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Adultery सरिस्का: एक परिवर्तन की कहानी

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Sariska55

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मैं मेरी पहली कहानी है उसको शुरू कर रही हूं यह रियल घटना जिसे मैं कहानी के रूप में आप लोगों के सामने फेस करना चाहती हूं
 

Eternallover012

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मैं मेरी पहली कहानी है उसको शुरू कर रही हूं यह रियल घटना जिसे मैं कहानी के रूप में आप लोगों के सामने फेस करना चाहती हूं
कृप्या आप अपने विचार खुल कर जिओ।
 

Sariska55

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यह मेरे जीवन पर रियल कहानी है
दोस्तों कहानी आज से 7 साल पहले से लेकर चलते हैं

7साल पहले की बात है, जब पटना की उमस भरी गर्मी में विनय एक छोटे से किराए के मकान में रहता था। वह उस समय इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में था और अपने गांव से शहर की इस भीड़ में खुद को स्थापित करने की जद्दोजहद में जुटा हुआ था। उसका परिवार बिहार के एक सुदूरवर्ती गांव से था, जहां पैसा और शिक्षा दोनों ही दुर्लभ थे। विनय कद-काठ में 5 फुट 7 इंच का था, रंग गोरा और शरीर सामान्य, न तो ज्यादा मजबूत और न ही कमजोर। उसकी जिंदगी की रफ्तार उस दिन बदल गई जब उसके पड़ोस के मकान में सरिस्का आई।

सरिस्का की उम्र उस समय भी 23 साल थी, लेकिन उसकी खूबसूरती किसी भी उम्र की पाबंदी नहीं मानती थी। वह 5 फुट 6 इंच की थी, बिल्कुल गोरी चमड़ी, जैसे दूध में भीगा हुआ केसर हो। उसका शरीर उस समय भरपूर और कसी हुई थी, जो किसी भी मर्द की नजरों को अपनी ओर खींच लेती थी। विनय पहली बार उसे छत पर कपड़े सुखाते हुए देखा था। धूप में उसके बालों की चमक और उसकी साड़ी के पल्ले की सांस लेने वाली लहर ने विनय के दिल की धड़कनों को बिगाड़ दिया था। वह अक्सर अपनी खिड़की से उसे देखा करता था, उसके हाथों की हलचल, उसकी मुस्कान, और जब वह उसकी नजर से टकरा जाती, तो विनय की सांसें थम जाती थीं।

धीरे-धीरे दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं। शुरुआत तो बस औपचारिक नमस्ते से हुई, लेकिन जल्द ही वह नमस्ते बातचीत में बदल गई। सरिस्का का परिवार अमीर और रूढ़िवादी था, जबकि विनय की जेब खाली थी और सपने बड़े। लेकिन प्यार की इन बेड़ियों को कोई नहीं समझ पाता। वे अक्सर छत के एक कोने में मिला करते थे, जहां से शहर की रोशनी दिखती थी। विनय का हाथ जब पहली बार डरते-डरते सरिस्का के हाथ को छुआ, तो उसने महसूस किया कि उसकी त्वचा कितनी मुलायम और ठंडी है। वह स्पर्श बिजली का झटका था जिसने दोनों के अंदर की आग को और भड़का दिया। सरिस्का की आंखों में एक भूख थी, वह भी उसे चाहती थी, लेकिन अपने परिवार के डर से वह खामोश रहती थी।

लेकिन प्यार और वासना को बहुत देर तक दबाया नहीं जा सकता था। जब सरिस्का के परिवार वालों ने उसकी शादी किसी अमीर घराने में तय कर दी, तो दोनों के सामने सिर्फ एक ही रास्ता था—भागना। एक रात, जब पूरा शहर सो रहा था, विनय ने अपना सारा सामान बांधा और सरिस्का अपने घर से चुपके से बाहर आ गई। वे दोनों पटना से गुड़गांव के लिए ट्रेन में सवार हो गए। ट्रेन की खिड़की से बाहर जाती हुई पटना की रोशनियों को देखकर सरिस्का की आंखें नम थीं, लेकिन विनय के हाथों में अपना हाथ डालकर वह खुद को सुरक्षित महसूस कर रही थी। उसने अपने सारे रिश्ते-नाते, अपने मां-बाप सब कुछ उस एक पल के लिए दांव पर लगा दिया था।

गुड़गांव पहुंचकर विनय ने एक छोटा सा मकान किराए पर लिया। वह तब तक एक सिविल इंजीनियर बन चुका था और उसकी नौकरी अच्छी खासी थी। शादी उन्होंने एक मंदिर में बहुत ही साधारण तरीके से कर ली, जहां केवल भगवान और वे दोनों ही गवाह थे। उस रात उनके लिए नई जिंदगी की शुरुआत थी। कमरे में एक छोटा सा दीया जल रहा था और हवा में गुलाब के फूलों की खुशबू घूम रही थी। विनय ने सरिस्का का हाथ अपने हाथों में लिया और उसे धीरे से अपने पास खींचा। यह पहली बार था जब वे किसी की नजरों से दूर, पूरी तरह से अकेले थे।

विनय के हाथ थरथरा रहे थे जब उसने सरिस्का की साड़ी का पल्लू सरकाया। सरिस्का ने भी अपनी शर्म को भूलकर अपना सर उसके कंधे पर टिका लिया। उसकी सांसें तेज चल रही थीं और उसके सीने के उठने की आवाज खामोशी को चीर रही थी। विनय ने धीरे-धीरे उसके ब्लाउज के हुक खोले और उसके कंधे से कपड़ा नीचे खिसका दिया। सरिस्का के गोरे-गोरे स्तन उछलकर बाहर आए, उन पर लाल रंग की स्तनावरण लगी थी जो उसकी त्वचा पर एकदम सटी हुई थी। विनय की नजरें उन पर जम गईं। उसने अपने मुंह को उनके करीब ले गया और उन्हें चूमना शुरू कर दिया। सरिस्का ने एक सिसकारी भरी और अपने हाथों से उसके बालों में उंगलियां फेरने लगी।
विनय का लंड उसके पैंट के अंदर फंसा हुआ था और वह दर्द से मचल रहा था। उसने सरिस्का को बिस्तर पर लिटा दिया और उसके ऊपर झुक गया। उसने अपना हाथ उसकी पेटीकोट के ऊपर रखा और धीरे-धीरे उसे ऊपर की ओर खिसकाते हुए उसकी जांघों तक पहुंच गया। सरिस्का की चूत गर्म और गीली हो रही थी। विनय ने उसकी पैंटी को एक झटके में नीचे खींच लिया। वहां उसकी कोमल, चिकनी और हल्के बालों से ढकी चूत उसका इंतजार कर रही थी। वह एक कुंवारी थी, और इस बात का एहसास विनय को उसके शरीर के तनाव से हो रहा था।

विनय ने अपनी उंगली उसकी चूत की फांकों पर रखी। सरिस्का का पूरा शरीर कांप उठा। उसने अपनी टांगें थोड़ी और फैला दीं। विनय ने धीरे से अपनी एक उंगली उसके अंदर डाली। वह बहुत टाइट थी। उंगली के अंदर जाते ही उसने महसूस किया कि वहां एक रुकावट है—उसका कौमार्य। विनय का दिमाग उस ख्याल से भर गया कि वह पहला आदमी है जो इस मंदिर के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। उसका लंड अब और भी कड़क हो गया और वीर्य से लबालब होने लगा।

विनय ने जल्दी से अपने कपड़े उतार दिए। उसका 4 इंच लंबा और लंड सलामी करते हुए सामने आया। विनय के लंड का साइज सामान्य ही था या यूं कहे सामान्य से भी कम लेकिन दोनों सेक्स में अनजान थे

सरिस्का ने उसे देखा और शर्म से अपनी आंखें चुरा लीं। विनय उसके ऊपर आ गया और अपने लंड को उसकी चूत के मुख पर रगड़ने लगा। चूत की पानी और लंड के सुपारे की गर्मी मिलकर एक अनोखा सा माहौल बना रही थी। विनय ने धीरे से धक्का लगाया। सुपारा अंदर घुसने लगा, लेकिन रुकावट की वजह से आगे नहीं बढ़ पा रहा था। सरिस्का दर्द से कराह उठी।
"सहारा दो मुझे," विनय ने कहा।

सरिस्का ने अपनी टांगों से उसकी कमर को जकड़ लिया। विनय ने एक जोरदार धक्का मारा। एक चीख निकलने वाली थी, लेकिन विनय ने उसके होंठों को अपने होंठों से दबा दिया। उसका लंड उसकी कोरी चूत को चीरता हुआ अंदर घुस गया। खून की कुछ बूंदें बिस्तर की चादर पर गिरीं। सरिस्का के आंसू बह निकले, लेकिन उसके चेहरे पर एक संतुष्टि भी थी। वह अब उसकी थी, पूरी तरह से।

विनय ने थोड़ी देर रुककर उसे थपथपाया, ताकि दर्द कम हो जाए। फिर धीरे-धीरे उसने अपनी गति बढ़ानी शुरू की। अंदर जाने का रास्ता अब आसान हो गया था। उसका लंड उसकी गर्म और गीली चूत के अंदर पूरी तरह से समा रहा था। चूत की दीवारें उसके लंड को चूस रही थीं। "आह... विनय... और जोर से," सरिस्का ने कराहते हुए कहा। उसकी आवाज में एक अजीब सी भूख थी।

विनय ने अपनी रफ्तार और बढ़ा दी। वह उसे एक सच्ची औरत की तरह चोद रहा था। उसके धक्के उसकी गर्भाशय की दीवारों तक पहुंच रहे थे। सरिस्का की सांसें टूट चुकी थीं और वह पूरी तरह से उसके आधीन हो चुकी थी। उसके नाखून विनय की पीठ में गड़ रहे थे। दोनों के शरीर पसीने से चमक रहे थे। कमरे में सिर्फ 'फच्च-फच्च' की आवाज गूंज रही थी।

कुछ ही पलों में विनय को महसूस हुआ कि वह झड़ने वाला है। "मैं झड़ने वाला हूं, सरिस्का," उसने गर्जन की।

"अंदर ही छोड़ दो, मुझे तुम्हारा बच्चा चाहिए," सरिस्का ने उसे और कसकर अपनी बांहों में भर लिया।

यह सुनकर विनय का जोश सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने एक आखिरी, जोरदार धक्का मारा और अपना गर्म वीर्य उसकी चूत की गहराइयों में उड़ेल दिया। उसका लंड झड़ते हुए सिकुड़ने लगा, लेकिन वह उसके अंदर ही फंसा रहा। सरिस्का भी उसी वक्त झड़ गई और उसकी चूत से भी पानी छलक उठी। दोनों एक-दूसरे से चिपके हुए थे, सांसें भरते हुए। उस रात उन्होंने न सिर्फ शादी की, बल्कि एक-दूसरे को अपनी आत्मा से जोड़ दिया।

उस रात के बाद से दोनों की जिंदगी बदल गई। विनय दिन में मेहनत करता और रात में सरिस्का की चूत का पूजा करता। सरिस्का के परिवार वालों ने उनसे सभी रिश्ते तोड़ लिए, लेकिन इस नई दुनिया में उन्हें किसी की जरूरत नहीं थी। एक साल बाद, जब सरिस्का के पेट में एक नई जिंदगी पल रही थी, तो विनय को लगा कि उसने अपना फैसला सही लिया था। उनका बेटा पैदा हुआ, एक नन्हा सा बच्चा जो उनके प्यार का प्रमाण था। विनय ने उसे गोद में उठाया और सरिस्का को देखा, जो अब एक मां बन चुकी थी। उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, यह तो शुरुआत थी।

ड़गांव के उस छोटे से किराए के मकान में अब तीसरे सदस्य की उपस्थिति से हर चीज़ बदल गई थी। शिशु की रोने की तीखी आवाज़ से रात की शांति हर बार टूट जाती थी। सरिस्का नींद में से झटके से जागती, उसकी आँखें भारी थीं और बाल बिखरे हुए थे। उसने अपनी ढीली सी रात का वस्त्र उठाया और अपने भारी, दूध से लबालब भरे स्तन को बच्चे के मुँह के पास ले गई। उसके निप्पल सूज गए थे और गुलाबी रंग के हो गए थे, जिन पर दाँतों के निशान भी साफ दिखाई दे रहे थे। जैसे ही बच्चे ने उस पर अपना मुँह टिकाया और चूसना शुरू किय, सरिस्का ने एक तीखी सांस ली। उसके चेहरे पर दर्द और संतुष्टि का मिला-जुला भाव था। दूध की धार बच्चे के मुँह से बाहर निकलकर उसकी चमड़ी पर गिरी, जिसे उसने अपनी उंगली से साफ किया।

विनय उसके पास लेटा हुआ था, उसकी आँखें बंद थीं लेकिन वो जाग रहा था। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाकर सरिस्का की कमर को सहलाया, जो अब पहले से थोड़ी और चौड़ी हो गई थी। उसकी उंगलियाँ उसकी नरम त्वचा पर फिसलती हुई उसके पेट के निशानों तक पहुँचीं। वो जानता था कि सरिस्का अब उसकी तुलना में उस छोटे से बच्चे को ज़्यादा ज़रूरतमंद थी। उसकी चूचियाँ, जो पहले सिर्फ उसके लिए थीं, अब उस बच्चे की भूख मिटाने का साधन बन गई थीं। विनय को यह देखकर एक अजीब सी ईर्ष्या और खुशी महसूस होती थी। वो उठकर बैठ गया और सरिस्का के बालों को उसके कान के पीछे कर दिया, फिर चुपचाप रसोईघर की ओर चला गया ताकि उसके लिए गर्म दूध तैयार कर सके।

सुबह होते ही विनय की दिनचर्या पूरी तरह से बदल गई। वो अब सिर्फ एक पति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार पिता और कमाने वाला था। उसने अपनी नौकरी, जो कि एक निर्माण कंपनी में थी, में पूरा ध्यान लगा दिया। वो दिन में 12 से 14 घंटे तक काम करता। साइट पर धूल और गर्मी उसे थका देती थी, उसके कपड़े सीमेंट और मिट्टी से सन जाते थे, लेकिन जब वो शाम को घर लौटता और दरवाज़ा खोलकर अंदर आता, तो बच्चे की खिलखिलाहट और सरिस्का की मुस्कान उसकी सारी थकावट धो देती थी। वो जानता था कि उसे ज़्यादा से ज़्यादा पैसे कमाने होंगे ताकि वो अपने परिवार को एक बेहतर जीवन दे सके। उसके हाथ मज़बूत होते गए और उसका शरीर और चौड़ा हो गया, जिसमें मेहनत के निशान साफ झलकते थे।

सरिस्का का पूरा ध्यान अब उस छोटे से बच्चे में केंद्रित था। वो अक्सर बाल बिखराए, बिना साड़ी के पल्ला ठीक किए, और रात का वस्त्र में ही घूमती रहती। उसका पेट अभी भी ढीला था, प्रसव के बाद के निशान अभी ताज़ा थे, लेकिन विनय को वो और भी सुंदर और कामुक लगती थी। वो देखता था कि कैसे सरिस्का बच्चे को उठाते समय उसकी चूचियाँ उछलती थीं और कैसे वो झुकने पर उसकी गोल मटमैली गांड साफ दिखाई देती थी। सरिस्का के लिए दिन बच्चे की देखभाल, उसे खिलाने और सुलाने में बीत जाता। वो खुद के लिए समय नहीं निकाल पाती थी, न ही खूबसूरत दिखने की फिक्र उसे रहती थी। उसके बदन से माँ की एक अलग ही खुशबू आने लगी थी—दूध और बच्चे के तेल की मिलीजुली सुगंध।

फिर वो दिन आया जब उनका बेटा एक साल का हो गया। विनय ने कार्यालय से जल्दी छुट्टी ली और रास्ते में से एक छोटा सा मिठाई का टुकड़ा और कुछ उपहार लाया। घर पहुँचकर उसने देखा कि सरिस्का ने बच्चे को नए कपड़े पहनाए थे और खुद भी एक साफ़-सुथरी पीले रंग की साड़ी पहने हुए थी। उसके बाल जूड़े में बंधे थे और वो एकदम ताज़ी लग रही थी। वो दोनों बच्चे को मिठाई का टुकड़ा खिलाते हुए हंस रहे थे। बच्चे ने मिठाई का टुकड़ा अपने हाथ से उठाकर सरिस्का के मुँह पर मारा। सरिस्का के गालों और नाक पर क्रीम लग गई। विनय ने हँसते हुए उसे पास खींचा और अपनी उंगली से उस क्रीम को चाट लिया, फिर उसके होंठों को गहराई से चूमा।

सरिस्का ने उसे धक्का देते हुए कहा, "बच्चा देख रहा है।"

"तो क्या हुआ," विनय ने उसकी कमर पर कसकर हाथ रखा। "ये भी तो हमारी मेहनत का नतीजा है।"

सरिस्का मुस्कुराई और बच्चे को गोद में उठा लिया। उसकी उम्र अब 25 साल हो गई थी। विनय भी उसी उम्र का था, लेकिन मेहनत और जिम्मेदारी ने उसे एक अजीब ही परिपक्वता दे दी थी। वो दोनों अपनी छोटी सी दुनिया में, उस किराए के मकान में, खुश थे।
 

Sariska55

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सरिस्का भी 25, दूध जैसी गोरी, 5'6", हाल ही में बेटा होने के बाद उसका फिगर 36-28-36 हो गया था—मोटे, नरम स्तन, गोल कूल्हे, और पेट पर हल्की-सी ढीली चमड़ी जो अब भी सेक्सी लगती थी। दोनों ने लव मैरिज की थी। गुड़गांव में विनय सिविल इंजीनियर था, छोटा-सा फ्लैट था। सरिस्का के घरवालों ने रिश्ते तोड़ दिए थे। विनय के मां-बाप गरीब गांव में रहते थे।
सेक्स हफ्ते में एक बार ही होता था। विनय थक जाता था ऑफिस से, और उसका छोटा लिंग जल्दी निकल जाता था। लेकिन सरिस्का कभी शिकायत नहीं करती थी। वह चुपचाप लेट जाती, पैर फैला देती, और विनय को अंदर आने देती। कभी-कभी वह खुद ऊपर बैठ जाती, अपने मोटे स्तनों को उसके मुंह में ठूंस देती, और धीरे-धीरे कमर हिलाती। विनय जल्दी झड़ जाता, फिर सरिस्का उसके सीने पर सिर रखकर सो जाती। बेटा बीच में रोता तो वह उठ जाती, दूध पिलाती, और वापस आती।
पहले साल में सब सामान्य रहा। बेटा एक साल का हो गया। सरिस्का का दूध अभी भी आता था। एक रात विनय ने उसके स्तन से दूध पी लिया। सरिस्का मुस्कुराई, “पियो… छोटा है तेरा, लेकिन मुंह से तो प्यार कर ले।” उसने विनय का सिर अपने स्तनों के बीच दबाया। दूध की मीठी गंध, नरम मांस… विनय ने दोनों निपल्स चूसे, काटे। सरिस्का कराह उठी। फिर उसने विनय को नीचे खींचा, अपनी गीली योनि उसके मुंह पर रख दी। विनय ने चाटा, चूसा। सरिस्का का पानी उसके चेहरे पर बह निकला। फिर वह ऊपर चढ़ी, 4 इंच के लिंग को अंदर लिया, और जोर-जोर से उछली। स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे, दूध की बूंदें गिर रही थीं। विनय जल्दी झड़ गया। सरिस्का ने खुद को उंगलियों से रगड़कर ऑर्गेज्म लिया, फिर विनय के सीने पर लेट गई।
दूसरे साल में विनय के मां-बाप दोनों का एक हफ्ते के अंदर देहांत हो गया। गांव में अंतिम संस्कार, फिर खाली घर। विनय टूट गया। रातों को रोता। सरिस्का उसे सीने से लगाती, “मैं हूं ना…” एक रात रोते-रोते विनय ने उसके स्तन चूसने शुरू कर दिए। सरिस्का ने चुपचाप अपने कपड़े उतार दिए। नंगी होकर उसने विनय को अपनी गोद में खींचा। विनय का मुंह उसके गीले छेद पर लग गया। सरिस्का ने उसके बाल पकड़कर जोर से दबाया। “चाट… जोर से चाट…” विनय ने जीभ अंदर डाली, चूसा। सरिस्का का शरीर कांपने लगा। फिर उसने विनय को लिटाया, खुद ऊपर बैठ गई। धीरे-धीरे कमर घुमाई, फिर तेज। उसके मोटे कूल्हे विनय की जांघों पर थपथपा रहे थे। स्तन उसके चेहरे पर लहरा रहे थे। विनय ने दोनों निपल्स मुंह में भर लिए। सरिस्का चिल्ला उठी और झड़ गई। विनय भी अंदर ही झड़ गया। उसके बाद वह रोया नहीं। सरिस्का ने उसके माथे को चूमा, “अब सिर्फ हम तीन हैं।”
तीसरे साल में बेटा तीन का हो गया। सरिस्का का फिगर और भी भरा-भरा हो गया था। स्तन भारी, कूल्हे चौड़े। सेक्स अभी भी हफ्ते में एक बार। लेकिन अब सरिस्का खुद पहल करती। कभी रात को नंगी होकर विनय के ऊपर चढ़ जाती। कभी सुबह बाथरूम में उसे खींच लेती। एक दिन उसने विनय से कहा, “तेरा छोटा है… लेकिन मेरी चूत को पूरा भर देता है जब तू जोर से धकेलता है।” विनय शरमा गया, लेकिन उत्तेजित हो गया। उस रात सरिस्का ने कुत्ते की तरह करवट ली। विनय पीछे से घुसा। 4 इंच पूरा अंदर। सरिस्का ने पीछे हाथ बढ़ाकर उसके कूल्हे पकड़े, “और जोर… मार…” विनय ने जोर लगाया। थप्पड़ की आवाज आ रही थी। सरिस्का की योनि गीली-गीली चिपक रही थी। वह कराह रही थी, “हां… ऐसे ही… गहरा…” विनय जल्दी झड़ गया, लेकिन सरिस्का ने उसे बाहर नहीं निकाला। वह लेटी रही, वीर्य उसके अंदर से रिस रहा था।
चौथे साल में जीवन स्थिर हो गया। गुड़गांव का फ्लैट, ऑफिस, बेटा स्कूल जाने लगा। सेक्स रूटीन था, लेकिन गरम। सरिस्का अब बिना कपड़ों के घर में घूमती। कभी-कभी विनय ऑफिस से लौटता तो वह सोफे पर पैर फैलाए बैठी होती, उंगलियां अपनी योनि में घुमाती हुई। “आजा… देख कितनी गीली हूं तेरे लिए।” विनय झुक जाता, चाटता। सरिस्का उसके सिर को पकड़कर जोर से रगड़ती। फिर लिंग मुंह में ले लेती। छोटा होने के बावजूद वह गहरा निगलती, गले तक। विनय की कमर कांपती। फिर सरिस्का लेट जाती, पैर कंधों पर रख देती। विनय घुसता, जोर-जोर से धकेलता। सरिस्का के स्तन इधर-उधर हिलते, निपल्स कड़े। वह चिल्लाती, “भर दे… अंदर ही छोड़…” विनय छोड़ देता। फिर दोनों पसीने से भीगे लेटे रहते।
पांचवें साल में बेटा पांच का हो गया। विनय 30 का, सरिस्का भी। शरीर और भी भरा। लेकिन प्यार और कामुकता वैसी ही। एक रात सरिस्का ने कहा, “तेरे मां-बाप नहीं रहे… मेरे वाले तो पहले से ही नहीं हैं। सिर्फ हम हैं। और ये शरीर… ये चूत… ये स्तन… सब तेरे हैं।” उसने विनय को नंगा किया, घुटनों के बल बैठी, लिंग को दोनों हाथों से सहलाया, फिर मुंह में लिया। धीरे-धीरे, गहराई से। फिर उठी, विनय को बिस्तर पर धकेला, खुद ऊपर चढ़ी। रात भर उन्होंने सेक्स किया—ऊपर-नीचे, पीछे से, साइड में। सरिस्का कई बार झड़ी। विनय दो बार। आखिर में सरिस्का उसके सीने पर लेटी, वीर्य उसकी जांघों पर चमक रहा था।
“हफ्ते में एक बार ही सही,” उसने फुसफुसाया, “लेकिन जब होता है… तो पूरा ले लेती हूं।”
विनय ने उसके गीले माथे को चूमा। बाहर रात थी, गुड़गांव की। अंदर दो शरीर एक-दूसरे में उलझे हुए—छोटा लिंग, बड़ी भूख, और पांच साल का सफर जो अभी खत्म नहीं हुआ था।
दोनों की जिंदगी हंसी-खुशी चल रही थी। बेटा स्कूल जा रहा था, विनय की नौकरी अच्छी चल रही थी, सरिस्का घर संभालती। सेक्स हफ्ते में एक बार ही सही, लेकिन जब होता तो सरिस्का पूरे जोश से लेती। कभी रात को नंगी होकर उसके ऊपर चढ़ जाती, कभी सुबह बाथरूम में दीवार से सटाकर लेती। उसके 36 के भारी स्तन, गोल कूल्हे और गीली चूत—विनय के छोटे लिंग को भी पूरा निगल लेती।
उनकी छठी शादी की सालगिरह आई। सरिस्का ने घर सजाया, केक काटा, बेटे को सोने भेजा। रात को दोनों नंगे बिस्तर पर थे। सरिस्का ने विनय का 4 इंच का लिंग मुंह में लिया, गहराई तक निगला, फिर ऊपर चढ़ गई। स्तन उसके चेहरे पर लहरा रहे थे, निपल्स मुंह में। वह जोर-जोर से कमर हिला रही थी, गीली आवाजें आ रही थीं। “आज पूरा भर दे… सालगिरह है…” विनय ने दोनों हाथों से उसके मोटे कूल्हे पकड़े और अंदर छोड़ दिया। सरिस्का भी कांपते हुए झड़ गई। दोनों पसीने से भीगे एक-दूसरे से चिपके सो गए।
दो दिन बाद सब बदल गया।
विनय साइट पर था। तीसरी मंजिल की बिल्डिंग पर निरीक्षण कर रहा था। अचानक पैर फिसला। वह नीचे गिर गया। पंद्रह-बीस फीट। कमर और दोनों पैर बुरी तरह चोटिल। अस्पताल में कई ऑपरेशन। डॉक्टरों ने कहा—कमर की हड्डी टूटी है, पैरों में नसें क्षतिग्रस्त। चलना-फिरना मुश्किल होगा। शायद व्हीलचेयर। सेक्स? डॉक्टर ने साफ कहा—“शारीरिक संबंध सीमित रह सकते हैं। लिंग में सनसनी कम हो सकती है।”
सरिस्का अस्पताल में टूट गई। रोई, चीखी, लेकिन विनय के सामने मुस्कुराती रही। बेटा रोता था—“पापा कब उठेंगे?”
एक्सीडेंट के बाद सब कुछ बदल गया।
विनय बिल्डिंग से गिरा। कमर और पैर बुरी तरह टूटे। अस्पताल में एक महीना रहा। ऑपरेशन, प्लेट्स, पाइप… सब कुछ। लेकिन सबसे बड़ी चोट वो थी जो दिखती नहीं थी—उसका लिंग बिल्कुल ही मर चुका था। कोई हरकत नहीं, कोई सनसनी नहीं। डॉक्टरों ने साफ कह दिया—“नर्व डैमेज हो चुका है। नॉर्मल सेक्स संभव नहीं।”
सरिस्का रोज आती। हाथ पकड़ती, माथा सहलाती, लेकिन रात को जब अकेली घर लौटती तो रोती। सेक्स पूरी तरह बंद हो गया। न छूना, न चूमना, न कुछ। विनय खुद मुंह फेर लेता। “मत छू मुझे… मैं अधूरा हो गया हूं।”
कंपनी ने पहले खर्चा उठाया, फिर हाथ खड़े कर दिए। “अब और सपोर्ट संभव नहीं। आपकी कंडीशन साइट के लायक नहीं रही।” आखिरी चेक मिला और खत्म।
किराए का फ्लैट था। हर महीने किराया देना पड़ता। गांव में विनय के मां-बाप की मौत पहले ही हो चुकी थी—कोई सहारा नहीं, कोई पैसा नहीं, कोई जगह नहीं जहां जा सकें। बेटे की फीस, दवाइयां, राशन… सब सरिस्का के सिर पर।
घर लौटे तो व्हीलचेयर पर। फ्लैट छोटा लगने लगा। रातें लंबी और चुप। सरिस्का सिलाई करती देर रात तक। विनय बिस्तर पर पड़ा रहता। दोनों के बीच बातें कम हो गईं। छूना तो जैसे बंद ही हो गया।
एक रात सरिस्का थक कर आई। कपड़े बदले बिना विनय के बगल में लेट गई। उसका हाथ अपने-आप विनय की जांघ पर चला गया। विनय ने हटा दिया। “मत कर। कुछ नहीं होगा। बेकार है।”
सरिस्का चुप रही। थोड़ी देर बाद वह उठी, नंगी हो गई और फिर लेट गई। सिर्फ शरीर सटाकर। स्तन विनय की बांह से छू रहे थे, जांघें सटी हुई थीं। कोई हरकत नहीं। कोई कोशिश नहीं। बस इतनी सी गर्मी। विनय की आंखों से आंसू बह निकले। सरिस्का ने उन्हें पोंछा नहीं। खुद भी रो रही थी।
पैसे की तंगी बढ़ती गई। किराया दो महीने का बकाया हो गया। मकान मालिक रोज नोटिस भेजने लगा। सरिस्का ने गहने बेचे, फिर मशीन के कुछ पार्ट्स। बेटा स्कूल से लौटता तो दोनों के चेहरे देखकर चुप हो जाता।
सेक्स का नामोनिशान नहीं रहा। न याद intercourse की, न छूने की। सिर्फ एक टूटा हुआ मर्द, एक थकी हुई औरत, और एक छोटा बच्चा। दुखों का पहाड़ इतना भारी था कि दोनों के सीने दब गए थे।
एक रात बिजली चली गई। अंधेरे में सरिस्का विनय के पास आई। उसने धीरे से कहा, “मैं तेरे बिना नहीं जी सकती… लेकिन अब कैसे जीएं?”
विनय ने जवाब नहीं दिया। बस उसका हाथ पकड़ लिया। ठंडा, बेजान हाथ। दोनों अंधेरे में लेटे रहे। बाहर बारिश शुरू हो गई। किराए का फ्लैट, खाली जेब, मरा हुआ शरीर, और एक जिंदगी जो अब सिर्फ सांस ले रही थी—और कुछ नहीं।
कहानी यहीं नहीं रुकी। अगली सुबह

कहानी जारी रहेगी.......

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Sariska55

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सरिस्का भी 25, दूध जैसी गोरी, 5'6", हाल ही में बेटा होने के बाद उसका फिगर 36-28-36 हो गया था—मोटे, नरम स्तन, गोल कूल्हे, और पेट पर हल्की-सी ढीली चमड़ी जो अब भी सेक्सी लगती थी। दोनों ने लव मैरिज की थी। गुड़गांव में विनय सिविल इंजीनियर था, छोटा-सा फ्लैट था। सरिस्का के घरवालों ने रिश्ते तोड़ दिए थे। विनय के मां-बाप गरीब गांव में रहते थे।
सेक्स हफ्ते में एक बार ही होता था। विनय थक जाता था ऑफिस से, और उसका छोटा लिंग जल्दी निकल जाता था। लेकिन सरिस्का कभी शिकायत नहीं करती थी। वह चुपचाप लेट जाती, पैर फैला देती, और विनय को अंदर आने देती। कभी-कभी वह खुद ऊपर बैठ जाती, अपने मोटे स्तनों को उसके मुंह में ठूंस देती, और धीरे-धीरे कमर हिलाती। विनय जल्दी झड़ जाता, फिर सरिस्का उसके सीने पर सिर रखकर सो जाती। बेटा बीच में रोता तो वह उठ जाती, दूध पिलाती, और वापस आती।
पहले साल में सब सामान्य रहा। बेटा एक साल का हो गया। सरिस्का का दूध अभी भी आता था। एक रात विनय ने उसके स्तन से दूध पी लिया। सरिस्का मुस्कुराई, “पियो… छोटा है तेरा, लेकिन मुंह से तो प्यार कर ले।” उसने विनय का सिर अपने स्तनों के बीच दबाया। दूध की मीठी गंध, नरम मांस… विनय ने दोनों निपल्स चूसे, काटे। सरिस्का कराह उठी। फिर उसने विनय को नीचे खींचा, अपनी गीली योनि उसके मुंह पर रख दी। विनय ने चाटा, चूसा। सरिस्का का पानी उसके चेहरे पर बह निकला। फिर वह ऊपर चढ़ी, 4 इंच के लिंग को अंदर लिया, और जोर-जोर से उछली। स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे, दूध की बूंदें गिर रही थीं। विनय जल्दी झड़ गया। सरिस्का ने खुद को उंगलियों से रगड़कर ऑर्गेज्म लिया, फिर विनय के सीने पर लेट गई।
दूसरे साल में विनय के मां-बाप दोनों का एक हफ्ते के अंदर देहांत हो गया। गांव में अंतिम संस्कार, फिर खाली घर। विनय टूट गया। रातों को रोता। सरिस्का उसे सीने से लगाती, “मैं हूं ना…” एक रात रोते-रोते विनय ने उसके स्तन चूसने शुरू कर दिए। सरिस्का ने चुपचाप अपने कपड़े उतार दिए। नंगी होकर उसने विनय को अपनी गोद में खींचा। विनय का मुंह उसके गीले छेद पर लग गया। सरिस्का ने उसके बाल पकड़कर जोर से दबाया। “चाट… जोर से चाट…” विनय ने जीभ अंदर डाली, चूसा। सरिस्का का शरीर कांपने लगा। फिर उसने विनय को लिटाया, खुद ऊपर बैठ गई। धीरे-धीरे कमर घुमाई, फिर तेज। उसके मोटे कूल्हे विनय की जांघों पर थपथपा रहे थे। स्तन उसके चेहरे पर लहरा रहे थे। विनय ने दोनों निपल्स मुंह में भर लिए। सरिस्का चिल्ला उठी और झड़ गई। विनय भी अंदर ही झड़ गया। उसके बाद वह रोया नहीं। सरिस्का ने उसके माथे को चूमा, “अब सिर्फ हम तीन हैं।”
तीसरे साल में बेटा तीन का हो गया। सरिस्का का फिगर और भी भरा-भरा हो गया था। स्तन भारी, कूल्हे चौड़े। सेक्स अभी भी हफ्ते में एक बार। लेकिन अब सरिस्का खुद पहल करती। कभी रात को नंगी होकर विनय के ऊपर चढ़ जाती। कभी सुबह बाथरूम में उसे खींच लेती। एक दिन उसने विनय से कहा, “तेरा छोटा है… लेकिन मेरी चूत को पूरा भर देता है जब तू जोर से धकेलता है।” विनय शरमा गया, लेकिन उत्तेजित हो गया। उस रात सरिस्का ने कुत्ते की तरह करवट ली। विनय पीछे से घुसा। 4 इंच पूरा अंदर। सरिस्का ने पीछे हाथ बढ़ाकर उसके कूल्हे पकड़े, “और जोर… मार…” विनय ने जोर लगाया। थप्पड़ की आवाज आ रही थी। सरिस्का की योनि गीली-गीली चिपक रही थी। वह कराह रही थी, “हां… ऐसे ही… गहरा…” विनय जल्दी झड़ गया, लेकिन सरिस्का ने उसे बाहर नहीं निकाला। वह लेटी रही, वीर्य उसके अंदर से रिस रहा था।
चौथे साल में जीवन स्थिर हो गया। गुड़गांव का फ्लैट, ऑफिस, बेटा स्कूल जाने लगा। सेक्स रूटीन था, लेकिन गरम। सरिस्का अब बिना कपड़ों के घर में घूमती। कभी-कभी विनय ऑफिस से लौटता तो वह सोफे पर पैर फैलाए बैठी होती, उंगलियां अपनी योनि में घुमाती हुई। “आजा… देख कितनी गीली हूं तेरे लिए।” विनय झुक जाता, चाटता। सरिस्का उसके सिर को पकड़कर जोर से रगड़ती। फिर लिंग मुंह में ले लेती। छोटा होने के बावजूद वह गहरा निगलती, गले तक। विनय की कमर कांपती। फिर सरिस्का लेट जाती, पैर कंधों पर रख देती। विनय घुसता, जोर-जोर से धकेलता। सरिस्का के स्तन इधर-उधर हिलते, निपल्स कड़े। वह चिल्लाती, “भर दे… अंदर ही छोड़…” विनय छोड़ देता। फिर दोनों पसीने से भीगे लेटे रहते।
पांचवें साल में बेटा पांच का हो गया। विनय 30 का, सरिस्का भी। शरीर और भी भरा। लेकिन प्यार और कामुकता वैसी ही। एक रात सरिस्का ने कहा, “तेरे मां-बाप नहीं रहे… मेरे वाले तो पहले से ही नहीं हैं। सिर्फ हम हैं। और ये शरीर… ये चूत… ये स्तन… सब तेरे हैं।” उसने विनय को नंगा किया, घुटनों के बल बैठी, लिंग को दोनों हाथों से सहलाया, फिर मुंह में लिया। धीरे-धीरे, गहराई से। फिर उठी, विनय को बिस्तर पर धकेला, खुद ऊपर चढ़ी। रात भर उन्होंने सेक्स किया—ऊपर-नीचे, पीछे से, साइड में। सरिस्का कई बार झड़ी। विनय दो बार। आखिर में सरिस्का उसके सीने पर लेटी, वीर्य उसकी जांघों पर चमक रहा था।
“हफ्ते में एक बार ही सही,” उसने फुसफुसाया, “लेकिन जब होता है… तो पूरा ले लेती हूं।”
विनय ने उसके गीले माथे को चूमा। बाहर रात थी, गुड़गांव की। अंदर दो शरीर एक-दूसरे में उलझे हुए—छोटा लिंग, बड़ी भूख, और पांच साल का सफर जो अभी खत्म नहीं हुआ था।
दोनों की जिंदगी हंसी-खुशी चल रही थी। बेटा स्कूल जा रहा था, विनय की नौकरी अच्छी चल रही थी, सरिस्का घर संभालती। सेक्स हफ्ते में एक बार ही सही, लेकिन जब होता तो सरिस्का पूरे जोश से लेती। कभी रात को नंगी होकर उसके ऊपर चढ़ जाती, कभी सुबह बाथरूम में दीवार से सटाकर लेती। उसके 36 के भारी स्तन, गोल कूल्हे और गीली चूत—विनय के छोटे लिंग को भी पूरा निगल लेती।
उनकी छठी शादी की सालगिरह आई। सरिस्का ने घर सजाया, केक काटा, बेटे को सोने भेजा। रात को दोनों नंगे बिस्तर पर थे। सरिस्का ने विनय का 4 इंच का लिंग मुंह में लिया, गहराई तक निगला, फिर ऊपर चढ़ गई। स्तन उसके चेहरे पर लहरा रहे थे, निपल्स मुंह में। वह जोर-जोर से कमर हिला रही थी, गीली आवाजें आ रही थीं। “आज पूरा भर दे… सालगिरह है…” विनय ने दोनों हाथों से उसके मोटे कूल्हे पकड़े और अंदर छोड़ दिया। सरिस्का भी कांपते हुए झड़ गई। दोनों पसीने से भीगे एक-दूसरे से चिपके सो गए।
दो दिन बाद सब बदल गया।
विनय साइट पर था। तीसरी मंजिल की बिल्डिंग पर निरीक्षण कर रहा था। अचानक पैर फिसला। वह नीचे गिर गया। पंद्रह-बीस फीट। कमर और दोनों पैर बुरी तरह चोटिल। अस्पताल में कई ऑपरेशन। डॉक्टरों ने कहा—कमर की हड्डी टूटी है, पैरों में नसें क्षतिग्रस्त। चलना-फिरना मुश्किल होगा। शायद व्हीलचेयर। सेक्स? डॉक्टर ने साफ कहा—“शारीरिक संबंध सीमित रह सकते हैं। लिंग में सनसनी कम हो सकती है।”
सरिस्का अस्पताल में टूट गई। रोई, चीखी, लेकिन विनय के सामने मुस्कुराती रही। बेटा रोता था—“पापा कब उठेंगे?”
एक्सीडेंट के बाद सब कुछ बदल गया।
विनय बिल्डिंग से गिरा। कमर और पैर बुरी तरह टूटे। अस्पताल में एक महीना रहा। ऑपरेशन, प्लेट्स, पाइप… सब कुछ। लेकिन सबसे बड़ी चोट वो थी जो दिखती नहीं थी—उसका लिंग बिल्कुल ही मर चुका था। कोई हरकत नहीं, कोई सनसनी नहीं। डॉक्टरों ने साफ कह दिया—“नर्व डैमेज हो चुका है। नॉर्मल सेक्स संभव नहीं।”
सरिस्का रोज आती। हाथ पकड़ती, माथा सहलाती, लेकिन रात को जब अकेली घर लौटती तो रोती। सेक्स पूरी तरह बंद हो गया। न छूना, न चूमना, न कुछ। विनय खुद मुंह फेर लेता। “मत छू मुझे… मैं अधूरा हो गया हूं।”
कंपनी ने पहले खर्चा उठाया, फिर हाथ खड़े कर दिए। “अब और सपोर्ट संभव नहीं। आपकी कंडीशन साइट के लायक नहीं रही।” आखिरी चेक मिला और खत्म।
किराए का फ्लैट था। हर महीने किराया देना पड़ता। गांव में विनय के मां-बाप की मौत पहले ही हो चुकी थी—कोई सहारा नहीं, कोई पैसा नहीं, कोई जगह नहीं जहां जा सकें। बेटे की फीस, दवाइयां, राशन… सब सरिस्का के सिर पर।
घर लौटे तो व्हीलचेयर पर। फ्लैट छोटा लगने लगा। रातें लंबी और चुप। सरिस्का सिलाई करती देर रात तक। विनय बिस्तर पर पड़ा रहता। दोनों के बीच बातें कम हो गईं। छूना तो जैसे बंद ही हो गया।
एक रात सरिस्का थक कर आई। कपड़े बदले बिना विनय के बगल में लेट गई। उसका हाथ अपने-आप विनय की जांघ पर चला गया। विनय ने हटा दिया। “मत कर। कुछ नहीं होगा। बेकार है।”
सरिस्का चुप रही। थोड़ी देर बाद वह उठी, नंगी हो गई और फिर लेट गई। सिर्फ शरीर सटाकर। स्तन विनय की बांह से छू रहे थे, जांघें सटी हुई थीं। कोई हरकत नहीं। कोई कोशिश नहीं। बस इतनी सी गर्मी। विनय की आंखों से आंसू बह निकले। सरिस्का ने उन्हें पोंछा नहीं। खुद भी रो रही थी।
पैसे की तंगी बढ़ती गई। किराया दो महीने का बकाया हो गया। मकान मालिक रोज नोटिस भेजने लगा। सरिस्का ने गहने बेचे, फिर मशीन के कुछ पार्ट्स। बेटा स्कूल से लौटता तो दोनों के चेहरे देखकर चुप हो जाता।
सेक्स का नामोनिशान नहीं रहा। न याद intercourse की, न छूने की। सिर्फ एक टूटा हुआ मर्द, एक थकी हुई औरत, और एक छोटा बच्चा। दुखों का पहाड़ इतना भारी था कि दोनों के सीने दब गए थे।
एक रात बिजली चली गई। अंधेरे में सरिस्का विनय के पास आई। उसने धीरे से कहा, “मैं तेरे बिना नहीं जी सकती… लेकिन अब कैसे जीएं?”
विनय ने जवाब नहीं दिया। बस उसका हाथ पकड़ लिया। ठंडा, बेजान हाथ। दोनों अंधेरे में लेटे रहे। बाहर बारिश शुरू हो गई। किराए का फ्लैट, खाली जेब, मरा हुआ शरीर, और एक जिंदगी जो अब सिर्फ सांस ले रही थी—और कुछ नहीं।
कहानी यहीं नहीं रुकी। अगली सुबह

कहानी जारी रहेगी.......

पढ़कर मुझे अपनी प्रतिक्रिया दें!!!
 

Sariska55

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सरिस्का भी 25, दूध जैसी गोरी, 5'6", हाल ही में बेटा होने के बाद उसका फिगर 36-28-36 हो गया था—मोटे, नरम स्तन, गोल कूल्हे, और पेट पर हल्की-सी ढीली चमड़ी जो अब भी सेक्सी लगती थी। दोनों ने लव मैरिज की थी। गुड़गांव में विनय सिविल इंजीनियर था, छोटा-सा फ्लैट था। सरिस्का के घरवालों ने रिश्ते तोड़ दिए थे। विनय के मां-बाप गरीब गांव में रहते थे।
सेक्स हफ्ते में एक बार ही होता था। विनय थक जाता था ऑफिस से, और उसका छोटा लिंग जल्दी निकल जाता था। लेकिन सरिस्का कभी शिकायत नहीं करती थी। वह चुपचाप लेट जाती, पैर फैला देती, और विनय को अंदर आने देती। कभी-कभी वह खुद ऊपर बैठ जाती, अपने मोटे स्तनों को उसके मुंह में ठूंस देती, और धीरे-धीरे कमर हिलाती। विनय जल्दी झड़ जाता, फिर सरिस्का उसके सीने पर सिर रखकर सो जाती। बेटा बीच में रोता तो वह उठ जाती, दूध पिलाती, और वापस आती।
पहले साल में सब सामान्य रहा। बेटा एक साल का हो गया। सरिस्का का दूध अभी भी आता था। एक रात विनय ने उसके स्तन से दूध पी लिया। सरिस्का मुस्कुराई, “पियो… छोटा है तेरा, लेकिन मुंह से तो प्यार कर ले।” उसने विनय का सिर अपने स्तनों के बीच दबाया। दूध की मीठी गंध, नरम मांस… विनय ने दोनों निपल्स चूसे, काटे। सरिस्का कराह उठी। फिर उसने विनय को नीचे खींचा, अपनी गीली योनि उसके मुंह पर रख दी। विनय ने चाटा, चूसा। सरिस्का का पानी उसके चेहरे पर बह निकला। फिर वह ऊपर चढ़ी, 4 इंच के लिंग को अंदर लिया, और जोर-जोर से उछली। स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे, दूध की बूंदें गिर रही थीं। विनय जल्दी झड़ गया। सरिस्का ने खुद को उंगलियों से रगड़कर ऑर्गेज्म लिया, फिर विनय के सीने पर लेट गई।
दूसरे साल में विनय के मां-बाप दोनों का एक हफ्ते के अंदर देहांत हो गया। गांव में अंतिम संस्कार, फिर खाली घर। विनय टूट गया। रातों को रोता। सरिस्का उसे सीने से लगाती, “मैं हूं ना…” एक रात रोते-रोते विनय ने उसके स्तन चूसने शुरू कर दिए। सरिस्का ने चुपचाप अपने कपड़े उतार दिए। नंगी होकर उसने विनय को अपनी गोद में खींचा। विनय का मुंह उसके गीले छेद पर लग गया। सरिस्का ने उसके बाल पकड़कर जोर से दबाया। “चाट… जोर से चाट…” विनय ने जीभ अंदर डाली, चूसा। सरिस्का का शरीर कांपने लगा। फिर उसने विनय को लिटाया, खुद ऊपर बैठ गई। धीरे-धीरे कमर घुमाई, फिर तेज। उसके मोटे कूल्हे विनय की जांघों पर थपथपा रहे थे। स्तन उसके चेहरे पर लहरा रहे थे। विनय ने दोनों निपल्स मुंह में भर लिए। सरिस्का चिल्ला उठी और झड़ गई। विनय भी अंदर ही झड़ गया। उसके बाद वह रोया नहीं। सरिस्का ने उसके माथे को चूमा, “अब सिर्फ हम तीन हैं।”
तीसरे साल में बेटा तीन का हो गया। सरिस्का का फिगर और भी भरा-भरा हो गया था। स्तन भारी, कूल्हे चौड़े। सेक्स अभी भी हफ्ते में एक बार। लेकिन अब सरिस्का खुद पहल करती। कभी रात को नंगी होकर विनय के ऊपर चढ़ जाती। कभी सुबह बाथरूम में उसे खींच लेती। एक दिन उसने विनय से कहा, “तेरा छोटा है… लेकिन मेरी चूत को पूरा भर देता है जब तू जोर से धकेलता है।” विनय शरमा गया, लेकिन उत्तेजित हो गया। उस रात सरिस्का ने कुत्ते की तरह करवट ली। विनय पीछे से घुसा। 4 इंच पूरा अंदर। सरिस्का ने पीछे हाथ बढ़ाकर उसके कूल्हे पकड़े, “और जोर… मार…” विनय ने जोर लगाया। थप्पड़ की आवाज आ रही थी। सरिस्का की योनि गीली-गीली चिपक रही थी। वह कराह रही थी, “हां… ऐसे ही… गहरा…” विनय जल्दी झड़ गया, लेकिन सरिस्का ने उसे बाहर नहीं निकाला। वह लेटी रही, वीर्य उसके अंदर से रिस रहा था।
चौथे साल में जीवन स्थिर हो गया। गुड़गांव का फ्लैट, ऑफिस, बेटा स्कूल जाने लगा। सेक्स रूटीन था, लेकिन गरम। सरिस्का अब बिना कपड़ों के घर में घूमती। कभी-कभी विनय ऑफिस से लौटता तो वह सोफे पर पैर फैलाए बैठी होती, उंगलियां अपनी योनि में घुमाती हुई। “आजा… देख कितनी गीली हूं तेरे लिए।” विनय झुक जाता, चाटता। सरिस्का उसके सिर को पकड़कर जोर से रगड़ती। फिर लिंग मुंह में ले लेती। छोटा होने के बावजूद वह गहरा निगलती, गले तक। विनय की कमर कांपती। फिर सरिस्का लेट जाती, पैर कंधों पर रख देती। विनय घुसता, जोर-जोर से धकेलता। सरिस्का के स्तन इधर-उधर हिलते, निपल्स कड़े। वह चिल्लाती, “भर दे… अंदर ही छोड़…” विनय छोड़ देता। फिर दोनों पसीने से भीगे लेटे रहते।
पांचवें साल में बेटा पांच का हो गया। विनय 30 का, सरिस्का भी। शरीर और भी भरा। लेकिन प्यार और कामुकता वैसी ही। एक रात सरिस्का ने कहा, “तेरे मां-बाप नहीं रहे… मेरे वाले तो पहले से ही नहीं हैं। सिर्फ हम हैं। और ये शरीर… ये चूत… ये स्तन… सब तेरे हैं।” उसने विनय को नंगा किया, घुटनों के बल बैठी, लिंग को दोनों हाथों से सहलाया, फिर मुंह में लिया। धीरे-धीरे, गहराई से। फिर उठी, विनय को बिस्तर पर धकेला, खुद ऊपर चढ़ी। रात भर उन्होंने सेक्स किया—ऊपर-नीचे, पीछे से, साइड में। सरिस्का कई बार झड़ी। विनय दो बार। आखिर में सरिस्का उसके सीने पर लेटी, वीर्य उसकी जांघों पर चमक रहा था।
“हफ्ते में एक बार ही सही,” उसने फुसफुसाया, “लेकिन जब होता है… तो पूरा ले लेती हूं।”
विनय ने उसके गीले माथे को चूमा। बाहर रात थी, गुड़गांव की। अंदर दो शरीर एक-दूसरे में उलझे हुए—छोटा लिंग, बड़ी भूख, और पांच साल का सफर जो अभी खत्म नहीं हुआ था।
दोनों की जिंदगी हंसी-खुशी चल रही थी। बेटा स्कूल जा रहा था, विनय की नौकरी अच्छी चल रही थी, सरिस्का घर संभालती। सेक्स हफ्ते में एक बार ही सही, लेकिन जब होता तो सरिस्का पूरे जोश से लेती। कभी रात को नंगी होकर उसके ऊपर चढ़ जाती, कभी सुबह बाथरूम में दीवार से सटाकर लेती। उसके 36 के भारी स्तन, गोल कूल्हे और गीली चूत—विनय के छोटे लिंग को भी पूरा निगल लेती।
उनकी छठी शादी की सालगिरह आई। सरिस्का ने घर सजाया, केक काटा, बेटे को सोने भेजा। रात को दोनों नंगे बिस्तर पर थे। सरिस्का ने विनय का 4 इंच का लिंग मुंह में लिया, गहराई तक निगला, फिर ऊपर चढ़ गई। स्तन उसके चेहरे पर लहरा रहे थे, निपल्स मुंह में। वह जोर-जोर से कमर हिला रही थी, गीली आवाजें आ रही थीं। “आज पूरा भर दे… सालगिरह है…” विनय ने दोनों हाथों से उसके मोटे कूल्हे पकड़े और अंदर छोड़ दिया। सरिस्का भी कांपते हुए झड़ गई। दोनों पसीने से भीगे एक-दूसरे से चिपके सो गए।
दो दिन बाद सब बदल गया।
विनय साइट पर था। तीसरी मंजिल की बिल्डिंग पर निरीक्षण कर रहा था। अचानक पैर फिसला। वह नीचे गिर गया। पंद्रह-बीस फीट। कमर और दोनों पैर बुरी तरह चोटिल। अस्पताल में कई ऑपरेशन। डॉक्टरों ने कहा—कमर की हड्डी टूटी है, पैरों में नसें क्षतिग्रस्त। चलना-फिरना मुश्किल होगा। शायद व्हीलचेयर। सेक्स? डॉक्टर ने साफ कहा—“शारीरिक संबंध सीमित रह सकते हैं। लिंग में सनसनी कम हो सकती है।”
सरिस्का अस्पताल में टूट गई। रोई, चीखी, लेकिन विनय के सामने मुस्कुराती रही। बेटा रोता था—“पापा कब उठेंगे?”
एक्सीडेंट के बाद सब कुछ बदल गया।
विनय बिल्डिंग से गिरा। कमर और पैर बुरी तरह टूटे। अस्पताल में एक महीना रहा। ऑपरेशन, प्लेट्स, पाइप… सब कुछ। लेकिन सबसे बड़ी चोट वो थी जो दिखती नहीं थी—उसका लिंग बिल्कुल ही मर चुका था। कोई हरकत नहीं, कोई सनसनी नहीं। डॉक्टरों ने साफ कह दिया—“नर्व डैमेज हो चुका है। नॉर्मल सेक्स संभव नहीं।”
सरिस्का रोज आती। हाथ पकड़ती, माथा सहलाती, लेकिन रात को जब अकेली घर लौटती तो रोती। सेक्स पूरी तरह बंद हो गया। न छूना, न चूमना, न कुछ। विनय खुद मुंह फेर लेता। “मत छू मुझे… मैं अधूरा हो गया हूं।”
कंपनी ने पहले खर्चा उठाया, फिर हाथ खड़े कर दिए। “अब और सपोर्ट संभव नहीं। आपकी कंडीशन साइट के लायक नहीं रही।” आखिरी चेक मिला और खत्म।
किराए का फ्लैट था। हर महीने किराया देना पड़ता। गांव में विनय के मां-बाप की मौत पहले ही हो चुकी थी—कोई सहारा नहीं, कोई पैसा नहीं, कोई जगह नहीं जहां जा सकें। बेटे की फीस, दवाइयां, राशन… सब सरिस्का के सिर पर।
घर लौटे तो व्हीलचेयर पर। फ्लैट छोटा लगने लगा। रातें लंबी और चुप। सरिस्का सिलाई करती देर रात तक। विनय बिस्तर पर पड़ा रहता। दोनों के बीच बातें कम हो गईं। छूना तो जैसे बंद ही हो गया।
एक रात सरिस्का थक कर आई। कपड़े बदले बिना विनय के बगल में लेट गई। उसका हाथ अपने-आप विनय की जांघ पर चला गया। विनय ने हटा दिया। “मत कर। कुछ नहीं होगा। बेकार है।”
सरिस्का चुप रही। थोड़ी देर बाद वह उठी, नंगी हो गई और फिर लेट गई। सिर्फ शरीर सटाकर। स्तन विनय की बांह से छू रहे थे, जांघें सटी हुई थीं। कोई हरकत नहीं। कोई कोशिश नहीं। बस इतनी सी गर्मी। विनय की आंखों से आंसू बह निकले। सरिस्का ने उन्हें पोंछा नहीं। खुद भी रो रही थी।
पैसे की तंगी बढ़ती गई। किराया दो महीने का बकाया हो गया। मकान मालिक रोज नोटिस भेजने लगा। सरिस्का ने गहने बेचे, फिर मशीन के कुछ पार्ट्स। बेटा स्कूल से लौटता तो दोनों के चेहरे देखकर चुप हो जाता।
सेक्स का नामोनिशान नहीं रहा। न याद intercourse की, न छूने की। सिर्फ एक टूटा हुआ मर्द, एक थकी हुई औरत, और एक छोटा बच्चा। दुखों का पहाड़ इतना भारी था कि दोनों के सीने दब गए थे।
एक रात बिजली चली गई। अंधेरे में सरिस्का विनय के पास आई। उसने धीरे से कहा, “मैं तेरे बिना नहीं जी सकती… लेकिन अब कैसे जीएं?”
विनय ने जवाब नहीं दिया। बस उसका हाथ पकड़ लिया। ठंडा, बेजान हाथ। दोनों अंधेरे में लेटे रहे। बाहर बारिश शुरू हो गई। किराए का फ्लैट, खाली जेब, मरा हुआ शरीर, और एक जिंदगी जो अब सिर्फ सांस ले रही थी—और कुछ नहीं।
कहानी यहीं नहीं रुकी। अगली सुबह

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Sariska55

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दो दिन बाद सब बदल गया।
विनय साइट पर था। तीसरी मंजिल की बिल्डिंग पर निरीक्षण कर रहा था। अचानक पैर फिसला। वह नीचे गिर गया। पंद्रह-बीस फीट। कमर और दोनों पैर बुरी तरह चोटिल। अस्पताल में कई ऑपरेशन। डॉक्टरों ने कहा—कमर की हड्डी टूटी है, पैरों में नसें क्षतिग्रस्त। चलना-फिरना मुश्किल होगा। शायद व्हीलचेयर। सेक्स? डॉक्टर ने साफ कहा—“शारीरिक संबंध सीमित रह सकते हैं। लिंग में सनसनी कम हो सकती है।”
सरिस्का अस्पताल में टूट गई। रोई, चीखी, लेकिन विनय के सामने मुस्कुराती रही। बेटा रोता था—“पापा कब उठेंगे?”
एक्सीडेंट के बाद सब कुछ बदल गया।
विनय बिल्डिंग से गिरा। कमर और पैर बुरी तरह टूटे। अस्पताल में एक महीना रहा। ऑपरेशन, प्लेट्स, पाइप… सब कुछ। लेकिन सबसे बड़ी चोट वो थी जो दिखती नहीं थी—उसका लिंग बिल्कुल ही मर चुका था। कोई हरकत नहीं, कोई सनसनी नहीं। डॉक्टरों ने साफ कह दिया—“नर्व डैमेज हो चुका है। नॉर्मल सेक्स संभव नहीं।”
सरिस्का रोज आती। हाथ पकड़ती, माथा सहलाती, लेकिन रात को जब अकेली घर लौटती तो रोती। सेक्स पूरी तरह बंद हो गया। न छूना, न चूमना, न कुछ। विनय खुद मुंह फेर लेता। “मत छू मुझे… मैं अधूरा हो गया हूं।”
कंपनी ने पहले खर्चा उठाया, फिर हाथ खड़े कर दिए। “अब और सपोर्ट संभव नहीं। आपकी कंडीशन साइट के लायक नहीं रही।” आखिरी चेक मिला और खत्म।
किराए का फ्लैट था। हर महीने किराया देना पड़ता। गांव में विनय के मां-बाप की मौत पहले ही हो चुकी थी—कोई सहारा नहीं, कोई पैसा नहीं, कोई जगह नहीं जहां जा सकें। बेटे की फीस, दवाइयां, राशन… सब सरिस्का के सिर पर।
घर लौटे तो व्हीलचेयर पर। फ्लैट छोटा लगने लगा। रातें लंबी और चुप। सरिस्का सिलाई करती देर रात तक। विनय बिस्तर पर पड़ा रहता। दोनों के बीच बातें कम हो गईं। छूना तो जैसे बंद ही हो गया।
एक रात सरिस्का थक कर आई। कपड़े बदले बिना विनय के बगल में लेट गई। उसका हाथ अपने-आप विनय की जांघ पर चला गया। विनय ने हटा दिया। “मत कर। कुछ नहीं होगा। बेकार है।”
सरिस्का चुप रही। थोड़ी देर बाद वह उठी, नंगी हो गई और फिर लेट गई। सिर्फ शरीर सटाकर। स्तन विनय की बांह से छू रहे थे, जांघें सटी हुई थीं। कोई हरकत नहीं। कोई कोशिश नहीं। बस इतनी सी गर्मी। विनय की आंखों से आंसू बह निकले। सरिस्का ने उन्हें पोंछा नहीं। खुद भी रो रही थी।
पैसे की तंगी बढ़ती गई। किराया दो महीने का बकाया हो गया। मकान मालिक रोज नोटिस भेजने लगा। सरिस्का ने गहने बेचे, फिर मशीन के कुछ पार्ट्स। बेटा स्कूल से लौटता तो दोनों के चेहरे देखकर चुप हो जाता।
सेक्स का नामोनिशान नहीं रहा। न याद intercourse की, न छूने की। सिर्फ एक टूटा हुआ मर्द, एक थकी हुई औरत, और एक छोटा बच्चा। दुखों का पहाड़ इतना भारी था कि दोनों के सीने दब गए थे।
एक रात बिजली चली गई। अंधेरे में सरिस्का विनय के पास आई। उसने धीरे से कहा, “मैं तेरे बिना नहीं जी सकती… लेकिन अब कैसे जीएं?”
विनय ने जवाब नहीं दिया। बस उसका हाथ पकड़ लिया। ठंडा, बेजान हाथ। दोनों अंधेरे में लेटे रहे। बाहर बारिश शुरू हो गई। किराए का फ्लैट, खाली जेब, मरा हुआ शरीर, और एक जिंदगी जो अब सिर्फ सांस ले रही थी—और कुछ नहीं।
कहानी यहीं नहीं रुकी। अगली सुबह

AB AAGE

सुबह की रोशनी जब खिड़की से अंदर आई तो घर में वही उदासी थी। किराए का बकाया, खाली रसोई, व्हीलचेयर पर बैठा विनय और सिलाई मशीन के पास बैठी थकी हुई सरिस्का। अचानक दरवाजे पर जोरदार दस्तक हुई।
सरिस्का ने दरवाजा खोला तो सांस अटक गई। सामने खड़ा था विनय का दूर का चाचा—रामबहादुर। 45 के करीब, 6.fit 5 इंच इंच लंबा, पहलवान जैसा तगड़ा बदन, चौड़े कंधे, मोटी गर्दन, हाथ ऐसे जैसे लोहे के हथौड़े। पूरा शरीर कालिख जैसा काला, चेहरा कठोर, आंखें तेज और डरावनी। जैसे कोई जेल से अभी-अभी निकला हो। पुरानी बनियान में मांसपेशियां उभर रही थीं, कमर में मोटा चांदी का कड़ा। आवाज भारी और दबंग—
“कहां है मेरा भतीजा?”
सरिस्का के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। यही वो आदमी था जिसकी वजह से उसके घरवालों ने शादी का विरोध किया था। बदनाम खानदान, गुंडागर्दी, कई बार जेल… सरिस्का ने बचपन से उसकी कहानियां सुनी थीं और दिल से नफरत करती थी। लेकिन आज वह खुद उनके दरवाजे पर खड़ा था।
विनय व्हीलचेयर पर पीछे से आवाज दी, “चाचा… आप?”
रामबहादुर अंदर घुसा। कमरे में उसकी मौजूदगी से हवा भारी हो गई। उसने विनय को ऊपर से नीचे तक देखा, फिर सरिस्का को। नजर ठहरी उसके भरे हुए शरीर पर—एक पल के लिए—फिर वह बिस्तर के किनारे बैठ गया। आवाज में हुक्म था, लेकिन अंदर दर्द भी छिपा था।
“मैंने सुना। कंपनी ने छोड़ दिया, किराया नहीं भर पा रहे, हालत खराब है। गांव में खबर पहुंच गई।” उसने जेब से तंबाकू निकालकर मुंह में दबाया। “तुम्हारे अलावा मेरा कोई नहीं। मैं अकेला हूं। शादी नहीं की, औलाद नहीं। अब तुम लोग मेरे हैं।”
सरिस्का चुप खड़ी थी। नफरत और मजबूरी दोनों उसके चेहरे पर थे।
रामबहादुर ने सीधे बात रखी, “यहां क्या रखा है? किराया, दवा, खाना… सब सिर पर। मेरे गांव चलो। बिहार। मेरा घर बड़ा है, खेत हैं, ठेकेदारी चलती है। तुम्हारा सारा खर्चा मैं उठाऊंगा—दवाई, खाना, बच्चे की पढ़ाई, सब। विनय की सेवा भी होगी। तुम लोग वहां रहो। मैं हूं न।”
विनय ने सरिस्का की तरफ देखा। आंखों में शर्म और थकान थी। सरिस्का ने नीचे देखा। मन में वही पुरानी नफरत उबल रही थी—यह आदमी, यह काला डरावना शरीर, यह जेल का इतिहास—लेकिन घर में राशन खत्म हो रहा था, मकान मालिक का फोन बज रहा था, बेटा बीमार पड़ने वाला था।
रामबहादुर उठा। कमरा उसकी लंबाई से छोटा लगने लगा। उसने विनय के सिर पर बड़ा हाथ रखा, “सोच मत। मैं कहता हूं तो होगा। पैसा मेरा, घर मेरा, तुम मेरे। तैयार हो जाओ। कल गाड़ी लेकर आता हूं।”
सरिस्का की आवाज पहली बार निकली, कांपती हुई, “हम… कैसे विश्वास करें?”
रामबहादुर मुड़ा। उसकी डरावनी आंखों में एक अजीब सी गर्मी थी। “विश्वास मत करो। मजबूरी देखो। तुम्हारे पास और कोई रास्ता है क्या?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। विनय ने धीरे से सरिस्का का हाथ पकड़ा। दोनों की नजरें मिलीं। आंसू थे, डर था, लेकिन आशा की एक पतली सी किरण भी थी।
सरिस्का ने आंखें बंद कीं, फिर खोलीं। आवाज बहुत धीमी निकली—
“ठीक है… हम चलेंगे।”
रामबहादुर ने धीरे से गर्दन हिलाई। उसके चेहरे पर पहली बार कोई भाव आया—जैसे कोई पुराना बोझ हल्का हुआ हो। वह दरवाजे की तरफ बढ़ा, फिर रुका और बिना मुड़े बोला,
“कल सुबह दस बजे। सामान कम रखना। बाकी सब मैं देख लूंगा।”
दरवाजा बंद हुआ। कमरे में फिर वही उदासी थी, लेकिन अब उसके बीच एक नई, भारी और डरावनी मौजूदगी की गंध रह गई थी—काले शरीर की, तंबाकू की, और एक ऐसे आदमी की जो अब उनकी जिंदगी में हमेशा के लिए उतर आया था।

विनय की आंखों में लाचारी थी। सरिस्का की आंखों में पुरानी नफरत और नई मजबूरी। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। फिर सरिस्का ने धीरे से गर्दन हिलाई।
“हम चलेंगे।”
रामबहादुर ने तंबाकू का रस थूका, भारी आवाज में बोला, “कल सुबह गाड़ी लेकर आता हूं। तैयार रहना।”

गांव की धूल भरी सड़क पर रामबहादुर की पुरानी जीप रुकी। तीन कमरों वाला छोटा मकान था—सामने आंगन, एक बड़ा सा बरामदा, फिर तीन कमरे। दीवारें कच्ची-पक्की मिली-जुली, छत पर खपरैल। अंदर अंधेरा और सीलन की हल्की गंध। एक कमरे में रामबहादुर रहता था, दूसरा खाली था जो अब विनय-सरिस्का के लिए, तीसरा छोटी सी रसोई और स्नानघर जैसा।
विनय को व्हीलचेयर से उतारकर अंदर ले जाया गया। सरिस्का बेटे का हाथ पकड़े पीछे-पीछे चली। साड़ी के नीचे उसकी 38 की मोटी गांड हर कदम पर लहरा रही थी। रामबहादुर ने तंबाकू मुंह में दबाए हुए उन्हें कमरे में उतारा।
“यही घर है। छोटा है, लेकिन मेरा है। तुम लोग यहीं रहोगे।” आवाज में वही दबंग अंदाज था। कोई पूछने वाला स्वर नहीं, बस हुक्म।
सरिस्का ने सिर झुकाए रखा। आंखें जमीन पर। “जी… चाचा।” इतनी ही बात कही और फिर चुप। उसकी गोरी गर्दन पर पसीने की बूंदें थीं। साड़ी का पल्लू स्तनों पर से बार-बार खिसक रहा था, लेकिन वह संभालने की जगह और नीचे झुक जाती।

जारी रहेगा..
 

Sariska55

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एक्सीडेंट के बाद विनय का चाचा विनय को सरिस्का को और अपने 6 साल के बेटे को गांव ले आते हैं


यहां पर एक बार फिर आपको कहानी के पात्रों का परिचय देते हैं
कहानी के पात्र
विनय
उम्र अब करीब 30। गोरा, सुंदर चेहरा, 5 फुट 7 इंच की हाइट, लेकिन शरीर हमेशा से कमजोर। लिंग सिर्फ 4 इंच का था—और एक्सीडेंट के बाद तो बिल्कुल बेजान हो चुका है। कभी सिविल इंजीनियर था, गुड़गांव की साइटों पर काम करता था। अब व्हीलचेयर पर है। कमर टूटी हुई, पैर सुन्न, कंपनी ने छोड़ दिया, किराया नहीं भर पा रहा। आंखों में हमेशा शर्म और लाचारी। बोलता कम है, जैसे खुद से माफी मांगता हो कि वह अब कुछ नहीं दे सकता—न पैसा, न शरीर, न मर्दाना हक। उसकी जिंदगी अब सिर्फ दूसरों की दया पर टिकी है


बेटा

अब पांच-छह साल का। मासूम चेहरा, पतला शरीर। पापा को व्हीलचेयर पर देखकर चुप हो जाता है। माँ के बगल में सोता है और कभी-कभी पूछ बैठता है—“पापा कब चलेंगे?”

चाचा रामबहादुर
उम्र 45। 6फुट 5इंच लंबा, पहलवान जैसा तगड़ा बदन। कंधे इतने चौड़े कि दरवाजे में टेढ़े होकर गुजरना पड़ता है। हाथ-पैर मोटे, नसें फूली हुई, पूरा शरीर कालिख जैसा काला और चमकदार। चेहरा कठोर, आंखें तेज और डरावनी, जैसे हमेशा किसी को दबाने को तैयार हों। गला भारी, आवाज में हुक्म। तंबाकू की लत गहरी—मुंह में हमेशा खैनी या तंबाकू भरा रहता है, थूक काले दाग छोड़ जाता है। शाम होते ही शराब शुरू। देसी या अंग्रेजी, फर्क नहीं पड़ता। दो-तीन पेग के बाद और भी दबंग हो जाता है—हंसता कम, बात करता सीधा, जैसे दुनिया उसी के कहे अनुसार चलनी चाहिए। पहले गुंडागर्दी करता था, कई बार जेल गया, इसलिए शादी नहीं हुई। अब बिहार के गांव में लोकल ठेकेदारी करता है। अकेला है। और अब कहता है—“तुम्हारे अलावा मेरा कोई नहीं।”

सरिस्का
उम्र 30। दूध जैसी गोरी-चिट्टी त्वचा, 5 फुट 6 इंच। बेटा होने के बाद फिगर और भी जिस्म का हो गया है—36-28-38। आगे 36 के भारी-भरकम नरम स्तन जो कपड़े के अंदर भी अपनी गोल शक्ल बनाए रखते हैं, निपल्स हमेशा थोड़े कड़े-से रहते हैं। बीच में 28 की पतली कमर, और फिर अचानक निकलती हुई 38 की मोटी-मोटी गोल गांड। इतनी भारी और रसीली गांड कि साड़ी या सालवार पहनने पर भी दोनों लोथड़े स्पष्ट लहराते हैं। चलते समय गांड के दोनों भाग अलग-अलग हिलते हैं, जैसे कोई जानबूझकर लुभा रहा हो। जांघें मोटी, चिकनी और आपस में रगड़ खाती हुई। जब नहाकर निकलती है तो पानी की बूंदें उसकी गांड की दरार में से फिसलती हुई नीचे की ओर बहती हैं। आंखें काली और गहरी, होंठ मोटे और हमेशा हल्के खुले। उसके शरीर से एक गंदी, भरी हुई कामुकता रिसती रहती है—छूने से पहले ही योनि गीली होने लगती है, निपल्स तन जाते हैं, और गांड अपने-आप थोड़ी सी तन जाती है जैसे कोई घुसने वाला हो। सेक्स की भूख उसके अंदर कभी मरती नहीं। चाहे मिले या न मिले, उसका जिस्म हमेशा तैयार और लालची रहता है।

अब कहानी पर चलते हैं
पहला दिन बीता। सरिस्का ने रसोई साफ की, खाना बनाया। जब रामबहादुर को थाली देने गई तो नजरें फिर नीचे थीं। वह खड़ा था—काला तगड़ा बदन, बनियान में नसें फूली हुई, तंबाकू का रस मुंह के कोने से रिसता हुआ। सरिस्का ने थाली आगे बढ़ाई। उसके भारी स्तन साड़ी के अंदर दबे हुए थे, लेकिन झुकते समय साफ उभर आए। रामबहादुर की निगाह एक पल के लिए रुक गई, फिर उसने तंबाकू का रस बाहर थूका।
“खाना ठीक बनाती है।” बस इतना कहा और बैठ गय


यहां से 3 महीने ऐसे ही निकल जाते हैं इन 3 महीने का फिर आपको flashback में वापस यहां की स्टोरी बताएंगे अब कहानी को 3 महीने आगे लेकर चलते हैं



{ विनय और सरिस्का को अभी गांव में रहते हुए 3 महीने हो चुके हैं}

............ …...........................................



रात का समय था।
विनय के छोटे से कमरे में एक बल्ब जल रहा था। रामबहादुर चारपाई पर बैठे थे—लंबे पैर फैलाए, काला तगड़ा बदन बनियान में कसा हुआ, एक हाथ में देसी शराब का गिलास। मुंह में तंबाकू भरा था। विनय बगल वाली चारपाई पर लेटा था, व्हीलचेयर दीवार से सटा दी गई थी। कमरे में सिर्फ दो पुरुष थे। सरिस्का रसोई में थी—बर्तन धोने और बासी रोटी सेंकने की आवाजें आ रही थीं।
रामबहादुर ने गिलास से घूंट लिया। आवाज भारी और सीधी निकली,
“कैसे हुआ बेटा? साइट पर इतना लापरवाह?”
विनय की आंखें छत पर थीं। आवाज में लाचारी साफ झलक रही थी,
“पैर फिसल गया चाचा… कुछ याद नहीं। डॉक्टर कहता है कमर की नस खराब हो गई… अब… अब कुछ नहीं हो सकता।”
रामबहादुर ने तंबाकू का रस फर्श पर थूका।
“हम्म। कंपनी वाले हरामजादे हैं। काम ले लिया, अब छोड़ दिया। दुनिया ऐसी ही है। पैसे के बिना आदमी लाश है।”
उसने गिलास फिर भरा।
“अब तू फिकर मत कर। मैं हूं। खाना-पीना, दवाई, बच्चे की पढ़ाई… सब मेरा। तू बस आराम कर।”
विनय ने धीरे से कहा,
“आप पर बोझ पड़ रहा है चाचा… हम… हम बोझ बन गए हैं।”
रामबहादुर की आंखें तिरछी हुईं। दबंग अंदाज में बोला,
“बोझ? तू मेरा खून है। तेरी बीवी-बच्चा मेरे हैं। बोझ का शब्द मुंह से मत निकाल। जो कहूं वो होगा। समझा?”
विनय चुप हो गया। बस गर्दन हिलाई।
इतने में सरिस्का रसोई से निकली। हाथ में पानी का जग और दो गिलास थे। पतली नाइटी पहने हुए—36 के भारी स्तन कपड़े के अंदर स्पष्ट उभरे हुए, नीचे 38 की मोटी गांड हर कदम पर लहरा रही थी। वह कमरे में घुसी तो नजरें फर्श पर गड़ा दीं। रामबहादुर की तरफ देखे बिना जग टेबल पर रखा।
“पानी…,” उसकी आवाज बहुत धीमी निकली।
रामबहादुर ने उसे ऊपर से नीचे देखा। निगाह एक पल स्तनों पर रुकी, फिर गांड पर। आवाज में वही हुक्म था,
“रुक। तू भी सुन ले।”
सरिस्का वहीं खड़ी रह गई। सिर झुकाए, हाथ आगे बांधे। नाइटी का कपड़ा उसके रसीले जिस्म पर चिपक रहा था।
रामबहादुर ने शराब का घूंट लिया और विनय से बात जारी रखी,
“गांव में रहना आसान नहीं। लोग बात बनाते हैं। तू बीमार है, तेरी बीवी जवान है… समझदार रहना दोनों को। मैं जो कहूं, वो करना। वरना गांव वाले मुंह बनाने लगेंगे।”
विनय ने फिर से लाचारी भरी आवाज में कहा,
“जी चाचा… जैसा आप कहेंगे।”
सरिस्का अभी भी सिर झुकाए खड़ी थी। रामबहादुर ने अचानक पूछा,
“तू क्या सोचती है?”
सरिस्का की आवाज कांपती हुई निकली, नजरें अभी भी नीचे,
“जो… जो आप कहेंगे चाचा… वही सही है।”
रामबहादुर ने हल्के से मुंह टेढ़ा किया। तंबाकू चबाते हुए बोला,
“अच्छी बात। अब जा, खाना तैयार कर। रात को जल्दी सो जाना। कल सबेरे खेत की तरफ चलना है मुझे।”
सरिस्का ने सिर झुकाए बिना “जी चाचा” कहा और बाहर निकल गई। उसके जाते समय मोटी गांड नाइटी के अंदर लहराती रही। रामबहादुर की निगाह पीठ पर टिकी रही जब तक वह रसोई में गायब नहीं हो गई।
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
रामबहादुर शराब पीता रहा। विनय छत की तरफ देखता रहा—लाचार, शर्मिंदा, और बोलने में असमर्थ।
रसोई से बर्तनों की आवाज आती रही।
 
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