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Incest बेटे की ख्वाहिश

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Enjoywuth

Well-Known Member
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Thank you so much! 🥰 Yeh ending nahi hai, kahani abhi baki hai.
Lekin aage story ko kaise badhaun, main thoda confuse hoon. Isliye aap sabhi readers se request hai ki apne ideas aur suggestions zaroor share karein takki mujhe aage likhne ki nayi direction mile! Aap sab aage kya dekhna chahte hain? Please comments me batayein
May be isko end karke aur nahi theme par story likho..

Isme ab ya toh aur character add karne padenge .jaisa mausi ya bua par usse son or mom ke beech difference AA sakte hain...
Ya phir
ya phir thoda kinky karna padega.jo at least mujhe pasand nahi hai
 

Gorgeous Ridhimaa

रिद्धिमा ✨
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Update 23

गोवा के उस बेहद रोमांटिक और रोमांचक सफर से वापस लौटने के बाद, मेरे और गोलू के रिश्ते का ताना-बाना पूरी तरह बदल चुका था। हमारे बीच की पुरानी सारी झिझक, डर और सामाजिक दूरियां हमेशा के लिए सिमट गई थीं। समाज की बंदिशों को पीछे छोड़ते हुए हम दोनों ने अपनी एक ऐसी गुप्त दुनिया बसा ली थी, जहाँ केवल एक गहरा, अटूट जुड़ाव और आत्मिक शांति थी। अब जब भी राजीव किसी बिजनेस ट्रिप या काम के सिलसिले में घर से बाहर जाते, तो घर की खामोशी में एक अलग ही मखमली नशा घुल जाता था।

ऐसे ही कुछ दिनों बाद, राजीव को एक ज़रूरी काम के सिलसिले में कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा। उनके जाते ही रात का सन्नाटा गहरा होते ही मेरे कमरे की हवाएं एक नई करवट लेने लगीं।

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। मैं बिस्तर पर आराम से लेटी हुई थी। इस सुनहरी, मद्धम रोशनी वाले कमरे में मैंने वही गहरा भूरा, बिल्कुल रेशमी और ढीला-ढाला नाइटगाउन पहना हुआ था जो शरीर पर मक्खन की तरह फिसलता था। इसकी पतली पट्टियाँ मेरे कंधों पर टिकी थीं और इसका गला आगे से काफी गहरा था, जिससे मेरे भरे-पूरे स्तनों का ऊपरी हिस्सा और मेरी साफ़, गोरी त्वचा साफ झलक रही थी। इस पतले रेशमी कपड़े के नीचे मैंने कुछ भी नहीं पहना था, जिससे मेरा पूरा बदन बिल्कुल आज़ाद, हल्का और अपनी स्वाभाविक कोमलता में था। मैं बिस्तर पर लेटी हुई एक मैगज़ीन के पन्ने पलट रही थी, तभी कमरे के दरवाज़े पर एक हल्का सा साया उभरा।
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गोलू बहुत ही शांत और मद्धम कदमों से अंदर दाखिल हुआ। उसकी आँखों में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, बल्कि अपनी मम्मा के पास सुकून पाने की एक गहरी दीवानगी और ज़िद्दी चाहत थी। उसने बिना कुछ बोले, सबसे पहले पीछे मुड़कर दरवाज़े की कुंडी को बहुत सावधानी से चढ़ाया, खिड़की के खुले पल्लों को सटाया और कमरे की तेज़ लाइट को बंद करके केवल बेडसाइड लैंप की पीली, सुनहरी रोशनी को जलता छोड़ दिया।

इसके बाद उसने बहुत ही सहजता से अपनी टी-शर्ट उतारी और उसे किनारे रख दिया। अब वह सिर्फ एक ढीले-ढाले शॉर्ट्स में था। मुझे अब उसके साथ इस रूप में रहने से कोई आपत्ति नहीं थी, क्योंकि हमारे बीच यह एक अनकहा नियम बन चुका था कि जब तक घर में कोई तीसरा न हो, हम पूरी आज़ादी से एक-दूसरे के करीब रह सकते हैं। उसे अब यह बात अच्छे से समझ आ गई थी।

मैं वैसे ही बिस्तर पर लेटी हुई थी। गोलू धीरे से आगे बढ़ा और बिना कोई देर किए सीधे आकर मेरे सीने से लग गया। उसने अपना चेहरा मेरे भरे-पूरे स्तनों के बीच की गहराई में छुपा लिया।

"मम्मी... सच कहूँ तो पापा के बिना यह पूरा घर खाली-खाली लगता है, पर आपके पास आते ही और आपके सीने से लगते ही मुझे ऐसा लगता है जैसे मुझे मेरी पूरी दुनिया मिल गई," उसने मेरे सीने की गर्माहट को महसूस करते हुए बहुत ही धीमे से कहा। उसकी आवाज़ में एक बच्चे जैसी मासूमियत थी, पर उसकी आँखों में एक जवान होते मर्द का गहरा खिंचाव था।
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मैंने मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए और उसके चौड़े, नंगे कंधों और पीठ को अपनी बांहों में भींच लिया। मैंने झुककर उसके गालों को चूमते हुए कहा, "अच्छा जी, मम्मा की इतनी याद आ रही थी तुझे? चल यह बता, आजकल कॉलेज की पढ़ाई कैसी चल रही है तेरी? कोई अच्छी दोस्त या कोई लड़की पसंद आई कि नहीं अब तक?"

गोलू ने अपना चेहरा मेरे सीने से थोड़ा सा हटाया और सीधे मेरी आँखों में देखते हुए बहुत ही मीठे और लाडले अंदाज़ में बोला, "क्या मम्मी, आप भी हमेशा बस लड़कियों की बातें शुरू कर देती हो। मुझे किसी लड़की-वड़की में कोई इंटरेस्ट नहीं है। जब मेरी मम्मा खुद इतनी सुंदर और प्यारी हैं, तो मुझे किसी और की तरफ देखने की ज़रूरत ही क्या है? मुझे तो बस अपनी मम्मा का यह लाड, यह खुशबू और यह सीना चाहिए।"

उसने अपनी दोनों मज़बूत बांहें मेरी कमर के चारों तरफ डाल दीं और खुद को मेरी तरफ और ऊपर खींच लिया। जैसे ही उसने मुझे कसकर अपने सीने से लगाया, मेरे उस पतले रेशमी गाउन के पार से मेरे दोनों स्तनों की पूरी नरमी और गोलाई उसकी चौड़ी, नंगी छाती पर पूरी तरह भींच गई। हमारे शरीरों के इस ज़बरदस्त जिस्मानी टकराव से कमरे की ठंडी हवा में एक तपी हुई, मीठी गरमाहट घुलने लगी। मेरे बदन की त्वचा उसकी छुँअन से हल्की सी सिहर उठी और मेरी सांसें थोड़ी भारी होने लगीं। हम दोनों एक-दूसरे में समाने के लिए अंदर ही अंदर तड़प रहे थे, लेकिन हमारी बातें ऊपर से बिल्कुल सामान्य चल रही थीं।

वह बड़े ही हक से मेरे चेहरे को निहार रहा था और उसके हाथ कभी मेरी कमर को सहलाते तो कभी मेरे बालों में खो जाते। मैंने भी उसकी नादान ज़िद के सामने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। मैं उसके घने, रेशमी बालों में उंगलियां फिराते हुए उससे बातें कर रही थी, और वह बस अपनी मम्मा के सीने से लगकर इस जादुई और सुरक्षित घेरे में खोया हुआ था। समाज के सारे कायदे अब इस कमरे की चारदीवारी के बाहर छूट चुके थे, और यहाँ सिर्फ एक माँ की ममता का वह नया रूप था जो अपने जवान बेटे को दुनिया का सबसे अनोखा और रसीला दुलार दे रहा था।

हमारी त्वचा की तपन और सांसों की गरमाहट आपस में मिलकर एक अलग ही नशा पैदा कर रही थी कि अचानक मेरे सिरहाने रखे फोन की स्क्रीन तेज़ रोशनी के साथ चमक उठी।

देखा तो उस पर कुसुम दीदी का नाम आ रहा था, वह एक वीडियो कॉल थी।

मैं थोड़ा सा संभलने ही वाली थी कि गोलू ने बिना सोचे-समझे तुरंत कॉल उठा लिया और फोन हम दोनों के चेहरों के सामने कर दिया। स्क्रीन चालू होते ही सामने दीदी का हंसता हुआ चेहरा दिखा। वे अपने बेडरूम में बिस्तर पर तकिए का सहारा लेकर बैठी थीं और जैसे ही उन्होंने हम दोनों को इस तरह एक साथ बिस्तर पर लिपटे हुए देखा, वे मुस्कुरा उठीं।
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"अरे वाह! राजीव के जाते ही छोटे राजा सीधे मम्मा की बांहों में आकर जम गए हैं! वह भी बिना शर्ट के! क्या बात है रिद्धिमा, बड़ा लाड उमड़ रहा है आज तो," दीदी ने अपनी आँखें नचाते हुए हल्की छेड़खानी शुरू कर दी।

दीदी की बात सुनकर मेरा चेहरा थोड़ा सा लाल हो गया। मैंने अपनी नाइटी को थोड़ा संभालते हुए कहा, "अरे दीदी, आप भी ना, इस वक्त फोन करके कुछ भी बोलने लगती हो! राजीव शाम को निकल गए थे, तो गोलू बस मेरे कमरे में ही आ गया कि पापा नहीं हैं तो मैं यहीं सो जाता हूँ। हम बस नॉर्मल बातें ही कर रहे थे।"

"हाँ मौसी, मुझे अपने कमरे में अकेले नींद नहीं आ रही थी," गोलू ने तुरंत हंसते हुए मेरी बात का सपोर्ट किया। उसने फोन को थोड़ा और पास लाते हुए चहककर पूछा, "वैसे मौसी, मौसा जी सो गए क्या? सोनू और मोनू भैया कहाँ हैं?"

कुसुम दीदी ने मुस्कुराकर बड़े दुलार से गोलू को देखा और बोलीं, "अरे तेरे मौसा जी तो दिनभर की भाग-दौड़ के बाद गहरी नींद में सो रहे हैं। और सोनू-मोनू भी अपने-अपने कमरों में जा चुके हैं। तू बता गोलू, गोवा की ट्रिप कैसी रही? बड़ी प्यारी तस्वीरें भेजी थीं तूने व्हाट्सऐप पर। तुम्हारी मम्मी तो बिल्कुल किसी हीरोइन जैसी लग रही थी हर फोटो में!"

मौसी के मुंह से अपनी मम्मी की तारीफ सुनकर गोलू खुश हो गया। उसने मेरी कमर पर अपनी पकड़ को और थोड़ा भींचते हुए कहा, "मौसी! सच में, मम्मी इतनी सुंदर लग रही थीं कि बीच पर जितने भी लोग थे, सब बस मम्मी को ही देख रहे थे। एक फोटोग्राफर तो हमारे पीछे ही पड़ गया था कि मम्मी की फोटो विज्ञापन के लिए चाहिए। पर पापा ने उसे साफ मना कर दिया।"

"अच्छा! राजीव ने मना कर दिया?" दीदी ने मजे लेते हुए कहा, "चलो, अच्छा ही किया। आख़िर मेरी बहन है ही इतनी प्यारी कि कोई भी देखता रह जाए। पर गोलू बेटा, तूने अपनी मम्मा का पूरा ध्यान रखा ना वहाँ समंदर में?"

"अरे मौसी, ध्यान तो रखना ही था ना," गोलू ने हंसते हुए सीधे दीदी को असली बात बताना शुरू किया, "आपको तो पता ही है कि मम्मी कितनी शर्माती हैं। जब हम सब बीच पर पहुँचे, तो मम्मी अपनी बिकिनी के ऊपर जो एक्स्ट्रा ड्रेस पहनी हुई थीं, उसे उतारने को ही तैयार नहीं थीं! वो बहुत हिचकिचा रही थीं और कह रही थीं कि मुझे सबके सामने बहुत शर्म आ रही है। फिर पापा ने और मैंने मिलकर मम्मी को बहुत प्यार से मनाया, उनकी मिन्नतें कीं कि आप इसे उतारो और बिकिनी में बाहर आओ, आप बहुत अच्छी लग रही हो। जब हम दोनों ने मिलकर बहुत ज़ोर दिया और जिद की, तब जाकर मम्मी मानीं और उन्होंने अपनी ऊपर की ड्रेस उतारी। अगर हम दोनों मिलकर नहीं मनाते, तो मम्मी पूरे टाइम उस भारी ड्रेस में ही बैठी रह जातीं!"



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गोलू की यह बात सुनकर मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई, क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद था कि जब मैं शर्मा रही थी, तब मेरे पति और मेरे बेटे ने किस तरह एक साथ मिलकर मेरे बदन की तारीफ की थी और मुझे मनाया था। मैंने तुरंत गोलू को चुप कराने के लिए उसकी पीठ पर थपथपाया और चेहरे पर झूठी डांट लाते हुए कहा, "गोलू! तू भी ना, मौसी के सामने पुरानी बातें लेकर बैठ गया। कुछ भी बोलता है!"

दीदी ने स्क्रीन पर हम माँ-बेटे के बीच का यह गहरा और मीठा जुड़ाव देख लिया था। वे बहुत खुश होकर बोलीं, "चलो, बहुत अच्छी बात है। बच्चे जब बड़े होने लगते हैं, तो वे अपनी माँ के रक्षक बन जाते हैं। गोलू अब समझदार हो रहा है, वो अपनी मम्मा को सँभालना सीख रहा है। मुझे तुम दोनों को इस तरह खुश और एक-दूसरे के करीब देखकर बहुत अच्छा लगता है।"

"दीदी, आप तो बस गोलू की ही तरफदारी करोगी, मुझे पता है," मैंने हंसते हुए बहुत ही घरेलू लहजे में कहा, "पर सच कहूँ दीदी, राजीव में जो बदलाव आया है, जो उन्होंने हमारे लिए इतना वक्त निकाला और इतना प्यार दिया... उसके लिए मैं आपका शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ। राजीव ने मुझे बताया कि जिया जी ने उन्हें बैठकर समझाया था। मैं समझ गई थी कि यह सब आपकी ही वजह से हुआ है।"

कुसुम दीदी के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई। वे बोलीं, "अरे, हम सब एक परिवार हैं रिद्धिमा। अपनों को खुशियाँ देना और उनके चेहरे पर सुकून देखना ही तो सबसे बड़ा सुख है। देख, आज राजीव भी कितना खुश है, तू भी अंदर से खिली हुई है, और हमारा गोलू बेटा तो अपनी मम्मा के पास बिल्कुल शांत महसूस कर रहा है। तुम दोनों इसी तरह हमेशा खुश रहो।"

गोलू ने दीदी की बात पर हां मिलाते हुए कहा, "हाँ मौसी, आप बिल्कुल सही कह रही हो। मम्मी तो बस बेकार में ही फिक्र करती रहती हैं। अब पापा कुछ दिनों के लिए बाहर गए हैं, तो मैं रोज़ मम्मी के पास ही सोऊंगा और इनका पूरा ध्यान रखूँगा।"

"बिलकुल बेटा, अपनी मम्मा के पास रहना और उनका ध्यान रखना ही सबसे अच्छी बात है," दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा, "चल रिद्धिमा, अब रात काफी हो गई है, मैं भी सोती हूँ। तुम दोनों भी आराम करो और बातें बंद करके अब सो जाओ। गुड नाइट!"

"गुड नाइट मौसी!" गोलू ने कहा।

"शुभरात्रि दीदी, टेक केयर," मैंने भी राहत भरी मुस्कान के साथ कहा।

जैसे ही कॉल कटा, फोन की स्क्रीन बंद हो गई और चारों तरफ वही मद्धम सुनहरी रोशनी पसर गई। पर इस बार, दीदी के इस दुलार और खुश होने के अंदाज़ ने हमारे बीच के इस रिश्ते को और भी गहरा और नॉर्मल कर दिया था। गोलू ने फोन साइड में रखा और अपनी दोनों आँखें सीधे मेरी आँखों में डालते हुए, बड़े ही लाड और हक के साथ मेरी कमर को अपनी तरफ दोबारा खींच लिया, जिससे हमारा पूरा जिस्म एक बार फिर बिना किसी दूरी के आपस में पूरी तरह सिमट गया। मैं अपनी उंगलियाँ उसके बालों में फेरने लगी और वह मेरे सीने से लगकर गहरी नींद में जाने लगा।

अगली सुबह जब कमरे की खिड़की से धूप की हल्की सुनहरी किरणें अंदर आईं, तो मेरी आँखें खुलीं। नींद से जागते ही मुझे अपने बदन पर एक बहुत ही गहरा, मुलायम और अजनब अजीब सा अहसास हुआ। मैंने नीचे देखा तो मेरा दिल एक पल के लिए थम सा गया, लेकिन अगले ही पल मेरे चेहरे पर एक बेहद प्यारी और सुकून भरी मुस्कान बिखर गई।
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रात को जो पतला और रेशमी गाउन मैंने पहना था, उसका आगे का हिस्सा पूरी तरह खुल चुका था। मेरे दोनों भरे-पूरे और कसी हुई बनावट वाले स्तन उस मुलायम कपड़े से बाहर आ चुके थे, और मेरे प्यारे गोलू का मुँह बिल्कुल मेरे सीने की उस गहराई पर टिका हुआ था। वह नींद में बिल्कुल एक छोटे नवजात बच्चे की तरह मासूमियत से मेरे वजूद का हिस्सा बना हुआ था। सिर्फ इतना ही नहीं, जब मैंने चादर के अंदर थोड़ा और ध्यान दिया, तो देखा कि रात के किसी पहर में उसने अपने बचे हुए कपड़े भी उतार दिए थे। अब उसका पूरा सुडौल और गदराया हुआ बदन पूरी तरह से नग्न था, और उसकी जवानी का वह स्वाभाविक, भारी और कड़ा उभार मेरी जांघों के बीच, बिल्कुल मेरी यॉनी के मुहाने पर टिका हुआ था।
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मुझे उसकी इस नग्नता या इस साहसी हरकत से कोई हैरानी या गुस्सा नहीं हुआ। बल्कि उसे इस तरह अपनी मम्मा के आगोश में पूरी तरह आज़ाद और बेपरवाह सोया देखकर मेरा दिल ममता और एक अनकहे लाड से भर उठा। मैं मन ही मन मुस्कुराई कि मेरा यह नटखट बच्चा रात को न जाने कब पूरी तरह कपड़ों से आज़ाद हो गया, और कब उसने इतनी खामोशी से मेरे रेशमी गाउन के बंधनों को हटाकर मेरे सीने की गर्माहट को अपना बना लिया, मुझे नींद में भनक तक नहीं लगने दी।

उसकी इस नादानी पर मुझे इतना ज़्यादा प्यार आ रहा था कि मैंने धीरे से अपने एक हाथ से चादर को ऊपर खींचा और हम दोनों के शरीरों को पूरी तरह से ढंक दिया, ताकि बाहर की सुबह की हवा की ठंडक उसे न छुए। मैंने अपनी बांहें उसके नंगे कंधों पर कस दीं और उसे और भी ज़्यादा लाड से अपने सीने से भींच लिया।
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जैसे ही मैंने उसे अपने करीब खींचा, उसकी जांघों के बीच का वह गरम और सख्त अहसास मेरी त्वचा पर और गहरे से छू गया। उस छुँअन से मेरे पूरे बदन में एक बहुत ही हल्की, मीठी और तीखी सिहरन दौड़ने लगी। मैं चाहकर भी उस अहसास को नज़रअंदाज़ नहीं कर पा रही थी। जब भी गोलू नींद के खुमार में हल्का सा हिलता या करवट बदलने की कोशिश करता, तो उसका वह तपता हुआ जिस्म मेरी यॉनी के सबसे संवेदनशील हिस्से पर पतले गाउन के ऊपर से रगड़ खाता, जिससे मेरे भीतर एक अजीब सी तड़प जाग उठती। उसकी उस गरम छुँअन ने अंदर ही अंदर मुझे फिर से गीला करना शुरू कर दिया था, और मैं बिस्तर की उस ठंडी चादर के बीच एक बार फिर गहरी सांसें लेती हुई काँप उठी।


बिस्तर की उस मखमली गर्माहट में, जब मैं गोलू के उस गदराए और तपे हुए जिस्म के अहसास से पूरी तरह पिघल रही थी, तभी अचानक साइड टेबल पर रखे मेरे फोन की तेज़ रिंगटोन बज उठी। सुबह के उस गहरे सन्नाटे को चीरती हुई उस अचानक आई आवाज़ को सुनकर मेरा दिल एक पल के लिए ज़ोर से धड़क उठा और भीतर एक अजीब सी घबराहट बैठ गई। इतनी सुबह-सुबह राजीव का फोन आना मेरे मन में तुरंत एक पत्नी वाली गहरी फिक्र और चिंता को जगा गया। मेरे दिमाग में तुरंत कई तरह के अनजाने ख्याल आने लगे कि कहीं रास्ते में उनके साथ कोई अनहोनी या कुछ गलत तो नहीं हो गया? वे अपनी मंजिल पर सुरक्षित पहुँचे तो होंगे ना? ट्रेन का सफर खैरियत से तो बीता होगा? इसी भारी चिंता और घबराहट में मैंने हड़बड़ाकर अपना हाथ बिस्तर से बाहर निकाला और फोन उठाकर स्क्रीन पर उनका नाम देखते ही बिना पलक झपकाए तुरंत कॉल रिसीव कर लिया।

"हेलो... राजीव? आप बिल्कुल ठीक तो हैं ना? सब खैरियत है?" मैंने अपनी थोड़ी भारी और चिंता से भरी आवाज़ में तुरंत उनसे पूछा।
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सामने से राजीव की बिल्कुल सहज, शांत और मुस्कुराती हुई आवाज़ गूंजी, "गुड मॉर्निंग मेरी जान! हाँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ और अपनी जगह पूरी तरह सुरक्षित पहुँच गया हूँ। तुम बेकार में ही इतनी चिंता करने लगीं। सच कहूँ तो ट्रेन के सफर में मुझे रातभर तुम दोनों की बहुत याद आ रही थी। सुबह होते ही मैं खुद को रोक नहीं पाया और तुरंत फोन लगा दिया। कहीं मैंने इतनी सुबह-सुबह फोन करके तुम्हारी प्यारी सी नींद तो खराब नहीं कर दी ना?" राजीव की आवाज़ में वही हमेशा वाला सीधा, सच्चा और निश्चिंत प्यार था, जिसे सुनकर मेरे दिल को एक बहुत बड़ी तसल्ली मिली और मैंने चैन की एक लंबी सांस ली।

मैंने अपने सीने की गहराई पर पूरी तरह नग्न होकर सोए हुए गोलू की तरफ देखा और अपने होंठों पर एक हल्की मुस्कान लाते हुए कहा, "नहीं-नहीं, मैं तो कब की उठ चुकी हूँ। बस आपकी ही फिक्र हो रही थी कि सुबह-सुबह फोन कैसे आया। लेकिन आपका यह लाडला बेटा अभी तक बिल्कुल घोड़े बेचकर सो रहा है, उसे तो सुबह की इस सुनहरी धूप का भी कोई होश नहीं है।"

यह सुनते ही राजीव ने फोन की दूसरी तरफ से एक ज़ोरदार और बेबाक ठहाका लगाया, "ओह अच्छा! तो लगता है आज रात माँ-बेटे एक साथ सोए थे? मेरे घर से जाते ही तुमने अपने उस बड़े से बेटे को फिर से अपनी गोद में घुसा लिया ना? हा हा!"

पति की यह पूरी तरह से मज़ाकिया लेकिन सच के बेहद करीब वाली बात सुनकर मेरे चेहरे पर शर्म की एक गहरी लाली दौड़ गई। मैंने अपनी काँपती हुई आवाज़ को पूरी तरह से संभालते हुए थोड़े झूठे गुस्से और नखरे से कहा, "राजीव, आप भी ना... कुछ भी बोलते रहते हैं! आपका अपना ही बेटा है वो, और मैं उसे भला क्यों बुलाऊँगी? वो खुद ही रात को मेरे पास चला आया था, मैंने नहीं बुलाया था उसे।"

"अरे मेरी जान, मैंने कब मना किया? मैं तो बस तुम्हारी टाँग खींच रहा हूँ। मेरे बेटे का पूरा हक़ है अपनी माँ पर, उसे भी अपनी मम्मा का पूरा प्यार लेने दो। जब मैं तुम दोनों को इस तरह एक-दूसरे के करीब, सुरक्षित और खुश देखता हूँ ना, तो मेरा दिल भी सुकून से भर जाता है, मेरी जान।" राजीव की बातों में छुपा वो गहरा विश्वास और मासूम अपनापन इस शांत सुबह के माहौल को और भी ज़्यादा रसीला और खूबसूरत बना रहा था।

ठीक उसी पल, फोन की उस आवाज़ और हमारे बीच चल रही इस बातचीत से गोलू की आँखें धीरे से खुल गईं। उसने जैसे ही सुना कि पापा लाइन पर हैं और मम्मा से बातें कर रहे हैं, उसके चेहरे पर एक बेहद नटखट, साहसी और शरारती चमक आ गई। उसने बिना किसी झिझक या डर के, सीधे अपने मुँह को मेरी छाती पर थोड़ा और ऊपर उठाया और मेरे रेशमी गाउन के खुले हुए हिस्से से पूरी तरह बाहर निकले, कसी हुई बनावट वाले स्तनों के उभरे हिस्से को अपने होठों के घेरे में ले लिया। उसने बड़े ही लाड, तड़प और हक के साथ उसे चूसना शुरू कर दिया।

"अहहह... ओफ़्फ़..."
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उसकी उस अचानक, गरम और बेहद तीव्र छुँअन के कारण मेरे मुँह से एक हल्की सी मादक और बेबस सिसकारी निकल गई, जिसे मैं चाहकर भी राजीव के सामने नहीं दबा सकी।

राजीव ने तुरंत फोन पर उस हल्की सी आवाज़ को भांप लिया और बड़ी फिक्र से पूछा, "अरे रिद्धिमा! क्या हुआ? कैसी आवाज़ थी वो? सब ठीक तो है ना वहाँ?"

मेरा दिल जैसे सीधे गले में आ गया और धड़कनें बेकाबू हो गईं। मैंने तुरंत अपने चेहरे को तकिए के साए में थोड़ा और छुपाया और अपनी उखड़ी हुई सांसों को काबू में करते हुए कहा, "नहीं... कुछ भी नहीं राजीव। बस यहाँ बिस्तर पर एक बड़ा सा मच्छर उड़ रहा था, उसने अचानक बहुत ज़ोर से काट लिया, इसलिए मुँह से अचानक आवाज़ निकल गई।"

"अच्छा-अच्छा, मुझे तो लगा कहीं गोलू मेरी बीवी को तंग तो नहीं कर रहा है ना? अगर वो अपनी मम्मा को थोड़ा भी परेशान कर रहा हो तो मुझे तुरंत बता दो, मैं वापस आकर अपने उस बेटे को अच्छा सबक सिखाऊंगा," राजीव ने हंसते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा।

"आप चुप कीजिए, कुछ भी बोलते रहते हैं! अब फोन रखिए, क्या आपको सुबह उठकर वहाँ नहाना-धोना नहीं है? हर वक्त बस ऐसी ही बातें सूझती हैं आपको। सच कहूँ तो मैं ही मिलती हूँ ना आप दोनों बाप-बेटे को तंग करने के लिए," मैंने थोड़े शरारती और घरेलू लहजे में कहा ताकि राजीव का ध्यान पूरी तरह से बदल जाए।

राजीव ने हंसते हुए बड़े ही रोमांटिक लहजे में कहा, "तो और क्या करूँ? अब अपनी इतनी खूबसूरत बीवी से मस्ती नहीं करूँगा तो क्या किसी बाहर वाली के साथ करूँ? बोलो, तुम ही इजाज़त दे दो!"

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"मैंने ऐसा तो बिल्कुल नहीं कहा! आप ना... बहुत गंदे हो गए हैं आजकल। पहले जो सीधे-साधे रहते थे, वही अच्छे थे," मैंने हंसते हुए कहा और हम दोनों कुछ मिनटों तक इसी तरह की हल्की-फुल्की घरेलू और प्यारी बातें करते रहे।

दूसरी तरफ, चादर के उस छिपे हुए और बेहद सुरक्षित साए में गोलू का खेल पूरी तरह जारी था। वह बिना किसी परवाह के, अपने पापा की आवाज़ सुनते हुए भी, बहुत ही शांत और गहरे दुलार के साथ मेरे स्तनों का रस ले रहा था, जैसे सच में वहाँ से कोई मीठा दूध आ रहा हो। उसके इस अनोखे और साहसी लाड से मेरे पूरे बदन में एक तीव्र सिहरन हो रही थी और मेरी जांघों के बीच की नमी और बढ़ रही थी। मैंने बहुत ही प्यार से अपना दूसरा हाथ उसके घने, रेशमी बालों में डाल दिया और उसे सहलाने लगी।

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फ़ोन पर मेरे पति का निश्चिंत और प्यारा वैवाहिक संवाद गूंज रहा था, और बिस्तर के भीतर मेरा नंगा बेटा मुझे एक मर्द और बच्चे का दोहरा दुलार दे रहा था। इन दोनों के बीच घिरी मैं, अपने दोनों स्तनों को गोलू के मुँह में सौंपे, बस चुपचाप अपनी बंद आँखों के पीछे इस अनोखे सुख से मुस्कुरा रही थी।
 
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