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Notice: यह कहानी धीमी एवं भावनात्मक चीजों पर ज्यादा केंद्रित हे अतः कहानी धीमे चलेगी । सस्ती चूदाई के शोखिन इस स्टोरी को ना पढ़े और न ही अपनी राय बताए।
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Adultery toh nahi hogi na.?? Shankarlal sirf dekh kr hi dur se reh jana chahiye.. ghar ki izzat pr bahar wale ki pachhai bhi nahi padni**कहानी: भाग 14 – शंकरलाल की चाल**
सोमवार की सुबह। विकाश और काम्या महाबलेश्वर से वापस लौट आए थे। रात को ही पहुंचे थे, थके हुए लेकिन खुश। काम्या ने सूटकेस खोला, कपड़े निकाले, और मन में यात्रा की यादें ताजा कर रही थी। विकाश ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था – आज से फिर वही रूटीन शुरू।
सवितादेवी ने सबको चाय दी। मदनलाल जी ने काम्या से पूछा,
"बेटी, मजा आया?"
काम्या ने मुस्कुराकर कहा, "बहुत पापाजी। थैंक यू सबके लिए।"
सवितादेवी ने बस देखा और चुपचाप रसोई में चली गईं।
उसी सुबह करीब 7:30 बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। सवितादेवी ने दरवाजा खोला। सामने शंकरलाल खड़ा था – हाथ में बड़ा सा प्लास्टिक का थैला, मुंह पर वही चौड़ी मुस्कान, लेकिन आंखों में कुछ और।
"नमस्ते बहू... अरे, मदनलाल जी! सब्जी लाया हूं। आज ताजी-ताजी भिंडी, टमाटर, बैंगन, और थोड़ी सी धनिया भी एक्स्ट्रा।"
मदनलाल जी लिविंग रूम से निकले।
"अच्छा शंकर, आ गया? डिलीवर करने लगा?"
"हां साहब, आपने कहा था ना। और बहू जी को झंझट न हो, इसलिए खुद लाया।"
काम्या किचन से निकली। आज उसने हल्की पीली साड़ी पहनी थी – यात्रा से ताजगी बरकरार। बाल अभी भी खुले, हल्के गीले। शंकरलाल की नजरें फौरन उस पर टिक गईं। मुंह से लार लगभग टपकने वाली थी, लेकिन उसने कंट्रोल किया।
"अरे वाह... बहू जी! वापस आ गईं? कितनी चमक रही हो! महाबलेश्वर का पानी लगता है।"
काम्या ने शर्माकर मुस्कुराई, नजरें नीची।
"जी... धन्यवाद।"
शंकरलाल ने थैला काम्या की तरफ बढ़ाया।
"ये लो बहू जी, सब्जियां। आज मैंने खास तुम्हारे लिए अच्छी-अच्छी चुनी हैं।"
काम्या ने थैला लिया। शंकरलाल ने जानबूझकर हाथ काम्या के हाथ पर रख दिया – एक सेकंड ज्यादा देर तक। काम्या ने फौरन हाथ खींच लिया, लेकिन शंकरलाल मुस्कुराता रहा।
मदनलाल जी ने देखा, लेकिन कुछ नहीं बोले। बस बोले,
"शंकर, पैसा कितना?"
शंकरलाल ने हिसाब लगाया – लेकिन आंखें काम्या पर।
"साहब, 250। लेकिन बहू जी के लिए 200 कर देते हैं।"
काम्या ने पैसे दिए। शंकरलाल ने पैसे लेते हुए फिर हाथ छुआ – इस बार हथेली पर हल्का सा दबाव। काम्या का शरीर सिहर गया। उसने फौरन हाथ पीछे खींच लिया और किचन में चली गई।
शंकरलाल बाहर निकला, लेकिन मन में खुशी।
*अरे वाह... बहू जी घर पर हैं। हाथ छुआ, वो सिहर गई। मतलब डरती है, लेकिन इग्नोर नहीं कर रही। रोज आऊंगा। धीरे-धीरे बातें बढ़ाऊंगा। कभी मजाक, कभी तारीफ। एक दिन मौका मिलेगा... जब मदनलाल जी बाहर होंगे, सवितादेवी पूजा में।*
उसने ठेले पर लौटते हुए प्लान बनाया:
- रोज सुबह 7:30-8 बजे डिलीवर।
- हर बार काम्या से ही बात करेगा – "बहू जी, आज क्या बनाओगी?", "आज साड़ी में बहुत अच्छी लग रही हो।"
- छोटे-छोटे गिफ्ट्स – कभी एक मुट्ठी मूंगफली, कभी एक फूल की टहनी। "ये तुम्हारे लिए लाया।"
- अगर काम्या अकेली मिली, तो थोड़ा और करीब आएगा – कमर पर हाथ रखने की कोशिश, या मजाक में "बहू जी, इतनी खूबसूरत हो, विकाश भैया लकी हैं।"
- धीरे-धीरे... अगर वो विरोध नहीं करेगी, तो और आगे।
शंकरलाल ने सिगरेट सुलगाई और धुंआ उड़ाते हुए बोला,
"काम्या... तू मेरी होगी। बस थोड़ा टाइम लगेगा।"
घर में काम्या किचन में सब्जियां धो रही थी। हाथ अभी भी कांप रहे थे। मन में घृणा थी, लेकिन थोड़ा डर भी। उसने सोचा – *ये आदमी... बहुत गंदा है। लेकिन रोज आएगा तो? पापाजी को बताऊं?*
लेकिन कुछ बोल नहीं पाई। सवितादेवी ने देखा – काम्या का चेहरा पीला था।
"क्या हुआ बेटी?"
"कुछ नहीं मम्मी जी... बस थकान है।"
सवितादेवी चुप रही, लेकिन नजरें शंकरलाल के जाने की तरफ गईं। उन्हें शक हो रहा था।
(शंकरलाल की चाल शुरू हो चुकी है। धीरे-धीरे, लेकिन खतरनाक।)