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Incest बेटे की ख्वाहिश

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Gorgeous Riddhima

रिद्धिमा
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यह जो दास्तान मैं आपको सुनाने जा रही हूँ, यह पूरी तरह से एक ख़ूबसूरत कल्पना है। इसका हकीकत की दुनिया से कोई वास्ता नहीं है। तो मेरी इस कहानी को सिर्फ़ मजे के तौर पर ही पढ़िएगा और यहीं तक रखिएगा।
 

Gorgeous Riddhima

रिद्धिमा
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Update 01

रात की वह घटना मेरे लिए जितनी खुबसूरत थी, उतनी ही घबराहट से भरी भी थी। उस रात मेरे पति हमेशा से कहीं ज़्यादा उत्तेजित और आक्रामक हो रहे थे। कमरे में पूरी तरह अंधेरा था, और वे बिना समय गंवाए मुझ पर पूरी तरह हावी हो चुके थे। उनका हर एक वार इतना गहरा और तेज़ था कि मैं चाहकर भी खुद पर काबू नहीं रख पा रही थी। एक अजीब सा मीठा दर्द मेरे पूरे बदन में दौड़ रहा था। मेरे मुंह से लगातार तेज़ सिसकारियां और कराहने की आवाज़ें निकल रही थीं। बिस्तर की चादरें सिकुड़ चुकी थीं, और उनकी बेतहाशा रफ़्तार की वजह से लकड़ी का वह भारी पलंग भी बार-बार दीवार से टकराकर आवाज़ कर रहा था। मैं पूरी तरह होश खो चुकी थी और समझ नहीं पा रही थी कि यह सब बगल के कमरे तक जा सकता है।

अगली सुबह, जब पति हमेशा की तरह अपने काम के लिए घर से निकल गए, तब मैं रसोई में चाय बना रही थी। तभी मेरा बेटा धीरे से मेरे पास आकर खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर अजीब सी मासूमियत और थोड़ी चिंता थी। उसने सीधे मेरी आँखों में देखा और पूछा, "मम्मी, कल रात आप रो क्यों रही थी? पापा आपको मार रहे थे क्या?"

उसका यह सवाल सुनते ही मानो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मेरे हाथ का चमचा वहीं रुक गया और धड़कनें एकदम तेज़ हो गईं। शर्म के मारे मेरा चेहरा लाल हो गया और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इस नादान लड़के को क्या जवाब दूँ।

बेटे का यह सीधा सवाल सुनकर मेरे बदन में जैसे बिजली दौड़ गई। मैंने तुरंत अपनी आँखें नीचे कर लीं और गैस की आँच को धीमा करने का बहाना बनाने लगी, ताकि वह मेरे चेहरे पर फैली घबराहट और शर्म को न पढ़ सके। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे डर था कहीं उसकी आवाज़ उसे सुनाई न दे जाए।

मैंने खुद को संभालते हुए झूठी मुस्कान के साथ कहा, "नहीं बेटा, ऐसा कुछ नहीं है। पापा क्यों मारेंगे मुझे? वो तो बस... कल रात मेरे पैर में अचानक बहुत तेज़ नस चढ़ गई थी, इसलिए दर्द के मारे मेरे मुँह से आवाज़ निकल रही थी। तुम जाओ, जाकर अपनी पढ़ाई करो।"

लेकिन मेरा बेटा वहीं खड़ा रहा। उसने अपने कदम पीछे नहीं हटाए। उसकी निगाहें लगातार मेरे चेहरे पर टिकी हुई थीं, जैसे वह समझ चुका था कि मैं कुछ छुपा रही हूँ। उसने धीरे से आगे बढ़कर मेरे काँपते हुए हाथ को थाम लिया। उसके हाथ का स्पर्श इस बार थोड़ा अलग और गहरा था।

वह थोड़ा करीब आया और धीमी, गंभीर आवाज़ में बोला, "मम्मी, मैं बच्चा नहीं हूँ। मैंने सब सुना है। पलंग के टकराने की आवाज़ें, आपके रोने और हाँफने की आवाज़... वह पैर दर्द का रोना नहीं था। मुझे सच-सच बताओ ना, पापा आपके साथ क्या कर रहे थे? आप इतनी ज़ोर-ज़ोर से क्यों कराह रही थीं?"

उसकी इन बातों ने सीधे मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया था। कमरे की उन गुप्त और निजी आवाज़ों का ज़िक्र जब मेरे अपने जवान बेटे के मुँह से इस तरह खुलकर निकला, तो लाज के मारे मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। शर्मिंदगी की एक बेहद गर्म लहर मेरे चेहरे से होते हुए पूरे बदन में उतर गई। मेरे पास उसके इन तीखे और सीधे सवालों का कोई जवाब नहीं था। मैं बस रसोई के स्लैब को पकड़े खड़ी रही, और मेरे और उसके बीच का यह सन्नाटा अब एक बेहद असहज और गहरे तनाव में तब्दील हो रहा था।

रसोई के उस बंद और शांत माहौल में जब मेरे बेटे ने मेरा हाथ और मजबूती से थाम लिया, तो मेरे बदन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। लोक-लाज और मर्यादा का डर एक तरफ था, लेकिन उसकी नज़दीकी से पैदा होने वाली घबराहट मेरे पूरे शरीर को सुन्न कर रही थी। वह धीरे से एक कदम और आगे बढ़ा, जिससे उसकी सांसों की गर्माहट मेरे चेहरे पर महसूस होने लगी।

उसने मेरी आँखों में झांकते हुए बेहद धीमी, गहरी और भारी आवाज़ में कहा, "मम्मी, आप मुझसे अपनी नज़रें क्यों चुरा रही हो? अगर पापा आपको दर्द दे रहे थे, तो मुझे जानने का हक है। कल रात आपकी आवाज़ों में जो तड़प थी, वैसी मैंने पहले कभी नहीं सुनी।"

उसका यह कहना और मेरे हाथ पर उसकी उंगलियों का दबाव बढ़ाना, मेरे भीतर एक अजीब सी कशमकश पैदा कर रहा था। शर्म के मारे मेरा सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगा। मैंने घबराहट में अपना दूसरा हाथ उसके कंधे पर रखा, मानो उसे दूर ढकेलना चाहती हूँ, लेकिन मेरे हाथों में जैसे ताकत ही नहीं बची थी।

मेरी इस बेबसी को देखकर उसने अपना दूसरा हाथ धीरे से मेरी कमर के पास टिका दिया। इस अनपेक्षित स्पर्श ने हमारे बीच के तनाव को और गहरा कर दिया। मर्यादा की दीवारें धुंधली पड़ रही थीं, और उस रसोई के सन्नाटे में हमारी तेज़ चलती सांसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इस मोड़ पर मैं उसे डांटकर दूर करूँ या इस अनजाने खिंचाव के सामने खुद को छोड़ दूँ।

रसोई के उस बेहद असहज और गहरे तनाव को किसी तरह तोड़ने के लिए मैंने अपनी बची-कूची हिम्मत बटोरी। मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी पकड़ से छुड़ाया और घड़ी की तरफ देखते हुए आवाज़ में थोड़ी जल्दबाजी लाने की कोशिश की।

मैंने कहा, "अच्छा ये सब छोड़ो, तुम्हें कॉलेज जाने के लिए देर हो रही है। जल्दी से हाथ-मुँह धोकर आओ, मैं नाश्ता लगाती हूँ।"

वह कुछ और कहना चाहता था, उसकी आँखों में अभी भी कई सवाल तैर रहे थे, लेकिन मेरी इस घबराहट और जल्दबाजी को देखकर वह चुपचाप पीछे हट गया। मैंने बिना वक़्त गंवाए जैसे-तैसे प्लेट में नाश्ता निकाला और उसके सामने रख दिया। उस वक़्त रसोई का सन्नाटा हमारे बीच की अजीब सी कशमकश को और बढ़ा रहा था, पर हम दोनों में से किसी ने भी दोबारा उस विषय पर बात नहीं की।

जब वह तैयार होकर जाने लगा, तो घर के मुख्य दरवाजे के पास आकर रोज़ की तरह रुका। उसकी आँखों की वह भारी नज़दीकी अब फिर से एक मासूम बेटे के प्यार में बदल चुकी थी। उसने हमेशा की तरह आगे बढ़कर मेरे गालों को बेहद प्यार से चूमा। उसकी इस आदत से मेरे भीतर का सारा डर एक पल के लिए शांत हो गया। मैंने भी मुस्कुराते हुए उसके गाल को चूमा और कहा, "अच्छे से जाना और अपना ध्यान रखना।"

जैसे ही वह सीढ़ियों से नीचे उतरा, मैंने तुरंत दरवाज़ा बंद किया और पीठ उससे टिकाकर खड़ी हो गई। एक बहुत लंबी और राहत की साँस मेरे सीने से निकली। मेरा दिल अभी भी तेज़ी से धड़क रहा था, और मुझे समझ आ रहा था कि आज सुबह जो कुछ भी हमारे बीच हुआ, उसने हमारे रिश्ते की एक ऐसी परत को छू दिया था जिसे वापस सामान्य करना अब मेरे लिए एक बड़ी चुनौती होने वाला था।

दरवाजा बंद करने के बाद, मेरे कदम अपने आप बेडरूम की तरफ बढ़ गए। जैसे ही मैंने कमरे के भीतर पैर रखा, रात के उस बेतहाशा मिलन की निशानियां हर तरफ बिखरी पड़ी थीं। पलंग की सफेद चादर पूरी तरह मुड़ चुकी थी और उस पर गुलाब की कटी हुई पंखुड़ियाँ चारों तरफ फैली हुई थीं। हवा में अभी भी उस इत्र की हल्की महक बाकी थी, जो मैंने कल शाम को लगाई थी। यह सब देखकर मेरा पूरा चेहरा शर्म से लाल हो गया।

दरअसल, पिछले कुछ महीनों से मेरे और मेरे पति के बीच एक अजीब सी दूरी आ गई थी। उसी रूखेपन को खत्म करने के लिए कल शाम मैंने खुद अपने हाथों से इस कमरे को सजाया था। मेरा वह तरीका काम भी आया; हम दोनों कई दिनों बाद एक-दूसरे के इतने करीब आए थे। लेकिन उस मिलन की खुशी और उत्तेजना में हम दोनों इस बात को पूरी तरह भूल गए कि अब हमारा बेटा बड़ा हो चुका है और बगल के कमरे में सो रहा है।

मैंने भारी मन और काँपते हाथों से बिस्तर की चादर को ठीक करना शुरू किया। पंखुड़ियों को समेटते हुए मेरे दिमाग में बार-बार वही एक डर आ रहा था कि अगर कॉलेज से लौटने के बाद उसने फिर से वही सवाल पूछ लिया, तो मैं क्या करूँगी? अब मैं उसे पैर दर्द का बहाना बनाकर दोबारा नहीं टाल सकती थी। इस उलझन और घबराहट के बीच मुझे सिर्फ अपनी बड़ी बहन कुसुम की याद आई। वे उम्र में मुझसे बड़ी थीं और ऐसे मामलों में समझदार भी थीं।

मैंने तुरंत अपना फोन उठाया और उनका नंबर मिलाया। जब उन्होंने फोन उठाया, तो पहले तो मैंने सामान्य रूप से घर और बच्चों की बातें कीं, लेकिन मेरी आवाज़ की घबराहट वे भाँप चुकी थीं। आखिर में, अपनी सारी झिझक और शर्म को एक तरफ रखते हुए, मैंने बेहद धीमी आवाज़ में उन्हें सुबह रसोई में हुई वह पूरी बात बता दी। मैंने उनसे पूछा, "दीदी, अब मैं उसे क्या जवाब दूँ? मुझे बहुत डर लग रहा है।"
 
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Gorgeous Riddhima

रिद्धिमा
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Update 02

दूसरी तरफ़ से कुसुम दीदी की आवाज़ आई। उनके लहजे में एक शरारती मुस्कान साफ़ झलक रही थी। वह मुझे छेड़ते हुए बोलीं, "क्यों रिधिमा? मेरा आइडिया काम किया कि नहीं? बड़ी ख़ुश होगी तू तो आज!"

मैं उनकी बात सुनकर झट से थोड़ा असहज हो गई। बेड पर बैठते हुए मैंने मोबाइल को थोड़ा और कान से सटाया और धीमे से उन्हें टोका, "दीदी, आप वह सब छोड़िए... मैं इस वक़्त बहुत परेशान हूँ। अभी मैं क्या करूँ? गोलू को क्या कहूँ अगर उसने वापस मुझसे उस बारे में पूछा तो? मेरा दिमाग़ काम नहीं कर रहा है।"

कुसुम दीदी ने फ़ोन पर एक गहरी साँस ली और उनकी आवाज़ थोड़ी गंभीर हो गई। वह बोलीं, "देख रिधिमा, उसे वैसे तो इस उम्र में सब पता होना चाहिए। मुझे तो लगता है तू उसे कहीं घूमने-फिरने नहीं देती ना, उसकी वजह से ही उसे अभी तक कुछ पता नहीं है। तूने उसे बस घर में ही रखा है।"

मैंने उन्हें फ़ोन पर अपनी परेशानी समझाने की कोशिश की, अपनी आवाज़ को थोड़ा दबाते हुए बोली, "दीदी, वो तो कोई ग़लत आदत ना लग जाए उसे... उसका डर लगता है मुझे। इसलिए मैं उसे ज़्यादा बाहर नहीं जाने देती और हमेशा अपनी नज़रों के सामने रखती हूँ।"

कुसुम दीदी ने हल्के से हँसते हुए कहा, "तेरी बात सही है, लेकिन उसे ये सब पता होना चाहिए, अब बड़ा हो गया है वो। अगर ऐसा ही रहा ना, तो तेरे पति जैसा ही बन जाएगा वो भी—बिलकुल सीधा-साधा और दुनिया से बेख़बर। तू इतने साल निकाल चुकी है पर आज कल की लड़कियों को तू जानती है ना? देख, अब ये तेरी ज़िम्मेदारी है उसे ये सब का ज्ञान देना।"

उनकी यह बात सुनकर मेरा दिल दहल गया। मेरी साँसें तेज़ चलने लगीं और मैंने घबरा कर फ़ोन पर उनसे कहा, "लेकिन मैं कैसे दीदी? मैं उसकी माँ हूँ! एक माँ अपने जवान होते बेटे से ऐसी बातें कैसे कर सकती है?"

कुसुम दीदी ने बिना रुके बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा, "तबही तो... तुम ही उसे अच्छे से समझा सकती हो। देख वो जवान हो रहा है, ये सब तो उसे पता होना ही चाहिए। अगर तुम नहीं समझाओगी, तो वो बाहर से ग़लत जानकारी लेकर आएगा।"

कुसुम दीदी की बातें सुनकर मैं कॉल कट होने के बाद भी कमरे में गहरी सोच में डूब गई। एक तरफ मेरी ममता और डर था, और दूसरी तरफ़ मेरे जवान होते बेटे की परवरिश की ज़िम्मेदारी, जिसका रास्ता मुझे समझ नहीं आ रहा था।

मेरा नाम रिधिमा है। मैं आपको अपनी कहानी सुनाती हूँ, जो मेरी, मेरे बेटे गोलू की, और हमारी ज़िंदगी में आने वाले बदलावों के बारे में है।

शाम के वक़्त जब मैं रसोई में रात के खाने की तैयारी के बारे में सोच रही थी, तभी अचानक मेरे पति का फ़ोन आया। उन्होंने बताया कि दफ़्तर के किसी बेहद ज़रूरी काम से उन्हें तुरंत तीन दिनों के लिए शहर से बाहर जाना पड़ रहा है। कुछ ही देर में वह घर आए, अपना ट्रैवल बैग उठाया और जल्दबाज़ी में निकल गए। उनके जाने के बाद घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया था।

उनके जाने के कुछ देर बाद मेरा बेटा गोलू कॉलेज से घर लौटा। मैंने गौर किया कि उसका सिर नीचे लटका हुआ था, जैसे वह किसी गहरी सोच में हो या किसी बात से परेशान हो। उसने मुझसे ठीक से नज़रे भी नहीं मिलाईं और सीधे ऊपर अपने कमरे में चला गया।

काफी देर बीत जाने के बाद भी जब वह नीचे नहीं आया, तो मुझे चिंता होने लगी। मैं उसे आवाज़ देने के लिए ऊपर उसके कमरे की तरफ़ जाने लगी। जैसे ही मैं उसके कमरे के आधे खुले दरवाज़े के पास पहुँची, जो नज़ारा मैंने देखा, उसे देखकर मेरे होश उड़ गए। मेरा दिल मानो सीने में ही थम गया। गोलू ने अपना शॉर्ट्स नीचे उतार रखा था और अपने फ़ोन की स्क्रीन पर आँखें टिकाए कुछ देख रहा था। उसका एक हाथ अपने उभरे हुए लंड पर था। यह सब देखकर मेरी धड़कनें बेहद तेज़ हो गईं। तभी अचानक उसकी नज़र दरवाज़े पर खड़ी मेरी तरफ़ गई और उसने हड़बड़ाहट में फटाक से अपना शॉर्ट्स ऊपर कर लिया।

वह पूरी तरह से डर और शर्म से सहम गया था। उसका चेहरा लाल हो चुका था और उसने घबराहट में अपनी आँखें वापस फ़ोन की स्क्रीन पर टिका लीं, मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं उसकी तरफ़ दोबारा देखूँ। बिना कुछ कहे या डांटे, मैं तुरंत वहाँ से पीछे मुड़ी और चुपचाप नीचे रसोई की तरफ़ आ गई। मेरा दिल अभी भी तेज़ी से धड़क रहा था और मुझे कुसुम दीदी की कही बातें याद आने लगीं।

रात को जब खाने की मेज़ पर हम दोनों बैठे, तो माहौल में एक अजीब सी खामोशी थी। गोलू बेहद अजीब ढंग से मुझे देख रहा था, ऐसे उसने मुझे पहले कभी नहीं देखा था। जब मैं उसकी थाली में खाना परोस रही थी, तो उसकी नज़रें बार-बार झुककर मेरे सीने पर ही अटक जा रही थीं। हालांकि, उस वक़्त मेरा ध्यान इस बात पर नहीं था, क्योंकि मेरे दिमाग़ में अभी भी शाम का वह दृश्य घूम रहा था।

रात को करीबन 11 बजे, जब मैं अपने कमरे में सोने की तैयारी कर रही थी, तब मैंने अपना ढीला-ढाला नाइट गाउन पहन रखा था। तभी अचानक कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई। गोलू अंदर आया और उसने बेहद मासूमियत से मुझसे पूछा, "मम्मी, क्या मैं आज आपके साथ सो जाऊँ?"

अक्सर जब भी मेरे पति किसी काम से घर पर नहीं होते थे, तो बचपन में मैं उसे अपने पास ही सुला लेती थी। लेकिन पिछले कुछ सालों से, जैसे-जैसे वह बड़ा हो रहा था, उसने मेरे पास सोने से साफ़ मना कर दिया था। मगर आज वह खुद चलकर मेरे कमरे में आया था और साथ सोने की ज़िद कर रहा था। मुझे उसका यह बर्ताव थोड़ा अजीब और अलग लगा, लेकिन उसकी मासूम शक्ल देखकर मैंने मना नहीं किया और बिस्तर पर अपनी बगल में जगह बनाते हुए उसे अपने पास सुला लिया।

कमरे में चारों तरफ़ गहरा अंधेरा था और घड़ी की टिक-टिक के अलावा पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। गोलू बिस्तर पर मेरे पीछे लेटा हुआ था। रात को करीब दो बजे के आसपास, अचानक मुझे अपने शरीर पर एक अनजाने स्पर्श का अहसास हुआ, जिससे मेरी नींद धीरे-धीरे खुलने लगी।

मैंने महसूस किया कि गोलू का हाथ मेरे एक स्तन पर टिका हुआ था। वह बहुत ही धीमे और सहमे हुए हाथों से उसे ऊपर से सहला रहा था, जैसे वह पहली बार किसी औरत के शरीर की बनावट को छूकर महसूस करने की कोशिश कर रहा हो। उस स्पर्श में एक अजीब सी घबराहट और उत्सुकता थी। जब मैंने थोड़ा और गौर किया, तो पाया कि वह बिस्तर पर पीछे से मेरे शरीर के साथ बिल्कुल सटकर चिपका हुआ लेटा था। उसके जिस्म की बढ़ती हुई गर्मी मुझे साफ़ महसूस हो रही थी।

शाम को कमरे में जो कुछ हुआ था, उसे देखने के बाद मेरा दिमाग तुरंत सतर्क हो गया। मैं समझ गई कि इस उम्र में उसके भीतर जाग रहे नए शारीरिक बदलाव और उत्सुकता उसे यह सब करने पर मजबूर कर रहे हैं। मैं उसे डराना या डांटकर दूर नहीं करना चाहती थी, और न ही यह चाहती थी कि वह इस गलत रास्ते पर आगे बढ़े।

बिना कुछ बोले या कोई आवाज़ किए, मैंने बहुत ही शांति से करवट बदली और अपना रुख उसकी तरफ़ कर लिया। जैसे ही मैंने करवट ली, उसका हाथ मेरे स्तन से हटकर अपने आप मेरी पीठ की तरफ़ चला गया। करवट बदलते ही उसका चेहरा मेरे गले के बिल्कुल करीब आ गया, जहाँ उसकी तेज़ चलती हुई सांसें मेरी त्वचा को छू रही थीं।

उसकी इस हरकत को रोकने और उसे किसी भी तरह की गलत दिशा में बढ़ने से बचाने के लिए, मैंने तुरंत आगे बढ़कर उसे दोनों हाथों से कसकर पकड़ लिया और अपने सीने से लगा लिया। मैंने उसे अपनी ममता के घेरे में इस तरह जकड़ लिया ताकि उसका हाथ दोबारा आगे बढ़कर मेरे स्तनों को न छू सके। गोलू मेरे इस अचानक आलिंगन से थोड़ा सकपका गया, लेकिन वह चुपचाप वैसे ही लिपटा रहा। मैंने अंधेरे में आँखें खोलकर छत की तरफ़ देखा और मुझे कुसुम दीदी की वह बात फिर याद आने लगी कि अब यह मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं उसे सही और गलत का रास्ता दिखाऊँ।
 
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रिद्धिमा
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Update 03

सुबह जब मेरी आँख खुली, तो खिड़की से छनकर आती धूप की सुनहरी किरणें पूरे कमरे को रोशन कर रही थीं। रात को जो गोलू डर और बेबसी में मुझसे लिपटकर सोया था, वह अब बिस्तर के दूसरे कोने पर था। हम दोनों के बीच अब काफी दूरी आ चुकी थी। मैं बेड से उठने ही वाली थी कि अचानक मेरी नज़रें गोलू के शॉर्ट्स पर जाकर ठहर गईं। सुबह के वक्त लड़कों के शरीर में होने वाले स्वाभाविक उभार की वजह से उसका अंग पूरी तरह से तना हुआ था, जो उसके पतले शॉर्ट्स के कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिख रहा था। वह उभार इतना साफ़ और बड़ा था कि उसे देखकर पल भर के लिए मेरी साँसें तेज़ हो गईं और मेरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। लेकिन मैंने तुरंत गहरी साँस लेते हुए खुद को संभाला। मैंने मन ही मन खुद को समझाया,

"इतना मत सोच रिधिमा, यह तो एक जवां होते लड़के के शरीर की बेहद आम बात है। सुबह-सुबह ऐसा होना स्वाभाविक है, तुम्हें इस बात से शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है। बल्कि यह तो अच्छी बात है कि मेरा बेटा पूरी तरह स्वस्थ और जवां हो रहा है।"

मैं बिस्तर से उठी और ठंडे पानी से नहाने के लिए बाथरूम में चली गई। मेरी हमेशा से एक आदत थी कि मैं नहाने के बाद बाथरूम के अंदर कपड़े नहीं बदलती थी, बल्कि सिर्फ एक तौलिया बदन से लपेटकर बाहर आ जाती थी। आज भी मैं अपनी ही धुन में, पूरे बदन पर सिर्फ एक छोटा तौलिया लपेटे हुए कमरे में बाहर आ गई। तौलिया मेरी जांघों तक ही आ रहा था और मेरे शरीर का बाकी हिस्सा खुला हुआ था। मैंने अलमारी से अपनी पसंदीदा साड़ी और अंतःवस्त्र निकाले और उन्हें बेड पर रख दिया।

इसके बाद, अपनी ही मस्ती में खोए हुए मैंने तौलिए की गांठ को खोल दिया और उसे अपने नग्न जिसम से अलग कर दिया। जैसे ही तौलिया फर्श पर गिरा, मेरा पूरा भरा हुआ बदन कमरे की खुली हवा में सांस लेने लगा। ठंडे पानी से नहाने की वजह से मेरी गोरी त्वचा में एक गजब का कसाव आ गया था और बदन के अंग और भी निखर उठे थे। मेरे भारी स्तनों के निप्पल ठंडे पानी के स्पर्श से एकदम सख्त और तने हुए खड़े थे।

कल रात की कामुक हलचल और उत्तेजना की वजह से मेरी योनि का हिस्सा भी थोड़ा उभरा हुआ और रसीला लग रहा था। योनि के आस-पास के काले, घने और लंबे बालों से पानी की नन्हीं बूंदें मोती की तरह टपक रही थीं, जो मेरी जांघों से होते हुए नीचे गिर रही थीं। मेरा पूरा जवां बदन इस वक्त पूरी तरह नग्न और बेपर्दा था।

मैंने एक बार फिर तौलिए को उठाया और अपने स्तनों के नीचे, जांघों के बीच और पूरे बदन के पानी को अच्छी तरह सुखाया। कमरे में छाए सन्नाटे के बीच मैं धीरे-धीरे एक गाना गुनगुनाने लगी। मैंने पहले अपनी मैचिंग पैंटी को पैरों से ऊपर खींचते हुए अपनी उभरी हुई योनि पर कसा, और फिर अपनी ब्रा को पहनकर अपने भारी और तने हुए स्तनों को उसमें संभाला। इसके बाद मैंने पेटीकोट बांधा और फिर जैसे ही मैं अपने ब्लाउज़ के सामने के बटन एक-एक करके लगा रही थी, मेरा ध्यान अचानक बिस्तर की तरफ़ गया।

बिस्तर का नज़ारा देखते ही मानो मेरे दिल की धड़कन रुक गई और पैर वहीं जम गए। मेरा बेटा गोलू कंबल से आधा बाहर आ चुका था और खुली, भूखी आँखों से मुझे ही घूरकर देख रहा था। उसकी पूरी नज़रें मेरे ब्लाउज़ के आधे खुले हिस्से और मेरे स्तनों के उभार पर ही टिकी हुई थीं। उसके चेहरे पर एक अजीब सी दीवानगी और उत्सुकता थी। जैसे ही हमारी नज़रें आपस में मिलीं, वह एकदम सकपका गया। उसने तुरंत अपनी आँखें जोर से बंद कर लीं और कंबल तानकर दोबारा सोने का गहरा नाटक करने लगा।

यह देखकर मेरा सीना ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। मेरे पूरे माथे और गर्दन पर पसीने की बूंदें आ गईं। मैं अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा उठी और सोचने लगी, "हाय! यह मैंने क्या अनर्थ कर दिया? जाने-अनजाने में मैंने अपने ही जवान होते बेटे के सामने अपने पूरे नग्न शरीर का प्रदर्शन कर दिया। अब पता नहीं उसने मुझे किस-किस हालत में और क्या-क्या देख लिया होगा! उसके दिमाग में अब मेरे इस शरीर को लेकर क्या चल रहा होगा!"

शाम की वह घटना, रात का उसका वह कामुक स्पर्श और अब सुबह का यह नज़ारा—इन सबने मेरे दिमाग और जिसम में एक अजीब सा तूफान खड़ा कर दिया था। मुझे डर सताने लगा कि अगर आज उसने मुझसे इस शरीर या रात की बात को लेकर कुछ भी पूछ लिया, तो मैं एक माँ होने के नाते उसे क्या मुंह दिखाऊँगी और क्या जवाब दूँगी? यही सब सोचते हुए और अपनी घबराहट को छुपाते हुए, मैंने जल्दी-जल्दी अपनी साड़ी लपेटी और बिना पीछे देखे कमरे से बाहर रसोई की तरफ़ भाग गई।
 
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Update 04

मुझे डर सता रहा था की वो कोई नादानी भरा सवाल न कर दे या कोई नई हरकत लेकिन उसने ऐसा कुच नहि किया, गोलू दिन के वक्त बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रहा था, जैसे सुबह कुछ हुआ ही न हो। दिनभर उसने घर के कामों में हाथ बंटाया, मुझसे बेहद तमीज से बात की और सामान्य तरीके से पढ़ाई की, जिससे मुझे लगा कि शायद वह अपनी उत्सुकता को भूल चुका है और सब कुछ पहले जैसा ही है। लेकिन जैसे ही रात हुई और बिस्तर पर अंधेरा छाया, उसके भीतर की कामुक जिज्ञासा फिर से जाग उठी। रात के अंधेरे में मेरी नींद अचानक एक हल्की सी 'आह' के साथ खुल गई। मैंने महसूस किया कि उसका हाथ मेरे स्तन को बेहद कामुकता से सहला रहा था। उसने अपनी उंगलियों की गिरफ्त को कड़ा करते हुए उन्हें हल्के से दबा भी दिया था। उस अनजाने और गरम स्पर्श की वजह से मेरी सांसें तेज़ होने लगी थीं। घबराहट और बढ़ती उत्तेजना के बीच, मैंने फौरन आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया। मैंने उसे डांटा नहीं, बल्कि बिना कुछ कहे उसकी तरफ़ करवट बदली और उसे दोबारा अपने सीने से लगा लिया ताकि वह शांत हो जाए।

अगली सुबह मैंने अपनी भूल को सुधारा और पूरी सावधानी बरती। मैं बाथरूम के भीतर ही पेटीकोट, ब्लाउज़ और अपने ब्रा पेंटी पहनकर पूरी तरह तैयार होकर कमरे में बाहर आई। जैसे ही मैं बाहर निकली, मैंने देखा कि गोलू जाग रहा था, लेकिन मुझे देखते ही उसने फटाक से अपनी आँखें बंद कर लीं और सोने का नाटक करने लगा।

तीसरे दिन की रात को भी उसने वही हरकत दोहराई। जब मेरी नींद खुली, तो उसका हाथ मेरे नाइट गाउन के ऊपर से ही मेरे स्तनों की गोलाई को सहला रहा था। उसकी थरथराती उंगलियां कपड़े के ऊपर से ही मेरे निप्पल्स को खोज रही थीं। उसके हाथों के इस लगातार और गहरे अहसास की वजह से, मेरे शरीर में एक अनचाही कामुक उत्तेजना दौड़ने लगी। ठंडी हवा और कपड़े के ऊपर से होते हुए उसके गरम स्पर्श के घालमेल से मेरे निप्पल्स एकदम सख्त और तने हुए खड़े हो गए। जैसे ही उसकी उंगलियों ने उन तने हुए निप्पल्स को छुआ, मेरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। आज अजीब बात यह थी कि मैंने उसे तुरंत नहीं हटाया। पता नहीं क्यों, मैं उसे वहां छूने दे रही थी। शायद यही माँ की वो अनजानी ममता भी है, जो बेटे की इस बढ़ती उम्र की उत्सुकता और गलत काम में भी उसके प्रति प्यार खोज लेती है। उसकी इस बेताब जिज्ञासा को देखकर मेरे होठों पर अंधेरे में एक हल्की सी मुस्कान आ गई। वह उन्हें हल्के-हल्के हाथों से पकड़कर उनके उभार को महसूस कर रहा था। उसकी तेज़ और गरम सांसों की हवा मेरी गर्दन और गले की त्वचा पर लग रही थी, जिससे माहौल और भी मादक हो गया था।

तभी गोलू ने खुद को थोड़ा और करीब लाने के लिए बिस्तर पर जैसे ही अपनी पोजीशन को एडजस्ट किया, मेरे होश उड़ गए। मैं शर्म और उत्तेजना से पानी-पानी हो गई। उसका लोहे जैसा सख्त और गर्म लंड मेरी पीठ के नीचे, मेरी जांघों के ऊपरी हिस्से और नितम्बों के बीच के उभार पर साफ़ महसूस हो रहा था। यह अहसास इतना तीखा था कि मैं और ज़्यादा कशमकश बर्दाश्त नहीं कर सकी। मैंने तुरंत अपनी करवट बदली, उसका रुख अपनी तरफ़ किया और उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया। जब वह पूरी तरह मेरी बाहों में जकड़ गया, तब जाकर मैंने राहत की सांस ली।

सुबह जब मेरी आँख खुली, तो धूप कमरे में फैल चुकी थी। मैंने देखा कि आज गोलू पूरी रात मेरे सीने से बिल्कुल लिपटकर ही सोया रहा था। मेरे नाइट गाउन का सीने वाला हिस्सा उसके मुँह से निकली लार की वजह से गीला हो चुका था। उसे इस तरह मासूमियत से सोता हुआ देख मेरे भीतर ममता का एक गजब का सैलाब उमड़ आया। मुझे उस पर बहुत प्यार आया, और मैंने झुककर उसके बिखरे बालों को बेहद लाड से चूम लिया। पता नहीं क्यों, मेरा दिल नहीं भरा और मैंने दो-तीन बार और उसके माथे और गालों को चूमा। मेरे चूमते ही अचानक उसकी आँखें खुल गईं। उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी। उसे देखकर मुझे अहसास हुआ कि वह सो नहीं रहा था, बल्कि पहले से ही जाग रहा था।

वह बेहद प्यार और थोड़े नटखट लहजे में बोला, "क्या हुआ मम्मी? आज सुबह-सुबह अपने बेटे पर कुछ ज़्यादा ही प्यार आ रहा है!"

इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती या जवाब देती, वह एकदम से मेरे ऊपर आ गया। उसने अपने शरीर का पूरा वजन मेरे ऊपर डाल दिया और अपना मुँह मेरे भारी स्तनों के बीच रखकर लेट गया। मेरे भरे हुए स्तन उसके सिर के इस अचानक आए वजन और दबाव की वजह से नीचे पिघलने लगे। इस शारीरिक स्पर्श और दबाव ने मेरे भीतर ममता के साथ-साथ एक अजीब सा, अलौकिक अहसास उजागर कर दिया। लेकिन उस वक्त मेरा ध्यान उस शारीरिक उत्तेजना पर नहीं था; मुझ पर माँ की ममता पूरी तरह हावी थी। मैंने अपने हाथ उसकी पीठ और कमर पर लपेटे और उसे कसकर अपनी बाहों में भींच लिया।

मैंने उसके बालों को सहलाते हुए कहा, "हाँ, बहुत प्यार आ रहा है... ऐसा लगता है जैसे कल ही की तो बात है जब तू मेरे दूध पीने के लिए रोते हुए उठता था। पता ही नहीं चला कि तू कब इतना बड़ा और जवान हो गया।" मैंने फिर से अपना सिर थोड़ा उठाया और उसके माथे को चूम लिया।

मेरी बात सुनते ही गोलू ने मेरे सीने पर से अपना सिर उठाया, मेरी आँखों में देखा और बेहद दीवानगी और मासूमियत के मिले-जुले लहजे में बोला, "मम्मी, मुझे भी आपका दूध पीना है..."

ऐसा कहते ही उसने बिना एक पल गंवाए, मेरे नाइट गाउन के ऊपर से ही मेरे पूरे स्तन पर अपना मुँह खोलकर रख दिया। उसके गीले मुँह और होठों के स्पर्श से मेरा गाउन तुरंत वहां से भीग गया। हालांकि उसने सिर्फ हल्के से वहां छुआ था और कपड़े के ऊपर से ही अपना मुँह टिकाया था, लेकिन उस स्पर्श की गहराई देखकर मानो मेरी जान ही निकल गई। मेरा पूरा बदन कांप उठा और धड़कनें आसमान छूने लगीं। एक माँ होने के नाते इस अजीब मोड़ पर मैं उसे क्या कहती और कैसे रोकती, यह सोचकर मेरा दिमाग पूरी तरह सुन्न हो गया था।

मैंने अपनी भारी और तेज़ चलती सांसों को काबू में करने की कोशिश की। गोलू का गीला मुँह अभी भी मेरे गाउन के ऊपर, मेरे स्तनों के कड़े उभार पर टिका हुआ था, जिससे वहां का कपड़ा पूरी तरह भीग चुका था। मैंने उसकी आँखों में सीधे झांकते हुए, अपने चेहरे पर एक हल्की और लाड़ भरी मुस्कान लाने की कोशिश की और बड़े प्यार से कहा, "बेटा, मेरा दूध नहीं आता अब।"

मेरी बात सुनते ही गोलू का चेहरा उतर गया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेबसी, नाराज़गी और जिद्द के भाव आ गए। वह मुझसे अपनी आँखें चुराते हुए, काफी उदास और नाराज़ होकर बोला, "क्यों नहीं आता? आप झूठ बोल रही हो। आपको मुझे दूध नहीं पिलाना है, मुझे अच्छी तरह पता है। आप सिर्फ पापा को दूध पीने देती हो!" इतना कहकर वह झटके से मेरे ऊपर से हटा और बिस्तर से उठकर कमरे से बाहर जाने लगा।

उसकी यह आखिरी बात मेरे कानों में किसी बम की तरह फटी। मेरे होश उड़ गए, और मेरे मुँह से बस इतना ही निकल पाया, "बेटा, ऐसा नहीं है..."

मैं बिस्तर पर अकेली बैठी रह गई। मेरे भरे हुए स्तनों और दूध के लिए उसका यह नया आकर्षण तो मैं समझ सकती थी; उसकी उम्र ही ऐसी थी कि लड़के अक्सर इस तरह की चीज़ों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। शारीरिक बदलावों और कामुक उत्सुकता की वजह से वह मेरे बदन को छूना चाहता था, यह बात अलग थी। लेकिन उसने ऐसा क्यों कहा कि मैं सिर्फ पापा को पिलाती हूँ? क्या उसने सच में कुछ ऐसा-वैसा तो नहीं देख लिया? कहीं उसने... नहीं, नहीं! यह सोचकर ही मेरा बदन कांप उठा कि अगर उसने कभी मुझे और मेरे पति को करीब आते देख लिया होगा, तो मैं उससे कभी आँखें नहीं मिला पाऊँगी। आखिरकार मैं उसकी माँ थी, और मेरी इतनी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं उससे आगे बढ़कर कुछ भी पूछूँ।

सुबह की इस घबराहट और उलझन के बाद, मैं नहा-धोकर अपनी साड़ी पहनकर पूरी तरह तैयार हो चुकी थी। जब हम दोनों रसोई में नाश्ते के समय मेज़ पर साथ बैठे, तो माहौल में एक भारी सन्नाटा था। मेरी साड़ी के सूती कपड़े के नीचे बदन की बनावट साफ़ झलक रही थी। गोलू अभी भी अंदर ही अंदर नाराज़ दिख रहा था, और चुपचाप अपनी प्लेट में देख रहा था। उसका यह उतरा हुआ चेहरा देखकर मुझसे रहा नहीं गया। मैंने अपनी सारी हिम्मत बटोरी और अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए पूछा, "बेटा, मम्मी का दूध सच में नहीं आता है। पर आपको ऐसा क्यों लगता है कि पापा को मैं दूध पीने देती हूँ?"

गोलू ने अपनी चम्मच प्लेट पर रखी, उसकी आँखें लाल थीं। वह अपनी उम्र के हिसाब से बड़ी ही हठ और कामुक उत्सुकता के मिले-जुले लहजे में बोला, "मम्मी, बस मुझे पता है। मैं बड़ा हो गया हूँ, आप मुझे बेवकूफ मत बनाओ। सभी वाइफ पिलाती हैं अपने हसबैंड को, मुझे सब पता है।"

उसकी बात सुनकर मेरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। मैंने अपनी आवाज़ को थोड़ा गंभीर किया और कहा, "बेटा, आपको ये सब किसने कहा? दूध सिर्फ कुछ साल ही आता है, जब कोई माँ बच्चे को जन्म देती है, यानी प्रेगनेंसी के बाद।"

गोलू फिर भी चुप रहा। मैंने अपने लहजे में थोड़ा गुस्सा और सख्ती दिखाते हुए पूछा, "बताओ, ये सब गलत बातें कौन बोल रहा है तुमसे, गोलू...?"

वह मेरी सख्ती देखकर थोड़ा हकबकाया, और अपनी उंगलियों को चटकाते हुए धीमे से बोला, "वो... वो मेरे दोस्त ने कहा।"

मैंने अपनी साड़ी के ब्लाउज के बंद हिस्सों को टटोला, जहाँ सुबह गोलू की भूखी नज़रें टिकी थीं, और थोड़ी सख्ती से कहा, "तुम्हें कितनी बार कहा है कि ऐसे गंदे लड़कों से दोस्ती मत करो और उनसे ऐसी बातें मत किया करो।"

गोलू की आँखों में अब आंसू तैरने लगे थे। वह डरते और hiचकिचाते हुए बोला, "वो... वो आप उस दिन रो रही थीं, तो मैंने बस उससे ऐसे ही कह दिया था... तो उसने कहा कि तेरे पापा तेरी मम्मी का पी रहे होंगे और..."

उसकी अधूरी बात ने मेरे दिल की धड़कन को आसमान पर पहुँचा दिया। मैंने मेज़ पर थोड़ा आगे झुकते हुए, अपने भारी सीने के उभार को छिपाने की कोशिश की और ज़ोर से पूछा, "और क्या? बोल!"

गोलू ने अपना सिर पूरी तरह नीचे झुका लिया, उसका चेहरा शर्म और डर से लाल हो चुका था। वह सुबकते हुए बोला, "और... वो पापा आपको चोद रहे थे, इसलिए आप रो रही थीं।"

यह शब्द सुनते ही मानो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मेरे कानों में सन्नाटा छा गया और मुझे कुछ समझ नहीं आया कि मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ। एक माँ के रूप में मेरे सामने मर्यादा का सबसे बड़ा संकट खड़ा था। लेकिन जब मैंने देखा कि गोलू का सिर नीचे झुका है और उसकी आँखों से लगातार आंसू निकल रहे हैं, तो मेरी सारी घबराहट पर माँ की ममता और उसका डर हावी हो गया। वह इस अधूरी और गलत जानकारी की वजह से अंदर ही अंदर घुट रहा था।

मैंने बिना एक पल गंवाए अपनी कुर्सी से उठी, उसके पास गई और उसे खींचकर कसकर अपने सीने से लगा लिया। उसका सिर सीधे मेरी साड़ी और ब्लाउज के नीचे दबे मेरे भरे हुए स्तनों के बीच जाकर टिक गया। मैंने उसे अपने आलिंगन में भींचते हुए बेहद प्यार और तसल्ली भरे लहजे में कहा, "मेरा बच्चा... ऐसा कुछ नहीं होता। मम्मी आपको सब समझा देगी, ठीक से। अब उससे ऐसी बातें कभी मत करना और उसकी कही बातें भूल जाओ।"

अंधेरे और कामुक कशमकश से भरी रातों के बाद, अब मेरे सामने अपनी ही साड़ी के आंचल में अपने जवान होते बेटे को जीवन और कामुकता का सही पाठ पढ़ाने की एक बड़ी ज़िम्मेदारी खड़ी थी।

गोलू अभी भी रो रहा था और उसका सिर मेरी साड़ी के नीचे, मेरे सीने से पूरी तरह सटा हुआ था। उसकी गरम और तेज़ चलती हुई सांसें मेरे ब्लाउज़ के कपड़े के ऊपर से मेरी त्वचा को साफ़ महसूस हो रही थीं, जिससे मेरे बदन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ रही थी। घबराहट और ममता के इस मिले-जुले माहौल में, मैंने महसूस किया कि उसके दोनों हाथ धीरे-धीरे मेरी कमर पर आकर टिक गए थे।

उसने मुझे कसकर पकड़ रखा था, जैसे उसे अपनी माँ की बाहों में दुनिया भर का सुकून मिल रहा हो। मैंने उसके डर और भ्रम को दूर करने के लिए उसके सिर के बालों को बेहद प्यार से सहलाया और झुकर उसके कान के पास बहुत ही धीमी और गंभीर आवाज़ में कहा,

"देखो बेटा, अब से कोई भी बात हो, तुम्हारे दिमाग में कैसा भी सवाल आए, तो सबसे पहले मुझसे पूछना, ठीक है मेरे बच्चे? और... मम्मी उस दिन क्यों रो रही थी... मेरा दूध अब क्यों नहीं आता, इन सब बातों का जवाब तुम्हें पता चल जाएगा। लेकिन अभी नहीं। तुम्हारे पापा कभी भी आते ही होंगे, उन्हें इस बारे में कुछ भी पता नहीं चलना चाहिए। यह बात सिर्फ हम दोनों के बीच ही रहनी चाहिए मेरे लाल।"

मेरी बात सुनकर गोलू ने अपने आंसू पोंछे और मेरी आँखों में देखते हुए बेहद मासूमियत से कहा, "ठीक है मम्मी, प्रॉमिस! मैं यह बात किसी को भी नहीं कहूँगा, अपने बेस्ट फ्रेंड को भी नहीं।"

उसका यह जवाब सुनकर मेरे दिल को बड़ी तसल्ली मिली। मैंने राहत की एक गहरी साँस ली और झुककर गोलू के गाल पर अपने होठ टिका दिए। उसे प्यार से चूमते हुए मैंने कहा, "मेरा प्यारा बच्चा।"

हम दोनों अभी इस भावुक पल में बंधे ही हुए थे कि तभी अचानक घर के मुख्य दरवाज़े पर भारी ट्रैवल बैग रखने की आवाज़ आई। आवाज़ सुनते ही हम दोनों चौंककर अलग हुए। सामने मेरे पति खड़े थे, जो मुस्कुराती हुई नज़रों से हम दोनों को ही देख रहे थे। माँ और बेटे को इस तरह एक-दूसरे पर प्यार लुटाते देख शायद वह अंदर से काफी खुश थे। उन्हें देखकर मेरी धड़कनें पल भर के लिए रुक गईं, लेकिन उनके चेहरे के हाव-भाव देखकर मैं तुरंत समझ गई कि उन्होंने हमारी बातें ज़्यादा कुछ सुनी नहीं थीं। उन्होंने सिर्फ हमारा यह आलिंगन देखा था। यह भांपते ही मैंने चैन की एक लंबी साँस ली।

मेरे पति ने अपनी जैकेट उतारते हुए हल्के मज़ाकिया लहजे में पूछा, "क्या नहीं बताओगे बेटा? क्या खिचड़ी पक रही है माँ-बेटे में आज सुबह-सुबह?"

इससे पहले कि कोई और बात आगे बढ़ती, मैं गोलू से पूरी तरह अलग हो गई। गोलू थोड़ा शर्माते और झेंपते हुए मेज़ से उठा और चुपचाप बिना कुछ बोले ऊपर अपने कमरे की तरफ़ चला गया। मैंने अपने पति की तरफ़ देखा, अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा ठीक किया और थोड़ा सा मुँह चिढ़ाते हुए नखरे से कहा, "वो हम माँ-बेटे के बीच की बात है, आपको उससे क्या करना है?" इतना कहकर मैं हल्के से मुस्कुरा दी।

फिर मैंने बात को बदलते हुए उनके पास जाकर कहा, "चलिए, आप सफर से आए हैं, जल्दी से फ्रेश हो जाइए। काफी थक गए होंगे ना?" वह अपना सामान लेकर कमरे की तरफ़ बढ़ गए और मैं रसोई में बर्तनों को समेटने लगी, लेकिन मेरा दिमाग अभी भी इस बात पर अटका था कि मुझे सही समय आने पर गोलू को जीवन का यह पाठ कैसे पढ़ाना है।
 
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