It's First Priority WorkI am too much busy so updates are takes more time
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It's First Priority WorkI am too much busy so updates are takes more time
Bahut khatarnak mod pr story a gyi hचरम सुख की उन लहरों के बाद कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया था, जिसमें सिर्फ ऋषभ और ममता की तेज चलती सांसों की आवाजें गूँज रही थीं।
दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए थे, जैसे दुनिया की सारी वर्जनाएं और सामाजिक बंधन उस कमरे की दहलीज के बाहर ही छूट गए हों।
पसीने से तरबतर उनके शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए थे, और बिस्तर की चादरें पूरी तरह से बिखर चुकी थीं।
ममता की आँखों में अब भी वह मदहोशी थी, लेकिन धीरे-धीरे वास्तविकता उनके सामने लौटने लगी।
उन्होंने महसूस किया कि उनके शरीर का हर हिस्सा अब भी कांप रहा था और उनके अंदर ऋषभ का गर्म वीर्य धीरे-धीरे रिस रहा था।
वह एक ऐसी तृप्ति महसूस कर रही थीं, जिसे उन्होंने अपनी पूरी उम्र में कभी नहीं जाना था।
उनके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी—एक ऐसी मुस्कान जिसमें प्यार, वासना और एक गहरा अपराधबोध, तीनों घुले हुए थे।
जब दोनों की सांसें थोड़ी सामान्य हुईं, तो ममता ने धीरे से अपना सिर ऋषभ के चौड़े सीने पर रखा।
उन्होंने महसूस किया कि ऋषभ का दिल अब भी तेजी से धड़क रहा था। ममता ने अपनी नजरें ऊपर उठाईं और ऋषभ की आँखों में देखा,
जिनमें अब भी एक गहरी भूख और अधिकार था।
ममता ने बहुत ही धीमी और सहमी हुई आवाज में पूछा, "बेटा... अब... अब क्या? खाना लगाऊँ या फिर शाम को खाओगे? अगर अभी भूख नहीं है, तो थोड़ा नाश्ता कर लो?"
ऋषभ ने एक गहरी सांस ली और ममता को और कसकर अपनी ओर खींच लिया। उसने उनके माथे को
चूमा और शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा, "माँ, इस कदर मेहनत करने के बाद मुझे तो बहुत ज़ोर की भूख लगी है। आप बस खाना लगा दो, मैं बस अभी आता हूँ।"
ममता के गाल शर्म से गुलाबी हो गए। 'मेहनत' शब्द सुनकर उन्हें याद आया कि उन्होंने अभी-अभी अपने बेटे के साथ क्या किया था।
वह एक पल के लिए ठिठकीं, फिर धीरे से उठीं। उनके शरीर में अभी भी एक हल्का सा कंपन था। उन्होंने बिस्तर पर बिखरी हुई अपनी काली साड़ी उठाई और उसे अपने शरीर पर लपेटना शुरू किया।
साड़ी पहनते समय उनकी नजरें बार-बार ऋषभ पर जा रही थीं, जो अभी भी बिस्तर पर लेटा हुआ उन्हें कामुक नज़रों से देख रहा था।
ममता ने अपनी साड़ी ठीक की, अपने बिखरे हुए बालों को संवारा और एक गहरी सांस लेकर किचन की ओर चल दीं।
उनके चलने के अंदाज़ में अब एक अलग ही आत्मविश्वास और स्त्रीत्व था, जो ऋषभ की दी हुई संतुष्टि से आया था।
किचन में पहुँचकर ममता ने जल्दी-जल्दी काम करना शुरू किया। उन्होंने दाल, चावल, सब्जी और गरमा-गरम रोटियाँ परोसीं।
जबकि वह खाना टेबल पर लगा रही थीं, उनके दिमाग में अभी भी वही दृश्य घूम रहे थे—ऋषभ का वह सख्त लंड, उसकी जीभ का स्पर्श और वह हिंसक धक्के।
वह खुद को रोक नहीं पा रही थीं; उनके हाथ कांप रहे थे और उनके मन में फिर से वही प्यास जाग रही थी।
"ऋषभ! बेटा, खाना लग गया है, आ जाओ!" ममता ने आवाज़ दी।
ऋषभ ने उनकी आवाज़ सुनी और बिस्तर से उठा। उसने कोई कपड़ा नहीं पहना, बस अपना अंडरवियर पहना हुआ था।
उसका गठीला और मस्कुलर शरीर, जिस पर पसीने की कुछ बूंदें अब भी चमक रही थीं, किसी यूनानी देवता जैसा लग रहा था।
वह बिना किसी झिझक के, केवल अंडरवियर में ही डाइनिंग टेबल पर आ गया।
ममता ने जब उसे इस हालत में देखा, तो उनकी सांसें एक बार फिर थम गईं। उनके बेटे का वह नग्न शरीर, उसकी चौड़ी छाती और सख्त मांसपेशियां उन्हें फिर से उत्तेजित कर रही थीं।
वह अपनी नजरें चुराने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उनकी आँखें बार-बार ऋषभ के अंडरवियर की ओर जा रही थीं,
जहाँ उसका उभार अब भी हल्का सा महसूस हो रहा था।
ऋषभ आराम से कुर्सी पर बैठ गया और खाने की खुशबू लेकर गहरी सांस ली।
उसने ममता की ओर देखा, जो पास ही खड़ी थीं और उनके चेहरे पर वही पुरानी शर्मीली मुस्कान थी।
खाना शुरू करने से पहले, ऋषभ ने एक गंभीर विषय छेड़ा। उसने पूछा, "माँ, पापा से बात हुई थी क्या आपकी?"
ममता ने सिर हिलाया और धीमी आवाज़ में कहा, "हाँ बेटा, बात हुई थी। सब ठीक है। बस... वह बता रहे थे कि रीना बुआ अपनी पूरी फैमिली के साथ आ रही हैं।
उनके बच्चों का वेकेशन चल रहा है, तो उन्होंने सोचा कि इस बार यहाँ आकर समय बिताया जाए।"
यह सुनते ही ऋषभ के चेहरे की चमक गायब हो गई। उसके हाथ में रोटी का टुकड़ा रुक गया। उसने अपनी माँ की ओर देखा, जिसकी आँखों में भी एक उदासी और चिंता छा गई थी।
ऋषभ ने अपनी परेशानी जाहिर करते हुए कहा, "वह तो ठीक है माँ, लेकिन अब मेरा एक दिन भी काटना मुश्किल है आपके बिना।
और अब जब घर पर पापा, रीना बुआ और उनके बच्चे रहेंगे, तो हम कैसे मिलेंगे? हम कैसे एक-दूसरे के करीब आ पाएंगे?
मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ। मैं इस तड़प के साथ कैसे रहूँगा?"
ऋषभ की आवाज़ में एक गहरी बेबसी थी। वह जानता था कि रीना बुआ की मौजूदगी में उनके लिए चोरी-छिपे मिलना लगभग नामुमकिन होगा।
घर में हर वक्त लोगों की भीड़ रहेगी, बच्चों का शोर होगा और पापा की सख्त नजरें होंगी। वह अपनी माँ के शरीर का आदी हो चुका था, और अब इस लत को छोड़ना उसके लिए किसी सजा से कम नहीं था।
ममता ने ऋषभ के पास आकर उसके कंधे पर अपना हाथ रखा। उनकी आँखों में भी आंसू थे और चेहरे पर गहरी मायूसी।
उन्होंने ऋषभ की आँखों में देखते हुए कहा, "मैं भी यही सोच रही हूँ बेटा... अब हम क्या करेंगे? मैं भी तुम्हारे बिना कैसे रहूँगी? मेरा शरीर तो अब सिर्फ तुम्हारी छुअन पहचानता है।"
ममता की आवाज़ में एक ऐसी तड़प थी जो ऋषभ के दिल को चीर गई। वह दोनों जानते थे कि उन्होंने एक ऐसी आग को जलाया है जिसे अब बुझाना नामुमकिन है।
अब जब परिवार के अन्य सदस्य आने वाले थे, तो उनकी यह वर्जित दुनिया खतरे में थी।
ऋषभ ने ममता का हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा और उसे अपनी गोद में बिठा लिया, भले ही वह डाइनिंग टेबल पर थे।
उसने उनके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "मैं आपको किसी और के हवाले नहीं कर सकता, चाहे घर में कोई भी क्यों न हो। हमें कोई न कोई रास्ता निकालना ही होगा, माँ।"
ममता ने अपनी आँखें बंद कर लीं और ऋषभ के सीने से लग गईं। उन्हें डर था कि कहीं कोई देख न ले, लेकिन इस डर ने उनकी उत्तेजना को और बढ़ा दिया।
वह सोच रही थीं कि क्या वह फिर से वही जोखिम उठा पाएंगी? क्या वह रीना बुआ और बच्चों के सामने अपनी इस गुप्त वासना को छिपा पाएंगी?
किचन की खामोशी में अब सिर्फ उनकी धड़कनें सुनाई दे रही थीं। बाहर की दुनिया के लिए वह एक आदर्श माँ और बेटा थे,
लेकिन इस टेबल के नीचे, एक ऐसी भूख पल रही थी जो किसी भी सामाजिक मर्यादा को तोड़ने का दम रखती थी।
ऋषभ ने धीरे से ममता की साड़ी के पल्लू को सरकाया और उनके कंधे पर एक छोटा सा किस किया।
"हम मिलेंगे माँ... चाहे कहीं भी, चाहे किसी भी तरह। मैं आपको तड़पने नहीं दूँगा और न ही खुद तड़पूँगा।"
ममता ने एक लंबी आह भरी। वह जानती थीं कि यह रास्ता काँटों भरा है, लेकिन ऋषभ के प्यार और उसकी वासना ने उन्हें इतना अंधा कर दिया था
कि अब उन्हें किसी और चीज़ की परवाह नहीं थी। उन्होंने बस इतना कहा, "जो भी हो बेटा, बस तुम मेरा साथ मत छोड़ना।"
दोनों वहीं एक-दूसरे में खो गए, यह जानते हुए कि आने वाले दिन उनके लिए और भी अधिक चुनौतीपूर्ण और रोमांचक होने वाले हैं।
अब उनकी यह लुका-छिपी का खेल और भी गहरा होने वाला था, जहाँ खतरा ज्यादा था, लेकिन सुख की तीव्रता भी उतनी ही अधिक होने वाली थी।
चरम सुख की उन लहरों के बाद कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया था, जिसमें सिर्फ ऋषभ और ममता की तेज चलती सांसों की आवाजें गूँज रही थीं।
दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए थे, जैसे दुनिया की सारी वर्जनाएं और सामाजिक बंधन उस कमरे की दहलीज के बाहर ही छूट गए हों।
पसीने से तरबतर उनके शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए थे, और बिस्तर की चादरें पूरी तरह से बिखर चुकी थीं।
ममता की आँखों में अब भी वह मदहोशी थी, लेकिन धीरे-धीरे वास्तविकता उनके सामने लौटने लगी।
उन्होंने महसूस किया कि उनके शरीर का हर हिस्सा अब भी कांप रहा था और उनके अंदर ऋषभ का गर्म वीर्य धीरे-धीरे रिस रहा था।
वह एक ऐसी तृप्ति महसूस कर रही थीं, जिसे उन्होंने अपनी पूरी उम्र में कभी नहीं जाना था।
उनके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी—एक ऐसी मुस्कान जिसमें प्यार, वासना और एक गहरा अपराधबोध, तीनों घुले हुए थे।
जब दोनों की सांसें थोड़ी सामान्य हुईं, तो ममता ने धीरे से अपना सिर ऋषभ के चौड़े सीने पर रखा।
उन्होंने महसूस किया कि ऋषभ का दिल अब भी तेजी से धड़क रहा था। ममता ने अपनी नजरें ऊपर उठाईं और ऋषभ की आँखों में देखा,
जिनमें अब भी एक गहरी भूख और अधिकार था।
ममता ने बहुत ही धीमी और सहमी हुई आवाज में पूछा, "बेटा... अब... अब क्या? खाना लगाऊँ या फिर शाम को खाओगे? अगर अभी भूख नहीं है, तो थोड़ा नाश्ता कर लो?"
ऋषभ ने एक गहरी सांस ली और ममता को और कसकर अपनी ओर खींच लिया। उसने उनके माथे को
चूमा और शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा, "माँ, इस कदर मेहनत करने के बाद मुझे तो बहुत ज़ोर की भूख लगी है। आप बस खाना लगा दो, मैं बस अभी आता हूँ।"
ममता के गाल शर्म से गुलाबी हो गए। 'मेहनत' शब्द सुनकर उन्हें याद आया कि उन्होंने अभी-अभी अपने बेटे के साथ क्या किया था।
वह एक पल के लिए ठिठकीं, फिर धीरे से उठीं। उनके शरीर में अभी भी एक हल्का सा कंपन था। उन्होंने बिस्तर पर बिखरी हुई अपनी काली साड़ी उठाई और उसे अपने शरीर पर लपेटना शुरू किया।
साड़ी पहनते समय उनकी नजरें बार-बार ऋषभ पर जा रही थीं, जो अभी भी बिस्तर पर लेटा हुआ उन्हें कामुक नज़रों से देख रहा था।
ममता ने अपनी साड़ी ठीक की, अपने बिखरे हुए बालों को संवारा और एक गहरी सांस लेकर किचन की ओर चल दीं।
उनके चलने के अंदाज़ में अब एक अलग ही आत्मविश्वास और स्त्रीत्व था, जो ऋषभ की दी हुई संतुष्टि से आया था।
किचन में पहुँचकर ममता ने जल्दी-जल्दी काम करना शुरू किया। उन्होंने दाल, चावल, सब्जी और गरमा-गरम रोटियाँ परोसीं।
जबकि वह खाना टेबल पर लगा रही थीं, उनके दिमाग में अभी भी वही दृश्य घूम रहे थे—ऋषभ का वह सख्त लंड, उसकी जीभ का स्पर्श और वह हिंसक धक्के।
वह खुद को रोक नहीं पा रही थीं; उनके हाथ कांप रहे थे और उनके मन में फिर से वही प्यास जाग रही थी।
"ऋषभ! बेटा, खाना लग गया है, आ जाओ!" ममता ने आवाज़ दी।
ऋषभ ने उनकी आवाज़ सुनी और बिस्तर से उठा। उसने कोई कपड़ा नहीं पहना, बस अपना अंडरवियर पहना हुआ था।
उसका गठीला और मस्कुलर शरीर, जिस पर पसीने की कुछ बूंदें अब भी चमक रही थीं, किसी यूनानी देवता जैसा लग रहा था।
वह बिना किसी झिझक के, केवल अंडरवियर में ही डाइनिंग टेबल पर आ गया।
ममता ने जब उसे इस हालत में देखा, तो उनकी सांसें एक बार फिर थम गईं। उनके बेटे का वह नग्न शरीर, उसकी चौड़ी छाती और सख्त मांसपेशियां उन्हें फिर से उत्तेजित कर रही थीं।
वह अपनी नजरें चुराने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उनकी आँखें बार-बार ऋषभ के अंडरवियर की ओर जा रही थीं,
जहाँ उसका उभार अब भी हल्का सा महसूस हो रहा था।
ऋषभ आराम से कुर्सी पर बैठ गया और खाने की खुशबू लेकर गहरी सांस ली।
उसने ममता की ओर देखा, जो पास ही खड़ी थीं और उनके चेहरे पर वही पुरानी शर्मीली मुस्कान थी।
खाना शुरू करने से पहले, ऋषभ ने एक गंभीर विषय छेड़ा। उसने पूछा, "माँ, पापा से बात हुई थी क्या आपकी?"
ममता ने सिर हिलाया और धीमी आवाज़ में कहा, "हाँ बेटा, बात हुई थी। सब ठीक है। बस... वह बता रहे थे कि रीना बुआ अपनी पूरी फैमिली के साथ आ रही हैं।
उनके बच्चों का वेकेशन चल रहा है, तो उन्होंने सोचा कि इस बार यहाँ आकर समय बिताया जाए।"
यह सुनते ही ऋषभ के चेहरे की चमक गायब हो गई। उसके हाथ में रोटी का टुकड़ा रुक गया। उसने अपनी माँ की ओर देखा, जिसकी आँखों में भी एक उदासी और चिंता छा गई थी।
ऋषभ ने अपनी परेशानी जाहिर करते हुए कहा, "वह तो ठीक है माँ, लेकिन अब मेरा एक दिन भी काटना मुश्किल है आपके बिना।
और अब जब घर पर पापा, रीना बुआ और उनके बच्चे रहेंगे, तो हम कैसे मिलेंगे? हम कैसे एक-दूसरे के करीब आ पाएंगे?
मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ। मैं इस तड़प के साथ कैसे रहूँगा?"
ऋषभ की आवाज़ में एक गहरी बेबसी थी। वह जानता था कि रीना बुआ की मौजूदगी में उनके लिए चोरी-छिपे मिलना लगभग नामुमकिन होगा।
घर में हर वक्त लोगों की भीड़ रहेगी, बच्चों का शोर होगा और पापा की सख्त नजरें होंगी। वह अपनी माँ के शरीर का आदी हो चुका था, और अब इस लत को छोड़ना उसके लिए किसी सजा से कम नहीं था।
ममता ने ऋषभ के पास आकर उसके कंधे पर अपना हाथ रखा। उनकी आँखों में भी आंसू थे और चेहरे पर गहरी मायूसी।
उन्होंने ऋषभ की आँखों में देखते हुए कहा, "मैं भी यही सोच रही हूँ बेटा... अब हम क्या करेंगे? मैं भी तुम्हारे बिना कैसे रहूँगी? मेरा शरीर तो अब सिर्फ तुम्हारी छुअन पहचानता है।"
ममता की आवाज़ में एक ऐसी तड़प थी जो ऋषभ के दिल को चीर गई। वह दोनों जानते थे कि उन्होंने एक ऐसी आग को जलाया है जिसे अब बुझाना नामुमकिन है।
अब जब परिवार के अन्य सदस्य आने वाले थे, तो उनकी यह वर्जित दुनिया खतरे में थी।
ऋषभ ने ममता का हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा और उसे अपनी गोद में बिठा लिया, भले ही वह डाइनिंग टेबल पर थे।
उसने उनके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "मैं आपको किसी और के हवाले नहीं कर सकता, चाहे घर में कोई भी क्यों न हो। हमें कोई न कोई रास्ता निकालना ही होगा, माँ।"
ममता ने अपनी आँखें बंद कर लीं और ऋषभ के सीने से लग गईं। उन्हें डर था कि कहीं कोई देख न ले, लेकिन इस डर ने उनकी उत्तेजना को और बढ़ा दिया।
वह सोच रही थीं कि क्या वह फिर से वही जोखिम उठा पाएंगी? क्या वह रीना बुआ और बच्चों के सामने अपनी इस गुप्त वासना को छिपा पाएंगी?
किचन की खामोशी में अब सिर्फ उनकी धड़कनें सुनाई दे रही थीं। बाहर की दुनिया के लिए वह एक आदर्श माँ और बेटा थे,
लेकिन इस टेबल के नीचे, एक ऐसी भूख पल रही थी जो किसी भी सामाजिक मर्यादा को तोड़ने का दम रखती थी।
ऋषभ ने धीरे से ममता की साड़ी के पल्लू को सरकाया और उनके कंधे पर एक छोटा सा किस किया।
"हम मिलेंगे माँ... चाहे कहीं भी, चाहे किसी भी तरह। मैं आपको तड़पने नहीं दूँगा और न ही खुद तड़पूँगा।"
ममता ने एक लंबी आह भरी। वह जानती थीं कि यह रास्ता काँटों भरा है, लेकिन ऋषभ के प्यार और उसकी वासना ने उन्हें इतना अंधा कर दिया था
कि अब उन्हें किसी और चीज़ की परवाह नहीं थी। उन्होंने बस इतना कहा, "जो भी हो बेटा, बस तुम मेरा साथ मत छोड़ना।"
दोनों वहीं एक-दूसरे में खो गए, यह जानते हुए कि आने वाले दिन उनके लिए और भी अधिक चुनौतीपूर्ण और रोमांचक होने वाले हैं।
अब उनकी यह लुका-छिपी का खेल और भी गहरा होने वाला था, जहाँ खतरा ज्यादा था, लेकिन सुख की तीव्रता भी उतनी ही अधिक होने वाली थी।
Nice updateचरम सुख की उन लहरों के बाद कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया था, जिसमें सिर्फ ऋषभ और ममता की तेज चलती सांसों की आवाजें गूँज रही थीं।
दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए थे, जैसे दुनिया की सारी वर्जनाएं और सामाजिक बंधन उस कमरे की दहलीज के बाहर ही छूट गए हों।
पसीने से तरबतर उनके शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए थे, और बिस्तर की चादरें पूरी तरह से बिखर चुकी थीं।
ममता की आँखों में अब भी वह मदहोशी थी, लेकिन धीरे-धीरे वास्तविकता उनके सामने लौटने लगी।
उन्होंने महसूस किया कि उनके शरीर का हर हिस्सा अब भी कांप रहा था और उनके अंदर ऋषभ का गर्म वीर्य धीरे-धीरे रिस रहा था।
वह एक ऐसी तृप्ति महसूस कर रही थीं, जिसे उन्होंने अपनी पूरी उम्र में कभी नहीं जाना था।
उनके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी—एक ऐसी मुस्कान जिसमें प्यार, वासना और एक गहरा अपराधबोध, तीनों घुले हुए थे।
जब दोनों की सांसें थोड़ी सामान्य हुईं, तो ममता ने धीरे से अपना सिर ऋषभ के चौड़े सीने पर रखा।
उन्होंने महसूस किया कि ऋषभ का दिल अब भी तेजी से धड़क रहा था। ममता ने अपनी नजरें ऊपर उठाईं और ऋषभ की आँखों में देखा,
जिनमें अब भी एक गहरी भूख और अधिकार था।
ममता ने बहुत ही धीमी और सहमी हुई आवाज में पूछा, "बेटा... अब... अब क्या? खाना लगाऊँ या फिर शाम को खाओगे? अगर अभी भूख नहीं है, तो थोड़ा नाश्ता कर लो?"
ऋषभ ने एक गहरी सांस ली और ममता को और कसकर अपनी ओर खींच लिया। उसने उनके माथे को
चूमा और शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा, "माँ, इस कदर मेहनत करने के बाद मुझे तो बहुत ज़ोर की भूख लगी है। आप बस खाना लगा दो, मैं बस अभी आता हूँ।"
ममता के गाल शर्म से गुलाबी हो गए। 'मेहनत' शब्द सुनकर उन्हें याद आया कि उन्होंने अभी-अभी अपने बेटे के साथ क्या किया था।
वह एक पल के लिए ठिठकीं, फिर धीरे से उठीं। उनके शरीर में अभी भी एक हल्का सा कंपन था। उन्होंने बिस्तर पर बिखरी हुई अपनी काली साड़ी उठाई और उसे अपने शरीर पर लपेटना शुरू किया।
साड़ी पहनते समय उनकी नजरें बार-बार ऋषभ पर जा रही थीं, जो अभी भी बिस्तर पर लेटा हुआ उन्हें कामुक नज़रों से देख रहा था।
ममता ने अपनी साड़ी ठीक की, अपने बिखरे हुए बालों को संवारा और एक गहरी सांस लेकर किचन की ओर चल दीं।
उनके चलने के अंदाज़ में अब एक अलग ही आत्मविश्वास और स्त्रीत्व था, जो ऋषभ की दी हुई संतुष्टि से आया था।
किचन में पहुँचकर ममता ने जल्दी-जल्दी काम करना शुरू किया। उन्होंने दाल, चावल, सब्जी और गरमा-गरम रोटियाँ परोसीं।
जबकि वह खाना टेबल पर लगा रही थीं, उनके दिमाग में अभी भी वही दृश्य घूम रहे थे—ऋषभ का वह सख्त लंड, उसकी जीभ का स्पर्श और वह हिंसक धक्के।
वह खुद को रोक नहीं पा रही थीं; उनके हाथ कांप रहे थे और उनके मन में फिर से वही प्यास जाग रही थी।
"ऋषभ! बेटा, खाना लग गया है, आ जाओ!" ममता ने आवाज़ दी।
ऋषभ ने उनकी आवाज़ सुनी और बिस्तर से उठा। उसने कोई कपड़ा नहीं पहना, बस अपना अंडरवियर पहना हुआ था।
उसका गठीला और मस्कुलर शरीर, जिस पर पसीने की कुछ बूंदें अब भी चमक रही थीं, किसी यूनानी देवता जैसा लग रहा था।
वह बिना किसी झिझक के, केवल अंडरवियर में ही डाइनिंग टेबल पर आ गया।
ममता ने जब उसे इस हालत में देखा, तो उनकी सांसें एक बार फिर थम गईं। उनके बेटे का वह नग्न शरीर, उसकी चौड़ी छाती और सख्त मांसपेशियां उन्हें फिर से उत्तेजित कर रही थीं।
वह अपनी नजरें चुराने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उनकी आँखें बार-बार ऋषभ के अंडरवियर की ओर जा रही थीं,
जहाँ उसका उभार अब भी हल्का सा महसूस हो रहा था।
ऋषभ आराम से कुर्सी पर बैठ गया और खाने की खुशबू लेकर गहरी सांस ली।
उसने ममता की ओर देखा, जो पास ही खड़ी थीं और उनके चेहरे पर वही पुरानी शर्मीली मुस्कान थी।
खाना शुरू करने से पहले, ऋषभ ने एक गंभीर विषय छेड़ा। उसने पूछा, "माँ, पापा से बात हुई थी क्या आपकी?"
ममता ने सिर हिलाया और धीमी आवाज़ में कहा, "हाँ बेटा, बात हुई थी। सब ठीक है। बस... वह बता रहे थे कि रीना बुआ अपनी पूरी फैमिली के साथ आ रही हैं।
उनके बच्चों का वेकेशन चल रहा है, तो उन्होंने सोचा कि इस बार यहाँ आकर समय बिताया जाए।"
यह सुनते ही ऋषभ के चेहरे की चमक गायब हो गई। उसके हाथ में रोटी का टुकड़ा रुक गया। उसने अपनी माँ की ओर देखा, जिसकी आँखों में भी एक उदासी और चिंता छा गई थी।
ऋषभ ने अपनी परेशानी जाहिर करते हुए कहा, "वह तो ठीक है माँ, लेकिन अब मेरा एक दिन भी काटना मुश्किल है आपके बिना।
और अब जब घर पर पापा, रीना बुआ और उनके बच्चे रहेंगे, तो हम कैसे मिलेंगे? हम कैसे एक-दूसरे के करीब आ पाएंगे?
मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ। मैं इस तड़प के साथ कैसे रहूँगा?"
ऋषभ की आवाज़ में एक गहरी बेबसी थी। वह जानता था कि रीना बुआ की मौजूदगी में उनके लिए चोरी-छिपे मिलना लगभग नामुमकिन होगा।
घर में हर वक्त लोगों की भीड़ रहेगी, बच्चों का शोर होगा और पापा की सख्त नजरें होंगी। वह अपनी माँ के शरीर का आदी हो चुका था, और अब इस लत को छोड़ना उसके लिए किसी सजा से कम नहीं था।
ममता ने ऋषभ के पास आकर उसके कंधे पर अपना हाथ रखा। उनकी आँखों में भी आंसू थे और चेहरे पर गहरी मायूसी।
उन्होंने ऋषभ की आँखों में देखते हुए कहा, "मैं भी यही सोच रही हूँ बेटा... अब हम क्या करेंगे? मैं भी तुम्हारे बिना कैसे रहूँगी? मेरा शरीर तो अब सिर्फ तुम्हारी छुअन पहचानता है।"
ममता की आवाज़ में एक ऐसी तड़प थी जो ऋषभ के दिल को चीर गई। वह दोनों जानते थे कि उन्होंने एक ऐसी आग को जलाया है जिसे अब बुझाना नामुमकिन है।
अब जब परिवार के अन्य सदस्य आने वाले थे, तो उनकी यह वर्जित दुनिया खतरे में थी।
ऋषभ ने ममता का हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा और उसे अपनी गोद में बिठा लिया, भले ही वह डाइनिंग टेबल पर थे।
उसने उनके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "मैं आपको किसी और के हवाले नहीं कर सकता, चाहे घर में कोई भी क्यों न हो। हमें कोई न कोई रास्ता निकालना ही होगा, माँ।"
ममता ने अपनी आँखें बंद कर लीं और ऋषभ के सीने से लग गईं। उन्हें डर था कि कहीं कोई देख न ले, लेकिन इस डर ने उनकी उत्तेजना को और बढ़ा दिया।
वह सोच रही थीं कि क्या वह फिर से वही जोखिम उठा पाएंगी? क्या वह रीना बुआ और बच्चों के सामने अपनी इस गुप्त वासना को छिपा पाएंगी?
किचन की खामोशी में अब सिर्फ उनकी धड़कनें सुनाई दे रही थीं। बाहर की दुनिया के लिए वह एक आदर्श माँ और बेटा थे,
लेकिन इस टेबल के नीचे, एक ऐसी भूख पल रही थी जो किसी भी सामाजिक मर्यादा को तोड़ने का दम रखती थी।
ऋषभ ने धीरे से ममता की साड़ी के पल्लू को सरकाया और उनके कंधे पर एक छोटा सा किस किया।
"हम मिलेंगे माँ... चाहे कहीं भी, चाहे किसी भी तरह। मैं आपको तड़पने नहीं दूँगा और न ही खुद तड़पूँगा।"
ममता ने एक लंबी आह भरी। वह जानती थीं कि यह रास्ता काँटों भरा है, लेकिन ऋषभ के प्यार और उसकी वासना ने उन्हें इतना अंधा कर दिया था
कि अब उन्हें किसी और चीज़ की परवाह नहीं थी। उन्होंने बस इतना कहा, "जो भी हो बेटा, बस तुम मेरा साथ मत छोड़ना।"
दोनों वहीं एक-दूसरे में खो गए, यह जानते हुए कि आने वाले दिन उनके लिए और भी अधिक चुनौतीपूर्ण और रोमांचक होने वाले हैं।
अब उनकी यह लुका-छिपी का खेल और भी गहरा होने वाला था, जहाँ खतरा ज्यादा था, लेकिन सुख की तीव्रता भी उतनी ही अधिक होने वाली थी।