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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

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komaalrani

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग 219 -- बुच्ची और लीला -दोनों ने लीला, ----खेला चोर सिपाही का पृष्ठ १२४३

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भाग २१७ ---बुच्ची --
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भैया से मिलन के बाद

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कोई दूर से भी देख के कह सकता है, ये छोरी चोदी नहीं गयी है कचरी गयी है और वो भी कस के।



असल में तिलक वाले दिन के बाद जब सब लोग गाने के लिए बैठे थे, तो बुच्ची दूल्हे की अकेली बहन छेड़ी जा रही थी, गरियाई जा रही थी और बड़की ठकुराइन दूल्हे की माँ की भी शह थी, खूब खुश थी, तिलक जबरदस्त चढ़ी थी, लड़की वालों ने पूरा आंगन भर दिया था, उम्मीद से कई गुना, लड़की भी पढ़वइया, दस का इम्तहान दी थी. कोई गाँव की भौजाई दूल्हे के बारे में बोली,

" हमार देवर जबरदस्त पहलवान हैं "

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" अरे हमार भैया हजार डंड पेलते है रोज "

बुच्ची ने खुश हो के कहा, तो बस एक कोई भौजाई, और कौन मुन्ना बहू ने चिढ़ाया,

" और अब लंड पेलेंगे, और दुलहिनिया के आने के पहले, अपनी छोटकी बहिनिया को तोहें, घोंटना अपनी चुनमुनिया में गपागप, अभी से तेल वेल लगा लो पेलवाने के लिए "

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और सब भौजाइयों, गाँव की औरतों के ठहाके गूँज गयी। लग रहा था अब, शादी का घर है, पर बुच्ची अलफ़, चेहरा गुस्से से लाल,

" भौजी ये कौन बात हुयी, ....फिर भाई से लगा के, …"
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" अरे सबके सामने भाई, कुठरिया में भतार "

एक बबुआने की ही भौजी ने और रगडा, जो लड़की जितना चिढ़ती थी, उतनी ही ज्यादा गरियाई जाती थी। बड़की ठकुराइन ने बात सम्हाली लेकिन मुन्ना बहू और इमरतिया दोनों को इशारा कर दिया,

" पक्की छिनार बनाना है, असल वाली और इस की फटेगी नहीं, ….चीथड़े चीथड़े होगी "



तो बस आज बुच्ची की चिथड़े चिथड़े ही हुई थी।



बुच्ची की हालत गौने की रात के अगले दिन सुबह नई दुल्हन की जो हाल होती है, उससे भी ख़राब थी।

जमीन पर पैर नहीं रखा जा रहा था, जाँघे फ़टी पड़ रही थीं, कुछ थकान से, कुछ बुरिया जो अंदर से जगह जगह छिल गयी थी, और एक तरफ से इमरतिया भौजी ने सहारा दे रखा था और दूसरी ओर से किसी तरह दीवार का सहारा लेकर, वो रुक रुक कर धीरे धीरे सीढ़ी पर एक एक कर के पैर रख रही थी।

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चेहरा जैसे पीला पड़ गया था, आँखे थकी लग रही थीं, बाल भी बिखर गए थे, गाल पर जगह जगह निशान थे, चूसने के तो कहीं काटने के, होंठ तो एकदम सूज के लाल हो गए थे और निचले होंठों की भी यही हालत थी।

लेकिन सबसे ज्यादा बुरी हालत बुरिया के साथ जुबना की भी थी।

अखाड़े का दमदार पहलवान, नया नया खिलाडी , बस उसने पूरा जोर लगा दिया छोटी छोटी चूँचियों पर, रगड़ा मसला और कचकचा के काटा भी,

बुच्ची की दर्द के मारे हालत खराब थी, लेकिन वो सोच के मुस्करा रही थी। गलती बेचारे भैया की थी भी नहीं, एक तो उसके छोटे छोटे जुबना वैसे ही आग लगाते हैं , और भैया को देख के आज से नहीं जमाने से, अपनी कच्ची अमिया उभार के उन्हें ललचाती थी, कभी उनकी पीठ से रगड़ देती तो कभी खुद उनका हाथ पकड़ के कच्चे टिकोरों पे रख देती, और उसकी देह भी एकदम छन्न से हो जाती, और सिर्फ भैया क्यों,

शीलवा से जब वह कभी चिढ़ाती की यार स्साली तेरे यार मेरे पीछे ज्यादा पड़ें है , तो शीलवा स्साली भी उसके उभार मसल के बोलती,

" मेरी रानी न गलती मेरे यारो की है न मेरी सहेली की, गलती तेरे ये उठ रहे उभारों की है। चल अपनी गुझिया अपने भैया भतार के लिए बचा रखी है तो रस्ख स्साली, लेकिन बुरचोदी, ये अपनी खट्टी मीठी अमिया तो कभी मेरे यारों को चखा दे। अरे यार जोबन दबवाने से ही बढ़ते हैं।

और आज जब भैया को मौका मिला तो क्या कस कस के मसला है उन्होंने, जैसे कोई औरत पूड़ी के लिए आटा गूंथ रही हो, चोदते समय भी नहीं छोड़ा, और जब घोड़ी बना के, निहुरा के पेला तब तो लगातार बुच्ची के दोनों जोबना रगड़ा, ऐसी कस के टीस उठ रही है, रह रह के दर्द टपक रहा है, पर उस दर्द के साथ जब भैया के उँगलियों की, नाखुनो की दांत की याद आती है तो मजा भी खूब आ रहा था।

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कोई दूर से भी देख के कह सकता है की कस के कचरी गयी है,

और बुच्ची बस यही मना रही थी, कि किसी भौजाई कि निगाह न पड़े वरना इतना चिढायंगी, और स्कर्ट उठा के चुनमुनिया कि हाल न सिर्फ खुद देख्नेगी बल्कि दस लोगो को और दिखाएंगी, ।



गनीमत थी कि अभी अभी साँझ जगाने की रस्म ख़तम हुयी थी, तब भी दो चार भौजाइयां मडंप में ही बैठीं कुछ रस्म कर रही थीं, मंजू भाभी और रामपुर वाली के जिम्मे रसोई का पूरा काम था तो वो दोनों रसोई में धंसी थीं और चुनिया भी उनके साथ, अहिराने और भरौटी वाली जो सब आयी थीं अब अपने अपने घर गयीं थीं, तीन घंटे बाद फिर आना था।



दर्द के मारे जान निकल रही थी, लेकिन ख़ुशी भी बहुत हो रही थी।



उईईई, वो जोर से चीखी, एक पैर गलत पड़ गया था, जोर से 'वहाँ' चिलख उठी,

" सम्हल के बबुनी " इमरतिया ने सम्हाल लिया और चिढ़ाया,

" घोंटते समय तो बहुत मजा आ रहा था, "
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बुच्ची मुस्करायी और फिर दीवाल पकड़ के धीरे धीरे संभाल के उतरने लगी, लेकिन उसकी आँखे बस नीचे देख रही थीं की कहीं भाभियाँ न हों, वरना चिढ़ा चिढ़ा के, लेकिन उसकी मामी, बड़की ठकुराइन दिखीं, और उसे देख के वो जोर से मुस्करायीं, वो बुच्ची की हालत देख के समझ गयीं।

काम हो गया,

उनके बेटवा ने अपनी कच्ची कोरी बहिनिया की झिल्ली फाड़ दी, बस ऐसे ही बियाहे के पहले दो चार और, कच्ची कुंवारियों का कबाड़ा करे तो एकदम पक्का हो जाएगा, जबतक दुलहिनिया आएगी।

लेकिन उनके मन में बुच्ची से ज्यादा बुच्ची की माई की तस्वीर उभर रही थी,

अरे बुच्चिया से भी पूरे चौदह महीने छोट थीं, जब बड़की ठकुराइन गौने उतरी थीं, लेकिन क्या जोबन था,

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एकदम बुच्चिया उन्ही पे पड़ी है, बल्कि जोबन के मामले में तो बुच्चिया अपनी माई से भी दो हाथ आगे है, और बड़की ठकुराइन ने पटा के अपनी ननद के ऊपर किसको किसको नहीं चढ़ाया, सूरजु के बाबू, चाचा, मामा,



बुच्चिया के मन में में भी अपनी माई की शक्ल घूम रही थी, हल्दी के बाद से जब से उसने अपनी मौसी ( सूरजु भैया की बुआ, कांति बुआ ) को सूरजु भैया के मामा से पेलवाते देखा था और जो बात उन लोगो ने बुच्ची की माई के बारे में कही थी, अपनी भौजाई के भाई से दो दिन में छह बार, और तीन बार गांड मरवाया सो अलग, बुच्ची दर्द भूल के मुस्कराने लगी,

" अगर तोहार नंबर न डकायी तो, तोहार असल बिटिया नहीं",

बुच्ची सोच रही थी, यहां तो, शीला और उसके यार सब सावन में कितना पीछे पड़े थे, लेकिन बाद में शीला भी समझ गयी, पहले भाई का नंबर, उसके बाद कोई और, लेकिन अब जब सूरजु भैया ने दरवाजा खोल दिया है तो फिर तो, चलो अपनी माई के चौदह महीना बाद खेल शुरू हुआ, लेकिन पक्का अब आज तक गाँव में सब लोग जो बुच्ची क माई क बात करते हैं, अब बुच्ची क बात करेंगे,



बुच्ची ने सबसे पहले अपनी माई को ही देखा था, करवाते, नहीं नहीं बाबू जी के साथ नहीं , वो तो सब लड़कियां देखती हैं सीखती हैं और अपने बाबू का देख देख के ललचाती हैं, बुच्चिया कोई अलग थोड़े थीऔर वो तो चार साल पहले तक माई के साथ ही अक्सर सोती थी, गाँव में मर्द तो अक्सर बाहर ही सोते हैं, फिर भी नागा नहीं होता।

लेकिन बुच्ची ने मौसा जी और फूफा के साथ भी, माई को, ….पर आज जो सुना उसने ,



लेकिन उसको बुरा कुछ नहीं लगा, बस बुच्ची ने तय कर लिया, अब तक लोग उसकी माई को याद करते हैं न अब आगे से सब उसको याद करेंगे, और एक बार जब भैया का हाथ भर का पूरा घोंट लिया फिर तो,

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सीढ़ी से उतरने के पहले ही उसने शीलवा, अपनी सहेली, को देखा और दोनों सहेलियों के चेहरे खिल उठे।


शीलवा पक्की लंडखोर, समझ गयी की अब उसकी सहेली भी उसकी बिरादरी में आ गयी है और अब उसके यारों की चांदी हो जायेगी, और सीढ़ी से उतरते ही जैसे इमरतिया ने बुच्ची को पकड़ के सहारा दिया था, शीला ने सम्हाल लिया।
 
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शीला

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शीला आज सुबह से अपने घर चली गयी थी ,

असल में सुबह सुबह उसकी माहवारी शुरू हो गयी थी और जिन लड़कियों औरतों की माहवारी होती है, वो न तो किसी रसम में रह सकती हैं न रसोई में जा सकती हैं। हाँ, घर में आने-जाने की, बाकी काम-काज की कोई मनाही नहीं है।

और आज सुबह से एक के बाद एक रस्म थीं, चुमावन, फिर हल्दी, फिर नेछु और उसके बाद लावा भूजने की, और शीलवा किसी में नहीं थी।

हाँ अब जब रसम सब ख़तम हो गयी थी तो वो आयी थी पर कोहवर रखाई में भी पांच दिन की उसकी छुट्टी थी, उसकी जगह बड़की ठकुराइन ने पूनम और लीला को बोल दिया था आज से रहने को।


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लेकिन ब्याह के घर में पचास काम होते हैं और फिर दस तरह की लड़कियां सब से चुहुलबाजी, और शीलवा की तो पक्की दोस्ती हो गयी थी, इसलिए वो कुछ देर पहले आ गयी थी और चुनिया ने उसे बाकी सब लड़कियों से भी मिलवा दिया था, शीतल मौसी की बेटी, रमा, और बड़ी मामी की बेटी रीनू , सुशीला चाची की बेटी मीना, और सब पक्की सहेली बन गयी थीं, और फिर लड़कों की बातें शुरू हो गयीं ,


लेकिन जब बुच्ची आयी तो शीला अकेले थी,

चुनिया रमा के साथ रसोई में थी, सुशीला चाची मीना को लेकर घर चली गयी थीं की, बस घंटे दो घंटे में आ जाएंगी, ससुर को खाना खिला के, और जब बड़की ठकुराइन और शीतल मौसी ने बड़ी जिद की कि कम से कम मीना को छोड़ दें, सब उसकी समौरिया लड़कियों के साथ रहेगी तो सुशीला चाची बोलीं, कि जब गाने में आएँगी तो उनकी बेटी आएगी और फिर उसको वो यहीं छोड़ देंगी, रात में घर पे ससुर अकेले हैं इसलिए वो लौट जाएंगी,



तो बस शीला थी और बड़की ठकुराइन उसको कुछ काम समझा रही थीं,

बुच्ची को देखकर वो हलके से मुस्करायीं और बुच्ची लजा गयी,



शीला ने बुच्ची को गले से लगा लिया और कान में हलके से पूछा, " मजा आया " ,


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लेकिन इतने हलके से भी नहीं, सुरजू की माई ने साफ़ साफ़ सुन लिया था, और वो जोर से मुस्करायीं और इमरतिया को खींच के अपने कमरे में ले गयीं, अपने बेटे की चुदाई का हाल खुलासा सुनने के लिए,

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शीला जानती थी, यहाँ बुच्ची से खुल के बात नहीं हो पाएगी तो वहीँ से उसने बड़की ठकुआइन को गुहार लगायी,

" जरा ये बुच्चिया को बाहर ले जा रही हूँ, अपने घर तक, घंटे भर में वापस आ जाएगी, "

"एकदम एकदम जाओ दोनों जाने, साढ़े आठ बजे से गाना है, आठ बजे तक आ जाना. अरे जाड़ा है जल्दी सांझ हो जाती है, अभी तो छह भी नहीं बजा होगा " इमरतिया अपने और बड़की ठकुराइन दोनों की और से बोलीं,
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बड़की ठकुराइन ने पूरे दो घंटे के लिए बुच्ची को छुट्टी दे दी।

पीछे वाली खिड़की से दोनों सहेलियां निकल गयीं, और शीला बुच्चिया का हाथ पकड़ एक घसीटते हुए, कुंए की बगल से, जहाँ जानवर बांधे जाते थे, उस के पास से खींचते हुए, आम की बगिया में धंस गयी।

बहुत बड़ा बाग़ नहीं था, लेकिन तब भी सौ डेढ़ सौ पेड़ तो होंगे ही, पर असली बात थी खूब गझिन थी, दिन में हाथ को हाथ नहीं सूझता था, और अब तो सांझ एकदम गहरा गयी थी। पर बुच्ची को उस बाग़ का एक एक पेड़, एक एक रास्ता पता था, सावन में जब आयी थी कितनी बार वहीं झूला झूलने आती थी, और उससे भी बढ़कर दसो बार बुच्ची ने चौकीदारी भी की, जब शीला अपने यारों के साथ गपागप करती थी तो बुच्ची आम के पेड़ पर चढ़कर, दूर दूर तक निगाह रखती थी और उससे भी ज्यादा मजे से बुच्ची और उसके यारो की मस्त चुदाई देखती थी, मन तो उसका भी बहुत करता था, लेकिन उसने तय कर लिया था, सबसे पहले सूरजु भैया के साथ, हाँ उसके बाद शीला को मना नहीं करेगी।
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और बाग़ में पहुँचकर शीला थोड़ा अंदर घुस गई और रुक गई।

सांझ की लालिमा पेड़ों की फुनगियों पर अटकी हुई थी, जैसे सूरज किसी तरह अपना आँचल छुड़ाकर भागने की जद्दोजहद कर रहा हो।

शीला को भी बेताबी थी — अपनी सहेली की फटी-चूत की पूरी कहानी सुनने की।


इस साल सावन में जब बुच्ची आई थी, तब उसके यारों ने कितना मिन्नतें की थीं। शीला से तो की ही, कई लौंडों ने बुच्चिया की जाँघें खोलने के लिए सीधे हाथ जोड़े थे, लेकिन वो ढाई सेर का ताला लगाकर बैठी रही। अब ताला खुल गया तो साफ़ झलक रहा था कि कसके चुदाई हुई है, चूत बुरी तरह फटी और निचोड़ी गई है।

शीला ने उसका हाथ मरोड़कर कसके पकड़ा और घुप अंधेरी आम की बगिया में घसीटते हुए ले चली।



बुच्ची की चूत में अभी भी जैसे कोई मोटा लकड़ी का लंड घुसा हुआ हो, हर कदम पर चीख निकल रही थी। झिल्ली फटने वाली जगह पर भैया ने बार-बार अपना मोटा लंड रगड़ा था, अब वो जगह लाल होकर अच्छे से छिल गई थी। बुच्ची चल नहीं पा रही थी, जाँघें रगड़ती हुई लंगड़ाती चल रही थी। बार-बार रोते हुए बोली,

"कमीनी स्साली... रुक जा न... मेरी चूत फट गई है...!"



लेकिन शीला को तो मजा आ रहा था। स्साली ने उसके यारों को बहुत तड़पाया था। वो और ज़ोर से उसे खींचकर अमराई के अंदर ले गयी,. जहाँ पेड़ खूब घने थे। जब बुच्ची बार-बार चीखने लगी तो बाग़ के सबसे घने और अंधेरे कोने में शीला रुक गई।

"अब बोल साफ-साफ, भैया को सीधी चुदाई दे दी या कुछ कबुलवाया भी?"

बुच्ची ने शीला को कसके गले लगा लिया, हँसते हुए बोली,

"अरे शीलवा, उनसे तो ऐसी बात कबुलवा ली है जो तू सुनकर भी चूत गीली कर लेगी। मान जाएगी कि मैं तेरी असली रंडी सहेली हूँ।"

"वो तो तू है ही, रंडी। पहले जाँघें नहीं खोल रही थी, अब चूत खुल गई। लेकिन बोल न साफ-साफ, वरना तेरे भैया ने तेरी बुर फाड़ी है, मैं तेरी गांड फाड़ दूंगी आज।"

"अरे छिनार, बता रही हूँ," बु

च्ची हँसकर बोली और शीला के गाल चूमकर बोली, "दर्द चाहे जितना हो, गांड भी उसी मोटे लंड से फड़वाऊंगी जिसने मेरी चूत फाड़ी है — अपने भैया भतार से। चल, बताती हूँ।"

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दोनों एक पुराने घने पेड़ के नीचे छिपकर बैठ गईं। चारों तरफ इतनी घुप्प अंधेरी कि जेठ की दोपहरी में भी सूरज की किरण नहीं पहुँचती थी।

बुच्ची ने हँसते हुए शुरू किया,

"पहली बार तो बहुत डर लग रहा था, चूत सूख गई थी। इमरतिया भौजी ने मेरी दोनों कलाइयाँ कसके पकड़ ली थीं, हिल भी नहीं सकती थी। भैया का मोटा लंड देखकर तो घबराहट हो रही थी, लेकिन भौजी ने दिन में दो बार चुदाई करके दिखा दिया था कि कितना मजा है। भैया देह से तो भैंसा है, लेकिन दिमाग से बिल्कुल उल्लू। दूसरे राउंड में जब वो रिरियाने लगा, तो मैंने शर्त रख दी..."

फिर बुच्ची हँसी के फव्वारे छूट पड़े।

"बोल न स्साली, क्या कबुलवाया अपने भैया से?" शीला बेचैनी से पूछ रही थी।

बुच्ची ने होंठ शीला के कान से सटाकर फुसफुसाया,

"मैंने कहा —

'भैया, तुम बहनचोद तो बन गए, लेकिन अब तेरी बहन की चूत दुबारा तब मिलेगी जब तू कबूल करेगा कि तू पक्का मादरचोद भी बनेगा। वरना तेरी बहन की यह कसी हुई चुनमुनिया हमेशा बंद रहेगी।'"
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शीला ज़ोर से हँस पड़ी। हँसी रुकने के बाद बोली, "तो भैया माना?"

"माना? अरे दस बार कसम दिलवाई, कि अपनी माँ की चूत में लंड घुसाएगा और दो दिन के अंदर,... हचक-हचक के चोदेगा।"

बुच्ची ने आगे बताया, "जब भैया मुझे चोद रहे थे, शुरू में तो चूत फट रही थी, लेकिन फिर मलाई भर गई और मजा आने लगा। तो मैंने चिढ़ाते हुए कहा..."

"बोल न स्साली, अपनी भैया की रखैल," शीला हँसते हुए बोली।

"भैया, एक बार बहन की चूत फाड़ने से कोई बहनचोद नहीं हो जाता।"

भैया ने जवाब दिया — "स्साली, तेरी जैसी टाइट चूत को कौन एक बार चोद के छोड़ सकता है? अब रोज बिना नागा तुझे मेरा मोटा लंड चूसना और घोंटना पड़ेगा।"

बुच्ची बोली, "मैंने कहा — 'जैसे एक बार बहन चोदने से बहनचोद नहीं होता, वैसे ही एक बार माँ चोदने से मादरचोद नहीं होता। तुझे अपनी माँ की चूत रोज चोदनी पड़ेगी, समझा मादरचोद?'


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और उसके बाद भैया ने मेरी चूत में इतने ज़ोरदार धक्के मारे कि अभी तक मेरी चूत जल रही है।"

शीला ने मुस्कुराते हुए कहा,


"एकदम सही किया तूने। ये स्साले लौंडे माँ-बहन की गाली सुनकर ही सबसे ज्यादा गर्म होते हैं। अब जल्दी से उसे पक्का मादरचोद बना दे। जो लड़की अपने भाई से चुदती है और रोज उसका लंड घोंटना चाहती है, वो पीछे पड़कर उसे मादरचोद बनवा ही देती है।"

फिर शीला ने और अर्थाते हुए कहा, "जब माँ खुद बेटे का मोटा लंड अपनी चूत में घुसवा-घुसवाकर चुदवा रही होगी, तब भाई को बेटी की चूत में लंड डालने से कौन रोकेगा? दोनों माँ-बेटी एक ही लंड की दीवानी बन जाएंगी।"
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लेकिन बुच्ची का मन कहीं और भटक रहा था। उसकी आँखों के सामने वो दिन घूम रहा था जब कांती बुआ (उसकी सगी बड़ी मौसी) को सूरजू भैया के मामा जोर-जोर से चोद रहे थे।
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मामा बुच्ची की माई को याद करके बड़बड़ा रहे थे,

"अरे तेरी छोटी बहन कितनी जलाती है... बुच्ची तो बिल्कुल अपनी माई जैसी है, देखते ही लंड फनफना जाता है, चूत में घुसने को बेताब हो जाता है।"

कांती बुआ हँसकर चिढ़ाते हुए बोली थी,

"सब कहते हैं न कि बुच्ची तुम्हारी ही जाई है।


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उसकी माई की बिदाई से पहले ही तुमने उसे कसके चोदा था, उसके मोटे लंड से उसकी चूत फाड़ी थी और गाभिन भी कर दिया था।"

सूरजू भैया के मामा ने हँसते हुए कांती बुआ को ज़ोरदार धक्के मारते हुए जवाब दिया, "तो क्या जो बीज बोया है उसे फल खाने का हक नहीं है?

उस दिन से बुच्ची के मन में अपनी माई के लिए हवस और प्यार दोनों उमड़ने लगे थे। मामा की उस बात ने उसके दिमाग में आग लगा दी —

"है क्यों नहीं... बीज लगाने वाले को फल खाने का पूरा हक है।"

उसे लगने लगा था कि अगर बाप बेटी की चूत चोद सकता है, तो माँ बेटे का मोटा लंड क्यों नहीं घोंट सकती?

यही सोचकर वो सूरजू भैया के पीछे पड़ी हुई थी।

बुच्ची को बार बार अपने भैया से कही बात याद आ रही थी, एक तो उसके भैया ने कसम खायी थी, अपनी महतारी को न सिर्फ पेलेंगे, बल्कि हचक के पेलेंगे, भोसड़े के चीथड़े उड़ा देंगे और ऊपर से बुच्ची चिढ़ाते हुए बोली थी,

" भैया सोच लो, तुझे तो पक्का मादरचोद बनना है, और एक बार माँ चोदने से कोई बेटा मादरचोद नहीं हो जाता, बार बार लगातार, पूरे गाँव देहात में रगड़ रगड़ के खुल्ल्म खुला, और ऐसा वैसा मादरचोद नहीं, दस पांच गाँव छोडो, दस पांच जिले में वैसा मादरचोद नहीं होना चाहिए, और

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भैया के मूसल ने जबरदस्त धक्के से हामी भरी थी, उसी समय बुर के अंदर बुच्ची के छिल गया था, चमड़ी अंदर उचड़ गयी थी, अब तक चिल्ख उठ रही थी, चला नहीं जा रहा था, शीलवा एक हाथ का सहारा न दिए होती तो दस कदम चलना मुश्किल,

और अब शीला की बात भी बिल्कुल सही लग रही थी। भैया को उनके माँ के ऊपर चढ़ाना बहुत जरूरी है, उसका भी रास्ता हरदम के लिए साफ हो जाएगा।
 
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शीला के यार

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शीला आज घर में अकेली थी और पहुँचते ही पहला काम उसे किया की अपनी सहेली की स्कर्ट पलट दी,

" हाय राम, तेरी तो हालत खराब कर दी तेरे यार ने, और मलाई कितनी भरी है "


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शीला हँसते हुए बोली। फिर चिढ़ाया, " स्साले तेरे भाई का आदमी का है की गदहे का "


" देख लेना . बोल दूंगी भैया से, एक बार तेरी पांच दिन की छुट्टी ख़तम हो जाए "

खिलखिला के बुच्ची बोली, लेकिन फिर उसकी चीख निकल गयी, जोर की चिलख उठी। शीला ने खाली उँगली से बुच्ची के रगड़-रगड़ के लाल हो गए भगोष्ठों को छू भर दिया था।

" मेरे यारों को बहुत इंन्तजार कराया न तूने। उसी का फल भुगत रही है तू स्साली, छिनार " शीला बोली।
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" तेरी ऐसी सहेली तो दुश्मन को न दे . मेरी जान निकल गयी और स्साली तुझे अपने यारों की पड़ी है "

शीला की पीठ पे कस के मुक्के से मारती बुच्ची बोली, लेकिन शीला असल खेली खायी सहेली थी।

हलके गुनगुने पानी में भीगी तौलिये से उसने चार पांच बार बुच्ची की ताज़ी फ़टी बुर की सेंकाई की,


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और उसी के साथ उस की पहली चुदाई की दो दो बार पूरे डिटेल में न सिर्फ दास्तान सुनी बल्कि अपनी बात भी मनवा ली।

" यार सुन, मेरी पांच दिन की छुट्टी शरू हो गयी है और मेरे सब यार एकदम पागल हो गए हैं, कुछ कर न, अब तो तेरे भाई ने इत्ती कस के तेरी कुटाई कर दी है, तू आराम से अब घोंट लेगी मेरी बिन्नो। मेरी अच्छी बुच्ची मान जा न, देख सब इत्तेदिन से तेरे पीछे पड़े हैं और अब इतना निहोरा कर रहे हैं, अच्छा वो जो झूले पे हम सब के साथ था जो ऊपर से नीचे वाले झूले पे, याद है या भूल गयी ? " शीला ने पीछा,

" वो कमीना, मुन्ना "

हँसते हुए बुच्ची बोली, फिर कहा उस स्साले को सपने में नहीं भूलूंगी, और तू भी न एक तो दो की जगह हम तीन झूले में बैठे थे और तूने उसका हथोड़ा खोल के मुझे झूले पे पकड़ा दिया "

" और तूने भी तो पकड़ के कैसे मुट्ठ मारी थी बेचारे की, ऊपर नीचे होते झूले पे " हँसते हुए शीला बोली।
सच यार उस मुन्ना स्साले पे तो मेरा दिल उसी समय आ गया था, मन कर रहा था ऊपर नीचे होते झूले में उस स्साले की गोद में बैठ के ही घोंट लूँ। बेचारा हम दोनों मिल के मुठिया रहीं थीं और उस स्साले की फट रही थी। लेकिन वो स्साला बहनचोद भी कम कमीना नहीं था, मेरे टॉप के अंदर हाथ डाल के स्साले ने कैसे कस कस के उभार मसले थे। सच में सबसे पहले मैंने उसी का खूंटा पकड़ा था। " बुच्ची खिलखिलाती बोली।
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कस के उसकी पीठ पे मुक्का मार के गरियाती शीला बोली,
" स्साली सौ छिनार मरी होंगी तब तेरी महतारी गाभिन हुयी होगी। कमीनी, भूल गयी सावन के मेले में जब हम तुम पहली बार मेले में गए थे और उस संकरी गैल में चार पांच लौंडो ने एक साथ पकड़ के दरेरा था, कस कस के तेरी चूँची खोल के मसली थी और एक ने अपना पजामे से निकाल के पकड़ा भी दिया था "
" अरे भाइ चोद , " हँसते हुए बुच्ची बोली,

" कैसे भूल सकती हूँ, बड़ा मजा आया था उस दिन और वो सब साले तेरे यार थे। हाँ पकड़ा था, लेकिन देखा थोड़ी था, भीड़ इतनी थी और उसने खुद खोल के पकड़ा दिया था। पर मुन्ना की बात अलग है, उस बेचारे की तो मैंने खुद झूले पे पैंट खोल के पकड़ा था और मस्ती से मुठियाई भी। चल यार तू नहीं कहती भी तो उस स्साले को मैं दे ही देती। "
" बहुत निहोरा करता है बेचारा, फिर तेरे भैया ने अब तेरी खोल भी दी है दे दे बेचारे को बड़ा भला होगा उसका " शीला ने अपने यार मुन्ना की ओर से अर्जी लगाई।
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" सच में बहुत भोला है, उस दिन पूरे मेले में हम दोनों ने मिल के उसे कैसे लूटा था, जलेबी, चाट, बिंदी फीता सब उसके खर्चे पे और झूला भी " बुच्ची याद कर के मुस्करा रही थी "

और फिर फिर बुच्ची ने कबूल कर लिया " चल यार तू कहती है तो दे दूंगी मुन्ना को,… वरना पांच दिन तक तो उसे खुद ही मुट्ठ मारना पड़ेगा "

पानी बदलकर फिर गुनगुने पानी से अंदर तक सेंकते शीला बोली, " और एक बार उस काशी का भी मन रख देना यार "

" नहीं, नहीं, वो बड़ा हरामी है, लेकिन चल, तू कहती है तो और उसको तो मैं कभी नहीं भूल सकती हूँ। अभी हम लोग जिस आम के बाग़ से आये थे, उसी में तो तुझे निहुरा के स्साले ने कितने कस के चोदा था, ऊपर से कमीना पेल तुझे रहा था, अमिया मेरी देख के ललचा रहा था। "

" मेरी सहेली की अमिया हैं ही इतनी मस्त, " टॉप के अंदर हाथ डाल के अपनी सहेली के जोबन कस के मसलते शीला बोली।

" छिनार तेरे यार तो निचोड़ेंगे ही इसे, …तू भी, " खिलखिताते हुए बुच्ची बोली


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और आम के बाग़ का किस्सा आगे बताया,

" और वो स्साला, एक बार में उसका मन नहीं भरा, ऐसे रगड़ के तुझे पेला और फिर पांच मिनट के अंदर उस का फनफना गया और तुझे खड़े खड़े ही, पेड़ के सहारे दबा के पेल दिया "

" अरे मेरी जान तुझे भी उसी आम के बाग़ में पेलवाउंगी, अपने सामने, पांच दिन तो मेरा कुछ हो नहीं सकता, और मेरी अगर तू सच्ची सहेली है बुच्ची तो यार मैं सबका मन नहीं कह रही हूँ बस, दो चार का मन रख दे न "

निहोरा करती शीला बोली और पांच का नाम ले ले के बुच्ची से हाँ करवा ली और कल का तय होगया, पर शीला सोच रही थी, पांच के लिए तूने हाँ की तो पांच और तो चढ़ ही जाएंगे, देख अगले चार पांच दिन में कम से कम अपने दस यार से पेलवाउंगी, बहुत तूने तड़पाया है बेचारो को "

बुच्ची का दर्द कुछ कम हो रहा था, जो फिटकरी गुनगुने पानी में मिलाकर उसकी सहेली ने सेंका था दर्द थोड़ा कम हो गया था, फिर धीरे धीरे अंदर जो छिला था, जहाँ जहाँ भैया ने काटा था, नाख़ून से नोचा था, वो सब अब भी धीरे धीरे ठीक हो रहे थे। हाँ खड़े होने में अभी सहारे की जरूरत थी। "बस चार पांच घंटे चुनमुनिया को आराम दिलवा दो, तो कल से अपने भैया को, अपनी भाभी के भैया को, मेरे यारों को सब को बाँटोगी तो भी ये हालत नहीं होगी, ""

शीला ने समझाया।

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हँसते हुए बुच्ची ने अपनी सहेली की पीठ पे कस के एक मुक्का जमाया और छेड़ते हुए बोली,

" स्साली यहाँ जान जा रही है तुझे अपने यारों की पड़ी है, लेकिन बात तो सही है तूने यार सब एक से एक मस्त पाले हैं, लेकिन एक पर तो मेरा भी दिल आ गया था। वो सुनील, स्साला गांडू, कैसे मेले में हम सब ने मिल के उसकी मारी थी। जलेबी खिलाई, झूला झुलाया और क्या क्या न ख़रीदा, तुझसे ज्यादा मेरे लिए, और स्साला जब गन्ने के खेत में चढ़ा था तेरे ऊपर और देख के मुझे ललचा रहा था "

" और तूने भी तो जलेबी की दूकान पे अपनी जूठी जलेबी गाँव के सब लड़के लड़कियों के सामने उसे खिलाई थी, " हँसते हुए शीला बोली,

" और मेर्ले में कैसे गाँव की लड़कियों के सामने वो मेरे पैर पड़ रहा था, " खिलखिलाते हुए बुच्ची ने याद किय। अरे मुश्किल से तीन चार महीने ही तो हुए थे।

" और मेरी सहेली तूने भी तो जब वो अपने घर के लिए मुड़ा और उसी अमराई में जहाँ हम लोग आज गपिया रहे थे, कस के क्या चिपक के चुम्मी दी थी" अबकी बुच्ची को चूम के शीला बोली

" और उस बदमाश ने मेरी एक चूँची इतने जोर से दबायी थी " बुच्ची ने भी सुनील को याद करते हुए कहा और फिर जोड़ा लेकिन तेरी सहेली कम बदमाश नहीं है, उस स्साले का खूंटा पजामे में एकदम तना था तो मैंने भी खूब कस के मसल दिया था "

" तभी तो, जिस दिन से तू आयी है रोज मेरे पीछे पड़ा है, यार अबकी तो दिलवा दे अपनी सहेली की " कम से कम दिन पांच बार तगादा करता है। शीला ने फिर से अपने यारों की ओर से निहोरा किया और कहा " देख यार अपने पहलवान भाई का तूने ले लिया है, तूने यही तो कहा था पहले भैया, तो अब यार तेरा कोई बहाना नहीं चलेगा, फिर ये मेरी स्साली पांच दिन दूकान भी बंद है '

"चल यार तू कहती है तो लेकिन तेरे तो दर्जनों हैं , बस पांच और वो भी मेरे पसंद के " बुच्ची मान गयी। बुच्ची के मन में चल रहा था की कल तो सबसे पहले गप्पू, अब आज रात तो छुट्टी है प्रेमगली की, पर कल कुछ भी हो गप्पू को जरूर देगी, आज भी ऐन मौके पे सूरजु भैया के मामा और कांती बुआ बगल के कमरे में आ गए और बुच्ची के मन में बार अपनी माई के बारे में जो उसकी मौसी ने बोला था वही याद आ रहा था , " दो दिन में छह बार, और चार बार गांड मारी गयी वो अलग "

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अगर माँ से आगे बढ़ना है तो एक दिन में छह बार, तो चल यार शीला उसकी बचपन की सहेली है, सावन में इतनी मस्ती की थी दोनों ने फिर साल में दो तीन बार तो यहाँ आती है है और सबसे बड़ी बात, कोई अपना गाँव तो है नहीं, तो बदनामी का डर भी नहीं और न यार हरदम के लिए पीछे पड़े रहेंगे,



शीला भी सोच रही थी, उसकी सहेली ऐसा रूप और जोबन तो गाँव में किसी का है नहीं , और जब तक उसकी छुट्टी है और उसके बाद भी लौंडे उसी से निहोरा करेंगे बुच्ची की दिलवाने के लिए, और सबसे बड़ी बात पन्दरह बीस दिन में बुच्ची अपने गाँव में और उसके यार उसी की मुट्ठी में, लेकिन अगर इन पांच दिनों में उन सालों ने किसी और लौंडिया को पटा लिया, और गाँव में टांग फैलाने वालियों की कमी नहीं रहती, तो वो सब फिसल जाएंगे,

बुच्ची मान गयी लेकिन सिर्फ पांच दिन में पांच यार शीला के उसके बाद तो शीला की छुट्टी खतम हो जायेगी, फिर छह साथ दिन बाद तो बरात भी जायेगी।

" यार लेकिन अभी भी वहाँ थोड़ी चिलख हो रही है और तूने पांच घर का बयाना अलग दिलवा दिया "

मुंह बना के बुच्ची बोली और शीला ने उसे चूम के कहा,

"मेरी छिनार सहेली, मेरी जान, चुदाई के दर्द का इलाज और चुदाई है, लेकिन अभी नहीं। मैंने सेंक दिया है, अगले तीन चार घण्टे तक तो उसमे ऊँगली भी नहीं जानी चाहिए, और उसके बाद एक बार और हचक के पेलवा लेना तो एकदम पक्की हो जायेगी तेरी ये सहेली। फिर तो एक मरद उतरे, दूसरा चढ़े, एक साथ दो दो पेलें, तू मजा ले ले के घोंटेंगी, स्साली। पर अगले तीन चार घंटे तक मुट्ठी में लेके झाड़ देना , मुँह में लेके लेकिन इस बिल में कुछ न जाए, वरना जो अंदर छिला है न वो सब फिर से हरा हो जाएगा और एक दो दिन के लिए तुझे आराम करना होगा, तो बस चार घंटे, उसके बाद तो एक से एक लम्बा मोटा लेना "

जब बुच्ची चलने लगी तो शीला ने कहा भी की वो बुच्ची को छोड़ दे, लेकिन बुच्ची ने मना कर दिया, फिर भी शीला ने बुच्ची को उस आम के बाग़ तक छोड़ दिया। लेकिन चलने के पहले कस के शीला ने बुच्ची को कस के भींच लिया और उस के उभार दबाते बोली,


" मेरी जान, अपने भैया भतार को पक्का मादरचोद, स्साले बहिन चोद तो सब बन जाते हैं, ....मादरचोद बनने में गाँड़ फटती है "



बुच्ची हंस के बोली

" तू एकदम सही कह रही है, लेकिन अब तूने बोल दिया है तो मैं भैया को मादरचोद बना के रहूंगी और याद है न मैंने भैया से क्या कहा था "

खिलखिलाती उसकी सहेली बोली, " एकदम याद है, भैया एक बार चोदने से कोई मादरचोद नहीं होता, रोजा माँ की सेवा करनी पड़ेगी "

" अरे मैं खुद अपने हाथ से पकड़ के उसका लौंडा उसकी महतारी की बिल में घुसाउंगी, देख लेना। बाद में दोनों में से कोई मना भी नहीं कर पायेगा, शीला की सहेली हूँ, अच्छा चल कल मिलती हूँ इसी आम के बाग़ में "

कह के बुच्ची उसी आम के बाग़ में धंस गयी।
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शीला भी वापस लौट आयी , बहुत काम था, अभी उसे अपने यारों को ये खुशखबरी देनी थी की उसकी सहेली ने हाँ कर दी है और कल के लिए एक दो को सेट भी करना था। बुच्ची रानी ने पांच के लिए हाँ किया था,लेकिन शीला पांच का दस तो कर ही देगी, और वो भी अगले पांच दिन में नहीं बस दो तीन दिन में और उसके बाद तो बुच्ची रानी की बुरिया ऐसे कुलबुलायेगी की खुद ही यारों के आगे टांग फैलाएंगी, लेकिन कल बुच्चिया को दिन दहाड़े खुले आम कुटवाना जरूरी है जिससे पूरे गाँव में बात फ़ैल जाए की अब बुच्चिया देने लगी है।
 
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komaalrani

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" पहचान कौन ?"
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रात शुरू हो चुकी थी। हल्की चाँदनी आम के पेड़ों की फुनगियों से छन-छन कर नीचे बिखर रही थी, जैसे कोई रहस्यमयी जादू जमीन पर उतर रहा हो।

बुच्ची का रास्ता भले ही पुराना था, पर आज उसका दिल अनजाने में तेजी से धड़क रहा था। वो आँख बंद करके भी घर पहुँच सकती थी, लेकिन आज आँखें बंद करने की नौबत खुद आ गई।

अचानक दो गर्म हथेलियाँ पीछे से आईं और उसकी दोनों आँखों को नरमी से ढक लिया।

बुच्ची की सांस एक पल को थम सी गई। उसका पूरा शरीर हल्का सा काँप उठा। पीछे से एक गहरी, परिचित और थोड़ी काँपती हुई आवाज आई —

"पहचान कौन?"

बुच्ची के होंठों पर एक प्यारी-सी मुस्कान खिल गई। दिल में एक मीठी-सी लहर दौड़ गई। वो जानती थी। उस छुअन को, उस गर्मी को, उस स्पर्श की लालसा को वो हजारों में भी पहचान लेती।

गप्पू...

साल भर से वो दोनों एक-दूसरे को चुपके-चुपके तड़पा रहे थे। नज़रों से, मुस्कानों से, छोटी-छोटी छेड़छाड़ से। आज वो तड़पन अब और सहन नहीं हो रही थी।

गप्पू का सीना धीरे-धीरे उसकी पीठ से सट गया। उसकी गर्म सांस बुच्ची की गर्दन पर पड़ रही थी, जिससे उसके बदन में मीठी-मीठी सिहरन दौड़ रही थी। बुच्ची ने धीरे से पीछे हटकर खुद को उसके सीने से और लिपटा लिया।

"छोड़ न..." उसने बहुत नरम, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज में कहा। उसकी आवाज में शरारत थी, लेकिन साथ ही एक गहरी चाहत भी।

गप्पू ने अपना मुँह उसके कान के बिल्कुल पास ले जाकर, बेहद धीरे से कहा,

"पहले बता तो सही... कौन हूँ मैं?"

उसकी गर्म सांस बुच्ची के कान से टकराई और उसके पूरे शरीर में एक मीठी लहर उठ गई। बुच्ची की पलकें उसकी हथेलियों के नीचे फड़फड़ाईं। उसने अपना हाथ ऊपर उठाया और गप्पू की उँगलियों को अपनी उँगलियों में धीरे से फँसा लिया।



बुच्ची सौ मर्दो में उस छुवन को पहचान सकती थी, स्साला, साल भर से उसके लिए तड़प रहा था, और वो उसे तड़पा रही थी, लेकिन अब और नहीं।

और आज तो हल्दी लगाने के नाम पे, बुच्ची ने अपनी भौजी के भैया के हर अंग पर ऐसी हल्दी लगायी, हलके हलके नहीं रगड़ रगड़ के, अबतक वो हल्दी महक रही थी, हाँ पलट के उसने भी लगाया था, स्कर्ट ऊपर कर के अपना खूंटा उसकी चुनमुनिया पे छुआ भी दिया था, लेकिन बस एक तो कडुआ तेल ऐसा कुछ चिकना था नहीं, और दूसरे ऐन मौके पे कांती बुआ ( बुच्ची की बड़ी मौसी ) और सूरजु के मामा की आवाज आ गयी , सूरजु के मामा, गप्पू की बहन के चचिया ससुर भी थे और गप्पू भी घबड़ा गया, दोनों ने समझा की बस आज बच गए,

" मुझे क्या मालूम है कौन है तू,,... जा के अपनी बहिनिया चुनिया से पूछ।"
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बुच्ची ने इतरा के चिढ़ा के बोला।



वो लड़का पीछे से एकदम चिपक गया , रात रुक गयी, हवा थम गयी, उस किशोरी का दिल जोर जोर से धड़क रहा था , बिना आँखों पर से हाथ हटाए हिम्मत कर के उस लड़के ने बस अपने होंठों से बुच्ची के कान की लर बस छू दी।

बुच्ची जाड़े की रात में भी दहक उठी। " बोल ना यार, कौन हूँ मैं " एक बार कस के अपने हाथों से उस सांरग नयनी के मृगनयनों को दबाता वो बोलै



एक पल के लिए दोनों चुप हो गए। सिर्फ उनकी सांसें और दिलों की धड़कनें सुनाई दे रही थीं। चाँदनी आम के पत्तों के बीच से छन रही थी, और दोनों के बीच का रोमांटिक तनाव हवा में महक रहा था।

"तुझे तो मैं... अंधेरे में भी, सपनों में भी, भीड़ में भी पहचान लूँगी," बुच्ची ने नरम स्वर में कहा, "स्साला..गप्पू।"
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वो लड़का और चिपक गया, रात गहरा रही थी, बस कहीं कहीं चांदनी आम के पेड़ों के पत्ते से छन छन कर आ रही थी, उस घनी आम की बगिया में रात को क्या दिन में भी कम लोग ही आते थे।

" छोड़ न "


मीठी सी आवाज में बुच्ची बोल के उसका एक हाथ छुड़ा के अपने सीने पे रखती वो बोली, लेकिन एक तो, एक हाथ ही उस का काफी था, बुच्ची की दोनों बड़ी बड़ी कजरारी आँखों को ढंकने के लिए, दूसरे उस लड़के का हाथ, सीने पे पड़ते ही, बुच्ची के उभार तेजी से नीचे ऊपर होने लगे,मन तो कर रहा था, टॉप उठा के दोनों अमिया ये मसल डाले, और सोच रही थी ये स्साले लौंडे, मन भी करेगा और कुछ करेंगे भी नहीं।



पर अब उस लड़के में भी हिम्मत जाग गयी थी, और हिम्मत इस लिए जाग गयी थी की नीचे वाले मूसलचंद जाग गए थे,। वो पीछे से एकदम चिपक के खड़ा था और वो खड़ा खूंटा बुच्ची के नितम्बो के बीच धंस रहा था, एक हाथ अब हलके हलके उस दर्जा नौ वाली, के आ रहे उभारों को रगड़ रहा था।

" पहचान कौन " जब वो तीसरी बार बोला, तो बुच्ची जोर से खिलखिलाई और हंस के बोली,

" अबे स्साले, तुझे तो मैं सपने में, हजार की भीड़ में पहचान लूँ। जिसने अपने बहन मेरे भैया को दी हो और एक और ले के टहल रहा हो, मेरे भाइयों के लिए तो उस स्साले से अच्छा मीठा कौन होगा। बताती हूँ स्साले तुझे अभी, तेरी बहन ने बतायानहीं की की लड़की की आँख नहीं कुछ और पकड़ते हैं, "
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गप्पू भी खिलखिलाने लगा।

बुच्ची उसे पहली बार से ही स्साला कह के बोलती थी, और रामपुर वाली ने अपने भाई को समझाया, " अरे बुर वाली की बात का बुरा नहीं मानते , तुम उसके भाई के साले तो उसके भी साले, "

और पीछे से उस ने 'कुछ और ' पकड़ लिया, आम की बाग़ में अपनी बहन की ननद की कच्ची अमिया, टॉप उठा के, बुच्ची सिसक उठी,

आज दोपहर में जब वो पुवाल वाले कमरे में, गप्पू को हल्दी लगा रही थी तो पलट के गप्पू ने उसे पकड़ लिया और उस के दोनों आते हुए उभारों को क्या मस्त मसला था, अभी तक उसकी छुअन, अगन बाकी थी।

वो समझ गयी थी, गप्पू अब साल भर पहले का सीधा साधा लजाधुर नहीं रहा, जिसे वो चिढ़ाती रहती थी, अब वो पहला मौका पाते ही पेल देगा।

और जब एक बार वो अपने भैया से पेलवा चुकी थी, दिन में उसने अपनी सगी मौसी, और सूरजु भैया की बुआ, कांती बूआ के मुंह से जब से सुना था की उनकी छोटी बहन, बुच्ची की माई ने दो दिन में छह बार अपनी भाभी के भाई से चुदवाया और तीन बार गांड मरवाई सी अलग, तो बस बुच्ची ने तय कर लिया, अब वो उसकी रामपुर वाली भाभी के भाई से, गप्पू से, अपनी माई का रिकार्ड तोड़ेगी और वो स्साला गप्पू कुछ ज्यादा हिचका तो पटक के खुद उसके ऊपर चढ़ के पेल देगी।



लेकिन गप्पू गरमाया था, कस कस के उस किशोरी की चूँचियों का रस ले रहा था, बुच्ची सिसक रही थी।

पर उस आम की बगिया के बारे में गप्पू से बहुत ज्यादा बुच्ची को मालूम था, बस पांच हाथ की दूरी पे एक आम का पेड़ था, खूब पुराना, खूब चौड़ा और एक मोटी डाल तो एकदम नीचे, कितनी बार उस डाल पे बुच्ची बैठी थी, और पांच छह बार तो उसने अपनी सहेली को व्ही डाल पकड़ के निहुर के पेलवाते देखा था, और दो बार तो उसका वही यार, काशी, उसी चौड़े पेड़ के सहारे शीलवा को खड़ा कर के, खड़े खड़े चोद दिया। और बुच्ची पास में खड़ी देख भी रही थी, पहरेदारी भी कर रही थी, और अपनी सहेली के बिल में आता जाता मोटा नाग ही देख रही थी।



लेकिन असली बात थी, दस कदम दूर की पगडंडी से न तो वो पेड़ दिखता था और न वहां कुछ भी हो, उस की झलक आती थी।


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और आज शीला की जगह बुच्ची उस डाल के सहारे थी, टॉप नेकलेस बना गले तक, स्कर्ट भी बुच्ची ने खुद उठा दी और गप्पू चुसूक़ चुसुक बुच्ची के उभारों का रस ले रहा था


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और उस का एक हाथ बुच्ची की जाँघों पर सरक रहा था।



बुच्ची ने भी सीधे गप्पू की नेकर में हाथ डाल के उस दहकती रॉड को पकड़ लिया था और मन तो कर रहा था की अपनी जाँघों के बीच उसे ले ले, पर एक तो अभी भी जो चमड़ी छिली थी और दूसरे उसकी अनुभवी सहेली, शीला ने जो फिटकरी डालकर गुनगुने पानी से अंदर तक सेंका था, उसी समय शीला ने साफ़ बोला,


" सुन छिनार, अगले तीन चार घंटे तक ऊँगली भी नहीं अंदर, बस अगर तीन चार घंटे तक आपन गर्मी रोक पायी तो उसके बाद तो मैं खुद एक के बाद एक चढ़वाऊंगी। लेकिन अगर अभी जरा सा भी धक्का लगा, तो बस चार पांच दिन तक चुदवाना तो दूर चुसवा भी नहीं पाएगी तू "



बुच्ची ने अपने मन को भरोसा दिया और प्यार से गप्पू के खूंटे को पकड़ के सहलाने लगी, अब वो एकदम मोटा हो गया था, कड़ा तना, उसकी मुट्ठी में फुफकार रहा था।



और अब चूमने चूसने का काम बुच्ची कर रही थी,

जैसा भाभियों ने सिखाया था, बिना एक पल भी देह से अलग हुए, बुच्ची के होंठ सरकते फिसलते सीधे गप्पू के लम्बे मोटे खूंटे के पास, पर बुच्ची ने उसे मुंह में नहीं लिया, गप्पू को उसने आम के पेड़ की चौड़ी डाल से सटा कर खड़ा कर दिया, और अब उस टीनेजर के होंठ, गप्पू की जाँघों को चूम रहे थे, फिर सिर्फ जीभ की नोक से बुच्ची ने गप्पू के खूंटे के बेस के चारो ओर हल्के हल्के चाटना, जीभ के नोक से प्रेस करना शुरू कर दिया रु बुच्ची के कोमल हाथ भी मैदान में आ गए थे , उँगलियों की टिप कभी गप्पू के बॉल्स को सहला देती तो कभी उसके बुच्ची के नाख़ून, बॉल्स को स्क्रेच कर देते,



गप्पू सिहर कर रह जाता, उसने अपने दोनों हाथों से बुच्ची के सर को पकड़ रखा था, और बुदबुदा रहा था



"बुच्ची ले ले, ले न बुच्ची मुंह में ले ले "



बुच्ची को गप्पू अच्छा भी बहुत लगता था, एकदम मीठा प्यारा सा गुलाबजामुन ऐसा, मन करे की गटक लो, लेकिन उसे चिढ़ाने में मजा भी बहुत आता था, वो अपना सर ऊपर कर के बोली

" अबे स्साले, बोलने में तो तेरी फट रही है, तुझसे ज्यादा जोश में तो मेरी भाभी, तेरी बहन हैं, बोल, क्या ले लूँ मुंह में "

" मेरा वो, प्लीज, मेरा " थूक गटकते हुए गप्पू बोला, " मेरा, मेरा लंड "

" सिर्फ मुंह में क्यों, हर जगह लूंगी, तूने अपने बहन को हमारे गाँव चुदवानेभेजा है यार, और अब चुनिया भी तैयार माल है, लेकिन चल तू कहता है तो पहले मुंह में " बुच्ची ने चिढ़ाया


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और अपनी जीभ निकाल के खुले मोटे सुपाड़े को बस चाट लिया, जैसे स्कूल की लड़कियां लॉलीपॉप चाटती हैं एक हाथ से उसने अपने यार का लंड पकड़ रखा था और जीभ से बस चाट रही थी, कभी सुपाड़े को, कभी ऊपर से नीचे तक,



" उप्प्स, बुच्ची, हाँ, बेबी, बहुत अछ्छा लग रहा है, उफ्फ्फ, स्साली चूस न "

" अबे स्साले, स्साली है तेरी बहन, मेरी सहेली चुनिया "

एक पल के लिए खूंटे को दूर कर के बुच्ची बोली और गप्प से सुपाड़ा मुंह में ले लिया और क्या चूसा है उस कच्ची कली ने।



कुछ तो उसकी भाभियों का कमाल, दो दिन से मुन्ना बहू और मंजू भाभी पहले बुच्ची के मुंह में ऊँगली डाल के फिर हलक तक मोटी गाजर पेल के चूसना सीखा रही थी और इमरतिया ने तो अपने सामने बुच्ची से उसके सूरजु भैया का खीरे इअसा मोटा लंड जड़ तक लेके चुसवा के पूरा पक्का कर दिया।



बुच्ची दाएं हाथ से गप्पू का चूतड़ कस के पकड़ी थी और बाएं हाथ से उसके मूसल के बेस पे ले जाके हलके हलके मुठिया रही थी , सुपाड़ा उसने गप्प कर लिया और जीभ एक ओर नीचे से चाट रही थी और दोनों टीनेज होंठ कस कस के चूस रहे थे।


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बुच्ची को बहुत अच्छा लग रहा था, इस तरह खुले में आम की बाग़ में, रात हो रही थी, और वो बिना किसी हिचक के अपने यार का खूंटा मुंह में लेकर,

" ले बुच्ची ले , ओह्ह उफ्फ्फ तू यार बहुत अच्छी है ले न " गप्पू बोल रहा था और बुच्ची का सर कस के पकड़ के उसने पूरी ताकत से अंदरपेल दिया।



आधा से ज्यादा खूंटा अंदर था और अब बुच्ची कस कस के चूस रही थी, एक हाथ से वो बॉल्स को सहलाती, दूसरे हाथ से गप्पू के नितम्बो को रगड़ती, कभी मुंह थोड़ा सा ढीला कर देती तो कभी कस कस के चूसने लगती साथ में लंड मुठिया भी रही थी पर अब गप्पू से नहीं रहा गया वो आगे पीछे करने लगा जैसे बुच्ची का मुंह नहीं उसकी बुर हो और वो चोद रहा हो, बुच्ची को भी बहोत मजा आ रहा था। लेकिन थोड़ी देर बाद ही, गप्पू घबड़ा के बोलने लगा



" अरे यार छोड़ दे निकल जाएगा "



लेकिन बुच्ची जानती थी कि अभी इतनी जल्दी कुछ नहीं होने वाला है।

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इमरतिया और मुन्ना बहू दोनों ने उसे दस दस पहचान बता दी थी कि मर्द कब झड़ता है और कब शरीफ सुरसुरी मचती है और उसे लगता है, कि वो गिरने वाला है। हाँ उस समय अगर लड़की रुक जाए, थोड़ा सांस लेने दे मर्द को तो असल में वो दस पंदह मिनट के पहले नहीं गिरेगा। और बुच्ची समझ गई थी कि गप्पू का किसी लड़की या औरत के साथ पहली बार है, इसलिए वो घबड़ा रहा है।

बुच्ची ने छोड़ दिया, मुंह से तो निकाल दिया, पर मुठियाना नहीं बंद किया और चिढ़ाते हुए बोली,

" अबे स्साले, तेरी सारी बहनों कि बुर अपने भाइयों से चुदवाउ, गिर जायेगा तो गिर जाने दे, किसके लिए बचा रखा है, मेरी रामपुर वाली भौजी के लिए कि मेरी छिनार सहली चुनिया के लिए, अरे उसपर तो इस गाँव के सब लड़को का नाम लिखा है "

" कहीं तेरे मुंह में गिर जाता न तो इस लिए "

घबड़ाते हुए गप्पू ने अपनी सफाई पेश की।



बुच्ची के मन में गप्पू के लिए ढेर सारा प्यार उमड़ आया, और उसकी आँखों में झाँक के गरिया के बोली, " तू स्साला है नंबरी बुद्धू, ...गनीमत है मेरे पल्ले पड़ा है "



और झट से एक बार फिर से सुपाड़ा मुंह में बुच्ची ने ले लिया और अब अगले दस मिनट तक इमरतिया ने जो काम कला सिखाई थी, एक से एक बदमाशियां सब की सब, चूसते हुए कभी गप्पू के पिछवाड़े की दरार में ऊँगली कर देती, कभी होंठों से दबा के सीधे लंड के बेस से सुपाड़े तक ले आती,

और बीच में एक दो बार निकाल भी तो अपने निपल से सुपाड़े पे रगड़ दिया, होंठों में रसगुल्लों को भर के चूसने लगी


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और अब जब पंछी फड़फड़ाने लगा तो साफ़ था अब गप्पू किनारे पर पहुँचने वाला है , बारह चौदह मिनट से लगातार बुच्ची चूस भी रही थी, मुठिया भी रही थी, तो उस लड़की ने कस के दोनों हाथों से गप्पू के चूतड़ पकड़ लिए जिससे वो लौंडा छुड़ा न पाए। गप्पू कसमसा रहा था, छटपटा रहा था
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" बुच्ची यार निकाल दे न, अब गिर जाएगा, ओह्ह्ह उफ्फ्फ यार तेरे मुंह में, उफ़ बस बाहर निकाल दे न , ओह्ह अच्छा चल बाहर गिरा दे न , ओह्ह इत्ता अच्छा लग रहा है, मेरी बुच्ची मान जा, यार मुंह खोल, ओह्ह्ह उफ्फ्फ्फ़ "



और बुच्ची ने बस तर्जनी से गप्पू के पिछवाड़े की दरार में जरा सी ऊँगली का जोर लगा दिया, लगा जैसे बाँध टूट गया हो। गुड्डी ने अपने होंठों को कस के भींच रखा था, जिससे एक बूँद भी अमृत बहार न छलके, पहले एक धार, तेजी से सीधे हलक के अंदर, और फिर रबड़ी मलाई के थक्के, निकलते ही गए।



गप्पू एकदम शिथिल हो गया, और उसी समय जहाँ एकदम अँधेरा था चांदनी का कोई टुकड़ा पेड़ों की डालो को हटा के कुन्द्ती फांदती सीधे बुच्ची के चेहरे पर, क्या ख़ुशी छिटकी थी वहां।

बुच्ची ने एक बार फिर जोर लगा के चूसा, चूसती ही रही, और दो चार थक्के और उस के मुंह में, फिर धीरे धीरे पेड़ की डाली को पकड़ के, सहारा ले के वो खड़ी हुयी और मुस्करा के पहले गप्पू को कस के गले लगा लिया। बुच्ची का मुंह एकदम फूला था। चांदनी उसकी देह को नहला रही थी, उसका सुन्दर मुखड़ा साफ़ दिख रहा था।

गप्पू को छोड़ के वो दूर खड़ी हुयी और मुंह खोल के चिढ़ाते हुए गप्पू को दिखया,

पूरे मुंह में मलाई भरी थी, खूब गाढ़ी सफ़ेद, जीभ भी नहीं दिख रही थी, एक बूँद मुंह से निकल के ठुड्डी पे आ गयी थी, बुच्ची ने उसे पोंछ के अपने होंठों पे लपेट लिया,


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बुच्ची खूब खुश थी और गप्पू को तो जैसे काठ मार गया था , मूरत बना वो बुच्ची को देख रहा था,



बुच्ची ने मुंह बंद कर लिया और गहरी सांस ली। उसके फूले गाल पिचकते चले गए। और दो मिनट के बाद जब उसने गप्पू के सामने मुंह खोला

जैसे जादूगर कबूतर दिखाते हैं, अभी है, अभी नहीं, बस एकदम उसी तरह।



बुच्ची का खुला मुंह एकदम खाली था , बस दो चार बूंदे जीभ पे लगी थीं,

अगली बार वो भी गायब।



बुच्ची ने अपने हाथ से गप्पू का नेकर खीँच के ऊपर कर दिया, अपने प्यारे पप्पू को अंदर और उसके पहले चूम के बोली,

" मिलते हैं ब्रेक के बाद, पक्का कल और तेरी सहेली से मुलाक़ात करवाउंगी "



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स्कर्ट तो उसकी अपने आप नीचे हो गयी थी, टॉप खीँच के कमर तक , और गप्पू का हाथ पकड़ के पगडंडी पे ले आयी और जहाँ एक फोर्क था उसे दिखाते बोली,

" सुन स्साले तू इधर से निकल ले, दालान के सामने जो कुंआ है न बस उसी के बगल में जायेगी ये और मैं बायीं ओर से जाउंगी, सीधे पिछवाड़े वाले दरवाजे पे "



मुड़ने के पहले बुच्ची ने गप्पू को पकड़ के एक बार कस के चूम भी लिया और उसके नेकर में हाथ डाल के गप्पू के पप्पू को दबा भी दिया।बुच्ची के मुंह में पहली बार मरद के बीज का स्वाद लगा था। चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था, आज खुद उसने अपने यार को वो मस्ती दे दी थी जिसके लिए सब लड़के तड़पते हैं, खुले आसमान के नीचे, खुलेआम आम के बाग़ में न सिर्फ उसे चूसा और झाड़ा बल्कि एक एक बूँद गटक गयी। और कल कुछ भी हो जाए, अपने इस यार को अपनी चुनमुनिया का भी मजा दे देगी, उसके बाद तो उसका गप्पू जब चाहे, जितनी बार, जहाँ चाहे

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कुछ देर में बुच्ची पिछवाड़े के दरवाजे से सीधे आंगन में पहुँच गई, जहाँ लड़कियों के झुंड में धंस गई।
 
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तितलियाँ

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कुछ देर में बुच्ची पिछवाड़े के दरवाजे से सीधे आंगन में पहुँच गई, जहाँ लड़कियों के झुंड में धंस गई।



लड़कियाँ क्या, जैसे बारिश के बाद किसी फुलवारी में रंग-बिरंगी तितलियाँ उड़ती-नाचती उतर आई हों। हर रंग, हर उम्र की।

बस वही हालत सूरजू भैया के बियाह में लड़कियों की थी।

कुछ एकदम कच्ची उम्र वाली, जिनके दूध के दाँत भी अभी न टूटे हों, तन-मन दोनों से भोली, जिनके कच्चे टिकोरे बस उठ रहे थे।



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कुछ तो घपाघप का खेल कई यारों के साथ खेल चुकी थीं। कुछ सूरजू भैया की चचेरी-फुफेरी बहनें या गाँव के रिश्तेदार, कुछ उनकी ननिहाल की, मामी-मौसी की बेटियाँ और दो-चार तो ननिहाल की भाभियों की बहनें भी। दर्जन भर से ऊपर लड़कियाँ।
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फिर गाँव की लड़कियाँ, बबुआने के अलावा, और टोले की भी।

सबसे कच्ची कलियों में सुशीला चाची की बेटी मीना अपनी माँ की तरह खूब गोरी, गदराई, भरी-भरी देह वाली थी। अपनी समौरिया लड़कियों से भी ज्यादा भरे-भरे जोबन वाली। कई साल बाद गाँव आई थी। उम्र में भरौटी की लीला से थोड़ी बड़ी, लेकिन बुच्ची से कम से कम सात-आठ महीने छोटी। उसी की तरुण ऊपरी, सुशीला चाची की पट्टीदारी में देवरानी चंदौली वाली चाची की बेटी रीना। चंदौली वाली देवरानी की उम्र भी लगभग बराबर, ३४-३५ की। एक ही अगहन में गौने आई थीं। रीना मीना से चार-पाँच महीने छोटी होगी, लेकिन दोनों शहर से आई किशोरियाँ एकदम सगी बहनों जैसी लगती थीं।



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उन्हीं की उम्र की सूरजू की मझली मौसी की बेटी रूपा भी थी — बहुत लजाधुर, लखनऊ के किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ती थी। पर शादी-बियाह का मौका ही तो मिलने-जुलने का होता है।

सूरजू भैया के बुआ की लड़कियों में बुच्ची ही अभी आई थी, और वो सगी से बढ़कर तिलक से भी हफ्ता भर पहले। हाँ, रीना और मीना के साथ बनारस से एक चाची और उनकी दो जुड़वाँ बेटियाँ सुनीता और रंजीता भी आई थीं। दोनों ११वीं पढ़ती थीं। दोनों बेहद सुंदर। आते ही सब लड़कियों और भाभियों से उनकी पक्की दोस्ती हो गई। नीलू पड़ोस के गाँव की चाचा की बिटिया, वो भी आज सुबह अपनी माँ के साथ आ गई थी।
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तो अब ददिहाल की टीम तगड़ी हो गई थी। लड़कियों की बात करें तो मीना, रीना, सुनीता, रंजीता, नीलू और बुच्ची तो पहले से ही थीं। लड़कियों में सबसे बड़ी बंबई से आई शीतल मौसी की बेटी रमा (जो बारहवीं पढ़ती थी) और बड़ी मामी की बड़ी बेटी संध्या थी। ननिहाल से आई मंझली मौसी की बेटी रूपा, और ननिहाल के गाँव में सूरजू के नाना के घर के पड़ोस से सोना और निशा भी थीं।

फिर गाँव की लड़कियाँ — कुछ बियाहता (लेकिन लरकोर नहीं), कुछ कुँवारी, कुछ बबुआने की, कुछ पठान टोले की और कुछ बाकी टोलों की। सबसे आगे थी पूनम, अहिराने की। सूरजू से बस साल-दो साल छोटी। इसी साल जेठ में गौने गई थी। पूनमिया ग्वालिन चाची की बेटी। अहिराने की सब जबरदस्त।
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पूनमिया जब दूध दुहने ग्वालिन चाची आतीं तो साथ-साथ आती और अक्सर सूरजू सिंह के घर पर ही रुक जाती। साथ खेलती, झगड़ती।

सूरजू की देखा-देखी उनकी महतारी को ‘माई’ और ग्वालिन को ‘भौजी’ बोलती। एक दिन सुबह-सुबह ग्वालिन भैंस दुह रही थीं, पूनमिया उनकी पीठ पर चढ़ी बदमाशी कर रही थी। सूरजू ग्वालिन चाची के आगे-पीछे निहोरा कर रहे थे,

“भौजी दूध! भौजी दूध!”

पूनमिया अब इतनी छोटी भी न थी। उसके कच्चे टिकोरे निकलने लगे थे। ग्वालिन चाची ने पूनमिया के टिकोरों को दबाकर सूरजू को चिढ़ाया,

“हे, इसका दूध पियोगे?” चिढ़ाने वाली ग्वालिन चाची अकेली नहीं थीं। सूरजू की माई, मुन्ना बहू सब।


सूरजू की माई चिढ़ाती, “हे पूनमिया से विवाह करबे!”


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और अब सूरजू

लजाने लगे थे, बियाह का मतलब मालूम हो गया था, और बियाह के बाद का होता है ये भी। नागराज पजामे में सोते जागते चौबीसो घंटा फड़फड़ाते रहते थे, जब देखो तब खूंटा खड़ा। एक तो बचपन के लजाधुर और अब और ज्यादा,

एक दिन ग्वालिन चाची छेड़ने पर जुट गईं। पूनम को दिखाते हुए बोलीं, “हे, पीना है इसका दूध?” फिर खुद जोड़ दिया,

“लेकिन पहले अपनी मलाई खिलानी पड़ेगी, तब दूध देगी ये।”
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कहारिन ने भी छेड़ा,

“अब ये मत कहना कि मलाई नहीं निकलती। रोज मैं पाजामा धोती हूँ, कटोरी भर के मांड निकलता है, बिन नागा। रात में सपने में गिराने से तो अच्छा है।”
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इतना जोर का ठहाका लगा। पूनमिया ने कसकर सूरजू की चिकोटी काट ली, बिना लजाए। सूरजू की माई हँसते हुए बोलीं,

“अरे तो क्या हुआ? ये तो इस गाँव का रिवाज है। सब मरद बहनचोद होते हैं, गाँव के पानी का असर।”

वही पूनम, जबरदस्त जोबन, चोली में न समाने वाला।

अब सब लड़कियों की लीडर। चाहे सूरजू के गाँव की हो या ननिहाल की। बियाहिता में बबुआने की चननिया पूनम की खास सहेली। दो-चार और गाँव की नई बियाहता लड़कियाँ।



कुंवारियों में पठान टोले की सईदा, रज्जो, बबुआने की लीना और दीपा।

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लड़कियाँ गाँव में पर्दा नहीं करती थीं।

रात में गाने की मस्ती, भौजाइयों की छेड़खानी और रस्मों में एकदम खुलकर मजाक और गाने।


शहर और गाँव, सूरजू सिंह के गाँव और ननिहाल का फर्क खत्म हो गया था।

लड़कियाँ सब आपस में भी पूरी तरह खुल गई थीं। एक कमरे में रहना, एक बाथरूम में तीन-चार लड़कियों का साथ नहाना, साथ-साथ कपड़े बदलना — इतनी टीनेजर्स, जवानी की सांकल खटखटाती।


तो सबसे ज्यादा बात एक ही चीज की होती — लड़कों की।

लड़कियाँ अपने भाइयों की, भाभियाँ अपने देवरों की।

जिनके भाई अभी नहीं आए थे, वो अपने देवरों का टाँका लगवाने में लगी थीं। रामपुर वाली भाभी और उनकी छोटी बहन चुनिया तो बुच्ची के पीछे ही पड़ी थीं — खुलकर अपने भाई गप्पू से उसकी सेटिंग कराने के चक्कर में। और आज बुच्ची ने ऊपर वाले मुँह से ही सही, गप्पू का गन्ना चूस ही लिया था।

मर्दों का इलाका अलग था — घर के बाहरी हिस्से में बैठक जमती। लेकिन लड़कों को थोड़ी छूट थी। वे जेठ-ससुर तो थे नहीं। किसी की माँ, बहन, भाभी अंदर होती। असली जरूरत सब औरतों को मालूम थी कि लड़कों को किस चीज की है। सब एक-दो दिन के अंदर किसी न किसी से सेटिंग करके मौके का फायदा उठा लेना चाहते थे। हाँ, कभी-कभी कोई बड़ी बूढ़ी बुआ-काकी हड़का भी लेती, “का हरदम लड़कियों-औरतों में घुसे रहते हो?”

एक दिन कांति बुआ एक-दो औरतों के साथ शादी का झाँपा तैयार कर रही थीं।

उनके साथ बंबई वाली रमा, पठान टोले की सईदा और पश्चिम पट्टी वाली नीलू थीं। तभी पूरब पट्टी वाला नंदू आया — सूरजू का खास दोस्त, छोटे भाई जैसा।


पहलवानी की थी तो देह खूब गठीली। बुआ से बोला, “बुआ, कैंची है? हम लोग झंडी बना रहे हैं।” लेकिन निगाह उसकी रमा पर टिकी थी। रमा सईदा को इशारा करके हलके-हलके मुस्करा रही थी।

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सबको मालूम था कि वो जबसे रमा आई है, उसके चक्कर में है। रमा को भी वो अच्छा लगता था। लेकिन कांति बुआ ने उसे जोर से हड़का लिया। भरौटी की एक भौजी ने चिढ़ाया,

“हे, साफ-साफ माँग लो जो माँगना है। ननद हमारी देने में संकोच नहीं करेगी।”

बुआ के हड़काने का असर हुआ। वो दुम दबाकर बाहर गया, लेकिन सब जानते थे कि आधे-पौने घंटे में किसी बहाने से फिर अंदर आ जाएगा।


नयी-नयी दुल्हनों ने आँचल में मुँह छिपाकर हँसना शुरू कर दिया। कांति बुआ की भौजी, सूरजू की माई हँसकर चिढ़ाई,

“अरे सूरजू क बुआ, काहें? जहाँ गुड़ होता है, चींटे आते ही हैं।”


फिर रुककर अपनी ननद और रमा की ओर देख मुस्कुराते हुए बोलीं,

“भूल गई आपन टाइम? ये रमा से भी छोटी थी, बुच्ची के बराबर रही होगी। हमहीं देखे थे — गन्ने के खेत में एक अगवाड़े से भरौटी वाला लौंडा चढ़ा था, पिछवाड़े अहिराने वाला, और वो जोखू हरवाहा...”

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पूनम की माई ग्वालिन चाची गेहूँ साफ करते हँसते हुए बोली, “सही कह रहीं हैं सूरजू की माई। पूनम के चाचा गाय दुहने आते थे तो पहले सूरजू की बुआ को दुहते थे।”

चावल पछोरती सूरजू की ननिहाल की एक औरत हँसकर बोली,

“तबे अइसन डबल-डबल चूँची हैं।”

लड़कियाँ सब खिसखिसाकर हँसने लगीं। दिन भर किसी न किसी की कुंडली खुलती रहती और लड़कियों को बहुत मजा आता।

और ऐसा नहीं कि सिर्फ रमा का कोई दीवाना था।

सूरजू के ननिहाल के दो-चार लड़के रंजीता और सुनीता के पीछे पड़े थे।


ननिहाल का चंदू, जिसे सब भौजाइयाँ ‘चोदू’ कहकर बुलाती थीं (और था भी वैसा ही), उसकी तो दो दिन में ही सईदा से पक्की सेटिंग हो गई थी। चुम्मा-चाटी पहले दिन से शुरू, अब बस घपाघप का चक्कर बाकी था।

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उसके अलावा दो-चार सूरजू के गाँव की भाभियों पर भी उसने हाथ डालना शुरू कर दिया था।

लंबा-चौड़ा, और ‘वो भी’ लंबा-मोटा। ननिहाल के लौंडे सूरजू की चचेरी-फुफेरी बहनों के पीछे, वैसे ही सूरजू के गाँव के लौंडे उसकी ममेरी-मौसेरी बहनों के।

हाँ, बुच्ची की बात अलग थी।


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गप्पू तो उसे देखकर साल भर से ललचाता था। उसकी दो बहनों — बुच्ची की सहेली चुनिया (गप्पू की छोटी बहन) और रामपुर वाली भाभी के चक्कर में अब गप्पू से उसकी पक्की सेटिंग हो गई थी। बस गप्पू के चढ़ने की देर थी। लेकिन उसके उभरते जोबन पर घात लगाने वाले सूरजू के ननिहाल में कई थे। गप्पू का दोस्त बिट्टू, जो हर चीज बाँटकर खाता था, वो भी गप्पू से पहले से बुच्ची पर लाइन मार रहा था। सूरजू का ममेरा भाई रवि, जो लखनऊ में पढ़ता था, वो भी बुच्ची के नैन-बाणों से घायल हो गया था।

सब जानते थे — चुनिया को ही पटाना पड़ेगा। कच्ची उम्र की लड़कियों की स्कर्ट में घुसने का रास्ता बिना उनकी भाभियों के पटाए नहीं खुलता। तो सब बुच्ची के चाहने वाले — कोई चुनिया की चापलूसी करता, तो कोई मंजू भाभी या मुन्ना बहू के पीछे।

एक दिन मुन्ना बहू ने सुना — रवि, बिट्टू और गप्पू चुनिया से सिफारिश लगा रहे थे, “अरे यार, एक बार बस दिलवा दे साली की।”

चुनिया हँसकर समझा रही थी, “अबे स्सालों, तरबूज कटेगा तो सबमें बंटेगा। काहे जल्दीबाजी कर रहे हो? एक बार गप्पू चढ़ जाए, उसकी टाँगें फैला दे, फिर देखना उसकी टाँगें सिकुड़ेंगी नहीं। बारी-बारी से लगा लेना सब नंबर।”

मुन्ना बहू से न रहा गया। वो भी घुस गईं,

“अरे बारी-बारी से क्यों? साथ-साथ नंबर लगाओ न। सब चीजें मिल-बाँट के खाते हो तो ये माल क्यों नहीं? अरे दो-दो गाल हैं, दो-दो चूँची हैं, दो-दो छेद हैं। और जब एक बार दो-तीन से लौंडिया चुद जाती है न, सब उसकी लाज-शर्म उसकी गाँड़ में घुस जाती है। फिर तो सबके सामने चुम्मा लेगी, खुद गन्ने के खेत में बुलाएगी।”

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ये बात चुनिया तक ही सीमित नहीं थी। उसके पीछे ननिहाल वाले भी, सूरजू के गाँव वाले भी। भाभी की छोटी बहन तो साली हुई फिर। चढ़ता जोबन, उबलती जवानी, गोरा रंग — किसका न फड़के? लड़कियों को सबसे ज्यादा मालूम था कि किसका आशिक कौन है, और वो एक-दूसरे को नाम लेकर इशारे से छेड़ती भी थीं।

लड़के बाहर ही रहते थे, लेकिन बीच-बीच में अंदर आँगन में किसी काम के बहाने आ जाते। लड़कियों पर कोई पाबंदी नहीं थी। गाँव-घर की बेटियाँ सीना तानकर चल सकती थीं।
 
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खाने के समय

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सबसे ज्यादा इशारेबाजी खाने के समय होती। लड़के पाँत लगाकर आँगन में खाते, लड़कियाँ परसतीं। फिर लड़कियाँ खातीं, लड़के परसते। रात में ये खाना आठ बजे तक खत्म हो जाता।

जब बुच्ची घर में घुसी तो शाम ढल चुकी थी, रात चढ़ रही थी। लड़कों की पंगत लग रही थी। आते ही कांति बुआ (बुच्ची की बड़ी मौसी) ने हड़काया, “अरे बुच्चिया, का खी-खी कर रही हो? लड़के बिचारे भूखे बैठे हैं। जल्दी चलो, खाना लगाओ।”

असली बात ये थी कि आठ बजे के बाद बाहर वाले मर्दों वाले हिस्से का दरवाजा बंद हो जाता और मोटा ताला लटक जाता, जिसकी जिम्मेदारी कांति बुआ की ही थी। फिर कोई लौंडा, कोई मरद, कुत्ता या बिल्ली भी रात भर इस हिस्से में नहीं आ सकता था। औरतों का रात। साढ़े आठ बजे तक सब लोग ऊपर छत पर, जहाँ गाना-मस्ती चल रही थी।

मीना और रीना मिलकर पत्तल लगा रही थीं। उनके साथ पठान टोले वाली सईदा और बड़ी मामी की लड़की संध्या भी थीं।

आँगन में पंगत जम चुकी थी। लड़के पाँत लगाए बैठे थे — नंदू, गप्पू, बिट्टू, रवि, चंदू और बाकी गाँव-ननिहाल के जवान लौंडे। लालटेन की पीली रोशनी में उनकी गठीली देहें चमक रही थीं। कई की कमीजें खुली हुई थीं, सीने पर पसीना चमक रहा था। हवा में रोटी-सब्जी की महक के साथ जवानी की तीखी, उत्तेजक गंध घुली हुई थी।

“अरे बुच्चिया! जल्दी कर बिटिया, लौंडों के पेट में चूहे दौड़ रहे हैं,” कांति बुआ ने हड़काया, पर उनकी आँखों में शरारत साफ झलक रही थी।
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बुच्ची ने झट से थाली उठाई।

उसके पीछे मीना, रीना, सुनीता, रंजीता, संध्या, सईदा, चुनिया, लीना और दीपा भी पत्तल परोसने लगीं। पूनम और लीला तो ऊपर कोहबर में सूरजू दूल्हा के लिए खाना ले गई थीं, इसलिए नीचे नहीं थीं।

लड़कियों की चाल में आज खास नखरा और चमक थी। चोली थोड़ी और टाइट खींच ली गई थी, घाघरा कमर से नीचे सरका हुआ, हर कदम पर कमर मटक रही थी। आँचल जान-बूझकर सरक रहा था। रमा ने खूब कसा हुआ छोटा टॉप पहना था, उसके गदराए भरे-भरे जोबन झुकते ही छलक रहे थे। मीना, रीना, दीपा जैसी शहर वाली लड़कियों ने टॉप-स्कर्ट पहन रखा था और दुपट्टा बिल्कुल नहीं लिया था। जिन्होंने सलवार-कुरता पहना था, उन्होंने भी दुपट्टा उतारकर कमर में कस के बाँध लिया था, जिससे उभार और छलक के साफ दिख रहे थे। साड़ी वाली लड़कियों ने तो आँचल अपनी पतली कमर में इतना टाइट बाँध रखा था कि उनकी भरी हुई छातियाँ और नाभि सबको ललचा रही थीं।

रीना, रमा और रूपा जैसी कच्ची उम्र वाली लड़कियों के उभरते टिकोरे झुकने पर और भी बड़े, कड़े और आकर्षक लग रहे थे।

एक बात और थी — कच्चा आँगन इतना बड़ा था कि पूरी बरात का भात वहाँ हो सकता था। लड़कियों ने जान-बूझकर पंगत आँगन के कोने में, रसोई से दूर लगाई थी। मंडप की रोशनी भी कम पड़ रही थी, बस एक लालटेन जल रही थी। अँधेरा और कोना — दोनों तरफ से मजा लेने के लिए बिल्कुल सही जगह थी।

चुनिया अपनी सहेली बुच्ची के साथ थी। सब लड़कों को चिढ़ाते हुए जोर से बोली,


“बहुत भूख लगी है न तुम सबको? आज मेरी सहेली बुच्ची तुम सबकी भूख मिटाएगी... खूब भर-भर के!”
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बुच्ची सबसे पहले गप्पू के सामने पहुँची। गप्पू की निगाहें सीधे उसके उभरते टिकोरों पर अटक गईं जो चोली फाड़ने को बेताब थे। बुच्ची ने झुककर रोटी परोसते हुए उसके कान में फुसफुसाया,


“लो गप्पू... गरम-गरम... आज खूब खा ले... तेरी सारी मलाई तो मैंने अभी चूस ली थी।”

गप्पू ने मुस्कुराते हुए उसकी कलाई पकड़ ली और नीचे स्वर में बोला, “गरम तो तू है बुच्ची... रोटी से कहीं ज्यादा। तेरे टिकोरे देखते ही मेरा पप्पू फनफना रहा है।”

बुच्ची ने शरमाते-हँसते हुए कहा, “तेरी तरह वो भी बड़ा बदमाश है। घंटा भर पहले ही चूस-चूस के सारा रस निकाल लिया था। ले, और दो रोटी खा ले। कल सुबह देखूंगी तेरी ताकत और तेरे इस मोटे पप्पू की भी। आज तो कुछ भी नहीं था।”

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गप्पू के बगल में बैठा बिट्टू हँसा, “अरे बुच्ची, क्या सिर्फ गप्पू को ही दोगी? हम लोगों को भी तो देगी?”

चुनिया दाल परोस रही थी। बाल्टी से दाल डालते हुए जोर से बोली, “अरे बिट्टू, मेरी सहेली को क्या समझता है? सबको देगी और भरपूर देगी!”

रसोई में बैठी मंजू भाभी ने चुनिया की बात सुनी तो ननद को रगड़ने का मौका न छोड़ा। जोर से आवाज लगाई,

“तुम सब लेते-लेते थक जाओगे, मेरी ननद देने में नहीं थकेगी!”

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बुच्ची बिट्टू के सामने ज्यादा झुक गई, उसके बड़े टिकोरे लगभग उसके मुँह पर आ गए। बोली,

“कुछ चाहिए तो खुल के माँग ले न... काहे ललचाता रहता है? दे रही हूँ न, जितना माँगेगा उससे दूना दूँगी।”


कहते हुए उसने बिट्टू की पत्तल में चार रोटियाँ एक साथ परस दीं।

रमा बार-बार नंदू के आस-पास चक्कर काट रही थी। उसने बिट्टू को छेड़ा, “देख मेरी सहेली को... देने में पीछे नहीं हटती!”

तभी सूरजू के ननिहाल का एक ममेरा भाई सुंदर धीरे से बोला, “पीछे का भी देती है क्या?”

सबने सुन लिया और जोर का ठहाका लग गया। बुच्ची का चेहरा शर्म से लाल हो गया। जवाब उसकी एक भौजाई ने रसोई से ही दिया, “अरे कैसे जवान मरद हो तुम! छेद-छेद में भेद नहीं करना चाहिए। आगे का लंबा हो या पीछे का गोल, रगड़-रगड़ के जाएगा तो दोनों ओर मजा आएगा। जब हमारी ननद भेद नहीं करती तो तुम लोग सोच में क्यों पड़ रहे हो? निहुरा के पेल दो!”

रसोई में मुन्ना बहू ने रमा को देखकर चिढ़ाया,

“अरे ननद रानी, नंदू के सामने इतना झुक रही है कि चोली फट जाएगी। ऐसे ही झुक-झुक के देना उसे... बड़ा मोटा औजार है न उसका?”

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रमा हँसते हुए बोली, “भौजी, झुक तो मैं जाऊँगी... आप अपने देवर को समझा दीजिएगा। नंदू का बंबू चाहे जितना मोटा हो, मैं अपनी नांद में बांसुरी बजवाने से बाज नहीं आऊँगी।”

रामपुर वाली भाभी हँसी, “अरे शर्म कर ले रमा... अभी कुँवारी है। पर सरसों का तेल लगा के चिकना कर लेगी न तो कितना भी मोटा हो, सट्ट से घुस जाएगा।”

मुन्ना बहू ने चुनिया को देखकर कहा, “तेरी सहेली बुच्ची तो आज सबको दिल खोल के बाँट रही है... अभी तो बिल भी बाँटेगी!”

चुनिया हँसकर बोली, “एकदम भौजी! देखिएगा, ऐसी रगड़ी जाएगी न कि जो दही लड़कों को दे रही है, कल वही उसके अगवाड़े-पिछवाड़े दोनों तरफ भरी जाएगी!”


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नंदू के सामने रमा खड़ी थी। उसका छोटा टॉप और नीचे सरका घाघरा-स्कर्ट देखकर नंदू का लौड़ा तन गया। गोरा चिकना पेट, गहरी नाभि, मटकते चूतड़ और कड़े टिकोरे — सब कुछ ललचा रहा था।

नंदू ने रोटी लेते हुए उँगलियाँ उसके निचले पेट पर फेर दीं, “रमा... तेरा घाघरा बहुत नीचे सरका है... चूत के ऊपर का हिस्सा दिख रहा है।”

रमा ने और झुककर अपनी भरी छातियाँ उसके मुँह के पास कर दीं, “देख ले जितना देखना है... कल छू भी लेना, चूस भी लेना। पहले खा ले अच्छे से... कल तो मैं तेरा पूरा निचोड़ लूँगी।”

चंदू की नजर सईदा पर थी। सईदा ने टाइट सलवार-सूट पहना था, दुपट्टा गले से चिपका रखा था जिससे उसके कड़े गोले और भी उभरकर दिख रहे थे। चंदू ने पहले ही शाम को दोनों उभारों पर हाथ फेर लिया था और सईदा ने भी उसके बांस को पकड़ लिया था।

सईदा झुककर परोसते हुए अपनी मोटी गांड उसके घुटनों से सटा दी। चंदू ने जोर से दबा दिया। सईदा सिहर गई लेकिन मुस्कुराई, “अरे चोदू... अभी खाना खा ले। कल सुबह पठान टोले के पास आम की बगिया में मिलना... आज मैं पागल हो रही हूँ। आज मैं डाल रही हूँ, कल तू पूरा डाल देना।”

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चटनी का पूरा कटोरा उसकी पत्तल में उड़ेल दिया और उँगली से चंदू के होंठों पर लगाते हुए बोली, “सब चाट-चाट के खत्म कर देना... जरा सा भी न छोड़ना!”

भरौटी की भौजी आँगन में आईं और लड़कों को चेतावनी दी,

“किसी के पत्तल में एक दाना भी छूटा न तो उसकी बहिनिया नंगी नचाई जाएगी!”

मुन्ना बहू ने रसोई से जोड़ा, “और बाकी बचा उसकी गांड़िया में!”

खाने के दौरान इशारे, छूना-छुआना, मस्त छेड़छाड़ और ठहाके चलते रहे। लड़कियाँ बार-बार झुकतीं, आँचल सरकातीं, कमर मटकातीं।



खाना खत्म होते ही लड़के उठ गए और लड़कियों की पंगत बैठ गई। अब बारी पलट गई थी — लड़के परोसने लगे, लड़कियाँ खा रही थीं। आँगन के उसी अँधेरे कोने में सब लड़कियाँ पत्तल के आगे बैठ गईं।

गप्पू सबसे पहले बुच्ची के सामने आया। सब्जी परोसते हुए उसने बुच्ची की जाँघ पर हाथ फेर दिया। और छेड़ा" क्यों रानी डाल दूँ पूरा



बुच्ची ने टाँग थोड़ी फैला दी और नखरे से बोली,

“अरे गप्पू, तू स्साला एकदम बुद्धू है , पूरा नहीं तो क्या आधा डालेगा, बाकी क्या चुनिया के लिए, अरे उसको घोंटने वाले इस गाँव में बहुत हैं । अभी तो तेरे पप्पू का स्वाद मेरे मुंह में बाकी है। पहले जो दे रहा है दे , कल तेरा मोटा मूसल लूंगी। "

गप्पू की जिम्मेदारी पानी पर लगी थी और बुच्ची उसे बार बार दौड़ा देती, कभी पानी पी लेती कभी गिरा देती।

“अरे ओए, मेरा कुल्हड़ सूख गया है, पानी दे न!”

जब गप्पू पानी लेने गया तो बुच्ची ने फिर आवाज लगाई, “अरे इतना सा पानी है क्या तेरे पास? जल्दी कर न बदमाश!”

चुनिया बगल में बैठी थी, जोर से हँस पड़ी, “अरे भैया, इसे सफ़ेद पानी चाहिए! गाढ़ा वाला, जो तेरे पप्पू से निकलता है।”

बुच्ची ने चुनिया के कान में फुसफुसाकर कहा, “हाँ रे, तेरे भैया का अभी बगिया में पी के आई हूँ। खूब गाढ़ा और मीठा था। अब दूसरे मुंह में पीना है... असली प्यासा तो नीचे वाला मुंह है ।”

तब तक बिट्टू दही परसते हुए आ गया

बिट्टू हँसते हुए बोला, “अरे बुच्ची, हम भी हैं यार। देख मेरा कितना गाढ़ा थक्केदार है, ले ले एक बार चखेगी बार बार मांगेगी ”

बुच्ची ने बेझिझक जवाब दिया, " चल यार स्साला तू भी क्या याद करेगा, डाल दे तू भी, मैं मना नहीं करुँगी, तेरी भी दही का स्वाद ले लूँ

रवि ने दाल डालते हुए बुच्ची के टिकोरे पर नजर गड़ाकर धीरे से कहा, “ यार तेरे टिकोरे तो देख के लौड़ा फट रहा है। यार के बार कुतरने दे न इनको, बहुत प्यार से चूसूँगा इनको।”

बुच्ची हँसकर बोली, “चूस लेना, दबा लेना, काट लेना। पर अभी जो डाल रहे हो वो डाल दे ”

दूसरी तरफ नंदू रमा के सामने खड़ा था। रमा ने जान-बूझकर आँचल सरका दिया, अपने बड़े-बड़े टिकोरे छलकाते हुए बोली,

“नंदू, एतना मत ताक। नजर लग जायेगी , दे दूंगी न तुझे ।”



सईदा चंदू के सामने बैठी थी। चंदू ने चटनी डालते हुए उसकी गोद में हाथ डाल दिया और चूत के ऊपर उँगली फेर दी। सईदा ने सिहरते हुए टाँगें फैला दीं और फुसफुसाई,

“अरे चोदू… अभी मत छेड़। कल सुबह बगिया में ले जाना।कर लेना अपनी मनमर्जी। आज मैं पागल हो रही हूँ।”



सुनीता और रंजीता दोनों बहनों ने मिलकर रवि और बिट्टू को घेर लिया। रीना ने रवि को चिढ़ाते हुए कहा,



रसोई की तरफ से मुन्ना बहू और रामपुर वाली भाभी ठहाका मार रही थीं। मुन्ना बहू ने आवाज लगाई,



पूरी पंगत में ठहाके, गंदी-खुली छेड़छाड़ और मस्ती छाई हुई थी। लड़कियाँ जानबूझकर झुक रही थीं, आँचल सरका रही थीं, टाँगें फैला रही थीं। लड़के परोसते समय छू रहे थे, दबा रहे थे, उँगलियाँ फेर रहे थे।

आठ बजते ही खाना खत्म हो गया। लड़के सब बाहर चले गए। कांति बुआ ने बाहर वाले मर्दों वाले हिस्से का बड़ा-मोटा ताला लगा दिया।
 
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छत पर नाच गाना

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आज सुबह से ही छत पर कल जो नाच गाना हुआ था, एकदम खुल के धमाल उस की गूँज भौजाइयों, बड़ी उमर की औरतों में तो थी ही, सबसे ज्यादा लड़कियों को खुजली मच रही थी

और जो लड़कियां, भाभियाँ, चाचियां मामियां, आज आयी थीं वो कल के किस्से सुन के गरमा रही थीं, और ऊपर से बड़की ठकुराइन का हुकुमनामा, आज तो कल से भी दस गुनी ज्यादा मस्ती होगी, एकदम खुल्लमखुल्ला ,



फिर आज नयी नई लड़कियां आयी थीं, कच्ची अमिया वाली, मीना और रीना, ननिहाल की रूपा और पांच से कम तो नहीं होंगी, असल बारी कुँवारी, जिनकी सील पक्का था अभी नहीं टूटी है, बल्कि ऊँगली भी नहीं हुयी, और उसमे में मुन्ना बहु की ममेरी ननद भी थी, लीला।


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गाँव की लड़कियां भी आज गरमाई थीं, अहिराने की पूनम और बबुआने की चननिया, फिर भउजाई लोग तो थीं ही, चाची और बूआ, मामी और मौसी भी।



गाँव की औरतों को कल लग गया था की जो मस्ती बरात के विदा होने पे होती है, क्योंकि मरद सब बरात चले जाते हैं यहाँ उससे भी ज्यादा प्राइवेसी थी, एक तो मर्दों को इलाके से अंदर का जो दरवाजा है उसपे ताला लगता है, और फिर सीढ़ी पे भी कांती बूआ खुद अपने हाथ से ढाई सेर का ताला लगा देतीं हैं, फिर ऊँचा बारजा और तिरपाल का पर्दा, छत पे जो भी मस्ती हो, जबरदस्ती हो, रगड़ी रगड़ाई हो, किसी को नहीं पता चल सकता, और मर्द तो छोड़िये चिड्डा भी पर नहीं मार सकता।


हाँ दूल्हे का कमरा ऊपर है, लेकिन उसका भी दरवाजे खिड़की तो बंद ही रहती है , ऊपर से कल मंजू भाभी ने बाहर से भी ताला मार दिया था। तो बस कर लो मन मर्जी, खोल दो जिसकी साड़ी, पेटीकोट, उठा दो स्कर्ट,



कल बुच्ची और चुनिया ने खूब धमाल मचाया था और दोनों खूब बन्ना बन बनी थीं, चुनिया बन्नी बनी और जयमाल डालने के लिए क्या शर्त लगाई थी



लेकिन पहले तेरी बहना को, तेरी बुच्ची को घोड़ी बनवाऊंगी, तेरी बुच्ची को कातिक की कुतिया बनवाऊंगी,

तेरी बुच्ची को घोड़ी बनवाऊंगी, तेरी बुच्ची को कातिक की कुतिया बनवाऊंगी,

अपने गप्पू से तेरी बुच्ची को खूब चुदवाउंगी , गपागप चुदवाउंगी




और चुनिया की बड़ी बहन, रामपुर वाली भाभी ने क्या मस्त नाचा था, और अपनी सास दूल्हे की महतारी को खूब चिढ़ाया था,


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जब तेरा मुन्ना छोटा था , जब ये बन्ना छोटा था, बोतल से दूध पीता था, तब ये बन्ना तेरा था,

जब इसकी छोटी सी नूनी थी , तू तेल इस में लगाती थी, तब ये बन्ना तेरा था, तब ये मुन्ना तेरा था

अब मोटा-सा लौंड़ा है, अब लंबा-सा लौंड़ा है, अब ये बन्ना मेरा है।




लड़के की शादी में लड़के की बहिन महतारी गरियाई जाती हैं, रगड़ी जाती हैं लेकिन कल तो हद ही हो गयी थी, सब भौजाइयों ने बुच्ची को साफ़ साफ़ बोल दिया"कल नाच गाने के पहले तेरी चुनमुनिया फट जानी चाहिए, वरना हम भाभियाँ पूरी मुट्ठी डाल के फाड़ेंगी तो सोच ले, भैया के लंड से फड़वाने है या भाभी की मुट्ठी से।

और जवाब खुल के सूरजु दूल्हे की महतारी ने ही दिया,

" अरे ये भी कोई पूछने की बात है, इसकी महतारी मेरे सामने एक साथ सूरजु के बाबू और चाचा का घोंटती थी और बुच्ची से भी छोटी थीं तो ये भी तो इसी गाँव की लड़की है, भाई चोद तो होगी ही। "
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लेकिन दूल्हे की मामी और बुआ लोगो ने मिल के और साथ में दूल्हे की भाभियाँ भी, दूल्हे की माई से कबूल करवाया की दूल्हा भी बरात जाने के पहले पक्का मादरचोद बनेगा, और वो भी सबके सामने।



रामपुर वाली भौजी, वैसे तो रिश्ते में उनकी बहू लगती थी, उनके मायके की, लेकिन मजाक के मामले में एकदम सूरजु क माई क टक्कर की, पीछे से जकड के अपनी हथेली अपनी सास की बुर पे रगड़ते हुए पूछ रही थीं,

" बताइये सब लोग, अब इसमें कितने गए हैं ये पूछने का मतलब नहीं.

लेकिन अब अगला लंड किसका जाएगा, बताइये बताइये , दूल्हा की माई की बुरिया में "

और पूरी ताक्त से बुलबुल की चोंच खोल दी, और बुर के अंदर अभी भी, सैकड़ों लंड का धक्का खा के भी लाल गुलाबी और रस से भीगी.

रामपुर वाली भाभी ने फिर सवाल दोहराया,

" दूल्हे की माई क बुरिया में केकर लंड जाई, बोला बोला, अइसन रसीली गुलाबी गुलाबी बुरिया केकर लौंड़ा खायी ? "

" अरे दूल्हे क माई क बुरिया में, दूल्हे का लंड जाई, हमरे तोहरे देवर क लंड, इनके बेटवा क लंड " जोर से हँसते हुए मुन्ना बहू बोली,
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" और हमरे भतीजा क, दूल्हा का, बरात तबतक न जाई जबतक दूल्हे के लंड पे दूल्हे क माई न चढ़ेंगी, " कांति बुआ ने कस के अपनी भौजाई के जोबन रगड़ते हुए कहा।

सूरजु क मामी रामपुर वाली भाभी से बोलीं,

" हमरे ननद क कम मत समझा, गदहा, घोडा, कुत्ता सब का लंड चुकी हैं सूरजु क महतारी तो तोहरे देवर के लंड भी सट्ट से घोंटेंगी और वो भी आड़े तिरछे, चोरी छिपे नहीं, खुल के सब के सामने, माटी कोड़ने जाएंगे न बस वहीँ खुले खेत में, भरी बगिया में, भौजाई लोग अपने देवर क लंड खड़ा करना, और हम इनकी ननद भौजाई मिल के चढ़ा देंगे, तोहरे देवर के लंड पे। "



और जब मंजू भाभी बनारस की ज्योतिषी बन के आयीं और वो भी बड़की ठकुराईन, सूरजु की माई के पीछे पड़ीं,

पंडित जी ने मुस्कराकर सब औरतों लड़कियों से सवाल किया, असली बात ये है १२ दिन बाद बियाह है बेटवा का तो ये सब बताओ की अब ये,… किससे चोदवाएंगी, दूल्हा क माई किससे चुदवाएंगी, कौन चढ़ेगा उनके ऊपर



बुच्ची क्लास के तेज बच्चों की तरह हाथ खड़ा कर के बोली, " मैं बताऊं "

" बोल छिनार, गलत जवाब होगा तो अभी तोहार गांड मार ली जायेगी " मुस्करा के पंडित जी बोले,

" इनको चोदेगा, और कोई नहीं, दुलहा,… हमार भाई "

हँसते हुए बुच्ची बोली और पंडित जी ने खुश हो के बुच्ची को गले लगा लिया, और बोले

" सही जवाब "

" तो कौन कौन शामिल होगा,यह पुण्य काम में, अगर दूल्हे की छिनार माई छिनरपन करे, दूल्हे को चढ़वाने में, जो उन्हें पकड़ के, हाथ गोड़ छान के" पंडित जी ने सब लड़कियों और औरतों की ओर देख के पूछा,

" अरे हम लोग हैं न दूल्हे क मामी, कउनो ना इंसाफ़ी नहीं होने देंगे, हंसहंस के कुंवारेपन में दूल्हे क मामा क घोंटी हैं हमार छिनार ननद तो हमरे भांजे के साथ दूल्हे के साथ कौन कंजूसी, हम का खुदे पकड़ के चढ़ाएंगे अपने मर्द की रखैल के को, दूल्हे के मामा चोदी को " छोटी मामी सब मामियों की ओर से बोलीं, अब मिला था उन्हें अपनी ननद की रगड़ाई का मौका,



और फिर दूल्हे की बूआ भी मैदान में आ गयीं, सबसे तेज कांती बूआ, बुच्ची क मौसी, " अरे कैसे नहीं घोंटेंगी, हम लोग काहे के लिए, भौजी, आज तक केहू को मना नहीं की तो दूल्हे को मना करेंगी ? फिर पंडित के पतरा में लिखा है तो करना ही होगा, सीधे से नहीं तो जबरदस्ती, इनकी भौजाई, ननद कुल मिल के :



तो आज तो कल से दस गुना ज्यादा खुलापन और मस्ती होनी थी, कल जो लड़कियां औरतें, गाँव की गौनहारिन आयी थीं, आते ही सब को सब से पहले भांग वाले दो लड्डू खुला दिया जाता था, और बाद में दो घंटे के बाद फिर से, जिससे सब लाज सरम छोड़ के खुल के मजे ले



लेकिन आज सूरजु की महतारी ने कलुआ की माई को, और हीरा की भौजाई को लगाया था 'देसी लाने के लिए गाँव के महुआ का बना, और उसमे तो वो नशा होता है, तो वो पेसल लड्डू तो होंगे ही वो कच्ची दारु भी और सबको पिलाई जायेगी, सीधे नहीं तो जबरदस्ती, और दूल्हे की माई ने मुन्ना बहु, इमरतिया और मंजू भाभी को ख़ास बोला था, जो कच्ची कलियाँ हैं उन्हें तो डबल पिलाया जाएगा, और साथ में उनकी बिन फटी चुनमुनिया पे कच्ची दारु अच्छी तरह पोती भी जायेगी।



आज स्वागत पार्टी में लड़कियां भी थीं, और गाँव घर की औरतें भी, बुच्ची और चुनिया के साथ, शीतल मौसी की बिटिया रमा, और पश्चिम पट्टी की सुनीता और साथ में पूनम भी और औरतों में मुन्ना बहु, अहिराने की मंगरु बहु, और सब का काम था, सब औरतों लड़कियों को लड्डू खिलाना, वो देसी प्रसाद पिलाना और भाभियाँ तो बिना ननदों के जोबन दबाये आने नहीं देती अंदर, फिर छोटी मामी ने एक और काम शुरू किया अपनी ननदों की साड़ी उतारने का, तो थोड़ी देर में सब औरतें सर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में, बहाना ये था की डांस करने में पैर में फंसेगा और सिर्र्फ दो कपड़ो में और दो कपडे की बात लड़कियों के लिए भी तो टॉप स्कर्ट या शलवार सूट और अंदर तो कुछ पहनने का सवाल ही नहीं था।



सबसे पहले तो पांच देवी गीत होते थे तो बड़ी बूढी औरतों ने वो और सब लड़कियां औरतें तो मस्ती वाले गानों का इन्तजार कर रही थी



लेकिन उसके बाद सुशीला चाची ने ढोलक खींच ली और उनकी बेटी मीना और उसकी छोटी चचेरी बहन, चंदौली वाली की बिटिया, रीना ने क्या जबरदस्त बन्ने गाये,



बन्ना धीरे धीरे जाना ससुराल गलियां

बन्ना धीरे धीरे जाना ससुराल गलियां

बन्ना धीरे-धीरे जाना ससुराल गलियाँ, बन्ना धीरे-धीरे जाना ससुराल गलियाँ।

तेरा मौर सम्हालेंगी वही सखियाँ, जिनके गोरे-गोरे गाल, रसीली अँखियाँ।

बन्ना धीरे-धीरे जाना ससुराल गलियाँ, बन्ना धीरे-धीरे जाना ससुराल गलियाँ।

तेरी कलगी सम्हालेंगी वही सखियाँ, जिनके लम्बे-लम्बे केश, कटीली आँखें।

-- बजरिया मजेदार बन्ना सौदा तू कर ले, बजरिया मजेदार बन्ना सौदा तू कर ले।

साड़ी भी ले ले, चुनरी भी ले ले, साड़ी भी ले ले, चुनरी भी ले ले।

बन्नी है फैशनदार, बन्ना लहंगा भी ले ले, बन्ना लहंगा भी ले ले।

बजरिया मजेदार बन्ना सौदा तू कर ले, बजरिया मजेदार बन्ना सौदा तू कर ले।

चूड़ी भी ले ले, कंगना भी ले ले, चूड़ी भी ले ले, कंगना भी ले ले।


बन्नी है फैशनदार, बन्ना मुंदरी भी ले ले, बन्ना मुंदरी भी ले ले।
 
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रीना और मीना

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रीना और मीना के पास बन्ना बन्नी के गीतों का खजाना था लेकिन अब उन्होंने एक मस्ती वाला शादी का गाना शुरू किया जैसे वो आने वाली नयी दुलहिनिया की ओर से कुछ कह रही हों

टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, बन्ना छूने न दूँगी, छूने न दूँगी,

टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी।

थाली भरी है बन्ना खाने न दूँगी, थाली भरी है बन्ना खाने न दूँगी।

सासु रानी के पास बन्ना जाने न दूँगी, सासु रानी के पास बन्ना जाने न दूँगी।


रामपुर वाली भाभी ने दूल्हे की मामियों और दूल्हे की माई की ओर देखते हुए अपने चिरपरिचित अंदाज में लाइन दुहराई, तो सब बहुएँ साथ-साथ हँसते हुए गाने लगीं:

"ससुइया छिनार, अरे ससुइया छिनार, संग सोने न दूँगी!"

और मंजू भाभी साफ़-साफ़ बोलीं,

"हमारी आने वाली देवरानी को पहली ही रात पता चल जाएगा कि उसकी सास पक्की बेटाचोद है! वही सब निचोड़ लेगी तो उस बेचारी के लिए क्या बचेगा?"
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लेकिन छोटी मामी से कोई जीत नहीं सकता था।

गाना तो लड़कियों ने शुरू किया था—बुच्ची और रमा मिलकर गा रही थीं और मीना, रीना, सुनीता, सईदा, संध्या, निशा सब सुर-में-सुर मिला रही थीं। बुच्ची और रमा की ओर इशारा करकेछोटी मामी तपाक से बोलीं,

"अरे, अगर ये सब बहनें नंबरी भाईचोद हो सकती हैं, तो बेचारी मेरी ननद, यानी दूल्हे की माई ने अगर दूल्हे का मोटा खूँटा घोंट लिया और बेटाचोद हो गईं, तो क्या बुरा किया?"

लड़कियाँ जवाब देने के बजाय खिलखिलाकर हँसने लगीं। ढोलक पर फिर से थाप पड़ी और रमा ने अगली कड़ी उठाई:

टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, बन्ना छूने न दूँगी, छूने न दूँगी,

टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी।

पानी भरा है, राजा पीने न दूँगी, पानी भरा है, राजा पीने न दूँगी।


(और अपनी भाभियों की ओर इशारा करके बुच्ची ने आगे की लाइन पकड़ ली)

जेठानी के पास राजा जाने न दूँगी, जेठानी के पास राजा जाने न दूँगी।

अरे, तेरी भौजी के पास राजा सोने न दूँगी, भौजाई के पास राजा सोने न दूँगी।
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लेकिन अगली ही लाइन में भाभियों को मौका मिल गया। रामपुर वाली भाभी ने रमा से ढोलक झपट ली और उसे तथा बुच्ची को चिढ़ाते हुए गाने लगीं:

टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, बन्ना छूने न दूँगी, छूने न दूँगी,

टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी, टमाटर जैसे गाल बन्ना छूने न दूँगी।

सेज सजी है, बन्ना सोने न दूँगी, सेज सजी है, बन्ना सोने न दूँगी।

ननदिया के पास राजा जाने न दूँगी, अरे बुच्ची छिनार को, अरे रमा स्साली को बन्ने चोदने न दूँगी!


भाभियों ने इतना ज़ोरदार ठहाका लगाया कि मँजू भाभी बोल उठीं,

"इसीलिए कह रही हूँ बिन्नो, तुम सब भाईचोदों से... मेरी देवरानी के आने के पहले अपने भाई का, यानी दूल्हे का पूरा मज़ा ले लो!"

मुन्ना बहू तो हर बात एकदम खोलकर कहने में यकीन रखती थीं। वह बुच्ची को चिढ़ाते हुए बोलीं,

"अरे, तो हमरी ननदों को क्या समझे हो? बुच्चिया को खोल के देख लो, अभी तक बन्ना की मलाई बजबजा रही होगी! का हो बुच्ची,… भैया तोहार एक बार रगड़े कि दो बार?"
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और जिस तरह से बुच्ची शरमाई और उसके गाल सुर्ख लाल हुए, सब लोग ताड़ गए कि आज चिड़िया उड़ गई है और भरतपुर लूट चुका है!

लेकिन चुनिया ने बात सँभालने की कोशिश की और रुख गप्पू की ओर मोड़ दिया,

"अरे तो का हुआ, हमार सहेली आज अपने भाई का घोंटी है, तो कल हमरे भाई का घोंटेंगी। क्यों बुच्ची रानी?"

"और का! हमारी ननदों को समझती क्या हैं? अपने भाई और हमरे भाई में कोई भेद नहीं करतीं। और बुच्ची, खाली गप्पू का पप्पू लोगी, कि उसके दोस्त बेचारों का भी मन रखोगी?"

रामपुर वाली भौजी ने रस लेते हुए पूछ लिया।


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उनका सीधा निशाना बिट्टू की ओर था, जो बुच्ची के पीछे एकदम दीवाना था।

लेकिन जवाब सूरजु की ननिहाल की दूसरी भाभी, मंजू भाभी ने दिया, जो बुच्ची के बगल में ही बैठी थीं,

"अरे एकदम! कौन उसके लँड में काँटा लगा है? हमार बुच्ची हम सबके भाई का, भाई के दोस्त का, और दूल्हे के कुल ननिहाल वालों का लँड घोंटेंगी! जैसे उनकी माई अपनी भौजी के मायके वालों का मन रखती थीं, वैसे ये भी रखेंगी।"

बुच्ची के ज़हन में दोपहर की वह बात ताज़ा हो गई, जब सूरजु भैया के मामा, उनकी बुआ कान्ति बुआ (जो बुच्ची की सगी बड़ी मौसी थीं) पर चढ़े गपागप चोद रहे थे और मस्ती में घोंटते हुए बुच्ची की माई का किस्सा सुना रहे थे—कि कैसे उनकी भाभी (सूरजु भैया की महतारी) के दोनों भाइयों ने उनकी छोटी बहन (बुच्ची की माई) की फाड़ी थी।

"सच में, बुच्चिया की माई के साथ बहुत मज़ा किए थे। दो दिन में छह बार हम दोनों भाई मिलकर पेले थे उसको!" सूरजु भैया के मामा बोल रहे थे।

"और गांड भी तो मारे थे!" पीछे से धक्का लगाते हुए सूरजु की बुआ बोलीं।

"तीन बार! दो बार हम और एक बार बड़के भैया।" सूरजु भैया के मामा ने जुगलबंदी पूरी की और याद करते हुए कहा, "और तब वह एकदम आज की बुच्चिया जैसी ही लगती थीं। वही शक्ल, वैसा ही गदराया जोबन! जैसे बुच्चिया को देख के लौंडों का लँड फनफना जाता है, एकदम वैसे ही!"

"लेकिन उमरिया में उससे पूरे चौदह महीने छोटी थी, जब तुम दोनों भाइयों का घोंटी थी!" कान्ति बुआ मदहोश होती हुई अपनी छोटी बहन का किस्सा सुनाती जा रही थीं।



लेकिन आज ननदों का पलड़ा भी भारी था।
 
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komaalrani

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भाग 117 ---बुच्ची --भैया से मिलन के बाद पृष्ठ १२१९
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Sand1947

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" पहचान कौन ?"

रात शुरू हो चुकी थी। हल्की चाँदनी आम के पेड़ों की फुनगियों से छन-छन कर नीचे बिखर रही थी, जैसे कोई रहस्यमयी जादू जमीन पर उतर रहा हो।

बुच्ची का रास्ता भले ही पुराना था, पर आज उसका दिल अनजाने में तेजी से धड़क रहा था। वो आँख बंद करके भी घर पहुँच सकती थी, लेकिन आज आँखें बंद करने की नौबत खुद आ गई।

अचानक दो गर्म हथेलियाँ पीछे से आईं और उसकी दोनों आँखों को नरमी से ढक लिया।

बुच्ची की सांस एक पल को थम सी गई। उसका पूरा शरीर हल्का सा काँप उठा। पीछे से एक गहरी, परिचित और थोड़ी काँपती हुई आवाज आई —

"पहचान कौन?"

बुच्ची के होंठों पर एक प्यारी-सी मुस्कान खिल गई। दिल में एक मीठी-सी लहर दौड़ गई। वो जानती थी। उस छुअन को, उस गर्मी को, उस स्पर्श की लालसा को वो हजारों में भी पहचान लेती।

गप्पू...

साल भर से वो दोनों एक-दूसरे को चुपके-चुपके तड़पा रहे थे। नज़रों से, मुस्कानों से, छोटी-छोटी छेड़छाड़ से। आज वो तड़पन अब और सहन नहीं हो रही थी।

गप्पू का सीना धीरे-धीरे उसकी पीठ से सट गया। उसकी गर्म सांस बुच्ची की गर्दन पर पड़ रही थी, जिससे उसके बदन में मीठी-मीठी सिहरन दौड़ रही थी। बुच्ची ने धीरे से पीछे हटकर खुद को उसके सीने से और लिपटा लिया।

"छोड़ न..." उसने बहुत नरम, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज में कहा। उसकी आवाज में शरारत थी, लेकिन साथ ही एक गहरी चाहत भी।

गप्पू ने अपना मुँह उसके कान के बिल्कुल पास ले जाकर, बेहद धीरे से कहा,

"पहले बता तो सही... कौन हूँ मैं?"

उसकी गर्म सांस बुच्ची के कान से टकराई और उसके पूरे शरीर में एक मीठी लहर उठ गई। बुच्ची की पलकें उसकी हथेलियों के नीचे फड़फड़ाईं। उसने अपना हाथ ऊपर उठाया और गप्पू की उँगलियों को अपनी उँगलियों में धीरे से फँसा लिया।



बुच्ची सौ मर्दो में उस छुवन को पहचान सकती थी, स्साला, साल भर से उसके लिए तड़प रहा था, और वो उसे तड़पा रही थी, लेकिन अब और नहीं।

और आज तो हल्दी लगाने के नाम पे, बुच्ची ने अपनी भौजी के भैया के हर अंग पर ऐसी हल्दी लगायी, हलके हलके नहीं रगड़ रगड़ के, अबतक वो हल्दी महक रही थी, हाँ पलट के उसने भी लगाया था, स्कर्ट ऊपर कर के अपना खूंटा उसकी चुनमुनिया पे छुआ भी दिया था, लेकिन बस एक तो कडुआ तेल ऐसा कुछ चिकना था नहीं, और दूसरे ऐन मौके पे कांती बुआ ( बुच्ची की बड़ी मौसी ) और सूरजु के मामा की आवाज आ गयी , सूरजु के मामा, गप्पू की बहन के चचिया ससुर भी थे और गप्पू भी घबड़ा गया, दोनों ने समझा की बस आज बच गए,

" मुझे क्या मालूम है कौन है तू,,... जा के अपनी बहिनिया चुनिया से पूछ।

बुच्ची ने इतरा के चिढ़ा के बोला।



वो लड़का पीछे से एकदम चिपक गया , रात रुक गयी, हवा थम गयी, उस किशोरी का दिल जोर जोर से धड़क रहा था , बिना आँखों पर से हाथ हटाए हिम्मत कर के उस लड़के ने बस अपने होंठों से बुच्ची के कान की लर बस छू दी।

बुच्ची जाड़े की रात में भी दहक उठी। " बोल ना यार, कौन हूँ मैं " एक बार कस के अपने हाथों से उस सांरग नयनी के मृगनयनों को दबाता वो बोलै



एक पल के लिए दोनों चुप हो गए। सिर्फ उनकी सांसें और दिलों की धड़कनें सुनाई दे रही थीं। चाँदनी आम के पत्तों के बीच से छन रही थी, और दोनों के बीच का रोमांटिक तनाव हवा में महक रहा था।

"तुझे तो मैं... अंधेरे में भी, सपनों में भी, भीड़ में भी पहचान लूँगी," बुच्ची ने नरम स्वर में कहा, "स्साला..गप्पू।"

वो लड़का और चिपक गया, रात गहरा रही थी, बस कहीं कहीं चांदनी आम के पेड़ों के पत्ते से छन छन कर आ रही थी, उस घनी आम की बगिया में रात को क्या दिन में भी कम लोग ही आते थे।

" छोड़ न " मीठी सी आवाज में बुच्ची बोल के उसका एक हाथ छुड़ा के अपने सीने पे रखती वो बोली, लेकिन एक तो, एक हाथ ही उस का काफी था, बुच्ची की दोनों बड़ी बड़ी कजरारी आँखों को ढंकने के लिए, दूसरे उस लड़के का हाथ, सीने पे पड़ते ही, बुच्ची के उभार तेजी से नीचे ऊपर होने लगे,मन तो कर रहा था, टॉप उठा के दोनों अमिया ये मसल डाले, और सोच रही थी ये स्साले लौंडे, मन भी करेगा और कुछ करेंगे भी नहीं।



पर अब उस लड़के में भी हिम्मत जाग गयी थी, और हिम्मत इस लिए जाग गयी थी की नीचे वाले मूसलचंद जाग गए थे,। वो पीछे से एकदम चिपक के खड़ा था और वो खड़ा खूंटा बुच्ची के नितम्बो के बीच धंस रहा था, एक हाथ अब हलके हलके उस दर्जा नौ वाली, के आ रहे उभारों को रगड़ रहा था।

" पहचान कौन " जब वो तीसरी बार बोला, तो बुच्ची जोर से खिलखिलाई और हंस के बोली,

" अबे स्साले, तुझे तो मैं सपने में, हजार की भीड़ में पहचान लूँ। जिसने अपने बहन मेरे भैया को दी हो और एक और ले के टहल रहा हो, मेरे भाइयों के लिए तो उस स्साले से अच्छा मीठा कौन होगा। बताती हूँ स्साले तुझे अभी, तेरी बहन ने बतायानहीं की की लड़की की आँख नहीं कुछ और पकड़ते हैं, "

गप्पू भी खिलखिलाने लगा।

बुच्ची उसे पहली बार से ही स्साला कह के बोलती थी, और रामपुर वाली ने अपने भाई को समझाया, " अरे बुर वाली की बात का बुरा नहीं मानते , तुम उसके भाई के साले तो उसके भी साले, "

और पीछे से उस ने 'कुछ और ' पकड़ लिया, आम की बाग़ में अपनी बहन की ननद की कच्ची अमिया, टॉप उठा के, बुच्ची सिसक उठी,

आज दोपहर में जब वो पुवाल वाले कमरे में, गप्पू को हल्दी लगा रही थी तो पलट के गप्पू ने उसे पकड़ लिया और उस के दोनों आते हुए उभारों को क्या मस्त मसला था, अभी तक उसकी छुअन, अगन बाकी थी।

वो समझ गयी थी, गप्पू अब साल भर पहले का सीधा साधा लजाधुर नहीं रहा, जिसे वो चिढ़ाती रहती थी, अब वो पहला मौका पाते ही पेल देगा।

और जब एक बार वो अपने भैया से पेलवा चुकी थी, दिन में उसने अपनी सगी मौसी, और सूरजु भैया की बुआ, कांती बूआ के मुंह से जब से सुना था की उनकी छोटी बहन, बुच्ची की माई ने दो दिन में छह बार अपनी भाभी के भाई से चुदवाया और तीन बार गांड मरवाई सी अलग, तो बस बुच्ची ने तय कर लिया, अब वो उसकी रामपुर वाली भाभी के भाई से, गप्पू से, अपनी माई का रिकार्ड तोड़ेगी और वो स्साला गप्पू कुछ ज्यादा हिचका तो पटक के खुद उसके ऊपर चढ़ के पेल देगी।



लेकिन गप्पू गरमाया था, कस कस के उस किशोरी की चूँचियों का रस ले रहा था, बुच्ची सिसक रही थी।

पर उस आम की बगिया के बारे में गप्पू से बहुत ज्यादा बुच्ची को मालूम था, बस पांच हाथ की दूरी पे एक आम का पेड़ था, खूब पुराना, खूब चौड़ा और एक मोटी डाल तो एकदम नीचे, कितनी बार उस डाल पे बुच्ची बैठी थी, और पांच छह बार तो उसने अपनी सहेली को व्ही डाल पकड़ के निहुर के पेलवाते देखा था, और दो बार तो उसका वही यार, काशी, उसी चौड़े पेड़ के सहारे शीलवा को खड़ा कर के, खड़े खड़े चोद दिया। और बुच्ची पास में खड़ी देख भी रही थी, पहरेदारी भी कर रही थी, और अपनी सहेली के बिल में आता जाता मोटा नाग ही देख रही थी।



लेकिन असली बात थी, दस कदम दूर की पगडंडी से न तो वो पेड़ दिखता था और न वहां कुछ भी हो, उस की झलक आती थी।



और आज शीला की जगह बुच्ची उस डाल के साहरे थी, टॉप नेकलेस बना गले तक, स्कर्ट भी बुच्ची ने खुद उठा दी और गप्पू चुसूक़ चुसुक बुच्ची के उभारों का रस ले रहा था और उस का एक हाथ बुच्ची की जाँघों पर सरक रहा था।



बुच्ची ने भी सीधे गप्पू की नेकर में हाथ डाल के उस दहकती रॉड को पकड़ लिया था और मन तो कर रहा था की अपनी जाँघों के बीच उसे ले ले, पर एक तो अभी भी जो चमड़ी छिली थी और दूसरे उसकी अनुभवी सहेली, शीला ने जो फिटकरी डालकर गुनगुने पानी से अंदर तक सेंका था, उसी समय शीला ने साफ़ बोला, " सुन छिनार, अगले तीन चार घंटे तक ऊँगली भी नहीं अंदर, बस अगर तीन चार घंटे तक आपन गर्मी रोक पायी तो उसके बाद तो मैं खुद एक के बाद एक चढ़वाऊंगी। लेकिन अगर अभी जरा सा भी धक्का लगा, तो बस चार पांच दिन तक चुदवाना तो दूर चुसवा भी नहीं पाएगी तू "



बुच्ची ने अपने मन को भरोसा दिया और प्यार से गप्पू के खूंटे को पकड़ के सहलाने लगी, अब वो एकदम मोटा हो गया था, कड़ा तना, उसकी मुट्ठी में फुफकार रहा था।



और अब चूमने चूसने का काम बुच्ची कर रही थी, जैसा भाभियों ने सिखाया था, बिना एक पल भी देह से अलग हुए, बुच्ची के होंठ सरकते फिसलते सीधे गप्पू के लम्बे मोटे खूंटे के पास, पर बुच्ची ने उसे मुंह में नहीं लिया, गप्पू को उसने आम के पेड़ की चौड़ी डाल से सटा कर खड़ा कर दिया, और अब उस टीनेजर के होंठ, गप्पू की जाँघों को चूम रहे थे, फिर सिर्फ जीभ की नोक से बुच्ची ने गप्पू के खूंटे के बेस के चारो ओर हल्के हल्के चाटना, जीभ के नोक से प्रेस करना शुरू कर दिया रु बुच्ची के कोमल हाथ भी मैदान में आ गए थे , उँगलियों की टिप कभी गप्पू के बॉल्स को सहला देती तो कभी उसके बुच्ची के नाख़ून, बॉल्स को स्क्रेच कर देते,



गप्पू सिहर कर रह जाता, उसने अपने दोनों हाथों से बुच्ची के सर को पकड़ रखा था, और बुदबुदा रहा था



"बुच्ची ले ले, ले न बुच्ची मुंह में ले ले "



बुच्ची को गप्पू अच्छा भी बहुत लगता था, एकदम मीठा प्यारा सा गुलाबजामुन ऐसा, मन करे की गटक लो, लेकिन उसे चिढ़ाने में मजा भी बहुत आता था, वो अपना सर ऊपर कर के बोली

" अबे स्साले, बोलने में तो तेरी फट रही है, तुझसे ज्यादा जोश में तो मेरी भाभी, तेरी बहन हैं, बोल, क्या ले लूँ मुंह में "

" मेरा वो, प्लीज, मेरा " थूक गटकते हुए गप्पू बोला, " मेरा, मेरा लंड "

" सिर्फ मुंह में क्यों, हर जगह लूंगी, तूने अपने बहन को हमारे गाँव चुदवानेभेजा है यार, और अब चुनिया भी तैयार माल है, लेकिन चल तू कहता है तो पहले मुंह में " बुच्ची ने चिढ़ाया



और अपनी जीभ निकाल के खुले मोटे सुपाड़े को बस चाट लिया, जैसे स्कूल की लड़कियां लॉलीपॉप चाटती हैं एक हाथ से उसने अपने यार का लंड पकड़ रखा था और जीभ से बस चाट रही थी, कभी सुपाड़े को, कभी ऊपर से नीचे तक,



" उप्प्स, बुच्ची, हाँ, बेबी, बहुत अछ्छा लग रहा है, उफ्फ्फ, स्साली चूस न "

" अबे स्साले, स्साली है तेरी बहन, मेरी सहेली चुनिया " एक पल के लिए खूंटे को दूर कर के बुच्ची बोली और गप्प से सुपाड़ा मुंह में ले लिया और क्या चूसा है उस कच्ची कली ने। कुछ तो उसकी भाभियों का कमाल, दो दिन से मुन्ना बहू और मंजू भाभी पहले बुच्ची के मुंह में ऊँगली डाल के फिर हलक तक मोटी गाजर पेल के चूसना सीखा रही थी और इमरतिया ने तो अपने सामने बुच्ची से उसके सूरजु भैया का खीरे इअसा मोटा लंड जड़ तक लेके चुसवा के पूरा पक्का कर दिया।



बुच्ची दाएं हाथ से गप्पू का चूतड़ कस के पकड़ी थी और बाएं हाथ से उसके मूसल के बेस पे ले जाके हलके हलके मुठिया रही थी , सुपाड़ा उसने गप्प कर लिया और जीभ एक ओर नीचे से चाट रही थी और दोनों टीनेज होंठ कस कस के चूस रहे थे। बुच्ची को बहुत अच्छा लग रहा था, इस तरह खुले में आम की बाग़ में, रात हो रही थी, और वो बिना किसी हिचक के अपने यार का खूंटा मुंह में लेकर,

" ले बुच्ची ले , ओह्ह उफ्फ्फ तू यार बहुत अच्छी है ले न " गप्पू बोल रहा था और बुच्ची का सर कस के पकड़ के उसने पूरी ताकत से अंदरपेल दिया।



आधा से ज्यादा खूंटा अंदर था और अब बुच्ची कस कस के चूस रही थी, एक हाथ से वो बॉल्स को सहलाती, दूसरे हाथ से गप्पू के नितम्बो को रगड़ती, कभी मुंह थोड़ा सा ढीला कर देती तो कभी कस कस के चूसने लगती साथ में लंड मुठिया भी रही थी पर अब गप्पू से नहीं रहा गया वो आगे पीछे करने लगा जैसे बुच्ची का मुंह नहीं उसकी बुर हो और वो चोद रहा हो, बुच्ची को भी बहोत मजा आ रहा था। लेकिन थोड़ी देर बाद ही, गप्पू घबड़ा के बोलने लगा



" अरे यार छोड़ दे निकल जाएगा "



लेकिन बुच्ची जानती थी कि अभी इतनी जल्दी कुछ नहीं होने वाला है। इमरतिया और मुन्ना बहू दोनों ने उसे दस दस पहचान बता दी थी कि मर्द कब झड़ता है और कब शरीफ सुरसुरी मचती है और उसे लगता है, कि वो गिरने वाला है। हाँ उस समय अगर लड़की रुक जाए, थोड़ा सांस लेने दे मर्द को तो असल में वो दस पंदह मिनट के पहले नहीं गिरेगा। और बुच्ची समझ गई थी कि गप्पू का किसी लड़की या औरत के साथ पहली बार है, इसलिए वो घबड़ा रहा है।

बुच्ची ने छोड़ दिया, मुंह से तो निकाल दिया, पर मुठियाना नहीं बंद किया और चिढ़ाते हुए बोली,

" अबे स्साले, तेरी सारी बहनों कि बुर अपने भाइयों से चुदवाउ, गिर जायेगा तो गिर जाने दे, किसके लिए बचा रखा है, मेरी रामपुर वाली भौजी के लिए कि मेरी छिनार सहली चुनिया के लिए, अरे उसपर तो इस गाँव के सब लड़को का नाम लिखा है "

" कहीं तेरे मुंह में गिर जाता न तो इस लिए " घबड़ाते हुए गप्पू ने अपनी सफाई पेश की।



बुच्ची के मन में गप्पू के लिए ढेर सारा प्यार उमड़ आया, और उसकी आँखों में झाँक के गरिया के बोली, " तू स्साला है नंबरी बुद्धू, गनीमत है मेरे पल्ले पड़ा है "



और झट से एक बार फिर से सुपाड़ा मुंह में बुच्ची ने ले लिया और अब अगले दस मिनट तक इमरतिया ने जो काम कला सिखाई थी, एक से एक बदमाशियां सब की सब, चूसते हुए कभी गप्पू के पिछवाड़े की दरार में ऊँगली कर देती, कभी होंठों से दबा के सीधे लंड के बेस से सुपाड़े तक ले आती, और बीच में एक दो बार निकाल भी तो अपने निपल से सुपाड़े पे रगड़ दिया, होंठों में रसगुल्लों को भर के चूसने लगी



और अब जब पंछी फड़फड़ाने लगा तो साफ़ था अब गप्पू किनारे पर पहुँचने वाला है , बारह चौदह मिनट से लगातार बुच्ची चूस भी रही थी, मुठिया भी रही थी, तो उस लड़की ने कस के दोनों हाथों से गप्पू के चूतड़ पकड़ लिए जिससे वो लौंडा छुड़ा न पाए। गप्पू कसमसा रहा था, छटपटा रहा था

" बुच्ची यार निकाल दे न, अब गिर जाएगा, ओह्ह्ह उफ्फ्फ यार तेरे मुंह में, उफ़ बस बाहर निकाल दे न , ओह्ह अच्छा चल बाहर गिरा दे न , ओह्ह इत्ता अच्छा लग रहा है, मेरी बुच्ची मान जा, यार मुंह खोल, ओह्ह्ह उफ्फ्फ्फ़ "



और बुच्ची ने बस तर्जनी से गप्पू के पिछवाड़े की दरार में जरा सी ऊँगली का जोर लगा दिया, लगा जैसे बाँध टूट गया हो। गुड्डी ने अपने होंठों को कस के भींच रखा था, जिससे एक बूँद भी अमृत बहार न छलके, पहले एक धार, तेजी से सीधे हलक के अंदर, और फिर रबड़ी मलाई के थक्के, निकलते ही गए।



गप्पू एकदम शिथिल हो गया, और उसी समय जहाँ एकदम अँधेरा था चांदनी का कोई टुकड़ा पेड़ों की डालो को हटा के कुन्द्ती फांदती सीधे बुच्ची के चेहरे पर, क्या ख़ुशी छिटकी थी वहां।

बुच्ची ने एक बार फिर जोर लगा के चूसा, चूसती ही रही, और दो चार थक्के और उस के मुंह में, फिर धीरे धीरे पेड़ की डाली को पकड़ के, सहारा ले के वो खड़ी हुयी और मुस्करा के पहले गप्पू को कस के गले लगा लिया। बुच्ची का मुंह एकदम फूला था। चांदनी उसकी देह को नहला रही थी, उसका सुन्दर मुखड़ा साफ़ दिख रहा था।

गप्पू को छोड़ के वो दूर खड़ी हुयी और मुंह खोल के चिढ़ाते हुए गप्पू को दिखया,

पूरे मुंह में मलाई भरी थी, खूब गाढ़ी सफ़ेद, जीभ भी नहीं दिख रही थी, एक बूँद मुंह से निकल के ठुड्डी पे आ गयी थी, बुच्ची ने उसे पोंछ के अपने होंठों पे लपेट लिया,



बुच्ची खूब खुश थी और गप्पू को तो जैसे काठ मार गया था , मूरत बना वो बुच्ची को देख रहा था,



बुच्ची ने मुंह बंद कर लिया और गहरी सांस ली। उसके फूले गाल पिचकते चले गए। और दो मिनट के बाद जब उसने गप्पू के सामने मुंह खोला



जैसे जादूगर कबूतर दिखाते हैं, अभी है, अभी नहीं, बस एकदम उसी तरह।



बुच्ची का खुला मुंह एकदम खाली था , बस दो चार बूंदे जीभ पे लगी थीं,

अगली बार वो भी गायब।



बुच्ची ने अपने हाथ से गप्पू का नेकर खीँच के ऊपर कर दिया, अपने प्यारे पप्पू को अंदर और उसके पहले चूम के बोली, " मिलते हैं ब्रेक के बाद, पक्का कल और तेरी सहेली से मुलाक़ात करवाउंगी "



स्कर्ट तो उसकी अपने आप नीचे हो गयी थी, टॉप खीँच के कमर तक , और गप्पू का हाथ पकड़ के पगडंडी पे ले आयी और जहाँ एक फोर्क था उसे दिखाते बोली, " सुन स्साले तू इधर से निकल ले, दालान के सामने जो कुंआ है न बस उसी के बगल में जायेगी ये और मैं बायीं ओर से जाउंगी, सीधे पिछवाड़े वाले दरवाजे पे "



मुड़ने के पहले बुच्ची ने गप्पू को पकड़ के एक बार कस के चूम भी लिया और उसके नेकर में हाथ डाल के गप्पू के पप्पू को दबा भी दिया।



कुछ देर में बुच्ची पिछवाड़े के दरवाजे से सीधे आंगन में पहुँच गई, जहाँ लड़कियों के झुंड में धंस गई।
Kya likhti ho dost😍😍
 
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