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Adultery शीला की लीला -५५ साल की शीला की जवानी (Completed)

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vakharia

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Sanju@

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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की...

वैशाली, जो एक हिंसक यौन हमले का शिकार हुई, शारीरिक और भावनात्मक रूप से टूटी हुई है.. वह अपने पति और समाज के डर से इस घटना को किसी को बता नहीं पाती और अकेलेपन में घुटती रहती है.. अंततः, वह सहारे के लिए अपनी माँ शीला को बुलाती है..

दूसरी ओर, कविता अपनी बहन मौसम को बाबिल और उनकी माँ रमिला के संबंधों के बारे में बताती है.. मौसम को यह सच स्वीकार करना बहुत कठिन लगता है.. वह छिपकर अपनी माँ और बाबिल को यौन संबंध बनाते हुए देखती है, जिससे उसकी दुनिया हिल जाती है.. विरोधाभास यह है कि यह दृश्य देखकर उसे घृणा के साथ-साथ यौन उत्तेजना भी महसूस होती है..

कहानी इन पात्रों के आंतरिक संघर्ष, टूटे विश्वास, सामाजिक बंधनों और मानवीय कमजोरियों के चित्रण के साथ आगे बढ़ती है, जहाँ हर कोई अपनी इच्छाओं और वास्तविकताओं के बीच फँसा हुआ है..

अब आगे..

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दूसरी सुबह शीला वैशाली के घर पहुँच गई.. पिंटू बेंगलोर गया हुआ था और वैशाली के सास-ससुर अपनी बेटी के घर एक हफ्ते के लिए गए थे.. दोनों माँ-बेटी ने अकेले में ढेर सारा वक्त साथ गुजारा.. शीला को देखते ही वैशाली अपने साथ घटी उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को जैसे भूल ही गई.. अपनी माँ के साथ रहकर उसमें नई शक्ति का संचार हुआ.. बस एक ही दिन मे वह नॉर्मल हो गई..

तीसरे दिन की सुबह.. बेड पर लेटी वैशाली अपने मोबाइल पर इंस्टाग्राम की रील्स देख रही थी.. शीला के आने पर उसने कुछ दिनों के लिए ऑफिस से छुट्टी ले ली थी ताकि वह अपनी माँ के साथ समय बीता सकें.. शीला रसोईघर में खाना पका रही थी..

स्क्रीन स्क्रॉल करते हुए कुछ उत्तेजक रील्स को देखकर वैशाली की फुद्दी कुलबुलाने लग गई.. कविता के घर चार दिन पहले हुई उस घमासान चुदाई का नशा तो कब का उतर चुका था.. रजाई ओढ़े लेटी वैशाली का हाथ उसकी शॉर्ट्स के अंदर चला गया.. और वह कपड़ों के ऊपर से ही अपनी मुनिया सहलाने लगी.. अपनी माँ शीला की तरह वैशाली भी अत्याधिक कामुक स्त्री थी.. देह-सुख का जितना आनंद लेती उतनी ही उसकी भूख अधिक तीव्र होती जाती थी

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आप जानते ही होंगे, इंस्टाग्राम आपकी गतिविधियों, जैसे रील्स देखने के समय और इंटरैक्शन को ट्रैक करता है.. फिर उस डेटा के आधार पर एल्गोरिदम आपको समान या संबंधित विषयों की और अधिक रील्स दिखाता रहता है.. यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ.. एक के बाद एक अर्धनग्न जिस्मों के अंतरंग यौन संबंधों वाली रील्स देखकर वैशाली बेहद गरमा गई.. उसकी उँगलियाँ अब चूत की गीली परतों को कुरेदने लग गई

जब जिस्म की हवस काबू से बाहर हो गई तब वैशाली बिस्तर से उठी.. उसने चुपके से किचन में नजर डाली.. शीला किसी से फोन पर बात करते हुए खाना बना रही थी.. वैशाली चुपके से अपने बाथरूम में गई, शावर ऑन कर दिया ताकि पानी की आवाज में उसकी आवाज दब जाएँ.. और बरस रहे पानी से थोड़े दूर कमोड पर जाकर बैठ गई

उसने तुरंत कविता को फोन मिलाया

कविता: "हाँ वैशाली, बता, कैसे याद किया?"

वैशाली: "यार, पॉइंट पर ही आती हूँ.. आज दोपहर तेरे घर पर उस नौकर को बुला सकती है क्या? में दोपहर में ऑफिस के काम का बहाना बनाकर तेरे घर चली आऊँगी"

कविता के चेहरे पर कुटिल सी मुस्कान आ गई, वह बोली "आय हाय, बड़ी तड़प रही है.. चार ही दिनों में फिर से आग लग गई नीचे..!!"

वैशाली ने ईमानदारी से कहा "मेरी फितरत तो तू जानती ही है कविता.. मुझे तो दिन में एक बार भी कम पड़ता है.. हाँ, जब तक संयम रख सकती हूँ तब तक ठीक है, पर एक बार जो शुरू हो गई फिर.."

कविता: "समझ गई यार.. पर सुन.. मेरे घर फिलहाल में उसे नहीं बुला सकती.. पीयूष लौट चुका है.. वैसे तो वो ऑफिस है पर उसका कुछ ठिकाना नहीं.. कब आ टपके..!!"

वैशाली: "मैं एक काम करती हूँ.. पीयूष को काम के बहाने फोन कर उसका शिड्यूल जान लेती हूँ.. फिर तो कोई दिक्कत नहीं है ना..!!"

कविता अब थोड़ी गंभीर हो गई.. हालांकि वह वैशाली की मदद करना चाहती थी और उसका खुद का भी मन था.. पर वह इतना बड़ा खतरा मोल लेना नहीं चाहती थी.. हाँ, पीयूष शहर में न होता तो और बात थी

कविता: "सॉरी वैशाली... नहीं हो पाएगा यार.. बहोत रिस्क है"

वैशाली निराश हो गई

कविता: "एक काम हो सकता है.. मैं उसे तेरे घर भेज देती हूँ.. तेरा घर तो फिलहाल खाली ही है.. फिर तू आराम से उसके मजे ले पाएगी"

वैशाली थोड़ी चिढ़ सी गई, और बोली "क्या बचकानी बातें कर रही है..!! भूल गई, मम्मी आई हुई है..!!"

कविता: "अरे हाँ, यह तो मैं भूल ही गई.. तो फिर तू शीला भाभी को किसी बहाने दो-तीन घंटों के लिए बाहर क्यों नहीं भेज देती..!!"

वैशाली ने परेशान स्वर में कहा "इतना आसान थोड़े ही है.. तू तो जानती है मम्मी को, मेरा चेहरा देखकर एक ही सेकंड में सब भांप लेगी"

एक लंबी सांस छोड़कर कविता ने कहा "फिर तो कुछ नहीं हो सकता यार..!!"

वैशाली सोच में पड़ गई.. हवस उसके सिर पर चढ़कर नंगा नाच कर रही थी.. आज इस प्यास को बुझाएँ बिना चैन नहीं पड़ने वाला

वैशाली: "ठीक है, मैं कुछ सोचती हूँ.. और फिर तुझे बताती हूँ" वैशाली ने फोन रख दिया

बिस्तर पर फोन पटककर वह गहरी सोच में पड़ गई.. क्या बहाना बनाउ..!! उसके उपजाऊ दिमाग में एक सुझाव आया

वह तुरंत भागी कीचेन की ओर.. रोटियाँ शेक रही शीला की बगल में जाकर बोली

"मम्मी, कुछ मदद करू आपकी?'

शीला ने बिना उसकी तरफ मुड़े रोटियाँ बनाना जारी रखा और हल्की सी मुस्कान के साथ कहा "जब तक मैं यहाँ हूँ, तुझे यह सब करने की कोई जरूरत नहीं.. रोज तो तू ऑफिस के काम के साथ साथ घर का काम भी संभालती ही है.. अब कुछ दिन आराम ही कर लें"

वैशाली: "मैं दरअसल आपसे कहने आई थी की मुझे ऑफिस जाना पड़ेगा कुछ घंटों के लिए"

अब शीला ने वैशाली की ओर रुख किया और पूछा "पर तू तो छुट्टी ले चुकी है ना..!! फिर ऐसा कौन सा काम आन पड़ा?"

शीला की आँखों में आँखें डालकर झूठ बोलने की ताकत थी नहीं वैशाली में.. वह जानती थी की उसकी माँ की माइक्रोस्कोप जैसी नजर से सच को छुपाना कितना मुश्किल है..!! वह पलटकर धुले हुए बर्तनों को एक के बाद एक शेल्फ पर रखते हुए बात करने लगी "असल में मेरा एक कंसाइनमेंट जाना है आज.. अर्जेंट है इसलिए मुझे जाना पड़ेगा"

शीला: "किसी ओर को बोल दे करने के लिए.. ऐसा हो तो मैं बात करू क्या पीयूष से??"

वैशाली ने थोड़ा हड़बड़ाकर कहा "उसकी कोई जरूरत नहीं है मम्मी, वैसे भी, पीयूष ऐसे कामों में उलझता नहीं है.. उसे तो इस बारे में शायद ज्यादा मालूम भी नहीं होगी.. चूंकि इस कस्टमर को पहले से मैंने हेंडल किया है, इसलिए मैं चाहती हूँ की मटीरीअल भेजने से पहले पूरी तसल्ली कर लूँ"

शीला ने हथियार डाल दिए.. "ठीक है, जैसा तुझे ठीक लगें.. वैसे कब तक वापिस लौटेगी?"

वैशाली: "कुछ कह नहीं सकते.. पर कम से कम दो-तीन घंटे तो लग ही जाएगी"

शीला ने एक गहरी सांस छोड़कर कहा "ठीक है फिर.. जाकर आ ऑफिस"

वैशाली: "अरे मम्मी, मैं तो आपको बताना ही भूल गई.. प्रदर्शन मैदान पर हेंडलूम साड़ियों की सेल लगी है.. ऑफिस में मेरी कलीग बता रही थी की बहोत ही बढ़िया साड़ियाँ है.. और दाम भी एकदम वाजिब है.. आप वहाँ क्यों नहीं हो आती?"

शॉपिंग का नाम सुनकर शीला की आँखों में चमक आ गई, उसने कहा "ऐसी बात है तो जरूर चलते है.. पर कल जाएंगे.. तू भी चलना मेरे साथ"

वैशाली ने थोड़ी घबराहट के साथ कहा "नहीं मम्मी, आज प्रदर्शनी का आखिरी दिन है.. और वैसे भी, मैं साड़ियाँ कहाँ पहनती ही हूँ..!! शादी के समय आपने जो साड़ियाँ दी थी वह भी वैसी की वैसी पेक पड़ी हुई है.. आप ही हो आइए.. ऐसा मौका दोबारा नहीं मिलेगा"

शीला ने कुछ सोचकर कहा "साड़ी नहीं तो कुछ और.. मुझे कुछ तो लेना है तेरे लिए.. एक काम कर.. ऑफिस का काम निपटाकर तू सीधे वहीं आ जाना..!!"

वैशाली: "हाँ यह भी ठीक है.. आपको मेरे लिए कुछ पसंद आ जाएँ तो विडिओ कॉल कर लेना.. मैं सिलेक्ट कर लूँगी"

शीला ने बड़बड़ाते हुए कहा "हाथ में पकड़कर कपड़ों की जो परख होती है वो फोन पर देखकर कैसे पता चलेगा..!!! ये आजकल की जनरेशन भी ना..!! सबकुछ घर बैठे ही चाहिए.. चल, ठीक है, मैं तुझे फोन करूंगी अगर कुछ पसंद आया तो"

वैशाली पीछे से ही शीला को लिपट गई और उसके गालों को चूमते हुए बोली "थैंक यू मम्मी"

शीला को थोड़ा सा अटपटा जरूर लगा.. उसके साड़ियों के सेल में जाने पर वैशाली इतनी खुश क्यों हो रही है..!! पर शीला ने उस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया

बाथरूम में जाकर हाथ-मुंह धोकर शीला सेल मे जाने के लिए तैयार हो गई.. बाहर आकर देखा तो वैशाली उन्हीं कपड़ों में बैठी थी और फोन पर मेसेज कर रही थी

शीला ने थोड़े आश्चर्य के साथ कहा "तू अब तक तैयार नहीं हुई?? ऑफिस नहीं जाना क्या? फिर चल मेरे साथ"

वैशाली: "अरे नहीं नहीं मम्मी.. मुझे ऑफिस जाना ही है.. बस मटीरीअल के वेरहाउस पहुंचते ही निकलूँगी" इतना कहकर वैशाली फिर से कविता को मेसेज करने लग गई की अब रास्ता साफ है और वो बाबिल को उसके घर भेज सकती है.. साथ ही उसने अपना अड्रेस भी व्हाट्सप्प कर दिया ताकि कविता बाबिल को दे सकें

मेसेज करने में व्यस्त वैसाली का अचानक ध्यान गया की शीला वहीं खड़ी खड़ी उसे तांक रही थी और उसकी हर हरकत को बारीकी से निहार रही थी.. वैशाली समझ गई.. मम्मी को यकीन दिलाने के लिए उसे तैयार होना ही पड़ेगा.. उसने फोन सोफ़े पर रखा और कपड़े पहनने अंदर चली गई

उसके जाने के बाद शीला ने वैशाली का फोन उठाया पर उसपर फिंगरप्रिन्ट लॉक लगा हुआ था इसलिए शीला उसे खोल न पाई.. फिर उसे लगा की वह बेकार ही वैशाली पर शक कर रही है.. और कहीं वैशाली बाहर आ गई और फोन उसके हाथों में दे दिया तो बुरा मान जाएगी.. नहीं पीढ़ी की अपने फोन के प्रति आसक्ति और सनक से वह भलीभाँति वाकिफ थी

उसने फोन रख दिया.. और बैठे बैठे वैशाली के तैयार होने का इंतज़ार करने लगी

वैशाली ने बेडरूम का दरवाजा आधा खोलकर, अपनी ब्रा के हुक को पकड़े हुए बाहर गर्दन निकाली.. बाहर शीला को सोफ़े पर बैठे देखकर उसने कहा "आप अभी गई नहीं मम्मी?"

शीला: "सोचा साथ में ही निकलते है"

वैशाली: "मुझे थोड़ा वक्त लगेगा.. एक बार मटीरीअल पहुँचने का फोन आने पर मैं निकलूँगी.. आप जाइए, वरना सेल मे पहुँचने में देरी हो गई तो अच्छी साड़ियाँ निकल जाएगी"

"ठीक है.." कहते हुए शीला ने अपना पर्स उठाया

"और हाँ माँ.. ऑटो लेकर ही जाना.. बस के चक्कर में मत रहना.. उनका कोई ठिकाना नहीं होता" वैशाली ने सलाह देते हुए कहा

"ओके, कहते हुए शीला ने घर का मुख्य दरवाजा खोला और चली गई..

शीला के जाते ही वैशाली ने चैन की सांस ली.. उसने तुरंत कविता को फोन किया..

कविता: "भेज दिया मैंने उसे.. ऑटो में आ रहा है.. और सुन... तेरे घर के बाहर वाले बागीचे पर जाकर उसका इंतज़ार करना.. वैसे तो मैंने तेरा पूरा पता दिया है.. पर घर ढूँढने शायद उसे वक्त लगे और तेरा उतना टाइम खराब होगा इसलिए"

वैशाली ने खुश होकर कहा "मैं अभी जाती हूँ.. और उसे लेकर आती हूँ"

वैशाली ने फोन कट किया.. शीला के सामने दिखावा करने के लिए जो ऑफिस के कपड़े पहने थे उसे बदलकर घर के आरामदायक कपड़े पहन लिए.. और अपने पिंक फ्लिप-फ्लॉप पहनकर बागीचे की ओर चल पड़ी..

उसके घर से बागीचा करीब २०० मीटर की दूरी पर ही था.. कुछ देर के इंतज़ार के बाद एक ऑटो वहाँ आकर रुकी.. और बाबिल उतरा.. आँखों ही आँखों में इशारा कर उसने बाबिल को अपने पीछे आने के लिए कहा.. घर के दरवाजे तक पहुंचकर उसने आजू बाजू देखकर तसल्ली कर ली की कोई देख तो नहीं रहा..!! दरवाजा खोलकर चुपके से उसने बाबिल को अंदर लिया और दरवाजा बंद कर दिया..

आह्ह..!! अब मज़ा आएगा.. वैशाली ने सोचा..!! उसने एक नजर बाबिल की ओर देखा.. मैली सी टी-शर्ट और ट्रेक पेंट पहने खड़ा.. गोरा गुलाबी सा वह नेपाली लड़का.. वैशाली को तो पहली ही बार में पसंद आ गया था..

ज्यादा वक्त न गँवाते हुए वह उसे अपने बेडरूम मे ले गई.. बेडरूम में जाकर बाबिल वहीं गुड्डे के तरह खड़ा हो गया.. वैशाली की फितरत को तो वो उस दिन कविता के घर ही भांप गया था.. पहल तो वैशाल की तरफ से ही होना तय था..

वैशाली ने बड़ी ही शरारती नज़रों से बाबिल की ओर देखा.. और एक मदहोश अंगड़ाई लेकर उसने अपना टॉप उतार दिया... उसके बड़े बड़े स्तन जो लाल रंग की जालीदार ब्रा में कैद थे.. बाबिल की तरफ धुंडीयां तानकर तांकने लगे.. बाबिल हक्काबका होकर वैशाली के गदराए यौवन को देखता रहा..

"अपने हाथों से पकड़कर दबा इन्हें" वैशाली ने उसे आमंत्रित करते हुए कहा

इस पर जब बाबिल की हिम्मत न हुई तो वैशाली ने अपने दोनों हाथों से पकड़कर बाबिल का मुंह अपनी लंबी क्लीवेज पर दबा दिया..

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आह्ह..!! परफ्यूम और पसीने की मिश्रित गंध से सने स्तनों के बीच अपना मुंह दबा पाकर बाबिल के तो वारे न्यारे हो गए.. उसने अपनी दोनों हथेलियों को वैशाली के मांसपिंडों पर दबाया.. इतने नरम और गरम..!!! उफ्फ़..!! धीरे धीरे उसने स्तनों का मर्दन शुरू किया और वैशाली मदहोश होकर.. आँखें बंद कर आनंद लेने लगी..

एक ही पल में वैशाली का हाथ बाबिल के ट्रेकपेंट के ऊपर से ही उसके मस्त लंड को सहलाने लग गया.. इससे पहले की बाबिल संभल पाता, वैशाली ने एक झटके में उसका पेंट, जांघिये समेट घुटनों तक उतार दिया.. और बाबिल के तने हुए हथियार के सामने उकड़ूँ अवस्था में बैठ गई


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प्यारे गुलाबी लंड की मोटाई को अपनी मुठ्ठी में पकड़कर, उभरी हुई नसों को वह बेतहाशा चाटने लगी.. बाबिल के तो जैसे होश ही उड़ गए.. चमकते हुए गुलाबी टोपे के मूत्र-छेद पर अपनी जीभ की नोक से चाटना शुरू कर वैशाली ने कुछ ही पलों में उस लंबे लंड को अपने कंठ तक उतार दिया..!!


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बहुत ही कामुक गरमागरम और उत्तेजना से भरपूर अपडेट है वैशाली की वासना की आज एक बार फिर से भड़क गई है वह कविता को फोन कर बाबिल का जुगाड करती है शीला को जैसे तैसे करके बाजार भेज देती है लेकिन जैसे ही बाबिल के साथ मजा करने की शुरुआत हो रही होती है तभी गेट की घंटी बजती है दोनों के साथ KLPD हो गया
 

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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

पिछले अपडेट में हमने देखा कि कैसे शीला ने अपनी शातिर चालों से पिंटू और कविता को बेनकाब करके वैशाली और पीयूष का रास्ता साफ कर दिया। लेकिन इस बार कहानी ने और भी गहरे और खौफनाक मोड़ लिए हैं। आइए, इस जटिल गाथा के सभी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं..

रात के अंधेरे में फाल्गुनी अपने पड़ोसी मदन अंकल को रूखी और चम्पा नामक दो महिलाओं के साथ अत्यंत उत्तेजक हालत में देखती है। यह दृश्य उसे बेहद गर्म कर देता है। वापस आकर वह अपनी सहेली मौसम को अपने सभी राज़ बताती है.. राजेश सर, मदन अंकल और शीला भाभी के साथ अपने संबंधों के बारे में, और आज रात का खुलासा भी। मौसम, जो पहले से ही फाल्गुनी के अपने पिता के साथ संबंधों के बारे में जानती है, इन बातों से हैरान नहीं होती, बल्कि वासना से भर जाती है।

फाल्गुनी मौसम को रसिक दूधवाले के बारे में बताती है, जिसके पास बहुत बड़ा और मोटा लिंग है। मौसम उसे देखने के लिए उत्सुक हो जाती है। फाल्गुनी रसिक को बुलाती है, और मौसम बाथरूम में छिपकर उनकी कामुक क्रियाओं को देखने का फैसला करती है। जब रसिक आता है, तो फाल्गुनी उसके साथ अत्यंत उत्तेजक और स्पष्ट यौन संबंध बनाती है.. वह उसके विशाल लिंग को मुँह में लेती है और फिर उसके साथ ज़बरदस्त संभोग करती है। मौसम यह सब छिपकर देखती है और बेहद उत्तेजित हो जाती है। संभोग के बाद, रसिक चला जाता है और मौसम बाहर आती है। वह फाल्गुनी से कहती है कि रसिक के लिंग को देखकर वह इतनी गर्म हो गई है कि अब उसे भी किसी असली मर्द की ज़रूरत है.. और फाल्गुनी उसे बिस्तर पर गिरा देती है, जिससे संकेत मिलता है कि वे दोनों अब आपस में यौन क्रिया करने वाली हैं।

उस भयानक रात को गुज़रे तीन दिन हो चुके हैं, लेकिन वैशाली के फ्लैट में पसरा सन्नाटा अभी भी किसी क़ब्रिस्तान जैसा भारी, वीरान और दम घोंटने वाला है। घर की हर दीवार, हर कोना उस रात की चीखों, टूटे हुए गुरूर और विश्वासघात की गवाही दे रहा है। दिन के उजाले में भी उस घर के भीतर एक अजीब सी, घुटन भरी अंधियारी छाई रहती है, मानो समय वहीं ठहर गया हो।

दूसरी तरफ, पिंटू शहर के बाहरी इलाके में हाईवे के किनारे बने एक सस्ते होटल में छिपा है। रंगे हाथों पकड़े जाने की भयानक शर्म, अपनी खोखली मर्दानगी का सरेआम पर्दाफाश और वैशाली के उस ज़ोरदार तमाचे की गूँज ने उसे अंदर तक चीर कर एक ज़िंदा लाश बना दिया है। शराब और सिगरेट की बदबू के बीच, फर्श पर बिखरी खाली बोतलें और राख से भरी ऐशट्रे उसकी हताशा का जीता-जागता सबूत हैं। हर बार जब वह अपनी सूजी हुई आँखें बंद करता है, उसे वैशाली की नफरत से भरी आँखें, उसके तमाचे का दर्द और पीयूष की तिरस्कार भरी हँसी दिखाई देती है। उसका सारा अहंकार उसी रात उस फ्लैट की ज़मीन में दफन हो चुका है।

दूसरी ओर, अपनी जीत के गुरूर में डूबी शीला को पीयूष का फोन आता है। पीयूष तलाक के कागज़ लेकर कविता के सामने जाने और वैशाली से मिलने की जल्दी में है, लेकिन शीला उसे रोकती है। वह समझाती है कि अगर पीयूष ने जल्दबाजी की तो कविता को विक्टिम कार्ड खेलने का मौका मिल जाएगा। शीला उसे धीरज रखने की सलाह देती है.. कविता को उसकी चुनी हुई दुनिया में तड़पने दो, और वैशाली का घाव अभी हरा है, इसलिए उसे और समय चाहिए। शीला वादा करती है कि वह सही वक़्त पर वैशाली को खुद पीयूष के पास लेकर आएगी। पीयूष, जो अब तक अपने गुस्से और चाहत में अंधा था, शीला की इस बिछाई हुई शतरंज में पूरा दम देखता है और उसके इशारों पर चलने को राज़ी हो जाता है।

लेकिन जब कविता शीला को फोन करके मदद माँगती है.. क्योंकि पिंटू उसका फोन नहीं उठा रहा और वह पूरी तरह अकेली है.. तो शीला का रवैया बिल्कुल बदल जाता है। वह अपनी आवाज़ से सारी मिठास निचोड़कर कविता को साफ-साफ कहती है कि अब यह उसकी अपनी जंग है। शीला समाज, मर्यादा और अपनी बेटी का बहाना बनाकर कविता को ठुकरा देती है। कविता को उसी पल एहसास होता है कि वह कभी शीला की दोस्त या राज़दार नहीं थी.. वह महज़ एक कठपुतली थी, एक मोहरा जिसे शीला ने पीयूष के घर से अपनी बेटी का रास्ता साफ करने के लिए इस्तेमाल किया था। और अब, जब काम निकल गया, तो शीला ने उसे कचरे की तरह फेंक दिया। कविता के पास अब न गुरूर बचा है, न पीयूष का महल, न पिंटू का सहारा, और न शीला का ज़हरीला साथ.. वह पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है।

अपनी जीत का जश्न मनाते ही शीला के पेट के निचले हिस्से में एक जानलेवा ऐंठन उठती है। उसे सुबह अपनी पैंटी पर असामान्य, गाढ़ा खून भी देखने को मिला था.. हालाँकि उसका मेनोपॉज़ दस साल पहले ही हो चुका था। वह दर्द को स्ट्रेस और उम्र का तकाज़ा बताकर अनदेखा करने की कोशिश करती है, लेकिन उसका अपना दिमाग उसे चीख-चीख कर बता रहा है कि यह सिर्फ थकान नहीं है, बल्कि उसके शरीर के भीतर कुछ गहरा उबल रहा है।

इसी बीच मदन का फोन आता है, जो उसकी वापसी के लिए उत्सुक है, लेकिन शीला उसे टालकर वैशाली के घर में अपनी उपस्थिति को सही ठहराती है। फोन रखते ही वह फिर से दर्द से दोहरी हो जाती है। जब वैशाली कॉफी लेकर आती है और अपनी माँ की यह हालत देखती है, तो वह डॉक्टर के पास चलने पर अड़ जाती है.. लेकिन शीला डरती है कि टेस्ट में कुछ न कुछ निकलेगा, इसलिए वह टालने की कोशिश करती है।

तभी वैशाली के फोन की घंटी बजती है.. पिंटू के पिता का फोन है। वे बताते हैं कि वे कल सुबह की फ्लाइट से आ रहे हैं, हालाँकि वे अगले हफ्ते आने वाले थे। वैशाली, जो अब पुरानी, मीठी और सहमी हुई बहू नहीं रही, बल्कि एक सख्त, बेरुख और बगावती औरत बन चुकी है, उन्हें बिना किसी गर्मजोशी के कैब लेकर आने को कहती है और फोन काट देती है।

वह शीला को बताती है कि पिंटू ने शायद अपने माँ-बाप को कोई उल्टी-सीधी कहानी सुनाई है, या वे इमोशनल ब्लैकमेल के लिए आ रहे हैं। लेकिन वैशाली साफ कर देती है.. "कल इस घर में बहुत बड़ा तमाशा होने वाला है, और इस बार तमाशा मैं करूँगी!" उसकी आँखों में अब नफरत और बगावत की आग जल रही है, जो शीला ने खुद बड़ी चालाकी से उसमें भड़काई थी।

पिंटू के माता-पिता के कीचड़ भरे ड्रामे और अपनी बिगड़ती सेहत से बचने के लिए शीला वैशाली के घर से लौटने का फैसला करती है। वह तसल्ली देती है कि अब पीयूष के करोड़ों के महल और वैशाली के बीच का रास्ता बिल्कुल साफ है, कोई काँटा नहीं बचा है। लेकिन जब वह कैब में बैठकर वैशाली का घर छोड़ती है, तो उसके पेडू में सुइयों जैसी चुभन और पीठ का भयंकर दर्द उसे चीर रहा होता है।

शहर की चमचमाती रोशनियों के बीच, वह अपनी जीत का परचम लहराकर, अपना मास्टरस्ट्रोक खेलकर वापस जा रही थी.. लेकिन खेल अभी खत्म नहीं हुआ था। बल्कि, कहानी अब एक ऐसे खौफनाक मोड़ पर पहुँच गई थी जहाँ मोहरे नहीं, बल्कि बिसात बिछाने वाली खुद मात खाने वाली थी।

देखते हैं इस साजिश, बदले और वासना की दुनिया में अब कौन-सा नया तूफान उठता है…
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आज मौसम का मन फुदक रहा था.. कल फाल्गुनी को रसिक के साथ चुदते देख उससे रहा नहीं गया और फाल्गुनी को बोलकर रसिक को आज रात फिर बुलावा भेजा.. मौसम आज रसिक के तगड़े मूसल का स्वाद लेना चाहती थी.. वह उत्तेजित तो थी पर साथ ही उसे डर भी लग रहा था

रसिक के आने से पहले दोनों सहेलियों ने तीन तीन पेग शराब पी रखी थी.. वैसे मौसम का ज्यादा मन नहीं था पीने का पर फिर भी उसने व्हिस्की पी ली ताकि रसिक को झेलने की हिम्मत आ जाए.. अब तक व्हिस्की का सुरूर उसके सिर पर चढ़ चुका था

कुछ ही देर में रसिक आ पहुंचा.. फाल्गुनी ने उसे सामने वाले सोफ़े पर बैठने को कहा। रसिक अपनी फटी आँखों से इन दोनों लड़कियों को शराब पीते देखता रहा.. मौसम तो रसिक को देखकर ऐसे शरमा रही थी जैसे नई नवेली दुल्हन हो..

"मैडम, मैं भी एकाद गिलास पी लूँ?" महंगी शराब की बोतल देखकर रसिक के मुंह में पानी आ गया

"तुम पी लेना.. पर अभी नहीं.. सब खत्म होने के बाद.. अब अंदर चलें?" फाल्गुनी ने किसी मालकिन के अंदाज में खड़े होते हुए कहा.. वह जानती थी की अगर इस रसिक नाम के सांड के पूरे मजे लेने हो तो उसे शुरू से ही काबू में रखना जरूरी था। आज बात केवल उसकी नहीं थी, मौसम भी शामिल थी। जो की पहले से ही थोड़ी डरी हुई थी.. उसके आत्मविश्वास के लिए यह जताना जरूरी था की रसिक उसके काबू में है..

रसिक खड़ा हुआ.. और गुड्डे की तरह फाल्गुनी के पीछे पीछे बेडरूम की तरफ जाने लगा

"तू क्यों यहाँ बैठी है..!! चल अंदर..!!" फाल्गुनी ने मौसम से कहा.. जो अब भी सोफ़े पर बैठे हुए रसिक की दोनों टांगों के बीच देख रही थी

"उम्म.. वो.. पहले तुम चली जाओ.. मैं फिर बाद में.." मौसम की जबान लड़खड़ा रही थी.. नशे से और डर से भी..!!

"बाद में.. वाद में कुछ नहीं.. चल अभी" कहते हुए फाल्गुनी ने मौसम को हाथ पकड़कर सोफ़े से खड़ा कर दिया और अपने साथ खींच लिया..

छोटी से स्कर्ट पहने मौसम की जांघ, सोफ़े से उठते हुए खुल गई.. मुलायम गोरी और चिकनी जांघ को देख रसिक के मुंह में पानी आ गया.. वह मन ही मन ऊपरवाले का शुक्रियादा कर रहा था की उसे एक साथ दो जवान लड़कियों को साथ में भोगने का अवसर मिला

तीनों अंदर बेडरूम में पहुंचे।

"अब तुम कपड़े उतारकर यहाँ बैठ जाओ" बेड की ओर इशारा करते हुए फाल्गुनी ने रसिक से कहा

रसिक ने पहले अपनी कमीज उतारी और फिर पतलून.. केवल अंडरवेयर पहने हुए वो बेड के कोने पर बैठ गया.. जांघिये के बीचोंबीच उसका लंड इतना बड़ा उभार बना रहा था की मौसम तो देखकर ही सिसक उठी

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बेड की एक तरफ मौसम तो दूसरी तरफ फाल्गुनी खड़ी थी.. बीच मे रसिक बैठा था.. लैम्प की रोशनी मे उसका काला विकराल बदन चमक रहा था.. उस कसरती बदन का वैभव देखकर फाल्गुनी की आँखें फटी की फटी रह गई.. अब तक पॉर्न फिल्मों मे जिन कल्लुओ को देखा था बिल्कुल वैसा ही शरीर था रसिक का.. काला गठीला बदन.. छाती पर ढेर सारे घुँघराले बाल.. आग मे तांबे की तप रहा शरीर.. चौड़े मजबूत कंधे.. बड़े बड़े डोले.. फाल्गुनी के साथ साथ मौसम की जांघों के बीच भी गर्माहट होने लगी.. उसे देखकर मौसम सोच रही थी.. रोज तो एकदम गंदा बदबूदार होता है रसिक.. आज तो साफ सुथरा लग रहा है.. शायद अभी नहाया होगा वो.. !!

रसिक: "आप दोनों खड़े क्यों हो?? बैठिए यहाँ" कहते हुए रसिक बेड से खड़ा होकर मौसम की ओर आगे बढ़ा.. मौसम घबराकर तुरंत बेड पर बैठ गई.. और उसके पीछे पीछे फाल्गुनी भी जा बैठी.. रसिक उनके सामने पहाड़ की तरह खड़ा था.. रसिक के बदन को देखकर तेज ए.सी. की ठंडी हवा के बीच भी दोनों की ठंडी गायब हो चुकी थी।

सफेद रंग के जांघिये से रसिक के लोडे का उभार दिख रहा था फाल्गुनी को.. रसिक का ध्यान मौसम की कमसिन जवानी पर था.. क्योंकि फाल्गुनी के जिस्म को तो वो पिछली रात ही रौंद चुका था.. अब वो धीरे धीरे चलते हुए मौसम के पास आकर खड़ा हो गया.. और बोला

रसिक: "आपको आज दरवाजे के पीछे छुपकर नहीं देखना पड़ेगा.. शांति से मन भरकर देख लीजिए मेरा.. "

सुनते ही मौसम के चेहरे से नूर गायब हो गया..!! मतलब रसिक को पता था की वो बाथरूम के दरवाजे के पीछे छुपकर सब देख रही थी.. फाल्गुनी भी पहले चोंक उठी और फिर मुस्कुराने लगी

मौसम से सिर्फ एक कदम दूर खड़ा था रसिक.. उसका लंड ऐसा उभार बना रहा था.. की मौसम चाहकर भी अपनी नजरें फेर नहीं पाई.. वो डर रही थी.. कहीं ये राक्षस उसे नोच न खाए.. उसने रसिक के लंड से नजरें हटा ली..

रसिक अब फाल्गुनी की ओर मुड़ा.. फाल्गुनी अत्यंत रोमांचित होकर रसिक के तंबू को देख रही थी..

रसिक: "आह्ह मैडम.. गजब की छातियाँ है आपकी.. वाह.. !!" रसिक के मुख से कामुक उद्गार निकल गए

इतने करीब से रसिक का बाम्बू देखकर फाल्गुनी की पुच्ची मे गजब की चुनमुनी होने लगी.. वो रसिक के लंड को चड्डी के अंदर से निकालने के बेकरार थी पर पहल करने से डर रही थी

रसिक अब फाल्गुनी की इतने करीब आ गया की उसके चेहरे और रसिक के लंड के बीच अब सिर्फ एक इंच की ही दूरी रह गई.. फाल्गुनी ने घबराकर मुंह फेर लिया.. और लंड का उभरा हुआ हिस्सा.. फाल्गुनी के गालों के डिम्पल पर जा टकराया..

रसिक अब फिर से मौसम के पास आया.. और लंड को चड्डी के ऊपर से ही अपनी मुठ्ठी मे पकड़कर मौसम को दिखाने लगा.. उस लंड का भव्य आकार देखकर मौसम की पेन्टी गीली हो गई.. !!

रसिक अब मौसम और फाल्गुनी के बीच बेड पर बैठ गया.. उसकी जांघें दोनों की जांघों को छूने लगी.. और दोनों को वह स्पर्श होते ही ४४० वॉल्ट का करंट सा लग गया..

मौसम और फाल्गुनी एक दूसरे की आँखों मे देखने लगी.. फाल्गुनी ने एक शरारती मुस्कान देकर मौसम को आँख मारते हुए नीचे देखने को कहा

रसिक के अन्डरवेर के साइड से.. खड़ा हुआ लंड.. बाहर झाँकने लगा था.. उसका लाल टोपा देखकर मौसम कांपने लगी.. जैसे बिल के अंदर से सांप बाहर निकला हो.. ऐसा लग रहा था रसिक का लंड

दोनों के कंधों पर एक एक हाथ रखते हुए रसिक ने कहा "शर्माने की जरूरत नहीं है.. आप दोनों खुलकर जो भी करना है कर सकते हो"

फिर उसने मौसम की ओर घूमकर कहा "मैडम, अब और कितना तड़पाओगी इसे?? अब तो महरबानी कर दो" कहते हुए मौसम का हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया उसने

मौसम थरथर कांपने लगी.. उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसका हाथ लोहे के गरम सरिये पर रख दिया हो.. वो हाथ खींचने गई पर रसिक ने राक्षसी ताकत से उसकी कलाई को पकड़ रखा था.. आखिर मौसम ने अपनी मुठ्ठी मे उसका लंड पकड़ ही लिया.. !! अभी भी उसकी हथेली और लंड के बीच मे अन्डरवेर का आवरण था पर.. जैसे हिंग-जीरे के छोंक की खुशबू से खाने के स्वाद का पता लग जाता है.. वैसे ही लंड के आकार से उसकी ताकत और चोदने की क्षमता का अंदाजा लग रहा था..

फाल्गुनी: "गजब का है.. आज तो कल से भी मोटा लग रहा है ये तो"

मौसम ने फाल्गुनी की ओर देखा.. फाल्गुनी आँखें बंद कर अपने स्तनों का खुद ही मर्दन करते हुए मजे कर रही थी.. रसिक ने फाल्गुनी का हाथ उसके स्तनों से खींचते ही फाल्गुनी ने आँखें खोल दी

"अपने हाथों को क्यों तकलीफ दे रही हो.. !! मैं हूँ ना.. !! आप सिर्फ इसे संभालो.. मैं आपके दोनों बबलों को संभाल लूँगा" रसिक ने कहा

रसिक ने फाल्गुनी का भी हाथ खींचा और मौसम के हाथ के साथ साथ अपने लंड पर रख दिया.. अब मौसम की शर्म भी थोड़ी घटने लगी.. फाल्गुनी और मौसम की हथेलियों के बीच रसिक का लोडा मचलने लगा..

फाल्गुनी अब लंड को खोल कर देखने के लिए बेचैन हो रही थी.. बेहद उत्तेजित होकर उसने सिसकियाँ लेते हुए रसिक की अन्डरवेर मे हाथ डाला और एक झटके मे लंड को बाहर निकाल दिया.. !!!

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"ओ बाप रे.. !!" लंड का आकार और कद देखकर फाल्गुनी के मुंह से निकल गया

फाल्गुनी इतनी जोर से चीखी थी.. मौसम आसपास देखने लगी.. कहीं किसी ने सुन तो नहीं लिया.. !!

रसिक ने मौसम का सुंदर चेहरा ठुड्डी से पकड़कर अपनी ओर फेरते हुए कहा "ओह्ह मैडम.. कितनी सुंदर हो आप.. एकदम गोरी गोरी.. इन गोरे गालों को चबा जाने का मन करता है मेरा"

सुनकर मौसम शरमा गई.. उसका शरीर अब भी कांप रहा था.. उसका मन अभी भी यह सोच रहा था की रसिक को यहाँ बुलाने के लिए कहकर कहीं उसने गलती तो नहीं कर दी.. !!

फाल्गुनी अब पूरी तरह बेशर्म होकर रसिक के लंड की चमड़ी उतारकर आगे पीछे करते हुए हिलाने लगी.. रसिक के लंड को महसूस करते हुए वह पॉर्न फिल्मों मे देखे अफ्रीकन मर्दों के लोडॉ को याद करने लगी.. रसिक ने मौसम के टॉप पर से उसके स्तनों को दबा दिया.. मौसम से अब इतनी अधिक उत्तेजना बर्दाश्त नहीं हो रही थी.. वो खड़ी हो गई और बेड के साइड पर चली गई..

मौसम: "रसिक, तुम्हें जो भी करना हो वो फाल्गुनी के साथ करो.. मुझे कुछ नहीं करवाना"

रसिक: "मैडम, आप तो मुझे पहले से बहोत पसंद हो.. ऐसा क्यों कर रही हो?? बस एक बार मुझे मेरी इच्छा पूरी कर लेने दीजिए.. !! आप पहले कविता मैडम के घर आती थी तब से देखता आया हूँ.. आपको एक बार नंगा देखने की बड़ी इच्छा है मुझे.. आह्ह.. देखिए.. ये आपको देखकर कैसे खड़ा हो गया है.. !!"

फाल्गुनी रसिक के मोटे लंड को दबाते हुए बोली "हाँ यार मौसम.. गजब का टाइट हो गया है.. !!"

मौसम: "फाल्गुनी प्लीज.. डॉन्ट इनवॉल्व मी.. यू इन्जॉय विद हीम.. !!" उनकी अंग्रेजी रसिक के पल्ले नहीं पड़ी..

फाल्गुनी: "ठीक है यार.. जैसी तेरी मर्जी.. आज तेरे कहने पर ही तो उसे बुलाया था.. तुझे नहीं करना तो कोई बात नहीं"

फिर रसिक की ओर मुड़कर फाल्गुनी ने कहा "ओह रसिक.. तुम मेरे कपड़े उतारो... मुझे नंगी कर दो" फाल्गुनी ने अपनी बीभत्स मांग रखकर रसिक का ध्यान अपनी ओर खींचा

मौसम के सामने देखते हुए रसिक ने फाल्गुनी को अपनी जांघों पर सुला दिया.. फाल्गुनी ओर बेचैन हो गई... उसका पतला सा टॉप ऊपर कर.. अपने हाथ बाहर निकालकर.. टॉप उतार दिया.. और कमर के ऊपर से नंगी हो गई.. !! उसके मदमस्त चुचे देखकर रसिक लार टपकाने लगा.. दोनों स्तनों को बेरहमी पूर्वक आंटे की तरह गूँदने लगा वो.. और फिर अपना एक हाथ उसने फाल्गुनी की चूत वाले हिस्से पर रखकर दबाया.. फाल्गुनी की चूत काफी मात्रा मे पानी छोड़ रही थी..

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जैसे जैसे फाल्गुनी की उत्तेजना बढ़ती गई वैसे वैसे उसकी हरकतें भी बढ़ने लगी.. रसिक की गोद मे उसने करवट लेकर अपने मुंह को उसके लंड के करीब ले गई.. यह अवस्था चूसने के लिए आदर्श थी.. फाल्गुनी अब पागलों की तरह उस मूसल लंड को चूमने लगी.. लंड को मूल से लेकर टोपे तक अपनी जीभ फेरते हुए उसने अपनी लार से लंड को गीला कर दिया..

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अब तक आक्रामकता से फाल्गुनी के बदन को रौंद रहा रसिक.. फाल्गुनी के चाटने के कारण बेबस हो गया.. उसकी हरकतें धीमी पड़ने लगी.. और अब फाल्गुनी आक्रामक होने लगी.. जैसे जैसे वो चूसती गई वैसे वैसे रसिक आनंद के महासागर मे गोते खाने लगा था..

अब तक जितनी भी ब्ल्यू-फिल्में देखकर ब्लो-जॉब की कला सीखी थी.. वह सारी उसने रसिक का लंड चूसने मे लगा दी थी.. फाल्गुनी का यह स्वरूप देखकर मौसम भी हतप्रभ हो गई थी.. फाल्गुनी जिस तरह से लंड को मजे लेकर चूस रही थी.. वो देखकर मौसम के लिए भी अपने आप को कंट्रोल मे रखना मुश्किल हो रहा था.. आखिर मौसम खुद ही स्कर्ट के ऊपर से अपनी चूत को दबाने लगी..

"ऐसे नहीं मैडम.. कपड़े उतार दीजिए ना.. !! आप कहोगे तो मैं हाथ भी नहीं लगाऊँगा.. पर एक बार आपका नंगा बदन देखने तो दीजिए.. !!" मौसम को ऐसा करने मे कोई दिक्कत नहीं लगी.. जहां तक रसिक उसके जिस्म को हाथ नहीं लगाता उसे कोई प्रॉब्लेम नहीं थी.. और वैसे भी वो जिस हद तक गरम हो चुकी थी.. वह खुद भी कपड़े उतारना चाहती थी

एक के बाद एक.. मौसम ने अपने सारे कपड़े उतार दीये.. और सर से पाँव तक नंगी होकर.. बेड के कोने पर बैठ गई.. बेड की खुरदरी रस्सी उसकी कोमल गांड पर चुभ रही थी.. उसका गोरा संगेमरमरी बदन आग मे तांबे की तरह चमक रहा था..

रसिक का लंड मुंह से बाहर निकालकर फाल्गुनी ने कहा "यार मौसम, ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा.. चूत मे ना लेना हो तो ना सही.. एक बार चूसकर तो देख.. इतना मज़ा आ रहा है यार.. !!" बड़े ही कामुक अंदाज मे रसिक का गीला लंड पकड़कर हिलाते हुए वो बोली "एक बार देख तो सही.. !! घोड़े के लंड जैसा मोटा और तगड़ा है"

मौसम ने जवाब नहीं दिया.. पर उसकी आँखों मे हवस का जबरदस्त खुमार देखते ही बनता था..

फाल्गुनी का सिर अपनी गोद से हटाकर बेड पर टिकाकर रसिक खड़ा हो गया.. और अपनी अन्डरवेर उतार दी.. उसका विशाल लंड.. तगड़ा शरीर.. और काला रंग.. लैम्प की रोशनी मे चमककर डरावना सा लग रहा था.. मौसम ने सोचा की आदिकाल मे असुर ऐसे ही दिखते होंगे.. !! अब फाल्गुनी भी बेड से खड़ी हो गई.. और अपना गाउन और पेन्टी उतारकर साइड मे रख दिया.. और फिर रसिक की छाती के साथ अपने स्तनों को दबाते हुए उसे चूमने लगी.. नाग की तरह फुँकार रहे लंड को पकड़कर वो हिला भी रही थी..

रसिक ने फाल्गुनी के गुलाबी अधरों को चूम लिया.. इतनी लंबी और उत्तेजक किस थी की देखकर ही मौसम पिघल गई.. उसकी सांसें भारी हो गई..

मौसम की इस अवस्था को भांपकर रसिक ने कहा "मैडम.. आप ऐसे बैठे रहेगी तो कैसे मज़ा आएगा?? चोदने न दो तो कोई बात नहीं... एक बार चाटने तो दीजिए.. उसमें तो आपको ही मज़ा आएगा"

फाल्गुनी ने रसिक का लंड हिलाते हुए कहा "हाँ यार.. चाटने तो दे.. मज़ा आएगा तुझे.. बेकार शरमा रही है तू.. इतना डेरिंग कर ही लिया है तो थोड़ा और सही.. सामने इतना मस्त लंड हो और तू मुंह धोने जाने की बातें मत कर"

वैसे भी मौसम मन ही मन पिघल रही थी.. ऊपर से रसिक और फाल्गुनी के आग्रह ने उसके विरोध को ओर कमजोर किया

"ऐसा नहीं है यार.. मैं देख तो रही हूँ.. आप दोनों करते रहो जो भी करना हो.. मेरा मन करेगा तो मैं जुड़ जाऊँगी.. पर अभी नहीं.. " मौसम ने ऊटपटाँग जवाब देकर खिसकना चाहा

फाल्गुनी रसिक को छोड़कर मौसम के करीब आई.. उसके नंगे स्तनों के बीच मौसम का चेहरा रगड़कर उसे चूम लिया और बोली "मादरचोद.. नखरे मत कर.. चल चुपचाप.. !!" कहते हुए वो मौसम को घसीटकर रसिक के पास ले आई और उसे कंधों से दबाकर घुटनों के बल नीचे बीठा दिया.. और खुद भी साथ बैठ गई..

रसिक अब पैर चौड़े कर अपने हाथ को पीछे ले जाकर विश्राम की पोजीशन मे खड़ा हो गया.. मौसम और फाल्गुनी दोनों के चेहरों के बीच उसका तगड़ा लंड सेंडविच होने के लिए तैयार था.. पर मौसम उसे हाथ लगाने से झिझक रही थी.. फाल्गुनी ने जबरन मौसम के दोनों हाथों को पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिया.. और मौसम उन्हें मसलने लगी.. फाल्गुनी की निप्पल एकदम कडक बेर जैसी हो गई थी.. अपनी पहली उंगली और अंगूठे के बीच उस सख्त निप्पल को दबाकर खींचते हुए उसने पहली बार फाल्गुनी के होंठों के करीब आना चाहा.. धीरे धीरे माहोल मे ढल रही मौसम को देखकर फाल्गुनी ने दोगुने उत्साह से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दीये.. मौसम फाल्गुनी के होंठों को चूसने लगी.. अपनी जीभ उसकी जीभ से मिलाकर उसका स्वाद चखने लगी..

मौसम इस लिप किस मे इतना खो गई थी.. तभी फाल्गुनी ने बड़ी ही चालाकी से रसिक का लँड दोनों के मुंह के बीच रख दिया.. लंड इतना कडक था की दोनों के होंठों को चीरकर आरपार निकल गया.. इतना कामुक द्रश्य था.. की मौसम ने पहली बार सामने से रसिक के सुपाड़े को पकड़ लिया.. मौसम के स्पर्श को पहचानकर रसिक बेहद खुश हो गया.. उसका सख्त तगड़ा लंड मौसम नाम की मोरनी को रिझाने के लिए नृत्य करने लगा.. फाल्गुनी ने उस लंड को थोड़ी देर तक चूसा और फिर मौसम को देते हुए कहा "ले, अब तू चूस.. !!"

मौसम ने मुंह फेर लिया "मुझे नहीं चूसना है.. !!"

फाल्गुनी: "अब नखरे छोड़ भी दे.. !!"

मौसम: "मुझे फोर्स मत कर फाल्गुनी.. तुझे जो करना हो कर.. चूसना हो तो चूस.. आगे पीछे जहां भी लेना हो ले.. तुझे कहाँ रोक रही हूँ मैं??"

फाल्गुनी अपना आपा खो बैठी "इतना मस्त लोडा मिला है मजे करने को.. और इस महारानी के नखरे ही खतम नहीं हो रहे है.. चल.. अब इसे चूस.. वरना तुझे उल्टा सुलाकर तेरी गांड मे दे दूँगी रसिक का लंड.. !!" मौसम के मुंह मे रसिक का लंड जबरदस्ती डालकर ही चैन लिया फाल्गुनी ने

"ओह्ह यस बेबी.. सक इट.. !!" फाल्गुनी मौसम को उकसाने लगी

मौसम को शुरू शुरू मे.. बड़ा अटपटा सा लगा.. पर वो खुद भी इतनी उत्तेजित थी की जो आदमी उसे देखकर ही पसंद नहीं था.. उसका लंड चूस रही थी.. थोड़ी देर के बाद फाल्गुनी ने मौसम को धकेल दिया और खुद चूसने लगी..

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काफी देर तक लंड की चुसाई के बाद फाल्गुनी ने लंड छोड़ा.. फिर मौसम को बेड पर लेटाकर रसिक को उसकी चूत चाटने का इशारा किया.. रसिक बावरा हो गया.. और अपनी पसंदीदा चूत पर टूट पड़ने के लिए तैयार हो गया..

मौसम की चूत पर रसिक की जीभ फिरते ही वो सिहर उठी.. सातवे आसमान पर उड़ने लगी मौसम.. उसकी निप्पलें टाइट हो गई.. और शुरुआत मे जांघें दबाकर रखने वाली मौसम ने खुद ही अपनी टांगें फैलाते हुए रसिक को चाटने मे आसानी कर दी..

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पैर चौड़े होते ही मौसम की नाजुक चूत के पंखुड़ियों जैसे होंठ खुल गए.. उसकी लाल क्लिटोरिस और छोटा सा छेद देखकर रसिक समझ गया की वो उसका लंड अंदर नहीं ले पाएगी..

मौसम की लाल क्लिटोरिस को होंठों के बीच दबाकर रसिक ने जब चूसा... तब उत्तेजित होकर मौसम अपनी गांड उछालकर गोल गोल घुमाते हुए ऊपर नीचे करने लगी.. आह्ह आह्ह आह्ह.. की आवाज़ें कमरे मे गूंजने लगी.. मौसम की चूत चाट रहे रसिक के लंड को फाल्गुनी बड़े ही प्यार से देख रही थी.. वो उसके लंड से कभी अपने गालों को रगड़ती तो कभी दो स्तनों के बीच उसे दबा देती..

"मैडम.. आप अपनी फैलाकर मेरे मुंह पर बैठ जाओ.. मज़ा आएगा.. मुझे उस तरह चाटना बहोत अच्छा लगता है" पतली सी मौसम के बदन को खिलौने की तरह उठाकर खड़ा कर दिया रसिक ने.. और खुद बेड पर लेट गया.. मौसम के गोरे कूल्हों पर हाथ फेरते हुए उसे अपने मुंह पर बीठा दिया रसिक ने..

मौसम की कोमल चूत के वर्टिकल होंठों को चाटते हुए अंदर घुसाने का सुराख ढूंढ रही थी रसिक की जीभ.. !! मौसम को तो जैसे बिन मांगे ही स्वर्ग मिल गया.. !! रसिक के प्रति उसके मन मे जो घृणा थी.. वो उत्तेजना की गर्मी से भांप बनकर उड़ गई.. !! आँखें बंद कर वो रसिक के मुंह पर सवारी कर अपनी चूत को आगे पीछे रगड़ रही थी.. ऐसा मौका दिलाने के लिए वो मन ही मन फाल्गुनी का आभार प्रकट करने लगी.. अगर फाल्गुनी ने इतनी हिम्मत न की होती.. तो ऐसा आनंद उसे कभी नहीं मिलता.. !! लंड तो लंड.. रसिक की तो जीभ भी कितनी कडक थी.. चूत की अंदरूनी परतों को कुरेद रही थी.. माय गॉड.. यह आदमी वाकई असुर योनि का लगता है.. इसकी जीभ तो लंड से भी ज्यादा खतरनाक है..

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मौसम का शरीर अकड़ने लगा. और उसने अपनी चूत की मांसपेशियों को जकड़ लिया.. रसिक की जीभ और तीव्रता से मौसम की चूत मे जितना अंदर जा सकती थी.. घुस गई.. !! दोनों तरफ आनंद की लहरें उठ रही थी.. दोनों हाथ ऊपर कर रसिक ने मौसम के नाजुक स्तनों को पकड़ लिया और दबाते हुए अपनी जीभ उसकी चूत मे नचाने लगा..

मौसम ने दोनों हाथ से रसिक का सर पकड़ लिया और अपनी चूत को ताकत के साथ उसकी जीभ पर दबाते हुए अपने शरीर को तंग कर दिया.. दूसरे ही पल.. रसिक का लोडा चूस रही फाल्गुनी के मुंह मे.. गाढ़े लस्सेदार वीर्य की पिचकारी छूटी.. फाल्गुनी इस प्रहार के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी.. वह उत्तेजित तो थी पर वीर्य को मुंह मे लेने की उसकी तैयारी नहीं थी.. उसने तुरंत लंड मुंह से बाहर निकाल दिया.. वीर्य थूक दिया और छी छी करते हुए खाँसने लगी..

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रसिक के चेहरे से उतरकर बेड के कोने पर बैठ गई.. फाल्गुनी के हाल पर हँसते हुए उसने रसिक के लंड की तरफ देखा.. बाप रे.. !! फाल्गुनी की लार और वीर्य से तरबतर लोडा, हर सेकंड पर एक झटका मार रहा था.. अद्भुत द्रश्य था.. !! फाल्गुनी और मौसम दोनों की नजर उस आसुरी लंड पर चिपक गई थी.. मौसम ऐसे देख रही थी जैसी किसी दुर्लभ प्रजाति के प्राणी को देख रही हो.. और फाल्गुनी थोड़ी सी नाराजगी से रसिक की तरफ देख रही थी

थोड़ी देर के बाद सब से पहले मौसम उठी और कपड़े पहनने लगी..

"अरे मैडम.. अभी से कपड़े पहनने लगी आप? अभी तो सिर्फ शुरुआत हुई है.. " रसिक खड़ा हो गया और मौसम के पीछे जाकर उसे अपनी बाहों मे जकड़कर स्तनों को दबाने लगा.. इस बार मौसम को रसिक के प्रति कोई घृणा नहीं हो रही थी.. पर फिर भी रसिक को अपने शरीर से दूर धकेलते हुए कहा "मुझे ठंड लग रही है.. जरूरत पड़ी तो फिर से उतार दूँगी.. अभी पहन लेने दो मुझे.. और पहले उस रंडी की चूत चोदकर ढीली कर दो.. कब से मचल रही है चुदवाने के लिए" मौसम अब बेझिझक होकर बोलने लगी थी

फाल्गुनी खुश होकर बोली "अरे वाह.. अब तो तू भी एकदम खुल गई मौसम.. !!"

रसिक: "जब कपड़े ही उतर चुके हो.. फिर किस बात की झिझक.. !! क्यों सही कहा ना मैडम.. !!"

रसिक अब बेड पर बैठ गया और मौसम तथा फाल्गुनी दोनों को अपनी एक एक जांघ पर बीठा दिया.. और फिर उनकी काँखों के नीचे से हाथ डालकर दोनों को स्तनों को दबाने लगा

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फाल्गुनी रसिक के आधे-मुरझाए लंड से खेलने लगी। फाल्गुनी के हाथों के जादू से रसिक का लंड फिर से खड़ा हो गया.. उसका विकराल रूप देखकर मौसम फिर से घबरा गई "देख तो सही फाल्गुनी.. इसके लंड से मेरी गुलाबी कोमल चूत की धज्जियां उड़ जाएगी.. !!"

रसिक: "आपको इतना डर हो तो मैं वादा करता हूँ.. के कभी अंदर डालने के लिए मजबूर नहीं करूंगा आपको.. मुझे बस अपनी चूत पर लंड रगड़ने देगी तो भी मेरा निकल जाएगा.. !!"

मौसम ने जवाब नहीं दिया

अब फाल्गुनी ने रसिक के लंड को अपनी चिपचिपी बुर पर रगड़ना शुरू कर दिया था.. फाल्गुनी के इस साहस मे मदद करने के लिए रसिक की जांघ से उठकर, बेड के छोर पर खड़ी हो गई मौसम

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रसिक की मोटी जांघों की दोनों और अपने पैर फैलाकर बैठते हुए.. नीचे हाथ डालकर.. अपनी जामुन जैसी क्लिटोरिस पर रगड़ रही थी फाल्गुनी.. स्त्री के शरीर के सब से संवेदनशील हिस्से पर मर्द के जीवंत पौरुष-सभर अंग का गरमागरम स्पर्श होते ही, फाल्गुनी का बदन लहराने लगा..

उसके बदन मे कसाव आने लगा और साथ ही साथ उत्तेजना बढ़ने लगी.. उसका साहस भी अब एक कदम आगे बढ़ने लगा था.. उत्तेजना इंसान को साहसिक बना देती है.. फाल्गुनी ने रसिक का खंभे जैसा लंड अपनी बुर मे लेने के लिए कमर कस ली थी.. अपनी योनि के सुराख पर रसिक का लाल टमाटर जैसा सुपाड़ा टिकाते हुए उसने हल्के हल्के शरीर का दबाव बनाना शुरू किया.. योनिमार्ग के शुरुआती प्रतिरोध के बाद.. रसिक का सुपाड़ा अंदर धीरे धीरे घुस गया.. फाल्गुनी उस विकराल लंड को बड़ी मुश्किल से आधा ही ले पाई अंदर.. फाल्गुनी अब स्थिर हो गई.. शरीर का पूरा वज़न डालने के बावजूद लोडा ज्यादा अंदर नहीं जा पा रहा था.. उसकी चूत अपने महत्तम परिघ तक फैल चुकी थी.. इससे ज्यादा चौड़ी होना मुमकिन नहीं था..

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फाल्गुनी के चेहरे पर असह्य पीड़ा के भाव दिख रहे थे.. उसका बदन पसीने से तर हो रहा था..

"क्या हो रहा है तुझे फाल्गुनी? बाहर निकाल देना है... ?? कल तो बड़े मजे से लिया था तूने" फाल्गुनी को इस हाल मे देखकर.. घबराते हुए मौसम ने कहा..

फाल्गुनी ने टूटती हुई आवाज मे कहा.. "न.. नहीं.. कल तो लेटे लेटे लिया था.. आज ऊपर चढ़ी उसलिए दर्द हुआ पर.. इस दर्द को सहने के लिए.. तो मैं.. आह्ह.. तड़प रही थी.. मर जाने दे मुझे.. पर मैं इसे अब बाहर नहीं निकालूँगी.. ओह्ह.. मज़ा आएगा अब तो.. मौसम.. ओह माय गॉड.. क्या मस्त लंड है यार.. प्लीज.. जरा नीचे देखकर बता मुझे.. कितना अंदर गया और कितना बाकी है.. !!"

मौसम बेड के पास, रसिक की जांघों के बीच बैठ गई और देखने की कोशिश करने लगी.. पर उसे कुछ नजर नहीं आ रहा था..

मौसम: "कुछ दिख नहीं रहा है फाल्गुनी.. !!"

"एक मिनट मैडम.. " रसिक ने कहा.. और फाल्गुनी को कमर से पकड़कर वो बेड से खड़ा हो गया.. ऐसा करने से फाल्गुनी की चूत और फैल गई और लंड का अधिक हिस्सा अंदर घुस गया.. फाल्गुनी की चीख निकल गई... !!!!!

"ऊईईईईईई माँ.... !!!!!! मर गईई मम्मी.. रसिक बहोत दुख रहा है मुझे... आह उतार दे मुझे" फाल्गुनी की आँखों से आँसू बहने लगे

रसिक ने फाल्गुनी के चूतड़ों को अपने हाथों से सहारा देकर.. अपना लंड उसकी चूत से हल्का सा बाहर निकालकर फाल्गुनी को थोड़ी सी राहत दी.. फाल्गुनी की जान मे जान आई..

रसिक: "लीजिए मैडम... अब आपको दिखेगा.. " फूल की तरह उठा रखा था फाल्गुनी को रसिक ने

मौसम ने नीचे झुककर देखा.. अब लिंग-योनि की महायुति अब स्पष्ट नजर आ रही थी.. मौसम ने फाल्गुनी के चूतड़ों को जितना हो सकता था.. अपने हाथों से फैलाकर देखा.. देखकर मौसम की जुबान उसके हलक मे उतर गई... फाल्गुनी की चूत के अंदर रसिक का लंड बुरी तरह फंसा हुआ था.. वीर्य से भरे अंडकोश इतने मोटे मोटे नजर आ रहे थे.. फाल्गुनी की द्रवित हो रही चूत के रस से सराबोर होकर.. आग की रोशनी मे कंचे की तरह चमक रहे थे..

"अभी तो आधा ही अंदर गया है फाल्गुनी.. आधा बाहर है" मौसम ने रसिक के अंडकोशों पर हाथ फेर लिया.. और लंड के बाहर वाले हिस्से की मोटाई को हाथ लगाकर नापते हुए... घबराकर कहा "ओ बाप रे.. पूरा तो अंदर जाएगा ही नहीं.. फट जाएगी तेरी.. !!"

अपने राक्षसी हाथों मे फाल्गुनी को उठाकर आग की प्रदक्षिणा करते हुए हल्के हल्के चोदने लगा रसिक.. उसके हर नाजुक धक्के के साथ फाल्गुनी की सिसकियाँ और दर्द भरी कराहें निकलकर.. रात के अंधेरे मे ओजल हो रही थी.. बड़ा खतरनाक साहस कर दिया था फाल्गुनी ने.. अपनी हवस को संतुष्ट करने के लिए इंसान बड़े से बड़ा जोखिम उठाने को तैयार हो जाता है.. यह उसका प्रत्यक्ष उदाहरण था..

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मौसम बेड पर बैठे बैठे.. दोनों के कठिन पर कामुक मिलन को विस्मय भरी नज़रों से देख रही थी.. सुंदर बदन वाली फाल्गुनी को उचककर घूम रहे रसिक के हाथ के डोले फूल गए थे.. फाल्गुनी ने रसिक की गर्दन मे अपने दोनों हाथ पिरोते हुए अपना सारा वज़न उसके शरीर पर डाल दिया था.. रसिक और फाल्गुनी के होंठ बस चार-पाँच इंच के अंतर पर थे.. फाल्गुनी के मुलायम गुलाबी होंठों को अपना बनाने के इरादे से रसिक ने अपने खुरदरे काले होंठों से उसे चूम लिया.. और अनुभवहीनता से चूसने लगा.. वो ऐसे चूम रहा था जैसे पुंगी बजा रहा हो..

रसिक के चूमने के इस तरीके पर फाल्गुनी को हंसी आ गई.. पर वो हंसी ज्यादा देर तक टिकी नहीं.. क्योंकि रसिक को किस करना आता नहीं था और वो खुद भी यह जानता था.. अब तक उसने उस क्षेत्र मे ज्यादा संशोधन किया नहीं था.. जरूरत भी नहीं पड़ी थी.. जितनी औरतों से उसका पाला पड़ा था उन्हें चूमने से ज्यादा उसके लंड से चुदने में ज्यादा दिलचस्पी थी.. उसने एक विशेष इरादे से फाल्गुनी को किस किया था.. जो फाल्गुनी को जल्दी ही समझ आने वाला था..

फाल्गुनी की चूत के बाहर जो आधा लंड घुसना बाकी था.. उसे एक जबरदस्त धक्का देते हुए अंदर डालने के बाद.. फाल्गुनी जोर से चीख न सकें इसलिए रसिक ने उसके मुंह को पकड़कर.. फाल्गुनी के चूतड़ों के नीचे सपोर्ट देने के लिए रखे अपने दोनों हाथों को छोड़ दिया.. फाल्गुनी के भारी शरीर का वज़न लंड पर पड़ते ही.. लंड का चार से पाँच इंच हिस्सा अंदर घुस गया.. !!!!!

फाल्गुनी ऐसे फड़फड़ाते हुए तड़पने लगी जैसे मछली पानी से बाहर निकल ने पर फड़फड़ाती है.. रसिक की बाहों से छूटने के लिए जद्दोजहत करने लगी.. पर चूत के अंदर लंड.. नश्तर की तरह घुसे हुए उसे बहुत दर्द दे रहा था.. असह्य पीड़ा से कराहते हुए फाल्गुनी जरा सी भी हलचल करती तो उसका दर्द और बढ़ रहा था.. इसलिए अब वो हिल भी नहीं पा रही थी.. इसलिए फाल्गुनी ने रसिक के बालों को ताकत पूर्वक पकड़कर लीप किस तोड़ दी और रसिक के कंधे पर सिर रखकर.. फुटफुटकर रोने लगी.. !!!

"ओह्ह... रसिक... मैं मर जाऊँगी..मुझे नहीं कराना.. प्लीज.. बाहर निकाल.. बहोत दर्द हो रहा है.. मौसम यार.. जरा समझा रसिक को.. !!"

मौसम बेड पर बैठे बैठे एक लकड़ी की मदद से आग के अंदर लकड़ियों को सही कर रही थी.. बड़े ही आराम से उसने कहा "तुझे ही बड़ा शौक था उसका लेने का.. अब अपनी सारी तमन्ना पूरी कर.. !!"

"नहीं नहीं.. रसिक, मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा.. फट गई है मेरी.. मेरे शरीर के बीच से दो टुकड़े हो जाएंगे ऐसा लग रहा है मुझे.. प्लीज" फाल्गुनी ने दर्द भरी विनती से रसिक और उत्तेजित हो गया.. उसने फाल्गुनी को मौसम के बगल मे.. बेड पर लेटा दिया.. और उसकी दोनों टांगों को फैलाकर मौसम के स्तनों को दबाने लगा और बोला "कल तो बड़े आराम से लिया था.. मैडम, आप इसकी दोनों टांगों को चौड़ा पकड़ रखिए.. आज तो इनको पूरा मज़ा देकर ही दम लूँगा.. "

बड़ी ही स्फूर्ति से मौसम खड़ी हो गई और फाल्गुनी की दोनों टांगों को पकड़कर चौड़ा कर दिया.. पर ऐसा करते वक्त जांघों के बीच झूल रहे मस्त लंड को पकड़कर अपने मन की मुराद पूरा करना भूली नहीं.. वो भले ही चूत मे लेने के लिए समर्थ नहीं थी.. पर इस मन-लुभावन लंड को पसंद तो करने लगी थी.. मौसम का हाथ लंड को छूते ही.. जैसे नेवले को देखकर सांप सचेत हो जाता है.. वैसे ही रसिक का लंड ऊपर होकर आसपास देखने लगा

"ओह् भेनचोद... मैडम, आपके हाथ मे पता नहीं कौन सा जादू है.. हाथ लगते ही मेरा उछलने लगता है.. आह्ह मैडम, थोड़ा सहलाओ इसे.. आह आह मज़ा आ रहा है.. थोड़ा सा चूस भी लो मेरी रानी.. !!" सुनते ही मौसम की प्यारी सी चूत मे जबरदस्त खुजली होने लगी..

तभी रसिक ने मौसम को धक्का देकर फाल्गुनी के बगल मे सुला दिया.. और रसिक उन दोनों के बदन पर छा गया.. भले ही अब तक एक भी चूत मे लंड घुस नहीं सका था.. पर रसिक के विशाल शरीर के तले दोनों लड़कियां ढँक गई थी.. फाल्गुनी और मौसम के स्तनों की हालत दयनीय थी.. मसल मसलकर रसिक ने स्तनों के आकार बदल दिया था.. उनके कोमल बदनो को कुचलते हुए.. अपने शरीर का तमाम वज़न उसने इन दोनों पर डाल दिया..

बारी बारी से दोनों के गालों को चूम रहा था रसिक.. वो दोनों के स्तनों को चूस रहा था.. जब फाल्गुनी के स्तन को चूसता तब मौसम के स्तन को मसलता.. उसके मर्दाना स्पर्श से दोनों कामुक सिसकियाँ निकालने लगी.. लंड बाहर निकल जाने से फाल्गुनी का दर्द भी गायब हो चुका था.. अब वो नए दर्द के लिए तड़पने लगी थी

अंधेरे कमरे में चमकता नाइट लैम्प.. ए.सी. की ठंडी हवा.. बेड पर लेटी हुई.. दो अति सुंदर नग्न सुंदरियाँ.. और उनके ऊपर मंडरा रहा हेवान जैसा रसिक.. बड़ी ही अद्भुत रात थी ये मौसम और फाल्गुनी के लिए.. दोनों सहेलियाँ इतनी कामुक हो गई थी अब उन्हें रसिक के छूने से कोई संकोच नहीं हो रहा था..

रसिक का खड़ा लंड मौसम के पेट और नाभि पर चुभ रहा था.. और उसे बेहद मज़ा आ रहा था.. फाल्गुनी इतनी उत्तेजित थी की रसिक के शरीर को मौसम के ऊपर से खींचकर अपने ऊपर लेने की कोशिश कर रही थी.. रसिक के स्वागत के लिए उसने अपनी जांघें खोल रखी थी.. फाल्गुनी का आमंत्रण समझ गया रसिक.. और मौसम के ऊपर से सरककर फाल्गुनी के शरीर के ऊपर छा गया..

फाल्गुनी की दोनों जांघों के बीच बैठकर.. रसिक का लोडा फाल्गुनी की चूत ढूंढकर.. बड़े ही आराम से आधा अंदर उतर गया.. फाल्गुनी की आँखों मे मोटे लंड-प्रवेश का जबरदस्त सुरूर छाने लगा था.. रसिक के काले चूतड़ों पर हाथ फेरते हुए वो उसके कंधों पर काटने लगी

बगल मे लेटी मौसम खुद ही अपनी चूत सहलाते हुए रसिक के कूल्हे और पीठ पर हाथ सहला रही थी.. और आश्चर्य भरी नज़रों से फाल्गुनी के इस अप्रतिम साहस को देख रही थी.. एक पल के लिए उसे ऐसा मन हुआ की वो फाल्गुनी को हटाकर खुद रसिक के नीचे लेट जाए.. जो होगा फिर देखा जाएगा.. पर दूसरे ही पल.. फाल्गुनी की दर्द-सभर चीखें याद आ जाती और उसका हौसला पस्त हो गया.. !!

थोड़ी देर पहले रसिक ने जितना लंड फाल्गुनी की चूत मे डाला था, उतना तो इस बार आसानी से चला गया.. पर लंड का बाकी हिस्सा अंदर घुसने का नाम ही नहीं ले रहा था.. रसिक ने अब बाकी का लंड, किसी भी सूरत मे, अंदर डालने का मन बनाकर मौसम से कहा "तुम इसका मुंह बंद दबाकर रखो.. मैं आखरी शॉट मारने जा रहा हूँ"

सुनते ही फाल्गुनी की शक्ल रोने जैसी हो गई, वो बोली "नहीं रसिक.. मेरी फट जाएगी.. खून निकल जाएगा.. पूरा अंदर नहीं जाएगा.. बस जितना अंदर गया है उतना ही अंदर बाहर करते है ना.. !!! दोनों को मज़ा आएगा" अपना मुंह दबाने करीब आ रही मौसम को दूर धकेलते हुए फाल्गुनी ने कहा

मौसम: "हाँ रसिक.. उसको जिस तरह करवाना हो वैसे ही करो.. जो करने मे उसे मज़ा न आए और दर्द हो.. ऐसा करने मे क्या फायदा??"

रसिक: "ठीक है मैडम.. जैसा आप कहो.. !!"

इतना कहते हुए रसिक ने मौसम का हाथ पकड़कर.. चूत से बाहर लंड के हिस्से पर रखते हुए कहा "इस आधे लंड को आप पकड़कर रखो.. ताकि इससे ज्यादा अंदर जाए नहीं.. मैं धक्के मारना शुरू कर रहा हूँ.. अगर दर्द ज्यादा हो तो बता देना.. मैं पूरा बाहर निकाल दूंगा.. ठीक है.. !!"

फाल्गुनी की चूत मे आधे घुसे लंड के बाद जो हिस्सा बाहर रह गया था, उसे मुठ्ठी मे पकड़ लिया मौसम ने.. लंड के परिघ को नापते हुए मौसम के रोंगटे खड़े हो गए.. इतना मोटा था की मौसम अपनी हथेली से उसे पूरी तरह पकड़ भी नहीं पा रही थी..

फाल्गुनी के मस्त स्तनों को मसलते हुए.. पहले लोकल ट्रेन की गति से.. और फिर राजधानी की स्पीड से.. रसिक पेलने लगा..!! फाल्गुनी आनंद से सराबोर हो गई.. उसके शरीर मे.. रसिक के लंड के घर्षण से एक तरह की ऐसी ऊर्जा उत्पन्न हुई की इतने भारी रसिक के नीचे दबे होने के बावजूद वो अपने चूतड़ उठाकर उछल रही थी.. रसिक को भी बहोत मज़ा आ रहा था.. बड़ी उम्र की.. फैले हुए भोसड़ों वाली औरतों के मुकाबले.. फाल्गुनी की चूत तो काफी टाइट थी.. वो सिसकते हुए फाल्गुनी की जवानी को रौंदने लगा..

रसिक ने धक्के लगाने की गति को और तेज कर दिया.. उसके हेवानी धक्कों की वजह से हुआ यह की.. मौसम का हाथ उसके लंड से छूट गया.. जो स्टापर का काम कर रहा था.. चूत के अंदर जाने का जो तय नाप था.. वो अब नहीं रहा.. और लंड पूरा अंदर घुस गया.. और फाल्गुनी की फिर से चीख निकल गई..

पर अब रसिक रुकने वाला नहीं था.. लगभग पाँच मिनट की जंगली चुदाई के बाद फाल्गुनी का शरीर ढीला पड़ गया और वो रसिक के बदन से लिपट पड़ी.. "आह आह रसिक.. आह्ह आह्ह ओह्ह मैं गई अब... ऊँहह.. आह्ह.. !!!" कहते हुए फाल्गुनी की चूत का रस झड़ गया.. इस अनोखे स्खलन को मौसम बड़े ही करीब से देख रही थी

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रसिक के लंड को पता चल गया की इस युद्ध मे उसकी भव्य विजय हुई है.. अब बिना एक पल का इंतज़ार कीये रसिक ने फाल्गुनी की चूत से लंड बाहर निकाला और उसके शरीर के ऊपर से खड़ा हो गया.. हल्का सा सरककर वो मौसम के ऊपर चढ़ गया.. उससे पहले की मौसम को सोच या समझ पाती.. रसिक ने अपने हाथ से लंड के सुपाड़े को मौसम की फुलझड़ी पर रगड़ना शुरू कर दिया.. रसिक की इस हरकत को देखकर ही मौसम कांप उठी.. उसने हाथ जोड़ दीये

मौसम: "नहीं नहीं रसिक.. फाल्गुनी की बात अलग है.. मेरे अंदर डालने की कोशिश करेगा तो मेरी जान निकल जाएगी"

रसिक: "आप चिंता मत करो मैडम.. अंदर नहीं डालूँगा.. मुझे पता है की अंदर जाएगा ही नहीं.. इतनी संकरी है आपकी फुद्दी.. जहां मेरी उंगली भी मुश्किल से घुस पाती हो वहाँ ये डंडा तो जाने से रहा.. मैं तो बस ऊपर ऊपर से रगड़कर आपको मज़ा देना चाहता हूँ.. देखना अभी कितना मज़ा आता है" कहते हुए रसिक मौसम के गाल को चूमता हुआ उसके होंठों को चूसकर.. मौसम की क्लिटोरिस को अपने खूंखार सुपाड़े से घिसने लगा.. आनंद से फड़फड़ाने लगी मौसम..

बेहद उत्तेजित होकर मौसम ने कहा "बहुत मज़ा आ रहा है रसिक.. एक बार मेरी चाटो ना.. !!"

रसिक बड़ी ही सावधानी से एक एक कदम आगे बढ़ रहा था.. वो ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहता थी जिससे मौसम नाराज हो.. वो खड़ा हो गया.. मौसम के पूरे शरीर को सहलाते हुए पलट गया.. मौसम के मुख की तरफ अपना लंड सेट करके वो उसके ऊपर लेट गया.. मौसम के चूतड़ों के नीचे हाथ डालकर खिलौने की तरह ऊपर उठाते हुए वो चूत चाटने लगा

"आह्ह रसिक.. ओह ओह्ह.. " मौसम ने सिसकने के लिए अपना मुंह खोला और तभी रसिक ने अपना लंड उसके होंठों के बीच दबाकर उसका मुंह बंद कर दिया.. बिना किसी घिन के रसिक का लंड पकड़कर बड़े ही प्रेम से चूसते हुए मौसम ने अपना पूरा शरीर रसिक को सौंप दिया..

रसिक ने कभी सपने मे भी नहीं सोचा था की मौसम उसका लंड चुसेगी.. अपने बबले दबाने देगी.. गुलाब की पंखुड़ियों जैसी उसकी चूत चाटने देगी..!!

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मौसम अपनी उत्तेजना के आखरी पड़ाव पर पहुँच चुकी थी.. और इस वक्त वो इतनी बेकाबू हो गई थी की रसिक के लंड को मुंह मे आधा लेकर वो पॉर्न फिल्मों की राँडों की तरह चूसने लगी.. रसिक भी सिसकियाँ भरते हुए मौसम के मुंह से अपने लंड को निकालकर उसी अवस्था मे मुठ्ठी से पकड़कर जबरदस्त स्पीड से हिलाने लगा.. फांसी की सजा पाए हुए कैदी की जैसे आखिरी इच्छा पूरी की जाती है वैसे रसिक अपने लंड को अंतिम सत्य के लिए लयबद्ध तरीके से हिला रहा था..

फाल्गुनी कभी उसके हाथ के डोलों को देखती.. तो कभी उसकी मुठ्ठी मे आगे पीछे होते सुपाड़े को.. !! रसिक के चौड़े कंधे और बड़ी लाल आँखें रात के अंधेरे मे बेहद डरावनी लग रही थी..

रसिक अचानक उठा.. और छलांग लगाते हुए मौसम की दोनों जांघों के बीच बैठ गया.. अपने लंड पर मुंह से निकालकर लार लगाते हुए.. इससे पहले की मौसम कुछ सोच या समझ पाती.. उसने मौसम की छोटी सी चूत पर अपना सुपाड़ा टीका दिया..

एकदम घबरा गई मौसम बोली "नहीं रसिक.. मत करो, मैंने पहले ही मना किया था" वो छटपटाने लगी पर रसिक के भारी शरीर तले उसकी जांघें दबी हुई थी इसलिए वो खिसक न पाई

हांफते हुए रसिक ने कहा "मैडम जी, कब से आपकी चूत चाट रहा था.. इतनी मस्त गंध आ रही थी.. इस गुलाबी छेद में एक बार डालने का मन है.. बस सिर्फ एक बार" कहते हुए उसने अपने सुपाड़े को मौसम की संकरी दरार के बीच दबाया

"ओह्ह फाल्गुनी, इसे समझा.. नहीं जाएगा अंदर.. मैं मर जाऊँगी.. उफ्फ़ प्लीज" मौसम ने गिड़गिड़ाते हुए फाल्गुनी से विनती की

"रहने दो रसिक, उसका मन नहीं है तो.. "फाल्गुनी अपना वाक्य पूरा करती इससे पहले तो रसिक ने अपना सुपाड़ा मौसम की मुनिया में अंदर धंसा दिया..

मौसम चीखती उससे पहले रसिक ने अपनी एक हथेली उसके मुंह पर दबा दी.. और इससे पहले की फाल्गुनी उसे रोकने के लिए कुछ कर पाती.. रसिक ने आधा लंड अंदर ठुसते हुए धक्के लगाना शुरू कर दिया..

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मौसम की संकरी सी चूत को रसिक का फौलादी लोडा चीर रहा था.. गनीमत थी की मौसम की चूत गीली थी वरना उसकी चमड़ी फट जाती..

रसिक की भारी हथेली तले दबी मौसम कुछ पलों के लिए छटपता कर शांत हो गई.. एक पल के लिए रसिक को लगा की मौसम को अब मज़ा आ रहा था.. पर ध्यान से देखने पर पता चला की मौसम अपने होश गंवा बैठी थी..!!

यह देखते ही रसिक की गांड फट गई.. उसने तुरंत मौसम के चेहरे से अपनी हथेली हटा ली.. और धीरे से अपना फंसा हुआ लंड मौसम की चूत से बाहर निकालने लगा..

जैसे ही उसका सुपाड़ा चूत के छेद से बाहर निकला.. मौसम की चूत से खून रिसने लगा.. देखते ही रसिक के तो पसीने छूट गए..

खून देखते ही फाल्गुनी भी बावरी हो गई.. "ये क्या कर दिया तूने रसिक..!!" कहते हुए उसने चद्दर उठाई और मौसम की चूत पर दबा दी ताकि खून का बहाव रोक सकें.. मौसम बेजान होकर बेड पर पड़ी थी

रसिक डरकर बेड से उठ गया.. फाल्गुनी ने घबराते हुए चद्दर को हल्के से हटाकर देखा.. मौसम की चूत से अब भी खून बह रहा था.. और जो बहाव था वो सामान्य नहीं था.. उसे यकीन हो गया की उसका योनिमार्ग अंदर से चोटिल हो चुका था.. अब बात काबू से बाहर थी.. तुरंत उसे मेडिकल मदद की जरूरत थी..

वह बेड से खड़ी हुई और अपने कपड़े पहनने लगी तब उसे एहसास हुआ की रसिक तो कब का भाग चुका था और अब वो अकेली थी..

उसने एम्बुलेंस बुलाने की सोची पर फिर उसे डर लगा की लोग क्या कहेंगे..!! उसने तुरंत अपने मोबाइल का एप खोलकर केब बुलाई। जैसे तैसे मौसम को कपड़े पहनाए और उसकी पेन्टी के अंदर एक सैनिटेरी पॅड रख दिया ताकि खून के बहाव को रोका जा सकें।

कैब आ गई और फाल्गुनी ने ड्राइवर की मदद से मौसम को पिछली सीट पर सुला दिया.. मदद की अपेक्षा से फाल्गुनी ने शीला भाभी के घर की ओर देखा पर वहाँ बाहर ताला लगा हुआ था..

कैब अस्पताल पहुंची और मौसम को ओ.पी.डी. में ले जाया गया..

कुछ देर बाद लैडी डॉक्टर ने बाहर आकर कहा की मौसम को काफी गंभीर अंदरूनी चोट लगी थी.. वह सब प्रयास कर रहे है पर अगर खून का बहाव न रुका तो मौसम की जान को खतरा हो सकता है

फाल्गुनी को पूरा विश्व गोल गोल घूमता नजर आने लगा.. वह अपना संतुलन खोकर कुर्सी पर गिर पड़ी.. वो अब अपने आप को कोस रही थी.. रसिक को बुलाना, मौसम को इसमें शामिल करना और फिर रसिक को रोक पाने में उसकी असमर्थता.. अगर मौसम को कुछ हो गया तो वो खुद को कभी माफ नहीं कर पाएगी.. सोचने पर उसे यह भी एहसास हुआ की इन सब के पीछे जिम्मेदार थी उसकी हवस.. और कुछ हद तक मौसम की भी.. इसी हवस के चलते आज मौसम ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही थी

पश्चाताप अक्सर इंसान को जीवन के सबसे गहरे दार्शनिक सवालों के सामने लाकर खड़ा कर देता है। युवावस्था के उस भ्रामक अहंकार में, जहाँ क्षणिक सुख और रोमांच ही सर्वोपरि लगते हैं, हम परिणामों की गंभीरता को नकार देते हैं और यह मान बैठते हैं कि हर परिस्थिति हमारे नियंत्रण में है। लेकिन, जब एक पल का भटकाव किसी अपने को जीवन और मृत्यु की दहलीज पर ले आता है, तो वह नियंत्रण का भ्रम पूरी तरह चूर-चूर हो जाता है। ऐसे असहाय क्षणों में हम विवश होकर अपनी आज़ादी, अपनी इच्छाओं और निर्णयों की वास्तविक कीमत पर सवाल उठाने लगते हैं। मन में यह द्वंद्व उठने लगता है कि क्या वह एक स्वीकृति वास्तव में हमारी आज़ादी का प्रतीक थी, या महज़ एक नासमझी? जब वक्त रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाता है, तब यह कड़वा सत्य सामने आता है कि हमारी नियति अक्सर उन क्षणभंगुर विकल्पों द्वारा ही तय होती है, जिनका असली वजन हम तब तक महसूस नहीं कर पाते, जब तक कि सब कुछ दांव पर न लग जाए।

"अरे फाल्गुनी, तुम यहाँ क्या कर रही हो?"

अपनी दोनों हथेलियों के बीच चेहरा छुपाकर रो रही फाल्गुनी को इस जानी पहचानी आवाज ने झकझोर कर रख दिया.. उसने तुरंत अपने आँसू पोंछे और सामने देखा.. सामने मदन खड़ा था.. दो दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी.. उतरा सा चेहरा..

एक पल के लिए फाल्गुनी को समझ नहीं आया की वह क्या बोले..

"वो.. वो.. वो तो मैं एक दोस्त को देखने आई थी.. पर अंकल आप यहाँ क्या कर रहे है??" फाल्गुनी ने खुद को थोड़ा सा स्वस्थ करते हुए पूछा

मदन ने एक भारी सांस छोड़ी और फाल्गुनी की बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया

"आज शीला वैशाली के घर से लौट रही थी.. सुबह से उसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी.. पर यहाँ पहुँचने से पहली ही उसे पेट में इतना दर्द शुरू हो गया की वह दर्द के मारे बेहोश हो गई.. भला हो उस ड्राइवर का जो उसे सीधे अस्पताल ले गया और फिर उसने वैशाली को फोन किया.. वैशाली ने मुझे फोन करके बताया.. वो भी यहाँ आने के लिए निकल गई है" मदन ने बताया

आश्चर्य के साथ फाल्गुनी ने कहा "पर शीला भाभी को हुआ क्या है? डॉक्टर ने कुछ बताया?"

"उसे कुछ ब्लीडिंग हो रही है नीचे.. शायद को लेडिज प्रॉब्लेम हो.. डॉक्टर सारे टेस्ट कर रहे है.. रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ बता पाएंगे"

उस रात फाल्गुनी और मदन अस्पताल में पूरी रात बैठे रहे..


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बहुत ही गरमागरम कामुक और उत्तेजना से भरपूर कामोत्तेजक अपडेट है भाई मजा आ गया
 
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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

कहानी दो समानांतर कथाओं में विभाजित हो जाती है, जो अंततः एक ही अस्पताल में आकर मिलती हैं.. एक ओर युवावस्था की क्षणिक हवस का विनाशकारी परिणाम, तो दूसरी ओर चालाकी और साजिश के जाल में उलझी एक महिला के शरीर का विद्रोह।

पहली कथा में, फाल्गुनी और मौसम नशे में धुत होकर रसिक दूधवाले को बुलाती हैं.. एक ऐसा पुरुष जिसका शारीरिक आकार और क्षमता दोनों ही असामान्य है। रसिक पहले फाल्गुनी के साथ कठोर संभोग करता है, जिसमें फाल्गुनी को भले ही दर्द सहना पड़ता है, पर वह अपनी हवस के आगे समर्पण कर देती है। इसके बाद रसिक की नज़र मौसम पर पड़ती है, जो शुरू में डरी-सहमी होती है और रसिक के विशाल आकार को देखकर सिहर उठती है। पर धीरे-धीरे उत्तेजना की गर्मी में वह भी पिघल जाती है.. लेकिन जब रसिक उसकी संकीर्ण, कोमल योनि में अपना विशाल लिंग जबरदस्ती घुसा देता है, तो मौसम बेहोश हो जाती है और उसके शरीर से भारी मात्रा में रक्तस्राव होने लगता है। रसिक डरकर वहाँ से भाग जाता है, और फाल्गुनी, जो अब अपनी गलती का एहसास कर चुकी है, मौसम को अस्पताल ले जाती है। वहाँ डॉक्टर बताते हैं कि मौसम को गंभीर आंतरिक चोट लगी है और यदि रक्तस्राव नहीं रुका तो उसकी जान को खतरा हो सकता है। फाल्गुनी आत्मग्लानि से भर जाती है.. उसे समझ आता है कि उसकी हवस, उसकी लापरवाही और उसकी नासमझी ने उसकी सबसे करीबी सहेली को मौत के कगार पर ला खड़ा किया है। वह इस दार्शनिक सत्य से रूबरू होती है कि क्षणिक सुख के पीछे भागना अक्सर हमें विनाश के गर्त में धकेल देता है, और परिणामों की गंभीरता का एहसास तब होता है जब सब कुछ हाथ से निकल चुका होता है।

दूसरी कथा में, शीला.. जिसने अभी-अभी पिंटू और कविता को बेनकाब कर अपनी बड़ी जीत का जश्न मनाया था.. अचानक असहनीय पेट दर्द और रक्तस्राव से पीड़ित हो जाती है। उसका रजोनिवृत्ति दस साल पहले हो चुका था, फिर भी उसकी पैंटी पर गाढ़ा, असामान्य खून देखकर वह भीतर ही भीतर काँप उठती है। वह दर्द को स्ट्रेस और उम्र का तकाज़ा बताकर अनदेखा करने की कोशिश करती है, पर उसका शरीर उसे चीख-चीख कर बता रहा होता है कि उसके भीतर कुछ गहरा उबल रहा है। वैशाली के घर से लौटते समय कैब में ही वह बेहोश हो जाती है, और ड्राइवर उसे सीधे अस्पताल ले जाता है।मदन अस्पताल पहुंचता है। मदन फाल्गुनी को अस्पताल में देखकर चौंक जाता हैं, और दोनों की मुलाकात इस अप्रत्याशित मोड़ पर होती है.. एक ओर मौसम की जान को खतरा है, तो दूसरी ओर शीला की बीमारी का कारण अज्ञात है और उसके टेस्ट हो रहे हैं।

अब आगे..
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अस्पताल के उस वीआईपी कॉरिडोर के आखिरी छोर पर डॉ. माथुर का केबिन था। केबिन के भीतर एक भारी खामोशी पसरी थी, जिसे सिर्फ दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक और एयर कंडीशनर की नीरस गूँज ही तोड़ रही थी। मदन डॉक्टर की बड़ी सी महोगनी टेबल के सामने रखी कुर्सी पर बैठा था। उसके हाथ आपस में इतनी ज़ोर से गुंथे हुए थे कि उँगलियों के पोर सफेद पड़ चुके थे। उसका दिल किसी भट्टी की तरह धड़क रहा था।

डॉक्टर माथुर अपने चश्मे के पीछे से एक गहरी, पेशेवर लेकिन उदास नज़र से टेबल पर रखी शीला की पेट-स्कैन, एमआरआई और बायोप्सी की रिपोर्ट्स को देख रहे थे। उन्होंने एक भारी साँस ली, चश्मा उतारा और रिपोर्ट्स की फाइल बंद कर दी।

"मदन जी..." डॉ. माथुर की आवाज़ उस सन्नाटे में किसी हथौड़े की तरह गूँजी।

मदन अपनी कुर्सी पर थोड़ा आगे खिसका, उसकी आँखों में एक अजीब सी दहशत और अनजानी उम्मीद दोनों एक साथ तैर रहे थे। "जी डॉक्टर साहब... क्या कह रही हैं रिपोर्ट्स? शीला को क्या हुआ है? उसे वो पेट का दर्द और ब्लीडिंग... वो सब क्यों हो रहा है? कोई इन्फेक्शन है क्या? आप दवा लिख दीजिए, मैं अभी..."

"मदन जी, प्लीज़ खुद को संभालिए," डॉक्टर ने मदन को बीच में रोकते हुए, एक बेहद शांत लेकिन खौफनाक लहज़े में कहा, "रिपोर्ट्स आ गई हैं, और मेडिकल साइंस के हिसाब से हमारे पास आपको देने के लिए कोई अच्छी खबर नहीं है। शीला जी को कैंसर है।"

मदन का शरीर एक झटके से सुन्न पड़ गया। कैंसर शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरा।

"क.. क.. कैं... कैंसर? क्या कह रहे हैं आप डॉक्टर साहब?" मदन की आवाज़ किसी सूखे पत्ते की तरह कांप उठी।

डॉक्टर ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर मदन के कांपते हाथों पर रखा और मेडिकल हकीकत बयां करना शुरू किया, "मदन जी, शीला जी को एडवांस स्टेज का सर्वाइकल यानि गर्भाशय और यूटेराइन कैंसर है। इसे हम अपनी मेडिकल भाषा में स्टेज 4बी कहते हैं। ट्यूमर बहुत ज़्यादा एग्रेसिव है। बीमारी अब सिर्फ गर्भाशय तक सीमित नहीं है, पर वो पेल्विक वॉल्स, ओवरीज़ और आस-पास के लिम्फ नोड्स तक पूरी तरह फैल चुकी है। मेटास्टेसिस की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।"

मदन की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह एक ऐसे सीधे-सादे पति की तरह व्यवहार कर रहा था, जिसने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा अपनी पत्नी को रानी बनाकर रखने के लिए अमेरिका में खपा दिया था।

"लेकिन ये कैसे हो सकता है डॉक्टर साहब?" मदन बिलखते हुए बोला, "मेरी शीला न तो सिगरेट फूँकती है न ही उसने कभी तंबाकू को हाथ लगाया ! उसका खान-पान भी साफ-सुथरा है। उसका लाइफस्टाइल भी काफी एक्टिव हैं। फिर उसे कैंसर कैसे हो गया? किस चीज़ से हुआ ये सब?"

डॉक्टर माथुर ने एक लंबी, गहरी साँस ली। एक डॉक्टर के तौर पर सच बताना उनका फर्ज़ था, चाहे वो सच कितना भी कड़वा और घिनौना क्यों न हो।

"मदन जी, यह कोई मुंह, फेफड़ों या पेट का कैंसर नहीं है जो खान-पान या सिगरेट से होता हो," डॉक्टर ने बहुत नपे-तुले, लेकिन स्पष्ट शब्दों में कहा, "सर्वाइकल कैंसर के 95% से ज़्यादा मामलों के पीछे एचपीवी (HPV - Human Papillomavirus) नाम का वायरस ज़िम्मेदार होता है। और यह वायरस हवा या पानी से नहीं फैलता।"

डॉक्टर एक पल के लिए रुके, ताकि मदन इस बात को समझ सके।

"तो... तो फिर ये कैसे फैलता है?" मदन ने उलझन और डर से फटी आँखों से पूछा।

डॉक्टर ने अपनी नज़रें हल्की सी नीची कीं और फिर मदन की आँखों में सीधा देखते हुए एक ऐसा सच उगला, जिसने मदन के वजूद को झकझोर कर रख दिया, "मदन जी... यह वायरस मुख्य रूप से अनप्रोटेक्टेड इंटरकोर्स यानि की असुरक्षित यौन संबंध से ट्रांसमिट होता है। जब किसी व्यक्ति के लंबे समय तक एक से अधिक लोगों के साथ असुरक्षित शारीरिक संबंध रहे हों, तो यह वायरस जननांगों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाता है। यह वायरस सालों तक शरीर में बिना कोई लक्षण दिखाए छुपकर बैठा रहता है, और अंदर ही अंदर गर्भाशय की कोशिकाओं को सड़ाता रहता है, उनका म्यूटेशन करता है।"

डॉक्टर ने आगे कहा, "शीला जी का मेनोपॉज़ बहुत पहले हो चुका था। उन्हें जो अनियमित ब्लीडिंग या कमर दर्द था, उन्होंने उसे काफी समय तक नज़रअंदाज़ किया। और इस तरह के एग्रेसिव इन्फेक्शन और ट्यूमर का जो पैटर्न इनकी रिपोर्ट्स में है, उसका मुख्य कारण वही मल्टीपल पार्टनर्स के साथ असुरक्षित यौन संबंध है। इस वायरस ने उन्हें अंदर से पूरी तरह खोखला कर दिया है।"

डॉक्टर के वो शब्द.. मल्टीपल पार्टनर्स और असुरक्षित संबंध.. मदन के दिमाग में किसी बम की तरह फटे। शीला और मदन दोनों ने अपनी मर्जी से ही ऐसी स्वच्छंद जीवनशैली को अपनाया था जहां ये तो उन दोनों के लिए काफी आम बात थी.. पर इसका नतीजा इतना भयानक होगा इसका उसे जरा सा भी अंदाजा नहीं था..

मदन कुर्सी से उठकर सीधा डॉक्टर की टेबल के पास जा पहुँचा और उसने डॉक्टर के दोनों हाथ अपने हाथों में कसकर पकड़ लिए।

"डॉक्टर साहब... मैं आपसे भीख मांगता हूँ!" मदन फूट-फूट कर रोते हुए गिड़गिड़ाने लगा, उसकी आँखों से आँसुओं की धारा डॉक्टर की टेबल पर गिर रही थी, "मुझे कोई मेडिकल साइंस नहीं समझना, मुझे कोई कारण नहीं जानना... मुझे बस मेरी शीला वापस चाहिए। आप कहिए तो मैं अभी उसे अमेरिका लेकर जाने को तैयार हूँ। दुनिया का कोई भी महंगा इलाज, कोई भी बड़ी सर्जरी, कोई भी कीमोथेरेपी... मैं अपना सब कुछ बेच दूँगा, अपना एक-एक पैसा पानी की तरह बहा दूँगा। बस आप मेरी शीला को बचा लीजिए! प्लीज़ डॉक्टर... उसे मरने मत दीजिए!"

डॉक्टर माथुर की आँखें भी नम हो गईं। उन्होंने बहुत ही नरमी से अपने हाथ मदन की पकड़ से छुड़ाए और मदन के कंधों को थामते हुए उसे वापस कुर्सी पर बिठाया।

"मदन जी, मुझे बहुत अफ़सोस है, लेकिन आपको सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा," डॉक्टर की आवाज़ में एक बेबसी और अंतिम फैसला था। "अब पैसा या अमेरिका काम नहीं आ सकता। शीला जी का कैंसर एक ऐसे स्टेज पर पहुँच चुका है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है। कोई सर्जरी अब उन कैंसर सेल्स को नहीं निकाल सकती, क्योंकि वो पूरे शरीर में फैल चुके हैं। हम सिर्फ पेलिएटिव केयर दे सकते हैं.. यानी कुछ दवाइयां और पेनकिलर्स, ताकि उनके आखिरी दिन कम दर्दनाक हों।"

मदन का सिर अपनी छाती तक झुक गया।

"व... वक़्त कितना है उसके पास?" मदन ने हकलाते हुए.. मरी हुई आवाज़ में पूछा।

"कुछ हफ्ते... या शायद कुछ दिन," डॉक्टर ने जवाब दिया। "बस इससे ज़्यादा नहीं।"

मदन के पैरों तले से ज़मीन, उसका आसमान, उसकी ज़िंदगी की सारी कमाई... सब कुछ उस केबिन के फर्श पर बिखर कर राख हो गया। उसने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों से छुपा लिया और एक छोटे बच्चे की तरह फफक-फफक कर रोने लगा।

वह उस कड़वे और ज़हरीले सच को अब अपनी नियति मान चुका था। उसने अपनी पत्नी के जिस्म की गद्दारी और मौत की उस काली परछाई को एक साथ स्वीकार कर लिया था। अब कुछ भी बाकी नहीं था... सिवाय इंतज़ार के।

कुछ देर बाद, भारी और कांपते कदमों के साथ मदन डॉक्टर के केबिन से बाहर निकला और उस आईसीयू की तरफ बढ़ गया, जहाँ शीला इन सबसे अनजान, अपनी ज़िंदगी की आखिरी साँसें गिन रही थी।

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अस्पताल के उस वीआईपी प्राइवेट कमरे, जिसे अब एक हाई-टेक आईसीयू (ICU) में तब्दील कर दिया गया था,की सफेद, ठंडी और दूधिया रोशनी शीला की आँखों में किसी तेज़ाब की तरह चुभ रही थी। हवा में फिनाइल, स्पिरिट और तेज़ दवाइयों की वह टिपिकल दम घोंटने वाली महक तैर रही थी, जो इंसान को उसके नश्वर होने का सबसे खौफनाक एहसास दिलाती है।

कमरे के बीचों-बीच रखे उस सफेद बिस्तर पर शीला लेटी हुई थी। वही शीला, जिसके चेहरे पर कुछ दिन पहले तक एक शातिर गुरूर, हुस्न का घमंड और दूसरों की ज़िंदगियों को अपनी उँगलियों पर नचाने का नशा था... आज एक कमज़ोर, बेबस और सूखी हुई टहनी की तरह उस बिस्तर पर पड़ी थी।

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केबिन के बाहर, कांच के दरवाज़े के उस पार, डॉक्टर माथुर ने मदन को शीला की ताज़ा एमआरआई और बायोप्सी की रिपोर्ट्स के बारे में सब कुछ बता दिया था।

"यूट्रस का कैंसर... फोर्थ स्टेज... और कारण... एचपीवी वायरस, जो मल्टीपल पार्टनर्स के साथ अनप्रोटेक्टेड इंटरकोर्स से फैला है।"

मदन के लिए मल्टीपल पार्टनर्स वाली बात कोई चौंकाने वाला राज़ नहीं था। वह शीला के अतीत और उसके अनगिनत यौन संबंधों से पूरी तरह वाकिफ था..पर सच तो यह था कि उन दोनों ने आपसी सहमति से इस उन्मुक्त, बेलगाम और हवस से भरी लाइफस्टाइल को चुना था। जब मदन अमेरिका में रहता था, तब से लेकर आज तक, उन्होंने अपनी जिस्मानी आज़ादी को अपनी मॉडर्न सोच का तमगा पहना रखा था।

लेकिन आज, डॉक्टर की बात सुनकर मदन को कोई धोखा नहीं, पर एक भयानक, गला घोंट देने वाली आत्मग्लानि महसूस हुई। जिस जिस्मानी आज़ादी और अय्याशी को वो दोनों अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा रोमांच मानते थे, आज उसी ने शीला को मौत के इस खौफनाक मुहाने पर ला खड़ा किया था।

मदन ने अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर एक झूठी, दिलासा देने वाली मुस्कान ओढ़ी और आईसीयू के भीतर शीला के बिस्तर के पास आ गया। उसने शीला का पीला पड़ चुका, सुइयों से छिदा हुआ हाथ अपने हाथों में लिया।

"कुछ... कुछ खास नहीं है शीला," मदन ने अपनी कांपती आवाज़ को सामान्य करने की पूरी कोशिश करते हुए कहा, "डॉक्टर कह रहे हैं कि बस यूट्रस में एक छोटा सा इन्फेक्शन हो गया है। कोई घबराने वाली बात नहीं है। बस कुछ दिन तेज़ एंटीबायोटिक्स चलेंगी, और सब बिल्कुल ठीक हो जाएगा। हम बहुत जल्द घर चलेंगे।"

लेकिन शीला का दिमाग? वो दिमाग जिसने ज़िंदगी भर बिसातें बिछाई थीं, जिसने लोगों के चेहरों के पीछे छिपे उनके सबसे गहरे राज़ पढ़े थे... वो इतनी आसानी से कैसे बेवकूफ बन सकता था?

शीला का शातिर और पारखी दिमाग तुरंत खतरे को सूंघ गया। उसने अपने शरीर के भीतर उठ रहे उस भयंकर, चीर देने वाले दर्द को महसूस किया, जो किसी मामूली इन्फेक्शन का नहीं हो सकता था। उसने अपनी तिरछी नज़रों से आस-पास घिरी उन भारी मेडिकल मशीनों, ऑक्सीजन पाइप्स और हार्ट-रेट मॉनिटर्स को देखा। एक छोटे से इन्फेक्शन के लिए किसी को आईसीयू की इन मौत जैसी बीप-बीप करती मशीनों के बीच नहीं रखा जाता.. इतना तो शीला जानती ही थी..

और सबसे बढ़कर, शीला की नज़रें मदन के चेहरे पर टिक गईं। मदन के होंठ भले ही मुस्कुरा रहे थे, लेकिन उसकी आँखें लाल और सूजी हुई थीं, उसकी ठुड्डी हल्की-हल्की कांप रही थी और उसके हाथों की पकड़ में एक बेबसी थी।

शीला ने अपनी सूखी जुबान होठों पर फेरी और मदन का हाथ हल्के से दबाया।

"मदन..." शीला की आवाज़ बेहद कमज़ोर थी, लेकिन उसमें वही पुरानी, बेधड़क सख्ती थी, "हम दोनों ने मिलकर अपनी पूरी ज़िंदगी दुनिया की आँखों में धूल झोंकी है। कम से कम मौत के इस बिस्तर पर तो मुझसे झूठा नाटक मत करो। ये दर्द कोई मामूली इन्फेक्शन नहीं है मदन। मेरी रगों का खून सूख रहा है, मुझे पता है। सच बताओ... डॉक्टर ने क्या कहा है?"

मदन ने फिर से झूठ बोलने के लिए मुँह खोला, लेकिन शीला की उन गहरी, सच को भेदती आँखों के सामने उसका झूठा नकाब भरभरा कर गिर पड़ा। मदन टूट गया। वह शीला के बिस्तर पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा।

"सब खत्म हो गया शीला... कुछ नहीं बचा!" मदन सिसकते हुए, रुंधी हुई आवाज़ में बोला, "कैंसर है तुम्हें... गर्भाशय का कैंसर... और वो आखिरी स्टेज में है। पूरे शरीर में फैल चुका है। डॉक्टर कह रहे हैं कि वो... वो जिस आजादी से हम आज तक जीते आए है... जो इतने सालों तक हमने अनगिनत लोगों के साथ... उसी से कोई वायरस शरीर में पनप गया था। उसी ने तुम्हें अंदर से खोखला कर दिया।"

यह सच कमरे में किसी बम की तरह फटा। शीला की साँसें वहीं अटक गईं। उसे ऐसा लगा जैसे मौत ने सीधे उसके सीने में एक बर्फीला खंजर उतार दिया हो। जिस जिस्म की भूख और जिन अनगिनत मर्दों की बाँहों को उसने और मदन ने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सुख माना था, आज उसी जिस्म ने, उसी हवस ने उसके अंदर मौत का बीज बो दिया था। कर्मों का हिसाब लौट कर आ गया था, और वो भी इतने वीभत्स रूप में।

शीला ने कांपते हुए हाथ से मदन के सिर को सहलाया और कहा, "मदन... रोना बंद करो। जो बोया है, वही तो काट रहे हैं। अब... अब मुझे थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ दो। प्लीज़, मुझे किसी से कोई बात नहीं करनी।"

मदन भारी कदमों से, खुद को घसीटता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।

अब उस खामोश आईसीयू में शीला बिल्कुल अकेली थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि उसमें सिर्फ मेडिकल मॉनिटर्स की वो मशीनी बीप... बीप... बीप... गूँज रही थी। शीला को वो आवाज़ यमराज के कदमों की आहट सी लग रही थी, जो हर गुज़रते सेकंड के साथ उसके करीब आ रहा था।

इंसान जब मौत के मुहाने पर होता है, तो ज़िंदगी किसी फिल्म की तरह उसकी आँखों के सामने से गुज़रती है। शीला के साथ भी यही हो रहा था।

उसे वो वक़्त याद आया जब मदन अमेरिका में था और तब से शुरू हुई उसकी ऐयाशी से भरी ज़िंदगी.. और फिर मदन के लौटने के बाद भी उन दोनों ने आपसी सहमति से एक खुली, बेपरवाह और हवस से भरी ज़िंदगी चुनी थी। उन्हें लगता था कि वो वह बहुत मॉडर्न हैं, दुनिया की उस दकियानूसी सोच से दो कदम आगे हैं जहाँ पति-पत्नी एक-दूसरे के गुलाम होते हैं। उन्होंने ओपन मैरिज के नाम पर अपनी शारीरिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपने हर उसूल, हर शर्म और हर मर्यादा का गला घोंट दिया था। वो कभी अपने किए पर शर्मिंदा नहीं हुई।

लेकिन आज, मौत के इस ठंडे बिस्तर पर लेटे हुए उसे एक भयानक सत्य का एहसास हो रहा था।

"जिस्म की आज़ादी... कितनी खोखली होती है न," शीला के गालों पर आँसुओं की एक गर्म धार बह निकली।

उसे आज समझ आ रहा था कि उन चंद मिनटों के शारीरिक सुख और कभी न मिटने वाली जिस्मानी भूख ने उसे असल में क्या दिया? कुछ नहीं! सिवाय एक दीमक की तरह अंदर से खोखला कर देने वाली बीमारी के। और वो भूख तो कभी मिटी ही नहीं.. उन क्षणभंगुर सुखों के लालच में उसने अपना स्वभाव कितना ज़हरीला बना लिया था। उसने इंसानों को इंसान समझना बंद कर दिया था। जब आप जिस्मों को बदलते हैं, तो आप रिश्तों को भी महज़ एक 'फायदे का सौदा' समझने लगते हैं। उसका सामाजिक व्यवहार, उसकी सहानुभूति, उसका मातृत्व... सब कुछ उस हवस की आग में जलकर राख हो चुका था। उसने अपनी रूह को सड़ा दिया था।

शीला की छाती में दर्द का एक भयानक रेला उठा, लेकिन यह दर्द उसके कैंसर का नहीं, पर उसके पश्चाताप का था।

अगर वो चाहती, तो एक साफ-सुथरी ज़िंदगी जी सकती थी। अपनी बेटी वैशाली को एक सही माँ की तरह संस्कार दे सकती थी, उसे सही और गलत की पहचान सिखा सकती थी। लेकिन उसने क्या किया? वैशाली को भी इसी हवस की दुनिया में धकेल दिया। वैशाली की दूसरी शादी से पहले उसके हिम्मत, पीयूष और राजेश के साथ जो संबंध थे उसे अनजाने में शीला ने ही पालने में मदद की थी। कभी अनजाने में तो कभी जानकर भी अनजान बनकर।

शीला के दिमाग में अचानक वो आखिरी, सबसे खौफनाक और घिनौनी बिसात घूम गई जो उसने महज़ तीन दिन पहले बिछाई थी। पीयूष, कविता, वैशाली और पिंटू की ज़िंदगी का वो भयंकर तमाशा।

उसने पीयूष के पैसों के लालच में अपनी ही बेटी वैशाली के दिमाग में ज़हर घोला। उसने रिश्तों को उसी तरह इस्तेमाल करो और फेंक दो की नज़र से देखा, जैसे वो मर्दों को देखती थी। उसने कविता जैसी एक डरी हुई अकेली औरत को उकसाकर उसका घर तुड़वाया। उसी कविता के ज़रिए पिंटू को अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए मोहरा बनाया। और फिर... खुद जाकर उन दोनों को रंगे हाथों पकड़ा, ताकि वैशाली की नज़रों में पिंटू हमेशा के लिए एक नीच धोखा देने वाला इंसान बन जाए, और पीयूष के लिए वैशाली का रास्ता साफ हो जाए।

"मैंने ये क्या कर दिया..." शीला ने सिसकते हुए अपने सूखे होंठों को दाँतों तले दबा लिया। "मैंने अपनी ही बच्ची की ज़िंदगी में अपना ज़हर घोल दिया। मैंने दो बसे हुए घर एक ही झटके में उजाड़ दिए... और किस लिए? ताकि मेरी बेटी को एक अमीर आदमी और उसका महल जैसा घर मिल सके? क्या पीयूष सच में वैशाली को प्यार देगा? क्या कोई रिश्ता इस धोखे और पाप की बुनियाद पर टिक सकता है?"

मौत की इस घड़ी में शीला को समझ आ गया था कि वो अपनी पूरी ज़िंदगी, अपना अतीत और अपने अनगिनत पाप तो नहीं सुधार सकती... उसकी सज़ा तो उसे अब भुगतनी ही थी। लेकिन वो अपना आखिरी गुनाह... वो आखिरी बिसात जो उसने बिछाई थी, उसे किसी भी कीमत पर सुधारना चाहती थी। वो वैशाली को अपने जैसा नहीं बनने देना चाहती थी।

तभी आईसीयू के कांच के दरवाज़े को धकेलते हुए वैशाली अंदर आई। वैशाली की आँखें रो-रोकर सूजी हुई थीं। उसने बाहर मदन से सब कुछ जान लिया था।

वैशाली अपनी माँ के बिस्तर के पास आकर ज़मीन पर बैठ गई। उसने शीला का ठंडा, कांपता हुआ हाथ अपनी आँखों से लगा लिया और सिसकने लगी, "मम्मी... ये क्या हो गया तुम्हें? तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगी। हम तुम्हें बड़े अस्पताल ले जाएंगे..."

शीला ने बहुत ही मुश्किल से वैशाली के सिर पर हाथ फेरा। उसकी आँखों में अब कोई शातिर चमक नहीं थी, पर एक माँ की और एक गुनहगार औरत की बेबसी थी।

"वैशाली..." शीला की आवाज़ किसी सूखी पत्ती की तरह कांप रही थी, "मेरी बच्ची... मेरा वक़्त अब खत्म हो रहा है। मेरी रगों में जो ज़हर दौड़ रहा है, उसे दुनिया का कोई डॉक्टर नहीं निकाल सकता। मुझे अब कोई नहीं बचा सकता।"

"नहीं मम्मी! ऐसा मत बोलो!" वैशाली चीख पड़ी।

"चुप... चुप हो जा और मेरी बात ध्यान से सुन," शीला ने अपनी पूरी ताक़त बटोरते हुए अपने लहज़े में थोड़ी सख्ती लाई। "जिंदगी भर मैंने जो गलतियां की हैं, जो पाप किए हैं, उनका सिला मुझे मिल गया है। मैं अपनी पूरी ज़िंदगी को तो पलट कर ठीक नहीं कर सकती... लेकिन वैशाली, मरने से पहले मुझे अपना आखिरी गुनाह सुधारना है। मुझ पर एक आखिरी एहसान कर दे मेरी बच्ची।"

वैशाली ने आँसू पोंछते हुए, हैरानी से अपनी माँ को देखा, "कैसा गुनाह मम्मी? तुम क्या कह रही हो? तुम्हें क्या चाहिए?"

शीला ने एक गहरी, दर्दनाक साँस ली और वैशाली की आँखों में सीधा देखते हुए बोली, "अपना फोन निकाल... और अभी, इसी वक़्त पीयूष को, कविता को और पिंटू को फोन कर। उन तीनों को तुरंत यहाँ, इसी अस्पताल में मेरे पास बुला।"

यह सुनते ही वैशाली के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसका शरीर गुस्से और नफरत से तन गया।

"क्या?!" वैशाली लगभग फुफकारते हुए पीछे हटी, "मम्मी, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? तुम उस धोखेबाज़ पिंटू को यहाँ बुलाना चाहती हो? उस गिरी हुई औरत कविता को, जो मेरी पीठ पीछे मेरे ही पति के साथ कपड़े उतारकर लेट गई... उसे मैं यहाँ बुलाऊँ? और पीयूष को? नहीं मम्मी! मैं पिंटू और कविता की शक्ल भी नहीं देखना चाहती। उन्होंने मेरा घर उजाड़ा है!"

शीला ने वैशाली का हाथ इतनी ज़ोर से पकड़ा कि वैशाली हैरान रह गई। शीला की आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी और आवाज़ में एक ऐसा सच था, जिसे सुनकर वैशाली का खून सर्द पड़ने वाला था।

"उन्होंने तेरा घर नहीं उजाड़ा वैशाली..." शीला ने एक कड़वी और मौत जैसी ठंडी आवाज़ में उस भयंकर सच का पर्दाफाश करते हुए कहा, "तेरा घर... तेरा घर तो मैंने उजाड़ा है।"

वैशाली की साँसें वहीं रुक गईं।

"मैंने बिछाई थी वो सारी बिसात," शीला ने हाँफते हुए कहा, "कॉल कर वैशाली! उन तीनों को यहाँ बुला। जब तक मैं उन सबके सामने, तुम्हारी आँखों के सामने अपना नंगा सच नहीं उगल दूँगी... जब तक मैं तुम चारों की वो उलझी हुई डोर वापस नहीं सुलझा दूँगी, तब तक मेरी जान इस जिस्म से नहीं निकलेगी। मुझे सुकून से मरने दे वैशाली... उन्हें बुला!"

वैशाली बुत बनकर अपनी माँ को देख रही थी। आईसीयू की वो बीप... बीप... की आवाज़ अब वैशाली के कानों में किसी हथौड़े की तरह बज रही थी। उसने कांपते हाथों से अपना फोन निकाला। बिसात पलटने वाली थी, लेकिन इस बार चाल किसी गुरूर की नहीं, पर पश्चाताप की थी।

वैशाली भारी, सुन्न और कांपते कदमों के साथ आईसीयू के उस ठंडे कमरे से बाहर निकली। उसकी माँ के वह आखिरी शब्द 'तेरा घर तो मैंने उजाड़ा है' उसके दिमाग की नसें फाड़ रहे थे। वो कॉरिडोर की एक खाली बेंच पर गिर सी गई और कांपते हाथों से अपने फोन की स्क्रीन पर पीयूष, कविता और पिंटू के नंबर तलाशने लगी। बिसात का आखिरी खेल अब शुरू होने वाला था।

इधर आईसीयू के अंदर, वैशाली के बाहर जाते ही कांच का दरवाज़ा फिर से खुला। शीला ने अपनी थकी हुई और धुंधली आँखों से दरवाज़े की तरफ देखा। सामने मौसम और फाल्गुनी खड़ी थीं।

मौसम उसी अस्पताल के जनरल वॉर्ड की मरीज़ों वाली ढीली-ढाली नीली गाउन पहने हुए थी, और उसके साथ खड़ी फाल्गुनी का चेहरा उतरा हुआ था। दरअसल, मौसम भी पिछले दो दिनों से इसी अस्पताल में भर्ती थी। लेकिन जैसे ही उन दोनों की नज़रें बिस्तर पर पड़ीं, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

सामने वो शीला नहीं थी जिसे वो जानती थीं.. वो ग्लैमरस, बेधड़क और अपने हुस्न के गुरूर में रहने वाली शीला। बिस्तर पर पसीने में तर-बतर, पीली पड़ चुकी त्वचा, आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे और अनगिनत सुइयों से छिदी हुई एक ज़िंदा लाश पड़ी थी।

"हे भगवान... शीला आंटी!" फाल्गुनी के मुँह से एक चीख सी निकल गई। वह दौड़कर बिस्तर के पास आई, मौसम भी लड़खड़ाते कदमों से उसके पीछे-पीछे आई।

फाल्गुनी ने शीला का हाथ पकड़ लिया, उसकी आँखों में आँसू आ गए, "ये... ये क्या हालत बना ली है अपनी? मदन अंकल और वैशाली बाहर मिले थे, उन्होंने सब बताया। हम तो सोच भी नहीं सकते थे कि आपको कैंसर... वो भी इस स्टेज का! पर आप हिम्मत मत हारना आंटी, सब ठीक हो जाएगा।"

शीला ने एक फीकी, दर्दभरी मुस्कान के साथ फाल्गुनी का हाथ अपनी कमज़ोर उँगलियों से दबाया और उसे बीच में ही रोक दिया।

"तसल्ली मत दे फाल्गुनी," शीला की आवाज़ में कोई खौफ नहीं था, बस एक डरा देने वाली शांति थी। "मुझे अब किसी झूठी उम्मीद की ज़रूरत नहीं है। मैंने हकीकत से समझौता कर लिया है। जो बोया था, वही तो काट रही हूँ। ये कोई बीमारी नहीं है, ये मेरा अपना कमाया हुआ कर्' है जो लौट कर आया है। अब मुझे इस बिस्तर से कोई डॉक्टर खड़ा नहीं कर सकता.."

मौसम और फाल्गुनी दोनों सुन्न रह गईं। शीला ने गहरी साँस ली और अपनी नज़रें मौसम की उस नीली गाउन और उसके उतरे हुए चेहरे पर गड़ा दीं।

"पर तू यहाँ कैसे मौसम?" शीला ने खांसते हुए पूछा, "तू तो ठीक-ठाक थी, फिर ये अस्पताल के कपड़े क्यों पहन रखे हैं? चेहरा भी बिल्कुल सफेद पड़ रहा है तेरा।"

मौसम शर्म के मारे गड़ गई। उसने अपनी नज़रें झुका लीं और अपने गाउन का कोना उँगलियों में मरोड़ने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि मौत के मुहाने पर खड़ी शीला को वो अपनी हवस और अय्याशी का घिनौना किस्सा कैसे सुनाए।

जब मौसम कुछ नहीं बोली, तो फाल्गुनी ने झेंपते हुए एक भारी साँस ली और सच उगल दिया, "अब क्या बताऊँ आंटी... मेरी अक्ल पर भी तो पत्थर पड़ गए हैं। हमने उस दूधवाले रसिक के साथ मजे करने का एक प्लान बनाया था। सोचा था थोड़ी एश करेंगे, कुछ नया ट्राई करेंगे। मौसम उसके साथ... मतलब... वैसे तो उसका लेने का मन नहीं था.. पर रसिक से रहा नहीं गया.. वो कुछ ज़्यादा ही जंगली हो गया। रफ इंटरकोर्स की वजह से मौसम को सीवियर इंटरनल ब्लीडिंग शुरू हो गई। खून रुक ही नहीं रहा था। आनन-फानन में इसे यहाँ लाकर एडमिट कराना पड़ा। बाल-बाल बची है, वरना..."

फाल्गुनी की बात सुनते ही शीला की आँखों में एक गहरा सूनापन छा गया। उसने मौसम को देखा, जो अभी भी शर्म से सिर झुकाए खड़ी थी। शीला ने अपना सिर तकिए पर पीछे की तरफ पटका और एक लंबी, हताश और दर्दभरी साँस छोड़ी।

यह साँस किसी जजमेंट की नहीं थी, बल्कि उस भयंकर हकीकत की थी जिसे शीला खुद अपनी ज़िंदगी की कीमत देकर समझ चुकी थी।

"कुछ नया ट्राई करेंगे..." शीला ने उन शब्दों को दोहराया, उसकी आवाज़ में एक अजीब सा दार्शनिक ठहराव था। "हमेशा कुछ नया... कुछ अलग... जिस्म के किसी नए कोने में छिपी हुई थोड़ी और आग। है न मौसम?"

मौसम ने डरते-डरते नज़रें उठाईं। शीला की आँखें अब सीधे मौसम की आत्मा में झांक रही थीं।

"इधर आ मौसम... मेरे पास बैठ," शीला ने कमज़ोर आवाज़ में कहा। मौसम डरते हुए बिस्तर के किनारे बैठ गई।

शीला ने उसका हाथ अपने ठंडे हाथों में लिया और एक ऐसी आवाज़ में बोली जो अस्पताल के उस सन्नाटे में किसी मंत्र की तरह गूँजने लगी, "तुझे पता है मौसम, इस दुनिया में सबसे बड़ा धोखा क्या है? जिस्म की आज़ादी। हमें लगता है कि हम बहुत मॉडर्न हो गए हैं। एक पति से बोर हो गए या थोड़ा मनमुटाव हो गया तो दूसरे मर्द के पास चले गए। बिस्तर पर नए-नए तमाशे कर लिए। दूधवाला, ड्राइवर, बॉस या जीजाजी... हमें लगता है कि हम अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जी रहे हैं। लेकिन सच बताऊँ? हम महज़ अपनी हवस के गुलाम बन जाते हैं।"

फाल्गुनी और मौसम चुपचाप सुन रही थीं। उनके रोंगटे खड़े हो रहे थे। मौसम के पैरों तले से तब जमीन खिसक गई जब शीला ने 'जीजाजी' नाम लिया.. शीला आंटी को पीयूष के साथ उसके संबंधों के बारे में कैसे पता चला..?? शायद वैशाली ने बताया होगा..

"जिस्म की ये भूख एक ऐसा अँधा कुआं है फाल्गुनी, जिसे दुनिया का कोई भी मर्द, कोई भी नया तजुर्बा नहीं भर सकता," शीला की आँखों से आँसुओं की एक बूँद छलक कर तकिए पर गिर गई। "ये शारीरिक रोमांच एक भ्रम है, छलाव है..। तू जितना इसके पीछे भागेगी, प्यास उतनी ही बढ़ती जाएगी। और आखिर में.. आखिर में ये आग तुझे अंदर से जलाकर खा जाएगी, बिल्कुल मेरी तरह। देख मुझे... ये जो कैंसर मुझे अंदर से दीमक की तरह नोच रहा है न, ये और कुछ नहीं, मेरी उसी अंधी हवस का नतीजा है। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी जिस्म के नए-नए ज़ायके चखने में निकाल दी, और आज... आज मेरा अपना जिस्म ही मेरे लिए जहन्नुम बन गया है।"

शीला ने खांसते हुए एक घूंट पानी पीने का इशारा किया। फाल्गुनी ने कांपते हाथों से उसे पानी पिलाया।

पानी निगलने के बाद शीला ने मौसम की आँखों में झांकते हुए अपना आखिरी ज्ञान दिया, "आज तुझे सिर्फ ब्लीडिंग हुई है मौसम, कल कुछ और होगा। ये एक चेतावनी है जो भगवान ने तुझे दी है, जो मुझे कभी नहीं मिली। या शायद मिली थी, पर मैं अपने गुरूर में अंधी थी। एक बात हमेशा याद रखना... वफादारी कोई पुरानी, दकियानूसी परंपरा नहीं है, ये एक कवच है। अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार रहना, अपनी इच्छाओं पर लगाम कसना... ये हमें घुटन नहीं देता, ये हमें बचाता है। हमारे शरीर को, हमारे रिश्तों को और सबसे बड़ी बात... हमारी रूह को बचाता है।"

शीला की आवाज़ अब और भी भारी हो गई थी, "जिस बिस्तर पर इंसान एक ही वफादार साथी के साथ सुकून की नींद सो सकता है, हमने उसी बिस्तर को अय्याशी का अखाड़ा बना दिया। और जो औरत अपने पति के प्यार को, उसकी वफादारी को छोड़कर जिस्मानी मज़े के लिए बाहर भटकती है... उसका अंत यही होता है। आज मैं मौत की दहलीज पर खड़ी होकर सोचती हूँ... क्या वो चंद मिनटों का रोमांच, वो नयापन, मेरी इस दर्दनाक मौत, मेरे उजड़े हुए घर और मेरी आत्मा के इस बोझ से ज़्यादा कीमती था? नहीं मौसम... बिल्कुल नहीं।"

मौसम की आँखों से अब झर-झर आँसू बहने लगे थे। वह शीला के सीने से लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। फाल्गुनी भी अपने आँसू नहीं रोक पा रही थी।

शीला ने मौसम के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, "वापस लौट जा मौसम। इससे पहले कि ये अँधा रास्ता तुझे भी इस आईसीयू के बिस्तर तक ले आए... लौट जा। अपने पति विशाल के पास, अपने परिवार के पास। ये जिस्म मिट्टी है... इसे और गंदा मत कर।"

कमरे में सिर्फ मौसम की सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी। शीला ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी हार को, अपने सबसे गहरे दर्द को आज एक सबक बनाकर उन लड़कियों के सामने रख दिया था।

बाहर, वैशाली ने अपना फोन काटा। पीयूष, कविता और पिंटू को अस्पताल पहुँचने का अल्टीमेटम दिया जा चुका था। शीला का आखिरी कर्म, उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा और अंतिम तमाशा अब नज़दीक आ रहा था।

मौसम और फाल्गुनी अपनी भारी आँखों, कांपते दिलों और ज़िंदगी के एक खौफनाक सबक के साथ आईसीयू के उस ठंडे कमरे से बाहर निकल गईं। उनके जाने के बाद कमरे में एक बार फिर वही मनहूस सन्नाटा और मशीनों की बीप-बीप गूँजने लगी। शीला ने अपनी आँखें मूँद लीं, वह अपनी बची-खुची ताक़त बटोर रही थी, क्योंकि असली तमाशा तो अभी बाकी था।

तभी आईसीयू का भारी कांच का दरवाज़ा एक बार फिर बहुत आहिस्ता से खुला।

शीला ने अपनी थकी हुई पलकें उठाईं। दरवाज़े पर जो शख्स खड़ा था, उसे देखकर एक पल के लिए शीला की धुंधली आँखों में भी हैरानी तैर गई। वह रसिक था.. मोहल्ले का वही गठीले बदन और चौड़ी छाती वाला दूधवाला। वही रसिक, जिसकी कच्ची मर्दानगी, बेबाकी और जंगली चुदाई शीला के बंद कमरों की महफिलों का मुख्य हिस्सा हुआ करते थे।

लेकिन आज? आज वो बेखौफ रसिक अस्पताल के इस दमघोंटू माहौल में एक डरे हुए, सहमे हुए जानवर की तरह खड़ा था। उसने पड़ोस की किसी औरत से शीला की अचानक बिगड़ी तबीयत और अस्पताल में भर्ती होने की खबर सुनी थी, और खुद को रोक नहीं पाया था।

रसिक दबे पाँव बिस्तर के करीब आया। जैसे ही उसकी नज़र शीला पर पड़ी, उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसकी चौड़ी छाती धौंकनी की तरह चलने लगी। वो शीला... जिसके हुस्न की आग में वो न जाने कितनी बार जला था, जिसके जिस्म की महक उसे पागल कर देती थी... आज वो एक पीली, सूखी और बेजान हड्डियों के ढांचे में तब्दील हो चुकी थी। रसिक के लिए यह मंज़र किसी भयानक डरावने सपने जैसा था।

शीला ने रसिक के उड़ चुके चेहरे और फटी हुई आँखों को देखा। उसके सूखे होठों पर एक बेहद कमज़ोर, थकी हुई लेकिन सब कुछ जान लेने वाली मुस्कान आ गई।

"आजा रसिक... वहीं क्यों खड़ा है? डर लग रहा है अपनी शीला भाभी को इस हाल में देखकर?" शीला की आवाज़ बहुत मद्धम थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी शांति थी।

रसिक कांपते हुए आगे बढ़ा। उसने अपना खुरदरा हाथ शीला के बिस्तर के किनारे पर रखा। उसकी आवाज़ गले में ही अटक रही थी, "भा... भाभी... ये क्या हो गया आपको? आप तो बिल्कुल... मेरा तो कलेजा कांप रहा है आपको ऐसे देखकर। डॉक्टर क्या कह रहे हैं?"

शीला ने एक गहरी, उखड़ी हुई साँस ली। उसकी नज़रें सीधे रसिक की आँखों में थीं।

"डॉक्टर ने कह दिया है रसिक, कि मेरा टिकट कट चुका है," शीला ने बिल्कुल सपाट लहज़े में कहा, "यूट्रस का.. मतलब बच्चेदानी का कैंसर है। आखिरी स्टेज पर। अब बस कुछ दिनों की मेहमान हूँ।"

"कैंसर?" रसिक के मुँह से अवाक होकर निकला। "पर... पर ऐसे कैसे अचानक? आप तो बिल्कुल ठीक थीं भाभी।"

शीला ने एक फीकी हँसी हँसी, जो खाँसी में बदल गई। "अचानक नहीं हुआ रसिक। ये आग बहुत पहले से मेरे अंदर सुलग रही थी। तुझे पता है इस कैंसर की वजह क्या है?"

रसिक ने नासमझी से सिर हिलाया।

"ये उसी हवस का नतीजा है रसिक, जिसमें हम सालों तक अंधे होकर गोते लगाते रहे," शीला की आवाज़ अब एक चेतावनी की तरह गूँजने लगी। "अनगिनत मर्द... और बिना किसी रोक-टोक की वो अय्याशी। उसी गंदे खेल ने मेरे शरीर में वो वायरस डाल दिया, जिसने मुझे अंदर से सड़ा दिया है। ये बीमारी नहीं है रसिक, ये मेरे कर्मों का वो हिसाब है, जो भगवान मुझसे ब्याज समेत वसूल रहा है।"

रसिक का पूरा शरीर पसीने से नहा गया। अभी कुछ दिनों पहले ही उसने मौसम का जो हाल किया था, और अब शीला का ये भयानक अंजाम सुनकर उसकी रूह कांप उठी। उसे लगा जैसे आईसीयू की वो ठंडी हवा उसकी हड्डियों में घुसकर उसे अंदर से जमा रही है।

शीला ने बड़ी मुश्किल से अपना हाथ उठाया और रसिक के कांपते हुए हाथ पर रखा। उसकी आँखों में अब कोई जिस्मानी चाहत नहीं थी, बल्कि एक मौत की दहलीज पर खड़ी औरत की नसीहत थी।

"रसिक... तूने मेरे साथ, मौसम के साथ, और न जाने कितनी औरतों के साथ अपनी मर्दानगी की प्यास बुझाई है," शीला ने खांसते हुए कहा, "लेकिन मेरी ये हालत देख ले। इस जिस्म का अंजाम देख ले। ये गोश्त और हड्डियां सब यहीं इसी बिस्तर पर सड़ कर खाक हो जाएंगी। जिस्म की ये भूख कभी खत्म नहीं होती रसिक, लेकिन ये इंसान को खत्म ज़रूर कर देती है।"

रसिक की आँखें भर आईं। वह घुटनों के बल शीला के बिस्तर के पास बैठ गया।

"आज मैं तुझे अपनी आखिरी नसीहत दे रही हूँ रसिक," शीला ने अपनी पूरी ताक़त बटोर कर कहा। "इस दलदल से बाहर निकल जा। रूखी के पास लौट जा। और उसे भी कहना की सुधर जाएँ और बाहर मुंह मारना बंद कर दें.. अगर तू नहीं रुका रसिक, तो याद रखना... तेरा अंजाम भी मेरी ही तरह होगा। या तो तू किसी ऐसी ही भयानक बीमारी से तड़प-तड़प कर मरेगा, या फिर तेरे कर्म तेरे ही घर में आग लगा देंगे। छोड़ दे ये अय्याशी का रास्ता..।"

रसिक की आँखों से आँसू छलक पड़े। शीला की उस कंकाल जैसी हालत और उसके मौत से रंगे हुए शब्दों ने रसिक के अंदर के उस जंगली, हवस के भूखे मर्द को पूरी तरह मार दिया था। उसे रूखी का और अपने लल्ला का वो भोला चेहरा याद आ गया।

रसिक ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। वो बुरी तरह कांप रहा था।

"मैं कसम खाता हूँ भाभी..." रसिक रोते हुए, रुंधी हुई आवाज़ में बोला, "आपकी ये हालत देखकर मेरी आँखें खुल गई हैं। मुझे माफ कर दो भाभी। मैं आज के बाद किसी पराई औरत की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखूँगा। मैं अपनी बीवी के साथ वफादारी से रहूँगा... भगवान कसम भाभी, मैं ये सब गंदे काम आज ही छोड़ दूँगा।"

शीला के होठों पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"जा रसिक... अब मुझे अकेला छोड़ दे। और अपनी कसम याद रखना," शीला ने फुसफुसाते हुए कहा।

रसिक अपने आँसू पोंछता हुआ, एक बदला हुआ इंसान बनकर आईसीयू से बाहर निकल गया। शीला ने गहरी साँस ली। उसने अपनी ज़िंदगी में अनगिनत पाप किए थे, लेकिन मौत के मुहाने पर खड़े होकर, मौसम, फाल्गुनी और रसिक को सही रास्ता दिखाकर उसने अपने गुनाहों का बोझ थोड़ा कम ज़रूर कर लिया था।

अब उसे बस इंतज़ार था... वैशाली के बुलाए हुए उन तीन मोहरों का.. पीयूष, कविता और पिंटू। अपनी बिछाई हुई आखिरी और सबसे ज़हरीली बिसात को उसे अपने ही हाथों से पलटना था।
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अस्पताल के उस लंबे और ठंडे कॉरिडोर में एक भारी सन्नाटा पसरा था, जिसे तोड़ते हुए तीन अलग-अलग कदमों की आहटें वहां पहुंचीं। वैशाली के बुलावे पर पीयूष, कविता और पिंटू अस्पताल पहुँच चुके थे।

पिंटू की हालत सबसे ज़्यादा खराब थी। उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं, कंधे झुके हुए थे और माथे पर पसीने की ठंडी बूँदें चमक रही थीं। रंगे हाथों पकड़े जाने की शर्म ने उसे अंदर तक तोड़ दिया था। उसे हर किसी से खौफ आ रहा था.. वैशाली के तमाचे की गूँज अभी भी उसके कानों में थी, पीयूष से नज़रे मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं थी, और मदन या शीला का सामना करना तो मौत के बराबर लग रहा था।

दूसरी तरफ, कविता बिल्कुल बेपरवाह सी नज़र आ रही थी। पीयूष के उस तमाचे और घर से निकाले जाने के बाद, उसे अपने आस-पास की दुनिया से कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा था। उसने एक बार पिंटू की तरफ देखकर हल्की सी सहानुभूति जताने की कोशिश की, लेकिन पिंटू किसी डरे हुए जानवर की तरह झिझक कर उससे दो कदम पीछे हट गया।

तभी भारी और सधे हुए कदमों से पीयूष वहाँ पहुँचा। उसके चेहरे पर एक गहरी टेंशन थी। उसे अब तक यह समझ नहीं आ रहा था कि शीला को अचानक ऐसा क्या हो गया कि उसे आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। कविता को वहां देखकर पीयूष के चेहरे पर एक पल के लिए चिढ़ उभरी, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र वैशाली पर पड़ी, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर सुकून आ गया।

पर वैशाली आज किसी से कोई औपचारिकता निभाने के मूड में नहीं थी। उसका चेहरा पत्थर की तरह सख्त था।

"तुम तीनों आ गए, ठीक है," वैशाली ने बिना किसी का हाल-चाल पूछे, एक बेहद ठंडे और सपाट लहज़े में कहा, "मम्मी ने तुम तीनों को, और पापा को... एक साथ अंदर बुलाया है। उन्हें तुम सबसे कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है।"

पीयूष ने कुछ पूछना चाहा, लेकिन वैशाली बिना किसी की तरफ देखे सीधा आईसीयू के दरवाज़े की तरफ मुड़ गई।

मदन पहले से ही भारी मन के साथ दरवाज़े के पास खड़ा था। शीला ने आज तक अपनी बिछाई गई हर ज़हरीली बिसात मदन से छुपा कर रखी थी। लेकिन अब, मौत की दहलीज पर खड़ी शीला जानती थी कि राज़ सीने में दफन करके ले जाने का कोई फायदा नहीं। मदन को सब कुछ जानना ज़रूरी था, ताकि उसके जाने के बाद मदन इन चारों की उजड़ी हुई ज़िंदगियों को वापस समेटने में उनकी मदद कर सके।

वैशाली, मदन, पीयूष, कविता और पिंटू... पांचों भारी कदमों से आईसीयू के अंदर दाखिल हुए।

कमरे के बीचों-बीच, सफेद चादरों के बीच शीला किसी सूखी टहनी की तरह लेटी थी। मशीनों की बीप-बीप के बीच, जब शीला ने इन पांचों को एक साथ देखा, तो उसके पपड़ीदार होठों पर एक हल्की सी, सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसने अपनी बची-खुची सारी ताक़त को इस आखिरी, सबसे मुश्किल काम के लिए बटोरना शुरू किया।

s2

"आ गए तुम सब..." शीला की आवाज़ बहुत कमज़ोर और हांफती हुई थी, लेकिन उसमें अभी भी एक अजीब सा अधिकार था।

पीयूष आगे बढ़ा, "भाभी, ये आपको क्या..."

"शशश... पीयूष, चुप बिल्कुल!" शीला ने अपना कांपता हुआ हाथ उठाकर उसे बीच में ही रोक दिया। "जब तक मैं अपनी बात पूरी न कर लूँ, कोई मुझे बीच में नहीं टोकेगा। मेरी साँसें गिनती की बची हैं, और मुझे बहुत कुछ उगलना है।"

पूरे कमरे में एक खौफनाक खामोशी छा गई। मदन हैरानी से अपनी पत्नी को देख रहा था।

शीला ने एक गहरी साँस ली और अपनी उस घिनौनी बिसात का एक-एक पन्ना खोलना शुरू किया।

"तुम चारों की ज़िंदगियां आज जिस मुकाम पर खड़ी हैं... जो घर टूटे हैं, जो रिश्ते बिखरे हैं... वो किसी हालात का नतीजा नहीं थे। वो मेरी रची हुई एक साज़िश थी।" शीला की बात सुनते ही पीयूष और पिंटू के चेहरे का रंग उड़ गया।

"वैशाली," शीला ने अपनी बेटी की तरफ देखते हुए कहा, "याद है तूने मुझे पिंटू की उस कमज़ोरी के बारे में रोते हुए बताया था? और ये भी कहा था कि वो अपने ईगो में आकर किसी डॉक्टर को भी नहीं दिखा रहा? एक माँ होने के नाते मुझे पिंटू का इलाज करवाना चाहिए था, लेकिन मैंने क्या किया? मैंने पीयूष की दौलत को देखा, और तय किया कि मेरी बेटी उस महल पर राज करेगी।"

पीयूष की आँखें फटी की फटी रह गईं।

"पीयूष, मैंने बड़ी ही चालाकी से तुम्हारे दिमाग में वैशाली का बीज बोया," शीला हांफते हुए, एक-एक शब्द चबाते हुए बोल रही थी। "तुम्हें कविता से दूर करने के लिए मैंने अपने जिस्म का इस्तेमाल किया। याद है वो रात, जिसके अगली सुबह तुमने कविता पर हाथ उठाया था? उस रात मैंने ही कविता को पट्टी पढ़ाई थी कि वो तुमसे ज़बरदस्ती प्यार मांगे। क्योंकि मुझे पता था कि तुम उसे वो प्यार नहीं दे पाओगे... क्योंकि पिछली रात मैंने खुद तुम्हें अपने जिस्म में इतना निचोड़ लिया था कि तुम सुबह किसी काम के नहीं बचे थे।"

यह सुनते ही मदन को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर हथौड़ा मार दिया हो। कविता ने झटके से अपना मुँह ढँक लिया।

शीला रुकी नहीं, उसने पिंटू की तरफ देखा, "जब कविता घर छोड़कर उस पुराने फ्लैट में गई, तो वो बहुत अकेली और डरी हुई थी। मैंने ही उसे उकसाया कि वो पिंटू को फोन करे और रोकर उसे वहां बुलाए। मैं जानती थी कि पिंटू सीधा-सादा और भावुक है, वो कविता के रोने पर दौड़ा चला जाएगा।"

पिंटू की आँखें आंसुओं से भर गईं। उसे समझ आ रहा था कि वो किस भयानक जाल में फंसा था।

"और वैशाली..." शीला की आवाज़ अब और भारी हो गई, "मैंने ही तुमसे कहा था न कि अगर पिंटू की बेवफाई साबित हो जाए, तो क्या तुम पीयूष के पास जाओगी? तुमने झिझकते हुए हाँ कह दिया था। जैसे ही मुझे पता चला कि पिंटू कविता के पास पहुँच गया है, मैंने पीयूष को उस फ्लैट की डुप्लीकेट चाबी के साथ बुलाया, और हम सब वहाँ साथ जा पहुँचे... ताकि पिंटू और कविता रंगे हाथों पकड़ा जाए, वैशाली का दिल टूट जाए, और पीयूष का रास्ता साफ हो जाए। मैंने तुम चारों को कठपुतलियों की तरह नचाया।"

शीला चुप हो गई। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। पूरे आईसीयू में किसी श्मशान जैसा सन्नाटा था। सिर्फ मदन के भारी-भारी सिसकने की आवाज़ आ रही थी, जिसे अपनी पत्नी के इस राक्षसी रूप का आज पहली बार पता चला था।

शीला ने वैशाली की तरफ देखा, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, "पिंटू सच में बहुत अच्छा इंसान है वैशाली। उसकी एक शारीरिक कमज़ोरी को छोड़कर, उसने कभी तुझे धोखा नहीं दिया। तेरा उस पर भरोसा करना बिल्कुल सही था। मैंने ज़हर घोला था... मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची।"

फिर शीला ने पिंटू की तरफ अपने हाथ जोड़े, "मुझे माफ कर दे पिंटू। मेरी सज़ा मुझे मिल रही है। पर मेरे इस घिनौने पाप के लिए मेरी वैशाली को सज़ा मत देना। उसकी कोई गलती नहीं थी।"

पिंटू फफक कर रो पड़ा। उसके सीने में वैशाली के लिए जो गुस्सा था, वो एक पल में खत्म हो गया। वह शीला से नफरत करना चाहता था, लेकिन इस कंकाल हो चुकी, मौत की दहलीज पर भीख मांगती औरत को देखकर उसका गुस्सा तरस में बदल गया। पिंटू ने रोते हुए अपना सिर हिलाकर शीला को माफ कर दिया।

अब शीला ने अपनी नज़रें पीयूष और कविता की तरफ घुमाईं।

"पीयूष... याद कर वो पुराने दिन," शीला के चेहरे पर एक पुरानी यादों वाली मुस्कान आ गई, "जब हम सब पड़ोसी हुआ करते थे। तुम राजेश की ऑफिस के एक मामूली मुलाजिम थे, मोटरसाइकिल पर घूमते थे, पर तुम दोनों कितने खुश थे। पैसे कम थे, पर प्यार बेशुमार था। दौलत ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया पीयूष। कविता जैसी हीरा लड़की तुम्हें दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी। तुम बहुत बड़े बेवकूफ होगे अगर तुम अपनी इस दौलत के अहंकार में अपनी इतनी प्यारी बीवी को खो दोगे। काम धंधा तो चलता रहेगा, पर कविता को इस चक्कर में इग्नोर करते रहे तो याद रखना.. तुम्हारे साथ ये दौलत नहीं आएगी.. तुम्हारे आखिरी पल तक यही लड़की तुम्हारा साथ देगी।"

शीला ने कांपते हाथों से कविता की तरफ इशारा किया, "मैंने तेरे साथ जो किया कविता, उसके लिए मैं माफ़ी के लायक भी नहीं हूँ। पर तेरा दिल बहुत बड़ा है। पीयूष को माफ कर दे... और अपने घर वापस लौट जा।"

कविता, जो अब तक बुत बनी खड़ी थी, अचानक फूट-फूट कर रोने लगी। वो दौड़कर शीला के पास आई और उसने शीला को कसकर गले लगा लिया। सारी नफरत, सारा गुस्सा उस एक आँसुओं से भीगे गले मिलने में पिघल गया।

कुछ ही पलों में, आईसीयू का वो दमघोंटू नज़ारा बदल गया। पीयूष ने आगे बढ़कर रोती हुई कविता का हाथ कसकर थाम लिया, और दूसरी तरफ पिंटू ने अपनी झिझक तोड़कर वैशाली के कंधे पर हाथ रखकर अपनी ओर खींच लिया। दोनों जोड़ियां.. जो कल तक हमेशा के लिए टूटने की कगार पर थीं.. आज एक-दूसरे का हाथ थामे खड़ी थीं। उन्होंने अपना सबक सीख लिया था।

शीला की आँखें अब थक कर बंद होने लगी थीं। उसने अपनी गर्दन बहुत मुश्किल से मदन की तरफ घुमाई, जो सदमे और आंसुओं में डूबा हुआ सिर झुकाए खड़ा था।

शीला ने अपना ठंडा हाथ मदन के हाथों में रख दिया।

"मदन..." शीला की आवाज़ अब सिर्फ एक फुसफुसाहट रह गई थी। "इन चारों का खयाल रखना। और... और तुझे बेवफाई और हवस के बारे में क्या ही ज्ञान दूँ... तू तो खुद अपनी आँखों से मेरा ये भयानक अंजाम देख रहा है। जिस्म की भूख ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा।"

शीला ने मदन का हाथ हल्का सा दबाया, "मेरे जाने के बाद अकेले मत रहना मदन। किसी अच्छी और वफादार औरत को देखकर शादी कर लेना। अपनी बाकी की ज़िंदगी सुकून से बिताना।"

यह सुनते ही मदन बुरी तरह टूट गया। उसने घुटनों के बल बैठकर शीला के दोनों हाथ अपने गालों से लगा लिए। उसके आँसुओं से शीला के हाथ भीग गए।

"क्या बकवास कर रही हो शीला!" मदन रोते हुए चीखा, "तुम्हारे जैसी कोई नहीं हो सकती... कोई नहीं! तुममें हज़ार बुराइयां थीं, तुमने जो किया वो गलत था... लेकिन मेरे लिए, तुम आज भी मेरी वही शीला हो। मेरी जान हो तुम। मैं तुम्हारे बिना किसी और औरत के बारे में अब सोच भी नहीं सकता। मैं अकेले जी लूँगा, पर किसी और को तुम्हारी जगह नहीं दे सकता।"

मदन के इन प्यार भरे, बेपनाह वफादारी वाले शब्दों ने शीला की आत्मा को एक अजीब सा सुकून दे दिया। अपनी बिछाई हुई सारी ज़हरीली बिसात को उखाड़ फेंकने का सुकून। चारों बच्चों को वापस मिला देने का सुकून।

मदन के आखिरी शब्द अभी पूरे भी नहीं हुए थे कि...

बीप... बीप... बीप... बीईईईईईईईईईप...

आईसीयू में गूँजती वो हार्ट-रेट मॉनिटर की मशीन अचानक एक लंबी और सपाट नीली लकीर में बदल गई। वह तेज़, लगातार गूँजने वाली आवाज़ कमरे के सन्नाटे को चीरने लगी।

पांचों ने झटके से मशीन की तरफ देखा और फिर खौफ से शीला के चेहरे की तरफ।

शीला की आँखें हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं। लेकिन उसके चेहरे पर कोई दर्द, कोई पछतावा या खौफ नहीं था। उसके होठों पर एक बहुत ही गहरी, शांत और मुकम्मल सुकून भरी मुस्कान ठहर गई थी.. यह बताने के लिए कि अपने आखिरी पलों में, वो वो सब कुछ समेटने में कामयाब हो गई थी, जिसे उसने खुद अपने हाथों से बिखेरा था।

शीला की लीला यहीं समाप्त हुई.. ||

Goodbye
— समाप्त —
बहुत ही जबरदस्त और गजब का शानदार लाजवाब समापन हैं भाई कहानी का मजा आ गया
 
  • Love
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vakharia

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Just on lighter note:

एक मिलियन व्यूज कि वखारिया जी आपको बहुत बहुत बधाई
इस मील के पत्थर के खातिर शीला ने कहां कहां नहीं मरवाई
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:heart:𝕋𝕙𝕒𝕟𝕜𝕤 𝕗𝕠𝕣 𝕥𝕙𝕖 𝕔𝕠𝕞𝕞𝕖𝕟𝕥𝕤 :heart:
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vakharia

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अगले अपडेट का इंतजार रहेगा भाई
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Sanju@

Well-Known Member
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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

शीला अपनी बेटी वैशाली के घर आई है, जहाँ घर के सभी सदस्य अनुपस्थित हैं.. माँ-बेटी साथ समय बिताती हैं, जिससे वैशाली को सहारा मिलता है.. हालाँकि, तीसरे दिन, वैशाली इंस्टाग्राम पर उत्तेजक विडियो देखकर कामुक रूप से उत्तेजित हो जाती है.. अपनी तीव्र इच्छा को शांत करने के लिए, वह कविता की माँ के नौकर बाबिल को बुलाने की योजना बनाती है..

शीला को वैशाली एक प्रदर्शनी में साड़ियाँ देखने भेज देती है.. मौका मिलते ही वह बाबिल को अपने घर बुला लेती है और उसके साथ यौन संबंध शुरू कर देती है.. जैसे ही वे आपस में मग्न होते हैं, अचानक दरवाजे की घंटी बज उठती है, जिससे दोनों चौंक जाते हैं..

अब आगे..

__________________________________________________________________________________________________

एक ही पल में वैशाली का हाथ बाबिल के ट्रेकपेंट के ऊपर से ही उसके मस्त लंड को सहलाने लग गया..


1

इससे पहले की बाबिल संभल पाता, वैशाली ने एक झटके में उसका पेंट, जांघिये समेट घुटनों तक उतार दिया.. और बाबिल के तने हुए हथियार के सामने उकड़ूँ अवस्था में बैठ गई

प्यारे गुलाबी लंड की मोटाई को अपनी मुठ्ठी में पकड़कर, उभरी हुई नसों को वह बेतहाशा चाटने लगी.. बाबिल के तो जैसे होश ही उड़ गए.. चमकते हुए गुलाबी टोपे के मूत्र-छेद पर अपनी जीभ की नोक से चाटना शुरू कर वैशाली ने कुछ ही पलों में उस लंबे लंड को अपने कंठ तक उतार दिया..!!

2


टिंग टॉंग..!!!

घर की डोरबेल बजी..

वैशाली ने तुरंत लंड को अपने मुंह से बाहर निकाला.. सोच में पड़ गई.. बेवक्त कौन टपक पड़ा..?? उसने अपने होंठ पर उंगली रखकर बाबिल को शांत खड़े रहने का इशारा किया.. पास बेड पर पड़ा टॉप पहन लिया.. और दरवाजे पर आई.. खोलने से पहले उसने दरवाजे में बने छेद से बाहर देखा... बाहर उसकी मम्मी शीला खड़ी थी..!!!!

अरे बाप रे..!!! मम्मी इतनी जल्दी कैसे वापिस आ गई?? अब क्या करें..??? बाबिल को कहाँ छुपाऊँ??

उसी उधेड़बुन के बीच शीला ने और दो तीन बार डोरबेल बजाई..

वैशाली भागकर बेडरूम में आई और बाबिल से कहा.. "जल्दी कपड़े ठीक कर ले.. और झाड़ू उठाकर सफाई शुरू कर"

बाबिल को पता नहीं चला की उसे असल में बुलाया किस लिए गया था..!!! वैशाली को इतनी घबराए हुए देखकर उसने तुरंत झाड़ू उठाया और फर्श पर लगाने लगा..

वैशाली ने दरवाजा खोला.. शीला अंदर आकर उसे आश्चर्य से देखती रही.. ऊपर से नीचे तक वैशाली का निरीक्षण करते हुए शीला के शातिर मन में सौ सवाल खड़े हो रहे थे.. पर वो गर्मी से बेहाल हो रही थी इसलिए उसने पंखा ऑन किया और धम्म से सोफ़े पर बैठ गई..

वैशाली की नज़रों में छुपा डर साफ नजर आ रहा था शीला को.. वह रुमाल से अपने चेहरे का पसीना पोंछते हुए वैशाली की तरफ तीक्ष्ण नज़रों से देख रही थी

वैशाली ने कृत्रिम मुस्कान के साथ कहा "अरे मम्मी, इतनी जल्दी कैसे आ गई? सेल में गई नहीं क्या?"

शीला ने थोड़े गुस्से से कहा "मुझे वहाँ भेजने से पहले चेक तो करना था.. सेल तो कल ही खतम हो गया.. बेकार में आने जाने के २०० रुपये ले लिए ऑटो वाले ने.. पर तू बता.. तू तो ऑफिस जाने वाली थी ना..??"

वैशाली ने नजरें झुका ली और कहा "वो फिर आज ट्रक आया ही नहीं तो मटीरीअल कल ही जाएगा.. जाने का कोई मतलब नहीं था इसलिए..!!"

शीला को कुछ तो गंध आ रही थी पर पता नहीं चल पा रहा था की वैशाली आखिर क्या गुल क हिला रही है.. तभी बेडरूम से कुछ गिरने की आवाज आई.. शीला और वैशाली दोनों चोंक उठे..

शीला: "कौन है अंदर?"

अब वैशाली की कठिन परीक्षा होने वाली थी

वैशाली: "वो.. वो... काफी दिनों से कामवाली बाई नहीं आई थी.. तो मैंने कविता के नौकर को फोन करके बुला लिया..!!"

संशय भरी नज़रों से शीला वैशाली की ओर देखती रही.. घर तो पहले से ही साफ-सुथरा था.. उसने खुद ही पिछले दिन पूरी सफाई की थी.. और वैसे भी वैशाली पहले से सफाई के लिए उतनी उत्सुक नहीं रहती थी.. घर पर भी उसकी ज्यादातर चीजें अस्तव्यस्त ही पड़ी रहती थी.. शीला के लाख कहने के बाद ही वह सफाई करती थी.. ऐसे में वैशाली की कही बात शीला को हजम नहीं हुई

शीला तुरंत उठ खड़ी हुई.. और अंदर बेडरूम में गई.. अंदर उस नेपाली लड़के को काम करते हुए उसने कुछ मिनटों तक उसका गहराई से मुआयना किया.. और फिर वापिस बाहर आई तब तक वैशाली किचन में चली गई थी.. असल में वह शीला से नजर मिलाना नहीं चाहती थी

सोफ़े पर आकर बैठी शीला का दिमाग बुलेट ट्रेन की गति से चलने लगा..!! साड़ियों के सेल में भेजने के लिए वैशाली की उत्सुकता.. फिर अचानक ऑफिस जाने की बात... फिर आधे ही घंटे के अंदर सब केन्सल हो जाना और अकेली वैशाली एक गोरे-चिट्टे तंदूरस्त जवान लड़के के साथ..!!

शीला के दिमाग को दो और दो चार का गणित गिनने में ज्यादा वक्त नहीं लगा.. उसने आवाज देकर वैशाली को बुलाना चाहा.. पर ड्रॉइंग रूम में उनकी बातचीत उस नौकर को भी सुनाई देती.. इसलिए वैशाली को बुलाने के बजाए उसने खुद ही अंदर कीचेन में जाकर बात करना मुनासिब समझा..

वह जब कीचेन में आई तो वैशाली बेफिजूल ही बर्तन ऊपर नीचे कर रही थी..

शीला: "क्या चल रहा है कुछ बताएगी मुझे तू?"

वैशाली का बदन पसीने से तर हो गया, वह जानती थी की अपनी मम्मी की नज़रों से यह छुपाना नामुमकिन था

उसने बनावटी हंसी के साथ कहा "किस बारे में बात कर रही हो मम्मी? मैं समझी नहीं"

अब शीला की भृकुटी तंग हो गई, उसने वैशाली का हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचते हुए कहा "आधे घंटे पहले तक तो ऑफिस जाने की बहोत जल्दी थी तुझे.. मुझे अकेले नहीं जाना था फिर भी साड़ियों के सेल में धकेल दिया.. और अचानक से तुझे सफाई की इतनी फिकर कब से होने लगी? हुई तो हुई.. यह सब कुछ आधे ही घंटे में?? चलो माना की तुझे मेरे जाने के बाद सफाई का खयाल आया होगा.. उतनी देर में तूने कविता को फोन कर नौकर को बुलाया और वो आ भी गया..!!! कविता का घर इतना नजदीक तो है नहीं..!!"

वैशाली का मन कर रहा था की अभी धरती फटे और वो अंदर समा जाएँ.. शीला ने उसकी चोरी बखूबी पकड़ ली थी.. उसकी माँ के सभी शक जायज थे और उसका कोई जवाब नहीं था उसके पास

वैशाली: "आप गलत समझ रही हो मम्मी.. वो.. असल में... अम्म.. वो कविता को फोन किया तो उसका नौकर यहीं कुछ सामान लेने आया था तो मैंने बुला लिया.. वैसे और कुछ नहीं है"

शीला को अब गुस्सा चढ़ने लगा.. यह लड़की मुझे मूर्ख समझती है क्या..!! उतनी उसकी उम्र नहीं है जिससे ज्यादा तो मैं खुद ऐसे कांड कर चुकी हूँ.. और यह मुझे बेवकूफ बना रही है??

शीला ने गुस्से से तमतमाते हुए चेहरे से वैशाली को कहा "मेरे सामने देख.. नजरें क्यों छिपा रही है?"

बेमन से वैशाली ने घबराई हुई नज़रों से शीला की तरफ देखा.. शीला की आँखों का गुस्सा देखकर वैशाली की हालत खराब हो गई

शीला: "सच सच बता.. क्या माजरा है? क्या चल रहा है तेरे और उस नौकर के बीच?"

अब वैशाली से अपने आप को रोका न गया.. उसने शीला के कंधों पर अपना सिर रख दिया और फूटफुटकर रोने लग गई..

एक ही पल में शीला का शक यकीन में बदल गया.. रो रही वैशाली पर गुस्से से गुर्राई "तू पागल हो गई है क्या वैशाली? वो भी यहाँ अपने घर में? एक नौकर को बुलाकर? अक्ल है भी तुझे या बेच आई है? शादी से पहले जब पिंटू ने तुझे राजेश के साथ देख लिया था तब क्या हुआ था.. भूल गई क्या?? कितनी मिन्नतें.. कितने वादे किए थे.. खुद मैंने पैरों में पड़कर.. गिड़गिड़ाकर माफी मांगी थी, तब जाकर पिंटू माना था.. जरा सा भी अंदाजा है तुझे की पिंटू को पता चला तो क्या होगा??"

शीला के कंधों पर सिर रखकर रो रही वैशाली ने अपने आँसू पोंछे और डाइनिंग टेबल की कुर्सी खींचकर नजरें झुकाए बैठ गई.. शीला भी उसके सामने बैठ गई.. आखिर कारण तो जानना ही था की आखिर वैशाली ने ऐसी बेवकूफों वाली हरकत भला क्यों की.. शीला को दिक्कत उस बात से नहीं थी की उसकी बेटी किसी पराए मर्द के साथ पाई गई थी, तकलीफ इस बात की थी की पिंटू को पता चल गया तो कैसा अनर्थ हो जाएगा

रोते बिलखते हुए वैशाली ने अपनी आपबीती बताई.. पिंटू की नपुंसकता, उसके डॉक्टर के पास जाने से कतराना, उल्टा वैशाली पर गुस्सा करना.. पिछले कई महीनों से पिंटू उसे संतुष्ट नहीं कर पाया था.. सारी बातें विस्तारपूर्वक बताई

सुनकर शीला स्तब्ध हो गई..

थोड़ी नरमी के साथ पर गंभीरतापूर्वक शीला ने कहा "समझ रही हूँ बेटी, समझ रही हूँ तेरी मजबूरी.. तू मेरी बेटी है, तेरे शरीर की आग मैं नहीं समझूंगी तो और कौन समझेगा? पर ये तूने जो किया, इतना बड़ा जोखिम उठाना.. ये बेवकूफी है वैशाली! बहुत बड़ी बेवकूफी..!! इतना भी नहीं समझती तू?"

वैशाली ने उखड़ते हुए कहा "तो क्या करूँ मम्मी? कब तक ऐसे ही बैठी रहूँ?? पिंटू का प्रॉब्लेम अपने आप तो ठीक होने वाला है नहीं.. और डॉक्टर के पास तो वो जाने से रहा..!! इतने महीने तड़पते हुए निकाले.. पर अब बर्दाश्त नहीं होता मुझसे"

शीला का गुस्सा अब अपनी बेटी के प्रति सहानुभूति में बदलने लगा..

शीला: "समझ सकती हूँ बेटा.. मैं तेरी जगह होती तो शायद मैं भी कुछ ऐसा ही करती.. पर मेरी बात और है.. तेरे सिर पर पिंटू नाम का पहरा है..!! तुझे याद है न राजेश वाला कांड? लाख माफ़ी-मिन्नतों के बाद, एक शर्त पर तेरी शादी टिकी है.. कि तू दोबारा ऐसी गलती नहीं करेगी!"

वैशाली अब भड़क पड़ी और बोली "तो क्या करूँ? ऐसे ही मर मरकर जीती रहूँ? पिंटू की खोखली मर्दानगी के लिए अपनी जवानी और अपने अरमानों को आग लगा दूँ?? क्या करूँ मैं, तुम्ही बताओ मुझे मम्मी"

शीला की बोलती बंद हो गई.. वैशाली की बात शत-प्रतिशत सही थी..

उसने एकदम धीरे से कहा "तेरी बात सुनकर अब समझ तो आ रहा है की तूने यह क्यों किया.. और उसपर मैं सवाल भी नहीं उठा रही.. मैं यह कह रही हूँ की यहाँ घर पर उसे बुलाकर यह सब करना खतरे से खाली नहीं है"

वैशाली: "पिंटू बेंगलोर है.. सास-ससुर मेरे दूसरे शहर है.. फिर कहाँ कोई डर की बात है मम्मी?"

शीला: "रे पगली! दुनिया में कुछ भी छुपता है? कल को यह नौकर खुद ही किसी को बता देगा तो..!! पड़ोसी ने देख लिया तो क्या होगा..!!! किसी की नजर पड़ गई तो क्या करेगी... एक बार शक हुआ ना पिंटू को, फिर वह तेरे पीछे पड़ जाएगा.. तू तो जानती है उसका गुस्सा! पिछली बार तो बस पकड़े गए थे, इस बार तो... सबूत मिल गया तो? तलाक! सरेआम बदनामी! और तेरी जिंदगी तबाह हो जाएगी! बेटी, मैं तेरे सुख के खिलाफ नहीं हूँ.. मैं तेरी माँ हूँ, तू खुश रहे, यही चाहती हूँ.. पर तू इतनी लापरवाही से काम मत कर.. अगर करना ही है, तो इतनी बेवकूफी से नहीं..चालाकी से कर"

वैशाली ने बेबस हो कर कहा "फिर क्या करूँ मैं मम्मी? आप ही बताओ"

शीला का खुराफाती दिमाग काम पर लग गया.. उस गोरे लड़के को देखकर नियत तो शीला की भी डोल उठी थी.. मन तो उसका भी कर गया था.. काफी समय से वह केवल राजेश और मदन के वही पुराने लंडों से खेलकर ऊब चुकी थी.. यह बढ़िया मौका था..वैशाली तो वैसे भी वहीं करने वाली थी जो शीला उससे कहेगी

बड़ी ही सावधानी से अपने पाँसे फेंकते हुए शीला ने कहा "देख वैशाली, अब जो हो गया सो हो गया.. लड़का यहाँ आ चुका है.. तो बिना उसका इस्तेमाल किए जाने तो नहीं देंगे..!! और वैसे भी.. अभी तू अकेली तो है नहीं.. तेरे साथ मैं हूँ.. कोई जानेगा तो भी शक नहीं होगा.. इसलिए रास्ता तो साफ है लेकिन.." शीला बीच में ही अटक गई

वैशाली: "लेकिन क्या मम्मी?"

शीला ने एक लंबी सांस छोड़कर कहा "तू उससे मिले उससे पहले मैं उस लड़के को परखूँगी"

वैशाली का दिमाग घूम गया.. इसमें परखना क्या?? ये कोई हीरे मोती है जो इन्हें मम्मी परखेगी?? पर फिर उसका माथा ठनका.. अपनी मम्मी के किस्से उसने भी बहोत सुने थे.. वह समझ गई.. की मम्मी का दिल बाबिल पर आ गया है.. चलो, कोई बात नहीं, इसी बहाने मम्मी मान तो गई.. खुद को तसल्ली देते हुए वैशाली ने कहा

वैशाली: "ठीक है मम्मी, तो पहले आप चले जाइए अंदर"

शीला: "नहीं वैसे सीधे सीधे नहीं"

वैशाली को कुछ समझ नहीं आया, उसने कहा "मतलब? आप कहना क्या चाहती हो?"

शीला ने बड़े ही कमीने अंदाज में कहा "मेरे कहने का मतलब यह है की पहले तू अंदर जा.. और ऊपर ऊपर से शुरुआत कर.. फिर ऐसा दिखावा करेंगे की मैंने तुम दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया..!!"
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वैशाली को कुछ समझ नहीं आ रहा था की शीला क्या खेल खेल रही थी, वह बोली "पर ऐसा क्यों मम्मी?"

शीला ने एक शैतानी मुस्कान के साथ कहा "ऐसा करने से लड़का हमारे दबाव में रहेगा.. किसी के सामने बकेगा नहीं.. मैंने अनुभव से सीखा है, ऐसे मामलों में अगर सामने वाला हमारे कंट्रोल में हो तो आसानी रहती है.. !!"

वैशाली ने जवाब नहीं दिया.. शीला के अगले आदेश के लिए वह तैयार बैठी थी

शीला: "एक काम कर, मैं घर से बाहर चली जाती हूँ, तू मुझे घर की चाबी दे दे.. और फिर मेरे जाने के बाद तू उसके साथ अंदर चली जाना.. फिर कहना की मैं चली गई हूँ और रास्ता साफ है"

वैशाली: "ओके मम्मी" कहते हुए घर के लैच-लॉक की चाबी शीला को दे दी.. शीला तुरंत दरवाजे के बाहर चली गई और वैशाली बेडरूम के अंदर चली आई.. अंदर बेड के पीछे डरा हुआ बाबिल दुबककर बैठा था.. उसकी बड़ी बड़ी आँखों से वैशाली की ओर देख रहा था.. देखकर मन ही मन वैशाली की हंसी छूट गई.. वैसे आधे घंटे पहले उसका हाल भी कुछ वैसा ही तो था..

बाबिल ने घबराते हुए कहा "मैं घर जाऊ?"

वैशाली ने मुस्कुराकर बाबिल के लंड को पकड़ते हुए कहा "जिस काम के लिए आया था वो करेगा नही??"

असमंजस में बाबिल ने पूछा "पर वो मेहमान..!! वो मेडम"

वैशाली: "वो तो कब की चली गई.. अब कोई नहीं है घर पर"

वैशाली उस लड़के का लंड दबोचकर उसके गले को चूमने लगी.. बाबिल की घबराहट धीरे धीरे कम हो रही थी.. गर्दन पर चूमते हुए वैशाली बाबिल के पीछे की तरफ चली गई और पीछे से उसे बाहों में भर लिया

3

वैशाली की चूचियाँ बाबिल के पीठ पर धँस गई.. वैशाली अपना हाथ आगे लाकर बाबिल के लंड पर ले आई और पतलून के बाहर निकालकर पकड़ कर मसलने लगी..

‘आहह.. मालकिन..’ बाबिल के मुँह से मस्ती भरी ‘आहह’ निकल गई और आँखें बंद हो गईं..

कुछ ही पलों में बाबिल का लंड तन कर अपनी औकात पर आ गया..

इस बात से अंजान कि दरवाजे पर खड़ी शीला ये सब देखते हुए अपने पेटीकोट के ऊपर से अपनी चूत को मसल रही थी..

5

शीला को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था..बाबिल का लंबा और मोटा लंड किसी मूसल के तरह खड़ा हुआ था.. जिसे देखते ही शीला की चूत पनियाने लगी..


9

वैशाली और बाबिल एक दूजे में खोए हुए थे की तभी अचानक से दरवाजा हिलने की आवाज़ से दोनों चौंक गए..

चौंका तो सिर्फ़ बाबिल था और वैशाली तो सब जानते हुए बनने का नाटक कर रही थी..

जैसे ही बाबिल की नज़र शीला पर पड़ी.. मानो उसकी गांड फट गई हो..

वैशाली तो कब से पीछे हट कर शीला की तरफ पीठ करके सर झुकाए खड़ी थी..

बाबिल कभी शीला की तरफ देखता.. कभी वैशाली की तरफ देखता.. तो कभी अपने झटके खाते हुए लंड की तरफ देखता..

डर के मारे थरथर कांप रहे बाबिल को देखकर शीला के होंठों पर वासना से भरी मुस्कान फ़ैल गई..

जिससे देख बाबिल उलझन में पड़ गया..!! यह भला गुस्सा होने की जगह मुस्कुरा क्यों रही है??

‘वो अपना पजामा ठीक कर..’ शीला ने बाबिल के लंड की तरफ इशारा करते हुए कहा..

‘और तुम वैशाली ज़रा बाहर आओ.. ये क्या गुल खिला रही थी?’

यह कह कर शीला वापिस ड्रॉइंग रूम में चली आई.. खेल शुरू हो चुका था.. वैशाली अपनी हँसी रोकते हुए कमरे से बाहर चली गई और बाबिल वहीं ठगा सा खड़ा रह गया.. कुछ पलों के लिए मानो उसके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया हो..

जब उसे होश सा आया तब उसने लपक कर अपनी ट्रेकपेंट को ऊपर किया.. उसका पूरा बदन डर से थरथर काँप रहा था.. अब क्या होगा?

बाबिल अपना सिर पकड़कर बिस्तर पर बैठ गया..

वैशाली के जाने के बाद बाबिल उस कमरा में ऐसा महसूस कर रहा था, जैसे वो किसी क़ैद खाने में बैठा हो और अभी बाहर से कुछ लोग आयेंगे और उसकी पिटाई शुरू हो जाएगी..

एक अजीब सा सन्नाटा उस कमरा में फैला हुआ था.. तभी कमरे के बाहर से कुछ क़दमों की आहट हुई..

जिससे सुन कर बाबिल के हाथ-पैर काँपने लगे.. लेकिन तभी वैशाली कमरे में दाखिल हुई, उसके चेहरे से ऐसा लग रहा था.. जैसे उसको कोई फर्क ही ना पड़ा हो..

बाबिल ने हकलाते हुए पूछा "क्या.. क्या हुआ... कौन है वो? अब क्या होगा मालकिन?"

वैशाली ने एकदम गंभीर चेहरा बनाकर बिस्तर पर बैठते हुए कहा " वो मेरी मम्मी थी जिन्हों ने हमे पकड़ लिया.. बहोत गुस्से वाली है.. तेरी कंप्लेन पुलिस में कर देने वाली थी.. जैसे तैसे मैंने उन्हें रोक लिया है... सुन बाबिल, अब सब तेरे हाथ में है.. अगर तू चाहे तो ये बात माँ किसी को नहीं बताएगी.. पुलिस को भी नहीं"

बाबिल को कुछ समझ नहीं आ रहा था, वह बोल "पर मैं.. मतलब? पर कैसे मालकिन?"

वैशाली: "तू एक काम कर.. यहाँ पर बैठ… मम्मी थोड़ी देर में यही आ रही हैं.. ध्यान रहें, वो तुझसे जो भी करने को कहें कर लेना.. मना मत करना वरना कहीं वो पुलिस में चली गई तो पूरी ज़िंदगी जेल की चक्की पिसेगा"

यह कह कर वैशाली बिना बाबिल से आँख मिलाए कमरे से बाहर निकल गई, एक बार फिर से वो जान निकाल देने वाला सन्नाटा कमरा में छा गया..

बाबिल को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करे.. वह दोनों क्या चाहते थे उससे आखिर..!!!

वैशाली जब बेडरूम से बाहर निकलकर दरवाजा अपने पीछे बंद कर रही थी तभी शीला उसके सामने खड़ी हुई थी..

दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और फिर दोनों के होंठों पर वासना से भरी मुस्कान फ़ैल गई..

‘ध्यान से मम्मी.. लड़का दिखने में भोला सा है पर उसका वो.. बहुत तगड़ा है..’ वैशाली ने शीला के पास से गुज़रते हुए कहा..

वैशाली की बात सुन कर शीला मुस्कुराई.. ‘अपनी माँ को कम आँकने की गलती मत करना कभी..’

वैशाली ने पीछे मुड़ कर शीला की तरफ देखा और एक बार फिर दोनों के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई, फिर वैशाली किचन की ओर चली गई..

उधर कमरे में बैठा, बाबिल अपनी किस्मत को कोस रहा था कि आख़िर वो वैशाली के साथ यहाँ क्यों आया.. क्यों कविता मालकिन के कहने पर वो चला आया.. आज अगर बच गया तो अब बड़ी वाली रमिला मालकिन के अलावा किसी के पास नहीं जाएगा..

एक बार फिर से कमरे के बाहर से आ रही क़दमों की आहट सुन कर बाबिल के रोंगटे खड़े हो गए..

वो जानता था कि अन्दर कौन आने वाला है और वो बिस्तर से खड़ा हो गया..

जैसे ही शीला उसके कमरा में आई तो उसने अपने सर को झुका लिया..

शीला ने एक बार सर झुकाए खड़े बाबिल की तरफ देखा, फिर पलट कर दरवाजे को बंद कर दिया.. दरवाजा बंद होने की आवाज़ सुन कर बाबिल एकदम से चौंक गया..

उसे समझ में नहीं आया कि आख़िर शीला ने दरवाजा किस लिए बंद किया है..

दरवाजा बंद करने के बाद शीला मदहोश अंगड़ाई लेकर बाबिल की तरफ देखते हुए, बिस्तर के पास जाकर खड़ी हो गई..

1a
शीला का मांसल जिस्म अपने जलवे बिखेर रहा था, उसकी गदराई कमर का मांस बाहर निकला हुआ था और नाभि इतनी गहरी थी मानो कुदरत ने उसे दूसरी चूत से नवाजा हो

बाबिल ने तिरछी नज़रों से शीला की तरफ देखा, जो उसकी तरफ देख कर मंद-मंद मुस्करा रही थी..

अपने सामने खड़ी शीला का ये रूप देख उससे यकीन नहीं हो रहा था.. इतने बड़े बड़े स्तनों वाली स्त्री उसने आज तक नहीं देखी थी

उससे देखते ही, बाबिल का मन मचल उठा.. पर कुछ करने या कहने के हिम्मत कहाँ बाकी थी..वो तो किसी मुजरिम की तरह उसके सामने खड़ा था..

‘ओए छोरे इधर आ..’ शीला ने बिस्तर पर बैठते हुए कहा..

बाबिल ने एकदम से चौंकते हुए कहा "जी क्या..?"

शीला: "जी.. जी.. क्या लगा रखा है, इधर आकर खड़ा हो…ठीक मेरे सामने..!!"

बाबिल बिना कुछ बोले शीला के सामने बिस्तर के पास जाकर खड़ा हो गया.. अब भले ही वो सर झुका कर खड़ा था, पर ब्लाउज में से शीला की झाँकती विराट चूचियों का दीदार उसे साफ़ हो रहा था, क्योंकि शीला उसके सामने बिस्तर पर बैठी हुई थी..

‘क्या कर रहा था..तू मेरे बेटी के साथ?’ शीला ने कड़क आवाज़ में बाबिल से पूछा, जिसे सुनते ही बाबिल की गांड फटने को आ गई.. पर वो बिना कुछ बोले खड़ा रहा..

‘सुना नहीं.. क्या पूछा मैंने?’

इस बार बाबिल के लिए चुप रहना नामुनकिन था..

‘वो मैं नहीं.. मालकिन कर रही थीं..’ बाबिल ने शीला की तरफ देखते हुए कहा..

‘अच्छा तो तेरे मतलब सब ग़लती मेरी बेटी की है.. इधर आ..’

शीला ने बाबिल का हाथ पकड़ कर उसे और पास खींच लिया..

बाबिल अवाक सा उसकी ओर देख रहा था..


अगला मजेदार अपडेट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
बहुत ही कामुक गरमागरम अपडेट है शीला जल्दी आ जाती है वैशाली के आव भाव देखकर शीला को शक हो जाता है और वह वैशाली से गुस्से में पूछती हैं वैशाली सब कुछ बता देती हैं शीला वैशाली के साथ अपना भी इंतजाम कर लेती है दोनों मां बेटी बाबिल के साथ चूदाई करने वाली हैं
 
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Sanju@

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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

वैशाली और बाबिल के बीच चुदाई का खेल शुरू होने ही वाला था की तब डॉरबेल बजी.. शीला लौट चुकी थी.. हालांकि वैशाली ने अपने झूठ को छुपाने की भरसक कोशिश की पर शीला की शातिर आँखों से सच छुप नहीं पाया.. शीला पहले तो वैशाल पर उखड़ पड़ती है पर अपनी बेटी की समस्या को सुनने के बाद उसका मन बदलता है.. वैशाली से पहले वो बाबिल को परखना चाहती है..

अब आगे..
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इससे पहले कि उसे कुछ समझ आता, शीला ने उसके मुरझाए हुए लंड को पतलून के ऊपर से पकड़ लिया और ज़ोर से मसल दिया..

‘आह दर्द हो रहा.. मालकिन ओह्ह..’

बाबिल ने शीला का हाथ हटाने की कोशिश करते हुए कहा..

शीला ने बाबिल की तरफ वासना से भरी नज़रों से देखते हुए कहा "क्यों रे, अब तो ये ऐसे मुरझा गया है…जैसे इसमें जान ही ना हो…पहले कैसे इतना कड़क खड़ा था.. साले.. मेरी जवान बेटी पर ग़लत नज़र रखता है.." ये कहते हुए शीला ने उसके लंड को थोड़ा और ज़ोर से मसल दिया..

1

बाबिल की तो जैसे जान ही निकल गई, उसके चेहरे से साफ़ पता चल रहा था कि वो कितने दर्द में है..
उसके चेहरे को देख कर शीला को अंदाज़ा हुआ कि उसने कुछ ज्यादा ही ज़ोर से उसके लंड को मसल दिया..

शीला ने उसके लंड को छोड़ दिया, फिर उसके लंड को हथेली से रगड़ने लगी..

बाबिल को जैसे लकवा मार गया हो.. वो बुत की तरह शीला को देख रहा था, जो उसकी तरफ देखते हुए, एक हाथ से अपनी चूची को ब्लाउज के ऊपर से मसल रही थी और दूसरे हाथ से बाबिल के लंड को सहला रही थी..

शीला "क्यों रे.. मेरे बेटी को चोदने वाला था..!! एक बार मुझे भी चोद कर देख.. देख फिर कितना ज्यादा मज़ा दूँगी.." ये कह कर उसने एक झटके से बाबिल की पतलून उतार दी..

इससे पहले कि घबराए हुए बाबिल को कुछ समझ आता.. उसकी पेंट घुटनों तक आ चुकी थी और उसका अधखड़ा लंड शीला के हाथ की मुठ्ठी में था..

2
"ये… ये आप क्या रही हैं मालकिन… ओह्ह नहीं मालकिन आ आहह.."

शीला ने उसके लंड के सुपाड़े पर चमड़ी पीछे सरका दी और गुलाबी सुपाड़े जो कि किसी छोटे सेब जितना मोटा था, उसे देख शीला कर आँखों में वासना छा गई..

शीला के मदमस्त भोसड़े की फांकें फड़फने लगीं और उनकी दीवारों ने कामरस की बूंदे बहाना शुरू कर दिया..

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क्योंकि अब बाबिल का लंड अपने असली विकराल रूप में आना शुरू हो गया था, शीला ने अपने अंगूठे के नाख़ून से बाबिल के लंड के सुपाड़े के चारों तरफ कुरेदा..

तो बाबिल की मस्ती भरी ‘आहह’ निकल गई और अगले ही पल उसे अपने लंड का सुपाड़ा किसी गरम और गीली जगह में जाता हुआ महसूस हुआ..

उससे ऐसा लगा जैसे किसी नरम और रसीले अंग ने उसके लंड के सुपाड़े को चारों तरफ से कस लिया हो..
जब बाबिल ने अपनी मस्ती से भरी आँखों को खोल कर नीचे देखा..

तो जो हो रहा था, उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ..

शीला ने एक हाथ से उसके टट्टों को मुठ्ठी में पकड़ रखा था.. उसके लंड का सुपाड़ा शीला के होंठों के अन्दर था और दूसरे हाथ से शीला अपनी चूची को मसल रही थी..

5

ये नज़ारा देख बाबिल एकदम से हैरान रह गया, शीला ने उसके लंड के सुपाड़े को चूसते हुए.. ऊपर बाबिल की तरफ देखा.. दोनों की नज़रें आपस में जा मिलीं..

बाबिल का लंड अपनी पूरी औकात पर आ चुका था..

जिस हाथ की मुठ्ठी में शीला ने बाबिल के लंड को भर रखा था, उसे यकीन नहीं हो रहा था कि इस उम्र के लड़के का लंड भी इतना बड़ा हो सकता है..!!

अचानक से शीला ने बाबिल के फनफनाते हुए लंड को अपने मुँह से बाहर निकाला और बिस्तर पर लेट गई..
उसकी टाँगें बिस्तर के नीचे लटक रही थीं..उसने अपनी टाँगों को उठा कर घुटनों से मोड़ा और अपने पेटीकोट को टाँगों से ऊपर उठाते हुए, अपनी कमर तक चढ़ा लिया..

7

यह देख कर बाबिल की हालत और खराब हो गई..

शीला की चूत की फाँकें फैली हुई थीं और उसमें से कामरस एक पतली सी धार के रूप में बह कर उसकी गांड के छेद की तरफ जा रहा था..उसकी चूत का छेद कभी सिकुड़ता और कभी फैलता..

8

बाबिल बिना अपनी पलकों को झपकाए हुए, उसकी तरफ देख रहा था..

यह देख कर शीला के होंठों पर कामुकता भरी मुस्कान फ़ैल गई..

‘देख.. तेरे लंड के लिए पानी छोड़ रही है..’ शीला ने अपनी चूत की फांकों को फ़ैलाते हुए अंदर के गुलाबी छेद को दिखाते हुए कहा..

9

यह सुन कर बाबिल की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा.. अब उसे समझ में आ रहा था यह दोनों माँ-बेटी उसके साथ खेल रही थी

बाबिल को यूँ खड़ा देख कर शीला से रहा नहीं गया, उसने अपना हाथ आगे बढ़ा कर बाबिल के लंड को पकड़ा और उसके लंड के गुलाबी मोटे सुपाड़े को अपनी गीली चूत के छेद पर रगड़ने लगी..


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बाबिल के लंड के गरम और मोटे सुपाड़े का स्पर्श अपनी चूत के छेद पर महसूस करते ही.. शीला के बदन में मस्ती की लहर दौड़ गई..

शीला की वासना से भरी हुई आँखें बंद हो गईं..

उसने बड़ी ही अदा के साथ एक बार अपने होंठों को अपने दाँतों से चबाया और काँपती हुई आवाज़ में बाबिल से बोली "ओह्ह.. बेटा डाल दे.. मेरी चूत में अपना ये मोटा लंड पेल दे… चोद मुझे साले ओह्ह..!!"

बाबिल का लंड अब पूरी तरह से तन चुका था और पूरे जोश में आ चुका था..

शीला उसके लंड को अपनी दो उँगलियों और अंगूठे के मदद से पकड़े हुए, अपनी चूत के छेद पर उसका लंड का सुपाड़ा टिकाए हुए थी..

बाबिल ने शीला की टाँगों को घुटनों से पकड़ कर मोड़ कर ऊपर उठाया और अपनी पूरी ताक़त के साथ एक जोरदार झटका मारा..

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बाबिल का लंड शीला की चूत की दीवारों से रगड़ ख़ाता हुआ तेज़ी के साथ अन्दर घुसता चला गया.. और धनाधन चोदने लगा.. इतनी अनुभवी और चुदक्कड़ शीला भी इन प्रचण्ड प्रहारों से स्तब्ध हो कर रह गई.. वह एकदम से कराह उठी.. पर तब तक बाबिल का ८ इंच लंबा पूरा का पूरा लंड शीला के भोसड़े की गहराईयों में उतर चुका था..

शीला: "हइई.. आह्ह.. ओह्ह.... ओह हरामी.. धीरे कर थोड़ा.. ओह्ह ओह्ह निकाल साले.. फाड़ के रख दी.. मादरचोद.. मेरी चूत ओह्ह..!!"

शीला ने अपने कंधों और गर्दन को बिस्तर से उठा कर अपनी चूत की तरफ देखने की कोशिश करते हुए कहा..

बाबिल भी शीला के कराहने की आवाज़ सुन कर थोड़ा डर गया और अपना लंड शीला की चूत से बाहर निकालने लगा..

अभी उसने अपना लंड आधा ही बाहर निकाला था कि शीला ने उससे कंधों से पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया..

जिससे बाबिल का लंड एक बार फिर शीला की चूत की दीवारों से रगड़ ख़ाता हुआ अन्दर घुस कर उसके बच्चेदानी के मुँह से जा टकराया..

शीला ने अपने ब्लाउज के बटन खोले.. ब्रा को सरकाया और सिसकते हुए बाबिल के चेहरे को अपनी चूचियों में दबा लिया.. इतने विशाल बबलों के बीच अपना चेहरा दबा हुआ पाकर बाबिल तो जैसे धन्य ही हो गया..

बाबिल अब जैसे पागल हो चुका था… निप्पलों को चूसते हुए वह शीला के खरबूजों को मसलने लगे..

शीला का रोम-रोम रोमांच से भर उठा.. नीचे से उसके चूतड़ ऊपर की तरफ उछल पड़े.. यह सीधा संकेत था कि वो बाबिल का पहला जोरदार वार झेल कर अब चुदवाने के लिए तड़प रही है..

बाबिल शीला के ऊपर लेटा हुआ दोनों हाथों से शीला के मम्मों को मसलते हुए हुमच रहा था.. शीला की आँखें फिर से मस्ती में बंद होने लगी थीं.. उसकी मादक सिसकियाँ पूरे कमरे में गूँज रही थीं..

अपनी निप्पल को पकड़कर बाबिल के मुंह में ठुसते हुए शीला बोली "ओह्ह ये ले.. ठीक से चूस्स्स इसे.. ओह्ह ओह्ह ह आह्ह..!!" शीला ने नीचे से अपनी कमर को हिलाते हुए कहा..

बाबिल ने भी झट से शीला की चूची को आधे से ज्यादा मुँह में भर लिया और ज़ोर-ज़ोर से चूसना चालू कर दिया..इतने विशाल स्तन थे की उसकी दोनों हथेलियों में मिलाकर भी शीला का एक स्तन नहीं आता था..

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बाबिल ने अपने लंड को आधे से ज्यादा बाहर निकाला और फिर पूरी ताक़त से अन्दर पेल दिया.. बाबिल का लंड पिछले आधे घंटे से खड़ा था.. शीला का भोसड़ा किसी तंदूर से भी ज्यादा गरम था और वह गर्मी अब बाबिल के बर्दाश्त से बाहर हो रही थी..

वो बिस्तर के किनारे खड़ा हो गया और शीला की टाँगों को घुटनों से मोड़ कर ऊपर उठा कर पूरी तरह से फैला दिया..

जिससे उसकी चूत ठीक उसके लंड के लेवल पर आ गई और बाबिल तेज़ी से अपने लंड को शीला की चूत की अन्दर-बाहर करने लगा..

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बरसों बाद शीला इतने जवान लंड से चुद रही थी.. इससे पहले इतना जवान साथी जो था.. वह था.. उसका खुद का दामाद पिंटू.!!! तब वो कविता का आशिक था.. और उन दोनों के मिलने का जुगाड़ शीला के घर पर ही होता था चूंकि तब मदन अमरीका गया हुआ था.. तभी एक बार मौका पाकर, शीला और रेणुका ने साथ मिलकर पिंटू को ऐसा रगड़ा था की वो रो दिया था..

बाबिल का मोटा लंड पाकर शीला के मानो ख़ुशी के आँसू बाहर निकालने लगी.. ऐसा तगड़ा लंड तो केवल रसिक का ही था..

शीला का भोसड़ा सरपट गीला हो चुका था और बाबिल का लंड भी शीला की चूत से निकल रहे गाढ़े पानी से एकदम सन गया था..

अब बाबिल का लंड ‘फच-फच’ की आवाज़ करता हुआ तेज़ी से शीला की चूत के अन्दर-बाहर हो रहा था और वह भी अपनी गांड को उछाल कर बाबिल का साथ दे रही थी..

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उसका पूरा बदन बाबिल के लगाए हुए हर धक्के के साथ हिल रहा था.. उसके बबले यहाँ वहाँ झूल रहे थे और शीला अपने सर को इधर-उधर पटकते हुए मछली के जैसे तड़प रही थी..

शीला कभी अपनी दोनों चूचियों को मसलती, कभी वो बिस्तर की चादर को अपने हाथों में दबोच लेती..

उसकी चूचियाँ हर धक्के के साथ हिल रही थीं, जिससे देख कर बाबिल का जोश और बढ़ता जा रहा था..

शीला "ओह बेटा धीरेए ओह्ह ओह्ह ह आह्ह.. उँघह धीरेए ऊहह निकाल जाएगा तेरा.. ओह्ह मज़ा आ गया .. ओहह.. आह्ह.. धीरेए ओह्ह ओह्ह ओह्ह..!!"

शीला की भोसड़े ने भरसक पानी छोड़ना चालू कर दिया और वो अपनी गांड को पागलों की तरह उछालते हुए झड़ने लगी..

उसने अपने बिखरे हुए बालों को नोचना शुरू कर दिया..

पर बाबिल अभी भी पूरी रफ़्तार के साथ शीला की चूत में अपना लंड अन्दर-बाहर कर रहा था..

शीला का पूरा बदन एकदम से ऐंठ चुका था, पर बाबिल के ताबड़तोड़ धक्कों ने एक बार फिर से उसकी चूत को ढीला कर दिया था..

शीला झड़ने के बाद पूरी तरह शांत हो चुकी थी और अपनी टाँगों को फैलाए हुए बाबिल के लंड को अपनी चूत में मज़े से ले रही थी..

आख़िर ५ मिनट की और चुदाई के बाद शीला दूसरी बार झड़ गई और इस बार बाबिल के लंड ने भी उसकी भोसड़े में अपना वीर्य उड़ेल दिया..

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जैसे ही बाबिल का लंड सिकुड़ कर बाहर आया.. शीला जल्दी से उठ कर बाथरूम चली गई..

बाबिल ने अपने मुरझाए हुए लंड की ओर देखा, वो शीला की चूत की कामरस से एकदम भीगा हुआ था..
उसने कमरे में इधर-उधर नज़र दौड़ाई.. तो उसे फर्श पर पड़ी शीला की साड़ी नज़र आई.. वो साड़ी के पास गया और उसके एक छोर को पकड़ कर उससे अपना लंड साफ़ करने लगा.. तभी वैशाली अचानक से कमरे में आ गई..

उसने बाबिल के लंड की तरफ देखा.. जो शिकार करने के बाद लटक रहा था..

वैशाली ने शैतानी मुस्कान के साथ कहा "क्यों मज़ा आया ना?"

बाबिल वैशाली की बात सुन कर एकदम से हैरान रह गया.. उससे यकीन नहीं हो रहा था कि वैशाली उससे अपनी माँ के बारे में पूछ रही है..

हँसते हुए वैशाली कमरे से बाहर चली गई..

बाबिल खड़ा हुआ और बिना अपना पेंट पहने नंगा ही बाथरूम की ओर गया.. दरवाजा सिर्फ अटका हुआ था, बंद नहीं था.. अंदर से कुछ आवाज़ सुनाई दे रही थी..

उसने दरवाजे पर कान लगाया तो शीला के मूतने की सुरीली सी आवाज़ उसके कानों में पड़ी… वह दरवाजे के पास खड़ा होकर अन्दर झाँकने लगा..

अन्दर का नज़ारा देख कर एक बार फिर से बाबिल का लंड पूरे उफान पर आ गया..

बड़े बड़े गोरे चूतड़ों को उजागर कर शीला मूतने के बाद झुक कर अपनी चूत को एक कपड़े से साफ़ कर रही थी.. पीछे खड़े बाबिल के सामने शीला के बड़े-बड़े चूतड़ों के बीच लबलबा रही चूत का गुलाबी छेद उस पर कहर बरपा रहा था..

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शीला को इस बात का पता नहीं था कि बाबिल उसके पीछे खड़े होकर उसकी बड़ी गांड को देख रहा है..

अगले ही पल बाबिल का लंड किसी सांप की तरह फुंफकारने लग गया ..

शीला अपनी चूत की फांकों को अपनी उँगलियों से सहला रही थी, उसके होंठों पर ख़ुशी से भरी हुई मुस्कान फैली हुई थी..

अचानक से उससे अपनी चूत पर एक बार फिर से बाबिल के लंड के मोटे और गरम सुपाड़े का अहसास हुआ.. जिसे महसूस करते ही.. उसके पूरे बदन में मस्ती की कंपकंपी दौड़ गई..

‘आह क्या कर रहा है ओह्ह..छोड़ मुझे!’

इसके पहले कि शीला कुछ संभल पाती.. बाबिल का लंड उसकी चूत की फांकों को फैला कर चूत के छेद पर जा लगा..

‘ओह्ह आह सीईईई..’ शीला के मुँह से मस्ती भरी ‘आह’ निकल गई..

शीला ने एक बार अपनी गर्दन पीछे घुमा कर बाबिल की तरफ अपनी वासना से भरी मस्त आँखों से देखा और मुस्करा कर फिर से आगे देखते हुए.. अपने दोनों हाथों को उस पुराने मेज पर टिका कर झुक गई..
फिर बड़ी ही अदा के साथ अपने पैरों को फैला कर पीछे से अपनी गांड ऊपर की तरफ उठा लिया..
अब बाबिल का लंड बिल्कुल शीला की चूत के सामने था..

बाबिल ने शीला के चूतड़ों को दोनों तरफ से पकड़ कर फैला दिया और अपने लंड को चूत के छेद पर टिका दिया..

इससे पहले कि बाबिल अपना लंड शीला की चूत में पेलने के लिए धक्का मारता.. शीला ने कामातुर होकर अपनी गांड को पीछे की तरफ धकेलना शुरू कर दिया..

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बाबिल के लंड का मोटा सुपाड़ा शीला की चूत के छेद को फ़ैलाता हुआ अन्दर घुस गया.. शीला अपनी चूत के छेद के छल्ले को बाबिल के लंड के मोटे सुपाड़े पर कसा हुआ साफ़ महसूस कर पा रही थी..

कामवासना का आनन्द चरम पर पहुँच गया.. शीला की चूत ने एक बार फिर से अपने कामरस का खजाना खोल दिया..

शीला की मस्ती का कोई ठिकाना नहीं था, उसकी चूत में सरसराहट बढ़ गई थी और वो बाबिल के लंड को जड़ तक अपनी चूत में लेने के लिए मचल रही थी..

"ओह्ह आह.. घुसाआ.. दे रे.. छोरे ओह फाड़ दे.. मेरी चूत ओह्ह आह… और ज़ोर से मसल मेरे गांड को ओह्ह हाँ.. ऐसे ही…"

बाबिल बुरी तरह से अपने दोनों हाथों से शीला की गांड को फैला कर मसल रहा था.. उसके लंड का सुपाड़ा शीला की चूत में फँसा हुआ, शीला को मदहोश किए जा रहा था.. बाबिल को भी अपने लंड के सुपाड़े पर शीला की चूत की गरमी साफ़ महसूस हो रही थी..

उसने शीला के चूतड़ों को दबोच कर दोनों तरफ फैला लिया और अपनी गांड को तेज़ी से आगे की तरफ धकेला.. बाबिल के लंड का सुपाड़ा शीला की चूत की दीवारों को चीरता हुआ आगे बढ़ गया, शीला के मुँह से एक घुटी हुई चीख निकल गई.. जो बाथरूम के दीवारों में ही दब कर रह गई..

बाबिल का आधे से अधिक लंड शीला की चूत में समा चुका था..

शीला ने पीछे की तरफ अपनी गांड को ठेल कर अपनी चूत में बाबिल का मोटा लंड लेते हुए कहा "आहह.. आह जालिम मेरी चूत.. ओह फाड़ दी… ओह्ह ओह तेरे इस मूसल लंड की तो मैं आह.. आह.. कायल हो गई उह्ह.. ओह्ह चोद दे.. मुझे.. और तेज धक्के मार.."

बाबिल भी अब नौकर और मालकीं की मर्यादाओं को भूल कर शीला के चूतड़ों को फैला कर अपने लंड को उसकी चूत में अन्दर-बाहर कर रहा था..बाबिल के हर जबरदस्त धक्के के साथ उसकी चूचियाँ तेज़ी से हिल रही थीं..

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"ओह रुक बेटे.. ज़रा ओह्ह ओह्ह.. मैं खड़ी-खड़ी थक गई हूँ..ओह्ह ओह्ह आह्ह.."

बाबिल ने अपने लंड को शीला की चूत से बाहर निकाल लिया.. शीला सीधी होकर उसकी तरफ पलटी और बाबिल के होंठों पर अपने रसीले होंठों को रखते हुए उसे से चिपक गई..

बाबिल ने उसकी कमर से अपनी बाँहों को पीछे ले जाकर उसके चूतड़ों को दबोच-दबोच कर मसलना शुरू कर दिया..

बाबिल का विकराल लंड शीला के पेट के निचले हिस्से पर रगड़ खा रहा था..

‘चल अंदर कमरे में चलते हैं..’ शीला ने चुंबन तोड़ते हुए कहा और फिर बाथरूम से निकल कर एक बेड के पास आ गई..


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बहुत ही कामुक गरमागरम और लाज़वाब अपडेट है शीला को बहुत दिनों बाद एक जवान लन्ड जो काफी लंबा और मोटा मिला है अब तो दमदार चूदाई होने वाली है
 
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