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Adultery सरिस्का: एक परिवर्तन की कहानी

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Sariska55

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सरिस्का रसोई में खड़ी थी। हाथ में गीला कपड़ा था, लेकिन बर्तन धोने का मन नहीं था। कान कमरे की तरफ थे—रामबहादुर की भारी आवाज, विनय की कांपती हुई लाचार सहमति। हर शब्द उसके जिस्म में उतर रहा था।
मन के अंदर उथल-पुथल मची हुई थी।
नफरत अभी भी जिंदा थी। यही वो आदमी था जिसकी बदनामी की वजह से उसके मां-बाप ने रिश्ते तोड़ दिए थे। काला, डरावना, जेल का भूत। बचपन से सुनी हुई कहानियां—गुंडागर्दी, मारपीट, औरतें… सब याद आ रही थीं। लेकिन अब वही आदमी उनके सिर पर छत बनकर खड़ा था। खाना उसी का, दवाई उसी की, किराया उसी का। नफरत के साथ-साथ एक गहरी मजबूरी भी बैठ गई थी।
और उसके नीचे… शरीर की भूख।
पतली नाइटी में उसका जिस्म तन रहा था। 36 के स्तन भारी थे, निपल्स कपड़े से रगड़ खाकर कड़े हो चुके थे। नीचे 38 की मोटी गांड हर छोटे मूवमेंट पर लहरा रही थी। विनय के बेजान लिंग की याद आते ही योनि में हल्की सी जलन सी होने लगती। महीने बीत गए सेक्स हुए। शरीर भूल नहीं पाया था। रामबहादुर की मोटी उंगलियां जब पानी के जग लेते समय छू गई थीं, तो जैसे करंट सा लग गया था। वह पीछे हट गई थी, लेकिन अंदर कुछ और हुआ था—योनि की दीवारें हल्की सिकुड़ गई थीं।
“जो आप कहेंगे चाचा… वही सही है।”
उसने जो शब्द कहे थे, वे मुंह से निकले थे, लेकिन मन में और बातें घूम रही थीं।
क्या वह सच में मान गई है? या सिर्फ मजबूरी है?
उसकी निगाह जब स्तनों और गांड पर रुकी थी, तो सरिस्का ने महसूस किया था। डरावनी निगाह। वजनदार। जैसे वह पहले से ही कुछ तय कर चुका हो। डर लगा था… और उसके साथ एक अजीब सी, गंदी सी उत्तेजना भी। शर्म आ रही थी खुद पर। पति बगल वाले कमरे में लाचार पड़ा है, और वह खुद इस काले, तगड़े आदमी की निगाह से गीली हो रही है।
रसोई का बल्ब मंद था। उसने सांस गहराई से ली। नाइटी के अंदर पसीना चिपका हुआ था। जांघों के बीच हल्की नमी महसूस हुई। उसने पैर भींच लिए।
“शर्म कर… पागल औरत…” मन ने डांटा।
लेकिन शरीर नहीं माना।
बाहर से रामबहादुर की खरखराती खांसी आई। शराब की बोतल की आवाज। विनय की खामोशी।
सरिस्का ने आंखें बंद कीं।
नफरत, डर, मजबूरी, और एक दबी हुई कामुक भूख—सब एक साथ उसके सीने में धड़क रहे थे। गांव का यह छोटा मकान अब सिर्फ रहने की जगह नहीं रह गया था। यह एक जाल बन चुका था, जिसमें उसका जिस्म पहले से ही फंसने लगा था।

सरिस्का के मन की गहराई अंधेरी और गीली थी—जैसे कोई पुराना कुआं, जिसमें कई परतें एक साथ सड़ रही हों।
सबसे ऊपर थी नफरत।
काली, मोटी, पुरानी नफरत। रामबहादुर का नाम सुनते ही उसके जिस्म में पहले सिहरन होती थी, फिर गुस्सा। यही आदमी था जिसकी बदनामी ने उसके मां-बाप को पागल बना दिया था। “उस खानदान में शादी मत कर… गुंडे हैं, जेलिया हैं, औरतें बेचते हैं…” सालों तक यही सुना था। शादी के बाद भी जब भी कोई रिश्तेदार उसका नाम लेता, सरिस्का का चेहरा तमतमा जाता। अब वही आदमी उनके घर का मालिक बनकर बैठा था। तंबाकू थूकता, शराब पीता, और हुक्म चलाता। नफरत अभी भी जिंदा थी—लेकिन अब वह नफरत के ऊपर एक और परत चढ़ चुकी थी। मजबूरी की।
मजबूरी गहरी थी।
विनय का बेजान शरीर, कंपनी का धोखा, किराए का नोटिस, बेटे का भविष्य… सबने उसे इस काले आदमी के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। “जो आप कहेंगे चाचा…” कहते समय उसकी आवाज कांपती थी, लेकिन अंदर कुछ और टूटता था। गर्व टूटता था। स्त्री होने का वह अहंकार टूटता था जो कभी लव मैरिज करके घरवालों से बगावत करने में दिखा था। अब वह बगावत की जगह सिर्फ सिर झुकाए खड़ी रहती।
और सबसे नीचे, सबसे गंदी परत थी—शरीर की भूख।
माह भर से ज्यादा हो गए थे। विनय का लिंग मरा हुआ पड़ा रहता। छूने से भी कोई हरकत नहीं। सरिस्का रात भर करवटें बदलती। स्तन भारी हो जाते, निपल्स चादर से रगड़ खाकर तन जाते, जांघों के बीच नमी फैल जाती। वह खुद को छूती—धीरे से, शर्म से, गुस्से से। उंगलियां गीली हो जातीं, लेकिन संतुष्टि नहीं मिलती। भूख और गहरी हो जाती।
अब रामबहादुर की मौजूदगी ने उस भूख को और उलझा दिया था।
जब वह पानी देने गई थी, और उसकी मोटी काली उंगलियां छू गई थीं—तो योनि ने सिकुड़कर जवाब दिया था। शर्मनाक जवाब। डरावना जवाब। वह पीछे हटी थी, लेकिन शरीर आगे बढ़ना चाहता था। उसकी निगाह जब स्तनों पर रुकी, फिर गांड पर ठहरी, तो सरिस्का को लगा जैसे कोई गरम लोहा उसकी त्वचा पर रख दिया गया हो। डर लगा… और उसके साथ एक गंदी सी, मीठी सी लहर भी।
मन के अंदर आवाजें चल रही थीं—
“यह गुंडा है… जेलिया है… तेरे पति का चाचा है…”
“लेकिन तगड़ा है… काला है… हाथ मोटे हैं… शायद जोर से पकड़े…”
“शर्म कर रांडे… पति बगल में पड़ा है…”
“पति तो अब कुछ दे नहीं सकता… तू कब तक सूखी रहेगी…”
ये आवाजें रात भर चलतीं।
सरिस्का खुद से नफरत करती। खुद को गंदी कहती। लेकिन जब अंधेरे में लेटी रहती, और रामबहादुर के कमरे से शराब की बोतल की आवाज आती, तो उसकी गांड अपने-आप तन जाती। जैसे कोई बुला रहा हो। जैसे कोई भारी शरीर उसके ऊपर आने वाला हो।
वह आंखें भींच लेती।
विनय का चेहरा याद करती—लाचार, शर्मिंदा, टूटा हुआ।
फिर रामबहादुर का चेहरा आ जाता—काला, कठोर, तंबाकू भरा मुंह, डरावनी आंखें।
दोनों चेहरों के बीच उसकी योनि धड़कने लगती।
गहराई में जाकर देखो तो सरिस्का अब सिर्फ एक दुखी पत्नी नहीं रह गई थी।
वह एक भूखी औरत बन चुकी थी—जिसके अंदर नफरत और वासना एक ही बिस्तर पर सो रहे थे।
और गांव का यह छोटा मकान, तीन कमरों वाला, धीरे-धीरे उस भूख को और पाल रहा था।

विनय का व्यक्तित्व एक नरम, जिम्मेदार लेकिन अब पूरी तरह टूटे हुए पुरुष का है। एक्सीडेंट से पहले और बाद की उसकी स्थिति में भारी अंतर आ चुका है, और यही अंतर उसके पूरे व्यक्तित्व को परिभाषित करता है।

विनय जन्म से ही दबंग या हावी रहने वाला पुरुष नहीं था। गोरा, सुंदर चेहरा, कमजोर शरीर और छोटी मर्दाना क्षमता—इन सबने उसे स्वभाव से ही नरम बना दिया था। वह झगड़ा नहीं करता था, रौब नहीं जमाता था। लव मैरिज करना उसका सबसे बड़ा साहसिक फैसला था, लेकिन उसके बाद भी वह संघर्ष से ज्यादा समझौता करने वाला रहा। उसकी मर्दानगी कभी शारीरिक शक्ति या दबंगई पर टिकी नहीं थी।

एक्सीडेंट से पहले वह अपनी जिम्मेदारियों को समझता था। नौकरी, पत्नी, बच्चा—सब संभालने की कोशिश करता था। सेक्स कम होने पर भी वह दोषी महसूस करता था, भले ही सरिस्का शिकायत न करे। यह दोषभाव उसके व्यक्तित्व का गहरा हिस्सा है। वह खुद को “पूरा मर्द” नहीं मानता था, और अब तो बिल्कुल नहीं मानता।

अब उसका व्यक्तित्व लगभग पूरी तरह लाचारी में डूब चुका है। व्हीलचेयर, बेजान लिंग, नौकरी का छिनना—इन सबने उसे अंदर से तोड़ दिया है। वह विरोध नहीं करता। चाचा जो कहते हैं, सिर हिला देता है। “हम बोझ बन गए हैं” जैसे वाक्य उसके मुंह से बार-बार निकलते हैं। यह आत्म-समर्पण अब उसकी आदत बन गई है। वह लड़ना नहीं चाहता, क्योंकि लड़ने की ताकत और इच्छा दोनों खत्म हो चुकी हैं।

विनय के व्यक्तित्व का सबसे दर्दनाक पहलू है—शर्म। वह अपनी पत्नी के सामने शर्मिंदा है कि वह अब कुछ नहीं दे सकता—न शरीर, न पैसा, न सुरक्षा। चाचा के सामने शर्मिंदा है कि वह बोझ बनकर रह गया है। बच्चे के सामने शर्मिंदा है कि वह पिता जैसी छवि नहीं दे पा रहा। यह शर्म उसे चुप बना देती है। वह बात कम करता है, नजरें चुराता है, और खुद को छोटा महसूस करता है।

अब वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो चुका है—पहले सरिस्का पर, अब रामबहादुर पर। यह निर्भरता उसके व्यक्तित्व को और निष्क्रिय बना रही है। वह फैसले नहीं लेता, बस स्वीकार करता है। गांव आने का फैसला हो, चाचा की बातें हों, या घर का माहौल—वह बस मूक दर्शक बना रहता है। उसकी चुप्पी अब सिर्फ शर्म नहीं, बल्कि हार की स्वीकृति भी है।

हालांकि वह खुलकर कुछ नहीं कहता, लेकिन अंदर एक दबी हुई ईर्ष्या और असहायता जरूर है। जब चाचा सरिस्का को देखते हैं, जब वह हुक्म चलाते हैं, जब सरिस्का सिर झुकाकर जवाब देती है—तो विनय सब देखता है। विरोध करने की क्षमता न होने के कारण यह भावनाएं उसके अंदर ही सड़ती रहती हैं। वह गुस्सा नहीं कर सकता, इसलिए खुद को और छोटा महसूस करता है।

विनय के अंदर अभी भी पत्नी और बच्चे के प्रति कोमलता बची हुई है। वह उन्हें बोझ नहीं बनाना चाहता, पर बन चुका है। यह कोमलता अब उसकी मजबूरी बन गई है। वह सरिस्का को स्वतंत्र नहीं देखना चाहता, लेकिन खुद उसे सुरक्षा देने की स्थिति में भी नहीं है।
कुल मिलाकर
विनय अब एक ऐसे पुरुष के रूप में बच गया है जिसने हार स्वीकार कर ली है। नरम स्वभाव, जिम्मेदारी का भाव, गहरी शर्म, और पूर्ण निष्क्रियता—ये उसके व्यक्तित्व के मुख्य स्तंभ हैं। वह नायक नहीं रहा, शिकायतकर्ता भी नहीं बन पाया। वह बस एक मूक, शर्मिंदा और पूरी तरह निर्भर पुरुष रह गया है, जो अपनी ही जिंदगी में दर्शक बनकर बैठा है।
.........
हमको गांव में रहते हुए 3 महीने हो चुके थे इन तीन महीना में सरिस्का का व्यवहार मुझे कुछ बदला बदला लग रहा था फिर एक शाम एक रात को

......................


रात का एक बज रहा था।
मेरी आंख अचानक खुली। कमरे में अंधेरा था, सिर्फ खिड़की से हल्की चांदनी झांक रही थी। मैंने हाथ बढ़ाया—बगल वाली जगह खाली थी। ठंडी।
सरिस्का नहीं थी।
एक पल के लिए सांस रुक गई। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। कहां गई? कब गई? मैं सोते हुए महसूस भी नहीं कर पाया। व्हीलचेयर दूर थी, खुद उठने का तो सवाल ही नहीं। मैं बस पड़ा-पड़ा अंधेरे में सुनता रहा। बाहर सन्नाटा। कोई आहट नहीं। मन में काले ख्याल दौड़ने लगे—चाचा का कमरा… बंद दरवाजा…
दस मिनट जैसे दस घंटे लग रहे थे।
फिर धीरे से किवाड़ खुला। सरिस्का अंदर आई। मैंने आंखें बंद रखीं, लेकिन सांसें रोक लीं। वह चुपचाप चारपाई पर लेटी। कोई बात नहीं की, कोई सफाई नहीं दी। बस लेटी और… दो-चार सांसों में सो गई। इतनी जल्दी, जैसे थक कर चूर हो।
मेरी जान में जान आई। कम से कम वापस तो आ गई।
लेकिन फिर…
उसके शरीर से एक गंध आई।
पहले हल्की, फिर तेज। सेक्स की गंदी, भरी हुई गंध। जैसी किसी औरत के जांघों के बीच से घंटों तक रिसती रहती है। उसके ऊपर थी मर्दाना पसीने की गंध—भारी, तेज, किसी तगड़े शरीर की। और उसके बीच में तंबाकू की हल्की-सी, तीखी खुशबू। वही जो चाचा के मुंह से हमेशा आती थी।
मेरा पूरा शरीर जैसे जल गया।
मैंने धीरे से करवट ली। सरिस्का की पीठ मेरी तरफ थी। नाइटी हल्की सी ऊपर उठी हुई थी। उसकी मोटी गांड के बीचों-बीच हल्की चमक थी चांदनी में—पसीने की या कुछ और की, मैं तय नहीं कर पाया। उसके बाल बिखरे हुए थे, गर्दन पर गीले। सांसें गहरी और शांत थीं, जैसे वह सच में गहरी नींद में हो।
लेकिन गंध… गंध झूठ नहीं बोल रही थी।
मेरे मन में तस्वीरें फिर से तड़पने लगीं।
चाचा का काला तगड़ा शरीर… सरिस्का का गोरा बदन उसके नीचे…
मोटे हाथ उसकी गांड दबाते हुए…
तंबाकू भरा मुंह उसके स्तनों पर…
और वह गंध… वही गंध जो अब मेरे बिस्तर पर फैल रही थी।
मैंने आंखें खोलीं। छत की तरफ देखा। नींद पूरी तरह उड़ चुकी थी।
शक अब शक नहीं रह गया था।
वह एक सच्चाई की तरह मेरे सीने पर बैठ गया था—भारी, गंदी, और असहनीय।
सरिस्का गहरी सोई हुई थी।
और मैं अंधेरे में पड़ा, उसके शरीर से आती उस मिश्रित गंध को बार-बार सूंघता रहा—
सेक्स की, मर्दाना पसीने की, और तंबाकू की।
नींद उस रात मेरे नसीब में नहीं थी।

विनय की मानसिक स्थिति उस रात के बाद पूरी तरह बिखर चुकी थी।
पहले सिर्फ लाचारी थी—शरीर का मरा होना, नौकरी का छिनना, चाचा के घर में पड़े रहना। अब उस लाचारी के ऊपर शक का काला पहाड़ बैठ गया था। और वह पहाड़ हर सांस के साथ और भारी हो रहा था।
उस रात की गंध उसके दिमाग में चिपक गई थी। सेक्स की भरी हुई, गंदी गंध… मर्दाना पसीने की तेज बू… और तंबाकू की हल्की लेकिन साफ पहचान। तीनों मिलकर एक सजा बन गई थीं। वह बार-बार आंखें बंद करता, लेकिन वही तस्वीरें आ जातीं—सरिस्का का गोरा शरीर, चाचा के काले मोटे हाथ, उसकी भारी गांड उन हाथों में दबती हुई, और वह खुद… चारपाई पर पड़ा, बेजान, कुछ कर पाने में असमर्थ।
मन के अंदर दो आवाजें चल रही थीं।
एक आवाज कहती—“तू पागल हो गया है… शायद पसीना था… शायद तंबाकू की गंध कपड़ों में लग गई… कुछ नहीं हुआ…”
दूसरी आवाज हंसती—“दस मिनट कहां गई थी आधी रात को? क्यों इतनी जल्दी सो गई? क्यों शरीर से सेक्स की गंध आ रही थी? तू जानता है… तू सब जानता है… बस स्वीकार नहीं कर पा रहा।”
शर्म सबसे ज्यादा काट रही थी।
वह अपनी पत्नी के शरीर से किसी और मर्द की गंध सूंघ रहा था—और कुछ कर नहीं पा रहा था। न उठ सकता था, न पकड़ सकता था, न पूछ सकता था। उसका लिंग मरा हुआ था, उसकी कमर टूटी हुई थी, उसकी हिम्मत खत्म हो चुकी थी। वह खुद को आदमी भी नहीं समझ रहा था। बस एक गवाह—जो अपनी ही बीवी के शरीर पर किसी और के निशान सूंघने के लिए मजबूर हो।
ईर्ष्या भी थी, लेकिन वह शुद्ध गुस्से वाली ईर्ष्या नहीं थी। वह एक लाचार, रोती हुई ईर्ष्या थी। जैसे कोई कुत्ता अपनी हड्डी किसी और के मुंह में देखे और सिर्फ पूंछ हिलाए। वह चाहता था कि वह चिल्लाए, सरिस्का के बाल पकड़े, पूछे—“कहां थी? किसके नीचे थी?” लेकिन गला सूख जाता। आवाज निकलने से पहले ही मर जाती।
आत्म-ग्लानि सबसे गहराई में थी।
“मैं ही कमजोर था… छोटा लिंग… फिर एक्सीडेंट… अब यह सब मेरी सजा है।”
वह खुद को दोषी ठहरा रहा था। सरिस्का को पूरी तरह दोष नहीं दे पा रहा था। मन कहता—“उसका शरीर जीवित है… भूखा है… तूने तो कुछ दिया नहीं महीने भर… अब अगर वह कहीं और चली गई तो दोष किसका?” यह सोचकर वह और टूटता।
नींद गायब हो गई थी।
रात भर वह पड़ा-पड़ा उसकी सांसें सुनता। गंध अब कम हो चुकी थी, लेकिन याद रह गई थी। सुबह होते-होते उसकी आंखें सूज जातीं। दिन में भी वही ख्याल पीछा करते—सरिस्का जब चाचा को पानी देने जाती, जब मुस्कुराती, जब थोड़ी देर ज्यादा लगती। हर छोटी बात अब सबूत लगती।
विनय अब सिर्फ लाचार पति नहीं रह गया था।
वह एक ऐसा पुरुष बन चुका था जो अपनी पत्नी के शरीर पर किसी और मर्द की गंध को सूंघते हुए भी चुप रहने के लिए मजबूर था।
उसकी मानसिक स्थिति एक धीमी मौत की तरह थी—हर रात थोड़ा और मरता हुआ, और हर सुबह फिर से जी उठता हुआ सिर्फ इसलिए कि वह और संदेह कर सके।
 
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Sariska55

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रात भर वह पड़ा-पड़ा उसकी सांसें सुनता रहा । गंध अब कम हो चुकी थी, लेकिन याद रह गई थी। सुबह होते-होते उसकी आंखें सूज जातीं। दिन में भी वही ख्याल पीछा करते—सरिस्का जब चाचा को पानी देने जाती, जब मुस्कुराती, जब थोड़ी देर ज्यादा लगती। हर छोटी बात अब सबूत लगती।
विनय अब सिर्फ लाचार पति नहीं रह गया था।
वह एक ऐसा पुरुष बन चुका था जो अपनी पत्नी के शरीर पर किसी और मर्द की गंध को सूंघते हुए भी चुप रहने के लिए मजबूर था।
उसकी मानसिक स्थिति एक धीमी मौत की तरह थी—हर रात थोड़ा और मरता हुआ, और हर सुबह फिर से जी
उठता हुआ सिर्फ इसलिए कि वह और संदेह कर सके।

सरिस्का का उसको बदला हुआ व्यवहार उसके मन में बहुत बड़ा संदेह पैदा कर दिया इस का पर्दा पास करने के लिए विनय सरिस्का पर नजर रखने लगा उसे रात
विनय पूरी रात आँखें बंद किए पड़ा रहा, लेकिन नींद नहीं आई।
दूसरी सुबह जब आंखें खोलता है बेडरूम में
थोड़ी देर बाद सरिस्का तौलिया लपेटे अंदर आई। बाल खुले, गीले। उसने साड़ी निकाली—लाल रंग की, नई-सी। ब्लाउज गहरा नेवी ब्लू, थोड़ा लो-कट। जब उसने ब्लाउज पहना तो स्तनों का ऊपरी गोल हिस्सा साफ दिखने लगा। साड़ी कमर पर कसकर बाँधी। पल्लू छाती पर डाला, लेकिन जानबूझकर ढीला रखा। ब्लाउज के अंदर स्तन भारी-भारी तने हुए थे। पीछे से साड़ी गाँड पर कस गई—दोनों भाग अलग-अलग उभर आए। चलते समय हिलने लगे।
विनय ने गौर से देखा।
कल रात वाली गंध अब नहीं थी। नहा लेने के बाद साबुन और पानी की ताज़गी थी। लेकिन शरीर में कुछ बदलाव लग रहा था। स्तन पहले से थोड़े और भारी? निप्पल थोड़े और कड़े? गाँड की चाल में एक अलग-सी नरमी? या सिर्फ उसका शक उसे दिखा रहा था?
सरिस्का आईने के सामने खड़ी होकर बाल संवारने लगी। हल्के स्वर में कोई पुराना भोजपुरी गाना गुनगुना रही थी—
“लइका के बाबूजी… अरे लइका के बाबूजी…”
आवाज़ में कोई ग्लानि नहीं थी। कोई डर नहीं। बस एक हल्की, संतुष्ट सी खुशी।
वह रसोई में चली गई। चूल्हा जलाया। रोटी सेंकने लगी। गाना जारी रहा। कभी-कभी कमर मटकाती, साड़ी का पल्लू संभालती। विनय आँगन में व्हीलचेयर पर बैठकर देखता रहा। उसकी नज़रें सरिस्का के बदन पर ही टिकी रहीं—भारी स्तन जब वह झुकती तो ब्लाउज से लगभग बाहर आने को होते, पतली कमर मुड़ती, और पीछे की मोटी गाँड साड़ी के अंदर से साफ अपनी शक्ल दिखाती।
बेटा उठ गया। सरिस्का ने उसे नहलाया, कपड़े पहनाए, टिफ़िन पैक किया। स्नेह से बाल सहलाए।
चाचा तुम्हें स्कूल छोड़ने जाएँगे,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
ठीक उसी वक्त चाचा के कमरे का किवाड़ खुला।
रामबहादुर बाहर आए। धोती-कुर्ता पहने, बालों में तेल, मुँह में पहले से खैनी। छह फुट पाँच का तगड़ा शरीर दरवाज़े में टेढ़ा होकर निकला। उनकी नज़र सबसे पहले सरिस्का पर पड़ी। एक पल के लिए ठहरी—उसके लो-कट ब्लाउज पर, भारी स्तनों की उभरी रेखा पर, फिर साड़ी में कसी गाँड पर। फिर उन्होंने नज़र फेर ली।
“चाय हो गई?” आवाज़ भारी थी, लेकिन नरम।
“हाँ जी ,” सरिस्का मुस्कुराई। आँखों में एक हल्की चमक थी। “गर्म-गर्म बनाई है।”
चाचा पास आए। प्याला लिया। उंगलियाँ सरिस्का की उंगलियों से छू गईं। एक सेकंड के लिए। विनय ने दूर से देखा। सरिस्का ने आँखें नहीं झुकाईं। मुस्कान बरकरार रही।
चाचा ने चाय पी। फिर बेटे के सिर पर हाथ फेरा।
“चल बेटा, स्कूल। मैं छोड़ आता हूँ।”
बेटा खुश हो गया। बैग उठाया। सरिस्का ने दरवाज़े तक उन्हें छोड़ा। चाचा ने जाते-जाते एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा। सरिस्का खड़ी थी—साड़ी में, लो-कट ब्लाउज में, बाल खुले, मुस्कुराती हुई। चाचा की आँखों में कुछ था—जाना-पहचाना, भूखा, लेकिन छिपा हुआ। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस बेटे का हाथ पकड़कर निकल गए।
विनय आँगन में बैठा रहा।
सरिस्का ने दरवाज़ा बंद किया। फिर रसोई की तरफ मुड़ी। गाना फिर शुरू हो गया। हल्का, बेपरवाह।
विनय ने उसे देखा—उसके शरीर को, उसकी चाल को, उसकी मुस्कान को।
शक सीने में बैठ गया था। भारी। लेकिन उसके साथ एक अजीब-सी चुप्पी भी।
सरिस्का पास आई। विनय की व्हीलचेयर के सामने झुकी। ब्लाउज का ऊपरी हिस्सा और खुल गया। भारी स्तन पास आ गए। उसने पति के माथे पर हाथ रखा।
“ आज तुम्हारी आंखें कैसी दिख रही है तबीयत तो ठीक है
विनय ने कुछ नहीं कहा। बस उसकी आँखों में देखा।
सरिस्का मुस्कुराई। वही मुस्कान जो चाचा को दी थी।
“चाय पिलाऊँ?”
और वह मुड़कर चली गई। साड़ी में उसकी मोटी गाँड हिलती रही—धीरे, भारी, और पूरी तरह बेखबर।
विनय ने आँखें बंद कीं।
गंध अब नहीं थी।
लेकिन यादें थीं।
और शक था।
घर में फिर वही चुप्पी छा गई—नीम की खुशबू, दूर से बैलगाड़ी की घंटी, और एक औरत का हल्का गुनगुनाहट

विनय ने अपनी बीवी का यह बदला हुआ रूप देखा तो शक और गहरा हो गया। कभी सरिस्का चाचा से इतनी डरती थी, उनकी भारी आवाज़ और तगड़े शरीर से नफरत करती थी, आँखें तक नहीं मिलाती थी—अब वही सरिस्का मुस्कुराकर बात कर रही थी, आँखों में एक अजीब-सी चमक लिए। यह अचानक कायापलट कैसे हो गया? क्या राज छिपा था इस मुस्कान के पीछे? विनय ने मन ही मन ठान लिया—आज नहीं तो कल, वह इस राज की तह तक ज़रूर पहुँचेगा।

विनय इस रात तक पहुंचाने के लिए अपना एक प्लान तैयार करता है

विनय की जाँच की रणनीति साफ और चुपचाप की थी।
वह जानता था कि वह व्हीलचेयर पर है, भाग नहीं सकता, लड़ नहीं सकता। इसलिए सीधा सामना करने की बजाय वह छाया बनकर रहना चाहता था।
उसकी योजना थी—
रात को जानबूझकर गहरी नींद का नाटक करना। आँखें बंद रखना, साँसें भारी चलाना, लेकिन कान पूरी तरह खुले रखना। अगर सरिस्का फिर उठी तो वह चुपचाप गिन लेगा—कितनी देर गई, कब लौटी, शरीर पर क्या गंध है, कपड़े कैसे हैं।
दिन में वह आँगन में व्हीलचेयर डालकर बैठेगा, अखबार का नाटक करेगा, लेकिन नज़रें हमेशा दरवाज़े, रसोई और चाचा के कमरे पर रखेगा। सरिस्का और चाचा जब बात करें तो वह दूरी से उनके चेहरे, मुस्कान, हाथों के छूने और आँखों के मिलने को गौर से देखेगा।
साथ ही वह छोटी-छोटी चीज़ें नोट करेगा—सरिस्का के ब्लाउज पर कोई नया निशान तो नहीं, गर्दन या जाँघों पर कोई लालिमा तो नहीं, और सबसे ज़रूरी… रात को उसके शरीर से आने वाली गंध में कोई बदलाव तो नहीं।
वह बेटे से भी हल्के-फुल्के सवाल पूछेगा—“चाचा तुम्हें स्कूल कैसे छोड़ते हैं? रास्ते में क्या बात करते हैं?” बिना शक जगाए।
और सबसे खास बात—वह खुद को और कमज़ोर दिखाएगा। ज़्यादा दर्द की शिकायत करेगा, जल्दी सोने का नाटक करेगा, ताकि घर वाले उसे नज़रअंदाज़ करें और बेखौफ हों।
विनय जानता था—सच्चाई छिपती नहीं।
वह बस इंतज़ार करेगा।
और जब मौका मिलेगा, तो शक को सबूत में बदल देगा।

सुबह होते ही विनय ने अपना पूरा प्लान मन में बैठा लिया था। रात को नाटक, दिन को नज़रें, छोटी-छोटी बातें नोट करना—सब तैयार था। तभी सरिस्का कमरे में आई।
लाल साड़ी पहनी हुई थी, कमर पर कसकर बाँधी। ब्लाउज गहरा मैरून, थोड़ा लो-कट। जब वह झुकी तो 36 के भारी, गोल स्तन ब्लाउज के ऊपरी किनारे से लगभग बाहर आने को थे। पतली 28 की कमर साड़ी की प्लीट्स में और भी पतली लग रही थी। नीचे 38 प्लस की मोटी, गोल गाँड साड़ी के अंदर से साफ उभर रही थी—चलते समय दोनों भाग अलग-अलग हिलते। गोरा पेट साड़ी की किनारी के नीचे हल्के से झलक रहा था, चिकना और टाइट। बाल खुले थे, माथे पर हल्का सिंदूर। पूरे बदन से एक कामुक, तैयार-सी खुशबू आ रही थी।
“दवाइयाँ खत्म हो गई हैं,” उसने धीरे से कहा। “और डॉक्टर ने चेकअप के लिए कहा था। चाचा जी बेटे को स्कूल से लाते ही एक बजे शहर चलना है। दस किलोमीटर दूर कस्बे में अच्छा हॉस्पिटल है।”
विनय ने सिर हिलाया। अंदर शक और गहरा हो गया, लेकिन चेहरे पर कुछ नहीं आने दिया।
ठीक एक बजे चाचा आ गए। कुर्ता-पजामा पहने, मुँह में खैनी। पुरानी कार आँगन में खड़ी की। बेटे को पड़ोसी के घर छोड़कर तीनों निकले—विनय आगे की सीट पर, सरिस्का पीछे, चाचा ड्राइवर।
रास्ता पतला था, खेत दोनों तरफ। कार में सन्नाटा था, लेकिन विनय की नज़रें आईने में थीं। चाचा कभी-कभी पीछे मुड़कर सरिस्का से कुछ कहते। आवाज़ धीमी होती। सरिस्का जवाब में हल्के से मुस्कुराती, आँखें झुकाती, फिर विनय की तरफ देखकर जल्दी से नज़र फेर लेती। दोनों की मुस्कान वही थी जो घर में होती थी—हल्की, गुप्त, और विनय से छिपाई हुई। विनय का दिमाग घूमने लगा। हाथ की मुट्ठियाँ भींच लीं। लेकिन कुछ बोला नहीं।
हॉस्पिटल पहुँचे। डॉक्टर ने जाँच की, दवाइयाँ लिखीं। बाहर निकलते समय चाचा ने कहा, “बाहर ही कुछ खा लेते हैं। घर पहुंचने में देर हो जाएगी।”
ढाबे पर बैठे। सरिस्का ने चाचा के सामने ही प्लेट सजाई, पानी दिया। जब वह झुकती तो ब्लाउज और खुल जाता, भारी स्तन और गोरा पेट साफ दिखता। चाचा की नज़रें एक पल के लिए वहीं रुक जातीं, फिर प्लेट पर चली जातीं। विनय सब नोट कर रहा था—उनके हाथों का हल्का छूना, आँखों का मिलना, सरिस्का की वो छोटी-सी मुस्कान जो सिर्फ चाचा के लिए थी। खाना खाते-खाते दोनों कभी-कभी धीमे स्वर में बात करते, जैसे कोई पुरानी बात याद आ रही हो। विनय की छाती में आग जल रही थी।
रात के आठ बजे घर पहुँचे।
बेटा पड़ोसी के घर से से ले आई
आँगन में नीम की पत्तियाँ सरसरा रही थीं।
विनय व्हीलचेयर पर बैठा रहा। सरिस्का साड़ी सँभालती हुई अंदर गई। चाचा कार बंद करके धीरे से बोले, “आराम करो बेटा। थक गए होंगे।”
विनय ने कुछ नहीं कहा।
सिर्फ दोनों की पीठ देखता रहा—सरिस्का की मोटी गाँड साड़ी में हिलती हुई, और चाचा का तगड़ा काला शरीर उसके पीछे।
शक अब और गाढ़ा हो चुका था।
और प्लान अभी भी चालू था।

घर पहुँचते ही सरिस्का ने साड़ी नहीं बदली। वही लाल साड़ी, वही लो-कट ब्लाउज। उसने विनय की व्हीलचेयर कमरे में धकेली और चारपाई पर लिटा दिया। खुद झुककर तकिया लगाया। ब्लाउज का ऊपरी हिस्सा और खुल गया। भारी स्तन पास आ गए।
“बहुत थक गए होंगे,” उसने जल्दी-जल्दी कहा। “दवाइयाँ ले लो, आराम करो।”
विनय ने उसकी आँखों में देखा। जल्दबाजी साफ थी। जैसे वह उसे जल्दी से सुलाना चाहती हो। अंदर शक की लहर दौड़ गई।
‘यह मुझे इतना जल्दी क्यों सुलाना चाहती है?’ वह मन ही मन सोचने लगा। ‘आज मैं सोऊँगा नहीं। बस नाटक करूँगा।’
सरिस्का ने बोतल से गोलियाँ निकालीं। पानी का गिलास दिया।
“ले लो… आराम करो। मैं बेटे को खाना खिला देती हूँ।”
विनय ने गोलियाँ निगल लीं। सरिस्का मुस्कुराई और बाहर चली गई। साड़ी में उसकी मोटी गाँड हिलती रही।
थोड़ी देर बाद विनय की पलकें भारी होने लगीं। शरीर सुन्न पड़ने लगा। वह आँखें खोले रखने की कोशिश करता रहा, लेकिन नींद ने जकड़ लिया। अंधेरा गहराता गया…
जब आँख खुली तो सुबह के पाँच बज रहे थे। खिड़की से हल्की रोशनी आ रही थी। सरिस्का उसके बगल में लेटी थी। नाइटी पहने, बाल बिखरे, साँसें शांत।
लेकिन गंध…
पिछली रात वाली वही गंदी, भरी हुई गंध। सेक्स की। मर्दाना पसीने की। और तंबाकू की तीखी खुशबू। आज और तेज। जैसे घंटों तक किसी तगड़े शरीर के नीचे दबी रही हो।
विनय का पूरा बदन जल उठा। उसने मन ही मन अपने आप को कोसा—
‘मैं इतनी गहरी नींद में कैसे चला गया? प्लान तैयार था… नाटक करना था… और मैं सो कैसे गया! और अभी तो सुबह के 5:00 रहे हैं
उसके दिमाग में काम करना बंद कर दिया था फिर उसने
धीरे से उसने बिस्तर से उठने की कोशिश की। व्हीलचेयर पास खींची। टेबल पर दवाइयों की पट्टियाँ पड़ी थीं। उसने एक-एक करके जाँची। ज़्यादातर दर्द और सूजन की थीं। लेकिन एक छोटी सी गोली अलग थी—नींद की। हल्के नीले रंग की।
विनय की मुट्ठी भींच गई।
सरिस्का अभी भी सोई हुई थी। उसके शरीर से वह मिश्रित गंध पूरे कमरे में फैल रही थी।
विनय ने आँखें बंद कीं।
शक अब सबूत बनने की कगार पर था

दूसरी सुबह भी वही दिनचर्या रही—चाचा काम पर निकले और साथ में बेटे को स्कूल छोड़ गए। लेकिन सरिस्का के व्यवहार में साफ बदलाव था। आज वह बहुत खुश नज़र आ रही थी, हल्के स्वर में गुनगुनाती हुई रसोई के काम में लगी थी। उसने बिल्कुल नई साड़ी पहनी थी—गहरी काली, पतली सी, जिसमें उसका 36-28-38 का बदन और भी उभरा-उभरा लग रहा था। ब्लाउज लो-कट और टाइट था, भारी स्तनों का ऊपरी गोल हिस्सा साफ झलक रहा था, गोरा पेट साड़ी की किनारी से हल्के-हल्के दिखता। विनय ने रात वाली घटना की कोई चर्चा नहीं की। वह सरिस्का को शक का अहसास नहीं होने देना चाहता था। बस साड़ी की तरफ देखकर धीरे से पूछ लिया—“नई है?” सरिस्का मुस्कुराई, आँखों में वही हल्की चमक लिए बोली—“चाचा जी लेकर आए थे… क्यों, आपको अच्छा नहीं लगा?” विनय ने कुछ नहीं कहा। दिन बीता। शाम को तीनों बैठकर खाना खाया। बातें कम हुईं। खाना खत्म होते-होते सोने का समय हो गया।

खाना खाने के बाद चाचा रामबहादुर बिना कुछ कहे उन्होंने व्हीलचेयर सहित विनय को आसानी से उठा लिया—जैसे कोई बच्चा हो। उनकी ताकत का अहसास विनय को तुरंत हो गया। छह फुट पाँच का तगड़ा शरीर, मोटे हाथ, और बदन से आती खैनी की तीखी गंध के साथ एक अलग ही मर्दाना पसीने की भारी खुशबू। चाचा ने उसे चारपाई पर लिटा दिया, तकिया ठीक किया और धीरे से बोले, “आराम करो बेटा।” फिर बाहर चले गए।
थोड़ी देर बाद सरिस्का अंदर आई। वही काली साड़ी, लो-कट ब्लाउज। उसने दवाइयों की पट्टियाँ निकालीं और पानी का गिलास लाई।
“लो, दवा ले लो… ।”
विनय ने मन ही मन ठान रखा था—नींद वाली गोली किसी भी हालत में नहीं लेनी। और सरिस्का को भनक तक नहीं पड़नी चाहिए। उसने बाकी गोलियाँ शांत भाव से मुँह में डाल लीं, पानी पिया। जब नींद की छोटी नीली गोली आई तो उसने हल्के से हाथ फेरा, जैसे गोलियाँ गिन रहा हो, और उसी चालाकी से उसे चारपाई के किनारे नीचे गिरा दिया। फर्श पर गिरते हुए कोई आवाज़ नहीं हुई।
फिर उसने आँखें मूँद लीं। साँसें धीमी कर लीं। सोने का नाटक शुरू कर दिया।
सरिस्का कुछ पल खड़ी रही। फिर धीरे से बोली, “सो जाओ

विनय झूठा सोने का नाटक करने लगता है और सरिस्का के हर मूवमेंट पर नजर रखता है विनय आँखें बंद किए पड़ा रहा। साँसें एक जैसी, शरीर शांत। लेकिन कान और आँखों की हल्की दरार पूरी तरह सतर्क थी।
उसी कमरे में, चारपाई के दूसरी तरफ़, छोटा बेटा सो रहा था। सरिस्का पहले उसी की ओर गई। धीरे से बच्चे के पास लेट गई। एक हाथ उसके पेट पर फेरा, बालों में उँगलियाँ फिराईं और बहुत हल्की आवाज़ में लोरी जैसी कुछ गुनगुनाई। करीब बीस-पच्चीस मिनट तक वह बच्चे के साथ लेटी रही, जब तक उसकी साँसें गहरी और नियमित हो गईं।
विनय ने दो घंटे तक इंतज़ार किया। फिर अचानक फिर वह उठकर चुपचाप खड़ी हो गई।कमरे में सिर्फ़ बच्चे की हल्की साँसें और बाहर से आने वाली हवा की आवाज़ थी।
एक नज़र विनय की ओर डाली। जैसे वह कोई बेहोश सामान हो। वह चारपाई से धीरे से उठी बिल्कुल बिना आवाज़ के, बिना कोई कराह निकले।
पहले वह व्हीलचेयर के पास गई। पहियों को पकड़कर उसे चारपाई से बहुत दूर, कमरे के कोने में खींचकर रख दिया। इतनी दूर कि विनय अगर उठ भी जाए तो आसानी से पहुँच न सके।
विनय का मन तुरंत खराब हो गया। एक अजीब सी बेबसी, गुस्सा और लाचारी एक साथ चढ़ आए। लेकिन उसने आँखें बंद रखीं। कोई हरकत नहीं की।
फिर सरिस्का सीधे दरवाज़े की ओर मुड़ी।
और जब वह कमरे से बाहर जाने लगी…
चाँदनी की हल्की रोशनी में उसका पूरा बदन एक पल के लिए साफ़ झलक गया।
काली साड़ी कमर पर कसकर लिपटी हुई थी। निचला हिस्सा इतना पतला और चिकना कि उसके मोटे, गोल, भारी नितंब हर कदम पर अलग-अलग हिल रहे थे। साड़ी का पल्लू कंधे से फिसलकर कमर तक आ चुका था, जिससे पीठ की नंगी चिकनी त्वचा और ब्लाउज की पतली डोरियाँ साफ़ नज़र आ रही थीं।
लो-कट ब्लाउज आगे से गहरा था। भारी, गोल स्तन हर साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। ब्लाउज इतना टाइट था कि निप्पल की हल्की उभार भी उभर आई थी। कमर पतली और गहरी, लेकिन कूल्हे चौड़े और भरे हुए। जाँघें मोटी, मज़बूत, और साड़ी के नीचे से उनकी गोलाई हर कदम पर साफ़ उभर रही थी।
वह जानबूझकर अपनी गांड को एक अजीब, बेहद कामुक अंदाज़ में हिला रही थी—दाएँ-बाएँ, धीरे-धीरे, गहरी लहरों की तरह। हर हिलने पर नितंबों की मांसपेशियाँ सिकुड़ती और फूलती दिखतीं। साड़ी का किनारा जाँघों के बीच से थोड़ा ऊपर उठ जाता, फिर फिर नीचे गिर जाता।
गर्दन लंबी, बाल खुले और पीठ पर बिखरे हुए। चेहरा एक तरफ़ झुका हुआ था, ताकि विनय की ओर नज़र न जाए। लेकिन शरीर पूरा बोल रहा था—भारी, गोल, और जानबूझकर लुभाने वाला।
दरवाज़े के पास पहुँचकर उसने एक बार और अपनी गांड को ज़ोर से, कामुक तरीके से हिलाया—फिर धीरे से बाहर निकल गई।
दरवाज़ा हल्के से बिना आवाज के बंद हुआ।
कमरे में सिर्फ़ बच्चे की हल्की साँसें और विनय की तेज़ धड़कन रह गईं।
और कोने में खड़ी व्हीलचेयर… बहुत दूर।

विनय की आँखें अब पूरी तरह खुल चुकी थीं। अँधेरे में भी वह छत की ओर ताक रहा था।
सरिस्का की वे सारी हरकतें… खासकर वह तरीका जिससे वह कमरे से निकली थी—अपनी भारी गांड को जानबूझकर, अजीब और बेहद कामुक अंदाज़ में हिलाते हुए—उसके मन को झकझोर गई थीं। सात साल की शादीशुदा ज़िंदगी में उसने सरिस्का को कभी ऐसा रूप नहीं देखा था। कभी नहीं। न रात में, न किसी त्योहार पर, न किसी निजी पल में। वह हमेशा संयमित, थोड़ी रूखी और घरेलू रहती थी। आज का वह शरीर… वह चाल… वह जानबूझकर लुभाने वाला हिलना… सब कुछ नया और चौंकाने वाला था।
और व्हीलचेयर को इतनी दूर रख देना… वह शक अब यकीन में बदल चुका था।
विनय ने हल्के से करवट बदली। हाथ बढ़ाकर चारपाई के किनारे को टटोला। कोई सहारा नहीं। व्हीलचेयर कोने में खड़ी थी—बहुत दूर। बिना उसके वह बिस्तर से उतर भी नहीं सकता था। लाचारी की एक कड़वी लहर उसके सीने में उतर गई।
दो मिनट बाद…
पास वाले कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला। फिर बंद हुआ। हल्की सी आवाज़, लेकिन खामोश रात में साफ़ सुनाई दी।
विनय की साँस एक पल के लिए रुक गई।
समझने में देर नहीं लगी।
वह कमरा… चाचा रामबहादुर का था। वही चाचा जिन्होंने उनकी मदद की थी, रहने का सहारा दिया था, सब कुछ किया था। और वह अकेले सो रहे थे।
अब दोनों उसी कमरे में थे।
विनय के पास सिर्फ़ एक ही रास्ता बचा था—सुनना।
आँखों से नींद बिल्कुल गायब हो चुकी थी। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। गहरी चिंता और एक अजीब सी बेचैनी उसके पूरे शरीर में फैल गई थी। वह चारपाई पर पड़ा-पड़ा, साँसें रोक-रोककर, दीवार के पार से आने वाली हर हल्की आवाज़ को सुनने की कोशिश करने लगा।
अब सिर्फ़ इंतज़ार था… और सुनने का।

विनय की आँखें अँधेरे में खुली की खुली रह गईं। पलकें भारी थीं, लेकिन नींद नाम की कोई चीज़ पास नहीं फटक रही थी।
सरिस्का का वह बदला हुआ रूप बार-बार दिमाग में घूम रहा था—गोरा, गदराया बदन, जानबूझकर हिलाई गई भारी गांड, टाइट ब्लाउज में फैले स्तन। सात साल में कभी नहीं देखा था ऐसा। मन में सवाल साँप की तरह रेंग रहा था—यह सब कब से चल रहा है? कितनी रातें? कितने दिन? क्या वह हर रात ऐसे ही जाती रही है जबकि वह बेहोशी की गोली खाकर सोया रहता था?
फिर चाचा का शरीर याद आया।
छह फुट पाँच का विशालकाय ढाँचा। काला, सख्त, साँड़ जैसा तगड़ा। मोटे हाथ जो उसे व्हीलचेयर सहित बच्चे की तरह उठा सकते थे। खैनी और मर्दाना पसीने की वह भारी गंध…
विनय की रूह सचमुच काँप उठी।
सरिस्का का नरम, गोरा, गदराया बदन और उसके सामने वह काला, भारी, दानव जैसा शरीर—दोनों की कल्पना एक साथ आते ही उसका दिल पागलों की तरह धड़कने लगा। सीने में धक-धक की आवाज़ खुद उसे सुनाई दे रही थी। गले में सूखापन फैल गया। हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगे।
वह हल्के से करवट बदलने की कोशिश करता, लेकिन व्हीलचेयर की दूरी याद आते ही शरीर जैसे जड़ हो जाता। कोने में खड़ी वह कुर्सी अब किसी जेल की सलाखों जैसी लग रही थी। बिना उसके वह फर्श पर भी नहीं उतर सकता था। पूरी तरह कैद।
दीवार के पार सन्नाटा था। बहुत गहरा सन्नाटा।
फिर… बहुत हल्की सी आवाज़।
चारपाई की हल्की कर्कश आवाज़। जैसे कोई भारी शरीर उस पर बैठ रहा हो। फिर कपड़ों की धीमी रगड़। कोई फुसफुसाहट—इतनी धीमी कि शब्द समझ नहीं आ रहे थे, बस सुर का अंदाज़ा हो रहा था। एक आवाज़ मोटी, भारी, गहरी। दूसरी… सरिस्का की।
विनय की साँस अटक गई।
वह साँसें रोककर सुनने लगा। माथा पसीने से गीला हो चुका था। अँधेरे में उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे डर लगने लगा कि कहीं आवाज़ दीवार के पार न चली जाए।
फिर एक और आवाज़—बहुत धीमी, लेकिन साफ़। जैसे कोई भारी साँस छोड़ रहा हो। और उसके साथ… सरिस्का की हल्की सी सिसकी।
विनय की रूह काँप उठी। शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई हो। वह चारपाई के किनारे को कसकर पकड़े रहा, नाखून गड़ने लगे। मन में एक ही खयाल घूम रहा था—वे दोनों अब एक साथ हैं। उसी कमरे में। बेड पर। और वह यहाँ… बेबस, अपाहिज, सिर्फ़ सुनने के लिए मजबूर।
अँधेरा और गहरा लगता जा रहा था। बच्चे की हल्की साँसें भी अब किसी डरावनी चीज़ जैसी सुनाई दे रही थीं।
विनय ने आँखें बंद कीं, लेकिन अँधेरे में भी सरिस्का का गोरा बदन और चाचा का काला, विशाल शरीर एक-दूसरे से लिपटे हुए दिख रहे थे।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं। गला सूख गया।
और दीवार के पार… आवाज़ें धीरे-धीरे बढ़ने लगीं।

विनय का दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसकी आवाज़ खुद उसके कानों में गूँज रही थी। वह चारपाई पर जड़ की तरह पड़ा रहा। आँखें अँधेरे में खुली हुईं। पूरा ध्यान दीवार के पार से आ रही हर छोटी-बड़ी आवाज़ पर केंद्रित कर लिया था।
पहले… कपड़ों की आवाज़ आई।
साड़ी की पतली रेशमी सरसराहट। जैसे कोई उसे धीरे-धीरे खोल रहा हो। फिर ब्लाउज की हुक खुलने की हल्की क्लिक। कपड़े फर्श पर गिरने की बहुत धीमी आवाज़। कुछ पल का सन्नाटा। फिर… चाचा की भारी, मोटी उँगलियों से किसी नरम चीकपड़े पूरी तरह उतर चुके थे। सरसराहट बंद हो गई थी।
अब सिर्फ़ शरीरों की आवाज़ थी।
पहले चाचा की मोटी, खुरदरी जीभ सरिस्का के गदरए गोरे स्तनों पर फिरने की गीली आवाज़। लंबे-लंबे चूसने की आवाज़—चुप-चुप-चुप। बीच-बीच में दाँतों से हल्के से काटने की आवाज़। सरिस्का हर बार “आउछ… आह…” करती, लेकिन आवाज़ में दर्द से ज़्यादा मज़ा था।
चाचा की गहरी, गंभीर आवाज़ कभी-कभी गूँजती—
“इतने बड़े हैं ये… इतने मोटे मोटे ।”
फिर और जोर से चूसने लगता।
विनय की साँसें काँप रही थीं। वह सोच रहा था—सरिस्का ने उसके साथ कभी ऐसे नहीं करवाया था। कभी इतनी आवाज़ नहीं निकाली थी।
फिर नीचे की ओर जाने की आवाज़। जाँघों को अलग करने की हल्की सी। फिर… चाचा की जीभ का गीला, चिपचिपा शोर। सरिस्का की सिसकियाँ तुरंत तेज़ हो गईं।
“आह… वहाँ… जीभ… आह्ह…”
वह आवाज़ लंबे समय तक चलती रही। कभी धीमी, कभी तेज़। सरिस्का के पैरों के फड़कने की हल्की आवाज़। बेड की चादर सिकुड़ने की आवाज़।
फिर अचानक
थप… थप… थप…
और साथ सरिस्का की लंबी सिसकी।
“आह… धीरे… बहुत बड़ा है… आह…”
चाचा की भारी साँसें और कभी-कभी गुर्राहट जैसी आवाज़।
“ अभी भी इतनी टight… आज भी…”

साथ साथ। बेड चरमरा रहा था। थप-थप की आवाज़ अब तेज़ और गीली हो चुकी थी। सरिस्का की सिसकियाँ खुलकर निकलने लगीं—
“आह… … चाचा… आह्ह… मत रोको…”
विनय की आँखों से पानी आ गया था। वह सोच रहा था—ऐसी आवाज़… ऐसी बेकाबू सिसकियाँ… ऐसी गिड़गिड़ाहट… सरिस्का ने उसके साथ कभी नहीं निकाली थी। कभी नहीं। सात साल में एक भी बार नहीं।
समय कट रहा था।
आधा घंटा… फिर पैंतालीस मिनट…
आवाज़ें थमने का नाम नहीं ले रही थीं। सरिस्का की सिसकियाँ तेज़ हो जातीं कभी भी धीमी। कभी थप-थप की आवाज़ और गहरी हो जाती। कभी लंबे समय तक सिर्फ़ अंदर ही अंदर धीमे धक्के चलते रहते, तो सरिस्का की सिसकियाँ दबी-दबी लेकिन लगातार निकलतीं।
पूरा 45 मिनट
विनय ने हर मिनट गिना। हर सिसकी सुनी। हर धक्के की आवाज़ अपने सीने में महसूस की। उसका शरीर पसीने से तरबतर हो चुका था। दिल अब भी पागलों की तरह धधक रहा था।
फिर… 45 मिनट बाद
आवाज़ें अचानक धीमी पड़ीं।
कुछ पल की तेज़ साँसें। सरिस्का की एक लंबी, काँपती हुई सिसकी। चाचा की भारी, संतुष्ट साँस।
फिर… सन्नाटा।
बिल्कुल सन्नाटा।
बेड की कोई आवाज़ नहीं। कपड़ों की कोई सरसराहट नहीं। बस दोनों की भारी साँसें जो धीरे-धीरे शांत हो रही थीं।
विनय की आँखें अँधेरे में खुली की खुली रह गईं।
पास वाले कमरे में चारपाई नहीं थी। वहाँ एक बड़ा, मज़बूत बेड लगा हुआ था। और उसी बेड पर… अभी भी दोनों लेटे हुए थे।
विनय ने चारपाई के किनारे को इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उसके नाखून गड़ गए।
सन्नाटा अब और भी डरावना लग रहा था।ज़ को दबाने जैसी हल्की

विनय का शक अब पूरी तरह यकीन में बदल चुका था।
वह चारपाई पर पड़ा-पड़ा अपनी शारीरिक बेबसी पर बार-बार पछता रहा था। व्हीलचेयर कोने में खड़ी थी—उतनी ही दूर जितनी सरिस्का ने रखी थी। बिना उसके वह कुछ नहीं कर सकता था। मन बहुत भारी और दुखी था।
दस मिनट का सन्नाटा रहा।
फिर पास वाले कमरे में फिर से हलचल शुरू हुई।
बेड की हल्की आवाज़। फिर दोनों की धीमी बातें।
चाचा की गहरी, दबंग आवाज़ आई—
“मुँह में ले। चूस।”
शायद सरिस्का ने हल्के से मना किया—
“अभी… थोड़ा बाद में ना…”
चाचा की आवाज़ और गंभीर हो गई—
“बाद में नहीं। अभी। चल
गीली, लंबी चूसने की आवाज़ आने लगी। बीच-बीच में चाचा की संतुष्ट भारी साँसें।
फिर
चाचा ने पूछा—
“उसको गोली देकर आई थी ना?”
सरिस्का ने जवाब दिया—
“हाँ… देख रही थी। सो भी गया था।”
कुछ पल बाद बेड फिर चरमराया। भारी शरीर चढ़ने की आवाज़। फिर… अंदर प्रवेश करते समय सरिस्का की दर्द भरी सिसकी निकली—
“आउछ… आह… दर्द… हो रहा है…”
चाचा हँसा। गहरी, दबंग हँसी।
“एक महीने से चुद रही है… अभी भी दर्द होता है क्या?”
सरिस्का की काँपती आवाज़ आई—
“आपका… है ही इतना बड़ा… पूरा अंदर जाता है तो… आह… फटने जैसा लगता है…”
चाचा ने और जोर से धक्का दिया।
“फटने दे। यही तो मज़ा है। इतनी टight चुदाई कहीं और नहीं मिलती। तेरी यह नरम गांड… ये गोरे मोटे स्तन… सब मेरे लिए बने हैं।”
सरिस्का सिसकते हुए बोली—
“जोर से मत करो… पूरा… अंदर… आह्ह…”
चाचा ने और दबंग अंदाज़ में कहा—
“जोर से ही करूँगा। रोज़ रात को ऐसे ही चोदूँगा। तेरा पति तो अपाहिज है… वह क्या दे सकता है तुझे? मैं देता हूँ पूरा मर्दाना मज़ा। बोल, कैसा लग रहा है?”
सरिस्का की आवाज़ अब और बेकाबू हो चुकी थी—
“अच्छा… बहुत अच्छा… लग रहा है… और अंदर… पूरा डालो… आह…”
चाचा हँसते हुए बोला—
“आज रात भर चोदूँगा। सुबह तक यह चूत सूज जाएँगी। फिर भी तू मना नहीं करेगी। बोल?”
“नहीं… नहीं करूँगी… चोदते रहो… आह्ह…”
फिर वापस लंबी, गहरी चुदाई की आवाज़ें शुरू हो गईं।
थप-थप… थप-थप…
सरिस्का की सिसकियाँ और चाचा की भारी गुर्राहटें। बीच-बीच में गंदी बातें।
“इतनी गीली हो रही है… देख… मेरा लंड कितना चिकना हो गया है तेरी पानी से।”
“चाचा… और जोर से… मत ठोकना
यह सिलसिला लगभग चार घंटे तक चलता रहा। कभी थमता, फिर फिर शुरू हो जाता।
आखिरकार बहुत देर बाद सरिस्का वापस विनय के कमरे में आई।
विनय ने तुरंत आँखें बंद कर लीं। सोने का नाटक।
जैसे ही वह लेटी, वही गंध आई—पिछले दो-तीन दिनों से आती वही भारी, मर्दाना गंध। नाइटी पहने हुए थी। साड़ी चाचा के कमरे में ही रह गई थी।
सुबह हुई। विनय की आँखों में नींद नहीं आई थी।
जब सरिस्का पास आई तो उसने हल्के से कहा—
“रात तो तुम साड़ी पहने हुई थी…”
सरिस्का ने सहज जवाब दिया—
“आपके सोने के बाद नींद नहीं आ रही थी… इसलिए मैंने निकाल दी थी।”
विनय ने सिर्फ़ हल्की सी मुस्कान दी।
अंदर ही अंदर सब कुछ जानते हुए।
 
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Sariska55

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यह सिलसिला लगभग चार घंटे तक चलता रहा। कभी थमता, फिर फिर शुरू हो जाता।
आखिरकार बहुत देर बाद सरिस्का वापस विनय के कमरे में आई।
विनय ने तुरंत आँखें बंद कर लीं। सोने का नाटक।
जैसे ही वह लेटी, वही गंध आई—पिछले दो-तीन दिनों से आती वही भारी, मर्दाना गंध। नाइटी पहने हुए थी। साड़ी चाचा के कमरे में ही रह गई थी।
सुबह हुई। विनय की आँखों में नींद नहीं आई थी।
जब सरिस्का पास आई तो उसने हल्के से कहा—
“रात तो तुम साड़ी पहने हुई थी…”
सरिस्का ने सहज जवाब दिया—
“आपके सोने के बाद नींद नहीं आ रही थी… इसलिए मैंने निकाल दी थी।”
विनय ने सिर्फ़ हल्की सी मुस्कान दी।
अंदर ही अंदर सब कुछ जानते हुए।

Ab aage

रात भर नहीं सोने के बाद भी विनय को नींद नहीं आई सुबह सरिस्का उठकर अपने कामों में लग गई विनय यही सोचता रहा और रात के बारे में याद करता रहा
दीवार के पार से आ रही हर आवाज़ उसके मन में कील की तरह धँस रही थी। कपड़ों की सरसराहट, सरिस्का की सिसकियाँ, चाचा की दबंग गहरी आवाज़—हर चीज़ उसके अंदर एक-एक करके कुछ तोड़ रही थी।
वह सोच रहा था—सात साल।
सात साल उसने इस औरत के साथ बिताए थे। बीमारी के बाद जब उसका शरीर काम करना छोड़ चुका था, तब भी सरिस्का उसके पास रही थी। खाना खिलाया, दवा दी, नहलाया, कपड़े पहनाए। वह सोचता था कि शायद यही प्यार है। शायद यही साथ है।
लेकिन आज रात सब कुछ झूठ लग रहा था।
व्हीलचेयर कोने में खड़ी थी। उतनी दूर कि वह छू भी नहीं सकता था। शारीरिक बेबसी की वह कड़वी सच्चाई बार-बार उसके गले में अटक जाती। वह चाहकर भी उठ नहीं सकता था। दीवार तोड़कर नहीं जा सकता था। दोनों को पकड़कर नहीं पूछ सकता था—“यह क्या कर रहे हो?”
बस सुन सकता था।
और सुनते हुए उसका मन एक अजीब से संघर्ष में फँस गया था।
एक तरफ़ गुस्सा था—तेज़, काला, जलता हुआ गुस्सा। सरिस्का पर, चाचा पर, अपनी किस्मत पर।
दूसरी तरफ़ एक गहरी शर्म थी। अपनी लाचारी पर शर्म। कि वह पति होकर भी अपनी बीवी को दूसरे मर्द के बिस्तर पर जाने से नहीं रोक सका।
तीसरी तरफ़ एक डरावना खालीपन था। जैसे उसके अंदर जो कुछ भी बचा था, वह धीरे-धीरे निकलता जा रहा हो।
जब चाचा ने कहा—“एक महीने से चुद रही है… अभी भी दर्द होता है क्या?”
तो विनय की साँस अटक गई।
एक महीने।
कम से कम एक महीने से यह सब चल रहा था। और वह हर रात नींद की गोली खाकर सोता रहा। बेखबर। बेबस।
सरिस्का की जवाब में आई आवाज़—“आपका है ही इतना बड़ा…”
उस वाक्य ने उसके अंदर कुछ और तोड़ दिया।
वह याद करने लगा कि सरिस्का उसके साथ कैसे होती थी। हमेशा धीमी, संयमित, कभी ज़्यादा आवाज़ नहीं निकालती। कभी इतनी बेकाबू नहीं होती। कभी ऐसे गिड़गिड़ाती नहीं थी।
आज जो सिसकियाँ दीवार पार से आ रही थीं… वे किसी और औरत की लग रही थीं। उसकी बीवी की नहीं।
मन में सवाल घूम रहे थे—
क्या वह कभी सच में उससे प्यार करती थी?
या सिर्फ़ दया?
क्या बीमारी के बाद वह उसके लिए सिर्फ़ एक बोझ बन गई थी?
और चाचा… जिन्होंने घर दिया, सहारा दिया… क्या वही उसकी बीवी को छीन रहे थे?
विनय ने चारपाई के किनारे को इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उँगलियाँ सफेद पड़ गईं। आँखें जल रही थीं, लेकिन आँसू नहीं आए। सिर्फ़ एक भारी, काला बोझ उसके सीने पर बैठ गया था।
चार घंटे तक आवाज़ें आती रहीं।
हर धक्के के साथ उसका मन और गहराई में डूबता गया।
हर सिसकी के साथ वह थोड़ा और टूटता गया।
जब आखिरकार सन्नाटा हुआ और सरिस्का वापस आई, तो विनय ने आँखें बंद कर लीं।
सोने का नाटक।
लेकिन अंदर वह जाग रहा था। पूरी तरह जाग रहा था।
जैसे ही सरिस्का उसके पास लेटी और वह गंध आई—वही गंध जो पिछले दिनों से आ रही थी—विनय का मन एक बार फिर काँपा।
यह गंध अब सिर्फ़ गंध नहीं रह गई थी।
यह उसके विश्वास के टूटने की गंध थी।
यह उसकी मर्दानगी की हार की गंध थी।
यह उसकी पूरी ज़िंदगी के छल की गंध थी।
सुबह जब उसने पूछा—“रात तो तुम साड़ी पहने हुई थी…”
और सरिस्का ने सहज जवाब दिया—“आपके सोने के बाद नींद नहीं आ रही थी… इसलिए मैंने निकाल दी थी।”
विनय ने हल्की सी मुस्कान दे दी।लेकिन अंदर…
अंदर वह मुस्कुरा नहीं रहा था।
अंदर वह चिल्ला रहा था।
बिल्कुल चुपचाप।
इन सब बातों को सोचकर विनय सोचता है कि मेरी बीवी क्या से क्या हो गई है और मुझे कुछ भी खबर नहीं

Ab Yahan Se Kahani Ko Wapas 3 mahine pahle Lekar Chalte Hain Jab

सरिस्का में गांव आए थे चाचा हमको गांव लेकर आए थे इन सब सवालों का पता करने के लिए

कहानी यहां से फ्लैशबैक में चलती है 3 महीने पहले
सरिस्का जब भी घर से निकलती, राम बहादुर की आँखें उसके पीछे चिपक जातीं।
वह सुबह-सुबह आँगन में झाड़ू लगाती, बाल खुले, साड़ी का पल्लू कंधे पर ढीला छोड़कर। चाचा अपने कमरे के दरवाज़े पर खड़े होकर चुपचाप देखते। उसके गोरे, गदरे, कामुक शरीर पर सूरज की रोशनी पड़ती तो चाचा के अंदर कुछ जलने लगता। 45 साल का, 6.5 फिट लंबा, हट्टा-कट्टा, तगड़ा शरीर वाला काला आदमी। चेहरा अच्छा नहीं था, मुँह में हमेशा खैनी भरी रहती। लेकिन आँखें… आँखें सरिस्का के बदन पर ऐसी चिपकतीं जैसे कोई भूखा जानवर।
पहले हफ़्ते में सरिस्का ने इसे अनदेखा किया। सोचा—चाचा हैं, शायद आदत से।
दूसरे हफ़्ते में घूरना और गहरा हो गया। जब वह पानी भरने जाती, चाचा पीछे-पीछे आ जाते। दूर खड़े होकर उसकी कमर, जाँघों, गदराए स्तनों और गोल कूल्हों पर नज़रें टिकाए रखते। सरिस्का जब मुड़कर देखती तो चाचा खैनी थूकते हुए मुस्कुरा देते, “कुछ चाहिए तो बोल देना बहू… मैं हूँ न।”
तीसरे हफ़्ते में बातें बढ़ीं।
चाचा अब विनय के पास कम बैठते, सरिस्का के पास ज़्यादा।
“बेटा, तुम टेंशन मत लो। इलाज का सारा खर्चा मैं दूँगा। ठेकेदारी अच्छा चल रहा है।”
फिर धीरे से सरिस्का की ओर मुड़कर, आवाज़ में एक अलग सी गरमाहट लाते हुए, “तुम भी थक जाती होगी न… रात-रात भर उठ-उठकर। कोई मदद चाहिए तो बता देना।”
सरिस्का असहज हो जाती। वह सिर झुकाकर “जी चाचा” कहकर निकल जाती। लेकिन चाचा की नज़रें उसके शरीर पर चिपककर रह जातीं। कभी-कभी वह साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए जानबूझकर देर तक खड़ा रह जाता। उसके काले, मोटे होठों पर खैनी की लार चमकती, और आँखों में साफ़-साफ़ वही भूख दिखती जो सरिस्का के गदरे बदन को देखकर पैदा होती।
चौथे हफ़्ते में घूरना खुला हो गया।
एक दिन सरिस्का रसोई में खड़ी थी। चाचा पीछे से आए और दरवाज़े पर खड़े होकर बोले, “बहू, आज खाना बहुत अच्छा बना है।” लेकिन उनकी आँखें खाने पर नहीं थीं। वे सीधे सरिस्का की कमर और भारी स्तनों पर टिकी थीं। सरिस्का ने मुड़कर देखा तो चाचा की निगाहें साफ़-साफ़ उसके सीने पर थीं। वह जल्दी से मुँह फेर लिया, लेकिन चाचा ने खैनी चबाते हुए एक लंबी साँस ली, जैसे किसी खुशबू को सूँघ रहा हो।
रात को सरिस्का और विनय एक ही कमरे में सोते। लाइट जलती रहती। चाचा अपने अलग कमरे में लेटे रहते, लेकिन उनकी नींद उड़ चुकी थी। दीवार के उस पार सरिस्का की हल्की हलचल, साड़ी की सरसराहट, कभी-कभी विनय को पानी पिलाने की आवाज़… सब कुछ चाचा के दिमाग में घूमता रहता। वह अपने मोटे हाथों से अपना लिंग दबा लेते, दाँत भींच लेते, और मन ही मन कसम खाते—इस कामुक बदन को मैं कैसे भी करके पाऊँगा।
एक महीने के अंत तक सरिस्का पूरी तरह असहज हो चुकी थी।
वह घर में भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती थी। चाचा हर दिन मदद का वादा करते, इलाज की बात करते, और बीच-बीच में उन आँखों से घूरते जो साफ़ कहती थीं—मैं तुम्हारे बदन को चाहता हूँ।
सरिस्का चुपचाप सहती रही।
और चाचा… चुपचाप, अपनी काली तगड़ी देह में दबाए हुए उस आग को, इंतज़ार करते रहे।

एक महीना खत्म होते-होते
सरिस्का के मन में राम बहादुर के लिए घृणा गहरी जमी हुई थी।
यही चाचा कभी गुंडा-मवाली का काम करते थे। इसी वजह से सरिस्का के घरवालों ने रिश्ता नामंजूर कर दिया था। दोनों ने भागकर शादी की थी।
अब वही आदमी रोज मदद का वादा कर रहा था, रोज घूर रहा था, और रोज उसके कामुक बदन पर अश्लील नज़रें डाल रहा था। सरिस्का अंदर ही अंदर चिढ़ती, घबराती, लेकिन कुछ बोल नहीं पाती।
फिर भी… मदद बेपनाह थी।
दवाइयाँ, पैसे, घर का खर्चा, विनय की देखभाल—सब कुछ चाचा संभाल रहे थे। ठेकेदारी का काम छोड़कर भी आ जाते थे। धीरे-धीरे सरिस्का के मन में एक अजीब सा द्वंद्व पैदा होने लगा।
“मैं तो इन्हें इतना बुरा मानती हूँ… लेकिन ये हमारी कितनी मदद कर रहे हैं।”
यह ख्याल बार-बार आता और उसका गुस्सा थोड़ा-थोड़ा पिघलने लगता।
एक महीने के अंत में डॉक्टर ने विनय की रेगुलर चेकअप और नई दवाइयों का समय बताया।
सुबह ही चाचा अपने कमरे से निकले। खैनी मुँह में दबाए, तगड़ी काली देह को साधारण कमीज़ में समेटे।
“बहू, आज विनय को अस्पताल लेकर चलना है। मैं गाड़ी लेकर आता हूँ। तुम तैयार हो जाना।”
सरिस्का ने सिर हिलाया। मन में एक बार फिर वही बात आई—
“कुछ भी हो… दिल के अच्छे हैं चाचा।”

अस्पताल
चाचा ने खुद व्हीलचेयर निकाली। विनय को बिस्तर से उठाते समय उनकी मोटी, काली बाँहें आसानी से उसके पूरे शरीर को समेट गईं।
6.5 फिट का हट्टा-कट्टा आदमी था। विनय उनके लिए जैसे कोई बच्चा हो। चाचा ने उसे ऐसे उठाया जैसे कोई बोझ ही न हो, और व्हीलचेयर पर बैठा दिया।
सरिस्का थोड़ी दूर खड़ी देख रही थी।
चाचा की ताकत, उनके शरीर की मजबूती, और जिस आसानी से उन्होंने उसके पति को संभाला… कुछ अलग सा लगा। पहले कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया था। अब अचानक नज़र गई।
अंदर डॉक्टर ने जाँच की, नई दवाइयाँ लिखीं। चाचा खुद काउंटर पर गए, पैसे दिए, दवाइयाँ लिए। वापस आकर विनय को फिर उसी आसानी से गोद में उठाया और गाड़ी तक ले गए।
सरिस्का गाड़ी में पीछे बैठी। आगे चाचा ड्राइव कर रहे थे। खैनी थूकने के लिए खिड़की खोली, फिर मुस्कुराकर बोले,
“अब घबरा मत। सब ठीक हो जाएगा। मैं हूँ न।”
सरिस्का ने धीरे से जवाब दिया, “जी चाचा… बहुत मेहरबानी।”
आवाज़ में नफ़रत अब थोड़ी कम थी। सिर्फ असहजता और एक अजीब सी कृतज्ञता बची थी।

शाम तक घर पहुँच गए।
चाचा ने फिर से विनय को आसानी से उठाकर कमरे में बिस्तर पर लिटाया। सरिस्का ने दवाइयाँ रखीं, पानी पिलाया। चाचा दरवाज़े पर खड़े रहे, खैनी चबाते हुए। उनकी आँखें एक बार फिर सरिस्का के गदरे शरीर पर ठहर गईं—कमरा, साड़ी का पल्लू, थकी हुई आँखें… सब कुछ।
लेकिन इस बार सरिस्का ने उनकी नज़रों को अनदेखा कर दिया।
मन में सिर्फ एक बात घूम रही थी—
“जो भी हैं… मदद तो कर रहे हैं।”रात होने वाली थी।
चाचा अपने कमरे की ओर बढ़े। और सरिस्का… विनय के पास बैठकर चुपचाप सोचती रही।

चाचा की मदद अब रोजमर्रा की दिनचर्या बन गई थी।
सुबह जल्दी उठ जाते। खैनी मुँह में दबाए, तगड़ी काली देह को कमीज़ में समेटे। पहले विनय को बिस्तर पर संभालते, फिर सरिस्का के बेटे को स्कूल के लिए तैयार करते। खुद गाड़ी में बिठाकर स्कूल छोड़ आते। कभी-कभी वापस आते समय बच्चे के लिए खिलौने, मिठाई या कोई नई चीज़ लेकर आ जाते।
सरिस्का यह सब देखकर बस इतना सोचती—
“परिवार का हिस्सा हैं… मदद कर रहे हैं।”
वह बहुत सीधी-सादी थी। चाचा की आँखों में छिपी भूख को अभी भी पूरी तरह समझ नहीं पाती थी, या समझकर भी अनदेखा कर देती थी।
लेकिन राम बहादुर के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।
जब भी सरिस्का रसोई में काम करती, आटा गूँधती, बर्तन माँजती या आँगन में झाड़ू लगाती, चाचा की नज़रें उसके गोरे, चिकने शरीर पर चिपक जातीं।
5 फुट 6 इंच लंबा, 36-28-38+ का गदराया, कामुक बदन। साड़ी का पल्लू जब कंधे से सरक जाता, या कमर झुकने पर कूल्हे उभर आते, तो चाचा के पजामे के अंदर लिंग खुद-ब-खुद झटका करने लगता। वे खैनी चबाते हुए दाँत भींच लेते, और मन ही मन कसम खाते—इस बदन को धीरे-धीरे पिघलाऊँगा।
वे आगे बढ़ने लगे, लेकिन बहुत सावधानी से।
कभी रसोई में आकर “बहू, मैं बर्तन धो दूँ?” कहते।
कभी पानी का घड़ा उठाते हुए जानबूझकर पास से गुजरते।
कभी बच्चे के सामने ही सरिस्का की तारीफ करते—“तुम कितनी मेहनत करती हो… विनय किस्मत वाला है।”
आवाज़ में गरमाहट थी, नज़रों में भूख। लेकिन सीधे कुछ अश्लील नहीं बोलते थे। बस धीरे-धीरे दीवारें गिरा रहे थे।
पंद्रह दिन ऐसे ही निकल गए।
सरिस्का अभी भी पतिव्रता, शर्मीली और सीधी-सादी बनी रही।
चाचा की मदद स्वीकार करती, धन्यवाद कहती, और किनारा कर लेती। लेकिन रात को… जब लाइट बुझाकर विनय के पास लेटती, तो कभी-कभी अचानक चाचा का भारी-भरकम शरीर याद आ जाता।
6 फुट 5 इंच लंबा, चौड़ा, हट्टा-कट्टा, ताकतवर काला बदन। जिसने विनय को जैसे पत्ता उठाया था।
उस ख्याल से सरिस्का का शरीर अपने-आप हरकत करने लगता। जाँघों के बीच हल्की गर्मी, निप्पल्स का सख्त होना, साँस का तेज़ हो जाना।
फिर वह खुद को झटके से रोकती।
“नहीं… नहीं… ये विनय के चाचा हैं। मैं पागल हो रही हूँ क्या?”
वह करवट बदल लेती, आँखें मूंद लेती, और मन को जबरदस्ती विनय की तरफ मोड़ने की कोशिश करती।
लेकिन अंदर कहीं कोई छोटी सी आग… बुझ नहीं रही थी।और दीवार के उस पार, अपने कमरे में, चाचा खैनी चबाते हुए अँधेरे में लेटे रहते।
पजामे के अंदर लिंग तना हुआ।
और मन में सिर्फ एक ही तस्वीर—सरिस्का का गोरा, गदराया, कामुक बदन।

ऐसे ही पंद्रह दिन और निकल जाते हैं और अब उनको गांव आए हुए लगभग एक महीना 15 दिन हो गए थे… और सरिस्का का मन
चाचा की मदद अब घर का हिस्सा बन चुकी थी।
सुबह जल्दी उठकर बच्चे को स्कूल छोड़ना, खिलौने लाना, दवाइयाँ लाना, विनय को उठाना-बिठाना—सब कुछ वे कर रहे थे। सरिस्का इसे परिवार की मदद मानती। सीधी-सादी थी। दिल में अभी भी पुरानी नफ़रत बाकी थी—यही आदमी कभी गुंडा-मवाली था, जिसके कारण घरवालों ने रिश्ता तक नहीं किया था। लेकिन अब वही आदमी उसके पति की ज़िंदगी संभाल रहा था।
यह द्वंद्व उसे रात-दिन खाए जा रहा था।
दिन में जब चाचा पास आते, रसोई में खड़े होकर बात करते, या जानबूझकर उसकी ओर देखते, तो सरिस्का का शरीर पहले असहज होता। उनकी काली, तगड़ी देह, 6 फुट 5 इंच का भारी-भरकम ढाँचा, खैनी भरे काले होठ… सब कुछ उसे याद दिलाता कि यह आदमी साधारण नहीं। लेकिन जब वे विनय को आसानी से गोद में उठा लेते, या बच्चे के लिए नई चीज़ लाते, तो मन कमज़ोर पड़ जाता।
“ये मदद कर रहे हैं… इतनी मदद कोई अजनबी नहीं करता। शायद बदल गए हैं।”
रात सबसे मुश्किल थी।
लाइट बुझ जाती। विनय बगल में सोया रहता—कमर से नीचे बिल्कुल सुन्न। सरिस्का आँखें मूंद लेती, लेकिन नींद नहीं आती। अचानक चाचा का शरीर याद आ जाता। जिस दिन अस्पताल में उन्होंने विनय को ऐसे उठाया था जैसे कोई बच्चा हो… उनकी बाँहों की मोटाई, सीने की चौड़ाई, ताकत।
उस ख्याल से सरिस्का के शरीर में एक अजीब सी हरकत शुरू हो जाती। जाँघों के बीच हल्की सी नमी, स्तनों का भारी होना, साँस का उलझना। वह तुरंत करवट बदलती, दाँत भींचती।
“पागल हो गई हूँ क्या मैं? ये विनय के चाचा हैं। रिश्ते में बड़े हैं। मैं पतिव्रता हूँ। मुझे ऐसे विचार नहीं आने चाहिए।”
लेकिन विचार रुकते नहीं थे।
जितना वह खुद को डाँटती, उतना ही शरीर प्रतिक्रिया देता। कभी-कभी वह विनय का हाथ पकड़ लेती, जैसे उससे माफ़ी माँग रही हो। मन में बार-बार एक ही सवाल घूमता—
“मैं इनसे नफ़रत क्यों नहीं कर पा रही पूरी तरह? मदद के कारण दिल पिघल रहा है… या कुछ और?”
सुबह होती तो वह चेहरे से सब मिटा देती। चाचा को “जी चाचा” कहती, काम में लग जाती। लेकिन अंदर कश्मकश चलती रहती। एक तरफ़ सालों पुरानी घृणा और शर्मीली पतिव्रता भावना, दूसरी तरफ़ रोजमर्रा की मदद और रात को शरीर की वह अजीब सी बेचैनी।

दिन ऐसे ही बीते।
सरिस्का की दीवार अभी मजबूत थी। लेकिन उसमें दरारें पड़ने लगी थीं—छोटी-छोटी, धीमी, और बहुत खतरनाक।
चाचा यह सब देख रहे थे।
और इंतज़ार कर रहे थे।.

फिर एक दिन
सुबह चाचा जल्दी निकल गए। ठेकेदारी का कोई ज़रूरी काम था।
सरिस्का दिनभर घर के कामों में लग गई—पति को दवाइयाँ देना, खाना बनाना, बर्तन साफ़ करना, बच्चे के स्कूल से लौटने का इंतज़ार। मन में वही पुराना द्वंद्व चलता रहा। नफ़रत पूरी तरह गई नहीं थी, लेकिन मदद के बोझ तले दबती जा रही थी।
शाम ठीक चार बजे चाचा लौटे। खैनी मुँह में, पसीने से भीगी कमीज़, तगड़ी काली देह।
दरवाज़े पर खड़े होकर बोले, “बहू, बाजार चलो। तुम्हारे लिए भी कपड़े ले आना, विनय के लिए भी, और बच्चे के लिए कुछ चीज़ें। बहुत दिन हो गए।”
सरिस्का मना करने ही वाली थी। मन में अभी भी हल्की नफ़रत बाकी थी। लेकिन चाचा ने जोर दिया,
“अरे, एक बार चल लो न। मैं हूँ साथ में।”
विनय ने भी बिस्तर से ही बोल दिया, “चली जाओ… क्या रखा है घर में। जाओ।”
सरिस्का चुपचाप तैयार हो गई।
बाजार में पहुँचते ही उसने देखा—लोग चाचा को देखते ही किनारा कर लेते। कोई नमस्ते करता, कोई सिर झुका लेता। उनकी 6 फुट 5 इंच की लंबाई, चौड़ा सीना, दबंग चाल… लोगों में एक अलग ही भय और इज्जत पैदा करती थी। सरिस्का अंदर ही अंदर एक अजीब सा अहसास महसूस कर रही थी। नफ़रत तो थी, लेकिन इस दबंगई को देखकर कुछ और भी हो रहा था—जो वह खुद से छिपाना चाहती थी।
कपड़ों की दुकान पर चाचा खुद खड़े रहे। विनय और बच्चे के कपड़े तो जल्दी चुन लिए। फिर सरिस्का की ओर मुड़े।
उन्होंने कुछ साड़ियाँ और सूट अपनी पसंद से निकाले—रंग गहरे, कट ऐसा जो शरीर को और उभार दे। सरिस्का ने हिचकते हुए भी ले लिए। मना नहीं कर सकी।
घर लौटे। खाना खाया। फिर सब अपने-अपने कमरों में चले गए।
रात
सरिस्का लाइट बुझाकर लेट गई। विनय बगल में साँस ले रहा था। लेकिन आँखों के सामने बार-बार चाचा का शरीर घूम रहा था—बाजार में उनकी लंबी तगड़ी चाल, लोगों का डरते हुए सम्मान करना, और जब वे कपड़े चुन रहे थे तो उनकी मोटी उंगलियाँ।
मन संघर्ष कर रहा था।
“ये विनय के चाचा हैं… गुंडा रहे हैं… मैं नफ़रत करती हूँ… फिर क्यों याद आ रहे हैं?”
शरीर फिर से हरकत करने लगा। जाँघों में गर्मी, साँस तेज़। वह करवट बदल-बदलकर खुद को रोकने की कोशिश करती रही। शर्मीली पतिव्रता भावना और शरीर की बेचैनी एक-दूसरे से लड़ रहे थे।
दीवार के उस पार
चाचा अँधेरे में लेटे थे। पजामे के अंदर लिंग तना हुआ।
बाजार का पूरा सीन आँखों के सामने था—सरिस्का आगे-आगे चल रही थी, साड़ी में उसकी मटकती हुई गाँड, गोल कूल्हे, हर कदम पर हिलते हुए। चाचा ने उसी समय पीछे-पीछे चलते हुए अपनी पजामे के अंदर हाथ डालकर लिंग सहलाया था। अब कमरे में लेटे-लेटे फिर से वही कर रहे थे। आँखें बंद, साँस भारी, और मन में सिर्फ वही मटकता बदन।
दोनों कमरों में एक ही आग जल रही थी।
एक तरफ़ शर्म और संघर्ष, दूसरी तरफ़ खुली भूख।

दूसरे दिन सुबह घर का माहौल पहले जैसा ही लगता था, लेकिन अंदर कुछ बदल चुका था।
सरिस्का जल्दी-जल्दी बेटे को स्कूल के लिए तैयार कर रही थी। नहलाया, कपड़े पहनाए, टिiffin पैक किया। इतने में चाचा उठकर बाहर आए। खैनी मुँह में दबाए, कमीज़ के बटन अभी पूरे नहीं खोले हुए।
“तैयार हो गया हो तो मैं छोड़ आता हूँ इसे,” उन्होंने साधारण स्वर में कहा।
बेटा खुशी-खुशी चाचा के साथ चला गया। दरवाज़ा बंद होते ही घर में सन्नाटा छा गया।
सरिस्का कुछ क्षण खड़ी रही। फिर अचानक उठकर कमरे में घुसी। कल बाज़ार से लाए गए कपड़ों का पार्सल खोला। गहरी मरून साड़ी और उससे मैच करता टाइट ब्लाउज़। उसने जानबूझकर साड़ी को नाभि से चार इंच नीचे बाँधा। पल्लू को इस तरह डाला कि कमर और कूल्हे साफ़ उभार पर आ जाएँ। आईने के सामने खड़ी होकर खुद को देखा।
गदराया हुआ चिकना बदन। बड़े-बड़े स्तन जो ब्लाउज़ में कसकर भरे हुए थे। साड़ी के नीचे गोल, भारी गाँड जो हर हल्की हरकत पर हिलती थी। आज वह पहले से कहीं ज़्यादा कामुक लग रही थी। खुद को देखकर उसके चेहरे पर एक अजीब सी लाली छा गई, लेकिन उसने साड़ी को और नीचे खींच लिया।
चुपचाप रसोई में काम करने लगी।
बेटे को स्कूल छोड़कर चाचा वापस आए। घर में सरिस्का नज़र नहीं आई। वे सीधे नहाने चले गए।
जब वे स्नान करके निकले तो नीचे सिर्फ एक तौलिया बाँधा हुआ था। ऊपर का पूरा शरीर नंगा—चौड़ा, बालों भरा सीना, कंधे, बाज़ू, पेट की मांसपेशियाँ। पानी की बूँदें अभी भी उनके तगड़े बदन पर चमक रही थीं। तौलिया कमर पर कसकर बँधा था, लेकिन उसके नीचे की उभार साफ़ झलक रही थी।
रसोई की ओर जाते हुए उनकी नज़र सरिस्का पर पड़ी।
वह झुककर बर्तन धो रही थी। साड़ी नाभि से काफ़ी नीचे बँधी हुई। पीठ मुड़ी हुई। गाँड पूरी तरह उभरी हुई, गोल और भारी, साड़ी के कपड़े में कसकर भरी हुई। हर छोटे-छोटे मूवमेंट पर वह हिल रही थी।
चाचा वहीं रुक गए। तौलिया में लिपटे शरीर के साथ। आँखें सरिस्का की उस गाँड पर अटक गईं। कुछ पल वे सिर्फ देखते रहे। साँस भारी हो गई।
सरिस्का ने महसूस किया कि कोई देख रहा है। वह घूमी।
और ठहर गई।
चाचा सिर्फ तौलिया बाँधे खड़े थे। बालों भरा चौड़ा सीना, पानी की चमक, तगड़ी मांसपेशियाँ, और तौलिये के नीचे साफ़ दिखती हुई उभार। सरिस्का की आँखें उनके सीने पर जाकर अटक गईं। फिर नीचे खिसकीं। एक तेज़ झटका उसके पूरे शरीर में दौड़ा। जाँघों के बीच अचानक सिकुड़न हुई। गाँड अंदर से कस गई। साँस अटक गई।
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
कुछ क्षण।
फिर सरिस्का ने जल्दी से नज़रें फेर लीं और बर्तन धोने में लग गई। लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे। शरीर में गर्मी फैल रही थी। साड़ी के नीचे उसकी जाँघें गीली होने लगी थीं।
चाचा भी धीरे से मुड़े और अपने कमरे की ओर चले गए। तौलिये के अंदर उनका लिंग पूरी तरह तन चुका था। कमरे में जाकर उन्होंने दरवाज़ा बंद किया। आँखें बंद कीं और रसोई का वह दृश्य फिर से चलाया—सरिस्का की झुकी हुई पीठ, नाभि से नीचे बँधी साड़ी, और वह भारी, मटकती गाँड।
सरिस्का रसोई में खड़ी थी। बर्तन धोते हुए भी उसका मन कमरे में था। चाचा का नंगा सीना, बाल, तगड़ी देह… और तौलिये के नीचे की वह उभार। उसने होंठ काटे। शरीर फिर से बेचैन हो उठा।
थोड़ी देर बाद उसने चाचा के लिए नाश्ता तैयार किया। थाली लेकर उनके कमरे में गई। चाचा अब कमीज़ पहन चुके थे, लेकिन आँखों में अभी भी वही भूख थी।
उन्होंने खाना खाया। सरिस्का चुपचाप पास खड़ी रही। दोनों के बीच हवा भारी थी। कोई ज़्यादा बात नहीं हुई।
खाना खाकर चाचा काम पर निकल गए।
घर फिर से खाली हो गया।
सरिस्का दरवाज़ा बंद करके रसोई में वापस आई। साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए उसने महसूस किया कि उसकी साँस अभी भी तेज़ है। और जाँघों के बीच… अभी भी गीलापन बाकी है।

घर खाली हो चुका था।
चाचा काम पर निकल गए थे। बेटा स्कूल में था। विनय कमरे में सो रहे थे।
सरिस्का रसोई में अकेली खड़ी थी। साड़ी अभी भी नाभि से चार इंच नीचे बँधी हुई। ब्लाउज़ टाइट। आईने में जो शरीर उसने देखा था, वही शरीर अब उसके अपने हाथों के नीचे काँप रहा था।
लेकिन शरीर से ज़्यादा बेचैन उसका मन था।
वह सिंक के किनारे हाथ रखे खड़ी रही। आँखें बंद कीं।
“क्या हो रहा है मुझसे…?”
कल रात की बातें एक-एक करके लौट आईं। बाज़ार में चाचा की तगड़ी चाल, लोगों का डरते हुए सम्मान करना, उनकी मोटी उंगलियाँ कपड़े चुनते हुए। फिर रात को दीवार के उस पार… और आज सुबह।
आज सुबह।
जब चाचा सिर्फ तौलिया बाँधे खड़े थे। बालों भरा चौड़ा सीना। पानी की बूँदें। तौलिये के नीचे की उभार। और उनकी नज़रें… जो उसकी गाँड पर टिकी हुई थीं।
सरिस्का की जाँघें खुद-ब-खुद सिकुड़ गईं। एक तेज़ लहर नीचे तक दौड़ गई। उसने दाँत भींच लिए।
“नफ़रत… मुझे नफ़रत करनी चाहिए।”
यह वाक्य उसने कई बार दोहराया। मन के अंदर, फुसफुसाहट में, लगभग प्रार्थना की तरह।
विनय के चाचा।
गुंडा रहे हैं।
घर की इज़्ज़त।
पति बीमार पड़े हैं।
बेटा छोटा है।
ये सब बातें एक के बाद एक उसके दिमाग में घूम रही थीं। हर बात एक दीवार की तरह खड़ी हो जाती, लेकिन शरीर उन दीवारों को तोड़ता जा रहा था।
उसने साड़ी के पल्लू को ठीक किया। फिर से नाभि के ऊपर खींचने की कोशिश की, लेकिन उंगलियाँ काँप गईं। साड़ी वहीं रह गई—नीचे। जानबूझकर बाँधी हुई।
“मैंने जानबूझकर बाँधी थी…”
यह सोचते ही शर्म की एक तेज़ लहर उसके चेहरे पर चढ़ गई। आँखें जलने लगीं। वह खुद से नफ़रत करने लगी।
“पतिव्रता… मैं पतिव्रता हूँ। विनय की बीवी हूँ। उनके बीमार शरीर के पास सोती हूँ। दवाइयाँ देती हूँ। और मैं… मैं उनके चाचा के शरीर को देखकर गीली हो रही हूँ?”
उसने सिंक का किनारा ज़ोर से पकड़ लिया। नाखून अंदर धँस गए।
लेकिन आँखें बंद करते ही वही दृश्य लौट आता।
चाचा का तगड़ा बदन।
तौलिया।
उनकी निगाहें जो उसकी गाँड पर टिकी थीं।
और वह क्षण जब दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे—बिना एक शब्द कहे।
उस क्षण में सरिस्का ने महसूस किया था कि चाचा की साँस भी भारी है। कि तौलिये के नीचे कुछ तन रहा है। और उसी पल उसकी अपनी गाँड अंदर से सिकुड़ गई थी।
“मैंने नियंत्रण रखा,” उसने खुद को समझाया।
“मैंने नज़रें फेर लीं। काम में लग गई। मैंने कुछ नहीं किया।”
लेकिन मन हँस रहा था।
क्योंकि नियंत्रण सिर्फ ऊपरी था। अंदर… अंदर आग फैल चुकी थी।
वह धीरे से बैठ गई। घुटनों पर सिर रख लिया। साड़ी के नीचे जाँघें अभी भी नम थीं। हर हल्की हरकत पर कपड़ा गीलापन को छू रहा था और याद दिला रहा था कि शरीर ने कब के हार मान ली है।
“मैं कैसे इस आग को बुझाऊँ?”
नफ़रत पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। अभी भी कहीं गहरी जगह पर वह पुरानी घृणा बैठी थी—चाचा के गुंडा अतीत के लिए, उनकी दबंगई के लिए, उस भय के लिए जो वे पैदा करते थे। लेकिन उस नफ़रत के ऊपर अब एक और परत चढ़ गई थी। मोटी, चिपचिपी, कामुक परत। जो नफ़रत को दबा रही थी, और साथ ही शर्म को और गहरा कर रही थी।
सरिस्का उठ खड़ी हुई। आईने के सामने फिर से गई।
अपने गदराए बदन को देखा। बड़े स्तन। भारी गाँड। साड़ी जो जानबूझकर नीचे बाँधी गई थी।
“यह शरीर… यह शरीर मुझे धोखा दे रहा है।”
उसने ब्लाउज़ के बटन पर उंगली फेरी। फिर झटके से हाथ हटा लिया। आँखें भर आईं।
आज का दिन बहुत लंबा होने वाला था।
और हर घंटे के साथ यह संघर्ष और तेज़ होता जाएगा—शर्म और भूख के बीच, पतिव्रता की दीवार और शरीर की आग के बीच।
वह रसोई में वापस आई। काम करने लगी। बर्तन। सब्ज़ी। आटा।
लेकिन हर काम के बीच-बीच में आँखें बंद हो जातीं।
और आँखें बंद होते ही चाचा का तगड़ा, बालों भरा सीना फिर से सामने आ जाता।
नफ़रत।
शर्म।
और उसके नीचे दबी हुई, धीरे-धीरे साँदो-तीन दिन और ऐसे ही बीत गए।
चाचा सुबह अपने ठेकेदारी के काम पर निकल जाते। वहाँ मजदूर, सीमेंट, हिसाब-किताब… लेकिन उनका मन कहीं और उलझा रहता। आँखें काम पर होतीं, पर दिमाग बार-बार उसी दृश्य पर लौट आता—रसोई में झुकी हुई सरिस्का, नाभि से नीचे बँधी साड़ी, भारी गाँड जो हर हल्की हरकत पर हिलती थी। तौलिये वाले दिन की बात तो बार-बार सताती। कभी-कभी काम के बीच ही उनका लिंग तन जाता। वे चुपचाप किसी कोने में चले जाते, साँस भारी करते, और मन ही मन कसमसाते—“बहू… घर की बहू… फिर भी…”
सरिस्का के भीतर वही पुराना युद्ध जारी था।
नफ़रत अभी भी कहीं बैठी थी। शर्म और भी गहरी हो गई थी। लेकिन शरीर हर रात बेचैन रहता। दीवार के उस पार चाचा की मौजूदगी महसूस होती, और जाँघों के बीच गर्मी फैल जाती। वह खुद को समझाती—“मैं पतिव्रता हूँ… विनय बीमार हैं… यह गलत है…” पर शरीर नहीं मानता था।
तीसरे दिन सुबह अलमारी खोलते हुए सरिस्का का हाथ रुक गया।
पीरियड्स आ गए थे।
और पैड का डिब्बा… खाली। सिर्फ एक पैड बचा था।
गाँव में यह चीज़ आसानी से नहीं मिलती। दुकानें दूर। और महिलाएँ खुद जातीं तो भी संकोच होता। सरिस्का का माथा ठनक गया। एक पैड से ज़्यादा देर नहीं चलेगा। कल तक तो चाहिए ही।
उसने रात भर सोचा।
विनय से कहे? लेकिन विनय बिस्तर पर थे, चल-फिर नहीं सकते।
बाहर किसी औरत से माँगे? गाँव में बातें फैल जाएँगी।
बस एक रास्ता बचा था।
अगली सुबह।
चाचा तैयार होकर निकलने ही वाले थे। खैनी मुँह में, कमीज़ के बटन बंद करते हुए। सरिस्का रसोई से निकली। कदम धीमे थे। सिर झुका हुआ। गला सूखा हुआ।
वह उनके पास जाकर खड़ी हो गई। आँखें ज़मीन पर गड़ाए।
“चाचा…” आवाज़ बहुत धीमी निकली।
चाचा मुड़े। “हम्म?”
सरिस्का के गाल जल रहे थे। वह दोनों हाथों से साड़ी का पल्लू मरोड़ रही थी। कुछ पल चुप रही। फिर जैसे हिम्मत जुटाते हुए बोली—
“वो… एक काम था…”
“बोलो।”
“बाजार से… वो… वाली चीज़… ला देना।” आवाज़ और भी दब गई।
चाचा की भौंहें थोड़ी सिकुड़ गईं। “कौन सी चीज़?”
सरिस्का की साँस अटक गई। आँखें और नीचे झुक गईं। गर्दन तक लाल हो चुकी थी। वह फुसफुसाई—
“वो… महिने वाली… पैड… बस एक पैकेट… खत्म हो गए हैं… गाँव में मिलते नहीं…”
आखिरी शब्द लगभग साँस में खो गए।
कमरे में एक अजीब सी खामोशी छा गई। चाचा कुछ क्षण उसे देखते रहे। सरिस्का का सिर पूरी तरह झुका हुआ था। कान लाल। होंठ काँप रहे थे। शर्म से उसका पूरा बदन तन गया था।
चाचा के मन में कुछ हिला। बहू… जो इन दिनों जानबूझकर साड़ी नीचे बाँधती थी, जो उनकी नज़रों से बचने की कोशिश करती थी, वही बहू आज इतनी बेबस खड़ी थी। इतनी निजी बात कहने के लिए मजबूर।
उन्होंने धीरे से कहा, “अच्छा। ला दूँगा।”
सरिस्का ने सिर्फ सिर हिलाया। बिना आँख उठाए पीछे हट गई। जैसे कोई बड़ा पाप करके भाग रही हो।
चाचा दरवाज़े से निकले। लेकिन मन में वही दृश्य घूम रहा था—सरिस्का की झुकी हुई गर्दन, लाल कान, काँपते होंठ। और उसके शरीर की वह शर्म… जो अजीब तरह से और भी आकर्षक लग रही थी।
शाम को जब चाचा लौटे, तो उन्होंने बिना कुछ कहे पैकेट सरिस्का के हाथ में थमा दिया। दोनों की नज़रें नहीं मिलीं। सरिस्का ने फुसफुसाकर “धन्यवाद” कहा और जल्दी से कमरे में चली गई।
दरवाज़ा बंद करते ही उसने पीठ टिका ली। आँखें बंद कीं।
शर्म की लहर फिर से पूरे शरीर में दौड़ गई।
“मैंने… उनसे यह माँग लिया…”नफ़रत, शर्म, और उसके नीचे दबी हुई वह भूख—तीनों एक साथ उसके मन में टकरा रही थीं।स लेती हुई… भूख।

पाँच दिन।
चाचा को ठेकेदारी के ज़रूरी काम से बाहर जाना पड़ा। सुबह जल्दी निकले। सरिस्का को घर खर्च के लिए कुछ पैसे देते हुए साधारण स्वर में बस इतना कहा, “पाँच दिन बाद लौटूँगा।” और चले गए।
घर फिर से शांत हो गया। लेकिन सरिस्का के अंदर की हलचल नहीं थमी।
तीसरे दिन उसके पीरियड्स खत्म हो गए।
शरीर ने जैसे कोई पुराना ताला खोल दिया हो। पहले दो दिन तो सिर्फ हल्की बेचैनी थी, लेकिन चौथे दिन से वह बेचैनी आग बनने लगी। रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे जाँघें अपने-आप रगड़ने लगतीं। स्तन भारी और संवेदनशील हो जाते। हर छोटी छूअन पर सिहरन दौड़ जाती। विनय बगल में सोते रहते—बीमार, कमज़ोर, साँस लेते हुए। उनकी मौजूदगी शर्म और और बढ़ा देती। सरिस्का करवट बदल-बदलकर खुद को रोकती। आँखें भींच लेती। मन के अंदर बार-बार वही पुराना संघर्ष दोहराती—
“मैं पतिव्रता हूँ।
विनय की बीवी हूँ।
यह शरीर मेरा नहीं… गलत है… बहुत गलत है…”
लेकिन शरीर नहीं मानता था।
पाँचवें दिन तो हालत और बिगड़ गई। सुबह उठते ही नीचे गीलापन महसूस होता। साड़ी बाँधते समय कूल्हे और जाँघों की हर हरकत जैसे याद दिला रही हो कि अंदर कितनी भूख जमा हो चुकी है। वह जानबूझकर ढीली साड़ी पहनती, ब्लाउज़ के बटन ऊपर तक बंद करती, बाल बाँध लेती—जैसे किसी कवच से खुद को ढक रही हो। पर कवच के अंदर आग धधक रही थी।
घर में एक तगड़ा, साँड़ जैसा मर्द था।
चौड़ा सीना, बालों भरी छाती, मोटी उंगलियाँ, दबंग चाल। जिसकी मौजूदगी भर से हवा भारी हो जाती थी। और वही मर्द… अभी घर में नहीं था। लेकिन उसकी याद हर कोने में बैठी थी। तौलिये वाला दिन, बाज़ार वाली शाम, पैड माँगते समय की शर्म—सब यादें शरीर को और बेचैन कर रही थीं।
सरिस्का दिनभर काम में खुद को डुबोए रखती। बर्तन, कपड़े, खाना, बच्चे की देखभाल। हर काम के बीच में अचानक रुक जाती। साँस तेज़ हो जाती। जाँघें सिकुड़ जातीं। फिर खुद को डाँटती—“शर्म कर… तू क्या सोच रही है… वह तेरे पति के चाचा हैं… गुंडा रहे हैं… नफ़रत कर…”
नफ़रत अभी भी थी। कहीं गहरी जगह पर। लेकिन उसके ऊपर इच्छा की परत इतनी मोटी हो चुकी थी कि नफ़रत दबती जा रही थी। शर्म बची हुई थी—तेज़, जलन पैदा करने वाली शर्म। वही शर्म उसे रोक रही थी कि वह अपने हाथों से अपनी भूख न मिटाए। शर्मीली, सीधी शादीशुदा औरत। जिसने हमेशा अपनी ज़रूरतों को दबाया था। आज भी दबाए जा रही थी। आँखें बंद करके, दाँत भींचकर, शरीर की हर माँग को ठुकराते हुए।
पाँचवें दिन शाम को चाचा लौटे।
दरवाज़े पर खड़े होकर उन्होंने खैनी निकाली। आँखें घर के अंदर घूमीं। सरिस्का रसोई से निकली। स्वागत में सिर झुकाया। साधारण सी मुस्कान। लेकिन चाचा की अनुभवी निगाहें चूक नहीं सकीं।
उन्होंने देखा—
सरिस्का की चाल में पहले से ज़्यादा भारीपन था। कूल्हे थोड़े और लचक के साथ हिल रहे थे। ब्लाउज़ के बटन कसकर बंद थे, फिर भी स्तनों की उभार पहले से ज़्यादा बेचैन लग रही थी। आँखें मिलते ही जल्दी से झुक गईं। गालों पर हल्की लाली। साँस थोड़ी तेज़। और जब वह मुड़ी, तो गाँड की हरकत… जैसे कोई दबा हुआ भूखा शरीर अपनी ज़रूरत खुद बता रहा हो।
चाचा कुछ नहीं बोले।
सिर्फ देखे।
अंदर ही अंदर एक धीमी मुस्कान तैर गई।
लोहा गरम है।
अब कुल्हाड़ी मारने का समय आ गया है।
वे अपने कमरे में चले गए। दरवाज़ा बंद किया। खैनी मुँह में दबाए बिस्तर पर बैठ गए। आँखें आधी बंद। दिमाग में प्लान बनने लगे—धीरे-धीरे, सब्र से, बिना जल्दबाज़ी के। बहू की शर्म को तोड़ना है। उसकी नफ़रत को पिघलाना है। और उस दबी हुई भूख को… बाहर निकालना है।
बाहर रसोई में सरिस्का खड़ी थी।
चाचा के लौटने की खबर से उसके शरीर में एक तेज़ झटका सा लगा था। जाँघों के बीच अचानक सिकुड़न हुई। उसने सिंक का किनारा ज़ोर से पकड़ लिया। आँखें बंद कीं।
“नहीं… फिर से वही संघर्ष…
मैं अपने आपको रोकूँगी।
हर कीमत पर रोकूँगी।”
लेकिन शरीर पहले ही जवाब दे चुका था।
और दीवार के उस पार… एक अनुभवी खिलाड़ी चुपचाप इंतज़ार कर रहा था।
 

NILUX

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यह सिलसिला लगभग चार घंटे तक चलता रहा। कभी थमता, फिर फिर शुरू हो जाता।
आखिरकार बहुत देर बाद सरिस्का वापस विनय के कमरे में आई।
विनय ने तुरंत आँखें बंद कर लीं। सोने का नाटक।
जैसे ही वह लेटी, वही गंध आई—पिछले दो-तीन दिनों से आती वही भारी, मर्दाना गंध। नाइटी पहने हुए थी। साड़ी चाचा के कमरे में ही रह गई थी।
सुबह हुई। विनय की आँखों में नींद नहीं आई थी।
जब सरिस्का पास आई तो उसने हल्के से कहा—
“रात तो तुम साड़ी पहने हुई थी…”
सरिस्का ने सहज जवाब दिया—
“आपके सोने के बाद नींद नहीं आ रही थी… इसलिए मैंने निकाल दी थी।”
विनय ने सिर्फ़ हल्की सी मुस्कान दी।
अंदर ही अंदर सब कुछ जानते हुए।

Ab aage

रात भर नहीं सोने के बाद भी विनय को नींद नहीं आई सुबह सरिस्का उठकर अपने कामों में लग गई विनय यही सोचता रहा और रात के बारे में याद करता रहा
दीवार के पार से आ रही हर आवाज़ उसके मन में कील की तरह धँस रही थी। कपड़ों की सरसराहट, सरिस्का की सिसकियाँ, चाचा की दबंग गहरी आवाज़—हर चीज़ उसके अंदर एक-एक करके कुछ तोड़ रही थी।
वह सोच रहा था—सात साल।
सात साल उसने इस औरत के साथ बिताए थे। बीमारी के बाद जब उसका शरीर काम करना छोड़ चुका था, तब भी सरिस्का उसके पास रही थी। खाना खिलाया, दवा दी, नहलाया, कपड़े पहनाए। वह सोचता था कि शायद यही प्यार है। शायद यही साथ है।
लेकिन आज रात सब कुछ झूठ लग रहा था।
व्हीलचेयर कोने में खड़ी थी। उतनी दूर कि वह छू भी नहीं सकता था। शारीरिक बेबसी की वह कड़वी सच्चाई बार-बार उसके गले में अटक जाती। वह चाहकर भी उठ नहीं सकता था। दीवार तोड़कर नहीं जा सकता था। दोनों को पकड़कर नहीं पूछ सकता था—“यह क्या कर रहे हो?”
बस सुन सकता था।
और सुनते हुए उसका मन एक अजीब से संघर्ष में फँस गया था।
एक तरफ़ गुस्सा था—तेज़, काला, जलता हुआ गुस्सा। सरिस्का पर, चाचा पर, अपनी किस्मत पर।
दूसरी तरफ़ एक गहरी शर्म थी। अपनी लाचारी पर शर्म। कि वह पति होकर भी अपनी बीवी को दूसरे मर्द के बिस्तर पर जाने से नहीं रोक सका।
तीसरी तरफ़ एक डरावना खालीपन था। जैसे उसके अंदर जो कुछ भी बचा था, वह धीरे-धीरे निकलता जा रहा हो।
जब चाचा ने कहा—“एक महीने से चुद रही है… अभी भी दर्द होता है क्या?”
तो विनय की साँस अटक गई।
एक महीने।
कम से कम एक महीने से यह सब चल रहा था। और वह हर रात नींद की गोली खाकर सोता रहा। बेखबर। बेबस।
सरिस्का की जवाब में आई आवाज़—“आपका है ही इतना बड़ा…”
उस वाक्य ने उसके अंदर कुछ और तोड़ दिया।
वह याद करने लगा कि सरिस्का उसके साथ कैसे होती थी। हमेशा धीमी, संयमित, कभी ज़्यादा आवाज़ नहीं निकालती। कभी इतनी बेकाबू नहीं होती। कभी ऐसे गिड़गिड़ाती नहीं थी।
आज जो सिसकियाँ दीवार पार से आ रही थीं… वे किसी और औरत की लग रही थीं। उसकी बीवी की नहीं।
मन में सवाल घूम रहे थे—
क्या वह कभी सच में उससे प्यार करती थी?
या सिर्फ़ दया?
क्या बीमारी के बाद वह उसके लिए सिर्फ़ एक बोझ बन गई थी?
और चाचा… जिन्होंने घर दिया, सहारा दिया… क्या वही उसकी बीवी को छीन रहे थे?
विनय ने चारपाई के किनारे को इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उँगलियाँ सफेद पड़ गईं। आँखें जल रही थीं, लेकिन आँसू नहीं आए। सिर्फ़ एक भारी, काला बोझ उसके सीने पर बैठ गया था।
चार घंटे तक आवाज़ें आती रहीं।
हर धक्के के साथ उसका मन और गहराई में डूबता गया।
हर सिसकी के साथ वह थोड़ा और टूटता गया।
जब आखिरकार सन्नाटा हुआ और सरिस्का वापस आई, तो विनय ने आँखें बंद कर लीं।
सोने का नाटक।
लेकिन अंदर वह जाग रहा था। पूरी तरह जाग रहा था।
जैसे ही सरिस्का उसके पास लेटी और वह गंध आई—वही गंध जो पिछले दिनों से आ रही थी—विनय का मन एक बार फिर काँपा।
यह गंध अब सिर्फ़ गंध नहीं रह गई थी।
यह उसके विश्वास के टूटने की गंध थी।
यह उसकी मर्दानगी की हार की गंध थी।
यह उसकी पूरी ज़िंदगी के छल की गंध थी।
सुबह जब उसने पूछा—“रात तो तुम साड़ी पहने हुई थी…”
और सरिस्का ने सहज जवाब दिया—“आपके सोने के बाद नींद नहीं आ रही थी… इसलिए मैंने निकाल दी थी।”
विनय ने हल्की सी मुस्कान दे दी।लेकिन अंदर…
अंदर वह मुस्कुरा नहीं रहा था।
अंदर वह चिल्ला रहा था।
बिल्कुल चुपचाप।
इन सब बातों को सोचकर विनय सोचता है कि मेरी बीवी क्या से क्या हो गई है और मुझे कुछ भी खबर नहीं

Ab Yahan Se Kahani Ko Wapas 3 mahine pahle Lekar Chalte Hain Jab

सरिस्का में गांव आए थे चाचा हमको गांव लेकर आए थे इन सब सवालों का पता करने के लिए

कहानी यहां से फ्लैशबैक में चलती है 3 महीने पहले
सरिस्का जब भी घर से निकलती, राम बहादुर की आँखें उसके पीछे चिपक जातीं।
वह सुबह-सुबह आँगन में झाड़ू लगाती, बाल खुले, साड़ी का पल्लू कंधे पर ढीला छोड़कर। चाचा अपने कमरे के दरवाज़े पर खड़े होकर चुपचाप देखते। उसके गोरे, गदरे, कामुक शरीर पर सूरज की रोशनी पड़ती तो चाचा के अंदर कुछ जलने लगता। 45 साल का, 6.5 फिट लंबा, हट्टा-कट्टा, तगड़ा शरीर वाला काला आदमी। चेहरा अच्छा नहीं था, मुँह में हमेशा खैनी भरी रहती। लेकिन आँखें… आँखें सरिस्का के बदन पर ऐसी चिपकतीं जैसे कोई भूखा जानवर।
पहले हफ़्ते में सरिस्का ने इसे अनदेखा किया। सोचा—चाचा हैं, शायद आदत से।
दूसरे हफ़्ते में घूरना और गहरा हो गया। जब वह पानी भरने जाती, चाचा पीछे-पीछे आ जाते। दूर खड़े होकर उसकी कमर, जाँघों, गदराए स्तनों और गोल कूल्हों पर नज़रें टिकाए रखते। सरिस्का जब मुड़कर देखती तो चाचा खैनी थूकते हुए मुस्कुरा देते, “कुछ चाहिए तो बोल देना बहू… मैं हूँ न।”
तीसरे हफ़्ते में बातें बढ़ीं।
चाचा अब विनय के पास कम बैठते, सरिस्का के पास ज़्यादा।
“बेटा, तुम टेंशन मत लो। इलाज का सारा खर्चा मैं दूँगा। ठेकेदारी अच्छा चल रहा है।”
फिर धीरे से सरिस्का की ओर मुड़कर, आवाज़ में एक अलग सी गरमाहट लाते हुए, “तुम भी थक जाती होगी न… रात-रात भर उठ-उठकर। कोई मदद चाहिए तो बता देना।”
सरिस्का असहज हो जाती। वह सिर झुकाकर “जी चाचा” कहकर निकल जाती। लेकिन चाचा की नज़रें उसके शरीर पर चिपककर रह जातीं। कभी-कभी वह साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए जानबूझकर देर तक खड़ा रह जाता। उसके काले, मोटे होठों पर खैनी की लार चमकती, और आँखों में साफ़-साफ़ वही भूख दिखती जो सरिस्का के गदरे बदन को देखकर पैदा होती।
चौथे हफ़्ते में घूरना खुला हो गया।
एक दिन सरिस्का रसोई में खड़ी थी। चाचा पीछे से आए और दरवाज़े पर खड़े होकर बोले, “बहू, आज खाना बहुत अच्छा बना है।” लेकिन उनकी आँखें खाने पर नहीं थीं। वे सीधे सरिस्का की कमर और भारी स्तनों पर टिकी थीं। सरिस्का ने मुड़कर देखा तो चाचा की निगाहें साफ़-साफ़ उसके सीने पर थीं। वह जल्दी से मुँह फेर लिया, लेकिन चाचा ने खैनी चबाते हुए एक लंबी साँस ली, जैसे किसी खुशबू को सूँघ रहा हो।
रात को सरिस्का और विनय एक ही कमरे में सोते। लाइट जलती रहती। चाचा अपने अलग कमरे में लेटे रहते, लेकिन उनकी नींद उड़ चुकी थी। दीवार के उस पार सरिस्का की हल्की हलचल, साड़ी की सरसराहट, कभी-कभी विनय को पानी पिलाने की आवाज़… सब कुछ चाचा के दिमाग में घूमता रहता। वह अपने मोटे हाथों से अपना लिंग दबा लेते, दाँत भींच लेते, और मन ही मन कसम खाते—इस कामुक बदन को मैं कैसे भी करके पाऊँगा।
एक महीने के अंत तक सरिस्का पूरी तरह असहज हो चुकी थी।
वह घर में भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती थी। चाचा हर दिन मदद का वादा करते, इलाज की बात करते, और बीच-बीच में उन आँखों से घूरते जो साफ़ कहती थीं—मैं तुम्हारे बदन को चाहता हूँ।
सरिस्का चुपचाप सहती रही।
और चाचा… चुपचाप, अपनी काली तगड़ी देह में दबाए हुए उस आग को, इंतज़ार करते रहे।

एक महीना खत्म होते-होते
सरिस्का के मन में राम बहादुर के लिए घृणा गहरी जमी हुई थी।
यही चाचा कभी गुंडा-मवाली का काम करते थे। इसी वजह से सरिस्का के घरवालों ने रिश्ता नामंजूर कर दिया था। दोनों ने भागकर शादी की थी।
अब वही आदमी रोज मदद का वादा कर रहा था, रोज घूर रहा था, और रोज उसके कामुक बदन पर अश्लील नज़रें डाल रहा था। सरिस्का अंदर ही अंदर चिढ़ती, घबराती, लेकिन कुछ बोल नहीं पाती।
फिर भी… मदद बेपनाह थी।
दवाइयाँ, पैसे, घर का खर्चा, विनय की देखभाल—सब कुछ चाचा संभाल रहे थे। ठेकेदारी का काम छोड़कर भी आ जाते थे। धीरे-धीरे सरिस्का के मन में एक अजीब सा द्वंद्व पैदा होने लगा।
“मैं तो इन्हें इतना बुरा मानती हूँ… लेकिन ये हमारी कितनी मदद कर रहे हैं।”
यह ख्याल बार-बार आता और उसका गुस्सा थोड़ा-थोड़ा पिघलने लगता।
एक महीने के अंत में डॉक्टर ने विनय की रेगुलर चेकअप और नई दवाइयों का समय बताया।
सुबह ही चाचा अपने कमरे से निकले। खैनी मुँह में दबाए, तगड़ी काली देह को साधारण कमीज़ में समेटे।
“बहू, आज विनय को अस्पताल लेकर चलना है। मैं गाड़ी लेकर आता हूँ। तुम तैयार हो जाना।”
सरिस्का ने सिर हिलाया। मन में एक बार फिर वही बात आई—
“कुछ भी हो… दिल के अच्छे हैं चाचा।”

अस्पताल
चाचा ने खुद व्हीलचेयर निकाली। विनय को बिस्तर से उठाते समय उनकी मोटी, काली बाँहें आसानी से उसके पूरे शरीर को समेट गईं।
6.5 फिट का हट्टा-कट्टा आदमी था। विनय उनके लिए जैसे कोई बच्चा हो। चाचा ने उसे ऐसे उठाया जैसे कोई बोझ ही न हो, और व्हीलचेयर पर बैठा दिया।
सरिस्का थोड़ी दूर खड़ी देख रही थी।
चाचा की ताकत, उनके शरीर की मजबूती, और जिस आसानी से उन्होंने उसके पति को संभाला… कुछ अलग सा लगा। पहले कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया था। अब अचानक नज़र गई।
अंदर डॉक्टर ने जाँच की, नई दवाइयाँ लिखीं। चाचा खुद काउंटर पर गए, पैसे दिए, दवाइयाँ लिए। वापस आकर विनय को फिर उसी आसानी से गोद में उठाया और गाड़ी तक ले गए।
सरिस्का गाड़ी में पीछे बैठी। आगे चाचा ड्राइव कर रहे थे। खैनी थूकने के लिए खिड़की खोली, फिर मुस्कुराकर बोले,
“अब घबरा मत। सब ठीक हो जाएगा। मैं हूँ न।”
सरिस्का ने धीरे से जवाब दिया, “जी चाचा… बहुत मेहरबानी।”
आवाज़ में नफ़रत अब थोड़ी कम थी। सिर्फ असहजता और एक अजीब सी कृतज्ञता बची थी।

शाम तक घर पहुँच गए।
चाचा ने फिर से विनय को आसानी से उठाकर कमरे में बिस्तर पर लिटाया। सरिस्का ने दवाइयाँ रखीं, पानी पिलाया। चाचा दरवाज़े पर खड़े रहे, खैनी चबाते हुए। उनकी आँखें एक बार फिर सरिस्का के गदरे शरीर पर ठहर गईं—कमरा, साड़ी का पल्लू, थकी हुई आँखें… सब कुछ।
लेकिन इस बार सरिस्का ने उनकी नज़रों को अनदेखा कर दिया।
मन में सिर्फ एक बात घूम रही थी—
“जो भी हैं… मदद तो कर रहे हैं।”रात होने वाली थी।
चाचा अपने कमरे की ओर बढ़े। और सरिस्का… विनय के पास बैठकर चुपचाप सोचती रही।

चाचा की मदद अब रोजमर्रा की दिनचर्या बन गई थी।
सुबह जल्दी उठ जाते। खैनी मुँह में दबाए, तगड़ी काली देह को कमीज़ में समेटे। पहले विनय को बिस्तर पर संभालते, फिर सरिस्का के बेटे को स्कूल के लिए तैयार करते। खुद गाड़ी में बिठाकर स्कूल छोड़ आते। कभी-कभी वापस आते समय बच्चे के लिए खिलौने, मिठाई या कोई नई चीज़ लेकर आ जाते।
सरिस्का यह सब देखकर बस इतना सोचती—
“परिवार का हिस्सा हैं… मदद कर रहे हैं।”
वह बहुत सीधी-सादी थी। चाचा की आँखों में छिपी भूख को अभी भी पूरी तरह समझ नहीं पाती थी, या समझकर भी अनदेखा कर देती थी।
लेकिन राम बहादुर के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।
जब भी सरिस्का रसोई में काम करती, आटा गूँधती, बर्तन माँजती या आँगन में झाड़ू लगाती, चाचा की नज़रें उसके गोरे, चिकने शरीर पर चिपक जातीं।
5 फुट 6 इंच लंबा, 36-28-38+ का गदराया, कामुक बदन। साड़ी का पल्लू जब कंधे से सरक जाता, या कमर झुकने पर कूल्हे उभर आते, तो चाचा के पजामे के अंदर लिंग खुद-ब-खुद झटका करने लगता। वे खैनी चबाते हुए दाँत भींच लेते, और मन ही मन कसम खाते—इस बदन को धीरे-धीरे पिघलाऊँगा।
वे आगे बढ़ने लगे, लेकिन बहुत सावधानी से।
कभी रसोई में आकर “बहू, मैं बर्तन धो दूँ?” कहते।
कभी पानी का घड़ा उठाते हुए जानबूझकर पास से गुजरते।
कभी बच्चे के सामने ही सरिस्का की तारीफ करते—“तुम कितनी मेहनत करती हो… विनय किस्मत वाला है।”
आवाज़ में गरमाहट थी, नज़रों में भूख। लेकिन सीधे कुछ अश्लील नहीं बोलते थे। बस धीरे-धीरे दीवारें गिरा रहे थे।
पंद्रह दिन ऐसे ही निकल गए।
सरिस्का अभी भी पतिव्रता, शर्मीली और सीधी-सादी बनी रही।
चाचा की मदद स्वीकार करती, धन्यवाद कहती, और किनारा कर लेती। लेकिन रात को… जब लाइट बुझाकर विनय के पास लेटती, तो कभी-कभी अचानक चाचा का भारी-भरकम शरीर याद आ जाता।
6 फुट 5 इंच लंबा, चौड़ा, हट्टा-कट्टा, ताकतवर काला बदन। जिसने विनय को जैसे पत्ता उठाया था।
उस ख्याल से सरिस्का का शरीर अपने-आप हरकत करने लगता। जाँघों के बीच हल्की गर्मी, निप्पल्स का सख्त होना, साँस का तेज़ हो जाना।
फिर वह खुद को झटके से रोकती।
“नहीं… नहीं… ये विनय के चाचा हैं। मैं पागल हो रही हूँ क्या?”
वह करवट बदल लेती, आँखें मूंद लेती, और मन को जबरदस्ती विनय की तरफ मोड़ने की कोशिश करती।
लेकिन अंदर कहीं कोई छोटी सी आग… बुझ नहीं रही थी।और दीवार के उस पार, अपने कमरे में, चाचा खैनी चबाते हुए अँधेरे में लेटे रहते।
पजामे के अंदर लिंग तना हुआ।
और मन में सिर्फ एक ही तस्वीर—सरिस्का का गोरा, गदराया, कामुक बदन।

ऐसे ही पंद्रह दिन और निकल जाते हैं और अब उनको गांव आए हुए लगभग एक महीना 15 दिन हो गए थे… और सरिस्का का मन
चाचा की मदद अब घर का हिस्सा बन चुकी थी।
सुबह जल्दी उठकर बच्चे को स्कूल छोड़ना, खिलौने लाना, दवाइयाँ लाना, विनय को उठाना-बिठाना—सब कुछ वे कर रहे थे। सरिस्का इसे परिवार की मदद मानती। सीधी-सादी थी। दिल में अभी भी पुरानी नफ़रत बाकी थी—यही आदमी कभी गुंडा-मवाली था, जिसके कारण घरवालों ने रिश्ता तक नहीं किया था। लेकिन अब वही आदमी उसके पति की ज़िंदगी संभाल रहा था।
यह द्वंद्व उसे रात-दिन खाए जा रहा था।
दिन में जब चाचा पास आते, रसोई में खड़े होकर बात करते, या जानबूझकर उसकी ओर देखते, तो सरिस्का का शरीर पहले असहज होता। उनकी काली, तगड़ी देह, 6 फुट 5 इंच का भारी-भरकम ढाँचा, खैनी भरे काले होठ… सब कुछ उसे याद दिलाता कि यह आदमी साधारण नहीं। लेकिन जब वे विनय को आसानी से गोद में उठा लेते, या बच्चे के लिए नई चीज़ लाते, तो मन कमज़ोर पड़ जाता।
“ये मदद कर रहे हैं… इतनी मदद कोई अजनबी नहीं करता। शायद बदल गए हैं।”
रात सबसे मुश्किल थी।
लाइट बुझ जाती। विनय बगल में सोया रहता—कमर से नीचे बिल्कुल सुन्न। सरिस्का आँखें मूंद लेती, लेकिन नींद नहीं आती। अचानक चाचा का शरीर याद आ जाता। जिस दिन अस्पताल में उन्होंने विनय को ऐसे उठाया था जैसे कोई बच्चा हो… उनकी बाँहों की मोटाई, सीने की चौड़ाई, ताकत।
उस ख्याल से सरिस्का के शरीर में एक अजीब सी हरकत शुरू हो जाती। जाँघों के बीच हल्की सी नमी, स्तनों का भारी होना, साँस का उलझना। वह तुरंत करवट बदलती, दाँत भींचती।
“पागल हो गई हूँ क्या मैं? ये विनय के चाचा हैं। रिश्ते में बड़े हैं। मैं पतिव्रता हूँ। मुझे ऐसे विचार नहीं आने चाहिए।”
लेकिन विचार रुकते नहीं थे।
जितना वह खुद को डाँटती, उतना ही शरीर प्रतिक्रिया देता। कभी-कभी वह विनय का हाथ पकड़ लेती, जैसे उससे माफ़ी माँग रही हो। मन में बार-बार एक ही सवाल घूमता—
“मैं इनसे नफ़रत क्यों नहीं कर पा रही पूरी तरह? मदद के कारण दिल पिघल रहा है… या कुछ और?”
सुबह होती तो वह चेहरे से सब मिटा देती। चाचा को “जी चाचा” कहती, काम में लग जाती। लेकिन अंदर कश्मकश चलती रहती। एक तरफ़ सालों पुरानी घृणा और शर्मीली पतिव्रता भावना, दूसरी तरफ़ रोजमर्रा की मदद और रात को शरीर की वह अजीब सी बेचैनी।

दिन ऐसे ही बीते।
सरिस्का की दीवार अभी मजबूत थी। लेकिन उसमें दरारें पड़ने लगी थीं—छोटी-छोटी, धीमी, और बहुत खतरनाक।
चाचा यह सब देख रहे थे।
और इंतज़ार कर रहे थे।.

फिर एक दिन
सुबह चाचा जल्दी निकल गए। ठेकेदारी का कोई ज़रूरी काम था।
सरिस्का दिनभर घर के कामों में लग गई—पति को दवाइयाँ देना, खाना बनाना, बर्तन साफ़ करना, बच्चे के स्कूल से लौटने का इंतज़ार। मन में वही पुराना द्वंद्व चलता रहा। नफ़रत पूरी तरह गई नहीं थी, लेकिन मदद के बोझ तले दबती जा रही थी।
शाम ठीक चार बजे चाचा लौटे। खैनी मुँह में, पसीने से भीगी कमीज़, तगड़ी काली देह।
दरवाज़े पर खड़े होकर बोले, “बहू, बाजार चलो। तुम्हारे लिए भी कपड़े ले आना, विनय के लिए भी, और बच्चे के लिए कुछ चीज़ें। बहुत दिन हो गए।”
सरिस्का मना करने ही वाली थी। मन में अभी भी हल्की नफ़रत बाकी थी। लेकिन चाचा ने जोर दिया,
“अरे, एक बार चल लो न। मैं हूँ साथ में।”
विनय ने भी बिस्तर से ही बोल दिया, “चली जाओ… क्या रखा है घर में। जाओ।”
सरिस्का चुपचाप तैयार हो गई।
बाजार में पहुँचते ही उसने देखा—लोग चाचा को देखते ही किनारा कर लेते। कोई नमस्ते करता, कोई सिर झुका लेता। उनकी 6 फुट 5 इंच की लंबाई, चौड़ा सीना, दबंग चाल… लोगों में एक अलग ही भय और इज्जत पैदा करती थी। सरिस्का अंदर ही अंदर एक अजीब सा अहसास महसूस कर रही थी। नफ़रत तो थी, लेकिन इस दबंगई को देखकर कुछ और भी हो रहा था—जो वह खुद से छिपाना चाहती थी।
कपड़ों की दुकान पर चाचा खुद खड़े रहे। विनय और बच्चे के कपड़े तो जल्दी चुन लिए। फिर सरिस्का की ओर मुड़े।
उन्होंने कुछ साड़ियाँ और सूट अपनी पसंद से निकाले—रंग गहरे, कट ऐसा जो शरीर को और उभार दे। सरिस्का ने हिचकते हुए भी ले लिए। मना नहीं कर सकी।
घर लौटे। खाना खाया। फिर सब अपने-अपने कमरों में चले गए।
रात
सरिस्का लाइट बुझाकर लेट गई। विनय बगल में साँस ले रहा था। लेकिन आँखों के सामने बार-बार चाचा का शरीर घूम रहा था—बाजार में उनकी लंबी तगड़ी चाल, लोगों का डरते हुए सम्मान करना, और जब वे कपड़े चुन रहे थे तो उनकी मोटी उंगलियाँ।
मन संघर्ष कर रहा था।
“ये विनय के चाचा हैं… गुंडा रहे हैं… मैं नफ़रत करती हूँ… फिर क्यों याद आ रहे हैं?”
शरीर फिर से हरकत करने लगा। जाँघों में गर्मी, साँस तेज़। वह करवट बदल-बदलकर खुद को रोकने की कोशिश करती रही। शर्मीली पतिव्रता भावना और शरीर की बेचैनी एक-दूसरे से लड़ रहे थे।
दीवार के उस पार
चाचा अँधेरे में लेटे थे। पजामे के अंदर लिंग तना हुआ।
बाजार का पूरा सीन आँखों के सामने था—सरिस्का आगे-आगे चल रही थी, साड़ी में उसकी मटकती हुई गाँड, गोल कूल्हे, हर कदम पर हिलते हुए। चाचा ने उसी समय पीछे-पीछे चलते हुए अपनी पजामे के अंदर हाथ डालकर लिंग सहलाया था। अब कमरे में लेटे-लेटे फिर से वही कर रहे थे। आँखें बंद, साँस भारी, और मन में सिर्फ वही मटकता बदन।
दोनों कमरों में एक ही आग जल रही थी।
एक तरफ़ शर्म और संघर्ष, दूसरी तरफ़ खुली भूख।

दूसरे दिन सुबह घर का माहौल पहले जैसा ही लगता था, लेकिन अंदर कुछ बदल चुका था।
सरिस्का जल्दी-जल्दी बेटे को स्कूल के लिए तैयार कर रही थी। नहलाया, कपड़े पहनाए, टिiffin पैक किया। इतने में चाचा उठकर बाहर आए। खैनी मुँह में दबाए, कमीज़ के बटन अभी पूरे नहीं खोले हुए।
“तैयार हो गया हो तो मैं छोड़ आता हूँ इसे,” उन्होंने साधारण स्वर में कहा।
बेटा खुशी-खुशी चाचा के साथ चला गया। दरवाज़ा बंद होते ही घर में सन्नाटा छा गया।
सरिस्का कुछ क्षण खड़ी रही। फिर अचानक उठकर कमरे में घुसी। कल बाज़ार से लाए गए कपड़ों का पार्सल खोला। गहरी मरून साड़ी और उससे मैच करता टाइट ब्लाउज़। उसने जानबूझकर साड़ी को नाभि से चार इंच नीचे बाँधा। पल्लू को इस तरह डाला कि कमर और कूल्हे साफ़ उभार पर आ जाएँ। आईने के सामने खड़ी होकर खुद को देखा।
गदराया हुआ चिकना बदन। बड़े-बड़े स्तन जो ब्लाउज़ में कसकर भरे हुए थे। साड़ी के नीचे गोल, भारी गाँड जो हर हल्की हरकत पर हिलती थी। आज वह पहले से कहीं ज़्यादा कामुक लग रही थी। खुद को देखकर उसके चेहरे पर एक अजीब सी लाली छा गई, लेकिन उसने साड़ी को और नीचे खींच लिया।
चुपचाप रसोई में काम करने लगी।
बेटे को स्कूल छोड़कर चाचा वापस आए। घर में सरिस्का नज़र नहीं आई। वे सीधे नहाने चले गए।
जब वे स्नान करके निकले तो नीचे सिर्फ एक तौलिया बाँधा हुआ था। ऊपर का पूरा शरीर नंगा—चौड़ा, बालों भरा सीना, कंधे, बाज़ू, पेट की मांसपेशियाँ। पानी की बूँदें अभी भी उनके तगड़े बदन पर चमक रही थीं। तौलिया कमर पर कसकर बँधा था, लेकिन उसके नीचे की उभार साफ़ झलक रही थी।
रसोई की ओर जाते हुए उनकी नज़र सरिस्का पर पड़ी।
वह झुककर बर्तन धो रही थी। साड़ी नाभि से काफ़ी नीचे बँधी हुई। पीठ मुड़ी हुई। गाँड पूरी तरह उभरी हुई, गोल और भारी, साड़ी के कपड़े में कसकर भरी हुई। हर छोटे-छोटे मूवमेंट पर वह हिल रही थी।
चाचा वहीं रुक गए। तौलिया में लिपटे शरीर के साथ। आँखें सरिस्का की उस गाँड पर अटक गईं। कुछ पल वे सिर्फ देखते रहे। साँस भारी हो गई।
सरिस्का ने महसूस किया कि कोई देख रहा है। वह घूमी।
और ठहर गई।
चाचा सिर्फ तौलिया बाँधे खड़े थे। बालों भरा चौड़ा सीना, पानी की चमक, तगड़ी मांसपेशियाँ, और तौलिये के नीचे साफ़ दिखती हुई उभार। सरिस्का की आँखें उनके सीने पर जाकर अटक गईं। फिर नीचे खिसकीं। एक तेज़ झटका उसके पूरे शरीर में दौड़ा। जाँघों के बीच अचानक सिकुड़न हुई। गाँड अंदर से कस गई। साँस अटक गई।
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
कुछ क्षण।
फिर सरिस्का ने जल्दी से नज़रें फेर लीं और बर्तन धोने में लग गई। लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे। शरीर में गर्मी फैल रही थी। साड़ी के नीचे उसकी जाँघें गीली होने लगी थीं।
चाचा भी धीरे से मुड़े और अपने कमरे की ओर चले गए। तौलिये के अंदर उनका लिंग पूरी तरह तन चुका था। कमरे में जाकर उन्होंने दरवाज़ा बंद किया। आँखें बंद कीं और रसोई का वह दृश्य फिर से चलाया—सरिस्का की झुकी हुई पीठ, नाभि से नीचे बँधी साड़ी, और वह भारी, मटकती गाँड।
सरिस्का रसोई में खड़ी थी। बर्तन धोते हुए भी उसका मन कमरे में था। चाचा का नंगा सीना, बाल, तगड़ी देह… और तौलिये के नीचे की वह उभार। उसने होंठ काटे। शरीर फिर से बेचैन हो उठा।
थोड़ी देर बाद उसने चाचा के लिए नाश्ता तैयार किया। थाली लेकर उनके कमरे में गई। चाचा अब कमीज़ पहन चुके थे, लेकिन आँखों में अभी भी वही भूख थी।
उन्होंने खाना खाया। सरिस्का चुपचाप पास खड़ी रही। दोनों के बीच हवा भारी थी। कोई ज़्यादा बात नहीं हुई।
खाना खाकर चाचा काम पर निकल गए।
घर फिर से खाली हो गया।
सरिस्का दरवाज़ा बंद करके रसोई में वापस आई। साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए उसने महसूस किया कि उसकी साँस अभी भी तेज़ है। और जाँघों के बीच… अभी भी गीलापन बाकी है।

घर खाली हो चुका था।
चाचा काम पर निकल गए थे। बेटा स्कूल में था। विनय कमरे में सो रहे थे।
सरिस्का रसोई में अकेली खड़ी थी। साड़ी अभी भी नाभि से चार इंच नीचे बँधी हुई। ब्लाउज़ टाइट। आईने में जो शरीर उसने देखा था, वही शरीर अब उसके अपने हाथों के नीचे काँप रहा था।
लेकिन शरीर से ज़्यादा बेचैन उसका मन था।
वह सिंक के किनारे हाथ रखे खड़ी रही। आँखें बंद कीं।
“क्या हो रहा है मुझसे…?”
कल रात की बातें एक-एक करके लौट आईं। बाज़ार में चाचा की तगड़ी चाल, लोगों का डरते हुए सम्मान करना, उनकी मोटी उंगलियाँ कपड़े चुनते हुए। फिर रात को दीवार के उस पार… और आज सुबह।
आज सुबह।
जब चाचा सिर्फ तौलिया बाँधे खड़े थे। बालों भरा चौड़ा सीना। पानी की बूँदें। तौलिये के नीचे की उभार। और उनकी नज़रें… जो उसकी गाँड पर टिकी हुई थीं।
सरिस्का की जाँघें खुद-ब-खुद सिकुड़ गईं। एक तेज़ लहर नीचे तक दौड़ गई। उसने दाँत भींच लिए।
“नफ़रत… मुझे नफ़रत करनी चाहिए।”
यह वाक्य उसने कई बार दोहराया। मन के अंदर, फुसफुसाहट में, लगभग प्रार्थना की तरह।
विनय के चाचा।
गुंडा रहे हैं।
घर की इज़्ज़त।
पति बीमार पड़े हैं।
बेटा छोटा है।
ये सब बातें एक के बाद एक उसके दिमाग में घूम रही थीं। हर बात एक दीवार की तरह खड़ी हो जाती, लेकिन शरीर उन दीवारों को तोड़ता जा रहा था।
उसने साड़ी के पल्लू को ठीक किया। फिर से नाभि के ऊपर खींचने की कोशिश की, लेकिन उंगलियाँ काँप गईं। साड़ी वहीं रह गई—नीचे। जानबूझकर बाँधी हुई।
“मैंने जानबूझकर बाँधी थी…”
यह सोचते ही शर्म की एक तेज़ लहर उसके चेहरे पर चढ़ गई। आँखें जलने लगीं। वह खुद से नफ़रत करने लगी।
“पतिव्रता… मैं पतिव्रता हूँ। विनय की बीवी हूँ। उनके बीमार शरीर के पास सोती हूँ। दवाइयाँ देती हूँ। और मैं… मैं उनके चाचा के शरीर को देखकर गीली हो रही हूँ?”
उसने सिंक का किनारा ज़ोर से पकड़ लिया। नाखून अंदर धँस गए।
लेकिन आँखें बंद करते ही वही दृश्य लौट आता।
चाचा का तगड़ा बदन।
तौलिया।
उनकी निगाहें जो उसकी गाँड पर टिकी थीं।
और वह क्षण जब दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे—बिना एक शब्द कहे।
उस क्षण में सरिस्का ने महसूस किया था कि चाचा की साँस भी भारी है। कि तौलिये के नीचे कुछ तन रहा है। और उसी पल उसकी अपनी गाँड अंदर से सिकुड़ गई थी।
“मैंने नियंत्रण रखा,” उसने खुद को समझाया।
“मैंने नज़रें फेर लीं। काम में लग गई। मैंने कुछ नहीं किया।”
लेकिन मन हँस रहा था।
क्योंकि नियंत्रण सिर्फ ऊपरी था। अंदर… अंदर आग फैल चुकी थी।
वह धीरे से बैठ गई। घुटनों पर सिर रख लिया। साड़ी के नीचे जाँघें अभी भी नम थीं। हर हल्की हरकत पर कपड़ा गीलापन को छू रहा था और याद दिला रहा था कि शरीर ने कब के हार मान ली है।
“मैं कैसे इस आग को बुझाऊँ?”
नफ़रत पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। अभी भी कहीं गहरी जगह पर वह पुरानी घृणा बैठी थी—चाचा के गुंडा अतीत के लिए, उनकी दबंगई के लिए, उस भय के लिए जो वे पैदा करते थे। लेकिन उस नफ़रत के ऊपर अब एक और परत चढ़ गई थी। मोटी, चिपचिपी, कामुक परत। जो नफ़रत को दबा रही थी, और साथ ही शर्म को और गहरा कर रही थी।
सरिस्का उठ खड़ी हुई। आईने के सामने फिर से गई।
अपने गदराए बदन को देखा। बड़े स्तन। भारी गाँड। साड़ी जो जानबूझकर नीचे बाँधी गई थी।
“यह शरीर… यह शरीर मुझे धोखा दे रहा है।”
उसने ब्लाउज़ के बटन पर उंगली फेरी। फिर झटके से हाथ हटा लिया। आँखें भर आईं।
आज का दिन बहुत लंबा होने वाला था।
और हर घंटे के साथ यह संघर्ष और तेज़ होता जाएगा—शर्म और भूख के बीच, पतिव्रता की दीवार और शरीर की आग के बीच।
वह रसोई में वापस आई। काम करने लगी। बर्तन। सब्ज़ी। आटा।
लेकिन हर काम के बीच-बीच में आँखें बंद हो जातीं।
और आँखें बंद होते ही चाचा का तगड़ा, बालों भरा सीना फिर से सामने आ जाता।
नफ़रत।
शर्म।
और उसके नीचे दबी हुई, धीरे-धीरे साँदो-तीन दिन और ऐसे ही बीत गए।
चाचा सुबह अपने ठेकेदारी के काम पर निकल जाते। वहाँ मजदूर, सीमेंट, हिसाब-किताब… लेकिन उनका मन कहीं और उलझा रहता। आँखें काम पर होतीं, पर दिमाग बार-बार उसी दृश्य पर लौट आता—रसोई में झुकी हुई सरिस्का, नाभि से नीचे बँधी साड़ी, भारी गाँड जो हर हल्की हरकत पर हिलती थी। तौलिये वाले दिन की बात तो बार-बार सताती। कभी-कभी काम के बीच ही उनका लिंग तन जाता। वे चुपचाप किसी कोने में चले जाते, साँस भारी करते, और मन ही मन कसमसाते—“बहू… घर की बहू… फिर भी…”
सरिस्का के भीतर वही पुराना युद्ध जारी था।
नफ़रत अभी भी कहीं बैठी थी। शर्म और भी गहरी हो गई थी। लेकिन शरीर हर रात बेचैन रहता। दीवार के उस पार चाचा की मौजूदगी महसूस होती, और जाँघों के बीच गर्मी फैल जाती। वह खुद को समझाती—“मैं पतिव्रता हूँ… विनय बीमार हैं… यह गलत है…” पर शरीर नहीं मानता था।
तीसरे दिन सुबह अलमारी खोलते हुए सरिस्का का हाथ रुक गया।
पीरियड्स आ गए थे।
और पैड का डिब्बा… खाली। सिर्फ एक पैड बचा था।
गाँव में यह चीज़ आसानी से नहीं मिलती। दुकानें दूर। और महिलाएँ खुद जातीं तो भी संकोच होता। सरिस्का का माथा ठनक गया। एक पैड से ज़्यादा देर नहीं चलेगा। कल तक तो चाहिए ही।
उसने रात भर सोचा।
विनय से कहे? लेकिन विनय बिस्तर पर थे, चल-फिर नहीं सकते।
बाहर किसी औरत से माँगे? गाँव में बातें फैल जाएँगी।
बस एक रास्ता बचा था।
अगली सुबह।
चाचा तैयार होकर निकलने ही वाले थे। खैनी मुँह में, कमीज़ के बटन बंद करते हुए। सरिस्का रसोई से निकली। कदम धीमे थे। सिर झुका हुआ। गला सूखा हुआ।
वह उनके पास जाकर खड़ी हो गई। आँखें ज़मीन पर गड़ाए।
“चाचा…” आवाज़ बहुत धीमी निकली।
चाचा मुड़े। “हम्म?”
सरिस्का के गाल जल रहे थे। वह दोनों हाथों से साड़ी का पल्लू मरोड़ रही थी। कुछ पल चुप रही। फिर जैसे हिम्मत जुटाते हुए बोली—
“वो… एक काम था…”
“बोलो।”
“बाजार से… वो… वाली चीज़… ला देना।” आवाज़ और भी दब गई।
चाचा की भौंहें थोड़ी सिकुड़ गईं। “कौन सी चीज़?”
सरिस्का की साँस अटक गई। आँखें और नीचे झुक गईं। गर्दन तक लाल हो चुकी थी। वह फुसफुसाई—
“वो… महिने वाली… पैड… बस एक पैकेट… खत्म हो गए हैं… गाँव में मिलते नहीं…”
आखिरी शब्द लगभग साँस में खो गए।
कमरे में एक अजीब सी खामोशी छा गई। चाचा कुछ क्षण उसे देखते रहे। सरिस्का का सिर पूरी तरह झुका हुआ था। कान लाल। होंठ काँप रहे थे। शर्म से उसका पूरा बदन तन गया था।
चाचा के मन में कुछ हिला। बहू… जो इन दिनों जानबूझकर साड़ी नीचे बाँधती थी, जो उनकी नज़रों से बचने की कोशिश करती थी, वही बहू आज इतनी बेबस खड़ी थी। इतनी निजी बात कहने के लिए मजबूर।
उन्होंने धीरे से कहा, “अच्छा। ला दूँगा।”
सरिस्का ने सिर्फ सिर हिलाया। बिना आँख उठाए पीछे हट गई। जैसे कोई बड़ा पाप करके भाग रही हो।
चाचा दरवाज़े से निकले। लेकिन मन में वही दृश्य घूम रहा था—सरिस्का की झुकी हुई गर्दन, लाल कान, काँपते होंठ। और उसके शरीर की वह शर्म… जो अजीब तरह से और भी आकर्षक लग रही थी।
शाम को जब चाचा लौटे, तो उन्होंने बिना कुछ कहे पैकेट सरिस्का के हाथ में थमा दिया। दोनों की नज़रें नहीं मिलीं। सरिस्का ने फुसफुसाकर “धन्यवाद” कहा और जल्दी से कमरे में चली गई।
दरवाज़ा बंद करते ही उसने पीठ टिका ली। आँखें बंद कीं।
शर्म की लहर फिर से पूरे शरीर में दौड़ गई।
“मैंने… उनसे यह माँग लिया…”नफ़रत, शर्म, और उसके नीचे दबी हुई वह भूख—तीनों एक साथ उसके मन में टकरा रही थीं।स लेती हुई… भूख।

पाँच दिन।
चाचा को ठेकेदारी के ज़रूरी काम से बाहर जाना पड़ा। सुबह जल्दी निकले। सरिस्का को घर खर्च के लिए कुछ पैसे देते हुए साधारण स्वर में बस इतना कहा, “पाँच दिन बाद लौटूँगा।” और चले गए।
घर फिर से शांत हो गया। लेकिन सरिस्का के अंदर की हलचल नहीं थमी।
तीसरे दिन उसके पीरियड्स खत्म हो गए।
शरीर ने जैसे कोई पुराना ताला खोल दिया हो। पहले दो दिन तो सिर्फ हल्की बेचैनी थी, लेकिन चौथे दिन से वह बेचैनी आग बनने लगी। रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे जाँघें अपने-आप रगड़ने लगतीं। स्तन भारी और संवेदनशील हो जाते। हर छोटी छूअन पर सिहरन दौड़ जाती। विनय बगल में सोते रहते—बीमार, कमज़ोर, साँस लेते हुए। उनकी मौजूदगी शर्म और और बढ़ा देती। सरिस्का करवट बदल-बदलकर खुद को रोकती। आँखें भींच लेती। मन के अंदर बार-बार वही पुराना संघर्ष दोहराती—
“मैं पतिव्रता हूँ।
विनय की बीवी हूँ।
यह शरीर मेरा नहीं… गलत है… बहुत गलत है…”
लेकिन शरीर नहीं मानता था।
पाँचवें दिन तो हालत और बिगड़ गई। सुबह उठते ही नीचे गीलापन महसूस होता। साड़ी बाँधते समय कूल्हे और जाँघों की हर हरकत जैसे याद दिला रही हो कि अंदर कितनी भूख जमा हो चुकी है। वह जानबूझकर ढीली साड़ी पहनती, ब्लाउज़ के बटन ऊपर तक बंद करती, बाल बाँध लेती—जैसे किसी कवच से खुद को ढक रही हो। पर कवच के अंदर आग धधक रही थी।
घर में एक तगड़ा, साँड़ जैसा मर्द था।
चौड़ा सीना, बालों भरी छाती, मोटी उंगलियाँ, दबंग चाल। जिसकी मौजूदगी भर से हवा भारी हो जाती थी। और वही मर्द… अभी घर में नहीं था। लेकिन उसकी याद हर कोने में बैठी थी। तौलिये वाला दिन, बाज़ार वाली शाम, पैड माँगते समय की शर्म—सब यादें शरीर को और बेचैन कर रही थीं।
सरिस्का दिनभर काम में खुद को डुबोए रखती। बर्तन, कपड़े, खाना, बच्चे की देखभाल। हर काम के बीच में अचानक रुक जाती। साँस तेज़ हो जाती। जाँघें सिकुड़ जातीं। फिर खुद को डाँटती—“शर्म कर… तू क्या सोच रही है… वह तेरे पति के चाचा हैं… गुंडा रहे हैं… नफ़रत कर…”
नफ़रत अभी भी थी। कहीं गहरी जगह पर। लेकिन उसके ऊपर इच्छा की परत इतनी मोटी हो चुकी थी कि नफ़रत दबती जा रही थी। शर्म बची हुई थी—तेज़, जलन पैदा करने वाली शर्म। वही शर्म उसे रोक रही थी कि वह अपने हाथों से अपनी भूख न मिटाए। शर्मीली, सीधी शादीशुदा औरत। जिसने हमेशा अपनी ज़रूरतों को दबाया था। आज भी दबाए जा रही थी। आँखें बंद करके, दाँत भींचकर, शरीर की हर माँग को ठुकराते हुए।
पाँचवें दिन शाम को चाचा लौटे।
दरवाज़े पर खड़े होकर उन्होंने खैनी निकाली। आँखें घर के अंदर घूमीं। सरिस्का रसोई से निकली। स्वागत में सिर झुकाया। साधारण सी मुस्कान। लेकिन चाचा की अनुभवी निगाहें चूक नहीं सकीं।
उन्होंने देखा—
सरिस्का की चाल में पहले से ज़्यादा भारीपन था। कूल्हे थोड़े और लचक के साथ हिल रहे थे। ब्लाउज़ के बटन कसकर बंद थे, फिर भी स्तनों की उभार पहले से ज़्यादा बेचैन लग रही थी। आँखें मिलते ही जल्दी से झुक गईं। गालों पर हल्की लाली। साँस थोड़ी तेज़। और जब वह मुड़ी, तो गाँड की हरकत… जैसे कोई दबा हुआ भूखा शरीर अपनी ज़रूरत खुद बता रहा हो।
चाचा कुछ नहीं बोले।
सिर्फ देखे।
अंदर ही अंदर एक धीमी मुस्कान तैर गई।
लोहा गरम है।
अब कुल्हाड़ी मारने का समय आ गया है।
वे अपने कमरे में चले गए। दरवाज़ा बंद किया। खैनी मुँह में दबाए बिस्तर पर बैठ गए। आँखें आधी बंद। दिमाग में प्लान बनने लगे—धीरे-धीरे, सब्र से, बिना जल्दबाज़ी के। बहू की शर्म को तोड़ना है। उसकी नफ़रत को पिघलाना है। और उस दबी हुई भूख को… बाहर निकालना है।
बाहर रसोई में सरिस्का खड़ी थी।
चाचा के लौटने की खबर से उसके शरीर में एक तेज़ झटका सा लगा था। जाँघों के बीच अचानक सिकुड़न हुई। उसने सिंक का किनारा ज़ोर से पकड़ लिया। आँखें बंद कीं।
“नहीं… फिर से वही संघर्ष…
मैं अपने आपको रोकूँगी।
हर कीमत पर रोकूँगी।”
लेकिन शरीर पहले ही जवाब दे चुका था।
और दीवार के उस पार… एक अनुभवी खिलाड़ी चुपचाप इंतज़ार कर रहा था।
Good 👍 Sariska Good 👍 😊 yaar likhti rho achhi jaa rhi h kahani
 
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Curiousbull

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बहुत सुंदर लिखा है। अगले अपडेट का इंतजार रहेगा।
 

Sariska55

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और किसी को भी अपनी कहानी लिखती हो तो मुझे DM करिये
 

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सरिस्का की चाल में पहले से ज़्यादा भारीपन था। कूल्हे थोड़े और लचक के साथ हिल रहे थे। ब्लाउज़ के बटन कसकर बंद थे, फिर भी स्तनों की उभार पहले से ज़्यादा बेचैन लग रही थी। आँखें मिलते ही जल्दी से झुक गईं। गालों पर हल्की लाली। साँस थोड़ी तेज़। और जब वह मुड़ी, तो गाँड की हरकत… जैसे कोई दबा हुआ भूखा शरीर अपनी ज़रूरत खुद बता रहा हो।
चाचा कुछ नहीं बोले।
सिर्फ देखे।
अंदर ही अंदर एक धीमी मुस्कान तैर गई।
लोहा गरम है।
अब कुल्हाड़ी मारने का समय आ गया है।
वे अपने कमरे में चले गए। दरवाज़ा बंद किया। खैनी मुँह में दबाए बिस्तर पर बैठ गए। आँखें आधी बंद। दिमाग में प्लान बनने लगे—धीरे-धीरे, सब्र से, बिना जल्दबाज़ी के। बहू की शर्म को तोड़ना है। उसकी नफ़रत को पिघलाना है। और उस दबी हुई भूख को… बाहर निकालना है।
बाहर रसोई में सरिस्का खड़ी थी।
चाचा के लौटने की खबर से उसके शरीर में एक तेज़ झटका सा लगा था। जाँघों के बीच अचानक सिकुड़न हुई। उसने सिंक का किनारा ज़ोर से पकड़ लिया। आँखें बंद कीं।
“नहीं… फिर से वही संघर्ष…
मैं अपने आपको रोकूँगी।
हर कीमत पर रोकूँगी।”
लेकिन शरीर पहले ही जवाब दे चुका था।
और दीवार के उस पार… एक अनुभवी खिलाड़ी चुपचाप इंतज़ार कर रहा था।

Ab aage...........................

चाचा कमरे में अकेले बैठे थे। खैनी मुँह में। आँखें आधी बंद। दिमाग ठंडा और साफ़।
बहू शर्मीली है। मासूम है। सीधी शादीशुदा औरत। नफ़रत अभी भी कहीं बैठी होगी। शर्म तो पहाड़ जैसी है। शरीर भूखा है—यह उन्होंने साफ़ पढ़ लिया था—लेकिन वह खुद कभी आगे नहीं बढ़ेगी। कभी मुँह नहीं खोलेगी। कभी अपनी भूख कबूल नहीं करेगी।
इसलिए सारा खेल उन्हें ही खेलना होगा।
उन्होंने धीरे-धीरे प्लान बनाना शुरू किया। जल्दबाज़ी नहीं। सब्र। दबाव। और सही समय पर थोड़ी-बहुत ज़बरदस्ती—बस उतनी जितनी शर्मीली औरत की दीवार तोड़ने के लिए ज़रूरी हो।
पहला चरण – नज़दीकी बढ़ाना, लेकिन साधारण तरीके से
अगले दो-तीन दिन कुछ खास नहीं करेंगे। बस घर में पहले से ज़्यादा मौजूद रहेंगे। सुबह नाश्ते के समय रसोई में देर तक बैठेंगे। शाम को खाना खाते समय सरिस्का के पास खड़े होकर बात करेंगे—काम की, बच्चे की, मौसम की। आँखें उसके शरीर पर ज़्यादा देर तक टिकाएँगे। जब वह झुकेगी तो गाँड पर, जब सामने होगी तो स्तनों पर। इतना साफ़ कि वह महसूस करे, लेकिन इतना कि पकड़ में न आए। बातचीत में कभी-कभी हल्की तारीफ़—“आज साड़ी अच्छी लग रही है” या “थक तो नहीं गई?”—इतनी साधारण कि वह नकार न सके।
उद्देश्य सिर्फ एक: उसकी शर्म को आदत बनाना। कि चाचा की निगाहें अब आम बात हैं।
दूसरा चरण – छोटी-छोटी छूअन
जब नज़दीकी थोड़ी बैठ जाए, तब अचानक छूना शुरू करेंगे।
किसी दिन रसोई में बर्तन देते समय उंगलियाँ उसके हाथ पर रुक जाएँगी।
किसी दिन साड़ी का पल्लू सीधा करते समय कंधे पर हाथ रख देंगे।
किसी दिन पीछे से गुज़रते समय कमर से सट जाएँगे—जाने-अनजाने।
हर बार बहाना तैयार रहेगा—“अरे, माफ़ करना, जगह कम थी।”
लेकिन छूअन इरादतन होगी। और हर छूअन के बाद उसकी साँस, उसकी आँखें, उसकी गाँड की हरकत—सब नोट करेंगे। अगर वह सिहरती है, अगर जाँघें सिकुड़ती हैं, अगर गाल लाल होते हैं… तो समझ जाएँगे कि लोहा और गरम हो रहा है।
तीसरा चरण – अकेलापन और दबाव
विनय का कुछ का इंतज़ाम करेंगे। या फिर खुद कोई ऐसा काम निकालेंगे कि रात को घर में सिर्फ वे और सरिस्का बचें। बेटा सो चुका हो। घर शांत हो।
उस रात वे सीधे बात करेंगे। कमरे में घुसकर दरवाज़ा बंद कर देंगे। सरिस्का के पास जाकर खड़े हो जाएँगे। पहले मीठी बात—“बहू, तू कितनी तकलीफ़ झेल रही है… विनय बीमार… तू अकेली… शरीर की भी तो जरूरत होती है।”
फिर धीरे-धीरे नज़दीक। हाथ उसके गाल पर। फिर कमर पर।
अगर वह हटने की कोशिश करे, तो थोड़ी पकड़ मज़बूत कर देंगे। ज़बरदस्ती नहीं—बस इतनी कि वह बच न सके। उसकी शर्म को तोड़ने के लिए थोड़ा दबाव ज़रूरी है। मासूम औरतें अक्सर दबाव में ही पिघलती हैं। जब शरीर पहले से भूखा हो, तो थोड़ी-सी जबरदस्ती दरवाज़ा खोल देती है।
चौथा चरण – अंतिम वार
जब वह काँप रही होगी, आँखें भर आई होंगी, “नहीं चाचा… यह गलत है…” कह रही होगी—तब वे उसकी कमर में ज़ोर से बाँहें डालकर खींच लेंगे। सीने से सटा देंगे। उसके कान में धीरे से बोलेंगे—“शरीर तो तेरा भी गरम है… मैं जानता हूँ… कितना गीला है तू।”
फिर उसके हाथ पकड़कर अपनी उभार पर रख देंगे।
यहाँ थोड़ी ज़बरदस्ती होगी ही। क्योंकि शर्मीली औरत आखिरी पल तक मना करती है। लेकिन एक बार उसका शरीर उनके हाथों में आ जाए, एक बार उसकी साँस उनके गले में फँस जाए… फिर नफ़रत, शर्म, पतिव्रता—सब पिघलने लगते हैं।
चाचा ने खैनी थूक दी। बिस्तर पर लेट गए। आँखें छत पर टिकाईं।
प्लान साफ़ था।
सब्र रखना है।
उसकी शर्म को धीरे-धीरे कुतरना है।
और जब लोहा पूरी तरह गरम हो जाए… तो बिना हिचकिचाहट कुल्हाड़ी मारनी है।
बहू मासूम है।
इसलिए शिकारी को और अनुभवी होना पड़ेगा।
चाचा अपने मन में यह सब प्लान तैयार करते हैं

दूसरे दिन शाम ढलते-ढलते चाचा बाज़ार से लौटे। हाथ में एक बोतल थी—देशी शराब। उन्होंने सीधे विनय के कमरे में जाकर दरवाज़ा खोला और बिस्तर के पास कुर्सी खींचकर बैठ गए।
“अरे विनय,” उन्होंने हँसते हुए कहा, “बहुत दिन हो गए यार। आज शराब पीते हैं। तू तो बिस्तर पर पड़ा-पड़ा दुनिया से ही कट चुका है। चल, दो घूँट पी ले।”
विनय ने कमज़ोर मुस्कान दी। मना नहीं कर सके। चाचा ने दोनों के लिए गिलास लगाए। खुद तो बस हल्के-हल्के घूँट ले रहे थे, लेकिन विनय के गिलास को बार-बार भरते जा रहे थे। “पी ले… तबीयत ठीक रहेगी… डॉक्टर भी कहते हैं कभी-कभी।”
बाहर रसोई में सरिस्का खड़ी थी। चाचा ने आवाज़ लगाई, “बहू, आज खाने में कुछ अच्छा बना देना। मन नहीं लग रहा साधारण खाने का।”
सरिस्का ने शर्माते हुए पल्लू सँभाला। “क्या बनाऊँ चाचा… कोई रेसिपी बता दो।”
चाचा ने मुस्कुराते हुए दो-एक व्यंजन बता दिए। सरिस्का किचन में लग गई। मन के अंदर हल्की बेचैनी थी। आज घर का माहौल अलग लग रहा था। शराब की बोतल, चाचा की हँसी, विनय को पिलाने का तरीका… सब कुछ सामान्य होते हुए भी सामान्य नहीं लग रहा था।
अंदर कमरे में चाचा अपना प्लान पूरे सब्र से चला रहे थे। खुद बहुत कम पी रहे थे। बस होंठ गीले कर रहे थे। विनय को लगातार पिलाते जा रहे थे। दो पैग में ही विनय की आँखें भारी होने लगीं। तीन में तो वे बिस्तर पर लुढ़कने लगे। चाचा ने उन्हें सहारा देकर ठीक से लिटा दिया। विनय की साँसें गहरी और बेसुध हो चुकी थीं। बिना खाना खाए ही वे गहरी नींद में चले गए।
इसी बीच सरिस्का ने बेटे को खाना खिलाया। बच्चा पेट भरकर जल्दी सो गया। घर में अब सिर्फ तीन लोग जागे हुए थे—सोया हुआ विनय, किचन में खाना लगाती सरिस्का, और कमरे में इंतज़ार करता चाचा।
खाना तैयार हो गया। सरिस्का थाली लेकर विनय के कमरे में गई। विनय को बेहोश अवस्था में सोता देखकर वह थोड़ी असहज हो गई। चाचा बिस्तर के पास ही बैठे थे। उन्होंने हँसते हुए कहा, “देखा? दो पैग में ही लुढ़क गया। कमज़ोर हो गया है बेचारा।”
सरिस्का ने कुछ नहीं कहा। बस धीरे से बोली, “आप खाना खा लो चाचा।”
चाचा ने आँखें उठाईं। सरिस्का के पूरे बदन पर एक लंबी नज़र डाली—साड़ी, ब्लाउज़, कूल्हे, फिर चेहरा। फिर बोले, “तुम भी आ जाओ। बैठकर साथ में खाते हैं। अकेले-अकेले क्या मज़ा।”
सरिस्का के गाल हल्के गर्म हो गए। मन में विरोध उठा, लेकिन वह कुछ बोल नहीं सकी। चुपचाप दूसरी थाली लेकर बैठ गई। दोनों ने खाना खाया। बातें कम हुईं। चाचा कभी-कभी कुछ पूछ लेते, सरिस्का सिर झुकाए जवाब देती। खाना खत्म होते-होते कमरे में एक अजीब सी खामोशी छा गई थी।
खाना खाकर चाचा उठे। खड़े होते समय फिर से सरिस्का के बदन पर एक गहरी नज़र डाली—जानबूझकर, देर तक। फिर बिना कुछ कहे अपने कमरे की ओर चले गए।
सरिस्का बर्तन समेटने लगी। मन बेचैन था। आज चाचा का व्यवहार… उनकी निगाहें… शराब… विनय का बेहोश होना… सब कुछ उसके अंदर हलचल मचा रहा था। पुराना संघर्ष फिर जाग उठा। “नफ़रत कर… शर्म कर… यह सब सामान्य नहीं है…” लेकिन शरीर पहले ही सचेत हो चुका था।
कुछ ही मिनट बाद चाचा के कमरे से आवाज़ आई।
“बहू… पानी।”
सरिस्का के हाथ रुक गए। सीने में एक हल्की धड़कन तेज़ हुई। अंदर ही अंदर एक अनकही बेचैनी फैल गई। वह जानती थी कि पानी का जग रसोई में ही है। फिर भी… आवाज़ में वह पुरानी दबंगई थी।
उसने गहरा साँस लिया। पानी का जग भरा। साड़ी का पल्लू ठीक किया। और धीमे कदमों से चाचा के कमरे की ओर चल दी।

सरिस्का ने रसोई में पानी का जग उठाया।
जैसे ही ठंडे जग का स्पर्श उसकी हथेलियों से हुआ, शरीर में एक अजीब सी हलचल दौड़ गई। पीरियड्स अभी-अभी खत्म हुए थे। शरीर पहले से ही भूखा और संवेदनशील था। जाँघों के बीच हल्की गर्मी फैल गई। स्तनों के निप्पल खुद-ब-खुद तनकर ब्लाउज़ से छूने लगे। उसने गहरी साँस ली और खुद को डाँटा—
“बस पानी देना है… और कुछ नहीं… चल… शर्म कर…”
लेकिन कदम बढ़ते जा रहे थे। गलियारा छोटा लग रहा था। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। नफ़रत, शर्म और वह दबी हुई भूख—तीनों एक साथ उसके सीने में टकरा रहे थे। वह जानती थी कि अंदर क्या हो सकता है, फिर भी जा रही थी। मासूमियत और डर के बीच उसका शरीर पहले से ही सचेत हो चुका था।
कमरे का दरवाज़ा अधखुला था। उसने हल्के हाथ से धकेला।
और ठहर गई।
चाचा बिस्तर पर लेटे हुए थे। नीचे सिर्फ एक तौलिया लपेटा हुआ। ऊपर का पूरा शरीर नंगा—छह फुट पाँच इंच लंबा, चौड़ा, हट्टा-कट्टा। काली चमकदार त्वचा। बालों भरा मज़बूत सीना। कंधे चौड़े। बाज़ू तगड़े। पेट की मांसपेशियाँ साफ़ उभर रही थीं। पूरा बदन ऐसा लग रहा था जैसे कोई जंगली साँड़ आराम कर रहा हो—दबंग, भारी और खतरनाक।
सरिस्का की आँखें उनके शरीर पर अटक गईं। एक पल के लिए साँस रुक गई।
और ठीक उसी पल उसकी गाँड एकदम से तन गई। अंदर तक सिकुड़ गई। जाँघों के बीच एक तेज़, गीली लहर दौड़ गई। ब्लाउज़ के अंदर स्तन भारी होकर उठे। मन चिल्लाया—“नज़रें फेर ले… यह गलत है… नफ़रत कर…” लेकिन शरीर ने जवाब में और सिहरन दी। तौलिये के नीचे की उभार भी साफ़ दिख रही थी—भारी और आधी तनी हुई।
शर्म की तेज़ लाली उसके गालों से लेकर गर्दन तक फैल गई। हाथ काँप रहे थे। जग लगभग छूटने ही वाला था।
वह जल्दी से अंदर घुसी। नज़रें झुकाए। बिना एक शब्द कहे पानी का जग पास रखी टेबल पर रख दिया।
जग टेबल पर टिका। उसके हाथ अभी भी जग के हैंडल पर थे। साँस तेज़। गाँड अभी भी तनी हुई। और आँखें… ज़मीन पर गड़ी हुई, लेकिन मन बार-बार उस नंगे, तगड़े, काले शरीर पर लौट रहा था।

चाचा एकदम से उठ खड़े हुए। तौलिया फर्श पर गिर गया। उनका पूरा नंगा, काला, तगड़ा शरीर सामने खड़ा था—लंड भारी और तनी हुई। आँखों में एक ठंडी, दबंग आग थी। आज उन्होंने ठान लिया था। थोड़ा-बहुत विरोध भी हुआ तो बात नहीं बनेगी। काम अंजाम तक पहुँचाना है।
एक झटके में उन्होंने सरिस्का को दोनों बाँहों में भर लिया। जैसे कोई शिकारी अपना शिकार उठा ले।
“अह्… चाचा जी!” सरिस्का चौंककर चीखी। उसके हाथ छाती पर जा लगे। “यह क्या कर रहे हो… छोड़ो… यह गलत है!”
चाचा ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। बस एक मोटी उंगली उसके होठों पर रख दी और धीमे, भारी स्वर में बोले—
“शशश… मुँह बंद रख। आज कुछ गलत नहीं है। जैसा कह रहा हूँ वैसा कर। बहुत दिनों से देख रहा हूँ… तू भी अंदर ही अंदर जल रही है।”
सरिस्का ने दोनों हाथों से उनकी बाँहें हटाने की कोशिश की। “नहीं… छोड़ो मुझे… विनय पास में ही सो रहा है… अगर उठ गया तो…”
चाचा हँसे। हँसी में कोई नर्मी नहीं थी। उन्होंने उसे और कसकर अपनी छाती से चिपका लिया। उसके स्तन उनके बालों भरे सीने से दब गए।
“विनय को दो पैग में ही नींद आ गई। अब तक तो वह मुर्दे की तरह सो रहा होगा। और तू… तू अभी भी ना ना कर रही है?”
सरिस्का ने फिर धक्का दिया। “चाचा जी… कृपया… यह ठीक नहीं… मैं आपकी बहू हूँ…”
“बहू हो,” चाचा ने उसके कान के पास मुँह लाकर फुसफुसाया, “लेकिन शरीर तेरा वैसा नहीं बोल रहा। देख, कैसे काँप रहा है।”
उन्होंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। सरिस्का उठने की कोशिश करने लगी, लेकिन चाचा ने उसके दोनों हाथ उसके सिर के ऊपर पकड़ लिए। एक हाथ से दोनों कलाई दबाकर रखा, दूसरे हाथ से उसकी साड़ी का पल्लू और ब्लाउज़ का हुक खोलने लगे।
“नहीं… मत करो…” सरिस्का की आवाज़ में अभी भी विरोध था, लेकिन साँसें तेज़ हो चुकी थीं।

चाचा ने पहली बार सरिस्का का पूरा गोरा, चिकना बदन नंगा देखा।
दोनों हाथों से उसने उसकी साड़ी-पेटीकोट एक साथ खींचकर फर्श पर फेंक दिए। सामने जो नज़ारा था, उसने उनकी साँस कुछ देर के लिए रोक दी।
छत्तीस साइज़ के भारी, गोरे स्तन—चिकने, गोल, निप्पल हल्के गुलाबी और पहले से तने हुए। नीचे नरम पेट, जिसमें बेटा पैदा होने की हल्की उभार और महीन रेखाएँ साफ़ दिख रही थीं। और उससे नीचे…
चाचा की निगाह उसकी चूत पर टिकी। दोनों होंठ हल्के गुलाबी, चिकने, और इतने कम इस्तेमाल किए हुए कि पहली नज़र में ही अंदाज़ा हो गया। बच्ची की माँ होकर भी अंदर तक इतनी सघन और कसी हुई… जैसे शायद ही कभी सही मायने में खोली गई हो।
चाचा मुस्कुराए। पुराने, माहिर खिलाड़ी की मुस्कान। उन्हें पता था औरत को कैसे पूरी तरह बस में किया जाता है।
उन्होंने कोई जल्दबाज़ी नहीं की।
पहले दोनों हाथों से उसके स्तन थामे। अंगूठों से निप्पल दबाए, फिर मुँह लाकर एक को पूरी तरह चूस लिया। जीभ से गोल-गोल घुमाया, हल्के दाँतों से काटा, फिर ज़ोर से खींचा। सरिस्का की कमर उठी। एक दबी कराह निकली।
चाचा ने दूसरा स्तन भी वैसा ही किया। फिर जीभ से उसके गले की नस चाटी, कंधे, बगल के कोमल हिस्से, और धीरे-धीरे नीचे उतरते गए।
पेट की नर्म उभार पर जीभ फेरते हुए उन्होंने वहाँ की हर छोटी रेखा को चाटा। नाभि के अंदर जीभ घुमाई। सरिस्का का शरीर सिहर उठा।
फिर दोनों जाँघों के अंदरूनी हिस्से। जीभ की नोक से धीरे-धीरे ऊपर चढ़ते हुए उसकी चूत के बिलकुल किनारे तक पहुँचे। वहाँ ठहरकर गर्म साँस छोड़ी।
सरिस्का की उंगलियाँ चादर में गड़ गईं।
चाचा ने दोनों हाथों से उसकी जाँघें और फैला दीं। चौड़ी जीभ से एक लंबी, धीमी चाट दी—नीचे से ऊपर तक। फिर उसके सबसे संवेदनशील बिंदु पर रुककर गोल-गोल घुमाने लगे। कभी चूसते, कभी हल्के थपथपाते, कभी सिर्फ़ नोक से खेलते।
सरिस्का की साँसें उखड़ने लगीं। पेट में अजीब सी ऐंठन उठ रही थी। वह खुद को समझाने की कोशिश कर रही थी—“यह गलत है… विनय…”—लेकिन शरीर अब उसकी बात नहीं सुन रहा था।
चाचा ने एक उंगली अंदर नहीं डाली। बस बाहर से ही इतना सटीक और जानबूझकर खेला कि कुछ ही देर में सरिस्का की जाँघें काँपने लगीं। कमर बार-बार उठने लगी।
“अह्… अह्ह्ह…”
एक तेज़ सिहरन ने उसे जकड़ लिया। पूरा शरीर तन गया। चूत में तेज़ complementन हुई और वह झड़ गई—पहली बार, इतनी तेज़ी से, कि खुद को भी अंदाज़ा नहीं हुआ। पानी जैसा गीलापन उसकी जाँघों तक फैल गया।
चाचा रुके नहीं।
वे उसी लय में चाटते रहे। सरिस्का की कराहें अब दबी नहीं रह पा रही थीं। शरीर अभी-अभी झड़ा था, लेकिन तुरंत फिर से गर्म होने लगा। चूत फिर से तड़पने लगी। निप्पल और सख्त हो गए।
चाचा अब ऊपर की ओर बढ़े।
वे उसके खूबसूरत चेहरे के ठीक ऊपर आ गए। काली, चमकदार त्वचा, चौड़े कंधे, बालों भरा मज़बूत सीना, और नीचे भारी, नसों से भरी लंड—जो उसकी जाँघ पर रखी हुई थी। सरिस्का की आँखें उस लंड पर अटक गईं। इतनी मोटी, इतनी लंबी… मन में एक अजीब सी घबराहट और उत्तेजना एक साथ उठने लगी।
चाचा ने अपने काले, मोटे होंठ उसके रसीले होठों पर रख दिए।
चुंबन गहरा था। शराब और बीड़ी की तेज़ गंध सरिस्का की नाक में भर गई। वह सिर हटाना चाहती थी, लेकिन चाचा ने उसकी गर्दन पकड़ रखी थी। जीभ उसके मुँह में घुस आई।
सरिस्का की आँखें खुली रहीं। इतने पास से चाचा का लंबा-चौड़ा, हट्टा-कट्टा शरीर और वह भारी लंड देखकर वह और विचलित हो गई। मन में एक आवाज़ चिल्ला रही थी—“यह क्या हो रहा है मुझसे…”, लेकिन शरीर फिर से पिघल रहा था।
चाचा ने चुंबन तोड़ा। होठों को उसके गाल, कान, गर्दन पर फेरते हुए फुसफुसाए—
“अब समझी? शरीर तेरा कितना भूखा था…”
उनकी उंगलियाँ फिर से उसकी अभी-अभी झड़ी हुई, संवेदनशील चूत पर लौट आईं। इस बार और धीरे, और जानबूझकर।
सरिस्का की साँस फिर उखड़ने लगी।

चाचा ने ज़्यादा देर नहीं की।
उन्होंने अपना मोटा नसों से उभरा आठ इंच लंब लंड पर ढेर सारा थूक थूककर लगा लिया। हथेली से पूरे लंड को चमकदार और फिसलन भरा कर दिया। फिर घुटनों के बल सरिस्का की फैली जाँघों के बीच आ गए और उस मोटे सिरे को उसकी चूत के मुहाने पर टिका दिया।
जैसे ही उस गर्म, भारी और चौड़े स्पर्श का अहसास हुआ, सरिस्का का पूरा शरीर और गाँड अपने-आप तन गई। अंदर तक एक तेज़ सिकुड़न दौड़ गई। आँखें फैल गईं, साँस अटक गई।
“अह्… चाचा… ससस …”
चाचा ने दोनों हाथ उसके कूल्हों पर जमाए। धीरे-धीरे दबाव बढ़ाने लगे। चार इंच लंबे और पतले पति के लिंग की आदी योनि अचानक इतनी मोटाई को स्वीकार करने से हिचकिचा रही थी। मुहाना कसकर बंद था। हल्का दर्द उठा—तेज़, चुभन भरा।
सरिस्का की उंगलियाँ चाचा के बाज़ुओं में गड़ गईं। सीसकियाँ निकलने लगीं।
“आह्ह… दर्द… …”
चाचा रुके नहीं। एक गहरी साँस के साथ उन्होंने ज़ोर का धक्का मारा। आधा लंड अंदर धँस गया।
सरिस्का की कमर बिस्तर से उठ गई। मुँह खुला रह गया। आँखों में पानी आ गया। इतना भरा-भरा अहसास… जैसे पूरा गर्भ तक कोई लोहे का कुछ ठूँस दिया हो। दर्द और एक अजीब, पागल कर देने वाली गहराई एक साथ। उसने तीस साल में कभी ऐसा महसूस नहीं किया था।
चाचा ने बाकी हिस्सा भी धीरे-धीरे, लेकिन लगातार धकेलते हुए जड़ तक पहुँचा दिया। जब आखिरी इंच अंदर समाया, तब सरिस्का की साँस पूरी तरह रुक गई। योनि की दीवारें उसके मोटे लंड के चारों ओर इतनी कसकर चिपक गईं कि हर नस का अहसास हो रहा था।
चाचा ने मिशनरी में उसके ऊपर अपना वजन संभाला। दोनों हाथ उसके सिर के दोनों तरफ़ रखे। फिर लंबी, गहरी हरकत शुरू की।
बाहर तक खींचा… फिर पूरे जोर से अंदर तक धकेला।
हर धक्के के साथ गीली, चप-चप आवाज़ आने लगी। सरिस्का की चूत पहले से ही इतनी गीली थी कि चाचा का लंड चमकत अंदर-बाहर हो हो रहा था
“अह्ह… आह्ह्ह… चाचा… नही ” सरिस्का की सीसकियाँ अब तेज़ हो रही थीं।
चाचा कभी उसके होठों पर गहरा चुंबन करते, जीभ अंदर घुसाकर चूसते। कभी गालों पर गर्म, गीले चुंबन छोड़ते। कभी नीचे झुककर उसके भारी छत्तीस साइज़ के स्तनों को दोनों हाथों से दबाते, निप्पल मरोड़ते और मुँह में लेकर ज़ोर से चूसते।
धक्के धीरे-धीरे और तगड़े होते गए।
हर बार लंड पूरी तरह बाहर निकलता , फिर एक ज़ोरदार झटके के साथ जड़ तक धँस जाती। सरिस्का की योनि पानी छोड़ने लगी—हर धक्के के साथ पतला, गर्म रस छलकता। चादर गीली होने लगी।
पहली बार जब वह झड़ी, तो उसकी कराह काफ़ी तेज़ निकल गई।
“आह्ह्ह… चाचा… मैं… अह्ह…”
चाचा ने तुरंत धक्के रोक दिए। उसके होठों पर उंगली रखी और कान के पास फुसफुसाए—
“चुप कर… पड़ोसियों को उठाएगी क्या? कितनी जोर से आवाज़ निकल रही है सब सुन लेंगे।”

क्योंकि सरिस्का की जो आवाज आ रही थी वह बहुत ही जोरदार थी यह पता खुद सरिस्का को नहीं था
सरिस्का की आँखें काँप रही थीं। वह सिर हिलाती रही, लेकिन शरीर अभी भी तन रहा था। चाचा ने कुछ पल रुककर उसे साँस लेने दी, फिर फिर से वही गहरी, तगड़ी लय शुरू कर दी।
इस बार धक्के और लंबे थे। पूरा लंड बाहर… फिर धीरे-धीरे, इंच दर इंच अंदर… और आखिर में एक ज़ोरदार धक्का। सरिस्का की योनि हर बार पानी छोड़ रही थी। जाँघें काँप रही थीं।
मन में एक अजीब सा तूफ़ान चल रहा था। वह सोच भी नहीं सकती थी कि सेक्स इतना गहरा, इतना भरा और इतना पागल कर देने वाला हो सकता है। पति के पतले लिंग से जो कुछ भी हुआ था, वह अब बच्चों जैसा खेल लग रहा था। यहाँ हर धक्के के साथ कुछ टूट रहा था अंदर, और कुछ नया जन्म ले रहा था।
दूसरी बार झड़ते समय उसने दोनों हाथ चाचा की पीठ पर फेर दिए। नख चुभ गए। कराह दबाने की कोशिश में होंठ काट लिए, लेकिन फिर भी आवाज़ निकल ही गई।
“अह्ह… अह्ह्ह… फिर… आ गया…”
चाचा ने फिर से उसके मुँह पर हाथ रखा। “शशश… चुप…”
फिर धक्के और तेज़ कर दिए। दोनों हाथ अब उसके कूल्हों के नीचे थे। उसे और ऊपर उठाकर और गहरे तक पहुँच रहे थे। भारी स्तन हर धक्के के साथ हिल रहे थे। चाचा कभी उन्हें दबाते, कभी निप्पल चूसते, कभी उसके गालों और होठों को काटते।
तीसरी बार जब लहर आई, तब सरिस्का की आँखों से आँसू बह निकले। योनि में इतनी तेज़ सिकुड़न हुई कि चाचा की लंड को ज़ोर से दबा लिया। ढेर सारा पानी छूटा—गर्म, पतला, चादर को और गीला करते हुए। पूरा शरीर काँप रहा था। टाँगें चाचा की कमर के इर्द-गिर्द लिपट गईं।
“चाचा… इतना… मज़ा… कभी नहीं… अह्ह…” उसकी आवाज़ अब सिर्फ़ टूटी हुई सीसकियाँ रह गई थी।
चाचा अभी भी उसी मिशनरी पोज़ीशन में, उसी तगड़ी और लंबी लय में उसकी कसी हुई, पानी छोड़ती योनि को भरे जा रहे थे। हर धक्के के साथ सरिस्का का शरीर एक नई सिहरन से गुज़र रहा था—हल्का दर्द, गहरी भरन, और ऐसा मज़ा जो उसने अपनी तीस साल की ज़िंदगी में कभी महसूस नहीं किया था।

बीस मिनट तक लगातार तगड़े, गहरे धक्के चलते रहे।
कमरे में सिर्फ़ गीली आवाज़ें, चाचा की भारी साँसें और सरिस्का की दबी हुई सीसकियाँ गूँज रही थीं। चादर पूरी तरह भीग चुकी थी। सरिस्का की योनि बार-बार पानी छोड़ चुकी थी। तीन बार झड़ने के बाद भी उसका शरीर अभी भी काँप रहा था।
चाचा की लय अब और तेज़ हो गई। धक्के छोटे लेकिन बहुत ज़ोरदार हो रहे थे। हर बार लंड जड़ तक धँस रही थी। उनके माथे पर पसीना चमक रहा था। बाज़ू तने हुए थे।
फिर अचानक उनकी साँसें और गहरी हो गईं। कमर की हरकतें अनियमित पड़ने लगीं।
“उम्म्म… अह्ह…” चाचा ने ज़ोर से गुर्राया।
एक आखिरी, बहुत तगड़ा धक्का मारा—पूरा आठ इंच का लंड जड़ तक चूत में धँस गया। फिर उनका पूरा शरीर तन गया।
गर्म, गाढ़ा वीर्य की धार अंदर फूट पड़ी।
एक… दो… तीन… लगातार। इतना ज़्यादा कि सरिस्का को साफ़ महसूस हो रहा था—गर्म लहरें उसके गर्भ तक जा रही हैं। योनि की दीवारें उस गाढ़े रस से भरती जा रही थीं। कुछ बाहर भी छलकने लगा, लेकिन ज़्यादातर अंदर ही समाता चला गया।
सरिस्का की आँखें फैल गईं। मुँह खुला रह गया।
इतना… इतना सारा…
विनय के साथ कभी ऐसा नहीं हुआ था। पतले लिंग से जो थोड़ा-बहुत निकलता था, वह तो महसूस भी नहीं होता था। यहाँ तो गर्म, गाढ़ा वीर्य उसकी योनि को पूरी तरह भर रहा था। हर धड़कन के साथ नई धार फूट रही थी। पेट के अंदर तक भारीपन फैल गया था।
चाचा अभी भी जड़ तक धँसे हुए थे। उनका शरीर हल्के-हल्के काँप रहा था। गुर्राहटें धीमी पड़ रही थीं।
सरिस्का की टाँगें उनकी कमर के इर्द-गिर्द कसी हुई थीं। अंदर वह भारी, भरा-भरा अहसास… ऐसा उसने अपनी ज़िंदगी में कभी महसूस नहीं किया था। योनि अभी भी हल्की-हल्की सिकुड़ रही थी, जैसे बाकी बचे वीर्य को और अंदर खींचना चाहती हो।
चाचा ने धीरे से साँस छोड़ते हुए उसका चेहरा देखा। पसीने से भीगे बाल उसके माथे पर चिपक गए थे।
वे अभी भी अंदर थे—पूरी तरह, जड़ तक।

चाचा धीरे से उसके ऊपर से हटे और साइड में लेट गए।
सरिस्का वहीं बिस्तर पर सीधी पड़ी रही। आँखें आधी खुली, साँसें अभी भी उखड़ी हुई। शरीर में एक अजीब सी सुन्नता फैल रही थी। योनि के अंदर अभी भी वह भारी, गीला अहसास बना हुआ था—चाचा का गाढ़ा वीर्य धीरे-धीरे बाहर रिस रहा था, जाँघों के बीच गर्म धार बनकर बह रहा था।
कुछ देर तक कमरे में सिर्फ़ पंखे की आवाज़ थी।
फिर धीरे-धीरे सरिस्का को होश आया।
पहले शरीर का अहसास लौटा—चादर की गीली ठंडक, स्तनों पर पसीने की परत, और अंदर वह भरा-भरा, अपरिचित भारीपन। फिर दिमाग जागा।
आँखें पूरी तरह खुल गईं।
एक तेज़ ग्लानि ने उसे जकड़ लिया। सीने में कुछ भारी बैठ गया। वह क्या कर बैठी थी… विनय बगल वाले कमरे में बेहोश पड़ा था… बच्चा सो रहा था… और वह यहाँ… चाचा के नीचे… तीन-तीन बार झड़ चुकी थी… अंदर तक भरी हुई थी उनके वीर्य से।
शर्म और घृणा एक साथ उठे। आँखों में पानी आ गया।
वह धीरे से उठी। हाथ काँप रहे थे। फर्श पर बिखरे कपड़े समेटे—साड़ी, ब्लाउज़, पेटीकोट। बिना कुछ पहने, सिर्फ़ कपड़े हाथ में लिए वह दरवाज़े की ओर बढ़ी। एक बार भी चाचा की तरफ़ नहीं देखा।
चाचा ने उसे नहीं रोका।
वे साइड में लेटे हुए उसे जाते हुए देखते रहे। आँखों में कोई पछतावा नहीं था। बस एक शांत, संतुष्ट मुस्कान। उन्होंने जानबूझकर कुछ नहीं कहा।
यह दोबारा न आए—ऐसा वे बिल्कुल नहीं चाहते थे।
आज तो बस शुरुआत थी।
सरिस्का के शरीर ने जो प्रतिक्रिया दी थी, जो कराहें निकली थीं, जो पानी छूटा था… सब कुछ उनके प्लान के मुताबिक था। अब धीरे-धीरे, सब्र से, और गहरा उतरना था।
दरवाज़ा बंद होते ही चाचा ने कमिनी मुस्कान के साथ आँखें बंद कर लीं।
प्लान बहुत बड़ा था।

सरिस्का कमरे से निकलते ही सीधे बाथरूम की ओर चली गई। दरवाज़ा बंद करके पीछे से कुंडी लगा ली। दीवार के सहारे खड़ी होकर लंबी साँस ली, लेकिन साँस अंदर तक नहीं उतर रही थी।
सीने में एक भारी, काला सा बोझ बैठ गया था।
ग्लानि पहले आई। तेज़, तीखी, साँस रोक देने वाली।
“मैंने क्या कर डाला…”
विनय बगल वाले कमरे में बेहोश पड़ा था। उसका पति। जिसने उसे कभी इतना गहरा नहीं छुआ था। और वह… चाचा के नीचे लेटी हुई तीन-तीन बार झड़ चुकी थी। अंदर तक उनके वीर्य से भरी हुई। जाँघों के बीच अभी भी वह गर्म, चिपचिपा एहसास बना हुआ था।
शर्म उसके गालों तक नहीं, पूरे शरीर तक फैल गई थी। गोरा बदन जो कुछ देर पहले चाचा की जीभ और हाथों के नीचे काँप रहा था, अब खुद से घृणा कर रहा था। स्तनों पर चाचा के दाँतों के हल्के निशान, निप्पल की हल्की लालिमा, योनि की हल्की सूजन—हर निशान उसे बता रहा था कि वह खुद इसके लिए राज़ी हो गई थी। शरीर ने विरोध करना बंद कर दिया था।
डर भी था।
अगर विनय को पता चल गया…
अगर कभी घर में कोई बात फँस गई…
चाचा की वह दबंग आँखें याद आ गईं। उन्होंने उसे रोका तक नहीं। जैसे उन्हें यकीन था कि वह फिर आएगी।
लेकिन सबसे खतरनाक चीज़ ग्लानि और डर के नीचे दबी हुई थी—
वह अहसास जो अभी भी शरीर में बचा हुआ था।
आठ इंच की मोटी लंड का भरा-भरा दबाव। हर धक्के के साथ गर्भ तक पहुँचती लहर। तीन बार झड़ते समय जो तीव्रता आई थी, वह विनय के साथ कभी नहीं आई थी। पतला, छोटा लिंग याद करके मन में एक अजीब सी तुलना हो रही थी—और वह तुलना उसे और शर्मिंदा कर रही थी।
मन बार-बार दो आवाज़ों में बँट रहा था।
एक आवाज़ चिल्ला रही थी—
“गंदी औरत… पति के चाचा के साथ… शर्म कर… नहा ले… भूल जा…”
दूसरी आवाज़ बहुत धीमी थी, लेकिन साफ़—
“इतना गहरा… इतना भरा… इतना मज़ा… कभी नहीं हुआ था…”
सरिस्का ने ठंडे पानी से चेहरा धोया। साड़ी बाँधी। ब्लाउज़ के हुक लगाए। लेकिन शरीर अभी भी काँप रहा था। योनि के अंदर वीर्य धीरे-धीरे बाहर रिस रहा था। हर कदम के साथ वह अहसास वापस आ जाता था।
वह आईने के सामने खड़ी रही। आँखों में पानी था, लेकिन आँसू नहीं बहे। चेहरा थका हुआ था। होंठ सूजे हुए। गर्दन पर हल्के लाल निशान।
मन में एक सवाल बार-बार घूम रहा था—
“अब आगे क्या होगा?”
चाचा ने उसे नहीं रोका था।
मतलब… यह खत्म नहीं हुआ था।
यह शुरुआत थी।
और सबसे डरावनी बात यह थी कि उसके शरीर का एक छोटा-सा हिस्सा… उस शुरुआत से डर नहीं रहा था

सरिस्का चुपके से अपने कमरे में दाखिल हुई।
दरवाज़ा धीरे से बंद किया। अंधेरे में पंखे की आवाज़ के अलावा कुछ नहीं सुनाई दिया। बिस्तर की तरफ़ बढ़ी तो नज़ारा साफ़ दिख गया—विनय एक तरफ़ मुँह किए हुए गहरी नींद में सो रहे थे। साँसें भारी और नियमित थीं। शराब का नशा अभी भी उन पर हावी था। बेटा उनके बगल में छोटा-सा होकर सोया हुआ था, एक हाथ विनय की बाँह पर रखा हुआ। दोनों पूरी तरह बेखबर।
सरिस्का खड़ी-खड़ी देखती रही।
दिल बैठ गया।
उसने दीवार पर टँगी घड़ी की ओर नज़र दौड़ाई। रात के साढ़े बारह बज रहे थे। चाचा के कमरे में वह करीब दो घंटे रही थी। दो पूरे घंटे…
शरीर में एक बार फिर वह अहसास कौंधा—अंदर का भारीपन, जाँघों के बीच हल्की गीली चिपचिपाहट, स्तनों पर बचे हुए निशान। ग्लानि ने फिर से सीना जकड़ लिया। आँखें भर आईं, लेकिन आँसू नहीं गिरे। वह बस बिस्तर के किनारे बैठ गई।
विनय की पीठ देखती रही।
“तुम्हारे सोते हुए… मैं…” मन में बात पूरी नहीं हो पाई।
कुछ देर वह ऐसे ही बैठी रही। फिर धीरे से साड़ी की गाँठ खोली, ब्लाउज़ ढीला किया और चुपचाप लेट गई। बेटे और विनय के बीच वाली खाली जगह में। पीठ विनय की तरफ़ कर ली। आँखें बंद कीं।
शरीर थका हुआ था। तीन बार झड़ने के बाद, इतने तगड़े सेक्स के बाद, और ऊपर से वह मानसिक तूफ़ान… सब कुछ एक साथ टूट रहा था।
लेटते ही नींद आने लगी।
ऐसी गहरी, भारी नींद जो उसे पिछले कई महीनों से नहीं आई थी। न कोई सपना, न कोई ख्याल। बस अंधेरा और सुन्नता। शरीर ने जैसे हार मान ली हो। आँखें बंद होते ही वह पूरी तरह सो गई—विनय के बगल में, बेटे के पास, चाचा के वीर्य के अहसास के साथ।
 
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