सरिस्का भी 25, दूध जैसी गोरी, 5'6", हाल ही में बेटा होने के बाद उसका फिगर 36-28-36 हो गया था—मोटे, नरम स्तन, गोल कूल्हे, और पेट पर हल्की-सी ढीली चमड़ी जो अब भी सेक्सी लगती थी। दोनों ने लव मैरिज की थी। गुड़गांव में विनय सिविल इंजीनियर था, छोटा-सा फ्लैट था। सरिस्का के घरवालों ने रिश्ते तोड़ दिए थे। विनय के मां-बाप गरीब गांव में रहते थे।
सेक्स हफ्ते में एक बार ही होता था। विनय थक जाता था ऑफिस से, और उसका छोटा लिंग जल्दी निकल जाता था। लेकिन सरिस्का कभी शिकायत नहीं करती थी। वह चुपचाप लेट जाती, पैर फैला देती, और विनय को अंदर आने देती। कभी-कभी वह खुद ऊपर बैठ जाती, अपने मोटे स्तनों को उसके मुंह में ठूंस देती, और धीरे-धीरे कमर हिलाती। विनय जल्दी झड़ जाता, फिर सरिस्का उसके सीने पर सिर रखकर सो जाती। बेटा बीच में रोता तो वह उठ जाती, दूध पिलाती, और वापस आती।
पहले साल में सब सामान्य रहा। बेटा एक साल का हो गया। सरिस्का का दूध अभी भी आता था। एक रात विनय ने उसके स्तन से दूध पी लिया। सरिस्का मुस्कुराई, “पियो… छोटा है तेरा, लेकिन मुंह से तो प्यार कर ले।” उसने विनय का सिर अपने स्तनों के बीच दबाया। दूध की मीठी गंध, नरम मांस… विनय ने दोनों निपल्स चूसे, काटे। सरिस्का कराह उठी। फिर उसने विनय को नीचे खींचा, अपनी गीली योनि उसके मुंह पर रख दी। विनय ने चाटा, चूसा। सरिस्का का पानी उसके चेहरे पर बह निकला। फिर वह ऊपर चढ़ी, 4 इंच के लिंग को अंदर लिया, और जोर-जोर से उछली। स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे, दूध की बूंदें गिर रही थीं। विनय जल्दी झड़ गया। सरिस्का ने खुद को उंगलियों से रगड़कर ऑर्गेज्म लिया, फिर विनय के सीने पर लेट गई।
दूसरे साल में विनय के मां-बाप दोनों का एक हफ्ते के अंदर देहांत हो गया। गांव में अंतिम संस्कार, फिर खाली घर। विनय टूट गया। रातों को रोता। सरिस्का उसे सीने से लगाती, “मैं हूं ना…” एक रात रोते-रोते विनय ने उसके स्तन चूसने शुरू कर दिए। सरिस्का ने चुपचाप अपने कपड़े उतार दिए। नंगी होकर उसने विनय को अपनी गोद में खींचा। विनय का मुंह उसके गीले छेद पर लग गया। सरिस्का ने उसके बाल पकड़कर जोर से दबाया। “चाट… जोर से चाट…” विनय ने जीभ अंदर डाली, चूसा। सरिस्का का शरीर कांपने लगा। फिर उसने विनय को लिटाया, खुद ऊपर बैठ गई। धीरे-धीरे कमर घुमाई, फिर तेज। उसके मोटे कूल्हे विनय की जांघों पर थपथपा रहे थे। स्तन उसके चेहरे पर लहरा रहे थे। विनय ने दोनों निपल्स मुंह में भर लिए। सरिस्का चिल्ला उठी और झड़ गई। विनय भी अंदर ही झड़ गया। उसके बाद वह रोया नहीं। सरिस्का ने उसके माथे को चूमा, “अब सिर्फ हम तीन हैं।”
तीसरे साल में बेटा तीन का हो गया। सरिस्का का फिगर और भी भरा-भरा हो गया था। स्तन भारी, कूल्हे चौड़े। सेक्स अभी भी हफ्ते में एक बार। लेकिन अब सरिस्का खुद पहल करती। कभी रात को नंगी होकर विनय के ऊपर चढ़ जाती। कभी सुबह बाथरूम में उसे खींच लेती। एक दिन उसने विनय से कहा, “तेरा छोटा है… लेकिन मेरी चूत को पूरा भर देता है जब तू जोर से धकेलता है।” विनय शरमा गया, लेकिन उत्तेजित हो गया। उस रात सरिस्का ने कुत्ते की तरह करवट ली। विनय पीछे से घुसा। 4 इंच पूरा अंदर। सरिस्का ने पीछे हाथ बढ़ाकर उसके कूल्हे पकड़े, “और जोर… मार…” विनय ने जोर लगाया। थप्पड़ की आवाज आ रही थी। सरिस्का की योनि गीली-गीली चिपक रही थी। वह कराह रही थी, “हां… ऐसे ही… गहरा…” विनय जल्दी झड़ गया, लेकिन सरिस्का ने उसे बाहर नहीं निकाला। वह लेटी रही, वीर्य उसके अंदर से रिस रहा था।
चौथे साल में जीवन स्थिर हो गया। गुड़गांव का फ्लैट, ऑफिस, बेटा स्कूल जाने लगा। सेक्स रूटीन था, लेकिन गरम। सरिस्का अब बिना कपड़ों के घर में घूमती। कभी-कभी विनय ऑफिस से लौटता तो वह सोफे पर पैर फैलाए बैठी होती, उंगलियां अपनी योनि में घुमाती हुई। “आजा… देख कितनी गीली हूं तेरे लिए।” विनय झुक जाता, चाटता। सरिस्का उसके सिर को पकड़कर जोर से रगड़ती। फिर लिंग मुंह में ले लेती। छोटा होने के बावजूद वह गहरा निगलती, गले तक। विनय की कमर कांपती। फिर सरिस्का लेट जाती, पैर कंधों पर रख देती। विनय घुसता, जोर-जोर से धकेलता। सरिस्का के स्तन इधर-उधर हिलते, निपल्स कड़े। वह चिल्लाती, “भर दे… अंदर ही छोड़…” विनय छोड़ देता। फिर दोनों पसीने से भीगे लेटे रहते।
पांचवें साल में बेटा पांच का हो गया। विनय 30 का, सरिस्का भी। शरीर और भी भरा। लेकिन प्यार और कामुकता वैसी ही। एक रात सरिस्का ने कहा, “तेरे मां-बाप नहीं रहे… मेरे वाले तो पहले से ही नहीं हैं। सिर्फ हम हैं। और ये शरीर… ये चूत… ये स्तन… सब तेरे हैं।” उसने विनय को नंगा किया, घुटनों के बल बैठी, लिंग को दोनों हाथों से सहलाया, फिर मुंह में लिया। धीरे-धीरे, गहराई से। फिर उठी, विनय को बिस्तर पर धकेला, खुद ऊपर चढ़ी। रात भर उन्होंने सेक्स किया—ऊपर-नीचे, पीछे से, साइड में। सरिस्का कई बार झड़ी। विनय दो बार। आखिर में सरिस्का उसके सीने पर लेटी, वीर्य उसकी जांघों पर चमक रहा था।
“हफ्ते में एक बार ही सही,” उसने फुसफुसाया, “लेकिन जब होता है… तो पूरा ले लेती हूं।”
विनय ने उसके गीले माथे को चूमा। बाहर रात थी, गुड़गांव की। अंदर दो शरीर एक-दूसरे में उलझे हुए—छोटा लिंग, बड़ी भूख, और पांच साल का सफर जो अभी खत्म नहीं हुआ था।
दोनों की जिंदगी हंसी-खुशी चल रही थी। बेटा स्कूल जा रहा था, विनय की नौकरी अच्छी चल रही थी, सरिस्का घर संभालती। सेक्स हफ्ते में एक बार ही सही, लेकिन जब होता तो सरिस्का पूरे जोश से लेती। कभी रात को नंगी होकर उसके ऊपर चढ़ जाती, कभी सुबह बाथरूम में दीवार से सटाकर लेती। उसके 36 के भारी स्तन, गोल कूल्हे और गीली चूत—विनय के छोटे लिंग को भी पूरा निगल लेती।
उनकी छठी शादी की सालगिरह आई। सरिस्का ने घर सजाया, केक काटा, बेटे को सोने भेजा। रात को दोनों नंगे बिस्तर पर थे। सरिस्का ने विनय का 4 इंच का लिंग मुंह में लिया, गहराई तक निगला, फिर ऊपर चढ़ गई। स्तन उसके चेहरे पर लहरा रहे थे, निपल्स मुंह में। वह जोर-जोर से कमर हिला रही थी, गीली आवाजें आ रही थीं। “आज पूरा भर दे… सालगिरह है…” विनय ने दोनों हाथों से उसके मोटे कूल्हे पकड़े और अंदर छोड़ दिया। सरिस्का भी कांपते हुए झड़ गई। दोनों पसीने से भीगे एक-दूसरे से चिपके सो गए।
दो दिन बाद सब बदल गया।
विनय साइट पर था। तीसरी मंजिल की बिल्डिंग पर निरीक्षण कर रहा था। अचानक पैर फिसला। वह नीचे गिर गया। पंद्रह-बीस फीट। कमर और दोनों पैर बुरी तरह चोटिल। अस्पताल में कई ऑपरेशन। डॉक्टरों ने कहा—कमर की हड्डी टूटी है, पैरों में नसें क्षतिग्रस्त। चलना-फिरना मुश्किल होगा। शायद व्हीलचेयर। सेक्स? डॉक्टर ने साफ कहा—“शारीरिक संबंध सीमित रह सकते हैं। लिंग में सनसनी कम हो सकती है।”
सरिस्का अस्पताल में टूट गई। रोई, चीखी, लेकिन विनय के सामने मुस्कुराती रही। बेटा रोता था—“पापा कब उठेंगे?”
एक्सीडेंट के बाद सब कुछ बदल गया।
विनय बिल्डिंग से गिरा। कमर और पैर बुरी तरह टूटे। अस्पताल में एक महीना रहा। ऑपरेशन, प्लेट्स, पाइप… सब कुछ। लेकिन सबसे बड़ी चोट वो थी जो दिखती नहीं थी—उसका लिंग बिल्कुल ही मर चुका था। कोई हरकत नहीं, कोई सनसनी नहीं। डॉक्टरों ने साफ कह दिया—“नर्व डैमेज हो चुका है। नॉर्मल सेक्स संभव नहीं।”
सरिस्का रोज आती। हाथ पकड़ती, माथा सहलाती, लेकिन रात को जब अकेली घर लौटती तो रोती। सेक्स पूरी तरह बंद हो गया। न छूना, न चूमना, न कुछ। विनय खुद मुंह फेर लेता। “मत छू मुझे… मैं अधूरा हो गया हूं।”
कंपनी ने पहले खर्चा उठाया, फिर हाथ खड़े कर दिए। “अब और सपोर्ट संभव नहीं। आपकी कंडीशन साइट के लायक नहीं रही।” आखिरी चेक मिला और खत्म।
किराए का फ्लैट था। हर महीने किराया देना पड़ता। गांव में विनय के मां-बाप की मौत पहले ही हो चुकी थी—कोई सहारा नहीं, कोई पैसा नहीं, कोई जगह नहीं जहां जा सकें। बेटे की फीस, दवाइयां, राशन… सब सरिस्का के सिर पर।
घर लौटे तो व्हीलचेयर पर। फ्लैट छोटा लगने लगा। रातें लंबी और चुप। सरिस्का सिलाई करती देर रात तक। विनय बिस्तर पर पड़ा रहता। दोनों के बीच बातें कम हो गईं। छूना तो जैसे बंद ही हो गया।
एक रात सरिस्का थक कर आई। कपड़े बदले बिना विनय के बगल में लेट गई। उसका हाथ अपने-आप विनय की जांघ पर चला गया। विनय ने हटा दिया। “मत कर। कुछ नहीं होगा। बेकार है।”
सरिस्का चुप रही। थोड़ी देर बाद वह उठी, नंगी हो गई और फिर लेट गई। सिर्फ शरीर सटाकर। स्तन विनय की बांह से छू रहे थे, जांघें सटी हुई थीं। कोई हरकत नहीं। कोई कोशिश नहीं। बस इतनी सी गर्मी। विनय की आंखों से आंसू बह निकले। सरिस्का ने उन्हें पोंछा नहीं। खुद भी रो रही थी।
पैसे की तंगी बढ़ती गई। किराया दो महीने का बकाया हो गया। मकान मालिक रोज नोटिस भेजने लगा। सरिस्का ने गहने बेचे, फिर मशीन के कुछ पार्ट्स। बेटा स्कूल से लौटता तो दोनों के चेहरे देखकर चुप हो जाता।
सेक्स का नामोनिशान नहीं रहा। न याद intercourse की, न छूने की। सिर्फ एक टूटा हुआ मर्द, एक थकी हुई औरत, और एक छोटा बच्चा। दुखों का पहाड़ इतना भारी था कि दोनों के सीने दब गए थे।
एक रात बिजली चली गई। अंधेरे में सरिस्का विनय के पास आई। उसने धीरे से कहा, “मैं तेरे बिना नहीं जी सकती… लेकिन अब कैसे जीएं?”
विनय ने जवाब नहीं दिया। बस उसका हाथ पकड़ लिया। ठंडा, बेजान हाथ। दोनों अंधेरे में लेटे रहे। बाहर बारिश शुरू हो गई। किराए का फ्लैट, खाली जेब, मरा हुआ शरीर, और एक जिंदगी जो अब सिर्फ सांस ले रही थी—और कुछ नहीं।
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