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मम्मी ने भले ही शिकायत ना की हो लेकिन मुझसे बात करना बंद कर दिया. यह चीज मुझे बहुत ज्यादा परेशान करने लगी, कैसे भी करके हालात को काबू में करना जरूरी था. अगले दिन टेबल पर हम भाई बेहन बैठकर नाश्ता कर रहे थे. आसमान में बादल छाए हुए थे लेकिन उसमें से हल्की धूप की किरणें झांक रही थी.
मम्मी: कपड़ों को धो लेती हूं बारिश का कोई ठिकाना नहीं लग रहा है कब बरस जाए. कुसुम दीदी: मम्मी नाश्ता तो कर लो. मम्मी: नहीं नहीं, तुम लोग करो मुझे बहुत काम करना है. कुसुम दीदी: आप टेंशन मत लो मैं बाकी काम देख लेती हूं
मम्मी को पीछे जाता देख, मैं भी फटाफट नाश्ता खत्म करके उसके पास गया. मम्मी वहीं थी, प्लास्टिक के बड़े टब के ऊपर झुकी हुई. मैंने दरवाजे से कुछ पल के लिए उन्हें देखा, लेकिन मुझे पता था कि मैंने उन्हें बहुत ज़्यादा आगे धकेल दिया था. अगर मैं सच में ऐसा कुछ कर सकूं जिससे कि वो मेरी हो जाए तो उसके लिए मुझे माफी मांगना जरूरी था.
मैं आगे बढ़ा,
मैं: (धीमे से) मम्मी? मुझे बहुत अफ़सोस है. प्लीज़... मेरी तरफ़ देखो. मम्मी: क्यों अभी भी मन नहीं भरा तेरा उस रात के बाद! मैं: मुझे नहीं पता मुझे क्या हो गया था, और करीब से आपको महसूस करके मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था. आप मेरी ज़िंदगी की सबसे ज़रूरी इंसान हैं, और यह सोचकर कि मैंने आपको चोट पहुँचाई है... यह बात मुझे अंदर ही अंदर मार रही है.
फिर मैंने उसे पकड़ने के लिए नहीं, बल्कि उसकी कलाई को धीरे से छूने के लिए अपना हाथ बढ़ाया. इस बार उसने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा.
मैं: मैं आपसे प्यार करता हूँ, मम्मी. मुझे माफ कर दो. मैं वादा करता हूँ कि मैं दोबारा कभी ऐसा कुछ नहीं करूँगा जिससे आपको इस तरह डर लगे. बस आप मुझे समझो. मम्मी: क्या समझूं? यही कि तू मेरा जिस्म पाना चाहता है, मेरे जिस्म से खेलना चाहता है, अपनी ही माँ के साथ. मैं: नहीं मम्मी मैं सिर्फ आपका प्यार चाहता हूं. मम्मी: जो तूने किया है उसे प्यार नहीं कहते हैं. और अगर तुझे रिश्तो की थोड़ी भी समझ है तो समझ जा. मैं: अच्छा इस बार मुझे माफ कर दो. मम्मी: मैं इस घटना को यहीं खत्म कर रही हूँ. क्योंकि तू मेरा बेटा है, मैं बस यही चाहती हूं कि तू कैसे भी करके पढ़ाई पर ध्यान दें. तेरे बोर्ड की परीक्षा बहुत नजदीक है. मैं अब और कोई 'कन्फ्यूज़न' या ध्यान भटकाने वाली चीज़ें नहीं चाहती. समझ गया? मैं: समझ गया.
आखिरकार मम्मी ने कपड़े धोने का काम खत्म कर लिया था. मेरे सोचे-समझे माफी मांगने के तरीके से उनके चेहरे की सख्ती कम हो गई थी. जब हम घर के अंदर लौट रहे थे, तो उन्होंने मुझे हॉलवे में रोक लिया और अपना हाथ धीरे से मेरे कंधे पर रखा. यह भरोसे का एक ऐसा इशारा था.
मम्मी: आशीष, मेरी बात समझ में आई? मैं: मैं खूब मन लगाकर पढ़ाई करूँगा.
उन्होंने संतुष्ट दिखते हुए सिर हिलाया और किचन की तरफ चली गई. मैंने यह कह तो दिया था मम्मी से की गलत चीजों पर ध्यान नहीं दूंगा. लेकिन वो भी मेरे ऊपरी मन की बात थी, अंदर से मैं नहीं जानता था कि आखिर में कैसे कंट्रोल करूं. और वो भी, जब मैंने अपनी मम्मी की चूचियों को करीब से देखा है, उसे चूस लिया है.
जैसे ही मैं अपने कमरे में पहुँचा, मैंने रीना और कुसुम को वहाँ पहले से ही मौजूद पाया. उन्होंने मेरी स्टडी टेबल को टेक्स्टबुक, नोटबुक और हाइलाइट की हुई गाइड से एक 'वॉर रूम' जैसा बना दिया था. वे दोनो स्वभाव से ही शिक्षक थी. मेहनती, अनुशासित और फ़िलहाल, पूरी तरह से मेरी पढ़ाई में सफलता पर ध्यान दे रही थी.
कुसुम दीदी: हम दस मिनट से इंतज़ार कर रहे हैं, बैठ. हम ऑर्गेनिक केमिस्ट्री रिएक्शन से शुरू कर रहे हैं, और अगर तुने फिर से नोमेनक्लेचर में गलती की, तो मैं तुझे रात का खाना नहीं खाने दूँगी. रीना दीदी: आशु ध्यान से पढ़ाई कर, नहीं तो तुझे पता है कुसुम तेरा क्या करेगी.
पढ़ाई के वो मशक्कत भरे दिन. रीना दीदी और कुसुम दीदी के साथ पुस्तकों और दबी हुई इच्छाओं के धुंधलके में बीते. हर बार जब मेरी बहनें किसी गणित की समस्या को सुधारने या किसी रासायनिक सूत्र को बताने के लिए मेरे ऊपर झुकती, तो मुझे उनका हाथ पकड़ने और उनके शरीर की कोमलता को महसूस करने की इच्छा से लड़ना पड़ता था. लेकिन मेरा दिमाग हमेशा मेरी माँ की तरफ चला जाता था. हमारे बीच का तनाव एक नाजुक शांति में बदल गया था.
एक शाम, दिन की गर्मी आखिरकार कम हो गई थी, जिससे पूरे घर में एक ठंडी हवा चल रही थी. मैं छत पर आ गया, जहाँ ढलते सूरज का नारंगी रंग आसमान को रंग रहा था. जैसे ही मैं किनारे की तरफ बढ़ा, मुझे आवाजें सुनाई दी. मम्मी पापा से फोन पर बात कर रही थी, जो अभी भी अपने बिजनेस ट्रिप के सिलसिले में बाहर थे.
मम्मी: हाँ, यहाँ सब ठीक है, आशीष अपने बोर्ड परीक्षा पर ध्यान दे रहा है. वो पिछले कुछ समय से एक अच्छा लड़का बना हुआ है.
जब मैंने उसे मेरा बचाव करते और मुझे अच्छा लड़का कहते सुना, जबकि मुझे अच्छी तरह पता था कि मैंने उसके साथ घर के पिछले हिस्से में क्या करने की कोशिश की थी, तो मेरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई. मैं सीधे उसके पास गया. उसने फ़ोन कान से हटाया और मुझे देखते ही,
मम्मी: आशीष! तुने तो मुझे चौंका ही दिया. बस एक सेकंड.
उसने जल्दी से फ़ोन पर बात की, पापा से कहा कि वो कुछ मिनटों में उन्हें वापस फ़ोन करेगी, और फ़ोन रख दिया. वो मेरी ओर मुड़ी,
मम्मी: क्या बात है? मैं: मैं उस दिन के बारे में सोच रहा था. मम्मी: मैं चाहती हूं कि हम उस तनाव से आगे बढ़े. पर तू अभी भी वहीं पर अटका हुआ है. मैं: लेकिन आप ही बताओ मैं कैसे यह सब भूल जाऊं? मम्मी: देख मैं अब जो बताने जा रही हूं उसे समझने की कोशिश कर. जब तू छोटा था, तब हां शायद तुझे मेरे स्तनों से सुकून मिलता था. माँ का दूध पीना या स्तन चूसना बच्चे के लिए होता है, जिसे पोषण और गर्माहट की ज़रूरत होती है. लेकिन अब तो तू बच्चा नहीं है, तेरी जिम्मेदारियां है तू बड़ा हो गया है.
मैं उसे बताना चाहता था कि वो मुझे जितना ज़्यादा किताबों की ओर धकेलती थी, मेरा मन उतना ही ज़्यादा उसकी साड़ी फाड़कर उसकी शरीर को अपनी शरीर से महसूस करने का करता था. लेकिन मैंने अपना मुँह बंद रखा और एक उलझन में पड़े बेटे का किरदार निभाता रहा.
मम्मी: अपनी सारी ऊर्जा अपनी किताबों में लगा. एक बार जब तु सफल हो जाएगा तो तुझे सही साथी मिल जाएगा, तेरी अपनी उम्र का कोई, और इन सभी भावनाओं को सही जगह मिल जाएगी.
बोर्ड एग्ज़ाम का साया मुझ पर काले बादल की तरह मंडरा रहा था, लेकिन मेरा मन किताबों से बहुत दूर था. रीना दीदी ने मेरी मुख्य शिक्षक बनने की ज़िम्मेदारी ली थी और दोपहर की शांति में मेरे साथ घंटों बिताती थी. वो बहुत लगनशील थी और मुश्किल कॉन्सेप्ट्स समझाते समय उनकी आवाज़ में धैर्य होता था. लेकिन न चाहते हुए भी मेरा ध्यान बार-बार दीदी पर जाता.
रीना दीदी: (धीरे से डाँटते हुए) तु यहाँ बुनियादी स्टेप छोड़ रहा है. अगर तुने इसे सही नहीं किया, तो पूरे सेक्शन में तेरे मार्क्स कट जाएँगे. मैं: एक बात बोलूं? मुझे पढ़ने-लिखने से ज़्यादा दिलचस्प कुछ और नज़र आ रहा है. रीना दीदी: तु किस बारे में बात कर रहा है? समस्या पर ध्यान दे. मैं: जिस तरह से आप बैठी हो, जिस तरह यह कुर्ती आप पर जंच रही है... इससे मेरा दिमाग कैसे भला किताबों में लगेगा.
रीना दीदी झटके से सीधी होकर बैठ गई, जिससे हमारे बीच साफ दूरी बन गई.
रीना दीदी: यह बचकानी छेड़छाड़, ये गलत ख्याल, इन्हें बंद करना होगा. मैं: मैं तो बस अपनी टीचर की तारीफ़ कर रहा हूँ, दीदी. रीना दीदी: यह तारीफ़ नहीं, बदतमीज़ी है, रुक जा मैं तेरा इलाज करती हूं. कुसुम, इधर आना.. मैं: रुक जाओ, क्या कर रही हो! रीना दीदी: नहीं, बहुत तुझे छेड़खानी सूझ रही है ना... कुसुम दीदी: रीना क्या हुआ? रीना दीदी: लो अब तुम पढ़ाओ इसे.
यह कहकर दीदी उठकर चली गई. उसकी जगह अब कुसुम दीदी ने ले लिया और फिर वही सख्त तरीके से उसका पढ़ाना शुरू हो गया.
एक के बाद एक एग्जाम देते हुए लगभग 20 दिन बीत चुके थे. बोर्ड एग्ज़ाम का बोझ आखिरकार हट गया था. और मेरे पास अचानक बहुत सारा खाली समय था, साथ ही मेरा दिमाग पहले से कहीं ज़्यादा बेचैन और उत्तेजित था. मैं सुबह जल्दी उठकर किचन में मम्मी की मदद करने लगा, उनके बनाने से पहले ही उन्हें चाय बनाकर देता, और घर के वे भारी-भरकम काम खुद करने लगा जिसे शाम तक मेरी बेहने खत्म करती थी. मैं अपनी मम्मी के लिए एक आज्ञाकारी लड़का बन गया. जो यह भांप लेता था कि वे कब थकी हुई है. मुझे उसका भरोसा जीतना बहुत जरूरी था और घर-गृहस्थी की भागदौड़ भरे दिन के बाद उनके कंधे या पैर दबाने की पेशकश करता था. हालाँकि, जब मैं उनकी गर्दन की जकड़न दूर करने के लिए मालिश करने लगता, तो वे कभी भी मेरे हाथों को नहीं हटाती थीं.
मेरी बहनों ने तुरंत बदलाव को महसूस किया. कुसुम, जो अक्सर मुझ पर गुस्सा करने का बहाना ढूंढती थी. हैरानी की बात है कि वो चुप थी. उसे शायद इस बात की खुशी थी कि मैं कोई गड़बड़ नहीं कर रहा था. एक दोपहर, मैं लिविंग रूम में था और मम्मी के साथ कपड़े तह करने में उनकी मदद कर रहा था. मैं उनके ठीक पीछे खड़ा था, उनकी बदन की खुशबू मेरे आस-पास महसूस हो रही थी, और एक चादर उठाते समय मैंने जान-बूझकर अपनी छाती को उनकी पीठ से छुआ. मम्मी बस हंसीं, यह सोचकर कि यह गलती से हुआ है, और उन्होंने मेरे हाथ पर थपथपाया. दरवाजे से मैंने देखा कि रीना दीदी हमें देख रही थी.
उस शाम बाद में, जब मम्मी नहा रही थीं, रीना दीदी मेरे कमरे में आई. वो दरवाजे के फ्रेम के सहारे खड़ी हो गई, उसने अपनी बाहें उन भारी स्तनों पर बांधी हुई थी जिनके बारे में मैं अब भी हर रात सपने देखता था.
रीना दीदी: मानना पड़ेगा, मैं इम्प्रेस हूं. जिस तरह से तु मम्मी का ख्याल रख रहा है, यह सच में बहुत प्यारा है. मैं: दीदी, मुझे अब समझ आ गया है कि मैं कुछ चीज गलत की है. रीना दीदी: अच्छा लगा सुनकर. मुझे तो डर लगने लगा था कि तु मुसीबत बन जाएगा. राहत की बात है कि तुने आखिरकार अपना ध्यान मुझ पर से हटा लिया है.
लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी. वो मेरे एग्जाम के रिजल्ट का दिन था. मैंने एक आदर्श बेटे का रोल निभाने और मम्मी के करीब आने के लिए अपनी अगली चालें सोचने में इतना समय बिताया था कि पढ़ाई-लिखाई को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया. जब स्क्रीन खुली और मैंने अपने मार्क्स देखे, तो मेरा दिल बैठ गया. मैं पास तो हो गया था, लेकिन बस नाम के लिए. मैं फेल होने की कगार पर था. कुछ ही सेकंड में घर का माहौल गर्मजोशी से बदलकर एकदम ठंडा पड़ गया. मेरी बनाई हुई अच्छे लड़के की छवि पल भर में टूट गई.
मम्मी: यह क्या है, आशीष? मैंने तुझ पर भरोसा किया था! मुझे लगा था कि तु आखिरकार समझदार हो गया है, अपने भविष्य पर ध्यान दे रहा है. तु इतना लापरवाह कैसे हो सकता है?
रीना और कुसुम दीदी ने भी हालात आसान नहीं बनाए. रीना दीदी ने मुझे ऐसी तरस भरी नज़रों से देखा जो गुस्से से ज़्यादा नीचा दिखाने वाली लग रही थी.
जोर से मेरी कान मरोड़ते हुए,
कुसुम दीदी: इससे आप अच्छा लड़का कह रही थी. इसने हमें बेवकूफ बनाया है. मैं: सॉरी दी... कुसुम दीदी: क्या करूं तेरे सॉरी का. हम सब ने मिलकर इतनी मेहनत की और तूने उन सब पर पानी फेर दिया. ध्यान कहां था तेरा?
मैं सिर झुकाए बैठा रहा और उनकी बातें सुनता रहा. मैंने मम्मी को कमरे में टहलते हुए देखा. गुस्से से उनका चेहरा लाल हो गया था. मुझे एहसास हुआ कि उनका गुस्सा असल में एक बहुत तेज़ जज़्बात का ही दूसरा रूप था, और अगर मैं इसे सही दिशा दे सकूं, तो मैं उनके पछतावे और अपनी नाकामी का इस्तेमाल करके उन्हें फिर से अपने काबू में कर सकता हूं.
मम्मी: जा अपने कमरे में. मैं तेरा यहां खड़ा रहना देख भी नहीं सकती. अब अपने पापा को जवाब दे देना.
मैंने उनकी बात मानी और धीरे-धीरे अपने कमरे की ओर चला गया. मैं मम्मी के स्वभाव को जानता था. वह मुझ पर सख़्त इसलिए थी क्योंकि उन्हें मेरी परवाह थी, और एक बार गुस्सा ठंडा होने पर, इतनी सख़्ती करने का पछतावा उन्हें होने लगेगा.
उस दिन दोपहर को, मम्मी और कुसुम दीदी पड़ोस में किसी के घर गई थी. मैं वही लिविंग रूम में बैठा था तभी रीना दीदी मेरे पास आई. दीदी को ऐसी हालत में देखकर मैं हैरान रह गया. देख कर ऐसा लग रहा था वो अभी तुरंत ही नहा कर आई है, उसके कमर पर टॉवल लिपटा हुआ था. और ऊपर बस एक पतली सी ब्रा जैसी कॉटन स्लिप. क्या उसे इस बात का जरा भी ध्यान नहीं था कि वो किस हालत में है या फिर मुझे उदास देखकर उसे रहा नहीं गया.
रीना दीदी: रिजल्ट के बाद से तु बहुत चुप-चुप हो गया है, मम्मी और कुसुम ने थोड़ी सख्ती दिखाई थी, लेकिन तु इस तरह चुप नहीं रह सकता. मुझे बता, असल में तेरे दिमाग में क्या चल रहा है? क्या सिर्फ मार्क्स की वजह से ऐसा है, या कोई और बात तुझे परेशान कर रही है?
मैंने अपना रुख बदलने का फ़ैसला किया, और कुछ ऐसा सच कहा जिससे हदें पार हो सकती थी.
मैं: सिर्फ़ उन मार्क्स की बात नहीं है, दी. बात आपकी है. मैं किसी चीज़ पर ध्यान नहीं दे पा रहा क्योंकि मैं हर वक़्त आपके बारे में ही सोचता रहता हूँ.
रीना दीदी: मैं तो बस तेरी मदद करना चाहती हूं और तू इस तरह की बात कर रहा है. मैं: मुझे पता है, लेकिन यह बात मुझे पागल कर रही है. जब भी मैं आपको देखता हूँ, तो बस... रीना दीदी: बस क्या? मैं: मुझे उन्हें देखना है. बस एक बार. प्लीज़, रीना दीदी, मुझे अपना ब्रेस्ट देखने दो. बस एक झलक, और मैं वादा करता हूँ कि मैं अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाऊँगा. जब तक मैं ऐसा नहीं कर लेता, मेरा मन शांत नहीं होगा.
इसके बाद जो सन्नाटा छाया, वो बहुत तनावपूर्ण था. रीना दीदी को जैसे अचानक कोई झटका लगा हो. वो बेचैनी से हिली-डुली. उसने अनजाने में ही अपने सूती टॉप को छाती के पास खींचने की कोशिश की, जिससे उसकी कमर पर बंधा तौलिया और कस गया.
रीना दीदी: आशीष! देख, तू अभी फिर से शुरू मत हो. तुझे कितना समझाया, अब तो समझ जा. और कुछ बोल तो मैं जरूर कर दूंगी लेकिन उस तरह से कोई गंदी बात नहीं. मैं: दीदी समझो ना बस यही, इसी वजह से मेरे मार्क्स इतने खराब आए अगर मेरे दिमाग में इतना सब कुछ नहीं चल रहा होता तो कम से कम मैं पढ़ाई में तो अपना दिमाग लगा ही लेता. रीना दीदी: (धीमी आवाज में) तू वादा करता है? अगर मैं ऐसा एक बार करूं, तो तू रुक जाएगा? तू इस तरह के ये कमेंट्स करना बंद कर देगा, ये रिक्वेस्ट करना बंद कर देगा, और सच में अपना ध्यान किताबों में लगाएगा? मैं: मैं वादा करता हूँ, दी, बस एक नज़र. मुझे उन्हें देखने दो, और कसम से मैं दोबारा नहीं पूछूँगा. मैं पूरी तरह अपनी पढ़ाई पर ध्यान दूँगा. मुझे बस अपने सीने से यह बोझ हटाना है ताकि मैं ध्यान लगा सकूँ. रीना दीदी: ठीक है, लेकिन सिर्फ़ कुछ सेकंड के लिए. और अगर तुने कभी किसी से इसका ज़िक्र किया या अगर तुने मुझसे दोबारा पूछा तो मैं मम्मी को सब बता दूँगी. मैं: मैं भला किसी से क्यों कहूंगा! रीना दीदी: दोबारा मुझसे जिद भी नहीं करना है इस बारे में.
मेरे मन में खुशी की लहर दौड़ पड़ी. जो अब तक इतना नामुमकिन लगता था, उसे मैं हासिल करने वाला था. कुछ दिन पहले ही मम्मी की चूचियां और अब मेरी बड़ी बेहन की. मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं वाकई में ये कर दिखाया.
धीरे-धीरे, हिचकिचाते हुए, दीदी ने ऊपर हाथ बढ़ाया. जब उन्होंने अपने सफ़ेद सूती टॉप के ऊपरी हिस्से को पकड़ा. उसने मेरी आँखों में नहीं देखा. इसके बजाय, वो दीवार को घूर रही थी, उसके चेहरे पर गहरी शर्मिंदगी और लज्जा के भाव थे. धीरे-धीरे, उसने कपड़े को नीचे की ओर सरकना शुरू किया. उसकी चूचियों का वो फुला हुआ हिस्सा दिखाना शुरू हो गया. उसका बदन बहुत गोरा था. देखते ही देखे मेरा लंड पत्थर की तरह मजबूत होने लगा. जैसे ही उसके निप्पल का वो हल्का गुलाबी घेरा दिखाना शुरू हुआ, मेरी धड़कन बहुत तेज हो गई, मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था यह मेरी बेहन है जो अपनी चूचियों को दिखाने जा रही है. बस थोड़ा सा और नीचे और उसके निप्पल मेरी आंखों के सामने आ गए.
मैं: ओ दीदी क्या गजब की है ये!!! रीना दीदी: श्श्श्श...धीरे बोल. बस हो गया, अब हट जा. मैं: नहीं नहीं दीदी रुको ना. रीना दीदी: आशु देख मैंने बोला था बस एक ही बार. मैं: दीदी थोड़ा अच्छे से तो देख लेने दो. रीना दीदी: (दरवाजे की तरफ देखते हुए) देख मम्मी और कुसुम कभी भी आ जाएगी. हट यहां से, मैंने कपड़े भी नहीं पहने हैं. मैं: बस 2 मिनट.
वो काफी डरी हुई थी, उसकी सांस फूल रही थी और नजरे दरवाजे की तरफ. उसकी पकड़ भी उसके कपड़ों से छूट गई थी. जैसे ही उसके चूचि दिखे, मेरे शरीर की हर नस ने मुझे उनकी तरफ हाथ बढ़ाने के लिए उकसाया. तभी मैंने अपने हाथों से उसके कपड़े को नीचे पकड़ के रखा उसने फिर मेरी तरफ देखा तो शर्म से पानी पानी हो गई.
रीना दीदी: छोड़, हो गया ना.
लेकिन मेरी नजरों को उसने समझ लिया की मेरा मन अभी और देखने का है. उसने अपने कपड़े को पकड़े हुए मुझे देखा और फिर उसकी नजर नीचे झुकी.
रीना दीदी: (धीमी आवाज में) देख तो लिया, कितना देखना है. आशु, पागल कहीं के, कुत्ते, भाई है तू मेरा, छोड़ दे.
उसकी चूचि को मैंने पड़कर अपने मुंह में भर लिया और उसके निप्पल को चूसने लगा. यह देख वो हिल गई.
रीना दीदी: छोड़ जल्दी पागल. क्या कर रहा है? कर क्या रहा है तू? नहीं प्लीज...
मैंने उसकी एक न सुनी और बस चूसने में अपने आप को बिस्तर रखा क्या रसीली बड़ी-बड़ी चूची थी उनकी. वो अपने हाथों से पहले जोर लगाकर मुझे धकेल रही थी लेकिन कुछ ही सेकंड में दीदी को आनंद का अनुभव होने लगा और उसका हाथ वहीं पर रुक गया. वो बस मुंह से इनकार कर रही थी लेकिन मन में आनंद का लहर दौड़ उठा था.
रीना दीदी: उम्म् ...नही…रुकक्क…..आअह्ह्ह्ह...
एक के बाद एक मैंने दोनों चूचियों को बराबर का दर्जा दिया कभी एक को दबाता तो दूसरे को चूस कर उसे गिला करता. मम्मी की चूची में और दीदी में बहुत फर्क था. मम्मी की चूची इतनी फूली हुई नहीं थी लेकिन उसका अपना मजा था. इस बीच मेरी नजर उसके होंठ पर पड़ी जो थोड़ी खुली हुई थी और आहें भर रही थी. मैं उसके दोनों गालों को पकड़ कर उसे चूमना शुरू किया. इससे वो थोड़ी सतर्क हो गई.
रीना दीदी: नहीं, हो गया. चल, चल, चल...
मैं: बस थोड़ा और...
ये एहसास उसके लिए भी नया था. वो अपने दोनों जांघो को एक दूसरे से दबा रही थी. तभी दरवाजे पर दस्तक हुई.
मम्मी: रीना... दरवाजा खोलो.
ये मम्मी की आवाज थी. दीदी डर के मारे कांपने लगी. क्योंकि उसने कपड़ा भी नहीं पहना था.
रीना दीदी: बोला था ना. तेरे समझ में नहीं आता. आज के बाद नहीं. तू जा जाकर दरवाजा खोल मैं अंदर जा रही हूं.
जल्दी से अपनी चूची को ढकते हुए वो अपने कमरे की ओर भाग गई. मैंने भी अपने खड़े लंड को जैसे तैसे सुलाया लेकिन मेरा मन अभी भी दीदी की चूचियों के नशे में ही था. मैंने दरवाजा खोला, मुझे देखकर उन दोनों ने फिर से मुंह बना लिया.
मम्मी: आशीष बैठ इधर कुछ बात करना है.
मैं: क्या हुआ मम्मी?
वो अभी भी बहुत गुस्से में थी.
मम्मी: कल तेरे पापा आ रहे हैं. हम दोनों ने फैसला लिया है कि तुझे अब यहां से दूर जाने की जरूरत है. क्योंकि यहां आस-पास तो अच्छा कॉलेज तुझे मिलने से रहा. मैं: नहीं ऐसा मत करो. मैं...मैं फिर से एग्जाम दे दूंगा. मम्मी: फिर से एग्जाम जिंदगी का एक और साल खराब करने के लिए. बिल्कुल नहीं.
कुसुम दीदी: अब तुझे समझ में आएगा दूर रहना किसे कहते हैं. यहां पर रहकर बहुत आवारा हो चुका है.
ये बात बहुत ही तकलीफ देने वाली थी. अभी तो मैंने कोशिश करना शुरू ही किया था. कुछ हद तक सफल भी हुआ, दीदी का स्वाद अभी भी मेरे मुंह में घूम रहा था. लेकिन दूर जाने की बात ने मुझे परेशान कर दिया.
दरवाज़े पर हुई बहस से माहौल में एक अजीब सी ठिठुरन आ गई थी. लेकिन असली झटका अगले दिन लगा, जब पापा घर पहुंच चुके थे. उन्होंने मेरे कम मार्क्स को लेकर मुझे खूब खरी-खोटी सुनाई. उनकी आवाज़ डाइनिंग रूम में गूंज रही थी और वे मुझे आलसी और लापरवाह कह रहे थे.
पापा: मैं तुम्हें यहाँ बर्बाद नहीं होने दे सकता. मैंने फ़ैसला कर लिया है. तुम्हारा एडमिशन घर से दूर किसी कॉलेज में कराया जाएगा. ऐसी जगह जहाँ तुम्हारा ध्यान भटकाने वाली कोई चीज़ न हो और तुम्हें पढ़ाई करने के लिए मजबूर होना पड़े.
मैंने मम्मी की तरफ देखा, उन्होंने अपना सिर झुका रखा था और उनकी आँखों में आँसू थे. शायद अपने राज़ों का पछतावा था या बेटे को घर से निकाले जाते देख दुख हो रहा था. कुसुम दीदी संतुष्ट लग रही थी, उसकी आँखों मे एक अजीब सी चमक थी, जैसे वो आखिरकार जीत गई हो. लेकिन रीना दीदी बुरी तरह टूट गई थी. वो मुझे एकटक देख रही थी, उसकी आँखों में गहरा और सच्चा दर्द था. और मुझे डांट खाते और घर से निकाले जाते देख उसके मन में मेरे लिए सुरक्षा की भावना जाग उठी. मैं अपने कमरे में बंद हो गया और छत को घूरता रहा. मेरे मन में गुस्से और तड़प का मिला-जुला एहसास था. मैं जाने के लिए तैयार नहीं था. मेरा काम अभी पूरा नहीं हुआ था.
उस रात देर गए, मेरे कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला. वो रीना दीदी थी. वो अंदर आई और अपने पीछे दरवाज़ा धीरे से बंद कर दिया.
मैं: क्या आप मुझे यह बताने आई हो कि मेरे जाने से आपको कितनी खुशी है?
दीदी ने कोई तीखा जवाब नहीं दिया. इसके बजाय, वो मेरे बिस्तर की ओर बढ़ी,
रीना दीदी: बस कर. मुझे नफ़रत है कि सब ने तुझसे उस तरह बात की. मुझे बुरा लगता है कि तुझे इतनी दूर जाना पड़ रहा है.
इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता, वो झुकी और उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया, मुझे कसकर और बेताबी से गले लगा लिया. उसकी मोटी चूचियां मेरे सीने को दबा रही थी. जिससे मेरे अंदर फिर से कामुकता जाग गई. मैंने भी अपना हाथ उसकी चूचियों की तरफ बढ़ाया लेकिन उसने रोक दिया.
रीना दीदी: नहीं. अभी ये सब नहीं, मैं तेरी परवाह करती हूं. मैं इस चीज के लिए नहीं आई हूं यहां पर. मैं चाहती हूं कि तू वहां जा और सबको गलत साबित कर दे.
ये सुन मैं भी रुक गया और बस अपने आप को उसके सीने से लिपटा हुआ वैसे ही छोड़ दिया.
रीना दीदी: अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना इन सब चीजों पर नहीं. मुझे तेरी याद आएगी.
वहाँ एक कशमकश थी. लेकिन उस दिन के गम ने उसे कमज़ोर कर दिया था. वह पीछे नहीं हटी. उसने एक धीमी, सिसकती हुई आवाज़ निकाली और अपना चेहरा मेरी गर्दन में छिपा लिया. मैंने यह देख उसे धीरे से चूम लिया.
रीना दीदी: बहुत गंदा है तू. मैं: लेकिन आप तो अच्छी हो. रीना दीदी: नाटक नहीं, चल सो जा.