Gorgeous Ridhimaa
रिद्धिमा ✨
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Super duperUpdate 11
जब हम दोनों घर के भीतर दाखिल हुए, तो देखा कि मेरे पति पहले से ही वापस आ चुके थे। वे लिविंग रूम में बहुत बेचैनी से चक्कर काट रहे थे। जैसे ही उन्होंने दरवाजा खुलने की आवाज सुनी, वे तुरंत हमारी तरफ झपटे। उनके चेहरे पर रात भर की चिंता और फिक्र साफ दिखाई दे रही थी।
"अरे! तुम दोनों ठीक तो हो ना?" उन्होंने आगे बढ़कर पहले गोलू के दोनों कंधे पकड़े और उसे ऊपर से नीचे तक देखा। "रात भर से मैं तुम दोनों को फोन लगाने की कोशिश कर रहा था, पर शहर में नेटवर्क पूरी तरह ठप था। टीवी पर जलभराव की खबरें देख-देखकर मेरी जान हलक में अटकी हुई थी! कोई परेशानी तो नहीं हुई ना तुम लोगों को?"
"नहीं पापा, हम बिल्कुल ठीक हैं। रात को पानी बहुत ज्यादा बढ़ गया था, इसलिए आप ने कहा वैसे हम पास के ही एक होटल में कमरा लेकर रुक गए थे," गोलू ने बहुत ही सामान्य और शांत आवाज में जवाब दिया। रात के बारे में सोच मेरे अंदर एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
तभी मेरे पति की नजर पूरी तरह मुझ पर पड़ी। वे वहीं के वहीं ठिठक गए और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वे बहुत हैरान थे। उन्होंने मुझे आज से पहले कभी ऐसे कपड़ों में नहीं देखा था। मेरी वह सफेद शॉर्ट ड्रेस, जो मेरे घुटनों तक आ रही थी, वह रात भर भीगने और फिर सूखने के बाद मेरे जिस्म के सारे उभारों को बहुत ही कामुक तरीके से उभार रही थी। अपने जवान बेटे के सामने पति की ऐसी हैरान और भूखी नजरें देखकर मैं शर्म से पूरी तरह पानी-पानी हो रही थी।
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"रिद्धिमा... यह... यह कैसी ड्रेस पहनी है तुमने?" उन्होंने थोड़े अचरज और दबी हुई चाहत से पूछा।
मैंने अपनी नजरें नीचे झुका लीं और अपनी उंगलियों को आपस में भींचते हुए शर्मा कर कहा, "वो... कल पिक्चर देखने गए थे ना, तो मॉल में गोलू ने ज़िद करके ये ड्रेस दिला दी थी। फिर रास्ते में इतनी तेज बारिश हुई कि साड़ी पूरी खराब हो गई, इसलिए होटल में मुझे यही पहननी पड़ी।"
"अच्छा-अच्छा, चलो भगवान का शुक्र है कि तुम दोनों सही-सलामत घर लौट आए," उन्होंने राहत की सांस ली, लेकिन उनकी नजरें अभी भी मेरी खुली जांघों और छाती के उभार पर ही टिकी हुई थीं। "तुम दोनों जाओ, फ्रेश हो जाओ। मैं किचन में चाय बनाता हूँ।"
मैं बिना कुछ कहे तुरंत अपने बेडरूम की तरफ बढ़ गई और मेरे पति भी मेरे पीछे-पीछे कमरे के अंदर आ गए। जैसे ही बेडरूम का दरवाजा बंद हुआ, कमरे के सन्नाटे में उनकी मदहोशी साफ नजर आने लगी। इस शॉर्ट ड्रेस में मुझे देखकर वे खुद पर बिल्कुल भी काबू नहीं रख पा रहे थे।
इस ड्रेस की सबसे बड़ी खासियत इसकी सामने लगी वह सुनहरी चेन थी। यह चेन छाती के ऊपर से शुरू होकर घुटनों तक जाती थी, जिसे अगर बीच से एक बार खींच दिया जाए, तो आगे से पूरी ड्रेस दो हिस्सों में खुलकर सीधे फर्श पर गिर सकती थी।
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उन्होंने बिना एक पल गंवाए, पीछे से आकर मुझे अपनी मजबूत बाहों में कस लिया। उनके होंठ मेरी गर्दन के पास आए, जहाँ कल रात गोलू ने चूमा था। "रिद्धिमा... तुम इस कपड़े में किसी अप्सरा जैसी लग रही हो, मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ," उन्होंने हांफते हुए कहा। उनके हाथ धीरे से मेरी छाती के बीचो-बीच लगी उस सुनहरी चेन की तरफ बढ़ गए और वे उसे धीरे-धीरे नीचे सरकाने लगे।
एक तरफ मेरे सीने पर कल रात अपने बेटे के साथ गुजारे उस गहरे राज का बोझ था, और दूसरी तरफ अपने पति की इस उतावली छुअन से मेरा पूरा बदन एक अनजाने खौफ और गहरी उत्तेजना से कांपने लगा था।
जैसे ही मेरे पति की उतावली उंगलियों ने मेरी छाती के बीचो-बीच लगी उस सुनहरी चेन को पकड़ा, कमरे के भीतर का सन्नाटा और भारी हो गया। उन्होंने हल्के से दबाव के साथ जिप को नीचे की तरफ खींचना शुरू किया। 'सर्रर्र...' की उस बारीक आवाज के साथ ही मेरी शॉर्ट ड्रेस आगे से दो हिस्सों में अलग होने लगी।
जैसे-जैसे चेन नीचे सरक रही थी, वैसे-वैसे कमरे की ठंडी हवा सीधे मेरे स्तनों के बीच की गोरी दरार, मेरे पेट और फिर नीचे मेरी नाभि को छूने लगी। उस छुअन से मेरे पूरे बदन के रोएं खड़े हो गए। मेरे पति की सांसें अब पूरी तरह से हांफने लगी थीं। उन्होंने एक झटके में पूरी ड्रेस को मेरे कंधों से नीचे सरका दिया। वह सफेद कपड़ा सरक कर सीधे नीचे फर्श पर जा गिरा। अब मैं उनके सामने पूरी तरह बेपर्दा, सिर्फ अपने छोटे से अंतःवस्त्रों में खड़ी कांप रही थी।
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"रिद्धिमा...! तुम... तुम सच में कमाल लग रही हो। इस रूप में तुम्हें देखकर मैं खुद पर काबू नहीं रख पा रहा हूँ," उन्होंने मदहोश होकर कहा। उनकी आँखें मेरी खुली जांघों और पेट के उतार-चढ़ाव को भूखी नजरों से निहार रही थीं।
उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर मुझे अपनी मजबूत बाहों में भींच लिया और सीधे किंग-साइज बेड पर ले जाकर गिरा दिया। बेड के गद्दे पर गिरते ही मेरी आँखें छत की तरफ टिक गईं, लेकिन मेरा दिमाग अभी भी कल रात की उस बंद होटल के कमरे की यादों में ही भटका हुआ था। मेरे पति बिना एक पल गंवाए मेरे ऊपर आ गए। उनके होंठ मेरी गर्दन और गले पर आकर टिक गए और वे पागलों की तरह चूमने लगे। वे ठीक उसी जगह पर अपने होंठ रगड़ रहे थे, जहाँ कल रात गोलू के जवां और गर्म होंठों ने मुझे अंदर तक तड़पाया था।
"सुनो ना..." मैंने अपने कांपते हाथों को उनके सीने पर रखते हुए बहुत ही धीमी आवाज में कहा, "अभी... अभी सुबह-सुबह... गोलू पास में ही होगा कमरे में। अगर उसे कुछ आवाज आई तो...?"
"अरे, नही जायगी आवाज, तुम उसकी चिंता मत करो," उन्होंने हांफते हुए कहा और अपने हाथों से मेरे बचे-कुचे कपड़ों को भी बदन से पूरी तरह अलग कर दिया।
अब मैं बेड की सफेद चादर पर पूरी तरह नग्न लेटी हुई थी, ठीक उसी हालत में जैसी कुछ घंटों पहले अपने जवान बेटे के सामने लेटी थी। जब मेरे पति ने मुझसे जुड़ने की तैयारी की और पूरी ताकत से मेरे भीतर समाए, तो उस छुअन और दबाव के साथ ही मेरे दिमाग में अचानक एक बहुत बड़ा झटका लगा।
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मेरे पति का अंग हमेशा की तरह बिल्कुल सामान्य और जाना-पहचाना था, लेकिन मेरा मन चाहकर भी कल रात के उस विराट अहसास से इसकी तुलना करने से खुद को रोक नहीं पाया। कल रात जब गोलू का वह बेहद बड़ा, काला और भयानक रूप से मोटा लिंग एक झटके में बिजली कड़कने पर मेरे भीतर उतरा था, तो उसने मेरी योनि की एक-एक दीवार को भीतर तक पूरी तरह झकझोर कर रख दिया था। उस गहराई और मोटाई का जो तीखा, भारी और मखमली दर्द से भरा अहसास मेरे बदन में घर कर गया था, उसके सामने आज मुझे अपने ही पति की यह छुअन बहुत ही अधूरी, छोटी और कम महसूस हो रही थी।
"उफ़्फ़... रिद्धिमा! आज तुम अंदर से इतनी गर्म क्यों हो रही हो? तुम्हारी पकड़ इतनी कसी हुई क्यों है आज?" मेरे पति ने मेरी जांघों को और ऊपर उठाते हुए गहरी सांस लेकर पूछा। वे पूरी तरह दीवाने हो रहे थे। उन्हें लग रहा था कि उनका यह रूप मुझे उत्तेजित कर रहा है, लेकिन सच तो यह था कि मेरे कानों में इस वक्त भी गोलू की वह मासूम आवाज गूंज रही थी, "मम्मी, यह अंदर से काफी कमाल का है... मुझे बस ऐसे ही आपके अंदर रहना है।"
अपने ही बेटे के उस बड़े लिंग के विचार ने मेरे भीतर के पापबोध और कामुकता दोनों को एक साथ चरम सीमा पर पहुँचा दिया। एक तरफ मुझे एक माँ होने के नाते अपनी इस सोच पर घोर शर्म आ रही थी, मेरी आँखों के कोने से एक आंसू फिसल कर तकिए पर गिर गया, लेकिन दूसरी तरफ उस भारी और मोटे अंग की याद मात्र से मेरी योनि के भीतर की प्राकृतिक नमी और गर्मी इस कदर बढ़ गई कि मेरे मुंह से एक तीखी सिसकारी निकल गई, "आह्ह्ह... हां... सुनिए... उफ़्फ़...!"
मैं अपने पति की बाहों में कसती चली गई, उनके हर प्रहार को झेलती रही, लेकिन मेरा पूरा वजूद, मेरी आत्मा और मेरा यह कामुक बदन कल रात के उस मखमली, काले और भारी अहसास के साए में पूरी तरह से डूब चुका था। मैं बिस्तर पर पति के साथ थी, लेकिन मेरी तृप्ति और मेरा अहसास पूरी तरह से मेरे जवान बेटे की मर्दानगी का गुलाम बन चुका था।
मेरे पति पूरी तरह मदहोश हो चुके थे। वे अपनी ही धुन में मेरे बदन पर लगातार प्रहार कर रहे थे, लेकिन मेरा मन इस कमरे से कोसों दूर, कल रात की उस तूफानी बारिश और होटल के उस बिस्तर पर अटका हुआ था। हर बीतते पल के साथ जब मुझे अपने भीतर वह अधूरापन महसूस हो रहा था, तो मेरी दीवानगी और मानसिक कशमकश बढ़ती ही जा रही थी।
बिस्तर की चादर मेरे हाथों की उंगलियों में कसती जा रही थी। मेरे पति ने हांफते हुए अपना चेहरा मेरे चेहरे के करीब लाया, उनकी सांसें गर्म थीं, "रिद्धिमा... तुम आज खोई हुई क्यों हो? तुम्हारी आँखें बंद हैं, लेकिन तुम यहाँ नहीं हो..."
"नहीं... ऐसा कुछ नहीं है..." मैंने झूठ बोलते हुए अपनी गर्दन को दूसरी तरफ घुमा लिया, लेकिन ठीक उसी पल मेरे दिमाग में कल रात का वह दृश्य कौंध गया जब बिजली कड़की थी और गोलू का वह भारी, मोटा अंग मेरे भीतर गहराई तक धंस गया था। उस गहरे तीखे अहसास की याद इतनी तीव्र थी कि मेरे मुंह से नियंत्रण खो गया।
"उफ़्फ़... आह्ह... गोलू...!" मेरे मुंह से अचानक एक तीखी सिसकारी के साथ यह नाम निकल गया।
कमरे में जैसे सन्नाटा पसर गया। मेरे पति जो पूरी रफ्तार में थे, अचानक वहीं के वहीं ठिठक गए। उनके बदन की हरकत रुक गई और उन्होंने अपनी आँखें सिकोड़कर बेहद हैरानी और शक से मेरी तरफ देखा।
"क्या? तुमने अभी किसका नाम लिया, रिद्धिमा?" उनके लहजे में अचरज और गुस्सा साफ था, "तुम इस वक्त गोलू का नाम क्यों ले रही हो?"
मेरा दिल जैसे गले में आ गया। पकड़े जाने के डर से मेरे पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। मैंने तुरंत अपनी आँखें खोलीं और चेहरे पर घबराहट को छुपाते हुए एक झूठी मुस्कान लाने की कोशिश की।
"वो... वो एक्चुअली..." मैंने हकलाते हुए तुरंत बात बनाई, "मैं... मैं डर गई थी। मुझे लगा बाहर लिविंग रूम में गोलू के पैर की आवाज आई। कहीं वो पानी लेने के लिए हमारे कमरे की तरफ तो नहीं आ रहा? बस... बस इसी फिक्र में मेरे मुंह से उसका नाम निकल गया। मैं डर गई थी कि कहीं वो हमें इस हालत में ना देख ले।"
मेरे पति ने कुछ सेकंड तक मेरी आँखों में गहराई से देखा, जैसे वे मेरे झूठ को पकड़ने की कोशिश कर रहे हों। लेकिन मेरी घबराई हुई सूरत देखकर उन्हें लगा कि शायद एक माँ होने के नाते मैं वाकई अपने जवान बेटे की मौजूदगी से असहज थी।
"तुम भी ना... इस वक्त भी तुम्हें बच्चों की फिक्र सता रही है," उन्होंने थोड़ा चिढ़ते हुए कहा। उनके चेहरे पर एक अजीब सा गुस्सा और अधिकार की भावना आ गई। जैसे ही वह नाम उनके कानों में पड़ा, उनकी आँखों में एक अलग ही जुनून सवार हो गया। ऐसा लग रहा था मानो वे आज अपने ही बेटे के अनजाने साए से मुकाबला कर रहे हों और यह साबित करना चाहते हों कि इस बदन पर, अपनी पत्नी पर सिर्फ और सिर्फ उनका हक है।
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उन्होंने मेरी जांघों पर अपनी पकड़ को और मजबूत किया और पहले से कहीं ज्यादा तेज रफ्तार में आ गए। उनके प्रहार अब उतावले और आक्रामक हो चुके थे। "रिद्धिमा... तुम सिर्फ मेरी हो... सिर्फ मेरी...!" उन्होंने हांफते हुए मेरे कान के पास फुसफुसाया।
वे पूरी ताकत से मेरे भीतर समाते रहे, लेकिन उनके इस तेज और भारी घर्षण के बावजूद मेरा मन पूरी तरह सुन्न था। मेरे बदन को वह गहराई और तृप्ति नहीं मिल रही थी जिसकी लत कल रात गोलू के उस भारी और मोटे अंग ने लगा दी थी। पति की यह रफ्तार मुझे अंदर से बिल्कुल खाली महसूस करा रही थी।
कुछ ही मिनटों की उस आक्रामक हलचल के बाद, मेरे पति अपने चरम पर पहुँच गए। उन्होंने एक गहरी कराह भरी और अपने शरीर का पूरा भार मेरे ऊपर डालते हुए, अपना सारा गर्म पानी मेरे भीतर गहराई में छोड़ दिया। उनका काम पूरा हो चुका था और वे पूरी तरह शांत होकर हांफ रहे थे।
लेकिन मैं? मैं इस चरम के बाद भी पूरी तरह अधूरी, प्यासी और अतृप्त खड़ी थी। मेरे भीतर की वह तड़प वैसी ही बनी हुई थी। लेकिन अपने पति को संतुष्ट और खुश देखने के लिए मैंने तुरंत नाटक करना शुरू कर दिया। मैंने अपनी आँखें बंद कीं, झूठी सिसकारियाँ लीं और अपनी बाहों को उनके गले में डालकर ऐसा ढोंग किया जैसे मैं भी उनके साथ पूरी तरह तृप्त हो चुकी हूँ।
"उफ़्फ़... आप तो आज बहुत जल्दी में थे..." मैंने हांफने का नाटक करते हुए उनके सीने पर अपना सिर रख दिया।
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वे मुस्कुराए और मेरी पेशानी को चूमते हुए बेड की दूसरी तरफ लुढ़क गए। कुछ ही देर में उनकी आँखें लग गईं और वे गहरी नींद में सो गए। लेकिन मैं उस ठंडे कमरे में चादर के भीतर अकेली लेटी रही। मेरी शारीरिक प्यास अधूरी थी, और मुझे अब साफ समझ आ चुका था कि मेरे भीतर लगी इस आग को अब मेरे पति का यह साधारण रूप कभी शांत नहीं कर पाएगा। इसे शांत करने की ताकत सिर्फ मेरे बेटे के पास ही थी।
Congratulations bhout hi badhiya start hai.Update 01
रात की वह घटना मेरे लिए जितनी खुबसूरत थी, उतनी ही घबराहट से भरी भी थी। उस रात मेरे पति हमेशा से कहीं ज़्यादा उत्तेजित और आक्रामक हो रहे थे। कमरे में पूरी तरह अंधेरा था, और वे बिना समय गंवाए मुझ पर पूरी तरह हावी हो चुके थे। उनका हर एक वार इतना गहरा और तेज़ था कि मैं चाहकर भी खुद पर काबू नहीं रख पा रही थी। एक अजीब सा मीठा दर्द मेरे पूरे बदन में दौड़ रहा था। मेरे मुंह से लगातार तेज़ सिसकारियां और कराहने की आवाज़ें निकल रही थीं। बिस्तर की चादरें सिकुड़ चुकी थीं, और उनकी बेतहाशा रफ़्तार की वजह से लकड़ी का वह भारी पलंग भी बार-बार दीवार से टकराकर आवाज़ कर रहा था। मैं पूरी तरह होश खो चुकी थी और समझ नहीं पा रही थी कि यह सब बगल के कमरे तक जा सकता है।
अगली सुबह, जब पति हमेशा की तरह अपने काम के लिए घर से निकल गए, तब मैं रसोई में चाय बना रही थी। तभी मेरा बेटा धीरे से मेरे पास आकर खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर अजीब सी मासूमियत और थोड़ी चिंता थी। उसने सीधे मेरी आँखों में देखा और पूछा, "मम्मी, कल रात आप रो क्यों रही थी? पापा आपको मार रहे थे क्या?"
उसका यह सवाल सुनते ही मानो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मेरे हाथ का चमचा वहीं रुक गया और धड़कनें एकदम तेज़ हो गईं। शर्म के मारे मेरा चेहरा लाल हो गया और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इस नादान लड़के को क्या जवाब दूँ।
बेटे का यह सीधा सवाल सुनकर मेरे बदन में जैसे बिजली दौड़ गई। मैंने तुरंत अपनी आँखें नीचे कर लीं और गैस की आँच को धीमा करने का बहाना बनाने लगी, ताकि वह मेरे चेहरे पर फैली घबराहट और शर्म को न पढ़ सके। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे डर था कहीं उसकी आवाज़ उसे सुनाई न दे जाए।
मैंने खुद को संभालते हुए झूठी मुस्कान के साथ कहा, "नहीं बेटा, ऐसा कुछ नहीं है। पापा क्यों मारेंगे मुझे? वो तो बस... कल रात मेरे पैर में अचानक बहुत तेज़ नस चढ़ गई थी, इसलिए दर्द के मारे मेरे मुँह से आवाज़ निकल रही थी। तुम जाओ, जाकर अपनी पढ़ाई करो।"
लेकिन मेरा बेटा वहीं खड़ा रहा। उसने अपने कदम पीछे नहीं हटाए। उसकी निगाहें लगातार मेरे चेहरे पर टिकी हुई थीं, जैसे वह समझ चुका था कि मैं कुछ छुपा रही हूँ। उसने धीरे से आगे बढ़कर मेरे काँपते हुए हाथ को थाम लिया। उसके हाथ का स्पर्श इस बार थोड़ा अलग और गहरा था।
वह थोड़ा करीब आया और धीमी, गंभीर आवाज़ में बोला, "मम्मी, मैं बच्चा नहीं हूँ। मैंने सब सुना है। पलंग के टकराने की आवाज़ें, आपके रोने और हाँफने की आवाज़... वह पैर दर्द का रोना नहीं था। मुझे सच-सच बताओ ना, पापा आपके साथ क्या कर रहे थे? आप इतनी ज़ोर-ज़ोर से क्यों कराह रही थीं?"
उसकी इन बातों ने सीधे मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया था। कमरे की उन गुप्त और निजी आवाज़ों का ज़िक्र जब मेरे अपने जवान बेटे के मुँह से इस तरह खुलकर निकला, तो लाज के मारे मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। शर्मिंदगी की एक बेहद गर्म लहर मेरे चेहरे से होते हुए पूरे बदन में उतर गई। मेरे पास उसके इन तीखे और सीधे सवालों का कोई जवाब नहीं था। मैं बस रसोई के स्लैब को पकड़े खड़ी रही, और मेरे और उसके बीच का यह सन्नाटा अब एक बेहद असहज और गहरे तनाव में तब्दील हो रहा था।
रसोई के उस बंद और शांत माहौल में जब मेरे बेटे ने मेरा हाथ और मजबूती से थाम लिया, तो मेरे बदन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। लोक-लाज और मर्यादा का डर एक तरफ था, लेकिन उसकी नज़दीकी से पैदा होने वाली घबराहट मेरे पूरे शरीर को सुन्न कर रही थी। वह धीरे से एक कदम और आगे बढ़ा, जिससे उसकी सांसों की गर्माहट मेरे चेहरे पर महसूस होने लगी।
उसने मेरी आँखों में झांकते हुए बेहद धीमी, गहरी और भारी आवाज़ में कहा, "मम्मी, आप मुझसे अपनी नज़रें क्यों चुरा रही हो? अगर पापा आपको दर्द दे रहे थे, तो मुझे जानने का हक है। कल रात आपकी आवाज़ों में जो तड़प थी, वैसी मैंने पहले कभी नहीं सुनी।"
उसका यह कहना और मेरे हाथ पर उसकी उंगलियों का दबाव बढ़ाना, मेरे भीतर एक अजीब सी कशमकश पैदा कर रहा था। शर्म के मारे मेरा सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगा। मैंने घबराहट में अपना दूसरा हाथ उसके कंधे पर रखा, मानो उसे दूर ढकेलना चाहती हूँ, लेकिन मेरे हाथों में जैसे ताकत ही नहीं बची थी।
मेरी इस बेबसी को देखकर उसने अपना दूसरा हाथ धीरे से मेरी कमर के पास टिका दिया। इस अनपेक्षित स्पर्श ने हमारे बीच के तनाव को और गहरा कर दिया। मर्यादा की दीवारें धुंधली पड़ रही थीं, और उस रसोई के सन्नाटे में हमारी तेज़ चलती सांसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इस मोड़ पर मैं उसे डांटकर दूर करूँ या इस अनजाने खिंचाव के सामने खुद को छोड़ दूँ।
रसोई के उस बेहद असहज और गहरे तनाव को किसी तरह तोड़ने के लिए मैंने अपनी बची-कूची हिम्मत बटोरी। मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी पकड़ से छुड़ाया और घड़ी की तरफ देखते हुए आवाज़ में थोड़ी जल्दबाजी लाने की कोशिश की।
मैंने कहा, "अच्छा ये सब छोड़ो, तुम्हें कॉलेज जाने के लिए देर हो रही है। जल्दी से हाथ-मुँह धोकर आओ, मैं नाश्ता लगाती हूँ।"
वह कुछ और कहना चाहता था, उसकी आँखों में अभी भी कई सवाल तैर रहे थे, लेकिन मेरी इस घबराहट और जल्दबाजी को देखकर वह चुपचाप पीछे हट गया। मैंने बिना वक़्त गंवाए जैसे-तैसे प्लेट में नाश्ता निकाला और उसके सामने रख दिया। उस वक़्त रसोई का सन्नाटा हमारे बीच की अजीब सी कशमकश को और बढ़ा रहा था, पर हम दोनों में से किसी ने भी दोबारा उस विषय पर बात नहीं की।
जब वह तैयार होकर जाने लगा, तो घर के मुख्य दरवाजे के पास आकर रोज़ की तरह रुका। उसकी आँखों की वह भारी नज़दीकी अब फिर से एक मासूम बेटे के प्यार में बदल चुकी थी। उसने हमेशा की तरह आगे बढ़कर मेरे गालों को बेहद प्यार से चूमा। उसकी इस आदत से मेरे भीतर का सारा डर एक पल के लिए शांत हो गया। मैंने भी मुस्कुराते हुए उसके गाल को चूमा और कहा, "अच्छे से जाना और अपना ध्यान रखना।"
जैसे ही वह सीढ़ियों से नीचे उतरा, मैंने तुरंत दरवाज़ा बंद किया और पीठ उससे टिकाकर खड़ी हो गई। एक बहुत लंबी और राहत की साँस मेरे सीने से निकली। मेरा दिल अभी भी तेज़ी से धड़क रहा था, और मुझे समझ आ रहा था कि आज सुबह जो कुछ भी हमारे बीच हुआ, उसने हमारे रिश्ते की एक ऐसी परत को छू दिया था जिसे वापस सामान्य करना अब मेरे लिए एक बड़ी चुनौती होने वाला था।
दरवाजा बंद करने के बाद, मेरे कदम अपने आप बेडरूम की तरफ बढ़ गए। जैसे ही मैंने कमरे के भीतर पैर रखा, रात के उस बेतहाशा मिलन की निशानियां हर तरफ बिखरी पड़ी थीं। पलंग की सफेद चादर पूरी तरह मुड़ चुकी थी और उस पर गुलाब की कटी हुई पंखुड़ियाँ चारों तरफ फैली हुई थीं। हवा में अभी भी उस इत्र की हल्की महक बाकी थी, जो मैंने कल शाम को लगाई थी। यह सब देखकर मेरा पूरा चेहरा शर्म से लाल हो गया।
दरअसल, पिछले कुछ महीनों से मेरे और मेरे पति के बीच एक अजीब सी दूरी आ गई थी। उसी रूखेपन को खत्म करने के लिए कल शाम मैंने खुद अपने हाथों से इस कमरे को सजाया था। मेरा वह तरीका काम भी आया; हम दोनों कई दिनों बाद एक-दूसरे के इतने करीब आए थे। लेकिन उस मिलन की खुशी और उत्तेजना में हम दोनों इस बात को पूरी तरह भूल गए कि अब हमारा बेटा बड़ा हो चुका है और बगल के कमरे में सो रहा है।
मैंने भारी मन और काँपते हाथों से बिस्तर की चादर को ठीक करना शुरू किया। पंखुड़ियों को समेटते हुए मेरे दिमाग में बार-बार वही एक डर आ रहा था कि अगर कॉलेज से लौटने के बाद उसने फिर से वही सवाल पूछ लिया, तो मैं क्या करूँगी? अब मैं उसे पैर दर्द का बहाना बनाकर दोबारा नहीं टाल सकती थी। इस उलझन और घबराहट के बीच मुझे सिर्फ अपनी बड़ी बहन कुसुम की याद आई। वे उम्र में मुझसे बड़ी थीं और ऐसे मामलों में समझदार भी थीं।
मैंने तुरंत अपना फोन उठाया और उनका नंबर मिलाया। जब उन्होंने फोन उठाया, तो पहले तो मैंने सामान्य रूप से घर और बच्चों की बातें कीं, लेकिन मेरी आवाज़ की घबराहट वे भाँप चुकी थीं। आखिर में, अपनी सारी झिझक और शर्म को एक तरफ रखते हुए, मैंने बेहद धीमी आवाज़ में उन्हें सुबह रसोई में हुई वह पूरी बात बता दी। मैंने उनसे पूछा, "दीदी, अब मैं उसे क्या जवाब दूँ? मुझे बहुत डर लग रहा है।"
Update 02
दूसरी तरफ़ से कुसुम दीदी की आवाज़ आई। उनके लहजे में एक शरारती मुस्कान साफ़ झलक रही थी। वह मुझे छेड़ते हुए बोलीं, "क्यों रिधिमा? मेरा आइडिया काम किया कि नहीं? बड़ी ख़ुश होगी तू तो आज!"
मैं उनकी बात सुनकर झट से थोड़ा असहज हो गई। बेड पर बैठते हुए मैंने मोबाइल को थोड़ा और कान से सटाया और धीमे से उन्हें टोका, "दीदी, आप वह सब छोड़िए... मैं इस वक़्त बहुत परेशान हूँ। अभी मैं क्या करूँ? गोलू को क्या कहूँ अगर उसने वापस मुझसे उस बारे में पूछा तो? मेरा दिमाग़ काम नहीं कर रहा है।"
कुसुम दीदी ने फ़ोन पर एक गहरी साँस ली और उनकी आवाज़ थोड़ी गंभीर हो गई। वह बोलीं, "देख रिधिमा, उसे वैसे तो इस उम्र में सब पता होना चाहिए। मुझे तो लगता है तू उसे कहीं घूमने-फिरने नहीं देती ना, उसकी वजह से ही उसे अभी तक कुछ पता नहीं है। तूने उसे बस घर में ही रखा है।"
मैंने उन्हें फ़ोन पर अपनी परेशानी समझाने की कोशिश की, अपनी आवाज़ को थोड़ा दबाते हुए बोली, "दीदी, वो तो कोई ग़लत आदत ना लग जाए उसे... उसका डर लगता है मुझे। इसलिए मैं उसे ज़्यादा बाहर नहीं जाने देती और हमेशा अपनी नज़रों के सामने रखती हूँ।"
कुसुम दीदी ने हल्के से हँसते हुए कहा, "तेरी बात सही है, लेकिन उसे ये सब पता होना चाहिए, अब बड़ा हो गया है वो। अगर ऐसा ही रहा ना, तो तेरे पति जैसा ही बन जाएगा वो भी—बिलकुल सीधा-साधा और दुनिया से बेख़बर। तू इतने साल निकाल चुकी है पर आज कल की लड़कियों को तू जानती है ना? देख, अब ये तेरी ज़िम्मेदारी है उसे ये सब का ज्ञान देना।"
उनकी यह बात सुनकर मेरा दिल दहल गया। मेरी साँसें तेज़ चलने लगीं और मैंने घबरा कर फ़ोन पर उनसे कहा, "लेकिन मैं कैसे दीदी? मैं उसकी माँ हूँ! एक माँ अपने जवान होते बेटे से ऐसी बातें कैसे कर सकती है?"
कुसुम दीदी ने बिना रुके बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा, "तबही तो... तुम ही उसे अच्छे से समझा सकती हो। देख वो जवान हो रहा है, ये सब तो उसे पता होना ही चाहिए। अगर तुम नहीं समझाओगी, तो वो बाहर से ग़लत जानकारी लेकर आएगा।"
कुसुम दीदी की बातें सुनकर मैं कॉल कट होने के बाद भी कमरे में गहरी सोच में डूब गई। एक तरफ मेरी ममता और डर था, और दूसरी तरफ़ मेरे जवान होते बेटे की परवरिश की ज़िम्मेदारी, जिसका रास्ता मुझे समझ नहीं आ रहा था।
मेरा नाम रिधिमा है। मैं आपको अपनी कहानी सुनाती हूँ, जो मेरी, मेरे बेटे गोलू की, और हमारी ज़िंदगी में आने वाले बदलावों के बारे में है।
शाम के वक़्त जब मैं रसोई में रात के खाने की तैयारी के बारे में सोच रही थी, तभी अचानक मेरे पति का फ़ोन आया। उन्होंने बताया कि दफ़्तर के किसी बेहद ज़रूरी काम से उन्हें तुरंत तीन दिनों के लिए शहर से बाहर जाना पड़ रहा है। कुछ ही देर में वह घर आए, अपना ट्रैवल बैग उठाया और जल्दबाज़ी में निकल गए। उनके जाने के बाद घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया था।
उनके जाने के कुछ देर बाद मेरा बेटा गोलू कॉलेज से घर लौटा। मैंने गौर किया कि उसका सिर नीचे लटका हुआ था, जैसे वह किसी गहरी सोच में हो या किसी बात से परेशान हो। उसने मुझसे ठीक से नज़रे भी नहीं मिलाईं और सीधे ऊपर अपने कमरे में चला गया।
काफी देर बीत जाने के बाद भी जब वह नीचे नहीं आया, तो मुझे चिंता होने लगी। मैं उसे आवाज़ देने के लिए ऊपर उसके कमरे की तरफ़ जाने लगी। जैसे ही मैं उसके कमरे के आधे खुले दरवाज़े के पास पहुँची, जो नज़ारा मैंने देखा, उसे देखकर मेरे होश उड़ गए। मेरा दिल मानो सीने में ही थम गया। गोलू ने अपना शॉर्ट्स नीचे उतार रखा था और अपने फ़ोन की स्क्रीन पर आँखें टिकाए कुछ देख रहा था। उसका एक हाथ अपने उभरे हुए लंड पर था। यह सब देखकर मेरी धड़कनें बेहद तेज़ हो गईं। तभी अचानक उसकी नज़र दरवाज़े पर खड़ी मेरी तरफ़ गई और उसने हड़बड़ाहट में फटाक से अपना शॉर्ट्स ऊपर कर लिया।
वह पूरी तरह से डर और शर्म से सहम गया था। उसका चेहरा लाल हो चुका था और उसने घबराहट में अपनी आँखें वापस फ़ोन की स्क्रीन पर टिका लीं, मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं उसकी तरफ़ दोबारा देखूँ। बिना कुछ कहे या डांटे, मैं तुरंत वहाँ से पीछे मुड़ी और चुपचाप नीचे रसोई की तरफ़ आ गई। मेरा दिल अभी भी तेज़ी से धड़क रहा था और मुझे कुसुम दीदी की कही बातें याद आने लगीं।
रात को जब खाने की मेज़ पर हम दोनों बैठे, तो माहौल में एक अजीब सी खामोशी थी। गोलू बेहद अजीब ढंग से मुझे देख रहा था, ऐसे उसने मुझे पहले कभी नहीं देखा था। जब मैं उसकी थाली में खाना परोस रही थी, तो उसकी नज़रें बार-बार झुककर मेरे सीने पर ही अटक जा रही थीं। हालांकि, उस वक़्त मेरा ध्यान इस बात पर नहीं था, क्योंकि मेरे दिमाग़ में अभी भी शाम का वह दृश्य घूम रहा था।
रात को करीबन 11 बजे, जब मैं अपने कमरे में सोने की तैयारी कर रही थी, तब मैंने अपना ढीला-ढाला नाइट गाउन पहन रखा था। तभी अचानक कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई। गोलू अंदर आया और उसने बेहद मासूमियत से मुझसे पूछा, "मम्मी, क्या मैं आज आपके साथ सो जाऊँ?"
अक्सर जब भी मेरे पति किसी काम से घर पर नहीं होते थे, तो बचपन में मैं उसे अपने पास ही सुला लेती थी। लेकिन पिछले कुछ सालों से, जैसे-जैसे वह बड़ा हो रहा था, उसने मेरे पास सोने से साफ़ मना कर दिया था। मगर आज वह खुद चलकर मेरे कमरे में आया था और साथ सोने की ज़िद कर रहा था। मुझे उसका यह बर्ताव थोड़ा अजीब और अलग लगा, लेकिन उसकी मासूम शक्ल देखकर मैंने मना नहीं किया और बिस्तर पर अपनी बगल में जगह बनाते हुए उसे अपने पास सुला लिया।
कमरे में चारों तरफ़ गहरा अंधेरा था और घड़ी की टिक-टिक के अलावा पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। गोलू बिस्तर पर मेरे पीछे लेटा हुआ था। रात को करीब दो बजे के आसपास, अचानक मुझे अपने शरीर पर एक अनजाने स्पर्श का अहसास हुआ, जिससे मेरी नींद धीरे-धीरे खुलने लगी।
मैंने महसूस किया कि गोलू का हाथ मेरे एक स्तन पर टिका हुआ था। वह बहुत ही धीमे और सहमे हुए हाथों से उसे ऊपर से सहला रहा था, जैसे वह पहली बार किसी औरत के शरीर की बनावट को छूकर महसूस करने की कोशिश कर रहा हो। उस स्पर्श में एक अजीब सी घबराहट और उत्सुकता थी। जब मैंने थोड़ा और गौर किया, तो पाया कि वह बिस्तर पर पीछे से मेरे शरीर के साथ बिल्कुल सटकर चिपका हुआ लेटा था। उसके जिस्म की बढ़ती हुई गर्मी मुझे साफ़ महसूस हो रही थी।
शाम को कमरे में जो कुछ हुआ था, उसे देखने के बाद मेरा दिमाग तुरंत सतर्क हो गया। मैं समझ गई कि इस उम्र में उसके भीतर जाग रहे नए शारीरिक बदलाव और उत्सुकता उसे यह सब करने पर मजबूर कर रहे हैं। मैं उसे डराना या डांटकर दूर नहीं करना चाहती थी, और न ही यह चाहती थी कि वह इस गलत रास्ते पर आगे बढ़े।
बिना कुछ बोले या कोई आवाज़ किए, मैंने बहुत ही शांति से करवट बदली और अपना रुख उसकी तरफ़ कर लिया। जैसे ही मैंने करवट ली, उसका हाथ मेरे स्तन से हटकर अपने आप मेरी पीठ की तरफ़ चला गया। करवट बदलते ही उसका चेहरा मेरे गले के बिल्कुल करीब आ गया, जहाँ उसकी तेज़ चलती हुई सांसें मेरी त्वचा को छू रही थीं।
उसकी इस हरकत को रोकने और उसे किसी भी तरह की गलत दिशा में बढ़ने से बचाने के लिए, मैंने तुरंत आगे बढ़कर उसे दोनों हाथों से कसकर पकड़ लिया और अपने सीने से लगा लिया। मैंने उसे अपनी ममता के घेरे में इस तरह जकड़ लिया ताकि उसका हाथ दोबारा आगे बढ़कर मेरे स्तनों को न छू सके। गोलू मेरे इस अचानक आलिंगन से थोड़ा सकपका गया, लेकिन वह चुपचाप वैसे ही लिपटा रहा। मैंने अंधेरे में आँखें खोलकर छत की तरफ़ देखा और मुझे कुसुम दीदी की वह बात फिर याद आने लगी कि अब यह मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं उसे सही और गलत का रास्ता दिखाऊँ।
Aapka yeh comment padhkar sach mein mera dil khush ho gaya! Mujhe bilkul yakin nahi ho raha ki aapko meri kahani itni acchi lagi. Ek writer ke liye isse bada koi reward nahi ho sakta. Itna pyaar dene ke liye bohot bohot shukriya!Super duperupdate Gorgeous Ridhima ji
Aapki update ne mujhe to tript kr dia sis![]()