Ajju Landwalia
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#10
"तुम मेरी बात सुन रही हो न" मैने जब काफी देर तक सौम्या की कोई आवाज नही आई तो पूछा।
"मैं सुन रही हूँ! तुम मुझे पूरी बात बताओ" सौम्या ने बोला तो मैं उसे कल शाम को उसके आफिस से निकलने के बाद से कल रात तक का पूरा वाक्या बताता चला गया।
"दो दिन से मेरे मोबाइल पर अनजान नंबर से काल तो आ रही थी, लेकिन मैंने रिसीव नही किये थे, आफिस के फोन पर जब फोन आया होगा तो शायद मैं उस समय आफिस में नही होउंगी" सौम्या ने मेरी पूरी बात सुनने के बाद बोला।
"वैसे मेरी सलाह है कि मेघना या देविका तुम से मिलने की कोशिश करे तो उनसे मिलना मत, और तुम्हारी सिक्युरिटी की क्या व्यवस्था है" मैने आखिर में सौम्या से पूछा।
"चार बाउंसर रहते है मेरे साथ, जिनमे से दो के पास पिस्टल भी होती है" सौम्या ने मुझे बताया।
"उन लोगो को अलर्ट पर रखना ,इस वक़्त तुम्हारी सुरक्षा में कोई चूक नही होनी चाहिए"मैने सौम्या को चेताया।
"आज एक बार तुम भी मेरे पास आ जाओ, मुझे देविका के बारे में और भी कुछ बात करनी है" सौम्या ने मुझे बोला तो मैंने शाम के समय आने की हामी भरके फोन को काट दिया।
मैने फोन काटते ही फोन को एक तरफ उछाला और सुबह के नित्यकर्म से निर्वित होने के लिए
बाथरूम की ओर बढ़ा ही था कि फोन एक बार फिर से बज उठा था।
फोन थाने से देवप्रिय का था।
"ग्यारह बजे तक थाने आ जाओ, वो दोनो लडकिया भी तब तक थाने पहुंच जाएगी" देवप्रिय ने आदेशात्मक स्वर में बोला।
"जो आज्ञा जनाब, बन्दा समय पर हाजिर हो जायेगा" मैंने देवप्रिय को बोला।
"रागिनी मैडम को साथ लेकर आना, वो भी कल रात की घटना की चश्मदीद है" देवप्रिय ने फिर से बोला।
"जी वो भी आ रही है, उसे मैने सुबह ही फोन कर दिया था।
"ठीक है" ये बोलकर उसने फोन काल की इति श्री कर दी।
इस बार मैंने कुछ पल फोन को घूरा,..मुझे अंदेशा था की कहीं बाथरूम की तरफ जाते हुए इसका पुलिस सायरन फिर से न बज उठे।
लेकिन जब फोन खामोशी से मेरा मुंह चिढ़ाता रहा तो मैंने फोन को अपने बिस्तर में उछाला बाथरूम में घुस गया।
घँटे भर के भीतर ही बन्दा चकाचक हो कर खुद को शीशे में निहार रहा था। तभी दरवाजे की बेल बजी, मैने घड़ी की ओर देखा।
ये वक़्त रागिनी के आने का था। मैने जाकर दरवाजा खोला तो रागिनी अपनी क़ातिल मुस्कान बिखेरती हुई मेरी ओर ही देख रही थी।
"आ गई हुजूरे आला" मैंने रागिनी के सम्मान में अपने सिर को हल्का सा नवाते हुए बोला।
"आप बुलाये और हम न आये,ऐसी गुस्ताखी करके कम से कम मै अपनी सैलरी तो खतरे में नही डाल सकती हूँ" रागिनी की आते ही बकलोली शुरू हो चुकी थी।
"अच्छा किस महीने तेरी सैलरी नही मिली" मैने दिखावटी गुस्से में बोला।
"वो तो मैं कही से कोई भी पेमेंट आती है, तो अपनी सैलरी पहले ही काट कर बाकी पेमेंट तुम्हे देती हूँ, नही तो हर महीने ही मेरी सैलरी नही आती" रागिनी ने मुझे चिढ़ाने वाले अंदाज में बोला।
"ये तुम बोल रही हो" मैने आहत निग़ाहों से उसकी और देखा।
मेरे इस तरह बोलने से रागिनी ने शरारती नजरो से मेरी ओर देखा।
"मैं तो तुम्हे अपनी कंपनी के साथ साथ अपने घर की भी मालकिन बनाने की सोच रहा था" मैने उसकी शरारती मुस्कान को देखकर बोला।
"क्यो दुनिया से सन्यास लेकर क्या हिमालय पर जाना है तपस्या करने, जो सब कुछ मेरे नाम करके जाना चाहते हो" रागिनी ने ना समझ बनते हुए बोला।
"घर की मालकिन कोई तभी बनता है क्या, जब कोई अपना घर किसी के नाम करके सन्यासी बन जाता है" मैने हल्के से खीज भरे स्वर में बोला। मै जानता था कि वो इस वक़्त मेरे मजे ले रही है, लेकिन मैं भी कुछ सोचकर उसे मजे लेने देने रहा था।
"हाँ! मैने तो यही सुना है कि घर के मालिक तो ऐसे ही बनते है" रागिनी ने मुस्करा कर बोला।
"एक तरीका और है घर की मालकिन बनने का" इस बार मैं भी जवाब में मुस्कराया।
"अच्छा बताओ फिर, और कौन सा तरीका है" रागिनी ने मुझे तकते हुए पूछा।
"लड़की शादी करके भी किसी के घर की मालकिन बन सकती है" मैने मुस्कराते हुए बोला।
"हाये दैया! तो तुम इस रास्ते से चलती गाड़ी में चढ़ने की कोशिश कर रहे हो" रागिनी ने अचानक से अपने तेवर बदलते हुए बोला।
"क्या मतलब" मैं उसकी प्रतिक्रिया से बौखला सा गया था।
"मतलब ये की माना कि सुबह उठकर आज तुम नहा लिए हो, लेकिन अभी भी चेहरे पर वो चमक नही आई कि रागिनी दौड़कर तुम्हारे गले मे वरमाला डाल दे, चाहो तो एक बार फिर से शीशे में अपने चेहरे की चमक को चेक कर लो"
रागिनी की बात सुनकर मैं न रोने में था न हँसने में, एक तरीके से वो घुमा फिरा कर बोल रही थी, की जाकर अपनी शक्ल आईने में देखकर आओ, ये मुंह और मसूर की दाल, खैर इस हालात पर कहावतें तो ढेर सारी याद आ रही थी, लेकिन हर कहावत को याद करके खुद पर ही जूते पड़ते हुए महसूस होते।
"बेटा कुंवारी ही रहेगी पूरी उम्र, जिसने रोमेश की कद्र नही की उसकी कद्र कभी इस जमाने ने भी की" मैने झल्ला कर बोला तो रागिनी खिलखिला कर हँस पड़ी।
"मेरे बैग में से नाश्ता निकालो! मैं भी करके नही आई हूँ! इतने मैं कॉफ़ी बना कर ला हूँ" ये बोलकर वो बकलोल बिना मेरी तरफ देखे ही किचन में घुस गई।
मै नाश्ते की बात सुनकर मुस्करा दिया था। जो बात मैं सुबह उसे फोन पर नही कह सका था, वो इच्छा उसने बिना बोले ही पूरी कर दी थी।
*********
मैं इस वक़्त कुमार गौरव के फ्लैट की घँटी बजा रहा था। दरवाजा कोई पांच मिनट के बाद एक लगभग पचपन साल की महिला ने खोला।
जो कि अपनी सूरत से ही बता रही थी कि वे कुमार की माता जी है! असली कुमार गौरव की जबरा फैन। उन्होंने दरवाजा खोलते ही हमारी और सवालिया निगाहों से देखा।
"कुमार साहब से मिलना था" उनके कुछ पूछने से पहले ही मैं बोल पड़ा था।
"वो तो बेटा कल से घर पर नही लौटा है, अपनी बवाना वाली फैक्ट्री में गया था,अक्सर जब काम ज्यादा होता है तो रात को वही रुक जाता है" कुमार की माता जी ने एक ही बार मे पूरी कैफियत दे डाली थी।
"कल से आपकी उनकी फोन पर कोई बात हुई है" मैने साधारण भाव से पूछा।
"बेटा बात तो नही हुई उससे, एक बार रात को मैंने फोन भी किया था, लेकिन उस वक़्त फोन स्विच ऑफ आ रहा था" माताजी ने उसी साधारण भाव मे जवाब दिया।
"ठीक है माताजी! अगर कुमार साहब आये तो उन्हें बोलना की वो एक बार रोमेश को फोन कर ले" ये बोलकर मैं उन्हें नमस्कार करके उनके दरवाजे से रुखसत होकर अपनी गाड़ी में जाकर बैठ गया।
जैसे ही रागिनी गाड़ी में सवार हुई, मैने कुमार का नंबर अपने मोबाइल से मिला दिया। फोन इस वक़्त आउट ऑफ कवरेज एरिया बता रहा था। मैने एक बार रागिनी की ओर देखा। रागिनी के चेहरे पर भी इस वक़्त कई सवालों की रेखाएं देखी जा सकती थी।
"कुमार के साथ कुछ गलत न हुआ हो" रागिनी के मुंह से बरबस ही निकला।
"शायद वही हो रहा है जो हम लोग सोच रहे थे" मैंने हल्की सी चिंता भरे स्वर में बोला।
"शायद उससे भी कुछ ज्यादा बड़ा होने वाला है" रागिनी मेरी तरफ देखकर बोली।
"चलो थाने चलते है, देवप्रिय से भी मिलना है" मैने रागिनी की ओर देखते हुए बोला।
"नही! मेघना और देविका ने देवप्रिय के साथ मिलकर ये जाल बुना है, थाने जाने से पहले हमें शर्मा जी को एक बार पूरी बात बता देनी चाहिए, और शर्मा जी से बात करने के बाद हमे सबसे पहले कुमार को ढूंढना होगा" रागिनी ने अपने दिमाग के सारे घोड़े खोल दिये थे।
"दिमाग तो आला दर्जे का लगाया है इन दोनों कुड़ियो ने, लेकिन वो भूल गए कि उनका पाला रोमेश से पड़ा है"
मेरी बात सुनकर रागिनी ने अपना गला खंखारा। मानो कह रही हो कि सिर्फ तुम ही तुम नही हो, हम भी साथ मे है, पाला हमसे भी पड़ा है।
मै उसकी इस अदा को देखकर हल्का सा मुस्करा दिया।
मैने उसी समय एसी पी निरंजन शर्मा का नम्बर अपने फोन से डायल कर दिया।
तभी काल वेटिंग में देवप्रिय का नंबर भी चमकने लगा था। लेकिन तभी शर्मा जी ने मेरा फोन रिसीव कर लिया था।
"कहो रोमेश कैसे याद किया" शर्मा जी ने आत्मीयता भरें स्वर में पूछा।
"आपकी रहमुनाई की जरूरत पड़ गयी है जनाब, आपसे मिलना है, बहुत जरुरी" मैने शर्मा जी को बोला।
"मिलना है तो आ जाओ, अब तुम्हारे इलाके में ही आ गया हूँ, यही पुलिस लाइन में आ जाओ, मैं शाम तक यही हूँ" शर्मा जी ने मुझे बोला।
"जी जनाब मैं कुछ देर में हाजिर होता हूँ" ये बोलकर मैने फोन काटा ही था कि देवप्रिय का फ़ोन नंबर फिर से चमक उठा। इस बार मैंने फोन उठाने में कोई कोताही नही की।
"तुम्हे ग्यारह बजे आने को बोला था, तुम अभी तक आये नही, और फोन भी नही उठा रहे हो" उसने गुस्से भरे स्वर में बोला।
"जिस वक्त आपका फोन कॉल वेटिंग में बज रहा था, इस समय आपके हाकिम एसी पी निरंजन शर्मा का फोन आया हुआ था, उन्हें मुझ से कोई जरूरी काम है, इसलिए अभी मुझें शर्मा जी के पास पुलिस लाइंस जाना पड़ रहा है, वहां से फ्री होते ही आपके दरबार मे हाजिर होता हूँ" मैंने जान बूझकर शर्मा जी का नाम उसके सामने लिया था।
"ठीक है यार! जैसे ही वहाँ से फ्री होते हो, सीधा मेरे पास ही आना" देवप्रिय के तेवर एक दम से किसी झाग की मानिंद बैठ चुके थे।
"बिल्कुल हाजिर होता हूँ जनाब! तब तक आप उन दोनों दस्यु सुंदरियों के साथ चाय कॉफी का शगन मेला करो" ये बोलकर मैने फोन काट दिया।
मैंने देखा कि रागिनी मेरी तरफ ही देखकर मन्द मन्द मुस्करा रही थी।
देवप्रिय की छुट्टी:
पुलिस लाइन पहुंचने में हमे कोई आधा घन्टा लगा था। वजह थी सुबह मिलने वाला ट्रैफिक जाम, जो अब दिल्ली की सड़कों पर हमेशा ही मिलने लगा था।
एसी पी निरंजन शर्मा जी ने मेरे पहुंचते ही अपने कक्ष में मुझें बुलवा लिया था।
मुझे ये कहने में कोई संकोच नही है कि मैंने तो शर्मा जी की सिर्फ एक बंसल मर्डर केस में मदद की थी, जिसकी वजह से शर्मा जी तरक्की पाकर अपने इंस्पेक्टर के ओहदे से एसी पी की कुर्सी तक पहुंच गए थे, लेकिन उसके बाद शर्मा जी ने मेरी अनेक मौकों पर मदद की।
जब जब भी मुझे उनकी जरूरत पड़ी, उन्होंने मेरी मदद करने में कभी आना कानी नही की। वो अपने महकमे के काम मे कितने ही मसरूफ क्यो न हो, वो इस नाचीज़ के लिए हमेशा वक्त निकाल लेते थे।
इस वक़्त मैं शर्मा जी को अपनी पूरी आपबीती सुना चुका था, और शर्मा जी पूरी गंभीरता से मेरी बात को सुनकर मेरी ओर ही देख रहे थे।
"तुम्हारी कहानी तो मुझे समझ मे आ रही है, लेकिन सबसे बड़ा पेंच इसमे यही फँसा है कि पिस्टल की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में करवाने के बाद पिस्टल का तुम्हारे ही घर से बरामद होना! अब अगर इस पिस्टल से कोई वारदात हो चुकी है तो, पहली फुर्सत में पुलिस तुम्हे ही गिरफ्तार करेगी" शर्मा जी ने साफ शब्दों में बोला।
"लेकिन मालिक मैं तो बेकसूर हूँ, आपके रहते हुए आपके ही इलाके में एक बेकसूर इंसान को फांसी चढ़ाने का इंतजाम कैसे किया जाता है" मैने विनय भरे स्वर में शर्मा जी की ओर देखते हुए बोला।
"वर्तमान हालात में मैं अपने किसी मातहत को तुम्हारे खिलाफ कोई कार्यवाही करने से तो नही रोक सकता, लेकिन इतना जरूर कर सकता हूँ, की इस कार्यवाही में मैं समय लगवा दू, लेकिन उस समय का सदुपयोग तुम्हे खुद की बेगुनाही साबित करने में करना होगा" शर्मा जी ने पहेली सी बुझाई।
"क्या मतलब" मै और खुलकर समझना चाहता था।
"मतलब ये की इस केस में तुम्हे अपनी मदद खुद ही करनी होगी, फिर रागिनी तो है ही तुम्हारे साथ, मुझें पूरी उम्मीद है कि तुम इस मुसीबत से भी बाहर आ जाओगे" शर्मा जी ने इस बार रागिनी पर नजर डालते हुए बोला।
"लेकिन देवप्रिय तो पहली फुर्सत में मुझे उठा कर जेल में ठूंस देगा, फिर मैं अपनी मदद कैसे कर पाऊंगा" मैंने शर्मा जो को बोला।
"तुम थाने जाओ, तुम्हारे वहां पहुंचने तक तुम्हारे केस में वहां का पूरा निजाम बदल चुका होगा, कोई भी तुम्हे नाहक परेशान नही करेगा, तुम्हारी तत्काल गिरफ्तारी को जब तक मेरे बस में होगा, मैं रोकने की कोशिश करूंगा, इस वक्त इससे ज्यादा मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाऊंगा" शर्मा जी ने अपनी मजबूरी बताई।
लेकिन वो ये बोलकर सिर्फ यही जता रहे थे कि वे मेरी ज्यादा मदद करने में असमर्थ है, लेकिन मैं जानता था कि उनकी ये मदद मेरे लिये कितनी बड़ी मददगार होने वाली थी।
मैं जेल से बाहर रहकर तो रागिनी के साथ मिलकर अपने खिलाफ बड़ी से बड़ी साजिस को बेनकाब कर सकता था, लेकिन जेल में जाने के बाद मैं कुछ भी करनें में असमर्थ था।
मुझे गिरफ्तारी से बचाए रखना ही इस वक़्त मेरे लिए वरदान साबित होने वाली थी। मैने शर्मा जी का तहेदिल से शुक्रिया अदा किया और वहां से विदा ली।
अब मैं पहले थाने जाकर देवप्रिय का ही सामना करना चाहता था।
जारी रहेगा_____![]()
Bahut hi shandar update he Raj_sharma Bhai
Kumar gaurav ke sath kuch na kuch hadsa ho chuka he..............
ACP Sharma se milke romesh ne ek tarah se apni jamanat karwa li he........
Ab devpriya uske case ka incharge nahi rahega, as per ACP sharma.......
Agli dhamakdar update ki pratiksha rahegi bhai


