काफी समय से आपकी कहानी एपिसोड दर एपिसोड पढ़ रहा था पर प्रतिक्रिया तब देना चाहता था जब कहानी एक मुकम्मल पड़ाव पर हो..
बहुत समय बाद कोई ऐसी कहानी मिली है जो सीधे दिमाग पर असर करती है। यह कहानी अपने प्लॉट या ट्विस्ट से आगे निकलकर आपके रचनात्मक दिमाग का परिचय देती है, जिसने इसे गढ़ा है।
कहानी में आपने एक बेहद निर्मम और पारदर्शी दुनिया रची है। कविता के किरदार को आपने पागल की जगह एक टूटा हुआ इंसान बनाया है और यही कहानी को अलग स्तर पर ले जाता है। किसी कैरेक्टर को साइको दिखाना आसान काम है। उससे अजीब हरकतें करवा लो या बिना बात चीखने-चिल्लाने दो। पर आपने कविता को एक इतिहास, एक बचपन और एक गहरा दर्द दिया है। जब वह सालों बाद वीरू के सीने पर सिर रखकर सोती है, तो उस पल में एक इंसान की पूरी ज़िंदगी की थकान नज़र आती है। वह सुकून और नींद बिना किसी मेलोड्रामा के बहुत कुछ कह जाती है।
वीरू एक जिगोलो, जुआरी और चोर है। पर स्टीरियोटाइप जरा भी नहीं लगता। कविता की आवाज़ सुनते ही उसका दिल पर हाथ रख लेना.. औरतों को अपना जिस्म बेचने वाले इस आदमी के अंदर भी कहीं कुछ कच्चा और मासूम बचा हुआ है। वह किसी की आवाज़ पर ठिठक जाता है। इस विरोधाभास को बिना किसी स्पष्टीकरण के छोड़ देना ही इस किरदार की असली ताकत है।
वह दृश्य जहाँ कविता अपनी योनि को नई दोस्त कहकर वीरू से मिलवाती है, वह मुझे बेहद असरदार लगा। यहाँ सेक्स शारीरिक जरूरत से आगे बढ़कर एक बच्ची का खेल बन गया है, जो प्यार पाने और किसी को अपने करीब बांधने की एक हताश कोशिश कर रही है। इस दृश्य में जो हवस खोजेगा, वह एक सतही पाठक ही हो सकता है। असल में वह एक ऐसी लड़की है जो प्यार को कैद करना जानती है पर उसे पनपने देना नहीं जानती। वह वीरू को जितना बांधती है, खुद भी उसी कैद में घुटती है।
रूपा का किरदार भी शानदार ग्रे शेड में लिखा है। वह पूरी तरह खलनायिका या मददगार के खांचे में फिट नहीं होती। वह एक औरत से प्यार भी करती है, चिढ़ती भी है और बचाती भी है। कविता के साथ लेस्बियन दृश्य और उसके बाद वीरू को कविता के शरीर के बारे में बताने वाले हिस्से में एक अजीब से विकृत मातृत्व की छाया नजर आती है। जैसे कोई माँ अपनी बेटी को सुहागरात के लिए तैयार कर रही हो। आपने रूपा को एक साधारण साइड कैरेक्टर से कहीं ऊपर उठा दिया है।
कहानी का सबसे व्यक्तिगत और झकझोरने वाला हिस्सा कविता का रोना है। एनल सेक्स के बाद जब वह टूटकर फर्श पर गिरती है, तो आपने उस दर्द को केवल लिखकर खत्म नहीं किया। आप उसकी हिचकी, कफ, सिसकियों और दीवार का सहारा लेने तक की बारीकियों में गए। किरदारों का दर्द कहानी का अस्त्र होने के बजाय उनका स्वाभाविक हिस्सा बन गया।
कुछ जगहों पर कहानी एक लूप में फंसती दिखती है। वीरू का बंधना, कविता का उसे छेड़ना और फिर से बंधना, यह पैटर्न बीच-बीच में अपनी ताजगी खो देता है। हो सकता है यह जानबूझकर किया गया हो क्योंकि कविता खुद भी एक ही पैटर्न में जी रही है जहाँ प्यार की तड़प, डर और फिर वही कोशिश बार-बार होती है। लेकिन एक पाठक के तौर पर कभी-कभी मन करता है कि यह चक्र टूटे।
कविता का एक मशहूर RJ होना और उस आवाज़ को कभी सीधे न सुनाना आपकी एक बहुत स्मार्ट चाल है। असल में कहानी उस आवाज़ की है ही नहीं, कहानी उस इंसान की है जिसे कभी सुना ही नहीं गया।
आपने सेक्स को हथियार, भाषा, बहाना और दवा सब कुछ बना दिया है। कविता के लिए यह प्यार पाने की ज़िद है, वीरू के लिए पैसा और रूपा के लिए नियंत्रण। सबसे अच्छी बात यह है कि आप इन तीनों को कोई नैतिक चश्मा पहनाकर जज नहीं करते, आप बस उनकी ज़रूरतें बेपर्दा करते हैं।
यह कहानी अपनी अस्थिरता में बेहद स्थिर है। कविता जितनी विक्षिप्त है, उतनी ही समझदार भी है। उसे प्यार करना मुश्किल है पर उससे नफरत करना नामुमकिन है। लिखते रहिए। यह कहानी जितनी खुरदरी है उतनी ही जीवंत भी है। यह ज़ेहन में अटकने वाली कहानी है।
ऐसे ही लिखते रहिए..
सस्नेह सविनय..
वखारिया