सरिस्का रसोई में खड़ी थी। हाथ में गीला कपड़ा था, लेकिन बर्तन धोने का मन नहीं था। कान कमरे की तरफ थे—रामबहादुर की भारी आवाज, विनय की कांपती हुई लाचार सहमति। हर शब्द उसके जिस्म में उतर रहा था।
मन के अंदर उथल-पुथल मची हुई थी।
नफरत अभी भी जिंदा थी। यही वो आदमी था जिसकी बदनामी की वजह से उसके मां-बाप ने रिश्ते तोड़ दिए थे। काला, डरावना, जेल का भूत। बचपन से सुनी हुई कहानियां—गुंडागर्दी, मारपीट, औरतें… सब याद आ रही थीं। लेकिन अब वही आदमी उनके सिर पर छत बनकर खड़ा था। खाना उसी का, दवाई उसी की, किराया उसी का। नफरत के साथ-साथ एक गहरी मजबूरी भी बैठ गई थी।
और उसके नीचे… शरीर की भूख।
पतली नाइटी में उसका जिस्म तन रहा था। 36 के स्तन भारी थे, निपल्स कपड़े से रगड़ खाकर कड़े हो चुके थे। नीचे 38 की मोटी गांड हर छोटे मूवमेंट पर लहरा रही थी। विनय के बेजान लिंग की याद आते ही योनि में हल्की सी जलन सी होने लगती। महीने बीत गए सेक्स हुए। शरीर भूल नहीं पाया था। रामबहादुर की मोटी उंगलियां जब पानी के जग लेते समय छू गई थीं, तो जैसे करंट सा लग गया था। वह पीछे हट गई थी, लेकिन अंदर कुछ और हुआ था—योनि की दीवारें हल्की सिकुड़ गई थीं।
“जो आप कहेंगे चाचा… वही सही है।”
उसने जो शब्द कहे थे, वे मुंह से निकले थे, लेकिन मन में और बातें घूम रही थीं।
क्या वह सच में मान गई है? या सिर्फ मजबूरी है?
उसकी निगाह जब स्तनों और गांड पर रुकी थी, तो सरिस्का ने महसूस किया था। डरावनी निगाह। वजनदार। जैसे वह पहले से ही कुछ तय कर चुका हो। डर लगा था… और उसके साथ एक अजीब सी, गंदी सी उत्तेजना भी। शर्म आ रही थी खुद पर। पति बगल वाले कमरे में लाचार पड़ा है, और वह खुद इस काले, तगड़े आदमी की निगाह से गीली हो रही है।
रसोई का बल्ब मंद था। उसने सांस गहराई से ली। नाइटी के अंदर पसीना चिपका हुआ था। जांघों के बीच हल्की नमी महसूस हुई। उसने पैर भींच लिए।
“शर्म कर… पागल औरत…” मन ने डांटा।
लेकिन शरीर नहीं माना।
बाहर से रामबहादुर की खरखराती खांसी आई। शराब की बोतल की आवाज। विनय की खामोशी।
सरिस्का ने आंखें बंद कीं।
नफरत, डर, मजबूरी, और एक दबी हुई कामुक भूख—सब एक साथ उसके सीने में धड़क रहे थे। गांव का यह छोटा मकान अब सिर्फ रहने की जगह नहीं रह गया था। यह एक जाल बन चुका था, जिसमें उसका जिस्म पहले से ही फंसने लगा था।
सरिस्का के मन की गहराई अंधेरी और गीली थी—जैसे कोई पुराना कुआं, जिसमें कई परतें एक साथ सड़ रही हों।
सबसे ऊपर थी नफरत।
काली, मोटी, पुरानी नफरत। रामबहादुर का नाम सुनते ही उसके जिस्म में पहले सिहरन होती थी, फिर गुस्सा। यही आदमी था जिसकी बदनामी ने उसके मां-बाप को पागल बना दिया था। “उस खानदान में शादी मत कर… गुंडे हैं, जेलिया हैं, औरतें बेचते हैं…” सालों तक यही सुना था। शादी के बाद भी जब भी कोई रिश्तेदार उसका नाम लेता, सरिस्का का चेहरा तमतमा जाता। अब वही आदमी उनके घर का मालिक बनकर बैठा था। तंबाकू थूकता, शराब पीता, और हुक्म चलाता। नफरत अभी भी जिंदा थी—लेकिन अब वह नफरत के ऊपर एक और परत चढ़ चुकी थी। मजबूरी की।
मजबूरी गहरी थी।
विनय का बेजान शरीर, कंपनी का धोखा, किराए का नोटिस, बेटे का भविष्य… सबने उसे इस काले आदमी के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। “जो आप कहेंगे चाचा…” कहते समय उसकी आवाज कांपती थी, लेकिन अंदर कुछ और टूटता था। गर्व टूटता था। स्त्री होने का वह अहंकार टूटता था जो कभी लव मैरिज करके घरवालों से बगावत करने में दिखा था। अब वह बगावत की जगह सिर्फ सिर झुकाए खड़ी रहती।
और सबसे नीचे, सबसे गंदी परत थी—शरीर की भूख।
माह भर से ज्यादा हो गए थे। विनय का लिंग मरा हुआ पड़ा रहता। छूने से भी कोई हरकत नहीं। सरिस्का रात भर करवटें बदलती। स्तन भारी हो जाते, निपल्स चादर से रगड़ खाकर तन जाते, जांघों के बीच नमी फैल जाती। वह खुद को छूती—धीरे से, शर्म से, गुस्से से। उंगलियां गीली हो जातीं, लेकिन संतुष्टि नहीं मिलती। भूख और गहरी हो जाती।
अब रामबहादुर की मौजूदगी ने उस भूख को और उलझा दिया था।
जब वह पानी देने गई थी, और उसकी मोटी काली उंगलियां छू गई थीं—तो योनि ने सिकुड़कर जवाब दिया था। शर्मनाक जवाब। डरावना जवाब। वह पीछे हटी थी, लेकिन शरीर आगे बढ़ना चाहता था। उसकी निगाह जब स्तनों पर रुकी, फिर गांड पर ठहरी, तो सरिस्का को लगा जैसे कोई गरम लोहा उसकी त्वचा पर रख दिया गया हो। डर लगा… और उसके साथ एक गंदी सी, मीठी सी लहर भी।
मन के अंदर आवाजें चल रही थीं—
“यह गुंडा है… जेलिया है… तेरे पति का चाचा है…”
“लेकिन तगड़ा है… काला है… हाथ मोटे हैं… शायद जोर से पकड़े…”
“शर्म कर रांडे… पति बगल में पड़ा है…”
“पति तो अब कुछ दे नहीं सकता… तू कब तक सूखी रहेगी…”
ये आवाजें रात भर चलतीं।
सरिस्का खुद से नफरत करती। खुद को गंदी कहती। लेकिन जब अंधेरे में लेटी रहती, और रामबहादुर के कमरे से शराब की बोतल की आवाज आती, तो उसकी गांड अपने-आप तन जाती। जैसे कोई बुला रहा हो। जैसे कोई भारी शरीर उसके ऊपर आने वाला हो।
वह आंखें भींच लेती।
विनय का चेहरा याद करती—लाचार, शर्मिंदा, टूटा हुआ।
फिर रामबहादुर का चेहरा आ जाता—काला, कठोर, तंबाकू भरा मुंह, डरावनी आंखें।
दोनों चेहरों के बीच उसकी योनि धड़कने लगती।
गहराई में जाकर देखो तो सरिस्का अब सिर्फ एक दुखी पत्नी नहीं रह गई थी।
वह एक भूखी औरत बन चुकी थी—जिसके अंदर नफरत और वासना एक ही बिस्तर पर सो रहे थे।
और गांव का यह छोटा मकान, तीन कमरों वाला, धीरे-धीरे उस भूख को और पाल रहा था।
विनय का व्यक्तित्व एक नरम, जिम्मेदार लेकिन अब पूरी तरह टूटे हुए पुरुष का है। एक्सीडेंट से पहले और बाद की उसकी स्थिति में भारी अंतर आ चुका है, और यही अंतर उसके पूरे व्यक्तित्व को परिभाषित करता है।
विनय जन्म से ही दबंग या हावी रहने वाला पुरुष नहीं था। गोरा, सुंदर चेहरा, कमजोर शरीर और छोटी मर्दाना क्षमता—इन सबने उसे स्वभाव से ही नरम बना दिया था। वह झगड़ा नहीं करता था, रौब नहीं जमाता था। लव मैरिज करना उसका सबसे बड़ा साहसिक फैसला था, लेकिन उसके बाद भी वह संघर्ष से ज्यादा समझौता करने वाला रहा। उसकी मर्दानगी कभी शारीरिक शक्ति या दबंगई पर टिकी नहीं थी।
एक्सीडेंट से पहले वह अपनी जिम्मेदारियों को समझता था। नौकरी, पत्नी, बच्चा—सब संभालने की कोशिश करता था। सेक्स कम होने पर भी वह दोषी महसूस करता था, भले ही सरिस्का शिकायत न करे। यह दोषभाव उसके व्यक्तित्व का गहरा हिस्सा है। वह खुद को “पूरा मर्द” नहीं मानता था, और अब तो बिल्कुल नहीं मानता।
अब उसका व्यक्तित्व लगभग पूरी तरह लाचारी में डूब चुका है। व्हीलचेयर, बेजान लिंग, नौकरी का छिनना—इन सबने उसे अंदर से तोड़ दिया है। वह विरोध नहीं करता। चाचा जो कहते हैं, सिर हिला देता है। “हम बोझ बन गए हैं” जैसे वाक्य उसके मुंह से बार-बार निकलते हैं। यह आत्म-समर्पण अब उसकी आदत बन गई है। वह लड़ना नहीं चाहता, क्योंकि लड़ने की ताकत और इच्छा दोनों खत्म हो चुकी हैं।
विनय के व्यक्तित्व का सबसे दर्दनाक पहलू है—शर्म। वह अपनी पत्नी के सामने शर्मिंदा है कि वह अब कुछ नहीं दे सकता—न शरीर, न पैसा, न सुरक्षा। चाचा के सामने शर्मिंदा है कि वह बोझ बनकर रह गया है। बच्चे के सामने शर्मिंदा है कि वह पिता जैसी छवि नहीं दे पा रहा। यह शर्म उसे चुप बना देती है। वह बात कम करता है, नजरें चुराता है, और खुद को छोटा महसूस करता है।
अब वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो चुका है—पहले सरिस्का पर, अब रामबहादुर पर। यह निर्भरता उसके व्यक्तित्व को और निष्क्रिय बना रही है। वह फैसले नहीं लेता, बस स्वीकार करता है। गांव आने का फैसला हो, चाचा की बातें हों, या घर का माहौल—वह बस मूक दर्शक बना रहता है। उसकी चुप्पी अब सिर्फ शर्म नहीं, बल्कि हार की स्वीकृति भी है।
हालांकि वह खुलकर कुछ नहीं कहता, लेकिन अंदर एक दबी हुई ईर्ष्या और असहायता जरूर है। जब चाचा सरिस्का को देखते हैं, जब वह हुक्म चलाते हैं, जब सरिस्का सिर झुकाकर जवाब देती है—तो विनय सब देखता है। विरोध करने की क्षमता न होने के कारण यह भावनाएं उसके अंदर ही सड़ती रहती हैं। वह गुस्सा नहीं कर सकता, इसलिए खुद को और छोटा महसूस करता है।
विनय के अंदर अभी भी पत्नी और बच्चे के प्रति कोमलता बची हुई है। वह उन्हें बोझ नहीं बनाना चाहता, पर बन चुका है। यह कोमलता अब उसकी मजबूरी बन गई है। वह सरिस्का को स्वतंत्र नहीं देखना चाहता, लेकिन खुद उसे सुरक्षा देने की स्थिति में भी नहीं है।
कुल मिलाकर
विनय अब एक ऐसे पुरुष के रूप में बच गया है जिसने हार स्वीकार कर ली है। नरम स्वभाव, जिम्मेदारी का भाव, गहरी शर्म, और पूर्ण निष्क्रियता—ये उसके व्यक्तित्व के मुख्य स्तंभ हैं। वह नायक नहीं रहा, शिकायतकर्ता भी नहीं बन पाया। वह बस एक मूक, शर्मिंदा और पूरी तरह निर्भर पुरुष रह गया है, जो अपनी ही जिंदगी में दर्शक बनकर बैठा है।
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हमको गांव में रहते हुए 3 महीने हो चुके थे इन तीन महीना में सरिस्का का व्यवहार मुझे कुछ बदला बदला लग रहा था फिर एक शाम एक रात को
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रात का एक बज रहा था।
मेरी आंख अचानक खुली। कमरे में अंधेरा था, सिर्फ खिड़की से हल्की चांदनी झांक रही थी। मैंने हाथ बढ़ाया—बगल वाली जगह खाली थी। ठंडी।
सरिस्का नहीं थी।
एक पल के लिए सांस रुक गई। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। कहां गई? कब गई? मैं सोते हुए महसूस भी नहीं कर पाया। व्हीलचेयर दूर थी, खुद उठने का तो सवाल ही नहीं। मैं बस पड़ा-पड़ा अंधेरे में सुनता रहा। बाहर सन्नाटा। कोई आहट नहीं। मन में काले ख्याल दौड़ने लगे—चाचा का कमरा… बंद दरवाजा…
दस मिनट जैसे दस घंटे लग रहे थे।
फिर धीरे से किवाड़ खुला। सरिस्का अंदर आई। मैंने आंखें बंद रखीं, लेकिन सांसें रोक लीं। वह चुपचाप चारपाई पर लेटी। कोई बात नहीं की, कोई सफाई नहीं दी। बस लेटी और… दो-चार सांसों में सो गई। इतनी जल्दी, जैसे थक कर चूर हो।
मेरी जान में जान आई। कम से कम वापस तो आ गई।
लेकिन फिर…
उसके शरीर से एक गंध आई।
पहले हल्की, फिर तेज। सेक्स की गंदी, भरी हुई गंध। जैसी किसी औरत के जांघों के बीच से घंटों तक रिसती रहती है। उसके ऊपर थी मर्दाना पसीने की गंध—भारी, तेज, किसी तगड़े शरीर की। और उसके बीच में तंबाकू की हल्की-सी, तीखी खुशबू। वही जो चाचा के मुंह से हमेशा आती थी।
मेरा पूरा शरीर जैसे जल गया।
मैंने धीरे से करवट ली। सरिस्का की पीठ मेरी तरफ थी। नाइटी हल्की सी ऊपर उठी हुई थी। उसकी मोटी गांड के बीचों-बीच हल्की चमक थी चांदनी में—पसीने की या कुछ और की, मैं तय नहीं कर पाया। उसके बाल बिखरे हुए थे, गर्दन पर गीले। सांसें गहरी और शांत थीं, जैसे वह सच में गहरी नींद में हो।
लेकिन गंध… गंध झूठ नहीं बोल रही थी।
मेरे मन में तस्वीरें फिर से तड़पने लगीं।
चाचा का काला तगड़ा शरीर… सरिस्का का गोरा बदन उसके नीचे…
मोटे हाथ उसकी गांड दबाते हुए…
तंबाकू भरा मुंह उसके स्तनों पर…
और वह गंध… वही गंध जो अब मेरे बिस्तर पर फैल रही थी।
मैंने आंखें खोलीं। छत की तरफ देखा। नींद पूरी तरह उड़ चुकी थी।
शक अब शक नहीं रह गया था।
वह एक सच्चाई की तरह मेरे सीने पर बैठ गया था—भारी, गंदी, और असहनीय।
सरिस्का गहरी सोई हुई थी।
और मैं अंधेरे में पड़ा, उसके शरीर से आती उस मिश्रित गंध को बार-बार सूंघता रहा—
सेक्स की, मर्दाना पसीने की, और तंबाकू की।
नींद उस रात मेरे नसीब में नहीं थी।
विनय की मानसिक स्थिति उस रात के बाद पूरी तरह बिखर चुकी थी।
पहले सिर्फ लाचारी थी—शरीर का मरा होना, नौकरी का छिनना, चाचा के घर में पड़े रहना। अब उस लाचारी के ऊपर शक का काला पहाड़ बैठ गया था। और वह पहाड़ हर सांस के साथ और भारी हो रहा था।
उस रात की गंध उसके दिमाग में चिपक गई थी। सेक्स की भरी हुई, गंदी गंध… मर्दाना पसीने की तेज बू… और तंबाकू की हल्की लेकिन साफ पहचान। तीनों मिलकर एक सजा बन गई थीं। वह बार-बार आंखें बंद करता, लेकिन वही तस्वीरें आ जातीं—सरिस्का का गोरा शरीर, चाचा के काले मोटे हाथ, उसकी भारी गांड उन हाथों में दबती हुई, और वह खुद… चारपाई पर पड़ा, बेजान, कुछ कर पाने में असमर्थ।
मन के अंदर दो आवाजें चल रही थीं।
एक आवाज कहती—“तू पागल हो गया है… शायद पसीना था… शायद तंबाकू की गंध कपड़ों में लग गई… कुछ नहीं हुआ…”
दूसरी आवाज हंसती—“दस मिनट कहां गई थी आधी रात को? क्यों इतनी जल्दी सो गई? क्यों शरीर से सेक्स की गंध आ रही थी? तू जानता है… तू सब जानता है… बस स्वीकार नहीं कर पा रहा।”
शर्म सबसे ज्यादा काट रही थी।
वह अपनी पत्नी के शरीर से किसी और मर्द की गंध सूंघ रहा था—और कुछ कर नहीं पा रहा था। न उठ सकता था, न पकड़ सकता था, न पूछ सकता था। उसका लिंग मरा हुआ था, उसकी कमर टूटी हुई थी, उसकी हिम्मत खत्म हो चुकी थी। वह खुद को आदमी भी नहीं समझ रहा था। बस एक गवाह—जो अपनी ही बीवी के शरीर पर किसी और के निशान सूंघने के लिए मजबूर हो।
ईर्ष्या भी थी, लेकिन वह शुद्ध गुस्से वाली ईर्ष्या नहीं थी। वह एक लाचार, रोती हुई ईर्ष्या थी। जैसे कोई कुत्ता अपनी हड्डी किसी और के मुंह में देखे और सिर्फ पूंछ हिलाए। वह चाहता था कि वह चिल्लाए, सरिस्का के बाल पकड़े, पूछे—“कहां थी? किसके नीचे थी?” लेकिन गला सूख जाता। आवाज निकलने से पहले ही मर जाती।
आत्म-ग्लानि सबसे गहराई में थी।
“मैं ही कमजोर था… छोटा लिंग… फिर एक्सीडेंट… अब यह सब मेरी सजा है।”
वह खुद को दोषी ठहरा रहा था। सरिस्का को पूरी तरह दोष नहीं दे पा रहा था। मन कहता—“उसका शरीर जीवित है… भूखा है… तूने तो कुछ दिया नहीं महीने भर… अब अगर वह कहीं और चली गई तो दोष किसका?” यह सोचकर वह और टूटता।
नींद गायब हो गई थी।
रात भर वह पड़ा-पड़ा उसकी सांसें सुनता। गंध अब कम हो चुकी थी, लेकिन याद रह गई थी। सुबह होते-होते उसकी आंखें सूज जातीं। दिन में भी वही ख्याल पीछा करते—सरिस्का जब चाचा को पानी देने जाती, जब मुस्कुराती, जब थोड़ी देर ज्यादा लगती। हर छोटी बात अब सबूत लगती।
विनय अब सिर्फ लाचार पति नहीं रह गया था।
वह एक ऐसा पुरुष बन चुका था जो अपनी पत्नी के शरीर पर किसी और मर्द की गंध को सूंघते हुए भी चुप रहने के लिए मजबूर था।
उसकी मानसिक स्थिति एक धीमी मौत की तरह थी—हर रात थोड़ा और मरता हुआ, और हर सुबह फिर से जी उठता हुआ सिर्फ इसलिए कि वह और संदेह कर सके।
मन के अंदर उथल-पुथल मची हुई थी।
नफरत अभी भी जिंदा थी। यही वो आदमी था जिसकी बदनामी की वजह से उसके मां-बाप ने रिश्ते तोड़ दिए थे। काला, डरावना, जेल का भूत। बचपन से सुनी हुई कहानियां—गुंडागर्दी, मारपीट, औरतें… सब याद आ रही थीं। लेकिन अब वही आदमी उनके सिर पर छत बनकर खड़ा था। खाना उसी का, दवाई उसी की, किराया उसी का। नफरत के साथ-साथ एक गहरी मजबूरी भी बैठ गई थी।
और उसके नीचे… शरीर की भूख।
पतली नाइटी में उसका जिस्म तन रहा था। 36 के स्तन भारी थे, निपल्स कपड़े से रगड़ खाकर कड़े हो चुके थे। नीचे 38 की मोटी गांड हर छोटे मूवमेंट पर लहरा रही थी। विनय के बेजान लिंग की याद आते ही योनि में हल्की सी जलन सी होने लगती। महीने बीत गए सेक्स हुए। शरीर भूल नहीं पाया था। रामबहादुर की मोटी उंगलियां जब पानी के जग लेते समय छू गई थीं, तो जैसे करंट सा लग गया था। वह पीछे हट गई थी, लेकिन अंदर कुछ और हुआ था—योनि की दीवारें हल्की सिकुड़ गई थीं।
“जो आप कहेंगे चाचा… वही सही है।”
उसने जो शब्द कहे थे, वे मुंह से निकले थे, लेकिन मन में और बातें घूम रही थीं।
क्या वह सच में मान गई है? या सिर्फ मजबूरी है?
उसकी निगाह जब स्तनों और गांड पर रुकी थी, तो सरिस्का ने महसूस किया था। डरावनी निगाह। वजनदार। जैसे वह पहले से ही कुछ तय कर चुका हो। डर लगा था… और उसके साथ एक अजीब सी, गंदी सी उत्तेजना भी। शर्म आ रही थी खुद पर। पति बगल वाले कमरे में लाचार पड़ा है, और वह खुद इस काले, तगड़े आदमी की निगाह से गीली हो रही है।
रसोई का बल्ब मंद था। उसने सांस गहराई से ली। नाइटी के अंदर पसीना चिपका हुआ था। जांघों के बीच हल्की नमी महसूस हुई। उसने पैर भींच लिए।
“शर्म कर… पागल औरत…” मन ने डांटा।
लेकिन शरीर नहीं माना।
बाहर से रामबहादुर की खरखराती खांसी आई। शराब की बोतल की आवाज। विनय की खामोशी।
सरिस्का ने आंखें बंद कीं।
नफरत, डर, मजबूरी, और एक दबी हुई कामुक भूख—सब एक साथ उसके सीने में धड़क रहे थे। गांव का यह छोटा मकान अब सिर्फ रहने की जगह नहीं रह गया था। यह एक जाल बन चुका था, जिसमें उसका जिस्म पहले से ही फंसने लगा था।
सरिस्का के मन की गहराई अंधेरी और गीली थी—जैसे कोई पुराना कुआं, जिसमें कई परतें एक साथ सड़ रही हों।
सबसे ऊपर थी नफरत।
काली, मोटी, पुरानी नफरत। रामबहादुर का नाम सुनते ही उसके जिस्म में पहले सिहरन होती थी, फिर गुस्सा। यही आदमी था जिसकी बदनामी ने उसके मां-बाप को पागल बना दिया था। “उस खानदान में शादी मत कर… गुंडे हैं, जेलिया हैं, औरतें बेचते हैं…” सालों तक यही सुना था। शादी के बाद भी जब भी कोई रिश्तेदार उसका नाम लेता, सरिस्का का चेहरा तमतमा जाता। अब वही आदमी उनके घर का मालिक बनकर बैठा था। तंबाकू थूकता, शराब पीता, और हुक्म चलाता। नफरत अभी भी जिंदा थी—लेकिन अब वह नफरत के ऊपर एक और परत चढ़ चुकी थी। मजबूरी की।
मजबूरी गहरी थी।
विनय का बेजान शरीर, कंपनी का धोखा, किराए का नोटिस, बेटे का भविष्य… सबने उसे इस काले आदमी के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। “जो आप कहेंगे चाचा…” कहते समय उसकी आवाज कांपती थी, लेकिन अंदर कुछ और टूटता था। गर्व टूटता था। स्त्री होने का वह अहंकार टूटता था जो कभी लव मैरिज करके घरवालों से बगावत करने में दिखा था। अब वह बगावत की जगह सिर्फ सिर झुकाए खड़ी रहती।
और सबसे नीचे, सबसे गंदी परत थी—शरीर की भूख।
माह भर से ज्यादा हो गए थे। विनय का लिंग मरा हुआ पड़ा रहता। छूने से भी कोई हरकत नहीं। सरिस्का रात भर करवटें बदलती। स्तन भारी हो जाते, निपल्स चादर से रगड़ खाकर तन जाते, जांघों के बीच नमी फैल जाती। वह खुद को छूती—धीरे से, शर्म से, गुस्से से। उंगलियां गीली हो जातीं, लेकिन संतुष्टि नहीं मिलती। भूख और गहरी हो जाती।
अब रामबहादुर की मौजूदगी ने उस भूख को और उलझा दिया था।
जब वह पानी देने गई थी, और उसकी मोटी काली उंगलियां छू गई थीं—तो योनि ने सिकुड़कर जवाब दिया था। शर्मनाक जवाब। डरावना जवाब। वह पीछे हटी थी, लेकिन शरीर आगे बढ़ना चाहता था। उसकी निगाह जब स्तनों पर रुकी, फिर गांड पर ठहरी, तो सरिस्का को लगा जैसे कोई गरम लोहा उसकी त्वचा पर रख दिया गया हो। डर लगा… और उसके साथ एक गंदी सी, मीठी सी लहर भी।
मन के अंदर आवाजें चल रही थीं—
“यह गुंडा है… जेलिया है… तेरे पति का चाचा है…”
“लेकिन तगड़ा है… काला है… हाथ मोटे हैं… शायद जोर से पकड़े…”
“शर्म कर रांडे… पति बगल में पड़ा है…”
“पति तो अब कुछ दे नहीं सकता… तू कब तक सूखी रहेगी…”
ये आवाजें रात भर चलतीं।
सरिस्का खुद से नफरत करती। खुद को गंदी कहती। लेकिन जब अंधेरे में लेटी रहती, और रामबहादुर के कमरे से शराब की बोतल की आवाज आती, तो उसकी गांड अपने-आप तन जाती। जैसे कोई बुला रहा हो। जैसे कोई भारी शरीर उसके ऊपर आने वाला हो।
वह आंखें भींच लेती।
विनय का चेहरा याद करती—लाचार, शर्मिंदा, टूटा हुआ।
फिर रामबहादुर का चेहरा आ जाता—काला, कठोर, तंबाकू भरा मुंह, डरावनी आंखें।
दोनों चेहरों के बीच उसकी योनि धड़कने लगती।
गहराई में जाकर देखो तो सरिस्का अब सिर्फ एक दुखी पत्नी नहीं रह गई थी।
वह एक भूखी औरत बन चुकी थी—जिसके अंदर नफरत और वासना एक ही बिस्तर पर सो रहे थे।
और गांव का यह छोटा मकान, तीन कमरों वाला, धीरे-धीरे उस भूख को और पाल रहा था।
विनय का व्यक्तित्व एक नरम, जिम्मेदार लेकिन अब पूरी तरह टूटे हुए पुरुष का है। एक्सीडेंट से पहले और बाद की उसकी स्थिति में भारी अंतर आ चुका है, और यही अंतर उसके पूरे व्यक्तित्व को परिभाषित करता है।
विनय जन्म से ही दबंग या हावी रहने वाला पुरुष नहीं था। गोरा, सुंदर चेहरा, कमजोर शरीर और छोटी मर्दाना क्षमता—इन सबने उसे स्वभाव से ही नरम बना दिया था। वह झगड़ा नहीं करता था, रौब नहीं जमाता था। लव मैरिज करना उसका सबसे बड़ा साहसिक फैसला था, लेकिन उसके बाद भी वह संघर्ष से ज्यादा समझौता करने वाला रहा। उसकी मर्दानगी कभी शारीरिक शक्ति या दबंगई पर टिकी नहीं थी।
एक्सीडेंट से पहले वह अपनी जिम्मेदारियों को समझता था। नौकरी, पत्नी, बच्चा—सब संभालने की कोशिश करता था। सेक्स कम होने पर भी वह दोषी महसूस करता था, भले ही सरिस्का शिकायत न करे। यह दोषभाव उसके व्यक्तित्व का गहरा हिस्सा है। वह खुद को “पूरा मर्द” नहीं मानता था, और अब तो बिल्कुल नहीं मानता।
अब उसका व्यक्तित्व लगभग पूरी तरह लाचारी में डूब चुका है। व्हीलचेयर, बेजान लिंग, नौकरी का छिनना—इन सबने उसे अंदर से तोड़ दिया है। वह विरोध नहीं करता। चाचा जो कहते हैं, सिर हिला देता है। “हम बोझ बन गए हैं” जैसे वाक्य उसके मुंह से बार-बार निकलते हैं। यह आत्म-समर्पण अब उसकी आदत बन गई है। वह लड़ना नहीं चाहता, क्योंकि लड़ने की ताकत और इच्छा दोनों खत्म हो चुकी हैं।
विनय के व्यक्तित्व का सबसे दर्दनाक पहलू है—शर्म। वह अपनी पत्नी के सामने शर्मिंदा है कि वह अब कुछ नहीं दे सकता—न शरीर, न पैसा, न सुरक्षा। चाचा के सामने शर्मिंदा है कि वह बोझ बनकर रह गया है। बच्चे के सामने शर्मिंदा है कि वह पिता जैसी छवि नहीं दे पा रहा। यह शर्म उसे चुप बना देती है। वह बात कम करता है, नजरें चुराता है, और खुद को छोटा महसूस करता है।
अब वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो चुका है—पहले सरिस्का पर, अब रामबहादुर पर। यह निर्भरता उसके व्यक्तित्व को और निष्क्रिय बना रही है। वह फैसले नहीं लेता, बस स्वीकार करता है। गांव आने का फैसला हो, चाचा की बातें हों, या घर का माहौल—वह बस मूक दर्शक बना रहता है। उसकी चुप्पी अब सिर्फ शर्म नहीं, बल्कि हार की स्वीकृति भी है।
हालांकि वह खुलकर कुछ नहीं कहता, लेकिन अंदर एक दबी हुई ईर्ष्या और असहायता जरूर है। जब चाचा सरिस्का को देखते हैं, जब वह हुक्म चलाते हैं, जब सरिस्का सिर झुकाकर जवाब देती है—तो विनय सब देखता है। विरोध करने की क्षमता न होने के कारण यह भावनाएं उसके अंदर ही सड़ती रहती हैं। वह गुस्सा नहीं कर सकता, इसलिए खुद को और छोटा महसूस करता है।
विनय के अंदर अभी भी पत्नी और बच्चे के प्रति कोमलता बची हुई है। वह उन्हें बोझ नहीं बनाना चाहता, पर बन चुका है। यह कोमलता अब उसकी मजबूरी बन गई है। वह सरिस्का को स्वतंत्र नहीं देखना चाहता, लेकिन खुद उसे सुरक्षा देने की स्थिति में भी नहीं है।
कुल मिलाकर
विनय अब एक ऐसे पुरुष के रूप में बच गया है जिसने हार स्वीकार कर ली है। नरम स्वभाव, जिम्मेदारी का भाव, गहरी शर्म, और पूर्ण निष्क्रियता—ये उसके व्यक्तित्व के मुख्य स्तंभ हैं। वह नायक नहीं रहा, शिकायतकर्ता भी नहीं बन पाया। वह बस एक मूक, शर्मिंदा और पूरी तरह निर्भर पुरुष रह गया है, जो अपनी ही जिंदगी में दर्शक बनकर बैठा है।
.........
हमको गांव में रहते हुए 3 महीने हो चुके थे इन तीन महीना में सरिस्का का व्यवहार मुझे कुछ बदला बदला लग रहा था फिर एक शाम एक रात को
......................
रात का एक बज रहा था।
मेरी आंख अचानक खुली। कमरे में अंधेरा था, सिर्फ खिड़की से हल्की चांदनी झांक रही थी। मैंने हाथ बढ़ाया—बगल वाली जगह खाली थी। ठंडी।
सरिस्का नहीं थी।
एक पल के लिए सांस रुक गई। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। कहां गई? कब गई? मैं सोते हुए महसूस भी नहीं कर पाया। व्हीलचेयर दूर थी, खुद उठने का तो सवाल ही नहीं। मैं बस पड़ा-पड़ा अंधेरे में सुनता रहा। बाहर सन्नाटा। कोई आहट नहीं। मन में काले ख्याल दौड़ने लगे—चाचा का कमरा… बंद दरवाजा…
दस मिनट जैसे दस घंटे लग रहे थे।
फिर धीरे से किवाड़ खुला। सरिस्का अंदर आई। मैंने आंखें बंद रखीं, लेकिन सांसें रोक लीं। वह चुपचाप चारपाई पर लेटी। कोई बात नहीं की, कोई सफाई नहीं दी। बस लेटी और… दो-चार सांसों में सो गई। इतनी जल्दी, जैसे थक कर चूर हो।
मेरी जान में जान आई। कम से कम वापस तो आ गई।
लेकिन फिर…
उसके शरीर से एक गंध आई।
पहले हल्की, फिर तेज। सेक्स की गंदी, भरी हुई गंध। जैसी किसी औरत के जांघों के बीच से घंटों तक रिसती रहती है। उसके ऊपर थी मर्दाना पसीने की गंध—भारी, तेज, किसी तगड़े शरीर की। और उसके बीच में तंबाकू की हल्की-सी, तीखी खुशबू। वही जो चाचा के मुंह से हमेशा आती थी।
मेरा पूरा शरीर जैसे जल गया।
मैंने धीरे से करवट ली। सरिस्का की पीठ मेरी तरफ थी। नाइटी हल्की सी ऊपर उठी हुई थी। उसकी मोटी गांड के बीचों-बीच हल्की चमक थी चांदनी में—पसीने की या कुछ और की, मैं तय नहीं कर पाया। उसके बाल बिखरे हुए थे, गर्दन पर गीले। सांसें गहरी और शांत थीं, जैसे वह सच में गहरी नींद में हो।
लेकिन गंध… गंध झूठ नहीं बोल रही थी।
मेरे मन में तस्वीरें फिर से तड़पने लगीं।
चाचा का काला तगड़ा शरीर… सरिस्का का गोरा बदन उसके नीचे…
मोटे हाथ उसकी गांड दबाते हुए…
तंबाकू भरा मुंह उसके स्तनों पर…
और वह गंध… वही गंध जो अब मेरे बिस्तर पर फैल रही थी।
मैंने आंखें खोलीं। छत की तरफ देखा। नींद पूरी तरह उड़ चुकी थी।
शक अब शक नहीं रह गया था।
वह एक सच्चाई की तरह मेरे सीने पर बैठ गया था—भारी, गंदी, और असहनीय।
सरिस्का गहरी सोई हुई थी।
और मैं अंधेरे में पड़ा, उसके शरीर से आती उस मिश्रित गंध को बार-बार सूंघता रहा—
सेक्स की, मर्दाना पसीने की, और तंबाकू की।
नींद उस रात मेरे नसीब में नहीं थी।
विनय की मानसिक स्थिति उस रात के बाद पूरी तरह बिखर चुकी थी।
पहले सिर्फ लाचारी थी—शरीर का मरा होना, नौकरी का छिनना, चाचा के घर में पड़े रहना। अब उस लाचारी के ऊपर शक का काला पहाड़ बैठ गया था। और वह पहाड़ हर सांस के साथ और भारी हो रहा था।
उस रात की गंध उसके दिमाग में चिपक गई थी। सेक्स की भरी हुई, गंदी गंध… मर्दाना पसीने की तेज बू… और तंबाकू की हल्की लेकिन साफ पहचान। तीनों मिलकर एक सजा बन गई थीं। वह बार-बार आंखें बंद करता, लेकिन वही तस्वीरें आ जातीं—सरिस्का का गोरा शरीर, चाचा के काले मोटे हाथ, उसकी भारी गांड उन हाथों में दबती हुई, और वह खुद… चारपाई पर पड़ा, बेजान, कुछ कर पाने में असमर्थ।
मन के अंदर दो आवाजें चल रही थीं।
एक आवाज कहती—“तू पागल हो गया है… शायद पसीना था… शायद तंबाकू की गंध कपड़ों में लग गई… कुछ नहीं हुआ…”
दूसरी आवाज हंसती—“दस मिनट कहां गई थी आधी रात को? क्यों इतनी जल्दी सो गई? क्यों शरीर से सेक्स की गंध आ रही थी? तू जानता है… तू सब जानता है… बस स्वीकार नहीं कर पा रहा।”
शर्म सबसे ज्यादा काट रही थी।
वह अपनी पत्नी के शरीर से किसी और मर्द की गंध सूंघ रहा था—और कुछ कर नहीं पा रहा था। न उठ सकता था, न पकड़ सकता था, न पूछ सकता था। उसका लिंग मरा हुआ था, उसकी कमर टूटी हुई थी, उसकी हिम्मत खत्म हो चुकी थी। वह खुद को आदमी भी नहीं समझ रहा था। बस एक गवाह—जो अपनी ही बीवी के शरीर पर किसी और के निशान सूंघने के लिए मजबूर हो।
ईर्ष्या भी थी, लेकिन वह शुद्ध गुस्से वाली ईर्ष्या नहीं थी। वह एक लाचार, रोती हुई ईर्ष्या थी। जैसे कोई कुत्ता अपनी हड्डी किसी और के मुंह में देखे और सिर्फ पूंछ हिलाए। वह चाहता था कि वह चिल्लाए, सरिस्का के बाल पकड़े, पूछे—“कहां थी? किसके नीचे थी?” लेकिन गला सूख जाता। आवाज निकलने से पहले ही मर जाती।
आत्म-ग्लानि सबसे गहराई में थी।
“मैं ही कमजोर था… छोटा लिंग… फिर एक्सीडेंट… अब यह सब मेरी सजा है।”
वह खुद को दोषी ठहरा रहा था। सरिस्का को पूरी तरह दोष नहीं दे पा रहा था। मन कहता—“उसका शरीर जीवित है… भूखा है… तूने तो कुछ दिया नहीं महीने भर… अब अगर वह कहीं और चली गई तो दोष किसका?” यह सोचकर वह और टूटता।
नींद गायब हो गई थी।
रात भर वह पड़ा-पड़ा उसकी सांसें सुनता। गंध अब कम हो चुकी थी, लेकिन याद रह गई थी। सुबह होते-होते उसकी आंखें सूज जातीं। दिन में भी वही ख्याल पीछा करते—सरिस्का जब चाचा को पानी देने जाती, जब मुस्कुराती, जब थोड़ी देर ज्यादा लगती। हर छोटी बात अब सबूत लगती।
विनय अब सिर्फ लाचार पति नहीं रह गया था।
वह एक ऐसा पुरुष बन चुका था जो अपनी पत्नी के शरीर पर किसी और मर्द की गंध को सूंघते हुए भी चुप रहने के लिए मजबूर था।
उसकी मानसिक स्थिति एक धीमी मौत की तरह थी—हर रात थोड़ा और मरता हुआ, और हर सुबह फिर से जी उठता हुआ सिर्फ इसलिए कि वह और संदेह कर सके।
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