Episode 10.2
शाम हो चुकी थी. और रूपा वीरू का खास ध्यान रख रही थी. वैसे तो उसे टोईलेट तक तो बेड पर कराया जा रहा था. पर रूपा उस से बाते मज़ाक वगेरा ज्यादा कर रही थी. वीरू के बगल मे बैठी रूपा के हाथ मे एक प्लास्टिक का जार जैसा कुछ था.
जैसे पेड़ो मे पानी डालने के लिए होता है. एक नोज़ल वाला. पर उसकी नोज़ल लम्बी और मोटी थी. और उस नोज़ल मे वीरू का लिंग था. वीरू ताकत लगाकर उसमे मूत रहा था. वही रूपा खड़ी उस जार को पकडे हुए थी. वीरू का मूत्र उस जार मे ही जा रहा था. साथ रूपा उस से बाते भी कर रही थी.
रूपा : (स्माइल, शारारत) जानते हो. आज मेने उसके पिछवाड़े की अच्छी मसाज की.
वीरू : (मूत ते हुए) अह्ह्ह ससस तो यह सब तुम मुझे क्यों बता रही हो.
रूपा : (स्माइल, शारारत) तेल लगाकर एकदम अच्छे से. वो भी अंदर तक. पता है. उसकी एकदम कस्सी हुई भी है. और मुलायम भी.
वीरू : ससस बस करो. मुझे नही सुन ना.
रूपा तो कविता के पिछवाड़े के बखान करने से बिलकुल पीछे नही हटी. वीरू का मूतना हो गया था. रूपा वीरू के लिंग को उस जार की नोज़ल से निकल कर कपडे से साफ करते हुए बोली.
रूपा : (स्माइल, शारारत) दिखती भी तो सुंदर है. गोरी.... गोरी. गोल गोल. मै तो खुद ही देख कर मचल जाती हु.
वीरू : (गुस्सा) फिर तू ही ले लेना उसकी. मुझे क्यों परेशान कर रही है.
वीरू कविता से नफरत करने की कोसिस कर रहा था. वो इतना समझ चूका था की रूपा अब उसकी तरफ नही है. रूपा भी जैसे वीरू के विरोध की कोई परवाह ना कर रही हो. बोलती ही चली गई.
रूपा : जानते हो. उसमे एक खास बात है. दर्द अच्छा बरदास कर लेती है. बिलकुल मना नही करती. और ना हिलती डुलती है.
वीरू ने कोई जवाब नही दिया. रूपा जाते जाते अपना असली मकशद बता गई.
रूपा : उसे तैयार कर दिया है मेने. रात को आती हु लेकर. तू उसे संभाल लेना. तेरा एक हाथ खोल दूंगी. पर प्यार से करना. उसने कभी पीछे से किया नही है.
रूपा बोल कर चली गई. वीरू सोचने लगा. वो चाह कर भी कविता से नफरत नही कर पा रहा था. वो सोचने लगा की ऐसा क्या करें जो वो पागल लड़की उसका पीछा छोड़ दे. वीरू सोचने लगा की अगर वो उस लड़की की लाइफ मे विलन बन जाए तो सायद वो लड़की उसे छोड़ देगी. पर डर यह भी था की कही उसे गोली ना मार दे.
रूपा वीरू के रूम से निकालने के बाद रूपा किचन मे जा रही थी. जाते हुए वो कविता जिस रूम मे थी. वहां रुक गई. डोर अब भी खुला हुआ था. रूपा ने अंदर झांका कविता अब भी बेड पर उलटी लेटी हुई थी. बस हिस्प के थोड़े ऊपर तक बेडशीट ओढ़े हुए थी.
कविता की नंगी पीठ चमकते हुए बहोत खूबसूरत और कामुख लग रही थी. कविता की आंखे खुली हुई. जैसे कही खोई हुई हो. जब रूपा डोर पर रुकी तो कविता की नजर भी डोर पर गई. दोनों की नजरें मिली. और दोनों ही मुस्कुरा दिए. रूपा की आँखों मे शारारत थी तो कविता की आँखों मे शर्म. रूपा ने अपनी आँखों के हिसारे से वीरू के रूम की तरफ वाला हिसारा दिआ.
जैसे कोमल रानी की किसी कहानी मे भाभी अपनी ननंद को उसके पहले सम्भोग से पहले हिसारा देती है. की अब तेरी बारी आ गई है. कविता भी रूपा के उस शारारत भरे हिसारे को देख कर शर्मा गई. और तुरंत अपने एक हाथ से अपना चहेरा ढक लिया. जितनी बेचैनी कविता को हो रही थी. उतना ही रोमांचित रूपा हो रही थी.
रूपा : (स्माइल, शारारत) उसे खाना खिला दू. फिर तुम्हे लेने आती हु. तैयार हो जाओ मेरी रानी. आज तुम्हारे पिछवाड़े का फूल भी खिलने वाला है.
रूपा की बात पर कविता और ज्यादा शर्मा गई तो रूपा खिल खिलाकर हस पड़ी. रूपा वहां से किचन मे चली गई. और कविता और ज्यादा बेचैन हो गई. जैसे कोई दुल्हन अपनी सुहागरात से पहले बेचैन होती है.