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Adultery शीला की लीला -५५ साल की शीला की जवानी (Completed)

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poorangyan

Cartoonist
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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

कहानी दो समानांतर कथाओं में विभाजित हो जाती है, जो अंततः एक ही अस्पताल में आकर मिलती हैं.. एक ओर युवावस्था की क्षणिक हवस का विनाशकारी परिणाम, तो दूसरी ओर चालाकी और साजिश के जाल में उलझी एक महिला के शरीर का विद्रोह।

पहली कथा में, फाल्गुनी और मौसम नशे में धुत होकर रसिक दूधवाले को बुलाती हैं.. एक ऐसा पुरुष जिसका शारीरिक आकार और क्षमता दोनों ही असामान्य है। रसिक पहले फाल्गुनी के साथ कठोर संभोग करता है, जिसमें फाल्गुनी को भले ही दर्द सहना पड़ता है, पर वह अपनी हवस के आगे समर्पण कर देती है। इसके बाद रसिक की नज़र मौसम पर पड़ती है, जो शुरू में डरी-सहमी होती है और रसिक के विशाल आकार को देखकर सिहर उठती है। पर धीरे-धीरे उत्तेजना की गर्मी में वह भी पिघल जाती है.. लेकिन जब रसिक उसकी संकीर्ण, कोमल योनि में अपना विशाल लिंग जबरदस्ती घुसा देता है, तो मौसम बेहोश हो जाती है और उसके शरीर से भारी मात्रा में रक्तस्राव होने लगता है। रसिक डरकर वहाँ से भाग जाता है, और फाल्गुनी, जो अब अपनी गलती का एहसास कर चुकी है, मौसम को अस्पताल ले जाती है। वहाँ डॉक्टर बताते हैं कि मौसम को गंभीर आंतरिक चोट लगी है और यदि रक्तस्राव नहीं रुका तो उसकी जान को खतरा हो सकता है। फाल्गुनी आत्मग्लानि से भर जाती है.. उसे समझ आता है कि उसकी हवस, उसकी लापरवाही और उसकी नासमझी ने उसकी सबसे करीबी सहेली को मौत के कगार पर ला खड़ा किया है। वह इस दार्शनिक सत्य से रूबरू होती है कि क्षणिक सुख के पीछे भागना अक्सर हमें विनाश के गर्त में धकेल देता है, और परिणामों की गंभीरता का एहसास तब होता है जब सब कुछ हाथ से निकल चुका होता है।

दूसरी कथा में, शीला.. जिसने अभी-अभी पिंटू और कविता को बेनकाब कर अपनी बड़ी जीत का जश्न मनाया था.. अचानक असहनीय पेट दर्द और रक्तस्राव से पीड़ित हो जाती है। उसका रजोनिवृत्ति दस साल पहले हो चुका था, फिर भी उसकी पैंटी पर गाढ़ा, असामान्य खून देखकर वह भीतर ही भीतर काँप उठती है। वह दर्द को स्ट्रेस और उम्र का तकाज़ा बताकर अनदेखा करने की कोशिश करती है, पर उसका शरीर उसे चीख-चीख कर बता रहा होता है कि उसके भीतर कुछ गहरा उबल रहा है। वैशाली के घर से लौटते समय कैब में ही वह बेहोश हो जाती है, और ड्राइवर उसे सीधे अस्पताल ले जाता है।मदन अस्पताल पहुंचता है। मदन फाल्गुनी को अस्पताल में देखकर चौंक जाता हैं, और दोनों की मुलाकात इस अप्रत्याशित मोड़ पर होती है.. एक ओर मौसम की जान को खतरा है, तो दूसरी ओर शीला की बीमारी का कारण अज्ञात है और उसके टेस्ट हो रहे हैं।

अब आगे..
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अस्पताल के उस वीआईपी कॉरिडोर के आखिरी छोर पर डॉ. माथुर का केबिन था। केबिन के भीतर एक भारी खामोशी पसरी थी, जिसे सिर्फ दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक और एयर कंडीशनर की नीरस गूँज ही तोड़ रही थी। मदन डॉक्टर की बड़ी सी महोगनी टेबल के सामने रखी कुर्सी पर बैठा था। उसके हाथ आपस में इतनी ज़ोर से गुंथे हुए थे कि उँगलियों के पोर सफेद पड़ चुके थे। उसका दिल किसी भट्टी की तरह धड़क रहा था।

डॉक्टर माथुर अपने चश्मे के पीछे से एक गहरी, पेशेवर लेकिन उदास नज़र से टेबल पर रखी शीला की पेट-स्कैन, एमआरआई और बायोप्सी की रिपोर्ट्स को देख रहे थे। उन्होंने एक भारी साँस ली, चश्मा उतारा और रिपोर्ट्स की फाइल बंद कर दी।

"मदन जी..." डॉ. माथुर की आवाज़ उस सन्नाटे में किसी हथौड़े की तरह गूँजी।

मदन अपनी कुर्सी पर थोड़ा आगे खिसका, उसकी आँखों में एक अजीब सी दहशत और अनजानी उम्मीद दोनों एक साथ तैर रहे थे। "जी डॉक्टर साहब... क्या कह रही हैं रिपोर्ट्स? शीला को क्या हुआ है? उसे वो पेट का दर्द और ब्लीडिंग... वो सब क्यों हो रहा है? कोई इन्फेक्शन है क्या? आप दवा लिख दीजिए, मैं अभी..."

"मदन जी, प्लीज़ खुद को संभालिए," डॉक्टर ने मदन को बीच में रोकते हुए, एक बेहद शांत लेकिन खौफनाक लहज़े में कहा, "रिपोर्ट्स आ गई हैं, और मेडिकल साइंस के हिसाब से हमारे पास आपको देने के लिए कोई अच्छी खबर नहीं है। शीला जी को कैंसर है।"

मदन का शरीर एक झटके से सुन्न पड़ गया। कैंसर शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरा।

"क.. क.. कैं... कैंसर? क्या कह रहे हैं आप डॉक्टर साहब?" मदन की आवाज़ किसी सूखे पत्ते की तरह कांप उठी।

डॉक्टर ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर मदन के कांपते हाथों पर रखा और मेडिकल हकीकत बयां करना शुरू किया, "मदन जी, शीला जी को एडवांस स्टेज का सर्वाइकल यानि गर्भाशय और यूटेराइन कैंसर है। इसे हम अपनी मेडिकल भाषा में स्टेज 4बी कहते हैं। ट्यूमर बहुत ज़्यादा एग्रेसिव है। बीमारी अब सिर्फ गर्भाशय तक सीमित नहीं है, पर वो पेल्विक वॉल्स, ओवरीज़ और आस-पास के लिम्फ नोड्स तक पूरी तरह फैल चुकी है। मेटास्टेसिस की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।"

मदन की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह एक ऐसे सीधे-सादे पति की तरह व्यवहार कर रहा था, जिसने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा अपनी पत्नी को रानी बनाकर रखने के लिए अमेरिका में खपा दिया था।

"लेकिन ये कैसे हो सकता है डॉक्टर साहब?" मदन बिलखते हुए बोला, "मेरी शीला न तो सिगरेट फूँकती है न ही उसने कभी तंबाकू को हाथ लगाया ! उसका खान-पान भी साफ-सुथरा है। उसका लाइफस्टाइल भी काफी एक्टिव हैं। फिर उसे कैंसर कैसे हो गया? किस चीज़ से हुआ ये सब?"

डॉक्टर माथुर ने एक लंबी, गहरी साँस ली। एक डॉक्टर के तौर पर सच बताना उनका फर्ज़ था, चाहे वो सच कितना भी कड़वा और घिनौना क्यों न हो।

"मदन जी, यह कोई मुंह, फेफड़ों या पेट का कैंसर नहीं है जो खान-पान या सिगरेट से होता हो," डॉक्टर ने बहुत नपे-तुले, लेकिन स्पष्ट शब्दों में कहा, "सर्वाइकल कैंसर के 95% से ज़्यादा मामलों के पीछे एचपीवी (HPV - Human Papillomavirus) नाम का वायरस ज़िम्मेदार होता है। और यह वायरस हवा या पानी से नहीं फैलता।"

डॉक्टर एक पल के लिए रुके, ताकि मदन इस बात को समझ सके।

"तो... तो फिर ये कैसे फैलता है?" मदन ने उलझन और डर से फटी आँखों से पूछा।

डॉक्टर ने अपनी नज़रें हल्की सी नीची कीं और फिर मदन की आँखों में सीधा देखते हुए एक ऐसा सच उगला, जिसने मदन के वजूद को झकझोर कर रख दिया, "मदन जी... यह वायरस मुख्य रूप से अनप्रोटेक्टेड इंटरकोर्स यानि की असुरक्षित यौन संबंध से ट्रांसमिट होता है। जब किसी व्यक्ति के लंबे समय तक एक से अधिक लोगों के साथ असुरक्षित शारीरिक संबंध रहे हों, तो यह वायरस जननांगों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाता है। यह वायरस सालों तक शरीर में बिना कोई लक्षण दिखाए छुपकर बैठा रहता है, और अंदर ही अंदर गर्भाशय की कोशिकाओं को सड़ाता रहता है, उनका म्यूटेशन करता है।"

डॉक्टर ने आगे कहा, "शीला जी का मेनोपॉज़ बहुत पहले हो चुका था। उन्हें जो अनियमित ब्लीडिंग या कमर दर्द था, उन्होंने उसे काफी समय तक नज़रअंदाज़ किया। और इस तरह के एग्रेसिव इन्फेक्शन और ट्यूमर का जो पैटर्न इनकी रिपोर्ट्स में है, उसका मुख्य कारण वही मल्टीपल पार्टनर्स के साथ असुरक्षित यौन संबंध है। इस वायरस ने उन्हें अंदर से पूरी तरह खोखला कर दिया है।"

डॉक्टर के वो शब्द.. मल्टीपल पार्टनर्स और असुरक्षित संबंध.. मदन के दिमाग में किसी बम की तरह फटे। शीला और मदन दोनों ने अपनी मर्जी से ही ऐसी स्वच्छंद जीवनशैली को अपनाया था जहां ये तो उन दोनों के लिए काफी आम बात थी.. पर इसका नतीजा इतना भयानक होगा इसका उसे जरा सा भी अंदाजा नहीं था..

मदन कुर्सी से उठकर सीधा डॉक्टर की टेबल के पास जा पहुँचा और उसने डॉक्टर के दोनों हाथ अपने हाथों में कसकर पकड़ लिए।

"डॉक्टर साहब... मैं आपसे भीख मांगता हूँ!" मदन फूट-फूट कर रोते हुए गिड़गिड़ाने लगा, उसकी आँखों से आँसुओं की धारा डॉक्टर की टेबल पर गिर रही थी, "मुझे कोई मेडिकल साइंस नहीं समझना, मुझे कोई कारण नहीं जानना... मुझे बस मेरी शीला वापस चाहिए। आप कहिए तो मैं अभी उसे अमेरिका लेकर जाने को तैयार हूँ। दुनिया का कोई भी महंगा इलाज, कोई भी बड़ी सर्जरी, कोई भी कीमोथेरेपी... मैं अपना सब कुछ बेच दूँगा, अपना एक-एक पैसा पानी की तरह बहा दूँगा। बस आप मेरी शीला को बचा लीजिए! प्लीज़ डॉक्टर... उसे मरने मत दीजिए!"

डॉक्टर माथुर की आँखें भी नम हो गईं। उन्होंने बहुत ही नरमी से अपने हाथ मदन की पकड़ से छुड़ाए और मदन के कंधों को थामते हुए उसे वापस कुर्सी पर बिठाया।

"मदन जी, मुझे बहुत अफ़सोस है, लेकिन आपको सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा," डॉक्टर की आवाज़ में एक बेबसी और अंतिम फैसला था। "अब पैसा या अमेरिका काम नहीं आ सकता। शीला जी का कैंसर एक ऐसे स्टेज पर पहुँच चुका है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है। कोई सर्जरी अब उन कैंसर सेल्स को नहीं निकाल सकती, क्योंकि वो पूरे शरीर में फैल चुके हैं। हम सिर्फ पेलिएटिव केयर दे सकते हैं.. यानी कुछ दवाइयां और पेनकिलर्स, ताकि उनके आखिरी दिन कम दर्दनाक हों।"

मदन का सिर अपनी छाती तक झुक गया।

"व... वक़्त कितना है उसके पास?" मदन ने हकलाते हुए.. मरी हुई आवाज़ में पूछा।

"कुछ हफ्ते... या शायद कुछ दिन," डॉक्टर ने जवाब दिया। "बस इससे ज़्यादा नहीं।"

मदन के पैरों तले से ज़मीन, उसका आसमान, उसकी ज़िंदगी की सारी कमाई... सब कुछ उस केबिन के फर्श पर बिखर कर राख हो गया। उसने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों से छुपा लिया और एक छोटे बच्चे की तरह फफक-फफक कर रोने लगा।

वह उस कड़वे और ज़हरीले सच को अब अपनी नियति मान चुका था। उसने अपनी पत्नी के जिस्म की गद्दारी और मौत की उस काली परछाई को एक साथ स्वीकार कर लिया था। अब कुछ भी बाकी नहीं था... सिवाय इंतज़ार के।

कुछ देर बाद, भारी और कांपते कदमों के साथ मदन डॉक्टर के केबिन से बाहर निकला और उस आईसीयू की तरफ बढ़ गया, जहाँ शीला इन सबसे अनजान, अपनी ज़िंदगी की आखिरी साँसें गिन रही थी।

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अस्पताल के उस वीआईपी प्राइवेट कमरे, जिसे अब एक हाई-टेक आईसीयू (ICU) में तब्दील कर दिया गया था,की सफेद, ठंडी और दूधिया रोशनी शीला की आँखों में किसी तेज़ाब की तरह चुभ रही थी। हवा में फिनाइल, स्पिरिट और तेज़ दवाइयों की वह टिपिकल दम घोंटने वाली महक तैर रही थी, जो इंसान को उसके नश्वर होने का सबसे खौफनाक एहसास दिलाती है।

कमरे के बीचों-बीच रखे उस सफेद बिस्तर पर शीला लेटी हुई थी। वही शीला, जिसके चेहरे पर कुछ दिन पहले तक एक शातिर गुरूर, हुस्न का घमंड और दूसरों की ज़िंदगियों को अपनी उँगलियों पर नचाने का नशा था... आज एक कमज़ोर, बेबस और सूखी हुई टहनी की तरह उस बिस्तर पर पड़ी थी।

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केबिन के बाहर, कांच के दरवाज़े के उस पार, डॉक्टर माथुर ने मदन को शीला की ताज़ा एमआरआई और बायोप्सी की रिपोर्ट्स के बारे में सब कुछ बता दिया था।

"यूट्रस का कैंसर... फोर्थ स्टेज... और कारण... एचपीवी वायरस, जो मल्टीपल पार्टनर्स के साथ अनप्रोटेक्टेड इंटरकोर्स से फैला है।"

मदन के लिए मल्टीपल पार्टनर्स वाली बात कोई चौंकाने वाला राज़ नहीं था। वह शीला के अतीत और उसके अनगिनत यौन संबंधों से पूरी तरह वाकिफ था..पर सच तो यह था कि उन दोनों ने आपसी सहमति से इस उन्मुक्त, बेलगाम और हवस से भरी लाइफस्टाइल को चुना था। जब मदन अमेरिका में रहता था, तब से लेकर आज तक, उन्होंने अपनी जिस्मानी आज़ादी को अपनी मॉडर्न सोच का तमगा पहना रखा था।

लेकिन आज, डॉक्टर की बात सुनकर मदन को कोई धोखा नहीं, पर एक भयानक, गला घोंट देने वाली आत्मग्लानि महसूस हुई। जिस जिस्मानी आज़ादी और अय्याशी को वो दोनों अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा रोमांच मानते थे, आज उसी ने शीला को मौत के इस खौफनाक मुहाने पर ला खड़ा किया था।

मदन ने अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर एक झूठी, दिलासा देने वाली मुस्कान ओढ़ी और आईसीयू के भीतर शीला के बिस्तर के पास आ गया। उसने शीला का पीला पड़ चुका, सुइयों से छिदा हुआ हाथ अपने हाथों में लिया।

"कुछ... कुछ खास नहीं है शीला," मदन ने अपनी कांपती आवाज़ को सामान्य करने की पूरी कोशिश करते हुए कहा, "डॉक्टर कह रहे हैं कि बस यूट्रस में एक छोटा सा इन्फेक्शन हो गया है। कोई घबराने वाली बात नहीं है। बस कुछ दिन तेज़ एंटीबायोटिक्स चलेंगी, और सब बिल्कुल ठीक हो जाएगा। हम बहुत जल्द घर चलेंगे।"

लेकिन शीला का दिमाग? वो दिमाग जिसने ज़िंदगी भर बिसातें बिछाई थीं, जिसने लोगों के चेहरों के पीछे छिपे उनके सबसे गहरे राज़ पढ़े थे... वो इतनी आसानी से कैसे बेवकूफ बन सकता था?

शीला का शातिर और पारखी दिमाग तुरंत खतरे को सूंघ गया। उसने अपने शरीर के भीतर उठ रहे उस भयंकर, चीर देने वाले दर्द को महसूस किया, जो किसी मामूली इन्फेक्शन का नहीं हो सकता था। उसने अपनी तिरछी नज़रों से आस-पास घिरी उन भारी मेडिकल मशीनों, ऑक्सीजन पाइप्स और हार्ट-रेट मॉनिटर्स को देखा। एक छोटे से इन्फेक्शन के लिए किसी को आईसीयू की इन मौत जैसी बीप-बीप करती मशीनों के बीच नहीं रखा जाता.. इतना तो शीला जानती ही थी..

और सबसे बढ़कर, शीला की नज़रें मदन के चेहरे पर टिक गईं। मदन के होंठ भले ही मुस्कुरा रहे थे, लेकिन उसकी आँखें लाल और सूजी हुई थीं, उसकी ठुड्डी हल्की-हल्की कांप रही थी और उसके हाथों की पकड़ में एक बेबसी थी।

शीला ने अपनी सूखी जुबान होठों पर फेरी और मदन का हाथ हल्के से दबाया।

"मदन..." शीला की आवाज़ बेहद कमज़ोर थी, लेकिन उसमें वही पुरानी, बेधड़क सख्ती थी, "हम दोनों ने मिलकर अपनी पूरी ज़िंदगी दुनिया की आँखों में धूल झोंकी है। कम से कम मौत के इस बिस्तर पर तो मुझसे झूठा नाटक मत करो। ये दर्द कोई मामूली इन्फेक्शन नहीं है मदन। मेरी रगों का खून सूख रहा है, मुझे पता है। सच बताओ... डॉक्टर ने क्या कहा है?"

मदन ने फिर से झूठ बोलने के लिए मुँह खोला, लेकिन शीला की उन गहरी, सच को भेदती आँखों के सामने उसका झूठा नकाब भरभरा कर गिर पड़ा। मदन टूट गया। वह शीला के बिस्तर पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा।

"सब खत्म हो गया शीला... कुछ नहीं बचा!" मदन सिसकते हुए, रुंधी हुई आवाज़ में बोला, "कैंसर है तुम्हें... गर्भाशय का कैंसर... और वो आखिरी स्टेज में है। पूरे शरीर में फैल चुका है। डॉक्टर कह रहे हैं कि वो... वो जिस आजादी से हम आज तक जीते आए है... जो इतने सालों तक हमने अनगिनत लोगों के साथ... उसी से कोई वायरस शरीर में पनप गया था। उसी ने तुम्हें अंदर से खोखला कर दिया।"

यह सच कमरे में किसी बम की तरह फटा। शीला की साँसें वहीं अटक गईं। उसे ऐसा लगा जैसे मौत ने सीधे उसके सीने में एक बर्फीला खंजर उतार दिया हो। जिस जिस्म की भूख और जिन अनगिनत मर्दों की बाँहों को उसने और मदन ने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सुख माना था, आज उसी जिस्म ने, उसी हवस ने उसके अंदर मौत का बीज बो दिया था। कर्मों का हिसाब लौट कर आ गया था, और वो भी इतने वीभत्स रूप में।

शीला ने कांपते हुए हाथ से मदन के सिर को सहलाया और कहा, "मदन... रोना बंद करो। जो बोया है, वही तो काट रहे हैं। अब... अब मुझे थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ दो। प्लीज़, मुझे किसी से कोई बात नहीं करनी।"

मदन भारी कदमों से, खुद को घसीटता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।

अब उस खामोश आईसीयू में शीला बिल्कुल अकेली थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि उसमें सिर्फ मेडिकल मॉनिटर्स की वो मशीनी बीप... बीप... बीप... गूँज रही थी। शीला को वो आवाज़ यमराज के कदमों की आहट सी लग रही थी, जो हर गुज़रते सेकंड के साथ उसके करीब आ रहा था।

इंसान जब मौत के मुहाने पर होता है, तो ज़िंदगी किसी फिल्म की तरह उसकी आँखों के सामने से गुज़रती है। शीला के साथ भी यही हो रहा था।

उसे वो वक़्त याद आया जब मदन अमेरिका में था और तब से शुरू हुई उसकी ऐयाशी से भरी ज़िंदगी.. और फिर मदन के लौटने के बाद भी उन दोनों ने आपसी सहमति से एक खुली, बेपरवाह और हवस से भरी ज़िंदगी चुनी थी। उन्हें लगता था कि वो वह बहुत मॉडर्न हैं, दुनिया की उस दकियानूसी सोच से दो कदम आगे हैं जहाँ पति-पत्नी एक-दूसरे के गुलाम होते हैं। उन्होंने ओपन मैरिज के नाम पर अपनी शारीरिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपने हर उसूल, हर शर्म और हर मर्यादा का गला घोंट दिया था। वो कभी अपने किए पर शर्मिंदा नहीं हुई।

लेकिन आज, मौत के इस ठंडे बिस्तर पर लेटे हुए उसे एक भयानक सत्य का एहसास हो रहा था।

"जिस्म की आज़ादी... कितनी खोखली होती है न," शीला के गालों पर आँसुओं की एक गर्म धार बह निकली।

उसे आज समझ आ रहा था कि उन चंद मिनटों के शारीरिक सुख और कभी न मिटने वाली जिस्मानी भूख ने उसे असल में क्या दिया? कुछ नहीं! सिवाय एक दीमक की तरह अंदर से खोखला कर देने वाली बीमारी के। और वो भूख तो कभी मिटी ही नहीं.. उन क्षणभंगुर सुखों के लालच में उसने अपना स्वभाव कितना ज़हरीला बना लिया था। उसने इंसानों को इंसान समझना बंद कर दिया था। जब आप जिस्मों को बदलते हैं, तो आप रिश्तों को भी महज़ एक 'फायदे का सौदा' समझने लगते हैं। उसका सामाजिक व्यवहार, उसकी सहानुभूति, उसका मातृत्व... सब कुछ उस हवस की आग में जलकर राख हो चुका था। उसने अपनी रूह को सड़ा दिया था।

शीला की छाती में दर्द का एक भयानक रेला उठा, लेकिन यह दर्द उसके कैंसर का नहीं, पर उसके पश्चाताप का था।

अगर वो चाहती, तो एक साफ-सुथरी ज़िंदगी जी सकती थी। अपनी बेटी वैशाली को एक सही माँ की तरह संस्कार दे सकती थी, उसे सही और गलत की पहचान सिखा सकती थी। लेकिन उसने क्या किया? वैशाली को भी इसी हवस की दुनिया में धकेल दिया। वैशाली की दूसरी शादी से पहले उसके हिम्मत, पीयूष और राजेश के साथ जो संबंध थे उसे अनजाने में शीला ने ही पालने में मदद की थी। कभी अनजाने में तो कभी जानकर भी अनजान बनकर।

शीला के दिमाग में अचानक वो आखिरी, सबसे खौफनाक और घिनौनी बिसात घूम गई जो उसने महज़ तीन दिन पहले बिछाई थी। पीयूष, कविता, वैशाली और पिंटू की ज़िंदगी का वो भयंकर तमाशा।

उसने पीयूष के पैसों के लालच में अपनी ही बेटी वैशाली के दिमाग में ज़हर घोला। उसने रिश्तों को उसी तरह इस्तेमाल करो और फेंक दो की नज़र से देखा, जैसे वो मर्दों को देखती थी। उसने कविता जैसी एक डरी हुई अकेली औरत को उकसाकर उसका घर तुड़वाया। उसी कविता के ज़रिए पिंटू को अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए मोहरा बनाया। और फिर... खुद जाकर उन दोनों को रंगे हाथों पकड़ा, ताकि वैशाली की नज़रों में पिंटू हमेशा के लिए एक नीच धोखा देने वाला इंसान बन जाए, और पीयूष के लिए वैशाली का रास्ता साफ हो जाए।

"मैंने ये क्या कर दिया..." शीला ने सिसकते हुए अपने सूखे होंठों को दाँतों तले दबा लिया। "मैंने अपनी ही बच्ची की ज़िंदगी में अपना ज़हर घोल दिया। मैंने दो बसे हुए घर एक ही झटके में उजाड़ दिए... और किस लिए? ताकि मेरी बेटी को एक अमीर आदमी और उसका महल जैसा घर मिल सके? क्या पीयूष सच में वैशाली को प्यार देगा? क्या कोई रिश्ता इस धोखे और पाप की बुनियाद पर टिक सकता है?"

मौत की इस घड़ी में शीला को समझ आ गया था कि वो अपनी पूरी ज़िंदगी, अपना अतीत और अपने अनगिनत पाप तो नहीं सुधार सकती... उसकी सज़ा तो उसे अब भुगतनी ही थी। लेकिन वो अपना आखिरी गुनाह... वो आखिरी बिसात जो उसने बिछाई थी, उसे किसी भी कीमत पर सुधारना चाहती थी। वो वैशाली को अपने जैसा नहीं बनने देना चाहती थी।

तभी आईसीयू के कांच के दरवाज़े को धकेलते हुए वैशाली अंदर आई। वैशाली की आँखें रो-रोकर सूजी हुई थीं। उसने बाहर मदन से सब कुछ जान लिया था।

वैशाली अपनी माँ के बिस्तर के पास आकर ज़मीन पर बैठ गई। उसने शीला का ठंडा, कांपता हुआ हाथ अपनी आँखों से लगा लिया और सिसकने लगी, "मम्मी... ये क्या हो गया तुम्हें? तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगी। हम तुम्हें बड़े अस्पताल ले जाएंगे..."

शीला ने बहुत ही मुश्किल से वैशाली के सिर पर हाथ फेरा। उसकी आँखों में अब कोई शातिर चमक नहीं थी, पर एक माँ की और एक गुनहगार औरत की बेबसी थी।

"वैशाली..." शीला की आवाज़ किसी सूखी पत्ती की तरह कांप रही थी, "मेरी बच्ची... मेरा वक़्त अब खत्म हो रहा है। मेरी रगों में जो ज़हर दौड़ रहा है, उसे दुनिया का कोई डॉक्टर नहीं निकाल सकता। मुझे अब कोई नहीं बचा सकता।"

"नहीं मम्मी! ऐसा मत बोलो!" वैशाली चीख पड़ी।

"चुप... चुप हो जा और मेरी बात ध्यान से सुन," शीला ने अपनी पूरी ताक़त बटोरते हुए अपने लहज़े में थोड़ी सख्ती लाई। "जिंदगी भर मैंने जो गलतियां की हैं, जो पाप किए हैं, उनका सिला मुझे मिल गया है। मैं अपनी पूरी ज़िंदगी को तो पलट कर ठीक नहीं कर सकती... लेकिन वैशाली, मरने से पहले मुझे अपना आखिरी गुनाह सुधारना है। मुझ पर एक आखिरी एहसान कर दे मेरी बच्ची।"

वैशाली ने आँसू पोंछते हुए, हैरानी से अपनी माँ को देखा, "कैसा गुनाह मम्मी? तुम क्या कह रही हो? तुम्हें क्या चाहिए?"

शीला ने एक गहरी, दर्दनाक साँस ली और वैशाली की आँखों में सीधा देखते हुए बोली, "अपना फोन निकाल... और अभी, इसी वक़्त पीयूष को, कविता को और पिंटू को फोन कर। उन तीनों को तुरंत यहाँ, इसी अस्पताल में मेरे पास बुला।"

यह सुनते ही वैशाली के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसका शरीर गुस्से और नफरत से तन गया।

"क्या?!" वैशाली लगभग फुफकारते हुए पीछे हटी, "मम्मी, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? तुम उस धोखेबाज़ पिंटू को यहाँ बुलाना चाहती हो? उस गिरी हुई औरत कविता को, जो मेरी पीठ पीछे मेरे ही पति के साथ कपड़े उतारकर लेट गई... उसे मैं यहाँ बुलाऊँ? और पीयूष को? नहीं मम्मी! मैं पिंटू और कविता की शक्ल भी नहीं देखना चाहती। उन्होंने मेरा घर उजाड़ा है!"

शीला ने वैशाली का हाथ इतनी ज़ोर से पकड़ा कि वैशाली हैरान रह गई। शीला की आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी और आवाज़ में एक ऐसा सच था, जिसे सुनकर वैशाली का खून सर्द पड़ने वाला था।

"उन्होंने तेरा घर नहीं उजाड़ा वैशाली..." शीला ने एक कड़वी और मौत जैसी ठंडी आवाज़ में उस भयंकर सच का पर्दाफाश करते हुए कहा, "तेरा घर... तेरा घर तो मैंने उजाड़ा है।"

वैशाली की साँसें वहीं रुक गईं।

"मैंने बिछाई थी वो सारी बिसात," शीला ने हाँफते हुए कहा, "कॉल कर वैशाली! उन तीनों को यहाँ बुला। जब तक मैं उन सबके सामने, तुम्हारी आँखों के सामने अपना नंगा सच नहीं उगल दूँगी... जब तक मैं तुम चारों की वो उलझी हुई डोर वापस नहीं सुलझा दूँगी, तब तक मेरी जान इस जिस्म से नहीं निकलेगी। मुझे सुकून से मरने दे वैशाली... उन्हें बुला!"

वैशाली बुत बनकर अपनी माँ को देख रही थी। आईसीयू की वो बीप... बीप... की आवाज़ अब वैशाली के कानों में किसी हथौड़े की तरह बज रही थी। उसने कांपते हाथों से अपना फोन निकाला। बिसात पलटने वाली थी, लेकिन इस बार चाल किसी गुरूर की नहीं, पर पश्चाताप की थी।

वैशाली भारी, सुन्न और कांपते कदमों के साथ आईसीयू के उस ठंडे कमरे से बाहर निकली। उसकी माँ के वह आखिरी शब्द 'तेरा घर तो मैंने उजाड़ा है' उसके दिमाग की नसें फाड़ रहे थे। वो कॉरिडोर की एक खाली बेंच पर गिर सी गई और कांपते हाथों से अपने फोन की स्क्रीन पर पीयूष, कविता और पिंटू के नंबर तलाशने लगी। बिसात का आखिरी खेल अब शुरू होने वाला था।

इधर आईसीयू के अंदर, वैशाली के बाहर जाते ही कांच का दरवाज़ा फिर से खुला। शीला ने अपनी थकी हुई और धुंधली आँखों से दरवाज़े की तरफ देखा। सामने मौसम और फाल्गुनी खड़ी थीं।

मौसम उसी अस्पताल के जनरल वॉर्ड की मरीज़ों वाली ढीली-ढाली नीली गाउन पहने हुए थी, और उसके साथ खड़ी फाल्गुनी का चेहरा उतरा हुआ था। दरअसल, मौसम भी पिछले दो दिनों से इसी अस्पताल में भर्ती थी। लेकिन जैसे ही उन दोनों की नज़रें बिस्तर पर पड़ीं, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

सामने वो शीला नहीं थी जिसे वो जानती थीं.. वो ग्लैमरस, बेधड़क और अपने हुस्न के गुरूर में रहने वाली शीला। बिस्तर पर पसीने में तर-बतर, पीली पड़ चुकी त्वचा, आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे और अनगिनत सुइयों से छिदी हुई एक ज़िंदा लाश पड़ी थी।

"हे भगवान... शीला आंटी!" फाल्गुनी के मुँह से एक चीख सी निकल गई। वह दौड़कर बिस्तर के पास आई, मौसम भी लड़खड़ाते कदमों से उसके पीछे-पीछे आई।

फाल्गुनी ने शीला का हाथ पकड़ लिया, उसकी आँखों में आँसू आ गए, "ये... ये क्या हालत बना ली है अपनी? मदन अंकल और वैशाली बाहर मिले थे, उन्होंने सब बताया। हम तो सोच भी नहीं सकते थे कि आपको कैंसर... वो भी इस स्टेज का! पर आप हिम्मत मत हारना आंटी, सब ठीक हो जाएगा।"

शीला ने एक फीकी, दर्दभरी मुस्कान के साथ फाल्गुनी का हाथ अपनी कमज़ोर उँगलियों से दबाया और उसे बीच में ही रोक दिया।

"तसल्ली मत दे फाल्गुनी," शीला की आवाज़ में कोई खौफ नहीं था, बस एक डरा देने वाली शांति थी। "मुझे अब किसी झूठी उम्मीद की ज़रूरत नहीं है। मैंने हकीकत से समझौता कर लिया है। जो बोया था, वही तो काट रही हूँ। ये कोई बीमारी नहीं है, ये मेरा अपना कमाया हुआ कर्' है जो लौट कर आया है। अब मुझे इस बिस्तर से कोई डॉक्टर खड़ा नहीं कर सकता.."

मौसम और फाल्गुनी दोनों सुन्न रह गईं। शीला ने गहरी साँस ली और अपनी नज़रें मौसम की उस नीली गाउन और उसके उतरे हुए चेहरे पर गड़ा दीं।

"पर तू यहाँ कैसे मौसम?" शीला ने खांसते हुए पूछा, "तू तो ठीक-ठाक थी, फिर ये अस्पताल के कपड़े क्यों पहन रखे हैं? चेहरा भी बिल्कुल सफेद पड़ रहा है तेरा।"

मौसम शर्म के मारे गड़ गई। उसने अपनी नज़रें झुका लीं और अपने गाउन का कोना उँगलियों में मरोड़ने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि मौत के मुहाने पर खड़ी शीला को वो अपनी हवस और अय्याशी का घिनौना किस्सा कैसे सुनाए।

जब मौसम कुछ नहीं बोली, तो फाल्गुनी ने झेंपते हुए एक भारी साँस ली और सच उगल दिया, "अब क्या बताऊँ आंटी... मेरी अक्ल पर भी तो पत्थर पड़ गए हैं। हमने उस दूधवाले रसिक के साथ मजे करने का एक प्लान बनाया था। सोचा था थोड़ी एश करेंगे, कुछ नया ट्राई करेंगे। मौसम उसके साथ... मतलब... वैसे तो उसका लेने का मन नहीं था.. पर रसिक से रहा नहीं गया.. वो कुछ ज़्यादा ही जंगली हो गया। रफ इंटरकोर्स की वजह से मौसम को सीवियर इंटरनल ब्लीडिंग शुरू हो गई। खून रुक ही नहीं रहा था। आनन-फानन में इसे यहाँ लाकर एडमिट कराना पड़ा। बाल-बाल बची है, वरना..."

फाल्गुनी की बात सुनते ही शीला की आँखों में एक गहरा सूनापन छा गया। उसने मौसम को देखा, जो अभी भी शर्म से सिर झुकाए खड़ी थी। शीला ने अपना सिर तकिए पर पीछे की तरफ पटका और एक लंबी, हताश और दर्दभरी साँस छोड़ी।

यह साँस किसी जजमेंट की नहीं थी, बल्कि उस भयंकर हकीकत की थी जिसे शीला खुद अपनी ज़िंदगी की कीमत देकर समझ चुकी थी।

"कुछ नया ट्राई करेंगे..." शीला ने उन शब्दों को दोहराया, उसकी आवाज़ में एक अजीब सा दार्शनिक ठहराव था। "हमेशा कुछ नया... कुछ अलग... जिस्म के किसी नए कोने में छिपी हुई थोड़ी और आग। है न मौसम?"

मौसम ने डरते-डरते नज़रें उठाईं। शीला की आँखें अब सीधे मौसम की आत्मा में झांक रही थीं।

"इधर आ मौसम... मेरे पास बैठ," शीला ने कमज़ोर आवाज़ में कहा। मौसम डरते हुए बिस्तर के किनारे बैठ गई।

शीला ने उसका हाथ अपने ठंडे हाथों में लिया और एक ऐसी आवाज़ में बोली जो अस्पताल के उस सन्नाटे में किसी मंत्र की तरह गूँजने लगी, "तुझे पता है मौसम, इस दुनिया में सबसे बड़ा धोखा क्या है? जिस्म की आज़ादी। हमें लगता है कि हम बहुत मॉडर्न हो गए हैं। एक पति से बोर हो गए या थोड़ा मनमुटाव हो गया तो दूसरे मर्द के पास चले गए। बिस्तर पर नए-नए तमाशे कर लिए। दूधवाला, ड्राइवर, बॉस या जीजाजी... हमें लगता है कि हम अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जी रहे हैं। लेकिन सच बताऊँ? हम महज़ अपनी हवस के गुलाम बन जाते हैं।"

फाल्गुनी और मौसम चुपचाप सुन रही थीं। उनके रोंगटे खड़े हो रहे थे। मौसम के पैरों तले से तब जमीन खिसक गई जब शीला ने 'जीजाजी' नाम लिया.. शीला आंटी को पीयूष के साथ उसके संबंधों के बारे में कैसे पता चला..?? शायद वैशाली ने बताया होगा..

"जिस्म की ये भूख एक ऐसा अँधा कुआं है फाल्गुनी, जिसे दुनिया का कोई भी मर्द, कोई भी नया तजुर्बा नहीं भर सकता," शीला की आँखों से आँसुओं की एक बूँद छलक कर तकिए पर गिर गई। "ये शारीरिक रोमांच एक भ्रम है, छलाव है..। तू जितना इसके पीछे भागेगी, प्यास उतनी ही बढ़ती जाएगी। और आखिर में.. आखिर में ये आग तुझे अंदर से जलाकर खा जाएगी, बिल्कुल मेरी तरह। देख मुझे... ये जो कैंसर मुझे अंदर से दीमक की तरह नोच रहा है न, ये और कुछ नहीं, मेरी उसी अंधी हवस का नतीजा है। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी जिस्म के नए-नए ज़ायके चखने में निकाल दी, और आज... आज मेरा अपना जिस्म ही मेरे लिए जहन्नुम बन गया है।"

शीला ने खांसते हुए एक घूंट पानी पीने का इशारा किया। फाल्गुनी ने कांपते हाथों से उसे पानी पिलाया।

पानी निगलने के बाद शीला ने मौसम की आँखों में झांकते हुए अपना आखिरी ज्ञान दिया, "आज तुझे सिर्फ ब्लीडिंग हुई है मौसम, कल कुछ और होगा। ये एक चेतावनी है जो भगवान ने तुझे दी है, जो मुझे कभी नहीं मिली। या शायद मिली थी, पर मैं अपने गुरूर में अंधी थी। एक बात हमेशा याद रखना... वफादारी कोई पुरानी, दकियानूसी परंपरा नहीं है, ये एक कवच है। अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार रहना, अपनी इच्छाओं पर लगाम कसना... ये हमें घुटन नहीं देता, ये हमें बचाता है। हमारे शरीर को, हमारे रिश्तों को और सबसे बड़ी बात... हमारी रूह को बचाता है।"

शीला की आवाज़ अब और भी भारी हो गई थी, "जिस बिस्तर पर इंसान एक ही वफादार साथी के साथ सुकून की नींद सो सकता है, हमने उसी बिस्तर को अय्याशी का अखाड़ा बना दिया। और जो औरत अपने पति के प्यार को, उसकी वफादारी को छोड़कर जिस्मानी मज़े के लिए बाहर भटकती है... उसका अंत यही होता है। आज मैं मौत की दहलीज पर खड़ी होकर सोचती हूँ... क्या वो चंद मिनटों का रोमांच, वो नयापन, मेरी इस दर्दनाक मौत, मेरे उजड़े हुए घर और मेरी आत्मा के इस बोझ से ज़्यादा कीमती था? नहीं मौसम... बिल्कुल नहीं।"

मौसम की आँखों से अब झर-झर आँसू बहने लगे थे। वह शीला के सीने से लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। फाल्गुनी भी अपने आँसू नहीं रोक पा रही थी।

शीला ने मौसम के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, "वापस लौट जा मौसम। इससे पहले कि ये अँधा रास्ता तुझे भी इस आईसीयू के बिस्तर तक ले आए... लौट जा। अपने पति विशाल के पास, अपने परिवार के पास। ये जिस्म मिट्टी है... इसे और गंदा मत कर।"

कमरे में सिर्फ मौसम की सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी। शीला ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी हार को, अपने सबसे गहरे दर्द को आज एक सबक बनाकर उन लड़कियों के सामने रख दिया था।

बाहर, वैशाली ने अपना फोन काटा। पीयूष, कविता और पिंटू को अस्पताल पहुँचने का अल्टीमेटम दिया जा चुका था। शीला का आखिरी कर्म, उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा और अंतिम तमाशा अब नज़दीक आ रहा था।

मौसम और फाल्गुनी अपनी भारी आँखों, कांपते दिलों और ज़िंदगी के एक खौफनाक सबक के साथ आईसीयू के उस ठंडे कमरे से बाहर निकल गईं। उनके जाने के बाद कमरे में एक बार फिर वही मनहूस सन्नाटा और मशीनों की बीप-बीप गूँजने लगी। शीला ने अपनी आँखें मूँद लीं, वह अपनी बची-खुची ताक़त बटोर रही थी, क्योंकि असली तमाशा तो अभी बाकी था।

तभी आईसीयू का भारी कांच का दरवाज़ा एक बार फिर बहुत आहिस्ता से खुला।

शीला ने अपनी थकी हुई पलकें उठाईं। दरवाज़े पर जो शख्स खड़ा था, उसे देखकर एक पल के लिए शीला की धुंधली आँखों में भी हैरानी तैर गई। वह रसिक था.. मोहल्ले का वही गठीले बदन और चौड़ी छाती वाला दूधवाला। वही रसिक, जिसकी कच्ची मर्दानगी, बेबाकी और जंगली चुदाई शीला के बंद कमरों की महफिलों का मुख्य हिस्सा हुआ करते थे।

लेकिन आज? आज वो बेखौफ रसिक अस्पताल के इस दमघोंटू माहौल में एक डरे हुए, सहमे हुए जानवर की तरह खड़ा था। उसने पड़ोस की किसी औरत से शीला की अचानक बिगड़ी तबीयत और अस्पताल में भर्ती होने की खबर सुनी थी, और खुद को रोक नहीं पाया था।

रसिक दबे पाँव बिस्तर के करीब आया। जैसे ही उसकी नज़र शीला पर पड़ी, उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसकी चौड़ी छाती धौंकनी की तरह चलने लगी। वो शीला... जिसके हुस्न की आग में वो न जाने कितनी बार जला था, जिसके जिस्म की महक उसे पागल कर देती थी... आज वो एक पीली, सूखी और बेजान हड्डियों के ढांचे में तब्दील हो चुकी थी। रसिक के लिए यह मंज़र किसी भयानक डरावने सपने जैसा था।

शीला ने रसिक के उड़ चुके चेहरे और फटी हुई आँखों को देखा। उसके सूखे होठों पर एक बेहद कमज़ोर, थकी हुई लेकिन सब कुछ जान लेने वाली मुस्कान आ गई।

"आजा रसिक... वहीं क्यों खड़ा है? डर लग रहा है अपनी शीला भाभी को इस हाल में देखकर?" शीला की आवाज़ बहुत मद्धम थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी शांति थी।

रसिक कांपते हुए आगे बढ़ा। उसने अपना खुरदरा हाथ शीला के बिस्तर के किनारे पर रखा। उसकी आवाज़ गले में ही अटक रही थी, "भा... भाभी... ये क्या हो गया आपको? आप तो बिल्कुल... मेरा तो कलेजा कांप रहा है आपको ऐसे देखकर। डॉक्टर क्या कह रहे हैं?"

शीला ने एक गहरी, उखड़ी हुई साँस ली। उसकी नज़रें सीधे रसिक की आँखों में थीं।

"डॉक्टर ने कह दिया है रसिक, कि मेरा टिकट कट चुका है," शीला ने बिल्कुल सपाट लहज़े में कहा, "यूट्रस का.. मतलब बच्चेदानी का कैंसर है। आखिरी स्टेज पर। अब बस कुछ दिनों की मेहमान हूँ।"

"कैंसर?" रसिक के मुँह से अवाक होकर निकला। "पर... पर ऐसे कैसे अचानक? आप तो बिल्कुल ठीक थीं भाभी।"

शीला ने एक फीकी हँसी हँसी, जो खाँसी में बदल गई। "अचानक नहीं हुआ रसिक। ये आग बहुत पहले से मेरे अंदर सुलग रही थी। तुझे पता है इस कैंसर की वजह क्या है?"

रसिक ने नासमझी से सिर हिलाया।

"ये उसी हवस का नतीजा है रसिक, जिसमें हम सालों तक अंधे होकर गोते लगाते रहे," शीला की आवाज़ अब एक चेतावनी की तरह गूँजने लगी। "अनगिनत मर्द... और बिना किसी रोक-टोक की वो अय्याशी। उसी गंदे खेल ने मेरे शरीर में वो वायरस डाल दिया, जिसने मुझे अंदर से सड़ा दिया है। ये बीमारी नहीं है रसिक, ये मेरे कर्मों का वो हिसाब है, जो भगवान मुझसे ब्याज समेत वसूल रहा है।"

रसिक का पूरा शरीर पसीने से नहा गया। अभी कुछ दिनों पहले ही उसने मौसम का जो हाल किया था, और अब शीला का ये भयानक अंजाम सुनकर उसकी रूह कांप उठी। उसे लगा जैसे आईसीयू की वो ठंडी हवा उसकी हड्डियों में घुसकर उसे अंदर से जमा रही है।

शीला ने बड़ी मुश्किल से अपना हाथ उठाया और रसिक के कांपते हुए हाथ पर रखा। उसकी आँखों में अब कोई जिस्मानी चाहत नहीं थी, बल्कि एक मौत की दहलीज पर खड़ी औरत की नसीहत थी।

"रसिक... तूने मेरे साथ, मौसम के साथ, और न जाने कितनी औरतों के साथ अपनी मर्दानगी की प्यास बुझाई है," शीला ने खांसते हुए कहा, "लेकिन मेरी ये हालत देख ले। इस जिस्म का अंजाम देख ले। ये गोश्त और हड्डियां सब यहीं इसी बिस्तर पर सड़ कर खाक हो जाएंगी। जिस्म की ये भूख कभी खत्म नहीं होती रसिक, लेकिन ये इंसान को खत्म ज़रूर कर देती है।"

रसिक की आँखें भर आईं। वह घुटनों के बल शीला के बिस्तर के पास बैठ गया।

"आज मैं तुझे अपनी आखिरी नसीहत दे रही हूँ रसिक," शीला ने अपनी पूरी ताक़त बटोर कर कहा। "इस दलदल से बाहर निकल जा। रूखी के पास लौट जा। और उसे भी कहना की सुधर जाएँ और बाहर मुंह मारना बंद कर दें.. अगर तू नहीं रुका रसिक, तो याद रखना... तेरा अंजाम भी मेरी ही तरह होगा। या तो तू किसी ऐसी ही भयानक बीमारी से तड़प-तड़प कर मरेगा, या फिर तेरे कर्म तेरे ही घर में आग लगा देंगे। छोड़ दे ये अय्याशी का रास्ता..।"

रसिक की आँखों से आँसू छलक पड़े। शीला की उस कंकाल जैसी हालत और उसके मौत से रंगे हुए शब्दों ने रसिक के अंदर के उस जंगली, हवस के भूखे मर्द को पूरी तरह मार दिया था। उसे रूखी का और अपने लल्ला का वो भोला चेहरा याद आ गया।

रसिक ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। वो बुरी तरह कांप रहा था।

"मैं कसम खाता हूँ भाभी..." रसिक रोते हुए, रुंधी हुई आवाज़ में बोला, "आपकी ये हालत देखकर मेरी आँखें खुल गई हैं। मुझे माफ कर दो भाभी। मैं आज के बाद किसी पराई औरत की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखूँगा। मैं अपनी बीवी के साथ वफादारी से रहूँगा... भगवान कसम भाभी, मैं ये सब गंदे काम आज ही छोड़ दूँगा।"

शीला के होठों पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"जा रसिक... अब मुझे अकेला छोड़ दे। और अपनी कसम याद रखना," शीला ने फुसफुसाते हुए कहा।

रसिक अपने आँसू पोंछता हुआ, एक बदला हुआ इंसान बनकर आईसीयू से बाहर निकल गया। शीला ने गहरी साँस ली। उसने अपनी ज़िंदगी में अनगिनत पाप किए थे, लेकिन मौत के मुहाने पर खड़े होकर, मौसम, फाल्गुनी और रसिक को सही रास्ता दिखाकर उसने अपने गुनाहों का बोझ थोड़ा कम ज़रूर कर लिया था।

अब उसे बस इंतज़ार था... वैशाली के बुलाए हुए उन तीन मोहरों का.. पीयूष, कविता और पिंटू। अपनी बिछाई हुई आखिरी और सबसे ज़हरीली बिसात को उसे अपने ही हाथों से पलटना था।
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अस्पताल के उस लंबे और ठंडे कॉरिडोर में एक भारी सन्नाटा पसरा था, जिसे तोड़ते हुए तीन अलग-अलग कदमों की आहटें वहां पहुंचीं। वैशाली के बुलावे पर पीयूष, कविता और पिंटू अस्पताल पहुँच चुके थे।

पिंटू की हालत सबसे ज़्यादा खराब थी। उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं, कंधे झुके हुए थे और माथे पर पसीने की ठंडी बूँदें चमक रही थीं। रंगे हाथों पकड़े जाने की शर्म ने उसे अंदर तक तोड़ दिया था। उसे हर किसी से खौफ आ रहा था.. वैशाली के तमाचे की गूँज अभी भी उसके कानों में थी, पीयूष से नज़रे मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं थी, और मदन या शीला का सामना करना तो मौत के बराबर लग रहा था।

दूसरी तरफ, कविता बिल्कुल बेपरवाह सी नज़र आ रही थी। पीयूष के उस तमाचे और घर से निकाले जाने के बाद, उसे अपने आस-पास की दुनिया से कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा था। उसने एक बार पिंटू की तरफ देखकर हल्की सी सहानुभूति जताने की कोशिश की, लेकिन पिंटू किसी डरे हुए जानवर की तरह झिझक कर उससे दो कदम पीछे हट गया।

तभी भारी और सधे हुए कदमों से पीयूष वहाँ पहुँचा। उसके चेहरे पर एक गहरी टेंशन थी। उसे अब तक यह समझ नहीं आ रहा था कि शीला को अचानक ऐसा क्या हो गया कि उसे आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। कविता को वहां देखकर पीयूष के चेहरे पर एक पल के लिए चिढ़ उभरी, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र वैशाली पर पड़ी, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर सुकून आ गया।

पर वैशाली आज किसी से कोई औपचारिकता निभाने के मूड में नहीं थी। उसका चेहरा पत्थर की तरह सख्त था।

"तुम तीनों आ गए, ठीक है," वैशाली ने बिना किसी का हाल-चाल पूछे, एक बेहद ठंडे और सपाट लहज़े में कहा, "मम्मी ने तुम तीनों को, और पापा को... एक साथ अंदर बुलाया है। उन्हें तुम सबसे कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है।"

पीयूष ने कुछ पूछना चाहा, लेकिन वैशाली बिना किसी की तरफ देखे सीधा आईसीयू के दरवाज़े की तरफ मुड़ गई।

मदन पहले से ही भारी मन के साथ दरवाज़े के पास खड़ा था। शीला ने आज तक अपनी बिछाई गई हर ज़हरीली बिसात मदन से छुपा कर रखी थी। लेकिन अब, मौत की दहलीज पर खड़ी शीला जानती थी कि राज़ सीने में दफन करके ले जाने का कोई फायदा नहीं। मदन को सब कुछ जानना ज़रूरी था, ताकि उसके जाने के बाद मदन इन चारों की उजड़ी हुई ज़िंदगियों को वापस समेटने में उनकी मदद कर सके।

वैशाली, मदन, पीयूष, कविता और पिंटू... पांचों भारी कदमों से आईसीयू के अंदर दाखिल हुए।

कमरे के बीचों-बीच, सफेद चादरों के बीच शीला किसी सूखी टहनी की तरह लेटी थी। मशीनों की बीप-बीप के बीच, जब शीला ने इन पांचों को एक साथ देखा, तो उसके पपड़ीदार होठों पर एक हल्की सी, सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसने अपनी बची-खुची सारी ताक़त को इस आखिरी, सबसे मुश्किल काम के लिए बटोरना शुरू किया।

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"आ गए तुम सब..." शीला की आवाज़ बहुत कमज़ोर और हांफती हुई थी, लेकिन उसमें अभी भी एक अजीब सा अधिकार था।

पीयूष आगे बढ़ा, "भाभी, ये आपको क्या..."

"शशश... पीयूष, चुप बिल्कुल!" शीला ने अपना कांपता हुआ हाथ उठाकर उसे बीच में ही रोक दिया। "जब तक मैं अपनी बात पूरी न कर लूँ, कोई मुझे बीच में नहीं टोकेगा। मेरी साँसें गिनती की बची हैं, और मुझे बहुत कुछ उगलना है।"

पूरे कमरे में एक खौफनाक खामोशी छा गई। मदन हैरानी से अपनी पत्नी को देख रहा था।

शीला ने एक गहरी साँस ली और अपनी उस घिनौनी बिसात का एक-एक पन्ना खोलना शुरू किया।

"तुम चारों की ज़िंदगियां आज जिस मुकाम पर खड़ी हैं... जो घर टूटे हैं, जो रिश्ते बिखरे हैं... वो किसी हालात का नतीजा नहीं थे। वो मेरी रची हुई एक साज़िश थी।" शीला की बात सुनते ही पीयूष और पिंटू के चेहरे का रंग उड़ गया।

"वैशाली," शीला ने अपनी बेटी की तरफ देखते हुए कहा, "याद है तूने मुझे पिंटू की उस कमज़ोरी के बारे में रोते हुए बताया था? और ये भी कहा था कि वो अपने ईगो में आकर किसी डॉक्टर को भी नहीं दिखा रहा? एक माँ होने के नाते मुझे पिंटू का इलाज करवाना चाहिए था, लेकिन मैंने क्या किया? मैंने पीयूष की दौलत को देखा, और तय किया कि मेरी बेटी उस महल पर राज करेगी।"

पीयूष की आँखें फटी की फटी रह गईं।

"पीयूष, मैंने बड़ी ही चालाकी से तुम्हारे दिमाग में वैशाली का बीज बोया," शीला हांफते हुए, एक-एक शब्द चबाते हुए बोल रही थी। "तुम्हें कविता से दूर करने के लिए मैंने अपने जिस्म का इस्तेमाल किया। याद है वो रात, जिसके अगली सुबह तुमने कविता पर हाथ उठाया था? उस रात मैंने ही कविता को पट्टी पढ़ाई थी कि वो तुमसे ज़बरदस्ती प्यार मांगे। क्योंकि मुझे पता था कि तुम उसे वो प्यार नहीं दे पाओगे... क्योंकि पिछली रात मैंने खुद तुम्हें अपने जिस्म में इतना निचोड़ लिया था कि तुम सुबह किसी काम के नहीं बचे थे।"

यह सुनते ही मदन को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर हथौड़ा मार दिया हो। कविता ने झटके से अपना मुँह ढँक लिया।

शीला रुकी नहीं, उसने पिंटू की तरफ देखा, "जब कविता घर छोड़कर उस पुराने फ्लैट में गई, तो वो बहुत अकेली और डरी हुई थी। मैंने ही उसे उकसाया कि वो पिंटू को फोन करे और रोकर उसे वहां बुलाए। मैं जानती थी कि पिंटू सीधा-सादा और भावुक है, वो कविता के रोने पर दौड़ा चला जाएगा।"

पिंटू की आँखें आंसुओं से भर गईं। उसे समझ आ रहा था कि वो किस भयानक जाल में फंसा था।

"और वैशाली..." शीला की आवाज़ अब और भारी हो गई, "मैंने ही तुमसे कहा था न कि अगर पिंटू की बेवफाई साबित हो जाए, तो क्या तुम पीयूष के पास जाओगी? तुमने झिझकते हुए हाँ कह दिया था। जैसे ही मुझे पता चला कि पिंटू कविता के पास पहुँच गया है, मैंने पीयूष को उस फ्लैट की डुप्लीकेट चाबी के साथ बुलाया, और हम सब वहाँ साथ जा पहुँचे... ताकि पिंटू और कविता रंगे हाथों पकड़ा जाए, वैशाली का दिल टूट जाए, और पीयूष का रास्ता साफ हो जाए। मैंने तुम चारों को कठपुतलियों की तरह नचाया।"

शीला चुप हो गई। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। पूरे आईसीयू में किसी श्मशान जैसा सन्नाटा था। सिर्फ मदन के भारी-भारी सिसकने की आवाज़ आ रही थी, जिसे अपनी पत्नी के इस राक्षसी रूप का आज पहली बार पता चला था।

शीला ने वैशाली की तरफ देखा, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, "पिंटू सच में बहुत अच्छा इंसान है वैशाली। उसकी एक शारीरिक कमज़ोरी को छोड़कर, उसने कभी तुझे धोखा नहीं दिया। तेरा उस पर भरोसा करना बिल्कुल सही था। मैंने ज़हर घोला था... मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची।"

फिर शीला ने पिंटू की तरफ अपने हाथ जोड़े, "मुझे माफ कर दे पिंटू। मेरी सज़ा मुझे मिल रही है। पर मेरे इस घिनौने पाप के लिए मेरी वैशाली को सज़ा मत देना। उसकी कोई गलती नहीं थी।"

पिंटू फफक कर रो पड़ा। उसके सीने में वैशाली के लिए जो गुस्सा था, वो एक पल में खत्म हो गया। वह शीला से नफरत करना चाहता था, लेकिन इस कंकाल हो चुकी, मौत की दहलीज पर भीख मांगती औरत को देखकर उसका गुस्सा तरस में बदल गया। पिंटू ने रोते हुए अपना सिर हिलाकर शीला को माफ कर दिया।

अब शीला ने अपनी नज़रें पीयूष और कविता की तरफ घुमाईं।

"पीयूष... याद कर वो पुराने दिन," शीला के चेहरे पर एक पुरानी यादों वाली मुस्कान आ गई, "जब हम सब पड़ोसी हुआ करते थे। तुम राजेश की ऑफिस के एक मामूली मुलाजिम थे, मोटरसाइकिल पर घूमते थे, पर तुम दोनों कितने खुश थे। पैसे कम थे, पर प्यार बेशुमार था। दौलत ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया पीयूष। कविता जैसी हीरा लड़की तुम्हें दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी। तुम बहुत बड़े बेवकूफ होगे अगर तुम अपनी इस दौलत के अहंकार में अपनी इतनी प्यारी बीवी को खो दोगे। काम धंधा तो चलता रहेगा, पर कविता को इस चक्कर में इग्नोर करते रहे तो याद रखना.. तुम्हारे साथ ये दौलत नहीं आएगी.. तुम्हारे आखिरी पल तक यही लड़की तुम्हारा साथ देगी।"

शीला ने कांपते हाथों से कविता की तरफ इशारा किया, "मैंने तेरे साथ जो किया कविता, उसके लिए मैं माफ़ी के लायक भी नहीं हूँ। पर तेरा दिल बहुत बड़ा है। पीयूष को माफ कर दे... और अपने घर वापस लौट जा।"

कविता, जो अब तक बुत बनी खड़ी थी, अचानक फूट-फूट कर रोने लगी। वो दौड़कर शीला के पास आई और उसने शीला को कसकर गले लगा लिया। सारी नफरत, सारा गुस्सा उस एक आँसुओं से भीगे गले मिलने में पिघल गया।

कुछ ही पलों में, आईसीयू का वो दमघोंटू नज़ारा बदल गया। पीयूष ने आगे बढ़कर रोती हुई कविता का हाथ कसकर थाम लिया, और दूसरी तरफ पिंटू ने अपनी झिझक तोड़कर वैशाली के कंधे पर हाथ रखकर अपनी ओर खींच लिया। दोनों जोड़ियां.. जो कल तक हमेशा के लिए टूटने की कगार पर थीं.. आज एक-दूसरे का हाथ थामे खड़ी थीं। उन्होंने अपना सबक सीख लिया था।

शीला की आँखें अब थक कर बंद होने लगी थीं। उसने अपनी गर्दन बहुत मुश्किल से मदन की तरफ घुमाई, जो सदमे और आंसुओं में डूबा हुआ सिर झुकाए खड़ा था।

शीला ने अपना ठंडा हाथ मदन के हाथों में रख दिया।

"मदन..." शीला की आवाज़ अब सिर्फ एक फुसफुसाहट रह गई थी। "इन चारों का खयाल रखना। और... और तुझे बेवफाई और हवस के बारे में क्या ही ज्ञान दूँ... तू तो खुद अपनी आँखों से मेरा ये भयानक अंजाम देख रहा है। जिस्म की भूख ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा।"

शीला ने मदन का हाथ हल्का सा दबाया, "मेरे जाने के बाद अकेले मत रहना मदन। किसी अच्छी और वफादार औरत को देखकर शादी कर लेना। अपनी बाकी की ज़िंदगी सुकून से बिताना।"

यह सुनते ही मदन बुरी तरह टूट गया। उसने घुटनों के बल बैठकर शीला के दोनों हाथ अपने गालों से लगा लिए। उसके आँसुओं से शीला के हाथ भीग गए।

"क्या बकवास कर रही हो शीला!" मदन रोते हुए चीखा, "तुम्हारे जैसी कोई नहीं हो सकती... कोई नहीं! तुममें हज़ार बुराइयां थीं, तुमने जो किया वो गलत था... लेकिन मेरे लिए, तुम आज भी मेरी वही शीला हो। मेरी जान हो तुम। मैं तुम्हारे बिना किसी और औरत के बारे में अब सोच भी नहीं सकता। मैं अकेले जी लूँगा, पर किसी और को तुम्हारी जगह नहीं दे सकता।"

मदन के इन प्यार भरे, बेपनाह वफादारी वाले शब्दों ने शीला की आत्मा को एक अजीब सा सुकून दे दिया। अपनी बिछाई हुई सारी ज़हरीली बिसात को उखाड़ फेंकने का सुकून। चारों बच्चों को वापस मिला देने का सुकून।

मदन के आखिरी शब्द अभी पूरे भी नहीं हुए थे कि...

बीप... बीप... बीप... बीईईईईईईईईईप...

आईसीयू में गूँजती वो हार्ट-रेट मॉनिटर की मशीन अचानक एक लंबी और सपाट नीली लकीर में बदल गई। वह तेज़, लगातार गूँजने वाली आवाज़ कमरे के सन्नाटे को चीरने लगी।

पांचों ने झटके से मशीन की तरफ देखा और फिर खौफ से शीला के चेहरे की तरफ।

शीला की आँखें हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं। लेकिन उसके चेहरे पर कोई दर्द, कोई पछतावा या खौफ नहीं था। उसके होठों पर एक बहुत ही गहरी, शांत और मुकम्मल सुकून भरी मुस्कान ठहर गई थी.. यह बताने के लिए कि अपने आखिरी पलों में, वो वो सब कुछ समेटने में कामयाब हो गई थी, जिसे उसने खुद अपने हाथों से बिखेरा था।

शीला की लीला यहीं समाप्त हुई.. ||

Goodbye
— समाप्त —
बेहतरीन कहानी पोस्ट करने के लिए धन्यवाद. आप फोरम के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में से एक हैं.
 

imdelta

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पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..

कहानी दो समानांतर कथाओं में विभाजित हो जाती है, जो अंततः एक ही अस्पताल में आकर मिलती हैं.. एक ओर युवावस्था की क्षणिक हवस का विनाशकारी परिणाम, तो दूसरी ओर चालाकी और साजिश के जाल में उलझी एक महिला के शरीर का विद्रोह।

पहली कथा में, फाल्गुनी और मौसम नशे में धुत होकर रसिक दूधवाले को बुलाती हैं.. एक ऐसा पुरुष जिसका शारीरिक आकार और क्षमता दोनों ही असामान्य है। रसिक पहले फाल्गुनी के साथ कठोर संभोग करता है, जिसमें फाल्गुनी को भले ही दर्द सहना पड़ता है, पर वह अपनी हवस के आगे समर्पण कर देती है। इसके बाद रसिक की नज़र मौसम पर पड़ती है, जो शुरू में डरी-सहमी होती है और रसिक के विशाल आकार को देखकर सिहर उठती है। पर धीरे-धीरे उत्तेजना की गर्मी में वह भी पिघल जाती है.. लेकिन जब रसिक उसकी संकीर्ण, कोमल योनि में अपना विशाल लिंग जबरदस्ती घुसा देता है, तो मौसम बेहोश हो जाती है और उसके शरीर से भारी मात्रा में रक्तस्राव होने लगता है। रसिक डरकर वहाँ से भाग जाता है, और फाल्गुनी, जो अब अपनी गलती का एहसास कर चुकी है, मौसम को अस्पताल ले जाती है। वहाँ डॉक्टर बताते हैं कि मौसम को गंभीर आंतरिक चोट लगी है और यदि रक्तस्राव नहीं रुका तो उसकी जान को खतरा हो सकता है। फाल्गुनी आत्मग्लानि से भर जाती है.. उसे समझ आता है कि उसकी हवस, उसकी लापरवाही और उसकी नासमझी ने उसकी सबसे करीबी सहेली को मौत के कगार पर ला खड़ा किया है। वह इस दार्शनिक सत्य से रूबरू होती है कि क्षणिक सुख के पीछे भागना अक्सर हमें विनाश के गर्त में धकेल देता है, और परिणामों की गंभीरता का एहसास तब होता है जब सब कुछ हाथ से निकल चुका होता है।

दूसरी कथा में, शीला.. जिसने अभी-अभी पिंटू और कविता को बेनकाब कर अपनी बड़ी जीत का जश्न मनाया था.. अचानक असहनीय पेट दर्द और रक्तस्राव से पीड़ित हो जाती है। उसका रजोनिवृत्ति दस साल पहले हो चुका था, फिर भी उसकी पैंटी पर गाढ़ा, असामान्य खून देखकर वह भीतर ही भीतर काँप उठती है। वह दर्द को स्ट्रेस और उम्र का तकाज़ा बताकर अनदेखा करने की कोशिश करती है, पर उसका शरीर उसे चीख-चीख कर बता रहा होता है कि उसके भीतर कुछ गहरा उबल रहा है। वैशाली के घर से लौटते समय कैब में ही वह बेहोश हो जाती है, और ड्राइवर उसे सीधे अस्पताल ले जाता है।मदन अस्पताल पहुंचता है। मदन फाल्गुनी को अस्पताल में देखकर चौंक जाता हैं, और दोनों की मुलाकात इस अप्रत्याशित मोड़ पर होती है.. एक ओर मौसम की जान को खतरा है, तो दूसरी ओर शीला की बीमारी का कारण अज्ञात है और उसके टेस्ट हो रहे हैं।

अब आगे..
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अस्पताल के उस वीआईपी कॉरिडोर के आखिरी छोर पर डॉ. माथुर का केबिन था। केबिन के भीतर एक भारी खामोशी पसरी थी, जिसे सिर्फ दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक और एयर कंडीशनर की नीरस गूँज ही तोड़ रही थी। मदन डॉक्टर की बड़ी सी महोगनी टेबल के सामने रखी कुर्सी पर बैठा था। उसके हाथ आपस में इतनी ज़ोर से गुंथे हुए थे कि उँगलियों के पोर सफेद पड़ चुके थे। उसका दिल किसी भट्टी की तरह धड़क रहा था।

डॉक्टर माथुर अपने चश्मे के पीछे से एक गहरी, पेशेवर लेकिन उदास नज़र से टेबल पर रखी शीला की पेट-स्कैन, एमआरआई और बायोप्सी की रिपोर्ट्स को देख रहे थे। उन्होंने एक भारी साँस ली, चश्मा उतारा और रिपोर्ट्स की फाइल बंद कर दी।

"मदन जी..." डॉ. माथुर की आवाज़ उस सन्नाटे में किसी हथौड़े की तरह गूँजी।

मदन अपनी कुर्सी पर थोड़ा आगे खिसका, उसकी आँखों में एक अजीब सी दहशत और अनजानी उम्मीद दोनों एक साथ तैर रहे थे। "जी डॉक्टर साहब... क्या कह रही हैं रिपोर्ट्स? शीला को क्या हुआ है? उसे वो पेट का दर्द और ब्लीडिंग... वो सब क्यों हो रहा है? कोई इन्फेक्शन है क्या? आप दवा लिख दीजिए, मैं अभी..."

"मदन जी, प्लीज़ खुद को संभालिए," डॉक्टर ने मदन को बीच में रोकते हुए, एक बेहद शांत लेकिन खौफनाक लहज़े में कहा, "रिपोर्ट्स आ गई हैं, और मेडिकल साइंस के हिसाब से हमारे पास आपको देने के लिए कोई अच्छी खबर नहीं है। शीला जी को कैंसर है।"

मदन का शरीर एक झटके से सुन्न पड़ गया। कैंसर शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरा।

"क.. क.. कैं... कैंसर? क्या कह रहे हैं आप डॉक्टर साहब?" मदन की आवाज़ किसी सूखे पत्ते की तरह कांप उठी।

डॉक्टर ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर मदन के कांपते हाथों पर रखा और मेडिकल हकीकत बयां करना शुरू किया, "मदन जी, शीला जी को एडवांस स्टेज का सर्वाइकल यानि गर्भाशय और यूटेराइन कैंसर है। इसे हम अपनी मेडिकल भाषा में स्टेज 4बी कहते हैं। ट्यूमर बहुत ज़्यादा एग्रेसिव है। बीमारी अब सिर्फ गर्भाशय तक सीमित नहीं है, पर वो पेल्विक वॉल्स, ओवरीज़ और आस-पास के लिम्फ नोड्स तक पूरी तरह फैल चुकी है। मेटास्टेसिस की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।"

मदन की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह एक ऐसे सीधे-सादे पति की तरह व्यवहार कर रहा था, जिसने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा अपनी पत्नी को रानी बनाकर रखने के लिए अमेरिका में खपा दिया था।

"लेकिन ये कैसे हो सकता है डॉक्टर साहब?" मदन बिलखते हुए बोला, "मेरी शीला न तो सिगरेट फूँकती है न ही उसने कभी तंबाकू को हाथ लगाया ! उसका खान-पान भी साफ-सुथरा है। उसका लाइफस्टाइल भी काफी एक्टिव हैं। फिर उसे कैंसर कैसे हो गया? किस चीज़ से हुआ ये सब?"

डॉक्टर माथुर ने एक लंबी, गहरी साँस ली। एक डॉक्टर के तौर पर सच बताना उनका फर्ज़ था, चाहे वो सच कितना भी कड़वा और घिनौना क्यों न हो।

"मदन जी, यह कोई मुंह, फेफड़ों या पेट का कैंसर नहीं है जो खान-पान या सिगरेट से होता हो," डॉक्टर ने बहुत नपे-तुले, लेकिन स्पष्ट शब्दों में कहा, "सर्वाइकल कैंसर के 95% से ज़्यादा मामलों के पीछे एचपीवी (HPV - Human Papillomavirus) नाम का वायरस ज़िम्मेदार होता है। और यह वायरस हवा या पानी से नहीं फैलता।"

डॉक्टर एक पल के लिए रुके, ताकि मदन इस बात को समझ सके।

"तो... तो फिर ये कैसे फैलता है?" मदन ने उलझन और डर से फटी आँखों से पूछा।

डॉक्टर ने अपनी नज़रें हल्की सी नीची कीं और फिर मदन की आँखों में सीधा देखते हुए एक ऐसा सच उगला, जिसने मदन के वजूद को झकझोर कर रख दिया, "मदन जी... यह वायरस मुख्य रूप से अनप्रोटेक्टेड इंटरकोर्स यानि की असुरक्षित यौन संबंध से ट्रांसमिट होता है। जब किसी व्यक्ति के लंबे समय तक एक से अधिक लोगों के साथ असुरक्षित शारीरिक संबंध रहे हों, तो यह वायरस जननांगों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाता है। यह वायरस सालों तक शरीर में बिना कोई लक्षण दिखाए छुपकर बैठा रहता है, और अंदर ही अंदर गर्भाशय की कोशिकाओं को सड़ाता रहता है, उनका म्यूटेशन करता है।"

डॉक्टर ने आगे कहा, "शीला जी का मेनोपॉज़ बहुत पहले हो चुका था। उन्हें जो अनियमित ब्लीडिंग या कमर दर्द था, उन्होंने उसे काफी समय तक नज़रअंदाज़ किया। और इस तरह के एग्रेसिव इन्फेक्शन और ट्यूमर का जो पैटर्न इनकी रिपोर्ट्स में है, उसका मुख्य कारण वही मल्टीपल पार्टनर्स के साथ असुरक्षित यौन संबंध है। इस वायरस ने उन्हें अंदर से पूरी तरह खोखला कर दिया है।"

डॉक्टर के वो शब्द.. मल्टीपल पार्टनर्स और असुरक्षित संबंध.. मदन के दिमाग में किसी बम की तरह फटे। शीला और मदन दोनों ने अपनी मर्जी से ही ऐसी स्वच्छंद जीवनशैली को अपनाया था जहां ये तो उन दोनों के लिए काफी आम बात थी.. पर इसका नतीजा इतना भयानक होगा इसका उसे जरा सा भी अंदाजा नहीं था..

मदन कुर्सी से उठकर सीधा डॉक्टर की टेबल के पास जा पहुँचा और उसने डॉक्टर के दोनों हाथ अपने हाथों में कसकर पकड़ लिए।

"डॉक्टर साहब... मैं आपसे भीख मांगता हूँ!" मदन फूट-फूट कर रोते हुए गिड़गिड़ाने लगा, उसकी आँखों से आँसुओं की धारा डॉक्टर की टेबल पर गिर रही थी, "मुझे कोई मेडिकल साइंस नहीं समझना, मुझे कोई कारण नहीं जानना... मुझे बस मेरी शीला वापस चाहिए। आप कहिए तो मैं अभी उसे अमेरिका लेकर जाने को तैयार हूँ। दुनिया का कोई भी महंगा इलाज, कोई भी बड़ी सर्जरी, कोई भी कीमोथेरेपी... मैं अपना सब कुछ बेच दूँगा, अपना एक-एक पैसा पानी की तरह बहा दूँगा। बस आप मेरी शीला को बचा लीजिए! प्लीज़ डॉक्टर... उसे मरने मत दीजिए!"

डॉक्टर माथुर की आँखें भी नम हो गईं। उन्होंने बहुत ही नरमी से अपने हाथ मदन की पकड़ से छुड़ाए और मदन के कंधों को थामते हुए उसे वापस कुर्सी पर बिठाया।

"मदन जी, मुझे बहुत अफ़सोस है, लेकिन आपको सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा," डॉक्टर की आवाज़ में एक बेबसी और अंतिम फैसला था। "अब पैसा या अमेरिका काम नहीं आ सकता। शीला जी का कैंसर एक ऐसे स्टेज पर पहुँच चुका है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है। कोई सर्जरी अब उन कैंसर सेल्स को नहीं निकाल सकती, क्योंकि वो पूरे शरीर में फैल चुके हैं। हम सिर्फ पेलिएटिव केयर दे सकते हैं.. यानी कुछ दवाइयां और पेनकिलर्स, ताकि उनके आखिरी दिन कम दर्दनाक हों।"

मदन का सिर अपनी छाती तक झुक गया।

"व... वक़्त कितना है उसके पास?" मदन ने हकलाते हुए.. मरी हुई आवाज़ में पूछा।

"कुछ हफ्ते... या शायद कुछ दिन," डॉक्टर ने जवाब दिया। "बस इससे ज़्यादा नहीं।"

मदन के पैरों तले से ज़मीन, उसका आसमान, उसकी ज़िंदगी की सारी कमाई... सब कुछ उस केबिन के फर्श पर बिखर कर राख हो गया। उसने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों से छुपा लिया और एक छोटे बच्चे की तरह फफक-फफक कर रोने लगा।

वह उस कड़वे और ज़हरीले सच को अब अपनी नियति मान चुका था। उसने अपनी पत्नी के जिस्म की गद्दारी और मौत की उस काली परछाई को एक साथ स्वीकार कर लिया था। अब कुछ भी बाकी नहीं था... सिवाय इंतज़ार के।

कुछ देर बाद, भारी और कांपते कदमों के साथ मदन डॉक्टर के केबिन से बाहर निकला और उस आईसीयू की तरफ बढ़ गया, जहाँ शीला इन सबसे अनजान, अपनी ज़िंदगी की आखिरी साँसें गिन रही थी।

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अस्पताल के उस वीआईपी प्राइवेट कमरे, जिसे अब एक हाई-टेक आईसीयू (ICU) में तब्दील कर दिया गया था,की सफेद, ठंडी और दूधिया रोशनी शीला की आँखों में किसी तेज़ाब की तरह चुभ रही थी। हवा में फिनाइल, स्पिरिट और तेज़ दवाइयों की वह टिपिकल दम घोंटने वाली महक तैर रही थी, जो इंसान को उसके नश्वर होने का सबसे खौफनाक एहसास दिलाती है।

कमरे के बीचों-बीच रखे उस सफेद बिस्तर पर शीला लेटी हुई थी। वही शीला, जिसके चेहरे पर कुछ दिन पहले तक एक शातिर गुरूर, हुस्न का घमंड और दूसरों की ज़िंदगियों को अपनी उँगलियों पर नचाने का नशा था... आज एक कमज़ोर, बेबस और सूखी हुई टहनी की तरह उस बिस्तर पर पड़ी थी।

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केबिन के बाहर, कांच के दरवाज़े के उस पार, डॉक्टर माथुर ने मदन को शीला की ताज़ा एमआरआई और बायोप्सी की रिपोर्ट्स के बारे में सब कुछ बता दिया था।

"यूट्रस का कैंसर... फोर्थ स्टेज... और कारण... एचपीवी वायरस, जो मल्टीपल पार्टनर्स के साथ अनप्रोटेक्टेड इंटरकोर्स से फैला है।"

मदन के लिए मल्टीपल पार्टनर्स वाली बात कोई चौंकाने वाला राज़ नहीं था। वह शीला के अतीत और उसके अनगिनत यौन संबंधों से पूरी तरह वाकिफ था..पर सच तो यह था कि उन दोनों ने आपसी सहमति से इस उन्मुक्त, बेलगाम और हवस से भरी लाइफस्टाइल को चुना था। जब मदन अमेरिका में रहता था, तब से लेकर आज तक, उन्होंने अपनी जिस्मानी आज़ादी को अपनी मॉडर्न सोच का तमगा पहना रखा था।

लेकिन आज, डॉक्टर की बात सुनकर मदन को कोई धोखा नहीं, पर एक भयानक, गला घोंट देने वाली आत्मग्लानि महसूस हुई। जिस जिस्मानी आज़ादी और अय्याशी को वो दोनों अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा रोमांच मानते थे, आज उसी ने शीला को मौत के इस खौफनाक मुहाने पर ला खड़ा किया था।

मदन ने अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर एक झूठी, दिलासा देने वाली मुस्कान ओढ़ी और आईसीयू के भीतर शीला के बिस्तर के पास आ गया। उसने शीला का पीला पड़ चुका, सुइयों से छिदा हुआ हाथ अपने हाथों में लिया।

"कुछ... कुछ खास नहीं है शीला," मदन ने अपनी कांपती आवाज़ को सामान्य करने की पूरी कोशिश करते हुए कहा, "डॉक्टर कह रहे हैं कि बस यूट्रस में एक छोटा सा इन्फेक्शन हो गया है। कोई घबराने वाली बात नहीं है। बस कुछ दिन तेज़ एंटीबायोटिक्स चलेंगी, और सब बिल्कुल ठीक हो जाएगा। हम बहुत जल्द घर चलेंगे।"

लेकिन शीला का दिमाग? वो दिमाग जिसने ज़िंदगी भर बिसातें बिछाई थीं, जिसने लोगों के चेहरों के पीछे छिपे उनके सबसे गहरे राज़ पढ़े थे... वो इतनी आसानी से कैसे बेवकूफ बन सकता था?

शीला का शातिर और पारखी दिमाग तुरंत खतरे को सूंघ गया। उसने अपने शरीर के भीतर उठ रहे उस भयंकर, चीर देने वाले दर्द को महसूस किया, जो किसी मामूली इन्फेक्शन का नहीं हो सकता था। उसने अपनी तिरछी नज़रों से आस-पास घिरी उन भारी मेडिकल मशीनों, ऑक्सीजन पाइप्स और हार्ट-रेट मॉनिटर्स को देखा। एक छोटे से इन्फेक्शन के लिए किसी को आईसीयू की इन मौत जैसी बीप-बीप करती मशीनों के बीच नहीं रखा जाता.. इतना तो शीला जानती ही थी..

और सबसे बढ़कर, शीला की नज़रें मदन के चेहरे पर टिक गईं। मदन के होंठ भले ही मुस्कुरा रहे थे, लेकिन उसकी आँखें लाल और सूजी हुई थीं, उसकी ठुड्डी हल्की-हल्की कांप रही थी और उसके हाथों की पकड़ में एक बेबसी थी।

शीला ने अपनी सूखी जुबान होठों पर फेरी और मदन का हाथ हल्के से दबाया।

"मदन..." शीला की आवाज़ बेहद कमज़ोर थी, लेकिन उसमें वही पुरानी, बेधड़क सख्ती थी, "हम दोनों ने मिलकर अपनी पूरी ज़िंदगी दुनिया की आँखों में धूल झोंकी है। कम से कम मौत के इस बिस्तर पर तो मुझसे झूठा नाटक मत करो। ये दर्द कोई मामूली इन्फेक्शन नहीं है मदन। मेरी रगों का खून सूख रहा है, मुझे पता है। सच बताओ... डॉक्टर ने क्या कहा है?"

मदन ने फिर से झूठ बोलने के लिए मुँह खोला, लेकिन शीला की उन गहरी, सच को भेदती आँखों के सामने उसका झूठा नकाब भरभरा कर गिर पड़ा। मदन टूट गया। वह शीला के बिस्तर पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा।

"सब खत्म हो गया शीला... कुछ नहीं बचा!" मदन सिसकते हुए, रुंधी हुई आवाज़ में बोला, "कैंसर है तुम्हें... गर्भाशय का कैंसर... और वो आखिरी स्टेज में है। पूरे शरीर में फैल चुका है। डॉक्टर कह रहे हैं कि वो... वो जिस आजादी से हम आज तक जीते आए है... जो इतने सालों तक हमने अनगिनत लोगों के साथ... उसी से कोई वायरस शरीर में पनप गया था। उसी ने तुम्हें अंदर से खोखला कर दिया।"

यह सच कमरे में किसी बम की तरह फटा। शीला की साँसें वहीं अटक गईं। उसे ऐसा लगा जैसे मौत ने सीधे उसके सीने में एक बर्फीला खंजर उतार दिया हो। जिस जिस्म की भूख और जिन अनगिनत मर्दों की बाँहों को उसने और मदन ने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सुख माना था, आज उसी जिस्म ने, उसी हवस ने उसके अंदर मौत का बीज बो दिया था। कर्मों का हिसाब लौट कर आ गया था, और वो भी इतने वीभत्स रूप में।

शीला ने कांपते हुए हाथ से मदन के सिर को सहलाया और कहा, "मदन... रोना बंद करो। जो बोया है, वही तो काट रहे हैं। अब... अब मुझे थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ दो। प्लीज़, मुझे किसी से कोई बात नहीं करनी।"

मदन भारी कदमों से, खुद को घसीटता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।

अब उस खामोश आईसीयू में शीला बिल्कुल अकेली थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि उसमें सिर्फ मेडिकल मॉनिटर्स की वो मशीनी बीप... बीप... बीप... गूँज रही थी। शीला को वो आवाज़ यमराज के कदमों की आहट सी लग रही थी, जो हर गुज़रते सेकंड के साथ उसके करीब आ रहा था।

इंसान जब मौत के मुहाने पर होता है, तो ज़िंदगी किसी फिल्म की तरह उसकी आँखों के सामने से गुज़रती है। शीला के साथ भी यही हो रहा था।

उसे वो वक़्त याद आया जब मदन अमेरिका में था और तब से शुरू हुई उसकी ऐयाशी से भरी ज़िंदगी.. और फिर मदन के लौटने के बाद भी उन दोनों ने आपसी सहमति से एक खुली, बेपरवाह और हवस से भरी ज़िंदगी चुनी थी। उन्हें लगता था कि वो वह बहुत मॉडर्न हैं, दुनिया की उस दकियानूसी सोच से दो कदम आगे हैं जहाँ पति-पत्नी एक-दूसरे के गुलाम होते हैं। उन्होंने ओपन मैरिज के नाम पर अपनी शारीरिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपने हर उसूल, हर शर्म और हर मर्यादा का गला घोंट दिया था। वो कभी अपने किए पर शर्मिंदा नहीं हुई।

लेकिन आज, मौत के इस ठंडे बिस्तर पर लेटे हुए उसे एक भयानक सत्य का एहसास हो रहा था।

"जिस्म की आज़ादी... कितनी खोखली होती है न," शीला के गालों पर आँसुओं की एक गर्म धार बह निकली।

उसे आज समझ आ रहा था कि उन चंद मिनटों के शारीरिक सुख और कभी न मिटने वाली जिस्मानी भूख ने उसे असल में क्या दिया? कुछ नहीं! सिवाय एक दीमक की तरह अंदर से खोखला कर देने वाली बीमारी के। और वो भूख तो कभी मिटी ही नहीं.. उन क्षणभंगुर सुखों के लालच में उसने अपना स्वभाव कितना ज़हरीला बना लिया था। उसने इंसानों को इंसान समझना बंद कर दिया था। जब आप जिस्मों को बदलते हैं, तो आप रिश्तों को भी महज़ एक 'फायदे का सौदा' समझने लगते हैं। उसका सामाजिक व्यवहार, उसकी सहानुभूति, उसका मातृत्व... सब कुछ उस हवस की आग में जलकर राख हो चुका था। उसने अपनी रूह को सड़ा दिया था।

शीला की छाती में दर्द का एक भयानक रेला उठा, लेकिन यह दर्द उसके कैंसर का नहीं, पर उसके पश्चाताप का था।

अगर वो चाहती, तो एक साफ-सुथरी ज़िंदगी जी सकती थी। अपनी बेटी वैशाली को एक सही माँ की तरह संस्कार दे सकती थी, उसे सही और गलत की पहचान सिखा सकती थी। लेकिन उसने क्या किया? वैशाली को भी इसी हवस की दुनिया में धकेल दिया। वैशाली की दूसरी शादी से पहले उसके हिम्मत, पीयूष और राजेश के साथ जो संबंध थे उसे अनजाने में शीला ने ही पालने में मदद की थी। कभी अनजाने में तो कभी जानकर भी अनजान बनकर।

शीला के दिमाग में अचानक वो आखिरी, सबसे खौफनाक और घिनौनी बिसात घूम गई जो उसने महज़ तीन दिन पहले बिछाई थी। पीयूष, कविता, वैशाली और पिंटू की ज़िंदगी का वो भयंकर तमाशा।

उसने पीयूष के पैसों के लालच में अपनी ही बेटी वैशाली के दिमाग में ज़हर घोला। उसने रिश्तों को उसी तरह इस्तेमाल करो और फेंक दो की नज़र से देखा, जैसे वो मर्दों को देखती थी। उसने कविता जैसी एक डरी हुई अकेली औरत को उकसाकर उसका घर तुड़वाया। उसी कविता के ज़रिए पिंटू को अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए मोहरा बनाया। और फिर... खुद जाकर उन दोनों को रंगे हाथों पकड़ा, ताकि वैशाली की नज़रों में पिंटू हमेशा के लिए एक नीच धोखा देने वाला इंसान बन जाए, और पीयूष के लिए वैशाली का रास्ता साफ हो जाए।

"मैंने ये क्या कर दिया..." शीला ने सिसकते हुए अपने सूखे होंठों को दाँतों तले दबा लिया। "मैंने अपनी ही बच्ची की ज़िंदगी में अपना ज़हर घोल दिया। मैंने दो बसे हुए घर एक ही झटके में उजाड़ दिए... और किस लिए? ताकि मेरी बेटी को एक अमीर आदमी और उसका महल जैसा घर मिल सके? क्या पीयूष सच में वैशाली को प्यार देगा? क्या कोई रिश्ता इस धोखे और पाप की बुनियाद पर टिक सकता है?"

मौत की इस घड़ी में शीला को समझ आ गया था कि वो अपनी पूरी ज़िंदगी, अपना अतीत और अपने अनगिनत पाप तो नहीं सुधार सकती... उसकी सज़ा तो उसे अब भुगतनी ही थी। लेकिन वो अपना आखिरी गुनाह... वो आखिरी बिसात जो उसने बिछाई थी, उसे किसी भी कीमत पर सुधारना चाहती थी। वो वैशाली को अपने जैसा नहीं बनने देना चाहती थी।

तभी आईसीयू के कांच के दरवाज़े को धकेलते हुए वैशाली अंदर आई। वैशाली की आँखें रो-रोकर सूजी हुई थीं। उसने बाहर मदन से सब कुछ जान लिया था।

वैशाली अपनी माँ के बिस्तर के पास आकर ज़मीन पर बैठ गई। उसने शीला का ठंडा, कांपता हुआ हाथ अपनी आँखों से लगा लिया और सिसकने लगी, "मम्मी... ये क्या हो गया तुम्हें? तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगी। हम तुम्हें बड़े अस्पताल ले जाएंगे..."

शीला ने बहुत ही मुश्किल से वैशाली के सिर पर हाथ फेरा। उसकी आँखों में अब कोई शातिर चमक नहीं थी, पर एक माँ की और एक गुनहगार औरत की बेबसी थी।

"वैशाली..." शीला की आवाज़ किसी सूखी पत्ती की तरह कांप रही थी, "मेरी बच्ची... मेरा वक़्त अब खत्म हो रहा है। मेरी रगों में जो ज़हर दौड़ रहा है, उसे दुनिया का कोई डॉक्टर नहीं निकाल सकता। मुझे अब कोई नहीं बचा सकता।"

"नहीं मम्मी! ऐसा मत बोलो!" वैशाली चीख पड़ी।

"चुप... चुप हो जा और मेरी बात ध्यान से सुन," शीला ने अपनी पूरी ताक़त बटोरते हुए अपने लहज़े में थोड़ी सख्ती लाई। "जिंदगी भर मैंने जो गलतियां की हैं, जो पाप किए हैं, उनका सिला मुझे मिल गया है। मैं अपनी पूरी ज़िंदगी को तो पलट कर ठीक नहीं कर सकती... लेकिन वैशाली, मरने से पहले मुझे अपना आखिरी गुनाह सुधारना है। मुझ पर एक आखिरी एहसान कर दे मेरी बच्ची।"

वैशाली ने आँसू पोंछते हुए, हैरानी से अपनी माँ को देखा, "कैसा गुनाह मम्मी? तुम क्या कह रही हो? तुम्हें क्या चाहिए?"

शीला ने एक गहरी, दर्दनाक साँस ली और वैशाली की आँखों में सीधा देखते हुए बोली, "अपना फोन निकाल... और अभी, इसी वक़्त पीयूष को, कविता को और पिंटू को फोन कर। उन तीनों को तुरंत यहाँ, इसी अस्पताल में मेरे पास बुला।"

यह सुनते ही वैशाली के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसका शरीर गुस्से और नफरत से तन गया।

"क्या?!" वैशाली लगभग फुफकारते हुए पीछे हटी, "मम्मी, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? तुम उस धोखेबाज़ पिंटू को यहाँ बुलाना चाहती हो? उस गिरी हुई औरत कविता को, जो मेरी पीठ पीछे मेरे ही पति के साथ कपड़े उतारकर लेट गई... उसे मैं यहाँ बुलाऊँ? और पीयूष को? नहीं मम्मी! मैं पिंटू और कविता की शक्ल भी नहीं देखना चाहती। उन्होंने मेरा घर उजाड़ा है!"

शीला ने वैशाली का हाथ इतनी ज़ोर से पकड़ा कि वैशाली हैरान रह गई। शीला की आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी और आवाज़ में एक ऐसा सच था, जिसे सुनकर वैशाली का खून सर्द पड़ने वाला था।

"उन्होंने तेरा घर नहीं उजाड़ा वैशाली..." शीला ने एक कड़वी और मौत जैसी ठंडी आवाज़ में उस भयंकर सच का पर्दाफाश करते हुए कहा, "तेरा घर... तेरा घर तो मैंने उजाड़ा है।"

वैशाली की साँसें वहीं रुक गईं।

"मैंने बिछाई थी वो सारी बिसात," शीला ने हाँफते हुए कहा, "कॉल कर वैशाली! उन तीनों को यहाँ बुला। जब तक मैं उन सबके सामने, तुम्हारी आँखों के सामने अपना नंगा सच नहीं उगल दूँगी... जब तक मैं तुम चारों की वो उलझी हुई डोर वापस नहीं सुलझा दूँगी, तब तक मेरी जान इस जिस्म से नहीं निकलेगी। मुझे सुकून से मरने दे वैशाली... उन्हें बुला!"

वैशाली बुत बनकर अपनी माँ को देख रही थी। आईसीयू की वो बीप... बीप... की आवाज़ अब वैशाली के कानों में किसी हथौड़े की तरह बज रही थी। उसने कांपते हाथों से अपना फोन निकाला। बिसात पलटने वाली थी, लेकिन इस बार चाल किसी गुरूर की नहीं, पर पश्चाताप की थी।

वैशाली भारी, सुन्न और कांपते कदमों के साथ आईसीयू के उस ठंडे कमरे से बाहर निकली। उसकी माँ के वह आखिरी शब्द 'तेरा घर तो मैंने उजाड़ा है' उसके दिमाग की नसें फाड़ रहे थे। वो कॉरिडोर की एक खाली बेंच पर गिर सी गई और कांपते हाथों से अपने फोन की स्क्रीन पर पीयूष, कविता और पिंटू के नंबर तलाशने लगी। बिसात का आखिरी खेल अब शुरू होने वाला था।

इधर आईसीयू के अंदर, वैशाली के बाहर जाते ही कांच का दरवाज़ा फिर से खुला। शीला ने अपनी थकी हुई और धुंधली आँखों से दरवाज़े की तरफ देखा। सामने मौसम और फाल्गुनी खड़ी थीं।

मौसम उसी अस्पताल के जनरल वॉर्ड की मरीज़ों वाली ढीली-ढाली नीली गाउन पहने हुए थी, और उसके साथ खड़ी फाल्गुनी का चेहरा उतरा हुआ था। दरअसल, मौसम भी पिछले दो दिनों से इसी अस्पताल में भर्ती थी। लेकिन जैसे ही उन दोनों की नज़रें बिस्तर पर पड़ीं, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

सामने वो शीला नहीं थी जिसे वो जानती थीं.. वो ग्लैमरस, बेधड़क और अपने हुस्न के गुरूर में रहने वाली शीला। बिस्तर पर पसीने में तर-बतर, पीली पड़ चुकी त्वचा, आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे और अनगिनत सुइयों से छिदी हुई एक ज़िंदा लाश पड़ी थी।

"हे भगवान... शीला आंटी!" फाल्गुनी के मुँह से एक चीख सी निकल गई। वह दौड़कर बिस्तर के पास आई, मौसम भी लड़खड़ाते कदमों से उसके पीछे-पीछे आई।

फाल्गुनी ने शीला का हाथ पकड़ लिया, उसकी आँखों में आँसू आ गए, "ये... ये क्या हालत बना ली है अपनी? मदन अंकल और वैशाली बाहर मिले थे, उन्होंने सब बताया। हम तो सोच भी नहीं सकते थे कि आपको कैंसर... वो भी इस स्टेज का! पर आप हिम्मत मत हारना आंटी, सब ठीक हो जाएगा।"

शीला ने एक फीकी, दर्दभरी मुस्कान के साथ फाल्गुनी का हाथ अपनी कमज़ोर उँगलियों से दबाया और उसे बीच में ही रोक दिया।

"तसल्ली मत दे फाल्गुनी," शीला की आवाज़ में कोई खौफ नहीं था, बस एक डरा देने वाली शांति थी। "मुझे अब किसी झूठी उम्मीद की ज़रूरत नहीं है। मैंने हकीकत से समझौता कर लिया है। जो बोया था, वही तो काट रही हूँ। ये कोई बीमारी नहीं है, ये मेरा अपना कमाया हुआ कर्' है जो लौट कर आया है। अब मुझे इस बिस्तर से कोई डॉक्टर खड़ा नहीं कर सकता.."

मौसम और फाल्गुनी दोनों सुन्न रह गईं। शीला ने गहरी साँस ली और अपनी नज़रें मौसम की उस नीली गाउन और उसके उतरे हुए चेहरे पर गड़ा दीं।

"पर तू यहाँ कैसे मौसम?" शीला ने खांसते हुए पूछा, "तू तो ठीक-ठाक थी, फिर ये अस्पताल के कपड़े क्यों पहन रखे हैं? चेहरा भी बिल्कुल सफेद पड़ रहा है तेरा।"

मौसम शर्म के मारे गड़ गई। उसने अपनी नज़रें झुका लीं और अपने गाउन का कोना उँगलियों में मरोड़ने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि मौत के मुहाने पर खड़ी शीला को वो अपनी हवस और अय्याशी का घिनौना किस्सा कैसे सुनाए।

जब मौसम कुछ नहीं बोली, तो फाल्गुनी ने झेंपते हुए एक भारी साँस ली और सच उगल दिया, "अब क्या बताऊँ आंटी... मेरी अक्ल पर भी तो पत्थर पड़ गए हैं। हमने उस दूधवाले रसिक के साथ मजे करने का एक प्लान बनाया था। सोचा था थोड़ी एश करेंगे, कुछ नया ट्राई करेंगे। मौसम उसके साथ... मतलब... वैसे तो उसका लेने का मन नहीं था.. पर रसिक से रहा नहीं गया.. वो कुछ ज़्यादा ही जंगली हो गया। रफ इंटरकोर्स की वजह से मौसम को सीवियर इंटरनल ब्लीडिंग शुरू हो गई। खून रुक ही नहीं रहा था। आनन-फानन में इसे यहाँ लाकर एडमिट कराना पड़ा। बाल-बाल बची है, वरना..."

फाल्गुनी की बात सुनते ही शीला की आँखों में एक गहरा सूनापन छा गया। उसने मौसम को देखा, जो अभी भी शर्म से सिर झुकाए खड़ी थी। शीला ने अपना सिर तकिए पर पीछे की तरफ पटका और एक लंबी, हताश और दर्दभरी साँस छोड़ी।

यह साँस किसी जजमेंट की नहीं थी, बल्कि उस भयंकर हकीकत की थी जिसे शीला खुद अपनी ज़िंदगी की कीमत देकर समझ चुकी थी।

"कुछ नया ट्राई करेंगे..." शीला ने उन शब्दों को दोहराया, उसकी आवाज़ में एक अजीब सा दार्शनिक ठहराव था। "हमेशा कुछ नया... कुछ अलग... जिस्म के किसी नए कोने में छिपी हुई थोड़ी और आग। है न मौसम?"

मौसम ने डरते-डरते नज़रें उठाईं। शीला की आँखें अब सीधे मौसम की आत्मा में झांक रही थीं।

"इधर आ मौसम... मेरे पास बैठ," शीला ने कमज़ोर आवाज़ में कहा। मौसम डरते हुए बिस्तर के किनारे बैठ गई।

शीला ने उसका हाथ अपने ठंडे हाथों में लिया और एक ऐसी आवाज़ में बोली जो अस्पताल के उस सन्नाटे में किसी मंत्र की तरह गूँजने लगी, "तुझे पता है मौसम, इस दुनिया में सबसे बड़ा धोखा क्या है? जिस्म की आज़ादी। हमें लगता है कि हम बहुत मॉडर्न हो गए हैं। एक पति से बोर हो गए या थोड़ा मनमुटाव हो गया तो दूसरे मर्द के पास चले गए। बिस्तर पर नए-नए तमाशे कर लिए। दूधवाला, ड्राइवर, बॉस या जीजाजी... हमें लगता है कि हम अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जी रहे हैं। लेकिन सच बताऊँ? हम महज़ अपनी हवस के गुलाम बन जाते हैं।"

फाल्गुनी और मौसम चुपचाप सुन रही थीं। उनके रोंगटे खड़े हो रहे थे। मौसम के पैरों तले से तब जमीन खिसक गई जब शीला ने 'जीजाजी' नाम लिया.. शीला आंटी को पीयूष के साथ उसके संबंधों के बारे में कैसे पता चला..?? शायद वैशाली ने बताया होगा..

"जिस्म की ये भूख एक ऐसा अँधा कुआं है फाल्गुनी, जिसे दुनिया का कोई भी मर्द, कोई भी नया तजुर्बा नहीं भर सकता," शीला की आँखों से आँसुओं की एक बूँद छलक कर तकिए पर गिर गई। "ये शारीरिक रोमांच एक भ्रम है, छलाव है..। तू जितना इसके पीछे भागेगी, प्यास उतनी ही बढ़ती जाएगी। और आखिर में.. आखिर में ये आग तुझे अंदर से जलाकर खा जाएगी, बिल्कुल मेरी तरह। देख मुझे... ये जो कैंसर मुझे अंदर से दीमक की तरह नोच रहा है न, ये और कुछ नहीं, मेरी उसी अंधी हवस का नतीजा है। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी जिस्म के नए-नए ज़ायके चखने में निकाल दी, और आज... आज मेरा अपना जिस्म ही मेरे लिए जहन्नुम बन गया है।"

शीला ने खांसते हुए एक घूंट पानी पीने का इशारा किया। फाल्गुनी ने कांपते हाथों से उसे पानी पिलाया।

पानी निगलने के बाद शीला ने मौसम की आँखों में झांकते हुए अपना आखिरी ज्ञान दिया, "आज तुझे सिर्फ ब्लीडिंग हुई है मौसम, कल कुछ और होगा। ये एक चेतावनी है जो भगवान ने तुझे दी है, जो मुझे कभी नहीं मिली। या शायद मिली थी, पर मैं अपने गुरूर में अंधी थी। एक बात हमेशा याद रखना... वफादारी कोई पुरानी, दकियानूसी परंपरा नहीं है, ये एक कवच है। अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार रहना, अपनी इच्छाओं पर लगाम कसना... ये हमें घुटन नहीं देता, ये हमें बचाता है। हमारे शरीर को, हमारे रिश्तों को और सबसे बड़ी बात... हमारी रूह को बचाता है।"

शीला की आवाज़ अब और भी भारी हो गई थी, "जिस बिस्तर पर इंसान एक ही वफादार साथी के साथ सुकून की नींद सो सकता है, हमने उसी बिस्तर को अय्याशी का अखाड़ा बना दिया। और जो औरत अपने पति के प्यार को, उसकी वफादारी को छोड़कर जिस्मानी मज़े के लिए बाहर भटकती है... उसका अंत यही होता है। आज मैं मौत की दहलीज पर खड़ी होकर सोचती हूँ... क्या वो चंद मिनटों का रोमांच, वो नयापन, मेरी इस दर्दनाक मौत, मेरे उजड़े हुए घर और मेरी आत्मा के इस बोझ से ज़्यादा कीमती था? नहीं मौसम... बिल्कुल नहीं।"

मौसम की आँखों से अब झर-झर आँसू बहने लगे थे। वह शीला के सीने से लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। फाल्गुनी भी अपने आँसू नहीं रोक पा रही थी।

शीला ने मौसम के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, "वापस लौट जा मौसम। इससे पहले कि ये अँधा रास्ता तुझे भी इस आईसीयू के बिस्तर तक ले आए... लौट जा। अपने पति विशाल के पास, अपने परिवार के पास। ये जिस्म मिट्टी है... इसे और गंदा मत कर।"

कमरे में सिर्फ मौसम की सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी। शीला ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी हार को, अपने सबसे गहरे दर्द को आज एक सबक बनाकर उन लड़कियों के सामने रख दिया था।

बाहर, वैशाली ने अपना फोन काटा। पीयूष, कविता और पिंटू को अस्पताल पहुँचने का अल्टीमेटम दिया जा चुका था। शीला का आखिरी कर्म, उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा और अंतिम तमाशा अब नज़दीक आ रहा था।

मौसम और फाल्गुनी अपनी भारी आँखों, कांपते दिलों और ज़िंदगी के एक खौफनाक सबक के साथ आईसीयू के उस ठंडे कमरे से बाहर निकल गईं। उनके जाने के बाद कमरे में एक बार फिर वही मनहूस सन्नाटा और मशीनों की बीप-बीप गूँजने लगी। शीला ने अपनी आँखें मूँद लीं, वह अपनी बची-खुची ताक़त बटोर रही थी, क्योंकि असली तमाशा तो अभी बाकी था।

तभी आईसीयू का भारी कांच का दरवाज़ा एक बार फिर बहुत आहिस्ता से खुला।

शीला ने अपनी थकी हुई पलकें उठाईं। दरवाज़े पर जो शख्स खड़ा था, उसे देखकर एक पल के लिए शीला की धुंधली आँखों में भी हैरानी तैर गई। वह रसिक था.. मोहल्ले का वही गठीले बदन और चौड़ी छाती वाला दूधवाला। वही रसिक, जिसकी कच्ची मर्दानगी, बेबाकी और जंगली चुदाई शीला के बंद कमरों की महफिलों का मुख्य हिस्सा हुआ करते थे।

लेकिन आज? आज वो बेखौफ रसिक अस्पताल के इस दमघोंटू माहौल में एक डरे हुए, सहमे हुए जानवर की तरह खड़ा था। उसने पड़ोस की किसी औरत से शीला की अचानक बिगड़ी तबीयत और अस्पताल में भर्ती होने की खबर सुनी थी, और खुद को रोक नहीं पाया था।

रसिक दबे पाँव बिस्तर के करीब आया। जैसे ही उसकी नज़र शीला पर पड़ी, उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसकी चौड़ी छाती धौंकनी की तरह चलने लगी। वो शीला... जिसके हुस्न की आग में वो न जाने कितनी बार जला था, जिसके जिस्म की महक उसे पागल कर देती थी... आज वो एक पीली, सूखी और बेजान हड्डियों के ढांचे में तब्दील हो चुकी थी। रसिक के लिए यह मंज़र किसी भयानक डरावने सपने जैसा था।

शीला ने रसिक के उड़ चुके चेहरे और फटी हुई आँखों को देखा। उसके सूखे होठों पर एक बेहद कमज़ोर, थकी हुई लेकिन सब कुछ जान लेने वाली मुस्कान आ गई।

"आजा रसिक... वहीं क्यों खड़ा है? डर लग रहा है अपनी शीला भाभी को इस हाल में देखकर?" शीला की आवाज़ बहुत मद्धम थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी शांति थी।

रसिक कांपते हुए आगे बढ़ा। उसने अपना खुरदरा हाथ शीला के बिस्तर के किनारे पर रखा। उसकी आवाज़ गले में ही अटक रही थी, "भा... भाभी... ये क्या हो गया आपको? आप तो बिल्कुल... मेरा तो कलेजा कांप रहा है आपको ऐसे देखकर। डॉक्टर क्या कह रहे हैं?"

शीला ने एक गहरी, उखड़ी हुई साँस ली। उसकी नज़रें सीधे रसिक की आँखों में थीं।

"डॉक्टर ने कह दिया है रसिक, कि मेरा टिकट कट चुका है," शीला ने बिल्कुल सपाट लहज़े में कहा, "यूट्रस का.. मतलब बच्चेदानी का कैंसर है। आखिरी स्टेज पर। अब बस कुछ दिनों की मेहमान हूँ।"

"कैंसर?" रसिक के मुँह से अवाक होकर निकला। "पर... पर ऐसे कैसे अचानक? आप तो बिल्कुल ठीक थीं भाभी।"

शीला ने एक फीकी हँसी हँसी, जो खाँसी में बदल गई। "अचानक नहीं हुआ रसिक। ये आग बहुत पहले से मेरे अंदर सुलग रही थी। तुझे पता है इस कैंसर की वजह क्या है?"

रसिक ने नासमझी से सिर हिलाया।

"ये उसी हवस का नतीजा है रसिक, जिसमें हम सालों तक अंधे होकर गोते लगाते रहे," शीला की आवाज़ अब एक चेतावनी की तरह गूँजने लगी। "अनगिनत मर्द... और बिना किसी रोक-टोक की वो अय्याशी। उसी गंदे खेल ने मेरे शरीर में वो वायरस डाल दिया, जिसने मुझे अंदर से सड़ा दिया है। ये बीमारी नहीं है रसिक, ये मेरे कर्मों का वो हिसाब है, जो भगवान मुझसे ब्याज समेत वसूल रहा है।"

रसिक का पूरा शरीर पसीने से नहा गया। अभी कुछ दिनों पहले ही उसने मौसम का जो हाल किया था, और अब शीला का ये भयानक अंजाम सुनकर उसकी रूह कांप उठी। उसे लगा जैसे आईसीयू की वो ठंडी हवा उसकी हड्डियों में घुसकर उसे अंदर से जमा रही है।

शीला ने बड़ी मुश्किल से अपना हाथ उठाया और रसिक के कांपते हुए हाथ पर रखा। उसकी आँखों में अब कोई जिस्मानी चाहत नहीं थी, बल्कि एक मौत की दहलीज पर खड़ी औरत की नसीहत थी।

"रसिक... तूने मेरे साथ, मौसम के साथ, और न जाने कितनी औरतों के साथ अपनी मर्दानगी की प्यास बुझाई है," शीला ने खांसते हुए कहा, "लेकिन मेरी ये हालत देख ले। इस जिस्म का अंजाम देख ले। ये गोश्त और हड्डियां सब यहीं इसी बिस्तर पर सड़ कर खाक हो जाएंगी। जिस्म की ये भूख कभी खत्म नहीं होती रसिक, लेकिन ये इंसान को खत्म ज़रूर कर देती है।"

रसिक की आँखें भर आईं। वह घुटनों के बल शीला के बिस्तर के पास बैठ गया।

"आज मैं तुझे अपनी आखिरी नसीहत दे रही हूँ रसिक," शीला ने अपनी पूरी ताक़त बटोर कर कहा। "इस दलदल से बाहर निकल जा। रूखी के पास लौट जा। और उसे भी कहना की सुधर जाएँ और बाहर मुंह मारना बंद कर दें.. अगर तू नहीं रुका रसिक, तो याद रखना... तेरा अंजाम भी मेरी ही तरह होगा। या तो तू किसी ऐसी ही भयानक बीमारी से तड़प-तड़प कर मरेगा, या फिर तेरे कर्म तेरे ही घर में आग लगा देंगे। छोड़ दे ये अय्याशी का रास्ता..।"

रसिक की आँखों से आँसू छलक पड़े। शीला की उस कंकाल जैसी हालत और उसके मौत से रंगे हुए शब्दों ने रसिक के अंदर के उस जंगली, हवस के भूखे मर्द को पूरी तरह मार दिया था। उसे रूखी का और अपने लल्ला का वो भोला चेहरा याद आ गया।

रसिक ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। वो बुरी तरह कांप रहा था।

"मैं कसम खाता हूँ भाभी..." रसिक रोते हुए, रुंधी हुई आवाज़ में बोला, "आपकी ये हालत देखकर मेरी आँखें खुल गई हैं। मुझे माफ कर दो भाभी। मैं आज के बाद किसी पराई औरत की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखूँगा। मैं अपनी बीवी के साथ वफादारी से रहूँगा... भगवान कसम भाभी, मैं ये सब गंदे काम आज ही छोड़ दूँगा।"

शीला के होठों पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"जा रसिक... अब मुझे अकेला छोड़ दे। और अपनी कसम याद रखना," शीला ने फुसफुसाते हुए कहा।

रसिक अपने आँसू पोंछता हुआ, एक बदला हुआ इंसान बनकर आईसीयू से बाहर निकल गया। शीला ने गहरी साँस ली। उसने अपनी ज़िंदगी में अनगिनत पाप किए थे, लेकिन मौत के मुहाने पर खड़े होकर, मौसम, फाल्गुनी और रसिक को सही रास्ता दिखाकर उसने अपने गुनाहों का बोझ थोड़ा कम ज़रूर कर लिया था।

अब उसे बस इंतज़ार था... वैशाली के बुलाए हुए उन तीन मोहरों का.. पीयूष, कविता और पिंटू। अपनी बिछाई हुई आखिरी और सबसे ज़हरीली बिसात को उसे अपने ही हाथों से पलटना था।
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अस्पताल के उस लंबे और ठंडे कॉरिडोर में एक भारी सन्नाटा पसरा था, जिसे तोड़ते हुए तीन अलग-अलग कदमों की आहटें वहां पहुंचीं। वैशाली के बुलावे पर पीयूष, कविता और पिंटू अस्पताल पहुँच चुके थे।

पिंटू की हालत सबसे ज़्यादा खराब थी। उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं, कंधे झुके हुए थे और माथे पर पसीने की ठंडी बूँदें चमक रही थीं। रंगे हाथों पकड़े जाने की शर्म ने उसे अंदर तक तोड़ दिया था। उसे हर किसी से खौफ आ रहा था.. वैशाली के तमाचे की गूँज अभी भी उसके कानों में थी, पीयूष से नज़रे मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं थी, और मदन या शीला का सामना करना तो मौत के बराबर लग रहा था।

दूसरी तरफ, कविता बिल्कुल बेपरवाह सी नज़र आ रही थी। पीयूष के उस तमाचे और घर से निकाले जाने के बाद, उसे अपने आस-पास की दुनिया से कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा था। उसने एक बार पिंटू की तरफ देखकर हल्की सी सहानुभूति जताने की कोशिश की, लेकिन पिंटू किसी डरे हुए जानवर की तरह झिझक कर उससे दो कदम पीछे हट गया।

तभी भारी और सधे हुए कदमों से पीयूष वहाँ पहुँचा। उसके चेहरे पर एक गहरी टेंशन थी। उसे अब तक यह समझ नहीं आ रहा था कि शीला को अचानक ऐसा क्या हो गया कि उसे आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। कविता को वहां देखकर पीयूष के चेहरे पर एक पल के लिए चिढ़ उभरी, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र वैशाली पर पड़ी, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर सुकून आ गया।

पर वैशाली आज किसी से कोई औपचारिकता निभाने के मूड में नहीं थी। उसका चेहरा पत्थर की तरह सख्त था।

"तुम तीनों आ गए, ठीक है," वैशाली ने बिना किसी का हाल-चाल पूछे, एक बेहद ठंडे और सपाट लहज़े में कहा, "मम्मी ने तुम तीनों को, और पापा को... एक साथ अंदर बुलाया है। उन्हें तुम सबसे कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है।"

पीयूष ने कुछ पूछना चाहा, लेकिन वैशाली बिना किसी की तरफ देखे सीधा आईसीयू के दरवाज़े की तरफ मुड़ गई।

मदन पहले से ही भारी मन के साथ दरवाज़े के पास खड़ा था। शीला ने आज तक अपनी बिछाई गई हर ज़हरीली बिसात मदन से छुपा कर रखी थी। लेकिन अब, मौत की दहलीज पर खड़ी शीला जानती थी कि राज़ सीने में दफन करके ले जाने का कोई फायदा नहीं। मदन को सब कुछ जानना ज़रूरी था, ताकि उसके जाने के बाद मदन इन चारों की उजड़ी हुई ज़िंदगियों को वापस समेटने में उनकी मदद कर सके।

वैशाली, मदन, पीयूष, कविता और पिंटू... पांचों भारी कदमों से आईसीयू के अंदर दाखिल हुए।

कमरे के बीचों-बीच, सफेद चादरों के बीच शीला किसी सूखी टहनी की तरह लेटी थी। मशीनों की बीप-बीप के बीच, जब शीला ने इन पांचों को एक साथ देखा, तो उसके पपड़ीदार होठों पर एक हल्की सी, सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसने अपनी बची-खुची सारी ताक़त को इस आखिरी, सबसे मुश्किल काम के लिए बटोरना शुरू किया।

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"आ गए तुम सब..." शीला की आवाज़ बहुत कमज़ोर और हांफती हुई थी, लेकिन उसमें अभी भी एक अजीब सा अधिकार था।

पीयूष आगे बढ़ा, "भाभी, ये आपको क्या..."

"शशश... पीयूष, चुप बिल्कुल!" शीला ने अपना कांपता हुआ हाथ उठाकर उसे बीच में ही रोक दिया। "जब तक मैं अपनी बात पूरी न कर लूँ, कोई मुझे बीच में नहीं टोकेगा। मेरी साँसें गिनती की बची हैं, और मुझे बहुत कुछ उगलना है।"

पूरे कमरे में एक खौफनाक खामोशी छा गई। मदन हैरानी से अपनी पत्नी को देख रहा था।

शीला ने एक गहरी साँस ली और अपनी उस घिनौनी बिसात का एक-एक पन्ना खोलना शुरू किया।

"तुम चारों की ज़िंदगियां आज जिस मुकाम पर खड़ी हैं... जो घर टूटे हैं, जो रिश्ते बिखरे हैं... वो किसी हालात का नतीजा नहीं थे। वो मेरी रची हुई एक साज़िश थी।" शीला की बात सुनते ही पीयूष और पिंटू के चेहरे का रंग उड़ गया।

"वैशाली," शीला ने अपनी बेटी की तरफ देखते हुए कहा, "याद है तूने मुझे पिंटू की उस कमज़ोरी के बारे में रोते हुए बताया था? और ये भी कहा था कि वो अपने ईगो में आकर किसी डॉक्टर को भी नहीं दिखा रहा? एक माँ होने के नाते मुझे पिंटू का इलाज करवाना चाहिए था, लेकिन मैंने क्या किया? मैंने पीयूष की दौलत को देखा, और तय किया कि मेरी बेटी उस महल पर राज करेगी।"

पीयूष की आँखें फटी की फटी रह गईं।

"पीयूष, मैंने बड़ी ही चालाकी से तुम्हारे दिमाग में वैशाली का बीज बोया," शीला हांफते हुए, एक-एक शब्द चबाते हुए बोल रही थी। "तुम्हें कविता से दूर करने के लिए मैंने अपने जिस्म का इस्तेमाल किया। याद है वो रात, जिसके अगली सुबह तुमने कविता पर हाथ उठाया था? उस रात मैंने ही कविता को पट्टी पढ़ाई थी कि वो तुमसे ज़बरदस्ती प्यार मांगे। क्योंकि मुझे पता था कि तुम उसे वो प्यार नहीं दे पाओगे... क्योंकि पिछली रात मैंने खुद तुम्हें अपने जिस्म में इतना निचोड़ लिया था कि तुम सुबह किसी काम के नहीं बचे थे।"

यह सुनते ही मदन को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर हथौड़ा मार दिया हो। कविता ने झटके से अपना मुँह ढँक लिया।

शीला रुकी नहीं, उसने पिंटू की तरफ देखा, "जब कविता घर छोड़कर उस पुराने फ्लैट में गई, तो वो बहुत अकेली और डरी हुई थी। मैंने ही उसे उकसाया कि वो पिंटू को फोन करे और रोकर उसे वहां बुलाए। मैं जानती थी कि पिंटू सीधा-सादा और भावुक है, वो कविता के रोने पर दौड़ा चला जाएगा।"

पिंटू की आँखें आंसुओं से भर गईं। उसे समझ आ रहा था कि वो किस भयानक जाल में फंसा था।

"और वैशाली..." शीला की आवाज़ अब और भारी हो गई, "मैंने ही तुमसे कहा था न कि अगर पिंटू की बेवफाई साबित हो जाए, तो क्या तुम पीयूष के पास जाओगी? तुमने झिझकते हुए हाँ कह दिया था। जैसे ही मुझे पता चला कि पिंटू कविता के पास पहुँच गया है, मैंने पीयूष को उस फ्लैट की डुप्लीकेट चाबी के साथ बुलाया, और हम सब वहाँ साथ जा पहुँचे... ताकि पिंटू और कविता रंगे हाथों पकड़ा जाए, वैशाली का दिल टूट जाए, और पीयूष का रास्ता साफ हो जाए। मैंने तुम चारों को कठपुतलियों की तरह नचाया।"

शीला चुप हो गई। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। पूरे आईसीयू में किसी श्मशान जैसा सन्नाटा था। सिर्फ मदन के भारी-भारी सिसकने की आवाज़ आ रही थी, जिसे अपनी पत्नी के इस राक्षसी रूप का आज पहली बार पता चला था।

शीला ने वैशाली की तरफ देखा, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, "पिंटू सच में बहुत अच्छा इंसान है वैशाली। उसकी एक शारीरिक कमज़ोरी को छोड़कर, उसने कभी तुझे धोखा नहीं दिया। तेरा उस पर भरोसा करना बिल्कुल सही था। मैंने ज़हर घोला था... मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची।"

फिर शीला ने पिंटू की तरफ अपने हाथ जोड़े, "मुझे माफ कर दे पिंटू। मेरी सज़ा मुझे मिल रही है। पर मेरे इस घिनौने पाप के लिए मेरी वैशाली को सज़ा मत देना। उसकी कोई गलती नहीं थी।"

पिंटू फफक कर रो पड़ा। उसके सीने में वैशाली के लिए जो गुस्सा था, वो एक पल में खत्म हो गया। वह शीला से नफरत करना चाहता था, लेकिन इस कंकाल हो चुकी, मौत की दहलीज पर भीख मांगती औरत को देखकर उसका गुस्सा तरस में बदल गया। पिंटू ने रोते हुए अपना सिर हिलाकर शीला को माफ कर दिया।

अब शीला ने अपनी नज़रें पीयूष और कविता की तरफ घुमाईं।

"पीयूष... याद कर वो पुराने दिन," शीला के चेहरे पर एक पुरानी यादों वाली मुस्कान आ गई, "जब हम सब पड़ोसी हुआ करते थे। तुम राजेश की ऑफिस के एक मामूली मुलाजिम थे, मोटरसाइकिल पर घूमते थे, पर तुम दोनों कितने खुश थे। पैसे कम थे, पर प्यार बेशुमार था। दौलत ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया पीयूष। कविता जैसी हीरा लड़की तुम्हें दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी। तुम बहुत बड़े बेवकूफ होगे अगर तुम अपनी इस दौलत के अहंकार में अपनी इतनी प्यारी बीवी को खो दोगे। काम धंधा तो चलता रहेगा, पर कविता को इस चक्कर में इग्नोर करते रहे तो याद रखना.. तुम्हारे साथ ये दौलत नहीं आएगी.. तुम्हारे आखिरी पल तक यही लड़की तुम्हारा साथ देगी।"

शीला ने कांपते हाथों से कविता की तरफ इशारा किया, "मैंने तेरे साथ जो किया कविता, उसके लिए मैं माफ़ी के लायक भी नहीं हूँ। पर तेरा दिल बहुत बड़ा है। पीयूष को माफ कर दे... और अपने घर वापस लौट जा।"

कविता, जो अब तक बुत बनी खड़ी थी, अचानक फूट-फूट कर रोने लगी। वो दौड़कर शीला के पास आई और उसने शीला को कसकर गले लगा लिया। सारी नफरत, सारा गुस्सा उस एक आँसुओं से भीगे गले मिलने में पिघल गया।

कुछ ही पलों में, आईसीयू का वो दमघोंटू नज़ारा बदल गया। पीयूष ने आगे बढ़कर रोती हुई कविता का हाथ कसकर थाम लिया, और दूसरी तरफ पिंटू ने अपनी झिझक तोड़कर वैशाली के कंधे पर हाथ रखकर अपनी ओर खींच लिया। दोनों जोड़ियां.. जो कल तक हमेशा के लिए टूटने की कगार पर थीं.. आज एक-दूसरे का हाथ थामे खड़ी थीं। उन्होंने अपना सबक सीख लिया था।

शीला की आँखें अब थक कर बंद होने लगी थीं। उसने अपनी गर्दन बहुत मुश्किल से मदन की तरफ घुमाई, जो सदमे और आंसुओं में डूबा हुआ सिर झुकाए खड़ा था।

शीला ने अपना ठंडा हाथ मदन के हाथों में रख दिया।

"मदन..." शीला की आवाज़ अब सिर्फ एक फुसफुसाहट रह गई थी। "इन चारों का खयाल रखना। और... और तुझे बेवफाई और हवस के बारे में क्या ही ज्ञान दूँ... तू तो खुद अपनी आँखों से मेरा ये भयानक अंजाम देख रहा है। जिस्म की भूख ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा।"

शीला ने मदन का हाथ हल्का सा दबाया, "मेरे जाने के बाद अकेले मत रहना मदन। किसी अच्छी और वफादार औरत को देखकर शादी कर लेना। अपनी बाकी की ज़िंदगी सुकून से बिताना।"

यह सुनते ही मदन बुरी तरह टूट गया। उसने घुटनों के बल बैठकर शीला के दोनों हाथ अपने गालों से लगा लिए। उसके आँसुओं से शीला के हाथ भीग गए।

"क्या बकवास कर रही हो शीला!" मदन रोते हुए चीखा, "तुम्हारे जैसी कोई नहीं हो सकती... कोई नहीं! तुममें हज़ार बुराइयां थीं, तुमने जो किया वो गलत था... लेकिन मेरे लिए, तुम आज भी मेरी वही शीला हो। मेरी जान हो तुम। मैं तुम्हारे बिना किसी और औरत के बारे में अब सोच भी नहीं सकता। मैं अकेले जी लूँगा, पर किसी और को तुम्हारी जगह नहीं दे सकता।"

मदन के इन प्यार भरे, बेपनाह वफादारी वाले शब्दों ने शीला की आत्मा को एक अजीब सा सुकून दे दिया। अपनी बिछाई हुई सारी ज़हरीली बिसात को उखाड़ फेंकने का सुकून। चारों बच्चों को वापस मिला देने का सुकून।

मदन के आखिरी शब्द अभी पूरे भी नहीं हुए थे कि...

बीप... बीप... बीप... बीईईईईईईईईईप...

आईसीयू में गूँजती वो हार्ट-रेट मॉनिटर की मशीन अचानक एक लंबी और सपाट नीली लकीर में बदल गई। वह तेज़, लगातार गूँजने वाली आवाज़ कमरे के सन्नाटे को चीरने लगी।

पांचों ने झटके से मशीन की तरफ देखा और फिर खौफ से शीला के चेहरे की तरफ।

शीला की आँखें हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं। लेकिन उसके चेहरे पर कोई दर्द, कोई पछतावा या खौफ नहीं था। उसके होठों पर एक बहुत ही गहरी, शांत और मुकम्मल सुकून भरी मुस्कान ठहर गई थी.. यह बताने के लिए कि अपने आखिरी पलों में, वो वो सब कुछ समेटने में कामयाब हो गई थी, जिसे उसने खुद अपने हाथों से बिखेरा था।

शीला की लीला यहीं समाप्त हुई.. ||

Goodbye
— समाप्त —


Behtrin update ke aath acha gyan bhi de diya bhai vakharia
 
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Many congratulations.

One of the choicest few stories that I absolutely loved. What a fantabulous description of the intricacies of a mature housewife. Very few could describe it the say you do and that too without being judgmental.

I am sure there would be many more such milestones to come. Keep writing.

Lots of love
:heart::heart::heart::heart::heart::heart::heart::heart::heart::heart::heart::heart::heart::heart:
:heart:𝕋𝕙𝕒𝕟𝕜𝕤 𝕗𝕠𝕣 𝕥𝕙𝕖 𝕔𝕠𝕞𝕞𝕖𝕟𝕥𝕤 :heart:
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arushi_dayal

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vakharia ji
बहुत ही भावुक और दुखद अंत दिया है आपने अपनी कहानी को। बुराइया हम सब मैं..किसी में कम या किसी में ज्यादा...लेकिन दूध के धुले हम में से शायद ही कोई हो। ये सच है जो कुछ शीला ने कविता के साथ किया। उसको पढ़ कर मेरा दिल मेरे उस किरदार के लिए कुछ पल के लिए नफ़रत अदा हुई थी लेकिन सच में ऐसा दुखद अंत मैंने उसके लिए नहीं सोचा था। सच कहूं तो इस अपडेट को पढ़ने के बाद मेरी आंखों में आंसू आ गए.

बेवफाई एक ऐसी खाई है जिसका कोई अंत नहीं है। कुछ लोग क्षणिक आनंद या किसी की अक्षमता के कारण इस तरह की जीवनशैली अपना लेते हैं, लेकिन यकीन मानिए, एक बार इसमें पड़ जाने के बाद वापसी का कोई रास्ता नहीं होता।

जीवन में चाहत और ख्वाहिशों का कोई अंत नहीं है। एक ख़तम होगी तो दूसरी जन्म लेगी और कहीं ना कहीं इसी का नाम तो जिंदगी है। लेकिन चाहत को अपने ऊपर हावी मत होने दो।

शायद इमोशंस में कुछ ज्यादा ही बोल गई। vakharia ji एक बार फिर ऐसी अद्भुत कहानी साझा करने के लिए धन्यवाद।
 
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बहुत ही भावुक और दुखद अंत दिया है आपने अपनी कहानी को। बुराइया हम सब मैं..किसी में कम या किसी में ज्यादा...लेकिन दूध के धुले हम में से शायद ही कोई हो। ये सच है जो कुछ शीला ने कविता के साथ किया। उसको पढ़ कर मेरा दिल मेरे उस किरदार के लिए कुछ पल के लिए नफ़रत अदा हुई थी लेकिन सच में ऐसा दुखद अंत मैंने उसके लिए नहीं सोचा था। सच कहूं तो इस अपडेट को पढ़ने के बाद मेरी आंखों में आंसू आ गए.

बेवफाई एक ऐसी खाई है जिसका कोई अंत नहीं है। कुछ लोग क्षणिक आनंद या किसी की अक्षमता के कारण इस तरह की जीवनशैली अपना लेते हैं, लेकिन यकीन मानिए, एक बार इसमें पड़ जाने के बाद वापसी का कोई रास्ता नहीं होता।

जीवन में चाहत और ख्वाहिशों का कोई अंत नहीं है। एक ख़तम होगी तो दूसरी जन्म लेगी और कहीं ना कहीं इसी का नाम तो जिंदगी है। लेकिन चाहत को अपने ऊपर हावी मत होने दो।


शायद इमोशंस में कुछ ज्यादा ही बोल गई। vakharia ji एक बार फिर ऐसी अद्भुत कहानी साझा करने के लिए धन्यवाद।
साहित्य हो या असल ज़िंदगी, कोई भी इंसान पूरी तरह श्वेत या श्याम नहीं होता। हम सब उसी ग्रे ज़ोन में जीते हैं, जहाँ हमारी कमज़ोरियां और अच्छाइयां लगातार आपस में लड़ती रहती हैं। बेवफाई और ख्वाहिशों की जिस अंधी खाई का आपने ज़िक्र किया, वो यथार्थ है। चाहतें जीवन का ईंधन ज़रूर हैं, लेकिन जब वे बेलगाम होकर हमारे वजूद पर सवारी गांठ लेती हैं, तो अंजाम सिर्फ तबाही होता है। शीला ने जिस क्षणिक सुख और तथाकथित आज़ादी को अपनी जीत समझा था, दरअसल वह एक ऐसा दलदल था जो उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था।

उसका अंत दुखद था, लेकिन कर्मों के तराज़ू पर शायद यही उसका इकलौता प्रायश्चित था। अगर वह बिना पछतावे के गुज़र जाती, तो महज़ एक खलनायिका बनकर रह जाती। लेकिन अपनी आखिरी साँसों के बीच, अपनी ही बिछाई हुई बिसात को उखाड़ फेंकना.. यही वो पल था जिसने उसे वापस 'इंसान' बना दिया।

आपने वाकई कहानी के उन जज़्बातों को एक बेहद खूबसूरत आवाज़ दी है जिन्हें मैं अपनी कलम से लिखने की कोशिश कर रहा था। इस कहानी को इतनी गहराई से जीने और इस सफर में इतनी आत्मीयता से जुड़ने के लिए आपका हृदय से आभार।
 
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