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Thriller कातिल रात

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Nice update. 👍

अभी के लिए इतना ही कह सकता हूँ.

और निःसंदेह वो जिस किसी भी लाश थी, वो कभी तो किसी का कुछ न कुछ तो रहा ही होगा. सोच कर ही बुरा लग रहा है.
ज़रूरी नहीं की हर लाश रोमेश के केस के साथ जुड़ा हो.. पर, देखते हैं... आगे क्या होता है?

अगले अपडेट की प्रतीक्षा है. जल्दी लाना.
Thank you very much for your valuable review and support , agla Update jald hi :thanks:
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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रोमेश बाबु शायद बाल बाल बच गये.....

Qki अगर gourav ki लाश नहीं मिली तो ऐसा ना हो कि इस व्यक्ति को रोमेश की पिस्टल से मारा गया हो....
Ho to kuch bhi sakta hai bhai, hum kaha mana kar rahe hain :D
Thank you very much for your valuable review :thanks:
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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रिव्यू की शुरुआत की जाए

मैं हमेशा गलत रहूँ, यह हो नहीं सकता।
क्या कहा था मैंने कि कुमार गौरव किडनैप ही हुआ है, बस उससे ज़्यादा नहीं। ऐसे ही हमको लोग सलाम नहीं ठोकते,अब यहाँ होना यह है कि कुमार गौरव को उठवाया तो मेघना और अनामिका ने ही है, मुझे ऐसा लगता है।या फिर ऐसा शक पैदा करवाया जा रहा है।
यह नया लड़का आने का क्या मतलब रहा?

कुमार के कज़िन को भी लेकर आए हो, तो ऐसे तो नहीं लेकर आए होंगे।शायद कुछ न कुछ वजह रही होगी, कुछ होने वाला है।कहीं ऐसा तो नहीं कि कुमार को पारिवारिक जायदाद के लिए उसके कज़िन ने ही उठवा लिया हो।

अब आते हैं आगे।
मुझे एक विचार आया, मैंने नहीं सोचा था कि यह विचार मेरे दिमाग को हिला देगा, बहुत खतरनाक विचार था ,सोमया के पति के बारे में अभी यह बताया नहीं है ना कि उसका क्या हुआ।

अब देखो, जहाँ तक मुझे लगता है, उसका पति भी इसके पीछे होना चाहिए। क्योंकि रोमेश ने उसकी ज़िंदगी की जो वाट लगाई थी, उसी चीज़ का बदला लेने के लिए उसने मेघना और देविका से हाथ भी मिलाया है ,सोमया और रोमेश को बर्बाद करने का।

अब अगर मैं सोचूँ कि इस सब से गौरव का सोमया और राजीव से लिंक क्यों है,तो सिर्फ़ देविका वाला बदला ही वजह नहीं हो सकती।गौरव के पीछे इसमें सोमया और राजीव का कनेक्शन भी होगा।
क्योंकि बिज़नेस से जुड़े मुद्दे भी तो हुए थे।

देविका ने जो फ़ाइलों को इधर-उधर किया था,उसको लेकर राजीव को गौरव से इश्यू हो सकता है।एक और अहम बात पर गौर करना चाहिए ,सोमया और गौरव बिज़नेस प्रतिद्वंदी भी हैं।इसीलिए तो यह खेला हुआ था।

वैसे एक बार को मान लें कि गौरव ने सोमया की जासूसी कंपनी में करवाई थी,तो इस हिसाब से दोनों में टकराव दिखना चाहिए था।मतलब यहाँ आधा सच और आधा झूठ है।

अब मुझे भगवान सिंह पर शक की वजह अभी नहीं मिल रही है कि उसकी भी इसमें कोई हिस्सेदारी होगी।
इस अपडेट में हमें रोमेश की डिटेक्टिव स्किल की कुछ झलकें दिख गई हैं,साथ ही उसकी चतुराई भी। देवप्रिय को उसने मस्त हड़का दिया।

अब ये सीधे तौर पर रोमेश को दिक्कत नहीं दे सकता,
लेकिन हाँ जब पिस्टल फ़ॉरेंसिक में गई थी,
उस समय अगर कुछ छेड़छाड़ हुई हो तो कहा नहीं जा सकता।

Raj_sharma
Wash londe waah, khoob dimaak laga rahe ho, aur kaafi aas paas tak bhi pahuch gaye kuch jagah to:claps:
Ab kumar jinda hai ya mar gaya ye to samay hi btayega. Rahi baat uske bhai ke aane ki, to aadmi ka pariwar bhi to hota hai, aur ye jaruri to nahi ki agar wo aaya hai to uska koi lafda hi ho?:D
Maine somya ke pati Rajiv ke bare me bataya to tha ki wo jail me hai, and usko somya ne hi Romesh ki madad se Jail bhijwaya tha, to bilkul ye sambhav hai ki iske peeche wo bhi ho sakta hai :dazed:
Gaurav sach bol raha tha, ya devika sach bol rahi hai ye to samay hi batayega :D
Waise bhagwan singh per to abhi shak karna banta hi nahi hai, wo to naya depute hua hai, wo bhi sp ke bolne se. Ha devpriya jaroor shak karne layak tha.:approve:
Thank you very much for your amazing review and superb support bhai :hug:
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Bhut hi badhiya update Bhai
Chalo romesh babu ka devpriy se to picha chuta
Agar ye lash Kumar ki nahi hai to kiski hai
Aur kahi aesa na ho ki iska khun romesh babu ki pistol se huva ho
Kuch bhi ho sakta hai mitra, abhi kuch kaha nahi ja sakta, jab tak pistol 🔫 ki report nahi aa jaati, Romesh ke gale per fasi ka fanda jhoolta hi rahega :D Thanks for your valuable review and support bhai :hug:
 

Ajju Landwalia

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#11

लगभग आधे घँटे के बाद ही हम रोहिणी के थाने में पहुंच चुके थे।

थाने में घुसते ही हेल्प डेस्क पर बैठी हुई मैडम से मैंने देवप्रिय के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि देवप्रिय दूसरी मंजिल पर अपने कमरे में ही था।

मैं और रागिनी दो सीढिया एक साथ फर्लांगते हुए जल्दी से ऊपर पहुँचे।

देवप्रिय इस वक़्त अकेला ही अपनी कुर्सी पर अधलेटी अवस्था में अपने सामने एक और कुर्सी लगाकर उस पर अपने पांव टिकाए हुए छत की ओर घूरते हुए किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था।

जैसे ही हमने कमरे में कदम रखा उसका ध्यान भंग हुआ और उसकी नजर हम दोनों पर पड़ गई।

मुझ पर नजर पड़ते ही उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान ख़िल उठी।

"तुम्हारा इको सिस्टम तो बहुत मजबूत है बॉस, मुझे अपने केस से ही हटवा दिया, ताकि तुम जेल जाने से बच जाओ"

मेरे लिये ये खबर खुद नई थी, लेकिन तभी मेरे कान में शर्मा जी के वे शब्द गूंज उठे थे, जिसमे उन्होने बोला था कि मेरे थाने पहुंचने तक मेरे केस में सारा निजाम बदल चुका होगा।

अब मुस्कराने की और उसे उसका इको सिस्टम समझाने की बारी मेरी थी।

"जब सामने वाले का सामना किसी जंग खाये हुए सिस्टम से हो तो, फिर अपने इको सिस्टम का प्रयोग करना ही पड़ता हैं" मैने कुटिल स्वर में उसे बोला।

"कहना क्या चाहते हो, साफ साफ बोलो" देवप्रिय को मेरी बात समझ नही आई थी।

"तुम्हे कैसे पता कि तुम मुझे जेल ही भेजोगे, उन दोनों लड़कियों से मिलकर कौन सी खिचड़ी पका रहे हो, मुझे सब पता है, कल रात को मेरे घर से निकल कर वे दोनो लडकिया कहाँ गई थी, और आप कहाँ गए थे"

मैंने ऐसे ही अँधेरे में तीर छोड़ा। लेकिन मेरी बात सुनकर जिस प्रकार से सकपकाया था, उससे मुझें तीर निशाने पर लगने का एहसास हो गया था। मैंने तुरन्त उसे दूसरी चोट दी।

"जनाब! जासूस हूँ कोई घसियारा नही हूँ, नाम रोमेश है मेरा सबकी ख़बर रखता हूँ, और आप क्या समझते हो वो सजा-याफ्ता मुजरिम लडकिया आपसे वफादारी निभाएगी क्या, इसलिए उनके साथ मिलकर मुझे किसी झूठे केस में फंसाने की कोशिश करने से बाज आ जाओ, नही तो रोमेश इस प्लेटिनम का वो दसवां ग्रह है, जो अगर किसी की कुंडली में आकर बैठ गया न, तो उस इंसान की कुंडली के सारे ग्रह एक साथ उल्टी चाल चलने लगते है"

ये बोलकर मैं उसके कमरे में रुका नही, क्यो कि मै जानता था कि इस वक़्त उसके बस में बाकी कुछ था नही और अपनी पुलिसिया धौंस में वो बस मुझ पर झपट ही सकता था।

लेकिन मैं अभी इस पुलिसिये के साथ बात को ज्यादा नही बढ़ाना चाहता था, क्यो कि मै नही चाहता था, की एक पुलिसिये के चक्कर में थाने का पूरा स्टाफ ही मेरे खिलाफ हो जाये।

कुछ भी था, अभी गर्दन तो मेरी फंसी ही हुई थी। मैं वहां से निकल कर सीढियो से तेजी से उतरते हुए थाने के इंचार्ज माहेश्वरी साहब के कमरे में घुस चुका था।

इस वक़्त वो एक फ़ाइल में बड़ी गहराई से उलझे हुए थे। मुझ पर नजर पड़ते ही उन्होने अपने सामने पड़ी हुई कुर्सियों पर हमे बैठने का इशारा किया।

उनका इशारा मिलते ही मैं और रागिनी उन कुर्सियों पर विराजमान हो गए। माहेश्वरी साहब ने भी कुछ ही पलों में अपनी नजर फ़ाइल से हटा ली थी।

"अपने केस के सिलसिले में तुम भगवान सिंह से मिल लो, अब वो तुम्हारे उस पिस्टल की गुत्थी को सुलझाएंगे" माहेश्वरी साहब ने केस देवप्रिय से लेकर भगवान सिंह को दे दिया था।

"ठीक है सर! मैं मिल लेता हूँ भगवान सिंह से, और उन्हें पूरे केस के बारे में शुरू से अवगत करवा देता हूँ" मैंने कुर्सी से उठने का उपक्रम किया।

"एक बात का ध्यान रखो रोमेश! अगर तुम बेकसूर हो तो तुम्हारे साथ इस थाने का कोई भी स्टाफ गलत नही कर सकता, उसकी जिम्मेदारी मैं लेता हूँ, मुझें इस बात का इल्म है कि इस शहर में तुम्हारे धंधे की वजह से तुम्हारे दुश्मनों की कोई कमी नही होगी, और वे लोग तुम्हारे साथ कुछ गलत करने की भी फिराक में होंगे, लेकिन यकीन मानो हम तुम्हारी स्थिति को भी ध्यान में रखकर ही कोई कार्यवाही करेगे" माहेश्वरी साहब ने मुझें भरोसा दिया।

"ठीक है सर! मैं जानता हूँ कि आपके रहते हुए मेरे साथ कुछ भी गलत नही हो सकता है" मैं बोलते हुए अपनी सीट छोड़ चुका था।

"चलिये! उम्मीद है की अगली बार कोई शिकायत हुई तो पहले सीधा मेरे पास आओगे" ये बोलकर माहेश्वरी साहब ने मेरी ओर अपना हाथ बढ़ाया, जिसे मैंने तत्काल अपने हाथ से थामा और गर्मजोशी से हाथ मिलाकर वहां से रुखसत हो गया।

भगवान सिंह का कमरा नीचे ही थोड़ा सा अंदर जाकर था। जिस वक्त मैं उनके कमरे में पहुंचा, उस वक्त वे भी किसी केस की चार्जशीट तैयार करने में व्यस्त थे।

"आप ही भगवान सिंह है जनाब" मैंने जानते बुझते भी उनसे पूछा।

"मैं ही भगवान सिंह हूँ! आप कौन है" भगवान सिंह ने मेरे साथ साथ रागिनी पर भी नजर डालते हुए पूछा।

"जी मेरा नाम रोमेश है और माहेश्वरी जी ने मुझें आपके पास भेजा है" मैंने भगवान सिंह को पूरी इज्जत बख्शते हुए बोला।

"आजा भाई रोमेश बैठ जा, मैं तो कब से तुम्हारे आने का इंतजार कर रहा था" भगवान सिंह अब अपने हाथ के कागजों को एक तरफ रखकर मुझ से पूरी तरह से मुखातिब हो चुका था।

"जी आपसे ही मिलने के लिए आया हूँ" मैंने जवाब दिया।

"जितना मुझे हमारे साथी देव ने तुम्हारे केस के बारे में बताया है, उस हिसाब से तो आप पर अभी तो कोई केस बनता नही है, अब पिस्टल आपके घर से गुम हुई और आपके ही घर से बरामद हो गई, इस गुमशुदगी के पीरियड में अगर उस पिस्टल से कोई वारदात नही हुई है तो, तुम लंबी तानकर सोना, लेकिन भाई अगर कुछ गड़बड़ हो गई तो फिर पुलिस के सवालो के घेरे में तो तुम आ ही जाओगे" भगवान सिंह ने पूरी साफगोई से वही बोला, जो उसे बोलना चाहिये था।

"जी ये तो मैं भी जानता हूँ, लेकिन मेरी पिस्टल के गायब होने से लेकर उसके मेरे ही घर से बरामद होने तक में एक लड़की की संदिग्ध भूमिका है, उस लड़की के साथ एक लड़की और शामिल है, जिसे मैंने इसी थाने में एक केस में जेल भिजवाया था, उन दोनों लड़कियों ने मुझे फ़साने के लिए कोई साजिश रची, अगर उन दोनों लड़कियों से अच्छी तरह से पूछताछ हो जाये तो इस पूरे मामले से पर्दा उठ सकता है" मैने भगवान सिंह को बोला।

"उन लड़कियों से मैं मिल चुका हूँ, आपकी पिस्टल की एक बार फोरेंसिक रिपोर्ट आ जाये, और उस पिस्टल पर उनमे से किसी के भी फिंगरप्रिंट मिल जाये, मैं एक मिनट नही लगाऊंगा, उनको घर से उठाने में, अब सिर्फ शक की बिना पर भी मैं जब तक उन दोनों से कोई पूछताछ नही कर सकता, जब तक उस पिस्टल से की हुई कोई वारदात सांमने नही आ जाती" भगवान सिंह एक एक बात बहुत नाप तौल कर बोल रहा था।

मेरे पास अभी तक उसकी किसी भी बात से असहमत होने का कोई कारण नही था।

तभी दरवाजे से आती हुई एक आवाज ने मुझे चौंका दिया था। हम तीनों की निगाहें एक साथ ही दरवाजे की ओर उठी थी।

दरवाजे पर कुमार की माता जी एक दूसरे लड़के के साथ खड़ी होकर अंदर आने की इजाजत मांग रही थी।

उनको वहां देखते ही मेरा मन आशंकाओं के बादलों से घिर चुका था।

"आ जाइये मैडम" तब तक भगवान सिंह उन्हें अंदर आने के लिये बोल चुका था।

वे दोनो अंदर आकर हमारे बगल वाली कुर्सियों पर ही बैठ चुके थे। उन माताजी ने बैठते ही कुछ पलों तक मुझे और रागिनी को घूरा।

"तुम तो वही हो न बेटा जो आज दिन में मेरे बेटे गौरव को पूछने के लिए आये थे" माता जी ने मेरी तरफ देखते हुए बोला।

"हां माता जी! मैं वही हूँ! क्या हुआ अभी तक गौरव घर पर नही आया क्या" मैने आशंकित स्वर में पूछा।

"बेटा न तो उसका फोन ही मिल रहा है और न ही वो अपनी बवाना वाली फैक्ट्री में है, मैं तो उसी की रिपोर्ट लिखवाने आई हूँ" माता जी ने बोला।

"क्या माजरा है, तुम जानते हो इन्हें रोमेश साहब" भगवान सिंह ने मुझ से पूछा, जो अभी तक मूक दर्शक बना हुआ हमे देख रहा था।

मैंने इस बार कुमार के बारे में तसल्ली से भगवान सिंह को समझाया।

"ठीक है मैडम! आप अपने बेटे का एक फ़ोटो और उसका कहाँ और किन लोगों के साथ उठना बैठना है, वो सब एक पेपर पर लिख कर दीजिए, साथ में उनका मोबाइल नंबर भी दीजिये, मैं उसके फोन की लोकेशन ट्रेस करवाने की कोशिश करता हूँ" भगवान सिंह ने एक ही बार मे सब कुछ बोल दिया था।

"जी मै अभी आपको सब लिखकर दे देता हूँ, आप बस मेरे कजिन को जल्द से जल्द ढूंढ दीजिये" माता जी के साथ आये हुए उस किशोर उम्र के लड़के ने अधीर स्वर में बोला।

"चिंता मत करो बच्चे, हम तुम्हारे भाई को ढूंढने में जी जान लगा देंगे" भगवान सिंह ने उस लड़के को सांत्वना भरे स्वर में बोला।

तभी भगवान सिंह के फोन की घँटी बज उठी। भगवान सिंह ने फोन सुनते हुए ही अजीब सी नजरो से हम सभी की ओर देखा। उसके बाद उसने फोन रखते ही उस कमरे में धमाका कर दिया।

"एक युवक की लाश मिली है, आप सभी को मेरे साथ चलना होगा, उस युवक की शिनाख्त करने के लिये"

भगवान सिंह ने अचानक से बोला ही था कि कुर्सी पर बैठी हुई माता जी एकदम गश ख़ाकर कुर्सी से नीचे गिर पड़ी।

मै जल्दी से माता जी को सम्हालने के लिए झुका, तब तक भगवान सिंह भी माता जी को उठाने की कोशिश करने लगा था।

रागिनी भगवान सिंह की टेबल पर रखा हुआ पानी के जग को उठाकर उससे पानी के छींटे माता जी के चेहरे पर मारने लगी थी।

गुमशुदा गौरव :

कुमार की माता जी को, चेहरे पर पानी पड़ते ही तत्काल होश आ गया था, रागिनी ने उनका सिर अपनी गोद मे ले लिया था।

"मैं किसी महिला सिपाही की ड्यूटी इनकी देखभाल के लिए लगाता हूँ, बेटा तुम हमारे साथ चलना" भगवान सिंह ने माता जी के साथ आये हुए उस लड़के को बोला।

"आंटी जी आप घबराए मत! भगवान न करे कि कुमार के साथ कुछ बुरा हुआ हो, वो कोई और भी तो हो सकता है, आप सलामत रहिये" रागिनी ने माता जी को दिलासा देते हुए बोला।

माता जी होश में जरूर आ गई थी, किंतु अभी तक उनके मुंह से कोई आवाज नही निकली थी, वे बस सूनी आँखों से सभी को निहारे जा रही थी।

तभी भगवान सिंह ने एक महिला सिपाही के साथ कमरे में प्रवेश किया।

"संतोष! जब तक हम वापिस नही आ जाते, तब तक इन माता जी की देखभाल करना, और इनके लिए कुछ ठंडा वगेरह मंगवाकर इन्हें पिला देना, हम लोग एक कॉल पर जा रहे है" भगवान सिंह ने उन संतोष नाम की सिपाही को बोला।

"जी जनाब! आप बेफिक्र होकर जाइये, मैं मैडम का पूरा ध्यान रखूंगी" संतोष ने भगवान सिंह की बात का जवाब दिया।

उसके बाद हम सभी लोग जल्दी से उस जगह के लिए निकल गए जहां किसी युवक की लाश मिलने की कॉल भगवान सिंह के फोन पर आई थी।

कोई बीस मिनट के बाद हम लोग सेक्टर 28 के पास एक वीरान इलाके में पहुंचे थे।

इस एरिया में अभी लोगो की बसावट काफी कम थी। लेकिन यहां पर दिल्ली के वाहनों के लाइसेंस बनने की वजह से वाहनो की आवा जाही लगी रहती थी।

दूर से ही हमारी नजर एक जगह पर लोगो की भीड़ पर पड़ चुकी थी। भगवान सिंह ने अपनी गाड़ी को उसी भीड़ के पास जा कर रोका था।
हमने भी अपनी गाड़ी को भगवान सिंह की गाड़ी के पीछे ही पार्क किया और भगवान सिंह के साथ ही उस भीड़ की तरफ बढ़ गए।

भगवान सिंह के साथ थाने से चार कांसटेबल भी थे। पुलिस को देखते ही भीड़ ने अब तीतर बितर होना शुरू कर दिया था।

वो एक खाली प्लाट था, जिसमे काफी झाड़ झंखाड़ उग आए थे, ऐसी ही एक झाड़ियों के पीछे से एक युवक के दोनो पाँव बाहर की तरफ नजर आ रहे थे।

दिल की धड़कने सिर्फ गौरव के भाई की ही नही मेरी भी बड़ी हुई थी। अगर ये लाश गौरव की हुई तो अपनी भी व्हाट लगना निश्चित था।

लेकिन पाँव को जब मैंने गौर से देखा तो मुझे वे पाँव गौरव के डीलडौल से जुदा प्रतीत हुए।

लेकिन तब तक भगवान सिंह और उसके साथ एक कांस्टेबल उस लाश तक पहुंच चुके थे, बाकी कांस्टेबल वहां लगी हुई भीड़ की हटाने में मशगूल हो चुके थे।

मै और रागिनी गौरव के भाई का हाथ पकड़े हुए लाश के नजदीक पहुंचे। लाश को देखते ही वो लड़का मुझ से लिपट गया।

"ये गौरव भैया नही हैं"उसने लिपटे हुए इतना ही बोला था, उसकी दोबारा से उस लाश को देखने की हिम्मत नही हो रही थी।

मैने भी उस लाश को देखकर भले ही ये सोचकर राहत की सांस ली थी कि ये गौरव की लाश नही है, लेकिन उस लाश को देखकर भी मन मे एक अफसोस तो उभरा था, क्यो कि कोई तो था, जिसे इस बेरहमी से मारा गया था।


जारी रहेगा_____✍️

Bahut hi shandar update he Raj_sharma Bhai,

Devpriya to case se hata diya gaya he, jaisa ki ACP sharma ne kha tha..........

Pistol ki forensic report abhi aani baaki he, sara case abhi yahi par atka he.........

Ab ye kumar gaurav bhi lapta ho gaya he........

Shukra he lash kumar ki nahi thi varna romesh ke L lagne pakke the..........

Keep rocking Bro
 

Raj_sharma

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Bahut hi shandar update he Raj_sharma Bhai,

Devpriya to case se hata diya gaya he, jaisa ki ACP sharma ne kha tha..........

Pistol ki forensic report abhi aani baaki he, sara case abhi yahi par atka he.........

Ab ye kumar gaurav bhi lapta ho gaya he........

Shukra he lash kumar ki nahi thi varna romesh ke L lagne pakke the..........

Keep rocking Bro
Bas pech khulne ko hi hai pistol ka, rahi baat kumar ki to wo lash to kisi or ki nikli, to ab dekhne wali baat ye hai ki kumaar ka kya hua, kya wo jinda hai ya mar gaya? Agar mar gaya to kaise mara? Aur agar jinda hai to kaha hai? Anyways thanks for your wonderful review and support bhai :hug:
 

DEVIL MAXIMUM

"सर्वेभ्यः सर्वभावेभ्यः सर्वात्मना नमः।"
Prime
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लगभग आधे घँटे के बाद ही हम रोहिणी के थाने में पहुंच चुके थे।

थाने में घुसते ही हेल्प डेस्क पर बैठी हुई मैडम से मैंने देवप्रिय के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि देवप्रिय दूसरी मंजिल पर अपने कमरे में ही था।

मैं और रागिनी दो सीढिया एक साथ फर्लांगते हुए जल्दी से ऊपर पहुँचे।

देवप्रिय इस वक़्त अकेला ही अपनी कुर्सी पर अधलेटी अवस्था में अपने सामने एक और कुर्सी लगाकर उस पर अपने पांव टिकाए हुए छत की ओर घूरते हुए किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था।

जैसे ही हमने कमरे में कदम रखा उसका ध्यान भंग हुआ और उसकी नजर हम दोनों पर पड़ गई।

मुझ पर नजर पड़ते ही उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान ख़िल उठी।

"तुम्हारा इको सिस्टम तो बहुत मजबूत है बॉस, मुझे अपने केस से ही हटवा दिया, ताकि तुम जेल जाने से बच जाओ"

मेरे लिये ये खबर खुद नई थी, लेकिन तभी मेरे कान में शर्मा जी के वे शब्द गूंज उठे थे, जिसमे उन्होने बोला था कि मेरे थाने पहुंचने तक मेरे केस में सारा निजाम बदल चुका होगा।

अब मुस्कराने की और उसे उसका इको सिस्टम समझाने की बारी मेरी थी।

"जब सामने वाले का सामना किसी जंग खाये हुए सिस्टम से हो तो, फिर अपने इको सिस्टम का प्रयोग करना ही पड़ता हैं" मैने कुटिल स्वर में उसे बोला।

"कहना क्या चाहते हो, साफ साफ बोलो" देवप्रिय को मेरी बात समझ नही आई थी।

"तुम्हे कैसे पता कि तुम मुझे जेल ही भेजोगे, उन दोनों लड़कियों से मिलकर कौन सी खिचड़ी पका रहे हो, मुझे सब पता है, कल रात को मेरे घर से निकल कर वे दोनो लडकिया कहाँ गई थी, और आप कहाँ गए थे"

मैंने ऐसे ही अँधेरे में तीर छोड़ा। लेकिन मेरी बात सुनकर जिस प्रकार से सकपकाया था, उससे मुझें तीर निशाने पर लगने का एहसास हो गया था। मैंने तुरन्त उसे दूसरी चोट दी।

"जनाब! जासूस हूँ कोई घसियारा नही हूँ, नाम रोमेश है मेरा सबकी ख़बर रखता हूँ, और आप क्या समझते हो वो सजा-याफ्ता मुजरिम लडकिया आपसे वफादारी निभाएगी क्या, इसलिए उनके साथ मिलकर मुझे किसी झूठे केस में फंसाने की कोशिश करने से बाज आ जाओ, नही तो रोमेश इस प्लेटिनम का वो दसवां ग्रह है, जो अगर किसी की कुंडली में आकर बैठ गया न, तो उस इंसान की कुंडली के सारे ग्रह एक साथ उल्टी चाल चलने लगते है"

ये बोलकर मैं उसके कमरे में रुका नही, क्यो कि मै जानता था कि इस वक़्त उसके बस में बाकी कुछ था नही और अपनी पुलिसिया धौंस में वो बस मुझ पर झपट ही सकता था।

लेकिन मैं अभी इस पुलिसिये के साथ बात को ज्यादा नही बढ़ाना चाहता था, क्यो कि मै नही चाहता था, की एक पुलिसिये के चक्कर में थाने का पूरा स्टाफ ही मेरे खिलाफ हो जाये।

कुछ भी था, अभी गर्दन तो मेरी फंसी ही हुई थी। मैं वहां से निकल कर सीढियो से तेजी से उतरते हुए थाने के इंचार्ज माहेश्वरी साहब के कमरे में घुस चुका था।

इस वक़्त वो एक फ़ाइल में बड़ी गहराई से उलझे हुए थे। मुझ पर नजर पड़ते ही उन्होने अपने सामने पड़ी हुई कुर्सियों पर हमे बैठने का इशारा किया।

उनका इशारा मिलते ही मैं और रागिनी उन कुर्सियों पर विराजमान हो गए। माहेश्वरी साहब ने भी कुछ ही पलों में अपनी नजर फ़ाइल से हटा ली थी।

"अपने केस के सिलसिले में तुम भगवान सिंह से मिल लो, अब वो तुम्हारे उस पिस्टल की गुत्थी को सुलझाएंगे" माहेश्वरी साहब ने केस देवप्रिय से लेकर भगवान सिंह को दे दिया था।

"ठीक है सर! मैं मिल लेता हूँ भगवान सिंह से, और उन्हें पूरे केस के बारे में शुरू से अवगत करवा देता हूँ" मैंने कुर्सी से उठने का उपक्रम किया।

"एक बात का ध्यान रखो रोमेश! अगर तुम बेकसूर हो तो तुम्हारे साथ इस थाने का कोई भी स्टाफ गलत नही कर सकता, उसकी जिम्मेदारी मैं लेता हूँ, मुझें इस बात का इल्म है कि इस शहर में तुम्हारे धंधे की वजह से तुम्हारे दुश्मनों की कोई कमी नही होगी, और वे लोग तुम्हारे साथ कुछ गलत करने की भी फिराक में होंगे, लेकिन यकीन मानो हम तुम्हारी स्थिति को भी ध्यान में रखकर ही कोई कार्यवाही करेगे" माहेश्वरी साहब ने मुझें भरोसा दिया।

"ठीक है सर! मैं जानता हूँ कि आपके रहते हुए मेरे साथ कुछ भी गलत नही हो सकता है" मैं बोलते हुए अपनी सीट छोड़ चुका था।

"चलिये! उम्मीद है की अगली बार कोई शिकायत हुई तो पहले सीधा मेरे पास आओगे" ये बोलकर माहेश्वरी साहब ने मेरी ओर अपना हाथ बढ़ाया, जिसे मैंने तत्काल अपने हाथ से थामा और गर्मजोशी से हाथ मिलाकर वहां से रुखसत हो गया।

भगवान सिंह का कमरा नीचे ही थोड़ा सा अंदर जाकर था। जिस वक्त मैं उनके कमरे में पहुंचा, उस वक्त वे भी किसी केस की चार्जशीट तैयार करने में व्यस्त थे।

"आप ही भगवान सिंह है जनाब" मैंने जानते बुझते भी उनसे पूछा।

"मैं ही भगवान सिंह हूँ! आप कौन है" भगवान सिंह ने मेरे साथ साथ रागिनी पर भी नजर डालते हुए पूछा।

"जी मेरा नाम रोमेश है और माहेश्वरी जी ने मुझें आपके पास भेजा है" मैंने भगवान सिंह को पूरी इज्जत बख्शते हुए बोला।

"आजा भाई रोमेश बैठ जा, मैं तो कब से तुम्हारे आने का इंतजार कर रहा था" भगवान सिंह अब अपने हाथ के कागजों को एक तरफ रखकर मुझ से पूरी तरह से मुखातिब हो चुका था।

"जी आपसे ही मिलने के लिए आया हूँ" मैंने जवाब दिया।

"जितना मुझे हमारे साथी देव ने तुम्हारे केस के बारे में बताया है, उस हिसाब से तो आप पर अभी तो कोई केस बनता नही है, अब पिस्टल आपके घर से गुम हुई और आपके ही घर से बरामद हो गई, इस गुमशुदगी के पीरियड में अगर उस पिस्टल से कोई वारदात नही हुई है तो, तुम लंबी तानकर सोना, लेकिन भाई अगर कुछ गड़बड़ हो गई तो फिर पुलिस के सवालो के घेरे में तो तुम आ ही जाओगे" भगवान सिंह ने पूरी साफगोई से वही बोला, जो उसे बोलना चाहिये था।

"जी ये तो मैं भी जानता हूँ, लेकिन मेरी पिस्टल के गायब होने से लेकर उसके मेरे ही घर से बरामद होने तक में एक लड़की की संदिग्ध भूमिका है, उस लड़की के साथ एक लड़की और शामिल है, जिसे मैंने इसी थाने में एक केस में जेल भिजवाया था, उन दोनों लड़कियों ने मुझे फ़साने के लिए कोई साजिश रची, अगर उन दोनों लड़कियों से अच्छी तरह से पूछताछ हो जाये तो इस पूरे मामले से पर्दा उठ सकता है" मैने भगवान सिंह को बोला।

"उन लड़कियों से मैं मिल चुका हूँ, आपकी पिस्टल की एक बार फोरेंसिक रिपोर्ट आ जाये, और उस पिस्टल पर उनमे से किसी के भी फिंगरप्रिंट मिल जाये, मैं एक मिनट नही लगाऊंगा, उनको घर से उठाने में, अब सिर्फ शक की बिना पर भी मैं जब तक उन दोनों से कोई पूछताछ नही कर सकता, जब तक उस पिस्टल से की हुई कोई वारदात सांमने नही आ जाती" भगवान सिंह एक एक बात बहुत नाप तौल कर बोल रहा था।

मेरे पास अभी तक उसकी किसी भी बात से असहमत होने का कोई कारण नही था।

तभी दरवाजे से आती हुई एक आवाज ने मुझे चौंका दिया था। हम तीनों की निगाहें एक साथ ही दरवाजे की ओर उठी थी।

दरवाजे पर कुमार की माता जी एक दूसरे लड़के के साथ खड़ी होकर अंदर आने की इजाजत मांग रही थी।

उनको वहां देखते ही मेरा मन आशंकाओं के बादलों से घिर चुका था।

"आ जाइये मैडम" तब तक भगवान सिंह उन्हें अंदर आने के लिये बोल चुका था।

वे दोनो अंदर आकर हमारे बगल वाली कुर्सियों पर ही बैठ चुके थे। उन माताजी ने बैठते ही कुछ पलों तक मुझे और रागिनी को घूरा।

"तुम तो वही हो न बेटा जो आज दिन में मेरे बेटे गौरव को पूछने के लिए आये थे" माता जी ने मेरी तरफ देखते हुए बोला।

"हां माता जी! मैं वही हूँ! क्या हुआ अभी तक गौरव घर पर नही आया क्या" मैने आशंकित स्वर में पूछा।

"बेटा न तो उसका फोन ही मिल रहा है और न ही वो अपनी बवाना वाली फैक्ट्री में है, मैं तो उसी की रिपोर्ट लिखवाने आई हूँ" माता जी ने बोला।

"क्या माजरा है, तुम जानते हो इन्हें रोमेश साहब" भगवान सिंह ने मुझ से पूछा, जो अभी तक मूक दर्शक बना हुआ हमे देख रहा था।

मैंने इस बार कुमार के बारे में तसल्ली से भगवान सिंह को समझाया।

"ठीक है मैडम! आप अपने बेटे का एक फ़ोटो और उसका कहाँ और किन लोगों के साथ उठना बैठना है, वो सब एक पेपर पर लिख कर दीजिए, साथ में उनका मोबाइल नंबर भी दीजिये, मैं उसके फोन की लोकेशन ट्रेस करवाने की कोशिश करता हूँ" भगवान सिंह ने एक ही बार मे सब कुछ बोल दिया था।

"जी मै अभी आपको सब लिखकर दे देता हूँ, आप बस मेरे कजिन को जल्द से जल्द ढूंढ दीजिये" माता जी के साथ आये हुए उस किशोर उम्र के लड़के ने अधीर स्वर में बोला।

"चिंता मत करो बच्चे, हम तुम्हारे भाई को ढूंढने में जी जान लगा देंगे" भगवान सिंह ने उस लड़के को सांत्वना भरे स्वर में बोला।

तभी भगवान सिंह के फोन की घँटी बज उठी। भगवान सिंह ने फोन सुनते हुए ही अजीब सी नजरो से हम सभी की ओर देखा। उसके बाद उसने फोन रखते ही उस कमरे में धमाका कर दिया।

"एक युवक की लाश मिली है, आप सभी को मेरे साथ चलना होगा, उस युवक की शिनाख्त करने के लिये"

भगवान सिंह ने अचानक से बोला ही था कि कुर्सी पर बैठी हुई माता जी एकदम गश ख़ाकर कुर्सी से नीचे गिर पड़ी।

मै जल्दी से माता जी को सम्हालने के लिए झुका, तब तक भगवान सिंह भी माता जी को उठाने की कोशिश करने लगा था।

रागिनी भगवान सिंह की टेबल पर रखा हुआ पानी के जग को उठाकर उससे पानी के छींटे माता जी के चेहरे पर मारने लगी थी।

गुमशुदा गौरव :

कुमार की माता जी को, चेहरे पर पानी पड़ते ही तत्काल होश आ गया था, रागिनी ने उनका सिर अपनी गोद मे ले लिया था।

"मैं किसी महिला सिपाही की ड्यूटी इनकी देखभाल के लिए लगाता हूँ, बेटा तुम हमारे साथ चलना" भगवान सिंह ने माता जी के साथ आये हुए उस लड़के को बोला।

"आंटी जी आप घबराए मत! भगवान न करे कि कुमार के साथ कुछ बुरा हुआ हो, वो कोई और भी तो हो सकता है, आप सलामत रहिये" रागिनी ने माता जी को दिलासा देते हुए बोला।

माता जी होश में जरूर आ गई थी, किंतु अभी तक उनके मुंह से कोई आवाज नही निकली थी, वे बस सूनी आँखों से सभी को निहारे जा रही थी।

तभी भगवान सिंह ने एक महिला सिपाही के साथ कमरे में प्रवेश किया।

"संतोष! जब तक हम वापिस नही आ जाते, तब तक इन माता जी की देखभाल करना, और इनके लिए कुछ ठंडा वगेरह मंगवाकर इन्हें पिला देना, हम लोग एक कॉल पर जा रहे है" भगवान सिंह ने उन संतोष नाम की सिपाही को बोला।

"जी जनाब! आप बेफिक्र होकर जाइये, मैं मैडम का पूरा ध्यान रखूंगी" संतोष ने भगवान सिंह की बात का जवाब दिया।

उसके बाद हम सभी लोग जल्दी से उस जगह के लिए निकल गए जहां किसी युवक की लाश मिलने की कॉल भगवान सिंह के फोन पर आई थी।

कोई बीस मिनट के बाद हम लोग सेक्टर 28 के पास एक वीरान इलाके में पहुंचे थे।

इस एरिया में अभी लोगो की बसावट काफी कम थी। लेकिन यहां पर दिल्ली के वाहनों के लाइसेंस बनने की वजह से वाहनो की आवा जाही लगी रहती थी।

दूर से ही हमारी नजर एक जगह पर लोगो की भीड़ पर पड़ चुकी थी। भगवान सिंह ने अपनी गाड़ी को उसी भीड़ के पास जा कर रोका था।
हमने भी अपनी गाड़ी को भगवान सिंह की गाड़ी के पीछे ही पार्क किया और भगवान सिंह के साथ ही उस भीड़ की तरफ बढ़ गए।

भगवान सिंह के साथ थाने से चार कांसटेबल भी थे। पुलिस को देखते ही भीड़ ने अब तीतर बितर होना शुरू कर दिया था।

वो एक खाली प्लाट था, जिसमे काफी झाड़ झंखाड़ उग आए थे, ऐसी ही एक झाड़ियों के पीछे से एक युवक के दोनो पाँव बाहर की तरफ नजर आ रहे थे।

दिल की धड़कने सिर्फ गौरव के भाई की ही नही मेरी भी बड़ी हुई थी। अगर ये लाश गौरव की हुई तो अपनी भी व्हाट लगना निश्चित था।

लेकिन पाँव को जब मैंने गौर से देखा तो मुझे वे पाँव गौरव के डीलडौल से जुदा प्रतीत हुए।

लेकिन तब तक भगवान सिंह और उसके साथ एक कांस्टेबल उस लाश तक पहुंच चुके थे, बाकी कांस्टेबल वहां लगी हुई भीड़ की हटाने में मशगूल हो चुके थे।

मै और रागिनी गौरव के भाई का हाथ पकड़े हुए लाश के नजदीक पहुंचे। लाश को देखते ही वो लड़का मुझ से लिपट गया।

"ये गौरव भैया नही हैं"उसने लिपटे हुए इतना ही बोला था, उसकी दोबारा से उस लाश को देखने की हिम्मत नही हो रही थी।

मैने भी उस लाश को देखकर भले ही ये सोचकर राहत की सांस ली थी कि ये गौरव की लाश नही है, लेकिन उस लाश को देखकर भी मन मे एक अफसोस तो उभरा था, क्यो कि कोई तो था, जिसे इस बेरहमी से मारा गया था।


जारी रहेगा_____✍️
Bechara Devpriy ke hathon se khel poori tarah se nikal chuka hai ab to
.
Lekin ab ye lash jise dekh ke sabko andaja ho gya ki ye Gaurav ki nahi hai to kisko ho sakti hai or Gaurav kaha hai is waqt
 
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