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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

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komaalrani

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग 219 -- बुच्ची और लीला -दोनों ने लीला, ----खेला चोर सिपाही का पृष्ठ १२४३

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Sand1947

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लीलवा की ले ली
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आधे घंटे से भी कम समय में भैया का खूंटा फिर से फनफना गया और लीलवा पनिया भी गई, और मान भी गई।


छिनरपना किया, हाथ गोड़ पटका, लेकिन कुछ बुच्चिया की जीभ ऊँगली का कमाल, और कुछ सूरजु ने जांगर दिखाया, जोर जबरदस्ती की, बस



लीलवा मिटटी के फर्श पर लेटी थी, टांग फैलाये, जाँघे चौड़ी किये और बुर चियारे, और उसकी बिन फटी बुर में सरसो के तेल की बोतल लेकर बुच्ची चढ़ी थी, बड़ी मुश्किल से चिड़िया की चोंच खुली, अंदर की गुलाबी झलक दिखी और सूरजु और उसके आदरणीय मूसलचंद दोनों पागल।


बुच्ची ने एक हाथ की उँगलियों से बुलबुल की चोंच फैला रखी थी और दूसरे हाथ से बूँद बूँद तेल गिरा रही थी।

उस कोमल सुरंग में तेल भर कर छलकने लगा, बुर चपचचप करने लगी, तो अपनी बायीं हथेली से बुच्ची ने दोनों फांको को चिपका दिया हलके हलके मसलने लगी, जैसे कोई पूड़ी के लिए आटा गूंथ रहा हो।



अब उसके बाद भैया का नंबर था, तो बचा खुचा तेल पहले डंडे पर लगा फिर उस चर्मदण्ड की एकलौती आँख खोल के तेल चुआने लगी।



बस अब खेल शुरू होने वाला था, एक खिलाड़ी के लिए पहली बार था, लेकिन देखा उसने कई बार था, अपनी भौजी मुन्ना बहु से लेकर अभी थोड़ी देर पहले इसी कमरे में अहिराने वाली पूनम दीदी को सूरजु भैया के साथ ही।



दूसरा खिलाडी भी नया था, और उसने ज्यादा देखा भी नहीं था। शेर उसका लंगोटा खुलने के बाद ही महीने दो महीने पहले पिंजड़े से निकला था लेकिन अब धीरे धीरे आदम मतलब औरत खोर होता जा रहा था, दो दिन में भी इमरतिया भौजी, बुच्ची और अब लीलवा का नंबर,



और जांगर तो उस जैसा दस पांच गाँव में नहीं था किसी में, पहले लजाधुर था लेकिन अब किसको पाए किसकी न फाड़ दे वाली हालत थी

इमरतिया ने कच्ची कली फाड़ने पर जितना ज्ञान दिया था उतना अखाड़े के गुरु ने भी कोई दांव नहीं सिखाया था, तो बस,



लीलवा की टाँगे सूरजु के कंधे पर, जाँघे खूब फैली और बुच्ची ने बहन का काम पूरा किया, अपने भाई का मोटा खूंटा पकड़ के, उसका सूपड़ा अपनी मुंहबोली छोटी बहन के निचले मुंह पे सटा के शरारत से रगड़ा और फिर फिर पूरी ताकत से दोनों फांके फैला के चर्मदण्ड का मुख मुंड लगा दिया, भैया ने कमर का थोड़ा सा जोर बढ़ाया, लीला की दोनों कलाई पकड़ के फिर से पुरी ताकत से पुश किया,



लीला छटपटा रही थी छूटने के लिए तड़प रही थी लेकिन सूरजु ने कस के दोनों कलाई पकड़ रखी थी लीला की और बुच्ची अपने भैया का खूंटा पकड़ के धकेल रही थी। लीला के चेहरे पर जाड़े की रात में पसीना आ गया, पर न तो बुच्ची पसीजी न सूरजु पसीजे, वो ठेलते रहे, धकेलते रहे और थोड़ी देर में मदन बाण का मुंड उस कच्ची कली की खूब फैली फांको के बीच धंस गया।



दर्द के मारे लीला की आँखे बंद थी और अब उसे मालूम था की अब आगे क्या होने वाला है,

बुच्ची की आँखों में एक अजीब ख़ुशी और चमक थी, और अपने भैया से उसने आँखों ही आँखों में हाई फाइव किया, और सूरजु की आँखों में एक अजीब नशा देखा, जैसे किसी शिक़ारी के चंगुल में कोई शिक़ार आ गया हो, और अब वो बच के जा नहीं सकता हो



बुच्ची ने भैया को छोड़ दिया, लीला का सर अपनी गोद में रखा और थोड़ी देर सर सहलाती रही, झुक के डर से सूख रहे लीला के होंठों पर चुम्मी लेती रही, कभी अपनी जीभ घुसा देती और एक बार और झुकी और बुच्ची ने अपनी छोटी छोटी चूँची लीला के मुंह में डाल दी, फिर पूरी ताकत से अपने जोबन को उस कच्ची कली के मुंह में पेलते हुए बुच्ची ने अपना पूरा वजन लीला की देह पर रख कर उसे पूरी ताकत से दबाते हुए, सूरजु को इशारा किया

" ठोंक दो "



सूरजु ने भी अपने दोनों हाथों से उस बारी उमरिया वाली की कच्ची ककड़ी ऐसी कलाइयां उसी पहलवान वाली ताकत से पकड़ रखी थी जैसे दंगल में वो जकड़ता था और आज तक कोई उससे हाथ नहीं छुड़ा पाया।

खुली खिड़की से आती चांदनी, मिट्टी के फर्श पर लेटी छटपटाती मुन्ना बहू की कच्ची कोरी ननद, उसके मुंह में अपनी चूँची ठेले, अपना पूरा बोझ उसपे डाले बुच्ची और कलाई पहलवान के हाथों में



और सूरजु ने मूसल ठोंक दिया, लेकिन इंच भर भी न घुसा होगा।



दर्द से लीला तड़प रही थी , देह ऐंठ रही थी, पार आवाज निकलती कैसे मुंह में बुच्ची ने पूरी ताकत से अपनी चूँची ठेल रखी थी,



सरजू ने फिर धक्का लगाया, कमर का चूतड़ का पूरा जोर लगा दिया



थोड़ा और सरका, था भी तो उसका लीला की कलाई से भी मोटा, चूत धीरे धीरे फ़ैल रही थी, लग रहा था अब फटी, तब फटी, जहाँ ऊँगली नहीं घुस पाती थी वहां मोटा बांस जा रहा था,



सूरजु ने धकेलना बंद नहीं किया, हाँ उसने भी भी आँख बंद कर के पूरा ध्यान धक्के पर लगाया, दो मिनट चार मिनट



सुपाड़ा अब एकदम अटक गया था, एक दो इंच और अंदर घुस गया था, और बुच्ची और सूरजु दोनों जानते थे अब स्साली लीलवा लाख चूतड़ पटके लंड बिना चोदे, झीली फाड़े, सफ़ेद रंग की दूध दही की उलटी किये बाहर नहीं आने वाला था।





और बुच्ची ने लीला को छोड़ दिया, मोटी मोटी चूँची, बेचारी लीला के मुंह से निकाल ली। हाँ अभी भी पूरी ताकत से दोनों कंधो को पकडे रही और मुस्करा कर अपने भाई को देखा जिसका सुपाड़ा और मोटा लंड अब अच्छी तरह उस बिन फटी बुर में पैबस्त था। दोनों भाई बहन मुस्कराये,



सूरजु को कई भौजाइयों ने समझा दिया था " तेरा मूसल हथोड़े से भी तगड़ा है तो नए माल में घुसेड़ के थोड़ी देर छोड़ देना, उसका दर्द कुछ कम हो जाये, बिलिया को मूसल की आदत पड़ जाए, दो चार मिनट ऐसी ही, फिर जब बो मुस्कराये तो बस घचक के पेलना, बिना झिल्ली फाड़े छोड़ना मत,



सूरजु ने ठेलना बंद कर दिया, अब आगे जा भी नहीं पा रहा था। और दो मिनट रुककर लीला ने आँखें खोलीं, दर्द तैर रहा था और बड़ी कमजोर सी मुस्कान से मुस्कुराई। जाँघे अभी भी फटी पड़ रही थी लेकिन बिल को मूसल की हलकी सी आदत हो रही थी थी, वो बेचारी सोच रही थी बस अब दर्द की घडी ख़त्म हो गयी।



बुच्ची की ओर देखकर उसने गुहार लगाई, " दी भैया को बोलिये बस थोड़ी देर के लिए निकाल लें बस ज़रा सा, फिर भले ही, एकदम सहा नहीं जा रहा था "



बुच्ची मुस्करायी। चिड़िया अब अच्छी तरह बहेलिया के जाल में फंस गई है। थोड़ा सा पंख फड़फड़ाएगी, तो फड़फड़ा ले।



उसने मुस्करा कर अपने भाई से बड़े भोलेपन से बोला, " भैया बेचारी कह रही है, जरा सा निकालने के लिए तो बस जरा सा ही निकालना, निकाल लो न थोड़ा सा फिर भले ही पूरा बांस ठेल देना "

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बेचारी लीला समझ नहीं पायी, बुच्ची को देख कर मुस्करा कर हामी में सर हिलाया और धीरे से बुदबुदायी, " हाँ बस थोड़ी देर "



लेकिन सूरजु ने बुच्ची की बात समझ ली, दस कदम आगे बढ़ने के लिए कभी दो कदम पीछे भी हटना पड़ता है। बस लंड थोड़ा सा पीछे घसीटा , सुपाड़ा बस फंसा रहा गया था, दो मिनट गहरी सांस ली जैसे सांड फुफकारता है, खुर जमीन में रगड़ता है, धुल उड़ाता है और फिर,



क्या ताकत है सूरजु की देह में बुच्ची की आँखे फटी रह गयीं हो, जैसे कोई दस मंजिला ईमारत एक हाइड्रा झटके में तोड़ दे



सूरजु ने कस के लीला की पतली कमर अपने दोनों मजबूत हाथों से जकड़ रखी थी और जैसा कोई तगड़ा श्रमिक लोहे के फाब्डे से पथरीली जमीन खोद रहा हो, चोट पर चोट मार रहा हो, धक्के पर धक्के लग रहे, वो मोटा रैम अंदर सरकता हुआ घुस रहा था। सूरजु पेलता रहा, धकेलता रहा, ठेलता रहा, अब उसकी मांसल कसरती देह पर भी पसीने की बूंदे एक नौ लड़ी माला की तरह आ गयी थी।



वो फिर रुका और थोड़ा सा पीछे खिंच कर क्या ताकत से उसने धक्का मारा,



लग रहा था लीला बेहोश हो गयी, उसकी देह अजीब ऐंठ रही थी, पर न बुच्ची उधर देख रही था न सूरजु। बुच्ची कसी बुर में से बूँद बूँद पसीजती लाल लाल बूंदे देख रही थी, जिसने पहले बुर की फांको को लाल किया, फिर सूरजु के खूंटे को और लीला की जांघ धीरे धीरे लाल होने लगी।



सूरजु की निगाह लीला की खूब कड़ी पथराई छोटी सी चूँची पर चिपकी थी, बस एक हाथ से वो कमर पकडे रहा, दूसरा हाथ लीला के उभार पर , और अबकी जब पिस्टन निकला तो लाल भभुका।



और लीला को कुछ राहत मिली, दर्द से देह अभी भी चूर थी, पर उसने आँखे खोल दी और जांघ पर खून देख जोर से चिल्लाई

" अरे माई रे, जान गयी रे माई, बहुत दर्द हो रहा है, उफ्फ्फ, दीदी बचाय लो , उईईईईई नहीं, भैया निकाल लो , ओह्ह्ह्हह्ह "



झिल्ली फट गई थी।


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और बुच्ची ने झुक के लीला को चूम के कहा, " अरे पगली अब काहें रो रही है , झिल्ली तो फट गयी, जितना दर्द था ख़तम। अब तो मजा लो बस मजा "

लेकिन बुच्ची झूठ बोल रही थी।

अब की जब एक हाथ से चूँची और दूसरे से कमर पकड़ के सूरजु ने ठेला, तो जहाँ झिल्ली फटी थी जब उसे रगड़ते मोटा मूसल दुबारा अंदर गया तो बस लीला की जान नहीं निकली और वो जोर से चीखी,



" उईईई उईईई नहीं ओफ़्फ़्फ़्फ़ माई रे, जान गयी, उफ्फ्फ ओह्ह्ह्ह "

पर अब सूरजु की इन चीखों में ही मजा आने लगा था, कच्ची कली को चोदने का झिल्ली को फाड़ने का फायदा ही क्या जब तक लौंडिया रोये नहीं, चीखे नहीं नौ नौ टसुए न बहाये, आँख से आंसू निकल के गाल को भिगो दे और चूँची पे आ के रुके। उसजे अगला धक्का और जोर से मारा



नहीं नहीं भैया, उईईई अब नहीं रुक जाओ ओह्ह बस बस



चीखें बँसवाड़ी के पार पहुँच रही थी और नीचे कमरे में लेटी सूरजु की महतारी के पास भी, जितना जोर से लीला चीखती थीं, उतना ही बड़की ठकुराइन का मन हुलसता था। सीना उनका गज भर का हो गया। मुन्ना बहू आज ही लीलवा को पटा के लायी और आज ही उनके मुन्ना ने उसकी झिल्ली फाड़ दी। बस ऐसे ही पांच छह और की झिल्ली फाड़ दे उनका दुलारा, बरात जाने के पहले, तो जो उनके मन में डर था, इअतना लजाधुर है, इतने दिन से लंगोट बाँध के रखे था पहलवानी में, तो कहीं ससुराल में मजाक न उड़े, पहली रात को नाक न कटा दे, और बंस बढ़ाने के लिए ये सब काम सीखना भी तो जरूरी है। इमलिया भी मस्त लग रही थी, नामक तो लीला से भी ज्यादा है, खूब खटमिट्ठी। दुलरिया को बोला तो है, अरे सब काम गान का भौजाई नहीं करेंगी तो कौन करेगा।



लीला ने दुबारा चीख मारी अबकी हथौड़ा साढ़े बच्चेदानी पे पड़ा था, और वो कांपने लगी। बांस जड़ तक अंदर घुस गया था, और सूरजु ने पोजीशन कुछ रुक कर बदल दी, अब वो लीला को दुहरा कर के पेल रहा था।



करीब आधे घंटे तक लगातार बिना रुके चुदाई चली। लीला की चीखे सिसकियों में बदल गयीं , मजे से वो पागल हो रही थी, कभी खुद मुंह उठा के भैया को चूम लेती तो कभी मस्ती में अपने नाखून उसके पीठ में धंसा देती, कभी कभी धक्के का जवाब धक्के से भी देती



और जब बारिश हुयी तो लीला उसके पहले तीन बार झड़ चुकी थी। और सूरजु ने उसे कस के दबोच रखा था, सब माल मलाई बिल में गयी और फिर धीरे धीरे रिसती हुयी, लीला की जाँघों पर बाहर निकली।



कुछ देर बाद बुच्ची ने किसी तरह दोनों को अलग किया और जब बुच्ची लीला के साथ सूरजु के कमरे से बाहर निकल कर कोहबर वाले कमरे में गयी तो ढाई से ऊपर हो रहा था। किसी तरह एक दूसरे को कभी सहारा देती कभी दीवाल का सहारा लेती दोनों कोहबर वाले कमरे में पहुंची, जहाँ पूनम दीदी , मंजू भाभी और मु
न्ना बहू एक दूसरे से चिपकी सो रही थीं
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Shetan

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भाग २१७ ---बुच्ची --
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भैया से मिलन के बाद

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कोई दूर से भी देख के कह सकता है, ये छोरी चोदी नहीं गयी है कचरी गयी है और वो भी कस के।



असल में तिलक वाले दिन के बाद जब सब लोग गाने के लिए बैठे थे, तो बुच्ची दूल्हे की अकेली बहन छेड़ी जा रही थी, गरियाई जा रही थी और बड़की ठकुराइन दूल्हे की माँ की भी शह थी, खूब खुश थी, तिलक जबरदस्त चढ़ी थी, लड़की वालों ने पूरा आंगन भर दिया था, उम्मीद से कई गुना, लड़की भी पढ़वइया, दस का इम्तहान दी थी. कोई गाँव की भौजाई दूल्हे के बारे में बोली,

" हमार देवर जबरदस्त पहलवान हैं "

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" अरे हमार भैया हजार डंड पेलते है रोज "

बुच्ची ने खुश हो के कहा, तो बस एक कोई भौजाई, और कौन मुन्ना बहू ने चिढ़ाया,

" और अब लंड पेलेंगे, और दुलहिनिया के आने के पहले, अपनी छोटकी बहिनिया को तोहें, घोंटना अपनी चुनमुनिया में गपागप, अभी से तेल वेल लगा लो पेलवाने के लिए "

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और सब भौजाइयों, गाँव की औरतों के ठहाके गूँज गयी। लग रहा था अब, शादी का घर है, पर बुच्ची अलफ़, चेहरा गुस्से से लाल,

" भौजी ये कौन बात हुयी, ....फिर भाई से लगा के, …"
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" अरे सबके सामने भाई, कुठरिया में भतार "

एक बबुआने की ही भौजी ने और रगडा, जो लड़की जितना चिढ़ती थी, उतनी ही ज्यादा गरियाई जाती थी। बड़की ठकुराइन ने बात सम्हाली लेकिन मुन्ना बहू और इमरतिया दोनों को इशारा कर दिया,

" पक्की छिनार बनाना है, असल वाली और इस की फटेगी नहीं, ….चीथड़े चीथड़े होगी "



तो बस आज बुच्ची की चिथड़े चिथड़े ही हुई थी।



बुच्ची की हालत गौने की रात के अगले दिन सुबह नई दुल्हन की जो हाल होती है, उससे भी ख़राब थी।

जमीन पर पैर नहीं रखा जा रहा था, जाँघे फ़टी पड़ रही थीं, कुछ थकान से, कुछ बुरिया जो अंदर से जगह जगह छिल गयी थी, और एक तरफ से इमरतिया भौजी ने सहारा दे रखा था और दूसरी ओर से किसी तरह दीवार का सहारा लेकर, वो रुक रुक कर धीरे धीरे सीढ़ी पर एक एक कर के पैर रख रही थी।

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चेहरा जैसे पीला पड़ गया था, आँखे थकी लग रही थीं, बाल भी बिखर गए थे, गाल पर जगह जगह निशान थे, चूसने के तो कहीं काटने के, होंठ तो एकदम सूज के लाल हो गए थे और निचले होंठों की भी यही हालत थी।

लेकिन सबसे ज्यादा बुरी हालत बुरिया के साथ जुबना की भी थी।

अखाड़े का दमदार पहलवान, नया नया खिलाडी , बस उसने पूरा जोर लगा दिया छोटी छोटी चूँचियों पर, रगड़ा मसला और कचकचा के काटा भी,

बुच्ची की दर्द के मारे हालत खराब थी, लेकिन वो सोच के मुस्करा रही थी। गलती बेचारे भैया की थी भी नहीं, एक तो उसके छोटे छोटे जुबना वैसे ही आग लगाते हैं , और भैया को देख के आज से नहीं जमाने से, अपनी कच्ची अमिया उभार के उन्हें ललचाती थी, कभी उनकी पीठ से रगड़ देती तो कभी खुद उनका हाथ पकड़ के कच्चे टिकोरों पे रख देती, और उसकी देह भी एकदम छन्न से हो जाती, और सिर्फ भैया क्यों,

शीलवा से जब वह कभी चिढ़ाती की यार स्साली तेरे यार मेरे पीछे ज्यादा पड़ें है , तो शीलवा स्साली भी उसके उभार मसल के बोलती,

" मेरी रानी न गलती मेरे यारो की है न मेरी सहेली की, गलती तेरे ये उठ रहे उभारों की है। चल अपनी गुझिया अपने भैया भतार के लिए बचा रखी है तो रस्ख स्साली, लेकिन बुरचोदी, ये अपनी खट्टी मीठी अमिया तो कभी मेरे यारों को चखा दे। अरे यार जोबन दबवाने से ही बढ़ते हैं।

और आज जब भैया को मौका मिला तो क्या कस कस के मसला है उन्होंने, जैसे कोई औरत पूड़ी के लिए आटा गूंथ रही हो, चोदते समय भी नहीं छोड़ा, और जब घोड़ी बना के, निहुरा के पेला तब तो लगातार बुच्ची के दोनों जोबना रगड़ा, ऐसी कस के टीस उठ रही है, रह रह के दर्द टपक रहा है, पर उस दर्द के साथ जब भैया के उँगलियों की, नाखुनो की दांत की याद आती है तो मजा भी खूब आ रहा था।

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कोई दूर से भी देख के कह सकता है की कस के कचरी गयी है,

और बुच्ची बस यही मना रही थी, कि किसी भौजाई कि निगाह न पड़े वरना इतना चिढायंगी, और स्कर्ट उठा के चुनमुनिया कि हाल न सिर्फ खुद देख्नेगी बल्कि दस लोगो को और दिखाएंगी, ।



गनीमत थी कि अभी अभी साँझ जगाने की रस्म ख़तम हुयी थी, तब भी दो चार भौजाइयां मडंप में ही बैठीं कुछ रस्म कर रही थीं, मंजू भाभी और रामपुर वाली के जिम्मे रसोई का पूरा काम था तो वो दोनों रसोई में धंसी थीं और चुनिया भी उनके साथ, अहिराने और भरौटी वाली जो सब आयी थीं अब अपने अपने घर गयीं थीं, तीन घंटे बाद फिर आना था।



दर्द के मारे जान निकल रही थी, लेकिन ख़ुशी भी बहुत हो रही थी।



उईईई, वो जोर से चीखी, एक पैर गलत पड़ गया था, जोर से 'वहाँ' चिलख उठी,

" सम्हल के बबुनी " इमरतिया ने सम्हाल लिया और चिढ़ाया,

" घोंटते समय तो बहुत मजा आ रहा था, "
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बुच्ची मुस्करायी और फिर दीवाल पकड़ के धीरे धीरे संभाल के उतरने लगी, लेकिन उसकी आँखे बस नीचे देख रही थीं की कहीं भाभियाँ न हों, वरना चिढ़ा चिढ़ा के, लेकिन उसकी मामी, बड़की ठकुराइन दिखीं, और उसे देख के वो जोर से मुस्करायीं, वो बुच्ची की हालत देख के समझ गयीं।

काम हो गया,

उनके बेटवा ने अपनी कच्ची कोरी बहिनिया की झिल्ली फाड़ दी, बस ऐसे ही बियाहे के पहले दो चार और, कच्ची कुंवारियों का कबाड़ा करे तो एकदम पक्का हो जाएगा, जबतक दुलहिनिया आएगी।

लेकिन उनके मन में बुच्ची से ज्यादा बुच्ची की माई की तस्वीर उभर रही थी,

अरे बुच्चिया से भी पूरे चौदह महीने छोट थीं, जब बड़की ठकुराइन गौने उतरी थीं, लेकिन क्या जोबन था,

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एकदम बुच्चिया उन्ही पे पड़ी है, बल्कि जोबन के मामले में तो बुच्चिया अपनी माई से भी दो हाथ आगे है, और बड़की ठकुराइन ने पटा के अपनी ननद के ऊपर किसको किसको नहीं चढ़ाया, सूरजु के बाबू, चाचा, मामा,



बुच्चिया के मन में में भी अपनी माई की शक्ल घूम रही थी, हल्दी के बाद से जब से उसने अपनी मौसी ( सूरजु भैया की बुआ, कांति बुआ ) को सूरजु भैया के मामा से पेलवाते देखा था और जो बात उन लोगो ने बुच्ची की माई के बारे में कही थी, अपनी भौजाई के भाई से दो दिन में छह बार, और तीन बार गांड मरवाया सो अलग, बुच्ची दर्द भूल के मुस्कराने लगी,

" अगर तोहार नंबर न डकायी तो, तोहार असल बिटिया नहीं",

बुच्ची सोच रही थी, यहां तो, शीला और उसके यार सब सावन में कितना पीछे पड़े थे, लेकिन बाद में शीला भी समझ गयी, पहले भाई का नंबर, उसके बाद कोई और, लेकिन अब जब सूरजु भैया ने दरवाजा खोल दिया है तो फिर तो, चलो अपनी माई के चौदह महीना बाद खेल शुरू हुआ, लेकिन पक्का अब आज तक गाँव में सब लोग जो बुच्ची क माई क बात करते हैं, अब बुच्ची क बात करेंगे,



बुच्ची ने सबसे पहले अपनी माई को ही देखा था, करवाते, नहीं नहीं बाबू जी के साथ नहीं , वो तो सब लड़कियां देखती हैं सीखती हैं और अपने बाबू का देख देख के ललचाती हैं, बुच्चिया कोई अलग थोड़े थीऔर वो तो चार साल पहले तक माई के साथ ही अक्सर सोती थी, गाँव में मर्द तो अक्सर बाहर ही सोते हैं, फिर भी नागा नहीं होता।

लेकिन बुच्ची ने मौसा जी और फूफा के साथ भी, माई को, ….पर आज जो सुना उसने ,



लेकिन उसको बुरा कुछ नहीं लगा, बस बुच्ची ने तय कर लिया, अब तक लोग उसकी माई को याद करते हैं न अब आगे से सब उसको याद करेंगे, और एक बार जब भैया का हाथ भर का पूरा घोंट लिया फिर तो,

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सीढ़ी से उतरने के पहले ही उसने शीलवा, अपनी सहेली, को देखा और दोनों सहेलियों के चेहरे खिल उठे।


शीलवा पक्की लंडखोर, समझ गयी की अब उसकी सहेली भी उसकी बिरादरी में आ गयी है और अब उसके यारों की चांदी हो जायेगी, और सीढ़ी से उतरते ही जैसे इमरतिया ने बुच्ची को पकड़ के सहारा दिया था, शीला ने सम्हाल लिया।
बुची बेचारी से चला नही जा रहा और मुँह छुपाए गली मे घूम रही है. सुकर है इमरतिया भौजी का. जो उसे सहारा दी हुई है. उसे डर है की कही भौजाई पार्टी मे गई तो उसकी और उसके मुनिया की नुमाइस हो जाएगी. अरे नांदिया तो होती है पैदाइसी छिनार. मुँह छुपाने की क्या जरुरत. ठकुराइन को बुची की महतारी याद आ गई. वो तो ठकुराइन की नांदिया छिनार थी. तो जब उसके कांड फेमॉस है. मौसा फूफा सबको मौका मिला. तो बुची तो उसी छिनार की बेटी है. ठकुराइन ने तो कहे ही दिया. टॉप की रांड बना ना है.

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Shetan

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शीला

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शीला आज सुबह से अपने घर चली गयी थी ,

असल में सुबह सुबह उसकी माहवारी शुरू हो गयी थी और जिन लड़कियों औरतों की माहवारी होती है, वो न तो किसी रसम में रह सकती हैं न रसोई में जा सकती हैं। हाँ, घर में आने-जाने की, बाकी काम-काज की कोई मनाही नहीं है।

और आज सुबह से एक के बाद एक रस्म थीं, चुमावन, फिर हल्दी, फिर नेछु और उसके बाद लावा भूजने की, और शीलवा किसी में नहीं थी।

हाँ अब जब रसम सब ख़तम हो गयी थी तो वो आयी थी पर कोहवर रखाई में भी पांच दिन की उसकी छुट्टी थी, उसकी जगह बड़की ठकुराइन ने पूनम और लीला को बोल दिया था आज से रहने को।


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लेकिन ब्याह के घर में पचास काम होते हैं और फिर दस तरह की लड़कियां सब से चुहुलबाजी, और शीलवा की तो पक्की दोस्ती हो गयी थी, इसलिए वो कुछ देर पहले आ गयी थी और चुनिया ने उसे बाकी सब लड़कियों से भी मिलवा दिया था, शीतल मौसी की बेटी, रमा, और बड़ी मामी की बेटी रीनू , सुशीला चाची की बेटी मीना, और सब पक्की सहेली बन गयी थीं, और फिर लड़कों की बातें शुरू हो गयीं ,


लेकिन जब बुच्ची आयी तो शीला अकेले थी,

चुनिया रमा के साथ रसोई में थी, सुशीला चाची मीना को लेकर घर चली गयी थीं की, बस घंटे दो घंटे में आ जाएंगी, ससुर को खाना खिला के, और जब बड़की ठकुराइन और शीतल मौसी ने बड़ी जिद की कि कम से कम मीना को छोड़ दें, सब उसकी समौरिया लड़कियों के साथ रहेगी तो सुशीला चाची बोलीं, कि जब गाने में आएँगी तो उनकी बेटी आएगी और फिर उसको वो यहीं छोड़ देंगी, रात में घर पे ससुर अकेले हैं इसलिए वो लौट जाएंगी,



तो बस शीला थी और बड़की ठकुराइन उसको कुछ काम समझा रही थीं,

बुच्ची को देखकर वो हलके से मुस्करायीं और बुच्ची लजा गयी,



शीला ने बुच्ची को गले से लगा लिया और कान में हलके से पूछा, " मजा आया " ,


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लेकिन इतने हलके से भी नहीं, सुरजू की माई ने साफ़ साफ़ सुन लिया था, और वो जोर से मुस्करायीं और इमरतिया को खींच के अपने कमरे में ले गयीं, अपने बेटे की चुदाई का हाल खुलासा सुनने के लिए,

[

शीला जानती थी, यहाँ बुच्ची से खुल के बात नहीं हो पाएगी तो वहीँ से उसने बड़की ठकुआइन को गुहार लगायी,

" जरा ये बुच्चिया को बाहर ले जा रही हूँ, अपने घर तक, घंटे भर में वापस आ जाएगी, "

"एकदम एकदम जाओ दोनों जाने, साढ़े आठ बजे से गाना है, आठ बजे तक आ जाना. अरे जाड़ा है जल्दी सांझ हो जाती है, अभी तो छह भी नहीं बजा होगा " इमरतिया अपने और बड़की ठकुराइन दोनों की और से बोलीं,
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बड़की ठकुराइन ने पूरे दो घंटे के लिए बुच्ची को छुट्टी दे दी।

पीछे वाली खिड़की से दोनों सहेलियां निकल गयीं, और शीला बुच्चिया का हाथ पकड़ एक घसीटते हुए, कुंए की बगल से, जहाँ जानवर बांधे जाते थे, उस के पास से खींचते हुए, आम की बगिया में धंस गयी।

बहुत बड़ा बाग़ नहीं था, लेकिन तब भी सौ डेढ़ सौ पेड़ तो होंगे ही, पर असली बात थी खूब गझिन थी, दिन में हाथ को हाथ नहीं सूझता था, और अब तो सांझ एकदम गहरा गयी थी। पर बुच्ची को उस बाग़ का एक एक पेड़, एक एक रास्ता पता था, सावन में जब आयी थी कितनी बार वहीं झूला झूलने आती थी, और उससे भी बढ़कर दसो बार बुच्ची ने चौकीदारी भी की, जब शीला अपने यारों के साथ गपागप करती थी तो बुच्ची आम के पेड़ पर चढ़कर, दूर दूर तक निगाह रखती थी और उससे भी ज्यादा मजे से बुच्ची और उसके यारो की मस्त चुदाई देखती थी, मन तो उसका भी बहुत करता था, लेकिन उसने तय कर लिया था, सबसे पहले सूरजु भैया के साथ, हाँ उसके बाद शीला को मना नहीं करेगी।
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और बाग़ में पहुँचकर शीला थोड़ा अंदर घुस गई और रुक गई।

सांझ की लालिमा पेड़ों की फुनगियों पर अटकी हुई थी, जैसे सूरज किसी तरह अपना आँचल छुड़ाकर भागने की जद्दोजहद कर रहा हो।

शीला को भी बेताबी थी — अपनी सहेली की फटी-चूत की पूरी कहानी सुनने की।


इस साल सावन में जब बुच्ची आई थी, तब उसके यारों ने कितना मिन्नतें की थीं। शीला से तो की ही, कई लौंडों ने बुच्चिया की जाँघें खोलने के लिए सीधे हाथ जोड़े थे, लेकिन वो ढाई सेर का ताला लगाकर बैठी रही। अब ताला खुल गया तो साफ़ झलक रहा था कि कसके चुदाई हुई है, चूत बुरी तरह फटी और निचोड़ी गई है।

शीला ने उसका हाथ मरोड़कर कसके पकड़ा और घुप अंधेरी आम की बगिया में घसीटते हुए ले चली।



बुच्ची की चूत में अभी भी जैसे कोई मोटा लकड़ी का लंड घुसा हुआ हो, हर कदम पर चीख निकल रही थी। झिल्ली फटने वाली जगह पर भैया ने बार-बार अपना मोटा लंड रगड़ा था, अब वो जगह लाल होकर अच्छे से छिल गई थी। बुच्ची चल नहीं पा रही थी, जाँघें रगड़ती हुई लंगड़ाती चल रही थी। बार-बार रोते हुए बोली,

"कमीनी स्साली... रुक जा न... मेरी चूत फट गई है...!"



लेकिन शीला को तो मजा आ रहा था। स्साली ने उसके यारों को बहुत तड़पाया था। वो और ज़ोर से उसे खींचकर अमराई के अंदर ले गयी,. जहाँ पेड़ खूब घने थे। जब बुच्ची बार-बार चीखने लगी तो बाग़ के सबसे घने और अंधेरे कोने में शीला रुक गई।

"अब बोल साफ-साफ, भैया को सीधी चुदाई दे दी या कुछ कबुलवाया भी?"

बुच्ची ने शीला को कसके गले लगा लिया, हँसते हुए बोली,

"अरे शीलवा, उनसे तो ऐसी बात कबुलवा ली है जो तू सुनकर भी चूत गीली कर लेगी। मान जाएगी कि मैं तेरी असली रंडी सहेली हूँ।"

"वो तो तू है ही, रंडी। पहले जाँघें नहीं खोल रही थी, अब चूत खुल गई। लेकिन बोल न साफ-साफ, वरना तेरे भैया ने तेरी बुर फाड़ी है, मैं तेरी गांड फाड़ दूंगी आज।"

"अरे छिनार, बता रही हूँ," बु

च्ची हँसकर बोली और शीला के गाल चूमकर बोली, "दर्द चाहे जितना हो, गांड भी उसी मोटे लंड से फड़वाऊंगी जिसने मेरी चूत फाड़ी है — अपने भैया भतार से। चल, बताती हूँ।"

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दोनों एक पुराने घने पेड़ के नीचे छिपकर बैठ गईं। चारों तरफ इतनी घुप्प अंधेरी कि जेठ की दोपहरी में भी सूरज की किरण नहीं पहुँचती थी।

बुच्ची ने हँसते हुए शुरू किया,

"पहली बार तो बहुत डर लग रहा था, चूत सूख गई थी। इमरतिया भौजी ने मेरी दोनों कलाइयाँ कसके पकड़ ली थीं, हिल भी नहीं सकती थी। भैया का मोटा लंड देखकर तो घबराहट हो रही थी, लेकिन भौजी ने दिन में दो बार चुदाई करके दिखा दिया था कि कितना मजा है। भैया देह से तो भैंसा है, लेकिन दिमाग से बिल्कुल उल्लू। दूसरे राउंड में जब वो रिरियाने लगा, तो मैंने शर्त रख दी..."

फिर बुच्ची हँसी के फव्वारे छूट पड़े।

"बोल न स्साली, क्या कबुलवाया अपने भैया से?" शीला बेचैनी से पूछ रही थी।

बुच्ची ने होंठ शीला के कान से सटाकर फुसफुसाया,

"मैंने कहा —

'भैया, तुम बहनचोद तो बन गए, लेकिन अब तेरी बहन की चूत दुबारा तब मिलेगी जब तू कबूल करेगा कि तू पक्का मादरचोद भी बनेगा। वरना तेरी बहन की यह कसी हुई चुनमुनिया हमेशा बंद रहेगी।'"
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शीला ज़ोर से हँस पड़ी। हँसी रुकने के बाद बोली, "तो भैया माना?"

"माना? अरे दस बार कसम दिलवाई, कि अपनी माँ की चूत में लंड घुसाएगा और दो दिन के अंदर,... हचक-हचक के चोदेगा।"

बुच्ची ने आगे बताया, "जब भैया मुझे चोद रहे थे, शुरू में तो चूत फट रही थी, लेकिन फिर मलाई भर गई और मजा आने लगा। तो मैंने चिढ़ाते हुए कहा..."

"बोल न स्साली, अपनी भैया की रखैल," शीला हँसते हुए बोली।

"भैया, एक बार बहन की चूत फाड़ने से कोई बहनचोद नहीं हो जाता।"

भैया ने जवाब दिया — "स्साली, तेरी जैसी टाइट चूत को कौन एक बार चोद के छोड़ सकता है? अब रोज बिना नागा तुझे मेरा मोटा लंड चूसना और घोंटना पड़ेगा।"

बुच्ची बोली, "मैंने कहा — 'जैसे एक बार बहन चोदने से बहनचोद नहीं होता, वैसे ही एक बार माँ चोदने से मादरचोद नहीं होता। तुझे अपनी माँ की चूत रोज चोदनी पड़ेगी, समझा मादरचोद?'


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और उसके बाद भैया ने मेरी चूत में इतने ज़ोरदार धक्के मारे कि अभी तक मेरी चूत जल रही है।"

शीला ने मुस्कुराते हुए कहा,


"एकदम सही किया तूने। ये स्साले लौंडे माँ-बहन की गाली सुनकर ही सबसे ज्यादा गर्म होते हैं। अब जल्दी से उसे पक्का मादरचोद बना दे। जो लड़की अपने भाई से चुदती है और रोज उसका लंड घोंटना चाहती है, वो पीछे पड़कर उसे मादरचोद बनवा ही देती है।"

फिर शीला ने और अर्थाते हुए कहा, "जब माँ खुद बेटे का मोटा लंड अपनी चूत में घुसवा-घुसवाकर चुदवा रही होगी, तब भाई को बेटी की चूत में लंड डालने से कौन रोकेगा? दोनों माँ-बेटी एक ही लंड की दीवानी बन जाएंगी।"
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लेकिन बुच्ची का मन कहीं और भटक रहा था। उसकी आँखों के सामने वो दिन घूम रहा था जब कांती बुआ (उसकी सगी बड़ी मौसी) को सूरजू भैया के मामा जोर-जोर से चोद रहे थे।
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मामा बुच्ची की माई को याद करके बड़बड़ा रहे थे,

"अरे तेरी छोटी बहन कितनी जलाती है... बुच्ची तो बिल्कुल अपनी माई जैसी है, देखते ही लंड फनफना जाता है, चूत में घुसने को बेताब हो जाता है।"

कांती बुआ हँसकर चिढ़ाते हुए बोली थी,

"सब कहते हैं न कि बुच्ची तुम्हारी ही जाई है।


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उसकी माई की बिदाई से पहले ही तुमने उसे कसके चोदा था, उसके मोटे लंड से उसकी चूत फाड़ी थी और गाभिन भी कर दिया था।"

सूरजू भैया के मामा ने हँसते हुए कांती बुआ को ज़ोरदार धक्के मारते हुए जवाब दिया, "तो क्या जो बीज बोया है उसे फल खाने का हक नहीं है?

उस दिन से बुच्ची के मन में अपनी माई के लिए हवस और प्यार दोनों उमड़ने लगे थे। मामा की उस बात ने उसके दिमाग में आग लगा दी —

"है क्यों नहीं... बीज लगाने वाले को फल खाने का पूरा हक है।"

उसे लगने लगा था कि अगर बाप बेटी की चूत चोद सकता है, तो माँ बेटे का मोटा लंड क्यों नहीं घोंट सकती?

यही सोचकर वो सूरजू भैया के पीछे पड़ी हुई थी।

बुच्ची को बार बार अपने भैया से कही बात याद आ रही थी, एक तो उसके भैया ने कसम खायी थी, अपनी महतारी को न सिर्फ पेलेंगे, बल्कि हचक के पेलेंगे, भोसड़े के चीथड़े उड़ा देंगे और ऊपर से बुच्ची चिढ़ाते हुए बोली थी,

" भैया सोच लो, तुझे तो पक्का मादरचोद बनना है, और एक बार माँ चोदने से कोई बेटा मादरचोद नहीं हो जाता, बार बार लगातार, पूरे गाँव देहात में रगड़ रगड़ के खुल्ल्म खुला, और ऐसा वैसा मादरचोद नहीं, दस पांच गाँव छोडो, दस पांच जिले में वैसा मादरचोद नहीं होना चाहिए, और

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भैया के मूसल ने जबरदस्त धक्के से हामी भरी थी, उसी समय बुर के अंदर बुच्ची के छिल गया था, चमड़ी अंदर उचड़ गयी थी, अब तक चिल्ख उठ रही थी, चला नहीं जा रहा था, शीलवा एक हाथ का सहारा न दिए होती तो दस कदम चलना मुश्किल,

और अब शीला की बात भी बिल्कुल सही लग रही थी। भैया को उनके माँ के ऊपर चढ़ाना बहुत जरूरी है, उसका भी रास्ता हरदम के लिए साफ हो जाएगा।
जिस तरह सुहागरात के बाद सहेलियां कैसे हुआ राज जान ना चाहते है. वैसे ही कही और मुँह काला करवाने पर भी सहेलियों को बेताबी होती है की कैसे किया. और सिला भी बुची से मस्ती करते यही पूछ रही थी. आखिर उसे भी तो अपने यारों से बुची की ठुकाई करवानी थी. बुची ने भी बताया की कैसे उसने अपने भाई को भेनचोद बनाया. और कैसे भाई से मदरचोद होने का वादा लिया.

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Sutradhar

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Komal
लीलवा की ले ली
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आधे घंटे से भी कम समय में भैया का खूंटा फिर से फनफना गया और लीलवा पनिया भी गई, और मान भी गई।


छिनरपना किया, हाथ गोड़ पटका, लेकिन कुछ बुच्चिया की जीभ ऊँगली का कमाल, और कुछ सूरजु ने जांगर दिखाया, जोर जबरदस्ती की, बस



लीलवा मिटटी के फर्श पर लेटी थी, टांग फैलाये, जाँघे चौड़ी किये और बुर चियारे, और उसकी बिन फटी बुर में सरसो के तेल की बोतल लेकर बुच्ची चढ़ी थी, बड़ी मुश्किल से चिड़िया की चोंच खुली, अंदर की गुलाबी झलक दिखी और सूरजु और उसके आदरणीय मूसलचंद दोनों पागल।


बुच्ची ने एक हाथ की उँगलियों से बुलबुल की चोंच फैला रखी थी और दूसरे हाथ से बूँद बूँद तेल गिरा रही थी।

उस कोमल सुरंग में तेल भर कर छलकने लगा, बुर चपचचप करने लगी, तो अपनी बायीं हथेली से बुच्ची ने दोनों फांको को चिपका दिया हलके हलके मसलने लगी, जैसे कोई पूड़ी के लिए आटा गूंथ रहा हो।



अब उसके बाद भैया का नंबर था, तो बचा खुचा तेल पहले डंडे पर लगा फिर उस चर्मदण्ड की एकलौती आँख खोल के तेल चुआने लगी।



बस अब खेल शुरू होने वाला था, एक खिलाड़ी के लिए पहली बार था, लेकिन देखा उसने कई बार था, अपनी भौजी मुन्ना बहु से लेकर अभी थोड़ी देर पहले इसी कमरे में अहिराने वाली पूनम दीदी को सूरजु भैया के साथ ही।



दूसरा खिलाडी भी नया था, और उसने ज्यादा देखा भी नहीं था। शेर उसका लंगोटा खुलने के बाद ही महीने दो महीने पहले पिंजड़े से निकला था लेकिन अब धीरे धीरे आदम मतलब औरत खोर होता जा रहा था, दो दिन में भी इमरतिया भौजी, बुच्ची और अब लीलवा का नंबर,



और जांगर तो उस जैसा दस पांच गाँव में नहीं था किसी में, पहले लजाधुर था लेकिन अब किसको पाए किसकी न फाड़ दे वाली हालत थी

इमरतिया ने कच्ची कली फाड़ने पर जितना ज्ञान दिया था उतना अखाड़े के गुरु ने भी कोई दांव नहीं सिखाया था, तो बस,



लीलवा की टाँगे सूरजु के कंधे पर, जाँघे खूब फैली और बुच्ची ने बहन का काम पूरा किया, अपने भाई का मोटा खूंटा पकड़ के, उसका सूपड़ा अपनी मुंहबोली छोटी बहन के निचले मुंह पे सटा के शरारत से रगड़ा और फिर फिर पूरी ताकत से दोनों फांके फैला के चर्मदण्ड का मुख मुंड लगा दिया, भैया ने कमर का थोड़ा सा जोर बढ़ाया, लीला की दोनों कलाई पकड़ के फिर से पुरी ताकत से पुश किया,



लीला छटपटा रही थी छूटने के लिए तड़प रही थी लेकिन सूरजु ने कस के दोनों कलाई पकड़ रखी थी लीला की और बुच्ची अपने भैया का खूंटा पकड़ के धकेल रही थी। लीला के चेहरे पर जाड़े की रात में पसीना आ गया, पर न तो बुच्ची पसीजी न सूरजु पसीजे, वो ठेलते रहे, धकेलते रहे और थोड़ी देर में मदन बाण का मुंड उस कच्ची कली की खूब फैली फांको के बीच धंस गया।



दर्द के मारे लीला की आँखे बंद थी और अब उसे मालूम था की अब आगे क्या होने वाला है,

बुच्ची की आँखों में एक अजीब ख़ुशी और चमक थी, और अपने भैया से उसने आँखों ही आँखों में हाई फाइव किया, और सूरजु की आँखों में एक अजीब नशा देखा, जैसे किसी शिक़ारी के चंगुल में कोई शिक़ार आ गया हो, और अब वो बच के जा नहीं सकता हो



बुच्ची ने भैया को छोड़ दिया, लीला का सर अपनी गोद में रखा और थोड़ी देर सर सहलाती रही, झुक के डर से सूख रहे लीला के होंठों पर चुम्मी लेती रही, कभी अपनी जीभ घुसा देती और एक बार और झुकी और बुच्ची ने अपनी छोटी छोटी चूँची लीला के मुंह में डाल दी, फिर पूरी ताकत से अपने जोबन को उस कच्ची कली के मुंह में पेलते हुए बुच्ची ने अपना पूरा वजन लीला की देह पर रख कर उसे पूरी ताकत से दबाते हुए, सूरजु को इशारा किया

" ठोंक दो "



सूरजु ने भी अपने दोनों हाथों से उस बारी उमरिया वाली की कच्ची ककड़ी ऐसी कलाइयां उसी पहलवान वाली ताकत से पकड़ रखी थी जैसे दंगल में वो जकड़ता था और आज तक कोई उससे हाथ नहीं छुड़ा पाया।

खुली खिड़की से आती चांदनी, मिट्टी के फर्श पर लेटी छटपटाती मुन्ना बहू की कच्ची कोरी ननद, उसके मुंह में अपनी चूँची ठेले, अपना पूरा बोझ उसपे डाले बुच्ची और कलाई पहलवान के हाथों में



और सूरजु ने मूसल ठोंक दिया, लेकिन इंच भर भी न घुसा होगा।



दर्द से लीला तड़प रही थी , देह ऐंठ रही थी, पार आवाज निकलती कैसे मुंह में बुच्ची ने पूरी ताकत से अपनी चूँची ठेल रखी थी,



सरजू ने फिर धक्का लगाया, कमर का चूतड़ का पूरा जोर लगा दिया



थोड़ा और सरका, था भी तो उसका लीला की कलाई से भी मोटा, चूत धीरे धीरे फ़ैल रही थी, लग रहा था अब फटी, तब फटी, जहाँ ऊँगली नहीं घुस पाती थी वहां मोटा बांस जा रहा था,



सूरजु ने धकेलना बंद नहीं किया, हाँ उसने भी भी आँख बंद कर के पूरा ध्यान धक्के पर लगाया, दो मिनट चार मिनट



सुपाड़ा अब एकदम अटक गया था, एक दो इंच और अंदर घुस गया था, और बुच्ची और सूरजु दोनों जानते थे अब स्साली लीलवा लाख चूतड़ पटके लंड बिना चोदे, झीली फाड़े, सफ़ेद रंग की दूध दही की उलटी किये बाहर नहीं आने वाला था।





और बुच्ची ने लीला को छोड़ दिया, मोटी मोटी चूँची, बेचारी लीला के मुंह से निकाल ली। हाँ अभी भी पूरी ताकत से दोनों कंधो को पकडे रही और मुस्करा कर अपने भाई को देखा जिसका सुपाड़ा और मोटा लंड अब अच्छी तरह उस बिन फटी बुर में पैबस्त था। दोनों भाई बहन मुस्कराये,



सूरजु को कई भौजाइयों ने समझा दिया था " तेरा मूसल हथोड़े से भी तगड़ा है तो नए माल में घुसेड़ के थोड़ी देर छोड़ देना, उसका दर्द कुछ कम हो जाये, बिलिया को मूसल की आदत पड़ जाए, दो चार मिनट ऐसी ही, फिर जब बो मुस्कराये तो बस घचक के पेलना, बिना झिल्ली फाड़े छोड़ना मत,



सूरजु ने ठेलना बंद कर दिया, अब आगे जा भी नहीं पा रहा था। और दो मिनट रुककर लीला ने आँखें खोलीं, दर्द तैर रहा था और बड़ी कमजोर सी मुस्कान से मुस्कुराई। जाँघे अभी भी फटी पड़ रही थी लेकिन बिल को मूसल की हलकी सी आदत हो रही थी थी, वो बेचारी सोच रही थी बस अब दर्द की घडी ख़त्म हो गयी।



बुच्ची की ओर देखकर उसने गुहार लगाई, " दी भैया को बोलिये बस थोड़ी देर के लिए निकाल लें बस ज़रा सा, फिर भले ही, एकदम सहा नहीं जा रहा था "



बुच्ची मुस्करायी। चिड़िया अब अच्छी तरह बहेलिया के जाल में फंस गई है। थोड़ा सा पंख फड़फड़ाएगी, तो फड़फड़ा ले।



उसने मुस्करा कर अपने भाई से बड़े भोलेपन से बोला, " भैया बेचारी कह रही है, जरा सा निकालने के लिए तो बस जरा सा ही निकालना, निकाल लो न थोड़ा सा फिर भले ही पूरा बांस ठेल देना "

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बेचारी लीला समझ नहीं पायी, बुच्ची को देख कर मुस्करा कर हामी में सर हिलाया और धीरे से बुदबुदायी, " हाँ बस थोड़ी देर "



लेकिन सूरजु ने बुच्ची की बात समझ ली, दस कदम आगे बढ़ने के लिए कभी दो कदम पीछे भी हटना पड़ता है। बस लंड थोड़ा सा पीछे घसीटा , सुपाड़ा बस फंसा रहा गया था, दो मिनट गहरी सांस ली जैसे सांड फुफकारता है, खुर जमीन में रगड़ता है, धुल उड़ाता है और फिर,



क्या ताकत है सूरजु की देह में बुच्ची की आँखे फटी रह गयीं हो, जैसे कोई दस मंजिला ईमारत एक हाइड्रा झटके में तोड़ दे



सूरजु ने कस के लीला की पतली कमर अपने दोनों मजबूत हाथों से जकड़ रखी थी और जैसा कोई तगड़ा श्रमिक लोहे के फाब्डे से पथरीली जमीन खोद रहा हो, चोट पर चोट मार रहा हो, धक्के पर धक्के लग रहे, वो मोटा रैम अंदर सरकता हुआ घुस रहा था। सूरजु पेलता रहा, धकेलता रहा, ठेलता रहा, अब उसकी मांसल कसरती देह पर भी पसीने की बूंदे एक नौ लड़ी माला की तरह आ गयी थी।



वो फिर रुका और थोड़ा सा पीछे खिंच कर क्या ताकत से उसने धक्का मारा,



लग रहा था लीला बेहोश हो गयी, उसकी देह अजीब ऐंठ रही थी, पर न बुच्ची उधर देख रही था न सूरजु। बुच्ची कसी बुर में से बूँद बूँद पसीजती लाल लाल बूंदे देख रही थी, जिसने पहले बुर की फांको को लाल किया, फिर सूरजु के खूंटे को और लीला की जांघ धीरे धीरे लाल होने लगी।



सूरजु की निगाह लीला की खूब कड़ी पथराई छोटी सी चूँची पर चिपकी थी, बस एक हाथ से वो कमर पकडे रहा, दूसरा हाथ लीला के उभार पर , और अबकी जब पिस्टन निकला तो लाल भभुका।



और लीला को कुछ राहत मिली, दर्द से देह अभी भी चूर थी, पर उसने आँखे खोल दी और जांघ पर खून देख जोर से चिल्लाई

" अरे माई रे, जान गयी रे माई, बहुत दर्द हो रहा है, उफ्फ्फ, दीदी बचाय लो , उईईईईई नहीं, भैया निकाल लो , ओह्ह्ह्हह्ह "



झिल्ली फट गई थी।


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और बुच्ची ने झुक के लीला को चूम के कहा, " अरे पगली अब काहें रो रही है , झिल्ली तो फट गयी, जितना दर्द था ख़तम। अब तो मजा लो बस मजा "

लेकिन बुच्ची झूठ बोल रही थी।

अब की जब एक हाथ से चूँची और दूसरे से कमर पकड़ के सूरजु ने ठेला, तो जहाँ झिल्ली फटी थी जब उसे रगड़ते मोटा मूसल दुबारा अंदर गया तो बस लीला की जान नहीं निकली और वो जोर से चीखी,



" उईईई उईईई नहीं ओफ़्फ़्फ़्फ़ माई रे, जान गयी, उफ्फ्फ ओह्ह्ह्ह "

पर अब सूरजु की इन चीखों में ही मजा आने लगा था, कच्ची कली को चोदने का झिल्ली को फाड़ने का फायदा ही क्या जब तक लौंडिया रोये नहीं, चीखे नहीं नौ नौ टसुए न बहाये, आँख से आंसू निकल के गाल को भिगो दे और चूँची पे आ के रुके। उसजे अगला धक्का और जोर से मारा



नहीं नहीं भैया, उईईई अब नहीं रुक जाओ ओह्ह बस बस



चीखें बँसवाड़ी के पार पहुँच रही थी और नीचे कमरे में लेटी सूरजु की महतारी के पास भी, जितना जोर से लीला चीखती थीं, उतना ही बड़की ठकुराइन का मन हुलसता था। सीना उनका गज भर का हो गया। मुन्ना बहू आज ही लीलवा को पटा के लायी और आज ही उनके मुन्ना ने उसकी झिल्ली फाड़ दी। बस ऐसे ही पांच छह और की झिल्ली फाड़ दे उनका दुलारा, बरात जाने के पहले, तो जो उनके मन में डर था, इअतना लजाधुर है, इतने दिन से लंगोट बाँध के रखे था पहलवानी में, तो कहीं ससुराल में मजाक न उड़े, पहली रात को नाक न कटा दे, और बंस बढ़ाने के लिए ये सब काम सीखना भी तो जरूरी है। इमलिया भी मस्त लग रही थी, नामक तो लीला से भी ज्यादा है, खूब खटमिट्ठी। दुलरिया को बोला तो है, अरे सब काम गान का भौजाई नहीं करेंगी तो कौन करेगा।



लीला ने दुबारा चीख मारी अबकी हथौड़ा साढ़े बच्चेदानी पे पड़ा था, और वो कांपने लगी। बांस जड़ तक अंदर घुस गया था, और सूरजु ने पोजीशन कुछ रुक कर बदल दी, अब वो लीला को दुहरा कर के पेल रहा था।



करीब आधे घंटे तक लगातार बिना रुके चुदाई चली। लीला की चीखे सिसकियों में बदल गयीं , मजे से वो पागल हो रही थी, कभी खुद मुंह उठा के भैया को चूम लेती तो कभी मस्ती में अपने नाखून उसके पीठ में धंसा देती, कभी कभी धक्के का जवाब धक्के से भी देती



और जब बारिश हुयी तो लीला उसके पहले तीन बार झड़ चुकी थी। और सूरजु ने उसे कस के दबोच रखा था, सब माल मलाई बिल में गयी और फिर धीरे धीरे रिसती हुयी, लीला की जाँघों पर बाहर निकली।



कुछ देर बाद बुच्ची ने किसी तरह दोनों को अलग किया और जब बुच्ची लीला के साथ सूरजु के कमरे से बाहर निकल कर कोहबर वाले कमरे में गयी तो ढाई से ऊपर हो रहा था। किसी तरह एक दूसरे को कभी सहारा देती कभी दीवाल का सहारा लेती दोनों कोहबर वाले कमरे में पहुंची, जहाँ पूनम दीदी , मंजू भाभी और मु
न्ना बहू एक दूसरे से चिपकी सो रही थीं

कोमल जी

ये पूनम वाला प्रकरण ???

शायद मुझसे ही कुछ छूट गया लगता है। बाकी शानदार अपडेट हमेशा की तरह।

सादर
 
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Sutradhar

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग 219 -- बुच्ची और लीला -दोनों ने लीला, ----खेला चोर सिपाही का पृष्ठ १२४३


मेगा अपडेट, १२ हजार से अधिक शब्द, पोस्टेड

कृपया पढ़ें, लाइक करें और कमेंट जरूर करें


कोमल जी

पूनम वाला प्रकरण और भाग 218 ???

कुछ गड़बड़ लग रहा है।

कृपया बताए कहां कुछ छूट रहा है ???

सादर
 
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Rajat1855

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13
<Practice makes ama
लीलवा की ले ली
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आधे घंटे से भी कम समय में भैया का खूंटा फिर से फनफना गया और लीलवा पनिया भी गई, और मान भी गई।


छिनरपना किया, हाथ गोड़ पटका, लेकिन कुछ बुच्चिया की जीभ ऊँगली का कमाल, और कुछ सूरजु ने जांगर दिखाया, जोर जबरदस्ती की, बस



लीलवा मिटटी के फर्श पर लेटी थी, टांग फैलाये, जाँघे चौड़ी किये और बुर चियारे, और उसकी बिन फटी बुर में सरसो के तेल की बोतल लेकर बुच्ची चढ़ी थी, बड़ी मुश्किल से चिड़िया की चोंच खुली, अंदर की गुलाबी झलक दिखी और सूरजु और उसके आदरणीय मूसलचंद दोनों पागल।


बुच्ची ने एक हाथ की उँगलियों से बुलबुल की चोंच फैला रखी थी और दूसरे हाथ से बूँद बूँद तेल गिरा रही थी।

उस कोमल सुरंग में तेल भर कर छलकने लगा, बुर चपचचप करने लगी, तो अपनी बायीं हथेली से बुच्ची ने दोनों फांको को चिपका दिया हलके हलके मसलने लगी, जैसे कोई पूड़ी के लिए आटा गूंथ रहा हो।



अब उसके बाद भैया का नंबर था, तो बचा खुचा तेल पहले डंडे पर लगा फिर उस चर्मदण्ड की एकलौती आँख खोल के तेल चुआने लगी।



बस अब खेल शुरू होने वाला था, एक खिलाड़ी के लिए पहली बार था, लेकिन देखा उसने कई बार था, अपनी भौजी मुन्ना बहु से लेकर अभी थोड़ी देर पहले इसी कमरे में अहिराने वाली पूनम दीदी को सूरजु भैया के साथ ही।



दूसरा खिलाडी भी नया था, और उसने ज्यादा देखा भी नहीं था। शेर उसका लंगोटा खुलने के बाद ही महीने दो महीने पहले पिंजड़े से निकला था लेकिन अब धीरे धीरे आदम मतलब औरत खोर होता जा रहा था, दो दिन में भी इमरतिया भौजी, बुच्ची और अब लीलवा का नंबर,



और जांगर तो उस जैसा दस पांच गाँव में नहीं था किसी में, पहले लजाधुर था लेकिन अब किसको पाए किसकी न फाड़ दे वाली हालत थी

इमरतिया ने कच्ची कली फाड़ने पर जितना ज्ञान दिया था उतना अखाड़े के गुरु ने भी कोई दांव नहीं सिखाया था, तो बस,



लीलवा की टाँगे सूरजु के कंधे पर, जाँघे खूब फैली और बुच्ची ने बहन का काम पूरा किया, अपने भाई का मोटा खूंटा पकड़ के, उसका सूपड़ा अपनी मुंहबोली छोटी बहन के निचले मुंह पे सटा के शरारत से रगड़ा और फिर फिर पूरी ताकत से दोनों फांके फैला के चर्मदण्ड का मुख मुंड लगा दिया, भैया ने कमर का थोड़ा सा जोर बढ़ाया, लीला की दोनों कलाई पकड़ के फिर से पुरी ताकत से पुश किया,



लीला छटपटा रही थी छूटने के लिए तड़प रही थी लेकिन सूरजु ने कस के दोनों कलाई पकड़ रखी थी लीला की और बुच्ची अपने भैया का खूंटा पकड़ के धकेल रही थी। लीला के चेहरे पर जाड़े की रात में पसीना आ गया, पर न तो बुच्ची पसीजी न सूरजु पसीजे, वो ठेलते रहे, धकेलते रहे और थोड़ी देर में मदन बाण का मुंड उस कच्ची कली की खूब फैली फांको के बीच धंस गया।



दर्द के मारे लीला की आँखे बंद थी और अब उसे मालूम था की अब आगे क्या होने वाला है,

बुच्ची की आँखों में एक अजीब ख़ुशी और चमक थी, और अपने भैया से उसने आँखों ही आँखों में हाई फाइव किया, और सूरजु की आँखों में एक अजीब नशा देखा, जैसे किसी शिक़ारी के चंगुल में कोई शिक़ार आ गया हो, और अब वो बच के जा नहीं सकता हो



बुच्ची ने भैया को छोड़ दिया, लीला का सर अपनी गोद में रखा और थोड़ी देर सर सहलाती रही, झुक के डर से सूख रहे लीला के होंठों पर चुम्मी लेती रही, कभी अपनी जीभ घुसा देती और एक बार और झुकी और बुच्ची ने अपनी छोटी छोटी चूँची लीला के मुंह में डाल दी, फिर पूरी ताकत से अपने जोबन को उस कच्ची कली के मुंह में पेलते हुए बुच्ची ने अपना पूरा वजन लीला की देह पर रख कर उसे पूरी ताकत से दबाते हुए, सूरजु को इशारा किया

" ठोंक दो "



सूरजु ने भी अपने दोनों हाथों से उस बारी उमरिया वाली की कच्ची ककड़ी ऐसी कलाइयां उसी पहलवान वाली ताकत से पकड़ रखी थी जैसे दंगल में वो जकड़ता था और आज तक कोई उससे हाथ नहीं छुड़ा पाया।

खुली खिड़की से आती चांदनी, मिट्टी के फर्श पर लेटी छटपटाती मुन्ना बहू की कच्ची कोरी ननद, उसके मुंह में अपनी चूँची ठेले, अपना पूरा बोझ उसपे डाले बुच्ची और कलाई पहलवान के हाथों में



और सूरजु ने मूसल ठोंक दिया, लेकिन इंच भर भी न घुसा होगा।



दर्द से लीला तड़प रही थी , देह ऐंठ रही थी, पार आवाज निकलती कैसे मुंह में बुच्ची ने पूरी ताकत से अपनी चूँची ठेल रखी थी,



सरजू ने फिर धक्का लगाया, कमर का चूतड़ का पूरा जोर लगा दिया



थोड़ा और सरका, था भी तो उसका लीला की कलाई से भी मोटा, चूत धीरे धीरे फ़ैल रही थी, लग रहा था अब फटी, तब फटी, जहाँ ऊँगली नहीं घुस पाती थी वहां मोटा बांस जा रहा था,



सूरजु ने धकेलना बंद नहीं किया, हाँ उसने भी भी आँख बंद कर के पूरा ध्यान धक्के पर लगाया, दो मिनट चार मिनट



सुपाड़ा अब एकदम अटक गया था, एक दो इंच और अंदर घुस गया था, और बुच्ची और सूरजु दोनों जानते थे अब स्साली लीलवा लाख चूतड़ पटके लंड बिना चोदे, झीली फाड़े, सफ़ेद रंग की दूध दही की उलटी किये बाहर नहीं आने वाला था।





और बुच्ची ने लीला को छोड़ दिया, मोटी मोटी चूँची, बेचारी लीला के मुंह से निकाल ली। हाँ अभी भी पूरी ताकत से दोनों कंधो को पकडे रही और मुस्करा कर अपने भाई को देखा जिसका सुपाड़ा और मोटा लंड अब अच्छी तरह उस बिन फटी बुर में पैबस्त था। दोनों भाई बहन मुस्कराये,



सूरजु को कई भौजाइयों ने समझा दिया था " तेरा मूसल हथोड़े से भी तगड़ा है तो नए माल में घुसेड़ के थोड़ी देर छोड़ देना, उसका दर्द कुछ कम हो जाये, बिलिया को मूसल की आदत पड़ जाए, दो चार मिनट ऐसी ही, फिर जब बो मुस्कराये तो बस घचक के पेलना, बिना झिल्ली फाड़े छोड़ना मत,



सूरजु ने ठेलना बंद कर दिया, अब आगे जा भी नहीं पा रहा था। और दो मिनट रुककर लीला ने आँखें खोलीं, दर्द तैर रहा था और बड़ी कमजोर सी मुस्कान से मुस्कुराई। जाँघे अभी भी फटी पड़ रही थी लेकिन बिल को मूसल की हलकी सी आदत हो रही थी थी, वो बेचारी सोच रही थी बस अब दर्द की घडी ख़त्म हो गयी।



बुच्ची की ओर देखकर उसने गुहार लगाई, " दी भैया को बोलिये बस थोड़ी देर के लिए निकाल लें बस ज़रा सा, फिर भले ही, एकदम सहा नहीं जा रहा था "



बुच्ची मुस्करायी। चिड़िया अब अच्छी तरह बहेलिया के जाल में फंस गई है। थोड़ा सा पंख फड़फड़ाएगी, तो फड़फड़ा ले।



उसने मुस्करा कर अपने भाई से बड़े भोलेपन से बोला, " भैया बेचारी कह रही है, जरा सा निकालने के लिए तो बस जरा सा ही निकालना, निकाल लो न थोड़ा सा फिर भले ही पूरा बांस ठेल देना "

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बेचारी लीला समझ नहीं पायी, बुच्ची को देख कर मुस्करा कर हामी में सर हिलाया और धीरे से बुदबुदायी, " हाँ बस थोड़ी देर "



लेकिन सूरजु ने बुच्ची की बात समझ ली, दस कदम आगे बढ़ने के लिए कभी दो कदम पीछे भी हटना पड़ता है। बस लंड थोड़ा सा पीछे घसीटा , सुपाड़ा बस फंसा रहा गया था, दो मिनट गहरी सांस ली जैसे सांड फुफकारता है, खुर जमीन में रगड़ता है, धुल उड़ाता है और फिर,



क्या ताकत है सूरजु की देह में बुच्ची की आँखे फटी रह गयीं हो, जैसे कोई दस मंजिला ईमारत एक हाइड्रा झटके में तोड़ दे



सूरजु ने कस के लीला की पतली कमर अपने दोनों मजबूत हाथों से जकड़ रखी थी और जैसा कोई तगड़ा श्रमिक लोहे के फाब्डे से पथरीली जमीन खोद रहा हो, चोट पर चोट मार रहा हो, धक्के पर धक्के लग रहे, वो मोटा रैम अंदर सरकता हुआ घुस रहा था। सूरजु पेलता रहा, धकेलता रहा, ठेलता रहा, अब उसकी मांसल कसरती देह पर भी पसीने की बूंदे एक नौ लड़ी माला की तरह आ गयी थी।



वो फिर रुका और थोड़ा सा पीछे खिंच कर क्या ताकत से उसने धक्का मारा,



लग रहा था लीला बेहोश हो गयी, उसकी देह अजीब ऐंठ रही थी, पर न बुच्ची उधर देख रही था न सूरजु। बुच्ची कसी बुर में से बूँद बूँद पसीजती लाल लाल बूंदे देख रही थी, जिसने पहले बुर की फांको को लाल किया, फिर सूरजु के खूंटे को और लीला की जांघ धीरे धीरे लाल होने लगी।



सूरजु की निगाह लीला की खूब कड़ी पथराई छोटी सी चूँची पर चिपकी थी, बस एक हाथ से वो कमर पकडे रहा, दूसरा हाथ लीला के उभार पर , और अबकी जब पिस्टन निकला तो लाल भभुका।



और लीला को कुछ राहत मिली, दर्द से देह अभी भी चूर थी, पर उसने आँखे खोल दी और जांघ पर खून देख जोर से चिल्लाई

" अरे माई रे, जान गयी रे माई, बहुत दर्द हो रहा है, उफ्फ्फ, दीदी बचाय लो , उईईईईई नहीं, भैया निकाल लो , ओह्ह्ह्हह्ह "



झिल्ली फट गई थी।


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और बुच्ची ने झुक के लीला को चूम के कहा, " अरे पगली अब काहें रो रही है , झिल्ली तो फट गयी, जितना दर्द था ख़तम। अब तो मजा लो बस मजा "

लेकिन बुच्ची झूठ बोल रही थी।

अब की जब एक हाथ से चूँची और दूसरे से कमर पकड़ के सूरजु ने ठेला, तो जहाँ झिल्ली फटी थी जब उसे रगड़ते मोटा मूसल दुबारा अंदर गया तो बस लीला की जान नहीं निकली और वो जोर से चीखी,



" उईईई उईईई नहीं ओफ़्फ़्फ़्फ़ माई रे, जान गयी, उफ्फ्फ ओह्ह्ह्ह "

पर अब सूरजु की इन चीखों में ही मजा आने लगा था, कच्ची कली को चोदने का झिल्ली को फाड़ने का फायदा ही क्या जब तक लौंडिया रोये नहीं, चीखे नहीं नौ नौ टसुए न बहाये, आँख से आंसू निकल के गाल को भिगो दे और चूँची पे आ के रुके। उसजे अगला धक्का और जोर से मारा



नहीं नहीं भैया, उईईई अब नहीं रुक जाओ ओह्ह बस बस



चीखें बँसवाड़ी के पार पहुँच रही थी और नीचे कमरे में लेटी सूरजु की महतारी के पास भी, जितना जोर से लीला चीखती थीं, उतना ही बड़की ठकुराइन का मन हुलसता था। सीना उनका गज भर का हो गया। मुन्ना बहू आज ही लीलवा को पटा के लायी और आज ही उनके मुन्ना ने उसकी झिल्ली फाड़ दी। बस ऐसे ही पांच छह और की झिल्ली फाड़ दे उनका दुलारा, बरात जाने के पहले, तो जो उनके मन में डर था, इअतना लजाधुर है, इतने दिन से लंगोट बाँध के रखे था पहलवानी में, तो कहीं ससुराल में मजाक न उड़े, पहली रात को नाक न कटा दे, और बंस बढ़ाने के लिए ये सब काम सीखना भी तो जरूरी है। इमलिया भी मस्त लग रही थी, नामक तो लीला से भी ज्यादा है, खूब खटमिट्ठी। दुलरिया को बोला तो है, अरे सब काम गान का भौजाई नहीं करेंगी तो कौन करेगा।



लीला ने दुबारा चीख मारी अबकी हथौड़ा साढ़े बच्चेदानी पे पड़ा था, और वो कांपने लगी। बांस जड़ तक अंदर घुस गया था, और सूरजु ने पोजीशन कुछ रुक कर बदल दी, अब वो लीला को दुहरा कर के पेल रहा था।



करीब आधे घंटे तक लगातार बिना रुके चुदाई चली। लीला की चीखे सिसकियों में बदल गयीं , मजे से वो पागल हो रही थी, कभी खुद मुंह उठा के भैया को चूम लेती तो कभी मस्ती में अपने नाखून उसके पीठ में धंसा देती, कभी कभी धक्के का जवाब धक्के से भी देती



और जब बारिश हुयी तो लीला उसके पहले तीन बार झड़ चुकी थी। और सूरजु ने उसे कस के दबोच रखा था, सब माल मलाई बिल में गयी और फिर धीरे धीरे रिसती हुयी, लीला की जाँघों पर बाहर निकली।



कुछ देर बाद बुच्ची ने किसी तरह दोनों को अलग किया और जब बुच्ची लीला के साथ सूरजु के कमरे से बाहर निकल कर कोहबर वाले कमरे में गयी तो ढाई से ऊपर हो रहा था। किसी तरह एक दूसरे को कभी सहारा देती कभी दीवाल का सहारा लेती दोनों कोहबर वाले कमरे में पहुंची, जहाँ पूनम दीदी , मंजू भाभी और मु
न्ना बहू एक दूसरे से चिपकी सो रही थी
Practice makes a man perfect
 

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बुच्चिया इस कहानी की जान है और अपने ननिहाल के लड़कों की भी, एक ओर उसका भाई उसका दीवाना है, दूसरी तरफ उसकी सहेली शीला के यार, फिर भौजाइयां भी अपने भाइयों का फायदा कराने के चक्कर में हैं आपने एकदम सही कहा और चित्र तो जबरदस्त हैं ही

आपके फिर से आने से इस कहानी में नया रंग आ गया है।

बुची बेचारी से चला नही जा रहा और मुँह छुपाए गली मे घूम रही है. सुकर है इमरतिया भौजी का. जो उसे सहारा दी हुई है. उसे डर है की कही भौजाई पार्टी मे गई तो उसकी और उसके मुनिया की नुमाइस हो जाएगी. अरे नांदिया तो होती है पैदाइसी छिनार. मुँह छुपाने की क्या जरुरत. ठकुराइन को बुची की महतारी याद आ गई. वो तो ठकुराइन की नांदिया छिनार थी. तो जब उसके कांड फेमॉस है. मौसा फूफा सबको मौका मिला. तो बुची तो उसी छिनार की बेटी है. ठकुराइन ने तो कहे ही दिया. टॉप की रांड बना ना है.

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पांच दिन से ऊपर हो गए इस अपडेट को पोस्ट हुए

कँमेन्ट आये सिर्फ चार मित्रों के, पांच दिन में चार कमेंट और करीब ६ हजार व्यूज, अर्थात प्रति दिन हजार से थोड़े ज्यादा लोग आ रहे हैं लेकिन हर हजार पर एक कमेंट का भी औसत नहीं

और लिखने वाली से शिकायत होती है की अपडेट नहीं आया,

पता नहीं यह हालत सिर्फ इस कहानी की है या बाकी लोगों की भी, पर जो भी है लिखने वालों के लिए बहुत उत्साहवर्धक नहीं।

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