**कहानी: भाग 36 – मदनलाल का मन बगावत कर चुका था**
रात गहरा चुकी थी। घर में सन्नाटा इतना गहरा था कि बाहर से आने वाली हल्की हवा की साँय-साँय भी सुनाई दे रही थी। मदनलाल जी बालकनी में खड़े थे। हाथ रेलिंग पर टिके हुए, लेकिन उँगलियाँ इतनी कसकर पकड़ी हुईं कि नाखून सफेद पड़ गए थे। ठंडी हवा उनके सफेद बालों में खेल रही थी, लेकिन अंदर... अंदर एक ऐसी आग सुलग रही थी जो सालों से दबी हुई थी – और आज वो आग बेकाबू हो चुकी थी।
उनकी साँसें अनियमित थीं। छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, जैसे कोई भारी बोझ हर साँस के साथ दबा रहा हो। काम्या की वो आवाज़... वो मादक, गहरी, संतुष्टि भरी कराहें... उनके कानों में बार-बार गूंज रही थीं। जैसे कोई पुराना रिकॉर्ड जो बार-बार प्ले हो रहा हो, और हर बार वो और तेज़, और गहरा हो जाता।
"आह्ह... हाँ... और गहरा... ओह्ह... विकाश... मैं आने वाली हूँ..."
हर बार वो आवाज़ उनके मन में एक तीर की तरह चुभती। और हर चुभन के साथ काम्या की तस्वीरें उभर आतीं – इतनी जीवंत, इतनी स्पष्ट, इतनी जीवंत कि वो खुद को रोक नहीं पा रहे थे।
- शादी में लाल बनारसी साड़ी में घूमती हुई काम्या... पल्लू हवा में लहराता हुआ, गोरी कमर झलकती हुई, आँखों में वो शरमाती चमक।
- बाजार में हँसते हुए... बाल हवा में उड़ाते हुए, होंठों पर वो खिलखिलाती मुस्कान जो मदनलाल जी के दिल को छू जाती थी।
- किचन में चाय बनाते वक्त पीछे मुड़कर मुस्कुराती हुई... आँखों में वो कृतज्ञता, वो प्यार भरी नजर।
- और अब... वो कल्पना जो वो रोकना चाहते थे, लेकिन रोक नहीं पा रहे थे – काम्या बिस्तर पर लेटी, टाँगें फैलाए, गोरी जाँघें चमकती हुईं, होंठ कटे हुए, आँखें बंद, और वो कराह... वो गहरी, भूखी कराह जो उनके कान में घुसकर सीधे दिल तक पहुँच रही थी।
मदनलाल जी की आँखें नम हो गईं। आंसू नहीं थे – वो गुस्से के आंसू थे। खुद पर गुस्सा। वो रेलिंग से हाथ हटाकर मुट्ठियाँ भींच लीं।
*मैं क्या कर रहा हूँ? ये मेरी बहू है... मेरी बेटी जैसी। मैंने उसे कभी गलत नजर से नहीं देखा। मैंने उसे दोस्त माना, उसकी खुशी के लिए सब किया। लेकिन आज... ये शरीर... ये मन... क्यों बगावत कर रहा है?*
उनका लंड अभी भी थिरक रहा था। कुर्ता-पायजामा के नीचे वो सख्त, दर्द भरा। वो खुद को कसकर पकड़ लिया। हाथ काँप रहे थे। मन में एक चीख उठी –
*बस कर! ये गलत है! बहुत गलत है! मैं बूढ़ा हो गया हूँ... 65 साल का हूँ... फिर भी ये आग... ये लालसा... क्यों? क्यों मेरा शरीर जवाब दे रहा है? मैं तो उसका पापाजी हूँ... उसका फ्रेंड हूँ... उसकी खुशी के लिए जीता हूँ। लेकिन आज... ये तस्वीरें... ये आवाज़... क्यों मेरे मन को चीर रही हैं?*
वो बालकनी में घूमने लगे। पैर ठंडी टाइल्स पर ठोकर खा रहे थे। हर कदम के साथ मन में एक नया सवाल –
*क्या मैं कमजोर हो गया हूँ? क्या सालों की अकेलापन, लक्ष्मी के जाने के बाद की खालीपन... अब काम्या में उतर आया है? नहीं... नहीं... ये नहीं हो सकता।*
उनकी आँखों के सामने काम्या की मुस्कान फिर आई – वो शुद्ध, वो मासूम मुस्कान। लेकिन साथ ही वो कराह... वो मादक कराह। दो विरोधी तस्वीरें – एक पवित्र, दूसरी कामुक। और दोनों ने उनके दिल को चीर दिया।
मदनलाल जी ने दीवार से सिर टिका लिया। आँखें बंद कर लीं। एक गहरी साँस ली। मन में खुद से कहा –
*कल सुबह... सब ठीक हो जाएगा। मैं दूरी बनाऊँगा। तारीफें कम करूँगा। फिल्में अकेले देखूँगा। ज्यादा बात नहीं करूँगा। वो मेरी बहू है... बस। मैं खुद को कंट्रोल करूँगा।*
लेकिन वो जानते थे – ये बगावत इतनी आसानी से नहीं रुकेगी। मन में वो तस्वीरें बार-बार आ रही थीं। और हर बार वो खुद पर गुस्सा होता। गुस्सा इतना कि आँखों में आंसू आ गए। वो आंसू खुद पर थे – अपनी कमजोरी पर, अपनी बगावत पर।
रात बीत गई। सुबह हुई। मदनलाल जी उठे। चेहरा थका हुआ, आँखें लाल। लेकिन उन्होंने फैसला किया – आज से खुद को रोकेंगे। काम्या से बात करेंगे, लेकिन दूरी रखेंगे। ताकि ये आग बुझ जाए।
लेकिन वो आग... वो अभी बुझने वाली नहीं थी। वो धीरे-धीरे, और गहराई से फैलने वाली थी।