Disclaimer
• इस कहानी में वर्णित सभी पात्र, स्थान, घटनाएँ और प्रस्तुत संबंध पूरी तरह से काल्पनिक हैं. किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, या वास्तविक घटना से इसका कोई भी संबंध मात्र एक संयोग है.

यह कहानी एक ऐसे लड़के की है, जो कभी परिवार की अहमियत और रिश्तों की गहराई को समझ नहीं पाया. माँ और बहनें हमेशा उसके करीब थीं, लेकिन उसका ध्यान अपनी ही दुनिया में रहता था.
समय के साथ कुछ अनुभवों ने उसकी सोच बदल दी. उसने रिश्तो को तो समझा लेकिन एक नए रूप में.

मेरा नाम आशीष है, मैं 18 साल का हूं और यह है मेरा परिवार. मेरे पापा जो 54 साल के हैं. वे आज भी मुझसे पूछते हैं कि मैंने ठीक से खाना खाया या नहीं, और जब मैं देर तक बाहर रहता हूँ, तो आज भी मेरा फोन चेक करते हैं. पूरा घर सिर्फ इसलिए चलता है क्योंकि वे कभी कोई शिकायत नहीं करते.
उनके बगल में मेरी माँ हैं, सीमा, 49 साल की. वो अभी भी बहुत खूबसूरत है इस उम्र में भी कोई मोटापा नहीं. अगर पापा घर की रीढ़ हैं, तो माँ इस घर का दिल हैं. वे आज भी एक छोटी सी बिंदी लगाती हैं, शाम को दीया जलाती हैं, और बिखरे बालों के लिए मुझे डांटती हैं.
और ये दोनों - सलवार सूट में मेरी सुपरहीरो.
गुलाबी कपड़ों में मेरी रीना दीदी हैं, 26 साल की या यूं कह लो घर की दूसरी माँ. रीना दीदी बहुत ही सुंदर और उनका शरीर भरा हुआ था. उन्होंने मुझे साइकिल चलाना सिखाया, तमीज से बात करना सिखाया और हर छोटी बड़ी गलती पर मुझे समझाती है. अब वे बड़ी हो गई हैं, लेकिन मेरे लिए वे हमेशा वही रहेंगी जिन्होंने मुझे माँ की डांट से बचाया था.
उनके बगल में लाल कपड़ों में कुसुम दीदी हैं, 24 साल की, जिसके साथ मेरा छोटी मोटी बातों पर नोक झोंक हो जाया करता है और वही हैं जो मेरे ईयरफ़ोन चुराती हैं.
हमारा घर ऐसी जगह पर था जो ना शहर था और ना ही गांव. आप समझ सकते हैं एक ऐसी जगह जो गांव और शहरों के बीच में होता है. लोगों की कम आना जाना और शांत माहौल.
कुसुम दीदी उस वक्त कॉलेज का आखिरी सेमेस्टर का एग्जाम देने वाली थी. वो अभी भी घर पर नहीं रह रही थी, लेकिन कुछ दिनों में घर वापस आने वाली थी.
बात उस दिन की है जब मैं सोफे पर बैठा, अपनी फिजिक्स की किताब को घूर रहा था, हालांकि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन (विद्युत चुंबकीय प्रेरण) के चैप्टर अब अर्थहीन आड़ी-तिरछी लकीरों जैसे धुंधले होने लगे थे. क्योंकि मेरे आंखों पर नींद सवार थी.
रीना दीदी: आशु! क्या क्या तू सच में पढ़ रहा है या फिर नौटंकी चल रही है?
मैं: मैं पढ़ रहा हूँ, दी.
मैंने झूठ बोला, और जल्दी से एक पन्ना पलट दिया.
मैं: ये कॉन्सेप्ट्स बस... थोड़े मुश्किल हैं.
रीना दीदी: कॉन्सेप्ट मुश्किल है या फिर जागना? झूठ बोलता है, नींद आ रही है और मुझे कह रहा है कॉन्सेप्ट मुश्किल है!
मैं: नहीं दीदी मैं सच में जाग रहा था.
वो पास आई और मेरे हाथों से किताब छीन ली. उसने दो सेकंड के लिए पन्ने पर नज़र दौड़ाई और उसे वापस मेरी गोद में फेंक दिया.
रीना दीदी: तू 10 मिनट से एक ही पेज पर अटका हुआ है. अगर इस बार काम नंबर आया तो पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर होगा, और मुझे ही उनका लेक्चर सुनना पड़ेगा.
मैं: आप हमेशा मेरे पीछे क्यों पड़ी रहती हो? आप वही हो जिसने आज सुबह मम्मी के साथ तीन घंटे लूडो खेला था.
रीना दीदी: इसे फैमिली बॉन्डिंग कहते हैं, शैतान. अब उठ, मम्मी किचन में चाय बना रही हैं, और अगर तुने बरामदे से भारी किराने के थैले हटाने में उनकी मदद नहीं की, तो वह मुझसे तेरा फोन एक हफ्ते के लिए छीनने को कह देंगी.
जब मैं बरामदे की तरफ चला, तो मम्मी मुझे मिली. उसने हाथ बढ़ाकर मेरे बाल बिगाड़ दिए, जिन्हें सँवारने में मैंने काफी समय लगाया था.
मैं:अरे!
मम्मी: हां हां बस करो, और यह सब्जियां उठाकर किचन में रखने में मेरी मदद करो.
दोपहर आम घरेलू उथल-पुथल के बीच बीत गई. हम छोटे डाइनिंग टेबल के चारों ओर बैठे, अदरक की चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे और गरमा-गरम पकौड़े खा रहे थे. बातचीत मम्मी की तरफ से पड़ोसी के शोरगुल वाले कुत्ते की शिकायत से शुरू होकर पापा द्वारा पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर चर्चा तक पहुँच गई. रीना दीदी मेरे बगल में बैठी थी, और जब भी मैंने पापा से बहस करने की कोशिश की, उसने टेबल के नीचे से मुझे कोहनी से हल्का सा धक्का दिया. यह चुपचाप दी गई चेतावनी थी कि अपना मुँह बंद रखो और अच्छे बेटे की हद में रहो.
हालाँकि, हमारे दैनिक जीवन की उलझनें आमतौर पर छोटी-छोटी बातों में सामने आती थीं. शाम करीब 6 बजे, बिजली चली गई. जो हमारे इलाके का एक आम समस्या था.
रीना दीदी ने मैगज़ीन से खुद को हवा देते हुए आह भरी. तभी बिजली वापस आ गई.
रीना दीदी: बहुत बढ़िया, बीस मिनट में मेरी दोस्त का कॉल आने वाला था. वो पिछले हफ्ते ही कनाडा शिफ्ट हुई है और मेरे लैपटॉप की बैटरी दस प्रतिशत पर है.
मैं: तुमने इसे चार्ज क्यों नहीं किया?
रीना दीदी: क्योंकि चार्जर मेरे बेडरूम में है, और दरवाजे का हैंडल फिर से जाम हो गया है!
हमारे पुराने घर की यह एक आम समस्या थी कि नमी के कारण लकड़ी के दरवाजे फूल जाते थे और जाम हो जाते थे. रीना दीदी एक हफ्ते से बेडरूम का दरवाजा ठीक करवाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन पापा बार-बार कह रहे थे कि वे इसे रविवार को ठीक करेंगे.
दीदी उठकर बेडरूम की तरफ जाने लगी, मैं उसके पीछे-पीछे उसके कमरे में गया. वह वहीं परेशान होकर हैंडल हिला रही थी. दरवाजा बाहर की ओर खुलता था, मैंने आगे बढ़कर अपना कंधा लकड़ी पर टिकाया और दरवाजे को बाहर की तरफ खींचा. एक तेज आवाज के साथ दरवाजा खुल गया, जिससे दीदी पीछे गिरते-गिरते बची. मैंने उसे संभालने के लिए उसकी बांहों से पकड़ लिया, और एक पल के लिए दिनभर का तनाव गायब हो गया.
रीना दीदी: (मजाक में) मेरे हीरो.
मैं: इसकी कीमत चुकानी होगी. आज रात एक बड़ा पिज्जा. घर पर डिलीवर, आपकी तरफ से.
रीना दीदी: (हड़बड़ाहट में लैपटॉप को चार्ज करते हुए) ठीक है. पर तभी जब तुम लाइट जाने से पहले इंडक्शन वाला वो चैप्टर सचमुच पूरा कर लो.
यह अफरा-तफरी ही हमारा तालमेल थी, और रीना दीदी ने अपनी तमाम हुकुम चलाने की आदत के बाद भी हम सबको आपस में जोड़े रखा था. मैं इस बार वाकई पढ़ने के इरादे से अपनी किताब लेकर वापस बैठ गया, और कॉल पर उसकी दूर से आती आवाज तथा रसोई में मेरी माँ के गुनगुनाने की सुकून भरी आवाज सुनने लगा.
शाम को पिज़्ज़ा आ गया और दीदी ने अपना वादा निभाया था. उसने एक्स्ट्रा चीज़ के साथ एक बड़ा पनीर टिक्का पिज़्ज़ा मंगवाया था, जिसे हमने लिविंग रूम में मजे से खाया, जबकि पापा शाम की खबरें देखने में व्यस्त थे.
जैसे-जैसे रात बढ़ती गई, घर में एक शांत माहौल हो गया. मम्मी और पापा अपने कमरे में चले गए थे, और रीना दीदी व मुझे लिविंग रूम में छोड़ गए थे. वह सोफे पर लेटी हुई थी, उसका लैपटॉप बंद था. उसका सिर एक तकिए पर टिका था और वह छत को देख रही थी. और अब वह सिर्फ एक थकी हुई लड़की थी उसने धीरे से कहा, शांत कमरे में उसकी आवाज़ बहुत धीमी लग रही थी.
रीना दीदी: आशीष?
मैं: हाँ?
रीना दीदी: क्या तुझे कभी ऐसा लगता है... कि तु बस किसी लिखी हुई स्क्रिप्ट पर चल रहा है? पढ़ाई करो, डिग्री लो, कॉर्पोरेट नौकरी पाओ, शादी का इंतज़ार करो. मुझे लगता है कि मैं सिर्फ जिंदगी के फॉर्मेलिटी करती जा रही हूँ.
मैं: दी, आप तो घर की आदर्श बेटी हो. तुमने हर उम्मीद पर पूरी तरह खरा उतरकर दिखाया है. तुम एक सफलता की मिसाल हो.
रीना दीदी: दिक्कत यही है. जब तुम सफलता का प्रतीक बन जाते हो, तो हर कोई तुमसे हमेशा जीतते रहने की उम्मीद करता है. मैं पापा को नहीं बता सकती कि मैं नहीं चाहती कि इतनी जल्दी मेरी शादी हो.
मैं: आप उन्हें... बता क्यों नहीं देतीं? या शायद थोड़ा ब्रेक ले लो.
रीना दीदी: आशीष, किसी भारतीय घर में यह इतना आसान नहीं है. तुम यह जानते हो. यहाँ सिर्फ स्थिरता ही एकमात्र ऐसा सिक्का है जिसकी कीमत होती है.
उसने एक आह भरी और आगे बढ़कर मेरा गाल प्यार से दबाया,
रीना दीदी: लेकिन तुम अभी पढ़ाई के दौर में हो. इस बनी-बनाई पटकथा को पूरी तरह खुद पर हावी मत होने देना. कोई ऐसी चीज़ ढूँढो जो तुम्हें सच में पसंद हो, भले ही वह वैसी न हो जैसी पड़ोसी उम्मीद करते हैं.
यह हम दोनों के बीच सच्ची संवेदनशीलता का एक दुर्लभ पल था. कुछ मिनटों के लिए, हम हुक्म चलाने वाली बहन और आलसी भाई नहीं थे. हम बस दो ऐसे इंसान थे जो एक पारंपरिक परिवार की भारी उम्मीदों से जूझ रहे थे.
तभी कॉफी टेबल पर रखे उसके फोन के जोर से बजने से वह पल टूट गया. उसने स्क्रीन पर देखा और फुसफुसाते हुए कहा,
रीना दीदी: यह मम्मी की सबसे अच्छी दोस्त, Mrs. शर्मा हैं. शायद मम्मी को कनाडा के किसी ऐसे परफेक्ट लड़के के बारे में बताने के लिए फोन कर रही है जो अभी-अभी अपने देश वापस आया है.
मैं: ओह, तो अब शुरू होता है सिलसिला. द ग्रेट इंडियन मैचमेकिंग शुरू.

दीदी ने मुझे घूर कर देखा, लेकिन उसके होठों पर मुस्कान की एक हल्की सी झलक थी. उसने पिज़्ज़ा का बचा हुआ एक टुकड़ा उठाया और मेरे चेहरे पर दे मारा.
रीना दीदी: चुप रह, नासमझ! अपनी इंडक्शन पर वापस जा. अगर तु प्री-बोर्ड पास नहीं करता, तो मैं Mrs. शर्मा को बता दूँगी कि पिछली दिवाली गैलरी में फूलदान तुने ही तोड़ा था.
मैं: आप ऐसा नहीं कर सकती!
रीना दीदी: आज़मा कर देख ले.
उसने आँख मारी, खड़ी हुई और अपने दोनों हाथ सिर के ऊपर ताने, जिससे उसकी वही रौबदार रीना वाली शख्सियत पूरी शान से लौट आई.
रीना दीदी: अब हट. मैं रिमोट ले रही हूँ. मेरे फेवरेट सीरियल का वक्त हो गया है.
मैं इस नाइंसाफी की जोर-जोर से शिकायत करते हुए उसके पीछे-पीछे कमरे में गया, लेकिन अंदर ही अंदर इस बात से खुश था कि वह पुरानी हलचल फिर से लौट आई थी.
अगले कुछ दिन अपनी सामान्य लय में बीते, लेकिन कुछ बदल गया था. सोफे पर बिताई गई वह कमज़ोरी की रात हमारे बीच एक खिंचाव छोड़ गई थी. कोई बुरा खिंचाव नहीं, बल्कि एक अजीब सा अहसास. मैं दीदी को और ज़्यादा गौर से देखने लगा था. जब उसे लगता कि कोई नहीं देख रहा है, तो उसके कंधे झुक जाते थे या फिर वह नाश्ते के दौरान अपने फोन को खाली नज़रों से देखती रहती थी, शायद इस डर से कि हमारी चाचियाँ उसे शादी के लिए बायोडाटा भेजती जा रही हैं.
यह मंगलवार की दोपहर थी मैं अपनी मेज पर बैठा था और इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म (विद्युत चुंबकत्व) की एक मुश्किल समस्या को हल करने की नाकाम कोशिश कर रहा था और दीदी मेरे सामने बैठी मुझे पढ़ा रही थी.

रीना दीदी: क्यों ना आशु का एग्जाम खत्म होने के बाद हम कहीं कैंपिंग ट्रिप पर चले?
पापा: अरे वाह रीना! यह तो बहुत अच्छा आईडिया है.
मम्मी: हां हां, सही कहा बहुत दिन हो गए कहीं घूमे हुए. दिन भर घर के कामों में ही इतना व्यस्त रहते हैं कि कुछ करने का मौका ही नहीं मिलता.
यह सुन तो मैं भी एकदम खुश हो गया मेरा एग्जाम दो दिन बाद ही था. मैं बस जल्दी-जल्दी एग्जाम खत्म होने का इंतजार करने लगा. 2 हफ्ते बीतने के बाद जब एग्जाम पूरा खत्म हो गया और क्योंकि दीदी ने इतने अच्छे से एग्जाम की तैयारी करवाई थी तो मुझे भी कोई फिक्र नहीं थी. जैसा कि हमने प्लान किया था कैंपिंग ट्रिप का, सबने अपने-अपने जरूरत के सामान पैक किया और हम निकल पड़े हिल स्टेशन की तरफ.
मैं: दीदी, क्या मुझे सच में इन वाटरप्रूफ हाइकिंग शूज़ की ज़रूरत है? क्योंकि मुझे कौन सा पहाड़ चढ़ना है.
रीना दीदी: हाँ, ज़रूरत है. क्योंकि जैसे ही हम रास्ते पर चलेंगे, तु शिकायत करना और रोना शुरू कर देगा. ऊं...ऊं...मेरे स्नीकर्स गंदे हो गए हैं, और मैं तुझे उठाकर बेस कैंप वापस नहीं ले जाने वाली.
मैं: बहुत रौब जमाती हो!
माँ का लगातार घर के बने पराठे और अचार देना और पापा का जीपीएस से जूझना, इस शांत छुट्टियों के सफर को एक उलझन भरा रोड ट्रिप बना रहा था. रीना दीदी आगे की सीट पर बैठी थी, जो नेविगेटर की भूमिका निभा रही थी, और उसके चेहरे पर महीनों से दिख रहा तनाव आखिरकार कम हो गया था.
हम आखिरकार कैंपसाइट पहुँचे. वहाँ लंबे देवदार के पेड़ों और पहाड़ों से घिरा एक हरा-भरा मैदान था. वहाँ की हवा ने हमारे होश उड़ा दिए. वह ताजी, ठंडी थी और उसमें भीगी हुई मिट्टी और देवदार की पत्तियों की खुशबू आ रही थी.
अगले एक घंटे तक हमने संघर्ष किया. टेंट लगाना तब और भी कठिन हो जाता है जब आप ऐसे मैनुअल के निर्देशों का पालन कर रहे हों जो किसी दूसरी भाषा में लग रहा हो. कई ऐसे पल आए जब खंभे हम पर गिर पड़े, और हम दोनों नायलॉन और फाइबरग्लास के ढेर में उलझकर रह गए.
मैं: मुझे लगा आपको टेंट लगाने आता होगा लेकिन आपको तो कुछ भी नहीं आता.

रीना दीदी भी हँस रही थी. उसने अपनी सलवार कमीज को एक मोटे ओवरसाइज़्ड हुडी और लेगिंग्स में बदल दिया था, और बालों की चोटी बना ली थी. एक बार जब तंबू आखिरकार खड़े हो गए, तो हमने शाम का समय लकड़ियाँ इकट्ठा करने में बिताया. जैसे ही सूरज नीचे डूबा, तापमान बहुत कम हो गया. हम एक चटकती हुई कैंपफायर के चारों ओर सिमट कर बैठ गए, जिसकी नारंगी लपटें अंधेरे होते आसमान में नाच रही थीं. माँ ने एक जुगाड़ वाली रसोई सेट कर ली थी, और गरम चाय तथा मसालेदार स्नैक्स की महक हवा में फैल गई थी.
जैसे-जैसे रात ठंडी होती गई, दीदी और मैं हमारे साझा तंबू में लौट आए. हम अपने स्लीपिंग बैग में एक-दूसरे के पास लेटे हुए तंबू के पतले कपड़े को घूर रहे थे, और दूर किसी पहाड़ी झरने की आवाज़ सुन रहे थे.
रीना दीदी : यहाँ कितनी शांति है. मुझे अपना फोन नहीं सुनाई दे रहा, मुझे यहाँ तक कि ट्रैफिक की आवाज़ भी नहीं सुनाई दे रही.
मैं: (मजाक में) आप तो यहीं रुक जाओ. आप पहले से ही सबको बता सकती हो कि क्या करना है.
रीना दीदी : सो जा, आशीष.
मैं: ठीक है. लेकिन कल टेंट के उस तरफ मेरा कब्जा होगा.
रीना दीदी : सपने में, छोटे.
जैसे ही मुझे नींद आने लगी, ठंडी हवा की वजह से मैं दीदी से चिपक गया. मुझे वर्षों बाद एक अजीब सी शांति महसूस हुई.
अगली सुबह, पहाड़ों ने हमारा स्वागत घने, दूधिया कोहरे से किया जो चीड़ के पेड़ों से लिपटा हुआ था. दीदी के हिलने-डुलने की आवाज़ से मेरी नींद खुली. वह उठने की कोशिश कर रही थी. और उसकी कोहनी मेरी पसलियों में चुभ रही थी.
रीना दीदी : उठ, कुंभकर्ण. सूरज बस निकला ही है, और मैं चाहती हूँ कि मम्मी-पापा के उठने और ठंड की शिकायतें शुरू करने से पहले हम सनराइज़ ट्रेक कर लें.
लेकिन इतनी सुबह कड़कती ठंड में मेरा लंड खड़ा हो गया था इसकी वजह से मैं तुरंत उठ नहीं सकता था. मैंने अपने जांघों से लंड को छुपाते हुए थोड़ी करवट फेर ली. मुझे बहुत डर लग रहा था कि कहीं दीदी की नजर ना पड़ जाए इस पर. मैंने बहाना बनाया,
मैं: थोड़ी देर बाद चलते हैं ना.
रीना दीदी: बाद में कुछ नहीं, अभी चलना है. उठ जल्दी.
मैं: दी.. पर वो...
रीना दीदी: वो क्या?
मैं: मुझे सुसु लग रहा है.
रीना दीदी: नहीं उठ जल्दी, रास्ते में कर लेना तेरा सुसु.
वो मुझे लगभग खींचकर टेंट से बाहर ले आई. पहाड़ की ताज़ी ठंडी हवा मेरी शरीर पर बर्फ़ के ठंडे पानी की बाल्टी की तरह लगी. हमने जल्दी-जल्दी ऊनी कपड़े पहने. जब मम्मी और पापा अपने टेंट में गहरी नींद सो रहे थे, दीदी एक संकरे, घुमावदार रास्ते पर आगे बढ़ रही थी. वो अपने पूरे रंग में थी, और मैं अपने खड़े लंड को दबाने की कोशिश कर रहा था. तभी उसने पलट कर पीछे देख मेरी तरफ देखा,
रीना दीदी: ओहो, ठीक है जा कर ले पहले तू सुसु.
मैं: कहां जाऊं आप भी चलो ना.
रीना दीदी: इतना बड़ा हो गया है फिर भी...जा उधर झाड़ियों के पीछे.
मैं चुपचाप एक छोटे से झाड़ी के पीछे जाकर पेशाब कर रहा था लेकिन यह भी सोच रहा था कि कहीं दीदी की नजर मेरे लंड पर ना पड़ जाए. उस वक्त में उनके बारे में कभी गलत नहीं सोचता था ना तो मेरे मन में कोई ऐसा ख्याल था.
हमने फिर आगे बढ़ना शुरू किया. जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ते गए, रास्ता और भी खड़ा और ऊबड़-खाबड़ होता गया. दीदी के पीछे चलते वक्त मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि कहीं दीदी ने कुछ देख तो नहीं लिया, मुझे बहुत शर्म आती थी. एक जगह पर रास्ता बहुत संकरा हो गया और ढीली बजरी पर मेरा पैर फिसल गया. और संतुलन खोने पर मेरे हाथ हवा में लहराने लगे. इससे पहले कि मैं फिसल जाता, दीदी का हाथ तेजी से आगे बढ़ा और उसने गजब की ताकत से मेरी कलाई कसकर पकड़ ली. उसने मुझे खींचकर रास्ते के बीचों-बीच कर दिया. उसके चेहरे पर डर और झुंझलाहट दोनों के भाव थे.
रीना दीदी: संभलकर, आशीष! ख्याली पुलाव पकाना बंद करो और देखो कि पैर कहां रख रहे हो. क्या सोच रहे हो? मैं संभाल लूंगी बस सांस लो.
उसने डांटते हुए कहा, लेकिन उसने तुरंत मेरा हाथ नहीं छोड़ा. उसे वक्त मुझे वो बेहन से भी ज्यादा बढ़कर लग रही थी.
हम ठीक उसी समय चोटी पर पहुँचे जब क्षितिज पर सोने की पहली किरण फूटी. कोहरा लगभग तुरंत गायब हो गया, जिससे नीचे की घाटी का एक विशाल दृश्य दिखाई देने लगा. हरे रंग का एक जंगल जिसके बीच से नदी का एक चाँदी जैसा धागा गुजर रहा था और ऊँचे पहाड़ों की नुकीली चोटियाँ थी. यह नज़ारा साँस रोक देने वाला था, एक ऐसा सन्नाटा जो पवित्र महसूस हो रहा था और उससे भी पवित्र मेरी दीदी.

रीना दीदी: (अचानक धीमी आवाज़ में) क्या तुझे लगता है कि हम हमेशा ऐसे ही रहेंगे? मेरा मतलब है, एक बार जब मेरी शादी हो जाएगी या तु कॉलेज चले जाएगा... तो क्या हम तब भी ऐसे ही... कहीं भाग सकेंगे?
मैं: बिल्कुल रहेंगे. फिजिक्स की किताबों से मुझे कौन बचाएगा? और हर पाँच मिनट में मुझे यह कौन बताएगा कि मैं कितना नटखट हूँ?
दीदी हँस पड़ी और अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया.
रीना दीदी: तु सच में एक नटखट है, आशु.
दोपहर का बाकी समय आलस और धूप से भरी सुस्ती में बीता. मैगी और सैंडविच के भारी लंच के बाद, पहाड़ों की हवा ने हमें मदहोश कर दिया था. जब मम्मी पापा मुख्य तंबू लगाने और सामान व्यवस्थित करने में व्यस्त थे, तब दीदी और मुझे घने चीड़ के जंगल के किनारे से सूखी लकड़ी इकट्ठा करने का काम सौंपा गया था.
दीदी ने एक टॉप और लेगिंग पहन रखी थी. वह मुझसे आगे चल रही थी और ऊंचे पेड़ों के बीच उसकी आकृति उभर रही थी.
रीना दीदी: पास रहना, इन जंगलों में रास्ता भटकना आसान है.
मैं: मैं तुम्हारे ठीक पीछे हूँ, दी.
तभी मेरी नजर उसके गांड पर पड़ी. मैं लेगिंग के नीचे उसके गांड के हल्के से हिलने-डुलने के तरीके को देख रहा था. लेकिन मैंने फिर नजर फिर ली. मैं खुद से यह सवाल करने लगता कि मैं क्या कर रहा हूं यह तो मेरी दीदी है. लेकिन उसकी गांड इतनी आकर्षक थी कि ना चाहते हुए भी बीच-बीच में मेरी नजर उसके गांड पर पड़ जाती. हमें एक ढलान मिली जहाँ एक बड़ी, सूखी टहनी टूटकर गिरी हुई थी और कई छोटे टुकड़ों में बँट गई थी. जैसे ही हमने लकड़ी इकट्ठा करना शुरू किया, गीली काई और ढीले कंकड़-पत्थरों के कारण जमीन फिसलन भरी हो गई. दीदी ने लकड़ी के एक भारी टुकड़े को पकड़ा जो दो पत्थरों के बीच फंसा हुआ था.
रीना दीदी: मेरी मदद कर.
जैसे ही मैंने उसकी मदद करने के लिए कदम आगे बढ़ाया, मेरा पैर कीचड़ के एक फिसलन भरे हिस्से पर पड़ गया. मेरा संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया, और मेरा शरीर एक अचानक, तेज़ झटके के साथ आगे की ओर झुक गया. मुझे खुद को संभालने का समय नहीं मिला. मैं दीदी से जा टकराया, और मेरे गिरने की ताकत ने उसकी पीठ को पेड़ की खुरदरी छाल से ज़ोर से टकरा दिया.
यह टक्कर अचानक और साँस रोक देने वाली थी. मेरा सीना उसके सीने से जा टकराया, और उसने उसे पेड़ से मजबूती से जकड़ लिया. लेकिन मेरा हाथ जहाँ पड़ा, उससे दुनिया की हलचल जैसे थम गई. मेरा हथेली किसी टहनी या पत्थर की बजाय सीधे उसके स्तन पर जा पड़ी.
इससे वो चौंक गई, आँखें हैरानी से फैल गई. और मैं अपने हाथ के नीचे उसके उसके मुलायम बड़ी चूचि को महसूस कर सकता था, जो मेरी अपनी धड़कन की घबराहट से मेल खा रही थी. कुछ पलों के लिए, हम वैसे ही रहे एक-दूसरे से जुड़े हुए. मेरा हाथ मजबूती से उसके सीने पर था और हमारे चेहरे बस कुछ ही इंच की दूरी पर थे. मैं उसके चेहरे की, गर्दन और बालों की खुशबूको महसूस कर सकता था. मैंने देखा कि उसके होंठ खुले, और हैरानी व उलझन में एक छोटी सी आह उसके मुँह से निकल गई.
उसने अचानक पूरी ताकत लगाकर मुझे पीछे धकेल दिया, और चेहरे पर थोड़ी शर्म थी.
रीना दीदी: आशीष! यह क्या था? तुम... तुम बस पेड़ को पकड़ सकते थे!
मैं: मैं फिसल गया था, दी!
रीना दीदी: तुम्हें और ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत है. यही वजह है कि मैं हमेशा तुमसे कोई भी काम ध्यान से करने को कहती हूं. चल चलें.
जब मैं उसके पीछे-पीछे वापस गया, तो मुझे चाय या परिवार की कोई परवाह नहीं थी. मैं बस यही सोच रहा था कि मेरे हाथ में उसके चुचियों का भार कितनी मुलायम महसूस हो रही थी.
शाम को दीदी आग जलाने की कोशिश कर रही थी.
रीना दीदी: आशीष! जलावन, इधर ला जल्दी!
वह चिल्लाई, पर उसने मेरी तरफ नहीं देखा. उसकी आँखें आग पर ही टिकी रहीं, लेकिन उसके आंखों में शर्म दिख रहा था. मैंने उसे सूखी टहनियाँ थमा दीं, और जैसे ही हमारी उँगलियाँ आपस में टकराई, मैंने उतनी जल्दी अपना हाथ पीछे नहीं खींचा जितनी जल्दी पहले खींचा था. यह एक पल का, बहुत छोटा सा स्पर्श था, लेकिन मैंने महसूस किया कि वही बिजली सी मेरे अंदर दौड़ गई.
आग पूरी तरह भड़कने के बाद, हम उसके चारों ओर सिमटकर बैठ गए. पापा मम्मी को बाहों में भरते हुए अपनी जवानी का कोई किस्सा सुना रहे थे, पर मैं मुश्किल से ही सुन रहा था. मेरी नजर मम्मी पर चली गई जो बाहों में जाकर अपने आप को बहुत रिलैक्स महसूस कर रही थी. मैं भी वही एहसास चाहता था इसीलिए मैंने भी अपना सर दीदी के कंधे पर झुकाया. तो दीदी ने भी मुझे अपने सीने से लगा लिया.
यहां पर मम्मी पापा का रिश्ता अलग था लेकिन मेरा और दीदी का तो भाई बहन का ही था और दीदी भी मुझे अपना छोटा भाई समझ कर ही अपने सीने से लगाई थी. मैंने अपने गालों पर उसके स्तनों की गरमाहट को भी महसूस किया जिससे मेरे लंड में थोड़ी हलचल पैदा होने लगी.

मैंने अपने गाल को उसकी चूचियों पर थोड़ा और दबाया इससे उसे कुछ अटपटा लगा. तभी उसने धीरे से अपने एक हाथ से मेरे सर को हटाने की कोशिश की लेकिन उसने देखा कि मैंने अपना जोर थोड़ा और बढ़ा दिया है उसके सीने की तरफ. फिर उसने पूरी कोशिश करके जैसे तैसे मुझे अलग किया. मैं ध्यान हटाते हुए फिर पापा की बातें सुनने लगा. जैसे-जैसे रात गहरी होती गई और बातचीत धीमी होकर एक सुकून भरा माहौल बन गई. दीदी ने मुझसे बात करना बंद कर दिया.
हिल स्टेशन से वापसी का सफर किसी सपने से एक ठंडी, कठोर सच्चाई में उतरने जैसा लग रहा था. मम्मी और पापा आगे बैठे थे, जो देखे गए नजारों और अगले सफर की योजनाओं के बारे में उत्साह से बातें कर रहे थे. रीना दीदी खिड़की से बिल्कुल सटकर बैठी थी, उसकी नजरें हरे-भरे जंगलों और घुमावदार रास्तों के धुंधलेपन पर टिकी थीं. जब से हमने कैंपसाइट छोड़ा था, उसने मेरी तरफ नहीं देखा था. उसे अभी भी शर्मिंदगी महसूस हो रही थी मेरे जानबूझकर किए गए हरकत की वजह से.
जैसे ही पापा ने थोड़ी देर के आराम के लिए सड़क किनारे एक ढाबे पर कार रोकी, दीदी ने मेरा हाथ पकड़ा और हमारे मम्मी-पापा की नजरों से बचाकर मुझे एक बड़े बरगद के पेड़ के पीछे खींच लाई.
रीना दीदी: आशीष, मेरी बात सुन, जो कुछ हुआ आग के पास उस रात वह एक गलती थी. एक बहुत बड़ी, गलती.
मैं: दी, मुझे नहीं पता था कि आपको इतना बुरा लगेगा. मुझे तो बस प्यार चाहिए था.
रीना दीदी: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता! हम भाई-बहन हैं, क्या तु इस चीज को समझता भी है? यह गलत है.
मैं: मैंने कुछ किया भी तो नहीं, हमने बस हाथ पकड़े थे. मैंने बस कुछ महसूस किया था.
रीना दीदी: यही गलत बात है कि तूने कुछ महसूस किया. हमारे बीच वो होना ही नहीं चाहिए था. मैं रास्ते भर हर पल इसके बारे में सोच रही थी. मैं इसे दोबारा नहीं होने दे सकती. हमें वैसे ही वापस लौटना होगा जैसे सब कुछ था.
तभी मम्मी की आवाज आई,
मम्मी: रीना! आशीष! जल्दी करो, खाना ठंडा हो रहा है.
दीदी ने एक लंबी साँस ली, अपने कपड़ों को ठीक किया और खुद को थोड़ा संभाला. उसने आखिरी बार मेरी तरफ देखा,
रीना दीदी: आज के बाद कभी गलत मत सोचना और इसके बारे में दोबारा बात मत करना, एक शब्द भी नहीं. कभी नहीं.
जैसे ही हम वापस कार में चढ़े, यात्रा आगे बढ़ गई.
शहर के अपने घर वापस लौटना किसी पिंजरे में कदम रखने जैसा था. रीना दीदी ने बहुत जोश के साथ अपनी दिनचर्या में वापसी कर ली थी.
हमारे लौटने के कुछ दिनों बाद, घर शांत था. मम्मी और पापा पास के ही एक शहर में किसी शादी में गए थे, और हमें पूरे वीकेंड के लिए अकेला छोड़ गए थे. मैंने उसे उसके बेडरूम में पाया, वह अपने डेस्क पर लैपटॉप खोले बैठी थी, और उसने एक पतली कुर्ती पहनी हुई थी जो उसके शरीर से चिपकी हुई थी. वह तनाव में लग रही थी, उसके बाल एक जूड़े में बंधे हुए थे, और कुछ खुले बाल उसके लाल चेहरे पर बिखर रहे थे.

रीना दीदी: मैं तुझसे कहा था ना कि मैं कुछ काम कर रही हूं. तु मेरे दरवाज़े पर क्यों खड़ा है.
मैंने कोई जवाब नहीं दिया. मैं अंदर चला गया और एक हल्की सी आवाज़ के साथ पीछे से दरवाज़ा बंद कर दिया. यह देख वो थोड़ी हैरान थी.
रीना दीदी: आशिष, बाहर जा. मैं काम कर रही हूँ.
मैं: मैं किताबों पर ध्यान नहीं दे पा रहा हूँ, दी. मैं सिर्फ यही सोच सकता हूँ कि आप उस आग के पास कैसी दिख रही थी.
रीना दीदी: क्योंकि वह नॉर्मल था. मैंने क्या गलत किया तुझे गले से लगा कर जो इस तरह से मुझसे पेश आ रहा है. मैंने तुझे एक हज़ार बार बताया है, यह गलत है.
मैं: क्या तुम्हें देखना चाहना गलत है. मुझे पता है कि तुम इसे उस कुर्ती के नीचे छुपा रही हो, पर मैं बता सकता हूँ कि तुम भी इसके बारे में सोच रही हो.
रीना दीदी: बंद कर, यह पागलपन है. तु अठारह साल का है, तुझे अपने फ्यूचर करियर और पढ़ाई के बारे में सोचना चाहिए न कि इस बारे में.
मैं: बस एक बार, दी. बस मुझे उन्हें देखने दो. मुझे अपने ब्रेस्ट दिखाओ. वो बहुत मुलायम है.
यह सुनते ही ना जाने वो एकदम आग बबूला हो गई और एक जोरदार थप्पड़ खींचकर मेरे गाल पर मारा.
रीना दीदी: निकल यहां से. बात मत करना मुझसे आज के बाद. तू मुझसे ऐसा कैसे कह सकता है? पढ़ने की उम्र में यह सब गंदगी दिमाग में भर रही है जा जाकर पढ़ाई कर अपनी.
मैं पूरी तरह से डर गया. उसका जोरदार मरा हुआ थप्पड़ मेरे गाल पर छपा हुआ था. मेरी धड़कन में तेज थी कुछ समझ में नहीं आ रहा था क्या करूं. मैं बिल्कुल सन्न रह गया और उसके डांटने के बाद चुपचाप अपने कमरे में चला गया.
अपने बेडरूम के एकांत में वापस आकर, मुझे अंदर ही अंदर डर खाए जा रहा था कि इतना भी मैंने क्या गलत कर दिया. मैं जानता था कि समाज क्या कहता है. मैं जानता था कि हमारे माता-पिता, और खासकर सख्त कुसुम, क्या करते अगर उन्हें कभी मेरे विचारों पर शक भी होता. मैं जानता था कि हर भारतीय घर में भाई-बहन का रिश्ता पवित्र, निर्मल और पूरी तरह से आत्मिक होता है. लेकिन मैं तो सिर्फ स्तनो की बस एक झलक को तरस रहा था.
मैंने अपना फोन उठाया, मैंने साधारण खोज से शुरुआत की. यह जानने के लिए एक तार्किक स्पष्टीकरण खोजने की कोशिश की कि मैं ऐसा क्यों महसूस कर रहा था. "मुझे अपनी बहन से आकर्षण क्यों है?" "क्या किसी भाई-बहन के प्रति ऐसी भावनाएं होना सामान्य है?"
शुरुआती परिणाम बेहद रूखे और वास्तविक थे.
लेकिन मैंने जितना अधिक इसके गलत होने के बारे में पढ़ा, मैं उतना ही यह जानना चाहता था कि आखिर किस हद तक की चीज गलत हो सकती है. मैंने और गहराई से खोजना शुरू किया.
तभी मुझे वे मिलीं. मैंने 'टैबू इरोटिका' (वर्जित कामुक कहानियों) वाली एक साइट के लिंक पर क्लिक किया. शुरू में तो बस उत्सुकता थी, लेकिन जैसे-जैसे मैं स्क्रॉल करता गया, मेरी साँसें थम गई. वहाँ हज़ारों कहानियाँ थीं, भाई-बहनों के बीच के रिश्तों के बारे में विस्तार से. यही नहीं बल्कि माँ और बेटे के संबंधों में भी यौन संबंधों को दर्शाया गया था और यह देखकर तो मेरा जी मचलने लगा. ये कहानियाँ सिर्फ़ 'क्रश' या 'गलती से छू लेने' जैसी नहीं थीं. ये पूरी तरह से सेक्सुअल रिश्तों की कहानियाँ थीं. मैंने पढ़ा कि कैसे लड़के अपनी माँ, बहनों की चूत का मज़ा लेते हैं, रात में एक-दूसरे के कमरे में छिपकर जाने का रोमांच, और आपस में शेयर किया गया उस वर्जित यौन सुख का राज़. मुझे सचमुच ज़ोरदार झटका लगा. मेरा लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया और अपनी बेहन को याद करने लगा.
मेरा हाथ तेजी से लंड को हिलाने लगा और उसी वक्त अपनी मम्मी का भी ख्याल आना शुरू हो गया. जो की और ज्यादा उत्तेजक था. इन सब को सोच सोच कर मैं पागल हुआ जा रहा था और आखिर में मेरा पानी निकल ही गया.
अगले दिन दीदी किचन में काम कर रही थी तभी मैं उसके पास गया. वह मुझसे बहुत ज्यादा नाराज थी, ना तो वह मुझसे बात करना चाहती थी. मैंने कोशिश किया कि कल रात जो कुछ मैंने पढ़ा था उसे बता कर समझा सकूं. मैं चुपचाप उसके पास गया. दीदी ने तिरछी नजर से मुझे देखा और फिर अपने काम में लगी रही.
मैं: दीदी देखो आप कहती थी ना कि यह गलत है. मैं आपको दिखाता हूं कि ऐसी बहुत कहानी है जहां भाई-बहन आपस में वाकई में प्यार करते हैं.
रीना दीदी: तुझे एक बार समझाया तो समझ में नहीं आया है? फिर से थप्पड़ खाना है?
मैं: दीदी प्लीज मैं आपसे सच में बहुत प्यार करता हूं.
यह सुनकर उसके चेहरे पर एक अजीब सा भाव नजर आया और आंखों में हल्के आंसू. मेरे प्यार शब्द कहने से नहीं बल्कि मेरे नादानी की वजह से. वो मुझे इस तरह नहीं देखना चाहती थी. वह एक पल के लिए किसी गुड़िया की तरह शांत खड़ी थी. यह देख मैं भी उसके करीब गया. जैसे ही मैंने अपना हाथ उसकी गर्दन से नीचे उसकी कुर्ती के गले की ओर बढ़ाया, तभी गलियारे से आती एक तीखी आवाज़ ने सन्नाटे को चीर दिया.
"आशु कहां है? दरवाजा खोल" यह आवाज़ किसी बर्फीले पानी की बाल्टी की तरह लगी. रीना दीदी एकदम से पीछे हटी और घबराहट में मुझे दूर धकेल दिया. हड़बड़ी में अपने कपड़े ठीक किए और एक ही झटके में गाल से आँसू पोंछ लिए. मैं पीछे हट गया, मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था. वो कुसुम थी. मेरी दूसरी बड़ी बहन, कुसुम, अपनी पढ़ाई पूरी करके अभी-अभी घर लौटी थी. अगर रीना दीदी घर की नरम और सबका ख्याल रखने वाली थी, तो कुसुम एक तूफ़ान की तरह थी. चौबीस साल की उम्र में ही उसका मिज़ाज ऐसा था कि छोटी-सी बात पर भी वो धूप वाली दोपहर को युद्ध के मैदान में बदल सकती थी. हमारा रिश्ता हमेशा उतार-चढ़ाव वाला रहा, वह मुझे एक आलसी और बिगड़ैल बच्चा समझती थी, और मैं उसे एक चलते-फिरते बारूद के ढेर जैसा मानता था.
रीना दीदी: जा जल्दी दरवाजा खोल.

दीदी के कहने पर मैं दौड़कर दरवाजा खोलना गया. ज़ोरदार धक्के के साथ दरवाज़ा खुला और मैं दीवार से जा टकराया. कुसुम दीदी वहाँ खड़ी थी, हाथ बाँधे हुए.
कुसुम दीदी: दरवाज़ा क्यों बंद है? और तुम दोनों ऐसे क्यों देख रहे हो जैसे कोई भूत देख लिया हो? रीना, तुम ऐसे क्यों हाँफ रही हो जैसे कोई मैराथन दौड़ी हो?
रीना दीदी: मैं... मैं बस आशीष को पढ़ने के लिए कह रही थी, कुसुम. वह अपनी केमिस्ट्री को लेकर बहुत जिद्दी हो रहा है.
कुसुम दीदी: जिद्दी? बस यही एक चीज तो इसे आता है. मैं कुछ महीनों के लिए बाहर गई और तुमने उसे पूरी तरह नकारा बना दिया, रीना. पिछला रिजल्ट मुझे याद है तेरा आशीष कितना थर्ड क्लास नंबर लाया था तुने.
मैं: सॉरी दी अब ऐसा नहीं होगा. मैं पढ़ाई कर रहा हूँ.
कुसुम दीदी: मुझे 'मैं पढ़ाई कर रहा हूँ' मत सुना! अब मैं आई हूं तो देखती हूं तू क्या पढ़ाई कर रहा है.

माहौल में बदलाव चौंकाने वाला था. कुछ सेकंड पहले, मैं रीना दीदी के इरादों को तोड़ने ही वाला था. अब, मैं एक ऐसी महिला से डाँट खा रहा था जो कमियाँ ढूँढने में माहिर थी. मैंने कुसुम दीदी के पीछे खड़ी रीना की तरफ़ देखा, जो राहत और बची हुई घबराहट के मिले-जुले भाव से हम दोनों को देख रही थी. वह फिलहाल सुरक्षित थी, कुसुम के गुस्से की ढाल के पीछे. मम्मी पापा नहीं घर लौट आए थे.
हम सब ने साथ मिलकर खाना खाया. हम टेबल के चारों ओर बैठे थे, ताज़ा रोटियों और तरह-तरह के स्वादिष्ट खाने की गंध कमरे में भरी हुई थी कुसुम दीदी के घर लौटने की खुशी में.
मेरे सामने उस वक्त मेरे घर की सारी औरतें बैठी थी जिनके संबंध में मैंने कल रात अश्लीलता भरी कहानी पढ़ी थी. मेरे दिमाग में हजारों सवाल दौड़ने लगे की मम्मी की चूत आखिर कैसी होगी, कुसुम दीदी जो मुझ पर इतना गुस्सा करती है उसकी चूत कैसी होगी और रीना दीदी फिलहाल जिनके पीछे मैं पड़ा था.
यह सब इतना आसान नहीं होता है. कोई माँ कोई बहन अपने बेटे के साथ इतना खुलकर ना तो कभी बात कर सकती है और उसके साथ यौन संबंध बनाना तो लगभग नामुमकिन है. लेकिन यह सारी बातें मुझे और रोमांचित कर रही थी कि अगर मेरी किस्मत अच्छी हुई और अगर मैं कामयाब हो गया तो वो पल भी यादगार होगा.
कुसुम दीदी: आशीष, अपनी थाली घूरना बंद कर और खाना खा.
ओहो यह भी ना मैं इसके लिए इतना सब कुछ सोच रहा हूं और यह मुझे डांटती रहती है. खाना खत्म होने पर, मैं प्लेटें हटाने में मदद के लिए वहीं रुक गया. रसोई में रीना दीदी मेरे ठीक बगल में थी, और हमारे बीच बर्तनों के टकराने की आवाज़ ही एकमात्र आवाज़ थी. कुछ ही पलों के लिए, कुसुम दीदी दूसरे कमरे में अपनी डिग्री को लेकर मम्मी पापा से बातें कर रही थी, जिससे हमें थोड़ी देर के लिए एकांत का एक पल मिल गया.
मैं दीदी के और करीब गया, मेरा कंधा उसके कंधे से छू गया. और धीरे से कमर पर हाथ रख दिया. उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा, उसकी नज़रें सिंक पर टिकी थीं.
रीना दीदी: आशीष, बस कर प्लीज़. तुझे इस बात का अंदाज़ा है कि अगर किसी को पता चल गया तो क्या होगा? अगर कुसुम को पता चल गया तो?
उसने मुझे दूर धकेला, ज़ोर से नहीं बल्कि काँपते हुए, बेताब हाथों से.
रीना दीदी: मैं नहीं कर सकती... मैं नहीं करूँगी. तुम्हें अपने जीवन, अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने की जरूरत है.
मैं: तुम भी तो नहीं चाहती हो इतनी जल्दी शादी करना, उन पुराने नियमों को मनाना, कुछ नया करना चाहती हो.
रीना दीदी: यह घिनौना है. मैं तुमसे प्यार करती हूँ, आशीष, लेकिन उस तरह नहीं.
कुसुम दीदी: आशीष! रीना! तुम दोनों वहाँ अंदर क्या रहे हो?
कहते हुए कुसुम दीदी की आहट करीब आती हुई सुनाई दी. रीना दीदी पीछे हट गई, उसने जल्दी से बर्तनों की तरफ़ रुख किया और एक बर्तन को जरूरत से ज्यादा जोर से रगड़ने लगी. मैं पीछे हट गया. कुसुम दीदी रसोई के अंदर आ गई,
कुसुम दीदी: इतनी खामोशियाँ क्यों हैं? रीना ऐसी क्यों देख रही है जैसे अभी बेहोश हो जाएगी?
रीना दीदी: बस कामों के बारे में बात कर रहे थे, कुसुम.
उसका संदेह बना रहा. तुम दोनों कुछ अजीब हरकत कर रहे हो.
कुसुम दीदी: आशिष, अगर मुझे पता चला कि तुम अपनी बकवास से रीना का ध्यान उसके ज़िम्मेदारियों से भटका रहे हो, तो मैं तुम्हें इसका पछतावा करा दूँगी.
रक्षाबंधन से पहले के दिन एक अजीब तरह की बेचैनी और तड़प से भरे थे. भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और सुरक्षा का यह त्योहार, मेरे अंदर मची भूख के कारण एक मज़ाक जैसा लग रहा था. लेकिन मेरी बहनों के लिए यह काफी खुशियों का त्यौहार था. रीना दीदी भी सारी बातें नजर अंदाज करके मुझे अपने साथ मार्केट ले जाने को कह रही थी.
रीना दीदी: आशीष, तैयार हो जा! बाज़ार में ज़्यादा भीड़ होने से पहले हमें राखी, मिठाई और तोहफ़े लेने हैं.
मम्मी: आशीष, तुम उसके साथ मोटरसाइकिल पर जाओ. सामान लेने में उसकी मदद करना और भगवान के लिए, आज उसे परेशान मत करना.

मम्मी का मतलब यहां पर मजाकिया तौर तरीके से परेशान करने का था
रीना दीदी ने सुंदर सलवार-कमीज़ पहना था. बाइक की तरफ़ चलते हुए उसका कपड़ा उसके गांड से सटा हुआ था. जब वह पीछे वाली सीट पर बैठी, तो उसने दूरी बनाए रखी, लेकिन जैसे ही मैंने इंजन स्टार्ट करके रफ़्तार बढ़ाई, झटके से वह आगे की तरफ़ खिसक गई. उसकी छाती मेरी पीठ से ज़ोर से दब गई और उसकी चूचियां मेरी पीठ में सट गए. मुझे अपनी गर्दन पर उसकी साँसें महसूस हो रही थीं, और दोपहर की धूप की गर्मी के साथ उसके परफ़्यूम की खुशबू मिल रही थी.
मैंने गति धीमी नहीं की. बल्कि, मैंने मोड़ों को जरूरत से ज्यादा तीखा काटा, जिससे उसे कसकर मेरी कमर पकड़नी पड़ी. उसकी बड़ी चूचियों की गर्मी अब जाकर मेरे बदन में सनसनाहट पैदा कर रही थी जिससे मेरा लंड खड़ा हो गया.
रीना दीदी: आशीष! धीमी कर!
मैं: अरे दीदी डरती क्यों हो? मुझे अच्छा लग रहा है कि आप मुझसे इतनी करीब हो.

उसने पीछे खिसकने की कोशिश की, लेकिन मैंने अपना वजन बदलकर उसे वैसे ही रोक कर रखा.
रीना दीदी: यह समय और जगह सही नहीं है. ढंग से पेश आ.
मैं: क्यों? यहाँ सिर्फ हम दोनों हैं.
रीना दीदी: ओहो चल चुपचाप.
कुछ देर बाद हम बाजार पहुंचे. बाजार रंगों और गंधों से भरा एक अस्त-व्यस्त माहौल था. हमने भीड़ के बीच से रास्ता निकाला, सजी हुई राखियां और सोने के वर्क वाली मिठाइयों के डिब्बे खरीदे. खरीदारी के दौरान, मैं उसके पास एक साया बनकर रहा, और संकीर्ण गलियों से गुजरते हुए मेरा हाथ बार-बार गलती से उसकी पीठ के निचले हिस्से को छू जाता था. हर बार, वह मुझे एक तीखी नजर से देखती या धीमी आवाज में डांटती.

वापसी के सफर के लिए जब तक हमने बाइक पर बैग लादे, सूरज डूबने लगा था. जैसे ही हम वापस तेजी से दौड़े, सड़क साफ हो गई, और हवा हमारे चारों ओर सनसनाहट करने लगी. बाजार के रोमांच और शारीरिक नजदीकी ने मुझे कुछ ज्यादा ही साहसी महसूस कराया था.
मैंने बाइक की रफ्तार धीमी की,
मैं: दीदी, तुम जानती हो कि राखी सुरक्षा के बारे में है. पर क्या तुम सच में मुझ पर भरोसा करती हो? मेरे मन में अजीब से ख्याल आ रहे हैं और मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ.
रीना दीदी: यह क्या कह रहा है? तु इस पवित्र दिन पर ऐसी बातें कैसे कर सकता है? मेरी बात सुन, आशिष! मेरी तरफ देख! तुझे लगता है कि यह कोई मजाक है? मैं वो हूँ जिसने बचपन में तुम्हारा हाथ थामकर तुम्हें चलना सिखाया. मैं वो हूँ जो तुम्हारी बीमारी में रातों को तुम्हारे साथ जागी थी. अपनी सोच बदल और हमारी पवित्रता का सम्मान कर.
उसके इन बातों ने मुझे शर्मिंदा कर दिया और मैं भी इसीलिए अपने मन को शांत किया. रक्षाबंधन की सुबह, हवा में अगरबत्ती और ताजे गेंदे के फूलों की महक भरी हुई थी. हर कोई अपने सबसे अच्छे पारंपरिक कपड़ों में था. रीना दीदी बेहद खूबसूरत लग रही थी. उसने जटिल सुनहरी कढ़ाई वाला एक गहरा लाल अनारकली सूट पहना था. और उसकी भौहों के बीच एक छोटी सी बिंदी सजी थी. वो पूरी तरह से एक शांत और संस्कारी बड़ी बहन लग रही थी.
दूसरी तरफ कुसुम दीदी थी. जो की खूबसूरती में किसी से कम नहीं थी. बस यही दिक्कत थी कि वो मुझ पर चिल्लाती रहती थी. लेकिन आज तो एकदम चौंकाने वाली घटना हो गई जब वो मुझ पर फूल बरसाने लगी.
मेरे कलाई पर राखी बांधते वक्त,

कुसुम दीदी: मेरे प्यारे भाई, अपनी बेहन का कहना मानेगा ना.
मैं: हां मेरी प्यारी बहन... कभी नहीं.
कुसुम दीदी: मम्मी देखो ना, आज अच्छे से बात कर रही हूं फिर मुझसे ऐसे बोल रहा है.
मम्मी: ओ कुसुम छोड़ो भी उसे परेशान करना.
कुसुम दीदी: चल अब मेरा गिफ्ट निकाल.
मम्मी ने पहले ही मुझे एक पायल दिया था जो मैं कुसुम दीदी को देने वाला था. उस पायल को देखकर कुसुम दीदी बहुत खुश हो गई और मेरे गले से लिपट गई. सच में उसके बदन की गर्माहट का भी जवाब नहीं और क्या फूलों जैसी खुशबू थी.
जैसे ही रीना दीदी थाली लेकर आगे बढ़ी, उसकी कलाइयों में सोने की चूड़ियाँ खनक उठीं. मेरे माथे पर तिलक लगाने के लिए वो मेरी ओर झुकी. उसके झुकते ही उसके कमीज़ का गला थोड़ा नीचे हुआ, जिससे मुझे उसकी गोरी छाती का एक पल भर का, दिल थाम देने वाला नज़ारा मिल गया और मुझे तुरंत अपनी पतलून के कपड़े पर तनाव महसूस हुआ.
रीना दीदी: (धीमी आवाज में) ध्यान दे, आशु.
उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मेरे अलावा शायद ही कोई सुन सके. उसके लहज़े में एक चेतावनी थी, इस बात का संकेत कि वो अच्छी तरह जानती थी कि मैं क्या देख रहा हूँ और मुझ पर इसका क्या असर हो रहा था.
उसने मेरे माथे पर तिलक लगाया और मुझे मिठाई का एक टुकड़ा खिलाया. जैसे ही उसकी उंगलियाँ मेरे होठों को छू गई, मुझे इच्छा का एक ऐसा तीव्र झटका महसूस हुआ कि मैं लगभग लड़खड़ा गया. मैं उसे अपने करीब खींचना चाहता था, उसके कान में कहना चाहता था कि दुनिया का कोई भी धागा उस अहसास को नहीं रोक सकता जो मैं उसके लिए रखता था.

जैसे ही उसने मेरी कलाई पर राखी बांधी. यह एक साधारण, पारंपरिक रस्म थी, लेकिन यह पहली बार था जब मेरे अंदर एक अलग ही परिवर्तन था. मैं थोड़ा आगे झुका, मेरा चेहरा उसके चेहरे के करीब था,
मैं: तुम आज बहुत खूबसूरत लग रही हो, दी.
रीना दीदी: आशीष! आज नहीं. सबके सामने तो बिल्कुल नहीं.
बाद में, जब मेहमान जा चुके थे और कुसुम दूसरे कमरे में थी, मुझे रीना दीदी रसोई में मिल गई. मैंने उसके करीब जाकर रोक लिया.
मैं: कुसुम दीदी मुझसे नफरत करती होगी, लेकिन हम दोनों जानते हैं कि आप मुझसे प्यार करती हो.
रीना दीदी: लेकिन तुम मेरे भाई भी हो और सब कुछ के बावजूद... मैं इस दुनिया में किसी भी इंसान से ज्यादा तुमसे प्यार करती हूँ.
इससे पहले कि मैं जवाब देता, वो आगे बढ़ी और अपनी बाहें मेरे चारों ओर लपेट लीं, मुझे कसकर गले से लगा लिया. उसकी फ्रूटी और स्पाइसी खुशबू जो कुसुम दीदी के फूलों वाले खुशबू से अलग थी उसको महसूस करते हुए, अपनी गर्दन में उसका चेहरा छिपाने से पहले मैं एक सेकंड के लिए वहीं ठहर गया. यह गले मिलना मूल रूप से क्षमा का एक संकेत, भाई-बहन का आलिंगन मात्र था.

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