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Incest Aankhon ka Taara

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Rahul ml

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परिणाम की खुशी और विदाई का दर्द

परीक्षा के बाद के वे दिन किसी अंतहीन प्रतीक्षा की तरह खिंच रहे थे। घर की हवा में एक अजीब सी बेचैनी घुली हुई थी। गौरव के लिए समय जैसे थम गया था। वह घंटों अपनी खिड़की के पास बैठा रहता, बाहर सड़क पर चलते लोगों को देखता, लेकिन उसका मन केवल एक ही सवाल से जूझ रहा था—क्या वह सफल होगा? उसके भीतर एक डर था, एक ऐसी घबराहट जो उसे रात भर सोने नहीं देती थी।

रेखा इन दिनों गौरव की परछाईं बन गई थी। वह जानती थी कि उसका लाडला किस मानसिक दबाव से गुजर रहा है। वह बिना कहे उसकी हर जरूरत को समझ लेती। सुबह की पहली किरण के साथ जब वह घर के मंदिर में दीया जलाती, तो उसकी प्रार्थनाओं में केवल गौरव का नाम होता।

पीच रंग की एक हल्की सूती साड़ी में लिपटी रेखा जब रसोई में काम करती, तो उसकी पायल की छन-छन पूरे घर में एक सुकून भरी लय पैदा करती। उसकी कमर पर बंधा पल्लू हल्का सा ढीला रहता, और जब वह झुककर काम करती, तो उसकी गर्दन पर वह छोटा सा काला तिल साफ नजर आता, जो उसकी सुंदरता में एक अलग ही आकर्षण जोड़ देता था। उसके चेहरे पर एक दिव्य तेज था, जैसे ममता और यौवन का एक दुर्लभ संगम हो।

गौरव अक्सर उसे चुपके से देखता। वह देखता कि कैसे उसकी माँ की उंगलियाँ बड़ी कुशलता से रोटियाँ बेल रही हैं, कैसे उसकी आँखों में उसके लिए बेपनाह प्यार है। वह महसूस करता कि दुनिया की सारी खुशियाँ उसकी माँ की उस एक मुस्कान में सिमटी हुई हैं।

एक दोपहर, जब सूरज की तपिश चरम पर थी, गौरव अपने कमरे में लैपटॉप के सामने बैठा था। उसके हाथ कांप रहे थे। पसीने की बूंदें उसके माथे पर चमक रही थीं। तभी कमरे का दरवाजा धीरे से खुला।

रेखा हाथ में एक गिलास ठंडा शरबत लेकर अंदर आई। उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी, लेकिन आँखों में वही चिंता जो गौरव के दिल में थी। उसने शरबत मेज पर रखा और गौरव के कंधे पर अपना कोमल हाथ रखा।

"बहुत तनाव ले रहे हो बेटा। सब अच्छा होगा।"

गौरव ने ऊपर देखा। उसकी माँ की आँखों की गहराई उसे हमेशा शांत कर देती थी। उसने एक गहरी साँस ली और स्क्रीन पर 'सबमिट' बटन दबाया। पेज लोड होने में कुछ सेकंड लगे, जो गौरव को सदियों जैसे महसूस हुए। जैसे ही स्क्रीन पर 'Qualified' शब्द उभरा, गौरव की चीख निकल गई।

"माँ! मैं पास हो गया! मैं स्टेशन मास्टर बन गया!"

वह अपनी कुर्सी से उछला और दौड़कर रेखा के गले लग गया। रेखा की आँखों में पल भर में आँसू भर आए। ये आँसू दुख के नहीं, उस गर्व और खुशी के थे जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन था। उसने गौरव को अपनी बाहों में कस लिया। गौरव का चेहरा उसकी छाती से लगा था, जहाँ वह अपनी माँ के दिल की धड़कन को साफ सुन सकता था।

"मेरा बच्चा... मेरा गौरव... मुझे पता था तू कर दिखाएगा।"

रेखा फूट-फूट कर रो पड़ी। गौरव ने अपनी माँ को थोड़ा पीछे धकेला और अपने हाथों से उसकी आँखों के आँसू पोंछे। उसने देखा कि रोते हुए उसकी माँ और भी अधिक सुंदर लग रही थी। उसकी काजल लगी आँखें नम थीं और गालों पर एक गुलाबी रंगत छा गई थी।

तभी राजेश कमरे में दाखिल हुए। उनके चेहरे पर एक गंभीर भाव था जो खबर सुनते ही एक चौड़ी मुस्कान में बदल गया।

"क्या बात है! मेरा बेटा अफसर बन गया!"

राजेश ने गौरव को गले लगाया और फिर रेखा की ओर देखा। दोनों की आँखों में एक-दूसरे के लिए सम्मान और खुशी थी। उस दिन घर का माहौल उत्सव जैसा हो गया। रेखा ने तुरंत रसोई में जाकर गौरव की पसंद के पकवान बनाने शुरू कर दिए।

अगले कुछ दिन इंटरव्यू की तैयारी में बीते। यह दौर और भी चुनौतीपूर्ण था। गौरव को अपनी बातचीत के तरीके, अपने ज्ञान और अपने आत्मविश्वास पर काम करना था। रेखा इस पूरी प्रक्रिया में उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

वह हर शाम गौरव के साथ बैठती और उससे कठिन सवाल पूछती। वह उसे सिखाती कि कैसे विनम्र रहकर अपनी बात रखनी है। जब गौरव घबराता, तो रेखा उसका हाथ थाम लेती। उस स्पर्श में एक ऐसी ऊर्जा थी जो गौरव के सारे डर को सोख लेती।

"बेटा, बस सच बोलना और अपनी सादगी को अपनी ताकत बनाना। तेरी सच्चाई ही तुझे जीत दिलाएगी।"

इंटरव्यू से एक दिन पहले, रेखा ने घर में विशेष पूजा का आयोजन किया। उसने पीले रंग की एक चमकदार साड़ी पहनी थी। माथे पर बड़ी लाल बिंदी, माँग में गहरा सिंदूर और गले में मंगलसूत्र—वह साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप लग रही थी। उसने गौरव की आरती उतारी। जब उसने गौरव के माथे पर टीका लगाया, तो गौरव की नजरें उसकी आँखों में गड़ी थीं। उसे महसूस हुआ कि उसकी माँ केवल उसकी देखभाल करने वाली स्त्री नहीं, बल्कि एक ऐसी शख्सियत है जिसकी सुंदरता और गरिमा का कोई सानी नहीं।

इंटरव्यू का दिन आया। गौरव ने अपना सबसे अच्छा सूट पहना था। रेखा ने उसे अंतिम बार गले लगाया और उसके कान में धीरे से कहा।

"मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।"

इंटरव्यू की प्रक्रिया लंबी और थकाऊ थी। गौरव ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। जब वह घर लौटा, तो उसके चेहरे पर एक संतोष था। उसने रेखा को सारी बातें विस्तार से बताईं। रेखा ने उसे बड़े ध्यान से सुना, बीच-बीच में अपनी सहमति में सिर हिलाती रही।

फिर वह दिन आया जब अंतिम मेरिट लिस्ट जारी हुई। गौरव का नाम सूची में काफी ऊपर था। उसका चयन हो चुका था। पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। पड़ोसियों ने मिठाइयां बांटीं, रिश्तेदार फोन कर बधाई देने लगे। राजेश की छाती गर्व से चौड़ी हो गई थी।

लेकिन इसी खुशी के बीच, एक खामोश दर्द ने जन्म लिया।

जैसे-जैसे जॉइनिंग की तारीख नजदीक आने लगी, घर की रौनक धीरे-धीरे एक भारीपन में बदलने लगी। गौरव की पोस्टिंग शहर से काफी दूर थी। उसे वहाँ जाकर रहना था।

रेखा के चेहरे की वह चमक अब थोड़ी धुंधली पड़ने लगी थी। वह अक्सर चुपचाप खिड़की के बाहर देखती रहती। उसका इकलौता बेटा, जिसकी हर छोटी जरूरत का उसने ध्यान रखा था, अब उससे दूर जाने वाला था।

गौरव के दिल में भी एक तूफान उठा हुआ था। वह खुश था कि उसने अपने माता-पिता का नाम रोशन किया, लेकिन उसकी आत्मा इस अलगाव के विचार से कांप रही थी। वह रेखा को केवल माँ के रूप में नहीं देख रहा था। उसके भीतर एक ऐसा प्रेम पनप रहा था जो पवित्र था, लेकिन साथ ही जटिल भी।

वह अपनी माँ की सुंदरता, उनकी कोमलता और उनके निस्वार्थ प्रेम के प्रति इतना आकर्षित हो चुका था कि उसे लगा कि उनके बिना वह अधूरा रह जाएगा। वह अक्सर सोचता—क्या दुनिया में कोई और स्त्री ऐसी हो सकती है जो रेखा जैसी हो?

'माँ से दूर कैसे रहूँगा? क्या मैं वहाँ उनकी कमी पूरी कर पाऊँगा?'

एक रात, जब वह अपनी माँ को सोफे पर बैठे हुए देख रहा था, उसके मन में एक विचार कौंधा—'काश माँ मेरी पत्नी होतीं।' यह विचार आते ही वह सहम गया। उसे अपनी सोच पर ग्लानि हुई, लेकिन वह आकर्षण इतना गहरा था कि वह उसे दबा नहीं पा रहा था। वह उनकी ममता और उनकी स्त्रीत्व के बीच झूल रहा था।

उसकी धड़कनें तेज हो गईं। उसे महसूस हुआ कि यह केवल एक बेटे का मोह नहीं है, बल्कि एक पुरुष का अपनी माँ के प्रति गहरा, अटूट और शायद वर्जित आकर्षण है। वह उनकी खुशबू, उनके चलने के अंदाज और उनके बात करने के तरीके का दीवाना हो चुका था।

विदाई की तारीख करीब आ गई। राजेश ने गौरव के सामान की सारी पैकिंग पूरी कर ली। लेकिन रेखा का प्यार तो अभी शुरू होना था।

विदाई से ठीक एक दिन पहले, रेखा ने सुबह चार बजे से ही रसोई संभाल ली। वह चाहती थी कि उसका बेटा अपने साथ घर का स्वाद और माँ का प्यार लेकर जाए।

रसोई में घी की खुशबू महक रही थी। रेखा ने बड़े-बड़े पतीलों में गौरव के पसंदीदा लड्डू और गुजिया बनाए। उसने आम और नींबू का अचार तैयार किया, जो उसकी विशेषता थी। नमकीन, सूखे मेवे और ढेर सारे स्नैक्स—उसने हर चीज इतनी मात्रा में बनाई जैसे गौरव सालों के लिए जा रहा हो।

उसकी साड़ी का पल्लू कमर में कसा हुआ था, और माथे पर पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं। वह बार-बार अपने हाथों से पसीना पोंछती और फिर काम में जुट जाती। उसकी उंगलियाँ फुर्ती से काम कर रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक उदासी थी।

गौरव रसोई के दरवाजे पर खड़ा होकर उसे देख रहा था। उसने देखा कि कैसे उसकी माँ हर डिब्बे को प्यार से बंद कर रही है, कैसे वह हर चीज को सलीके से पैक कर रही है। उसे महसूस हुआ कि इन डिब्बों में केवल खाना नहीं, बल्कि उसकी माँ की ममता और उनकी विदाई की तड़प बंद हो रही है।

"माँ, आप इतना सब क्यों बना रही हैं? वहाँ सब मिल जाएगा।"

रेखा ने मुड़कर देखा। उसकी आँखों में नमी थी।

"वहाँ सब मिलेगा बेटा, लेकिन माँ के हाथ का स्वाद कहाँ मिलेगा? जब तू रात को अकेला होगा और तुझे मेरी याद आएगी, तब ये चीजें तुझे सुकून देंगी।"

गौरव के पास कोई शब्द नहीं थे। वह आगे बढ़ा और पीछे से अपनी माँ को गले लगा लिया। रेखा ठिठक गई, फिर उसने भी अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया। रसोई की उस गर्मी में, उन दोनों के बीच एक ऐसा मौन संवाद हो रहा था जिसे दुनिया कभी नहीं समझ सकती थी।

रात गहरी हो चुकी थी। घर में एक भारी सन्नाटा था। सारा सामान पैक हो चुका था और कल सुबह की ट्रेन का समय तय था।

गौरव अपने कमरे में लेटा था, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। वह छत को घूर रहा था, और उसके दिमाग में केवल रेखा का चेहरा घूम रहा था। अचानक उसने महसूस किया कि वह इस बोझ को और नहीं सह सकता।

उसने धीरे से दरवाजा खोला और लिविंग रूम में गया। रेखा वहाँ अकेली बैठी थी, शायद वह भी सो नहीं पा रही थी। वह एक हल्की नीली सूती साड़ी में थी, जिसके बाल खुले थे और उसके कंधों पर गिर रहे थे।

"माँ..."

रेखा ने मुड़कर देखा। गौरव की आवाज कांप रही थी। वह दौड़कर उसके पास गया और उसके पैरों में गिर गया।

"मुझे नहीं जाना माँ! मुझे आपसे दूर जाने का मन नहीं है।"

गौरव फूट-फूट कर रोने लगा। वह एक वयस्क पुरुष था, लेकिन अपनी माँ के सामने वह फिर से वही छोटा बच्चा बन गया था। वह जोर-जोर से सिसक रहा था, जैसे उसका कोई अंग उससे अलग होने वाला हो।

"मैं आपके बिना कैसे रहूँगा माँ? मुझे बहुत याद आएगी आपकी... बहुत ज्यादा।"

रेखा का दिल बैठ गया। उसने तुरंत गौरव को ऊपर उठाया और उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसने उसे कसकर पकड़ लिया, जैसे वह उसे दुनिया की नजरों से छिपा लेना चाहती हो।

"पगले, रोता क्यों है? तू मेरा लाडला है, तू जहाँ भी रहेगा, मेरी दुआएँ तेरे साथ रहेंगी। यह तेरी तरक्की है बेटा, तेरी जीत है।"

गौरव ने अपना चेहरा उसकी गोद में छिपा लिया। वह उसकी साड़ी की खुशबू को अपने भीतर उतार लेना चाहता था। वह महसूस कर रहा था कि उसकी माँ का शरीर कितना कोमल है, उनका स्पर्श कितना सुखदायक है।

"मैं वहाँ अकेला हो जाऊँगा माँ। मुझे डर लग रहा है।"

रेखा ने उसके सिर पर हाथ फेरा, उसकी जुल्फों को सहलाया और उसके माथे को चूम लिया।

"तू अकेला नहीं होगा। तू जब भी आँखें बंद करेगा, मुझे अपने पास पाएगा। देख, तूने अपने पिता का सपना पूरा किया है। अब तुझे अपनी जिम्मेदारियाँ निभानी हैं।"

वे दोनों काफी देर तक उसी तरह लिपटे रहे। कमरे की मद्धम रोशनी में उनकी परछाइयां दीवार पर एक हो गई थीं। गौरव के लिए यह केवल एक विदाई नहीं थी, बल्कि एक गहरे भावनात्मक जुड़ाव की चरम सीमा थी।

कुछ देर बाद, जब गौरव थोड़ा शांत हुआ, तो उसने रेखा की ओर देखा। उसकी आँखें अभी भी लाल थीं।

"माँ, एक बात कहूँ?"

"हाँ, बोल लाडले।"

"मैं चाहता हूँ कि मैं आपकी बहुत सारी तस्वीरें अपने साथ ले जाऊँ। जब मैं वहाँ अकेला होऊँगा और मुझे आपकी याद आएगी, तो मैं उन्हें देखूँगा। इससे मुझे लगेगा कि आप मेरे पास ही हैं।"

रेखा थोड़ा झिझका। वह स्वभाव से शर्मीली थी और उसे इस तरह फोटो खिंचवाना अजीब लगता था।

"तस्वीरें? अरे, तेरे पास मेरा नंबर है, वीडियो कॉल कर लेना।"

"नहीं माँ, वो अलग बात है। मुझे आपकी तस्वीरें चाहिए। प्लीज माँ, मेरे लिए इतना तो कर दीजिए।"

गौरव की विनती के आगे रेखा हार गई। उसने एक हल्की मुस्कान के साथ अपना सिर हिलाया।

गौरव ने अपना फोन निकाला। उसने रेखा को घर के अलग-अलग कोनों में खड़ा किया।

"यहाँ खड़े हो जाइए माँ... हाँ, बस ऐसे ही।"

उसने कई तस्वीरें लीं। कभी रेखा मुस्कुरा रही थी, कभी वह अपनी साड़ी का पल्लू ठीक कर रही थी, तो कभी वह बस खामोशी से कैमरे की ओर देख रही थी। गौरव हर तस्वीर के बाद उसे कॉम्प्लीमेंट देता।

"माँ, आप कितनी सुंदर लग रही हैं। सच कहूँ तो, आपकी सुंदरता के आगे सब फीका है।"

रेखा शर्मा गई। उसने अपनी नजरें झुका लीं और अपनी चूड़ियों को सहलाने लगी।

"बड़ा मक्खन लगाना सीख गया है तू।"

गौरव ने उसकी आँखों में देखा। उसके शब्दों में अब एक अलग ही गहराई थी।

"मैं मक्खन नहीं लगा रहा माँ। आप वाकई बहुत सुंदर हैं... बहुत ज्यादा।"

तभी गौरव के मन में एक इच्छा जागी। उसने धीरे से कहा।

"माँ, क्या मैं आपको एक बार सलवार सूट में देख सकता हूँ? मुझे आपकी वो सादगी बहुत पसंद है।"

रेखा एक पल के लिए ठिठकी। उसने अपनी अलमारी की ओर देखा और फिर धीरे से मुस्कुराई।

"अरे पागल, मेरे पास जो पुराने सूट हैं, वे अब मुझे छोटे हो गए हैं। फिटिंग सही नहीं आएगी।"

गौरव ने उसकी बात सुनी, लेकिन उसके चेहरे पर एक शरारती और प्रशंसा भरी मुस्कान थी।

"कोई बात नहीं माँ। आप किसी भी ड्रेस में, चाहे साड़ी हो या सूट, कयामत लगती हैं।"

'कयामत' शब्द सुनकर रेखा के गाल फिर से गुलाबी हो गए। उसने हल्का सा गौरव के कंधे पर हाथ मारा।

"बदतमीज! अपनी माँ से ऐसी बातें करता है?"

लेकिन उसकी आवाज में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अनकहा प्यार और खुशी थी। गौरव ने फिर से उसे गले लगा लिया।

रात के दो बज चुके थे। घर के सभी सदस्य अपने-अपने कमरों में चले गए थे। गौरव अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था।

उसने अपने फोन की गैलरी खोली और उन तस्वीरों को एक-एक करके देखने लगा। हर तस्वीर में रेखा की वह मासूमियत, वह गरिमा और वह अद्भुत सुंदरता कैद थी जिसने गौरव के दिल को पूरी तरह से जीत लिया था।

वह सोचने लगा कि कल वह इस घर से दूर चला जाएगा। वह उन गलियारों से दूर हो जाएगा जहाँ उसकी माँ की पायल गूँजती थी। वह उस रसोई से दूर हो जाएगा जहाँ से उसकी माँ के हाथों के पकवानों की खुशबू आती थी।

उसने अपनी आँखें बंद कीं और महसूस किया कि उसकी माँ का वह आखिरी स्पर्श अभी भी उसके माथे पर है। उसके भीतर एक युद्ध चल रहा था—एक तरफ बेटे का कर्तव्य और दूसरी तरफ एक पुरुष की वह अतृप्त चाहत जो अपनी माँ की सुंदरता और प्रेम में खो जाना चाहती थी।

'मैं आपको बहुत याद करूँगा माँ... बहुत ज्यादा।'

उस रात गौरव
सो नहीं सका। वह बस उन यादों और उन तस्वीरों के सहारे अपनी विदाई की सुबह का इंतजार करता रहा, जबकि उसके दिल के किसी कोने में एक गहरा दर्द और एकforbidden आकर्षण घर कर चुका था।

Dosto plz comment kre kaisa jaa rhe hai story , kya kami hai ya sahi jaa rha hai , aaplogo ko kaisa lag raha hai story plz btaiye , kisiko baat Krna ho mujhse to xforum ID de skte hai only for mom lovers ...
 

archana_87

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परिणाम की खुशी और विदाई का दर्द

परीक्षा के बाद के वे दिन किसी अंतहीन प्रतीक्षा की तरह खिंच रहे थे। घर की हवा में एक अजीब सी बेचैनी घुली हुई थी। गौरव के लिए समय जैसे थम गया था। वह घंटों अपनी खिड़की के पास बैठा रहता, बाहर सड़क पर चलते लोगों को देखता, लेकिन उसका मन केवल एक ही सवाल से जूझ रहा था—क्या वह सफल होगा? उसके भीतर एक डर था, एक ऐसी घबराहट जो उसे रात भर सोने नहीं देती थी।

रेखा इन दिनों गौरव की परछाईं बन गई थी। वह जानती थी कि उसका लाडला किस मानसिक दबाव से गुजर रहा है। वह बिना कहे उसकी हर जरूरत को समझ लेती। सुबह की पहली किरण के साथ जब वह घर के मंदिर में दीया जलाती, तो उसकी प्रार्थनाओं में केवल गौरव का नाम होता।

पीच रंग की एक हल्की सूती साड़ी में लिपटी रेखा जब रसोई में काम करती, तो उसकी पायल की छन-छन पूरे घर में एक सुकून भरी लय पैदा करती। उसकी कमर पर बंधा पल्लू हल्का सा ढीला रहता, और जब वह झुककर काम करती, तो उसकी गर्दन पर वह छोटा सा काला तिल साफ नजर आता, जो उसकी सुंदरता में एक अलग ही आकर्षण जोड़ देता था। उसके चेहरे पर एक दिव्य तेज था, जैसे ममता और यौवन का एक दुर्लभ संगम हो।

गौरव अक्सर उसे चुपके से देखता। वह देखता कि कैसे उसकी माँ की उंगलियाँ बड़ी कुशलता से रोटियाँ बेल रही हैं, कैसे उसकी आँखों में उसके लिए बेपनाह प्यार है। वह महसूस करता कि दुनिया की सारी खुशियाँ उसकी माँ की उस एक मुस्कान में सिमटी हुई हैं।

एक दोपहर, जब सूरज की तपिश चरम पर थी, गौरव अपने कमरे में लैपटॉप के सामने बैठा था। उसके हाथ कांप रहे थे। पसीने की बूंदें उसके माथे पर चमक रही थीं। तभी कमरे का दरवाजा धीरे से खुला।

रेखा हाथ में एक गिलास ठंडा शरबत लेकर अंदर आई। उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी, लेकिन आँखों में वही चिंता जो गौरव के दिल में थी। उसने शरबत मेज पर रखा और गौरव के कंधे पर अपना कोमल हाथ रखा।

"बहुत तनाव ले रहे हो बेटा। सब अच्छा होगा।"

गौरव ने ऊपर देखा। उसकी माँ की आँखों की गहराई उसे हमेशा शांत कर देती थी। उसने एक गहरी साँस ली और स्क्रीन पर 'सबमिट' बटन दबाया। पेज लोड होने में कुछ सेकंड लगे, जो गौरव को सदियों जैसे महसूस हुए। जैसे ही स्क्रीन पर 'Qualified' शब्द उभरा, गौरव की चीख निकल गई।

"माँ! मैं पास हो गया! मैं स्टेशन मास्टर बन गया!"

वह अपनी कुर्सी से उछला और दौड़कर रेखा के गले लग गया। रेखा की आँखों में पल भर में आँसू भर आए। ये आँसू दुख के नहीं, उस गर्व और खुशी के थे जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन था। उसने गौरव को अपनी बाहों में कस लिया। गौरव का चेहरा उसकी छाती से लगा था, जहाँ वह अपनी माँ के दिल की धड़कन को साफ सुन सकता था।

"मेरा बच्चा... मेरा गौरव... मुझे पता था तू कर दिखाएगा।"

रेखा फूट-फूट कर रो पड़ी। गौरव ने अपनी माँ को थोड़ा पीछे धकेला और अपने हाथों से उसकी आँखों के आँसू पोंछे। उसने देखा कि रोते हुए उसकी माँ और भी अधिक सुंदर लग रही थी। उसकी काजल लगी आँखें नम थीं और गालों पर एक गुलाबी रंगत छा गई थी।

तभी राजेश कमरे में दाखिल हुए। उनके चेहरे पर एक गंभीर भाव था जो खबर सुनते ही एक चौड़ी मुस्कान में बदल गया।

"क्या बात है! मेरा बेटा अफसर बन गया!"

राजेश ने गौरव को गले लगाया और फिर रेखा की ओर देखा। दोनों की आँखों में एक-दूसरे के लिए सम्मान और खुशी थी। उस दिन घर का माहौल उत्सव जैसा हो गया। रेखा ने तुरंत रसोई में जाकर गौरव की पसंद के पकवान बनाने शुरू कर दिए।

अगले कुछ दिन इंटरव्यू की तैयारी में बीते। यह दौर और भी चुनौतीपूर्ण था। गौरव को अपनी बातचीत के तरीके, अपने ज्ञान और अपने आत्मविश्वास पर काम करना था। रेखा इस पूरी प्रक्रिया में उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

वह हर शाम गौरव के साथ बैठती और उससे कठिन सवाल पूछती। वह उसे सिखाती कि कैसे विनम्र रहकर अपनी बात रखनी है। जब गौरव घबराता, तो रेखा उसका हाथ थाम लेती। उस स्पर्श में एक ऐसी ऊर्जा थी जो गौरव के सारे डर को सोख लेती।

"बेटा, बस सच बोलना और अपनी सादगी को अपनी ताकत बनाना। तेरी सच्चाई ही तुझे जीत दिलाएगी।"

इंटरव्यू से एक दिन पहले, रेखा ने घर में विशेष पूजा का आयोजन किया। उसने पीले रंग की एक चमकदार साड़ी पहनी थी। माथे पर बड़ी लाल बिंदी, माँग में गहरा सिंदूर और गले में मंगलसूत्र—वह साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप लग रही थी। उसने गौरव की आरती उतारी। जब उसने गौरव के माथे पर टीका लगाया, तो गौरव की नजरें उसकी आँखों में गड़ी थीं। उसे महसूस हुआ कि उसकी माँ केवल उसकी देखभाल करने वाली स्त्री नहीं, बल्कि एक ऐसी शख्सियत है जिसकी सुंदरता और गरिमा का कोई सानी नहीं।

इंटरव्यू का दिन आया। गौरव ने अपना सबसे अच्छा सूट पहना था। रेखा ने उसे अंतिम बार गले लगाया और उसके कान में धीरे से कहा।

"मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।"

इंटरव्यू की प्रक्रिया लंबी और थकाऊ थी। गौरव ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। जब वह घर लौटा, तो उसके चेहरे पर एक संतोष था। उसने रेखा को सारी बातें विस्तार से बताईं। रेखा ने उसे बड़े ध्यान से सुना, बीच-बीच में अपनी सहमति में सिर हिलाती रही।

फिर वह दिन आया जब अंतिम मेरिट लिस्ट जारी हुई। गौरव का नाम सूची में काफी ऊपर था। उसका चयन हो चुका था। पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। पड़ोसियों ने मिठाइयां बांटीं, रिश्तेदार फोन कर बधाई देने लगे। राजेश की छाती गर्व से चौड़ी हो गई थी।

लेकिन इसी खुशी के बीच, एक खामोश दर्द ने जन्म लिया।

जैसे-जैसे जॉइनिंग की तारीख नजदीक आने लगी, घर की रौनक धीरे-धीरे एक भारीपन में बदलने लगी। गौरव की पोस्टिंग शहर से काफी दूर थी। उसे वहाँ जाकर रहना था।

रेखा के चेहरे की वह चमक अब थोड़ी धुंधली पड़ने लगी थी। वह अक्सर चुपचाप खिड़की के बाहर देखती रहती। उसका इकलौता बेटा, जिसकी हर छोटी जरूरत का उसने ध्यान रखा था, अब उससे दूर जाने वाला था।

गौरव के दिल में भी एक तूफान उठा हुआ था। वह खुश था कि उसने अपने माता-पिता का नाम रोशन किया, लेकिन उसकी आत्मा इस अलगाव के विचार से कांप रही थी। वह रेखा को केवल माँ के रूप में नहीं देख रहा था। उसके भीतर एक ऐसा प्रेम पनप रहा था जो पवित्र था, लेकिन साथ ही जटिल भी।

वह अपनी माँ की सुंदरता, उनकी कोमलता और उनके निस्वार्थ प्रेम के प्रति इतना आकर्षित हो चुका था कि उसे लगा कि उनके बिना वह अधूरा रह जाएगा। वह अक्सर सोचता—क्या दुनिया में कोई और स्त्री ऐसी हो सकती है जो रेखा जैसी हो?

'माँ से दूर कैसे रहूँगा? क्या मैं वहाँ उनकी कमी पूरी कर पाऊँगा?'

एक रात, जब वह अपनी माँ को सोफे पर बैठे हुए देख रहा था, उसके मन में एक विचार कौंधा—'काश माँ मेरी पत्नी होतीं।' यह विचार आते ही वह सहम गया। उसे अपनी सोच पर ग्लानि हुई, लेकिन वह आकर्षण इतना गहरा था कि वह उसे दबा नहीं पा रहा था। वह उनकी ममता और उनकी स्त्रीत्व के बीच झूल रहा था।

उसकी धड़कनें तेज हो गईं। उसे महसूस हुआ कि यह केवल एक बेटे का मोह नहीं है, बल्कि एक पुरुष का अपनी माँ के प्रति गहरा, अटूट और शायद वर्जित आकर्षण है। वह उनकी खुशबू, उनके चलने के अंदाज और उनके बात करने के तरीके का दीवाना हो चुका था।

विदाई की तारीख करीब आ गई। राजेश ने गौरव के सामान की सारी पैकिंग पूरी कर ली। लेकिन रेखा का प्यार तो अभी शुरू होना था।

विदाई से ठीक एक दिन पहले, रेखा ने सुबह चार बजे से ही रसोई संभाल ली। वह चाहती थी कि उसका बेटा अपने साथ घर का स्वाद और माँ का प्यार लेकर जाए।

रसोई में घी की खुशबू महक रही थी। रेखा ने बड़े-बड़े पतीलों में गौरव के पसंदीदा लड्डू और गुजिया बनाए। उसने आम और नींबू का अचार तैयार किया, जो उसकी विशेषता थी। नमकीन, सूखे मेवे और ढेर सारे स्नैक्स—उसने हर चीज इतनी मात्रा में बनाई जैसे गौरव सालों के लिए जा रहा हो।

उसकी साड़ी का पल्लू कमर में कसा हुआ था, और माथे पर पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं। वह बार-बार अपने हाथों से पसीना पोंछती और फिर काम में जुट जाती। उसकी उंगलियाँ फुर्ती से काम कर रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक उदासी थी।

गौरव रसोई के दरवाजे पर खड़ा होकर उसे देख रहा था। उसने देखा कि कैसे उसकी माँ हर डिब्बे को प्यार से बंद कर रही है, कैसे वह हर चीज को सलीके से पैक कर रही है। उसे महसूस हुआ कि इन डिब्बों में केवल खाना नहीं, बल्कि उसकी माँ की ममता और उनकी विदाई की तड़प बंद हो रही है।

"माँ, आप इतना सब क्यों बना रही हैं? वहाँ सब मिल जाएगा।"

रेखा ने मुड़कर देखा। उसकी आँखों में नमी थी।

"वहाँ सब मिलेगा बेटा, लेकिन माँ के हाथ का स्वाद कहाँ मिलेगा? जब तू रात को अकेला होगा और तुझे मेरी याद आएगी, तब ये चीजें तुझे सुकून देंगी।"

गौरव के पास कोई शब्द नहीं थे। वह आगे बढ़ा और पीछे से अपनी माँ को गले लगा लिया। रेखा ठिठक गई, फिर उसने भी अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया। रसोई की उस गर्मी में, उन दोनों के बीच एक ऐसा मौन संवाद हो रहा था जिसे दुनिया कभी नहीं समझ सकती थी।

रात गहरी हो चुकी थी। घर में एक भारी सन्नाटा था। सारा सामान पैक हो चुका था और कल सुबह की ट्रेन का समय तय था।

गौरव अपने कमरे में लेटा था, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। वह छत को घूर रहा था, और उसके दिमाग में केवल रेखा का चेहरा घूम रहा था। अचानक उसने महसूस किया कि वह इस बोझ को और नहीं सह सकता।

उसने धीरे से दरवाजा खोला और लिविंग रूम में गया। रेखा वहाँ अकेली बैठी थी, शायद वह भी सो नहीं पा रही थी। वह एक हल्की नीली सूती साड़ी में थी, जिसके बाल खुले थे और उसके कंधों पर गिर रहे थे।

"माँ..."

रेखा ने मुड़कर देखा। गौरव की आवाज कांप रही थी। वह दौड़कर उसके पास गया और उसके पैरों में गिर गया।

"मुझे नहीं जाना माँ! मुझे आपसे दूर जाने का मन नहीं है।"

गौरव फूट-फूट कर रोने लगा। वह एक वयस्क पुरुष था, लेकिन अपनी माँ के सामने वह फिर से वही छोटा बच्चा बन गया था। वह जोर-जोर से सिसक रहा था, जैसे उसका कोई अंग उससे अलग होने वाला हो।

"मैं आपके बिना कैसे रहूँगा माँ? मुझे बहुत याद आएगी आपकी... बहुत ज्यादा।"

रेखा का दिल बैठ गया। उसने तुरंत गौरव को ऊपर उठाया और उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसने उसे कसकर पकड़ लिया, जैसे वह उसे दुनिया की नजरों से छिपा लेना चाहती हो।

"पगले, रोता क्यों है? तू मेरा लाडला है, तू जहाँ भी रहेगा, मेरी दुआएँ तेरे साथ रहेंगी। यह तेरी तरक्की है बेटा, तेरी जीत है।"

गौरव ने अपना चेहरा उसकी गोद में छिपा लिया। वह उसकी साड़ी की खुशबू को अपने भीतर उतार लेना चाहता था। वह महसूस कर रहा था कि उसकी माँ का शरीर कितना कोमल है, उनका स्पर्श कितना सुखदायक है।

"मैं वहाँ अकेला हो जाऊँगा माँ। मुझे डर लग रहा है।"

रेखा ने उसके सिर पर हाथ फेरा, उसकी जुल्फों को सहलाया और उसके माथे को चूम लिया।

"तू अकेला नहीं होगा। तू जब भी आँखें बंद करेगा, मुझे अपने पास पाएगा। देख, तूने अपने पिता का सपना पूरा किया है। अब तुझे अपनी जिम्मेदारियाँ निभानी हैं।"

वे दोनों काफी देर तक उसी तरह लिपटे रहे। कमरे की मद्धम रोशनी में उनकी परछाइयां दीवार पर एक हो गई थीं। गौरव के लिए यह केवल एक विदाई नहीं थी, बल्कि एक गहरे भावनात्मक जुड़ाव की चरम सीमा थी।

कुछ देर बाद, जब गौरव थोड़ा शांत हुआ, तो उसने रेखा की ओर देखा। उसकी आँखें अभी भी लाल थीं।

"माँ, एक बात कहूँ?"

"हाँ, बोल लाडले।"

"मैं चाहता हूँ कि मैं आपकी बहुत सारी तस्वीरें अपने साथ ले जाऊँ। जब मैं वहाँ अकेला होऊँगा और मुझे आपकी याद आएगी, तो मैं उन्हें देखूँगा। इससे मुझे लगेगा कि आप मेरे पास ही हैं।"

रेखा थोड़ा झिझका। वह स्वभाव से शर्मीली थी और उसे इस तरह फोटो खिंचवाना अजीब लगता था।

"तस्वीरें? अरे, तेरे पास मेरा नंबर है, वीडियो कॉल कर लेना।"

"नहीं माँ, वो अलग बात है। मुझे आपकी तस्वीरें चाहिए। प्लीज माँ, मेरे लिए इतना तो कर दीजिए।"

गौरव की विनती के आगे रेखा हार गई। उसने एक हल्की मुस्कान के साथ अपना सिर हिलाया।

गौरव ने अपना फोन निकाला। उसने रेखा को घर के अलग-अलग कोनों में खड़ा किया।

"यहाँ खड़े हो जाइए माँ... हाँ, बस ऐसे ही।"

उसने कई तस्वीरें लीं। कभी रेखा मुस्कुरा रही थी, कभी वह अपनी साड़ी का पल्लू ठीक कर रही थी, तो कभी वह बस खामोशी से कैमरे की ओर देख रही थी। गौरव हर तस्वीर के बाद उसे कॉम्प्लीमेंट देता।

"माँ, आप कितनी सुंदर लग रही हैं। सच कहूँ तो, आपकी सुंदरता के आगे सब फीका है।"

रेखा शर्मा गई। उसने अपनी नजरें झुका लीं और अपनी चूड़ियों को सहलाने लगी।

"बड़ा मक्खन लगाना सीख गया है तू।"

गौरव ने उसकी आँखों में देखा। उसके शब्दों में अब एक अलग ही गहराई थी।

"मैं मक्खन नहीं लगा रहा माँ। आप वाकई बहुत सुंदर हैं... बहुत ज्यादा।"

तभी गौरव के मन में एक इच्छा जागी। उसने धीरे से कहा।

"माँ, क्या मैं आपको एक बार सलवार सूट में देख सकता हूँ? मुझे आपकी वो सादगी बहुत पसंद है।"

रेखा एक पल के लिए ठिठकी। उसने अपनी अलमारी की ओर देखा और फिर धीरे से मुस्कुराई।

"अरे पागल, मेरे पास जो पुराने सूट हैं, वे अब मुझे छोटे हो गए हैं। फिटिंग सही नहीं आएगी।"

गौरव ने उसकी बात सुनी, लेकिन उसके चेहरे पर एक शरारती और प्रशंसा भरी मुस्कान थी।

"कोई बात नहीं माँ। आप किसी भी ड्रेस में, चाहे साड़ी हो या सूट, कयामत लगती हैं।"

'कयामत' शब्द सुनकर रेखा के गाल फिर से गुलाबी हो गए। उसने हल्का सा गौरव के कंधे पर हाथ मारा।

"बदतमीज! अपनी माँ से ऐसी बातें करता है?"

लेकिन उसकी आवाज में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अनकहा प्यार और खुशी थी। गौरव ने फिर से उसे गले लगा लिया।

रात के दो बज चुके थे। घर के सभी सदस्य अपने-अपने कमरों में चले गए थे। गौरव अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था।

उसने अपने फोन की गैलरी खोली और उन तस्वीरों को एक-एक करके देखने लगा। हर तस्वीर में रेखा की वह मासूमियत, वह गरिमा और वह अद्भुत सुंदरता कैद थी जिसने गौरव के दिल को पूरी तरह से जीत लिया था।

वह सोचने लगा कि कल वह इस घर से दूर चला जाएगा। वह उन गलियारों से दूर हो जाएगा जहाँ उसकी माँ की पायल गूँजती थी। वह उस रसोई से दूर हो जाएगा जहाँ से उसकी माँ के हाथों के पकवानों की खुशबू आती थी।

उसने अपनी आँखें बंद कीं और महसूस किया कि उसकी माँ का वह आखिरी स्पर्श अभी भी उसके माथे पर है। उसके भीतर एक युद्ध चल रहा था—एक तरफ बेटे का कर्तव्य और दूसरी तरफ एक पुरुष की वह अतृप्त चाहत जो अपनी माँ की सुंदरता और प्रेम में खो जाना चाहती थी।

'मैं आपको बहुत याद करूँगा माँ... बहुत ज्यादा।'

उस रात गौरव
सो नहीं सका। वह बस उन यादों और उन तस्वीरों के सहारे अपनी विदाई की सुबह का इंतजार करता रहा, जबकि उसके दिल के किसी कोने में एक गहरा दर्द और एकforbidden आकर्षण घर कर चुका था।

Dosto plz comment kre kaisa jaa rhe hai story , kya kami hai ya sahi jaa rha hai , aaplogo ko kaisa lag raha hai story plz btaiye , kisiko baat Krna ho mujhse to xforum ID de skte hai only for mom lovers ...
Bohot badhiya sahi jaa rahe ho
 

Subham

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Accha story hai bro... kyun update dena band kr diye the??App apne hisab hai story banaiye... story accha lagega...bass daily update dijiye...
 
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Rahul ml

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दूरियाँ और एहसास

भोर की पहली किरण अभी क्षितिज पर उभरी भी नहीं थी कि गौरव की आँखें खुल गईं। कमरे में गहरा सन्नाटा था, बस दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक दिल की धड़कन की तरह गूँज रही थी। आज वह दिन था जिसका उसे इंतज़ार भी था और जिससे वह डर भी रहा था। आज उसे अपनी नई नौकरी जॉइन करने के लिए शहर छोड़ना था। दस बजकर तीस मिनट की ट्रेन थी, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर जा चुकी थी।

उसने करवट बदली और बगल में रखे सूटकेस को देखा, जिसे उसकी माँ, रेखा, ने बड़ी तन्मयता से पैक किया था। कपड़ों की हर तह में उसकी ममता सिमटी हुई थी। गौरव धीरे से उठा और दबे पाँव कमरे से बाहर निकला। घर के गलियारे में हल्की सी नमी और अगरबत्ती की मंद खुशबू तैर रही थी। उसने देखा कि माँ अभी भी सो रही होंगी, लेकिन उनकी वह कोमल मौजूदगी पूरे घर में महसूस हो रही थी।

गौरव ने दबे पाँव पिता के कमरे की ओर रुख किया। राजेश जी गहरी नींद में थे। गौरव ने सावधानी से मेज पर रखी दुकान की चाबियाँ उठाईं। उसके मन में एक योजना थी, एक ऐसी इच्छा जो उसने कई दिनों से दबा रखी थी। वह चुपचाप घर से निकला और पिता की कपड़ों की दुकान की ओर चल दिया।

सड़कें अभी शांत थीं, और ठंडी हवा उसके चेहरे को छूकर गुज़र रही थी। दुकान का शटर उठाते समय उसने पूरी कोशिश की कि शोर न हो। अंदर कदम रखते ही नए कपड़ों की वह विशिष्ट गंध उसके नथुनों से टकराई। वह सीधा उस सेक्शन में गया जहाँ सबसे महंगे और बेहतरीन ब्रांडेड सलवार-सूट रखे थे।

उसकी नज़रें एक पीच रंग के रेशमी सूट पर ठहरीं। उसने सोचा, 'यह रंग माँ पर कितना खिलेगा।' उसकी गोरी, चमकती त्वचा पर यह रंग जैसे सोने पर सुहागा होगा। उसने एक स्काई ब्लू सूट उठाया, जो बिल्कुल आसमान की तरह साफ़ और शीतल था। फिर एक पिस्ता ग्रीन और एक लैवेंडर रंग का सूट भी चुन लिया। हर कपड़ा छूने में मखमल जैसा नरम था।

फिर उसकी नज़र कुछ एलिगेंट नाइटियों पर पड़ी। उसने कुछ बेहतरीन चुनाव किए, जो आरामदायक भी थे और सुंदर भी। अचानक, उसका हाथ अंतःवस्त्रों (bra and panty) के सेक्शन की ओर बढ़ा। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई। एक पल के लिए उसके मन में आया कि वह अपनी माँ के लिए ये भी ले ले, लेकिन तभी उसके भीतर एक हिचकिचाहट उठी।

'माँ क्या सोचेंगी? क्या वह नाराज़ हो जाएँगी? क्या उन्हें लगेगा कि मैं...?'

उसने झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया। वह अपनी माँ से बेहद प्यार करता था, लेकिन उनके बीच एक पवित्र मर्यादा थी, जिसे वह तोड़ना नहीं चाहता था। उसने केवल सूट और नाइटियाँ लीं, उन्हें एक सुंदर कागज़ में पैक करवाया और तेज़ी से घर की ओर लौट आया।

जब वह घर पहुँचा, तो सूरज की पहली किरण ने घर के आँगन को छू लिया था। रेखा रसोई में चाय बना रही थीं। उन्होंने हल्के पीले रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जो उनके सुडौल शरीर पर बड़ी शालीनता से लिपटी हुई थी। उनके लंबे काले बाल एक ढीली चोटी में बंधे थे, और उनके गले पर वह छोटा सा तिल उनकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहा था। उनके पैरों की पायल की छन-छन रसोई की शांति को संगीत में बदल रही थी।

गौरव ने देखा कि पिता अभी भी सो रहे हैं। वह चुपके से रसोई में दाखिल हुआ और माँ के पीछे जाकर खड़ा हो गया।

"माँ!"

रेखा चौंककर पलटीं। उनकी बड़ी, अभिव्यंजक आँखों में पहले हैरानी और फिर ढेर सारा प्यार उमड़ आया।

"अरे! तू इतनी जल्दी उठ गया? मैंने तो सोचा था कि तुझे थोड़ा और सोने दूँगा। देख, मैं तेरे लिए परांठे बना रही हूँ।"

गौरव ने मुस्कुराते हुए वह पैक किया हुआ पैकेट उनकी ओर बढ़ाया।

"यह क्या है, बेटा?"

"एक छोटा सा सरप्राइज। इसे अभी खोलिए।"

रेखा ने धीरे से पैकेट खोला। जैसे ही उन्होंने उन रंग-बिरंगे, महंगे सलवार-सूटों और नाइटियों को देखा, उनकी आँखें फैल गईं। उन्होंने एक-एक करके कपड़ों को छुआ, उनकी कोमलता को महसूस किया।

"इतने महंगे कपड़े! पागल है क्या तू? इतने पैसे खर्च करने की क्या ज़रूरत थी? और ये... ये सब..."

रेखा की आवाज़ धीमी हो गई और उनके गालों पर एक हल्की सी गुलाबी रंगत छा गई। वह थोड़ा शर्मा गईं।

गौरव ने उनका हाथ थामा और बड़ी मासूमियत से कहा, "माँ, आप हमेशा साड़ी पहनती हैं। मैं चाहता हूँ कि आप कभी-कभी ये भी पहनें। और हाँ, अगली बार जब मैं वापस आऊँगा, तब आप इनमें से कोई एक पहनकर मुझे दिखाना। प्रॉमिस?"

रेखा ने नज़रें झुका लीं। उनकी पलकें झुक गईं और एक मंद सी मुस्कान उनके होठों पर तैर गई। उन्हें अपनी ममता और बेटे के इस लाड़ के बीच एक अजीब सी कशमकश महसूस हुई। वह शर्मा रही थीं, लेकिन उनके दिल में गौरव के लिए प्यार और बढ़ गया था।

"तू बहुत शरारती हो गया है, गौरव। अब जा, नहाकर आ, वरना देर हो जाएगी।"

उन्होंने धीरे से उसे गले लगाया। गौरव ने महसूस किया कि माँ की खुशबू—वह चंदन और साबुन का मिला-जुला अहसास—उसे सुकून दे रहा था। लेकिन इस सुकून के साथ एक टीस भी थी, क्योंकि कुछ ही घंटों में वह उनसे दूर जाने वाला था।

समय जैसे रेत की तरह हाथों से फिसल रहा था। दस बजे करीब आ रहे थे। घर का माहौल अब पूरी तरह से भावुक हो चुका था। रेखा की आँखों में नमी थी, लेकिन वह उसे छिपाने की कोशिश कर रही थीं।

उन्होंने एक पीतल की थाली में दीया, कुमकुम और अक्षत लिया। गौरव ने अपना सूटकेस पास रखा और माँ के सामने खड़ा हो गया। रेखा ने कांपते हाथों से उसकी आरती उतारी। दीये की रोशनी में उनका चेहरा और भी दैवीय लग रहा था। उन्होंने उसके माथे पर एक लंबा, लाल तिलक लगाया।

"जुग-जुग जियो मेरे लाल।"

उनकी आवाज़ भारी हो गई थी। उन्होंने गौरव के सिर पर हाथ रखा और आशीर्वाद दिया। फिर अचानक, उनके भीतर की वह ममतामयी माँ जाग उठी जो हमेशा चिंता में रहती है।

"सुन, वहाँ पहुँचकर सबसे पहले मुझे फोन करना। और हाँ, खाना समय पर खाना। बाहर का कचरा मत खाना, समझ गया? वहाँ ठंड होगी, तो अपना पुराना स्वेटर साथ रखा है न? उसे पहन लेना, वरना ज़ुकाम हो जाएगा। और किसी अजनबी पर भरोसा मत करना..."

गौरव मुस्कुराया, उसकी आँखों में भी आँसू थे।

"माँ, मैं बच्चा नहीं हूँ। स्टेशन मास्टर बन रहा हूँ, अब थोड़ा बड़ा हो गया हूँ।"

रेखा ने हल्के से उसके गाल पर चपत लगाई, लेकिन उनकी आँखों से एक आँसू ढलक कर उनके गाल पर आ गिरा।

"मेरे लिए तू हमेशा छोटा ही रहेगा। चाहे तू कितना भी बड़ा अफसर बन जाए, मेरी नज़र में तू वही छोटा गौरव है जो मेरी उँगली पकड़कर चलना सीखा था।"

गौरव ने माँ को कसकर गले लगा लिया। वह उनके कंधे पर अपना सिर रखकर फूट-फूट कर रो पड़ा। रेखा ने भी उसे कसकर जकड़ लिया, जैसे वह उसे कभी जाने ही नहीं देना चाहती हों। उस आलिंगन में वर्षों का प्यार, सुरक्षा और बिछड़ने का दर्द एक साथ सिमट आया था।

राजेश जी पास ही खड़े थे। उनकी आँखों में भी नमी थी, लेकिन वह एक पिता की तरह मज़बूती दिखा रहे थे।

"चलो बेटा, अब निकलना होगा। ट्रेन छूट जाएगी।"

घर की दहलीज पार करते समय गौरव ने एक बार पीछे मुड़कर देखा। रेखा दरवाज़े पर खड़ी थीं, उनका पल्लू उनके सिर पर था और वह हाथ जोड़कर उसे विदा कर रही थीं। उनकी वह छवि गौरव के ज़हन में हमेशा के लिए छप गई।

स्टेशन का शोर-शराबा, लोगों की भीड़ और कुली की आवाज़ें—सब कुछ धुंधला था। गौरव का मन अभी भी उस 2BHK घर की शांति और माँ की ममता में अटका हुआ था। जब ट्रेन ने अपनी लंबी सीटी बजाई और धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म छोड़ने लगी, तो गौरव ने खिड़की से हाथ हिलाया।

उसने देखा कि उसके पिता अभी भी वहीं खड़े थे। ट्रेन की गति जैसे-जैसे बढ़ी, पिता की आकृति छोटी होती गई और अंततः ओझल हो गई। गौरव ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे महसूस हो रहा था जैसे माँ की वह खुशबू अभी भी उसके कपड़ों में बसी हुई है।

पूरे सफर के दौरान वह खिड़की से बाहर देखता रहा, लेकिन उसे हर पेड़, हर खेत में माँ की छवि नज़र आ रही थी। वह सोच रहा था कि अब सुबह उठकर उसे कौन जगाएगा? उसे कौन याद दिलाएगा कि उसने अपना रुमाल नहीं लिया? वह अकेलापन उसे डराने लगा था।

जब वह अपने नए शहर पहुँचा, तो वहाँ की हवा अलग थी। वह एक छोटा सा स्टेशन था, जहाँ की शांति उसे थोड़ी डरावनी लग रही थी। अपनी नई पोस्टिंग के पास ही उसने एक छोटा सा किराए का कमरा ढूँढा। वह कमरा बहुत साधारण था—एक छोटा सा कमरा, एक पुराना बिस्तर और एक टूटी हुई मेज।

कमरे में धूल की एक मोटी परत जमी थी। दीवारों का पेंट उखड़ रहा था। गौरव ने अपनी आस्तीनें ऊपर चढ़ाईं और सफाई में जुट गया। जैसे-जैसे वह कमरा साफ कर रहा था, उसे अपनी माँ की याद और सताने लगी। उसे याद आया कि कैसे माँ घर के हर कोने को चमका कर रखती थीं।

उसने अपनी अलमारी व्यवस्थित की और अपना सूटकेस खोला। जैसे ही उसने वह कपड़ा देखा जो माँ ने उसके लिए पैक किया था, उसकी आँखों में फिर से आँसू आ गए। उसने महसूस किया कि वह अब वास्तव में अकेला है।

अगला दिन उसकी नौकरी का पहला दिन था। स्टेशन मास्टर के रूप में उसकी ज़िम्मेदारियाँ बड़ी थीं। उसे ट्रेनों के समय का ध्यान रखना था, सिग्नल की निगरानी करनी थी और स्टेशन के कर्मचारियों को संभालना था।

शुरुआत में उसे बहुत घबराहट हुई। सहकर्मी थोड़े रूखे थे, और स्टेशन का माहौल तनावपूर्ण था। लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलने लगा, उसने खुद को ढालना शुरू कर दिया। फिर भी, काम के बीच-बीच में उसका मन भटककर घर की ओर चला जाता।

शाम को जब वह अपने उस छोटे से कमरे में वापस आया, तो सन्नाटा उसे काटने को दौड़ रहा था। उसने अपना फोन उठाया और सबसे पहले अपनी माँ का नंबर डायल किया।

दूसरी घंटी पर ही फोन उठ गया।

"हेलो? गौरव! बेटा, पहुँच गया तू? सब ठीक है? खाना खाया?"

रेखा की आवाज़ सुनते ही गौरव का सारा तनाव जैसे हवा हो गया। उसकी आवाज़ में वही पुरानी ममता और वही चिंता थी।

"हाँ माँ, मैं पहुँच गया। कमरा मिल गया है, थोड़ा छोटा है पर ठीक है। बस... आपकी बहुत याद आ रही है।"

"पागल लड़का! अभी तो गया है और इतनी याद आने लगी? देख, मैंने तेरे लिए लड्डू बनाए थे, काश मैं उन्हें साथ भेज पाती। तू अपना ख्याल रखना, बेटा।"

दोनों के बीच लंबी बातचीत हुई। उन्होंने घर की हर छोटी बात साझा की—कैसे पिताजी ने आज सुबह चाय में चीनी कम डाली थी, कैसे पड़ोस वाली चाची ने गौरव के बारे में पूछा था।

फिर गौरव ने धीरे से कहा, "माँ, एक वीडियो कॉल करूँ?"

"वीडियो कॉल? अभी? मैं तो रसोई में हूँ, साड़ी में... और चेहरा भी थोड़ा थका हुआ है।"

"अरे माँ, आप कैसी भी लगो, मेरे लिए सबसे सुंदर हो। प्लीज, वीडियो कॉल करो न।"

रेखा थोड़ा हिचकिचाईं, लेकिन बेटे की ज़िद के आगे वह हार गईं। उन्होंने कॉल स्वीकार किया। स्क्रीन पर रेखा का चेहरा नज़र आया। वह रसोई में खड़ी थीं, उनके चेहरे पर पसीने की कुछ बूँदें थीं और उनके बाल थोड़े बिखरे हुए थे, लेकिन उनकी वह सादगी और सुंदरता देखते ही बनती थी।

गौरव उन्हें निहारता रहा।

"माँ, आप बहुत सुंदर लग रही हो।"

रेखा शर्मा गईं और उन्होंने अपने पल्लू से चेहरा थोड़ा ढँक लिया।

"चल हट! अब मुझे सुंदर बोलना शुरू कर दिया। तूने खाना खाया या नहीं, यह बता?"

बातचीत चलते-चलते फिर से उन कपड़ों पर आ गई जो गौरव ने सुबह उन्हें दिए थे।

"माँ, वो सलवार-सूट याद हैं जो मैंने दिए थे? मेरा बहुत मन है कि मैं आपको उनमें देखूँ।"

रेखा की आँखें बड़ी हो गईं। "बेटा, ऐसा कैसे... अभी तो पिताजी घर पर नहीं हैं, लेकिन फिर भी... मैं अब इस उम्र में सूट पहनूँगी? लोग क्या कहेंगे? और तू... तू मुझे ऐसे देखेगा?"

उनकी आवाज़ में एक अजीब सी लज्जा थी। वह वास्तव में शर्मा रही थीं।

"माँ, लोग क्या कहेंगे, उसकी चिंता छोड़िए। आप अभी भी इतनी जवान दिखती हैं कि कोई कह ही नहीं सकता कि आप मेरी माँ हैं। प्लीज, मेरे लिए पहन लीजिए। मैं बहुत दूर हूँ, बस एक बार देखना चाहता हूँ कि मेरी माँ उन कपड़ों में कैसी लगती हैं।"

रेखा ने एक गहरी साँस ली। उनके दिल में अपने लाडले के लिए असीम प्रेम था। उन्होंने सोचा कि बेटा इतनी दूर है, अकेले कमरे में संघर्ष कर रहा है, अगर उसकी यह छोटी सी इच्छा पूरी करने से उसे खुशी मिलती है, तो इसमें बुरा क्या है?

"ठीक है... तू रुक, मैं अभी पहनकर आती हूँ। लेकिन शर्त यह है कि तू कल से समय पर फोन करेगा।"

गौरव की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। "पक्का माँ! प्रॉमिस!"

रेखा फोन रखकर अपने कमरे में गईं। उन्होंने सावधानी से वह पीच रंग का रेशमी सूट निकाला। जब उन्होंने उसे पहना, तो वह उनके शरीर पर बिल्कुल सही बैठ रहा था। सूट की फिटिंग ने उनके सुडौल बदन को उभार दिया था। उन्होंने अपने बालों को खुला छोड़ दिया, जो उनकी कमर तक लहरा रहे थे। उन्होंने हल्का सा काजल लगाया और गले में अपना मंगलसूत्र पहना।

जब वह वापस वीडियो कॉल पर आईं, तो गौरव की साँसें जैसे थम गईं।

स्क्रीन पर जो महिला थी, वह एक माँ से ज़्यादा एक युवती लग रही थी। पीच रंग ने उनकी रंगत को और भी निखार दिया था। वह इतनी सुंदर, इतनी आकर्षक लग रही थीं कि गौरव को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ।

गौरव कुछ देर तक चुप रहा, बस उन्हें देखता रहा।

"क्या हुआ बेटा? कुछ बोल क्यों नहीं रहा? बुरा लग रहा है क्या? मैं कह रही थी न कि मैं अब सूट में अच्छी नहीं लगूँगी..."

रेखा ने घबराकर अपना दुपट्टा ठीक किया, उनके चेहरे पर शर्म की लालिमा छा गई थी।

गौरव ने भावुक होकर कहा, "माँ... आप... आप एकदम लड़की लग रही हो। सच कह रहा हूँ, अगर यह मंगलसूत्र न होता, तो कोई यह नहीं कह सकता था कि आप मेरी माँ हो। आप इतनी खूबसूरत कैसे हो सकती हैं?"

रेखा यह सुनकर बुरी तरह शर्मा गईं। उन्होंने अपना चेहरा दुपट्टे से आधा ढँक लिया और धीरे से डाँटा, "चुप कर बदमाश! माँ को ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं। तू बहुत बिगड़ गया है।"

लेकिन उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी गर्माहट थी। उन्हें अपनी सुंदरता की सराहना अपने बेटे से सुनकर एक अलग ही तरह का संतोष मिल रहा था।

गौरव की आवाज़ अब और भी गहरी और भावुक हो गई थी। "काश मैं अभी आपके सामने होता... काश मैं आपको सामने से ऐसे देख पाता। माँ, आप सच में बहुत प्यारी लग रही हैं।"

रेखा ने मुस्कुराते हुए कहा, "अच्छा बाबा, अब बहुत हो गया। अब तू सो जा, सुबह तेरी ड्यूटी है।"

"एक वादा कीजिए माँ। जब मैं अगली बार घर आऊँगा, तब आप फिर से मेरे लिए ऐसे ही तैयार होंगी। मैं चाहता हूँ कि आप हमेशा ऐसे ही सुंदर रहें।"

रेखा ने अपनी आँखों में प्यार भरकर सिर हिलाया। "ठीक है, मेरे लाडले। अब सो जा।"

कॉल कट गया, लेकिन गौरव के ज़हन में वह छवि बसी रही। वह बिस्तर पर लेटा हुआ छत को निहारने लगा। उसके मन में माँ के लिए सम्मान था, अथाह प्रेम था, लेकिन साथ ही एक ऐसी भावना थी जिसे वह खुद भी नहीं समझ पा रहा था। वह एक आकर्षण था—अपनी माँ की सुंदरता के प्रति एक ऐसा लगाव जो उसे बेचैन कर रहा था।

दिन बीतने लगे। गौरव की नौकरी अब पटरी पर आ गई थी। वह स्टेशन मास्टर के रूप में अपनी पहचान बना रहा था, लेकिन उसका दिल अब भी उस छोटे से घर में धड़कता था।

उसका रोज़ का नियम बन गया था—सुबह उठकर माँ को फोन करना और रात को सोने से पहले वीडियो कॉल।

हर कॉल पर वह माँ की सुंदरता की तारीफ करता, उन्हें नए-नए कपड़े पहनने के लिए प्रेरित करता। रेखा, जो पहले बहुत शर्माती थीं, अब धीरे-धीरे इस बात की आदी हो गई थीं। वह गौरव के लिए तैयार होने लगीं। कभी वह स्काई ब्लू सूट पहनतीं, तो कभी पिस्ता ग्रीन।

हर बार जब वह स्क्रीन पर आतीं, गौरव की दुनिया थम जाती। वह उन्हें निहारता, उनकी हर अदा को याद करता।

"माँ, आज आप उस नीले सूट में बिल्कुल परी लग रही हैं।"

रेखा खिलखिलाकर हँस पड़तीं। "तू मुझे बिगाड़ रहा है, गौरव। अब तो मैं घर में भी साड़ी के बजाय सूट ही पहनने लगी हूँ। तेरे पापा भी कह रहे थे कि आजकल मैं कुछ ज़्यादा ही सजने लगी हूँ।"

गौरव ने मुस्कुराते हुए कहा, "पापा को कहिए कि यह सब मेरी वजह से है। आप मेरी प्रेरणा हैं, माँ।"

लेकिन इस दूरी ने उनके रिश्ते में एक नई गहराई ला दी थी। वे अब केवल माँ-बेटा नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त बन गए थे। गौरव अपनी हर परेशानी माँ से साझा करता और रेखा अपनी हर छोटी-बड़ी खुशी अपने बेटे को सुनातीं।

फिर भी, रात के सन्नाटे में जब गौरव अपने कमरे की खिड़की से चाँद को देखता, तो उसे एक खालीपन महसूस होता। उसे याद आता कि कैसे माँ उसके सिर पर हाथ फेरती थीं, कैसे उनके स्पर्श से उसकी सारी थकान मिट जाती थी।

वह अक्सर सोचता कि क्या यह आकर्षण गलत है? लेकिन फिर वह याद करता कि उसकी माँ ने उसे दुनिया का सबसे ज़्यादा प्यार दिया है। यह आकर्षण केवल शारीरिक नहीं था, बल्कि उस संपूर्णता के प्रति था जो केवल एक माँ में होती है—सुंदरता, ममता, त्याग और निस्वार्थ प्रेम।

एक रात, जब बारिश तेज़ हो रही थी और खिड़की पर बूँदें दस्तक दे रही थीं, गौरव ने अपनी आँखें बंद कीं। उसे महसूस हुआ जैसे माँ उसके पास बैठी हैं और उसके बालों में उँगलियाँ फिरा रही हैं।

"जल्दी वापस आऊँगा माँ..." उसने धीरे से फुसफुसाया।

उसने अपने फोन में माँ की वह फोटो देखी जो उसने वीडियो कॉल के दौरान स्क्रीनशॉट ली थी—पीच सूट में शर्माती हुई उसकी माँ। वह तस्वीर उसके लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज़ थी।

उसे एहसास हुआ कि दूरियाँ शरीर को अलग करती हैं, लेकिन रूह को और करीब ले आती हैं। उसकी माँ की वह सुंदरता, वह शर्माना, वह लाड़—सब कुछ अब उसकी ताकत बन चुका था। वह जानता था कि चाहे दुनिया की कोई भी मुश्किल आए, घर पर कोई है जो उसकी राह देख रहा है, जो उसके लिए दुआएँ कर रहा है, और जो उसके लौटने पर फिर से उसी ममता और सुंदरता के साथ उसका स्वागत करेगी।

रात गहरी हो गई थी। बारिश की आवाज़ अब एक लोरी की तरह लग रही थी। गौरव ने एक लंबी साँस ली और माँ की यादों की चादर ओढ़कर सो गया, इस उम्मीद में कि कल फिर एक नई सुबह होगी और फिर से उसकी माँ की वह मधुर आवाज़ उसके कानों में गूँजेगी।
 

Rahul ml

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Kaisa laga update guys ?comment karke awasya btaye !
Jisko apni feelings ya kuch bhi share karni ho mujhse baat karni wo apna xforum id mujhse share kr skta hai!
 
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Rahul ml

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Kaisa laga update guys ?comment karke awasya btaye !
Jisko apni feelings ya kuch bhi share karni ho mujhse baat karni ho wo apna xforum id mujhse share kr skta hai!
 
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