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Erotica मेरी माँ कामिनी

sunoanuj

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मेरी माँ कामिनी -15


छत पर मूसलाधार बारिश हो रही थी।
कामिनी किसी मन्त्रमुग्ध मोरनी की तरह गोल-गोल घूम रही थी। उसका पल्लू गिर चुका था, बाल चेहरे पर चिपके थे, और वह अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। उसे याद ही नहीं रहा कि वह कहाँ है और किसके साथ है। वह बस अपनी आज़ादी को पी रही थी।

रवि, जो अब तक एक कोने में खड़ा था, कामिनी के इस कामुक और मादक रूप को देखकर खुद को रोक नहीं सका।
उसकी बर्दाश्त की हद पार हो गई।
वह धीरे-धीरे कदमों से कामिनी की तरफ बढ़ा।
कामिनी की आँखें बंद थीं, चेहरे पर बारिश की बूंदें गिर रही थीं

रवि उसके बिल्कुल करीब आ गया। उसकी गर्म सांसें कामिनी के भीगे गालों को छूने लगीं।
"आंटी..." रवि की भारी और नशीली आवाज़ ने कामिनी का ध्यान खींचा।
कामिनी ने धीरे से आँखें खोलीं। सामने रवि खड़ा था, बारिश में भीगा हुआ, उसकी टी-शर्ट उसके सीने से चिपकी हुई थी।
"आप कितनी सुंदर हैं..." रवि ने कामिनी की आँखों में गहराई से झांकते हुए कहा, "ऐसा लग रहा है जैसे कामदेव की पत्नी, रति खुद धरती पर उतर कर नाच रही हो।"
इस तारीफ ने कामिनी पर जादू कर दिया। उसका जिस्म स्थिर हो गया, कब उसने अपनी सुंदरता की तारीफ सुनी थी?

'काम की देवी रति...' एक जवान लड़का उसकी तुलना रति से कर रहा रहा.
आज तक उसे किसी ने इतनी खूबसूरती से नहीं सराहा था।


रमेश ने उसे 'रंडी' और 'गंवार' कहा था, लेकिन रवि ने उसे 'देवी' बना दिया।

कामिनी रवि की गहरी आवाज़ और नज़रों से इतनी मदहोश हो गई कि उसके पैर लड़खड़ा गए। गीले फर्श पर उसका संतुलन बिगड़ा और वह गिरने को हुई।
"आह्ह..."
लेकिन गिरने से पहले ही रवि के मजबूत, गठीले हाथों ने उसे थाम लिया।
रवि ने एक हाथ उसकी कमर पर और दूसरा उसकी पीठ पर रखकर उसे अपनी तरफ खींच लिया।

धप्प...
कामिनी का भारी, भीगा और नरम जिस्म रवि के सख्त, मर्दाना सीने से टकरा गया। कामिनी हैरान थी रवि ने उसे कितनी आसानी से थाम लिया.


दो भीगे बदन एक-दूसरे से चिपक गए।
कामिनी की छाती रवि की छाती पर दब गई, उसके कड़क निप्पल रवि की छाती में चुभने लगे।
कामिनी रवि की बांहों में कैद थी। उनकी नज़रें मिलीं।
बारिश का शोर था, लेकिन दोनों के बीच एक चुप्पी थी जो चीख रही थी।
रवि ने धीरे से अपना चेहरा झुकाया।
कामिनी चाहती तो उसे धक्का दे सकती थी, लेकिन उसने अपनी आँखें मूंद लीं और अपना चेहरा ऊपर उठा दिया। यह एक मूक सहमति थी। कामिनी के संस्कार, उसका माँ होने का भाव, उसकी उम्र, उसकी शर्म, लाज सब बारिश के ठन्डे पानी मे बह गए थे.
जवान मर्द की पकड़ ने उसे जवान कर दिया था, जांघो की बीच योनि खुल के बंद हो जा रही थी.

और फिर...
न जाने किस आवेश में, रवि ने अपने होंठ कामिनी के गुलाबी, भीगे होंठों पर रख दिए।
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रवि के होंठ जैसे ही कामिनी के होठों से टकराए, कामिनी का बचा-खुचा संयम भी बारिश के पानी में बह गया।


वह रवि को रोक नहीं सकी। रोकना चाहती भी नहीं थी।
उसका जिस्म, जो बरसों से प्यार और स्पर्श के लिए तरस रहा था, आज रवि की गर्मी पाकर सुलग उठा।
कामिनी के होंठ रवि के लिए किसी प्यासे फूल की तरह खुल गए।
रवि ने मौका नहीं गंवाया। उसने अपनी गर्म जीभ कामिनी के मुंह के अंदर डाल दी।
जवाब में कामिनी ने भी अपनी जीभ आगे बढ़ा दी।
deep-kiss-passionate-kiss


दो जीभें एक-दूसरे से लिपट गईं, लड़ने लगीं और एक-दूसरे का रस पीने लगीं।
कामिनी, जो आज तक सिर्फ़ एक 'भोग की वस्तु' बनी थी, आज पहली बार "प्रेमिका" बन गई थी। वह आगे होकर रवि की जीभ को चूस रही थी।
उसने ऐसा कभी नहीं किया था, उसे आता हूँ नहीं था, इसे kiss कहते है ये भी नहीं पता था.
वो मुँह खोले अपने बेटे के दोस्त की जीभ चूस रही थी, प्यासी कुतिया की तरह उसके होंठो को चाट रही थी.

चुप्प... सुड़प...लप... लप....
बारिश के शोर के बीच उनके चूसने की गीली आवाज़ें गूंजने लगीं।
रवि ने कामिनी को अपनी बाहों में कसकर भींच लिया।
उसका लंड पूरी ताकत से खड़ा हो चुका था और कामिनी के पेट और नाभि के निचले हिस्से (Pelvis) पर दबाव बना रहा था।
गीली साड़ी की वजह से कामिनी को वह सख्त, लोहे जैसा दबाव साफ़ महसूस हो रहा था।
यह अहसास उसे पागल कर रहा था।
वह पीछे हटने के बजाय, अपनी कमर को आगे धकेलने लगी।
वह अपनी चूत को उस खड़े लंड पर रगड़ना चाहती थी, उस गर्माहट को अपनी गहराइयों में महसूस करना चाहती थी।
दोनों एक-दूसरे में इस कदर खो गए थे कि उन्हें दुनिया की कोई सुध नहीं थी।
कामिनी अपना अस्तित्व भुला चुकी थी.
***************
तभी नीचे से बंटी आया।
उसने नीचे से आवाज़ दी थी— "मम्मी, रवि... हलवा...ठंडा हो रहा है, आ जाओ "
लेकिन जब कोई जवाब नहीं आया, तो वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया।
जैसे ही वह छत की दहलीज पर पहुंचा, उसके कदम ज़मीन पर जम गए।
उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
सामने बारिश में जो नज़ारा था, वह किसी भी बेटे के होश उड़ाने के लिए काफी था।
उसका दोस्त रवि और उसकी माँ कामिनी... आपस में गूंथम-गूंथा थे।

रवि ने कामिनी को दबोच रखा था और पागलों की तरह उसका मुंह खा रहा था।
और उसकी माँ?
वह विरोध नहीं कर रही थी।
बंटी ने देखा कि कामिनी की कमर रवि के लंड को महसूस करने के लिए आगे-पीछे (Grinding) हो रही है। वह अपनी गांड को हिला-हिलाकर रवि के लंड पर रगड़ रही थी।

रवि के दोनों हाथ कामिनी के भीगे हुए, भारी स्तनों को कस-कस कर भींच रहे थे। कभी वह स्तनों को मसलता, तो कभी उसका हाथ फिसलकर कामिनी की भारी गांड पर चला जाता और उसे आटे की लोई की तरह गूंथ देता।

यह दृश्य देखकर बंटी को गुस्सा आना चाहिए था, लेकिन उसकी उम्र और माहौल ने उसे धोखा दे दिया।
अपनी माँ का यह कामुक, जंगली रूप देखकर बंटी का अपना लंड भी पैंट के अंदर फनफनाने लगा।
वह वहीं खड़ा होकर, अपनी माँ को अपने दोस्त के साथ 'रासलीला' करते हुए देखने लगा।


इधर कामिनी और रवि को बंटी की मौजूदगी का कोई इल्म नहीं था। वे दूसरे लोक में थे।
करीब 10 मिनट तक यह खेल चलता रहा।
दोनों के भीगे जिस्म एक-दूसरे पर रगड़ खा रहे थे। घर्षण से आग पैदा हो रही थी। वैज्ञानिक नियम है.
लेकिन विज्ञानं ये नहीं बताता की दो जिस्म भी जब रगड़ते है तो गर्मी, आग पैदा होती है, लेकिन ये आग कैसी होती है इसकी परिभाषा किसी किताब मे नहीं लिखी किसी ने.
मै भी नहीं लिख सकता, ये सिर्फ महसूस किया जा सकता है.


कामिनी की चूत पूरी तरह से बह निकली थी।
उसकी योनि का चिपचिपा पानी (Lubrication) रिसकर उसकी जांघों पर आ गया था और बारिश के पानी के साथ बर्बाद हुआ जा रहा था,

कामिनी ने ऐसा Kiss अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं किया था।
"ईईस्स्स्स.... आअह्ह्ह..... उउउफ्फ्फ्फ़...."
कामिनी के गले से रवि के मुंह में सिसकियाँ निकल रही थीं। वह मचल रही थी।

रमेश के साथ उसे जबरजस्ती, बलात्कार जैसा ही महसूस हुआ था, लेकिन रवि के साथ वह 'प्यार की अनुभूति' कर रही थी।

यह गर्म चुम्बन उसे खींचकर वापस उसकी जवानी में ले आया था। उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा था।
उसे पहली बार पता चला कि प्यार और हवस के बीच एक "जुनून" भी होता है, जिसे आज एक 20 साल का लड़का उसे सीखा रहा था।
बदकिश्मती की ये अहसास बहुत देर तक सम्भव ना हो सका....
हवा का एक तेज़ झोंका आया।
छत का लोहे का दरवाज़ा, जो खुला था, हवा के दबाव से ज़ोर से दीवार से टकराया।
धड़ाम!!! भड़ाम्म्म्म......

वह आवाज़ किसी बम धमाके जैसी थी।
इस तेज़ आवाज़ ने कामिनी और रवि की तंद्रा तोड़ दी।
कामिनी को जैसे 440 वोल्ट का झटका लगा। वह होश में आई।
उसने झटके से रवि को धक्का दिया।
उसने चारों तरफ देखा।

सीढ़ियों का दरवाज़ा अब बंद हो चुका था (हवा से)।
बंटी, जो दरवाज़े के पास खड़ा था, आवाज़ होते ही और कामिनी के होश में आने से पहले ही वहां से खिसक लिया था। वह नीचे भाग गया था ताकि पकड़ा न जाए।

कामिनी का दिल मुंह को आ गया।
वह हांफ रही थी। उसका सीना ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके होंठ सूजे हुए थे और ब्लाउज अस्त-व्यस्त था। निप्पल भीगे ब्लाउज से साफ झलक रहे थे, बहार आने को बेताब थे.
या यूँ कहिये वो सम्पूर्ण नंगी ही खड़ी थी रवि के सामने.

उसे अहसास हुआ कि उसने क्या कर दिया।
उसने अपने बेटे के दोस्त के साथ, खुले आसमान के नीचे, अपनी सारी हदें पार कर दी थीं।
उसका जिस्म कांप गया, उत्तेजना हवास मे वो क्या कर गई.

शर्म, डर और उत्तेजना का एक मिश्रित भाव उसके चेहरे पर आ गया।
उसने रवि की तरफ एक बार भी नहीं देखा।
उसमें नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं थी।
वह अपना पल्लू समेटती हुई, नंगे पांव भागती हुई सीढ़ियों की तरफ लपकी और सीधे नीचे अपने कमरे में जा घुसी।

पीछे छत पर...
रवि अकेला खड़ा था।
बारिश अभी भी हो रही थी।
वह भीग रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक शैतानी और संतुष्ट मुस्कान थी।
उसने अपनी जीभ अपने होठों पर फेरी, जहाँ कामिनी की लार और लिपस्टिक का स्वाद अभी भी बाकी था।
********************


कामिनी अपने कमरे में बदहवास सी खड़ी थी।
उसकी सांसें फूली हुई थीं। उसकी चूत किसी खुले हुए नल की तरह बह रही थी। योनि के अंदर एक भयानक जलन और मीठा दर्द था, जैसे वहां कोई ज्वालामुखी फटने को तैयार हो।
उसने जैसे-तैसे खुद को संभाला। बाथरूम में जाकर उसने अपने भीगे कपड़े उतारे।
आज उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि आईने में अपने नंगे जिस्म और चेहरे को देख सके। उसे अपनी आँखों में वह 'हवस' साफ़ दिखाई दे रही थी।
उसने बदन पोंछा और कपड़े बदलने लगी।
उसने एक ढीला-ढाला सूती गाउन (Night Gown) पहन लिया।
लेकिन उसकी चूत इतनी गीली और संवेदनशील थी कि वह पैंटी का कपड़ा बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।
उसने फैसला किया— अंदर कुछ नहीं पहनेगी।
गाउन के नीचे वह पूरी तरह नंगी थी। आज़ाद।

बाहर से बंटी की आवाज़ आई— "जल्दी करो ना माँ... भूख लगी है।"
कामिनी ने गाउन ठीक किया और बालों पर तौलिया लपेटा। वह बाहर जाने के लिए मुड़ी, लेकिन उसके कदम भारी थे।
'कैसे सामना करूँगी रवि का? अभी छत पर जो हुआ... उसके बाद तो मुझे ज़मीन में गड़ जाना चाहिए।'
लेकिन पेट की भूख और बेटे की पुकार ने उसे बाहर खींच लिया।

वह डाइनिंग टेबल पर पहुंची।
रवि पहले से वहां बैठा था। वो भी कपडे बदल कार वहाँ आ बैठा था, उसका गठिला जिस्म कामिनी को आकर्षित कर रहा था,

उसने कामिनी को देखा, उसकी आँखों में वही तारीफ थी, वही चमक थी जो थोड़ी देर पहले छत पर थी.

"आओ ना आंटी..." रवि ने कुर्सी खींचते हुए कहा।
कामिनी नज़रें झुकाए, चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई।
उसके कंधे झुके हुए थे, जैसे कोई अपराधी कटघरे में बैठा हो।

"कैसा लगा माँ?" बंटी ने हलवे का चम्मच उठाते हुए पूछा। उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।

"कक्क.. कक... क्या कैसा?" कामिनी हड़बड़ा गई।
"अरे छत पर... बारिश में भीगना," बंटी ने बड़ी संजीदगी से कहा, "मैं देखता हूँ आप हमेशा परेशान रहती हो, घर के कामों में उलझी रहती हो। कभी-कभी खुद के लिए भी जीना चाहिए माँ।"
बंटी किसी परिपक्व (Mature) मर्द की तरह बात कर रहा था।

कामिनी हैरान थी। उसका बेटा उसे 'जीने' की सलाह दे रहा था? क्या उसे कुछ पता है? या वह बस अपनी माँ की खुशी चाहता है?

बंटी की इन बातों ने कामिनी के मन का बोझ थोड़ा हल्का कर दिया।
तभी... टेबल के नीचे हलचल हुई।
"तुझे पता है बंटी... आंटी तो खूब अच्छा नाचती हैं," रवि ने शरारती लहजे में कहा।
और उसी वक़्त, टेबल के नीचे रवि का नंगा पैर कामिनी के पैर पर चढ़ गया और उसकी पिंडलियों को सहलाने लगा।
कामिनी को करंट लगा।
"कक्क.... कककया... क्या तुम दोनों भी मुझे छेड़ रहे हो? अपनी माँ को? बिगड़ गये हो तुम लोग, हलवा खाओ, ठंडा हो जायेगा," कामिनी ने बात बदलने की कोशिश की।

"थैंक यू आंटी..." रवि ने एक बड़ा चम्मच मुंह में भरा और कामिनी की आँखों में झांकते हुए बोला.

"गाजर का हलवा बहुत स्वादिष्ट बना है... ऐसा 'माल' मैंने आज तक नहीं खाया।"
कहते हुए रवि के पैर की उंगलियां कामिनी की नंगी पिंडलियों से ऊपर चढ़ती हुई उसके घुटनों तक पहुंच गईं।

कामिनी शॉक्ड थी।
रवि की हिम्मत तो देखो! बेटा बगल में बैठा है और वह माँ को टेबल के नीचे छेड़ रहा है।
लेकिन कामिनी का डर और उसकी ख़ामोशी ही रवि की ताकत थी।
कामिनी की चूत, जो पहले से सुलग रही थी, इस स्पर्श से और भी गीली होने लगी।
रवि का पैर अब उसके गाउन के घेरे में घुस चुका था और उसकी नंगी जांघों पर रेंग रहा था।
कामिनी को उसे डांटना चाहिए था, पैर झटक देना चाहिए था।
लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया। वह बस कभी रवि को घूरती, तो कभी खांसी का नाटक करती।

असल में, वह उस स्पर्श से पागल हो रही थी। एक जवान लड़का, उसके बेटे के सामने, उसे उत्तेजित कर रहा था—यह जोखिम (Risk) उसे और भी ज्यादा मज़ा दे रहा था।
रवि के पैर का अंगूठा अब उसकी जांघों के बीच, ठीक चूत के मुहाने पर पहुंच गया था।
कामिनी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
उसे रुकना चाहिए था... लेकिन उसका जिस्म हार गया।
कामिनी कुर्सी पर थोड़ा आगे खिसक आई और टेबल के नीचे अपनी जांघों को चौड़ा कर दिया।
कामिनी की चुत पूरी तरह भीगी हुई चमक रही थी.20210804-213151

नतीजा?
पचचच...
रवि का मोटा अंगूठा सीधा कामिनी की गीली, फिसलन भरी चूत से टकरा गया।
"उईक्सस्स्स्स.... इस्स्स्स... आउच..."
कामिनी के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई। उसकी आँखें गोल हो गईं।
रवि को भी उम्मीद नहीं थी कि रास्ता इतना आसान और इतना गीला मिलेगा। उसे पता चल गया कि आंटी ने नीचे पैंटी नहीं पहनी है।
यह इशारा काफी था।
रवि का अंगूठा अब कामिनी की चूत की दरार को ऊपर से नीचे तक टटोलने लगा।
कामिनी के ज़हन में रवि का वह गुलाबी लंड घूमने लगा जो उसने सुबह देखा था।
उससे रहा नहीं गया। वह अपनी कमर को थोड़ा और आगे ले गई।

धप... धापक... पच...
एक सधे हुए दबाव के साथ, रवि का मोटा अंगूठा कामिनी की गीली योनि के अंदर धंस गया।
कामिनी चीखना चाहती थी, लेकिन उसने कसकर अपने मुंह पर हाथ रख लिया।
रवि धीरे-धीरे अपने अंगूठे को अंदर-बाहर करने लगा, उसे सहलाने लगा।
कामिनी चरम सीमा पर थी।
अपने बेटे के ठीक बगल में बैठकर, उसके दोस्त से अपनी चूत में उंगली (अंगूठा) करवा रही थी। इस 'हराम' अनुभूति ने उसे आग का गोला बना दिया था। उसे सिर्फ अपने जिस्म की आग को शांत करना था, इसके लिए ही तो वो अपनी मान मर्यादा त्यागी बैठी थी,
उसे सिर्फ अपनी चुत मे होती जलन याद थी.

वह खुद अपनी कमर हिलाकर उस अंगूठे को और गहराई तक लेने की कोशिश कर रही थी।
वह बेकाबू थी... पागल हो रही थी... उसकी चूत में ज्वालामुखी फूटने वाला था... वह इस लावे को बाहर निकाल देना चाहती थी...
"इसस्स.... उफ्फ्फ.... बस.... आह्ह्ह..." कामिनी बस चिल्लाने ही वही थी, उसका सब्र जवाब देने ही वाला था, गले मे दबी हुई आवाज़ चीख का रूप लेने ही वाली थी की.....
तभी...
ट्रिंग... ट्रिंग... ट्रिंग...
टेबल पर रखे कामिनी के फोन की घंटी बजी।
पच...
आवाज़ सुनकर रवि ने झटके से अपना पैर बाहर खींच लिया।
कामिनी को लगा जैसे उसकी आत्मा शरीर से निकलते-निकलते बची हो। वह हड़बड़ा कर सीधी हो गई।
उसकी सांसें अटक गईं।

"पापा का फोन है माँ..."
बंटी ने टेबल पर पड़ा फोन सरका कर कामिनी की तरफ बढ़ा दिया।
उसकी नज़रें टीवी पर टिकी थीं, लेकिन उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह सब कुछ देख कर भी अनदेखा कर रहा है।
बंटी कुछ अलग ही था। या तो वो अपनी माँ को ख़ुश देखना चाहता था या फिर उसे दर्शक होने का ही मजा था, खिलाडी बनने मे उसकी कोई रूचि नहीं थी.

Contd.....
Bahut hee hot update …
 
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Ajju Landwalia

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मेरी माँ कामिनी -15


छत पर मूसलाधार बारिश हो रही थी।
कामिनी किसी मन्त्रमुग्ध मोरनी की तरह गोल-गोल घूम रही थी। उसका पल्लू गिर चुका था, बाल चेहरे पर चिपके थे, और वह अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। उसे याद ही नहीं रहा कि वह कहाँ है और किसके साथ है। वह बस अपनी आज़ादी को पी रही थी।

रवि, जो अब तक एक कोने में खड़ा था, कामिनी के इस कामुक और मादक रूप को देखकर खुद को रोक नहीं सका।
उसकी बर्दाश्त की हद पार हो गई।
वह धीरे-धीरे कदमों से कामिनी की तरफ बढ़ा।
कामिनी की आँखें बंद थीं, चेहरे पर बारिश की बूंदें गिर रही थीं

रवि उसके बिल्कुल करीब आ गया। उसकी गर्म सांसें कामिनी के भीगे गालों को छूने लगीं।
"आंटी..." रवि की भारी और नशीली आवाज़ ने कामिनी का ध्यान खींचा।
कामिनी ने धीरे से आँखें खोलीं। सामने रवि खड़ा था, बारिश में भीगा हुआ, उसकी टी-शर्ट उसके सीने से चिपकी हुई थी।
"आप कितनी सुंदर हैं..." रवि ने कामिनी की आँखों में गहराई से झांकते हुए कहा, "ऐसा लग रहा है जैसे कामदेव की पत्नी, रति खुद धरती पर उतर कर नाच रही हो।"
इस तारीफ ने कामिनी पर जादू कर दिया। उसका जिस्म स्थिर हो गया, कब उसने अपनी सुंदरता की तारीफ सुनी थी?

'काम की देवी रति...' एक जवान लड़का उसकी तुलना रति से कर रहा रहा.
आज तक उसे किसी ने इतनी खूबसूरती से नहीं सराहा था।


रमेश ने उसे 'रंडी' और 'गंवार' कहा था, लेकिन रवि ने उसे 'देवी' बना दिया।

कामिनी रवि की गहरी आवाज़ और नज़रों से इतनी मदहोश हो गई कि उसके पैर लड़खड़ा गए। गीले फर्श पर उसका संतुलन बिगड़ा और वह गिरने को हुई।
"आह्ह..."
लेकिन गिरने से पहले ही रवि के मजबूत, गठीले हाथों ने उसे थाम लिया।
रवि ने एक हाथ उसकी कमर पर और दूसरा उसकी पीठ पर रखकर उसे अपनी तरफ खींच लिया।

धप्प...
कामिनी का भारी, भीगा और नरम जिस्म रवि के सख्त, मर्दाना सीने से टकरा गया। कामिनी हैरान थी रवि ने उसे कितनी आसानी से थाम लिया.


दो भीगे बदन एक-दूसरे से चिपक गए।
कामिनी की छाती रवि की छाती पर दब गई, उसके कड़क निप्पल रवि की छाती में चुभने लगे।
कामिनी रवि की बांहों में कैद थी। उनकी नज़रें मिलीं।
बारिश का शोर था, लेकिन दोनों के बीच एक चुप्पी थी जो चीख रही थी।
रवि ने धीरे से अपना चेहरा झुकाया।
कामिनी चाहती तो उसे धक्का दे सकती थी, लेकिन उसने अपनी आँखें मूंद लीं और अपना चेहरा ऊपर उठा दिया। यह एक मूक सहमति थी। कामिनी के संस्कार, उसका माँ होने का भाव, उसकी उम्र, उसकी शर्म, लाज सब बारिश के ठन्डे पानी मे बह गए थे.
जवान मर्द की पकड़ ने उसे जवान कर दिया था, जांघो की बीच योनि खुल के बंद हो जा रही थी.

और फिर...
न जाने किस आवेश में, रवि ने अपने होंठ कामिनी के गुलाबी, भीगे होंठों पर रख दिए।
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रवि के होंठ जैसे ही कामिनी के होठों से टकराए, कामिनी का बचा-खुचा संयम भी बारिश के पानी में बह गया।


वह रवि को रोक नहीं सकी। रोकना चाहती भी नहीं थी।
उसका जिस्म, जो बरसों से प्यार और स्पर्श के लिए तरस रहा था, आज रवि की गर्मी पाकर सुलग उठा।
कामिनी के होंठ रवि के लिए किसी प्यासे फूल की तरह खुल गए।
रवि ने मौका नहीं गंवाया। उसने अपनी गर्म जीभ कामिनी के मुंह के अंदर डाल दी।
जवाब में कामिनी ने भी अपनी जीभ आगे बढ़ा दी।
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दो जीभें एक-दूसरे से लिपट गईं, लड़ने लगीं और एक-दूसरे का रस पीने लगीं।
कामिनी, जो आज तक सिर्फ़ एक 'भोग की वस्तु' बनी थी, आज पहली बार "प्रेमिका" बन गई थी। वह आगे होकर रवि की जीभ को चूस रही थी।
उसने ऐसा कभी नहीं किया था, उसे आता हूँ नहीं था, इसे kiss कहते है ये भी नहीं पता था.
वो मुँह खोले अपने बेटे के दोस्त की जीभ चूस रही थी, प्यासी कुतिया की तरह उसके होंठो को चाट रही थी.

चुप्प... सुड़प...लप... लप....
बारिश के शोर के बीच उनके चूसने की गीली आवाज़ें गूंजने लगीं।
रवि ने कामिनी को अपनी बाहों में कसकर भींच लिया।
उसका लंड पूरी ताकत से खड़ा हो चुका था और कामिनी के पेट और नाभि के निचले हिस्से (Pelvis) पर दबाव बना रहा था।
गीली साड़ी की वजह से कामिनी को वह सख्त, लोहे जैसा दबाव साफ़ महसूस हो रहा था।
यह अहसास उसे पागल कर रहा था।
वह पीछे हटने के बजाय, अपनी कमर को आगे धकेलने लगी।
वह अपनी चूत को उस खड़े लंड पर रगड़ना चाहती थी, उस गर्माहट को अपनी गहराइयों में महसूस करना चाहती थी।
दोनों एक-दूसरे में इस कदर खो गए थे कि उन्हें दुनिया की कोई सुध नहीं थी।
कामिनी अपना अस्तित्व भुला चुकी थी.
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तभी नीचे से बंटी आया।
उसने नीचे से आवाज़ दी थी— "मम्मी, रवि... हलवा...ठंडा हो रहा है, आ जाओ "
लेकिन जब कोई जवाब नहीं आया, तो वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया।
जैसे ही वह छत की दहलीज पर पहुंचा, उसके कदम ज़मीन पर जम गए।
उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
सामने बारिश में जो नज़ारा था, वह किसी भी बेटे के होश उड़ाने के लिए काफी था।
उसका दोस्त रवि और उसकी माँ कामिनी... आपस में गूंथम-गूंथा थे।

रवि ने कामिनी को दबोच रखा था और पागलों की तरह उसका मुंह खा रहा था।
और उसकी माँ?
वह विरोध नहीं कर रही थी।
बंटी ने देखा कि कामिनी की कमर रवि के लंड को महसूस करने के लिए आगे-पीछे (Grinding) हो रही है। वह अपनी गांड को हिला-हिलाकर रवि के लंड पर रगड़ रही थी।

रवि के दोनों हाथ कामिनी के भीगे हुए, भारी स्तनों को कस-कस कर भींच रहे थे। कभी वह स्तनों को मसलता, तो कभी उसका हाथ फिसलकर कामिनी की भारी गांड पर चला जाता और उसे आटे की लोई की तरह गूंथ देता।

यह दृश्य देखकर बंटी को गुस्सा आना चाहिए था, लेकिन उसकी उम्र और माहौल ने उसे धोखा दे दिया।
अपनी माँ का यह कामुक, जंगली रूप देखकर बंटी का अपना लंड भी पैंट के अंदर फनफनाने लगा।
वह वहीं खड़ा होकर, अपनी माँ को अपने दोस्त के साथ 'रासलीला' करते हुए देखने लगा।


इधर कामिनी और रवि को बंटी की मौजूदगी का कोई इल्म नहीं था। वे दूसरे लोक में थे।
करीब 10 मिनट तक यह खेल चलता रहा।
दोनों के भीगे जिस्म एक-दूसरे पर रगड़ खा रहे थे। घर्षण से आग पैदा हो रही थी। वैज्ञानिक नियम है.
लेकिन विज्ञानं ये नहीं बताता की दो जिस्म भी जब रगड़ते है तो गर्मी, आग पैदा होती है, लेकिन ये आग कैसी होती है इसकी परिभाषा किसी किताब मे नहीं लिखी किसी ने.
मै भी नहीं लिख सकता, ये सिर्फ महसूस किया जा सकता है.


कामिनी की चूत पूरी तरह से बह निकली थी।
उसकी योनि का चिपचिपा पानी (Lubrication) रिसकर उसकी जांघों पर आ गया था और बारिश के पानी के साथ बर्बाद हुआ जा रहा था,

कामिनी ने ऐसा Kiss अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं किया था।
"ईईस्स्स्स.... आअह्ह्ह..... उउउफ्फ्फ्फ़...."
कामिनी के गले से रवि के मुंह में सिसकियाँ निकल रही थीं। वह मचल रही थी।

रमेश के साथ उसे जबरजस्ती, बलात्कार जैसा ही महसूस हुआ था, लेकिन रवि के साथ वह 'प्यार की अनुभूति' कर रही थी।

यह गर्म चुम्बन उसे खींचकर वापस उसकी जवानी में ले आया था। उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा था।
उसे पहली बार पता चला कि प्यार और हवस के बीच एक "जुनून" भी होता है, जिसे आज एक 20 साल का लड़का उसे सीखा रहा था।
बदकिश्मती की ये अहसास बहुत देर तक सम्भव ना हो सका....
हवा का एक तेज़ झोंका आया।
छत का लोहे का दरवाज़ा, जो खुला था, हवा के दबाव से ज़ोर से दीवार से टकराया।
धड़ाम!!! भड़ाम्म्म्म......

वह आवाज़ किसी बम धमाके जैसी थी।
इस तेज़ आवाज़ ने कामिनी और रवि की तंद्रा तोड़ दी।
कामिनी को जैसे 440 वोल्ट का झटका लगा। वह होश में आई।
उसने झटके से रवि को धक्का दिया।
उसने चारों तरफ देखा।

सीढ़ियों का दरवाज़ा अब बंद हो चुका था (हवा से)।
बंटी, जो दरवाज़े के पास खड़ा था, आवाज़ होते ही और कामिनी के होश में आने से पहले ही वहां से खिसक लिया था। वह नीचे भाग गया था ताकि पकड़ा न जाए।

कामिनी का दिल मुंह को आ गया।
वह हांफ रही थी। उसका सीना ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके होंठ सूजे हुए थे और ब्लाउज अस्त-व्यस्त था। निप्पल भीगे ब्लाउज से साफ झलक रहे थे, बहार आने को बेताब थे.
या यूँ कहिये वो सम्पूर्ण नंगी ही खड़ी थी रवि के सामने.

उसे अहसास हुआ कि उसने क्या कर दिया।
उसने अपने बेटे के दोस्त के साथ, खुले आसमान के नीचे, अपनी सारी हदें पार कर दी थीं।
उसका जिस्म कांप गया, उत्तेजना हवास मे वो क्या कर गई.

शर्म, डर और उत्तेजना का एक मिश्रित भाव उसके चेहरे पर आ गया।
उसने रवि की तरफ एक बार भी नहीं देखा।
उसमें नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं थी।
वह अपना पल्लू समेटती हुई, नंगे पांव भागती हुई सीढ़ियों की तरफ लपकी और सीधे नीचे अपने कमरे में जा घुसी।

पीछे छत पर...
रवि अकेला खड़ा था।
बारिश अभी भी हो रही थी।
वह भीग रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक शैतानी और संतुष्ट मुस्कान थी।
उसने अपनी जीभ अपने होठों पर फेरी, जहाँ कामिनी की लार और लिपस्टिक का स्वाद अभी भी बाकी था।
********************


कामिनी अपने कमरे में बदहवास सी खड़ी थी।
उसकी सांसें फूली हुई थीं। उसकी चूत किसी खुले हुए नल की तरह बह रही थी। योनि के अंदर एक भयानक जलन और मीठा दर्द था, जैसे वहां कोई ज्वालामुखी फटने को तैयार हो।
उसने जैसे-तैसे खुद को संभाला। बाथरूम में जाकर उसने अपने भीगे कपड़े उतारे।
आज उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि आईने में अपने नंगे जिस्म और चेहरे को देख सके। उसे अपनी आँखों में वह 'हवस' साफ़ दिखाई दे रही थी।
उसने बदन पोंछा और कपड़े बदलने लगी।
उसने एक ढीला-ढाला सूती गाउन (Night Gown) पहन लिया।
लेकिन उसकी चूत इतनी गीली और संवेदनशील थी कि वह पैंटी का कपड़ा बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।
उसने फैसला किया— अंदर कुछ नहीं पहनेगी।
गाउन के नीचे वह पूरी तरह नंगी थी। आज़ाद।

बाहर से बंटी की आवाज़ आई— "जल्दी करो ना माँ... भूख लगी है।"
कामिनी ने गाउन ठीक किया और बालों पर तौलिया लपेटा। वह बाहर जाने के लिए मुड़ी, लेकिन उसके कदम भारी थे।
'कैसे सामना करूँगी रवि का? अभी छत पर जो हुआ... उसके बाद तो मुझे ज़मीन में गड़ जाना चाहिए।'
लेकिन पेट की भूख और बेटे की पुकार ने उसे बाहर खींच लिया।

वह डाइनिंग टेबल पर पहुंची।
रवि पहले से वहां बैठा था। वो भी कपडे बदल कार वहाँ आ बैठा था, उसका गठिला जिस्म कामिनी को आकर्षित कर रहा था,

उसने कामिनी को देखा, उसकी आँखों में वही तारीफ थी, वही चमक थी जो थोड़ी देर पहले छत पर थी.

"आओ ना आंटी..." रवि ने कुर्सी खींचते हुए कहा।
कामिनी नज़रें झुकाए, चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई।
उसके कंधे झुके हुए थे, जैसे कोई अपराधी कटघरे में बैठा हो।

"कैसा लगा माँ?" बंटी ने हलवे का चम्मच उठाते हुए पूछा। उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।

"कक्क.. कक... क्या कैसा?" कामिनी हड़बड़ा गई।
"अरे छत पर... बारिश में भीगना," बंटी ने बड़ी संजीदगी से कहा, "मैं देखता हूँ आप हमेशा परेशान रहती हो, घर के कामों में उलझी रहती हो। कभी-कभी खुद के लिए भी जीना चाहिए माँ।"
बंटी किसी परिपक्व (Mature) मर्द की तरह बात कर रहा था।

कामिनी हैरान थी। उसका बेटा उसे 'जीने' की सलाह दे रहा था? क्या उसे कुछ पता है? या वह बस अपनी माँ की खुशी चाहता है?

बंटी की इन बातों ने कामिनी के मन का बोझ थोड़ा हल्का कर दिया।
तभी... टेबल के नीचे हलचल हुई।
"तुझे पता है बंटी... आंटी तो खूब अच्छा नाचती हैं," रवि ने शरारती लहजे में कहा।
और उसी वक़्त, टेबल के नीचे रवि का नंगा पैर कामिनी के पैर पर चढ़ गया और उसकी पिंडलियों को सहलाने लगा।
कामिनी को करंट लगा।
"कक्क.... कककया... क्या तुम दोनों भी मुझे छेड़ रहे हो? अपनी माँ को? बिगड़ गये हो तुम लोग, हलवा खाओ, ठंडा हो जायेगा," कामिनी ने बात बदलने की कोशिश की।

"थैंक यू आंटी..." रवि ने एक बड़ा चम्मच मुंह में भरा और कामिनी की आँखों में झांकते हुए बोला.

"गाजर का हलवा बहुत स्वादिष्ट बना है... ऐसा 'माल' मैंने आज तक नहीं खाया।"
कहते हुए रवि के पैर की उंगलियां कामिनी की नंगी पिंडलियों से ऊपर चढ़ती हुई उसके घुटनों तक पहुंच गईं।

कामिनी शॉक्ड थी।
रवि की हिम्मत तो देखो! बेटा बगल में बैठा है और वह माँ को टेबल के नीचे छेड़ रहा है।
लेकिन कामिनी का डर और उसकी ख़ामोशी ही रवि की ताकत थी।
कामिनी की चूत, जो पहले से सुलग रही थी, इस स्पर्श से और भी गीली होने लगी।
रवि का पैर अब उसके गाउन के घेरे में घुस चुका था और उसकी नंगी जांघों पर रेंग रहा था।
कामिनी को उसे डांटना चाहिए था, पैर झटक देना चाहिए था।
लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया। वह बस कभी रवि को घूरती, तो कभी खांसी का नाटक करती।

असल में, वह उस स्पर्श से पागल हो रही थी। एक जवान लड़का, उसके बेटे के सामने, उसे उत्तेजित कर रहा था—यह जोखिम (Risk) उसे और भी ज्यादा मज़ा दे रहा था।
रवि के पैर का अंगूठा अब उसकी जांघों के बीच, ठीक चूत के मुहाने पर पहुंच गया था।
कामिनी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
उसे रुकना चाहिए था... लेकिन उसका जिस्म हार गया।
कामिनी कुर्सी पर थोड़ा आगे खिसक आई और टेबल के नीचे अपनी जांघों को चौड़ा कर दिया।
कामिनी की चुत पूरी तरह भीगी हुई चमक रही थी.20210804-213151

नतीजा?
पचचच...
रवि का मोटा अंगूठा सीधा कामिनी की गीली, फिसलन भरी चूत से टकरा गया।
"उईक्सस्स्स्स.... इस्स्स्स... आउच..."
कामिनी के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई। उसकी आँखें गोल हो गईं।
रवि को भी उम्मीद नहीं थी कि रास्ता इतना आसान और इतना गीला मिलेगा। उसे पता चल गया कि आंटी ने नीचे पैंटी नहीं पहनी है।
यह इशारा काफी था।
रवि का अंगूठा अब कामिनी की चूत की दरार को ऊपर से नीचे तक टटोलने लगा।
कामिनी के ज़हन में रवि का वह गुलाबी लंड घूमने लगा जो उसने सुबह देखा था।
उससे रहा नहीं गया। वह अपनी कमर को थोड़ा और आगे ले गई।

धप... धापक... पच...
एक सधे हुए दबाव के साथ, रवि का मोटा अंगूठा कामिनी की गीली योनि के अंदर धंस गया।
कामिनी चीखना चाहती थी, लेकिन उसने कसकर अपने मुंह पर हाथ रख लिया।
रवि धीरे-धीरे अपने अंगूठे को अंदर-बाहर करने लगा, उसे सहलाने लगा।
कामिनी चरम सीमा पर थी।
अपने बेटे के ठीक बगल में बैठकर, उसके दोस्त से अपनी चूत में उंगली (अंगूठा) करवा रही थी। इस 'हराम' अनुभूति ने उसे आग का गोला बना दिया था। उसे सिर्फ अपने जिस्म की आग को शांत करना था, इसके लिए ही तो वो अपनी मान मर्यादा त्यागी बैठी थी,
उसे सिर्फ अपनी चुत मे होती जलन याद थी.

वह खुद अपनी कमर हिलाकर उस अंगूठे को और गहराई तक लेने की कोशिश कर रही थी।
वह बेकाबू थी... पागल हो रही थी... उसकी चूत में ज्वालामुखी फूटने वाला था... वह इस लावे को बाहर निकाल देना चाहती थी...
"इसस्स.... उफ्फ्फ.... बस.... आह्ह्ह..." कामिनी बस चिल्लाने ही वही थी, उसका सब्र जवाब देने ही वाला था, गले मे दबी हुई आवाज़ चीख का रूप लेने ही वाली थी की.....
तभी...
ट्रिंग... ट्रिंग... ट्रिंग...
टेबल पर रखे कामिनी के फोन की घंटी बजी।
पच...
आवाज़ सुनकर रवि ने झटके से अपना पैर बाहर खींच लिया।
कामिनी को लगा जैसे उसकी आत्मा शरीर से निकलते-निकलते बची हो। वह हड़बड़ा कर सीधी हो गई।
उसकी सांसें अटक गईं।

"पापा का फोन है माँ..."
बंटी ने टेबल पर पड़ा फोन सरका कर कामिनी की तरफ बढ़ा दिया।
उसकी नज़रें टीवी पर टिकी थीं, लेकिन उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह सब कुछ देख कर भी अनदेखा कर रहा है।
बंटी कुछ अलग ही था। या तो वो अपनी माँ को ख़ुश देखना चाहता था या फिर उसे दर्शक होने का ही मजा था, खिलाडी बनने मे उसकी कोई रूचि नहीं थी.

Contd.....

Superb update Lord haram Bro,

Simply outstanding............

Keep rokcing Bro
 
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rajeev13

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इस कहानी को पढ़कर यह अहसास हुआ कि इस मंच पर आपके जैसे बेहतरीन लेखकों की कमी है, क्योंकि अगर कहानी और संवाद ऐसे न हों, तो फिर वे कहानी क्या हुई!

वाकई मज़ा आ गया

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Luckyloda

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अपडेट - 13, मेरी माँ कामिनी



सुबह के 8 बज रहे थे।
कमरे की खिड़की से धूप की एक तीखी किरण कामिनी के चेहरे पर पड़ी। वह हड़बड़ा कर उठी।
सिर भारी था, जैसे कोई पत्थर रखा हो।
जैसे ही उसे होश आया, उसे अपने मुंह के अंदर एक अजीब सा कसैला और बासी स्वाद महसूस हुआ।
याददाश्त का एक झोंका आया—कल रात... स्टोर रूम... रघु का वीर्य... और उसका निगलना।

"उबक..."

कामिनी को एक ज़बरदस्त उबकाई आई। उसे लगा वह उल्टी कर देगी। उसे तुरंत अपना मुंह साफ़ करना था, उस 'गंदगी' को खुरच कर बाहर निकालना था।
उसने बाथरूम की तरफ देखा, लेकिन अंदर से पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी। रमेश अंदर था।
कामिनी के पास इंतज़ार करने का वक़्त नहीं था। उसका पेट मचल रहा था।
वह बिस्तर से उठी और भागते हुए कमरे से बाहर निकली।
वह सीधे हॉल में बने कॉमन बाथरूम की तरफ दौड़ी।

हड़बड़ाहट और उबकाई के मारे उसने यह चेक भी नहीं किया कि अंदर कोई है या नहीं। उसे लगा बंटी और रवि तो स्कूल चले गये होंगे,

उसने झटके से बाथरूम का दरवाज़ा धकेला।
कुंडी शायद ठीक से नहीं लगी थी या खुली थी, दरवाज़ा एक बार में ही खुल गया।
और सामने का दृश्य देखकर कामिनी के कदम वहीं फ्रीज़ हो गए। उसकी आंखे फटी की फटी रह गई,
सामने शावर के नीचे रवि खड़ा था।
बिल्कुल नंगा।
पानी की बूंदें उसके कसते हुए, गोरे और जवान बदन से फिसल रही थीं।
दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनकर रवि चौंक गया। वह मुड़ा।

उसकी आँखों में हैरानी थी, उसके सामने अप्सरा खड़ी थी मुँह पर हाथ रखे, रवि खुद हक्का बक्का था, उसने कभी ऐसी परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की थी.
उसने अपना बदन छुपाने की कोशिश नहीं की।

सामने उसके दोस्त की माँ, कामिनी खड़ी थी—बिखरे बाल, अस्त-व्यस्त साड़ी और चेहरे पर हवाईयां।
कामिनी को तुरंत भाग जाना चाहिए था। उसे चीखना चाहिए था या माफ़ी मांगकर दरवाज़ा बंद कर देना चाहिए था।
लेकिन... उसे सांप सूंघ गया।
उसकी नज़रें रवि के चेहरे से फिसलकर, उसके चौड़े सीने, सपाट पेट से होते हुए सीधे नीचे चली गईं।
और वहां जाकर चिपक गईं।

कामिनी ने अब तक अपने जीवन में सिर्फ़ दो तरह के लंड देखे थे (पति के अलावा)—रघु का और शमशेर का।
दोनों काले थे। भद्दे थे। घने, काले और जंगली बालों से घिरे हुए। उनमें एक 'जानवर' जैसा खुरदरापन था।
लेकिन रवि?
रवि का लंड... खूबसूरती की एक मूरत था।
वह गोरा-चिट्टा था। बिल्कुल साफ़-सुथरा।
रवि ने अपनी जांघों के बीच के बाल पूरी तरह साफ़ कर रखे थे। वहां एक भी बाल नहीं था, सिर्फ़ चिकनी, गोरी चमड़ी थी।
और उस चिकनी जगह के बीचो-बीच... उसका लंड शान से लटक रहा था।
वह इस उम्र (20 साल )में भी काफी बड़ा और मोटा था, लेकिन उसमें एक सुडौलपन था।
उसका रंग बाकी शरीर की तरह ही हल्का सांवला-गोरा था, लेकिन उसका सुपारी, वह बिल्कुल गुलाबी (Pink) था।
ताज़े खिले हुए गुलाब की तरह।
कामिनी की आँखें फटी रह गईं।
उसने कभी सोचा भी नहीं था कि एक मर्द का अंग इतना सुंदर भी हो सकता है।
रघु और शमशेर के लंड 'हथियार' लगते थे, डरावने लगते थे।
लेकिन रवि का लंड एक 'फल' जैसा लग रहा था—रसीला, साफ़ और ताज़ा।
शावर का पानी उस गुलाबी सुपारी पर गिर रहा था और फिसलकर नीचे जा रहा था।
ना जाने क्यों कामिनी के दिमाग में तुलना चलने लगी। जिस्म पर चीटिया सी रेंगने लगी.
'इतना चिकना... इतना गोरा... रघु का तो काला नाग था... और यह? यह तो किसी राजकुमार जैसा है।'
रवि वहीं खड़ा था, पानी में भीगता हुआ।
उसका लंड, जो पहले शांत था, कामिनी की उन भूखी, ताड़ती हुई नज़रों को महसूस करके हल्का सा हिलने लगा।
उसमें हरकत हुई। वह धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा, जैसे सलामी दे रहा हो।
उस गुलाबी सुपारी का फूलना कामिनी को साफ़ दिखाई दे रहा था।
कामिनी एक भयंकर दुविधा में फंसी थी।
उसका दिमाग चीख रहा था— 'भाग कामिनी... यह तेरे बेटे का दोस्त है... यह पाप है।'
लेकिन उसका जिस्म?
उसका जिस्म उस 'खूबसूरत नज़ारे' के सम्मोहन में जकड़ गया था।
वह उस चिकनेपन को छूना चाहती थी। वह देखना चाहती थी कि वह 'गुलाबी हिस्सा' कितना नरम होगा।
उसकी चूत, जो सुबह उठते ही शांत थी, इस नज़ारे को देखकर फिर से गीली हो गई।
एक गर्म धारा उसकी पैंटी में रिस गई।
कल रात उसने 'काले और खुरदरे, रघु के लंड का स्वाद चखा था, वो इस हादसे से बहार निकली भी नहीं थी की, आज सुबह सुबह ही उसके सामने खूबसूरत अजूबा था, उसे लुभा रहा था.

कामिनी की सांसें फूलने लगीं। वह दरवाज़े के हैंडल को पकड़े, बस उस गुलाबी लंड को घूरे जा रही थी, जैसे किसी ने उस पर काला जादू कर दिया हो।

***************

कामिनी हक्की-बक्की थी। उसका दिमाग सुन्न हो चुका था।
बाथरूम के दरवाजे पर उसके पैर जैसे फेविकोल से चिपक गए थे। न वह अंदर जा पा रही थी, न बाहर आ पा रही थी। उसकी आँखें रवि के उस 'खूबसूरत' अंग पर टंगी हुई थीं।
तभी...
रवि के उस खड़े लंड ने एक हल्का सा झटका लिया।
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वह मांसल गुलाबी सुपारी हवा में फड़फड़ाया।
इस एक मामूली से झटके ने कामिनी को सपनों की दुनिया से खींचकर धरातल पर पटक दिया।

उसे होश आया कि वह क्या कर रही है।
वह घबराकर एक कदम पीछे हटी।
उसने हड़बड़ाहट में बाथरूम का दरवाज़ा अपनी तरफ खींचा और बंद कर दिया।
धप्प...
दरवाज़ा बंद होते ही कामिनी उसी दरवाजे से अपनी पीठ टिकाकर खड़ी हो गई।

उसकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी।
तभी अंदर से शावर के पानी के शोर के बीच रवि की मखमली आवाज़ आई—
"Sorry आंटी... मैं जल्दी में दरवाज़ा बंद करना भूल गया था।"
उसकी आवाज़ में शर्मिंदगी कम और एक अजीब सी 'शरारत' ज्यादा थी।
कामिनी का गला सूख रहा था। उसके मुंह में अभी भी रघु के वीर्य का वह कसैला और बासी स्वाद भरा हुआ था, जिसकी वजह से उसे उबकाई आ रही थी।
लेकिन रवि की आवाज़ और उस 'गुलाबी लंड' की छवि ने उसके दिमाग पर ऐसा असर किया कि उसने अनजाने में ही...
गटक...
उसने अपने मुंह में जमा थूक (और उस कसैले स्वाद) को निगल लिया।
हैरान कर देने वाली बात यह थी कि जैसे ही वह कड़वा घूंट उसके गले से नीचे उतरा... उसकी उबकाई गायब हो गई।
पेट की वह मरोड़, वह उल्टी आने का अहसास... सब उस 'जवान नज़ारे' के नशे में दब गया।
उसने अभी-अभी एक जवान लड़के का साफ़-सुथरा, गुलाबी और खूबसूरत लंड देखा था। उस दृश्य ने उसके दिमाग से 'गंदगी' का ख्याल ही मिटा दिया।
"क... ककक... कोई बात नहीं..." कामिनी ने दरवाजे के बाहर से हकलाते हुए जवाब दिया।
और फिर वह वहां से भागी।
जैसे कोई भूत उसके पीछे लगा हो। नंगे पैर वह हॉल पार करते हुए सीधे अपने बेडरूम में जा पहुंची।
बेडरूम में रमेश तैयार खड़ा था। वह नहा चुका था (कमरे वाले बाथरूम में) और कपड़े पहन रहा था।
कामिनी हांफते हुए अंदर आई।

उसका चेहरा पसीने से भीगा था और हवाइयां उड़ रही थीं।
रमेश ने मुड़कर उसे देखा। उसके चेहरे पर कल रात वाली हैवानियत का नामो-निशान नहीं था।
"अरे, आज कितना देर सोती रही तुम?" रमेश ने बड़े प्यार से, सामान्य लहजे में पूछा।
जैसे उसे कल रात का कुछ याद ही न हो। जैसे उसने कल अपनी बीवी को 'रंडी' नहीं बोला था, जैसे उसने उसे शमशेर के हवाले नहीं किया था।
यह उसका 'ब्लैकआउट' था या नाटक, कहना मुश्किल था।
"वो... वक... वो..." कामिनी कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन शब्द उसके गले में फंस गए। वह क्या बताती? कि वह अभी-अभी उसके दोस्त के बेटे का नंगा लंड देखकर आ रही है? या यह कि उसके मुंह में अभी भी रघु का स्वाद है?
रमेश ने घड़ी देखी।
"अच्छा सुनो, मैं निकल रहा हूँ। बहुत लेट हो रहा है। नाश्ता बाहर ही कर लूँगा।"
रमेश ने अपनी फाइल उठाई और कामिनी के पास से गुज़र गया।
उसने एक बार भी नहीं पूछा कि— तुम कांप क्यों रही हो? पसीने में क्यों हो? तुम्हारी आँखें लाल क्यों हैं?
रमेश चला गया।

कामिनी वहीं खड़ी रह गई—हैरान, पसीने से भीगी और कांपती हुई।

उसके दिमाग में अभी भी वही रील (Reel) चल रही थी—
बाथरूम का वो शावर... वो साफ़-सुथरा बदन... और वो गुलाबी, सुडौल लंड जो उसे सलामी दे रहा था।
उसकी चूत ने उस खूबसूरत नज़ारे को याद करके, एक बार फिर अपनी 'सहमति' की मोहर लगा दी थी।
उसकी जांघों के बीच एक ताज़ा गीलापन रिस आया था।

***********


रमेश के घर से निकलते ही कामिनी ने मुख्य दरवाज़ा बंद किया और सीधे अपने बेडरूम की तरफ भागी।
उसकी चाल में एक अजीब सी हड़बड़ाहट थी। उसकी पैंटी, जो रवि के उस 'गुलाबी नज़ारे' को देखकर गीली हुई थी, अब उसकी जांघों से चिपचिपे पदार्थ की तरह चिपक रही थी। वह गीलापन उसे किसी तेज़ाब की तरह जला रहा था।
वह बाथरूम में घुस गई।
उसने अपने कपड़े उतारने शुरू किए। साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज... उसने सब कुछ ऐसे नोच कर फेंका जैसे वे कपड़े नहीं, बल्कि कांटे हों जो उसके जिस्म को चुभ रहे हों।
जैसे ही आखिरी कपड़ा (गीली पैंटी) उतरा, कामिनी ने राहत की सांस ली।
उसने बाथरूम के बड़े आईने में अपने नंगे जिस्म को देखा।

और देखती ही रह गई।
आज उसका बदन सिर्फ़ नंगा नहीं था, वह बोल रहा था।
उसकी त्वचा पर एक अजीब सी, मादक चमक थी—जैसे किसी ने उसे तेल से नहला दिया हो।
उसके स्तन आज पहले से कहीं ज्यादा भारी और फूले हुए लग रहे थे।

उसके निप्पल, जो अक्सर मुलायम रहते थे, आज एकदम कड़क होकर बाहर निकले हुए थे। उनका रंग गहरा कत्थई हो गया था और वे ऐसे तने हुए थे जैसे किसी के स्पर्श के लिए भीख मांग रहे हों।images-2
कामिनी की नज़र नीचे फिसली।
उसकी नाभि गहरी थी, और उसके नीचे... उसकी चूत।
वह किसी फूली हुई, गरम कचौरी जैसी लग रही थी।
उसके होंठ सूज कर मोटे हो गए थे, बहार को उभर आये थे और हल्के खुले हुए थे।

वहां अब छोटे-छोटे, काले बाल उग आए थे, जो उस गुलाबी दरार को एक जंगली रूप दे रहे थे। वह नज़ारा इतना कामुक था कि कामिनी को खुद अपने ही जिस्म को देखकर नशा होने लगा।
उसका हाथ अनजाने में अपनी जांघों के बीच जाने के लिए उठा।
लेकिन वह बीच हवा में ही रुक गई।
उसे डर लगा।
'नहीं... अगर मैंने अभी खुद को छुआ... तो मैं यहीं गिर जाऊंगी। मैं दम तोड़ दूंगी।" उसकी जाँघे कांप रही थी, वो खुद अपने जिस्म की गर्मी से डर रही थी.
एक बेचैन, कामवासना मे तड़पती औरत भला कर भी क्या सकती है, खुद को छूना भी उसके लिए मुश्किल हो रहा था,

उसने तुरंत शावर का नॉब घुमाया।
छनन्नन्न...


ठंडा पानी उसके तपे हुए बदन पर गिरने लगा। ऐसा लगा हो जैसे ठंडा पानी पड़ने से उसके गर्म जिस्म से भाँप निकल रही हो.
जैसे-जैसे पानी उसके स्तनों और पेट से होकर नीचे बह रहा था, उसके जिस्म की गर्मी तो शांत होने लगी, लेकिन दिमाग का तूफ़ान तेज हो गया।745f79ab84a23b1f7e13737565ddde8a
अचानक, उसे एक ज़बरदस्त आत्मग्लानि (Guilt) महसूस हुई।
कल रात की यादें किसी डरावनी फिल्म की तरह उसके दिमाग में चलने लगीं।
स्टोर रूम का अंधेरा... रघु का पसीने से भीगा लंड... और उसका मुंह में लेना।
"वेककक..."
कामिनी को एक ज़बरदस्त उबकाई आई। उसने अपना मुंह हाथों से ढक लिया।
'छिः कामिनी... तू इतनी गिर गई? तूने एक शराबी, गंदे मजदूर का लंड चूसा?'
उसे अपने मुंह में वही कसैला स्वाद फिर से महसूस होने लगा।
'क्या मैं सच में रंडी बन गई हूँ? रमेश सही कहता था क्या?'

उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कार रही थी। वह एक इज़्ज़तदार घर की बहू थी, एक बेटे की माँ थी। उसने यह सब कैसे किया?
और सबसे बड़ी बात— उसे यह सब आया कैसे?
उसने तो आज तक रमेश का भी ठीक से नहीं चूसा था। फिर कल रात उसने रघु के लंड को इतनी महारत से, इतनी गहराई तक (Deep Throat) कैसे लिया? जैसे वह वर्षों से यही काम करती हो।

'किसने सिखाया मुझे? मेरे अंदर यह कौन सी औरत छिपी है?'

वह पानी के नीचे खड़ी रोती रही। आंसू और पानी मिलकर उसके गालों से बहते रहे। वह अपने पापों को धोने की कोशिश कर रही थी, लेकिन वह जानती थी कि यह दाग पानी से नहीं धुलेंगे।

करीब 15 मिनट बाद वह बाहर निकली।
उसने खुद को पोंछा, लेकिन रगड़-रगड़ कर नहीं, बल्कि बहुत धीमे से। उसका जिस्म अभी भी संवेदनशील (Sensitive) था।
उसने एक सूती साड़ी पहनी और गीले बालों पर तौलिया लपेट लिया।

जब वह तैयार होकर आंगन में आई, तो रवि और बंटी स्कूल जाने के लिए तैयार खड़े थे।
कामिनी की नज़रें ज़मीन पर थीं। वह रवि का सामना नहीं करना चाहती थी।
लेकिन रवि की नज़रें उसी पर थीं।
रवि के चेहरे पर एक विजयी और शरारती मुस्कान थी। वह जानता था कि कामिनी ने उसे नंगा देखा है, लेकिन कामिनी का उस से नजर ना मिलाना क्या है?
रवि मन ही मन डर भी रहा था कहीं आंटी उस पर चिल्लाये ना.
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ,

कामिनी उसे कनखियों से देख रही थी, लेकिन नज़रें मिला नहीं पा रही थी। उसका दिल 'चोर' की तरह धड़क रहा था।
"माँ..." बंटी ने अपनी माँ का ध्यान खींचा।
"आज प्लीज़ गाजर का हलवा बनाओ ना? रवि को बहुत पसंद है। इसने कल ही बोला था।"

कामिनी ठिठक गई।
गाजर का हलवा?
रवि को गाजर का हलवा बहुत पसंद है?
कामिनी ने धीरे से सिर उठाया और रवि को देखा।
रवि ने अपनी जीभ हल्का सा अपने होंठों पर फेरी, जैसे स्वाद ले रहा हो। यह इशारा हलवे के लिए था या कामिनी के लिए, यह समझना मुश्किल नहीं था।


"ठी... ठीक है... बेटा," कामिनी की आवाज़ लड़खड़ा गई, "बना दूंगी।"
उसने एक बहुत ही फीकी और कमज़ोर मुस्कान दी। वह न तो ना कह सकती थी, न ही इस माहौल से भाग सकती थी।
"चलो भाई, लेट हो रहा है," रवि ने बंटी के कंधे पर हाथ रखा और दोनों निकल गए।
दरवाज़ा बंद होते ही कामिनी ने एक गहरी, लंबी सांस छोड़ी।
"हम्म्म्म्म..."
उसने अपने सीने पर हाथ रखा। धड़कनें अब जाकर काबू में आ रही थीं।
लेकिन घर का सन्नाटा उसे खाने को दौड़ रहा था।
उसे याद आया कि बाथरूम में उसके 'पापों की गठरी' (गीले कपड़े) पड़ी है।
कामिनी ने बाल्टी उठाई। उसमें उसकी वह ब्रा, ब्लाउज और गीली पैंटी थी, जिसमें उसकी उत्तेजना की गंध बसी थी।
वह भारी कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।
छत पर कपड़े सुखाने थे।
धूप तेज़ थी, लेकिन कामिनी का मन अंधेरे में था।
(क्रमशः)
बहुत ही सुंदर लेखन...



कामिनी तो लाटरी लग रहीं हैं....देखो किसके भाग्य में सबसे पहले आती हैं.....
 
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मेरी माँ कामिनी, भाग -14



छत से कपड़े सुखाकर कामिनी नीचे आई।
घर में सन्नाटा था, लेकिन उसके दिमाग में शोर था।
रवि की फरमाइश—गाजर का हलवा—पूरी करनी थी। लेकिन घर में गाजर नहीं थी।
अब समस्या यह थी कि गाजर लाए कौन?
रवि और बंटी स्कूल जा चुके थे। रमेश ऑफिस में था।
बचा सिर्फ़ एक ही शख्स—रघु।
कामिनी की नज़र स्टोर रूम की तरफ गई।

उसका दिल ज़ोर से धड़का। कल रात की उस जंगली घटना के बाद, रघु का सामना करने की उसकी रत्ती भर भी हिम्मत नहीं थी।

'कैसे जाऊं उसके सामने? क्या सोच रहा होगा वो मेरे बारे में? कहीं उसे मेरा वहाँ होने का अहसास तो नहीं हो गया होगा?"
"नहीं... नहीं.... रघु तो नशे में धुत्त था। उसने उसे 'सुगना' बोला था। शायद उसे कुछ याद न हो। शायद उसे सपना लगा होगा"
कामिनी खुद को बचाने की दलील खुद को ही दे रही थी, वो किसी मझे हुए वकील की तरह, खुद का केस लड़ रही थी अपने अंतर्मन मे.
दुविधा मे फसा इंसान दलिले अच्छी देता है.

इस उम्मीद के सहारे कामिनी ने मुट्ठी भींची और स्टोर रूम की तरफ कदम बढ़ा दिए,
स्टोर रूम का दरवाज़ा खुला था।
अंदर रघु काम में लगा हुआ था। वह पुराने बक्से हटा रहा था।
उसका बदन पसीने से भीगा हुआ था। वही सांवला, गठीला शरीर, वही पसीने की गंध... कामिनी के नथुनों में कल रात की याद ताज़ा हो गई।
कामिनी की आहट सुनकर रघु मुड़ा।
सामने अपनी 'मेमसाब' को देखकर उसने तुरंत काम छोड़ा और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
"नमस्ते मेमसाब..."

उसकी आवाज़ में वही पुराना सम्मान और डर था। उसकी आँखों में कोई शरारत या 'मालिक' वाला भाव नहीं था। वह अभी भी भ्रम में था कि कल रात जो हुआ, वह हकीकत थी या शराब का नशा।

रघु का यह रवैया देखकर कामिनी की जान में जान आई।
'शुक्र है... इसे कुछ याद नहीं है। यह सपना ही समझ रहा है,' कामिनी ने राहत की सांस ली।

"वो... वो रघु..." कामिनी ने नज़रें चुराते हुए कहा, "बाज़ार से कुछ सामान लाना था। गाजर लानी थी।"

रघु ने सिर हिलाया। "जी मेमसाब, ले आऊंगा। पैसे दे दीजिये।"
कामिनी ने पल्लू में बंधे नोट निकाले और रघु की तरफ बढ़ाए। हाथ बढ़ाते वक़्त उसकी उंगलियां कांप रही थीं, डर था कि कहीं रघु का हाथ छू न जाए।
औरत भी कमाल होती है, रात मे जिस आदमी का लंड चूसा था, उजाले मे उसी शख्श का हाथ तक ना छू जाये इसकी परवाह थी.

रघु ने पैसे लिए और पूछा, "कितनी लाऊं मेमसाब?"
"दो किलो ले आना... हलवा बनाना है," कामिनी ने कहा।
रघु ने गमछे से अपना पसीना पोंछा और एक व्यावहारिक सलाह दी, जो कामिनी के लिए किसी बम से कम नहीं थी।

"मेमसाब... गाजर एकदम मोटी और लम्बी वाली ही लाऊंगा। पतली वाली में वो बात नहीं होती।"
उसने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा,
"जितनी मोटी और लम्बी गाजर होती है... हलवे में उतना ही मज़ा आता है। अच्छे से घिस जाता है,"

रघु तो सिर्फ़ सब्जी की बात कर रहा था, लेकिन कामिनी का दिमाग कल रात के दृश्य पर चला गया।
मोटी... लम्बी... और मज़ेदार?
उसकी आँखों के सामने रघु का वह विशाल, काला लंड आ गया जो उसने कल रात अपने मुंह में भरा था।
उसकी सरसरी नजर ना जाने क्यों रघु के कमर के निचले हिस्से लार फिसल गई,
वहाँ अभी भी मोटा सा कुछ लटका हुआ था।

कामिनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसके कान गर्म हो गए।
रघु की यह सीधी-सादी बात उसे अश्लील लग रही थी।
"ह... हाँ... देख लेना, अच्छी लाना," कामिनी हड़बड़ा कर बोली।
रघु ने एक और बात जोड़ दी।
"गाजर का हलवा तो मुझे भी बहुत पसंद है मेमसाब... गांव में खूब खाता था। गरम-गरम हलवा, ऊपर से मलाई डाल कर....उफ्फ्फ, क्या स्वाद होता है।"

कामिनी की हालत खराब हो गई।
'गरम हलवा... मलाई...'
उसे याद आया कि कल रात उसने रघु की 'मलाई' (वीर्य) का स्वाद चखा था।
उसे फिर से हल्की सी उबकाई महसूस हुई, लेकिन साथ ही पेट के निचले हिस्से में एक मीठी सी टीस भी उठी।

"ठीक है... जाओ अब जल्दी," कामिनी ने उसे वहां से भगाना ही बेहतर समझा।
रघु सिर झुकाकर वहां से निकल गया।

रघु के हाथ मे पुरे 200 rs थे,
रघु बाज़ार की तरफ पैदल चल दिया,
रास्ते भर वह सोचता रहा।
'कल रात... वो सपना कितना सच लग रहा था। सुगना आई थी... उसने... उसने मेरा चूसा था। आह्ह्ह...'
रघु ने अपनी जांघों के बीच हाथ फेरा। वहां अभी भी हल्का दर्द था जो ज्यादा मुठ मारने या चूसने के बाद होता है।
वह कन्फ्यूज था।
तभी रास्ते मे उसे एक दुकान दिखी, उसकी फेवरेट दुकान...
"देसी शराब का ठेका "

उसने मुट्ठी मे बंद 200के नोट को देखा, फिर ठेके के अंदर कांच की सीसी मे बंद उसकी महबूबा को देखा.
"नहीं... नहीं... पहले गाजर ले लेता हूँ " रघु ने मन मे आते विचारों को एक पल मे झटक दिया.
उसने दो कदम बढ़ाये ही थे की...

"मेमसाब ने पैसे तो ज्यादा दिए हैं... एक 'पव्वा' तो आ ही जाएगा," रघु ने सोचा।
"बस एक ढक्कन मारूँगा... थकान मिटाने के लिए।" " रघु पलटा और मयखाने मे जा बैठा.
शराबी आदमी शराब से कभी जीत ही नहीं सकता, इतिहास गवाह है, बड़े बड़े राजा महराजा सब हार बैठे इस शराब के आगे, रघु क्या चीज हुआ भला.

****************

दोपहर के 2 बज गए थे।
कामिनी बार-बार घड़ी देख रही थी और स्टोर रूम की तरफ झांक रही थी।
रघु का कोई अता-पता नहीं था।
"नालायक कहीं का... पैसे लेकर भाग गया शायद। दारू पीने बैठ गया होगा," कामिनी ने गुस्से में बड़बड़ाया।

छोटे लोगो का यही है, पैसे मिले नहीं की सब काम भूल जाते है " कामिनी गुस्से मे भुंभुना रही थी.

तभी गेट खुलने की आवाज़ आई।
रवि और बंटी स्कूल से वापस आ गए थे।
"मम्मी, भूख लगी है," बंटी ने बैग सोफे पर पटकते हुए कहा।
लेकिन कामिनी की नज़र रवि पर थी।
रवि के हाथ में एक थैला था, जिसमें से ताज़ी, लाल गाजरें झांक रही थीं।
"आंटी..." रवि ने अपनी मनमोहक मुस्कान के साथ कहा, "आते वक़्त दिखा तो ले आया। मुझे याद था कि आज हलवा बनना है।"

कामिनी का गुस्सा पिघल गया।
जहाँ रघु, एक शराबी को उसने काम बोला था, वो नदारद था, वहीं रवि बिना कहे उसकी ज़रूरत पूरी कर रहा था।

"थैंक यू बेटा..." कामिनी ने थैला लिया।
******************

किचन का दृश्य (शाम 4 बजे):
उसी वक़्त रमेश का फोन आया।
"हेलो कामिनी... मैं आज रात घर नहीं आ पाऊंगा।"
"क्यों? क्या हुआ?" कामिनी ने पूछा।

"कुछ अर्जेंट काम है, साइट पर जाना पड़ रहा है... किशनगढ़," रमेश ने जल्दी में कहा और फोन काट दिया।
कामिनी ने फोन रखा और गाजर धोने लगी।
रवि किचन में आ गया। उसने कपड़े बदल लिए थे—एक स्लीवलेस टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने थे। उसका चिकना, गोरा बदन चमक रहा था।

"लाओ आंटी, मैं घिसवा देता हूँ," रवि ने कद्दूकस (Grater) उठा लिया।
वह गाजर घिसने लगा।


घिस... घिस... घिस...
"आंटी, गाजरें काफी अच्छी मिली हैं ना?" रवि ने गाजर को कसकर पकड़ते हुए कहा, "एकदम लंबी और मोटी। ऐसी गाजर घिसने में बड़ा मज़ा आता है, हाथ में ग्रिप (Grip) अच्छी बनती है।"
रवि की बात सीधी थी, लेकिन कामिनी की नज़रों में 'चोर' था।
'मोटी और लम्बी' सुनकर उसे सुबह रघु की बात और रवि का 'गुलाबी लंड' याद आ गया।
वह रवि से नज़रें नहीं मिला पा रही थी। उसका चेहरा लाल हो गया।

"ह... हाँ... अच्छी हैं," वह बस इतना ही बोल पाई।
"और सुबह के लिए sorry आंटी, मुझे दरवाजा अच्छे से बंद करना चाहिए था " रवि ने जैसे कामिनी को कर्रेंट छुवा दिया हो.
"कककम.... कोई बात नहीं,"
उसके चेहरे पे लाल मुस्कान तैर गई. हाथो मे मोटा गाजर लिए घिसे जा रही थी,

हॉल में बैठा बंटी टीवी देख रहा था, लेकिन उसके कान खड़े थे।
जब कामिनी ने बताया कि— "पापा आज नहीं आएंगे, किशनगढ़ गए हैं"—तो बंटी का माथा ठनका।
'किशनगढ़?'
उसने यह नाम पहले भी सुना था। रघु के मुँह से, जब वो पहले दिन घर आया था, तब माँ से बातचीत मे उसने इस कस्बे का जिक्र किया था, और बचपन मे दादा जी के मुँह से भी ये नाम सुना था.

'पापा और रघु का कनेक्शन? रघु भी वहीं का है क्या?'
बंटी चुप रहा, लेकिन उसके दिमाग में शक का कीड़ा रेंगने लगा.

शाम के 6 बजते-बजते मौसम बदल गया।
काले बादल घिर आए और ठंडी हवा चलने लगी। बारिश की बूंदें टप-टप गिरने लगीं।
"अरे! कपड़े भीग जाएंगे," कामिनी हड़बड़ाई। उसे याद आया कि उसकी धुली हुई साड़ी, ब्रा और पैंटी छत पर है।
वह जाने ही वाली थी कि रवि ने उसे रोक दिया।
"आप रहने दो आंटी... आप हलवा देखो, मैं ले आता हूँ," रवि ने कहा और बिजली की रफ़्तार से सीढ़ियाँ चढ़ गया।
कामिनी उसे मना भी नहीं कर पाई।
उसका दिल धक-धक करने लगा। 'हे भगवान... मेरी पैंटी...'
दो मिनट बाद रवि नीचे आया।
वह थोड़ा भीग गया था। उसके हाथ में कपड़ों का एक ढेर था।
उसने सोफे पर साड़ी और ब्लाउज रखा।
लेकिन उसके हाथ में अभी भी दो छोटे कपड़े थे—कामिनी की सफ़ेद ब्रा और वह फिजी (Skin) कलर की पैंटी।
कामिनी का चेहरा शर्म से टमाटर हो गया।
रवि धीरे से कामिनी के पास आया।
उसने बिना किसी हिचकिचाहट के, बड़े आराम से वह पैंटी और ब्रा कामिनी की तरफ बढ़ाई।
कामिनी का हाथ कांप रहा था। उसने झपट्टा मारकर कपड़े लिए और अपनी साड़ी के पल्लू में छुपाने लगी।
वह घबरा रही थी, शर्म से गड़ी जा रही थी।
रवि ने उसकी घबराहट भांप ली।
उसने कामिनी की आँखों में झांकते हुए बहुत ही सामान्य लहजे में कहा—
"अरे, इसमें शर्माने वाली क्या बात है आंटी? अंडरगारमेंट्स ही तो हैं, सब पहनते हैं।"
उसकी आवाज़ में एक अपनापन था, एक तसल्ली थी कि 'यह कोई बड़ी बात नहीं है'।
रवि की इस बात ने कामिनी को थोड़ा सहज कर दिया।

उसे लगा कि यह लड़का कितना मैच्योर (Mature) है।
कामिनी के अंदर की 'शरारती औरत' जाग उठी। उसे सुबह का नज़ारा याद आ गया—रवि का नंगा बदन और वहां बालों का नामो-निशान न होना।
उसने अपनी शर्म को एक किनारे फेंका और रवि की आँखों में देखते हुए, एक हल्की सी मुस्कान के साथ ताना मारा—
"हाँ, सब पहनते हैं... पर तुम भी पहन लिया करो कभी-कभी। दरवाज़ा बंद करना भूल जाते हो।"
यह बोलकर कामिनी वहां रुकी नहीं, वह मुस्कुराती हुई अपने कमरे की तरफ भाग गई।

पीछे रवि खड़ा रह गया—हैरान और खुश।
उसे सिग्नल मिल गया था।
'आंटी ने सुबह सब कुछ देखा था... और उन्हें बुरा नहीं लगा।'
बाहर बारिश तेज़ हो गई थी, और घर के अंदर रोमांस की खिचड़ी पकने लगी थी।
*****************

रात के 8 बज रहे थे।
बाहर आसमान फट पड़ा था, मूसलाधार बारिश हो रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट घर की खामोशी को चीर रही थी।
किचन में खाना तैयार था, गाजर के हलवे की मीठी महक हवा में थी।
सामने tv चल रहा था,
लेकिन कामिनी का मन बेचैन था। वह डाइनिंग टेबल पर गुमसुम बैठी थी। उसकी नज़रें बार-बार बंद दरवाजे पर जा रही थीं।
'रघु कहाँ रह गया? इतनी तेज़ बारिश है... पैसे लेकर कहीं शराब पीने तो नहीं बैठ गया? या कोई हादसा तो नहीं हो गया?'
एक अजीब सी चिंता उसे खाए जा रही थी। आखिर रघु ही वो शख्श था, जिसने उसके जिस्म मे सालों बाद ये बेचैनी पैदा की थी,

कामिनी को इस तरह खोया हुआ देख, रवि ने चुप्पी तोड़ी।
"चल ना बंटी... बारिश में नहा के आते हैं, देख कितनी मस्त बारिश हो रही है," रवि ने खिड़की की तरफ इशारा करते हुए कहा।

बंटी कम्बल ओढे सोफे पर दुबका हुआ था। उसने मुंह बनाया।
"नहीं यार... बहुत ठंडा पानी है, मैं बीमार पड़ जाऊंगा। तू जा, मुझे नहीं नहाना।" बंटी ने साफ़ मना कर दिया।

रवि ने हार नहीं मानी। वह कामिनी की तरफ घूमा। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी।
"आंटी... आप चलो ना। बहुत मज़ा आएगा।"
रवि के इस अचानक ऑफर से कामिनी सकपका गई। वह ख्यालों की दुनिया से धरातल पर लौटी।

"क... ककक... कौन मैं?" कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए कहा, "पागल हो गए हो क्या? मैं इस उम्र में बारिश में नहाउंगी?"

"तो और कौन आंटी?" रवि ने ज़िद्द की, "बारिश रोज़ थोड़ी न होती है। और उम्र का क्या है? कभी-कभी अपनी जवानी को जी लेना चाहिए। कब तक घर की चारदीवारी में कैद रहोगी?"

रवि एक ही सांस में बोल गया, लेकिन उसकी बातें कामिनी के दिल पर किसी हथौड़े की तरह लगीं।
यह एक आघात था।

'क्या मैं वाकई जीना भूल गई हूँ? मैंने आखिरी बार कब खुद के लिए कुछ किया था? कब बारिश की बूंदों को अपने चेहरे पर महसूस किया था?'

उसे याद आया, शादी से पहले अपने गांव में वह सावन की बारिश में सहेलियों के साथ घंटों नहाती थी। लेकिन इस घर में आकर, रमेश की मार और रसोड़े के धुएं ने उसकी सारी हसरतें कुचल दी थीं।
तभी बंटी ने भी रवि का साथ दिया।

"जाओ ना मम्मी... जी लो अपनी ज़िंदगी। वैसे भी आज पापा नहीं हैं घर पर, कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है।"
बंटी ने अनजाने में ही कामिनी को सबसे बड़ी आज़ादी दे दी थी। वो अपनी माँ का दुख समझता था, बरसो से चारदीवारी मे कैद थी उसकी माँ.

बंटी का उत्साह देखकर कामिनी की झिझक टूट गई। उसके चेहरे पर एक दबी हुई मुस्कान आ गई।
"ठीक है..."
रवि तो जैसे पागल हो गया।
वह बहुत उत्साही लड़का था। उसने आव देखा न ताव, कामिनी का हाथ पकड़ लिया।

"चलो आंटी... देर मत करो..."
रवि लगभग कामिनी को घसीटता हुआ सीढ़ियों की तरफ ले गया।
कामिनी मुंह से "ना-ना" कर रही थी, लेकिन उसके पैर किसी जवान हिरणी की तरह थिरक रहे थे। वह रवि के पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ गई। आज उसका यौवन लौट आया था।

छत पर पहुंचते ही ठंडे पानी की बौछार ने उनका स्वागत किया।
कामिनी एक पल के लिए ठिठकी, लेकिन रवि उसे खींचकर बीच छत पर ले गया।
छप-छप-छप... आउच.... कामिनी के जिस्म पर ठन्डे पानी की बौछार जैसे ही पड़ी, उसकी शर्म भी उतर गई.
"रवि पानी बहुत ठंडा है "

पानी ने कामिनी को ऊपर से नीचे तक भिगो दिया।
और फिर... एक चमत्कार हुआ।
कामिनी ने अपनी सारी शर्म, सारा दुख, सारी मर्यादा बारिश के पानी में बहा दी। वह गोल-गोल घूमने लगी। उसने अपने दोनों हाथ आकाश की तरफ फैला दिए और बारिश की बूंदों को अपने मुंह पर गिरने दिया।
वह किसी जवान मोरनी की तरह नाचने लगी।

रवि, जो उसके जीवन में किसी फ़रिश्ते की तरह आया था, एक कोने में खड़ा होकर बस उसे निहार रहा था।
कामिनी आज भूल गई थी कि वह 38 साल की एक माँ है। उसे लगा वह फिर से 18 साल की अल्हड़ लड़की बन गई है।

लेकिन रवि की नज़रें सिर्फ़ उसकी खुशी पर नहीं थीं... उसकी नज़रें कामिनी के भीगे हुए, कामुक जिस्म पर जम गई थीं।
बारिश के पानी ने कामिनी की सूती साड़ी को शरीर से बुरी तरह चिपका दिया था। वह कपड़ा अब खाल की तरह उसके बदन पर मढ़ा हुआ था।
ठंडे पानी के स्पर्श से कामिनी के भारी स्तन तन गए थे।
उसका ब्लाउज भीगकर पारदर्शी हो गया था, और उसके अंदर कैद उसके निप्पल एकदम कड़क होकर, ब्लाउज के कपड़े को चीरते हुए बाहर उभर आए थे। वे दो नुकीले पत्थरों की तरह रवि को चुनौती दे रहे थे।

कामिनी जब घूम रही थी, तो उसकी भारी छाती लय में ऊपर-नीचे हो रही थी।
पानी की धार उसकी साड़ी को भारी कर रही थी। साड़ी का कपड़ा उसकी जांघों के बीच फंस गया था।
इससे उसकी टांगों के बीच का वह गुप्त 'वी' (V) आकार—उसकी चूत का तिकोना उभार—साफ़ झलक रहा था। पानी की बूंदें उस उभार से फिसलकर नीचे गिर रही थीं।

पीछे से, उसकी चौड़ी और भारी गांड का आकार पूरी तरह से नुमाया हो रहा था। साड़ी उसके नितम्बों की दरार में धंस गई थी, जिससे उसके जिस्म के हर भूगोल का नक्शा रवि के सामने खुला था।


रवि किसी प्रेमी की तरह बस उस उछलती-खेलती कामिनी को देखे जा रहा था।
उसकी आँखों में हवस थी, लेकिन एक पूजा का भाव भी था।
कामिनी ने अकेले झूमता हुआ महसूस किया, वो अकेले ही उछले जा रही है, उसने सामने देखा रवि एकटक उसे ही देखे जा रहा था.

उसने रवि की टकटकी को महसूस कर लिया।
आम तौर पर वह अपना पल्लू ठीक करती या शर्मा जाती।
लेकिन आज?
आज उसे अच्छा लग रहा था।
उसे अच्छा लग रहा था कि एक 20 साल का जवान, खूबसूरत लड़का उसे ऐसे देख रहा है जैसे वह दुनिया की सबसे सुंदर औरत हो।
"क्या हुआ आओ ना, देख क्या रहे हो?"
उसने जानबूझकर अपनी कमर को और लचकाया, अपनी छाती को थोड़ा और आगे किया ताकि बारिश की बूंदें उसके कड़क निप्पलों पर गिरें।

इस बारिश में कामिनी सिर्फ़ भीग नहीं रही थी... वह जल रही थी।
उसका जिस्म चीख-चीख कर कह रहा था कि वह ज़िंदा है, एक औरत है, कामुक औरत जिसका जिस्म प्यासा है, उसकी भी कुछ इच्छा है, उसका भी एक जीवन है, जो पति की मार से परे है, इसे भी हक़ है ये जीवन जीने का.
उसकी आँखों मे खुशी के आंसू थे, और उसकी आँखों मे धुंधला सा दिखता रवि का जवान जिस्म.
जो उसे ही देख रहा था....
Contd....
रघु तो khade लंड की तरह धोखा दे गया 200 रुपये मिलते ही... bahanchod यहां तिजोरी लूटने को तैयार हैं और वो pawwe में खुश हैं....


रवि लगा हुआ है तिजोरी की रक्षा में... उसे लूटने के लिए 😍😍😍😍😍😍
 

Luckyloda

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मेरी माँ कामिनी -15


छत पर मूसलाधार बारिश हो रही थी।
कामिनी किसी मन्त्रमुग्ध मोरनी की तरह गोल-गोल घूम रही थी। उसका पल्लू गिर चुका था, बाल चेहरे पर चिपके थे, और वह अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। उसे याद ही नहीं रहा कि वह कहाँ है और किसके साथ है। वह बस अपनी आज़ादी को पी रही थी।

रवि, जो अब तक एक कोने में खड़ा था, कामिनी के इस कामुक और मादक रूप को देखकर खुद को रोक नहीं सका।
उसकी बर्दाश्त की हद पार हो गई।
वह धीरे-धीरे कदमों से कामिनी की तरफ बढ़ा।
कामिनी की आँखें बंद थीं, चेहरे पर बारिश की बूंदें गिर रही थीं

रवि उसके बिल्कुल करीब आ गया। उसकी गर्म सांसें कामिनी के भीगे गालों को छूने लगीं।
"आंटी..." रवि की भारी और नशीली आवाज़ ने कामिनी का ध्यान खींचा।
कामिनी ने धीरे से आँखें खोलीं। सामने रवि खड़ा था, बारिश में भीगा हुआ, उसकी टी-शर्ट उसके सीने से चिपकी हुई थी।
"आप कितनी सुंदर हैं..." रवि ने कामिनी की आँखों में गहराई से झांकते हुए कहा, "ऐसा लग रहा है जैसे कामदेव की पत्नी, रति खुद धरती पर उतर कर नाच रही हो।"
इस तारीफ ने कामिनी पर जादू कर दिया। उसका जिस्म स्थिर हो गया, कब उसने अपनी सुंदरता की तारीफ सुनी थी?

'काम की देवी रति...' एक जवान लड़का उसकी तुलना रति से कर रहा रहा.
आज तक उसे किसी ने इतनी खूबसूरती से नहीं सराहा था।

रमेश ने उसे 'रंडी' और 'गंवार' कहा था, लेकिन रवि ने उसे 'देवी' बना दिया।

कामिनी रवि की गहरी आवाज़ और नज़रों से इतनी मदहोश हो गई कि उसके पैर लड़खड़ा गए। गीले फर्श पर उसका संतुलन बिगड़ा और वह गिरने को हुई।
"आह्ह..."
लेकिन गिरने से पहले ही रवि के मजबूत, गठीले हाथों ने उसे थाम लिया।
रवि ने एक हाथ उसकी कमर पर और दूसरा उसकी पीठ पर रखकर उसे अपनी तरफ खींच लिया।

धप्प...
कामिनी का भारी, भीगा और नरम जिस्म रवि के सख्त, मर्दाना सीने से टकरा गया। कामिनी हैरान थी रवि ने उसे कितनी आसानी से थाम लिया.


दो भीगे बदन एक-दूसरे से चिपक गए।
कामिनी की छाती रवि की छाती पर दब गई, उसके कड़क निप्पल रवि की छाती में चुभने लगे।
कामिनी रवि की बांहों में कैद थी। उनकी नज़रें मिलीं।
बारिश का शोर था, लेकिन दोनों के बीच एक चुप्पी थी जो चीख रही थी।
रवि ने धीरे से अपना चेहरा झुकाया।
कामिनी चाहती तो उसे धक्का दे सकती थी, लेकिन उसने अपनी आँखें मूंद लीं और अपना चेहरा ऊपर उठा दिया। यह एक मूक सहमति थी। कामिनी के संस्कार, उसका माँ होने का भाव, उसकी उम्र, उसकी शर्म, लाज सब बारिश के ठन्डे पानी मे बह गए थे.
जवान मर्द की पकड़ ने उसे जवान कर दिया था, जांघो की बीच योनि खुल के बंद हो जा रही थी.

और फिर...
न जाने किस आवेश में, रवि ने अपने होंठ कामिनी के गुलाबी, भीगे होंठों पर रख दिए।
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रवि के होंठ जैसे ही कामिनी के होठों से टकराए, कामिनी का बचा-खुचा संयम भी बारिश के पानी में बह गया।


वह रवि को रोक नहीं सकी। रोकना चाहती भी नहीं थी।
उसका जिस्म, जो बरसों से प्यार और स्पर्श के लिए तरस रहा था, आज रवि की गर्मी पाकर सुलग उठा।
कामिनी के होंठ रवि के लिए किसी प्यासे फूल की तरह खुल गए।
रवि ने मौका नहीं गंवाया। उसने अपनी गर्म जीभ कामिनी के मुंह के अंदर डाल दी।
जवाब में कामिनी ने भी अपनी जीभ आगे बढ़ा दी।
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दो जीभें एक-दूसरे से लिपट गईं, लड़ने लगीं और एक-दूसरे का रस पीने लगीं।
कामिनी, जो आज तक सिर्फ़ एक 'भोग की वस्तु' बनी थी, आज पहली बार "प्रेमिका" बन गई थी। वह आगे होकर रवि की जीभ को चूस रही थी।
उसने ऐसा कभी नहीं किया था, उसे आता हूँ नहीं था, इसे kiss कहते है ये भी नहीं पता था.
वो मुँह खोले अपने बेटे के दोस्त की जीभ चूस रही थी, प्यासी कुतिया की तरह उसके होंठो को चाट रही थी.

चुप्प... सुड़प...लप... लप....
बारिश के शोर के बीच उनके चूसने की गीली आवाज़ें गूंजने लगीं।
रवि ने कामिनी को अपनी बाहों में कसकर भींच लिया।
उसका लंड पूरी ताकत से खड़ा हो चुका था और कामिनी के पेट और नाभि के निचले हिस्से (Pelvis) पर दबाव बना रहा था।
गीली साड़ी की वजह से कामिनी को वह सख्त, लोहे जैसा दबाव साफ़ महसूस हो रहा था।
यह अहसास उसे पागल कर रहा था।
वह पीछे हटने के बजाय, अपनी कमर को आगे धकेलने लगी।
वह अपनी चूत को उस खड़े लंड पर रगड़ना चाहती थी, उस गर्माहट को अपनी गहराइयों में महसूस करना चाहती थी।
दोनों एक-दूसरे में इस कदर खो गए थे कि उन्हें दुनिया की कोई सुध नहीं थी।
कामिनी अपना अस्तित्व भुला चुकी थी.
***************
तभी नीचे से बंटी आया।
उसने नीचे से आवाज़ दी थी— "मम्मी, रवि... हलवा...ठंडा हो रहा है, आ जाओ "
लेकिन जब कोई जवाब नहीं आया, तो वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया।
जैसे ही वह छत की दहलीज पर पहुंचा, उसके कदम ज़मीन पर जम गए।
उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
सामने बारिश में जो नज़ारा था, वह किसी भी बेटे के होश उड़ाने के लिए काफी था।
उसका दोस्त रवि और उसकी माँ कामिनी... आपस में गूंथम-गूंथा थे।

रवि ने कामिनी को दबोच रखा था और पागलों की तरह उसका मुंह खा रहा था।
और उसकी माँ?
वह विरोध नहीं कर रही थी।
बंटी ने देखा कि कामिनी की कमर रवि के लंड को महसूस करने के लिए आगे-पीछे (Grinding) हो रही है। वह अपनी गांड को हिला-हिलाकर रवि के लंड पर रगड़ रही थी।

रवि के दोनों हाथ कामिनी के भीगे हुए, भारी स्तनों को कस-कस कर भींच रहे थे। कभी वह स्तनों को मसलता, तो कभी उसका हाथ फिसलकर कामिनी की भारी गांड पर चला जाता और उसे आटे की लोई की तरह गूंथ देता।

यह दृश्य देखकर बंटी को गुस्सा आना चाहिए था, लेकिन उसकी उम्र और माहौल ने उसे धोखा दे दिया।
अपनी माँ का यह कामुक, जंगली रूप देखकर बंटी का अपना लंड भी पैंट के अंदर फनफनाने लगा।
वह वहीं खड़ा होकर, अपनी माँ को अपने दोस्त के साथ 'रासलीला' करते हुए देखने लगा।


इधर कामिनी और रवि को बंटी की मौजूदगी का कोई इल्म नहीं था। वे दूसरे लोक में थे।
करीब 10 मिनट तक यह खेल चलता रहा।
दोनों के भीगे जिस्म एक-दूसरे पर रगड़ खा रहे थे। घर्षण से आग पैदा हो रही थी। वैज्ञानिक नियम है.
लेकिन विज्ञानं ये नहीं बताता की दो जिस्म भी जब रगड़ते है तो गर्मी, आग पैदा होती है, लेकिन ये आग कैसी होती है इसकी परिभाषा किसी किताब मे नहीं लिखी किसी ने.
मै भी नहीं लिख सकता, ये सिर्फ महसूस किया जा सकता है.


कामिनी की चूत पूरी तरह से बह निकली थी।
उसकी योनि का चिपचिपा पानी (Lubrication) रिसकर उसकी जांघों पर आ गया था और बारिश के पानी के साथ बर्बाद हुआ जा रहा था,

कामिनी ने ऐसा Kiss अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं किया था।
"ईईस्स्स्स.... आअह्ह्ह..... उउउफ्फ्फ्फ़...."
कामिनी के गले से रवि के मुंह में सिसकियाँ निकल रही थीं। वह मचल रही थी।

रमेश के साथ उसे जबरजस्ती, बलात्कार जैसा ही महसूस हुआ था, लेकिन रवि के साथ वह 'प्यार की अनुभूति' कर रही थी।

यह गर्म चुम्बन उसे खींचकर वापस उसकी जवानी में ले आया था। उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा था।
उसे पहली बार पता चला कि प्यार और हवस के बीच एक "जुनून" भी होता है, जिसे आज एक 20 साल का लड़का उसे सीखा रहा था।
बदकिश्मती की ये अहसास बहुत देर तक सम्भव ना हो सका....
हवा का एक तेज़ झोंका आया।
छत का लोहे का दरवाज़ा, जो खुला था, हवा के दबाव से ज़ोर से दीवार से टकराया।
धड़ाम!!! भड़ाम्म्म्म......

वह आवाज़ किसी बम धमाके जैसी थी।
इस तेज़ आवाज़ ने कामिनी और रवि की तंद्रा तोड़ दी।
कामिनी को जैसे 440 वोल्ट का झटका लगा। वह होश में आई।
उसने झटके से रवि को धक्का दिया।
उसने चारों तरफ देखा।

सीढ़ियों का दरवाज़ा अब बंद हो चुका था (हवा से)।
बंटी, जो दरवाज़े के पास खड़ा था, आवाज़ होते ही और कामिनी के होश में आने से पहले ही वहां से खिसक लिया था। वह नीचे भाग गया था ताकि पकड़ा न जाए।

कामिनी का दिल मुंह को आ गया।
वह हांफ रही थी। उसका सीना ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके होंठ सूजे हुए थे और ब्लाउज अस्त-व्यस्त था। निप्पल भीगे ब्लाउज से साफ झलक रहे थे, बहार आने को बेताब थे.
या यूँ कहिये वो सम्पूर्ण नंगी ही खड़ी थी रवि के सामने.

उसे अहसास हुआ कि उसने क्या कर दिया।
उसने अपने बेटे के दोस्त के साथ, खुले आसमान के नीचे, अपनी सारी हदें पार कर दी थीं।
उसका जिस्म कांप गया, उत्तेजना हवास मे वो क्या कर गई.

शर्म, डर और उत्तेजना का एक मिश्रित भाव उसके चेहरे पर आ गया।
उसने रवि की तरफ एक बार भी नहीं देखा।
उसमें नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं थी।
वह अपना पल्लू समेटती हुई, नंगे पांव भागती हुई सीढ़ियों की तरफ लपकी और सीधे नीचे अपने कमरे में जा घुसी।

पीछे छत पर...
रवि अकेला खड़ा था।
बारिश अभी भी हो रही थी।
वह भीग रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक शैतानी और संतुष्ट मुस्कान थी।
उसने अपनी जीभ अपने होठों पर फेरी, जहाँ कामिनी की लार और लिपस्टिक का स्वाद अभी भी बाकी था।
********************


कामिनी अपने कमरे में बदहवास सी खड़ी थी।
उसकी सांसें फूली हुई थीं। उसकी चूत किसी खुले हुए नल की तरह बह रही थी। योनि के अंदर एक भयानक जलन और मीठा दर्द था, जैसे वहां कोई ज्वालामुखी फटने को तैयार हो।
उसने जैसे-तैसे खुद को संभाला। बाथरूम में जाकर उसने अपने भीगे कपड़े उतारे।
आज उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि आईने में अपने नंगे जिस्म और चेहरे को देख सके। उसे अपनी आँखों में वह 'हवस' साफ़ दिखाई दे रही थी।
उसने बदन पोंछा और कपड़े बदलने लगी।
उसने एक ढीला-ढाला सूती गाउन (Night Gown) पहन लिया।
लेकिन उसकी चूत इतनी गीली और संवेदनशील थी कि वह पैंटी का कपड़ा बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।
उसने फैसला किया— अंदर कुछ नहीं पहनेगी।
गाउन के नीचे वह पूरी तरह नंगी थी। आज़ाद।

बाहर से बंटी की आवाज़ आई— "जल्दी करो ना माँ... भूख लगी है।"
कामिनी ने गाउन ठीक किया और बालों पर तौलिया लपेटा। वह बाहर जाने के लिए मुड़ी, लेकिन उसके कदम भारी थे।
'कैसे सामना करूँगी रवि का? अभी छत पर जो हुआ... उसके बाद तो मुझे ज़मीन में गड़ जाना चाहिए।'
लेकिन पेट की भूख और बेटे की पुकार ने उसे बाहर खींच लिया।

वह डाइनिंग टेबल पर पहुंची।
रवि पहले से वहां बैठा था। वो भी कपडे बदल कार वहाँ आ बैठा था, उसका गठिला जिस्म कामिनी को आकर्षित कर रहा था,

उसने कामिनी को देखा, उसकी आँखों में वही तारीफ थी, वही चमक थी जो थोड़ी देर पहले छत पर थी.

"आओ ना आंटी..." रवि ने कुर्सी खींचते हुए कहा।
कामिनी नज़रें झुकाए, चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई।
उसके कंधे झुके हुए थे, जैसे कोई अपराधी कटघरे में बैठा हो।

"कैसा लगा माँ?" बंटी ने हलवे का चम्मच उठाते हुए पूछा। उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।

"कक्क.. कक... क्या कैसा?" कामिनी हड़बड़ा गई।
"अरे छत पर... बारिश में भीगना," बंटी ने बड़ी संजीदगी से कहा, "मैं देखता हूँ आप हमेशा परेशान रहती हो, घर के कामों में उलझी रहती हो। कभी-कभी खुद के लिए भी जीना चाहिए माँ।"
बंटी किसी परिपक्व (Mature) मर्द की तरह बात कर रहा था।

कामिनी हैरान थी। उसका बेटा उसे 'जीने' की सलाह दे रहा था? क्या उसे कुछ पता है? या वह बस अपनी माँ की खुशी चाहता है?

बंटी की इन बातों ने कामिनी के मन का बोझ थोड़ा हल्का कर दिया।
तभी... टेबल के नीचे हलचल हुई।
"तुझे पता है बंटी... आंटी तो खूब अच्छा नाचती हैं," रवि ने शरारती लहजे में कहा।
और उसी वक़्त, टेबल के नीचे रवि का नंगा पैर कामिनी के पैर पर चढ़ गया और उसकी पिंडलियों को सहलाने लगा।
कामिनी को करंट लगा।
"कक्क.... कककया... क्या तुम दोनों भी मुझे छेड़ रहे हो? अपनी माँ को? बिगड़ गये हो तुम लोग, हलवा खाओ, ठंडा हो जायेगा," कामिनी ने बात बदलने की कोशिश की।

"थैंक यू आंटी..." रवि ने एक बड़ा चम्मच मुंह में भरा और कामिनी की आँखों में झांकते हुए बोला.

"गाजर का हलवा बहुत स्वादिष्ट बना है... ऐसा 'माल' मैंने आज तक नहीं खाया।"
कहते हुए रवि के पैर की उंगलियां कामिनी की नंगी पिंडलियों से ऊपर चढ़ती हुई उसके घुटनों तक पहुंच गईं।

कामिनी शॉक्ड थी।
रवि की हिम्मत तो देखो! बेटा बगल में बैठा है और वह माँ को टेबल के नीचे छेड़ रहा है।
लेकिन कामिनी का डर और उसकी ख़ामोशी ही रवि की ताकत थी।
कामिनी की चूत, जो पहले से सुलग रही थी, इस स्पर्श से और भी गीली होने लगी।
रवि का पैर अब उसके गाउन के घेरे में घुस चुका था और उसकी नंगी जांघों पर रेंग रहा था।
कामिनी को उसे डांटना चाहिए था, पैर झटक देना चाहिए था।
लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया। वह बस कभी रवि को घूरती, तो कभी खांसी का नाटक करती।

असल में, वह उस स्पर्श से पागल हो रही थी। एक जवान लड़का, उसके बेटे के सामने, उसे उत्तेजित कर रहा था—यह जोखिम (Risk) उसे और भी ज्यादा मज़ा दे रहा था।
रवि के पैर का अंगूठा अब उसकी जांघों के बीच, ठीक चूत के मुहाने पर पहुंच गया था।
कामिनी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
उसे रुकना चाहिए था... लेकिन उसका जिस्म हार गया।
कामिनी कुर्सी पर थोड़ा आगे खिसक आई और टेबल के नीचे अपनी जांघों को चौड़ा कर दिया।
कामिनी की चुत पूरी तरह भीगी हुई चमक रही थी.20210804-213151

नतीजा?
पचचच...
रवि का मोटा अंगूठा सीधा कामिनी की गीली, फिसलन भरी चूत से टकरा गया।
"उईक्सस्स्स्स.... इस्स्स्स... आउच..."
कामिनी के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई। उसकी आँखें गोल हो गईं।
रवि को भी उम्मीद नहीं थी कि रास्ता इतना आसान और इतना गीला मिलेगा। उसे पता चल गया कि आंटी ने नीचे पैंटी नहीं पहनी है।
यह इशारा काफी था।
रवि का अंगूठा अब कामिनी की चूत की दरार को ऊपर से नीचे तक टटोलने लगा।
कामिनी के ज़हन में रवि का वह गुलाबी लंड घूमने लगा जो उसने सुबह देखा था।
उससे रहा नहीं गया। वह अपनी कमर को थोड़ा और आगे ले गई।

धप... धापक... पच...
एक सधे हुए दबाव के साथ, रवि का मोटा अंगूठा कामिनी की गीली योनि के अंदर धंस गया।
कामिनी चीखना चाहती थी, लेकिन उसने कसकर अपने मुंह पर हाथ रख लिया।
रवि धीरे-धीरे अपने अंगूठे को अंदर-बाहर करने लगा, उसे सहलाने लगा।
कामिनी चरम सीमा पर थी।
अपने बेटे के ठीक बगल में बैठकर, उसके दोस्त से अपनी चूत में उंगली (अंगूठा) करवा रही थी। इस 'हराम' अनुभूति ने उसे आग का गोला बना दिया था। उसे सिर्फ अपने जिस्म की आग को शांत करना था, इसके लिए ही तो वो अपनी मान मर्यादा त्यागी बैठी थी,
उसे सिर्फ अपनी चुत मे होती जलन याद थी.

वह खुद अपनी कमर हिलाकर उस अंगूठे को और गहराई तक लेने की कोशिश कर रही थी।
वह बेकाबू थी... पागल हो रही थी... उसकी चूत में ज्वालामुखी फूटने वाला था... वह इस लावे को बाहर निकाल देना चाहती थी...
"इसस्स.... उफ्फ्फ.... बस.... आह्ह्ह..." कामिनी बस चिल्लाने ही वही थी, उसका सब्र जवाब देने ही वाला था, गले मे दबी हुई आवाज़ चीख का रूप लेने ही वाली थी की.....
तभी...
ट्रिंग... ट्रिंग... ट्रिंग...
टेबल पर रखे कामिनी के फोन की घंटी बजी।
पच...
आवाज़ सुनकर रवि ने झटके से अपना पैर बाहर खींच लिया।
कामिनी को लगा जैसे उसकी आत्मा शरीर से निकलते-निकलते बची हो। वह हड़बड़ा कर सीधी हो गई।
उसकी सांसें अटक गईं।

"पापा का फोन है माँ..."
बंटी ने टेबल पर पड़ा फोन सरका कर कामिनी की तरफ बढ़ा दिया।
उसकी नज़रें टीवी पर टिकी थीं, लेकिन उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह सब कुछ देख कर भी अनदेखा कर रहा है।
बंटी कुछ अलग ही था। या तो वो अपनी माँ को ख़ुश देखना चाहता था या फिर उसे दर्शक होने का ही मजा था, खिलाडी बनने मे उसकी कोई रूचि नहीं थी.

Contd.....
अखिरकार रवि ने कामिनी के ख़ज़ाने में लूट शुरू कर दी....

क्या हुआ अंगूठा गया है तो लंड का रास्ता खुल गया.....


बहुत ही सुंदर लिखा है आपने....


मजा आ जाएगा अगर रवि के साथ साथ बंटी भी अपनी माँ की चुत में घुस जाए....


बहुत ही सुंदर...


अगले भाग का इंतजार है
 
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मेरी माँ कामिनी, भाग -14



छत से कपड़े सुखाकर कामिनी नीचे आई।
घर में सन्नाटा था, लेकिन उसके दिमाग में शोर था।
रवि की फरमाइश—गाजर का हलवा—पूरी करनी थी। लेकिन घर में गाजर नहीं थी।
अब समस्या यह थी कि गाजर लाए कौन?
रवि और बंटी स्कूल जा चुके थे। रमेश ऑफिस में था।
बचा सिर्फ़ एक ही शख्स—रघु।
कामिनी की नज़र स्टोर रूम की तरफ गई।

उसका दिल ज़ोर से धड़का। कल रात की उस जंगली घटना के बाद, रघु का सामना करने की उसकी रत्ती भर भी हिम्मत नहीं थी।

'कैसे जाऊं उसके सामने? क्या सोच रहा होगा वो मेरे बारे में? कहीं उसे मेरा वहाँ होने का अहसास तो नहीं हो गया होगा?"
"नहीं... नहीं.... रघु तो नशे में धुत्त था। उसने उसे 'सुगना' बोला था। शायद उसे कुछ याद न हो। शायद उसे सपना लगा होगा"
कामिनी खुद को बचाने की दलील खुद को ही दे रही थी, वो किसी मझे हुए वकील की तरह, खुद का केस लड़ रही थी अपने अंतर्मन मे.
दुविधा मे फसा इंसान दलिले अच्छी देता है.

इस उम्मीद के सहारे कामिनी ने मुट्ठी भींची और स्टोर रूम की तरफ कदम बढ़ा दिए,
स्टोर रूम का दरवाज़ा खुला था।
अंदर रघु काम में लगा हुआ था। वह पुराने बक्से हटा रहा था।
उसका बदन पसीने से भीगा हुआ था। वही सांवला, गठीला शरीर, वही पसीने की गंध... कामिनी के नथुनों में कल रात की याद ताज़ा हो गई।
कामिनी की आहट सुनकर रघु मुड़ा।
सामने अपनी 'मेमसाब' को देखकर उसने तुरंत काम छोड़ा और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
"नमस्ते मेमसाब..."

उसकी आवाज़ में वही पुराना सम्मान और डर था। उसकी आँखों में कोई शरारत या 'मालिक' वाला भाव नहीं था। वह अभी भी भ्रम में था कि कल रात जो हुआ, वह हकीकत थी या शराब का नशा।

रघु का यह रवैया देखकर कामिनी की जान में जान आई।
'शुक्र है... इसे कुछ याद नहीं है। यह सपना ही समझ रहा है,' कामिनी ने राहत की सांस ली।

"वो... वो रघु..." कामिनी ने नज़रें चुराते हुए कहा, "बाज़ार से कुछ सामान लाना था। गाजर लानी थी।"

रघु ने सिर हिलाया। "जी मेमसाब, ले आऊंगा। पैसे दे दीजिये।"
कामिनी ने पल्लू में बंधे नोट निकाले और रघु की तरफ बढ़ाए। हाथ बढ़ाते वक़्त उसकी उंगलियां कांप रही थीं, डर था कि कहीं रघु का हाथ छू न जाए।
औरत भी कमाल होती है, रात मे जिस आदमी का लंड चूसा था, उजाले मे उसी शख्श का हाथ तक ना छू जाये इसकी परवाह थी.

रघु ने पैसे लिए और पूछा, "कितनी लाऊं मेमसाब?"
"दो किलो ले आना... हलवा बनाना है," कामिनी ने कहा।
रघु ने गमछे से अपना पसीना पोंछा और एक व्यावहारिक सलाह दी, जो कामिनी के लिए किसी बम से कम नहीं थी।

"मेमसाब... गाजर एकदम मोटी और लम्बी वाली ही लाऊंगा। पतली वाली में वो बात नहीं होती।"
उसने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा,
"जितनी मोटी और लम्बी गाजर होती है... हलवे में उतना ही मज़ा आता है। अच्छे से घिस जाता है,"

रघु तो सिर्फ़ सब्जी की बात कर रहा था, लेकिन कामिनी का दिमाग कल रात के दृश्य पर चला गया।
मोटी... लम्बी... और मज़ेदार?
उसकी आँखों के सामने रघु का वह विशाल, काला लंड आ गया जो उसने कल रात अपने मुंह में भरा था।
उसकी सरसरी नजर ना जाने क्यों रघु के कमर के निचले हिस्से लार फिसल गई,
वहाँ अभी भी मोटा सा कुछ लटका हुआ था।

कामिनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसके कान गर्म हो गए।
रघु की यह सीधी-सादी बात उसे अश्लील लग रही थी।
"ह... हाँ... देख लेना, अच्छी लाना," कामिनी हड़बड़ा कर बोली।
रघु ने एक और बात जोड़ दी।
"गाजर का हलवा तो मुझे भी बहुत पसंद है मेमसाब... गांव में खूब खाता था। गरम-गरम हलवा, ऊपर से मलाई डाल कर....उफ्फ्फ, क्या स्वाद होता है।"

कामिनी की हालत खराब हो गई।
'गरम हलवा... मलाई...'
उसे याद आया कि कल रात उसने रघु की 'मलाई' (वीर्य) का स्वाद चखा था।
उसे फिर से हल्की सी उबकाई महसूस हुई, लेकिन साथ ही पेट के निचले हिस्से में एक मीठी सी टीस भी उठी।

"ठीक है... जाओ अब जल्दी," कामिनी ने उसे वहां से भगाना ही बेहतर समझा।
रघु सिर झुकाकर वहां से निकल गया।

रघु के हाथ मे पुरे 200 rs थे,
रघु बाज़ार की तरफ पैदल चल दिया,
रास्ते भर वह सोचता रहा।
'कल रात... वो सपना कितना सच लग रहा था। सुगना आई थी... उसने... उसने मेरा चूसा था। आह्ह्ह...'
रघु ने अपनी जांघों के बीच हाथ फेरा। वहां अभी भी हल्का दर्द था जो ज्यादा मुठ मारने या चूसने के बाद होता है।
वह कन्फ्यूज था।
तभी रास्ते मे उसे एक दुकान दिखी, उसकी फेवरेट दुकान...
"देसी शराब का ठेका "

उसने मुट्ठी मे बंद 200के नोट को देखा, फिर ठेके के अंदर कांच की सीसी मे बंद उसकी महबूबा को देखा.
"नहीं... नहीं... पहले गाजर ले लेता हूँ " रघु ने मन मे आते विचारों को एक पल मे झटक दिया.
उसने दो कदम बढ़ाये ही थे की...

"मेमसाब ने पैसे तो ज्यादा दिए हैं... एक 'पव्वा' तो आ ही जाएगा," रघु ने सोचा।
"बस एक ढक्कन मारूँगा... थकान मिटाने के लिए।" " रघु पलटा और मयखाने मे जा बैठा.
शराबी आदमी शराब से कभी जीत ही नहीं सकता, इतिहास गवाह है, बड़े बड़े राजा महराजा सब हार बैठे इस शराब के आगे, रघु क्या चीज हुआ भला.

****************

दोपहर के 2 बज गए थे।
कामिनी बार-बार घड़ी देख रही थी और स्टोर रूम की तरफ झांक रही थी।
रघु का कोई अता-पता नहीं था।
"नालायक कहीं का... पैसे लेकर भाग गया शायद। दारू पीने बैठ गया होगा," कामिनी ने गुस्से में बड़बड़ाया।

छोटे लोगो का यही है, पैसे मिले नहीं की सब काम भूल जाते है " कामिनी गुस्से मे भुंभुना रही थी.

तभी गेट खुलने की आवाज़ आई।
रवि और बंटी स्कूल से वापस आ गए थे।
"मम्मी, भूख लगी है," बंटी ने बैग सोफे पर पटकते हुए कहा।
लेकिन कामिनी की नज़र रवि पर थी।
रवि के हाथ में एक थैला था, जिसमें से ताज़ी, लाल गाजरें झांक रही थीं।
"आंटी..." रवि ने अपनी मनमोहक मुस्कान के साथ कहा, "आते वक़्त दिखा तो ले आया। मुझे याद था कि आज हलवा बनना है।"

कामिनी का गुस्सा पिघल गया।
जहाँ रघु, एक शराबी को उसने काम बोला था, वो नदारद था, वहीं रवि बिना कहे उसकी ज़रूरत पूरी कर रहा था।

"थैंक यू बेटा..." कामिनी ने थैला लिया।
******************

किचन का दृश्य (शाम 4 बजे):
उसी वक़्त रमेश का फोन आया।
"हेलो कामिनी... मैं आज रात घर नहीं आ पाऊंगा।"
"क्यों? क्या हुआ?" कामिनी ने पूछा।

"कुछ अर्जेंट काम है, साइट पर जाना पड़ रहा है... किशनगढ़," रमेश ने जल्दी में कहा और फोन काट दिया।
कामिनी ने फोन रखा और गाजर धोने लगी।
रवि किचन में आ गया। उसने कपड़े बदल लिए थे—एक स्लीवलेस टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने थे। उसका चिकना, गोरा बदन चमक रहा था।

"लाओ आंटी, मैं घिसवा देता हूँ," रवि ने कद्दूकस (Grater) उठा लिया।
वह गाजर घिसने लगा।


घिस... घिस... घिस...
"आंटी, गाजरें काफी अच्छी मिली हैं ना?" रवि ने गाजर को कसकर पकड़ते हुए कहा, "एकदम लंबी और मोटी। ऐसी गाजर घिसने में बड़ा मज़ा आता है, हाथ में ग्रिप (Grip) अच्छी बनती है।"
रवि की बात सीधी थी, लेकिन कामिनी की नज़रों में 'चोर' था।
'मोटी और लम्बी' सुनकर उसे सुबह रघु की बात और रवि का 'गुलाबी लंड' याद आ गया।
वह रवि से नज़रें नहीं मिला पा रही थी। उसका चेहरा लाल हो गया।

"ह... हाँ... अच्छी हैं," वह बस इतना ही बोल पाई।
"और सुबह के लिए sorry आंटी, मुझे दरवाजा अच्छे से बंद करना चाहिए था " रवि ने जैसे कामिनी को कर्रेंट छुवा दिया हो.
"कककम.... कोई बात नहीं,"
उसके चेहरे पे लाल मुस्कान तैर गई. हाथो मे मोटा गाजर लिए घिसे जा रही थी,

हॉल में बैठा बंटी टीवी देख रहा था, लेकिन उसके कान खड़े थे।
जब कामिनी ने बताया कि— "पापा आज नहीं आएंगे, किशनगढ़ गए हैं"—तो बंटी का माथा ठनका।
'किशनगढ़?'
उसने यह नाम पहले भी सुना था। रघु के मुँह से, जब वो पहले दिन घर आया था, तब माँ से बातचीत मे उसने इस कस्बे का जिक्र किया था, और बचपन मे दादा जी के मुँह से भी ये नाम सुना था.

'पापा और रघु का कनेक्शन? रघु भी वहीं का है क्या?'
बंटी चुप रहा, लेकिन उसके दिमाग में शक का कीड़ा रेंगने लगा.

शाम के 6 बजते-बजते मौसम बदल गया।
काले बादल घिर आए और ठंडी हवा चलने लगी। बारिश की बूंदें टप-टप गिरने लगीं।
"अरे! कपड़े भीग जाएंगे," कामिनी हड़बड़ाई। उसे याद आया कि उसकी धुली हुई साड़ी, ब्रा और पैंटी छत पर है।
वह जाने ही वाली थी कि रवि ने उसे रोक दिया।
"आप रहने दो आंटी... आप हलवा देखो, मैं ले आता हूँ," रवि ने कहा और बिजली की रफ़्तार से सीढ़ियाँ चढ़ गया।
कामिनी उसे मना भी नहीं कर पाई।
उसका दिल धक-धक करने लगा। 'हे भगवान... मेरी पैंटी...'
दो मिनट बाद रवि नीचे आया।
वह थोड़ा भीग गया था। उसके हाथ में कपड़ों का एक ढेर था।
उसने सोफे पर साड़ी और ब्लाउज रखा।
लेकिन उसके हाथ में अभी भी दो छोटे कपड़े थे—कामिनी की सफ़ेद ब्रा और वह फिजी (Skin) कलर की पैंटी।
कामिनी का चेहरा शर्म से टमाटर हो गया।
रवि धीरे से कामिनी के पास आया।
उसने बिना किसी हिचकिचाहट के, बड़े आराम से वह पैंटी और ब्रा कामिनी की तरफ बढ़ाई।
कामिनी का हाथ कांप रहा था। उसने झपट्टा मारकर कपड़े लिए और अपनी साड़ी के पल्लू में छुपाने लगी।
वह घबरा रही थी, शर्म से गड़ी जा रही थी।
रवि ने उसकी घबराहट भांप ली।
उसने कामिनी की आँखों में झांकते हुए बहुत ही सामान्य लहजे में कहा—
"अरे, इसमें शर्माने वाली क्या बात है आंटी? अंडरगारमेंट्स ही तो हैं, सब पहनते हैं।"
उसकी आवाज़ में एक अपनापन था, एक तसल्ली थी कि 'यह कोई बड़ी बात नहीं है'।
रवि की इस बात ने कामिनी को थोड़ा सहज कर दिया।

उसे लगा कि यह लड़का कितना मैच्योर (Mature) है।
कामिनी के अंदर की 'शरारती औरत' जाग उठी। उसे सुबह का नज़ारा याद आ गया—रवि का नंगा बदन और वहां बालों का नामो-निशान न होना।
उसने अपनी शर्म को एक किनारे फेंका और रवि की आँखों में देखते हुए, एक हल्की सी मुस्कान के साथ ताना मारा—
"हाँ, सब पहनते हैं... पर तुम भी पहन लिया करो कभी-कभी। दरवाज़ा बंद करना भूल जाते हो।"
यह बोलकर कामिनी वहां रुकी नहीं, वह मुस्कुराती हुई अपने कमरे की तरफ भाग गई।

पीछे रवि खड़ा रह गया—हैरान और खुश।
उसे सिग्नल मिल गया था।
'आंटी ने सुबह सब कुछ देखा था... और उन्हें बुरा नहीं लगा।'
बाहर बारिश तेज़ हो गई थी, और घर के अंदर रोमांस की खिचड़ी पकने लगी थी।
*****************

रात के 8 बज रहे थे।
बाहर आसमान फट पड़ा था, मूसलाधार बारिश हो रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट घर की खामोशी को चीर रही थी।
किचन में खाना तैयार था, गाजर के हलवे की मीठी महक हवा में थी।
सामने tv चल रहा था,
लेकिन कामिनी का मन बेचैन था। वह डाइनिंग टेबल पर गुमसुम बैठी थी। उसकी नज़रें बार-बार बंद दरवाजे पर जा रही थीं।
'रघु कहाँ रह गया? इतनी तेज़ बारिश है... पैसे लेकर कहीं शराब पीने तो नहीं बैठ गया? या कोई हादसा तो नहीं हो गया?'
एक अजीब सी चिंता उसे खाए जा रही थी। आखिर रघु ही वो शख्श था, जिसने उसके जिस्म मे सालों बाद ये बेचैनी पैदा की थी,

कामिनी को इस तरह खोया हुआ देख, रवि ने चुप्पी तोड़ी।
"चल ना बंटी... बारिश में नहा के आते हैं, देख कितनी मस्त बारिश हो रही है," रवि ने खिड़की की तरफ इशारा करते हुए कहा।

बंटी कम्बल ओढे सोफे पर दुबका हुआ था। उसने मुंह बनाया।
"नहीं यार... बहुत ठंडा पानी है, मैं बीमार पड़ जाऊंगा। तू जा, मुझे नहीं नहाना।" बंटी ने साफ़ मना कर दिया।

रवि ने हार नहीं मानी। वह कामिनी की तरफ घूमा। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी।
"आंटी... आप चलो ना। बहुत मज़ा आएगा।"
रवि के इस अचानक ऑफर से कामिनी सकपका गई। वह ख्यालों की दुनिया से धरातल पर लौटी।

"क... ककक... कौन मैं?" कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए कहा, "पागल हो गए हो क्या? मैं इस उम्र में बारिश में नहाउंगी?"

"तो और कौन आंटी?" रवि ने ज़िद्द की, "बारिश रोज़ थोड़ी न होती है। और उम्र का क्या है? कभी-कभी अपनी जवानी को जी लेना चाहिए। कब तक घर की चारदीवारी में कैद रहोगी?"

रवि एक ही सांस में बोल गया, लेकिन उसकी बातें कामिनी के दिल पर किसी हथौड़े की तरह लगीं।
यह एक आघात था।

'क्या मैं वाकई जीना भूल गई हूँ? मैंने आखिरी बार कब खुद के लिए कुछ किया था? कब बारिश की बूंदों को अपने चेहरे पर महसूस किया था?'

उसे याद आया, शादी से पहले अपने गांव में वह सावन की बारिश में सहेलियों के साथ घंटों नहाती थी। लेकिन इस घर में आकर, रमेश की मार और रसोड़े के धुएं ने उसकी सारी हसरतें कुचल दी थीं।
तभी बंटी ने भी रवि का साथ दिया।

"जाओ ना मम्मी... जी लो अपनी ज़िंदगी। वैसे भी आज पापा नहीं हैं घर पर, कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है।"
बंटी ने अनजाने में ही कामिनी को सबसे बड़ी आज़ादी दे दी थी। वो अपनी माँ का दुख समझता था, बरसो से चारदीवारी मे कैद थी उसकी माँ.

बंटी का उत्साह देखकर कामिनी की झिझक टूट गई। उसके चेहरे पर एक दबी हुई मुस्कान आ गई।
"ठीक है..."
रवि तो जैसे पागल हो गया।
वह बहुत उत्साही लड़का था। उसने आव देखा न ताव, कामिनी का हाथ पकड़ लिया।

"चलो आंटी... देर मत करो..."
रवि लगभग कामिनी को घसीटता हुआ सीढ़ियों की तरफ ले गया।
कामिनी मुंह से "ना-ना" कर रही थी, लेकिन उसके पैर किसी जवान हिरणी की तरह थिरक रहे थे। वह रवि के पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ गई। आज उसका यौवन लौट आया था।

छत पर पहुंचते ही ठंडे पानी की बौछार ने उनका स्वागत किया।
कामिनी एक पल के लिए ठिठकी, लेकिन रवि उसे खींचकर बीच छत पर ले गया।
छप-छप-छप... आउच.... कामिनी के जिस्म पर ठन्डे पानी की बौछार जैसे ही पड़ी, उसकी शर्म भी उतर गई.
"रवि पानी बहुत ठंडा है "

पानी ने कामिनी को ऊपर से नीचे तक भिगो दिया।
और फिर... एक चमत्कार हुआ।
कामिनी ने अपनी सारी शर्म, सारा दुख, सारी मर्यादा बारिश के पानी में बहा दी। वह गोल-गोल घूमने लगी। उसने अपने दोनों हाथ आकाश की तरफ फैला दिए और बारिश की बूंदों को अपने मुंह पर गिरने दिया।
वह किसी जवान मोरनी की तरह नाचने लगी।

रवि, जो उसके जीवन में किसी फ़रिश्ते की तरह आया था, एक कोने में खड़ा होकर बस उसे निहार रहा था।
कामिनी आज भूल गई थी कि वह 38 साल की एक माँ है। उसे लगा वह फिर से 18 साल की अल्हड़ लड़की बन गई है।

लेकिन रवि की नज़रें सिर्फ़ उसकी खुशी पर नहीं थीं... उसकी नज़रें कामिनी के भीगे हुए, कामुक जिस्म पर जम गई थीं।
बारिश के पानी ने कामिनी की सूती साड़ी को शरीर से बुरी तरह चिपका दिया था। वह कपड़ा अब खाल की तरह उसके बदन पर मढ़ा हुआ था।
ठंडे पानी के स्पर्श से कामिनी के भारी स्तन तन गए थे।
उसका ब्लाउज भीगकर पारदर्शी हो गया था, और उसके अंदर कैद उसके निप्पल एकदम कड़क होकर, ब्लाउज के कपड़े को चीरते हुए बाहर उभर आए थे। वे दो नुकीले पत्थरों की तरह रवि को चुनौती दे रहे थे।

कामिनी जब घूम रही थी, तो उसकी भारी छाती लय में ऊपर-नीचे हो रही थी।
पानी की धार उसकी साड़ी को भारी कर रही थी। साड़ी का कपड़ा उसकी जांघों के बीच फंस गया था।
इससे उसकी टांगों के बीच का वह गुप्त 'वी' (V) आकार—उसकी चूत का तिकोना उभार—साफ़ झलक रहा था। पानी की बूंदें उस उभार से फिसलकर नीचे गिर रही थीं।

पीछे से, उसकी चौड़ी और भारी गांड का आकार पूरी तरह से नुमाया हो रहा था। साड़ी उसके नितम्बों की दरार में धंस गई थी, जिससे उसके जिस्म के हर भूगोल का नक्शा रवि के सामने खुला था।


रवि किसी प्रेमी की तरह बस उस उछलती-खेलती कामिनी को देखे जा रहा था।
उसकी आँखों में हवस थी, लेकिन एक पूजा का भाव भी था।
कामिनी ने अकेले झूमता हुआ महसूस किया, वो अकेले ही उछले जा रही है, उसने सामने देखा रवि एकटक उसे ही देखे जा रहा था.

उसने रवि की टकटकी को महसूस कर लिया।
आम तौर पर वह अपना पल्लू ठीक करती या शर्मा जाती।
लेकिन आज?
आज उसे अच्छा लग रहा था।
उसे अच्छा लग रहा था कि एक 20 साल का जवान, खूबसूरत लड़का उसे ऐसे देख रहा है जैसे वह दुनिया की सबसे सुंदर औरत हो।
"क्या हुआ आओ ना, देख क्या रहे हो?"
उसने जानबूझकर अपनी कमर को और लचकाया, अपनी छाती को थोड़ा और आगे किया ताकि बारिश की बूंदें उसके कड़क निप्पलों पर गिरें।

इस बारिश में कामिनी सिर्फ़ भीग नहीं रही थी... वह जल रही थी।
उसका जिस्म चीख-चीख कर कह रहा था कि वह ज़िंदा है, एक औरत है, कामुक औरत जिसका जिस्म प्यासा है, उसकी भी कुछ इच्छा है, उसका भी एक जीवन है, जो पति की मार से परे है, इसे भी हक़ है ये जीवन जीने का.
उसकी आँखों मे खुशी के आंसू थे, और उसकी आँखों मे धुंधला सा दिखता रवि का जवान जिस्म.
जो उसे ही देख रहा था....
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Jabarjast
 
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Lord haram

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मेरी माँ कामिनी, भाग -16




कामिनी हड़बड़ाहट मे उठ के चली आई, रमेश के कॉल ने उसे बेटे के सामने झड़ने से रोक लिया था,
अंदर कमरे मे,
रमेश फोन पर नशे में था।
उसने इधर-उधर की बेतुकी बातें कीं और बस इतना बताकर फोन रख दिया कि वह कल सुबह तक आ जाएगा।
यानी... आज की पूरी रात कामिनी को इसी वासना मे जलना था, वैसे भी रमेश होता तब भी कामिनी के नसीब मे यही बेचैनी थी,

रात का खाना हो चुका था।
घर में सन्नाटा पसर गया था। बंटी और रवि अपने कमरे में जा चुके थे।
कामिनी अपने बेडरूम में लेटी थी, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी।
उसका शरीर बिस्तर पर था, लेकिन आत्मा आग में जल रही थी।

छत पर रवि का वह जंगली चुंबन और डाइनिंग टेबल के नीचे उसकी उंगलियों का खेल... कामिनी करवटें बदल रही थी।
उसका एक मन कह रहा था उसने ऐसा कैसे कर लिया, रवि को उसकी हरकत पे डांटा क्यों नहीं? वो ऐसे कैसे बहक सकती है? वो मेरे बेटे का दोस्त है, मेरे बेटा जैसा हूँ हुआ?

लललल... लल्ल... लेकिन उसकी हिम्म, उसका वो चुम्बन, उसके लंड का कड़कपन जो शायद ही उसने पहली बार महसूस किया था,

दूसरा मन कह रहा था कि अभी उठकर रवि के कमरे में जाए और उसे भींच ले, अपनी प्यास बुझा ले।
लेकिन... उसके संस्कार, उसका 'माँ' होना और लोक-लाज की मर्यादा उसे रोक रही थी।
'नहीं कामिनी... वो तेरे बेटे का दोस्त है... यह गलत है।'

तभी... घड़ी ने 11:30 बजाए।
सन्नाटे को चीरती हुई मेन गेट के लोहे के दरवाज़े की चरमराहट सुनाई दी।
चर्ररर...
फिर किसी के लड़खड़ाते कदमों की आवाज़ और एक भद्दी, बेसुरी गुनगुनाहट कानों में पड़ी।

"हिचहह.... थोड़ी सी जो पी ली है... चोरी तो नहीं.... हिचहह... की है... हीच...."
कामिनी तुरंत बिस्तर से उठी और दबे पांव खिड़की पर गई। उसने पर्दा हटाकर बाहर झांका।
बारिश धीमी हो गई थी, बस फुहारें पड़ रही थीं।
स्ट्रीट लाइट की धुंधली रोशनी में उसने देखा—रघु चला आ रहा था।
वह बुरी तरह भीगा हुआ था। उसका कुर्ता शरीर से चिपका था, लुंगी की गांठ ढीली थी। वह झूमता हुआ, लड़खड़ाता हुआ आ रहा था।

कामिनी का शक सही निकला। यह हरामखोर पैसे लेकर गाजर नहीं, बल्कि दारू पीने बैठ गया था।
कामिनी का ज़हन गुस्से से भर उठा।
'नालायक कहीं का... मैंने गाजर मंगाई थी और यह नवाब दारू पीकर आ रहा है।'
लेकिन अगले ही पल, जब उसने रघु को बारिश में भीगते, कांपते और नशे में चूर देखा... तो उसके गुस्से की जगह एक अजीब सी दया और हवस ने ले ली।
उसे रघु के वो शब्द याद आए जो उसने सुबह स्टोर रूम में कहे थे—
"गाजर का हलवा तो मुझे भी बहुत पसंद है मेमसाब... गरम-गरम हलवा और मलाई... उफ्फ्फ!"
कामिनी का दिल पिघला... या शायद उसका जिस्म पिघला, कहना मुश्किल था,
कल रात उसने जो हरकत की थी, उसने कामिनी के हौसले बढ़ा दिए थे, अक्सर चोर को हिम्मत ही तब मिलती है जब वो पकड़ा नहीं जाता,
कामिनी भी कल रात पकड़ी नहीं गई थी, उसके चुत का चोर फिर से कुलबुलाने लगा,
रघु का लंड रवि की कोमलता से अलग था। रवि 'प्यार' था, लेकिन रघु 'गन्दा नशा' सा महसूस हो रहा था,

और आज कामिनी को इस नशे की तलब लगी थी, रवि के प्यार भरे स्पर्श ने उसे इस तरफ धकेला था,

उसे एक अवसर दिखाई दिया। रघु नशे में है, घर में सब सो रहे हैं... और वह खुद 'गरम' है।
उसने तुरंत फैसला किया।

वह किचन में गई। फ्रिज से एक कटोरी में गाजर का हलवा निकाला। उसे माइक्रोवेव में हल्का गर्म किया।
फिर उसने एक हाथ में हलवे की कटोरी ली और दूसरे में छाता।
वह मेन दरवाज़े की तरफ बढ़ी।
बाहर निकलने से पहले, वह बंटी और रवि के कमरे के पास रुकी।
अंदर सन्नाटा था। शायद दोनों सो गए थे,

कामिनी ने कोई रिस्क नहीं लिया।
उसने बहुत ही सावधानी से मेन दरवाज़े की कुंडी खोली, बाहर निकली, और फिर...
कच...
उसने बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया (Lock लगा दिया)।
अब अगर रवि या बंटी की नींद खुल भी जाए, तो वे बाहर नहीं आ सकते थे। कामिनी ने अपनी सुरक्षा पक्की कर ली थी।
अब वह आंगन में थी। ठंडी हवा चल रही थी।
उसके बदन पर सिर्फ़ वही सूती गाउन था, जिसके नीचे उसने कुछ नहीं पहना था। ठंडी हवा उसके नंगे बदन को छू रही थी, जिससे उसके निप्पल फिर से अकड़ गए।

वह छाता ताने, दबे पांव स्टोर रूम की तरफ बढ़ी।
कीचड़ और पानी से बचते हुए, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

धक्... धक्... धक्...
पैर कांप रहे थे, लेकिन पेट के निचले हिस्से में लगी आग उसे हिम्मत दे रही थी।
जैसे कोई बिल्ली अपने शिकार (या शिकारी) के पास जा रही हो।
वह स्टोर रूम के दरवाज़े पर पहुंची। दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर एक पीले बल्ब की मद्धम रोशनी जल रही थी।
कामिनी ने अंदर झांका।

बल्ब की पीली, मद्धम रोशनी में रघु खटिया पर निढाल पड़ा था।

उसने नशे में जैसे-तैसे अपना गीला कुर्ता तो उतार फेंका था, लेकिन उसकी गीली लुंगी अभी भी उसके कमर से चिपकी हुई थी।
उसका सोया हुआ लंड जाँघ पर किसी सांप की तरह लेता हुआ था, और लुंगी केंचुली की तरह उसपर लिपटी हुई थी.

रघु पूरी तरह बेसुध था। उसकी आँखें बंद थीं, मुंह हल्का खुला था, और वह गहरी, भारी सांसें ले रहा था।
बीच-बीच में वह नशे में कुछ बड़बड़ा देता— "अरे... और डालो..."
लेकिन इन शब्दों का कोई मतलब नहीं था। वह इस दुनिया में था ही नहीं। आज दिन भर उसने शायद गाजर खरीदने के बजाय सिर्फ़ शराब ही पी थी।
कामिनी को उस पर गुस्सा तो बहुत आया।
'जानवर कहीं का... यहाँ मैं इंतज़ार कर रही थी और यह यहाँ बेहोश पड़ा है।'

उसने सोचा कि हलवे की कटोरी पास में रखी मेज़ पर रख दे और चली जाए। जब होश आएगा, खा लेगा।
वह पलटी भी, जाने के लिए कदम बढ़ाया भी... लेकिन फिर रुक गई।
उसके लालची, प्यासे और उत्तेजित मन में एक ख्याल आया। एक ऐसा ख्याल जिसे 'नैतिकता' पाप कहती है, लेकिन 'हवस' उसे मौका कहती है।

उसने खुद को समझाया— "बेचारा... गीले कपड़ों में सो रहा है। निमोनिया हो जाएगा। इंसानियत के नाते इसकी लुंगी उतार देती हूँ, कोई चादर ओढ़ा दूंगी।"
यह सिर्फ़ एक बहाना था। एक सफ़ेद झूठ जो वह खुद से बोल रही थी।
असल में, वह उस 'जानवर' को फिर से देखना चाहती थी। जो लुंगी रुपी केंचूली ओढे शांत लेटा हुआ था रघु की जांघो पर.

वह वापस खटिया के पास गई।
उसका दिल गले में धड़क रहा था। घर का दरवाजा बाहर से बंद था, रघु बेहोश था... उसे रोकने वाला कोई नहीं था।
उसने अपने कांपते हुए हाथ रघु की कमर की तरफ बढ़ाए।
उसकी उंगलियों ने गीली लुंगी की गीली गांठ को छुवा।
गांठ थोड़ी टाइट थी, लेकिन गीली होने के कारण फिसल रही थी। कामिनी ने धीरे से उसे खींचा।
सर्रर्र...
गांठ खुल गई।
जैसे ही गांठ ढीली हुई और लुंगी का कपड़ा रघु की कमर से अलग हुआ, एक तेज़, मादक और कसैली मर्दाना गंध का भभका कामिनी की नाक से टकराया।

यह गंध पसीने, पुरानी शराब, गीले कपड़े और एक 'कामकाजी मर्द' की कच्ची महक का मिश्रण थी।
रवि के पास से महंगे इत्र की खुशबू आती थी, लेकिन रघु के पास से "मर्दना " गंध आ रही थी।

कामिनी न चाहते हुए भी उस गंध को अपनी सांसों में भर गई। सससन्नणीयफ़्फ़्फ़.... सस्नेनीफ्फ...उसे नशा सा होने लगा। आप लाख चाहो लेकिन ऐसी महक को नकारते हुए भी बार बार सूंघने का मन करता है.
यही हालात कामिनी की थी, वो सांस भी लेना नहीं चाहती थी इस माहौल मे लेकिन... सिनीफ्फ... शनिफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... जीरो जोर से सांस खिंच रही थी.
रघु की गंदी मर्दाना गंध उसके जलते जिस्म मे घुलने लगी.

उसने धीरे से लुंगी को खींचकर नीचे कर दिया।
और फिर... वह नज़ारा उसकी आँखों के सामने था।
रघु का लंड। गन्दा, नसो से भरा, काला मोटा लंड.

वह उसकी बाईं जांघ पर एक तरफ लुढ़का पड़ा था।
कल रात जो 'दानव' बनकर उसके गले तक उतरा था, वह अभी एक सोये हुए अजगर की तरह शांत था।
वह काला था। बेहद काला।
उसके आसपास घने, घुंघराले बाल थे जो जांघों तक फैले थे।
वह शांत अवस्था (Flaccid) में भी काफी मांसल और भारी लग रहा था। उसकी चमड़ी (Foreskin) आगे से बंद थी, जो उसे एक सुप्त ज्वालामुखी जैसा रूप दे रही थी।
कामिनी की आँखें उस पर चिपक गईं।
सुबह उसने रवि का 'गुलाबी और साफ़' लंड देखा था—जो सुंदर था, सुडौल था।

और अभी वह रघु का 'काला और जंगली' लंड देख रही थी—जो डरावना था, लेकिन उसमें एक अजीब सा खिंचाव (Magnetism) था।
कामिनी की सांसें भारी हो गईं।
वह अपनी जांघों के बीच फिर से गीलापन महसूस करने लगी।
उसका मन किया कि वह उसे छूकर देखे।
कल रात गुस्से, धुंधली आँखों से वह ठीक से देख भी नहीं पाई थी। मगर आज सब कुछ सामने था, बिल्कुल साफ आँखों के सामने, इसे झूठलाया भी नहीं जा सकता था.
कामिनी की सांसे थमने को थी, हाँथ कांप रहे थे, उसका जिस्म उस से कुछ कह रहा था, बहार साय साय कर हवा चलती ही जा रही थी.
लेकिन असल मे ये कामिनी के जिस्म और मनचले दिल मे उठते तूफान की आवाज़ थी.
*******************-



स्टोर रूम में एक अजीब सी, भारी खामोशी थी। बाहर हो रही बारिश की रिमझिम अब धीमी पड़ चुकी थी, लेकिन कामिनी के मन का तूफ़ान अपनी चरम सीमा पर था।
दीवार पर टंगा पीला बल्ब अपनी मद्धम रोशनी में उस छोटे से कमरे को एक तिलिस्मी दुनिया बना रहा था—एक ऐसी दुनिया जो घर के नियमों, समाज के दायरों और एक 'इज़्ज़तदार बहू' की मर्यादाओं से कोसों दूर थी।

कामिनी खटिया के पास खड़ी थी। उसके हाथ में गाजर के हलवे की कटोरी थी, जो अब ठंडी हो रही थी। लेकिन कामिनी का जिस्म? वह किसी भट्टी की तरह तप रहा था।
सामने खटिया पर रघु बेसुध पड़ा था।
उसका सांवला, पसीने और बारिश के पानी से भीगा हुआ बदन खटिया पर ऐसे निढाल था जैसे कोई युद्ध हार चुका योद्धा हो। उसके मुंह से शराब की तीखी और सड़ी हुई गंध आ रही थी, जो कमरे की सीलन भरी हवा में मिल गई थी।
आमतौर पर, किसी भी सभ्य औरत को इस गंध से उबकाई आ जाती। कामिनी को भी आनी चाहिए थी। लेकिन आज... आज यह गंध उसे किसी महंगे इत्र से ज्यादा मादक लग रही थी।

यह 'मर्दानगी' की गंध थी—कच्ची, जंगली और बिना किसी बनावट के।
कामिनी की नज़रों ने रघु के जिस्म का मुआयना किया।
चौड़ा सीना, जिस पर काले बाल उगे थे, सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था।
उसका पेट, जो लुंगी की ढीली गांठ के कारण आधा नंगा था।
और उसके नीचे... वह गीली लुंगी, जो उसके पैरों के बीच के हिस्से को किसी रहस्य की तरह छुपाए हुए थी।
कामिनी के दिमाग में द्वंद्व चल रहा था। एक तरफ उसका 'अहंकार' था—कि वह मालकिन है और यह नौकर। दूसरी तरफ उसकी 'भूख' थी—जो कल रात इसी नौकर ने जगाई थी।
उसने हलवे की कटोरी पास के एक टूटे हुए स्टूल पर रख दी।
"जानवर कहीं का..." वह बुदबुदायी, लेकिन उसकी आवाज़ में नफरत नहीं, बल्कि एक अजीब सा अपनापन था। "गीले कपड़ों में सो रहा है, बीमार पड़ेगा तो मर जायेगा, यहाँ तेरी लुगाई बैठी है क्या सेवा करने को?"

यह एक झूठ था। एक बहाना था खुद को छूने की अनुमति देने का।
कामिनी धीरे से खटिया के किनारे बैठ गई। पुरानी खटिया 'चर्र' से बोल उठी, लेकिन रघु को कोई होश नहीं था।
कामिनी ने अपना कांपता हुआ हाथ आगे बढ़ाया। उसकी उंगलियों ने रघु की कमर पर बंधी गीली लुंगी की गांठ को छुआ।
कपड़ा गीला और ठंडा था, लेकिन उसे छूते ही कामिनी की उंगलियों में एक गरम लहर दौड़ गई।
उसने गांठ को खींचा।
वह खुल गई।
लुंगी की पकड़ ढीली पड़ते ही कामिनी ने उसे धीरे-धीरे नीचे सरका दिया।

जैसे ही कपड़ा हटा, कामिनी की आँखें फटी रह गईं।
रघु का नंगापन उसके सामने था।
उसकी बाईं जांघ पर, काले घने बालों के जंगल के बीच, उसका लंड एक तरफ लुढ़का हुआ पड़ा था।

उसमें वह 'अकड़' नहीं थी जो कल रात थी।
कामिनी की सांसें भारी होने लगीं। उसका सीना गाउन के अंदर ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे होने लगा।
उसके दिमाग में तुलना शुरू हो गई।
सुबह उसने रवि का 'गुलाबी, गोरा और सुडौल' लंड देखा था। वह सुंदरता की मूरत था।
और अभी वह रघु का 'काला, खुरदरा और जंगली' अंग देख रही थी। यह ताकत का प्रतीक था।
उसकी चूत, जो रवि के स्पर्श से पहले ही गीली थी, अब इस नज़ारे को देखकर और भी ज्यादा रस छोड़ने लगी।
कामिनी का हाथ खुद-ब-खुद आगे बढ़ा।
उसने रघु के शांत लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया।
वह नरम था, लचीला था।
कामिनी उसे सहलाने लगी।20231129-101055उसने अपने अंगूठे से उसके सुपारी के ऊपर चढ़ी चमड़ी को पीछे करने की कोशिश की।
"उठ ना... जाग ना..." कामिनी मन ही मन फुसफुसा रही थी। "कल तो बड़ा शेर बन रहा था... आज क्या हुआ?"
वह उसे पंप करने लगी, सहलाने लगी।

लेकिन रघु इतनी गहरी शराब के नशे में था कि उसके शरीर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उसका लंड कामिनी के हाथ में एक बेजान मांस के टुकड़े की तरह झूल रहा था।
कामिनी को झुंझलाहट होने लगी।
उसे अभी, इसी वक़्त राहत चाहिए थी।

रवि ने छत पर और डाइनिंग टेबल के नीचे उसे जिस मुकाम पर छोड़ा था, वहां से वापस लौटना नामुमकिन था। उसके जिस्म का हर रेशा चीख-चीख कर 'संतुष्टि' मांग रहा था।
लेकिन रघु का यह बेजान अंग उसकी मदद नहीं कर पा रहा था।
"धत्त तेरे की..." कामिनी ने गुस्से में उसे छोड़ दिया।
निराशा और कामवासना के मिश्रण ने उसकी आँखों में आंसू ला दिए। वह जल रही थी, और पानी का स्रोत (रघु) सूखा पड़ा था।

रघु ने नशे में अपना मुंह खोला। उसके होंठ पपड़ी की तरह सूखे हुए थे।
वह नींद में बड़बड़ाया—
"पानी... पानी... बहुत प्यास लगी है... गला सूख रहा है..."
उसकी आवाज़ फटी हुई थी, दर्द भरी थी। शराब ने उसके हलक को रेगिस्तान बना दिया था।
रघु की यह मांग— 'पानी'—सुनकर कामिनी के दिमाग में एक बिजली सी कौंधी।
पानी?
उसने अपनी टांगों के बीच महसूस किया।
वहां तो सैलाब आया हुआ था।
रवि की उंगलियों ने, छत की बारिश ने और अब इस नंगेपन ने उसके मूत्राशय (Bladder) पर भी दबाव बना दिया था।
सेक्स की उत्तेजना और पेशाब का दबाव—ये दोनों मिलकर कामिनी के निचले हिस्से में एक मीठा लेकिन असहनीय दर्द पैदा कर रहे थे।
उसे बहुत ज़ोरों की लगी थी।
उसका पेट का निचला हिस्सा (Lower abdomen) फटने को था।
और सामने रघु 'पानी' मांग रहा था।
कामिनी के चेहरे पर एक शैतानी, विकृत मुस्कान तैर गई।
यह मुस्कान उस 'कामिनी' की नहीं थी जो पूजा करती थी, यह उस 'कामिनी' की थी जो अपनी हदों को पार कर चुकी थी।
'तुझे पानी चाहिए? प्यास लगी है तुझे?' उसने मन ही मन सोचा।
'मैं पिलाऊंगी तुझे पानी... ऐसा पानी जो तेरी रूह तक को तृप्त कर देगा। मेरी जवानी का रस, मेरी गर्मी, मेरा सब कुछ...'
उसने एक पल के लिए भी नहीं सोचा।
नैतिकता? संस्कार? वो सब तो दरवाज़े के बाहर छूट गए थे।
कामिनी खटिया पर घुटनों के बल खड़ी हो गई।
उसने अपने दोनों हाथों से अपने सूती गाउन को पकड़ा और एक झटके में उसे अपनी कमर तक ऊपर चढ़ा लिया।
अंधेरे कमरे में उसकी नंगी जवानी चमक उठी।
उसकी चूत... वह किसी पके हुए फल की तरह सूजी हुई थी। उसके दोनों होंठ (Lips) खुले हुए थे और उनमें से काम-रस की बूंदें टपक रही थीं। जांघों पर पानी की लकीरें बनी हुई थीं।
कामिनी की साफ चिकनी चुत चमक उठी थी, चुत को इस कद्र चमकता देख कोई भी कह सकता था की उसकी मनसा क्या है?

कामिनी रघु के सिरहाने की तरफ बढ़ी।
उसने रघु के चेहरे के दोनों तरफ अपने पैर जमाए।
एक पैर रघु के बाएं कान के पास, दूसरा दाएं कान के पास।

अब वह रघु के चेहरे के ठीक ऊपर थी। उसकी विशाल, गीली और टपकती हुई योनि रघु की नाक से महज कुछ इंच ऊपर हवा में लटक रही थी।

रघु की सांसों की गर्म हवा सीधा कामिनी की चूत पर लग रही थी, और कामिनी की उत्तेजना की गंध रघु की नाक में भर रही थी।
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कामिनी वहाशहीपन की हद पर आ गई थी, जो उसका पति उसे देता था, आज वो रघु को देने जा रही थी, यही तो कर्म का सिद्धांत है, करता कोई है, भरना किसी को पड़ता है,

कामिनी ने धीरे-धीरे अपनी कमर नीचे की।
वह बैठने जा रही थी—रघु के मुंह पर। उसका डर, उसका संस्कार, उसका घरेलू औरत होना ये सब भाव खत्म हो गए थे, वो इस समय वो प्यासी औरत थी जो किसी प्यासे की प्यास बुझाने का पुण्य काम करने जा रही थी.
प्यास भी अजीब चीज है...

धप... पच.... फूरररर.....
कामिनी ने अपनी भारी गांड और अपनी गीली चूत को सीधा रघु के मुंह पर टिका दिया।
उसकी चूत के गीले खुले हुए होंठ रघु के सूखे होंठों पर फिट हो गए।
जैसे ही वह बैठी, रघु के चेहरे की हड्डी और उसकी नाक कामिनी की नरम मांसल गुफा में धंस गई.
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रघु, जो पानी मांग रहा था, उसे अचानक अपनी नाक और मुंह पर एक गरम, गीला और भारी दबाव महसूस हुआ।
"उफ्फ्फ्फ..." कामिनी ने आंखें बंद कर लीं और सिर पीछे झुका दिया।
रघु के गालों की खुरदरी दाढ़ी उसकी जांघों की कोमल त्वचा को छील रही थी। यह दर्द उसे और भी उत्तेजित कर रहा था।

उसने अपने वजन से रघु का मुंह पूरी तरह ढक दिया था। अब रघु को सांस लेने के लिए कामिनी की चूत के अंदर से हवा खींचनी पड़ रही थी।
रघु की नाक पूरी तरह से कामिनी की योनि-दरार (Cleft) में दबी हुई थी।
वह कामिनी की कस्तूरी जैसी गंध—जिसमें पसीना, काम-रस और हल्का सा पेशाब का अहसास था—को अपनी सांसों में भर रहा था।
रघु के होंठों पर गीलापन लगा।
नींद में, प्यास से तड़पते हुए रघु के अवचेतन मन (Subconscious mind) ने इसे 'पानी' या कोई 'गीला फल' समझा।
उसकी जीभ प्रतिक्रिया स्वरूप बाहर निकली।
लप... लापक... लपाक...
रघु की जीभ बाहर निकली और उसने कामिनी की चूत के बाहरी हिस्से को चाटा।
"सीईईईई.... आअह्ह्ह...."
कामिनी का पूरा शरीर कमान की तरह तन गया। एक बिजली का झटका उसकी रीढ़ की हड्डी से होता हुआ उसके दिमाग तक पहुंचा।
रघु की जीभ खुरदरी थी, एक जानवर की तरह।
वह खुरदरापन कामिनी की अति-संवेदनशील (Hypersensitive) चूत को किसी रेगमाल की तरह रगड़ रहा था।
रघु चाटने लगा।
चप-चप-चप... लप लप लप...
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वह प्यासा था, वह उस रस को पीने की कोशिश कर रहा था जो कामिनी की चूत से बह रहा था।
उसकी जीभ अब रास्ता ढूंढती हुई कामिनी की योनि के अंदर घुसने की कोशिश कर रही थी।

कामिनी पागल हो रही थी।
उसने अपने दोनों हाथों से अपने भारी स्तनों को गाउन के ऊपर से ही दबोच लिया। वह उन्हें बुरी तरह मसल रही थी, नोच रही थी।

वह अपनी कमर को रघु के चेहरे पर गोल-गोल घुमाने लगी (Grinding)।
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वह चाहती थी कि रघु की जीभ और अंदर जाए... और अंदर...
"हाँ रघु... चाट... अपनी मालकिन को चाट... पी ले मेरी गंदगी..." वह नशे में बड़बड़ा रही थी। "तुझे प्यास लगी है ना? मैं बुझाउंगी तेरी प्यास..."

रघु की जीभ अब लगातार कामिनी के 'क्लिटोरिस' (Clitoris) और पेशाब के रास्ते (Urethra) को टटोल रही थी।
कामिनी की उत्तेजना अब बर्दाश्त से बाहर हो गई थी।
उसका मूत्राशय (Bladder) अब और एक सेकंड भी इंतज़ार नहीं कर सकता था।
रवि का दिया हुआ नशा, रघु की खुरदरी जीभ और सालों की दबी हुई हवस—सब एक साथ विस्फोट होने को तैयार थे।
कामिनी का बदन अकड़ गया।
उसने रघु के बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया और उसका सिर अपनी चूत में और कसकर दबा दिया।15761394
"उफ्फ्फ्फ.... ले पी ले..... पी ले मेरा अमृत....."
और इसके साथ ही, कामिनी के जिस्म ने अपना नियंत्रण छोड़ दिया।
उसकी पेशाब की थैली का वाल्व खुल गया।
सर्रर्रर्रर्र.....
एक तेज़, गर्म और दबावपूर्ण धार कामिनी के जिस्म से निकली।
सीधा रघु के खुले हुए मुंह के अंदर।
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यह बूंद-बूंद नहीं था, यह एक बाढ़ थी।
कामिनी का पेशाब—जो उसकी उत्तेजना की गर्मी से उबल रहा था—सीधा रघु के गले में उतरने लगा।
रघु, जो प्यास से मर रहा था, उसे लगा जैसे स्वर्ग से कोई धारा उसके मुंह में गिर रही है।
वह नमकीन था, कसैला था, गरम था... लेकिन तरल था।
रघु का गला तर होने लगा।
उसने विरोध नहीं किया। उसका शरीर पानी मांग रहा था, और उसे मिल रहा था।
वह उसे गटकने लगा।
गटक... गटक... गटक...
कामिनी की जांघें थर-थर कांप रही थीं।
उसकी योनि से निकलती हुई वह सुनहरी धारा रघु के गालों से होती हुई, उसकी ठुड्डी से बहती हुई, खटिया पर गिर रही थी। लेकिन उसका अधिकांश हिस्सा रघु के हलक में जा रहा था।

कामिनी को एक ऐसा सुकून मिला जो उसे आज तक किसी संभोग में नहीं मिला था।
यह सिर्फ जिस्म का हल्का होना नहीं था, यह उसकी आत्मा का हल्का होना था।
उसने अपने अंदर की सारी गंदगी, सारी शर्म, सारी हया उस शराबी, दो कोड़ी के आदमी के मुंह में त्याग दी थी।25624943

उसे एक राक्षसी आनंद आ रहा था।
उसे महसूस हो रहा था कि वह कितनी ताकतवर है। एक मर्द, जो कल रात उस पर हावी था, आज उसकी गंदगी पी रहा है। वह उसे अपने पेशाब से 'पवित्र' कर रही थी, या शायद उसे अपनी तरह 'अपवित्र' बना रही थी।

"पी... पूरा पी जा... एक बूंद मत छोड़ना..." वह सिसक रही थी, हाफ रही थी।
करीब 30-40 सेकंड तक वह धारा बहती रही।
रघु लगातार उसे पीता रहा, चाटता रहा। उसकी जीभ अब उस पेशाब की धारा के बीच में लपलपा रही थी।
कामिनी के पेट का भारीपन खत्म हो गया, उसकी जलन शांत हो गई।

धीरे-धीरे धारा कम हुई और बूंदों में बदल गई।
कामिनी अभी भी रघु के मुंह पर बैठी थी।
उसका शरीर पसीने से लथपथ था। उसकी चूत अब भी रघु के मुंह से चिपकी हुई थी, आखिरी कतरे निचोड़ रही थी।
रघु अब शांत हो गया था। शायद उसकी प्यास बुझ गई थी। वह फिर से गहरी नींद में जाने लगा था, उसके मुंह में कामिनी का स्वाद भरा हुआ था।
कामिनी ने एक गहरी, लंबी सांस ली।
"हम्म्म्म्म....."
उसने धीरे से अपनी कमर उठाई।
एक 'चप' की आवाज़ के साथ उसकी चूत रघु के गीले मुंह से अलग हुई।
उसने नीचे देखा।
रघु का चेहरा गीला था, उसके होंठों पर कामिनी के पेशाब की चमक थी।
कामिनी ने अपनी उंगली से रघु के होंठों पर लगे उस तरल को पोंछा और अपनी जीभ से चाट लिया।
नमकीन। अपना ही स्वाद।

उसने ऐसा क्यों और कैसे किया उसे खुद नहीं पता, या फिर ये जिस्म के शांत होने का उन्माद था जिस वजह से कामिनी ये गंदी हरकत कर गई.


उसे कोई घिन नहीं आई। उसे गर्व महसूस हुआ।
उसने अपना गाउन नीचे किया।
मेज़ पर रखा गाजर का हलवा अब पूरी तरह ठंडा हो चुका था और बेमानी लग रहा था।
कामिनी ने हलवे की कटोरी को उठा लिया,
"मैडम गाजर का हलवा तो मुझे भी बहुत पसंद है "
जाती हुई कामिनी के जहन मे याकायाक दिन मे कहे गए रघु के शब्द गूंज उठे.
"अच्छा तो तुझे हलवा भी खाना है "
कामिनी रघु की और पलट के मुस्कुरा दी,
इंसान की दबी हुई वासना, इच्छा कब विकृत रूप ले लेती है, इसका उदाहरण है कामिनी.

क्रमशः......



 
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