" पहचान कौन ?"
रात शुरू हो चुकी थी। हल्की चाँदनी आम के पेड़ों की फुनगियों से छन-छन कर नीचे बिखर रही थी, जैसे कोई रहस्यमयी जादू जमीन पर उतर रहा हो।
बुच्ची का रास्ता भले ही पुराना था, पर आज उसका दिल अनजाने में तेजी से धड़क रहा था। वो आँख बंद करके भी घर पहुँच सकती थी, लेकिन आज आँखें बंद करने की नौबत खुद आ गई।
अचानक दो गर्म हथेलियाँ पीछे से आईं और उसकी दोनों आँखों को नरमी से ढक लिया।
बुच्ची की सांस एक पल को थम सी गई। उसका पूरा शरीर हल्का सा काँप उठा। पीछे से एक गहरी, परिचित और थोड़ी काँपती हुई आवाज आई —
"पहचान कौन?"
बुच्ची के होंठों पर एक प्यारी-सी मुस्कान खिल गई। दिल में एक मीठी-सी लहर दौड़ गई। वो जानती थी। उस छुअन को, उस गर्मी को, उस स्पर्श की लालसा को वो हजारों में भी पहचान लेती।
गप्पू...
साल भर से वो दोनों एक-दूसरे को चुपके-चुपके तड़पा रहे थे। नज़रों से, मुस्कानों से, छोटी-छोटी छेड़छाड़ से। आज वो तड़पन अब और सहन नहीं हो रही थी।
गप्पू का सीना धीरे-धीरे उसकी पीठ से सट गया। उसकी गर्म सांस बुच्ची की गर्दन पर पड़ रही थी, जिससे उसके बदन में मीठी-मीठी सिहरन दौड़ रही थी। बुच्ची ने धीरे से पीछे हटकर खुद को उसके सीने से और लिपटा लिया।
"छोड़ न..." उसने बहुत नरम, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज में कहा। उसकी आवाज में शरारत थी, लेकिन साथ ही एक गहरी चाहत भी।
गप्पू ने अपना मुँह उसके कान के बिल्कुल पास ले जाकर, बेहद धीरे से कहा,
"पहले बता तो सही... कौन हूँ मैं?"
उसकी गर्म सांस बुच्ची के कान से टकराई और उसके पूरे शरीर में एक मीठी लहर उठ गई। बुच्ची की पलकें उसकी हथेलियों के नीचे फड़फड़ाईं। उसने अपना हाथ ऊपर उठाया और गप्पू की उँगलियों को अपनी उँगलियों में धीरे से फँसा लिया।
बुच्ची सौ मर्दो में उस छुवन को पहचान सकती थी, स्साला, साल भर से उसके लिए तड़प रहा था, और वो उसे तड़पा रही थी, लेकिन अब और नहीं।
और आज तो हल्दी लगाने के नाम पे, बुच्ची ने अपनी भौजी के भैया के हर अंग पर ऐसी हल्दी लगायी, हलके हलके नहीं रगड़ रगड़ के, अबतक वो हल्दी महक रही थी, हाँ पलट के उसने भी लगाया था, स्कर्ट ऊपर कर के अपना खूंटा उसकी चुनमुनिया पे छुआ भी दिया था, लेकिन बस एक तो कडुआ तेल ऐसा कुछ चिकना था नहीं, और दूसरे ऐन मौके पे कांती बुआ ( बुच्ची की बड़ी मौसी ) और सूरजु के मामा की आवाज आ गयी , सूरजु के मामा, गप्पू की बहन के चचिया ससुर भी थे और गप्पू भी घबड़ा गया, दोनों ने समझा की बस आज बच गए,
" मुझे क्या मालूम है कौन है तू,,... जा के अपनी बहिनिया चुनिया से पूछ।
बुच्ची ने इतरा के चिढ़ा के बोला।
वो लड़का पीछे से एकदम चिपक गया , रात रुक गयी, हवा थम गयी, उस किशोरी का दिल जोर जोर से धड़क रहा था , बिना आँखों पर से हाथ हटाए हिम्मत कर के उस लड़के ने बस अपने होंठों से बुच्ची के कान की लर बस छू दी।
बुच्ची जाड़े की रात में भी दहक उठी। " बोल ना यार, कौन हूँ मैं " एक बार कस के अपने हाथों से उस सांरग नयनी के मृगनयनों को दबाता वो बोलै
एक पल के लिए दोनों चुप हो गए। सिर्फ उनकी सांसें और दिलों की धड़कनें सुनाई दे रही थीं। चाँदनी आम के पत्तों के बीच से छन रही थी, और दोनों के बीच का रोमांटिक तनाव हवा में महक रहा था।
"तुझे तो मैं... अंधेरे में भी, सपनों में भी, भीड़ में भी पहचान लूँगी," बुच्ची ने नरम स्वर में कहा, "स्साला..गप्पू।"
वो लड़का और चिपक गया, रात गहरा रही थी, बस कहीं कहीं चांदनी आम के पेड़ों के पत्ते से छन छन कर आ रही थी, उस घनी आम की बगिया में रात को क्या दिन में भी कम लोग ही आते थे।
" छोड़ न " मीठी सी आवाज में बुच्ची बोल के उसका एक हाथ छुड़ा के अपने सीने पे रखती वो बोली, लेकिन एक तो, एक हाथ ही उस का काफी था, बुच्ची की दोनों बड़ी बड़ी कजरारी आँखों को ढंकने के लिए, दूसरे उस लड़के का हाथ, सीने पे पड़ते ही, बुच्ची के उभार तेजी से नीचे ऊपर होने लगे,मन तो कर रहा था, टॉप उठा के दोनों अमिया ये मसल डाले, और सोच रही थी ये स्साले लौंडे, मन भी करेगा और कुछ करेंगे भी नहीं।
पर अब उस लड़के में भी हिम्मत जाग गयी थी, और हिम्मत इस लिए जाग गयी थी की नीचे वाले मूसलचंद जाग गए थे,। वो पीछे से एकदम चिपक के खड़ा था और वो खड़ा खूंटा बुच्ची के नितम्बो के बीच धंस रहा था, एक हाथ अब हलके हलके उस दर्जा नौ वाली, के आ रहे उभारों को रगड़ रहा था।
" पहचान कौन " जब वो तीसरी बार बोला, तो बुच्ची जोर से खिलखिलाई और हंस के बोली,
" अबे स्साले, तुझे तो मैं सपने में, हजार की भीड़ में पहचान लूँ। जिसने अपने बहन मेरे भैया को दी हो और एक और ले के टहल रहा हो, मेरे भाइयों के लिए तो उस स्साले से अच्छा मीठा कौन होगा। बताती हूँ स्साले तुझे अभी, तेरी बहन ने बतायानहीं की की लड़की की आँख नहीं कुछ और पकड़ते हैं, "
गप्पू भी खिलखिलाने लगा।
बुच्ची उसे पहली बार से ही स्साला कह के बोलती थी, और रामपुर वाली ने अपने भाई को समझाया, " अरे बुर वाली की बात का बुरा नहीं मानते , तुम उसके भाई के साले तो उसके भी साले, "
और पीछे से उस ने 'कुछ और ' पकड़ लिया, आम की बाग़ में अपनी बहन की ननद की कच्ची अमिया, टॉप उठा के, बुच्ची सिसक उठी,
आज दोपहर में जब वो पुवाल वाले कमरे में, गप्पू को हल्दी लगा रही थी तो पलट के गप्पू ने उसे पकड़ लिया और उस के दोनों आते हुए उभारों को क्या मस्त मसला था, अभी तक उसकी छुअन, अगन बाकी थी।
वो समझ गयी थी, गप्पू अब साल भर पहले का सीधा साधा लजाधुर नहीं रहा, जिसे वो चिढ़ाती रहती थी, अब वो पहला मौका पाते ही पेल देगा।
और जब एक बार वो अपने भैया से पेलवा चुकी थी, दिन में उसने अपनी सगी मौसी, और सूरजु भैया की बुआ, कांती बूआ के मुंह से जब से सुना था की उनकी छोटी बहन, बुच्ची की माई ने दो दिन में छह बार अपनी भाभी के भाई से चुदवाया और तीन बार गांड मरवाई सी अलग, तो बस बुच्ची ने तय कर लिया, अब वो उसकी रामपुर वाली भाभी के भाई से, गप्पू से, अपनी माई का रिकार्ड तोड़ेगी और वो स्साला गप्पू कुछ ज्यादा हिचका तो पटक के खुद उसके ऊपर चढ़ के पेल देगी।
लेकिन गप्पू गरमाया था, कस कस के उस किशोरी की चूँचियों का रस ले रहा था, बुच्ची सिसक रही थी।
पर उस आम की बगिया के बारे में गप्पू से बहुत ज्यादा बुच्ची को मालूम था, बस पांच हाथ की दूरी पे एक आम का पेड़ था, खूब पुराना, खूब चौड़ा और एक मोटी डाल तो एकदम नीचे, कितनी बार उस डाल पे बुच्ची बैठी थी, और पांच छह बार तो उसने अपनी सहेली को व्ही डाल पकड़ के निहुर के पेलवाते देखा था, और दो बार तो उसका वही यार, काशी, उसी चौड़े पेड़ के सहारे शीलवा को खड़ा कर के, खड़े खड़े चोद दिया। और बुच्ची पास में खड़ी देख भी रही थी, पहरेदारी भी कर रही थी, और अपनी सहेली के बिल में आता जाता मोटा नाग ही देख रही थी।
लेकिन असली बात थी, दस कदम दूर की पगडंडी से न तो वो पेड़ दिखता था और न वहां कुछ भी हो, उस की झलक आती थी।
और आज शीला की जगह बुच्ची उस डाल के साहरे थी, टॉप नेकलेस बना गले तक, स्कर्ट भी बुच्ची ने खुद उठा दी और गप्पू चुसूक़ चुसुक बुच्ची के उभारों का रस ले रहा था और उस का एक हाथ बुच्ची की जाँघों पर सरक रहा था।
बुच्ची ने भी सीधे गप्पू की नेकर में हाथ डाल के उस दहकती रॉड को पकड़ लिया था और मन तो कर रहा था की अपनी जाँघों के बीच उसे ले ले, पर एक तो अभी भी जो चमड़ी छिली थी और दूसरे उसकी अनुभवी सहेली, शीला ने जो फिटकरी डालकर गुनगुने पानी से अंदर तक सेंका था, उसी समय शीला ने साफ़ बोला, " सुन छिनार, अगले तीन चार घंटे तक ऊँगली भी नहीं अंदर, बस अगर तीन चार घंटे तक आपन गर्मी रोक पायी तो उसके बाद तो मैं खुद एक के बाद एक चढ़वाऊंगी। लेकिन अगर अभी जरा सा भी धक्का लगा, तो बस चार पांच दिन तक चुदवाना तो दूर चुसवा भी नहीं पाएगी तू "
बुच्ची ने अपने मन को भरोसा दिया और प्यार से गप्पू के खूंटे को पकड़ के सहलाने लगी, अब वो एकदम मोटा हो गया था, कड़ा तना, उसकी मुट्ठी में फुफकार रहा था।
और अब चूमने चूसने का काम बुच्ची कर रही थी, जैसा भाभियों ने सिखाया था, बिना एक पल भी देह से अलग हुए, बुच्ची के होंठ सरकते फिसलते सीधे गप्पू के लम्बे मोटे खूंटे के पास, पर बुच्ची ने उसे मुंह में नहीं लिया, गप्पू को उसने आम के पेड़ की चौड़ी डाल से सटा कर खड़ा कर दिया, और अब उस टीनेजर के होंठ, गप्पू की जाँघों को चूम रहे थे, फिर सिर्फ जीभ की नोक से बुच्ची ने गप्पू के खूंटे के बेस के चारो ओर हल्के हल्के चाटना, जीभ के नोक से प्रेस करना शुरू कर दिया रु बुच्ची के कोमल हाथ भी मैदान में आ गए थे , उँगलियों की टिप कभी गप्पू के बॉल्स को सहला देती तो कभी उसके बुच्ची के नाख़ून, बॉल्स को स्क्रेच कर देते,
गप्पू सिहर कर रह जाता, उसने अपने दोनों हाथों से बुच्ची के सर को पकड़ रखा था, और बुदबुदा रहा था
"बुच्ची ले ले, ले न बुच्ची मुंह में ले ले "
बुच्ची को गप्पू अच्छा भी बहुत लगता था, एकदम मीठा प्यारा सा गुलाबजामुन ऐसा, मन करे की गटक लो, लेकिन उसे चिढ़ाने में मजा भी बहुत आता था, वो अपना सर ऊपर कर के बोली
" अबे स्साले, बोलने में तो तेरी फट रही है, तुझसे ज्यादा जोश में तो मेरी भाभी, तेरी बहन हैं, बोल, क्या ले लूँ मुंह में "
" मेरा वो, प्लीज, मेरा " थूक गटकते हुए गप्पू बोला, " मेरा, मेरा लंड "
" सिर्फ मुंह में क्यों, हर जगह लूंगी, तूने अपने बहन को हमारे गाँव चुदवानेभेजा है यार, और अब चुनिया भी तैयार माल है, लेकिन चल तू कहता है तो पहले मुंह में " बुच्ची ने चिढ़ाया
और अपनी जीभ निकाल के खुले मोटे सुपाड़े को बस चाट लिया, जैसे स्कूल की लड़कियां लॉलीपॉप चाटती हैं एक हाथ से उसने अपने यार का लंड पकड़ रखा था और जीभ से बस चाट रही थी, कभी सुपाड़े को, कभी ऊपर से नीचे तक,
" उप्प्स, बुच्ची, हाँ, बेबी, बहुत अछ्छा लग रहा है, उफ्फ्फ, स्साली चूस न "
" अबे स्साले, स्साली है तेरी बहन, मेरी सहेली चुनिया " एक पल के लिए खूंटे को दूर कर के बुच्ची बोली और गप्प से सुपाड़ा मुंह में ले लिया और क्या चूसा है उस कच्ची कली ने। कुछ तो उसकी भाभियों का कमाल, दो दिन से मुन्ना बहू और मंजू भाभी पहले बुच्ची के मुंह में ऊँगली डाल के फिर हलक तक मोटी गाजर पेल के चूसना सीखा रही थी और इमरतिया ने तो अपने सामने बुच्ची से उसके सूरजु भैया का खीरे इअसा मोटा लंड जड़ तक लेके चुसवा के पूरा पक्का कर दिया।
बुच्ची दाएं हाथ से गप्पू का चूतड़ कस के पकड़ी थी और बाएं हाथ से उसके मूसल के बेस पे ले जाके हलके हलके मुठिया रही थी , सुपाड़ा उसने गप्प कर लिया और जीभ एक ओर नीचे से चाट रही थी और दोनों टीनेज होंठ कस कस के चूस रहे थे। बुच्ची को बहुत अच्छा लग रहा था, इस तरह खुले में आम की बाग़ में, रात हो रही थी, और वो बिना किसी हिचक के अपने यार का खूंटा मुंह में लेकर,
" ले बुच्ची ले , ओह्ह उफ्फ्फ तू यार बहुत अच्छी है ले न " गप्पू बोल रहा था और बुच्ची का सर कस के पकड़ के उसने पूरी ताकत से अंदरपेल दिया।
आधा से ज्यादा खूंटा अंदर था और अब बुच्ची कस कस के चूस रही थी, एक हाथ से वो बॉल्स को सहलाती, दूसरे हाथ से गप्पू के नितम्बो को रगड़ती, कभी मुंह थोड़ा सा ढीला कर देती तो कभी कस कस के चूसने लगती साथ में लंड मुठिया भी रही थी पर अब गप्पू से नहीं रहा गया वो आगे पीछे करने लगा जैसे बुच्ची का मुंह नहीं उसकी बुर हो और वो चोद रहा हो, बुच्ची को भी बहोत मजा आ रहा था। लेकिन थोड़ी देर बाद ही, गप्पू घबड़ा के बोलने लगा
" अरे यार छोड़ दे निकल जाएगा "
लेकिन बुच्ची जानती थी कि अभी इतनी जल्दी कुछ नहीं होने वाला है। इमरतिया और मुन्ना बहू दोनों ने उसे दस दस पहचान बता दी थी कि मर्द कब झड़ता है और कब शरीफ सुरसुरी मचती है और उसे लगता है, कि वो गिरने वाला है। हाँ उस समय अगर लड़की रुक जाए, थोड़ा सांस लेने दे मर्द को तो असल में वो दस पंदह मिनट के पहले नहीं गिरेगा। और बुच्ची समझ गई थी कि गप्पू का किसी लड़की या औरत के साथ पहली बार है, इसलिए वो घबड़ा रहा है।
बुच्ची ने छोड़ दिया, मुंह से तो निकाल दिया, पर मुठियाना नहीं बंद किया और चिढ़ाते हुए बोली,
" अबे स्साले, तेरी सारी बहनों कि बुर अपने भाइयों से चुदवाउ, गिर जायेगा तो गिर जाने दे, किसके लिए बचा रखा है, मेरी रामपुर वाली भौजी के लिए कि मेरी छिनार सहली चुनिया के लिए, अरे उसपर तो इस गाँव के सब लड़को का नाम लिखा है "
" कहीं तेरे मुंह में गिर जाता न तो इस लिए " घबड़ाते हुए गप्पू ने अपनी सफाई पेश की।
बुच्ची के मन में गप्पू के लिए ढेर सारा प्यार उमड़ आया, और उसकी आँखों में झाँक के गरिया के बोली, " तू स्साला है नंबरी बुद्धू, गनीमत है मेरे पल्ले पड़ा है "
और झट से एक बार फिर से सुपाड़ा मुंह में बुच्ची ने ले लिया और अब अगले दस मिनट तक इमरतिया ने जो काम कला सिखाई थी, एक से एक बदमाशियां सब की सब, चूसते हुए कभी गप्पू के पिछवाड़े की दरार में ऊँगली कर देती, कभी होंठों से दबा के सीधे लंड के बेस से सुपाड़े तक ले आती, और बीच में एक दो बार निकाल भी तो अपने निपल से सुपाड़े पे रगड़ दिया, होंठों में रसगुल्लों को भर के चूसने लगी
और अब जब पंछी फड़फड़ाने लगा तो साफ़ था अब गप्पू किनारे पर पहुँचने वाला है , बारह चौदह मिनट से लगातार बुच्ची चूस भी रही थी, मुठिया भी रही थी, तो उस लड़की ने कस के दोनों हाथों से गप्पू के चूतड़ पकड़ लिए जिससे वो लौंडा छुड़ा न पाए। गप्पू कसमसा रहा था, छटपटा रहा था
" बुच्ची यार निकाल दे न, अब गिर जाएगा, ओह्ह्ह उफ्फ्फ यार तेरे मुंह में, उफ़ बस बाहर निकाल दे न , ओह्ह अच्छा चल बाहर गिरा दे न , ओह्ह इत्ता अच्छा लग रहा है, मेरी बुच्ची मान जा, यार मुंह खोल, ओह्ह्ह उफ्फ्फ्फ़ "
और बुच्ची ने बस तर्जनी से गप्पू के पिछवाड़े की दरार में जरा सी ऊँगली का जोर लगा दिया, लगा जैसे बाँध टूट गया हो। गुड्डी ने अपने होंठों को कस के भींच रखा था, जिससे एक बूँद भी अमृत बहार न छलके, पहले एक धार, तेजी से सीधे हलक के अंदर, और फिर रबड़ी मलाई के थक्के, निकलते ही गए।
गप्पू एकदम शिथिल हो गया, और उसी समय जहाँ एकदम अँधेरा था चांदनी का कोई टुकड़ा पेड़ों की डालो को हटा के कुन्द्ती फांदती सीधे बुच्ची के चेहरे पर, क्या ख़ुशी छिटकी थी वहां।
बुच्ची ने एक बार फिर जोर लगा के चूसा, चूसती ही रही, और दो चार थक्के और उस के मुंह में, फिर धीरे धीरे पेड़ की डाली को पकड़ के, सहारा ले के वो खड़ी हुयी और मुस्करा के पहले गप्पू को कस के गले लगा लिया। बुच्ची का मुंह एकदम फूला था। चांदनी उसकी देह को नहला रही थी, उसका सुन्दर मुखड़ा साफ़ दिख रहा था।
गप्पू को छोड़ के वो दूर खड़ी हुयी और मुंह खोल के चिढ़ाते हुए गप्पू को दिखया,
पूरे मुंह में मलाई भरी थी, खूब गाढ़ी सफ़ेद, जीभ भी नहीं दिख रही थी, एक बूँद मुंह से निकल के ठुड्डी पे आ गयी थी, बुच्ची ने उसे पोंछ के अपने होंठों पे लपेट लिया,
बुच्ची खूब खुश थी और गप्पू को तो जैसे काठ मार गया था , मूरत बना वो बुच्ची को देख रहा था,
बुच्ची ने मुंह बंद कर लिया और गहरी सांस ली। उसके फूले गाल पिचकते चले गए। और दो मिनट के बाद जब उसने गप्पू के सामने मुंह खोला
जैसे जादूगर कबूतर दिखाते हैं, अभी है, अभी नहीं, बस एकदम उसी तरह।
बुच्ची का खुला मुंह एकदम खाली था , बस दो चार बूंदे जीभ पे लगी थीं,
अगली बार वो भी गायब।
बुच्ची ने अपने हाथ से गप्पू का नेकर खीँच के ऊपर कर दिया, अपने प्यारे पप्पू को अंदर और उसके पहले चूम के बोली, " मिलते हैं ब्रेक के बाद, पक्का कल और तेरी सहेली से मुलाक़ात करवाउंगी "
स्कर्ट तो उसकी अपने आप नीचे हो गयी थी, टॉप खीँच के कमर तक , और गप्पू का हाथ पकड़ के पगडंडी पे ले आयी और जहाँ एक फोर्क था उसे दिखाते बोली, " सुन स्साले तू इधर से निकल ले, दालान के सामने जो कुंआ है न बस उसी के बगल में जायेगी ये और मैं बायीं ओर से जाउंगी, सीधे पिछवाड़े वाले दरवाजे पे "
मुड़ने के पहले बुच्ची ने गप्पू को पकड़ के एक बार कस के चूम भी लिया और उसके नेकर में हाथ डाल के गप्पू के पप्पू को दबा भी दिया।
कुछ देर में बुच्ची पिछवाड़े के दरवाजे से सीधे आंगन में पहुँच गई, जहाँ लड़कियों के झुंड में धंस गई।