• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Incest काम्या सेक्सी बहू

🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

Speedy_rocket

Member
137
350
79
Index
भाग 1भाग 2भाग 3भाग 4भाग 5भाग 6भाग 7भाग 8भाग 9भाग 10
भाग 11भाग 12भाग 13भाग 14भाग 15भाग 16भाग 17भाग 18भाग 19भाग 20
भाग 21भाग 22भाग 23भाग 24भाग 25भाग 26भाग 27भाग 28भाग 29भाग 30
भाग 31भाग 32भाग 33भाग 34भाग 35भाग 36भाग 37भाग 38भाग 39भाग 40
भाग 41भाग 42भाग 43भाग 44भाग 45भाग 46भाग 47भाग 48भाग 49भाग 50
Notice: यह कहानी धीमी एवं भावनात्मक चीजों पर ज्यादा केंद्रित हे अतः कहानी धीमे चलेगी । सस्ती चूदाई के शोखिन इस स्टोरी को ना पढ़े और न ही अपनी राय बताए।
 
Last edited:
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

DB Singh

Active Member
737
1,231
123
**कहानी: भाग 14 – शंकरलाल की चाल**

सोमवार की सुबह। विकाश और काम्या महाबलेश्वर से वापस लौट आए थे। रात को ही पहुंचे थे, थके हुए लेकिन खुश। काम्या ने सूटकेस खोला, कपड़े निकाले, और मन में यात्रा की यादें ताजा कर रही थी। विकाश ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था – आज से फिर वही रूटीन शुरू।

सवितादेवी ने सबको चाय दी। मदनलाल जी ने काम्या से पूछा,

"बेटी, मजा आया?"

काम्या ने मुस्कुराकर कहा, "बहुत पापाजी। थैंक यू सबके लिए।"

सवितादेवी ने बस देखा और चुपचाप रसोई में चली गईं।

उसी सुबह करीब 7:30 बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। सवितादेवी ने दरवाजा खोला। सामने शंकरलाल खड़ा था – हाथ में बड़ा सा प्लास्टिक का थैला, मुंह पर वही चौड़ी मुस्कान, लेकिन आंखों में कुछ और।

"नमस्ते बहू... अरे, मदनलाल जी! सब्जी लाया हूं। आज ताजी-ताजी भिंडी, टमाटर, बैंगन, और थोड़ी सी धनिया भी एक्स्ट्रा।"

मदनलाल जी लिविंग रूम से निकले।

"अच्छा शंकर, आ गया? डिलीवर करने लगा?"

"हां साहब, आपने कहा था ना। और बहू जी को झंझट न हो, इसलिए खुद लाया।"

काम्या किचन से निकली। आज उसने हल्की पीली साड़ी पहनी थी – यात्रा से ताजगी बरकरार। बाल अभी भी खुले, हल्के गीले। शंकरलाल की नजरें फौरन उस पर टिक गईं। मुंह से लार लगभग टपकने वाली थी, लेकिन उसने कंट्रोल किया।

"अरे वाह... बहू जी! वापस आ गईं? कितनी चमक रही हो! महाबलेश्वर का पानी लगता है।"

काम्या ने शर्माकर मुस्कुराई, नजरें नीची।

"जी... धन्यवाद।"

शंकरलाल ने थैला काम्या की तरफ बढ़ाया।

"ये लो बहू जी, सब्जियां। आज मैंने खास तुम्हारे लिए अच्छी-अच्छी चुनी हैं।"

काम्या ने थैला लिया। शंकरलाल ने जानबूझकर हाथ काम्या के हाथ पर रख दिया – एक सेकंड ज्यादा देर तक। काम्या ने फौरन हाथ खींच लिया, लेकिन शंकरलाल मुस्कुराता रहा।

मदनलाल जी ने देखा, लेकिन कुछ नहीं बोले। बस बोले,

"शंकर, पैसा कितना?"

शंकरलाल ने हिसाब लगाया – लेकिन आंखें काम्या पर।

"साहब, 250। लेकिन बहू जी के लिए 200 कर देते हैं।"

काम्या ने पैसे दिए। शंकरलाल ने पैसे लेते हुए फिर हाथ छुआ – इस बार हथेली पर हल्का सा दबाव। काम्या का शरीर सिहर गया। उसने फौरन हाथ पीछे खींच लिया और किचन में चली गई।

शंकरलाल बाहर निकला, लेकिन मन में खुशी।

*अरे वाह... बहू जी घर पर हैं। हाथ छुआ, वो सिहर गई। मतलब डरती है, लेकिन इग्नोर नहीं कर रही। रोज आऊंगा। धीरे-धीरे बातें बढ़ाऊंगा। कभी मजाक, कभी तारीफ। एक दिन मौका मिलेगा... जब मदनलाल जी बाहर होंगे, सवितादेवी पूजा में।*

उसने ठेले पर लौटते हुए प्लान बनाया:

- रोज सुबह 7:30-8 बजे डिलीवर।
- हर बार काम्या से ही बात करेगा – "बहू जी, आज क्या बनाओगी?", "आज साड़ी में बहुत अच्छी लग रही हो।"
- छोटे-छोटे गिफ्ट्स – कभी एक मुट्ठी मूंगफली, कभी एक फूल की टहनी। "ये तुम्हारे लिए लाया।"
- अगर काम्या अकेली मिली, तो थोड़ा और करीब आएगा – कमर पर हाथ रखने की कोशिश, या मजाक में "बहू जी, इतनी खूबसूरत हो, विकाश भैया लकी हैं।"
- धीरे-धीरे... अगर वो विरोध नहीं करेगी, तो और आगे।

शंकरलाल ने सिगरेट सुलगाई और धुंआ उड़ाते हुए बोला,

"काम्या... तू मेरी होगी। बस थोड़ा टाइम लगेगा।"

घर में काम्या किचन में सब्जियां धो रही थी। हाथ अभी भी कांप रहे थे। मन में घृणा थी, लेकिन थोड़ा डर भी। उसने सोचा – *ये आदमी... बहुत गंदा है। लेकिन रोज आएगा तो? पापाजी को बताऊं?*

लेकिन कुछ बोल नहीं पाई। सवितादेवी ने देखा – काम्या का चेहरा पीला था।

"क्या हुआ बेटी?"

"कुछ नहीं मम्मी जी... बस थकान है।"

सवितादेवी चुप रही, लेकिन नजरें शंकरलाल के जाने की तरफ गईं। उन्हें शक हो रहा था।

(शंकरलाल की चाल शुरू हो चुकी है। धीरे-धीरे, लेकिन खतरनाक।)
Adultery toh nahi hogi na.?? Shankarlal sirf dekh kr hi dur se reh jana chahiye.. ghar ki izzat pr bahar wale ki pachhai bhi nahi padni
 
  • Like
Reactions: Speedy_rocket

Speedy_rocket

Member
137
350
79
**कहानी: भाग 17 – सवितादेवी का नया सोच और बदलाव**

कई दिन ऐसे ही बीत गए। काम्या ने अपनी सतर्कता कभी कम नहीं की। शंकरलाल जब भी आता, काम्या या तो सवितादेवी को बुला लेती, या मदनलाल जी को, या फिर दरवाजे पर ही थैला रखवाकर पैसे दे देती। कभी भी शंकरलाल को अंदर आने या हाथ छूने का मौका नहीं मिला। काम्या की ये छोटी-छोटी तरकीबें काम कर गईं।

शंकरलाल पहले तो रोज कोशिश करता रहा – तारीफ करता, मजाक करता, हाथ बढ़ाने की कोशिश करता। लेकिन हर बार खाली हाथ लौटता। धीरे-धीरे उसका जोश ठंडा पड़ने लगा। एक दिन उसने मन ही मन सोचा,
*साला... ये बहू तो पत्थर की लकड़ी निकली। रोज-रोज अपमान सहना... और कुछ मिल भी नहीं रहा। बेहतर है कम आया करूं।*

तो शंकरलाल ने आना कम कर दिया। पहले रोज, फिर हर दूसरे दिन, फिर हफ्ते में दो-तीन बार, और अंत में... बस कभी-कभी। घर में सब्जियां अब मदनलाल जी खुद बाजार जाकर लाने लगे। लेकिन मदनलाल जी को मोलभाव करने की आदत नहीं थी, इसलिए सब्जियां थोड़ी महंगी आतीं। कभी 20-30 रुपये ज्यादा।

सवितादेवी को ये सब महसूस हो रहा था। वे किचन में खड़े-खड़े हिसाब लगातीं – आज टमाटर 80 के बजाय 100 में आए। कल भिंडी 60 के बजाय 90। वे चुपचाप देखतीं, लेकिन मन में कुछ चल रहा था।

सवितादेवी कंजूस स्वभाव की थीं – बहुत ज्यादा नहीं, लेकिन घर का हर पैसा सोच-समझकर खर्च करना उनकी आदत थी। वे सोचतीं,
*शंकरलाल पहले अच्छे दाम देता था। 10-20 रुपये कम में सब्जियां घर पहुंच जातीं। अब ये महंगाई... और मदनलाल जी को बाजार जाना पड़ता है, थक जाते हैं।*

एक शाम सवितादेवी अकेले बैठीं पूजा के बाद। मन में विचार आया। वे खुद से बोलीं,
*शंकरलाल बेचारा... उसकी बीवी को मरे 8-10 साल हो गए। अकेला आदमी है। बहू से थोड़ी-बहुत बात कर लेता है, तारीफ कर लेता है – इसमें क्या हर्ज है? काम्या भी तो समझदार है, वो कभी गलत नहीं होने देगी। और घर में सब्जियां सस्ती मिल जाएंगी। थोड़ी-सी बातचीत से क्या बिगड़ जाएगा?*

सवितादेवी का ये सोच अब बदल रहा था। पहले शक था, अब वो शक कम हो गया। वे सोचने लगीं कि शायद उन्होंने ज्यादा ही सोच लिया। शंकरलाल कोई बहुत बड़ा खतरा नहीं है – बस एक अकेला, बातूनी आदमी। और पैसे बचाना... घर की मालकिन होने के नाते उनका फर्ज है।

अगले दिन जब शंकरलाल फिर से आया (कई दिनों बाद), सवितादेवी ने खुद दरवाजा खोला। मुस्कुराकर बोलीं,

"अरे शंकर, कहाँ गायब हो गए थे? कई दिन से नहीं आए।"

शंकरलाल थोड़ा हैरान हुआ, लेकिन मुस्कुराया।

"जी बहन जी... बस काम ज्यादा था।"

सवितादेवी ने थैला लिया, पैसे दिए, और धीरे से कहा,

"अब से फिर रोज आया करो। मदनलाल जी को बाजार जाना मुश्किल हो रहा है। और हाँ... बहू से बात कर लेना, वो भी अकेली रहती है दिन भर। थोड़ी हंसी-मजाक हो जाएगी।"

शंकरलाल की आंखें चमक उठीं। उसने मन ही मन सोचा – *अब सासू माँ खुद कह रही हैं? वाह... मौका मिल गया।*

"जी बहन जी, जरूर। मैं रोज आऊंगा। बहू जी को भी अच्छा लगेगा।"

सवितादेवी ने बस सिर हिलाया और दरवाजा बंद किया। मन में संतुष्टि थी – *पैसे बचेंगे, घर में रौनक रहेगी, और कुछ नहीं बिगड़ेगा।*

लेकिन काम्या को जब पता चला कि सवितादेवी ने शंकरलाल को फिर से रोज आने को कहा है, तो उसका चेहरा पीला पड़ गया। वह समझ गई कि अब मुश्किल बढ़ने वाली है। सवितादेवी की कंजूसी और वो "थोड़ी-बहुत बातचीत" का बहाना... काम्या के लिए नई चुनौती बन गया।

काम्या ने मन में ठान लिया – *अब और ज्यादा सतर्क रहना पड़ेगा। मम्मी जी को समझ नहीं आ रहा कि खतरा कितना बड़ा है।*

(सवितादेवी की कार्रवाई ने कहानी को नया मोड़ दिया। अब शंकरलाल को फिर मौका मिल रहा है। अगला सीन – शंकरलाल की नई कोशिशें, काम्या की नई तरकीबें, या मदनलाल जी को कुछ पता चलना)
 

Speedy_rocket

Member
137
350
79
**कहानी: भाग 18 – मदनलाल जी का संदेह**

शंकरलाल का आना फिर से नियमित हो गया था। सुबह 7:30 बजे दरवाजे पर दस्तक, सवितादेवी मुस्कुराकर थैला लेतीं, थोड़ी बातें करतीं, और दरवाजा बंद। काम्या अब भी वही तरकीबें अपनाती – कभी सास को बुलाती, कभी खुद दरवाजे पर खड़ी रहती, लेकिन कभी भी ज्यादा बात नहीं करती। शंकरलाल की नजरें काम्या पर टिकतीं, लेकिन अब वो ज्यादा कोशिश नहीं करता – बस मुस्कुराता रहता और "बहू जी, नमस्ते" कहकर चला जाता।

मदनलाल जी को ये सब दिख रहा था। वे रिटायर्ड थे, दिन भर घर पर रहते, अखबार पढ़ते, लेकिन आँखें और कान हमेशा सक्रिय। वे देखते –

- शंकरलाल जब आता, तो उसकी नजरें दरवाजे के पीछे काम्या की तलाश में रहतीं।
- अगर काम्या दिख जाती, तो शंकरलाल की मुस्कान थोड़ी ज्यादा चौड़ी हो जाती। आँखें मिलाने की कोशिश करता, जैसे कोई पुराना राज हो।
- काम्या नजरें झुका लेती, या मुड़ जाती। कभी-कभी वो दरवाजे के पीछे छिपकर देखती कि शंकरलाल चला गया या नहीं।
- सवितादेवी अब खुद ज्यादा बात करतीं – "शंकर, आज क्या भाव है?", "बहू को अच्छी भिंडी देना" – और शंकरलाल हँसकर जवाब देता।

मदनलाल जी का मन में संदेह जागा। वे सोचते – *शंकर मेरा पुराना दोस्त है। बरसों से जानता हूँ। लेकिन... ये आँखें मिलाने की आदत... ये ज्यादा मुस्कुराना... ये बहू को देखने का तरीका... कुछ तो गड़बड़ है।*

एक सुबह मदनलाल जी खुद दरवाजा खोलने गए। शंकरलाल सामने खड़ा था।

"अरे मदनलाल जी! आज आप?"

"हाँ शंकर, आज मैं ले लूँगा।"

मदनलाल जी ने थैला लिया, पैसे दिए। शंकरलाल ने अंदर झाँका – काम्या किचन में थी, लेकिन दिख नहीं रही थी। शंकरलाल की आँखें एक पल रुकीं, फिर बोला,

"बहू जी कहाँ हैं? आज नहीं दिखीं।"

मदनलाल जी ने शांत लेकिन सख्त आवाज में कहा,

"अंदर हैं। काम में व्यस्त हैं।"

शंकरलाल हँसा,

"अच्छा-अच्छा। बस ऐसे ही पूछ लिया।"

मदनलाल जी ने दरवाजा बंद किया। मन में एक हल्की सी आग सुलग रही थी। वे सोच रहे थे – *शंकर मेरा दोस्त है, लेकिन दोस्ती की भी हद होती है। अगर वो बहू की तरफ गलत नजर से देख रहा है... तो ये बर्दाश्त नहीं होगा।*

लेकिन मदनलाल जी कुछ नहीं बोले। वे जानते थे कि सवितादेवी ने खुद शंकरलाल को फिर से आने को कहा है – पैसे बचाने के लिए। अगर वो अब कुछ कहेंगे, तो घर में बहस होगी। सवितादेवी कहेंगी, "तुम ज्यादा सोचते हो।" काम्या डर जाएगी। विकाश को पता चलेगा तो वो भी कुछ नहीं करेगा – बस "पापा, छोड़िए" कह देगा।

इसलिए मदनलाल जी चुप रहे। लेकिन अब उनकी नजरें और सख्त हो गईं। वे हर सुबह 7:30 बजे लिविंग रूम में बैठ जाते – अखबार हाथ में, लेकिन आँखें दरवाजे पर। जब शंकरलाल आता, तो वे खुद थैला लेते, या काम्या को अंदर रखते। कभी-कभी शंकरलाल से सीधे पूछते,

"शंकर, आजकल तू ज्यादा तारीफ करता है बहू की।"

शंकरलाल हँसकर टाल देता,

"अरे साहब, बहू अच्छी है तो तारीफ तो बनेगी।"

मदनलाल जी बस मुस्कुरा देते, लेकिन अंदर से फैसला कर चुके थे – *अगर एक बार भी हाथ बढ़ाया, या कोई गलत बात की... तो दोस्ती खत्म। और शंकरलाल को सबक सिखाऊंगा।*

काम्या को मदनलाल जी की ये चुप्पी और सतर्कता महसूस हो रही थी। उसे थोड़ा सुकून मिला – *पापाजी समझ रहे हैं।* लेकिन वो भी चुप थी। घर की शांति बनाए रखने के लिए।

सवितादेवी को अभी भी लगा कि सब ठीक है। लेकिन मदनलाल जी का संदेह अब एक शांत तूफान बन चुका था – जो बाहर से दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन अंदर से बढ़ रहा था।

(मदनलाल जी अब watchful हो चुके हैं। अगला सीन – शंकरलाल की कोई गलती, मदनलाल जी की कोई कार्रवाई, या काम्या-पापाजी के बीच कोई बातचीत)
 
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories
Top