sandy4hotgirls
Active Member
- 1,001
- 1,106
- 143
Wah kya baat hai...maasi bhi bhanje ko maa se milan ke liye raasta banaa rahi hai...abb agar maasi apne haathon se bete ka milan maa se karaa dey toh soney pe suhaaga ho jaaye..plz update soon.Update 15
जब मैं अपने बेडरूम की तन्हाई में जाकर, आईने के सामने खड़ी हुई, तो मेरी सांसें अब भी बेकाबू थीं। ब्लाउज के टूटे हुए बटनों के पीछे छिपे मेरे स्तनों का उभार अब भी गोलू की उस गरम छुअन से सुलग रहा था। मैंने झटपट अलमारी से दूसरा ब्लाउज निकाला, अपनी कांपती उँगलियों से उसके बटनों को बंद किया और साड़ी के पल्लू को सलीके से लपेटकर खुद को पूरी तरह शांत करने की कोशिश करते हुए लिविंग रूम में आई।
बाहर कयामत की बारिश अब एक भयानक तूफान में बदल चुकी थी। खिड़कियों के कांच थरथरा रहे थे और अंदर हॉल का माहौल उस ठंडी रंगत में एकदम सिमटा हुआ था। मेरे पति दफ्तर से लौट चुके थे और सोफे पर आराम से बैठे थे। कुसुम दीदी ने रसोई से कड़क अदरक और इलाइची वाली चाय बनाकर सबको परोस दी थी, जिसकी सोंधी खुशबू पूरे कमरे में फैली हुई थी।
जैसे ही मैं हॉल में दाखिल हुई, मेरे पति की नज़रें मुझ पर पड़ीं। उन्होंने थोड़ा घूरते हुए, हल्के शिकायती लहजे में कहा, "कहाँ रह गई थी तुम रिधिमा? खुद कमरे में आराम कर रही हो और कुसुम दीदी को आते ही रसोई के काम पर लगा दिया...?"
उनकी यह बात सुनकर सोफे पर आराम से बैठे मेरे जीजू तुरंत हंस पड़े। उन्होंने मटकती हुई कुसुम दीदी की तरफ देखा और फिर मुझसे अपनी नज़रें मिलाकर बेहद रसीले अंदाज़ में बोले, "अरे साढ़ू भाई, आप हमारी इस प्यारी साली साहिबा को खामखां डांट रहे हैं। इनकी तो बात ही निराली है! और वैसे भी, कुसुम को तो दूसरों की रसोई पर कब्ज़ा करने की पुरानी आदत है।" जीजू की इस दो-अर्थी और हल्के मज़ाकिया लहजे पर हॉल में एक ज़बर्दस्त ठहाका गूंज उठा।
मैं झेंपकर एक तरफ बैठ गई। सोफे के कोने में बैठा मेरा जवान बेटा गोलू हाथ में चाय का कप थामे मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। लेकिन जैसे ही उसकी मतवाली आँखें मेरी नज़रों से टकराईं, मेरे बदन में करंट दौड़ गया। उसकी गहरी नज़रों में सुबह की वो पैंटी वाली चोरी और अभी कुछ देर पहले सोफे पर मेरे स्तनों पर अपना मुँह रगड़ने की आदिम कामुक भूख साफ गवाही दे रही थी।
चाय की चुस्कियों और इस पारिवारिक हंसी-मज़ाक के बाद, रात के घने अंधेरे के साथ खाने का वक्त होने लगा। बाहर की कयामत जैसी बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी, इसलिए दीदी और जीजू का आज रात हमारे ही घर पर रुकना तय हो चुका था। तीनों मर्द—यानी मेरे पति, जीजू और मेरा जवान बेटा गोलू—बाहर हॉल में सोफे पर पैर पसारकर टीवी पर मैच देखने में मग्न हो गए। मैं और कुसुम दीदी रात के शाही खाने की तैयारी के लिए दोबारा रसोई के भीतर आ गईं।
कुसुम दीदी अपनी पीली साड़ी के पल्लू को कमर में ठूँसकर, रसोई के ठीक दरवाज़े की ओट में खड़ी होकर सब्ज़ी काटने लगीं। उनकी पोजीशन ऐसी थी कि अगर बाहर से कोई भी मर्द अंदर की तरफ कदम बढ़ाता, तो वो उसे पहले ही देख लेतीं और हम दोनों सँभल जातीं। सब्ज़ी काटते-काटते दीदी की आँखों में अचानक वही सम्मोहक और शातिर औरत वाली चमक उभर आई।
वो अपनी जाँघों को थोड़ा सा मटकाकर मेरे बिल्कुल करीब आईं और बेहद धीमी, मखमली आवाज़ में फुसफुसाकर बोलीं, "देख छोटी, मैं तुम दोनों माँ-बेटे के बीच बोलने वाली कोई नहीं हूँ, और न ही मुझे इस खूबसूरत खेल से कोई ऐतराज़ है। लेकिन मेरी एक बड़ी बहन होने के नाते मेरी ये बात हमेशा के लिए गाँठ बाँध ले... जब भी आगे तुम दोनों के बीच कुछ और गहरा हो, तो तू बिना कॉन्डोम (Condom) के उसे अपने इस गोरे जिस्म को हाथ भी मत लगाने देना। बच्चा है वो अभी, जवानी के जोश में उसे इन सब बातों की समझ नहीं है। अगर तू कहीं उसके अंश से प्रेग्नेंट हो गई ना, तो इस भरे-पूरे समाज और परिवार में वो आफत आएगी कि मुँह दिखाने लायक नहीं रहेगी।" यह कहकर वो एक बेहद कातिलाना, रसभरी मुस्कान के साथ मेरी योनि की तरफ ताकने लगीं।
![]()
दीदी की यह बेहद बेबाक और नंगी बात सुनते ही मेरे पूरे वजूद में एक भयंकर, बर्फीली सिहरन दौड़ गई। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़का कि लगा अभी हलक से बाहर आ जाएगा। दीदी को तो केवल आज सोफे वाली कशमकश का अंदाज़ा था, उन्हें उस अंधेरी होटल वाली रात की दहकती हकीकत का कोई इल्म नहीं था! उस रात, जब मूसलाधार बारिश के बीच, गोलू का वह विशाल, सात इंच लंबा, काला और तपा हुआ मोटा लिंग बिना किसी प्रोटेक्शन के मेरी योनि के मखमली दलदल के भीतर पूरा अंदर तक समाया हुआ था... अगर उस वक्त कुछ ऐसा-वैसा हो गया होता और उसके वीर्य की गर्म बूंदें मेरे भीतर छूट गई होती ? और मैं सचमुच अपने ही सगे जवान बेटे के बच्चे की माँ बनने वाली होती, तो क्या होता? यह भयानक और साथ ही असीम कामुक ख्याल ही पल भर में मुझे अंदर ही अंदर मार रहा था और मेरे पेटीकोट के भीतर एक अजीब सी कँपकँपी और नमी पैदा कर रहा था।
मैंने अपनी उस भयंकर घबराहट और बदन की कुलबुलाहट को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए बहुत ही दबी आवाज़ में कहा, "दीदी! प्लीज़ थोड़ा धीरे बोलो... आप जैसा सोच रही हो वैसा कुछ भी नहीं हुआ है हमारे बीच। कुछ भी मत बोलो, बाहर जीजू या उसके पापा सुन लेंगे तो अनर्थ हो जाएगा।"
"अच्छा! बड़ी आई सती सावित्री की औलाद..." दीदी ने रस लेते हुए अपनी पीली साड़ी के पल्लू को उँगलियों से घुमाया, "अभी कुछ देर पहले हॉल में सोफे पर लेटी-लेटी अपने ही सगे बेटे से ब्लाउज के बटन तुड़वा रही थी, उसकी ज़बान अपने जिस्म पर महसूस कर रही थी, तब डर नहीं लग रहा था? और अब कोई सुन लेगा? वाह मेरी माँ! तू भी कमाल की औरत है।"
दीदी की इस सीधी चुटकी पर मेरे गाल लाज के मारे सुर्ख लाल हो गए। मैंने अपनी आँखें झुकाकर, सब्ज़ी के बर्तनों से उंगलियाँ उलझाते हुए धीरे से सच कबूल किया, "दीदी... हाँ, वो बटन तो उसने ही तोड़े थे... लेकिन कसम से आगे और कुछ नहीं हुआ है। आप तो जानती हो ना कि हमारा गोलू बचपन से ही कितना ज़िद्दी है। और... और तब वो मेरे इन मोटे स्तनों को पूरा मुँह में भरकर चूसने के लिए मचल रहा था। मैंने उसे अपनी ममता की कसम दी, बहुत मना किया, लेकिन आपको तो पता ही है ना कि गोलू अपनी मर्दाना ज़िद के आगे अपनी इस माँ की एक नहीं सुनता।"
दीदी ने एक गहरी, मखमली सांस ली, जिससे उनका अपना भारी वशस्थल पीली साड़ी के पार से मचल उठा। वो दूर देखते हुए बेहद कामुक लहजे में बोलीं, "हैं! मुझे कैसे नहीं पता होगा? बचपन में रात-रात भर जागकर मैंने तेरे इस इकलौते बेटे को अपने इन गोरे सीनों से लगा-लगाकर अपना गाढ़ा, मीठा दूध पिलाया है। गोलू जब भूखा होकर रोता था, तो मेरे दोनों स्तनों के निप्पल्स को अपने छोटे से मुँह में भरकर पूरी तरह खाली कर देता था। और मेरा दूध आता भी कितना मलाईदार और ज़्यादा था, तुझे तो याद ही होगा ना छोटी...?"
दीदी की इस बात ने मेरे भीतर की ममता और एक प्यासी औरत की कामुकता दोनों को एक साथ भड़का दिया। मैंने अपनी आवाज़ को बिल्कुल फुसफुसाहट में बदलते हुए कहा, "दीदी... वो अब भी मुझसे यही बोलता है कि उसे मेरी छाती से मेरा दूध पीना है। अब आप ही बताओ, मैं उस जवान होते लड़के को क्या समझाऊँ? मैंने उसे कितना डांटा है, लेकिन वो कुछ दिनों के बाद फिर से मेरे पास आकर यही बात दोहराने लगता है..."
![]()
यह सुनते ही कुसुम दीदी ने अपनी सब्ज़ी काटना पूरी तरह रोक दिया। वो एक कदम और आगे बढ़ीं, जिससे उनके भारी स्तनों का दबाव सीधे मेरी पीठ और कंधों पर महसूस होने लगा। उन्होंने मेरे कंधे पर अपनी गर्म हथेली रखी और मेरे कान के बिल्कुल पास अपने होंठ लाकर, बेहद कामुक और सम्मोहन भरी आवाज़ में फुसफुसाकर बोलीं:
"तो पिला दे उसे! बेटा ही तो है तेरा, कोई बाहर का राक्षस थोड़ी ना है छोटी... उसका तो पूरा जन्मसिद्ध हक़ बनता है तेरे इस गोरे बदन पर। चल, तुझे याद है उस रात शादी वाले दिन, जब में तेरे साथ सोने आई थी तब आधी रात को नींद में उसने मेरे इन दोनों स्तनों को अपने मजबूत हाथों से बहुत बुरी तरह मसला और भींचा था। जब वो वासना में बेकाबू होने लगा, तो मैंने खुद अपने ये कड़े निप्पल्स उसके मुँह के भीतर दे दिए थे और उसने उन्हें बच्चे की तरह चूसा। वो भले ही नींद में था.. लेकिन मुझे आज भी पक्का यकीन है कि वो उस रात मेरे जिस्म पर लेटा हुआ भी, नींद में अपनी इस गोरी, रसीली और खूबसूरत माँ के बारे में ही कोई गहरा कामुक सपना देख रहा होगा...!"
कुसुम दीदी के मुँह से शादी वाली रात का वो भयंकर और रसीला सच सुनकर मेरा दिमाग पूरी तरह सुन्न हो गया था। रसोई की गर्म हवा में जैसे एक अजीब सा नशा घुल गया था। दीदी की इस बात ने मेरी योनि के भीतर की नमी को और बढ़ा दिया था। मैंने अपनी उंगलियों से साड़ी के पल्लू को थोड़ा और कसा, कुछ देर दीदी की उस बात को अपने दिमाग में घुमाया और फिर अपने दिल की बढ़ती धड़कनों को रोकते हुए बहुत ही धीमी आवाज़ में पूछा:
"दीदी... एक बात पूछूँ? आपके दोनों बेटे, सोनू और...मोनू... क्या वो दोनों भी आपके साथ ऐसा ही कुछ करते हैं? क्या वो भी आपके इस गोरे बदन के इतने करीब हैं?"
मेरी यह बेबाक बात सुनते ही कुसुम दीदी के चेहरे पर एक गहरी और शातिर मुस्कान आ गई। उन्होंने अपनी पीली साड़ी के पल्लू को थोड़ा और मटकाया, अपनी आँखों को मतवाले अंदाज़ में सिकोड़ा और दबी आवाज़ में हंसते हुए बोलीं, "वाह री छोटी! बड़ी चालाक है तू... मैं तुझे क्यों बताऊँ कि मेरे बेटे मेरे कितने करीब हैं और हमारे बीच क्या बातें होती हैं? यह हमारे बीच का राज़ है।"
![]()
दीदी ने अपनी सब्ज़ी काटने वाला चाकू साइड में रखा और वो मेरे और करीब आ गईं। उनकी आँखों की चमक अब एक अनुभवी औरत जैसी गंभीर हो चुकी थी। वो सीधे मेरी आँखों में झांकते हुए बोलीं, "देख छोटी, एक बात तू आज बहुत अच्छे से समझ ले। इस दुनिया में माँ और बेटे का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता है कि हर घर की चारदीवारी के भीतर इसके मायने बदल जाते हैं। यहाँ इस घर में तू अपने जवान बेटे गोलू को खुद को छूने देती है, उसका हक़ मानती है। लेकिन इसी दुनिया में कुछ ऐसी माँएँ भी होंगी, जो अपने बेटों को खुद से कोसों दूर रखती हैं। वो उन्हें अपने जिस्म को छूने तक नहीं देतीं, और गले लगाना या चूमना तो दूर की बात है, वो लड़के सपने में भी ऐसा नहीं सोच सकते।"
दीदी ने एक गहरी सांस ली और अपनी पीली साड़ी के पार से मचलते अपने भारी वशस्थल पर हाथ रखते हुए आगे समझाया, "लेकिन इसके ठीक उलट, इस दुनिया में कुछ ऐसे माँ-बेटे भी हैं जो एक-दूसरे के इस कदर करीब आ चुके हैं कि उन्हें आपस में बच्चे तक पैदा करने हैं! इसलिए तू दूसरों के बारे में मत सोच, और न ही बाहर की दुनिया को देखकर कोई फैसला कर। यह जो कुछ भी हो रहा है, यह सिर्फ और सिर्फ तेरा अपना फैसला होना चाहिए। अगर तुझे अपने जवान बेटे का वो तीखा मर्दाना छुआ जाना अच्छा लगता है, तेरे बदन को उससे सुख मिलता है, तो कोई दूसरा बाहर वाला क्या सोचता है—यह सोचकर तू अपनी इस छिपी हुई खुशी का गला मत घोंट!"
दीदी ने मेरे कंधे को धीरे से सहलाया, उनकी उंगलियों की छुअन मेरे ब्लाउज के पार तक महसूस हो रही थी। वो सीधे मेरी रूह को झकझोरते हुए फुसफुसाकर बोलीं, "याद रख छोटी... कोई बाहर वाला गैर मर्द कभी तेरे इस सूने आंगन में तुझे प्यार देने नहीं आएगा। तुझे जो भी सुख, प्यार और तृप्ति मिलेगी, वो या तो तेरा पति देगा या फिर तेरा यह जवान बेटा देगा। इसलिए तू सिर्फ उनके बारे में सोच और उन्हीं के साथ अपने सुख की तलाश कर। और इस अनोखे माँ-बेटे के रिश्ते की गहराई कितनी है, इसका राज़ सिर्फ और सिर्फ उन दोनों को ही पता होना चाहिए, किसी तीसरे को भनक तक नहीं लगनी चाहिए... समझी मेरी भोली छोटी बहन?"
![]()
दीदी की इस सरल लेकिन बेहद गहरी बात ने मेरे दिमाग के सारे जाले साफ कर दिए थे। लोक-लाज का जो आखिरी डर मेरे मन में सुलग रहा था, वह दीदी की इस ढाल के पीछे पूरी तरह छिप चुका था। मैं अपनी आँखें झुकाए बस गहरी सांसें ले रही थी, जबकि पेटीकोट के भीतर मेरा पूरा बदन गोलू की उस अधूरी छुअन को दोबारा महसूस करने के लिए अंदर ही अंदर मचल उठा था।