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Incest काम्या सेक्सी बहू

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Speedy_rocket

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Index
भाग 1भाग 2भाग 3भाग 4भाग 5भाग 6भाग 7भाग 8भाग 9भाग 10
भाग 11भाग 12भाग 13भाग 14भाग 15भाग 16भाग 17भाग 18भाग 19भाग 20
भाग 21भाग 22भाग 23भाग 24भाग 25भाग 26भाग 27भाग 28भाग 29भाग 30
भाग 31भाग 32भाग 33भाग 34भाग 35भाग 36भाग 37भाग 38भाग 39भाग 40
भाग 41भाग 42भाग 43भाग 44भाग 45भाग 46भाग 47भाग 48भाग 49भाग 50
Notice: यह कहानी धीमी एवं भावनात्मक चीजों पर ज्यादा केंद्रित हे अतः कहानी धीमे चलेगी । सस्ती चूदाई के शोखिन इस स्टोरी को ना पढ़े और न ही अपनी राय बताए।
 
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varsha0000

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Update padh kar bhi lg rha ki kahani kahi ruk gyi hai
Kahani me 32 bhaag ho gye hai par abhi tak sasur bahu ka prem prasang shuru nhi hua hai.
 
Last edited:

Kawal Kumar

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ये कहानी अत्यंत धीमी रहेगी, चूदाई इतनी जल्दी नहीं होगी, कोई किरदार अपनी मर्जी से कुछ नहीं करेगा
Ap shi se liikh thi ho aise hi likhate rhiye.
Jinko story me kewal sex padna hai yha jai waahiyaat story hai jinme sex hi bhara hua hai use pade ek acchi story ko kharab na kare
 
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Speedy_rocket

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**कहानी: भाग 35 – रात का वो पल**

रात के ठीक दो बज चुके थे। घर में गहरा सन्नाटा था। सवितादेवी अपने कमरे में सो रही थीं, भजन मंडली की थकान से गहरी नींद में। मदनलाल जी का कमरा भी शांत था। लिविंग रूम की घड़ी की टिक-टिक ही सुनाई दे रही थी।

विकाश और काम्या के कमरे में हल्की-सी लैंप की पीली रोशनी थी। विकाश आज जल्दी लौटा था। सरप्राइज के बाद वो काम्या को गले लगाकर बिस्तर पर ले आया था। दोनों के कपड़े धीरे-धीरे गिरते गए। विकाश ने काम्या को चूमना शुरू किया – पहले होंठ, फिर गला, फिर ब्रेस्ट्स। काम्या की साँसें तेज हो गईं। महीनों बाद वो पूरा महसूस कर रही थी – पति का स्पर्श, उसकी गर्मी, उसकी भूख।

विकाश ने काम्या की टाँगें फैलाईं। लंड पहले से खड़ा था। धीरे से अंदर डाला। काम्या की आँखें बंद हो गईं। वो कराह उठी –
"आह्ह... विकाश... धीरे... ओह्ह..."

विकाश ने धक्के देना शुरू किए – पहले हल्के, फिर गहरे। काम्या की कमर ऊपर-नीचे होने लगी। वो खुशी में कराह रही थी – वो मादक, गहरी आवाज़ जो कमरे में गूंज रही थी:
"आह्ह... हाँ... ऐसे ही... और जोर से... ओह्ह... विकाश... बहुत अच्छा लग रहा है..."

उसकी आवाज़ में वो संतुष्टि थी जो महीनों से गायब थी। वो चीख नहीं रही थी, बस गहरी, मादक सिसकारियाँ – "आह्ह... हाँ... अंदर... सब अंदर... ओह्ह..."

उसी वक्त मदनलाल जी की नींद खुल गई। गले में प्यास लगी थी। वो धीरे से उठे, चप्पल पहने, और पानी पीने किचन की तरफ चले। कमरे का दरवाजा हल्का खुला था। जैसे ही वो पास से गुजरे, काम्या की वो आवाज़ उनके कानों में पड़ी – वो गहरी, मादक कराह:
"आह्ह... हाँ... और गहरा... ओह्ह..."

मदनलाल जी ठिठक गए। उनके कदम रुक गए। वो जानते थे कि ये काम्या की आवाज़ है – लेकिन ऐसी आवाज़... इतनी मादक, इतनी भूखी। उनके शरीर में एक अजीब सी सिहरन हुई। उनका लंड, जो सालों से शांत था, अचानक थिरकने लगा। कुर्ता-पायजामा के नीचे वो सख्त होने लगा। मदनलाल जी ने खुद को झटका।

मन में गुस्सा आया – खुद पर।
*ये क्या हो रहा है? ये मेरी बहू है... मेरी बेटी जैसी। मैं क्या सोच रहा हूँ? क्यों मेरा लंड जवाब दे रहा है? ये गलत है... बहुत गलत है।*

उनकी साँसें तेज हो गईं। वो किचन की तरफ मुड़े, लेकिन पैर नहीं बढ़े। काम्या की कराह फिर सुनाई दी – "आह्ह... विकाश... मैं आने वाली हूँ... ओह्ह..."
मदनलाल जी ने आँखें बंद कीं। हाथ से खुद को कसकर पकड़ा। मन में खुद से लड़ाई चल रही थी –
*मैंने कभी गलत नजर नहीं डाली। मैंने उसे बेटी माना। लेकिन आज... ये आवाज़... ये मादकपन... क्यों मेरे शरीर में आग लग रही है?*

वो किचन में गए। पानी का ग्लास लिया, लेकिन हाथ काँप रहे थे। ग्लास से पानी गिर गया। वो दीवार से टेक लगाकर खड़े रहे। मन में बार-बार वही सवाल –
*क्यों? क्यों मेरा लंड थिरक रहा है? मैं तो उसका पापाजी हूँ... फ्रेंड हूँ... लेकिन आज...*

उन्होंने पानी पिया। ठंडा पानी गले से नीचे गया। लेकिन अंदर की आग नहीं बुझी। वो वापस कमरे की तरफ मुड़े। काम्या की आवाज़ अब धीमी हो गई थी – दोनों झड़ चुके थे। मदनलाल जी धीरे से अपने कमरे में लौट आए। बिस्तर पर लेटे। आँखें खुली रहीं।

मन में खुद से कहा –
*ये गलत है। मैं खुद को कंट्रोल करूँगा। काम्या मेरी बहू है। उसकी खुशी में मैं शामिल हूँ, लेकिन ये... ये नहीं।*

लेकिन वो रात उनके लिए लंबी हो गई। नींद नहीं आई। शरीर में वो थिरकन अभी भी बाकी थी। और मन में एक नया संघर्ष शुरू हो चुका था – जो पहले कभी नहीं हुआ था।
 
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Speedy_rocket

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**कहानी: भाग 36 – मदनलाल का मन बगावत कर चुका था**

रात गहरा चुकी थी। घर में सन्नाटा इतना गहरा था कि बाहर से आने वाली हल्की हवा की साँय-साँय भी सुनाई दे रही थी। मदनलाल जी बालकनी में खड़े थे। हाथ रेलिंग पर टिके हुए, लेकिन उँगलियाँ इतनी कसकर पकड़ी हुईं कि नाखून सफेद पड़ गए थे। ठंडी हवा उनके सफेद बालों में खेल रही थी, लेकिन अंदर... अंदर एक ऐसी आग सुलग रही थी जो सालों से दबी हुई थी – और आज वो आग बेकाबू हो चुकी थी।

उनकी साँसें अनियमित थीं। छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, जैसे कोई भारी बोझ हर साँस के साथ दबा रहा हो। काम्या की वो आवाज़... वो मादक, गहरी, संतुष्टि भरी कराहें... उनके कानों में बार-बार गूंज रही थीं। जैसे कोई पुराना रिकॉर्ड जो बार-बार प्ले हो रहा हो, और हर बार वो और तेज़, और गहरा हो जाता।

"आह्ह... हाँ... और गहरा... ओह्ह... विकाश... मैं आने वाली हूँ..."

हर बार वो आवाज़ उनके मन में एक तीर की तरह चुभती। और हर चुभन के साथ काम्या की तस्वीरें उभर आतीं – इतनी जीवंत, इतनी स्पष्ट, इतनी जीवंत कि वो खुद को रोक नहीं पा रहे थे।

- शादी में लाल बनारसी साड़ी में घूमती हुई काम्या... पल्लू हवा में लहराता हुआ, गोरी कमर झलकती हुई, आँखों में वो शरमाती चमक।
- बाजार में हँसते हुए... बाल हवा में उड़ाते हुए, होंठों पर वो खिलखिलाती मुस्कान जो मदनलाल जी के दिल को छू जाती थी।
- किचन में चाय बनाते वक्त पीछे मुड़कर मुस्कुराती हुई... आँखों में वो कृतज्ञता, वो प्यार भरी नजर।
- और अब... वो कल्पना जो वो रोकना चाहते थे, लेकिन रोक नहीं पा रहे थे – काम्या बिस्तर पर लेटी, टाँगें फैलाए, गोरी जाँघें चमकती हुईं, होंठ कटे हुए, आँखें बंद, और वो कराह... वो गहरी, भूखी कराह जो उनके कान में घुसकर सीधे दिल तक पहुँच रही थी।

मदनलाल जी की आँखें नम हो गईं। आंसू नहीं थे – वो गुस्से के आंसू थे। खुद पर गुस्सा। वो रेलिंग से हाथ हटाकर मुट्ठियाँ भींच लीं।
*मैं क्या कर रहा हूँ? ये मेरी बहू है... मेरी बेटी जैसी। मैंने उसे कभी गलत नजर से नहीं देखा। मैंने उसे दोस्त माना, उसकी खुशी के लिए सब किया। लेकिन आज... ये शरीर... ये मन... क्यों बगावत कर रहा है?*

उनका लंड अभी भी थिरक रहा था। कुर्ता-पायजामा के नीचे वो सख्त, दर्द भरा। वो खुद को कसकर पकड़ लिया। हाथ काँप रहे थे। मन में एक चीख उठी –
*बस कर! ये गलत है! बहुत गलत है! मैं बूढ़ा हो गया हूँ... 65 साल का हूँ... फिर भी ये आग... ये लालसा... क्यों? क्यों मेरा शरीर जवाब दे रहा है? मैं तो उसका पापाजी हूँ... उसका फ्रेंड हूँ... उसकी खुशी के लिए जीता हूँ। लेकिन आज... ये तस्वीरें... ये आवाज़... क्यों मेरे मन को चीर रही हैं?*

वो बालकनी में घूमने लगे। पैर ठंडी टाइल्स पर ठोकर खा रहे थे। हर कदम के साथ मन में एक नया सवाल –
*क्या मैं कमजोर हो गया हूँ? क्या सालों की अकेलापन, लक्ष्मी के जाने के बाद की खालीपन... अब काम्या में उतर आया है? नहीं... नहीं... ये नहीं हो सकता।*

उनकी आँखों के सामने काम्या की मुस्कान फिर आई – वो शुद्ध, वो मासूम मुस्कान। लेकिन साथ ही वो कराह... वो मादक कराह। दो विरोधी तस्वीरें – एक पवित्र, दूसरी कामुक। और दोनों ने उनके दिल को चीर दिया।

मदनलाल जी ने दीवार से सिर टिका लिया। आँखें बंद कर लीं। एक गहरी साँस ली। मन में खुद से कहा –
*कल सुबह... सब ठीक हो जाएगा। मैं दूरी बनाऊँगा। तारीफें कम करूँगा। फिल्में अकेले देखूँगा। ज्यादा बात नहीं करूँगा। वो मेरी बहू है... बस। मैं खुद को कंट्रोल करूँगा।*

लेकिन वो जानते थे – ये बगावत इतनी आसानी से नहीं रुकेगी। मन में वो तस्वीरें बार-बार आ रही थीं। और हर बार वो खुद पर गुस्सा होता। गुस्सा इतना कि आँखों में आंसू आ गए। वो आंसू खुद पर थे – अपनी कमजोरी पर, अपनी बगावत पर।

रात बीत गई। सुबह हुई। मदनलाल जी उठे। चेहरा थका हुआ, आँखें लाल। लेकिन उन्होंने फैसला किया – आज से खुद को रोकेंगे। काम्या से बात करेंगे, लेकिन दूरी रखेंगे। ताकि ये आग बुझ जाए।

लेकिन वो आग... वो अभी बुझने वाली नहीं थी। वो धीरे-धीरे, और गहराई से फैलने वाली थी।
 
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Speedy_rocket

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**कहानी: भाग 37 – सुबह की खुशी**

सुबह की पहली किरण घर में घुस आई थी। सूरज की हल्की पीली रोशनी बालकनी से लिविंग रूम में फैल रही थी। काम्या किचन में थी – आज वो बहुत जल्दी उठी थी। चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, होंठों पर हल्की-हल्की मुस्कान जो छिप नहीं पा रही थी। वो चाय बना रही थी, लेकिन हाथों में एक अलग ही हल्कापन था। रात की वो गर्माहट, विकाश का सरप्राइज, वो प्यार भरा स्पर्श – सब कुछ अभी भी उसके शरीर में महसूस हो रहा था। वो गुनगुना रही थी – कोई पुराना गाना, बहुत धीमे से।

मदनलाल जी लिविंग रूम में आ गए। आज उनका चेहरा थोड़ा थका हुआ था – रात भर नींद नहीं आई थी। लेकिन काम्या को देखते ही उनकी आँखें नरम पड़ गईं। वो सोफे पर बैठे और काम्या की तरफ देखकर मुस्कुराए।

"अरे बेटी... आज तो तू बहुत जल्दी उठ गई। और ये मुस्कान... क्या बात है?"

काम्या ट्रे लेकर आई – दो कप चाय, कुछ बिस्किट। वो मदनलाल जी के सामने रखकर बैठ गई। उसकी आँखें चमक रही थीं, गाल हल्के गुलाबी। वो हँसकर बोली,

"कुछ नहीं पापाजी... बस आज मन बहुत अच्छा है। नींद अच्छी आई, मौसम अच्छा है... बस ऐसे ही।"

मदनलाल जी ने चाय का घूंट लिया। उनकी नजर काम्या के चेहरे पर टिकी रही। वो हँसते हुए बोले,

"अरे नहीं-नहीं... ये 'बस ऐसे ही' वाली मुस्कान नहीं है। ये तो कुछ खास वाली मुस्कान है। रात को कुछ हुआ क्या? विकाश ने कोई सरप्राइज दिया?"

काम्या का चेहरा और लाल हो गया। वो शरमाकर नजरें नीची कर लीं, लेकिन होंठों पर मुस्कान बढ़ गई। वो हँसकर बात टालने लगी,

"अरे पापाजी... आप भी ना! कुछ नहीं हुआ। बस... अच्छी नींद आई। और हाँ, आज चाय में थोड़ी ज्यादा इलायची डाली है – आपकी फेवरेट। पीजिए ना!"

मदनलाल जी ने हँसकर सिर हिलाया।
"ठीक है ठीक है... राज़ रख ले। लेकिन ये मुस्कान देखकर मेरा दिन बन गया। तू खुश है, तो मैं भी खुश हूँ।"

काम्या ने चाय का घूंट लिया। मन में वो रात की यादें घूम रही थीं – विकाश का स्पर्श, उसकी वो कोशिश, वो प्यार। वो खुश थी – सच में खुश। लेकिन वो ये नहीं बता सकती थी कि पापाजी से। वो बस हँसकर बोली,

"पापाजी... आप भी तो रोज़ मुझे खुश रखते हैं। आज आपकी तारीफ का नंबर है – बताइए, आज मैं कैसी लग रही हूँ?"

मदनलाल जी ने मुस्कुराकर कहा,
"बेटी... आज तू चाँद की तरह चमक रही है।"

काम्या हँस पड़ी – वो खिलखिलाहट जो घर में गूंज गई। लेकिन मदनलाल जी के मन में रात की वो बगावत अभी भी सुलग रही थी। वो खुद को कंट्रोल कर रहे थे। लेकिन काम्या की ये खुशी देखकर उनका दिल भी हल्का हो गया। वो सोच रहे थे –
*बेटी खुश है... विकाश ने अच्छा किया। मैं... मैं खुद को संभाल लूँगा।*

सुबह का सूरज और ऊपर चढ़ रहा था। काम्या की मुस्कान घर में फैल रही थी। और मदनलाल जी... वो चुपचाप उस मुस्कान को देखते रहे। मन में एक हल्की सी पीड़ा थी, लेकिन साथ ही एक गहरी खुशी भी – कि बहू खुश है।
 
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