आँखों का तारा
सुबह की पहली किरण ने जब खिड़की के हल्के नीले पर्दों को चीरकर कमरे में दस्तक दी, तो घर में एक अजीब सी शांति और पवित्रता छाई हुई थी। रसोई से आती इलायची और अदरक वाली चाय की खुशबू पूरे घर में फैल चुकी थी। रेखा ने अपनी पिस्ता हरे रंग की सूती साड़ी का पल्लू कमर में खोंस रखा था। साड़ी का हल्का कपड़ा उनके सुडौल शरीर पर पूरी तरह बैठा हुआ था, जो उनकी सादगी और सुंदरता में चार चाँद लगा रहा था। जब वे रसोई में एक तरफ से दूसरी तरफ जातीं, तो उनके पैरों की चांदी की पायल एक मधुर छन-छन की आवाज करती, जो घर की खामोशी को संगीत में बदल देती थी।
उनके माथे पर लगी गहरे लाल रंग की गोल बिंदी, माँग में भरा सिंदूर और गले में चमकता मंगलसूत्र उनकी सुहागन छवि को पूर्ण कर रहा था। आँखों में लगा गहरा काजल उनकी बड़ी और अभिव्यंजक आँखों की गहराई को और बढ़ा रहा था। हाथों की कांच की चूड़ियाँ जब बर्तनों से टकरातीं, तो एक खनक पैदा होती जो ममता की लय जैसी लगती थी।
तभी कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला और एक लंबी, गठीली काया वाला युवक नींद भरी आँखों से बाहर निकला। गौरव ने अपनी आँखें मलते हुए रसोई की ओर देखा, जहाँ उसकी माँ अपनी पूरी गरिमा और सुंदरता के साथ खड़ी थीं।
"गुड मॉर्निंग, माँ।"
रेखा का चेहरा खिल उठा। उन्होंने तुरंत गैस बंद की और मुड़कर अपने लाडले को देखा। उनकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो केवल एक माँ की आँखों में अपने बच्चे के लिए होती है।
"उठ गए मेरे राजा बेटा? मुझे लगा आज मेरा लाडला सूरज ढलने तक सोता रहेगा।"
रेखा ने आगे बढ़कर गौरव के माथे को चूमा। उनके स्पर्श में एक ऐसी गर्माहट थी जो दुनिया की सारी थकान मिटा दे। गौरव ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ की कमर में हाथ डालकर अपना सिर उनके कंधे पर टिका दिया। रेखा की खुशबू—चंदन और ताजे धुले सूती कपड़ों की मिली-जुली महक—गौरव के लिए दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना था।
"आज कॉलेज में प्रेजेंटेशन है माँ, इसलिए जल्दी उठना पड़ा।"
रेखा की भौहें थोड़ी सिकुड़ीं, चेहरे पर हल्की सी चिंता की लकीर उभर आई। उन्होंने गौरव के चेहरे को अपने दोनों कोमल हाथों में लिया और उसे गौर से देखने लगीं।
"तनाव तो नहीं ले रहे हो न मेरी जान? देखो, तुम्हारी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे दिख रहे हैं। रात को देर तक जागे थे क्या?"
गौरव ने अपनी माँ की उन आँखों में देखा जिनमें उसके लिए बेपनाह प्यार और फिक्र सिमटी हुई थी। उसने धीरे से माँ का हाथ चूम लिया।
"बस थोड़ा सा काम था माँ। आप बेकार में चिंता करती हैं।"
"बेकार कैसे हो सकती है? तू मेरी आँखों का तारा है गौरव। तुझे ज़रा सी भी परेशानी हो, तो मेरी रूह कांप जाती है।"
रेखा ने उसे धीरे से धक्का दिया और डाइनिंग टेबल की ओर इशारा किया।
"जाओ, हाथ-मुँह धोकर आओ। मैं तुम्हारे पसंदीदा आलू के पराठे और दही ला रही हूँ। आज का दिन बहुत खास है, इसलिए पेट भरकर नाश्ता करना होगा।"
गौरव मुस्कुराया और बाथरूम की ओर बढ़ गया। रेखा वापस रसोई में गईं, उनके पैरों की पायल की आवाज़ अब और तेज़ और खुशमिजाज़ हो गई थी। उन्होंने पराठों पर मक्खन की एक मोटी परत रखी और दही में हल्का सा भुना जीरा छिड़का। उनके चेहरे पर एक संतोष था—यह संतोष कि उनका बेटा उनके पास है, स्वस्थ है और खुश है।
तभी हॉल से एक भारी आवाज़ आई। राजेश, जो अपनी उम्र के हिसाब से थोड़े गंभीर और शांत दिखते थे, तैयार होकर बाहर निकले। उन्होंने साधारण सफेद कुर्ता और पजामा पहना था। उनकी आँखों में वह चमक नहीं थी जो रेखा की आँखों में थी, बल्कि एक तरह की थकान और रूखापन था।
"रेखा, मेरी चाय कहाँ है?"
रेखा ने मुड़कर देखा और एक हल्की, औपचारिक मुस्कान के साथ जवाब दिया।
"बस आ रही है। आप बैठिए, मैं अभी लाती हूँ।"
राजेश ने एक ठंडी नज़र रेखा पर डाली और सोफे पर बैठ गए। रेखा और राजेश के बीच की दूरी अब केवल भौतिक नहीं रही थी; सालों से उनके बीच एक ऐसी खामोश दीवार खड़ी हो गई थी जिसे पार करना अब नामुमकिन सा लगता था। उनके बीच बातचीत केवल ज़रूरत तक सीमित थी। रेखा के लिए अब उनका पूरा ब्रह्मांड गौरव था। राजेश की उपस्थिति घर में एक ज़रूरत की तरह थी, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव कहीं खो गया था।
रेखा ने चाय का कप राजेश के सामने रखा और बिना कुछ कहे वापस गौरव की ओर मुड़ गईं, जो अब तैयार होकर आ चुका था।
"मेरा लाडला कितना हैंडसम लग रहा है!"
रेखा ने गौरव के कुर्ते की सिलवटें ठीक कीं और उसके कॉलर को सलीके से बैठाया। उनकी उंगलियां गौरव के गले को हल्के से छू गईं, जिससे गौरव के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई।
"माँ, अब मैं लेट हो जाऊँगा।"
"बस एक मिनट रुक जा बेटा। नज़र उतार लूँ पहले।"
रेखा ने अपने हाथ से हवा में एक घेरा बनाया और गौरव की नज़र उतारी। फिर उन्होंने उसके माथे पर एक गहरा चुंबन अंकित किया।
"जाओ, मेरा राजा बेटा आज सबको दिखा दे कि वह सबसे बेहतरीन है। मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।"
गौरव ने झुककर अपनी माँ के पैर छुए। रेखा ने उसके सिर पर हाथ रखा और उसे ढेर सारा प्यार दिया। जब गौरव घर की दहलीज पार कर गया, तो रेखा तब तक वहीं खड़ी रहीं जब तक कि उसकी बाइक की आवाज़ गली के मोड़ पर ओझल नहीं हो गई।
जैसे ही गौरव गया, घर की रौनक जैसे कहीं चली गई। रेखा के चेहरे की वह चमक थोड़ी मद्धम पड़ गई। उन्होंने एक गहरी सांस ली और घर के कामों में जुट गईं।
दिन भर का रूटीन शुरू हुआ। झाड़ू-पोछा, बर्तनों की खनक और कपड़ों की तह लगाना। लेकिन रेखा का मन कहीं और था। वे हर आधे घंटे में घड़ी की ओर देखतीं। उनके मन में एक निरंतर विचार चलता रहता—'गौरव ने खाना खाया होगा? उसे प्रेजेंटेशन के दौरान घबराहट तो नहीं हुई होगी? कहीं वह धूप में ज़्यादा तो नहीं घूम लिया होगा?'
दोपहर के समय, जब सूरज अपनी पूरी तपिश पर था, रेखा ने रसोई में जाकर गौरव की पसंद की खीर बनानी शुरू की। उन्होंने दूध को धीमी आंच पर पकाया, उसमें केसर के धागे और बादाम-पिस्ता डाले। खीर की मिठास पूरे घर में फैल गई, लेकिन रेखा की मिठास केवल गौरव के लिए आरक्षित थी।
काम करते समय उनका पल्लू बार-बार कंधे से सरक जाता, जिसे वे बड़ी नज़ाकत से वापस ठीक करतीं। उनकी चूड़ियों की खनक अब एक इंतज़ार में बदल गई थी। वे बार-बार खिड़की के पास जाकर सड़क की ओर देखतीं, जैसे उन्हें दूर से ही अपने बेटे की आहट सुनाई दे जाएगी।
शाम के करीब पांच बजे थे। रेखा ने अपनी साड़ी ठीक की और चेहरे पर हल्का सा पानी छिड़क कर खुद को ताज़ा किया। उन्होंने ड्राइंग रूम के सोफे की चादर ठीक की और पानी के गिलास भरकर रखे।
तभी बाहर से बाइक की आवाज़ सुनाई दी। रेखा के चेहरे पर बिजली जैसी चमक आ गई। वे लगभग दौड़ती हुई दरवाज़े की ओर बढ़ीं। उनके पैरों की पायल ने एक तेज़ संगीत छेड़ा।
दरवाज़ा खुलते ही गौरव सामने खड़ा था। वह थोड़ा थका हुआ दिख रहा था, लेकिन उसकी आँखों में एक जीत की खुशी थी।
"माँ!"
रेखा ने उसे गले से लगा लिया। उन्होंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और बड़ी व्याकुलता से पूछा।
"क्या हुआ मेरे लाल? कैसा रहा प्रेजेंटेशन? तू ठीक तो है न? चेहरे पर इतनी थकान क्यों है? किसी ने कुछ कहा तो नहीं?"
गौरव ने ज़ोर से ठहाका लगाया और माँ के गले लग गया।
"माँ, मैंने टॉप किया! प्रोफेसर ने सबके सामने मेरी तारीफ की।"
रेखा की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने गौरव के गालों को चूम लिया।
"मुझे पता था मेरा बेटा कमाल करेगा। तू तो मेरा हीरा है, मेरी जान है। चल, जल्दी अंदर आ। मैंने तेरे लिए केसरिया खीर बनाई है और तेरे पसंदीदा पकौड़े भी तैयार हैं।"
रेखा उसे अंदर ले गईं। उन्होंने गौरव को सोफे पर बिठाया और उसके पैरों के पास बैठकर उसकी थकान मिटाने लगीं।
"बता, पूरा दिन कैसा बीता? किसने क्या कहा? तूने लंच किया था न ठीक से?"
गौरव अपनी माँ की गोद में सिर रखकर लेटा हुआ था। उसे दुनिया का सबसे बड़ा सुख इसी पल में मिल रहा था। उसने अपनी माँ को कॉलेज की सारी बातें विस्तार से बताईं—दोस्तों के साथ की गई मस्ती, प्रोफेसर की डाँट और अंत में मिली सफलता। रेखा एक-एक शब्द को ऐसे सुन रही थीं जैसे वह कोई पवित्र ग्रंथ पढ़ रही हों। उनकी आँखों में गौरव के लिए गर्व और असीम प्रेम था।
"तू बस खुश रह मेरे लाल। तेरी खुशी में ही मेरी जन्नत है।"
रात का समय हुआ। राजेश दुकान से लौट आए थे। घर में डिनर का समय था। डाइनिंग टेबल पर सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन सजा था।
राजेश ने भोजन करते हुए कहा, "आज दुकान पर बहुत भीड़ थी, थकान हो गई है।"
रेखा ने शांति से उनकी प्लेट में रोटी रखी।
"आप हाथ-मुँह धोकर आइए, मैं पानी लाती हूँ।"
उनकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी, लेकिन कोई गर्माहट भी नहीं थी। वह एक मशीन की तरह काम कर रही थीं। लेकिन जैसे ही उनकी नज़र गौरव पर पड़ी, उनकी आवाज़ बदल गई।
"गौरव, थोड़ा और पनीर ले ले बेटा। तूने आज बहुत मेहनत की है, तुझे ताकत की ज़रूरत है।"
गौरव ने मुस्कुराते हुए माँ की ओर देखा।
"बस माँ, पेट भर गया। आप भी खाइए न।"
"मैं तब तक नहीं खाऊँगी जब तक मेरा लाडला प्लेट साफ नहीं कर लेता।"
भोजन के बाद, राजेश अपने कमरे में चले गए। घर में फिर से वह सुकून भरी खामोशी छा गई। रेखा ने गौरव को उसके कमरे में जाने के लिए कहा।
गौरव जब बिस्तर पर लेटा, तो रेखा उसके पास आईं। उन्होंने धीरे से उसके सिर के बालों को सहलाना शुरू किया। यह वह पल था जब शब्दों की ज़रूरत नहीं होती थी। गौरव की आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।
"माँ, आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हो।"
रेखा की आँखों में फिर से नमी आ गई। उन्होंने झुककर उसके माथे पर एक लंबा और गहरा चुंबन दिया।
"और तू मेरी दुनिया का सबसे प्यारा बेटा। सो जा मेरे राजा बेटा, कल फिर एक नया दिन होगा।"
उन्होंने कमरे की लाइट बंद की, लेकिन बाहर निकलने से पहले एक बार फिर मुड़कर अपने सोए हुए बेटे को देखा। उनके चेहरे पर एक दिव्य संतोष था। उन्होंने धीरे से दरवाज़ा बंद किया, और उनके पैरों की पायल की आखिरी छन-छन ने उस रात को ममता की चादर में लपेट दिया।
अगली सुबह, वही सुगंधित चाय की महक घर में फैली। रेखा रसोई में, अपनी बादामी रंग की साड़ी में, लाल बिंदी और मंगलसूत्र के साथ, अपने बेटे के लिए नाश्ता तैयार कर रही थी। पायल की धुन पर उनके हाथ थिरक रहे थे। गौरव की आँखें खुलीं। कमरे में फैलती सुगंध उसे खींचती हुई रसोई तक ले आई, जहाँ माँ का प्रेम हर सुबह की नई शुरुआत करता था।
"माँ, आज क्या बन रहा है?" गौरव ने अपनी नींद भरी आवाज़ में पूछा, रसोई के दरवाज़े पर खड़ा होकर। रेखा ने पलट कर देखा, उनके चेहरे पर वही चिर-परिचित, ममतामयी मुस्कान थी, जिसने गौरव के दिन को एक नई ऊर्जा से भर दिया।
"मेरे लाडले के लिए आज मीठी सेवइयां बन रही हैं," रेखा ने कहा, उनकी आवाज में मिठास घुली हुई थी, जैसे गरम दूध में घुली चीनी। गौरव ने महसूस किया, यह सिर्फ सेवइयां नहीं थीं, माँ का अनमोल प्यार था जो थाली में परोसा जा रहा था।
"वाह माँ! मेरी सबसे पसंदीदा चीज़!" गौरव की आँखों में चमक आ गई, और वह तेज़ी से अपनी कुर्सी पर जा बैठा। रेखा ने उसके सामने गरमागरम सेवइयां रखीं, उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान तैर रही थी, जो उसके हर शब्द के साथ और गहरी होती जा रही थी।
सुबह की पहली किरण ने जब खिड़की के हल्के नीले पर्दों को चीरकर कमरे में दस्तक दी, तो घर में एक अजीब सी शांति और पवित्रता छाई हुई थी। रसोई से आती इलायची और अदरक वाली चाय की खुशबू पूरे घर में फैल चुकी थी। रेखा ने अपनी पिस्ता हरे रंग की सूती साड़ी का पल्लू कमर में खोंस रखा था। साड़ी का हल्का कपड़ा उनके सुडौल शरीर पर पूरी तरह बैठा हुआ था, जो उनकी सादगी और सुंदरता में चार चाँद लगा रहा था। जब वे रसोई में एक तरफ से दूसरी तरफ जातीं, तो उनके पैरों की चांदी की पायल एक मधुर छन-छन की आवाज करती, जो घर की खामोशी को संगीत में बदल देती थी।
उनके माथे पर लगी गहरे लाल रंग की गोल बिंदी, माँग में भरा सिंदूर और गले में चमकता मंगलसूत्र उनकी सुहागन छवि को पूर्ण कर रहा था। आँखों में लगा गहरा काजल उनकी बड़ी और अभिव्यंजक आँखों की गहराई को और बढ़ा रहा था। हाथों की कांच की चूड़ियाँ जब बर्तनों से टकरातीं, तो एक खनक पैदा होती जो ममता की लय जैसी लगती थी।
तभी कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला और एक लंबी, गठीली काया वाला युवक नींद भरी आँखों से बाहर निकला। गौरव ने अपनी आँखें मलते हुए रसोई की ओर देखा, जहाँ उसकी माँ अपनी पूरी गरिमा और सुंदरता के साथ खड़ी थीं।
"गुड मॉर्निंग, माँ।"
रेखा का चेहरा खिल उठा। उन्होंने तुरंत गैस बंद की और मुड़कर अपने लाडले को देखा। उनकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो केवल एक माँ की आँखों में अपने बच्चे के लिए होती है।
"उठ गए मेरे राजा बेटा? मुझे लगा आज मेरा लाडला सूरज ढलने तक सोता रहेगा।"
रेखा ने आगे बढ़कर गौरव के माथे को चूमा। उनके स्पर्श में एक ऐसी गर्माहट थी जो दुनिया की सारी थकान मिटा दे। गौरव ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ की कमर में हाथ डालकर अपना सिर उनके कंधे पर टिका दिया। रेखा की खुशबू—चंदन और ताजे धुले सूती कपड़ों की मिली-जुली महक—गौरव के लिए दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना था।
"आज कॉलेज में प्रेजेंटेशन है माँ, इसलिए जल्दी उठना पड़ा।"
रेखा की भौहें थोड़ी सिकुड़ीं, चेहरे पर हल्की सी चिंता की लकीर उभर आई। उन्होंने गौरव के चेहरे को अपने दोनों कोमल हाथों में लिया और उसे गौर से देखने लगीं।
"तनाव तो नहीं ले रहे हो न मेरी जान? देखो, तुम्हारी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे दिख रहे हैं। रात को देर तक जागे थे क्या?"
गौरव ने अपनी माँ की उन आँखों में देखा जिनमें उसके लिए बेपनाह प्यार और फिक्र सिमटी हुई थी। उसने धीरे से माँ का हाथ चूम लिया।
"बस थोड़ा सा काम था माँ। आप बेकार में चिंता करती हैं।"
"बेकार कैसे हो सकती है? तू मेरी आँखों का तारा है गौरव। तुझे ज़रा सी भी परेशानी हो, तो मेरी रूह कांप जाती है।"
रेखा ने उसे धीरे से धक्का दिया और डाइनिंग टेबल की ओर इशारा किया।
"जाओ, हाथ-मुँह धोकर आओ। मैं तुम्हारे पसंदीदा आलू के पराठे और दही ला रही हूँ। आज का दिन बहुत खास है, इसलिए पेट भरकर नाश्ता करना होगा।"
गौरव मुस्कुराया और बाथरूम की ओर बढ़ गया। रेखा वापस रसोई में गईं, उनके पैरों की पायल की आवाज़ अब और तेज़ और खुशमिजाज़ हो गई थी। उन्होंने पराठों पर मक्खन की एक मोटी परत रखी और दही में हल्का सा भुना जीरा छिड़का। उनके चेहरे पर एक संतोष था—यह संतोष कि उनका बेटा उनके पास है, स्वस्थ है और खुश है।
तभी हॉल से एक भारी आवाज़ आई। राजेश, जो अपनी उम्र के हिसाब से थोड़े गंभीर और शांत दिखते थे, तैयार होकर बाहर निकले। उन्होंने साधारण सफेद कुर्ता और पजामा पहना था। उनकी आँखों में वह चमक नहीं थी जो रेखा की आँखों में थी, बल्कि एक तरह की थकान और रूखापन था।
"रेखा, मेरी चाय कहाँ है?"
रेखा ने मुड़कर देखा और एक हल्की, औपचारिक मुस्कान के साथ जवाब दिया।
"बस आ रही है। आप बैठिए, मैं अभी लाती हूँ।"
राजेश ने एक ठंडी नज़र रेखा पर डाली और सोफे पर बैठ गए। रेखा और राजेश के बीच की दूरी अब केवल भौतिक नहीं रही थी; सालों से उनके बीच एक ऐसी खामोश दीवार खड़ी हो गई थी जिसे पार करना अब नामुमकिन सा लगता था। उनके बीच बातचीत केवल ज़रूरत तक सीमित थी। रेखा के लिए अब उनका पूरा ब्रह्मांड गौरव था। राजेश की उपस्थिति घर में एक ज़रूरत की तरह थी, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव कहीं खो गया था।
रेखा ने चाय का कप राजेश के सामने रखा और बिना कुछ कहे वापस गौरव की ओर मुड़ गईं, जो अब तैयार होकर आ चुका था।
"मेरा लाडला कितना हैंडसम लग रहा है!"
रेखा ने गौरव के कुर्ते की सिलवटें ठीक कीं और उसके कॉलर को सलीके से बैठाया। उनकी उंगलियां गौरव के गले को हल्के से छू गईं, जिससे गौरव के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई।
"माँ, अब मैं लेट हो जाऊँगा।"
"बस एक मिनट रुक जा बेटा। नज़र उतार लूँ पहले।"
रेखा ने अपने हाथ से हवा में एक घेरा बनाया और गौरव की नज़र उतारी। फिर उन्होंने उसके माथे पर एक गहरा चुंबन अंकित किया।
"जाओ, मेरा राजा बेटा आज सबको दिखा दे कि वह सबसे बेहतरीन है। मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।"
गौरव ने झुककर अपनी माँ के पैर छुए। रेखा ने उसके सिर पर हाथ रखा और उसे ढेर सारा प्यार दिया। जब गौरव घर की दहलीज पार कर गया, तो रेखा तब तक वहीं खड़ी रहीं जब तक कि उसकी बाइक की आवाज़ गली के मोड़ पर ओझल नहीं हो गई।
जैसे ही गौरव गया, घर की रौनक जैसे कहीं चली गई। रेखा के चेहरे की वह चमक थोड़ी मद्धम पड़ गई। उन्होंने एक गहरी सांस ली और घर के कामों में जुट गईं।
दिन भर का रूटीन शुरू हुआ। झाड़ू-पोछा, बर्तनों की खनक और कपड़ों की तह लगाना। लेकिन रेखा का मन कहीं और था। वे हर आधे घंटे में घड़ी की ओर देखतीं। उनके मन में एक निरंतर विचार चलता रहता—'गौरव ने खाना खाया होगा? उसे प्रेजेंटेशन के दौरान घबराहट तो नहीं हुई होगी? कहीं वह धूप में ज़्यादा तो नहीं घूम लिया होगा?'
दोपहर के समय, जब सूरज अपनी पूरी तपिश पर था, रेखा ने रसोई में जाकर गौरव की पसंद की खीर बनानी शुरू की। उन्होंने दूध को धीमी आंच पर पकाया, उसमें केसर के धागे और बादाम-पिस्ता डाले। खीर की मिठास पूरे घर में फैल गई, लेकिन रेखा की मिठास केवल गौरव के लिए आरक्षित थी।
काम करते समय उनका पल्लू बार-बार कंधे से सरक जाता, जिसे वे बड़ी नज़ाकत से वापस ठीक करतीं। उनकी चूड़ियों की खनक अब एक इंतज़ार में बदल गई थी। वे बार-बार खिड़की के पास जाकर सड़क की ओर देखतीं, जैसे उन्हें दूर से ही अपने बेटे की आहट सुनाई दे जाएगी।
शाम के करीब पांच बजे थे। रेखा ने अपनी साड़ी ठीक की और चेहरे पर हल्का सा पानी छिड़क कर खुद को ताज़ा किया। उन्होंने ड्राइंग रूम के सोफे की चादर ठीक की और पानी के गिलास भरकर रखे।
तभी बाहर से बाइक की आवाज़ सुनाई दी। रेखा के चेहरे पर बिजली जैसी चमक आ गई। वे लगभग दौड़ती हुई दरवाज़े की ओर बढ़ीं। उनके पैरों की पायल ने एक तेज़ संगीत छेड़ा।
दरवाज़ा खुलते ही गौरव सामने खड़ा था। वह थोड़ा थका हुआ दिख रहा था, लेकिन उसकी आँखों में एक जीत की खुशी थी।
"माँ!"
रेखा ने उसे गले से लगा लिया। उन्होंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और बड़ी व्याकुलता से पूछा।
"क्या हुआ मेरे लाल? कैसा रहा प्रेजेंटेशन? तू ठीक तो है न? चेहरे पर इतनी थकान क्यों है? किसी ने कुछ कहा तो नहीं?"
गौरव ने ज़ोर से ठहाका लगाया और माँ के गले लग गया।
"माँ, मैंने टॉप किया! प्रोफेसर ने सबके सामने मेरी तारीफ की।"
रेखा की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने गौरव के गालों को चूम लिया।
"मुझे पता था मेरा बेटा कमाल करेगा। तू तो मेरा हीरा है, मेरी जान है। चल, जल्दी अंदर आ। मैंने तेरे लिए केसरिया खीर बनाई है और तेरे पसंदीदा पकौड़े भी तैयार हैं।"
रेखा उसे अंदर ले गईं। उन्होंने गौरव को सोफे पर बिठाया और उसके पैरों के पास बैठकर उसकी थकान मिटाने लगीं।
"बता, पूरा दिन कैसा बीता? किसने क्या कहा? तूने लंच किया था न ठीक से?"
गौरव अपनी माँ की गोद में सिर रखकर लेटा हुआ था। उसे दुनिया का सबसे बड़ा सुख इसी पल में मिल रहा था। उसने अपनी माँ को कॉलेज की सारी बातें विस्तार से बताईं—दोस्तों के साथ की गई मस्ती, प्रोफेसर की डाँट और अंत में मिली सफलता। रेखा एक-एक शब्द को ऐसे सुन रही थीं जैसे वह कोई पवित्र ग्रंथ पढ़ रही हों। उनकी आँखों में गौरव के लिए गर्व और असीम प्रेम था।
"तू बस खुश रह मेरे लाल। तेरी खुशी में ही मेरी जन्नत है।"
रात का समय हुआ। राजेश दुकान से लौट आए थे। घर में डिनर का समय था। डाइनिंग टेबल पर सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन सजा था।
राजेश ने भोजन करते हुए कहा, "आज दुकान पर बहुत भीड़ थी, थकान हो गई है।"
रेखा ने शांति से उनकी प्लेट में रोटी रखी।
"आप हाथ-मुँह धोकर आइए, मैं पानी लाती हूँ।"
उनकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी, लेकिन कोई गर्माहट भी नहीं थी। वह एक मशीन की तरह काम कर रही थीं। लेकिन जैसे ही उनकी नज़र गौरव पर पड़ी, उनकी आवाज़ बदल गई।
"गौरव, थोड़ा और पनीर ले ले बेटा। तूने आज बहुत मेहनत की है, तुझे ताकत की ज़रूरत है।"
गौरव ने मुस्कुराते हुए माँ की ओर देखा।
"बस माँ, पेट भर गया। आप भी खाइए न।"
"मैं तब तक नहीं खाऊँगी जब तक मेरा लाडला प्लेट साफ नहीं कर लेता।"
भोजन के बाद, राजेश अपने कमरे में चले गए। घर में फिर से वह सुकून भरी खामोशी छा गई। रेखा ने गौरव को उसके कमरे में जाने के लिए कहा।
गौरव जब बिस्तर पर लेटा, तो रेखा उसके पास आईं। उन्होंने धीरे से उसके सिर के बालों को सहलाना शुरू किया। यह वह पल था जब शब्दों की ज़रूरत नहीं होती थी। गौरव की आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।
"माँ, आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हो।"
रेखा की आँखों में फिर से नमी आ गई। उन्होंने झुककर उसके माथे पर एक लंबा और गहरा चुंबन दिया।
"और तू मेरी दुनिया का सबसे प्यारा बेटा। सो जा मेरे राजा बेटा, कल फिर एक नया दिन होगा।"
उन्होंने कमरे की लाइट बंद की, लेकिन बाहर निकलने से पहले एक बार फिर मुड़कर अपने सोए हुए बेटे को देखा। उनके चेहरे पर एक दिव्य संतोष था। उन्होंने धीरे से दरवाज़ा बंद किया, और उनके पैरों की पायल की आखिरी छन-छन ने उस रात को ममता की चादर में लपेट दिया।
अगली सुबह, वही सुगंधित चाय की महक घर में फैली। रेखा रसोई में, अपनी बादामी रंग की साड़ी में, लाल बिंदी और मंगलसूत्र के साथ, अपने बेटे के लिए नाश्ता तैयार कर रही थी। पायल की धुन पर उनके हाथ थिरक रहे थे। गौरव की आँखें खुलीं। कमरे में फैलती सुगंध उसे खींचती हुई रसोई तक ले आई, जहाँ माँ का प्रेम हर सुबह की नई शुरुआत करता था।
"माँ, आज क्या बन रहा है?" गौरव ने अपनी नींद भरी आवाज़ में पूछा, रसोई के दरवाज़े पर खड़ा होकर। रेखा ने पलट कर देखा, उनके चेहरे पर वही चिर-परिचित, ममतामयी मुस्कान थी, जिसने गौरव के दिन को एक नई ऊर्जा से भर दिया।
"मेरे लाडले के लिए आज मीठी सेवइयां बन रही हैं," रेखा ने कहा, उनकी आवाज में मिठास घुली हुई थी, जैसे गरम दूध में घुली चीनी। गौरव ने महसूस किया, यह सिर्फ सेवइयां नहीं थीं, माँ का अनमोल प्यार था जो थाली में परोसा जा रहा था।
"वाह माँ! मेरी सबसे पसंदीदा चीज़!" गौरव की आँखों में चमक आ गई, और वह तेज़ी से अपनी कुर्सी पर जा बैठा। रेखा ने उसके सामने गरमागरम सेवइयां रखीं, उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान तैर रही थी, जो उसके हर शब्द के साथ और गहरी होती जा रही थी।