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परिणाम की खुशी और विदाई का दर्द
परीक्षा के बाद के वे दिन किसी अंतहीन प्रतीक्षा की तरह खिंच रहे थे। घर की हवा में एक अजीब सी बेचैनी घुली हुई थी। गौरव के लिए समय जैसे थम गया था। वह घंटों अपनी खिड़की के पास बैठा रहता, बाहर सड़क पर चलते लोगों को देखता, लेकिन उसका मन केवल एक ही सवाल से जूझ रहा था—क्या वह सफल होगा? उसके भीतर एक डर था, एक ऐसी घबराहट जो उसे रात भर सोने नहीं देती थी।
रेखा इन दिनों गौरव की परछाईं बन गई थी। वह जानती थी कि उसका लाडला किस मानसिक दबाव से गुजर रहा है। वह बिना कहे उसकी हर जरूरत को समझ लेती। सुबह की पहली किरण के साथ जब वह घर के मंदिर में दीया जलाती, तो उसकी प्रार्थनाओं में केवल गौरव का नाम होता।
पीच रंग की एक हल्की सूती साड़ी में लिपटी रेखा जब रसोई में काम करती, तो उसकी पायल की छन-छन पूरे घर में एक सुकून भरी लय पैदा करती। उसकी कमर पर बंधा पल्लू हल्का सा ढीला रहता, और जब वह झुककर काम करती, तो उसकी गर्दन पर वह छोटा सा काला तिल साफ नजर आता, जो उसकी सुंदरता में एक अलग ही आकर्षण जोड़ देता था। उसके चेहरे पर एक दिव्य तेज था, जैसे ममता और यौवन का एक दुर्लभ संगम हो।
गौरव अक्सर उसे चुपके से देखता। वह देखता कि कैसे उसकी माँ की उंगलियाँ बड़ी कुशलता से रोटियाँ बेल रही हैं, कैसे उसकी आँखों में उसके लिए बेपनाह प्यार है। वह महसूस करता कि दुनिया की सारी खुशियाँ उसकी माँ की उस एक मुस्कान में सिमटी हुई हैं।
एक दोपहर, जब सूरज की तपिश चरम पर थी, गौरव अपने कमरे में लैपटॉप के सामने बैठा था। उसके हाथ कांप रहे थे। पसीने की बूंदें उसके माथे पर चमक रही थीं। तभी कमरे का दरवाजा धीरे से खुला।
रेखा हाथ में एक गिलास ठंडा शरबत लेकर अंदर आई। उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी, लेकिन आँखों में वही चिंता जो गौरव के दिल में थी। उसने शरबत मेज पर रखा और गौरव के कंधे पर अपना कोमल हाथ रखा।
"बहुत तनाव ले रहे हो बेटा। सब अच्छा होगा।"
गौरव ने ऊपर देखा। उसकी माँ की आँखों की गहराई उसे हमेशा शांत कर देती थी। उसने एक गहरी साँस ली और स्क्रीन पर 'सबमिट' बटन दबाया। पेज लोड होने में कुछ सेकंड लगे, जो गौरव को सदियों जैसे महसूस हुए। जैसे ही स्क्रीन पर 'Qualified' शब्द उभरा, गौरव की चीख निकल गई।
"माँ! मैं पास हो गया! मैं स्टेशन मास्टर बन गया!"
वह अपनी कुर्सी से उछला और दौड़कर रेखा के गले लग गया। रेखा की आँखों में पल भर में आँसू भर आए। ये आँसू दुख के नहीं, उस गर्व और खुशी के थे जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन था। उसने गौरव को अपनी बाहों में कस लिया। गौरव का चेहरा उसकी छाती से लगा था, जहाँ वह अपनी माँ के दिल की धड़कन को साफ सुन सकता था।
"मेरा बच्चा... मेरा गौरव... मुझे पता था तू कर दिखाएगा।"
रेखा फूट-फूट कर रो पड़ी। गौरव ने अपनी माँ को थोड़ा पीछे धकेला और अपने हाथों से उसकी आँखों के आँसू पोंछे। उसने देखा कि रोते हुए उसकी माँ और भी अधिक सुंदर लग रही थी। उसकी काजल लगी आँखें नम थीं और गालों पर एक गुलाबी रंगत छा गई थी।
तभी राजेश कमरे में दाखिल हुए। उनके चेहरे पर एक गंभीर भाव था जो खबर सुनते ही एक चौड़ी मुस्कान में बदल गया।
"क्या बात है! मेरा बेटा अफसर बन गया!"
राजेश ने गौरव को गले लगाया और फिर रेखा की ओर देखा। दोनों की आँखों में एक-दूसरे के लिए सम्मान और खुशी थी। उस दिन घर का माहौल उत्सव जैसा हो गया। रेखा ने तुरंत रसोई में जाकर गौरव की पसंद के पकवान बनाने शुरू कर दिए।
अगले कुछ दिन इंटरव्यू की तैयारी में बीते। यह दौर और भी चुनौतीपूर्ण था। गौरव को अपनी बातचीत के तरीके, अपने ज्ञान और अपने आत्मविश्वास पर काम करना था। रेखा इस पूरी प्रक्रिया में उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
वह हर शाम गौरव के साथ बैठती और उससे कठिन सवाल पूछती। वह उसे सिखाती कि कैसे विनम्र रहकर अपनी बात रखनी है। जब गौरव घबराता, तो रेखा उसका हाथ थाम लेती। उस स्पर्श में एक ऐसी ऊर्जा थी जो गौरव के सारे डर को सोख लेती।
"बेटा, बस सच बोलना और अपनी सादगी को अपनी ताकत बनाना। तेरी सच्चाई ही तुझे जीत दिलाएगी।"
इंटरव्यू से एक दिन पहले, रेखा ने घर में विशेष पूजा का आयोजन किया। उसने पीले रंग की एक चमकदार साड़ी पहनी थी। माथे पर बड़ी लाल बिंदी, माँग में गहरा सिंदूर और गले में मंगलसूत्र—वह साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप लग रही थी। उसने गौरव की आरती उतारी। जब उसने गौरव के माथे पर टीका लगाया, तो गौरव की नजरें उसकी आँखों में गड़ी थीं। उसे महसूस हुआ कि उसकी माँ केवल उसकी देखभाल करने वाली स्त्री नहीं, बल्कि एक ऐसी शख्सियत है जिसकी सुंदरता और गरिमा का कोई सानी नहीं।
इंटरव्यू का दिन आया। गौरव ने अपना सबसे अच्छा सूट पहना था। रेखा ने उसे अंतिम बार गले लगाया और उसके कान में धीरे से कहा।
"मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।"
इंटरव्यू की प्रक्रिया लंबी और थकाऊ थी। गौरव ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। जब वह घर लौटा, तो उसके चेहरे पर एक संतोष था। उसने रेखा को सारी बातें विस्तार से बताईं। रेखा ने उसे बड़े ध्यान से सुना, बीच-बीच में अपनी सहमति में सिर हिलाती रही।
फिर वह दिन आया जब अंतिम मेरिट लिस्ट जारी हुई। गौरव का नाम सूची में काफी ऊपर था। उसका चयन हो चुका था। पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। पड़ोसियों ने मिठाइयां बांटीं, रिश्तेदार फोन कर बधाई देने लगे। राजेश की छाती गर्व से चौड़ी हो गई थी।
लेकिन इसी खुशी के बीच, एक खामोश दर्द ने जन्म लिया।
जैसे-जैसे जॉइनिंग की तारीख नजदीक आने लगी, घर की रौनक धीरे-धीरे एक भारीपन में बदलने लगी। गौरव की पोस्टिंग शहर से काफी दूर थी। उसे वहाँ जाकर रहना था।
रेखा के चेहरे की वह चमक अब थोड़ी धुंधली पड़ने लगी थी। वह अक्सर चुपचाप खिड़की के बाहर देखती रहती। उसका इकलौता बेटा, जिसकी हर छोटी जरूरत का उसने ध्यान रखा था, अब उससे दूर जाने वाला था।
गौरव के दिल में भी एक तूफान उठा हुआ था। वह खुश था कि उसने अपने माता-पिता का नाम रोशन किया, लेकिन उसकी आत्मा इस अलगाव के विचार से कांप रही थी। वह रेखा को केवल माँ के रूप में नहीं देख रहा था। उसके भीतर एक ऐसा प्रेम पनप रहा था जो पवित्र था, लेकिन साथ ही जटिल भी।
वह अपनी माँ की सुंदरता, उनकी कोमलता और उनके निस्वार्थ प्रेम के प्रति इतना आकर्षित हो चुका था कि उसे लगा कि उनके बिना वह अधूरा रह जाएगा। वह अक्सर सोचता—क्या दुनिया में कोई और स्त्री ऐसी हो सकती है जो रेखा जैसी हो?
'माँ से दूर कैसे रहूँगा? क्या मैं वहाँ उनकी कमी पूरी कर पाऊँगा?'
एक रात, जब वह अपनी माँ को सोफे पर बैठे हुए देख रहा था, उसके मन में एक विचार कौंधा—'काश माँ मेरी पत्नी होतीं।' यह विचार आते ही वह सहम गया। उसे अपनी सोच पर ग्लानि हुई, लेकिन वह आकर्षण इतना गहरा था कि वह उसे दबा नहीं पा रहा था। वह उनकी ममता और उनकी स्त्रीत्व के बीच झूल रहा था।
उसकी धड़कनें तेज हो गईं। उसे महसूस हुआ कि यह केवल एक बेटे का मोह नहीं है, बल्कि एक पुरुष का अपनी माँ के प्रति गहरा, अटूट और शायद वर्जित आकर्षण है। वह उनकी खुशबू, उनके चलने के अंदाज और उनके बात करने के तरीके का दीवाना हो चुका था।
विदाई की तारीख करीब आ गई। राजेश ने गौरव के सामान की सारी पैकिंग पूरी कर ली। लेकिन रेखा का प्यार तो अभी शुरू होना था।
विदाई से ठीक एक दिन पहले, रेखा ने सुबह चार बजे से ही रसोई संभाल ली। वह चाहती थी कि उसका बेटा अपने साथ घर का स्वाद और माँ का प्यार लेकर जाए।
रसोई में घी की खुशबू महक रही थी। रेखा ने बड़े-बड़े पतीलों में गौरव के पसंदीदा लड्डू और गुजिया बनाए। उसने आम और नींबू का अचार तैयार किया, जो उसकी विशेषता थी। नमकीन, सूखे मेवे और ढेर सारे स्नैक्स—उसने हर चीज इतनी मात्रा में बनाई जैसे गौरव सालों के लिए जा रहा हो।
उसकी साड़ी का पल्लू कमर में कसा हुआ था, और माथे पर पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं। वह बार-बार अपने हाथों से पसीना पोंछती और फिर काम में जुट जाती। उसकी उंगलियाँ फुर्ती से काम कर रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक उदासी थी।
गौरव रसोई के दरवाजे पर खड़ा होकर उसे देख रहा था। उसने देखा कि कैसे उसकी माँ हर डिब्बे को प्यार से बंद कर रही है, कैसे वह हर चीज को सलीके से पैक कर रही है। उसे महसूस हुआ कि इन डिब्बों में केवल खाना नहीं, बल्कि उसकी माँ की ममता और उनकी विदाई की तड़प बंद हो रही है।
"माँ, आप इतना सब क्यों बना रही हैं? वहाँ सब मिल जाएगा।"
रेखा ने मुड़कर देखा। उसकी आँखों में नमी थी।
"वहाँ सब मिलेगा बेटा, लेकिन माँ के हाथ का स्वाद कहाँ मिलेगा? जब तू रात को अकेला होगा और तुझे मेरी याद आएगी, तब ये चीजें तुझे सुकून देंगी।"
गौरव के पास कोई शब्द नहीं थे। वह आगे बढ़ा और पीछे से अपनी माँ को गले लगा लिया। रेखा ठिठक गई, फिर उसने भी अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया। रसोई की उस गर्मी में, उन दोनों के बीच एक ऐसा मौन संवाद हो रहा था जिसे दुनिया कभी नहीं समझ सकती थी।
रात गहरी हो चुकी थी। घर में एक भारी सन्नाटा था। सारा सामान पैक हो चुका था और कल सुबह की ट्रेन का समय तय था।
गौरव अपने कमरे में लेटा था, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। वह छत को घूर रहा था, और उसके दिमाग में केवल रेखा का चेहरा घूम रहा था। अचानक उसने महसूस किया कि वह इस बोझ को और नहीं सह सकता।
उसने धीरे से दरवाजा खोला और लिविंग रूम में गया। रेखा वहाँ अकेली बैठी थी, शायद वह भी सो नहीं पा रही थी। वह एक हल्की नीली सूती साड़ी में थी, जिसके बाल खुले थे और उसके कंधों पर गिर रहे थे।
"माँ..."
रेखा ने मुड़कर देखा। गौरव की आवाज कांप रही थी। वह दौड़कर उसके पास गया और उसके पैरों में गिर गया।
"मुझे नहीं जाना माँ! मुझे आपसे दूर जाने का मन नहीं है।"
गौरव फूट-फूट कर रोने लगा। वह एक वयस्क पुरुष था, लेकिन अपनी माँ के सामने वह फिर से वही छोटा बच्चा बन गया था। वह जोर-जोर से सिसक रहा था, जैसे उसका कोई अंग उससे अलग होने वाला हो।
"मैं आपके बिना कैसे रहूँगा माँ? मुझे बहुत याद आएगी आपकी... बहुत ज्यादा।"
रेखा का दिल बैठ गया। उसने तुरंत गौरव को ऊपर उठाया और उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसने उसे कसकर पकड़ लिया, जैसे वह उसे दुनिया की नजरों से छिपा लेना चाहती हो।
"पगले, रोता क्यों है? तू मेरा लाडला है, तू जहाँ भी रहेगा, मेरी दुआएँ तेरे साथ रहेंगी। यह तेरी तरक्की है बेटा, तेरी जीत है।"
गौरव ने अपना चेहरा उसकी गोद में छिपा लिया। वह उसकी साड़ी की खुशबू को अपने भीतर उतार लेना चाहता था। वह महसूस कर रहा था कि उसकी माँ का शरीर कितना कोमल है, उनका स्पर्श कितना सुखदायक है।
"मैं वहाँ अकेला हो जाऊँगा माँ। मुझे डर लग रहा है।"
रेखा ने उसके सिर पर हाथ फेरा, उसकी जुल्फों को सहलाया और उसके माथे को चूम लिया।
"तू अकेला नहीं होगा। तू जब भी आँखें बंद करेगा, मुझे अपने पास पाएगा। देख, तूने अपने पिता का सपना पूरा किया है। अब तुझे अपनी जिम्मेदारियाँ निभानी हैं।"
वे दोनों काफी देर तक उसी तरह लिपटे रहे। कमरे की मद्धम रोशनी में उनकी परछाइयां दीवार पर एक हो गई थीं। गौरव के लिए यह केवल एक विदाई नहीं थी, बल्कि एक गहरे भावनात्मक जुड़ाव की चरम सीमा थी।
कुछ देर बाद, जब गौरव थोड़ा शांत हुआ, तो उसने रेखा की ओर देखा। उसकी आँखें अभी भी लाल थीं।
"माँ, एक बात कहूँ?"
"हाँ, बोल लाडले।"
"मैं चाहता हूँ कि मैं आपकी बहुत सारी तस्वीरें अपने साथ ले जाऊँ। जब मैं वहाँ अकेला होऊँगा और मुझे आपकी याद आएगी, तो मैं उन्हें देखूँगा। इससे मुझे लगेगा कि आप मेरे पास ही हैं।"
रेखा थोड़ा झिझका। वह स्वभाव से शर्मीली थी और उसे इस तरह फोटो खिंचवाना अजीब लगता था।
"तस्वीरें? अरे, तेरे पास मेरा नंबर है, वीडियो कॉल कर लेना।"
"नहीं माँ, वो अलग बात है। मुझे आपकी तस्वीरें चाहिए। प्लीज माँ, मेरे लिए इतना तो कर दीजिए।"
गौरव की विनती के आगे रेखा हार गई। उसने एक हल्की मुस्कान के साथ अपना सिर हिलाया।
गौरव ने अपना फोन निकाला। उसने रेखा को घर के अलग-अलग कोनों में खड़ा किया।
"यहाँ खड़े हो जाइए माँ... हाँ, बस ऐसे ही।"
उसने कई तस्वीरें लीं। कभी रेखा मुस्कुरा रही थी, कभी वह अपनी साड़ी का पल्लू ठीक कर रही थी, तो कभी वह बस खामोशी से कैमरे की ओर देख रही थी। गौरव हर तस्वीर के बाद उसे कॉम्प्लीमेंट देता।
"माँ, आप कितनी सुंदर लग रही हैं। सच कहूँ तो, आपकी सुंदरता के आगे सब फीका है।"
रेखा शर्मा गई। उसने अपनी नजरें झुका लीं और अपनी चूड़ियों को सहलाने लगी।
"बड़ा मक्खन लगाना सीख गया है तू।"
गौरव ने उसकी आँखों में देखा। उसके शब्दों में अब एक अलग ही गहराई थी।
"मैं मक्खन नहीं लगा रहा माँ। आप वाकई बहुत सुंदर हैं... बहुत ज्यादा।"
तभी गौरव के मन में एक इच्छा जागी। उसने धीरे से कहा।
"माँ, क्या मैं आपको एक बार सलवार सूट में देख सकता हूँ? मुझे आपकी वो सादगी बहुत पसंद है।"
रेखा एक पल के लिए ठिठकी। उसने अपनी अलमारी की ओर देखा और फिर धीरे से मुस्कुराई।
"अरे पागल, मेरे पास जो पुराने सूट हैं, वे अब मुझे छोटे हो गए हैं। फिटिंग सही नहीं आएगी।"
गौरव ने उसकी बात सुनी, लेकिन उसके चेहरे पर एक शरारती और प्रशंसा भरी मुस्कान थी।
"कोई बात नहीं माँ। आप किसी भी ड्रेस में, चाहे साड़ी हो या सूट, कयामत लगती हैं।"
'कयामत' शब्द सुनकर रेखा के गाल फिर से गुलाबी हो गए। उसने हल्का सा गौरव के कंधे पर हाथ मारा।
"बदतमीज! अपनी माँ से ऐसी बातें करता है?"
लेकिन उसकी आवाज में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अनकहा प्यार और खुशी थी। गौरव ने फिर से उसे गले लगा लिया।
रात के दो बज चुके थे। घर के सभी सदस्य अपने-अपने कमरों में चले गए थे। गौरव अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था।
उसने अपने फोन की गैलरी खोली और उन तस्वीरों को एक-एक करके देखने लगा। हर तस्वीर में रेखा की वह मासूमियत, वह गरिमा और वह अद्भुत सुंदरता कैद थी जिसने गौरव के दिल को पूरी तरह से जीत लिया था।
वह सोचने लगा कि कल वह इस घर से दूर चला जाएगा। वह उन गलियारों से दूर हो जाएगा जहाँ उसकी माँ की पायल गूँजती थी। वह उस रसोई से दूर हो जाएगा जहाँ से उसकी माँ के हाथों के पकवानों की खुशबू आती थी।
उसने अपनी आँखें बंद कीं और महसूस किया कि उसकी माँ का वह आखिरी स्पर्श अभी भी उसके माथे पर है। उसके भीतर एक युद्ध चल रहा था—एक तरफ बेटे का कर्तव्य और दूसरी तरफ एक पुरुष की वह अतृप्त चाहत जो अपनी माँ की सुंदरता और प्रेम में खो जाना चाहती थी।
'मैं आपको बहुत याद करूँगा माँ... बहुत ज्यादा।'
उस रात गौरव
सो नहीं सका। वह बस उन यादों और उन तस्वीरों के सहारे अपनी विदाई की सुबह का इंतजार करता रहा, जबकि उसके दिल के किसी कोने में एक गहरा दर्द और एकforbidden आकर्षण घर कर चुका था।
Dosto plz comment kre kaisa jaa rhe hai story , kya kami hai ya sahi jaa rha hai , aaplogo ko kaisa lag raha hai story plz btaiye , kisiko baat Krna ho mujhse to xforum ID de skte hai only for mom lovers ...
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परिणाम की खुशी और विदाई का दर्द
परीक्षा के बाद के वे दिन किसी अंतहीन प्रतीक्षा की तरह खिंच रहे थे। घर की हवा में एक अजीब सी बेचैनी घुली हुई थी। गौरव के लिए समय जैसे थम गया था। वह घंटों अपनी खिड़की के पास बैठा रहता, बाहर सड़क पर चलते लोगों को देखता, लेकिन उसका मन केवल एक ही सवाल से जूझ रहा था—क्या वह सफल होगा? उसके भीतर एक डर था, एक ऐसी घबराहट जो उसे रात भर सोने नहीं देती थी।
रेखा इन दिनों गौरव की परछाईं बन गई थी। वह जानती थी कि उसका लाडला किस मानसिक दबाव से गुजर रहा है। वह बिना कहे उसकी हर जरूरत को समझ लेती। सुबह की पहली किरण के साथ जब वह घर के मंदिर में दीया जलाती, तो उसकी प्रार्थनाओं में केवल गौरव का नाम होता।
पीच रंग की एक हल्की सूती साड़ी में लिपटी रेखा जब रसोई में काम करती, तो उसकी पायल की छन-छन पूरे घर में एक सुकून भरी लय पैदा करती। उसकी कमर पर बंधा पल्लू हल्का सा ढीला रहता, और जब वह झुककर काम करती, तो उसकी गर्दन पर वह छोटा सा काला तिल साफ नजर आता, जो उसकी सुंदरता में एक अलग ही आकर्षण जोड़ देता था। उसके चेहरे पर एक दिव्य तेज था, जैसे ममता और यौवन का एक दुर्लभ संगम हो।
गौरव अक्सर उसे चुपके से देखता। वह देखता कि कैसे उसकी माँ की उंगलियाँ बड़ी कुशलता से रोटियाँ बेल रही हैं, कैसे उसकी आँखों में उसके लिए बेपनाह प्यार है। वह महसूस करता कि दुनिया की सारी खुशियाँ उसकी माँ की उस एक मुस्कान में सिमटी हुई हैं।
एक दोपहर, जब सूरज की तपिश चरम पर थी, गौरव अपने कमरे में लैपटॉप के सामने बैठा था। उसके हाथ कांप रहे थे। पसीने की बूंदें उसके माथे पर चमक रही थीं। तभी कमरे का दरवाजा धीरे से खुला।
रेखा हाथ में एक गिलास ठंडा शरबत लेकर अंदर आई। उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी, लेकिन आँखों में वही चिंता जो गौरव के दिल में थी। उसने शरबत मेज पर रखा और गौरव के कंधे पर अपना कोमल हाथ रखा।
"बहुत तनाव ले रहे हो बेटा। सब अच्छा होगा।"
गौरव ने ऊपर देखा। उसकी माँ की आँखों की गहराई उसे हमेशा शांत कर देती थी। उसने एक गहरी साँस ली और स्क्रीन पर 'सबमिट' बटन दबाया। पेज लोड होने में कुछ सेकंड लगे, जो गौरव को सदियों जैसे महसूस हुए। जैसे ही स्क्रीन पर 'Qualified' शब्द उभरा, गौरव की चीख निकल गई।
"माँ! मैं पास हो गया! मैं स्टेशन मास्टर बन गया!"
वह अपनी कुर्सी से उछला और दौड़कर रेखा के गले लग गया। रेखा की आँखों में पल भर में आँसू भर आए। ये आँसू दुख के नहीं, उस गर्व और खुशी के थे जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन था। उसने गौरव को अपनी बाहों में कस लिया। गौरव का चेहरा उसकी छाती से लगा था, जहाँ वह अपनी माँ के दिल की धड़कन को साफ सुन सकता था।
"मेरा बच्चा... मेरा गौरव... मुझे पता था तू कर दिखाएगा।"
रेखा फूट-फूट कर रो पड़ी। गौरव ने अपनी माँ को थोड़ा पीछे धकेला और अपने हाथों से उसकी आँखों के आँसू पोंछे। उसने देखा कि रोते हुए उसकी माँ और भी अधिक सुंदर लग रही थी। उसकी काजल लगी आँखें नम थीं और गालों पर एक गुलाबी रंगत छा गई थी।
तभी राजेश कमरे में दाखिल हुए। उनके चेहरे पर एक गंभीर भाव था जो खबर सुनते ही एक चौड़ी मुस्कान में बदल गया।
"क्या बात है! मेरा बेटा अफसर बन गया!"
राजेश ने गौरव को गले लगाया और फिर रेखा की ओर देखा। दोनों की आँखों में एक-दूसरे के लिए सम्मान और खुशी थी। उस दिन घर का माहौल उत्सव जैसा हो गया। रेखा ने तुरंत रसोई में जाकर गौरव की पसंद के पकवान बनाने शुरू कर दिए।
अगले कुछ दिन इंटरव्यू की तैयारी में बीते। यह दौर और भी चुनौतीपूर्ण था। गौरव को अपनी बातचीत के तरीके, अपने ज्ञान और अपने आत्मविश्वास पर काम करना था। रेखा इस पूरी प्रक्रिया में उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
वह हर शाम गौरव के साथ बैठती और उससे कठिन सवाल पूछती। वह उसे सिखाती कि कैसे विनम्र रहकर अपनी बात रखनी है। जब गौरव घबराता, तो रेखा उसका हाथ थाम लेती। उस स्पर्श में एक ऐसी ऊर्जा थी जो गौरव के सारे डर को सोख लेती।
"बेटा, बस सच बोलना और अपनी सादगी को अपनी ताकत बनाना। तेरी सच्चाई ही तुझे जीत दिलाएगी।"
इंटरव्यू से एक दिन पहले, रेखा ने घर में विशेष पूजा का आयोजन किया। उसने पीले रंग की एक चमकदार साड़ी पहनी थी। माथे पर बड़ी लाल बिंदी, माँग में गहरा सिंदूर और गले में मंगलसूत्र—वह साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप लग रही थी। उसने गौरव की आरती उतारी। जब उसने गौरव के माथे पर टीका लगाया, तो गौरव की नजरें उसकी आँखों में गड़ी थीं। उसे महसूस हुआ कि उसकी माँ केवल उसकी देखभाल करने वाली स्त्री नहीं, बल्कि एक ऐसी शख्सियत है जिसकी सुंदरता और गरिमा का कोई सानी नहीं।
इंटरव्यू का दिन आया। गौरव ने अपना सबसे अच्छा सूट पहना था। रेखा ने उसे अंतिम बार गले लगाया और उसके कान में धीरे से कहा।
"मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।"
इंटरव्यू की प्रक्रिया लंबी और थकाऊ थी। गौरव ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। जब वह घर लौटा, तो उसके चेहरे पर एक संतोष था। उसने रेखा को सारी बातें विस्तार से बताईं। रेखा ने उसे बड़े ध्यान से सुना, बीच-बीच में अपनी सहमति में सिर हिलाती रही।
फिर वह दिन आया जब अंतिम मेरिट लिस्ट जारी हुई। गौरव का नाम सूची में काफी ऊपर था। उसका चयन हो चुका था। पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। पड़ोसियों ने मिठाइयां बांटीं, रिश्तेदार फोन कर बधाई देने लगे। राजेश की छाती गर्व से चौड़ी हो गई थी।
लेकिन इसी खुशी के बीच, एक खामोश दर्द ने जन्म लिया।
जैसे-जैसे जॉइनिंग की तारीख नजदीक आने लगी, घर की रौनक धीरे-धीरे एक भारीपन में बदलने लगी। गौरव की पोस्टिंग शहर से काफी दूर थी। उसे वहाँ जाकर रहना था।
रेखा के चेहरे की वह चमक अब थोड़ी धुंधली पड़ने लगी थी। वह अक्सर चुपचाप खिड़की के बाहर देखती रहती। उसका इकलौता बेटा, जिसकी हर छोटी जरूरत का उसने ध्यान रखा था, अब उससे दूर जाने वाला था।
गौरव के दिल में भी एक तूफान उठा हुआ था। वह खुश था कि उसने अपने माता-पिता का नाम रोशन किया, लेकिन उसकी आत्मा इस अलगाव के विचार से कांप रही थी। वह रेखा को केवल माँ के रूप में नहीं देख रहा था। उसके भीतर एक ऐसा प्रेम पनप रहा था जो पवित्र था, लेकिन साथ ही जटिल भी।
वह अपनी माँ की सुंदरता, उनकी कोमलता और उनके निस्वार्थ प्रेम के प्रति इतना आकर्षित हो चुका था कि उसे लगा कि उनके बिना वह अधूरा रह जाएगा। वह अक्सर सोचता—क्या दुनिया में कोई और स्त्री ऐसी हो सकती है जो रेखा जैसी हो?
'माँ से दूर कैसे रहूँगा? क्या मैं वहाँ उनकी कमी पूरी कर पाऊँगा?'
एक रात, जब वह अपनी माँ को सोफे पर बैठे हुए देख रहा था, उसके मन में एक विचार कौंधा—'काश माँ मेरी पत्नी होतीं।' यह विचार आते ही वह सहम गया। उसे अपनी सोच पर ग्लानि हुई, लेकिन वह आकर्षण इतना गहरा था कि वह उसे दबा नहीं पा रहा था। वह उनकी ममता और उनकी स्त्रीत्व के बीच झूल रहा था।
उसकी धड़कनें तेज हो गईं। उसे महसूस हुआ कि यह केवल एक बेटे का मोह नहीं है, बल्कि एक पुरुष का अपनी माँ के प्रति गहरा, अटूट और शायद वर्जित आकर्षण है। वह उनकी खुशबू, उनके चलने के अंदाज और उनके बात करने के तरीके का दीवाना हो चुका था।
विदाई की तारीख करीब आ गई। राजेश ने गौरव के सामान की सारी पैकिंग पूरी कर ली। लेकिन रेखा का प्यार तो अभी शुरू होना था।
विदाई से ठीक एक दिन पहले, रेखा ने सुबह चार बजे से ही रसोई संभाल ली। वह चाहती थी कि उसका बेटा अपने साथ घर का स्वाद और माँ का प्यार लेकर जाए।
रसोई में घी की खुशबू महक रही थी। रेखा ने बड़े-बड़े पतीलों में गौरव के पसंदीदा लड्डू और गुजिया बनाए। उसने आम और नींबू का अचार तैयार किया, जो उसकी विशेषता थी। नमकीन, सूखे मेवे और ढेर सारे स्नैक्स—उसने हर चीज इतनी मात्रा में बनाई जैसे गौरव सालों के लिए जा रहा हो।
उसकी साड़ी का पल्लू कमर में कसा हुआ था, और माथे पर पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं। वह बार-बार अपने हाथों से पसीना पोंछती और फिर काम में जुट जाती। उसकी उंगलियाँ फुर्ती से काम कर रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक उदासी थी।
गौरव रसोई के दरवाजे पर खड़ा होकर उसे देख रहा था। उसने देखा कि कैसे उसकी माँ हर डिब्बे को प्यार से बंद कर रही है, कैसे वह हर चीज को सलीके से पैक कर रही है। उसे महसूस हुआ कि इन डिब्बों में केवल खाना नहीं, बल्कि उसकी माँ की ममता और उनकी विदाई की तड़प बंद हो रही है।
"माँ, आप इतना सब क्यों बना रही हैं? वहाँ सब मिल जाएगा।"
रेखा ने मुड़कर देखा। उसकी आँखों में नमी थी।
"वहाँ सब मिलेगा बेटा, लेकिन माँ के हाथ का स्वाद कहाँ मिलेगा? जब तू रात को अकेला होगा और तुझे मेरी याद आएगी, तब ये चीजें तुझे सुकून देंगी।"
गौरव के पास कोई शब्द नहीं थे। वह आगे बढ़ा और पीछे से अपनी माँ को गले लगा लिया। रेखा ठिठक गई, फिर उसने भी अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया। रसोई की उस गर्मी में, उन दोनों के बीच एक ऐसा मौन संवाद हो रहा था जिसे दुनिया कभी नहीं समझ सकती थी।
रात गहरी हो चुकी थी। घर में एक भारी सन्नाटा था। सारा सामान पैक हो चुका था और कल सुबह की ट्रेन का समय तय था।
गौरव अपने कमरे में लेटा था, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। वह छत को घूर रहा था, और उसके दिमाग में केवल रेखा का चेहरा घूम रहा था। अचानक उसने महसूस किया कि वह इस बोझ को और नहीं सह सकता।
उसने धीरे से दरवाजा खोला और लिविंग रूम में गया। रेखा वहाँ अकेली बैठी थी, शायद वह भी सो नहीं पा रही थी। वह एक हल्की नीली सूती साड़ी में थी, जिसके बाल खुले थे और उसके कंधों पर गिर रहे थे।
"माँ..."
रेखा ने मुड़कर देखा। गौरव की आवाज कांप रही थी। वह दौड़कर उसके पास गया और उसके पैरों में गिर गया।
"मुझे नहीं जाना माँ! मुझे आपसे दूर जाने का मन नहीं है।"
गौरव फूट-फूट कर रोने लगा। वह एक वयस्क पुरुष था, लेकिन अपनी माँ के सामने वह फिर से वही छोटा बच्चा बन गया था। वह जोर-जोर से सिसक रहा था, जैसे उसका कोई अंग उससे अलग होने वाला हो।
"मैं आपके बिना कैसे रहूँगा माँ? मुझे बहुत याद आएगी आपकी... बहुत ज्यादा।"
रेखा का दिल बैठ गया। उसने तुरंत गौरव को ऊपर उठाया और उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसने उसे कसकर पकड़ लिया, जैसे वह उसे दुनिया की नजरों से छिपा लेना चाहती हो।
"पगले, रोता क्यों है? तू मेरा लाडला है, तू जहाँ भी रहेगा, मेरी दुआएँ तेरे साथ रहेंगी। यह तेरी तरक्की है बेटा, तेरी जीत है।"
गौरव ने अपना चेहरा उसकी गोद में छिपा लिया। वह उसकी साड़ी की खुशबू को अपने भीतर उतार लेना चाहता था। वह महसूस कर रहा था कि उसकी माँ का शरीर कितना कोमल है, उनका स्पर्श कितना सुखदायक है।
"मैं वहाँ अकेला हो जाऊँगा माँ। मुझे डर लग रहा है।"
रेखा ने उसके सिर पर हाथ फेरा, उसकी जुल्फों को सहलाया और उसके माथे को चूम लिया।
"तू अकेला नहीं होगा। तू जब भी आँखें बंद करेगा, मुझे अपने पास पाएगा। देख, तूने अपने पिता का सपना पूरा किया है। अब तुझे अपनी जिम्मेदारियाँ निभानी हैं।"
वे दोनों काफी देर तक उसी तरह लिपटे रहे। कमरे की मद्धम रोशनी में उनकी परछाइयां दीवार पर एक हो गई थीं। गौरव के लिए यह केवल एक विदाई नहीं थी, बल्कि एक गहरे भावनात्मक जुड़ाव की चरम सीमा थी।
कुछ देर बाद, जब गौरव थोड़ा शांत हुआ, तो उसने रेखा की ओर देखा। उसकी आँखें अभी भी लाल थीं।
"माँ, एक बात कहूँ?"
"हाँ, बोल लाडले।"
"मैं चाहता हूँ कि मैं आपकी बहुत सारी तस्वीरें अपने साथ ले जाऊँ। जब मैं वहाँ अकेला होऊँगा और मुझे आपकी याद आएगी, तो मैं उन्हें देखूँगा। इससे मुझे लगेगा कि आप मेरे पास ही हैं।"
रेखा थोड़ा झिझका। वह स्वभाव से शर्मीली थी और उसे इस तरह फोटो खिंचवाना अजीब लगता था।
"तस्वीरें? अरे, तेरे पास मेरा नंबर है, वीडियो कॉल कर लेना।"
"नहीं माँ, वो अलग बात है। मुझे आपकी तस्वीरें चाहिए। प्लीज माँ, मेरे लिए इतना तो कर दीजिए।"
गौरव की विनती के आगे रेखा हार गई। उसने एक हल्की मुस्कान के साथ अपना सिर हिलाया।
गौरव ने अपना फोन निकाला। उसने रेखा को घर के अलग-अलग कोनों में खड़ा किया।
"यहाँ खड़े हो जाइए माँ... हाँ, बस ऐसे ही।"
उसने कई तस्वीरें लीं। कभी रेखा मुस्कुरा रही थी, कभी वह अपनी साड़ी का पल्लू ठीक कर रही थी, तो कभी वह बस खामोशी से कैमरे की ओर देख रही थी। गौरव हर तस्वीर के बाद उसे कॉम्प्लीमेंट देता।
"माँ, आप कितनी सुंदर लग रही हैं। सच कहूँ तो, आपकी सुंदरता के आगे सब फीका है।"
रेखा शर्मा गई। उसने अपनी नजरें झुका लीं और अपनी चूड़ियों को सहलाने लगी।
"बड़ा मक्खन लगाना सीख गया है तू।"
गौरव ने उसकी आँखों में देखा। उसके शब्दों में अब एक अलग ही गहराई थी।
"मैं मक्खन नहीं लगा रहा माँ। आप वाकई बहुत सुंदर हैं... बहुत ज्यादा।"
तभी गौरव के मन में एक इच्छा जागी। उसने धीरे से कहा।
"माँ, क्या मैं आपको एक बार सलवार सूट में देख सकता हूँ? मुझे आपकी वो सादगी बहुत पसंद है।"
रेखा एक पल के लिए ठिठकी। उसने अपनी अलमारी की ओर देखा और फिर धीरे से मुस्कुराई।
"अरे पागल, मेरे पास जो पुराने सूट हैं, वे अब मुझे छोटे हो गए हैं। फिटिंग सही नहीं आएगी।"
गौरव ने उसकी बात सुनी, लेकिन उसके चेहरे पर एक शरारती और प्रशंसा भरी मुस्कान थी।
"कोई बात नहीं माँ। आप किसी भी ड्रेस में, चाहे साड़ी हो या सूट, कयामत लगती हैं।"
'कयामत' शब्द सुनकर रेखा के गाल फिर से गुलाबी हो गए। उसने हल्का सा गौरव के कंधे पर हाथ मारा।
"बदतमीज! अपनी माँ से ऐसी बातें करता है?"
लेकिन उसकी आवाज में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अनकहा प्यार और खुशी थी। गौरव ने फिर से उसे गले लगा लिया।
रात के दो बज चुके थे। घर के सभी सदस्य अपने-अपने कमरों में चले गए थे। गौरव अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था।
उसने अपने फोन की गैलरी खोली और उन तस्वीरों को एक-एक करके देखने लगा। हर तस्वीर में रेखा की वह मासूमियत, वह गरिमा और वह अद्भुत सुंदरता कैद थी जिसने गौरव के दिल को पूरी तरह से जीत लिया था।
वह सोचने लगा कि कल वह इस घर से दूर चला जाएगा। वह उन गलियारों से दूर हो जाएगा जहाँ उसकी माँ की पायल गूँजती थी। वह उस रसोई से दूर हो जाएगा जहाँ से उसकी माँ के हाथों के पकवानों की खुशबू आती थी।
उसने अपनी आँखें बंद कीं और महसूस किया कि उसकी माँ का वह आखिरी स्पर्श अभी भी उसके माथे पर है। उसके भीतर एक युद्ध चल रहा था—एक तरफ बेटे का कर्तव्य और दूसरी तरफ एक पुरुष की वह अतृप्त चाहत जो अपनी माँ की सुंदरता और प्रेम में खो जाना चाहती थी।
'मैं आपको बहुत याद करूँगा माँ... बहुत ज्यादा।'
उस रात गौरव
सो नहीं सका। वह बस उन यादों और उन तस्वीरों के सहारे अपनी विदाई की सुबह का इंतजार करता रहा, जबकि उसके दिल के किसी कोने में एक गहरा दर्द और एकforbidden आकर्षण घर कर चुका था।
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