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पिछले कई सारे अनुभव से मुझे नई-नई चीज़ सीखने को मिला. मैं फिर से मम्मी का मेरे बाथरूम में नहाने का इंतजार करने लगा. काश रीना दीदी के साथ भी ऐसा मौका मिलता. दो दिनों से लगातार मूसलाधार बारिश हो रही थी, मम्मी और मेरी दो बहनों ने मौका निकाल कर पीछे वाला ही बाथरूम इस्तेमाल किया. लेकिन एक दिन फिर से वो पूरी तरह इस्तेमाल के लायक नहीं रह गया था. तब मम्मी मेरे कमरे में आई और पिछली बार की तरह मुझे बाहर जाने को कहने लगी. मेरे पास ये सुनहरा मौका था और मैं इसे गवाना नहीं चाहता था. मैंने फिर से बहाना बनाया कि मुझे अभी और थोड़ी देर सोना है. वो भी अपने कपड़े लेकर बाथरूम की ओर चली गई.
उसके अंदर जाते ही मैं उठ खड़ा हुआ और कमरे में टहल रहा था. मेरे दिमाग में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे. लेकिन मेरे पास ज्यादा वक्त भी नहीं था जो करना था वो तुरंत करना था. मैं उन्हें पाना चाहता था. मैं जानना चाहता था कि क्या वो चिंगारी अभी भी बाकी है, या क्या वो सच में सब कुछ भूल जाना चाहती है. मुझे शॉवर चलने की आवाज़ सुनाई दी, पानी के गिरने की आवाज़ आ रही थी. मैं दबे पाँव बाथरूम की ओर बढ़ा. मेरे दिल की धड़कन पिछले बार से भी कहीं ज्यादा तेज थी क्योंकि आज मैं कुछ अनहोनी करने जा रहा था.
जब मैं दरवाज़े के पास पहुँचा, तो मैंने देखा कि दरवाज़ा थोड़ा सा खुला था, और उस छोटी सी दरार से अंदर उठती भाप दिखाई दे रही थी. मैं वहाँ ऐसे खड़ा रहा मानो सदियाँ बीत गई हो. मेरा ज़मीर मुझसे वापस मुड़ने और एक अच्छा बेटा बने रहने के लिए कह रहा था, लेकिन मेरी इच्छा एक भारी बोझ की तरह मुझे आगे खींच रही थी. कांपती हुई साँसों के साथ, मैंने दरवाज़ा खोल दिया. मैंने उन्हें देखा, मम्मी शॉवर के नीचे खड़ी थीं. उनकी पीठ मेरी तरफ़ थी, पानी उनके पूरे, आकर्षक शरीर पर बह रहा था, उनके गांड के उभार वैसे ही चौड़े तरीके से मेरे बहुत करीब थी. मैं अंदर गया और अचानक हुई हलचल से चौंककर वो मुड़ी.
उसकी आँखें हैरानी से यकीन नहीं कर पा रही थी कि उसका बेटा उसके सामने खड़ा है. उसने तुरंत अपने हाथों को छाती पर रखकर अपने स्तनों को ढकने की कोशिश की.
मम्मी: (चौंकते हुए) आ..आशीष! तू यहां क्या कर रहा है? दिखाई नहीं दे रहा है मैं नहा रही हूं!
मैं अपनी जगह से नहीं हिला. पूरी हिम्मत दिखाकर वहीं खड़ा रहा. उसने दरवाज़े की तरफ देखा और फिर मेरी तरफ, उसके चेहरे के भाव बदल रहे थे.
वो चिल्लाई नहीं लेकिन बिल्कुल दबी हुई आवाज में, दांतों को पीसते हुए, उसने मुझे डांटना शुरू किया. जो किसी चिल्लाने से कम नहीं था. उसे डर था कि अगर वो चिल्लाएगी तो कोई और नहीं सुन ले. मैं भी इसी बात का फायदा उठाया.
मम्मी: देख तुझे यहां नहीं होना चाहिए. मेरी हालत देख, जा यहां से अभी.
लेकिन मैं एक कदम और करीब बढ़ा, उसकी खुशबू मेरी साँसों में भर गई. ठंडे पानी की बौछार में उसके निप्पल्स सख्त हो रहे थे और उसकी उंगलियों के बीच से साफ दिख रहे थे. झटके से मैंने अपना लंड पैंट को नीचे सरकाते हुए बाहर निकाल दिया, जिससे उसके ख्याल बदल जाए.
लेकिन ये देख कर उसका गुस्सा और बढ़ गया. उसने मुझे सिर्फ धक्का ही नहीं दिया, बल्कि इतनी ज़ोर से धकेला कि मैं गीली टाइल्स पर जा गिरा. दीवार से मेरी पीठ टकराने की आवाज़ उस छोटी सी जगह में गूंज उठी.
मम्मी: हट मुझे जाने दे. तू एक नंबर का हरामि है. मैं: (उसका हाथ पकड़ते हुए) मेरी बात तो सुनो, शांत हो जाओ.
वो हड़बड़ी में अपना तौलिया पकड़ने लगी अपने आपकी इज्जत बचाने के लिए, अपने आप को ढकने के लिए.
मम्मी: तु घटिया इंसान है! तेरी हिम्मत कैसे हुई? अपनी ही माँ के साथ ऐसा करने की. मुझे छूने की हिम्मत भी मत करना! मैं: मम्मी कोई नहीं जान पाएगा, हम दोनों एकांत में है. बात समझो... मम्मी: मेरी ही गलती थी जो तुझे यहां रहने दिया, तेरा साथ दिया.
उसकी आवाज़ इतनी खतरनाक और धीमी थी कि मेरे रोंगटे खड़े हो गए. मैंने उसे ज़ोर से अपनी बाहों में जकड़ लिया और बेडरूम की तरफ ले जाने लगा. गुस्से में पागल होकर, उसने मेरा हाथ पकड़ा, उसके नाखून मेरी बाहों में धंस गए.
मम्मी: मुझे यकीन नहीं होता कि मैंने ऐसे हरामज़ादे को जन्म दिया!
लेकिन मैंने हद पार कर दिया था अब यहां से पीछे हटना बहुत मुश्किल था. मैंने उसकी कलाइयाँ पकड़ीं और उन्हें ज़ोरदार झटके के साथ गद्दे पर दबा दिया. वो मेरे नीचे छटपटा रही थी, बचने की बेताब कोशिश में उसका शरीर ऐंठ रहा था, लेकिन उसकी इस हरकत से वो मेरी नज़रो के सामने पूरी तरह खुल गई. जिंदगी में पहली बार मैं मम्मी के साथ इस हालत में था, जिसके शरीर पर न तो कोई शर्म-लिहाज़ था और न ही कोई कपड़ा. हम दोनों के नंगे बदन की गर्मी मिलकर एक हवस को जन्म दे रही थी.
उसके निप्पल के आस-पास का हिस्सा हल्के रंग का था. और उसके स्तन भरे हुए थे, जो उम्र के साथ आए स्वाभाविक, थोड़े झुके हुए थे. जब मैंने उसे दबाकर रखा, तो मेरी नज़रे नीचे उसके पेट के नरम और उभार पर गई. ये किसी लड़की का सपाट पेट नहीं था, बल्कि एक ऐसी औरत का पेट था जिसने बच्चों को जन्म दिया हो. उसमें एक माँ वाली भरपूर कोमलता थी. उसकी कमर पर मांस की एक हल्की सी, आकर्षक सिलवट थी जो उसके यौवन और परिपक्वता को और बढ़ा रही थी. उसकी जांघें मोटी और मज़बूत थी और साथ में उसका चौड़ा गांड.
मैं झुका और ज़ोर से, ज़बरदस्ती उसके होंठों पर अपने होंठ दबा दिए और हम दोनों की गर्म सांसे एक दूसरे से टकराने लगी.
शुरू में उसने विरोध किया, उसका मुंह बंद था और सिर इधर-उधर हिल रहा था, लेकिन मैंने ज़बरदस्ती अपना रास्ता बनाया, अपनी जीभ उसके दाँतों के बीच से अंदर डाली. उसके ना चाहते हुए भी हमारे बीच वो चुंबन हुआ. जिससे फिर वो धीमी, कांपती हुई सिसकी में बदल गई जब मैंने उसकी जीभ को चूसा. मैं अपना मुँह नीचे उसकी गर्दन की ओर ले गया और अपना चेहरा उसके कंधे की गर्म, खुशबूदार जगह में दबा दिया.
मैं: हाय... मेरी जान क्या खुशबू है आपकी! मम्मी: मुझे यकीन नहीं होता कि मैंने ऐसे हरामज़ादे को जन्म दिया. मैं: मम्मी मेरे प्यास को समझो. आपको देखता हूं तो रोक नहीं पाता हूं. मम्मी: मैं कह रही हूं चुप हो जा और छोड़ मुझे...
लेकिन मैं नहीं रुका और रुकता अभी कैसे पहली बार मेरी मम्मी मेरे हाथ लगी थी. मैंने उसकी गर्दन को भूखेपन और शिद्दत के साथ चूमना शुरू किया. कभी धीरे-धीरे और देर तक दबाते हुए, तो कभी ज़ोर से काटते हुए, जिससे उसकी पीठ बिस्तर से ऊपर उठ जाती थी. उसका विरोध कमज़ोर पड़ रहा था, शब्द लड़खड़ा रहे थे क्योंकि मैं उसकी गर्दन पर गीले, गर्म चुंबनों की लकीर बनाता हुआ नीचे बढ़ रहा था. आखिरकार, मैं उसके स्तनों तक पहुँचा. मैंने एक पल के लिए उन निप्पल्स को देखा और फिर उनमें से एक को पूरी तरह अपने मुँह में ले लिया. मैंने ज़ोर से चूसा, अपनी जीभ को उस सख्त उभार के चारों ओर घुमाया और हल्के रंग के एरियोला (निप्पल के आसपास का हिस्सा) को अपने गले के अंदर तक खींचा. और उसके गांड अचानक ऊपर की ओर झटके से उठे.
मम्मी: इश्श्श्श...ओह! मत कर...आह
फिर मैंने अपना हाथ बढ़ाते हुए उसकी दूसरी चूची को पकड़ा और चूसना शुरू कर दिया क्योंकि वह भी बराबर की हकदार थी. मैंने अपने आप को सीमित न रखकर, नीचे की ओर खिसकने लगा जहां उसकी गहरी नाभी थी. मैं अपनी जीभ को उस मुलायम से गहरी नाभि में घुमाने लगा जिससे उसके जांघों में कंपन हुई. मैं ये देख सकता था कि एक माँ को कैसा एहसास होता है जब उसका बेटा उसके साथ यौन संबंध बनाता है.
मैं उसकी कांपती हुई जांघों के बीच पहुंच गया. मैंने उसके पैरों को पकड़ा और उन्हें ज़बरदस्ती फैलाया ताकि उसके सबसे गुप्त हिस्से को देख सकूं. जब मैंने नीचे देखा, तो मेरी साँसें थम गई. उसकी चूत परिपक्व सुंदरता का एक बेहतरीन नमूना थी. बाहरी होंठ मोटे और चिकने, जिनका रंग गहरे गुलाबी-भूरे रंग का था जो उसकी जांघों की हल्की रंगत के साथ बहुत सुंदर लग रहा था. जब मैंने अपनी उंगलियों से उन्हें खोला, तो उसकी चूत का चमकदार, गीला हिस्सा दिखाई दिया. उसकी अंदरूनी परतें उत्तेजना की एक मोटी, पारदर्शी परत से चमक रही थी. वो बिल्कुल सही आकार की थी. एक तंग, लुभावनी दरार जो उसके दिल की हर तेज़ धड़कन के साथ धड़क रही थी. उसकी महक तुरंत मुझ तक पहुँची, एक नशीली, मदहोश कर देने वाली खुशबू. यह एक गहरी, कस्तूरी खुशबू थी जिसमें एक परिपक्व महिला की प्राकृतिक, नमकीन गंध मिली हुई थी. मैं उसके करीब झुका, मेरी गर्म साँसें उसकी संवेदनशील त्वचा को छू रही थी, और फिर मैंने अपने होंठ सीधे उसके चूत के दाने (क्लिटोरिस) पर टिका दिए. पहला स्पर्श बिजली जैसा था. उसकी चूत मखमली लग रही थी, रेशमी, गर्म और बेहद नरम. जब मैंने अपनी जीभ उसके क्लिटोरिस के उभरे हुए छोटे से हिस्से पर फेरी, तो उसने एक दबी हुई सिसकारी लेते हुए अंगड़ाई लिया.
वो मेरी जिंदगी का पहला दिन था जब मैंने किसी चूत का स्वाद चखा था. उसका स्वाद अद्भुत था. नमक और एक मीठे, धातु जैसा स्वाद का ज़बरदस्त मिश्रण. ये एक गहरा, मलाईदार स्वाद था. जिसे मैं तब तक चाटता रहा जब तक कि वो पूरा पानी पानी नहीं हो गई.
मम्मी: उम्म्...नहीं... हे भगवान, नहीं.... आह्ह!
एक तरफ उसकी सिसकारियां, दूसरी तरफ उसकी खुशबू और उसका स्वाद मेरे तन-बदन में बिजली पैदा कर रहा था. जैसे-जैसे मैं उसकी चूत का मज़ा ले रहा था, उस सुख ने अचानक उसमें घबराहट और डर की एक ज़बरदस्त लहर पैदा कर दी. मज़ा लेते हुए निकलने वाली आहें अचानक असली डर और गुस्से भरी चीखों में बदल गई. उसकी चूत मेरे आगे मचलने लगी, और मुझे अपने ऊपर से हटाने की बेताब कोशिश में उसके गांड झटके खाने लगे.
उसके हाथ, जो पहले चादर को कसकर पकड़े हुए थे, अब मेरे सिर की ओर झपटे. उसने मेरे बालों को नोचा और पूरी ताकत से मेरे गालों को पीछे धकेलने की कोशिश की.
वो अब सिर्फ विरोध नहीं कर रही थी, वो अपनी जान बचाने के लिए लड़ रही थी. उसने अपने पैरों को ज़ोर-ज़ोर से मरोड़ना शुरू किया और अपनी जांघों को सिकोड़कर बंद करने की कोशिश की ताकि मेरी जीभ से अपने खुले हुए चूत को बचा सके. उसने अपने कूल्हों को ऊपर की ओर झटका दिया और मुझसे दूर खिसकने की कोशिश की.
मम्मी: (गुस्सा करते हुए) हट जा कमीने, छोड़ मुझे!
उसका शरीर उत्तेजना और पसीने से तर-बतर था. जब भी मैंने उसके पैरों को दोबारा खोलने की कोशिश की, उसने पूरी ताकत और जुनून के साथ विरोध किया.
मम्मी: हट जा हरामी कहीं के... कोई कुत्ता भी अपनी माँ के साथ ऐसा नहीं करता!
उसने अपने धड़ को मरोड़ा और बिस्तर से भागने की कोशिश में एक तरफ लुढ़की. उसके नाखून मेरे कंधों में धंस गए, जिससे मेरी कंधों पर लाल निशान पड़ गए. लेकिन वो जितना ज़्यादा संघर्ष करती, मेरी पकड़ उतनी ही मज़बूत होती जाती. मैंने उसके टखनों को पकड़कर गद्दे पर ज़ोर से दबा दिया और एक ज़ोरदार झटके से उसके पैरों को फिर से खोल दिया. वो मुझे बुरा-भला कहती रही, मुझे तरह-तरह की गालियाँ देती रही, चिल्लाने की कोशिश में उसकी आवाज़ भी फटने लगी थी. लेकिन मुझे पता था की वो शोर नहीं मचाएगी.
मेरा लंड जो पत्थर की तरह मजबूत हो चुका था वो अब चादर से रगड़ खा रहा था और अपनी माँ की चूत से पहली मुलाक़ात को लेकर बेहद बेचैन था. मैंने अपना पोजीशन बदला, एक हाथ से उसकी कलाइयों को उसके सिर के ऊपर दबाकर रखा और खुद को उसकी कांपती हुई जांघों के बीच सेट किया. मैंने अभी अंदर प्रवेश नहीं किया था. इसके बजाय, मैंने अपने सख्त, लंड को पकड़ा और उसके सिरे को धीरे-धीरे और मज़बूती से उसकी पूरी तरह गीली चूत पर रगड़ने लगा.
उसकी चूत के होठों की परतों पर मेरी लंड की रगड़ से एक गीली, थपथपाने वाली आवाज़ पैदा हुई. मेरी की हुई इस छोटी लेकिन कामुकता भरे हरकत ने उसकी चीखों के बीच की खामोशी को भर दिया. जिस गुस्से ने उसके संघर्ष को हवा दी थी, वो अब गहरी शर्मिंदगी में बदलने लगा. उसका चेहरा गहरे लाल रंग का हो गया और उसने अपना सिर दूसरी तरफ घुमा लिया. वो मेरी ओर देख नहीं पा रही थी, जबकि मैं उसे छेड़ता रहा और अपने लंड की लंबाई को उसकी चूत के छेद पर ऊपर-नीचे रगड़ता रहा.
मम्मी: (सिसकते हुए) प्लीज़... आशीष, प्लीज़ रुक जा. ये पाप है बेटा! मैं: मत रोको आज मुझे मम्मी, मेरी जरूरत को भी तो समझो. आपका बेटा आपके लिए बहुत तड़पता है आज प्यास बुझा लेने दो... मम्मी: मैं माँ हूँ तेरी... थोड़ी शर्म कर. दूसरे लड़कों को देख, वो इज़्जत करते हैं माँ की न कि इज़्जत लूटते हैं.
ये कहते हुए उसके गालों पर आँसू बहने लगे, जो उसके चेहरे पर मौजूद पसीने के साथ मिल गए. हम दोनों के बीच एक गहरी खामोशी छा गई. मैंने अपना सर उसके सर से टीकाकर अपने लंड को धीरे से चूत के मुहाने पर रखा और हल्का सा अंदर की ओर धक्का लगाया. आह..., ये वही पल था, जिसका मुझे इतने दिनों से इंतजार था. वो एहसास बहुत ज़बरदस्त था. उसकी चूत बहुत तंग थी, उसने मेरे लंड को कसकर जकड़ रखा था. उसकी चूत की दीवारें झटके और अनचाहे उत्तेजना के कारण धड़क रही थी.
मम्मी: नहीं... नहीं, है भगवान...रुक... बस... ओह भगवान... नहीं... म्म्म्फ!
मैंने फिर उसकी कमर को कसकर पकड़ा. और मैंने लंड को थोड़ा बाहर निकाल, एक ज़ोरदार झटके के साथ अपना लंड उसके अंदर डाल दिया. इस बार जांघों के टकराने की आवाज़ एक गीले, भारी थप्पड़ जैसी थी जो पूरे कमरे में गूंज गई.
मम्मी: हाय राम! ये क्या किया...तूने? मादरचोद कहीं के... मैं: ओ मम्मी पहली बार आपके मुंह से ऐसी गाली सुना... मम्मी: बाहर निकल, मुझे छोड़ हरामी...आज से तू मेरा बेटा नहीं है. मैं: बस मम्मी हो गया. देखो सब कुछ हो गया, आप बहुत गर्म हो.
मैंने रफ़्तार बढ़ा दी, घर्षण ज़बरदस्त था. उसका चूत एक जलती हुई, तंग सुरंग जैसा था जो हर स्ट्रोक के साथ मेरे लंड को जकड़ लेता था.
लेकिन मुझे कुछ देर बाद एहसास हुआ की मम्मी एक परिपक्व औरत है और अनुभवी भी. वो अच्छे से जानती थी कि मुझे वो कैसे हरा सकती है. उसने अपनी चूत को जानबूझकर टाइट कर लिया था जिससे कि मैं उसके सामने टिक ना पाऊं, और यही एक इकलौता तरीका था जिससे वो बच सकती थी. और हुआ भी लगभग ऐसा ही लेकिन मैंने कोशिश की. मैंने उसे और ज़ोर से चोदना शुरू किया, गहरे और तेज़ी से धक्के मारते हुए.
मम्मी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…आह्ह्ह…आह्ह्ह…
वो सिसक रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ें तकलीफ़ भरी चीखों से बदलकर एक औरत की, सुरीली कराहों में बदल रही थीं.
वो मेरे नीचे कांप रही थी, चूत की अंदरूनी मांसपेशियां मेरे लंड को बेताबी और लय के साथ जकड़ रही थी. हर धक्के के साथ मानो मुझे निचोड़ रही हो. मुझे अपने पेट में एक दबाव महसूस हो रहा था, एक तेज़ गर्मी जो चरम सीमा तक पहुँच रही थी. सच में मैं उसे नहीं बर्दाश्त कर पाया. क्योंकि ये पहली बार था जब मैं अपनी मम्मी को चोद रहा था.
मैंने अपनी रफ़्तार बढ़ाई, मेरे धक्के छोटे, तेज़ और ज़ोरदार हो गए. मैंने अपना चेहरा उसकी गर्दन के मोड़ में दबाया और उसके कंधे को काटा, ठीक उसी समय जब मुझे अपने चर्मसुख का पहला ज़ोरदार अहसास हुआ. वो चालक थी, उसे मेरी हालत का पता चल गया. यहां उसके अनुभव ने उसका साथ दिया. मेरे लंड से वीर्य निकलता, इससे पहले ही उसने जैसे तैसे अपनी चूत को खींच लिया जिससे मेरे लंड का सारा गर्म वीर्य, थोड़ा बिस्तर पर और बाकी उसके पेट पर गिर गया.
गिरते हुए वीर्य के साथ मेरी तो जैसे जान ही निकल गई और मैं भी बेसुध होकर उसके शरीर पर पड़ा रहा. उसे उस हालत में देखना बहुत दुखद था. उसके बाल तकिए पर बिखरे हुए थे, और उसकी चुचियों में भी अब ठहराव था. वो काफी देर तक हिली-डुली नही. फिर, उसने धीरे से अपना सिर मुझसे दूर घुमाया और दीवार की ओर खाली नज़रों से देखने लगी. उसके गाल पर पसीने के बीच से एक आँसू बह निकला.
मम्मी: (फुसफुसाते हुए) तुने ये क्या किया? मैं: मम्मी...
मैंने उसके कंधे को छूने के लिए हाथ बढ़ाते हुए कहा. वो ज़ोर से चौंक गई और ऐसे पीछे हट गई जैसे मेरा स्पर्श तेज़ाब हो. वो धीरे से उठी, अपनी पेट से टपकते वीर्य की परवाह किए बिना, और मेरी ओर देखा.
मम्मी: तुने सब कुछ बर्बाद कर दिया. मैं तेरी माँ थी, तुझे प्यार करती थी और तूने मेरे इज्जत के साथ खिलवाड़ किया? मैं: आपको ये पसंद आया था! मैंने आपकी सिसकारियां सुनी थी. मम्मी: क्योंकि मेरे शरीर ने मुझे धोखा दिया...
मैं: मेरी बात सुनो आज जो भी हुआ यह सिर्फ मैं और आप जानते हैं. ये सब कुछ इस चारदीवारी के अंदर की बात है. किसे पता चलेगा? आप अपने आप को दोषी मत समझो. मम्मी: अच्छा तो तू समझाएगा मुझे, क्या सही है और क्या गलत. रहने दे!
वो बस बिस्तर से उतरी, और वो मेरे वीर्य के निशान धोने के लिए बाथरूम की ओर चली गई. मुझे उस कमरे की खामोशी में अकेला छोड़ गई, जो अब किसी क्राइम सीन जैसा लग रहा था. मैंने गलत किया था, जिसका पछतावा अब मुझे हो रहा था. मुझे शायद रीना दीदी तक ही सीमित रहना चाहिए था, क्योंकि वो अपनी मर्जी से कुछ ना कुछ मेरे लिए कर रही थी. लेकिन मैं क्या करता मम्मी की तड़पी ऐसी है की दिमाग से नहीं निकलती और अब तो बिल्कुल नहीं. अभी भी मेरे लंड में फड़फड़ाहट हो रही थी उसकी चूत के एहसास को आखिर कैसे भूल जाऊं? वो मेरी जिंदगी की पहली चूत थी, मेरे लैंड का ख्याल रखने वाली पर फिलहाल उसे मनाना ज्यादा जरूरी था.
तभी बेडरूम के दरवाज़े पर दस्तक की आवाज उस भारी सन्नाटे में किसी बंदूक की गोली जैसी लगी. मैं चौंक गया, मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था. मैंने बाथरूम के दरवाज़े की तरफ़ देखा जहाँ मम्मी नहाने चली गई थीं, शॉवर की आवाज़ आ रही थी. मैंने गहरी साँस ली, और दरवाज़े की तरफ बढ़ा. जब मैंने दरवाज़ा खोला, तो कुसुम दीदी वहाँ खड़ी थी. उन्होंने हाथ बांध रखे थे, उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था लेकिन उनकी नज़रें तेज़ थी.
कुसुम दीदी: मम्मी कहाँ हैं? मुझे नहाना है, और वो काफ़ी देर से अंदर है. मैं: वो... वो अभी भी बाथरूम में हैं, दीदी. आज वो आराम से नहा रही हैं. कुसुम दीदी: और तू? तुझे इतना पसीना क्यों हो रहा है? घर में इतनी गर्मी भी नहीं है. और तु... हाँफ रहा है.
दीदी अपनी जगह से नहीं हिली. उन्होंने मुझे गौर से देखा. उनकी नज़रें मेरी आँखों से नीचे मेरी छाती तक गई. उन्होंने देखा कि मेरी टी-शर्ट मेरी गीली त्वचा से कैसे चिपकी हुई थी.
मैं: मैं बस अलमारी से भारी चादरें और तौलिए सही तरीके से रखने में मम्मी की मदद कर रहा था. शुरू करने से पहले मुझे अंदाज़ा नहीं था कि इसमें कितनी मेहनत लगेगी.
तभी बाथरूम का दरवाज़ा खुला. मम्मी बाहर निकलीं, ठीक तरीके से कुर्ती पहनकर, ऐसा लग रहा था मानो कुछ हुआ ही नहीं हो. उसके चेहरे पर एक शांत और अधिकारपूर्ण भाव था, हालाँकि मैं उसकी गर्दन पर बची हुई लाली देख सकता था. जो उस ज़बरदस्त सेक्स की निशानी थी जो उसने अभी-अभी झेला था.
कुसुम दीदी: मम्मी, आपको इतनी देर क्यों लगी? और आशीष यहाँ पसीने से लथपथ क्यों खड़ा है, जैसे उसने अभी-अभी मैराथन दौड़ी हो?
मम्मी जरा भी नहीं घबराई. वो आगे बढ़ीं, उसके चेहरे पर हल्की झुंझलाहट और चिंता के भाव आ गए, और उसने घर की मुखिया की भूमिका बखूबी निभाई. उसने दीदी के कंधे पर हाथ रखा, जिससे दीदी का ध्यान मुझ पर से हट गया.
मम्मी: अरे, बेचारे लड़के से पूछताछ बंद करो, कुसुम. आशीष बस कमरे में कुछ भारी सामान उठाने में मेरी मदद कर रहा था. वो थोड़ा अनाड़ी है और उसने ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर लगा दिया. कुसुम दीदी: लेकिन कपड़े तो इतने भारी नहीं होते! मम्मी: हाँ, अलमारी के दराज अटक गए थे. अब, तुम्हारे नहाने की बात करें तो, अभी इस बाथरूम का इस्तेमाल मत करना. इसका हैंडल फिर से टूट गया है. ये मुश्किल से बंद होता है. कुसुम दीदी: हैंडल टूटा हुआ है? आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?
मम्मी ने आसानी से झूठ बोला, उसकी नजर एक पल के लिए मेरी ओर घूमी, उसमें चेतावनी और छिपा हुआ गुस्सा था.
मम्मी: जाओ कुसुम पीछे वाला ही बाथरूम इस्तेमाल कर लो या तब तक इंतज़ार करो जब तक मैं किसी कारीगर से उसे ठीक न करवा लूँ. अब जाओ भी, तुम समय बर्बाद कर रही हो.
जैसे ही दीदी नज़र से ओझल हुई, सन्नाटा पहले से भी ज़्यादा गहरा हो गया. मम्मी मेरी तरफ़ मुड़ीं. उसका शांत माँ वाला मुखौटा उतर चुका था. उसकी आँखों में साफ-साफ नफरत और शर्म झलक रही थी. उसने एक शब्द भी नहीं कहा, लेकिन जिस तरह से उसने अपने दुपट्टे को कसकर पकड़ा था, उससे सब कुछ साफ़ हो गया. उसने मुझे पकड़े जाने से बचाया था, लेकिन प्यार की वजह से नहीं, बल्कि अपनी बची-खुची इज्जत बचाने और हमारे उस वाकये की गंदगी को परिवार के बाकी लोगों से छिपाए रखने के लिए.
अभी भी मुझे घूरते हुए खड़ी थी,
मम्मी: आज के बाद मुझसे दूर रहना! मैं: मम्मी, आपने मुझे बचा लिया, क्यों? क्योंकि आप जानती हो कि अगर दीदी को पता चल गया, तो आप भी उतनी ही बर्बाद हो जाओगी जितना मैं. अब हम दोनों इसमें साथ हैं. मम्मी: साथ में? साथ में जैसा कुछ नहीं है. तुने ही ये सब जबरदस्ती करवाया है.
कहकर वो किचन की तरफ चली गई. जब मैं अपने कमरे की ओर जा रहा था, तो हॉलवे में रीना दीदी से मेरी मुलाक़ात हुई. उनके हाथों में तय किए हुए कपड़ों का ढेर था और उनके चेहरे पर हमेशा की तरह शर्मीला और सौम्य भाव था. वो रुकी और मुझे देखा. उनकी नज़रें मेरे तमतमाए चेहरे और अस्त-व्यस्त कपड़ों को देख रही थी.
रीना दीदी: आशीष? क्या तु ठीक है? तु... परेशान लग रहा है! मैं: मैं ठीक हूँ दी. आप थोड़ी देर के लिए मेरे कमरे में क्यों नहीं आ जातीं? मुझे थोड़ी... साथ की ज़रूरत है. रीना दीदी: मुझे अभी बहुत काम है. अच्छा पहले नाश्ता तो कर ले.
उसके बाद के दिन, मम्मी ने मुझे अपनी दुनिया से पूरी तरह मिटा दिया था. न तो वो चिल्लाई, न उसने कोई लेक्चर दिया और न ही कोई बहस की. उसने बस मेरे होने को ही नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया. खाने की टेबल पर वो खाना परोसतीं. उसके काम करने का तरीका सटीक होता, लेकिन उसकी नज़रें कभी मुझसे नहीं मिलती थी. अगर मैं कुछ कहता, तो वो रीना या कुसुम दीदी की तरफ मुंह करके से ऐसे बात करती जैसे मैं कमरे में कोई भूत हूँ. वो खामोशी मुझे दर्द की तरह महसूस होने लगी.
फिर एक दिन दोपहर आई और घर आखिरकार खाली-खाली सा लगने लगा. रीना और कुसुम दीदी अपने ग्रूमिंग के लिए पार्लर चली गई थी, जिससे घर में सन्नाटा छा गया था. मुझे ठीक-ठीक पता था कि मम्मी कहाँ है. मानसून की बारिश ने छत पर जिद्दी नमी के धब्बे छोड़ दिए थे, और उसने पिछले कुछ घंटे उन्हें साफ करने में बिताए थे.
मैं सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर की ओर गया और देखा तो मम्मी वही सूती की साड़ी पहने हुए अपनी नज़रें झुकाए, मुझे अभी भी नजरअंदाज कर रही थी.
मैं: मम्मी?
उसने कोई जवाब नहीं दिया. मैंने उसके करीब जाकर अपना हाथ उसकी कंधे पर रखकर उसे बुलाने की कोशिश की. तभी उसने मेरा हाथ झटक दिया,
मम्मी: क्या है? अब क्यों आया है यहां पर, फिर मेरी इज्जत लूटना चाहता है? मैं: मम्मी ठीक है, हो गया ना, हटाओ उन बातों को.
मम्मी: बस ठीक है? ये बहुत छोटी सी बात है ना तेरे लिए!
मैं: मैं क्या करता आपने देखा था मेरी हालत कैसी थी, मेरा लंड कितना कड़क हो गया था. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था और आप इतनी खूबसूरत हो कि मुझे अपने आप पर कंट्रोल नहीं रहा. मम्मी: चुप, एकदम चुप. बेशर्म कहीं का...
वो गुस्से से आगे बड़ी, मुझसे दूर हटने के लिए लेकिन तभी उस गिले फर्श पर उसका पैर फिसल गया और वो गिर पड़ी. फिसलने के कारण चोट बहुत तेज लगी जिससे उसका खड़ा होना भी मुश्किल हो गया. मैं तुरंत उसके करीब गया और उसे उठाने की कोशिश करने लगा. वो अभी गुस्से में मुझसे बेरहमी से पेश आ रही थी.
मैं: मम्मी, मेरी बात सुनो दर्द बहुत ज्यादा है आप नहीं चल पाओगी. मम्मी: मैं सब कुछ झेल लूंगी. तू बस हट जा मेरे पास से.
वो खुद से उठने की कोशिश करने लगी पर नाकाम रही. उसकी नज़रें झुकी हुई थी और दर्द बहुत ज्यादा था.
मैं: मैं जानता हूं यह सब मेरी वजह से हुआ है. मुझे मौका तो दो.
उसका कोई जवाब नहीं आया मैं उसके करीब जाकर उसके बाहों को अपने कंधे पर रख सहारा देते हुए उसे उठाने की कोशिश करने लगा. वो अभी भी मानने को तैयार नहीं थी. पर मैंने जैसे तैसे उसे उठाया और फिर गोद में उठाकर सीढ़ियों से नीचे कमरे में ले आया और उसे बिस्तर पर लेटा दिया.
भले ही मेरे पास इस बार बहुत अच्छा मौका था. लेकिन मैंने अपने आप पर काबू किया और इस बार कोई कामुकता नहीं. क्योंकि मुझे जो हासिल करना था वो मैंने कर लिया था. फिलहाल उसे मनाना बहुत जरूरी था जो की सबसे कठिन काम था.