बहुत ही अद्भुत लेखन शैली है आपकी !राजकुमारी शुभदा की आंखों में ज्वालाएं धधक रही थी। कामग्नि तो थी पर साथ ही गुस्सा भी था।
राजकुमारी शुभदा, “पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, आप समझ गए थे कि हम निद्रा में नहीं थे। क्या एक पत्नी को पति के अलावा किसी पुरुष से संबंध बनाने चाहिए? या एक विधवा को सामाजिक स्थान के लिए पति की स्मृति को ऐसे दूषित करना चाहिए? हम निद्रा का छल करते और आप अपना कार्य, तो हम अपना मान रख सकते। अब… अब ऐसा नहीं होगा।”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “राजकुमारी शुभदा, आप क्षत्राणि हो! आप ने न केवल क्षात्र कुल में जन्म लिया है पर युद्धकाल में वीरता और आत्मत्याग का परिचय देते हुए इस कुल का गौरव पाया है। पर यही विशेषताएं अब आप को लज्जा या भय का सहारा लेकर अपने कर्तव्य को त्यागने से रोकती हैं।”
राजकुमारी शुभदा सोचते हुए, “कर्तव्य? कैसे?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री राजकुमारी शुभदा के बगल में लेटते हुए, “राज्य की स्थिरता और शांति राजवंश के अबाधित रहने से आती है और इसके प्रमाण आप को शास्त्रों में मिलते हैं।”
राजकुमारी शुभदा उत्सुकता से, “ऐसे… कार्य का वर्णन शास्त्रों में है?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा को अपने अंग से लगाया और वह पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने पर सर रखकर अपने नग्न अंग को उनकी गर्मी में सेंकती सुनने लगी।
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “महाभारत में भीष्म पितामह के भतीजे निसंतान मर गए तो वेद व्यास से नियोग कर राजा पांडु, राजा धृतराष्ट्र और विदुर का जन्म हुआ। नियोग में निसंतान स्त्री पति की इच्छा से या विधवा अपनी इच्छा से योग्य पुरुष को चुनकर उनसे पुत्र प्राप्ति कर लेती हैं। इस पुत्र को पति का ही नाम मिलता है और नियोग करता पुरुष उस संतान पर कोई अधिकार नहीं रखता।”
राजकुमारी शुभदा पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने के घुंघराले काले बालों में उंगलियां घुमाते हुए, “तो अब आप नियोग कार्य कीजिए। मैं तैयार हूं।”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री राजकुमारी शुभदा के माथे को चूमते हुए, “क्रिया बहुत उबाऊ और चिकित्सक होती हैं। और ऐसी परिस्थिति में कार्य उबाऊ हो तो फल मिलना अनिश्चित हो सकता है। क्यों ना हम इसे क्रीड़ा कहें?”
राजकुमारी शुभदा होंठ काटते हुए, “कैसी क्रीड़ा? हमें इस क्रीड़ा का कोई ज्ञान नहीं।”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “क्रीड़ा के नियम सरल हैं। इस कक्ष में हम समान हैं। आप का हमारे संपूर्ण शरीर पर अधिकार है पर हमारा भी आप के शरीर पर अधिकार है। जो व्यक्ति दूसरे को सर्वाधिक स्खलित करे वहीं इस क्रीड़ा का विजेता है।”
राजकुमारी शुभदा, “इस क्रीड़ा की शुरुआत हो गई है क्या? आप ने पहले ही हमें… कामोत्तेजित कर दिया है।”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “शुरुआत होगी ऐसे…”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के चेहरे को अपनी उंगली से ऊपर उठाया और राजकुमारी शुभदा के होठों पर अपने होंठ लगाए। राजकुमारी शुभदा पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से चिपककर हल्की आह भरते हुए पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के होठों पर अपने होंठ दबाने लगी।
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के होठों ने हिलते हुए थोड़ा खुलकर राजकुमारी शुभदा के होठों को पकड़कर चूमा और चूस लिया। राजकुमारी शुभदा को कामोत्तेजना बढ़ने का एहसास हुआ और वह पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का होंठ अपने होठों में पकड़ कर चूमा और चूसने लगी।
कुछ पल ऐसे ही चलते रहे जब पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने होठों के युद्ध में जीभ को बढ़ाया। राजकुमारी शुभदा सहज ज्ञान से जीभ को अपने मुंह में प्रवेश करता पाकर उसे चूसने लगी।
राजकुमारी शुभदा को समझ आया कि पंडित ज्ञानदीप शास्त्री अपनी जीभ को उसके मुंह में वैसे ही आगे पीछे कर रहे थे जैसे उनका लोह उस की यौन नलिका में गया था।
राजकुमारी शुभदा मोहित होकर अपने बदन को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से लिपटकर उनकी जीभ से अपने मुंह में रति क्रीड़ा करते हुए अनजाने में ही अपनी कमर को हिलाने लगी।
राजकुमारी शुभदा की मधु से भीगी यौन पंखुड़ियों ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के लोह पर जीभ की ताल पर हिलना शुरू किया। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अचानक राजकुमारी शुभदा को अपने सीने पर दबाते हुए राजकुमारी शुभदा के सर को अपने होठों पर दबाया और पीट पर लेट गए।
राजकुमारी शुभदा चीख पड़ी पर वह चीख पंडित ज्ञानदीप शास्त्री पी गए थे।
राजकुमारी शुभदा ने अपने आप को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के ऊपर पाया। उसके हाथ पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के हाथों में कैद फैले हुए थे जैसे उसके पैर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की कमर पर फैल कर घुटने शय्या पर लगे थे। उसके उभरे संवेदनशील स्तन पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने के बालों को महसूस कर रहे थे जब उसके यौन होंठ फैलकर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के उबलते लोहे पर लग कर उस पर अपने मधु का लेप लगा रहे थे।
राजकुमारी शुभदा शर्माकर चुपके से, “अब हम क्या करें?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “जो भी आप चाहो।”
राजकुमारी शुभदा, “पर हमें ज्ञात नहीं की सही क्या है!”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के हाथों को छोड़ते हुए, “इस क्रीड़ा में कुछ सही या गलत नहीं। केवल एक ध्येय, एक ही नियम। प्रतिस्पर्धी को सर्वाधिक आनंद देना।”
राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने पर हाथ रखे और खुद को उनके ऊपर ऐसे बिठाया जैसे वह किसी अश्व पर बैठी हो। किंतु जैसे ही वह पूरी तरह सीधे होने लगीं वह डर कर आगे झुक गई।
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के अजरस्त्र जलते भाले की नोक राजकुमारी शुभदा की गुदा में एक क्षण के लिए फंस गई थी। राजकुमारी शुभदा ने किसी तरह विवाहरात्रि के बाद अपने आप को समझाया था कि निसर्ग का नियम है कि उन्हें आपत्य पाने के लिए इस अजगर रूपी पौरुष को अपनी संकरी यौन गली में लेना होगा। राजकुमारी शुभदा ने अपने राजधर्म को स्मरण कर वह पीड़ा सहन करने का मन बना लिया था पर गुदा…
वह तो गंदा है। पर इस क्रीड़ा में केवल एक नियम है।
नहीं!!…
नियोग!!…
केवल आपत्य प्राप्ति!!
और वह होगी…
राजकुमारी शुभदा ने अपने अचानक सूखे पड़े गले को अपने सूखे मुंह में से गायब लार को निगलकर संभालने की नाकाम कोशिश की।
फिर राजकुमारी शुभदा ने घुटनों पर खड़े होकर अपने दोनों हथेलियों में से पकड़कर उस तपे हुए अजगर को पकड़ा। राजकुमारी शुभदा ने गहरी सांस ली और उस उछलते धड़कते अजगर के मुंह को अपने यौन फूल पर लाया। अजगर का मुंह दंश करने फूल की बाहरी फूली हुई पंखुड़ियों को फैलाकर अंदर आया।
अंदर की महीन पंखुड़ियां उस अजगर से डर कर सुख गईं और फैलने के बजाय उस विशाल चपटे मुंह पर दब गई। राजकुमारी शुभदा ने पीड़ा के लिए अपने आप को तैयार किया और गहरी सांस ली।
राजकुमारी शुभदा घुटिहुई चीख से, “दीप!!…”
दीप ने अचानक उठते हुए राजकुमारी शुभदा को आधे खड़े आधे बैठे हालत में आलिंगन में पकड़ लिया था। इस स्थिति में भरे हुए मोतीसे शुभ्र लज्जतदार बेरीयों वाले रसीले राजसी वक्ष दीप के होठों में पकड़े गए थे।
राजकुमारी शुभदा ने अपने सर को झुकाकर अपने होठों को दीप के सर पर दबाकर अपनी चीख को लगभग दबाया था जब दीप ने उसके चूची को ऐसे चूसा जैसे दिन भर से बिछड़ा बछड़ा गाय की चूची को क्रोध से चूसता है।
राजकुमारी शुभदा का बदन अचानक हुए हमले से चौंक कर ढीला पड़ गया। राजकुमारी शुभदा के स्तनों में से बनते चूसने से उसके बदन में यौन बिजली दौड़ कर हर अंग से जलने लगी।
राजकुमारी शुभदा गिड़गिड़ाकर रोते हुए, “दी…
आ…
आ…
ई…
प…!!
आह!!…”
दीप ने राजकुमारी शुभदा की चूचियों को चूसते हुए अपने सर को धीरे धीरे ऊपर नीचे किया तो राजकुमारी शुभदा ने उसके मुंह के साथ अपने स्तनों को रखते हुए अपने बदन को हिलाया।
एक युग या कुछ पलों तक स्तनों से पकड़ कर उसे अधर में रखने के बाद शुभा की नाभि के नीचे जैसे यौन उत्तेजना का बना गोला फट पड़ा और वह “दीप!!” की पुकार उसके सर पर दबाकर कांपते हुए ढीली पड़ गई।
दीप ने राजकुमारी शुभदा से कहा, “क्षमा करें शुभा पर मैं इस मोह से बच नहीं पाया।”
शुभा ने दीप के आलिंगन में समाते हुए उसके कंधे पर अपना माथा रखा और गहरी सांस ली। शुभा को अपने यौन होठों पर कुछ खुरतरा महसूस हुआ और वह अचानक पहचान गई कि वह दीप के यौन केश थे। दीप का अजरस्त्र अजगर उसकी तंग सुरंग में समाकर उसकी कोख के द्वार पर धड़क रहा था।
शुभा ने अपने प्रियकर की शरारतपूर्ण मदत को पहचानकर दीप के कंधे को हल्के से कांट लिया।
दीप ने शुभा के सर को पकड़कर उसकी आंखों में देखते हुए, “बहुत होशियार हो। ऐसे काटना कैसे सिखा?”
शुभा शर्माकर दीप के सीने में मुंह छुपाकर, “प्रथमरात्री आप ने ऐसे ही मुझे हर तरफ काटा था। (सीने पर हल्के से दांत लगाकर) मैंने तो बस शुरुआत की है।”
दीप ने पीछे शय्या पर गिरकर, “तो जो शेष है उसे पूर्ण कर लो!”
शुभा को अपनी गीली यौन नलिका में अपनी और अंदर से निचोडे जाते अजगर की धड़कने महसूस हो रही थी। एक देह में दो हृदयों के स्पंदन एक विलक्षण उत्तेजना निर्माण कर रहे थे।
शुभा ने प्रयोग की तरह अपनी कमर को ऐसे हिलाया जैसे अश्वारूढ़ होने पर अश्व के चलने से हिलती थी। दीप के होठों में से आह निकल गई और अजगर नलिका में बस छोटी उंगली की चौड़ाई जीतना घूम आया।
शुभा ने दुबारा अपनी कमर को हिलाकर दीप के चेहरे को देखते हुए अपने अंदर होती यौन पीड़ा को महसूस किया। हां, वह पीड़ा थी। शुभा के गुप्त अंग अपने आकार से कई गुना बड़े अस्त्र को पकड़े हुए थे पर इस पीड़ा में वह मजा आ रहा था कि उसका संपूर्ण अस्तित्व केवल वह नलिका और उसमें निचोड़ा जाता अजगर था।
शुभा ने अपनी कमर को हिलाकर दीप की आहों में अपनी आहें जोड़ते हुए निसर्ग के उस मूल तत्त्व को जाना जिसकी केवल सतह को उसने विवाहरात्रि को देखा था। शुभा की कमर का हिलना तेज होने लगा और उसकी कमर ज्यादा ऊपर उठकर नीचे होने लगी।
शुभा के दूधिया गोलों को दीप ने अपने हाथ उठाकर पकड़ा तो शुभा ने उसकी हथेलियों को अपनी हथेलियों में पकड़कर उन्हें दबाना शुरू किया।
शुभा अब न ही राजकुमारी थी और ना ही विधवा। वह अब केवल एक स्त्री थी जो अपने पुरुष को इस्तमाल कर अपनी उस भूख को शांत कर रही थी जिसका अस्तित्व भी उसे पांच रात्रि पहले तक पता नहीं था।
अर्ध घटिका तक दीप के अजगर को अपने मधु के कुंए में डूबो कर मारने के अथक परिश्रम के बाद दीप ने शय्या के ऊपर बिछे वस्त्र को मुट्ठियों में पकड़ कर तड़पते हुए पुकारा,
“शुभा…
आ…
आ…
हा…
हः…”
शुभा को अपनी कोख में पिघला लोह पसारता महसूस हुआ और वह थरथराते हुए गिर गई।
कुछ पल या दिनों के बाद राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने पर से सर उठाए बगैर,
“पुत्रप्राप्ति क्रिया पूर्ण हो गई?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री थक कर सांस छोड़ते हुए, “यदि यही आपकी इच्छा हो, तो हां!”
राजकुमारी शुभदा शर्माकर मुस्कुराकर चुपके से, “क्या पुत्रप्राप्ति की संभावना बढ़ाई जा सकती है?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से पहले उन दोनों को उत्तर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के अजगर ने दिया और दोनों हंस पड़े।
राजकुमारी शुभदा, “अपने राज्य की रक्षा और स्थिरता हेतु हम कोई भी पीड़ा सह लेंगी।”
राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री पर फिर से आरूढ़ होकर दौड़ तब तक लगाई जब तक दोनों थक कर अचेत हो नहीं गए। प्रातः से पूर्व पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का अजगर और फिर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री उठ गए।
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा को अपने अजगर को इस्तेमाल कर निद्रा में से उठाया और पुत्रप्राप्ति कार्य का प्रसाद गहराई में भर कर गुप्त मार्ग से लौट गए।
राजकुमारी शुभदा ने मुस्कुराकर अपनी आंखे बंद की और उनमें से अश्रु बह गए। पुत्रप्राप्ति हो या न हो राजकुमारी शुभदा को एक माह से अधिक पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को अपने संग रखना संभव नहीं था। राजसी मर्यादा के कारण राजकुमारी शुभदा को यौवन के दशकों में से केवल अर्ध माह ही मिलना था।
राजकुमारी शुभदा की आंखों में ज्वालाएं धधक रही थी। कामग्नि तो थी पर साथ ही गुस्सा भी था।
राजकुमारी शुभदा, “पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, आप समझ गए थे कि हम निद्रा में नहीं थे। क्या एक पत्नी को पति के अलावा किसी पुरुष से संबंध बनाने चाहिए? या एक विधवा को सामाजिक स्थान के लिए पति की स्मृति को ऐसे दूषित करना चाहिए? हम निद्रा का छल करते और आप अपना कार्य, तो हम अपना मान रख सकते। अब… अब ऐसा नहीं होगा।”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “राजकुमारी शुभदा, आप क्षत्राणि हो! आप ने न केवल क्षात्र कुल में जन्म लिया है पर युद्धकाल में वीरता और आत्मत्याग का परिचय देते हुए इस कुल का गौरव पाया है। पर यही विशेषताएं अब आप को लज्जा या भय का सहारा लेकर अपने कर्तव्य को त्यागने से रोकती हैं।”
राजकुमारी शुभदा सोचते हुए, “कर्तव्य? कैसे?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री राजकुमारी शुभदा के बगल में लेटते हुए, “राज्य की स्थिरता और शांति राजवंश के अबाधित रहने से आती है और इसके प्रमाण आप को शास्त्रों में मिलते हैं।”
राजकुमारी शुभदा उत्सुकता से, “ऐसे… कार्य का वर्णन शास्त्रों में है?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा को अपने अंग से लगाया और वह पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने पर सर रखकर अपने नग्न अंग को उनकी गर्मी में सेंकती सुनने लगी।
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “महाभारत में भीष्म पितामह के भतीजे निसंतान मर गए तो वेद व्यास से नियोग कर राजा पांडु, राजा धृतराष्ट्र और विदुर का जन्म हुआ। नियोग में निसंतान स्त्री पति की इच्छा से या विधवा अपनी इच्छा से योग्य पुरुष को चुनकर उनसे पुत्र प्राप्ति कर लेती हैं। इस पुत्र को पति का ही नाम मिलता है और नियोग करता पुरुष उस संतान पर कोई अधिकार नहीं रखता।”
राजकुमारी शुभदा पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने के घुंघराले काले बालों में उंगलियां घुमाते हुए, “तो अब आप नियोग कार्य कीजिए। मैं तैयार हूं।”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री राजकुमारी शुभदा के माथे को चूमते हुए, “क्रिया बहुत उबाऊ और चिकित्सक होती हैं। और ऐसी परिस्थिति में कार्य उबाऊ हो तो फल मिलना अनिश्चित हो सकता है। क्यों ना हम इसे क्रीड़ा कहें?”
राजकुमारी शुभदा होंठ काटते हुए, “कैसी क्रीड़ा? हमें इस क्रीड़ा का कोई ज्ञान नहीं।”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “क्रीड़ा के नियम सरल हैं। इस कक्ष में हम समान हैं। आप का हमारे संपूर्ण शरीर पर अधिकार है पर हमारा भी आप के शरीर पर अधिकार है। जो व्यक्ति दूसरे को सर्वाधिक स्खलित करे वहीं इस क्रीड़ा का विजेता है।”
राजकुमारी शुभदा, “इस क्रीड़ा की शुरुआत हो गई है क्या? आप ने पहले ही हमें… कामोत्तेजित कर दिया है।”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “शुरुआत होगी ऐसे…”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के चेहरे को अपनी उंगली से ऊपर उठाया और राजकुमारी शुभदा के होठों पर अपने होंठ लगाए। राजकुमारी शुभदा पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से चिपककर हल्की आह भरते हुए पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के होठों पर अपने होंठ दबाने लगी।
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के होठों ने हिलते हुए थोड़ा खुलकर राजकुमारी शुभदा के होठों को पकड़कर चूमा और चूस लिया। राजकुमारी शुभदा को कामोत्तेजना बढ़ने का एहसास हुआ और वह पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का होंठ अपने होठों में पकड़ कर चूमा और चूसने लगी।
कुछ पल ऐसे ही चलते रहे जब पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने होठों के युद्ध में जीभ को बढ़ाया। राजकुमारी शुभदा सहज ज्ञान से जीभ को अपने मुंह में प्रवेश करता पाकर उसे चूसने लगी।
राजकुमारी शुभदा को समझ आया कि पंडित ज्ञानदीप शास्त्री अपनी जीभ को उसके मुंह में वैसे ही आगे पीछे कर रहे थे जैसे उनका लोह उस की यौन नलिका में गया था।
राजकुमारी शुभदा मोहित होकर अपने बदन को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से लिपटकर उनकी जीभ से अपने मुंह में रति क्रीड़ा करते हुए अनजाने में ही अपनी कमर को हिलाने लगी।
राजकुमारी शुभदा की मधु से भीगी यौन पंखुड़ियों ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के लोह पर जीभ की ताल पर हिलना शुरू किया। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अचानक राजकुमारी शुभदा को अपने सीने पर दबाते हुए राजकुमारी शुभदा के सर को अपने होठों पर दबाया और पीट पर लेट गए।
राजकुमारी शुभदा चीख पड़ी पर वह चीख पंडित ज्ञानदीप शास्त्री पी गए थे।
राजकुमारी शुभदा ने अपने आप को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के ऊपर पाया। उसके हाथ पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के हाथों में कैद फैले हुए थे जैसे उसके पैर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की कमर पर फैल कर घुटने शय्या पर लगे थे। उसके उभरे संवेदनशील स्तन पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने के बालों को महसूस कर रहे थे जब उसके यौन होंठ फैलकर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के उबलते लोहे पर लग कर उस पर अपने मधु का लेप लगा रहे थे।
राजकुमारी शुभदा शर्माकर चुपके से, “अब हम क्या करें?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “जो भी आप चाहो।”
राजकुमारी शुभदा, “पर हमें ज्ञात नहीं की सही क्या है!”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के हाथों को छोड़ते हुए, “इस क्रीड़ा में कुछ सही या गलत नहीं। केवल एक ध्येय, एक ही नियम। प्रतिस्पर्धी को सर्वाधिक आनंद देना।”
राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने पर हाथ रखे और खुद को उनके ऊपर ऐसे बिठाया जैसे वह किसी अश्व पर बैठी हो। किंतु जैसे ही वह पूरी तरह सीधे होने लगीं वह डर कर आगे झुक गई।
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के अजरस्त्र जलते भाले की नोक राजकुमारी शुभदा की गुदा में एक क्षण के लिए फंस गई थी। राजकुमारी शुभदा ने किसी तरह विवाहरात्रि के बाद अपने आप को समझाया था कि निसर्ग का नियम है कि उन्हें आपत्य पाने के लिए इस अजगर रूपी पौरुष को अपनी संकरी यौन गली में लेना होगा। राजकुमारी शुभदा ने अपने राजधर्म को स्मरण कर वह पीड़ा सहन करने का मन बना लिया था पर गुदा…
वह तो गंदा है। पर इस क्रीड़ा में केवल एक नियम है।
नहीं!!…
नियोग!!…
केवल आपत्य प्राप्ति!!
और वह होगी…
राजकुमारी शुभदा ने अपने अचानक सूखे पड़े गले को अपने सूखे मुंह में से गायब लार को निगलकर संभालने की नाकाम कोशिश की।
फिर राजकुमारी शुभदा ने घुटनों पर खड़े होकर अपने दोनों हथेलियों में से पकड़कर उस तपे हुए अजगर को पकड़ा। राजकुमारी शुभदा ने गहरी सांस ली और उस उछलते धड़कते अजगर के मुंह को अपने यौन फूल पर लाया। अजगर का मुंह दंश करने फूल की बाहरी फूली हुई पंखुड़ियों को फैलाकर अंदर आया।
अंदर की महीन पंखुड़ियां उस अजगर से डर कर सुख गईं और फैलने के बजाय उस विशाल चपटे मुंह पर दब गई। राजकुमारी शुभदा ने पीड़ा के लिए अपने आप को तैयार किया और गहरी सांस ली।
राजकुमारी शुभदा घुटिहुई चीख से, “दीप!!…”
दीप ने अचानक उठते हुए राजकुमारी शुभदा को आधे खड़े आधे बैठे हालत में आलिंगन में पकड़ लिया था। इस स्थिति में भरे हुए मोतीसे शुभ्र लज्जतदार बेरीयों वाले रसीले राजसी वक्ष दीप के होठों में पकड़े गए थे।
राजकुमारी शुभदा ने अपने सर को झुकाकर अपने होठों को दीप के सर पर दबाकर अपनी चीख को लगभग दबाया था जब दीप ने उसके चूची को ऐसे चूसा जैसे दिन भर से बिछड़ा बछड़ा गाय की चूची को क्रोध से चूसता है।
राजकुमारी शुभदा का बदन अचानक हुए हमले से चौंक कर ढीला पड़ गया। राजकुमारी शुभदा के स्तनों में से बनते चूसने से उसके बदन में यौन बिजली दौड़ कर हर अंग से जलने लगी।
राजकुमारी शुभदा गिड़गिड़ाकर रोते हुए, “दी…
आ…
आ…
ई…
प…!!
आह!!…”
दीप ने राजकुमारी शुभदा की चूचियों को चूसते हुए अपने सर को धीरे धीरे ऊपर नीचे किया तो राजकुमारी शुभदा ने उसके मुंह के साथ अपने स्तनों को रखते हुए अपने बदन को हिलाया।
एक युग या कुछ पलों तक स्तनों से पकड़ कर उसे अधर में रखने के बाद शुभा की नाभि के नीचे जैसे यौन उत्तेजना का बना गोला फट पड़ा और वह “दीप!!” की पुकार उसके सर पर दबाकर कांपते हुए ढीली पड़ गई।
दीप ने राजकुमारी शुभदा से कहा, “क्षमा करें शुभा पर मैं इस मोह से बच नहीं पाया।”
शुभा ने दीप के आलिंगन में समाते हुए उसके कंधे पर अपना माथा रखा और गहरी सांस ली। शुभा को अपने यौन होठों पर कुछ खुरतरा महसूस हुआ और वह अचानक पहचान गई कि वह दीप के यौन केश थे। दीप का अजरस्त्र अजगर उसकी तंग सुरंग में समाकर उसकी कोख के द्वार पर धड़क रहा था।
शुभा ने अपने प्रियकर की शरारतपूर्ण मदत को पहचानकर दीप के कंधे को हल्के से कांट लिया।
दीप ने शुभा के सर को पकड़कर उसकी आंखों में देखते हुए, “बहुत होशियार हो। ऐसे काटना कैसे सिखा?”
शुभा शर्माकर दीप के सीने में मुंह छुपाकर, “प्रथमरात्री आप ने ऐसे ही मुझे हर तरफ काटा था। (सीने पर हल्के से दांत लगाकर) मैंने तो बस शुरुआत की है।”
दीप ने पीछे शय्या पर गिरकर, “तो जो शेष है उसे पूर्ण कर लो!”
शुभा को अपनी गीली यौन नलिका में अपनी और अंदर से निचोडे जाते अजगर की धड़कने महसूस हो रही थी। एक देह में दो हृदयों के स्पंदन एक विलक्षण उत्तेजना निर्माण कर रहे थे।
शुभा ने प्रयोग की तरह अपनी कमर को ऐसे हिलाया जैसे अश्वारूढ़ होने पर अश्व के चलने से हिलती थी। दीप के होठों में से आह निकल गई और अजगर नलिका में बस छोटी उंगली की चौड़ाई जीतना घूम आया।
शुभा ने दुबारा अपनी कमर को हिलाकर दीप के चेहरे को देखते हुए अपने अंदर होती यौन पीड़ा को महसूस किया। हां, वह पीड़ा थी। शुभा के गुप्त अंग अपने आकार से कई गुना बड़े अस्त्र को पकड़े हुए थे पर इस पीड़ा में वह मजा आ रहा था कि उसका संपूर्ण अस्तित्व केवल वह नलिका और उसमें निचोड़ा जाता अजगर था।
शुभा ने अपनी कमर को हिलाकर दीप की आहों में अपनी आहें जोड़ते हुए निसर्ग के उस मूल तत्त्व को जाना जिसकी केवल सतह को उसने विवाहरात्रि को देखा था। शुभा की कमर का हिलना तेज होने लगा और उसकी कमर ज्यादा ऊपर उठकर नीचे होने लगी।
शुभा के दूधिया गोलों को दीप ने अपने हाथ उठाकर पकड़ा तो शुभा ने उसकी हथेलियों को अपनी हथेलियों में पकड़कर उन्हें दबाना शुरू किया।
शुभा अब न ही राजकुमारी थी और ना ही विधवा। वह अब केवल एक स्त्री थी जो अपने पुरुष को इस्तमाल कर अपनी उस भूख को शांत कर रही थी जिसका अस्तित्व भी उसे पांच रात्रि पहले तक पता नहीं था।
अर्ध घटिका तक दीप के अजगर को अपने मधु के कुंए में डूबो कर मारने के अथक परिश्रम के बाद दीप ने शय्या के ऊपर बिछे वस्त्र को मुट्ठियों में पकड़ कर तड़पते हुए पुकारा,
“शुभा…
आ…
आ…
हा…
हः…”
शुभा को अपनी कोख में पिघला लोह पसारता महसूस हुआ और वह थरथराते हुए गिर गई।
कुछ पल या दिनों के बाद राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने पर से सर उठाए बगैर,
“पुत्रप्राप्ति क्रिया पूर्ण हो गई?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री थक कर सांस छोड़ते हुए, “यदि यही आपकी इच्छा हो, तो हां!”
राजकुमारी शुभदा शर्माकर मुस्कुराकर चुपके से, “क्या पुत्रप्राप्ति की संभावना बढ़ाई जा सकती है?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से पहले उन दोनों को उत्तर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के अजगर ने दिया और दोनों हंस पड़े।
राजकुमारी शुभदा, “अपने राज्य की रक्षा और स्थिरता हेतु हम कोई भी पीड़ा सह लेंगी।”
राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री पर फिर से आरूढ़ होकर दौड़ तब तक लगाई जब तक दोनों थक कर अचेत हो नहीं गए। प्रातः से पूर्व पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का अजगर और फिर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री उठ गए।
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा को अपने अजगर को इस्तेमाल कर निद्रा में से उठाया और पुत्रप्राप्ति कार्य का प्रसाद गहराई में भर कर गुप्त मार्ग से लौट गए।
राजकुमारी शुभदा ने मुस्कुराकर अपनी आंखे बंद की और उनमें से अश्रु बह गए। पुत्रप्राप्ति हो या न हो राजकुमारी शुभदा को एक माह से अधिक पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को अपने संग रखना संभव नहीं था। राजसी मर्यादा के कारण राजकुमारी शुभदा को यौवन के दशकों में से केवल अर्ध माह ही मिलना था।
Thank you for your reply and appreciation
Thank you for your reply and please give me your opinion about the storyबहुत ही अद्भुत लेखन शैली है आपकी !
Thank you for your late night replyExcellent update
राजकुमारी शुभदा ने आखिरकार जीवन का वास्तविक आनन्द ले लिया....और बहुत शानदार प्रदर्शन किया अपने प्रेम के सामने....
बहुत ही सुंदर लिखा है आपने. अगले भाग का इंतजार रहेगा...
प्रातः पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपनी कुटीर में से बाहर निकल कर नदी में स्नान किया और फिर मंदिर में पूजा कर राज सभा के लिए वस्त्र पहने।
कुटीर के बाहर अंगद को देख शांत चेहरे से, “आर्य, क्या राजकुमारी शुभदा ने मुझे बुलाया है?”
अंगद ने मना करते हुए पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को अपने साथ सैनिक शिक्षा केंद्र में कुछ दिखाने लाया। वहां तीरंदाजी के निशान से सौ गज दूर खड़े होकर अंगद ने धनुष उठाकर तीर लगाया।
अंगद गूढ़ चेहरे से, “पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, हम आपसे क्षमा मांगना चाहते हैं। चार वर्ष मैंने आपका सामर्थ्य गलत आंका। अब मैं आप को अपना सामर्थ्य दिखाना चाहता हूं।”
सौ गज पर भी बाण को लगातार सही निशाना लगाकर अंगद ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की आंखों में देखते हुए,
“बारह वर्ष का था जब मेरे पिता ने नवजात राजकुमारी शुभदा को मेरे हाथों में रखा। उस दिन से आज तक मैंने उनकी रक्षा में अपने प्राण लगाए हैं। यदि किसी ने उनको या उनके हृदय को चोट पहुंचाई तो…”
एक और बाण निशाने पर लगा तो पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को संपूर्ण संदेश मिल गया।
राज सभा में सभासद पैनी नजरों से राजकुमारी शुभदा को देख रहे थे जब वह कल रात्रि की क्रीड़ा के कारण कुछ धीमी गति से लेकिन राजसी मुद्रा में चलती सिंहासन की ओर बढ़ी।
वृद्ध सभासद, “रुक जाइए राजकुमारी शुभदा। आप अभी सिंहासन पर नहीं बैठ सकती। आप के पिता और पति के मृत्यु को केवल तीन दिन हुए हैं। आप को शुद्धिकरण के लिए तेरह दिन रुकना होगा। तब तक राज्य को चलाने के लिए आपके पिता के सबसे पुराने सभासदों के मंडल को नियुक्त करना चाहिए।”
राजकुमारी शुभदा मुड़कर सभा के सामने, “इस मंडल में कौन कौन होंगे और इस मंडल की कार्य सीमा क्या होगी?”
राजकुमारी शुभदा को अपनी बात मानते देख सभासद, “मंडल के मुख्य में सबसे ज्येष्ठ सभासद यानी मैं रहूंगा। बाकी के और चार पुराने सभासद होंगे। हम मिलकर राज्य की दैनंदिन को संभालेंगे। यदि आप गर्भवती रही तो आप को एक वर्ष के लिए विश्रांति की आवश्यकता होगी तब यही मंडल कार्य संभालेगा। और यदि आप गर्भवती नहीं रही तो मंडल को निर्णय लेना होगा कि आप कब उस दुख से बाहर निकलकर राज्य चलाने के योग्य होंगी। हम आप की सहायता करने हेतु एकत्र आए हैं पर आप भी मानेंगी की राज्य को एक रोती दुखी राजकुमारी नहीं पर एक सशक्त और स्थिर शासक की आवश्यकता है।”
राजकुमारी शुभदा, “सेनापति को इस मंडल में क्यों नहीं लिया जाता?”
सभासद, “क्षमा राजनंदिनी पर सभी लोग प्रथम दिन से समझ गए थे कि सेनापति अचलसेन की रणनीति अत्यंत दोषपूर्ण थी। उनके युवा बंधु पर राज्य की जिम्मेदारी का भार देना मतलब उसी परेशानी को वापस बुलाना।”
राजकुमारी शुभदा, “पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को मंडल में क्यों नहीं लिया जा सकता?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की ओर हीनता से देख कर सभासद, “राजा खड़गराज जानते थे कि यह हीन कुल की उत्पत्ति है। इसे विदूषक या नर्तक का कार्य योग्य है। कुछ गीत पठन कर शूद्र ब्राह्मण नहीं बनता और एक बार साहस दिखाने से शूद्र क्षत्रिय नहीं बनता।”
राजकुमारी शुभदा, “सभी सभासदों ने हमारे ज्येष्ठ सभासद की बातें सुन ली हैं तो सबसे पहले हम शुद्धिकरण के मुद्दे पर आते हैं। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, शास्त्र क्या कहते हैं?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “शास्त्र इस बात को बताते हैं कि घर में पिता या पति की मृत्यु पर स्त्री को तेरह दिन घर में रहना होगा। (सभासद विजयी हास्य देने लगे) किंतु राजा, या यहां राजकुमारी, को यह बंधन नहीं क्योंकि ईश्वर ने उन्हें पूर्ण राज्य की जिम्मेदारी दी है। आप दाहसंस्कार के बाद स्नान कर के शुद्धिकरण प्राप्त कर चुकी हो।”
मंडल के सभासद हक्काबक्का रह गए जब बाकी सभासद कतराते हुए मुस्कुराए।
राजकुमारी शुभदा, “बात रही हमारी योग्यता और आपकी योग्यता की तो, जब सब समझ चुके थे कि सेनापति अचलसेन की रणनीति अत्यंत दोषपूर्ण थी तो आप में से किसी ने भी उन्हें रोका क्यों नहीं? पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपनी बताई योजना को कार्यान्वित कर नृत्यशाला से युद्ध जीता! आप सब उस समय क्यों नहीं बोले?”
सभासद, “उस समय राजा खड़गराज ने सेनापति अचलसेन को स्वीकृत किया था।”
राजकुमारी शुभदा, “तो सभा का कार्य क्या है? राजा की हर बात को हां कहना या उन्हें योग्य मार्गदर्शन करना? क्योंकि पहला उत्तर गलत है और दूसरा आपने किया नहीं। ऐसे सभासद राज्य कैसे चलाएंगे?”
बाकी सारे सभासद आपस में बात करने लगे तो मंडल सभासद गुस्से से, “एक स्त्री, जो युवा है, विधवा है और संभवतः गर्भवती है, वह अस्थिर होती है। ऐसी स्त्री राज्य नहीं चला सकती। यदि राजवंश को युद्ध से पदच्युत किया गया तो आप और राजमाता की अति मानहानि होगी। हम तो आप को चुपके से दूर जाने का सरल मार्ग दे रहे हैं! यह नगर ऐसी स्त्री को शासक नहीं मानेगा जो वर्ण से भेद करते पिता की पुत्री हो, जो मूर्खता की परिसीमा लांघते सेनापति की पत्नी हो, संभवतः एक ऐसे बालक की माता हो जो कभी अपने पिता को न जाने और संपूर्ण समाज जानता है कि एक रात्रि की पत्नी को क्या कहते हैं।”
राज सभा में लोग आपस में बातें करने लगे जब सबकी आवाज को भेदते हुए राजकुमारी शुभदा की शांत आवाज सुनाई दी।
राजकुमारी शुभदा मुस्कुराकर, “तो बात अब पात्रता पर आई है। यह सत्य है कि मेरे पिता ने क्षत्रिय वर्ण को प्रधान्य दिया किंतु फिर भी उन्होंनेही सभी वर्ण के सभासद नियुक्त किए। क्या इस सभा में ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र वर्ण के सभासद नहीं हैं? यहां तो पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को भी राजा खड़गराज ने सभा का मान दिया जब वह दो भिन्न वर्ण के एकत्रित रूप हैं।”
मंडल के सभासद बस बुदबुदाते रह गए पर बाकी सभा अब एकाग्रता से अपनी राजकुमारी शुभदा को सुन रही थी।
राजकुमारी शुभदा, “विवाह की हमारी एक रात्रि के बाद हमें अपने पति संग मंदिर में जाना था पर इस अस्थिर रोती चंचल राजकुमारी ने अपने पति को उनका कर्तव्य पूर्ण करने राज सभा में भेजा और स्वयं मंदिर में अकेली गईं। दोपहर को जब हमें युद्ध की योजना के बारे में पता चला तब हम युद्धसभा में राजा खड़गराज और सेनापति अचलसेन को रोकने आईं थी पर हमें युद्धसभा से भेज दिया गया। आप, मंडल के सभासद वहां यह सब देख कर चुप रहे। जब राजा उग्रवीर के दूत आए तब किसी को मेरे शुद्धिकरण की याद नहीं आई? जब राजा उग्रवीर के दूत ने नागरिकों की सुरक्षा के लिए चर्चा की तो यही रोती चंचल राजकुमारी थी जिसने अपनी अप्रतिष्ठा के बदले नागरिकों की सुरक्षा का वचन लिया, तब मंडल को हमारी चंचलता या अस्थिरता दिखी नहीं? पूर्ण रात्रि को नगरकोट पर हमने युद्ध की तैयारी की तब मंडल को हम में स्त्री की दुर्बलता नहीं दिखी? प्रातः जब पूर्ण नगर को लगा कि राजा उग्रवीर अपने संपूर्ण सेना को लेकर यहां पहुंच गए हैं तब हमने नगर सुरक्षा हेतु दासत्व स्वीकार किया तब मंडल को हमारी कम आयु या कम अनुभव नहीं दिखा? हारे हुए युवराज को सम्मान से हमने लौटाकर उस राज्य में गृहयुद्ध छेड़ा तब मंडल को हमारी अल्पबुद्धि नहीं दिखी? (संपूर्ण सभा को संबोधित करते हुए) हे नगर के नागरिकों, हे राज्य के गण, यदि आप को लगता है कि हम सिंहासन के योग्य नहीं तो हमें अभी समाप्त कर दें पर हमें ऐसे मंडल के पिजड़े की हंसिनी ना बनाएं! हमें उत्तर दें या मृत्यु दें!!”
मंडल अध्यक्ष सभासद आवेश से चीखा, “पंडित की आकस्मिक वीरता को अपने नाम न लें राजनंदिनी! आप ने तो उन्हें अपने चाबुक से मरवाकर, अपमानित कर नगर से निष्कासित किया था!!”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ऊंचे स्वर में, “इसी को छद्मयुद्ध कहते हैं आर्य। चाबुक के इतने प्रहार होकर भी मेरी काया पर एक निशान नहीं क्योंकि वह चाबुक और चाबुक चलाता व्यक्ति दोनों को ज्ञात था कि यह सब छल था युवराज को दिखाने के लिए। मेरी योजना मैंने स्वयं उस रात्रि राजकुमारी शुभदा को बताई थी। यदि आप योजना और गोपनीयता का अर्थ नहीं समझते तो राजकुमारी शुभदा को दोष न दें!”
मंडल अध्यक्ष सभासद अपनी तलवार खींचते हुए, “वह एक स्त्री है!! राज्य का शासक राजा होता है न कि रानी!!”
सभासदों को समझ आने से पहले, मंडल अध्यक्ष सभासद की तलवार म्यान से बाहर निकलने से पहले मंडल अध्यक्ष सभासद के गले पर तीन तलवारें लगी हुई थीं। अंगद, पंडित ज्ञानदीप शास्त्री और सेनापति गरुड़वीर।
अंगद, “राजकुमारी जी, आज तक इस राज सभा में कभी रक्त नहीं बहा। आज्ञा दें तो शेष कार्य बाहर जाकर पूर्ण करूं।”
मंडल के सभी सभासदों को सैनिकोंने और बाकी सभासदों ने पकड़ लिया था। राजकुमारी शुभदा ने उन सब को सर्दिली आंखों से देखा।
राजकुमारी शुभदा, “मृत्यु ही राजद्रोह का परिणाम है पर इन सब को हम जीवित छोड़ेंगे। बदले में हम इन्हें अलग पीड़ा देंगे। इन्हें नगर पर राज्य करना था तो अब इनका पूर्ण नगर में वास होगा। हम, राजकुमारी शुभदा, घोषणा करते हैं कि आज और अभी से यह पांच लोग सभासद का सम्मान खो बैठे हैं। राज्य इनकी और इनके परिवार की संपूर्ण संपत्ति जप्त कर रही है। इन से या इनके परिवार से इस राज्य में कोई भी किसी भी तरह का लेनदेन नहीं कर सकता। अंत में इन पांच लोगोंको नगर त्यागने से रोक दिया जाता है!”
Thank you for your prompt reply and appreciationBahut hi gazab ki update he Lefty69 Bro
Rajkumar shubhda ne ab apna asli rajsi rup dikhaya...........
Unke sabhi kathan akatay the...........Dhurt sabhasad rajay par kabja karna chahte the...........
Lekin rajkumari ne badi samajhdari se unke mansubo par paani fer diya..........
Keep rocking Bro