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Incest Aankhon ka Taara

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Rahul ml

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आँखों का तारा

सुबह की पहली किरण ने जब खिड़की के हल्के नीले पर्दों को चीरकर कमरे में दस्तक दी, तो घर में एक अजीब सी शांति और पवित्रता छाई हुई थी। रसोई से आती इलायची और अदरक वाली चाय की खुशबू पूरे घर में फैल चुकी थी। रेखा ने अपनी पिस्ता हरे रंग की सूती साड़ी का पल्लू कमर में खोंस रखा था। साड़ी का हल्का कपड़ा उनके सुडौल शरीर पर पूरी तरह बैठा हुआ था, जो उनकी सादगी और सुंदरता में चार चाँद लगा रहा था। जब वे रसोई में एक तरफ से दूसरी तरफ जातीं, तो उनके पैरों की चांदी की पायल एक मधुर छन-छन की आवाज करती, जो घर की खामोशी को संगीत में बदल देती थी।

उनके माथे पर लगी गहरे लाल रंग की गोल बिंदी, माँग में भरा सिंदूर और गले में चमकता मंगलसूत्र उनकी सुहागन छवि को पूर्ण कर रहा था। आँखों में लगा गहरा काजल उनकी बड़ी और अभिव्यंजक आँखों की गहराई को और बढ़ा रहा था। हाथों की कांच की चूड़ियाँ जब बर्तनों से टकरातीं, तो एक खनक पैदा होती जो ममता की लय जैसी लगती थी।

तभी कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला और एक लंबी, गठीली काया वाला युवक नींद भरी आँखों से बाहर निकला। गौरव ने अपनी आँखें मलते हुए रसोई की ओर देखा, जहाँ उसकी माँ अपनी पूरी गरिमा और सुंदरता के साथ खड़ी थीं।

"गुड मॉर्निंग, माँ।"

रेखा का चेहरा खिल उठा। उन्होंने तुरंत गैस बंद की और मुड़कर अपने लाडले को देखा। उनकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो केवल एक माँ की आँखों में अपने बच्चे के लिए होती है।

"उठ गए मेरे राजा बेटा? मुझे लगा आज मेरा लाडला सूरज ढलने तक सोता रहेगा।"

रेखा ने आगे बढ़कर गौरव के माथे को चूमा। उनके स्पर्श में एक ऐसी गर्माहट थी जो दुनिया की सारी थकान मिटा दे। गौरव ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ की कमर में हाथ डालकर अपना सिर उनके कंधे पर टिका दिया। रेखा की खुशबू—चंदन और ताजे धुले सूती कपड़ों की मिली-जुली महक—गौरव के लिए दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना था।

"आज कॉलेज में प्रेजेंटेशन है माँ, इसलिए जल्दी उठना पड़ा।"

रेखा की भौहें थोड़ी सिकुड़ीं, चेहरे पर हल्की सी चिंता की लकीर उभर आई। उन्होंने गौरव के चेहरे को अपने दोनों कोमल हाथों में लिया और उसे गौर से देखने लगीं।

"तनाव तो नहीं ले रहे हो न मेरी जान? देखो, तुम्हारी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे दिख रहे हैं। रात को देर तक जागे थे क्या?"

गौरव ने अपनी माँ की उन आँखों में देखा जिनमें उसके लिए बेपनाह प्यार और फिक्र सिमटी हुई थी। उसने धीरे से माँ का हाथ चूम लिया।

"बस थोड़ा सा काम था माँ। आप बेकार में चिंता करती हैं।"

"बेकार कैसे हो सकती है? तू मेरी आँखों का तारा है गौरव। तुझे ज़रा सी भी परेशानी हो, तो मेरी रूह कांप जाती है।"

रेखा ने उसे धीरे से धक्का दिया और डाइनिंग टेबल की ओर इशारा किया।

"जाओ, हाथ-मुँह धोकर आओ। मैं तुम्हारे पसंदीदा आलू के पराठे और दही ला रही हूँ। आज का दिन बहुत खास है, इसलिए पेट भरकर नाश्ता करना होगा।"

गौरव मुस्कुराया और बाथरूम की ओर बढ़ गया। रेखा वापस रसोई में गईं, उनके पैरों की पायल की आवाज़ अब और तेज़ और खुशमिजाज़ हो गई थी। उन्होंने पराठों पर मक्खन की एक मोटी परत रखी और दही में हल्का सा भुना जीरा छिड़का। उनके चेहरे पर एक संतोष था—यह संतोष कि उनका बेटा उनके पास है, स्वस्थ है और खुश है।

तभी हॉल से एक भारी आवाज़ आई। राजेश, जो अपनी उम्र के हिसाब से थोड़े गंभीर और शांत दिखते थे, तैयार होकर बाहर निकले। उन्होंने साधारण सफेद कुर्ता और पजामा पहना था। उनकी आँखों में वह चमक नहीं थी जो रेखा की आँखों में थी, बल्कि एक तरह की थकान और रूखापन था।

"रेखा, मेरी चाय कहाँ है?"

रेखा ने मुड़कर देखा और एक हल्की, औपचारिक मुस्कान के साथ जवाब दिया।

"बस आ रही है। आप बैठिए, मैं अभी लाती हूँ।"

राजेश ने एक ठंडी नज़र रेखा पर डाली और सोफे पर बैठ गए। रेखा और राजेश के बीच की दूरी अब केवल भौतिक नहीं रही थी; सालों से उनके बीच एक ऐसी खामोश दीवार खड़ी हो गई थी जिसे पार करना अब नामुमकिन सा लगता था। उनके बीच बातचीत केवल ज़रूरत तक सीमित थी। रेखा के लिए अब उनका पूरा ब्रह्मांड गौरव था। राजेश की उपस्थिति घर में एक ज़रूरत की तरह थी, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव कहीं खो गया था।

रेखा ने चाय का कप राजेश के सामने रखा और बिना कुछ कहे वापस गौरव की ओर मुड़ गईं, जो अब तैयार होकर आ चुका था।

"मेरा लाडला कितना हैंडसम लग रहा है!"

रेखा ने गौरव के कुर्ते की सिलवटें ठीक कीं और उसके कॉलर को सलीके से बैठाया। उनकी उंगलियां गौरव के गले को हल्के से छू गईं, जिससे गौरव के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई।

"माँ, अब मैं लेट हो जाऊँगा।"

"बस एक मिनट रुक जा बेटा। नज़र उतार लूँ पहले।"

रेखा ने अपने हाथ से हवा में एक घेरा बनाया और गौरव की नज़र उतारी। फिर उन्होंने उसके माथे पर एक गहरा चुंबन अंकित किया।

"जाओ, मेरा राजा बेटा आज सबको दिखा दे कि वह सबसे बेहतरीन है। मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।"

गौरव ने झुककर अपनी माँ के पैर छुए। रेखा ने उसके सिर पर हाथ रखा और उसे ढेर सारा प्यार दिया। जब गौरव घर की दहलीज पार कर गया, तो रेखा तब तक वहीं खड़ी रहीं जब तक कि उसकी बाइक की आवाज़ गली के मोड़ पर ओझल नहीं हो गई।

जैसे ही गौरव गया, घर की रौनक जैसे कहीं चली गई। रेखा के चेहरे की वह चमक थोड़ी मद्धम पड़ गई। उन्होंने एक गहरी सांस ली और घर के कामों में जुट गईं।

दिन भर का रूटीन शुरू हुआ। झाड़ू-पोछा, बर्तनों की खनक और कपड़ों की तह लगाना। लेकिन रेखा का मन कहीं और था। वे हर आधे घंटे में घड़ी की ओर देखतीं। उनके मन में एक निरंतर विचार चलता रहता—'गौरव ने खाना खाया होगा? उसे प्रेजेंटेशन के दौरान घबराहट तो नहीं हुई होगी? कहीं वह धूप में ज़्यादा तो नहीं घूम लिया होगा?'

दोपहर के समय, जब सूरज अपनी पूरी तपिश पर था, रेखा ने रसोई में जाकर गौरव की पसंद की खीर बनानी शुरू की। उन्होंने दूध को धीमी आंच पर पकाया, उसमें केसर के धागे और बादाम-पिस्ता डाले। खीर की मिठास पूरे घर में फैल गई, लेकिन रेखा की मिठास केवल गौरव के लिए आरक्षित थी।

काम करते समय उनका पल्लू बार-बार कंधे से सरक जाता, जिसे वे बड़ी नज़ाकत से वापस ठीक करतीं। उनकी चूड़ियों की खनक अब एक इंतज़ार में बदल गई थी। वे बार-बार खिड़की के पास जाकर सड़क की ओर देखतीं, जैसे उन्हें दूर से ही अपने बेटे की आहट सुनाई दे जाएगी।

शाम के करीब पांच बजे थे। रेखा ने अपनी साड़ी ठीक की और चेहरे पर हल्का सा पानी छिड़क कर खुद को ताज़ा किया। उन्होंने ड्राइंग रूम के सोफे की चादर ठीक की और पानी के गिलास भरकर रखे।

तभी बाहर से बाइक की आवाज़ सुनाई दी। रेखा के चेहरे पर बिजली जैसी चमक आ गई। वे लगभग दौड़ती हुई दरवाज़े की ओर बढ़ीं। उनके पैरों की पायल ने एक तेज़ संगीत छेड़ा।

दरवाज़ा खुलते ही गौरव सामने खड़ा था। वह थोड़ा थका हुआ दिख रहा था, लेकिन उसकी आँखों में एक जीत की खुशी थी।

"माँ!"

रेखा ने उसे गले से लगा लिया। उन्होंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और बड़ी व्याकुलता से पूछा।

"क्या हुआ मेरे लाल? कैसा रहा प्रेजेंटेशन? तू ठीक तो है न? चेहरे पर इतनी थकान क्यों है? किसी ने कुछ कहा तो नहीं?"

गौरव ने ज़ोर से ठहाका लगाया और माँ के गले लग गया।

"माँ, मैंने टॉप किया! प्रोफेसर ने सबके सामने मेरी तारीफ की।"

रेखा की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने गौरव के गालों को चूम लिया।

"मुझे पता था मेरा बेटा कमाल करेगा। तू तो मेरा हीरा है, मेरी जान है। चल, जल्दी अंदर आ। मैंने तेरे लिए केसरिया खीर बनाई है और तेरे पसंदीदा पकौड़े भी तैयार हैं।"

रेखा उसे अंदर ले गईं। उन्होंने गौरव को सोफे पर बिठाया और उसके पैरों के पास बैठकर उसकी थकान मिटाने लगीं।

"बता, पूरा दिन कैसा बीता? किसने क्या कहा? तूने लंच किया था न ठीक से?"

गौरव अपनी माँ की गोद में सिर रखकर लेटा हुआ था। उसे दुनिया का सबसे बड़ा सुख इसी पल में मिल रहा था। उसने अपनी माँ को कॉलेज की सारी बातें विस्तार से बताईं—दोस्तों के साथ की गई मस्ती, प्रोफेसर की डाँट और अंत में मिली सफलता। रेखा एक-एक शब्द को ऐसे सुन रही थीं जैसे वह कोई पवित्र ग्रंथ पढ़ रही हों। उनकी आँखों में गौरव के लिए गर्व और असीम प्रेम था।

"तू बस खुश रह मेरे लाल। तेरी खुशी में ही मेरी जन्नत है।"

रात का समय हुआ। राजेश दुकान से लौट आए थे। घर में डिनर का समय था। डाइनिंग टेबल पर सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन सजा था।

राजेश ने भोजन करते हुए कहा, "आज दुकान पर बहुत भीड़ थी, थकान हो गई है।"

रेखा ने शांति से उनकी प्लेट में रोटी रखी।

"आप हाथ-मुँह धोकर आइए, मैं पानी लाती हूँ।"

उनकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी, लेकिन कोई गर्माहट भी नहीं थी। वह एक मशीन की तरह काम कर रही थीं। लेकिन जैसे ही उनकी नज़र गौरव पर पड़ी, उनकी आवाज़ बदल गई।

"गौरव, थोड़ा और पनीर ले ले बेटा। तूने आज बहुत मेहनत की है, तुझे ताकत की ज़रूरत है।"

गौरव ने मुस्कुराते हुए माँ की ओर देखा।

"बस माँ, पेट भर गया। आप भी खाइए न।"

"मैं तब तक नहीं खाऊँगी जब तक मेरा लाडला प्लेट साफ नहीं कर लेता।"

भोजन के बाद, राजेश अपने कमरे में चले गए। घर में फिर से वह सुकून भरी खामोशी छा गई। रेखा ने गौरव को उसके कमरे में जाने के लिए कहा।

गौरव जब बिस्तर पर लेटा, तो रेखा उसके पास आईं। उन्होंने धीरे से उसके सिर के बालों को सहलाना शुरू किया। यह वह पल था जब शब्दों की ज़रूरत नहीं होती थी। गौरव की आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।

"माँ, आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हो।"

रेखा की आँखों में फिर से नमी आ गई। उन्होंने झुककर उसके माथे पर एक लंबा और गहरा चुंबन दिया।

"और तू मेरी दुनिया का सबसे प्यारा बेटा। सो जा मेरे राजा बेटा, कल फिर एक नया दिन होगा।"

उन्होंने कमरे की लाइट बंद की, लेकिन बाहर निकलने से पहले एक बार फिर मुड़कर अपने सोए हुए बेटे को देखा। उनके चेहरे पर एक दिव्य संतोष था। उन्होंने धीरे से दरवाज़ा बंद किया, और उनके पैरों की पायल की आखिरी छन-छन ने उस रात को ममता की चादर में लपेट दिया।

अगली सुबह, वही सुगंधित चाय की महक घर में फैली। रेखा रसोई में, अपनी बादामी रंग की साड़ी में, लाल बिंदी और मंगलसूत्र के साथ, अपने बेटे के लिए नाश्ता तैयार कर रही थी। पायल की धुन पर उनके हाथ थिरक रहे थे। गौरव की आँखें खुलीं। कमरे में फैलती सुगंध उसे खींचती हुई रसोई तक ले आई, जहाँ माँ का प्रेम हर सुबह की नई शुरुआत करता था।

"माँ, आज क्या बन रहा है?" गौरव ने अपनी नींद भरी आवाज़ में पूछा, रसोई के दरवाज़े पर खड़ा होकर। रेखा ने पलट कर देखा, उनके चेहरे पर वही चिर-परिचित, ममतामयी मुस्कान थी, जिसने गौरव के दिन को एक नई ऊर्जा से भर दिया।

"मेरे लाडले के लिए आज मीठी सेवइयां बन रही हैं," रेखा ने कहा, उनकी आवाज में मिठास घुली हुई थी, जैसे गरम दूध में घुली चीनी। गौरव ने महसूस किया, यह सिर्फ सेवइयां नहीं थीं, माँ का अनमोल प्यार था जो थाली में परोसा जा रहा था।

"वाह माँ! मेरी सबसे पसंदीदा चीज़!" गौरव की आँखों में चमक आ गई, और वह तेज़ी से अपनी कुर्सी पर जा बैठा। रेखा ने उसके सामने गरमागरम सेवइयां रखीं, उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान तैर रही थी, जो उसके हर शब्द के साथ और गहरी होती जा रही थी।
 

Rahul ml

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Ye first thread start Kiya hai Maine kya kami h ya kya aisha kuch h jo or bhi behtar ho sakta h ,apna sujhao awasya de ..
Otherwise comment krke jrur btate kahani kaisi jaa rahi hai himmat badhaye ...
 
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माँ की ममता

सुबह की पहली किरण ने जब खिड़की से झाँका, तो घर में एक चिर-परिचित शांति थी। रेखा रसोई में व्यस्त थीं, उनकी पैरों की पायल की छन-छन पूरे घर में एक मधुर संगीत की तरह गूँज रही थी। हल्के पीले रंग की सूती साड़ी, माथे पर लाल बिंदी और माँग में गहरा सिंदूर—वह साक्षात ममता की मूरत लग रही थीं।

कॉलेज खत्म होते ही गौरव सीधे अपने पिता राजेश की कपड़े की दुकान पर पहुँच गया। दोपहर की धूप तेज़ थी, लेकिन दुकान के भीतर ठंडी हवा और नए कपड़ों की महक फैली थी। गौरव फुर्ती से साड़ियों की तह बना रहा था और ग्राहकों को नए डिज़ाइन्स दिखा रहा था।

"बेटा, वो नीले वाले सूट का स्टॉक चेक कर लेना, कल कुछ ग्राहक पूछ रहे थे।"

राजेश ने चश्मा ठीक करते हुए कहा। गौरव ने मुस्कुराते हुए रजिस्टर उठाया और स्टॉक का मिलान करने लगा।

"हो गया पापा, दस पीस बचे हैं। मैं अभी नए ऑर्डर की लिस्ट बना देता हूँ।"

राजेश ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आँखों में गर्व था। कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ गौरव जिस तरह दुकान की जिम्मेदारी संभालता, वह राजेश के लिए किसी सुकून से कम नहीं था। बिलिंग काउंटर पर बैठते हुए गौरव की उंगलियाँ तेज़ी से चल रही थीं, लेकिन उसके मन में कहीं न कहीं एक बेचैनी थी।

शाम को घर लौटकर गौरव अपने कमरे में किताबों के ढेर के बीच बैठ गया। अगले महीने रेलवे स्टेशन मास्टर की परीक्षा थी। सरकारी नौकरी का दबाव, समाज की उम्मीदें और भविष्य की चिंता—सब कुछ उसके दिमाग में एक शोर की तरह गूँज रहा था। वह बार-बार एक ही पन्ने को पढ़ रहा था, लेकिन शब्द उसकी समझ से बाहर जा रहे थे। उसने सिर पकड़ लिया और एक गहरी आह भरी।

तभी कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला। रेखा हाथ में दूध का गिलास लेकर अंदर आईं। उनकी पायल की वह धीमी आवाज़ गौरव के तनाव को कम करने के लिए काफी थी। उन्होंने देखा कि उनका लाड़ला कितना परेशान है।

"इतना बोझ मत ले मेरे बच्चे। तू बस अपनी मेहनत कर, बाकी सब ऊपर वाले पर छोड़ दे।"

रेखा ने उसके सिर पर हाथ फेरा। उनकी हथेलियों की गर्माहट गौरव के मन को शांत करने लगी।

"माँ, अगर इस बार नहीं हुआ तो? पापा की दुकान तो है, पर मैं चाहता हूँ कि उन्हें गर्व महसूस हो।"

रेखा ने उसे अपने पास खींच लिया और उसके माथे को चूम लिया।

"पापा दुकान चलाते रह गए, पर तू बड़ी सरकारी नौकरी करेगा। मुझे पूरा विश्वास है। मैं तेरे लिए कितनी मन्नतें माँग चुकी हूँ, तुझे पता भी नहीं। मंदिर जाकर मैंने तेरा नाम लिया है। तू बस हिम्मत मत छोड़ना, यह परीक्षा तू ज़रूर निकाल लेगा।"

उनकी आवाज़ में वह विश्वास था जो किसी भी पहाड़ को हिला सकता था। गौरव ने माँ के गले लगकर अपनी सारी थकान उतार दी।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। अगले दिन अचानक गौरव को तेज़ बुखार ने जकड़ लिया। शरीर आग की तरह तप रहा था और सिर में असहनीय दर्द था। दो दिनों तक वह बिस्तर से नहीं उठ पाया। रेखा के लिए यह समय किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था।

वह रात-रात भर जागकर गौरव के पास बैठी रहतीं। हर आधे घंटे में वह उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखतीं। उनकी आँखों में नींद नहीं, बल्कि अपने बेटे के लिए गहरी चिंता थी।

"थोड़ा सा सूप पी ले बेटा, प्लीज। जब तक कुछ खाएगा नहीं, दवाई कैसे असर करेगी?"

गौरव ने आँखें बंद किए सिर हिला दिया। रेखा ने उसे सहारा देकर बिठाया और धीरे-धीरे चम्मच से सूप पिलाने लगीं। उन्हें पता था कि गौरव को सादा दूध पसंद नहीं है, इसलिए उन्होंने बड़ी मेहनत से केसर और बादाम वाला गाढ़ा दूध बनाया था।

"देख, तेरी पसंद का केसर वाला दूध। एक घूँट ले ले, फिर देखना कैसे ताकत आएगी।"

जैसे ही गौरव ने दूध पिया, उसने देखा कि माँ की आँखों के कोर हल्के नम थे। वह अपनी ममता में इतनी डूबी थीं कि उन्हें अपनी थकान का अहसास तक नहीं था। रात के सन्नाटे में जब गौरव की नींद खुलती, तो वह पाता कि रेखा अभी भी उसके पास बैठी हैं, कभी उसका हाथ सहला रही हैं तो कभी धीमी आवाज़ में कोई लोरी जैसा गुनगुना रही हैं।

बुखार के उन धुंधले पलों में गौरव को एक गहरी अनुभूति हुई। उसने महसूस किया कि वह अब तक अपनी दुनिया में खोया था, लेकिन उसकी असली दुनिया तो उसकी माँ है।

'मुझे थोड़ा सा भी कष्ट होता है, तो माँ को कितना दर्द होता है। मैं कितना लापरवाह था कि मैंने कभी उनकी कुर्बानियों को इस तरह नहीं देखा।'

रिकवरी के दौरान, जब बुखार उतरने लगा, गौरव ने पहली बार अपनी माँ को एक अलग नज़रिए से देखा। वह उनके पास बैठी थीं, उनकी साड़ी का पल्लू उनके कंधे से हल्का सा खिसका हुआ था। गौरव की नज़र उनकी गर्दन पर मौजूद उस छोटे से तिल पर पड़ी, जिसे उसने बचपन से देखा था, लेकिन आज वह उसे 'चाँद पर दाग' की तरह महसूस हुआ, जिसने उनकी सुंदरता में चार चाँद लगा दिए थे।

उसकी गोरी, चमकती त्वचा, बड़ी-बड़ी ममतामयी आँखें और वह सौम्य मुस्कान—गौरव को लगा जैसे उसके सामने कोई परी बैठी हो। उनकी साड़ी की सिलवटें, हाथों की कांच की चूड़ियाँ और पैरों की पायल—सब कुछ अद्भुत और पूर्ण लग रहा था। लेकिन इस सुंदरता के ऊपर एक और परत थी—पवित्रता की परत। वह उसके लिए सिर्फ एक सुंदर स्त्री नहीं, बल्कि साक्षात देवी और ममता की मूरत थीं।

"क्या देख रहा है पागल? अभी भी बुखार है क्या? चल, उठ अब।"

रेखा ने उसके गाल को धीरे से थपथपाया।

गौरव ने माँ का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने गाल से लगा लिया। उसकी आँखों में सम्मान और प्रेम के आँसू थे।

"माँ, आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हो। मैं वादा करता हूँ, मैं आपका सिर गर्व से ऊँचा करूँगा।"

रेखा ने मुस्कुराते हुए उसे अपने सीने से लगा लिया। कमरे में फैली वह गर्माहट किसी भी दवा से ज्यादा असरदार थी। गौरव अब शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी मज़बूत महसूस कर रहा था। उसे अपनी मंजिल साफ दिख रही थी, क्योंकि उसके पीछे उसकी माँ की दुआओं का अटूट कवच था। अब वह अपनी पढ़ाई पर दोगुने उत्साह से ध्यान केंद्रित करने को तैयार था, माँ की प्रेरणा उसके हर कदम को शक्ति दे रही थी।

अब उसके मन में कोई संशय नहीं था, बस एक दृढ़ संकल्प था कि वह अपनी माँ के सपनों को पूरा करेगा और उनकी आँखों में खुशी के आँसू लाएगा। अगली सुबह, गौरव एक नई ऊर्जा के साथ उठा, उसके
कदम आत्मविश्वास से भरे थे और उसकी आँखों में एक नई चमक थी।
 

netsunil

मैं काग़ज़ बेरंग.. तू रंगरेज़ मेरे अल्फ़ाज़ों का
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माँ की ममता

सुबह की पहली किरण ने जब खिड़की से झाँका, तो घर में एक चिर-परिचित शांति थी। रेखा रसोई में व्यस्त थीं, उनकी पैरों की पायल की छन-छन पूरे घर में एक मधुर संगीत की तरह गूँज रही थी। हल्के पीले रंग की सूती साड़ी, माथे पर लाल बिंदी और माँग में गहरा सिंदूर—वह साक्षात ममता की मूरत लग रही थीं।

कॉलेज खत्म होते ही गौरव सीधे अपने पिता राजेश की कपड़े की दुकान पर पहुँच गया। दोपहर की धूप तेज़ थी, लेकिन दुकान के भीतर ठंडी हवा और नए कपड़ों की महक फैली थी। गौरव फुर्ती से साड़ियों की तह बना रहा था और ग्राहकों को नए डिज़ाइन्स दिखा रहा था।

"बेटा, वो नीले वाले सूट का स्टॉक चेक कर लेना, कल कुछ ग्राहक पूछ रहे थे।"

राजेश ने चश्मा ठीक करते हुए कहा। गौरव ने मुस्कुराते हुए रजिस्टर उठाया और स्टॉक का मिलान करने लगा।

"हो गया पापा, दस पीस बचे हैं। मैं अभी नए ऑर्डर की लिस्ट बना देता हूँ।"

राजेश ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आँखों में गर्व था। कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ गौरव जिस तरह दुकान की जिम्मेदारी संभालता, वह राजेश के लिए किसी सुकून से कम नहीं था। बिलिंग काउंटर पर बैठते हुए गौरव की उंगलियाँ तेज़ी से चल रही थीं, लेकिन उसके मन में कहीं न कहीं एक बेचैनी थी।

शाम को घर लौटकर गौरव अपने कमरे में किताबों के ढेर के बीच बैठ गया। अगले महीने रेलवे स्टेशन मास्टर की परीक्षा थी। सरकारी नौकरी का दबाव, समाज की उम्मीदें और भविष्य की चिंता—सब कुछ उसके दिमाग में एक शोर की तरह गूँज रहा था। वह बार-बार एक ही पन्ने को पढ़ रहा था, लेकिन शब्द उसकी समझ से बाहर जा रहे थे। उसने सिर पकड़ लिया और एक गहरी आह भरी।

तभी कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला। रेखा हाथ में दूध का गिलास लेकर अंदर आईं। उनकी पायल की वह धीमी आवाज़ गौरव के तनाव को कम करने के लिए काफी थी। उन्होंने देखा कि उनका लाड़ला कितना परेशान है।

"इतना बोझ मत ले मेरे बच्चे। तू बस अपनी मेहनत कर, बाकी सब ऊपर वाले पर छोड़ दे।"

रेखा ने उसके सिर पर हाथ फेरा। उनकी हथेलियों की गर्माहट गौरव के मन को शांत करने लगी।

"माँ, अगर इस बार नहीं हुआ तो? पापा की दुकान तो है, पर मैं चाहता हूँ कि उन्हें गर्व महसूस हो।"

रेखा ने उसे अपने पास खींच लिया और उसके माथे को चूम लिया।

"पापा दुकान चलाते रह गए, पर तू बड़ी सरकारी नौकरी करेगा। मुझे पूरा विश्वास है। मैं तेरे लिए कितनी मन्नतें माँग चुकी हूँ, तुझे पता भी नहीं। मंदिर जाकर मैंने तेरा नाम लिया है। तू बस हिम्मत मत छोड़ना, यह परीक्षा तू ज़रूर निकाल लेगा।"

उनकी आवाज़ में वह विश्वास था जो किसी भी पहाड़ को हिला सकता था। गौरव ने माँ के गले लगकर अपनी सारी थकान उतार दी।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। अगले दिन अचानक गौरव को तेज़ बुखार ने जकड़ लिया। शरीर आग की तरह तप रहा था और सिर में असहनीय दर्द था। दो दिनों तक वह बिस्तर से नहीं उठ पाया। रेखा के लिए यह समय किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था।

वह रात-रात भर जागकर गौरव के पास बैठी रहतीं। हर आधे घंटे में वह उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखतीं। उनकी आँखों में नींद नहीं, बल्कि अपने बेटे के लिए गहरी चिंता थी।

"थोड़ा सा सूप पी ले बेटा, प्लीज। जब तक कुछ खाएगा नहीं, दवाई कैसे असर करेगी?"

गौरव ने आँखें बंद किए सिर हिला दिया। रेखा ने उसे सहारा देकर बिठाया और धीरे-धीरे चम्मच से सूप पिलाने लगीं। उन्हें पता था कि गौरव को सादा दूध पसंद नहीं है, इसलिए उन्होंने बड़ी मेहनत से केसर और बादाम वाला गाढ़ा दूध बनाया था।

"देख, तेरी पसंद का केसर वाला दूध। एक घूँट ले ले, फिर देखना कैसे ताकत आएगी।"

जैसे ही गौरव ने दूध पिया, उसने देखा कि माँ की आँखों के कोर हल्के नम थे। वह अपनी ममता में इतनी डूबी थीं कि उन्हें अपनी थकान का अहसास तक नहीं था। रात के सन्नाटे में जब गौरव की नींद खुलती, तो वह पाता कि रेखा अभी भी उसके पास बैठी हैं, कभी उसका हाथ सहला रही हैं तो कभी धीमी आवाज़ में कोई लोरी जैसा गुनगुना रही हैं।

बुखार के उन धुंधले पलों में गौरव को एक गहरी अनुभूति हुई। उसने महसूस किया कि वह अब तक अपनी दुनिया में खोया था, लेकिन उसकी असली दुनिया तो उसकी माँ है।

'मुझे थोड़ा सा भी कष्ट होता है, तो माँ को कितना दर्द होता है। मैं कितना लापरवाह था कि मैंने कभी उनकी कुर्बानियों को इस तरह नहीं देखा।'

रिकवरी के दौरान, जब बुखार उतरने लगा, गौरव ने पहली बार अपनी माँ को एक अलग नज़रिए से देखा। वह उनके पास बैठी थीं, उनकी साड़ी का पल्लू उनके कंधे से हल्का सा खिसका हुआ था। गौरव की नज़र उनकी गर्दन पर मौजूद उस छोटे से तिल पर पड़ी, जिसे उसने बचपन से देखा था, लेकिन आज वह उसे 'चाँद पर दाग' की तरह महसूस हुआ, जिसने उनकी सुंदरता में चार चाँद लगा दिए थे।

उसकी गोरी, चमकती त्वचा, बड़ी-बड़ी ममतामयी आँखें और वह सौम्य मुस्कान—गौरव को लगा जैसे उसके सामने कोई परी बैठी हो। उनकी साड़ी की सिलवटें, हाथों की कांच की चूड़ियाँ और पैरों की पायल—सब कुछ अद्भुत और पूर्ण लग रहा था। लेकिन इस सुंदरता के ऊपर एक और परत थी—पवित्रता की परत। वह उसके लिए सिर्फ एक सुंदर स्त्री नहीं, बल्कि साक्षात देवी और ममता की मूरत थीं।

"क्या देख रहा है पागल? अभी भी बुखार है क्या? चल, उठ अब।"

रेखा ने उसके गाल को धीरे से थपथपाया।

गौरव ने माँ का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने गाल से लगा लिया। उसकी आँखों में सम्मान और प्रेम के आँसू थे।

"माँ, आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हो। मैं वादा करता हूँ, मैं आपका सिर गर्व से ऊँचा करूँगा।"

रेखा ने मुस्कुराते हुए उसे अपने सीने से लगा लिया। कमरे में फैली वह गर्माहट किसी भी दवा से ज्यादा असरदार थी। गौरव अब शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी मज़बूत महसूस कर रहा था। उसे अपनी मंजिल साफ दिख रही थी, क्योंकि उसके पीछे उसकी माँ की दुआओं का अटूट कवच था। अब वह अपनी पढ़ाई पर दोगुने उत्साह से ध्यान केंद्रित करने को तैयार था, माँ की प्रेरणा उसके हर कदम को शक्ति दे रही थी।

अब उसके मन में कोई संशय नहीं था, बस एक दृढ़ संकल्प था कि वह अपनी माँ के सपनों को पूरा करेगा और उनकी आँखों में खुशी के आँसू लाएगा। अगली सुबह, गौरव एक नई ऊर्जा के साथ उठा, उसके
कदम आत्मविश्वास से भरे थे और उसकी आँखों में एक नई चमक थी।
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Rahul ml

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अँखों का तारा बन गयी माँ

सुबह की पहली किरण ने जब खिड़की के पर्दों को चीरकर कमरे में दस्तक दी, तो घर में एक अजीब सी शांति और पवित्रता घुली हुई थी। रसोई से आती इलायची वाली चाय की खुशबू और हल्की-हल्की बर्तनों की खनखनाहट ने नींद को धीरे से जगाया। गौरव ने अपनी आँखें मलीं और छत की ओर देखते हुए एक गहरी साँस ली। पिछले कुछ दिनों से उसके भीतर कुछ बदल रहा था। वह बदलाव शब्दों में बयां करना मुश्किल था, लेकिन वह महसूस कर सकता था कि उसकी दुनिया का केंद्र अब और भी अधिक गहरा और सघन हो गया था।

वह धीरे से उठकर कमरे से बाहर आया। हॉल में कदम रखते ही उसकी नजर रसोई की चौखट पर खड़ी अपनी माँ, रेखा पर पड़ी। रेखा ने हल्के आड़ू (peach) रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जो उनके गोरे और चमकते बदन पर किसी सुबह की ओस की तरह जच रही थी। साड़ी का पल्लू कमर पर सलीके से खोंसा हुआ था, जिससे उनकी सुडौल काया और भी निखर कर सामने आ रही थी। उनके लंबे काले बाल एक ढीली चोटी में बंधे थे, जिनमें से कुछ लटें उनके माथे और गालों को चूम रही थीं।

गौरव वहीं ठिठक गया। उसने अपनी माँ को हमेशा 'माँ' के रूप में देखा था—वह ममता की मूरत, जो उसकी हर जरूरत का ख्याल रखती थी। लेकिन आज, उसकी नजरें कुछ अलग तलाश रही थीं। उसने देखा कि कैसे रेखा के गले पर वह छोटा सा तिल किसी पूर्ण चंद्रमा पर एक सुंदर दाग की तरह चमक रहा था। उनके चेहरे पर एक अलौकिक तेज था, जो उम्र के साथ और भी गहरा होता गया था। उनकी लाल बिंदी, माँग में भरा सिंदूर और गले में चमकता मंगलसूत्र उनकी सादगी में एक गरिमा जोड़ रहे थे।

"उठ गए मेरे लाडले?"

रेखा ने पलटकर देखा। उनकी बड़ी-बड़ी, अभिव्यंजक आँखों में वही पुराना प्यार था, लेकिन गौरव को उनमें आज एक नई चमक दिखी। जब वह चलीं, तो उनके पैरों की पायल की छन-छन ने पूरे घर में एक संगीत घोल दिया। गौरव ने गौर किया कि माँ की चाल में एक ऐसी गरिमा और शालीनता है, जो उसे किसी और महिला में कभी नहीं दिखी। वह सोचने लगा कि क्या दुनिया की कोई भी लड़की, कोई भी नायिका अपनी माँ की इस सहज सुंदरता का मुकाबला कर सकती है?

उसे अपनी सोच पर एक पल के लिए झिझक हुई। एक अजीब सा अपराधबोध उसके मन में जागा—क्या अपनी माँ को एक सुंदर स्त्री के रूप में देखना गलत है? लेकिन अगले ही पल उस विचार ने एक गहरे सम्मान का रूप ले लिया। उसे महसूस हुआ कि यह आकर्षण केवल शारीरिक नहीं था, बल्कि उस निस्वार्थ प्रेम और समर्पण के प्रति था, जिसने रेखा को इतना सुंदर बनाया था। वह सोचने लगा कि माँ से ज्यादा दुनिया में उसे अब किसी और की जरूरत नहीं है।

रसोई में रेखा बहुत फुर्ती से काम कर रही थीं, लेकिन गौरव की पैनी नजरों ने कुछ नोटिस किया। रेखा के चेहरे पर एक हल्की सी पीलापन था, और उनकी साँसें थोड़ी तेज चल रही थीं। वह बार-बार अपने माथे से पसीना पोंछ रही थीं, लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान कम नहीं हुई थी।

"माँ, आप ठीक तो हैं? चेहरा थोड़ा उतरा हुआ लग रहा है।"

रेखा ने अपनी कलाई की कांच की चूड़ियों को खनकाते हुए गौरव के गाल पर हाथ फेरा। उनके हाथ ठंडे थे, लेकिन स्पर्श में वही गर्माहट थी।

"बस थोड़ा सा सिरदर्द है बेटा, तू चिंता मत कर। जा, हाथ-मुँह धोकर आ, मैंने तेरे लिए पराठे बनाए हैं।"

गौरव ने देखा कि माँ ने खुद चाय का कप नहीं उठाया था। वह चुपचाप अपनी प्लेट लगा रही थीं। गौरव को याद आया कि आज अहोई अष्टमी है। उसने सुना था कि माँएँ अपने बच्चों की लंबी उम्र और सफलता के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं। क्या माँ ने आज व्रत रखा है? लेकिन माँ ने तो कुछ बताया नहीं था।

रेखा ने मन ही मन संकल्प लिया था। उन्होंने यह व्रत पूरी गोपनीयता के साथ रखा था। वह नहीं चाहती थीं कि गौरव को पता चले और वह अपनी पढ़ाई छोड़कर उनकी चिंता करने लगे। रेलवे स्टेशन मास्टर की परीक्षा करीब थी, और रेखा के लिए गौरव की सफलता ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। उन्होंने सुबह सूर्योदय से पहले स्नान किया था, दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाया था और पूरी श्रद्धा के साथ प्रार्थना की थी—"हे माँ, मेरे गौरव को सफलता देना। उसकी राह के सारे कांटे हटा देना। मैं भूखी-प्यासी रह लूँ, पर मेरे बेटे का भविष्य उज्ज्वल हो।"

यह एक निर्जला व्रत था। पानी की एक बूंद भी वर्जित थी। दोपहर होते-होते भूख और प्यास ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। रसोई की गर्मी और घर के काम ने उन्हें शारीरिक रूप से तोड़ दिया था, लेकिन उनका मानसिक संकल्प चट्टान की तरह मजबूत था।

दोपहर के समय, गौरव को अपनी कुछ किताबें और स्टेशनरी लेने बाजार जाना था। जाते समय उसने देखा कि माँ सोफे पर बैठी थीं और उनकी आँखें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं। वह कितनी कमजोर लग रही थीं, फिर भी उनके चेहरे पर वह ममतामयी शांति बनी हुई थी।

"मैं बाजार जा रहा हूँ माँ, कुछ चाहिए आपको?"

रेखा ने अपनी आँखें खोलीं और एक फीकी लेकिन प्यारी मुस्कान दी।

"नहीं बेटा, तू बस जल्दी आना।"

बाजार पहुँचकर गौरव का मन पढ़ाई की किताबों से ज्यादा अपनी माँ के बारे में सोचने लगा। उसने देखा कि एक दुकान पर ताजी मिठाइयाँ और फल सजे हुए थे। उसे याद आया कि माँ को काजू कतली और ताजे अनार बहुत पसंद हैं। उसने सोचा कि माँ ने सुबह से शायद बहुत कम खाया होगा, या शायद वह थकान में भूल गई होंगी। उसने ढेर सारी काजू कतली, ताजे अनार, और कुछ हल्के स्नैक्स खरीदे।

जब वह घर लौटा, तो उसके चेहरे पर एक उत्साह था। उसने देखा कि रेखा अभी भी रसोई में कुछ काम कर रही थीं। वह धीरे से उनके पीछे गया और मिठाई का डिब्बा उनके सामने रख दिया।

"देखो माँ! आपके पसंदीदा काजू कतली और अनार लाया हूँ। जल्दी से खाइए, मुझे लग रहा है आपने सुबह से कुछ नहीं खाया।"

रेखा अचानक चौंक गईं। उन्होंने मिठाई के डिब्बे को देखा और फिर गौरव की उन आँखों को, जिनमें उनके लिए बेपनाह चिंता और प्यार था। उनके गले में एक गोला सा अटक गया। व्रत के नियमों के अनुसार, उन्हें तारों को देखने के बाद ही कुछ ग्रहण करना था।

"नहीं बेटा, मेरा मन नहीं है। तू खा ले।"

गौरव ने डिब्बा और करीब कर दिया।

"माँ, झूठ मत बोलिए। आपका चेहरा देखिए, कितना पीला पड़ गया है। क्या आपने कुछ खाया है आज? प्लीज, थोड़ा सा ही सही, पर खाइए।"

रेखा ने अपनी नजरें झुका लीं। उनकी लंबी पलकें उनके गालों पर छाया बना रही थीं। उन्होंने धीरे से गौरव का हाथ पकड़ा। उनके हाथों की कोमलता ने गौरव के दिल को छू लिया।

"ला दे बेटा, बाद में खा लूँगी... अभी थोड़ा काम बाकी है। तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, ठीक है?"

गौरव को उनकी बात में एक छिपाव महसूस हुआ। वह समझ गया कि माँ कुछ छुपा रही हैं, लेकिन उसने ज्यादा दबाव नहीं डाला। फिर भी, उसके मन में एक बेचैनी घर कर गई। वह बार-बार रसोई की ओर देखता, जहाँ माँ अपनी साड़ी का पल्लू संभालते हुए बर्तनों को व्यवस्थित कर रही थीं।

शाम ढलने लगी थी। घर में धुंधलका छा गया था। गौरव अपनी मेज पर बैठा पढ़ाई कर रहा था, लेकिन उसका ध्यान किताबों के अक्षरों में नहीं, बल्कि बगल के कमरे से आने वाली पायल की आवाज़ों में था। वह देख रहा था कि माँ कैसे धीरे-धीरे चल रही थीं, जैसे उनके पैरों में अब ताकत न बची हो।

वह उठा और चुपके से उनके पास गया। रेखा एक छोटे से स्टूल पर बैठी थीं और चुपचाप अपनी आँखें बंद किए कुछ बुदबुदा रही थीं। वह प्रार्थना कर रही थीं। उनके चेहरे पर एक अजीब सा समर्पण था। गौरव ने देखा कि उनके होंठ सूखे हुए थे और साँसें भारी थीं।

वह बिना कुछ बोले उनके पास बैठा और उनके पैरों को धीरे से सहलाने लगा। रेखा चौंककर जागीं, लेकिन जब उन्होंने गौरव को देखा, तो उनकी आँखों में आँसू छलक आए।

"क्या कर रहा है पागल? जा पढ़, परीक्षा पास है तेरी।"

गौरव ने उनका पैर अपने हाथों में थामे रखा।

"मुझे नहीं पढ़ना अभी। मुझे बस यह देखना है कि मेरी माँ इतनी कमजोर क्यों हो रही है। आप मुझसे कुछ छुपा रही हैं न? क्या आज आपका व्रत है?"

रेखा की चुप्पी ने सब कुछ बयां कर दिया। उन्होंने एक लंबी साँस ली और गौरव के सिर पर हाथ रखा।

"तेरी सफलता के लिए माँ, बस एक छोटा सा व्रत था। अहोई अष्टमी है आज। तू स्टेशन मास्टर बन जाएगा, तो मेरी सारी भूख, सारी प्यास मिट जाएगी।"

गौरव का दिल जैसे धक से रह गया। वह अपनी माँ के त्याग की गहराई को महसूस कर पा रहा था। वह सोचने लगा कि वह कितना स्वार्थी था, जो केवल अपनी पढ़ाई और करियर के बारे में सोच रहा था, जबकि उसकी माँ उसकी सफलता के लिए अपनी देह को कष्ट दे रही थीं। उसे महसूस हुआ कि यह दुनिया की सबसे बड़ी सुंदरता है—एक माँ का अपनी संतान के लिए यह निस्वार्थ समर्पण।

उसने अपना सिर माँ की गोद में रख दिया। रेखा के हाथों ने उसके बालों को सहलाना शुरू किया। उस स्पर्श में जो सुकून था, वह दुनिया के किसी भी ऐशो-आराम से परे था। गौरव ने ऊपर देखा; माँ की आँखों में प्यार का समंदर था। उस पल उसे लगा कि वह अपनी माँ की सुंदरता के सामने छोटा पड़ गया है। उनकी सादगी, उनका त्याग और उनका यह रूप—सब कुछ उसे मंत्रमुग्ध कर रहा था।

"मुझे कुछ नहीं चाहिए माँ, बस आप हमेशा ऐसी ही रहना। आपकी यह ममता ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।"

रात गहरा गई थी। आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे। रेखा ने अंततः तारों को अर्घ्य दिया और अपना व्रत खोला। गौरव ने खुद अपने हाथों से उन्हें पानी का गिलास दिया। जब रेखा ने पहला घूँट पिया, तो उनके चेहरे पर एक ऐसी तृप्ति आई, जैसे उन्होंने दुनिया की सारी खुशियाँ पा ली हों।

रात के खाने के बाद, रेखा बहुत थक चुकी थीं। वह बिस्तर पर लेटी थीं, लेकिन उनकी आँखें अब भी गौरव को देख रही थीं, जो पास ही बैठकर अपनी किताब खोलकर बैठा था, हालांकि उसका ध्यान अब भी माँ पर ही था।

कमरे में मद्धम रोशनी थी। रेखा ने अपनी साड़ी का पल्लू ढीला कर दिया था और उनके बाल तकिए पर बिखरे हुए थे। गौरव ने गौर किया कि नींद के आगोश में जाते हुए भी माँ के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। वह धीरे से उठा और उनके पास जाकर बैठ गया।

उसने देखा कि माँ की साँसें अब नियमित हो रही थीं। उसने धीरे से उनके माथे को चूमा। उस पल गौरव के भीतर भावनाओं का एक ज्वार उमड़ पड़ा। उसे महसूस हुआ कि वह अपनी माँ से केवल प्यार नहीं करता, बल्कि वह उनकी पूजा करता है। उनके प्रति उसका आकर्षण अब एक दिव्य प्रेम में बदल चुका था।

वह सोचने लगा कि जीवन में चाहे कितनी भी उपलब्धियाँ मिलें, लेकिन अगर उसके पास माँ का यह साया न रहा, तो सब कुछ व्यर्थ होगा। उसने धीरे से उनका हाथ पकड़ा और मन ही मन वादा किया कि वह एक दिन उन्हें वह सारी खुशियाँ देगा, जिसकी वह हकदार हैं।

रेखा ने नींद में ही गौरव का हाथ कसकर पकड़ लिया, जैसे वह उसे कभी छोड़ना नहीं चाहती थीं। गौरव वहीं बैठा रहा, चाँद की रोशनी में अपनी माँ के उस शांत और सुंदर चेहरे को निहारता रहा। उसे महसूस हुआ कि उसकी माँ केवल एक स्त्री या एक अभिभावक नहीं, बल्कि उसके जीवन का वह प्रकाश हैं, जो उसे अंधेरों से बाहर निकाल कर एक सही इंसान बनाएंगे।

उस रात, गौरव की आँखों में नींद नहीं थी, बल्कि एक नया संकल्प था। एक ऐसा संकल्प जो उसकी माँ की सुंदरता, उनके त्याग और उनके असीम प्रेम से उपजा था। वह जान गया था कि दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ कोई गहना या चेहरा नहीं, बल्कि एक माँ का वह दिल है जो अपने बच्चे के लिए हर दुख सहने को तैयार रहता है।

सुबह की रोशनी ने गौरव को अपनी माँ की गोद में उसी तरह पाया जैसे वह रात को सोई थी। उसके मन में एक नया अध्याय खुल गया था, जिसमें प्यार, सम्मान और एक अनकही समझ गहराई से समाहित थी।

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अंकों का तारा बन गई एहसास

परीक्षा के वे अंतिम कुछ दिन घर में एक अजीब सी खामोशी और गहरी बेचैनी लेकर आए थे। पूरा घर जैसे गौरव की किताबों के पन्नों में सिमट गया था। दोपहर की उस सुनहरी धूप में, जब बाहर की दुनिया अपनी रफ़्तार से चल रही थी, घर के भीतर समय जैसे ठहर सा गया था। गौरव अपने कमरे में मेज पर झुका हुआ था, उसके चारों ओर नोट्स का ढेर लगा था और बगल में चाय का वह कप रखा था जो अब ठंडा हो चुका था।

तभी कमरे के दरवाजे पर एक हल्की सी दस्तक हुई और पायल की वह चिर-परिचित 'छन-छन' सुनाई दी। रेखा अंदर आईं। उन्होंने हल्के पेस्टल हरे रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जिसका पल्लू सलीके से उनके कंधे पर टिका था। साड़ी के हल्के कपड़े उनके सुडौल शरीर से इस तरह चिपके थे कि उनकी गरिमा और सुंदरता का एक अद्भुत संगम दिख रहा था। उनके चेहरे पर वही चिर-स्थायी ममतामयी मुस्कान थी, और माथे पर लगी लाल बिंदी उनके गोरे चेहरे पर एक चमक बिखेर रही थी।

"बेटा, थोड़ा ब्रेक ले लो। मैंने तुम्हारे लिए बादाम का दूध बनाया है।"

रेखा ने धीरे से गिलास मेज पर रखा। जब वह झुकीं, तो उनके गले पर बना वह छोटा सा काला तिल गौरव की नजरों में आ गया। उनकी गर्दन की त्वचा इतनी चिकनी और गोरी थी कि वह चांदनी की तरह चमक रही थी। उनके शरीर से चंदन और ताजे फूलों की एक हल्की, मदहोश कर देने वाली खुशबू आ रही थी, जो गौरव की एकाग्रता को क्षण भर के लिए भंग कर गई।

गौरव ने नजरें उठाईं और अपनी माँ की उन बड़ी, काजल लगी आँखों में देखा, जिनमें उसके लिए असीम विश्वास और प्यार था।

"बस थोड़ा सा और, माँ। यह टॉपिक खत्म कर लूँ फिर पीता हूँ।"

रेखा ने उसके सिर पर अपना कोमल हाथ रखा। उनकी उंगलियों का स्पर्श रेशम जैसा था। उन्होंने गौरव के बिखरे बालों को धीरे से संवारा। उनके हाथों की कांच की चूड़ियाँ एक-दूसरे से टकराकर एक मधुर संगीत पैदा कर रही थीं।

"ज्यादा तनाव मत लो। तुमने बहुत मेहनत की है। बस अपना मन शांत रखना।"

उनकी आवाज में वह ठहराव और मिठास थी जो गौरव के भीतर के सारे डर को सोख लेती थी। लेकिन रेखा की आँखों के पीछे एक गुप्त चिंता छिपी थी। वह जानती थीं कि यह परीक्षा गौरव के भविष्य के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। वह रात-रात भर जागकर उसके लिए प्रार्थना करती थीं, यह कामना करते हुए कि उनके बेटे का सपना सच हो।

जैसे-जैसे परीक्षा का दिन करीब आया, घर का माहौल और भी संवेदनशील हो गया। रेखा ने अपनी पूरी ऊर्जा गौरव की सेवा में लगा दी। सुबह का नाश्ता, दोपहर का हल्का भोजन और रात का सुकून—सब कुछ उनकी देखरेख में था। वह केवल उसकी माँ नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा बन गई थीं।

आखिरकार, वह सुबह आ ही गई।

भोर का समय था। आसमान में अभी भी हल्का अंधेरा था और ठंडी हवाएं चल रही थीं। रेखा सुबह चार बजे ही उठ गई थीं। उन्होंने स्नान किया और एक हल्के पीले रंग की सूती साड़ी पहनी, जो उनकी रंगत को और भी निखार रही थी। उनके चेहरे पर एक अलग ही तेज था, जैसे किसी बड़े अनुष्ठान की तैयारी हो।

रसोई में वह बहुत सावधानी से तैयारी कर रही थीं। उन्होंने पिछली रात ही दही जमाया था, जो अब बिल्कुल गाढ़ा और मलाईदार हो गया था। उन्होंने एक छोटी कटोरी में दही लिया और उसमें थोड़ी चीनी मिलाई—शुभ शुरुआत के लिए।

जब गौरव अपनी नींद से जागा, तो उसने देखा कि उसकी माँ उसके कमरे के दरवाजे पर खड़ी थीं। उनके चेहरे पर एक दिव्य चमक थी।

"उठ जाओ मेरे लाल। आज तुम्हारा दिन है।"

गौरव ने अंगड़ाई ली और अपनी माँ की ओर देखा। पीले रंग की साड़ी में रेखा किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थीं। उनके खुले काले बाल उनकी कमर तक लहरा रहे थे, और उनके चेहरे की सादगी ने गौरव के दिल में एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी।

नहाने और तैयार होने के बाद, गौरव ने अपनी सफेद शर्ट और काली पैंट पहनी। वह अब एक वयस्क युवक लग रहा था, लेकिन अपनी माँ के सामने वह हमेशा वही छोटा बच्चा था।

रेखा ने पूजा घर में दीया जलाया था। उन्होंने गौरव को अपने पास बुलाया।

"इधर आओ।"

उन्होंने एक छोटी थाली में कुमकुम और अक्षत लिया। गौरव के सामने खड़े होकर उन्होंने बड़े प्यार से उसके माथे पर लाल तिलक लगाया। उनकी उंगलियों का स्पर्श गौरव के माथे पर एक बिजली की तरह दौड़ा। रेखा ने उसकी आरती उतारी, और उनके चेहरे पर वह संतोष था जो केवल एक माँ के चेहरे पर होता है।

"जाओ और दुनिया को दिखा दो कि मेरा बेटा क्या कर सकता है।"

गौरव ने झुककर अपनी माँ के पैर छुए। जैसे ही उसने अपने सिर को उनके पैरों पर रखा, उसकी नजर रेखा के पैरों पर पड़ी। उनके पैर अत्यंत सुंदर, गोरे और कोमल थे। टखनों पर बंधी वह चांदी की पायल और एक काला धागा, जो उनकी गोरी त्वचा पर साफ उभर कर दिख रहा था। उनके पैरों की उंगलियों की वह मासूमियत और त्वचा की वह मखमली चमक गौरव को सम्मोहित कर गई।

एक पल के लिए, गौरव के भीतर एक तीव्र, अनियंत्रित इच्छा जागी। उसका मन हुआ कि वह अपनी माँ की साड़ी और पेटीकोट को थोड़ा और ऊपर उठा दे, उन सुंदर पैरों को और करीब से देखे, शायद उन्हें छुए। यह विचार इतना अचानक और शक्तिशाली था कि उसका दिल जोर से धड़कने लगा। लेकिन अगले ही पल, अपराधबोध की एक लहर उसके भीतर उठी।

'यह मेरी माँ हैं...'

उसने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं और सम्मान के साथ उनके पैरों से अपना सिर हटाया। रेखा ने उसकी इस आंतरिक उथल-पुथल से अनजान, झुककर उसके माथे को चूम लिया। उस चुंबन में वह सारी ममता, सुरक्षा और आशीर्वाद था जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था।

"जीते रहो, खुश रहो।"

गौरव ने अपना बैग उठाया और घर से निकला, लेकिन उसके दिमाग में अभी भी अपनी माँ की वह खुशबू और उनके पैरों की वह छवि बसी हुई थी।

रेलवे स्टेशन मास्टर की परीक्षा का केंद्र एक बड़ा सरकारी स्कूल था। जब गौरव वहां पहुँचा, तो भीड़ और शोर ने उसकी घबराहट बढ़ा दी। परीक्षा हॉल के अंदर का माहौल बहुत गंभीर था। चारों ओर सन्नाटा था, केवल घड़ियों की टिक-टिक और पेन के चलने की आवाजें सुनाई दे रही थीं।

जब प्रश्न पत्र उसके सामने आया, तो पहले कुछ मिनटों के लिए उसका दिमाग सुन्न हो गया। उसे लगा जैसे वह सब कुछ भूल गया है। उसका गला सूख रहा था और हाथ कांप रहे थे। तभी उसे अपनी माँ का वह चेहरा याद आया—वह विश्वास भरी मुस्कान, वह माथे पर लगाया गया तिलक और वह कोमल स्पर्श।

उसने आँखें बंद कीं और एक गहरी सांस ली। उसे महसूस हुआ कि उसकी माँ का आशीर्वाद उसके साथ है, जैसे वह साये की तरह उसके बगल में खड़ी हों।

धीरे-धीरे, उसके दिमाग के बंद दरवाजे खुलने लगे। उसने एक-एक करके सवालों के जवाब देना शुरू किया। गणित के कठिन सवाल हों या सामान्य ज्ञान की पेचीदगियां, उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसकी माँ की प्रेरणा उसे सही उत्तरों की ओर ले जा रही है। परीक्षा के दौरान कई बार उसका ध्यान भटकता, लेकिन जैसे ही वह अपनी माँ के बारे में सोचता, उसकी एकाग्रता वापस लौट आती।

तीन घंटे कैसे बीते, उसे पता ही नहीं चला। जब घंटी बजी, तो उसने राहत की एक लंबी सांस ली। उसने अपना पेपर जमा किया और हॉल से बाहर निकला। सूरज अब पूरी तरह ऊपर आ चुका था, लेकिन गौरव के मन में एक सुकून था।

जैसे ही वह घर पहुँचा, उसने देखा कि रेखा दरवाजे पर ही उसका इंतजार कर रही थीं। उनके चेहरे पर चिंता और उत्सुकता का मिश्रण था।

"कैसा हुआ बेटा?"

गौरव ने दौड़कर अपनी माँ को गले लगा लिया। उसने अपना चेहरा उनकी साड़ी के पल्लू में छिपा लिया। वह खुशबू, वह गर्माहट—उसे लगा कि वह दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह पर है।

"बहुत अच्छा हुआ, माँ! मुझे पूरा यकीन है कि मेरा सिलेक्शन हो जाएगा।"

रेखा की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। उन्होंने उसे अपनी बाहों में और कस लिया।

"मुझे पता था। मेरा बेटा कभी असफल नहीं हो सकता।"

अंदर जाकर, गौरव ने उन्हें परीक्षा की हर एक छोटी बात बताई। उसने बताया कि कैसे वह शुरू में घबराया था, कैसे उसे उनकी याद आई और कैसे उसने कठिन सवालों को हल किया। रेखा पूरी तन्मयता से उसकी बातें सुन रही थीं। वह बीच-बीच में मुस्कुरातीं और गौरव के हाथों को सहलातीं।

"अब बस नतीजों का इंतजार है। भगवान सब अच्छा करेंगे।"

अगले कुछ दिन प्रतीक्षा की अग्नि में जलने जैसे थे। घर में एक अजीब सी बेचैनी व्याप्त थी। गौरव कोशिश करता कि वह सामान्य रहे, लेकिन उसके मन में भी संदेह और उम्मीद की जंग चल रही थी। वहीं रेखा की स्थिति और भी नाजुक थी। वह अब और भी अधिक धार्मिक हो गई थीं। वह रोज सुबह मंदिर जातीं, लंबी प्रार्थनाएं करतीं और चुपचाप मन ही मन मन्नतें मांगती थीं।

वह अक्सर खिड़की के पास खड़ी होकर आकाश को देखतीं, जैसे वहां से कोई संकेत मिल जाएगा। उनकी वह खामोश प्रार्थनाएं गौरव को महसूस होती थीं। वह देखता था कि कैसे उसकी माँ उसके भविष्य के लिए खुद को मानसिक रूप से झोंक रही थीं।

एक शाम, जब सूरज ढल रहा था और आसमान में नारंगी और बैंगनी रंगों की छटा बिखरी हुई थी, गौरव के मन में घुटन महसूस होने लगी। वह अपने कमरे से निकला और ताजी हवा के लिए छत पर चला गया।

छत पर सन्नाटा था। वह रेलिंग के पास खड़ा होकर दूर क्षितिज को देख रहा था। वह सोच रहा था कि यदि उसका चयन हो गया, तो वह अपनी माँ के जीवन को और भी बेहतर कैसे बना पाएगा। वह उन्हें दुनिया की हर खुशी देना चाहता था।

तभी, अचानक मौसम ने करवट ली।

शांत हवाएं अचानक तेज झोंकों में बदल गईं। आसमान में काले बादलों का डेरा जम गया और देखते ही देखते बिजली कड़कने लगी। एक जोरदार गर्जना हुई और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। हवा इतनी तेज थी कि छत पर रखी कुछ चीजें इधर-उधर उड़ने लगीं।

गौरव ने घबराकर नीचे जाने का सोचा, लेकिन तभी उसकी नजर कपड़ों की रस्सी पर पड़ी। वहां रेखा के कई कपड़े सूख रहे थे।

"ओह नहीं! माँ के सारे कपड़े भीग जाएंगे।"

वह तुरंत रस्सी की ओर भागा। बारिश इतनी तेज थी कि कुछ ही सेकंड में वह पूरी तरह भीग गया। उसकी शर्ट उसके शरीर से चिपक गई थी। उसने जल्दी-जल्दी कपड़े उतारना शुरू किया।

सबसे पहले उसने रेखा की साड़ियाँ उठाईं। एक आसमानी नीले रंग की साड़ी, एक पीच रंग की, और एक पिस्ता हरे रंग की। वे सूती साड़ियाँ थीं, लेकिन बारिश की बूंदों से भीगकर वे भारी और रेशमी महसूस हो रही थीं। जब उसने उन साड़ियों को समेटा, तो उसे उनमें अपनी माँ की वही चिर-परिचित खुशबू आई, जो अब बारिश की मिट्टी की सोंधी महक के साथ मिल गई थी।

फिर उसने उनके ब्लाउज और पेटीकोट उठाए। कपड़ों की वह कोमलता और उनका आकार गौरव के मन में अपनी माँ की शारीरिक छवि को और स्पष्ट कर रहा था। वह अनजाने में ही उन कपड़ों को महसूस कर रहा था।

तभी, रस्सी के एक कोने पर उसे कुछ छोटा और हल्का दिखाई दिया।

जब उसने उसे हाथ लगाया, तो उसकी धड़कनें अचानक तेज हो गईं। वह रेखा के अंतःवस्त्र थे—एक ब्रा और एक पैंटी।

गौरव जैसे पत्थर का हो गया। उसने उन कपड़ों को अपने हाथों में लिया। पैंटी एक साधारण नीले रंग की थी, बिल्कुल नई, और उसका आकार और बनावट इतनी सटीक थी कि गौरव का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने देखा कि उस पर साइज '85' लिखा था।

उसके दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वह अपनी माँ के इतने निजी वस्त्रों को इस तरह छुएगा। यह एक ऐसा अनुभव था जिसने उसे पूरी तरह हिला कर रख दिया। उसकी नजरें उस नीले कपड़े पर जमी थीं, और उसका मस्तिष्क उन कल्पनाओं में खो गया जिन्हें वह अब तक दबाता आया था।

बारिश अब और भी भीषण हो चुकी थी। गौरव वहीं खड़ा था, पूरी तरह भीगा हुआ, उसके हाथ में अपनी माँ की सबसे निजी वस्तु थी। एक अजीब सा, अनियंत्रित आवेग उसके भीतर उठा। बिना सोचे-समझे, उसने उस नीली पैंटी को अपने चेहरे के करीब लाया और एक गहरी सांस ली।

उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

वह खुशबू... वह केवल कपड़े की खुशबू नहीं थी। वह उसकी माँ के शरीर की, उनकी त्वचा की, उनके सबसे निजी अंगों की खुशबू थी। वह गंध इतनी तीव्र और मादक थी कि गौरव को लगा जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में पहुँच गया हो। उसके भीतर एक भीषण युद्ध छिड़ गया।

एक तरफ वह बेटा था, जिसके लिए उसकी माँ ईश्वर का रूप थीं, जिसकी ममता ने उसे पाला था, जिसके चरणों में वह सिर झुकाता था। और दूसरी तरफ वह एक युवक था, जिसके भीतर दबी हुई वासना और आकर्षण अब विस्फोट कर रहे थे।

'यह मेरी माँ की पैंटी है... वह हिस्सा जो उनके शरीर के सबसे करीब रहता है... उनका जन्मस्थान...'

यह विचार उसके मस्तिष्क में गूंजने लगा। उसे अपनी इस इच्छा पर घृणा महसूस हुई, लेकिन साथ ही एक ऐसा आकर्षण था जिसे वह चाहकर भी नहीं रोक पा रहा था। वह उस सुगंध में खो गया। उसे महसूस हुआ कि इस दुनिया में उसकी माँ से अधिक सुंदर, कोमल और पूर्ण कोई और नहीं हो सकता। उनकी ममता और उनकी देह का यह संगम उसके लिए एकforbidden स्वर्ग जैसा था।

वह वहीं खड़ा रहा, बारिश की बूंदें उसके चेहरे पर गिर रही थीं, लेकिन उसका पूरा ध्यान उस छोटे से नीले कपड़े पर था। उसके भीतर का अपराधबोध अब एक गहरे जुनून में बदल रहा था। उसने महसूस किया कि वह अपनी माँ से केवल प्यार नहीं करता, बल्कि वह उनकी सुंदरता और उनके अस्तित्व के प्रति एक गहरा, अनकहा खिंचाव महसूस करता है।

उसकी सांसें तेज हो गई थीं। उसका पूरा शरीर कांप रहा था—ठंड से नहीं, बल्कि उस उत्तेजना से जो उसके भीतर उठी थी। उसने अपनी आँखें खोलीं और आसमान की ओर देखा। बिजली कड़की, और उस रोशनी में उसे अपनी माँ का वह चेहरा याद आया जो उसे हमेशा प्यार से देखता था।

अचानक, उसे अपनी स्थिति का एहसास हुआ। वह पूरी तरह भीग चुका था और उसके हाथ में वह वस्त्र थे जिन्हें देखकर कोई भी उसे गलत समझ सकता था।

"गौरव! बेटा! कहाँ हो तुम? जल्दी नीचे आओ, बहुत तेज बारिश हो रही है!"

नीचे से रेखा की आवाज आई। उनकी आवाज में वही चिंता और ममता थी।

उस आवाज ने गौरव को उसके भ्रम से जगाया। उसने झटके से सारे कपड़ों को एक पोटली की तरह समेटा और तेजी से सीढ़ियों की ओर भागा। उसके दिल की धड़कनें अभी भी सामान्य नहीं हुई थीं।

जब वह नीचे पहुँचा, तो रेखा लिविंग रूम में खड़ी थीं। उन्होंने उसे इस हालत में देखा तो घबरा गईं।

"हे भगवान! तुम पूरी तरह भीग गए हो! पागल हो क्या? कपड़े उतारने के लिए मुझे बुलाना चाहिए था।"

वह तुरंत एक तौलिया लेकर आईं और गौरव के सिर और चेहरे को पोंछने लगीं। गौरव चुपचाप खड़ा रहा। वह अपनी माँ की आँखों में देख नहीं पा रहा था। उसे लग रहा था कि उसकी आँखों में वह राज लिखा है जो उसने अभी छत पर महसूस किया था।

रेखा का स्पर्श, उनकी चिंता, और उनके हाथों की वह गर्माहट गौरव को और भी बेचैन कर रही थी। उसने महसूस किया कि अब उसका रिश्ता अपनी माँ के साथ केवल ममता का नहीं रहा। इसमें एक नई, जटिल और खतरनाक भावना जुड़ गई थी।

"चलो, जल्दी से कपड़े बदलो, वरना जुकाम हो जाएगा।"

रेखा ने उसे धक्का देते हुए कमरे की ओर भेजा। गौरव अपने कमरे में गया और उसने कपड़े बदले, लेकिन उसका मन अभी भी छत पर था। उसने उन भीगे हुए कपड़ों को वॉशिंग मशीन में डाल दिया, लेकिन वह नीला कपड़ा... उसकी खुशबू अब भी उसकी नासिकाओं में बसी हुई थी।

उसने खिड़की से बाहर गिरती बारिश को देखा और एक गहरी सांस ली। वह जानता था कि अब कुछ बदल गया है। वह अब भी अपनी माँ से उतना ही प्यार करता था, उनका उतना ही सम्मान करता था, लेकिन अब उसके भीतर एक ऐसा रहस्य था जिसे वह कभी किसी को नहीं बता पाएगा।

उस रात, जब वह सोया, तो उसकी नींद में केवल एक ही छवि थी—पीले रंग की साड़ी में लिपटी उसकी सुंदर माँ और बारिश की बूंदों के बीच वह नीला अहसास। गौरव का दिल अब एक नए द्वंद्व की दहलीज पर खड़ा था, जहाँ ममता और आकर्षण की सीमाएं धुंधली हो रही थीं।

अगले दिन सुबह, चाय की चुस्कियों के बीच, राजेश ने अखबार से नज़रें उठाईं।

"गौरव, कल परीक्षा कैसी रही? तेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं था," राजेश ने अपनी आवाज में सामान्य जिज्ञासा दर्शाई।

गौरव ने कप से गर्म चाय का एक घूंट भरा, उसकी निगाहें माँ पर टिकी थीं जो कमरे में कांच के बर्तन व्यवस्थित कर रही थीं।

"ठीक
 
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