.
Contd.....
अखिरकार रवि ने कामिनी के ख़ज़ाने में लूट शुरू कर दी....
क्या हुआ अंगूठा गया है तो लंड का रास्ता खुल गया.....
बहुत ही सुंदर लिखा है आपने....
मजा आ जाएगा अगर रवि के साथ साथ बंटी भी अपनी माँ की चुत में घुस जाए....
बहुत ही सुंदर...
अगले भाग का इंतजार है