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Incest Maa beheno ka pyar

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vs12557

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कई दिनों बाद दोपहर में धूप अच्छी खिली थी. मम्मी कटे हुए आलू का चिप्स बनाने वाली थी इसीलिए उसने सोचा कि क्यों ना आज कटे हुए आलुओं को धूप में सुखा दिया जाए. वो उन्हें लेकर ऊपर जाने लगी और मैं उसके पीछे-पीछे. मम्मी ने इशारा भी किया मुझे नीचे ही रुकने को लेकिन मैं कहां मानने वाला था. मम्मी के मन में घबराहट साफ झलक रही थी कि कहीं मैं कुछ ऐसा ना कर दूं जिसकी वजह से चीज बिगड़ जाए. मम्मी, ऊपर उन आलुओं को सुखाने में व्यस्त थी तभी मैं उसके बगल में बैठ गया.

मैं: आज क्या स्पेशल है!

मेरी तरफ देखते हुए उसने धीरे से कहा,

मम्मी: मेरी बात सुन, मैं चाहती हूँ कि तु अपनी किताबों पर ध्यान दे. तु अपना ध्यान... इस चीज़ में नहीं खो सकता. तेरी पढ़ाई सबसे ज़रूरी है.
मैं: मैं ध्यान दे सकता हूँ, मम्मी. मैं एक साथ कई काम करने में बहुत माहिर हूँ.


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मम्मी: ज़्यादा शरारत मत कर, यह रिश्ता एक पागलपन है, तुझे दिन में अपना दिमाग शांत रखना होगा.
मैं: और रात में?
मम्मी: तुझे तो मेरी बात से फर्क पादना ही बंद हो गया है.
मैं: मैं समझता हूं. आपकी बात आपकी बहुत इज्जत करता हूं.
मम्मी: हां वो तो मैंने देखी लिया कि कल रात तूने मेरी कितनी इज्जत की.

वो और पास आ गई, उसके होंठ लगभग मेरे कान को छू रहे थे, उसकी साँसें गर्म थी.

मम्मी: आज रात, खाने के बाद, जब रीना और कुसुम सो जाएँगी तो मैं तुझे बुलाऊँगी. चुपके से मेरे कमरे में आना.

रात को डिनर के वक्त, मम्मी टेबल के सिरे पर बैठी थी, शांत हाथों से खाना परोस रही थी, लेकिन मेरा पैर टेबल के नीचे धीरे-धीरे उसकी पैर एड़ियों पर ऊपर की ओर बढ़ रहा था.

कुसुम दीदी: मम्मी, क्या आपने रीना की खरीदी हुई नई ड्रेस देखी?
मम्मी: हां, बहुत प्यारी है, बेटा.
रीना दीदी: (हँसते हुए) हमें अगले वीकेंड सब साथ में शॉपिंग पर जाना चाहिए.

मैंने मम्मी की ओर देखा. वो मुझे घूर रही थी, उसकी आँखों में गहरी हवस थी. उसे पता था कि समय तेज़ी से बीत रहा था. खाने के बाद प्लान सीधा-सादा था, लड़कियाँ सो जाएँगी, और मैं उसके पास जाऊँगा. लेकिन रीना और कुसुम दीदी सोने के मूड में नहीं थी. वे मम्मी को लिविंग रूम में ले गईं और कज़िन्स, कॉलेज के ड्रामे और पड़ोस की गपशप का लंबा-चौड़ा सिलसिला शुरू कर दिया.

तीस मिनट बीत गए, फिर एक घंटा गुज़र गया. मैं सोफ़े पर बैठकर किताब पढ़ने का नाटक कर रहा था, लेकिन मेरा मन बेचैन था. मैं देख सकता था कि मम्मी अपनी बेटियों के बीच फँसी हुई थी. उसके चेहरे पर शालीन सब्र था, लेकिन उसकी नजरें बार-बार मेरी ओर आ-जा रही थी. उस साड़ी में उसका दम घुट रहा था और वो उसके नीचे पहने काले लेस वाले कपड़ों के बारे में सोच रही थी.

आखिरकार, मम्मी की नज़रें मुझसे मिली. उसने कुछ कहा नहीं, लेकिन हॉलवे की तरफ़ इशारा करते हुए सिर हिलाया और एक गहरी नज़र डाली जिसका मतलब था "जाओ. अभी जाओ".



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मम्मी ने रीना की बात बीच में ही काटते हुए कहा,

मम्मी: लगता है मैं थक गई हूँ, लड़कियों. तुम दोनों सोने के लिए क्यों नहीं चली जातीं? मैं कुछ ही देर में आकर लाइटें चेक करूँगी.
कुसुम दीदी: बस पाँच मिनट और, मम्मी!

मम्मी ने मुझे एक और नज़र से देखा. जैसे कोई हुक्म दे रही हो. मैं झटके से खड़ा हो गया.

मैं: मैं पढ़ने के लिए अपने कमरे में जा रहा हूँ.

मैं अपने कमरे में चला गया. घर की खामोशी में मेरे दिल की धड़कन और तेज सुनाई दे रही थी. मैं बिस्तर पर लेटकर छत को घूरने लगा. मुझे दूर से लड़कियों के अपने कमरों में जाने, दरवाज़ों के बंद होने की आवाज़ें और फिर आधी रात की खामोशी सुनाई दी. तभी, मेरा फ़ोन वाइब्रेट हुआ. वह एक सीधा-सीधा कॉल था मम्मी का.

मम्मी: दरवाजा खोल जल्दी!

मैंने तो सोचा था कि मुझे जाना पड़ेगा पर यह क्या मम्मी खुद मेरे कमरे में आने वाली थी. जैसे ही वो अंदर आई, मुझे काफी निराशा महसूस हुआ क्योंकि हमारे पास अब समय बहुत कम बचा था. रात के 1:00 चुके थे और वो मेरे सामने साड़ी में खड़ी थी.

मैं: ये क्या? उस ड्रेस का क्या जो आप पहनने वाली थी?
मम्मी: क्यों मैं साड़ी में अच्छी नहीं लगती.
मैं: अब तो मुझे हमेशा अच्छी लगती हो लेकिन हम चीजों को अलग तरह से करने वाले थे ना?
मम्मी: टेंशन मत ले मैंने पहना है.
मैं: सच!
मम्मी: हां.
मैं: ओ मम्मी, आपने इतनी देर क्यों लगा दी?
मम्मी: तुझे पता ही है तेरी बहनें कैसी हैं.
मैं: रात का एक बज रहा है. मैं घंटों से बिस्तर पर लेटा छत को घूर रहा था.
मम्मी: रीना और कुसुम ने मुझे फँसा लिया. आज रात उनकी बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं.
मैं: मुझे लगा आप हमारा प्लान भूल गई हो.
मम्मी: भूलना? मैं कैसे भूल सकती थी?

मेरी निराशा पिघलने लगी और उसकी जगह एक गहरी, तीव्र इच्छा ने ले ली. उसने अपना सिर पीछे झुकाया, जिससे उसकी गर्दन की खूबसूरत रेखा दिखाई देने लगी. मुझे अपने लंड में तनाव बढ़ता हुआ महसूस हो रहा था, जैसे वो अब बर्दाश्त से बाहर हो जाएगा. इंतज़ार बहुत मुश्किल था, उसने धीरे-धीरे मेरी पीठ पर सहलाते हुए हाथों को गोल-गोल घुमाना शुरू किया, उसकी आवाज़ धीमी और सम्मोहक हो गई.

मम्मी: शश... शांत हो जा, परेशान मत हो. रात अभी बाकी है.
मैं: सही से करने के लिए बहुत देर हो चुकी है.
मम्मी: बहुत देर? सूरज उगने में अभी कई घंटे बाकी हैं. हमारे पास खेलने के लिए बहुत समय है.


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उसने नज़रें हटाए बिना पीछे कदम बढ़ाया और धीरे-धीरे बिस्तर की ओर चलने लगी. वह गद्दे के किनारे रुकी, मैंने अपना ध्यान उसके ब्लाउज़ पर लगाया. बटन छोटे और खोलने में मुश्किल थे, लेकिन मैंने एक-एक करके उन्हें खोला. हर बटन का खुलना एक जीत जैसा लग रहा था. जैसे ही कपड़ा हटा, उसके पूरे स्तनों का उभार सामने आ गया, जो की लेस में मुश्किल से ही समा पा रहे थे. मैंने उसके कंधों से ब्लाउज़ हटाया और उसे ज़मीन पर गिरने दिया. अब वो उस लिबास में थी, काली लेस उसके आकर्षक शरीर के उभारों से चिपकी हुई थी, जो कुछ भी छिपा नहीं रही थी. मैं अपने शरीर को उसके शरीर से कसकर सटा लिया. मैंने उसके होंठों को प्यार से चुम्मा शुरू किया. हमारी जीभें आपस में टकराई, जिनमें बेताबी और एक दूसरे के जीभ को लपेटना, मुंह के गरम-गरम नशीले रस को चखना शुरू था.



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उसके हाथों ने मेरे कंधों को कसकर पकड़ लिया जैसे वो हमारे शरीरों को एक कर देना चाहती हो. हम एक दूसरे के नशे में चूर थे कि तभी उसे कुछ ख्याल आया और उसने अपना मुंह थोड़ा पीछे करते हुए कहा,


मम्मी: आशीष, रुक.
मैं: क्या बात है?
मम्मी: मैं तुझे बताना भूल गई थी... तेरे पापा कल घर आ रहे हैं.
मैं: कल?
मम्मी: वो इसे एक सरप्राइज़ बनाना चाहते थे.
मैं: बात करते समय तो उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा था.
मम्मी: जो भी हो हमें सतर्क रहना होगा.
मैं: तब तो हमारे पास जितना मैंने सोचा था, उससे भी कम समय है.
मम्मी: हमारे पास पूरी रात है.

उनके कल आने की बात ने उस रात में एक तरह की जल्दबाजी और बेचैनी भर दी. हम बहुत बड़े दांव वाला खेल खेल रहे थे, और समय तेज़ी से बीत रहा था. पकड़े जाने का डर, बीतता हुआ समय ने हर पल को रोमांचक बना दिया था.


मम्मी ने मुझे बिस्तर पर धक्का देते हुए मेरे शरीर पर नीचे खिसकी. मेरे पैरों के बीच घुटनों के बल बैठते हुए उसके स्तन मेरी जांघों से छू रहे थे. इस बार उसने खुद मेरा पैंट उतारना शुरू किया. उसने बेताबी और जोश के साथ मेरे कपड़े उतार दिए. जब मेरा लंड पूरी तरह खड़ा बाहर निकला, तो उसके मुँह से एक धीमी, आह निकली. वो आगे झुकी और अपने होंठ मेरे लंड के अगले हिस्से पर रखे और धीरे-धीरे सुपाडे को चाटने लगी. जैसे ही मेरे लंड पर उसके गरम-गरम थूक लगना शुरू हुआ. लंड के नसों में एक अजीब सा करंट लगने लगा, और लगे भी क्यों ना जब अपनी मम्मी सेक्स का शुरुआत कुछ इस तरह से करें तो.



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उसके गर्म गीले मुँह के एहसास ने मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लिया और मैं कराह उठा, मेरा सिर तकिए पर जा लगा. उसे इसे चूसना बहुत पसंद था. पिछली बार हमारे मिलन के दौरान उसे मेरे स्वाद और एहसास की एक ज़बरदस्त लत लग गई थी, और आज रात वो हर पल का पूरा मज़ा लेना चाहती थी. मम्मी पूरी तेजी से ये कर रही थी. तेजी से लंड को अपने गले के अंदर गहराई तक लेने की कला उसने सीख ली थी. फिर एक बार अपनी जीभ से लंड के अगले हिस्से के चारों ओर घुमाया और फिर नीचे जड़ तक ले गई, उसका गला मेरे चारों ओर कस गया था. लंड उसकी मुंह को गपा गप चोद रहा था और साथी साथ उसकी सिसकारियां भी छूट रही थी.

मम्मी: म्म्...मम्म्म...मम्म्म...

उसने अपनी पलकों के नीचे से मेरी ओर देखा, और उसे अच्छी तरह पता था कि वो मेरे साथ क्या कर रही है. उसने गति बढ़ा दी, उसका सिर तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था और उसने मुझे अपने मुँह में और अंदर तक खींचने के लिए मेरी जांघों को कसकर पकड़ रखा था.

उसके गर्म गले से मेरे लंड की मालिश का एहसास इतना तीव्र था कि उसे सहना मुश्किल हो रहा था. उसके मुँह की गर्मी से लंड फड़कने और धड़कने लगा था. वो पूरे जोश में थी, अपने होंठों और जीभ से मेरे लंड के संवेदनशील अगले हिस्से को छेड़ रही थी, जिससे मेरे मुँह से सिसकारी निकल रही थी. लेकिन जितना वो मुझे सुख दे रही थी, मुझे पता था कि वो भी तड़प रही थी.

मुझे पता था कि मुझे उसके साथ सही व्यवहार करना है. मैं उसे सूखा नहीं रहने दे सकता था. मैं चाहता था कि वो भी पूरी तरह गीली हो जाए और आसानी से मेरे लंड पर फिसल सके. इसलिए मैंने उसका सिर लंड से छुड़ाने की कोशिश की और जैसे ही ऊपर उठाया तो एक जोरदार चूसने की खिंचाव वाली आवाज के साथ ऊपर उठी.

उसे नीचे सुलाते हुए मैंने नीचे हाथ बढ़ाया और उसकी क्लिटोरिस को छुआ, जो पहले से ही सूजी हुई थी. मैंने अपनी उंगलियों को उसके अंदर डालना शुरू किया. पहले दो, फिर तीन उंगलियाँ उसकी तंग, गर्म चूत में गहराई तक ले गया. उंगलियों को मोड़कर उसकी चूत की मुलायम रेशेदार दीवार को रगड़ा. मम्मी के मुँह से एक तेज़, चीख जैसी कराह निकली, और उसका शरीर सिहरते हुए पीछे की ओर मुड़ गया.


मम्मी: आह...उफ़्फ़…बेटा…आह्ह्ह…आह्ह्ह्हह…….


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मैंने अपने अंगूठे से उसकी क्लिटोरिस को तेज़ी से सहलाया, जबकि मेरी उंगलियाँ उसके अंदर-बाहर हो रही थीं, ठीक वैसे ही जैसे मेरा लंड करता. मम्मी अब सिसक रही थी, उसकी साँसें तेज़ और उखड़ी हुई थीं

मम्मी: हाँ... ठीक वहीं... ओह!!

मैं महसूस कर सकता था कि उसका रस मेरे हाथ पर बह रहा था, उसकी चूत पूरी तरह गीली और चिकनी हो गई थी.

मम्मी: आशु, बस कर. मैं चाहती हूं आज मैं तेरी सेवा करूं.

यह कहते हुए मम्मी मेरे ऊपर आने की कोशिश करने लगी. मम्मी ने मुझे बिस्तर पर दबाते हुए, मेरे सीने पर अपने हाथ को रखा और खड़े लंड पर बैठने की कोशिश करने लगी. शुरू में उसे थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी पर फिर उसने मेरा लंड पकड़ कर अपनी चूत के सही जगह पर रखा और धीरे-धीरे सरकते हुए लंड पर बैठ गई.

एक पल के लिए, हम दोनों स्थिर रहे, पूरी तरह से जुड़े होने के एहसास का मज़ा लेते हुए. फिर, उसने हिलना शुरू किया. वो सीधी बैठी, उसके भारी ब्रेस्ट हर हरकत के साथ उछल रहे थे, और उसने कमर को हिलाते हुए ऊपर नीचे झटका करने लगी. उसने धीरे-धीरे शुरुआत की, अपने गांड को ऊपर उठाया और वापस नीचे पटका, हमारे शरीर के घर्षण से एक तेज़ गर्मी पैदा हो रही थी. वो भूखी लय के साथ सवारी कर रही थी. जैसे-जैसे उसका आत्मविश्वास बढ़ा, उसकी हरकतें और तेज होती गई. वो ज़ोर-ज़ोर से उछलने लगी, उसकी चूत हर नीचे की हरकत के साथ मेरे लंड को जकड़ रही थी. हमारे शरीर के टकराने की आवाज़ और उसके गांड के मेरी जांघों से टकराने की गीली, थप्पड़ जैसी आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी.



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मम्मी इसमें खो गई थी,

मम्मी: ओहो...आह..आशु कैसा लग रहा है? ऊऊह्ह्ह्ह…
मैं: ओह... मम्मी बहुत अच्छा लग रहा है... ऐसे ही करो!


मम्मी आगे झुकी, अपने चूचियों को मेरी छाती से दबाते हुए, उसके निप्पल्स मेरे सीने के खिलाफ सख्त हो रहे थे. उसने अपने गांड को गोल-गोल घुमाना शुरू किया, ये एहसास करते हुए कि उसकी चूत की हर नस मेरे सुपाडे से उत्तेजित हो रही थी. मैंने ऊपर हाथ बढ़ाया, उसके चूचियों को पकड़ा और ज़ोर से दबाया, मेरे अंगूठे उसके निप्पल्स को रगड़ रहे थे.

जबकि वह मुझ पर सवारी करती रही.

मम्मी अब वह शांत माँ नहीं थी, वो पूरी तरह से कामुकता में डूबी हुई थी, उसकी त्वचा पसीने से चमक रही थी. उसने गति बढ़ा दी, उसके झटके इतनी तेज़ हो गए कि सब धुंधला लगने लगा. मैंने उसके कमर को पकड़ा, उसे पूरी ताकत से खुद को मुझ पर नीचे धकेलने में मदद की. मैं उसकी चूत की सुरंग को कसते हुए महसूस कर सकता था, अंदरूनी मांसपेशियां मेरे लंड के चारों ओर धड़क रही थीं जैसे ही वो अपनी चरम सीमा के करीब पहुँच रही थी.


मम्मी: बेटा…आह्ह्ह…आह्ह्ह… आह्ह्ह्हह…….

जब वो मेरे सीने पर गिरी, उसका शरीर अभी भी चरम सुख की तीव्रता से कांप रहा था. लेकिन मेरी प्यास अभी अधूरी थी, तो मैंने उस जोश को कम नहीं होने दिया. मैंने अपना पोजीशन बदला, उसकी कमर को मज़बूती से पकड़ा और एक झटकेदार, हावी होने वाले अंदाज में उसे पलट दिया. मम्मी के मुँह से हैरानी भरी एक हल्की सी सिसकारी निकली जब उसने खुद को मेरे नीचे दबा हुआ पाया. उसके बाल तकिए पर बिखरे हुए थे, उसकी आँखें मदहोश और बेसुध थीं, और मेरे चूमने से उसके होंठ खुले और सूजे हुए लग रहे थे.


उसकी जांघों को चौड़ा करते हुए मैंने उसकी चूत को पूरी तरह से खोल दिया, और एक ज़ोरदार, एक ही झटके में अपना लंड उसके अंदर डाल दिया. वो चिल्लाई,


मम्मी: आह! आशीष! ऊऊह्ह्ह्ह…


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उस आवाज में हैरानी और शुद्ध सुख का मिला-जुला अहसास था. मैंने उसे ज़ोर-ज़ोर से चोदना शुरू कर दिया, पहले वाली धीमी छेड़छाड़ को छोड़ दिया. मैं चाहता था कि वो मेरी लंड का हर एक झटका महसूस करे. उस बेटे की कच्ची ताकत को महसूस करे जिसने उसके बिस्तर पर अपने पिता की जगह पूरी तरह से हथिया ली थी. हर धक्का गहरा और ज़ोरदार था. मेरा जांघों के ऊपर का हिस्सा उसकी मुलायम जांघों से टकरा रहा था और एक गीली थप-थप की आवाज पूरे शांत घर में गूंज रही थी.

मम्मी बेकाबू होने लगी और कभी मेरे कंधे को पकड़ती तो कभी मेरे बाहों को, जैसे वो उस तूफ़ान के बीच खुद को थामे रखने की कोशिश कर रही हो जो मैं उसके भीतर पैदा कर रहा था.


मैं: मुझे बताओ, मम्मी, कैसा लग रहा है?
मम्मी: ये... ओह भगवान... तेरा बहुत बड़ा है सच में!
मैं: पापा से भी बड़ा?
मम्मी: आह्ह्ह… आह्ह्ह्हह…….ये इतना मोटा है... ये मुझे पूरी तरह फैला रहा है...
मैं: मजा आ रहा है?
मम्मी: हाँ...हाँ...आह्ह्ह्हह...
मैं: बोलो ना पापा जैसा है मेरा या उनसे अच्छा है?
मम्मी: हाँ! हाँ, ऐसा ही...उनसे अच्छा है! ... आशीष, मुझे ज़ोर से चोद!

इस बात ने आग में घी का काम किया. मैंने उसकी जांघों को पकड़कर उसकी छाती की ओर खींचा ताकि वो और खुल सके, जिससे मैं पूरी गहराई तक जा सकूँ. उसकी चूत इतनी गीली थी कि हर धक्के के साथ एक गीली आवाज आ रही थी, और जब मैं ज़ोर-ज़ोर से अंदर-बाहर कर रहा था तो रस चारों ओर उड़ रहा था. वो एक और चरम सुख के करीब थी, उसकी साँसें तेज हो रही थी.

मैं: कैसा लग रहा है बेटे से चूदवा कर?

मैंने पूछा, और साथ ही तेज़ी से छोटे-छोटे झटके देने लगा जो सटीक रूप से उसके क्लिटोरिस पर लग रहे थे.

मैं: आपको पसंद है कि आपका अपना बेटा आपको किसी वेश्या की तरह चोदे?
मम्मी: ओह...आशीष, ऐसा मत बोल मैं तेरी मम्मी हूं बेटा...
मैं: लेकिन पति के अलावा जो किसी और से चूदवाए जाने पर, वो तो वेश्या ही होती है ना.
मम्मी: प्लीज...मुझे, आह्ह्ह…आह्ह्ह… मैं तेरी वेश्या हूँ...हाँ! हाँ!

मेरे अपने शरीर में तनाव असहनीय होता जा रहा था और उसकी चूत मेरे चारों ओर ज़ोरदार, लहरों के साथ सिकुड़ रही थी. मैंने तीन आखिरी, गहरे झटके दिए, जितना हो सके उतना अंदर तक जाकर और स्खलित हो गया. मैंने महसूस किया कि मेरे वीर्य की गर्म और गाढ़ी धार उसके चूत में बह रहा था और उस रात दूसरी बार उसका चूत भर रहा था. मैं कराह उठा, और मैंने अपना माथा उसके माथे से सटा लिया, जबकि मैंने अपना सारा वीर्य उसके भीतर खाली कर दिया.

हम दोनों पूरी तरह से थक गए थे. कुछ देर वैसे ही सोए रहने के बाद मम्मी की नींद खुल गई तो उसने देखा कि सुबह के 4:00 बजने वाले हैं. इससे पहले की रीना और कुसुम दीदी उठे मम्मी जल्दी से उठकर खड़ी हो गई और अपने कपड़े पहने लगी. मैं अभी भी उसे मदहोश नजरों से देख रहा था. तैयार होने के बाद उसने फटाफट मेरे होठों पर एक चुम्मा देते हुए कहा,


मम्मी: आराम कर, मैं जाती हूं इससे पहले की कोई उठ जाए.

अगले दिन दोपहर को, जैसे ही पापा घर के दरवाज़े से अंदर आए, घर का माहौल एकदम बदल गया. हवा में जो सीक्रेट सेक्स का महक था, वो अचानक पापा के कड़े अनुशासन और दबदबे के बोझ तले दबकर खत्म हो गया. पापा नियम और अनुशासन मानने वाले इंसान थे, और उनके आने से घर में छाई कामुकता की गर्मी पर जैसे ठंडा पानी पड़ गया हो. मम्मी को उनका स्वागत करते देखना एक अजीब अनुभव था. उन्होंने एक पारंपरिक और शालीन साड़ी पहनी हुई थी, और उनके चेहरे पर एक समर्पित पत्नी का भाव था. वो मुस्कुराई, उन्होंने पापा को गले लगाया, और उन्होंने अपना किरदार बखूबी निभाया.


वो अपने पति को देखकर सिर्फ़ खुश नहीं थीं, वो डरी हुई भी थी. उस रात का डिनर, हम मेज़ के चारों ओर बैठे थे, कटलरी की खनक और आम बातचीत की आवाज़ें कमरे में गूंज रही थी. पापा बहुत अच्छे मूड में थे और अपनी यात्राओं के किस्से सुना रहे थे.


मैंने मम्मी की आँखों में झाँकने की कोशिश की, उन्हें एक गहरी, प्यासी नजर से देखा जो उन्हें याद दिलाती कि कैसे मैंने सिर्फ़ कुछ घंटे पहले उन्हें चोदा था. मैं उस पागलपन की चमक देखना चाहता था, उस वेश्या वाली झलक को जो बंद दरवाज़ों के पीछे उनमें दिखती थी. लेकिन उन्होंने मेरी तरफ नहीं देखा. हर बार जब मैंने अपनी नजर उनकी तरफ घुमाई, तो वे अचानक चावल परोसने या पापा के किसी मज़ाक पर हँसने में व्यस्त हो गई. मैंने अपनी बहनों के साथ भी यही कोशिश की. मैंने कुसुम को देखा, उसकी वर्जिन चूत के एहसास और मेरे नीचे उसके कराहने को याद किया. मैंने रीना दीदी को देखा, उस शर्मीले अंदाज़ को याद किया जिसमें उसने मुझे अपनी चूत में उँगली करने दी थी. लेकिन वे बिल्कुल बेअसर थी. उन्होंने मुझे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया, उनकी नज़रें अपनी प्लेटों या अपने पापा पर टिकी थी. ऐसा लगा जैसे किसी ने स्विच दबा दिया हो, हमारी बनाई हुई गुप्त दुनिया आपसी शारीरिक संबंधों और स्पर्शो की दुनिया, घर के मुखिया की मौजूदगी से ही मिट गई थी.

अगले दिन झाड़ू लगाते हुए जब मम्मी मेरे कमरे में खड़ी थी, तो उस बदचलन औरत का मुखौटा हट चुका था और उसकी जगह एक हारी हुई पत्नी की चोट खाई हुई सच्चाई दिख रही थी. मैंने देखा कि जो कल तक बहुत खुश थी आज उसका चेहरा उतना ही उदास नजर आ रहा था.

मैंने उसे सहारा देने और सांत्वना देने की कोशिश की, लेकिन उसका रिएक्शन तुरंत और रूखा था.




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मैं: मम्मी, प्लीज़ बताओ क्या हुआ? तुम क्यों रो रही हो?
मम्मी: आशीष, अपने काम से काम रख.
मैं: मैंने आपका चेहरा देखा. क्या पापा ने कुछ किया?
मम्मी: थप्पड़ खाने के बाद और होगा ही क्या?
मैं: क्या? उन्होंने तुम्हें चोट पहुँचाई?
मम्मी: उन्होंने वही किया जो एक पति तब करता है जब उसकी पत्नी अपनी हद भूल जाती है. अब मुझे अकेला छोड़ दे.
मैं: लेकिन हमारे बीच... हमारे बीच कुछ खास था.
मम्मी: अब कोई हम नहीं है. अब सिर्फ़ एक माँ और बेटा हैं. ये याद रखना.
मैं: मम्मी, रुको! पर हुआ क्या यह तो बताओ?
मम्मी: उन्होंने वो अश्लील कपड़े देख लिए...
मैं: क्या आप सच में एक थप्पड़ की वजह से सब कुछ बदल जाने दोगी?
मम्मी: मैं कन्फ्यूज़्ड थी. मैं कमज़ोर थी. लेकिन अब मुझे उस कमज़ोरी की कीमत समझ आ रही है.
मैं: मैं आपसे प्यार करता हूँ.
मम्मी: बस कर. मेरे सामने ऐसे शब्द मत इस्तेमाल कर. मैं तेरी माँ हूँ, बस.
मैं: क्या अब भी आपके मन में मेरे लिए वो भावनाएँ हैं?
मम्मी: वो भावनाएँ एक गलती थी. एक घिनौनी, शर्मनाक गलती.
मैं: आप इसे शर्मनाक कैसे कह सकती हो जबकि ये इतना सही लगा था?
मम्मी: ये सही इसलिए लगा क्योंकि मैं अकेली थी. अब मुझे याद आ गया है कि मुझे वफ़ादार क्यों रहना चाहिए.
मैं: उस आदमी के प्रति वफ़ादार जो तुम्हें मारता-पीटता है? ये वफ़ादारी नहीं है, मम्मी. यह डर है.
मम्मी: ये नियम है. और तुझे इसका सम्मान करना होगा, वरना तुझे पछताना पड़ेगा.
मैं: मैंने वही किया जो आप चाहती थीं! आपने ही तो इसके लिए ज़िद की थी!
मम्मी: अपनी आवाज़ धीमी रख! और फिर कह रही हूं अपने काम से काम रख.


समीकरण पूरी तरह बदल गया था. मैं अब उसकी ज़िंदगी में हावी रहने वाला इंसान नहीं था. मैं फिर से बच्चा बन गया था, और वो अधिकार वाली हस्ती थी, जिसके पीछे मेरे पापा का साया था. रात का खाना खामोशी में बीता. मैंने उसे पापा को खाना परोसते देखा, उसकी नज़रें झुकी हुई थीं, उसकी आवाज़ धीमी और आज्ञाकारी थी. न कोई चोरी-छिपे नज़रें मिलना था, न कोई छिपी हुई मुस्कान, न कोई बिजली जैसी कड़क.


पापा: खाना ठीक है, सीमा?
मम्मी: हाँ, बहुत बढ़िया है.
पापा: बिल्कुल वैसे ही, जैसा तुम्हें पसंद है.

मैंने उसे देखा, उस औरत की कोई झलक पाने की कोशिश की जिसने लालच के साथ मेरा वीर्य निगल लिया था. वहाँ कुछ नहीं था. बस एक कर्तव्यपरायण पत्नी.

पापा: आशीष, तुम खाना क्यों नहीं खा रहे हो? क्या अभी भी तुम्हारा ध्यान फ़ोन में है?
मैं: नहीं, पापा. मैं बस... अपनी पढ़ाई के बारे में सोच रहा हूँ.
पापा: अच्छी बात है. अपने भविष्य पर ध्यान दो.

उस रात, मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था और वही अकेलापन महसूस कर रहा था जो पहले भी महसूस किया था.

END OF SEASON 1​
 
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