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अगली सुबह, घर का माहौल कुछ बदला हुआ सा लग रहा था. मम्मी वहीं थीं, सुबह का नाश्ता बनाते हुए. उन्होंने एक साधारण सूती साड़ी पहन रखी थी, जो उनके गांड पर एक टाइट पकड़ बनाकर रखे हुए था. मैं उन्हें देखता रहा, और मेरा दिमाग पिछली रात की यादों में खो गया. मुझे किचन की चौखट पर खड़ा देखकर,
मम्मी: गुड मॉर्निंग, बेटा. तुम्हारा बुखार कैसा है? अब बेहतर महसूस कर रहे हो? मैं: बहुत बेहतर, मम्मी.
वो मेरे सामने आकर खड़ी हो गई और मेरे दोनों कंधे पर हाथ रखते हुए,
मम्मी: ओहो दो दिन की बीमारी ने कितना कमजोर कर दिया. बैठो और खाना खाओ चलो.
तभी पापा का फोन आया, उनका प्रोग्राम बदल गया था. अब उनके आने में थोड़ा और वक्त लग सकता था, लगभग एक महीने का. हालाकि, उनकी यह उदासी ज़्यादा देर नहीं टिकी. कुछ घंटों बाद, फोन फिर बजा. यह अंजू आंटी थीं, जो मम्मी की सबसे करीबी दोस्तों में से एक थीं. जैसे ही मम्मी ने सुना, उनका चेहरा चमक उठा, और उदासी की जगह उत्साह की एक लहर ने ले ली. अंजू आंटी की बेटी, संगीता, की शादी हो रही थी. यह एक भव्य आयोजन था, एक उत्सव जिसके लिए हमें तुरंत तैयारी शुरू करने की जरूरत थी.
हम वहां शनिवार शाम को पहुंचने वाले थे. वो आखरी दिन था मेहंदी का उसकी अगली सुबह शादी वाला दिन था. मुझे तो राहुल से भी मिलने की बहुत जल्दी थी, वो मेरा बहुत अच्छा दोस्त था. हालांकि राहुल मुझसे उम्र में बड़ा था पर कभी भी उसने बड़ा जताने की कोशिश नहीं की. वो हमेशा मुझे दोस्त की तरह ही मिलता था. शादी के लिए उन लोगों ने मैरिज गार्डन बुक किया था. वहाँ का माहौल बहुत ही शानदार था, जो गेंदे के फूलों, अगरबत्ती और इत्र की खुशबू से महक रहा था.
जब हम पहुंचे, अंजू आंटी के परिवार ने खुले दिल से हमारा स्वागत किया. हम सालों से एक-दूसरे के करीब थे, जिससे वहाँ का माहौल बहुत अपनापन और सुकून भरा लग रहा था.
भीड़ के बीच, मैंने तुरंत राहुल को देख लिया. वो भी मुझे देखकर उतना ही खुश हुआ. आखिर हमें बहुत सारी बातें करनी थी. तभी मेरी नजर संगीता पर भी पड़ी, वो बहुत खूबसूरत लग रही थी, किसी अप्सरा जैसी. उत्सव की रोशनी में वो चमक रही थी, और उसके चलने का अंदाज़ जो शालीन होने के साथ-साथ आत्मविश्वासी भी था. कमरे में मौजूद हर व्यक्ति का ध्यान खींच रहा था. उसने एक मीठी मुस्कान और चमकती हुई आँखों के साथ हमारा स्वागत किया.
संगीता: आशीष! तुम्हें देखो, तुम कितने बड़े हो गए हो. मैं: और तुम बहुत ही सुंदर लग रही हो. संगीता: थैंक यू! थैंक यू!
उसने मज़ाक करते हुए मुझे गले लगाने के लिए आगे कदम बढ़ाया. जैसे ही उसने अपनी बाहें मेरे गिर्द डालीं, उसकी मदहोश कर देने वाली कस्तूरी खुशबू किसी लहर की तरह मुझ पर छा गई.
हां वो मेहंदी वाली रात थी, सारी लड़कियां मेहंदी लगाने में व्यस्त थी और बाद में फिर नाच गाना.
रीना दीदी और कुसुम दीदी भी उत्साह के रंग में रंग गए थे. अंजू आंटी और मम्मी भी उस बढ़ते उम्र को अपनी खूबसूरती से छुपा रही थी. तभी राहुल मेरे पास आया,
राहुल: कैसा लग रहा है मेरे भाई सब कुछ? मैं: यार बहुत अच्छी तैयारी की है तूने. राहुल: अरे असली तैयारी तो कल है. तू भी चलना साथ में. मैं: कहां? राहुल: इवेंट मैनेजमेंट वालों से पता करने की सब तैयारी सही है कि नहीं कल के लिए. मैं: हां हां बिल्कुल चलेंगे. वो मेरे भी तो बेहन है.
अगले दिन मैं और राहुल मोटरसाइकिल पर सवार होकर सफर के लिए निकल गए.
हम उस जगह से दूर निकल आए, हमारे चेहरों पर हवा के झोंके लग रहे थे क्योंकि हम जंगलों के एक शांत हिस्से की तरफ बढ़ रहे थे. हमारी बात लड़कों की आम बातचीत से शुरू हुई. गर्मी की शिकायत करना, अजीब रिश्तेदारों पर हँसना, और फिर बातचीत महिलाओं की ओर मुड़ गई.
राहुल ने गाड़ी धीमी करते हुए मेरी तरफ देखा और कहा.
राहुल: यार, तेरा परिवार कुछ अलग ही है. तेरी बहनें बेहद खूबसूरत हैं. और तेरी माँ? गजब, आशीष, वो तो उम्र के साथ और भी हसीन हो गई हैं. मुझे नहीं पता कि तु उनके आस-पास खुद पर काबू कैसे रखता है.
मुझे एक अजीब सी सिहरन महसूस हुई. आमतौर पर मुझे अपनी इच्छाओं को छिपा कर रखना पड़ता था, लेकिन राहुल अलग था. वो कोई नैतिक उपदेश देने वाला नहीं था. वो एक दोस्त था, जो मेरी ही तरह सोचता था.
मैं: यह आसान नहीं है. उन्हें कोई अंदाज़ा नहीं है कि मेरे दिमाग में क्या चलता है. हर बार जब रीना दीदी झुकती है या कुसुम दीदी मुझ पर चिल्लाती है, तो मैं सिर्फ यही सोचता हूँ कि वे मेरे साथ कैसी लगेंगी.
राहुल ने एक धीमी सी सीटी बजाई, उसके होठों पर एक मुस्कान थी. वो हैरान नहीं लग रहा था,
राहुल: अरे वाह. तुझे सच में इस तरह की चीजें पसंद हैं? मैं: यार सॉरी, लेकिन क्या करूं तू मेरा खास है इसलिए बता दिया. किसी को मत बताना. अगर पापा या किसी और को मेरे इन ख्यालों के बारे में पता चल गया... तो मेरी खैर नहीं. राहुल, कसम से, यह बात हमारे बीच ही रहनी चाहिए. राहुल: शांत हो जा. तेरा राज़ मेरे पास महफ़ूज़ है. जब मैं ट्रिगर दबाने में तेरा मदद कर सकता हूं, तो भला मैं भंडाफोड़ क्यों करूँगा? मैं तेरी मदद करना चाहता हूं.
मुझे उम्मीद थी कि राहुल एक मददगार और सुनने वाले की तरह व्यवहार करेगा, लेकिन जैसे-जैसे हमारी बात आगे बढ़ी, मुझे एहसास हुआ कि वो न केवल उस वर्जित विषय में रुचि रखता है बल्कि उसका अपना भी एक इतिहास था, और इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि वो घर की औरतों के बारे में बहुत बारीकी से समझ रखता था.
मैं राहुल के सामने खुद को छोटा महसूस कर रहा था.
राहुल: अच्छा मुझे यह बता, तूने पहले किसके साथ कोशिश किया? मैं: रीना दीदी. मैं उसके बारे में सोचना बंद नहीं कर पा रहा था. उसके मोटी चूचियां जिस तरह उसके कपड़े, उसके शरीर पर कसे हुए लगते हैं. वो सच में बहुत कामुक है. राहुल: यहीं तु बिल्कुल गलत है. तु किसी क्रश वाले लड़के की तरह सोच रहा है, उस आदमी की तरह नहीं जो अपनी चाहत को हासिल करता है. रीना एक भटकाव है. वो एक साइड डिश की तरह है. तेरी बहनें? वे सिर्फ एक टूलकिट हैं. मैं: क्या मतलब है, एक टूलकिट? राहुल: मेरा मतलब है कि वे खेलने के लिए, और प्रैक्टिस सुधारने में मदद करने के लिए हैं. लेकिन अगर तु असली सुख चाहता है, तो वो है तेरी माँ. मैं: तो, मुझे उस पर ध्यान देना चाहिए?
राहुल: जरा सोच. अपनी ही माँ के साथ सेक्स करना एक बेटे के लिए सबसे गर्व की चीज है, हर सामाजिक नियम का सबसे बड़ा उल्लंघन है. और इसीलिए इसमें ज़्यादा मज़ा आता है. बहनें तो आसानी से मिल जाती हैं. एक अच्छी, ममतामयी माँ के तौर पर उसकी भूमिका और जिस चूदाइ में तु उसे धकेलेगा. इन दोनों के बीच का फर्क ही असली मज़ा देता है.
वो आगे झुका, उसकी आँखों में शिकारी जैसी जिज्ञासा की चमक थी.
राहुल: अच्छा बता तूने अभी तक कुछ किया है मम्मी के साथ? मैं: नाइटी को ऊपर उठाना, सोते समय उसके स्तनों का भार महसूस करना... राहुल: यह एक शुरुआत है, और कोशिश कर जितना जल्दी हो सके हिम्मत दिखा और एक बार बस उसे चोद ले. वो चिल्लाएगी, विरोध करेगी, कहेगी कि यह पाप है. लेकिन यही तो सबसे मज़ेदार बात है. मैं: यार हिम्मत नहीं होती. राहुल: हिम्मत करना पड़ेगा, नहीं तो फिर हमेशा के लिए पछता. मैं: मैं कोशिश करूंगा. राहुल: चल अब बहुत काम है.
शादी वाले दिन मैं हॉलवे में खड़ा होकर घर की औरतों को भाग-दौड़ करते हुए देख रहा था. मेरी बहनें, रीना और कुसुम, चमकीले और झिलमिलाते लहंगे पहने हुए थीं जो उनके शरीर के उभारों से चिपके हुए थे. तभी मेरी नजर मम्मी पर गई. वो बेडरूम से हल्की गुलाबी रंग की सिल्क की साड़ी पहनकर निकलीं. साड़ी का अंदाज़ बहुत शानदार था जो और भी आकर्षक बना रही थी. ब्लाउज़ टाइट था, जिससे उनके स्तन ऊपर की ओर उठे हुए थे. वो पूरी तरह से एक आदर्श और सम्मानित महिला लग रही थीं, जिसने मेरे दिमाग में राहुल की बातों को और भी ज़ोर से गूँजने पर मजबूर कर दिया.
शाम को बारात आई फिर हर तरफ फूल माला काफी धूमधाम से शादी हुई. रिसेप्शन पूरे जोरों पर था, लेकिन जैसे-जैसे घड़ी आधी रात की ओर बढ़ी, भीड़ कम होने लगी. और अंत हुआ एक बेहतरीन फैमिली फोटो के साथ.
जब हम आखिरकार अपने घर वापस लौटे तो मेरे मन में बस यही हलचल चल रही थी. अब आगे कैसे चीजों को संभालना है और हिम्मत दिखाना है जैसा कि राहुल ने कहा था. इतनी देर होने के बाद भी मम्मी नहीं रुकी उसने अपना काम बखूबी किया. हम सबके लिए खाना बना कर लाई और फिर रीना दीदी और कुसुम दीदी के सोने जाने के बाद वो किचन में साफ सफाई करती रही. रात के 1 बज चुके थे मुझे रहा नहीं गया इसीलिए मैं उसके पास गया.
मम्मी: मैं अपने कंधे भी नहीं हिला पा रही हूँ, सब कुछ दर्द कर रहा है.
मुझे मौका मिल गया था. मैं और करीब आ गया,
मैं: मैं आपकी मदद करता हूँ. मैं आपको मालिश कर देता हूँ. इससे आपको आराम मिलेगा. मम्मी: आशु, तुम कितने अच्छे हो बेटा. पहले काम खत्म कर लूं, फिर आती हूं.
मैं मम्मी के कमरे में उसका इंतजार कर रहा था. उसे कमरे के अंदर आते देख मेरी तो हालत खराब हो गई मेरी धड़कन बहुत तेज थी. क्योंकि मैं आज कुछ नया कोशिश करने जा रहा था.
मम्मी ने तकिए पर चेहरा चेहरा दबाया और पेट के बल लेट गई. मैं उसके पास बैठ गया, उसके कंधों पर हाथ रखते हुए मेरे हाथ थोड़े कांप रहे थे. मैंने धीरे-धीरे शुरुआत की, उसकी मांसपेशियों की जकड़न को दूर करने के लिए उन्हें दबाने लगा.
जैसे ही मैं काम कर रहा था, मैं उसके ब्लाउज के पतले कपड़े से उसके शरीर की गर्माहट महसूस कर सकता था. मैंने अपने हाथ नीचे किए, उन्हें उसकी कमर पर सरकाया, उसकी पीठ के हर मोड़ और गहराई को महसूस किया.
मम्मी: ओह हां... वहीं पर... रुकना मत.
और जैसे-जैसे उसे आराम लगने लगा उसकी आंखें बंद हो गई. वो एक प्यारी सी नींद में सो गई. यह देख, मैंने उसकी करवट बदली और उसे सामने की तरफ कर दिया. मैं उसकी चूत देखना चाहता था, यह जानने के लिए कि क्या वो मेरे लिए उतनी ही गीली थी जितनी किचन में थी. जैसे ही मैंने उसकी पैंटी को देखने के लिए साड़ी ऊपर उठाई, मम्मी की नींद खुली.
सब कुछ पल भर में बदल गया. उसकी आँखें झटके से खुलीं और उसने अपनी जांघों पर मेरे हाथ को महसूस किया. वो उठ बैठी, अपने आप को ऐसी हालत में देखकर वो चौंक गई.
मम्मी: (चिल्लाते हुए) आशीष!!!
इससे पहले कि मैं कोई बहाना बना पाता, उसका थप्पड़ मेरे चेहरे पर पड़ा.
मम्मी: तुम यह क्या कर रहे थे? ऐसा कैसे कर सकते हो? अपनी ही माँ के साथ! क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?
वो साड़ी को अपनी छाती से सटाए, बुरी तरह कांपते हुए बिस्तर के सिरहाने की तरफ पीछे हटी.
मम्मी: बाहर निकलो! अभी इसी वक्त इस कमरे से बाहर निकलो! मुझे यकीन नहीं हो रहा... मैं तुम्हारी तरफ देख भी नहीं सकती!
मैं अपनी जगह से नहीं हिला. गाल पर लगी चोट एक चिंगारी की तरह थी. वो चाहती थी कि मैं चला जाऊँ, लेकिन उसकी हालत, बिखरे बाल, खिसकती साड़ी और घबराहट से तेज़ी से उठती-गिरती छाती ने मेरे लिए वहाँ से चले जाना नामुमकिन बना दिया. मैंने हिम्मत दिखाई.
पीछे हटने के बजाय, मैं उसके और करीब हो गया, हमारे बीच की दूरी कम कर दी. मैं उसकी आँखों में डर देख सकता था, लेकिन मैंने यह भी देखा कि उसकी साँसें कितनी तेज़ चल रही थीं. मैं उसके ऊपर झुका और अपने वजूद के भारीपन से उसे बिस्तर के सिरहाने से सटा दिया. और यह मेरे लिए अब तक का सबसे नशीला अनुभव था.
मैं: मैं नहीं रोक पा रहा हूं अपने आप को मम्मी. बस एक बार मौका दो. मम्मी: आशीष, रुको! यह गलत है! प्लीज़, बस चले जाओ!
बिना एक भी शब्द बोले, मैं आगे की ओर झपटा और एक गहरे, आक्रामक चुंबन में अपने होंठ उसके होंठों से टकराने की कोशिश की.
मम्मी: (गुर्राते हुए) नहीं! मुझे छूने की हिम्मत मत करना! अभी के अभी मुझे छोड़ दो!
उसने किसी तरह अपना एक हाथ छुड़ाया और पूरी ताकत से मुझे धक्का दिया. तभी उसने एक और थप्पड़ मेरे गाल पर जड दिया. यह देखने में किसी बलात्कार से कम नहीं था, वो भी अपनी ही माँ का. लेकिन मेरे पास यह आखरी मौका था, मैंने कदम आगे बढ़ा दिया था. यहां से पीछे हटना बहुत मुश्किल था. मुझे थप्पड़ों की कोई परवाह नहीं थी. मेरे गालों का दर्द, मेरे कानों में दौड़ते खून की आवाज़ और मेरी टांगों के बीच महसूस हो रही उस बेताब, धड़कती हुई ज़रूरत के आगे कुछ भी नहीं था.
इससे पहले कि वो ठीक से साँस भी ले पाती, मैंने उस पर झपट्टा मारा. उसने भागने की कोशिश की, उसके नाखून बेडशीट को खरोंच रहे थे, लेकिन मैं उससे ज़्यादा तेज़ था. मैंने अपना पूरा वजन उस पर डाल दिया और उसे ज़ोर से गद्दे पर पटक दिया. मैंने उसके हाथों की कलाइयों को उसके सिर के ऊपर कसकर पकड़ लिया. इतनी ज़ोर से कि वह ज़रा भी हिल नहीं पाई.
मम्मी: प्लीज़! हे भगवान... मुझे यकीन नहीं हो रहा, मेरा अपना बेटा... तुम मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हो? मैं: चुप हो जाओ, मम्मी. बस चुप हो जाओ.
मैंने ज़बरदस्ती अपना मुँह उसके मुँह पर दे मारा और अपनी जुबान उसके दाँतो के बीच घुसा दी, जबकि वो अपने होंठ बंद रखने की कोशिश कर रही थी. चुम्मा करते हुए उसके मुँह से एक आह निकली. और वो मुझसे छूटने के लिए अपना सिर इधर-उधर झटक रही थी. उसका स्वाद उसकी चेहरे की खुशबू और उसके आँसुओं से मेरे लंड में बिजली की एक लहर सी दौड़ गई.
मम्मी: (सिसकते हुए) नहीं... नहीं... यह पाप है! तुम मेरे बच्चे हो... तुम मेरे बेटे हो... हे भगवान, मेरी मदद करो!
मैंने अपने हाथों से उसकी नरम चूचियां दबाना शुरू किया. मैंने उन्हें ज़ोर से दबाना और कपड़े के ऊपर से ही मसलना शुरू कर दिया.
मम्मी: आशीष...यह पागलपन बंद करो! मैं... मैं तुम्हारे पापा को बता दूंगी! जैसे ही वो घर आएंगे, मैं उन्हें सब कुछ बता दूंगी! वो तुमको बहुत मारेंगे.
मैं: मम्मी, पापा यहा नहीं हैं. और आप उन्हें क्यों बताओगी? ज़रा सोचो. कितनी शर्मिंदगी होगी जब उन्हें पता चलेगा कि उनकी परफेक्ट पत्नी ने अपने ही बेटे को अपने साथ ऐसा करने दिया. आप नहीं चाहोगी कि लड़कियों को पता चले कि उनकी माँ को उनके ही भाई ने दबाकर उसके साथ चूदाइ किया था.
मेरे मुंह से चूदाइ शब्द सुनकर वो हैरान रह गई.
मम्मी: यह कैसी बातें कर रहे हो? होश में तो हो तुम? मैं: बस एक झलक, मम्मी. बस मुझे यह देखने दो कि तुम कितनी खूबसूरत हो. मैं वादा करता हूं अगर तुम मुझे देखने दोगी. तो मैं रुक जाऊंगा.
यह उसके लिए थोड़ा आसान लगा. उसे ऐसा लगा कि वाकई में मैं रुक जाऊंगा, लेकिन उसकी इनकार के साथ-साथ थोड़ा शरीर में ढीलापन भी था जिससे मुझे मौका मिल गया.
मैंने उसके ब्लाउज़ के कपड़े को एक तरफ़ हटाया और उसे उसके कंधों से नीचे खिसका दिया. मेरी साँसें थम गई. उसने एक मैचिंग ब्रा पहनी हुई थी, जिसका रंग उसकी मलाई जैसी गोरी शरीर के साथ ज़बरदस्त मेल खा रही थी. अंडरवायर ने उसके स्तनों को ऊपर की ओर धकेल दिया था, जिससे क्लीवेज की एक गहरी और आकर्षक घाटी बन गई थी.
मैं: ओह, मम्मी... आप कितनी खूबसूरत हो!
मम्मी: यह गलत है... हम ऐसा नहीं कर सकते... प्लीज़, मुझे जाने दो.
मैं: खुद देखो किसी को कुछ नहीं पता चल रहा है.
मम्मी: (रोते हुए) बात पता चलने की नहीं है बेटा. मैं माँ हूं तुम्हारी, यह गलत है.
मैंने उसे नज़रअंदाज़ किया और अपना मुँह उसके चूचियों के बीच में ले गया, और धीरे से उसकी ब्रा को नीचे की तरफ सरकाया. इससे मैंने महसूस किया कि उसका पूरा शरीर कांप उठा. वो पहली बार मेरे सामने था, उसकी चूचियां, उसका निप्पल. गोरे बदन पर एक गुलाबी सी फूल जैसी. यह देख, मैं पागल हो गया और तुरंत उसे चूसने लगा.
मैंने अपनी पकड़ बदली, अपना हाथ ब्रा के तार के नीचे खिसकाकर उसके चूचि को थामा और उसे ज़ोर से दबाया. साथ ही अपने होंठ वापस उसकी निप्पल पर टिका दिए और चूसने लगा. उसके आंसू बहने बंद हो गए
मुझे उसके मुंह से एक हल्की सी सिसकारी भी सुनाई दी.
मम्मी: अहह...
वो कुछ देर वैसे ही शांत थी. इससे मेरी हिम्मत बढ़ गई और अपना हाथ धीरे-धीरे उसके नाभि की ओर ले जाने लगा. मैं अपनी माँ के नशे में पूरी तरह चूर था. इतने में, वो मुझे धकेलते हुए अचानक उठ खड़ी हुई. मुझे यकीन नहीं हुआ, उसने झट से अपने कांपते हाथों से उसने अपने ब्लाउज के किनारो को पकड़ा, कपड़े को पास खींचा और घबराहट में हुक लगाने की कोशिश करने लगी. मैं वहीं जम गया. कुछ पल पहले मुझ पर हावी हुई हवस गायब हो गई और उसकी जगह डर की एक ठंडी चुभने वाली लहर ने ले ली. उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा. वो चिल्लाई भी नहीं, बस साड़ी संभालते हुए भाग खड़ी हुई.
नंगे पैरों के फ़र्श पर पड़ने की आवाज़ और पायल की छम छम हॉल में गूंजने लगी. और उसके बाद रीना के बेडरूम के दरवाज़े पर उसकी मुट्ठी की ज़ोरदार, धप-धप-धप आवाज़ सुनाई दी.
मम्मी: रीना! रीना, दरवाज़ा खोलो!
यह सुन मेरी तो फट गई. मैं उसके बेडरूम के दरवाजे पर ही चुप कर खड़ा रह गया. मेरा दिमाग तेज़ी से चल रहा था. वो रीना से क्या कहेगी? जब यह बात सबको पता चलेगी तो क्या होगा? मेरे पापा के चेहरे की तस्वीर, मेरी बहनों की नफ़रत, मेरी ज़िंदगी का पूरी तरह से बर्बाद होना. ये सब मेरी आँखों के सामने घूमने लगा.
दूसरे कमरे से मुझे रीना का दरवाज़ा खुलने की धीमी आवाज़ और तुरंत ही घबराहट भरी बातचीत सुनाई दी. धीरे-धीरे मेरी नज़रें खुले दरवाज़े पर टिकी थीं. मुझे डर था कि कोई कोने से मुड़कर मुझे देख न ले. मैं हॉल तक पहुंचा और कमरे में चला गया. इस वजह से मुझे पूरी रात नींद नहीं आया.
अगली सुबह, मैं मन में डर और घबराहट के साथ उठा. मुझे उम्मीद थी कि शायद चिल्ला-चोट होगी, मेरे पापा को फ़ोन किया जाएगा, या शायद मुझे घर से निकाल दिया जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ होना होता तो शायद कल रात को ही हो गया होता. जब मैं लिविंग रूम में पहुँचा, सब कुछ सामान्य दिख रहा था. चाय बन रही थी, पर्दो से छनकर धूप आ रही थी, और सुबह की रोज़मर्रा की गतिविधियाँ चल रही थी.
मम्मी किचन में थीं और उनकी पीठ मेरी तरफ. जब मैं किचन में आया, तो वह मुड़ी नहीं. उन्होंने हमेशा की तरह "गुड मॉर्निंग, बेटा" कहकर मेरा स्वागत नहीं किया और न ही मुझे तैयार होने के लिए कहा. वह बस बर्तन में कुछ चलाती रहीं. मैंने उनकी आँखों में देखने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने बहुत सफाई से मुझसे नज़रें बचा लीं. हर बार जब मैं उनके करीब जाता, वो दूर हट जाती.
कुसुम दीदी: कभी-कभी मम्मी की मदद कर दिया कर. कल रात इनको पैरों में कितना दर्द था. वो तो अच्छा है कि हम लोग हैं.
यह सुनकर मेरी सांस में सांस आई की मम्मी ने रीना और कुसुम दीदी को यह बताने के बजाय कि उसके अपने बेटे ने उसे ज़बरदस्ती दबाकर उसके चूचियों पर मुँह लगाने की कोशिश की थी, उसने एक मामूली शारीरिक बीमारी का बहाना बना लिया. उसने परिवार को बचाने या शायद मुझे बचाने का फ़ैसला किया था.