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Notice: यह कहानी धीमी एवं भावनात्मक चीजों पर ज्यादा केंद्रित हे अतः कहानी धीमे चलेगी । सस्ती चूदाई के शोखिन इस स्टोरी को ना पढ़े और न ही अपनी राय बताए।
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Lajwab keep it up bro...**कहानी: भाग 18 – मदनलाल जी का संदेह**
शंकरलाल का आना फिर से नियमित हो गया था। सुबह 7:30 बजे दरवाजे पर दस्तक, सवितादेवी मुस्कुराकर थैला लेतीं, थोड़ी बातें करतीं, और दरवाजा बंद। काम्या अब भी वही तरकीबें अपनाती – कभी सास को बुलाती, कभी खुद दरवाजे पर खड़ी रहती, लेकिन कभी भी ज्यादा बात नहीं करती। शंकरलाल की नजरें काम्या पर टिकतीं, लेकिन अब वो ज्यादा कोशिश नहीं करता – बस मुस्कुराता रहता और "बहू जी, नमस्ते" कहकर चला जाता।
मदनलाल जी को ये सब दिख रहा था। वे रिटायर्ड थे, दिन भर घर पर रहते, अखबार पढ़ते, लेकिन आँखें और कान हमेशा सक्रिय। वे देखते –
- शंकरलाल जब आता, तो उसकी नजरें दरवाजे के पीछे काम्या की तलाश में रहतीं।
- अगर काम्या दिख जाती, तो शंकरलाल की मुस्कान थोड़ी ज्यादा चौड़ी हो जाती। आँखें मिलाने की कोशिश करता, जैसे कोई पुराना राज हो।
- काम्या नजरें झुका लेती, या मुड़ जाती। कभी-कभी वो दरवाजे के पीछे छिपकर देखती कि शंकरलाल चला गया या नहीं।
- सवितादेवी अब खुद ज्यादा बात करतीं – "शंकर, आज क्या भाव है?", "बहू को अच्छी भिंडी देना" – और शंकरलाल हँसकर जवाब देता।
मदनलाल जी का मन में संदेह जागा। वे सोचते – *शंकर मेरा पुराना दोस्त है। बरसों से जानता हूँ। लेकिन... ये आँखें मिलाने की आदत... ये ज्यादा मुस्कुराना... ये बहू को देखने का तरीका... कुछ तो गड़बड़ है।*
एक सुबह मदनलाल जी खुद दरवाजा खोलने गए। शंकरलाल सामने खड़ा था।
"अरे मदनलाल जी! आज आप?"
"हाँ शंकर, आज मैं ले लूँगा।"
मदनलाल जी ने थैला लिया, पैसे दिए। शंकरलाल ने अंदर झाँका – काम्या किचन में थी, लेकिन दिख नहीं रही थी। शंकरलाल की आँखें एक पल रुकीं, फिर बोला,
"बहू जी कहाँ हैं? आज नहीं दिखीं।"
मदनलाल जी ने शांत लेकिन सख्त आवाज में कहा,
"अंदर हैं। काम में व्यस्त हैं।"
शंकरलाल हँसा,
"अच्छा-अच्छा। बस ऐसे ही पूछ लिया।"
मदनलाल जी ने दरवाजा बंद किया। मन में एक हल्की सी आग सुलग रही थी। वे सोच रहे थे – *शंकर मेरा दोस्त है, लेकिन दोस्ती की भी हद होती है। अगर वो बहू की तरफ गलत नजर से देख रहा है... तो ये बर्दाश्त नहीं होगा।*
लेकिन मदनलाल जी कुछ नहीं बोले। वे जानते थे कि सवितादेवी ने खुद शंकरलाल को फिर से आने को कहा है – पैसे बचाने के लिए। अगर वो अब कुछ कहेंगे, तो घर में बहस होगी। सवितादेवी कहेंगी, "तुम ज्यादा सोचते हो।" काम्या डर जाएगी। विकाश को पता चलेगा तो वो भी कुछ नहीं करेगा – बस "पापा, छोड़िए" कह देगा।
इसलिए मदनलाल जी चुप रहे। लेकिन अब उनकी नजरें और सख्त हो गईं। वे हर सुबह 7:30 बजे लिविंग रूम में बैठ जाते – अखबार हाथ में, लेकिन आँखें दरवाजे पर। जब शंकरलाल आता, तो वे खुद थैला लेते, या काम्या को अंदर रखते। कभी-कभी शंकरलाल से सीधे पूछते,
"शंकर, आजकल तू ज्यादा तारीफ करता है बहू की।"
शंकरलाल हँसकर टाल देता,
"अरे साहब, बहू अच्छी है तो तारीफ तो बनेगी।"
मदनलाल जी बस मुस्कुरा देते, लेकिन अंदर से फैसला कर चुके थे – *अगर एक बार भी हाथ बढ़ाया, या कोई गलत बात की... तो दोस्ती खत्म। और शंकरलाल को सबक सिखाऊंगा।*
काम्या को मदनलाल जी की ये चुप्पी और सतर्कता महसूस हो रही थी। उसे थोड़ा सुकून मिला – *पापाजी समझ रहे हैं।* लेकिन वो भी चुप थी। घर की शांति बनाए रखने के लिए।
सवितादेवी को अभी भी लगा कि सब ठीक है। लेकिन मदनलाल जी का संदेह अब एक शांत तूफान बन चुका था – जो बाहर से दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन अंदर से बढ़ रहा था।
(मदनलाल जी अब watchful हो चुके हैं। अगला सीन – शंकरलाल की कोई गलती, मदनलाल जी की कोई कार्रवाई, या काम्या-पापाजी के बीच कोई बातचीत)
Nice realisation....**कहानी: भाग 40 – विकास का गहरा दृष्टिकोण**
विकास का जीवन अब एक मशीन की तरह चल रहा था – सुबह अलार्म की घंटी, जल्दी-जल्दी तैयार होना, काम्या को एक हल्का सा किस, फिर कार में फँसकर ऑफिस की दौड़। लेकिन रात का वो सरप्राइज... वो पायल, वो कैंडल लाइट डिनर, काम्या की वो मुस्कान – सब कुछ उसके मन में घूम रहा था। वो खुश था कि काम्या खुश थी। लेकिन गहराई में उतरते ही उसके दिमाग में सवालों का सैलाब उठ रहा था।
ऑफिस में मीटिंग के बीच में, जब क्लाइंट की डिमांड्स सुनते हुए वो नोट्स ले रहा था, अचानक काम्या का चेहरा आ गया आँखों के सामने – वो रात की मुस्कान, वो कराह... नहीं, वो तो उसके साथ थी। लेकिन उसके दिमाग में एक हल्की सी चुभन थी। *काम्या... तू कितने दिनों से अकेली थी? मैंने तुझे कितना इग्नोर किया? पापा की तारीफें, उनका साथ... वो सब तेरी खुशी के लिए था ना? लेकिन क्या मैंने वो जगह छोड़ दी?*
विकास का दृष्टिकोण अब पहले से ज्यादा जटिल हो चुका था। बाहर से वो वही था – महत्वाकांक्षी, मेहनती, "सब ठीक है" कहने वाला। लेकिन अंदर से... एक गहरा अपराधबोध, एक हल्की जलन, और एक डर।
1. **अपराधबोध का बोझ**
वो सोचता – "मैंने काम्या को कितना दुख दिया। शादी के 6 महीने... वो अकेली थी। पापा ने उसका साथ दिया, अच्छा किया। लेकिन मैं... मैं कहाँ था? ऑफिस में, मीटिंग्स में, प्रमोशन के पीछे। सरप्राइज देकर सोचा सब ठीक हो जाएगा? नहीं... वो सिर्फ एक रात का था। कल से फिर वही रूटीन। काम्या की आँखों में वो चमक... क्या वो मेरी वजह से थी, या पापा की दोस्ती की?"
2. **जलन का छिपा दर्द**
विकास नोटिस करने लगा था। शाम को घर लौटता तो देखता – पापा और काम्या सोफे पर बैठे, हँस रहे होते। काम्या की वो खिलखिलाहट, जो पहले उसके लिए होती थी, अब पापा के जोक्स पर आ रही थी। उसे जलन होती – न गुस्से वाली, बल्कि दर्द वाली। *पापा मेरे साथ हैं, परिवार है। लेकिन क्यों लगता है जैसे मैं बाहर हो गया? काम्या की मुस्कान... वो मेरी होनी चाहिए। लेकिन मैंने खुद छोड़ दिया।*
3. **डर का साया**
गहराई में उतरते ही विकास को डर लगने लगा। *अगर मैंने समय नहीं दिया, तो क्या काम्या कहीं और मुड़ जाएगी? पापा तो ठीक हैं – सम्मानजनक हैं। लेकिन अगर कोई और... शंकरलाल जैसा कोई? या बाहर का कोई? नहीं... काम्या पतिव्रता है। लेकिन मैंने उसे कितना अकेला छोड़ा? क्या मैंने अपना रिश्ता खुद कमजोर कर दिया?*
एक दोपहर ऑफिस में ब्रेक के दौरान विकास ने फोन निकाला। काम्या को मैसेज किया – "शाम को जल्दी आऊँगा। साथ डिनर बाहर?" काम्या का रिप्लाई आया – "हाँ विकाश! बहुत अच्छा लगेगा। " विकास मुस्कुराया, लेकिन मन में सवाल – *क्या ये काफी है? या मैं बहुत देर कर चुका?*
घर लौटते वक्त कार में वो सोच रहा था – *मैं बदलूँगा। समय दूँगा। काम्या मेरी है। पापा फ्रेंड हैं, लेकिन पति मैं हूँ।* लेकिन गहराई में वो जानता था – बदलाव आसान नहीं। ऑफिस की डिमांड्स, प्रमोशन का दबाव... और घर में वो नया संतुलन जो पापा और काम्या के बीच बन चुका था।
विकास का दृष्टिकोण अब एक आईने जैसा हो गया था – जिसमें वो खुद को देख रहा था, अपनी कमियों को, अपनी गलतियों को। लेकिन क्या वो आईना टूटने से पहले खुद को सुधार पाएगा? वो सवाल उसके मन में घूम रहा था।