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Incest बेटे की ख्वाहिश

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sandy4hotgirls

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Update 15

जब मैं अपने बेडरूम की तन्हाई में जाकर, आईने के सामने खड़ी हुई, तो मेरी सांसें अब भी बेकाबू थीं। ब्लाउज के टूटे हुए बटनों के पीछे छिपे मेरे स्तनों का उभार अब भी गोलू की उस गरम छुअन से सुलग रहा था। मैंने झटपट अलमारी से दूसरा ब्लाउज निकाला, अपनी कांपती उँगलियों से उसके बटनों को बंद किया और साड़ी के पल्लू को सलीके से लपेटकर खुद को पूरी तरह शांत करने की कोशिश करते हुए लिविंग रूम में आई।

बाहर कयामत की बारिश अब एक भयानक तूफान में बदल चुकी थी। खिड़कियों के कांच थरथरा रहे थे और अंदर हॉल का माहौल उस ठंडी रंगत में एकदम सिमटा हुआ था। मेरे पति दफ्तर से लौट चुके थे और सोफे पर आराम से बैठे थे। कुसुम दीदी ने रसोई से कड़क अदरक और इलाइची वाली चाय बनाकर सबको परोस दी थी, जिसकी सोंधी खुशबू पूरे कमरे में फैली हुई थी।

जैसे ही मैं हॉल में दाखिल हुई, मेरे पति की नज़रें मुझ पर पड़ीं। उन्होंने थोड़ा घूरते हुए, हल्के शिकायती लहजे में कहा, "कहाँ रह गई थी तुम रिधिमा? खुद कमरे में आराम कर रही हो और कुसुम दीदी को आते ही रसोई के काम पर लगा दिया...?"

उनकी यह बात सुनकर सोफे पर आराम से बैठे मेरे जीजू तुरंत हंस पड़े। उन्होंने मटकती हुई कुसुम दीदी की तरफ देखा और फिर मुझसे अपनी नज़रें मिलाकर बेहद रसीले अंदाज़ में बोले, "अरे साढ़ू भाई, आप हमारी इस प्यारी साली साहिबा को खामखां डांट रहे हैं। इनकी तो बात ही निराली है! और वैसे भी, कुसुम को तो दूसरों की रसोई पर कब्ज़ा करने की पुरानी आदत है।" जीजू की इस दो-अर्थी और हल्के मज़ाकिया लहजे पर हॉल में एक ज़बर्दस्त ठहाका गूंज उठा।

मैं झेंपकर एक तरफ बैठ गई। सोफे के कोने में बैठा मेरा जवान बेटा गोलू हाथ में चाय का कप थामे मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। लेकिन जैसे ही उसकी मतवाली आँखें मेरी नज़रों से टकराईं, मेरे बदन में करंट दौड़ गया। उसकी गहरी नज़रों में सुबह की वो पैंटी वाली चोरी और अभी कुछ देर पहले सोफे पर मेरे स्तनों पर अपना मुँह रगड़ने की आदिम कामुक भूख साफ गवाही दे रही थी।

चाय की चुस्कियों और इस पारिवारिक हंसी-मज़ाक के बाद, रात के घने अंधेरे के साथ खाने का वक्त होने लगा। बाहर की कयामत जैसी बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी, इसलिए दीदी और जीजू का आज रात हमारे ही घर पर रुकना तय हो चुका था। तीनों मर्द—यानी मेरे पति, जीजू और मेरा जवान बेटा गोलू—बाहर हॉल में सोफे पर पैर पसारकर टीवी पर मैच देखने में मग्न हो गए। मैं और कुसुम दीदी रात के शाही खाने की तैयारी के लिए दोबारा रसोई के भीतर आ गईं।

कुसुम दीदी अपनी पीली साड़ी के पल्लू को कमर में ठूँसकर, रसोई के ठीक दरवाज़े की ओट में खड़ी होकर सब्ज़ी काटने लगीं। उनकी पोजीशन ऐसी थी कि अगर बाहर से कोई भी मर्द अंदर की तरफ कदम बढ़ाता, तो वो उसे पहले ही देख लेतीं और हम दोनों सँभल जातीं। सब्ज़ी काटते-काटते दीदी की आँखों में अचानक वही सम्मोहक और शातिर औरत वाली चमक उभर आई।

वो अपनी जाँघों को थोड़ा सा मटकाकर मेरे बिल्कुल करीब आईं और बेहद धीमी, मखमली आवाज़ में फुसफुसाकर बोलीं, "देख छोटी, मैं तुम दोनों माँ-बेटे के बीच बोलने वाली कोई नहीं हूँ, और न ही मुझे इस खूबसूरत खेल से कोई ऐतराज़ है। लेकिन मेरी एक बड़ी बहन होने के नाते मेरी ये बात हमेशा के लिए गाँठ बाँध ले... जब भी आगे तुम दोनों के बीच कुछ और गहरा हो, तो तू बिना कॉन्डोम (Condom) के उसे अपने इस गोरे जिस्म को हाथ भी मत लगाने देना। बच्चा है वो अभी, जवानी के जोश में उसे इन सब बातों की समझ नहीं है। अगर तू कहीं उसके अंश से प्रेग्नेंट हो गई ना, तो इस भरे-पूरे समाज और परिवार में वो आफत आएगी कि मुँह दिखाने लायक नहीं रहेगी।" यह कहकर वो एक बेहद कातिलाना, रसभरी मुस्कान के साथ मेरी योनि की तरफ ताकने लगीं।
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दीदी की यह बेहद बेबाक और नंगी बात सुनते ही मेरे पूरे वजूद में एक भयंकर, बर्फीली सिहरन दौड़ गई। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़का कि लगा अभी हलक से बाहर आ जाएगा। दीदी को तो केवल आज सोफे वाली कशमकश का अंदाज़ा था, उन्हें उस अंधेरी होटल वाली रात की दहकती हकीकत का कोई इल्म नहीं था! उस रात, जब मूसलाधार बारिश के बीच, गोलू का वह विशाल, सात इंच लंबा, काला और तपा हुआ मोटा लिंग बिना किसी प्रोटेक्शन के मेरी योनि के मखमली दलदल के भीतर पूरा अंदर तक समाया हुआ था... अगर उस वक्त कुछ ऐसा-वैसा हो गया होता और उसके वीर्य की गर्म बूंदें मेरे भीतर छूट गई होती ? और मैं सचमुच अपने ही सगे जवान बेटे के बच्चे की माँ बनने वाली होती, तो क्या होता? यह भयानक और साथ ही असीम कामुक ख्याल ही पल भर में मुझे अंदर ही अंदर मार रहा था और मेरे पेटीकोट के भीतर एक अजीब सी कँपकँपी और नमी पैदा कर रहा था।

मैंने अपनी उस भयंकर घबराहट और बदन की कुलबुलाहट को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए बहुत ही दबी आवाज़ में कहा, "दीदी! प्लीज़ थोड़ा धीरे बोलो... आप जैसा सोच रही हो वैसा कुछ भी नहीं हुआ है हमारे बीच। कुछ भी मत बोलो, बाहर जीजू या उसके पापा सुन लेंगे तो अनर्थ हो जाएगा।"

"अच्छा! बड़ी आई सती सावित्री की औलाद..." दीदी ने रस लेते हुए अपनी पीली साड़ी के पल्लू को उँगलियों से घुमाया, "अभी कुछ देर पहले हॉल में सोफे पर लेटी-लेटी अपने ही सगे बेटे से ब्लाउज के बटन तुड़वा रही थी, उसकी ज़बान अपने जिस्म पर महसूस कर रही थी, तब डर नहीं लग रहा था? और अब कोई सुन लेगा? वाह मेरी माँ! तू भी कमाल की औरत है।"

दीदी की इस सीधी चुटकी पर मेरे गाल लाज के मारे सुर्ख लाल हो गए। मैंने अपनी आँखें झुकाकर, सब्ज़ी के बर्तनों से उंगलियाँ उलझाते हुए धीरे से सच कबूल किया, "दीदी... हाँ, वो बटन तो उसने ही तोड़े थे... लेकिन कसम से आगे और कुछ नहीं हुआ है। आप तो जानती हो ना कि हमारा गोलू बचपन से ही कितना ज़िद्दी है। और... और तब वो मेरे इन मोटे स्तनों को पूरा मुँह में भरकर चूसने के लिए मचल रहा था। मैंने उसे अपनी ममता की कसम दी, बहुत मना किया, लेकिन आपको तो पता ही है ना कि गोलू अपनी मर्दाना ज़िद के आगे अपनी इस माँ की एक नहीं सुनता।"

दीदी ने एक गहरी, मखमली सांस ली, जिससे उनका अपना भारी वशस्थल पीली साड़ी के पार से मचल उठा। वो दूर देखते हुए बेहद कामुक लहजे में बोलीं, "हैं! मुझे कैसे नहीं पता होगा? बचपन में रात-रात भर जागकर मैंने तेरे इस इकलौते बेटे को अपने इन गोरे सीनों से लगा-लगाकर अपना गाढ़ा, मीठा दूध पिलाया है। गोलू जब भूखा होकर रोता था, तो मेरे दोनों स्तनों के निप्पल्स को अपने छोटे से मुँह में भरकर पूरी तरह खाली कर देता था। और मेरा दूध आता भी कितना मलाईदार और ज़्यादा था, तुझे तो याद ही होगा ना छोटी...?"

दीदी की इस बात ने मेरे भीतर की ममता और एक प्यासी औरत की कामुकता दोनों को एक साथ भड़का दिया। मैंने अपनी आवाज़ को बिल्कुल फुसफुसाहट में बदलते हुए कहा, "दीदी... वो अब भी मुझसे यही बोलता है कि उसे मेरी छाती से मेरा दूध पीना है। अब आप ही बताओ, मैं उस जवान होते लड़के को क्या समझाऊँ? मैंने उसे कितना डांटा है, लेकिन वो कुछ दिनों के बाद फिर से मेरे पास आकर यही बात दोहराने लगता है..."

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यह सुनते ही कुसुम दीदी ने अपनी सब्ज़ी काटना पूरी तरह रोक दिया। वो एक कदम और आगे बढ़ीं, जिससे उनके भारी स्तनों का दबाव सीधे मेरी पीठ और कंधों पर महसूस होने लगा। उन्होंने मेरे कंधे पर अपनी गर्म हथेली रखी और मेरे कान के बिल्कुल पास अपने होंठ लाकर, बेहद कामुक और सम्मोहन भरी आवाज़ में फुसफुसाकर बोलीं:

"तो पिला दे उसे! बेटा ही तो है तेरा, कोई बाहर का राक्षस थोड़ी ना है छोटी... उसका तो पूरा जन्मसिद्ध हक़ बनता है तेरे इस गोरे बदन पर। चल, तुझे याद है उस रात शादी वाले दिन, जब में तेरे साथ सोने आई थी तब आधी रात को नींद में उसने मेरे इन दोनों स्तनों को अपने मजबूत हाथों से बहुत बुरी तरह मसला और भींचा था। जब वो वासना में बेकाबू होने लगा, तो मैंने खुद अपने ये कड़े निप्पल्स उसके मुँह के भीतर दे दिए थे और उसने उन्हें बच्चे की तरह चूसा। वो भले ही नींद में था.. लेकिन मुझे आज भी पक्का यकीन है कि वो उस रात मेरे जिस्म पर लेटा हुआ भी, नींद में अपनी इस गोरी, रसीली और खूबसूरत माँ के बारे में ही कोई गहरा कामुक सपना देख रहा होगा...!"

कुसुम दीदी के मुँह से शादी वाली रात का वो भयंकर और रसीला सच सुनकर मेरा दिमाग पूरी तरह सुन्न हो गया था। रसोई की गर्म हवा में जैसे एक अजीब सा नशा घुल गया था। दीदी की इस बात ने मेरी योनि के भीतर की नमी को और बढ़ा दिया था। मैंने अपनी उंगलियों से साड़ी के पल्लू को थोड़ा और कसा, कुछ देर दीदी की उस बात को अपने दिमाग में घुमाया और फिर अपने दिल की बढ़ती धड़कनों को रोकते हुए बहुत ही धीमी आवाज़ में पूछा:

"दीदी... एक बात पूछूँ? आपके दोनों बेटे, सोनू और...मोनू... क्या वो दोनों भी आपके साथ ऐसा ही कुछ करते हैं? क्या वो भी आपके इस गोरे बदन के इतने करीब हैं?"

मेरी यह बेबाक बात सुनते ही कुसुम दीदी के चेहरे पर एक गहरी और शातिर मुस्कान आ गई। उन्होंने अपनी पीली साड़ी के पल्लू को थोड़ा और मटकाया, अपनी आँखों को मतवाले अंदाज़ में सिकोड़ा और दबी आवाज़ में हंसते हुए बोलीं, "वाह री छोटी! बड़ी चालाक है तू... मैं तुझे क्यों बताऊँ कि मेरे बेटे मेरे कितने करीब हैं और हमारे बीच क्या बातें होती हैं? यह हमारे बीच का राज़ है।"

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दीदी ने अपनी सब्ज़ी काटने वाला चाकू साइड में रखा और वो मेरे और करीब आ गईं। उनकी आँखों की चमक अब एक अनुभवी औरत जैसी गंभीर हो चुकी थी। वो सीधे मेरी आँखों में झांकते हुए बोलीं, "देख छोटी, एक बात तू आज बहुत अच्छे से समझ ले। इस दुनिया में माँ और बेटे का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता है कि हर घर की चारदीवारी के भीतर इसके मायने बदल जाते हैं। यहाँ इस घर में तू अपने जवान बेटे गोलू को खुद को छूने देती है, उसका हक़ मानती है। लेकिन इसी दुनिया में कुछ ऐसी माँएँ भी होंगी, जो अपने बेटों को खुद से कोसों दूर रखती हैं। वो उन्हें अपने जिस्म को छूने तक नहीं देतीं, और गले लगाना या चूमना तो दूर की बात है, वो लड़के सपने में भी ऐसा नहीं सोच सकते।"

दीदी ने एक गहरी सांस ली और अपनी पीली साड़ी के पार से मचलते अपने भारी वशस्थल पर हाथ रखते हुए आगे समझाया, "लेकिन इसके ठीक उलट, इस दुनिया में कुछ ऐसे माँ-बेटे भी हैं जो एक-दूसरे के इस कदर करीब आ चुके हैं कि उन्हें आपस में बच्चे तक पैदा करने हैं! इसलिए तू दूसरों के बारे में मत सोच, और न ही बाहर की दुनिया को देखकर कोई फैसला कर। यह जो कुछ भी हो रहा है, यह सिर्फ और सिर्फ तेरा अपना फैसला होना चाहिए। अगर तुझे अपने जवान बेटे का वो तीखा मर्दाना छुआ जाना अच्छा लगता है, तेरे बदन को उससे सुख मिलता है, तो कोई दूसरा बाहर वाला क्या सोचता है—यह सोचकर तू अपनी इस छिपी हुई खुशी का गला मत घोंट!"

दीदी ने मेरे कंधे को धीरे से सहलाया, उनकी उंगलियों की छुअन मेरे ब्लाउज के पार तक महसूस हो रही थी। वो सीधे मेरी रूह को झकझोरते हुए फुसफुसाकर बोलीं, "याद रख छोटी... कोई बाहर वाला गैर मर्द कभी तेरे इस सूने आंगन में तुझे प्यार देने नहीं आएगा। तुझे जो भी सुख, प्यार और तृप्ति मिलेगी, वो या तो तेरा पति देगा या फिर तेरा यह जवान बेटा देगा। इसलिए तू सिर्फ उनके बारे में सोच और उन्हीं के साथ अपने सुख की तलाश कर। और इस अनोखे माँ-बेटे के रिश्ते की गहराई कितनी है, इसका राज़ सिर्फ और सिर्फ उन दोनों को ही पता होना चाहिए, किसी तीसरे को भनक तक नहीं लगनी चाहिए... समझी मेरी भोली छोटी बहन?"


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दीदी की इस सरल लेकिन बेहद गहरी बात ने मेरे दिमाग के सारे जाले साफ कर दिए थे। लोक-लाज का जो आखिरी डर मेरे मन में सुलग रहा था, वह दीदी की इस ढाल के पीछे पूरी तरह छिप चुका था। मैं अपनी आँखें झुकाए बस गहरी सांसें ले रही थी, जबकि पेटीकोट के भीतर मेरा पूरा बदन गोलू की उस अधूरी छुअन को दोबारा महसूस करने के लिए अंदर ही अंदर मचल उठा था।
Wah kya baat hai...maasi bhi bhanje ko maa se milan ke liye raasta banaa rahi hai...abb agar maasi apne haathon se bete ka milan maa se karaa dey toh soney pe suhaaga ho jaaye..plz update soon.
 
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Gorgeous Ridhimaa

रिद्धिमा ✨
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Update 16

रात का खाना खाने के बाद, बाहर कयामत की बारिश और हवाओं के शोर के बीच, हम सभी लोग लिविंग रूम में काफी देर रात तक बैठे बातें करते रहे। पूरा परिवार एक साथ था, मेरे पति की नजरे बार बार कुसुम दीदी के भरे हुए सुने से टकरा रही थी और वो अपनी नजरे शर्म से झुका लेते । मेरा जवान बेटा गोलू सोफे पर अपनी मौसी कुसुम से बिल्कुल सटकर बैठा हुआ था। बातों-बातों में जब भी गोलू के बचपन की कोई नटखट याद निकलती, तो कुसुम दीदी अपनी पीली साड़ी के पल्लू को लहराते हुए बड़े प्यार से गोलू को खींचकर अपने भरे-पूरे सीने से कसकर लगा लेतीं। जीजू और मेरे पति उन दोनों का यह लाड़ देखकर मुस्कुरा रहे थे, दीदी के स्तनों से सटने पर गोलू का चेहरा लाज और उत्तेजना से लाल हो जाता था, और वह तिरछी नज़रों से बार-बार मेरे कड़े स्तनों को भी ताक लेता था।

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जब काफी रात बीत गई और सबके सोने का वक्त आया, तो कुसुम दीदी ने अपनी चालबाज़ आँखें नचाते हुए एक नया पासा फेंका। वह मुस्कुराकर बोलीं, "में क्या कहती हु छोटी, आज काफी समय बाद हम दोनों को ऐसा मौका मिला है की हम दोनो साथ में सो सकती है पहले जैसे । और आप तीनों मर्द एक साथ गोलू के कमरे में एडजस्ट कर लो।"

दीदी की यह बात सुनकर गोलू के चेहरे पर निराशा छा गई। सुबह और शाम की उस अधूरी छुअन की वजह से वह पूरी तरह बेचैन था। उसने अपनी मासूम आँखें बड़ी कीं और एक उम्मीद के साथ बड़े लाड़ से अपनी मौसी से पूछा, "मौसी... क्या मैं भी आप दोनों के साथ ही कमरे में सो सकता हूँ? प्लीज़..."

गोलू का अपनी माँ और मौसी के जिस्म के करीब सोने का यह तड़पता हुआ अंदाज़ देखकर कुसुम दीदी ने मस्ती भरे अंदाज़ में उसे आँख मारी और साफ़ मना करते हुए बोलीं, "बिलकुल नहीं बदमाश! अब तू कोई छोटा बच्चा नहीं रहा जो अपनी माँ और मौसी के बीच सोएगा। चल भाग अपने कमरे में।" दीदी का यह नटखट इनकार सुनकर गोलू ने मायूसी से मुझे देखा, लेकिन मैं अपने पति के डर से चुप रही।

इसके बाद सोने का इंतज़ाम शुरू हुआ। जीजू जाकर सीधे गोलू के सिंगल बेड पर पसर गए। मेरे पति और गोलू के सोने के लिए मैंने उसी कमरे में फर्श पर एक बड़ा और आरामदायक गद्दा बिछाकर नीचे ही बिस्तर लगा दिया। गोलू चिढ़कर चुपचाप नीचे लेट गया, क्योंकि उसका अपनी माँ के बदन को चूसने का पूरा प्लान आज रात के लिए फ्लॉप हो चुका था।

सबको सुलाने के बाद जब मैं थकी हुई और अंदर से सुलगती हुई अपने बेडरूम में आई, तो कुसुम दीदी पहले से ही वहाँ बिस्तर पर मेरा इंतज़ार कर रही थीं। मेरे अंदर आते ही दीदी ने मुड़कर कमरे की कुंडी को बहुत सलीके से और ठीक से बंद किया, ताकि रात के सन्नाटे में बाहर कोई हमारी आहट भी न सुन सके। कुंडी चढ़ाकर वो पलटीं, तो उनकी आँखों में वही सम्मोहक और मतवाली चमक थी जो किसी को भी मदहोश कर दे।

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वो दबे पाँव मेरे पास आईं और उन्होंने अचानक अपनी दोनों गोरी बाहें मेरी पतली कमर पर कस दीं और मुझे पीछे से अपनी छाती में भींचते हुए बेहद मखमली आवाज़ में कहा, "पता नहीं क्यों छोटी... आज तुझ पर बहुत ज़्यादा प्यार आ रहा है। कितने सालों के बाद आज हम दोनों बहनें इस तरह एक साथ, एक कमरे में अकेले सो रही हैं।"

इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती, दीदी ने मुझे बहुत ही नाज़ुक और मदहोश कर देने वाले हक़ से पकड़कर बेड पर सीधा लेटा दिया। उन्होंने मेरा सिर अपनी मुलायम और गोरी जाँघों के ऊपर, अपनी गोद में रख लिया। साड़ी के पतले कपड़े के पार से जब दीदी के बदन की गर्मी और उनकी गोद का मखमली अहसास मेरे चेहरे को छूने लगा, तो पेटीकोट के भीतर मेरी योनि की नमी एक बार फिर तेज़ी से रिसने लगी। मैं आँखें बंद किए अपनी बड़ी बहन की उस कामुक ममता के साये में पूरी तरह पिघलने लगी थी।

बेडरूम के उस शांत सन्नाटे में, जब मेरा सिर कुसुम दीदी की मुलायम जाँघों पर टिका हुआ था, तो बाहर हो रही बारिश की आवाज़ अब बहुत धीमी लग रही थी। दीदी का हाथ बहुत ही नाज़ुक अहसास के साथ मेरे सिर और मेरे बालों को सहला रहा था। कमरे की मद्धम रोशनी में उनकी आँखों की वो मतवाली चमक मेरे चेहरे पर टिकी हुई थी। अचानक, दीदी ने बिना कुछ बोले अपना सिर नीचे झुकाया और उनके गर्म, गीले होंठ सीधे मेरे होठों पर आकर टिक गए।

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दीदी के होठों का वह अचानक हुआ तीखा स्पर्श जैसे ही मुझे महसूस हुआ, मेरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। मैंने थोड़ा शर्माते हुए और हल्का सा नाटक करते हुए उनका हाथ पकड़ना चाहा, "उफ़्फ़ दीदी... क्या कर रही हो आप... छोड़ो ना..."

लेकिन मेरा यह नाटक ज़्यादा देर नहीं चला। दीदी की ज़बान का मखमली स्वाद जैसे ही मेरे होठों के भीतर उतरा, मैं खुद को रोक नहीं पाई और अपनी आँखें बंद करके मैं भी पूरे जोश के साथ उनका साथ देने लगी। हम दोनों बहनें कुछ पलों के लिए दुनिया की सारी मर्यादाएँ भूलकर एक-दूसरे के होठों के रस को चूसने लगीं। जब वो पीछे हटीं, तो हम दोनों की सांसें पूरी तरह से फूल चुकी थीं।

दीदी ने मुस्कुराते हुए अपने अंगूठे से मेरे होठों को साफ़ किया और मेरी साड़ी के पल्लू को धीरे से सहलाते हुए बेहद बेबाक अंदाज़ में बोलीं, "चल छोटी... अब बहुत नाटक हो गया। आज मुझे साफ़-साफ़ देखना है कि तेरा वो सीधा-साधा पति तुझे कितना प्यार देता है। ज़रा देखूँ तो सही, अंदर से कितना भरा हुआ है तेरा यह कातिलाना जिस्म?"

मैंने शरमाकर अपना चेहरा उनकी जाँघों में और छुपाना चाहा, लेकिन दीदी ने मेरी ठोड़ी को पकड़कर मेरा चेहरा ऊपर उठा दिया। उनकी उँगलियाँ अब मेरे ब्लाउज के नए बटनों के ऊपर रेंग रही थीं।

वह एक गहरी और कामुक सांस लेकर सीधे मेरी आँखों में देखते हुए बोलीं, "तेरे ये कड़े और मोटे स्तन तो मैंने रसोई में ही देख लिए हैं, जिन्होंने गोलू को पूरी तरह पागल बना रखा है... लेकिन अब मुझे तेरा पूरा सुडौल बदन देखना है। आज मुझ पर तुझ पर बहुत ज़्यादा प्यार आ रहा है छोटी, और आज तू अपनी इस बड़ी बहन से किसी भी कीमत पर बच नहीं पाएगी!"

दीदी की इस खुली और रसीली चुनौती ने पेटीकोट के भीतर मेरी जाँघों के बीच की नमी को एक बार फिर से बढ़ा दिया था। मैं लाज और उत्तेजना के उस मखमली जाल में पूरी तरह फंस चुकी थी और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपनी बड़ी बहन को इस कामुक खेल के लिए हाँ कहूँ या ना।

कमरे में चारों तरफ रात का गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन हम दोनों बहनों के बीच की सांसें इस कदर गर्म थीं कि उस बंद कमरे की हवा में वासना का एक तीखा, नशीला सम्मोहन घुलने लगा था। दीदी ने मुझे अपनी मखमली गोद से उठाया और बड़े प्यार से, एक अजीब सी दीवानगी के साथ खींचकर बेडरूम के बड़े से आईने के सामने खड़ा कर दिया। आईने के धुंधले अक्स में हम दोनों की सूरतें साफ गवाही दे रही थीं कि आज रात मर्यादा की कोई भी दीवार बचने वाली नहीं है। दीदी मेरी पीठ से बिल्कुल सटकर खड़ी हो गईं, जिससे उनकी पीली साड़ी की मखमली खुशबू सीधे मेरी रूह तक उतरने लगी।

दीदी ने एक गहरी, तपती हुई सांस ली और मुस्कुराते हुए मेरी साड़ी के पल्लू को पूरी तरह से मेरे बदन से हटाकर एक तरफ गिरा दिया। पल्लू के हटते ही, मेरी तेज़ और भारी चलती हुई साँसों की वजह से मेरी छाती का पूरा उभार आईने में बुरी तरह ऊपर-नीचे मचलने लगा। उनके होठ मेरी गर्दन को चूम रहे थे और में बस मचल रही थी उनकी मजबूत पकड़ में।


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दीदी ने आईने में मेरे इस रूप को देखा, उनकी आँखें वासना से भारी हो गईं और वो सम्मोहित होकर एक-एक करके मेरे ब्लाउज के बटन खोलने लगीं। बंद कमरे के सन्नाटे में 'टिक... टिक...' की वो बारीक आवाज़ें सीधे मेरी नाभि के नीचे एक अजीब सी कँपकँपी पैदा कर रही थीं। दीदी के हाथ जैसे-जैसे नीचे सरक रहे थे, वो मेरे इस भरे-पूरे और सुडौल जिस्म की तारीफ करते नहीं थक रही थीं, "उफ़्फ़ छोटी... तू तो अंदर से किसी ताज़े, रसीले फल की तरह भरी पड़ी है। तेरी इस जवानी को देखकर तो कोई भी जवां मर्द अपना आपा खो दे।"

ब्लाउज के सारे बटन खुलते ही दीदी ने बहुत ही लाड़ और एक अजीब से हक़ से मेरे दोनों हाथ ऊपर कराए और उस ब्लाउज को मेरे कंधों से सरकाकर फर्श पर फेंक दिया। ब्लाउज के हटते ही मेरी जो गहरे रंग की सैटिन की ब्रा सामने आई, उसे देखकर दीदी की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह उस चिकने, मखमली कपड़े के पार से मेरे स्तनों के उभार को सहलाते हुए बोलीं, "मानना पड़ेगा छोटी, तेरी चॉइस बहुत कातिलाना है। इतनी कसी हुई ब्रा पहनकर तू इस जवानी के तूफान को कैसे संभाल कर रखती है? तेरे इस बदन का एक-एक अंग गज़ब ढा रहा है।"

अब बारी उस आखिरी मखमली पर्दे को हटाने की थी। दीदी पीछे मुड़ें और मेरी ब्रा का हुक खोलने के लिए जैसे ही अपनी गोरी, गर्म उँगलियाँ बढ़ाईं, साड़ी के नीचे पेटीकोट के भीतर मेरी जाँघों के बीच की नमी और तेज़ी से रिसने लगी। हुक खोलने से ठीक पहले, उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं, अपना चेहरा मेरी नंगी गर्दन के पास लाया और मेरे गले के उस बेहद संवेदनशील हिस्से को बहुत ही गहराई से चूम लिया।


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उनके होंठों की वो गीली और तीखी छुअन अभी मेरी त्वचा को चीर ही रही थी कि वो धीरे से नीचे झुकीं और मेरी नंगी, गोरी और चिकनी पीठ को अपनी गर्म ज़बान से चाटते और चूमते हुए एक झटके में ब्रा का हुक निकाल दिया।

"उफ़्फ़अअ... दीदी...!" मेरे मुँह से एक बेहद मादक सिसकारी निकल गई।

ब्रा के बदन से अलग होते ही मेरे दोनों गोरे, भारी, मोटे और पूरी तरह से भरे हुए स्तन बेपर्दा होकर आईने के सामने छलक आए। एअर-कंडीशनर की ठंडी हवा के छूते ही मेरे स्तनों के निप्पल्स एकदम सख्त, कड़े और गहरे रंग में तने हुए सीधे खड़े हो गए। दीदी ने उस उतरी हुई ब्रा को अपने नथुनों के पास ले जाकर उसकी खुशबू को गहराई से अपने भीतर खींचा और मदहोश होकर बोलीं, "क्या गजब की स्त्री-सुलभ खुशबू है तेरी इस ब्रा में... उफ़्फ़! सच कहूँ तो बेचारा गोलू क्या ही करे? उसकी माँ है ही इतनी बेमिसाल और रसीली कि कोई भी जवान लड़का अपनी मर्यादा भूल जाए।"

अब मैं आईने के सामने सिर्फ एक पतले से पेटीकोट में, ऊपर से पूरी तरह नंगी खड़ी अपनी बाहों से खुद को ढकने की नाकाम कोशिश कर रही थी। लाज और भयंकर उत्तेजना के मारे मेरा पूरा चेहरा सुर्ख लाल हो चुका था, लेकिन दीदी तो जैसे मुझे और भी ज़्यादा छेड़ने के मूड में थीं। वह बार-बार आईने में मेरे तने हुए निप्पल्स की तरफ इशारा करके मुझे उकसा रही थीं, मेरी नाभि पर अपनी उँगलियाँ रेंग रही थीं। मैं भी उनकी इस ज़बर्दस्त छेड़खानी का शर्माते हुए, अपनी दबी-दबी और काँपती आवाज़ में जवाब दे रही थी, "प्लीज़ दीदी... अब और मत तड़पाओ मुझे... बहुत शर्म आ रही है, देखो पूरा बदन काँप रहा है मेरा।"

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तभी दीदी ने आगे बढ़कर अपने दोनों हाथों की हथेलियों से मेरे उन भारी स्तनों को नीचे से पूरा थाम लिया। उन्होंने उन्हें अपनी उँगलियों के बीच कसकर भींचते हुए बहुत ही बेबाक और कामुक अंदाज़ में कहा, "इतने कड़े, गोल और कसे हुए हैं तेरे ये दोनों चूचे कि इन्हें देखकर लगता ही नहीं कि तूने एक जवान बेटे को जन्म दिया है। सच-सच बता छोटी... क्या तू अपने सीधे-साधे पति राजीव को इन्हें ढंग से छूने भी नहीं देती क्या? इन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे तेरे इस मखमली जिस्म को अभी तक किसी ताकतवर मर्द ने कायदे से निचोड़ा ही नहीं है! इसकी असली गर्मी तो अभी भी वैसी ही सुरक्षित रखी है।

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दीदी की इस बेहद तीखी, नंगी और दो-अर्थी बात को सुनकर मेरे पैर जैसे फर्श पर जम गए। मैंने शर्म से अपनी आँखें कसकर मूँद लीं और अपनी आख़िरी सफाई देने की कोशिश की, "राम-राम दीदी! आप कुछ भी बोलती हो... वो... वो बहुत प्यार करते हैं मुझसे... आप बेकार की बातें करके मुझे मत सताओ।"

मेरी इस कमज़ोर और हांफती हुई सफाई पर दीदी ने ज़ोर से चुटकी ली। उन्होंने मेरे एक कड़े निप्पल को अपनी उँगलियों से धीरे से मरोड़ा, जिससे मेरी योनि के भीतर से कामुक रस का एक और कतरा छलक पड़ा। दीदी ने अपनी पीली साड़ी के पल्लू को हिलाया और सीधे मेरे कान के पास अपने गर्म होंठ लाकर, बेहद कामुक और सम्मोहन भरे लहजे में फुसफुसाकर बोलीं:

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"चल झूठी! अब अपनी इस बड़ी बहन को मत सिखा। तेरे इस ठंडे और सीधे पति के बस का कुछ नहीं है। मुझे तो साफ़-साफ़ लग रहा है कि अब तेरा ये जवान बेटा गोलू ही तेरी इस तड़पती हुई जवानी का असली मज़ा लेगा... उसी के पास वो मर्दाना ताकत और वो लंबा मोटा तपा हुआ लोहा है जो तेरी इस गोरी काया की प्यास को पूरी तरह बुझा सके...!"

दीदी के मुँह से अपने ही जवान बेटे के उस विशाल अंग और उसकी मर्दानगी के लिए यह आख़िरी, भयंकर और रसीली बात सुनते ही मेरा पूरा वजूद लाज और खौफ के मारे पूरी तरह से पानी-पानी हो गया। मेरा दिल धौंकनी की तरह चलने लगा, और मैंने बिना कुछ सोचे शर्म के मारे अपना चेहरा दीदी के उन भरे-पूरे, मजबूत कंधों की ओट में पूरी तरह छुपा लिया, जबकि मेरा पूरा नंगा बदन उत्तेजना के मारे थर-थर काँप रहा था।

आईने के सामने की उस गहरी मदहोशी के बाद, कुसुम दीदी ने अपनी मजबूत और गोरी बाहों में मेरे काँपते हुए जिस्म को पूरी तरह से समेटा और धीरे से ले जाकर बेड पर सुला दिया। बिस्तर की मखमली, ठंडी चादर जैसे ही मेरी नंगी पीठ से टकराई, मेरे बदन का रोम-रोम एक बार फिर जाग उठा। मैं अभी सीधे लेटकर अपनी साँसों को सँभालने की कोशिश ही कर रही थी कि दीदी बेड के किनारे खड़ी होकर अपनी पीली साड़ी के पल्लू को खोलने लगीं। कमरे की मद्धम रोशनी में उनका वह भारी, सुगठित और जवां जिस्म धीरे-धीरे बेपर्दा होने लगा। उन्होंने एक-एक करके अपने सारे कपड़े उतार दिए और पूरी तरह नग्न होकर, अपनी भारी जाँघों को मटकाती हुई मेरे पास बेड पर आ गईं।

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जब दीदी पूरी तरह नंगी होकर मेरे सामने बेड पर बैठ गईं, तो मैं उन्हें बस एकटक देखती ही रह गई। उनका रूप इस वक्त किसी मदमस्त अप्सरा जैसा कातिलाना लग रहा था। उनके भारी और सुडौल स्तन उनकी छाती पर पूरी तरह उभरे हुए थे, और उनके अग्रभाग गहरे रंग में तने हुए थे। उनका चौड़ा पेट और भारी गोरी जाँघें कमरे की मद्धम रोशनी में आईने की तरह चमक रही थीं। उनकी आँखों में वही तीखी, सब कुछ जान लेने वाली मतवाली और कामुक चमक थी जो किसी को भी पूरी तरह से अपना गुलाम बना दे। वह अपनी उन नशीली नज़रों से मेरे पूरे नंगे बदन को ऊपर से नीचे तक ऐसे निहार रही थीं, जैसे मेरे पूरे वजूद को अपनी आँखों से ही पी जाना चाहती हों।

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दीदी की नंगी, तपती हुई त्वचा जब मेरे बेजान होते बदन से छुई, तो मेरी सांसें और भारी हो गईं। उन्होंने बिना वक्त गंवाए मुस्कुराते हुए अपना हाथ नीचे बढ़ाया और मेरे पेटीकोट के नाड़े को अपनी उँगलियों से धीरे से ढीला कर दिया।

"दीदी... नहीं, प्लीज... यह बहुत ज़्यादा हो रहा है... मुझसे अब और बर्दाश्त नहीं होगा..." मैंने काँपते और झिझकते हुए हाथों से उनके हाथ को रोकने का एक आखिरी, छोटा सा नाटक किया।

लेकिन दीदी तो आज मुझे पूरी तरह अपने वश में करने की कसम खा चुकी थीं। उन्होंने मेरी इस हल्की सी छेड़खानी का जवाब अपनी नटखट हँसी से दिया, "अच्छा! अभी आईने के सामने तो बड़ी कयामत ढा रही थी, और अब बोलती है बर्दाश्त नहीं होगा?" यह कहते हुए उन्होंने एक झटके में मेरे पेटीकोट को पैरों के रास्ते खींचकर बेड से नीचे हटा दिया और बहुत ही सलीके से, कामुक अंदाज़ में मेरे दोनों गोरे और चिकने पैरों को फैलाना शुरू कर दिया।

मैं खौफ और बेपनाह शर्म के मारे पूरी तरह सिकुड़ने लगी और ज़ोर-ज़ोर से हाथ-पैर मारकर उन्हें मना करने लगी। यह देखकर दीदी ने तुरंत अपना एक गर्म हाथ मेरे मुँह पर रखा और मुझे डांटते हुए बेहद धीमी, मदहोश कर देने वाली आवाज़ में फुसफुसाकर बोलीं:

"ज़्यादा आवाज़ मत कर छोटी! पास वाले कमरे में ही वो सब सो रहे हैं। अगर किसी की भी नींद खुली और वो यहाँ आ गया, तो अनर्थ हो जाएगा। तू बस चुपचाप अपनी इस बड़ी बहन के प्यार का मज़ा ले... आज तुझे तड़पना छोड़ना होगा।"

दीदी की उस मीठी डांट ने मुझे अंदर तक खामोश और बेबस कर दिया। अगले ही पल, उन्होंने अपना चेहरा नीचे झुकाया और मेरी उस बेहद संवेदनशील, नंगी और कामुक रस से पूरी तरह भीग चुकी प्यासी योनि के ठीक ऊपर अपने गर्म, गीले होंठ रख दिए।

"उफ़्फ़अअ... म... मम्म... आहाअअ...!"

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दीदी की गरम ज़बान का पहला तीखा, गीला और मखमली स्पर्श जैसे ही मेरी योनि के सबसे नाज़ुक हिस्से से टकराया, मेरा पूरा बदन कमान की तरह बेड से ऊपर उठ गया। उत्तेजना की एक ऐसी कयामत मेरे भीतर उठी कि मैंने कसकर बेड की चादर को अपनी उँगलियों में भींच लिया। दीदी रुकने का नाम नहीं ले रही थीं, वो बहुत ही अनुभवी औरत की तरह अपनी ज़बान को मेरी योनि की गहराइयों में फिराते हुए उसे बुरी तरह चूसने लगीं।

"दी... दीदी... उफ़्फ़... मार डाला... आः... थोड़ा धीरे...!" मेरे मुँह से बेहद मादक, गाढ़ी और तीखी सिसकारियाँ निकलने लगीं।

अभी मैं उनकी ज़बान के इस तीखे रस में डूब ही रही थी कि दीदी ने मुझे और ज़्यादा तड़पाने और छेड़ने के लिए एक नया कामुक कदम बढ़ाया। उन्होंने चूसते-चूसते अपनी एक गोरी और चिकनी उंगली को धीरे से मेरी योनि के उस गीले, तंग रास्ते के भीतर डाल दिया।

"अहह... दीदी... ये क्या... आः...!" मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं।

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दीदी ने अंदर अपनी उंगली को हिलाते हुए मेरी आँखों में देखा और बहुत ही कामुक आवाज़ में मुझे छेड़ते हुए बोलीं, "देख तो सही छोटी... तेरी ये गुफा कितनी तंग, कितनी छोटी और कितनी गर्म है। अभी तो सिर्फ मेरी ये एक उंगली अंदर गई है... ज़रा सोच, जब हमारे गोलू का वो जवान, लंबा और मोटा लंड तेरी इस नन्ही सी छेद के भीतर पूरा अंदर तक जाएगा, तब तेरा क्या हाल होगा? तू तो चिल्ला ही पड़ेगी!"

दीदी की यह बात सुनकर मेरा कलेजा काँप उठा। दीदी को तो ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि गोलू पहले ही उस होटल वाली रात को अपना वो मोटा लंड मेरी इस छेद के भीतर पूरा अंदर तक डाल चुका है! वह रात सिर्फ मुझे और गोलू को पता थी, और दीदी की इस बात ने मेरे भीतर उस गुप्त रात की कामुक आग को फिर से भड़का दिया।

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मैं अभी उस मखमली याद और उनकी एक उंगली के अहसास से संभल भी नहीं पाई थी कि दीदी ने मुस्कुराते हुए अपनी दूसरी उंगली भी पहली उंगली के साथ सटाकर मेरी योनि के भीतर उतार दी। अब दो उँगलियाँ एक साथ मेरे उस नाज़ुक और तंग रास्ते को फैलाते हुए अंदर-बाहर हो रही थीं। उस तीखे और दोहरे दबाव से मेरा पूरा वजूद घुटनों तक काँपने लगा। मेरी सिसकारियाँ अब और भारी हो चुकी थीं।

दीदी ने अंदर उँगलियाँ चलाते हुए फिर से ज़ोरदार चुटकी ली, "क्यों छोटी? दो उँगलियों में ही ये हाल है? जब गोलू की वो मोटी मर्दानगी इस छेद को फाड़ते हुए अंदर घुसेगी, तब तो तू अपनी इस दीदी को भी भूल जाएगी ना?"

"ओहोओ... दी... दीदी... बस करो... मर जाऊँगी मैं... आः... बहुत मज़ा आ रहा है...!"

लेकिन दीदी का इरादा तो मुझे पूरी तरह से मदहोश कर देने का था। उन्होंने मेरी योनि को पूरी तरह से कामुक रस से लथपथ देखा, और अपनी इन्हीं गंदी और कामुक बातों के साथ-साथ, अपनी तीसरी उंगली को भी उस संकरे रास्ते के भीतर ज़बरदस्ती धकेल दिया। तीन उँगलियों का वह विशाल और भारी दबाव जैसे ही मेरी योनि की गहराइयों को चीरता हुआ अंदर गया, मेरे मुँह से एक ऐसी तीखी और आसमान छूने वाली सिसकारी निकली जिसे मैं चाहकर भी दबा नहीं सकी।


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मैंने अपनी आँखों को कसकर बंद कर लिया और बेड की चादर को अपनी उँगलियों में इतनी ज़ोर से भींचा कि मेरी उँगलियों के पोर सफेद पड़ गए। दीदी नीचे से अपनी तीनों उँगलियों को पागलों की तरह अंदर-बाहर कर रही थीं और ऊपर से अपनी ज़बान से चूस रही थीं।

दीदी तब तक लगातार अपनी ज़बान और उन तीन उँगलियों का जादुई और तीखा प्रहार करती रहीं, जब तक कि मेरे बदन की आखिरी नस ने भी पूरी तरह जवाब नहीं दे दिया। अचानक मेरी योनि से कामुक रस का एक ज़बर्दस्त, गरम फव्वारा छूटा, मेरा पूरा बदन एक झटके के साथ एकदम से अकड़ गया, और एक भयंकर, जादुई चरम सुख के बाद मैं पूरी तरह ढीली होकर हांफती हुई बिस्तर पर बिखर गई। मेरी आँखें पूरी तरह मदहोश हो चुकी थीं और मेरा रोम-रोम कांप रहा था।

इसके बाद, दीदी ने बहुत ही लाड़ से मुझे अपनी तरफ घुमाया और पीछे से आकर मुझे अपनी बाहों में कस लिया, जिससे हम दोनों बहनें स्पूनिंग पोजीशन में आ गईं। दीदी का नंगा, भारी और गरम पेट मेरी पीठ से पूरी तरह सटा हुआ था और उनका एक हाथ आगे आकर मेरे उन कड़े, भारी स्तनों के निप्पल्स को बहुत ही नाज़ुक उँगलियों से सहला रहा था।

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कमरे में छाए उस सुहावने, मादक सन्नाटे के बीच, दीदी ने मेरे कान के पास अपने होंठ लाए और बहुत ही मीठी, रसीली आवाज़ में पूछा, "अब बता छोटी... कैसा लगा तुझे अपनी दीदी का यह प्यार? सच-सच बताना, इस हरकत का तेरे इस जिस्म पर क्या हाल हुआ है?"

मैंने एक लंबी, राहत भरी गर्म सांस छोड़ी। दीदी की उँगलियों की उस मखमली छुअन का आनंद लेते हुए मैंने अपने बदन का पूरा हाल और अपने दिल का पूरा हक़ उनके सामने रख दिया, "दीदी... सच कहूँ तो आपके इस स्पर्श ने मेरे इस पूरे जिस्म को अंदर तक झकझोर कर रख दिया है। मेरी जाँघों के बीच इस वक्त इतनी गर्मी और इतनी शिथिलता है कि मेरे पैर पूरी तरह बेजान हो चुके हैं। ऐसा लग रहा है जैसे बदन का एक-एक कतरा पिघलकर बह गया हो। मेरे इस शांत पड़े अंगों को आज पहली बार ऐसा तीखा और रसीला सुख मिला है कि अब मेरे भीतर की सारी घबराहट और लोक-लाज का डर पूरी तरह ख़त्म हो चुका है। आपका यह प्यार मेरे इस बदन को हमेशा याद रहेगा...I Love You दीदी"

मेरी यह सच्ची, बेहद कामुक और बेबाक बात सुनकर दीदी ने मुस्कुराते हुए मेरी नंगी पीठ पर एक गहरा, गीला चुंबन अंकित कर दिया, और हम दोनों बहनें उस रात के घने अंधेरे में एक-दूसरे के जिस्म की तपती हुई गर्मी में पूरी तरह खो गईं।

स्पूनिंग पोजीशन में लेटे हुए, कुसुम दीदी का नंगा और भारी बदन जब मेरी पीठ से सटा हुआ था, तब उनके दोनों बड़े-बड़े और मखमली स्तनों का भारी दबाव मुझे अपने पीछे साफ़ महसूस हो रहा था। वो इतने विशाल और गर्म थे कि उनके कड़े निप्पल्स मेरी पीठ की त्वचा को रह-रहकर छू रहे थे। आईने के सामने उनका वो कातिलाना रूप देखकर मेरे भीतर भी एक औरत की चाहत जाग उठी थी। मैंने बहुत ही नाज़ुक और लाड़ भरे लहजे में दीदी से कहा:

"दीदी... आपके ये स्तन कितने बड़े और कितने खूबसूरत हैं। इन्हें देखकर मैं खुद को रोक नहीं पा रही हूँ... क्या मैं इन्हें थोड़ा चूस सकती हूँ?"

मेरी यह भोली और कामुक ख़्वाहिश सुनकर दीदी मुस्कुरा दीं। उन्होंने तुरंत मुझे अपनी तरफ घुमाया और बिस्तर पर थोड़ा ऊपर की तरफ सरक गईं, जिससे उनके दोनों भारी और रसीले स्तन सीधे मेरे चेहरे के ठीक सामने आ गए। दीदी ने बहुत ही ममता और वासना के मिले-जुले लाड़ से मुझे अपने सीने से लगा लिया। जैसे ही उनका एक बड़ा, कड़ा निप्पल मेरे मुँह के भीतर गया, दीदी के मुँह से एक बेहद गहरी और मादक सिसकारी निकल गई:

"उफ़्फ़अअ... आराम से छोटी... क्या कर रही है...!"

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मैंने बिना रुके उनके उस भारी स्तन को अपने मुँह की गहराई में भरा और किसी छोटे बच्चे की तरह धीरे-धीरे चूसना शुरू किया। लेकिन अगले ही पल, जैसे ही मैंने एक गहरा कश खींचा, मेरे मुँह के भीतर किसी बेहद मीठे और गाढ़े रस की एक गरम धार आ गिरी! मैं पूरी तरह हैरान रह गई। वह कुसुम दीदी का असली, मलाईदार दूध था!


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पल भर के लिए तो मैं स्तब्ध रह गई, लेकिन उस स्वाद में डूबते ही मुझे अपने बचपन की याद आ गई जब दीदी मुझे माँ की तरह संभालती थीं। मैंने बिना रुके, दीदी की आँखों में आँखें डालकर उनके उस रसीले अंग को पागलों की तरह चूसना जारी रखा। दीदी मदहोशी में अपनी आँखें मूँदे, मेरे बालों को सहलाते हुए बड़े लाड़ से मुझे अपना दूध पिलाती रहीं, और कमरे का सन्नाटा हमारी गीली आवाज़ों से गूंजता रहा।

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जब कुछ देर बाद दूध की वो धार शांत हुई, तो मैं उनके सीने से और ज़्यादा सट गई। मेरी आँखें विस्मय से भरी थीं। मैंने हांफते हुए पूछा, "दीदी... यह कैसे हो सकता है? आपके बच्चे तो इतने बड़े हो गए हैं, फिर इस उम्र में आपके स्तनों में यह दूध... यह मुमकिन नहीं है दीदी! क्या मैं कोई सपना देख रही हूँ?"

दीदी ने बहुत प्यार से मेरे चेहरे पर बिखरे बालों को समेटा, उनके चेहरे पर एक माँ की बेबाकी और एक कामुक औरत का सम्मोहन एक साथ झलक रहा था। वह धीमी आवाज़ में बोलीं, "तेरा तो सिर्फ एक बेटा है छोटी, मेरे तो दो-दो जवान बेटे हैं... सोनू और मोनू। और तेरा गोलू तो उनके सामने बहुत सीधा और अच्छा बच्चा है। तुझे क्या लगता है, मेरे उन दोनों बदमाशों ने मेरे इस बदन का क्या हाल करके रखा है?

जब वो जवानी की दहलीज़ पर आए, तो उनके भीतर भी अपनी इस माँ के दूध के लिए एक अजीब सी ज़िद जाग उठी। मैं क्या करती? आखिर माँ हूँ... उनके सुख और उनकी दीवानगी के आगे न जाने कैसे मान जाती हूँ, मुझे खुद समझ नहीं आता। बस कुछ ही दिन पहले से स्तनों में दोबारा यह दूध आना शुरू हुआ है।"

मैंने अचरज से दीदी की आँखों में देखा, "लेकिन दीदी... जीजू? क्या जीजू को इस बात का पता है? उन्हें ऐतराज़ नहीं होता कि उनके जवान बेटे अपनी माँ का दूध पीते हैं?"

दीदी ने अपनी पीली साड़ी के फर्श पर गिरे ब्लाउज की तरफ देखा और मुस्कुराकर बोलीं, "अरे, तेरे जीजू को इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं है! बल्कि वो तो खुद खुश होते हैं। वो हमेशा मुझसे कहते हैं कि वैसे भी आजकल बाज़ार में कितना नकली और मिलावटी दूध आता है... तो यह तो सबसे अच्छी बात है कि मेरे दोनों जवान बेटों को उनकी माँ का असली, सेहतमंद दूध पीने को मिलेगा। और... और कभी-कभी जब उनका मन बहकता है, तो रात के अंधेरे में वो खुद भी मेरे इन स्तनों का सुख ले लेते हैं।"

दीदी की इस रहस्यमयी और बेबाक बात ने मेरे मन में सवालों का एक सैलाब खड़ा कर दिया। मैंने उत्सुकता में उनसे कुछ और सवाल किए, "दीदी, क्या सोनू और मोनू भी आपके साथ वैसे ही सोते हैं जैसे गोलू मेरे साथ...? क्या वो भी आपके सारे कपड़े...?"

कुसुम दीदी बहुत चालाक थीं; उन्होंने मेरी इस बेहद निजी पूछताछ को भांप लिया। उन्होंने मेरे कुछ सवालों के जवाब बहुत ही कामुक अंदाज़ में मुस्कुराकर दिए, और कुछ को अपनी नटखट बातों में घुमा दिया। उन्होंने बस इतना कहा, "वक्त आने पर सब समझ जाएगी छोटी... अभी बस इस रात का मज़ा ले।"

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दीदी की इन मदहोश कर देने वाली बातों, उनके बदन की उस मखमली गर्मी और उनके सीने से रिसते दूध के नशे में मेरा पूरा वजूद इस कदर शांत और तृप्त हो चुका था कि हम दोनों बहनें एक-दूसरे को बाहों में भींचे कब गहरी नींद के आगोश में सो गईं, हमें पता ही नहीं चला। बाहर तूफान थमता जा रहा था, और अंदर हम दोनों अपनी नई दुनिया के सुकून में खो चुके थे।
 
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Gorgeous Ridhimaa

रिद्धिमा ✨
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Update 17

अगली सुबह-सुबह ही कयामत की वो बारिश थम चुकी थी, और जीजू और कुसुम दीदी अपने घर के लिए वापस निकल गए। जाते वक्त दीदी ने मुझे गले लगाया, तो उनकी आँखों में वही सब कुछ जान लेने वाली शरारती चमक थी, जिसने मुझे अंदर तक एक गहरा सुकून दे दिया था।

इस बात को बीते कुछ दिन हो चुके थे। एक रात, हम तीनों रोज़ की तरह खाना खाने के बाद घर की खुली छत पर आकर बैठ गए। रात का मौसम बेहद खूबसूरत और सुहावना था। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी और आसमान के घने अंधेरे में सारे तारे एकदम साफ़-साफ़ टिमटिमाते हुए दिख रहे थे। हम छत पर एक चटाई बिछाकर बैठे हुए थे। मेरा जवान बेटा गोलू हमेशा की तरह बड़े लाड़ से मेरी गोरी जाँघों पर अपना सिर रखकर चटाई पर ही लेटा हुआ था। मैं अपनी उँगलियों से बहुत ही प्यार और दुलार के साथ उसके घने बालों को सहला रही थी। साड़ी के पतले कपड़े के पार से मुझे उसकी गर्म साँसें अपने पेट पर महसूस हो रही थीं, जो मेरे भीतर एक दबी हुई सिहरन पैदा कर रही थीं।

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तभी चटाई पर बैठे मेरे पति ने आसमान की तरफ देखते हुए कुछ सोचते हुए कहा, "काफी दिन हो गए रिधिमा, हम लोग कहीं बाहर घूमने नहीं गए हैं। क्या कहते हो गोलू? कहीं बाहर जाने का मन है तो बताओ, अभी मेरे ऑफिस में भी काम का दबाव काफी कम है।"

अपने पापा के मुँह से घूमने की बात सुनते ही गोलू के भीतर का बच्चा जैसे जाग उठा। वह एक झटके में मेरी गोद से उठकर खड़ा हुआ और दौड़कर चटाई पर बैठे अपने पापा से इस कदर लिपट गया जैसे वो कोई छोटा सा बच्चा हो। उसका यह बचपना देखकर मुझसे भी रहा नहीं गया; मैं भी मुस्कुराती हुई आगे बढ़ी और दौड़कर अपने पति के गले लग गई। हम दोनों के इस अचानक आए भारी वजन और लाड़ के दबाव की वजह से मेरे पति पीछे की ओर चटाई पर ही गिर गए, और हम दोनों हंसते हुए उनकी दाईं और बाईं तरफ एक-एक तरफ लेट गए। माहौल में असीम पारिवारिक प्यार और एक छुपा हुआ रोमांच घुल चुका था।

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"पापा! हम लोग इस बार गोवा चलते हैं। मेरे कॉलेज के सारे दोस्त वहाँ घूमकर आ चुके हैं, मेरा भी बहुत मन है," गोलू ने अपने पापा की छाती पर हाथ रखकर बड़ी उम्मीद से कहा।

मैंने जैसे ही गोवा का नाम सुना, मेरे दिमाग में वहाँ के समंदर, रेत और छोटे कपड़ों के ख्यालात तैर गए। मैंने तुरंत मना करते हुए कहा, "नहीं, नहीं! मुझे गोवा नहीं जाना है। वहाँ बहुत गर्मी होगी, हम लोग कहीं ठंडे पहाड़ों में चलते हैं।"

मेरी यह बात सुनकर गोलू ने वहीं लेटे-लेटे मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में एक बेहद नटखट और तीखी कामुक चमक आ गई। वह मुस्कुराते हुए सबके सामने ही बेबाक अंदाज़ में बोला, "मम्मी... आप वहाँ बिकिनी पहनने से डर रही हो ना? आप फिक्र मत करो, आपका फिगर आज भी लड़कियों जैसा काफी अच्छा और सुडौल है। आप उसमें बहुत अच्छी लगोगी, टेंशन मत लो।"

गोलू के मुँह से अचानक 'बिकिनी' और मेरे 'फिगर' की यह बात सुनकर उसके पापा एक पल के लिए पूरी तरह चौंक गए। उन्होंने आँखें फाड़कर गोलू को देखा, लेकिन फिर माहौल को हल्का करने के लिए वो गोलू का साथ देते हुए हंसकर बोले, "अरे! ऐसा है क्या रिधिमा? गोलू बिल्कुल सही कह रहा है, तुम दिखने में बहुत खूबसूरत हो और आज भी काफी फिट हो। बहुत मज़ा आएगा! वैसे भी हम आज तक कभी किसी बीच (Beach) पर गए नहीं हैं, पहाड़ों में तो कितनी ही बार घूम चुके हैं।"

अपने पति और जवान बेटे के सामने अपने जिस्म की ऐसी तारीफ सुनकर मेरे गाल लाज के मारे सुर्ख लाल हो गए। मैंने शरमाकर अपनी आँखें झुका लीं और साड़ी के पल्लू को थोड़ा सँभालते हुए कहा, "अरे! आप दोनों भी ना... कुछ भी बोलते हो। ऐसा थोड़ी है कि वहाँ बिकिनी पहनना कँपल्सरी है, वह बात नहीं है। लेकिन बीच पर बहुत ज़्यादा भीड़ होती है, बहुत शोर-शराबा होता है और मुझे थोड़ा शांत माहौल अच्छा लगता है।"

गोलू ने तुरंत पासा पलटा और मुस्कुराकर बोला, "मम्मी, आप शांत माहौल की फिक्र मत करो। हम लोग गोवा में कोई ऐसा बीच खोज लेंगे जहाँ बहुत कम लोग आते हों, एकदम प्राइवेट जैसा।"

"हाँ रिधिमा, क्या कहती हो तुम? अब बोलो..." उसके पापा ने प्यार से मेरा हाथ थामते हुए पूछा।

अब मैं उन दोनों बाप-बेटे की इस ज़िद के आगे क्या ही बोलती। वैसे भी अंदर ही अंदर मेरे भीतर की औरत भी गोलू के सामने अपने उस सुडौल जिस्म को और आज़ादी से बेपर्दा करने के लिए मचल रही थी। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अच्छा बाबा ठीक है! अब आप दोनों बाप-बेटे के आगे मैं क्या बोलूँ। लेकिन यह तो बताओ कि जाना कब है? तैयारी करने के लिए मुझे भी कुछ समय तो चाहिए होगा ना?"

मेरे पति ने तुरंत खुश होकर फैसला सुनाया, "बस दो दिन बाद ही निकल जाते हैं! तुम फटाफट हम सबका सामान पैक करना शुरू कर लो, बाकी टिकट और होटल की बुकिंग का सारा काम मैं खुद देख लेता हूँ।"

छत पर गोवा जाने का वह रोमांचक और अचानक बना फैसला हमारे दिलों में एक अजीब सी हलचल छोड़ गया था। कुछ देर बाद जब हम तीनों छत की सीढ़ियों से नीचे आए, तो रात के डेढ़ बज चुके थे। घर में एक अजीब सा, मादक सन्नाटा पसरा हुआ था। गोलू गलियारे के अंधेरे में मुड़ा, और अपनी गहरी, कँपकँपाती आँखों से मुझे एक ऐसा नटखट और आदिम इशारा दिया जिसे देखकर मेरी योनि के भीतर कामुक रस का एक कतरा और रिस गया। उसने अपने होठों को हल्के से दबाया, जैसे वह कह रहा हो कि 'अब पापा के साथ आपका क्या हाल होगा, मैं देखूँगा।' वह मुस्कुराता हुआ अपने कमरे में सोने चला गया, और मैं और मेरे पति सीधे अपने बेडरूम की तरफ बढ़ गए।

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कमरे का दरवाज़ा बंद करके मैं जैसे ही कुंडी चढ़ाने के लिए पलटी, मेरे पति ने बिना एक सेकंड गंवाए पीछे से आकर मुझे अपनी बाहों के घेरे में कस लिया। उनके दोनों हाथ मेरी पतली कमर पर कस गए और उनका तपा हुआ सीना मेरी पीठ पर भींच गया। उन्होंने मुझे सोफे और बेड के बीच के उस संकरे रास्ते में रोकते हुए, मेरी नंगी गर्दन पर अपनी गर्म साँसें छोड़ीं और बड़े लाड़ से कहा, "रिधिमा... सच कहूँ तो गोवा में तुम्हें बिकिनी में देखने के लिए मैं बहुत ज़्यादा बेताब हूँ। तुम कल बाज़ार जाकर अपने लिए एक बहुत अच्छी, छोटी और खूबसूरत बिकिनी खरीद लाना। मुझे दफ्तर का कुछ ज़रूरी काम ख़त्म करना है, वरना मैं खुद तुम्हारे साथ शॉपिंग के लिए चलता।" उनकी आवाज़ में दफ्तर की थकान के बावजूद एक अजीब सा मर्दाना उतावलापन था।

उनकी यह बात सुनकर मेरे गाल लाज के मारे सुर्ख लाल हो गए। मैंने अपनी जगह पर घूमकर अपना सिर उनके चौड़े सीने पर टिका दिया, जहाँ उनकी धड़कनें तेज़ थीं। मैंने अपनी आँखें आधी मूँद लीं और उनके दिल के ऊपर अपनी उंगलियाँ घुमाते हुए बहुत ही नाज़ुक आवाज़ में कहा, "आप भी ना... क्या बहकी-बहकी बातें कह रहे हो? मैं वहाँ ऐसा-वैसा कुछ नहीं पहनने वाली। आप भूल रहे हैं क्या, हमारे साथ हमारा जवान बेटा गोलू भी होगा। वह अब बच्चा नहीं रहा, कॉलेज जाता है।" मेरे चेहरे पर शर्म और अंदरूनी घबराहट का मिला-जुला भाव था।


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मेरे पति ने अपनी उँगलियों से मेरे चेहरे पर बिखरे बालों को पीछे समेटा, मेरी ठोड़ी को उठाकर सीधे मेरी आँखों में देखा, उनके चेहरे पर एक गहरा लाड़ था। वह मुस्कुराए और हंसकर बोले, "तो क्या हुआ रिधिमा? तुम उसकी माँ ही हो, वो कोई पराया मर्द थोड़ी ना है जो तुम्हें बुरी नज़र से देखेगा। और वैसे भी गोवा के बीच पर कई लोग होंगे, तुम खामखां शर्माना बंद करो। वहाँ सब लोग अपनी फैमिली के साथ ही जाते हैं, यह कोई बड़ी बात नहीं है।"

अपने सीधे-साधे पति की यह भोली और नादान बात सुनकर मुझे अंदर ही अंदर एक ज़बर्दस्त झटका लगा। मेरा वजूद काँप उठा। अब मैं उन्हें कैसे समझाती कि जिस बेटे को वो नादान बच्चा समझ रहे हैं, उसकी माँ तो पहले ही उसका वो विशाल, लंबा, भयंकर मोटा और तपा हुआ लंड पूरी तरह अपनी योनि के भीतर तक महसूस कर चुकी है! और उस जवान लंड के ख्यालों मात्र से ही मेरी योनि से कामुक पानी निकल जाता है। मेरे चेहरे पर एक पल के लिए खौफ की लकीरें उभरीं, लेकिन मैंने उसे तुरंत छुपा लिया।

मैंने अपने इस गुप्त राज़ को दिल की गहराइयों में दफन किया और अपने पति की आँखों में आँखें डालकर, उनके गले में अपनी बाहें डालते हुए, एक शरारती और कातिलाना मुस्कान के साथ उन्हें थोड़ा छेड़ते हुए कहा, "अच्छा! आपको ज़रा भी बुरा नहीं लगेगा कि आपकी इतनी खूबसूरत, गोरी बीवी को दूसरे गैर मर्द बिकिनी में इस तरह नंगा देखेंगे और आँखें फाड़कर घूरेंगे?"

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मेरी यह बात सुनते ही मेरे पति के भीतर का मर्द जैसे एक झटके में जाग उठा। उनकी आँखों की पुतलियाँ फैल गईं, और उनमें मेरे जिस्म के लिए एक आदिम अधिकार और गहरी वासना आ गई। उन्होंने मेरी कमर को कसकर पकड़ा और एक झटके में बेड पर सीधा लेटा दिया। वो तुरंत मेरे ऊपर आ गए, उनका भारी बदन मुझ पर कस गया। वह मेरी नंगी गर्दन पर अपने गर्म होंठ टिकाते हुए गहरी, भारी और काँपती हुई आवाज़ में बोले, "हाँ... थोड़ा बुरा तो ज़रूर लगेगा, लेकिन इस बात का गर्व और घमंड भी होगा कि सबके सामने जो कातिलाना और खूबसूरत बीवी खड़ी है, वो सिर्फ और सिर्फ मेरी है।"

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यह कहते ही उन्होंने नीचे झुककर मेरे होठों को अपने होठों की गिरफ्त में ले लिया। उनका यह चुंबन रोज़ की तरह साधारण नहीं था; इसमें एक अजीब सी तड़प और भूख थी। उनकी ज़बान मेरे होठों को चीरती हुई अंदर समाने लगी। मैंने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, मेरा दम फूलने लगा था। मैंने थोड़ा हांफते हुए और नकली झिझक दिखाते हुए उन्हें पीछे धकेलने का नाटक किया, "चुप रखिए! आप आजकल काफी बिगड़ गए हैं। पहले ही ठीक थे—भोले-भाले, मासूम से। अब पता नहीं आप किसकी संगत में आ गए हो।"

"अरे! अब मैं अपनी ही बीवी से प्यार भी ना करूँ?" मेरे पति के चेहरे पर एक दीवानी और मदहोश मुस्कान थी। वह मेरे ब्लाउज की तरफ हाथ बढ़ाते हुए बोले, "इतनी खूबसूरत बीवी को मैंने इतने सालों तक ठीक से प्यार ही नहीं किया, और तुम कभी कुछ बोली भी नहीं। लेकिन अब मैं अपनी जान को दुनिया की हर खुशी दूँगा।"

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इतना कहते ही उनकी उँगलियाँ उतावली में मेरे कपड़ों पर हरकत करने लगीं। उन्होंने मेरी साड़ी को एक झटके में कमर से खींचा। उनके चेहरे पर इस वक्त केवल मुझे पूरी तरह से पा लेने की जिद थी। 'टिक... टिक...' की आवाज़ के साथ उन्होंने मेरे ब्लाउज के एक-एक बटन को खोल दिया। दोपहर को नहाने के बाद मैंने भीतर कुछ नहीं पहना था, इसलिए ब्लाउज के हटते ही मेरे दोनों गोरे, भारी और मोटे स्तन पूरी तरह बेपर्दा होकर कमरे की हवा में छलक आए। मेरे पति ने सम्मोहित होकर, आँखें फाड़कर मेरे उन भारी स्तनों को देखा। उनके चेहरे पर एक अचरज और असीम भूख थी। उन्होंने अपने दोनों हाथों में मेरे स्तनों को भींचा और उनके कड़े निप्पल्स को अपने मुँह में भरकर पागलों की तरह चूसने लगे।

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"उफ़्फ़... राजीव... आः... आराम से..." मेरे मुँह से एक तीखी सिसकारी निकली, और मेरी भौंहें दर्द और मज़े के मारे आपस में सिकुड़ गईं।

दीदी की कुछ देर पहले दी हुई उंगलियों की छुअन और अब पति के मुँह का यह तीखा खिंचाव... मेरी योनि के भीतर रस का सैलाब आ चुका था। मेरे पति ने बिना वक्त गंवाए, बेहद उतावली में मेरे पेटीकोट की नाड़ी को खोला और उसे पैरों के रास्ते बाहर निकालकर मुझे बिस्तर पर पूरी तरह नंगा कर दिया। वो खुद भी अपने सारे कपड़े उतारकर पूरी तरह नग्न हुए। उनके चेहरे पर इस वक्त वासना का पूरा नियंत्रण था। उन्होंने मेरे दोनों गोरे, चिकने पैरों को पकड़कर पूरा फैला दिया।

उन्होंने अपना लिंग मेरी योनि के मखमली, पूरी तरह से भीग चुके गीले रास्ते के मुँह पर टिकाया। उनका चेहरा इस वक्त उत्तेजना से तमतमा रहा था। और फिर, उन्होंने दाँत भींचते हुए एक गहरा, भारी और मर्दाना धक्का मारा। उनका पूरा लिंग मेरी योनि की तंग दीवारों को चीरता हुआ पूरा अंदर तक समा गया।

"उफ़्फ़अअ... आहाअअ... राजीव...!" मेरी आँखें झटके से खुल गईं और फिर तुरंत मूँद गईं। मेरे मुँह से एक बेहद मादक, गाढ़ी सिसकारी निकल गई, और मेरा पूरा चेहरा बेबसी और चरम उत्तेजना के मारे तन गया।

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वह बेड पर अपनी पोजीशन सँभालते हुए, अपनी आँखें बंद किए ज़ोर-ज़ोर से मर्दाना धक्के मारने लगे। उनके चेहरे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं और वह पूरी तरह अपनी धुन में खोए हुए थे। मैं आज अंदर से काफी खुश थी कि मेरे पति मुझे इतने सालों बाद इस कदर टूटकर चाह रहे हैं, इसलिए मैंने भी बिस्तर पर अपनी गोरी कमर उठा-उठाकर, उनके हर धक्के पर अपने कूल्हों को उनके साथ रगड़ते हुए उनका पूरा साथ दिया। मेरे चेहरे पर एक औरत की तृप्ति के भाव साफ तैर रहे थे।

जैसे-जैसे धक्कों की रफ्तार तेज़ हो रही थी, मेरे पति के चेहरे के हाव-भाव और उग्र हो रहे थे। वह मेरे स्तनों को अपनी उँगलियों से मरोड़ रहे थे और मेरे कानों के पास हांफते हुए, भारी आवाज़ में बोल रहे थे, "रिधिमा... तुम कितनी गरम हो... उफ़्फ़, आज मुझे पूरी तरह चूस लो... गोवा में तुम्हें नंगा देखने का नशा मुझे अभी से चढ़ रहा है।"

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मैंने अपनी आँखें आधी खोलकर उनके उस दीवाने चेहरे को देखा। मैंने अपनी पीठ को सोफे की तरह बेड से ऊपर उठाया, उनकी पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए और मदहोशी में बुदबुदाई, "हाँ... राजीव... और ज़ोर से... मैं सिर्फ आपकी हूँ..."

कमरे का सन्नाटा हमारे जिस्मों के टकराने की 'थप-थप' की गीली आवाज़ों और मेरी बेबाक, बेकाबू होती 'अहह... उफ़्फ़... ओ...ओ...' की रसीली सिसकारियों से पूरी तरह गूंज उठा। कुछ ही देर में वो चरम सीमा पर पहुँच गए, उनके चेहरे पर एक तीखा खिंचाव आया, उनका पूरा बदन लोहे की तरह अकड़ गया और एक बेहद गहरी, मर्दाना कराह के साथ उनका सारा गर्म, गाढ़ा पानी मेरी योनि की गहराइयों के भीतर पिचकारियों की तरह छूट गया। उस गरम पानी के भीतर गिरते ही मेरे बदन की भी आखिरी नस चटक गई, मेरा चेहरा ढीला पड़ गया और मैं भी पूरी तरह शांत हो गई।

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वीर्य निकलने के बाद, उनका चेहरा एकदम शांत और सुस्त हो गया। वह पूरी तरह बेजान हो गए और कुछ देर मेरे भारी, भीगे सीने पर ही अपना भारी सिर और अपने शरीर का पूरा भार रखकर लेटे रहे। उनके चेहरे पर एक मुकम्मल सुकून था। हम दोनों एक-दूसरे के नंगे, पसीने से लथपथ बदन को सहलाते हुए उसी मदहोशी में सो गए। मेरे पति के इस प्यार में कोई कमी नहीं थी, वो मुझे अपनी पूरी जान से तड़पकर चाह रहे थे।

लेकिन बिस्तर के उस घने, डरावने सन्नाटे में, जब वो मेरे सीने पर चैन की नींद सो रहे थे, मेरी योनि के भीतर मुझे बार-बार बस गोलू के उस सात इंच के तपे हुए लोहे जैसी भयंकर चौड़ाई, उसकी मोटाई, उसके चेहरे की वह मर्दाना और दीवानी आँखें, और उस रात होटल में उसके दिए हुए उस मीठे-मीठे जानलेवा गहरे दर्द की याद आ रही थी। मेरा वजूद आज भी अपने ही बेटे की उस तबाही मचाने वाली मर्दानगी के लिए अंदर ही अंदर बुरी तरह सुलग रहा था, और मेरी आँखें अंधेरे में खुली की खुली रह गईं।
 

Gorgeous Ridhimaa

रिद्धिमा ✨
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wonderful update & wonderful story
Thanks 💕
Kya isme aage chalkar kusum aur uski family ko bhi add Kiya jayega with golu family
Aap kya kehna chahte hain, main poori tarah samajh nahi paayi... thoda detail me batakar meri mushkil aasan kijiye na? ☺️ Kya dekhna hai aapko? 😉

Sach toh yeh hai ki maine aage ki kahani abhi tak sochi hi nahi hai. Aage ka safar kaisa hoga, yeh poori tarah aapki khwaahishon se bhare comments aur mere thode chanchal mood par nirbhar karta hai. Toh thoda sa saaf-saaf bataiye, taaki mere khayaalon ko ek nayi disha mile...💖
 
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