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Romance पर्वतपुर का HERO

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sunoanuj

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पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा को अपना सम्पूर्ण सत्य बताया।


सोलह वर्ष पूर्व सेनापति अचलसेन के पिता, तत्कालीन सेनापति ने छोटे पवन दास के सामने उसके पिता को मारा। अपनी जीवनरक्षा हेतु छोटा पवन तब तक दौड़ता रहा जब तक वह किसी से टकराकर अचेत होकर गिर ना गया। वह व्यक्ति निष्कासित गुरु, राज ऋषि धीरानंद थे। राज ऋषि धीरानंद ने पवन को न केवल अपनी छत्रछाया में लिया पर उसे 21 कला एवं शास्त्रों में निपुण कर उसे ब्राह्मण बनाया। ज्ञान अर्जन करने पर राज ऋषि धीरानंद ने गुरुदक्षिणा स्वरूप पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से पर्वतपुर लौट कर राजकुमारी शुभदा की रक्षा का वचन लिया।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने पूर्व सेनापति से बचने के लिए अपनी पहचान नर्तक बताई और राजकुमारी शुभदा के निकट पहुंचने में कामयाब हुआ।


परंतु 4 वर्षों में वह राजकुमारी शुभदा से मोहित होकर उससे प्रेम करने लगा। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने आप को समझाया कि राजकुमारी शुभदा से विवाह कर वह सदैव के लिए उसका रक्षक बनकर रह सकता है। लेकिन स्वयंवर में हुए अपमान और निष्कासन के बाद उसने अपना पूर्ण लक्ष राजा उग्रवीर पर लाया।
राजकुमारी शुभदा के प्रति अपने आकर्षण को त्यागने उसने अपना घर राजकुमारी शुभदा को विवाह भेट स्वरूप दे दिया और स्वयं कुटीर में रहने को तैयार हो गया।



राजकुमारी शुभदा, “विवाहरात्रि का पेय एक समान नहीं था ना?”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा को बताया कि तीनों प्यालों में मिश्रण समान था पर प्रमाण अलग थे।

•राजकुमारी शुभदा के पेय में कामोद्दीपक और नींद की औषधि समान थी ताकि उन्हें इस रात्रि में आनंद आए और दर्द की याद ना रहे।

•सेनापति अचलसेन के बारे में गुप्त वार्ता व्यापारीयों से सुनी थी कि वह अनेक नगरों की वेश्याओं के संग संबंध रख चुके थे। उनका पौरुष अस्थिर था और स्खलन शीघ्र इस लिए उनके पेय में कामोद्दीपक औषधि दुगुनी थी और नींद की औषधि नाममात्र।

•पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को उस रात्रि राजकुमारी शुभदा को भुलाना था तो नींद की दवा दुगुनी थी और कामोद्दीपक औषधि नाममात्र।


राजकुमारी शुभदा, “लेकिन सेनापति अचलसेन ने आप से अपना प्याला बदल लिया और आप के प्याला रिक्त करने के बाद ही अपना प्याला होठों से लगाकर पिया।”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने बताया कि उसने अंगद और बाकी सुरक्षा पथक को लज्जा रक्षा हेतु दूर रखा और अपनी कुटीर पर भी पहरा लगवाया। यह सब राजकुमारी शुभदा की रक्षा हेतु था।


राजकुमारी शुभदा, “आप किसी को भी दिखे बगैर अंदर कैसे आए और वापस कैसे गए?”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “राजवंश के व्यक्ति का वास जिस घर में हो उस में गुप्त मार्ग होना अनिवार्य है। यह घर आपके लिए ही बनाया गया था इस लिए यहां भी एक भूमिगत मार्ग है जो स्नानगृह से मेरी कुटीर के अंदर आता है।”


राजकुमारी शुभदा ने चौंक कर देखा तो पंडित ज्ञानदीप शास्त्री मुस्कुराए।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने बताया कि वह मार्ग केवल राजकुमारी शुभदा को बताया जा सकता था और उस रात्रि सेनापति अचलसेन से राजकुमारी शुभदा को एकांत मिलना संभव नहीं था। परंतु सेनापति अचलसेन की क्रूरता के बारे में जान कर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री चुप नहीं रह पाए। उन्होंने गुप्त मार्ग से अंदर की स्थिति को जांचने के लिए प्रवेश किया तो सेनापति अचलसेन को स्नानगृह में अचेत पड़ा पाया। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने सेनापति अचलसेन के लिंग पर थोड़ा अश्व का रक्त लगाया और चूषक को लिंग से जोड़ दिया। वह शयनगृह में राजकुमारी शुभदा को सब बताने आए पर कामोत्तेजना से जलती मोहिनी से मोहित होकर प्रातः तक वहीं रुक गए। प्रातः जब कामोद्दीपक औषधि का ज्वर टूटा तब उसने स्नानगृह से सेनापति अचलसेन को शय्या तक लाया। पर लाख प्रयास करके भी उनका मन उन्हें सेनापति अचलसेन को राजकुमारी शुभदा के बगल में रखने से रोकता रहा। अंत में पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने सेनापति अचलसेन को राजकुमारी शुभदा की शय्या की दूसरी ओर नीचे ऐसे रखा जैसे पूर्ण रात्रि को रतिक्रिडा कर थका व्यक्ति शय्या से नीचे गिर गया हो।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने कौमार्यमर्दन से घायल राजकुमारी शुभदा को सेनापति अचलसेन की आंखों से छुपाने के लिए वस्त्र से ढक दिया। घर से अपने चिन्ह मिटाकर गुप्त मार्ग से लौट कर प्रातः स्नान संध्या करने गए।


राजकुमारी शुभदा ने अपने रुदन को दबाया पर उनकी सुडौल काया पत्ते की तरह हिल रही थी।


राजकुमारी शुभदा, “किंतु हम से ऐसा पाप हो गया है कि हम सिंहासन ही नहीं पर समाज के पात्र नहीं रहीं।”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “राजकुमारी, जो हुआ वह नियति थी। सेनापति अचलसेन ने अपने मन से प्याला बदला था। सेनापति अचलसेन ने आपको इस घर में रहने के लिए मनाया था। यह नियति के अलावा और कुछ नहीं। इस में किसी भी व्यक्ति का कोई दोष नहीं।”


राजकुमारी शुभदा तीव्रता से, “पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, आपको क्यों लगता है कि हम आप को दोषी नहीं मानते? घर आपका था, प्याले आपके, पेय आपका और… क्रीड़ा… भी आपकी!”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री मुस्कुराकर, “क्षमा करें राजकुमारी शुभदा पर क्रीड़ा में आपका समान सहभाग था और मेरे पास प्रमाण है आपकी क्षमा का!”


राजकुमारी शुभदा झल्लाकर, “कैसा प्रमाण? हमने आपको कोई क्षमा नहीं दी!”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “राजकुमारी जी के दो चाबुक हैं। काला चमड़े का और लाल रेशम का। चमड़ा आवाज और क्षति दोनों देता है पर रेशम? केवल ध्वनि! हमें नगर से भागने का आभास करना था तो आपने हमें निष्कासित कर सरल मार्ग बनाया।”


राजकुमारी शुभदा एक जामुन के पेड़ के नीचे बैठ गई तो पंडित ज्ञानदीप शास्त्री उसके पैरों में बैठ गया।


राजकुमारी शुभदा, “राजा खड़गराज ने न केवल गलत व्यक्ति को सेनापति बनाया पर योग्य योजना होते हुए भी गलत मार्ग अपनाया। नागरिकों का दुःख समाप्त होते ही वह राजवंश से विद्रोह करने लगेंगे। विद्रोह से राजवंश को मिटाने से बेहतर हम सती हो कर स्वयं राजवंश समाप्त कर दें।”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री चुपके से, “सही और गलत राजकुमारी शुभदा। राजा खड़गराज की आलोचना सही है पर उपाय गलत। अचानक राजवंश समाप्त हो गया तो वर्णव्यवस्था में बंटा हुआ नगर गृहयुद्ध में जलेगा। किंतु यदि आप राजवंश की अगली पीढ़ी को लाती हो तो इस आनंद में आपको समय मिलता है कुछ क्रांतिकारी करने का।”


राजकुमारी शुभदा, “कैसा क्रांतिकारी?”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा को अपने विचार बताए और दोनों ने संध्या तक बातें की। नगर द्वार सूर्य की अंतिम किरण के साथ बंद हुआ और पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा से राज महल लौटने की विनंती की।


राजकुमारी शुभदा मन ही मन मुस्कुराकर, “नहीं, हमें वही घर पसंद है जिस में हम राजकुमारी शुभदा नहीं है।”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा को हाथ जोड़कर नम्रता से प्रणाम किया और आज्ञा ले कर अपनी कुटीर में लौटे। कुटीर में अत्यंत सादगी थी। संध्या स्नान के बाद पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपनी कुटीर के एकमात्र बर्तन में खाना बनाने की शुरुवात की जब एक राज सेविका ने उन्हें पुकारा। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को देख उस सेविका ने उन्हें रात्रि भोजन बनाकर देने का प्रस्ताव दिया। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री विनम्रता से उसे मना करते पर उस से पहले नगर के एक समृद्ध व्यापारी की पत्नी अपनी बेटी के साथ उनके लिए रात्रि भोजन लेकर आई। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को चौंकने तक का समय नहीं मिला क्योंकि पीछे पीछे और कई परिवार अपनी बेटियों के हाथों बने रात्रि भोजन को लेकर आते दिखे।


सौभाग्यवश अंगद ने राजकुमारी शुभदा की रक्षा हेतु रखा पथक इस्तमाल किया और पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को कुछ दिन राजकुमारी शुभदा के स्वास्थ्य हेतु रात्रि भोजन राजकुमारी शुभदा के साथ करने की विनंती की।


नगर के नागरिक अपनी एक रात्रि में विधवा हुई राजकुमारी शुभदा से सहानुभूति रखते थे परंतु अनेक धूर्त लोगों को यह जानने के जल्दी थी कि राजकुमारी शुभदा गर्भ से है या नहीं।
राजकुमारी शुभदा अगर गर्भ से ना हो तो राजा खड़गराज ने क्षत्रियों को दी हुई सत्ता हटाकर या हथियाकर स्वयं राजा बनने का स्वप्न अनेक देख रहे थे। पर कुछ अति धूर्त थे जो पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से अपनी पुत्री का विवाह करा कर नगर के नायक को कठपुतली राजा बनाकर सिंहासन के पीछे से राज करना चाहते थे फिर वह सेवक हो या पुरोहित, दास हो या सामंत।



राजकुमारी शुभदा ने अपनी सेविका को भोजन परोसने को कहा जब पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने हाथ धोए। सेविका के जाने के बाद राजकुमारी शुभदा ने मुख्य मुद्दा उठाया।


राजकुमारी शुभदा, “पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, आपके लिए भोजन लाने वालों की संख्या लगभग उतनी ही है जितनी मेरे स्वास्थ्य के बारे में पूछने वालों की है। सेनापति अचलसेन की माता ने मुझे सांत्वना देते हुए गरुड़वीर से विवाह कर उनके वंश को पिता का साथ देने को कहा।”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने सर को हिलाकर हां कहा जैसे उन्हें यह अपेक्षित था।


राजकुमारी शुभदा, “पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, क्या मैं… कैसे अनुमान लगाएं कि… मेरे गर्भ में…”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री राजकुमारी शुभदा की दुविधा समझकर, “राजकुमारी, क्या है यह फल?”


राजकुमारी शुभदा चकराकर, “संतरा।”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “क्या मुझे यह गर्मी की दिनों में मिलेगा? नहीं। क्योंकि हर पीढ़ी को पोषक ऋतु की आवश्यकता होती है। अश्व और श्वान भी वर्ष के तय ऋतु में जन्म लेते हैं।”


राजकुमारी शुभदा की गुस्सैल आंखों को देख मुस्कुराकर, “स्त्री का भी ऋतु होता है। एक रक्तस्राव की शुरुवात से दूसरे तक २८ दिवस का काल होता है। विज्ञान अनुसार गर्भधारणा की सर्वोच्च संभावना बीच में होती है। दसवें दिन से उन्नीसवे दिन तक। क्या आप बता सकती हो कि विवाहरात्रि की रात्रि का क्रम क्या था?”


राजकुमारी शुभदा लज्जा और भय में पीसकर, “रक्तस्राव से छटा दिन। आज दसवां दिन है।”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री गंभीरता से, “छठे दिन गर्भधारणा की संभावना बेहद कम है।”


राजकुमारी शुभदा, “क्या सारे क्रांतिकारी विचार पंधरा दिन में नहीं हो सकते?”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “नहीं, जल्दबाजी सब बिगाड़ देगी।”


राजकुमारी शुभदा, “हम झूठ बोल सकते हैं कि मैं गर्भवती हूं। एक या दो महीनों बाद…”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री सर हिलाकर मना करते हुए, “साधारण स्त्री के लिए यह संभव है पर राजनंदिनी के लिए नहीं। खास कर इन परिस्थितियों में कोई न कोई सेवक या सेविका कुछ पहचान जाएगी।”


राजकुमारी शुभदा गहरी सांस लेकर, “तो हमारे पास एक ही मार्ग शेष है। (पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की ओर सख्ती से देखते हुए) आप आज से अगले पूर्ण सप्ताह मेरी शय्या में आकर वो… करेंगे। यह हमारी राज आज्ञा है।”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री हाथ जोड़कर उठते हुए, “जो आज्ञा राजकुमारी शुभदा।”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री जाने लगे तो राजकुमारी शुभदा घबराए ऊंचे स्वर में, “आप हमें त्याग रहे हैं?”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा से एक सांस के दूरी पर रुक कर चुपके से, “कदापि नहीं, किंतु मेरा यहां से जाते हुए देखा जाना आवश्यक है। मैं एक घटिका बाद गुप्त मार्ग से लौट आऊंगा।”


राजकुमारी शुभदा ने अपने सर को हिलाकर हां कहा तो पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने दरवाजा खोला और अंगद के समक्ष राजकुमारी शुभदा को शुभ रात्रि कह कर अपनी कुटीर में जा कर अपना दरवाजा बंद कर लिया।

बहुत ही बेहतरीन और शानदार अपडेट है
 
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एक घटिका बीत चुकी थी जब स्नानगृह की भूमि का एक पत्थर हिला। ज्ञानदीप शास्त्री ने वहां से बाहर आते ही उस पत्थर को अपनी योग्य जगह पर रखा और राजकुमारी शुभदा के शयनगृह की ओर बढ़ा। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने चुपके से अंदर झांक कर देखा तो पाया कि राजकुमारी शुभदा शय्या पर गहरी निद्रा में थीं। ज्ञानदीप शास्त्री ने नजदीक जाकर देखा तो राजकुमारी शुभदा के चेहरे पर कुछ तनाव था पर वह हल्के खर्राटे ले रही थी।


ज्ञानदीप शास्त्री मुस्कुराकर अपने आप से, “राजकुमारी ने खर्राटे पिछली बार तो नहीं लिए थे। कहीं उन्हें ज्वर तो नहीं हो रहा?”


ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के बगल में बैठते हुए उनके माथे को अपनी हथेली से सहलाया। राजकुमारी शुभदा के बदन ने हल्के से थरथराते हुए सांस छोड़ी और उनके खर्राटे रुक गए।


ज्ञानदीप शास्त्री को विश्वास हो गया की राजकुमारी शुभदा लज्जा कर निद्रा का नाटक कर रहीं थी। ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के गालों को अपने होठों से छू लिया और वह सिहर उठी।


होठों ने दूर होते ही राजकुमारी शुभदा का अंग कुछ उठ गया ताकि ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी दूर न हो। किंतु ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने होठों को हटाकर अब अपनी चालाक उंगलियों को युद्ध में उतारा।


उंगलियों ने राजकुमारी शुभदा की गर्दन पर होठों से छाती तक एक रेखा बनाई। राजकुमारी शुभदा की सांसे तेज होने लगी और उनके ऊपरी वस्त्र में से दो लुभावने बिंदु उभर आए।


ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के ऊपरी वस्त्र में से उभरे बिन्दुओं की अपनी उंगलियों से परिक्रमा करके अपनी उंगलियों को कसे हुए पेट की गहरी नाभि तक लाया। राजकुमारी शुभदा की पीठ हल्के से उठ गई पर उंगलियों ने नाभि की परिक्रमा कर नीचे की ओर बढ़ना जारी रखा।


उंगलियों ने धोती को छूते ही पैरों के जोड़ को अनछुआ छोड़ बाएं पैर पर से चलना शुरू किया। बायां पैर थोड़ा उठकर उंगलियों को नीचे उतरने से रोकने लगा पर उंगलियों ने घुटने से उतरकर पैरों की उंगलियों से मिलने तक चलना जारी रखा।
राजकुमारी शुभदा के होठों से निकली निराशा की ऊंह को आश्चर्य की आह से बदला गया जब बाएं पैर की उंगलियों को ज्ञानदीप शास्त्री की सांसों की गर्मी महसूस हुई।



ज्ञानदीप शास्त्री ने बचने की कोशिश करती राजकुमारी शुभदा के पैरों की उंगलियों को हल्के से चूमा फिर सबसे छोटी ऊंगली को अपने होठों में पकड़ कर चूमा।


राजकुमारी शुभदा की हथेलियों ने शय्या पर बिछे नए सूती वस्त्र को मुट्ठियों में भींच कर अपने होठों को कस कर दबाया। ज्ञानदीप शास्त्री की गरम सांसे राजकुमारी शुभदा के रोमांचित बदन को जलाते हुए ऊपर की ओर बढ़ी।


धोती के ऊपर से सांसों का एहसास कम हुआ तो होठों का दबाव महसूस होता रहा। लज्जा असहाय होने से राजकुमारी शुभदा बाईं ओर मूड कर सोती रही।


होठों ने कमर को छू कर जलाते हुए राजकुमारी शुभदा की पीठ की ओर मोर्चा बनाया। ऊपरी वस्त्र की पहली गांठ खुल गई तो राजकुमारी शुभदा अपनी आह को दबा नहीं पाईं पर उन्होंने अगली दो गांठें खुलते हुए अपने होठों को कस कर पकड़ते हुए अपने निद्रा में होने को बनाए रखा।


राजकुमारी शुभदा ने ज्ञानदीप शास्त्री को अपने कंधे पर से ऊपरी वस्त्र को सरकाते हुए महसूस किया जिस से उसकी सख्त बैरियों को रात्रि के शीतल पवन ने छेड़ा। राजकुमारी शुभदा ने अपने आप को आवाज करने से रोके रखा पर…


राजकुमारी शुभदा, “मां…”


ज्ञानदीप शास्त्री के दांतों ने राजकुमारी शुभदा के दाएं कंधे पर हल्की चोट पहुंचाते हुए राजकुमारी शुभदा की उत्तेजना को अनेक गुना बढ़ाया था। ज्ञानदीप शास्त्री को जैसे यह पता नहीं चला और वह सोती हुई राजकुमारी शुभदा का चीरहरण करते रहे। ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के ऊपरी वस्त्र को उनके बाएं हाथ में फंसा छोड़ दिया पर अपने हाथ को ऊपर उठाते हुए अपने खुर्तरे हाथ को शुभ्र मुलायम स्तनों पर रगड़ते हुए ले गए।


राजकुमारी शुभदा ने अनजाने में गहरी सांस लेकर अपने दूधिया गोलों को ज्ञानदीप शास्त्री के खुर्तरे हाथ पर लगाया पर वह हाथ रुके बगैर अपने मार्ग पर धीरे धीरे बढ़ता रहा।


राजकुमारी शुभदा को एहसास हुआ कि ज्ञानदीप शास्त्री उनके पीछे लेट गए थे और अब उनका खुरतरा हाथ राजकुमारी शुभदा के कसे हुए पेट पर से नाभि की ओर बढ़ रहा था। यदि ज्ञानदीप शास्त्री का हाथ ऐसे ही बढ़ता रहा तो वह राजकुमारी शुभदा की धोती की गांठ तक पहुंच जाएगा।


ज्ञानदीप शास्त्री के दाएं हाथ ने राजकुमारी शुभदा के सर को अपने ऊपर लेते हुए अपने सीने को राजकुमारी शुभदा की नग्न पीठ से सटा लिया। राजकुमारी शुभदा अपने आप को ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी में पिघलता महसूस कर रही थी जब उसकी धोती की गांठ खुलने लगी।


राजकुमारी शुभदा चुपके से, “आ…
अं…
अं…
ई…”


चोर की सावधानी से धोती को राजकुमारी शुभदा के बदन से चुराया गया। राजकुमारी शुभदा की कोमल जांघों को पीछे से ज्ञानदीप शास्त्री के पैरों के खुरतरी बाल महसूस हुए और वह अपने आप को उस गर्मी पर दबाने लगी।


अश्व के संचालन और नृत्य से सुडौल बने नितंब अंतर्वस्त्र छोड़ अब खुले में थे। ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी को महसूस करते राजकुमारी शुभदा के नितंबों को अंतर्वस्त्र के दोनों तरफ से धधकती ज्वाला की छड़ की ऊष्मा महसूस हुई।


राजकुमारी शुभदा प्रथम रात्रि की पीड़ा को याद कर दूर होने लगी तभी ज्ञानदीप शास्त्री की मजबूत हथेली ने उनकी दाहिनी जांघ को पकड़ कर अपने पैरों पर रख दिया।


राजकुमारी शुभदा की सांस गले में अटक गई पर ज्ञानदीप शास्त्री ने एक पल में उसके अंतर्वस्त्र को छुड़ा कर उड़ा दिया। राजकुमारी शुभदा अपनी आह को दबा नहीं पाई जब उसके यौन फूल की कोमल पंखुड़ियों पर एक जलता लोह का खंबा टकराया।


राजकुमारी शुभदा ने अपनी सांसे रोक ली ताकि जब लोह उसकी मधु को जलाए तब वह पीड़ा की चीख को राके रखे। परंतु ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने लोह को राजकुमारी शुभदा की मधु से गीली पंखुड़ियों से कसे हुए नितंबों में छुपे बंद गुदा तक घुमाना शुरू किया।


राजकुमारी शुभदा के अंदर भड़कती ज्वाला लोह पिघलाने को तैयार थी जब ज्ञानदीप शास्त्री की दाहिनी हथेली नाभि पर से सरकते हुए राजकुमारी शुभदा के यौन केशों पर से घूमती हुई प्यासी गीली पंखुड़ियों पर पहुंची। राजकुमारी शुभदा ने अपनी कमर को लोह पर रगड़ते हुए ज्ञानदीप शास्त्री के सीने और हथेली के बीच आगे पीछे होना शुरू किया।


राजकुमारी शुभदा को लोह से भय था क्योंकि इतना मोटा धधकता खंबा उसके फूल को जला कर रहेगा पर अंदर से बहता मधु उसी ज्वाला को अपने अंदर बुझाना चाहता था।


राजकुमारी शुभदा चौंक कर, “आह!!…”


ज्ञानदीप शास्त्री की विद्वान उंगलियों ने फूल की पंखुड़ियों के जोड़ में छुपे केंद्र बिंदु को अपने आवरण से निकाल कर प्रेम से छेड़ना शुरू किया। ज्ञानदीप शास्त्री का अंगूठा केंद्र को घुमाता और राजकुमारी शुभदा का बदन उसी बिंदु के साथ ज्ञानदीप शास्त्री के अंगूठे भर के इशारे पर नाचता झूमता और अपने आप को रगड़ता।


राजकुमारी शुभदा ने अपने होठों को अपनी आंखों की तरह कस कर बंद रखते हुए नींद में अपने आप को रखा पर…


राजकुमारी शुभदा, “दीप!!…”


दीप की लंबी उंगली अंगूठे के ताल पर नाचते हुए मधु की संकरी नलिका में गोता लगाने लगी थी।


दीप कान में, “हां, शुभा।”


शुभा, “दीप…”


दीप, “बोलो न शुभा।”


शुभा सिसकते हुए, “दीप…”


उंगली पर नलिका कस गई और यौन मधु की धारा से हथेली भीग गई। शुभा की कोमल काया झंझावत में फंसे पत्ते की तरह दीप के लोह, उंगली और अंगूठे पर कांपते हुए थरथराने लगी।


राजकुमारी शुभदा के होठोंसे निकली, “दीप!!…” की चीख ज्ञानदीप शास्त्री के होठों ने पी ली।


राजकुमारी शुभदा ने यौन संतुष्टि से अपनी थकी हुई आँखें खोली और पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को मुस्कुराकर देखता पाया।


ज्ञानदीप शास्त्री, “राजकुमारी जी, निद्रा उड़ गई हो तो पुत्र प्राप्ति क्रिया शुरू करें?”
 
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Thank you sunoanuj avsji for your continued conversation
I really love talking to interested readers
 
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एक घटिका बीत चुकी थी जब स्नानगृह की भूमि का एक पत्थर हिला। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने वहां से बाहर आते ही उस पत्थर को अपनी योग्य जगह पर रखा और राजकुमारी शुभदा के शयनगृह की ओर बढ़ा। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने चुपके से अंदर झांक कर देखा तो पाया कि राजकुमारी शुभदा शय्या पर गहरी निद्रा में थीं। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने नजदीक जाकर देखा तो राजकुमारी शुभदा के चेहरे पर कुछ तनाव था पर वह हल्के खर्राटे ले रही थी।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री मुस्कुराकर अपने आप से, “राजकुमारी ने खर्राटे पिछली बार तो नहीं लिए थे। कहीं उन्हें ज्वर तो नहीं हो रहा?”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के बगल में बैठते हुए उनके माथे को अपनी हथेली से सहलाया। राजकुमारी शुभदा के बदन ने हल्के से थरथराते हुए सांस छोड़ी और उनके खर्राटे रुक गए।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को विश्वास हो गया की राजकुमारी शुभदा लज्जा कर निद्रा का नाटक कर रहीं थी। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के गालों को अपने होठों से छू लिया और वह सिहर उठी।


होठों ने दूर होते ही राजकुमारी शुभदा का अंग कुछ उठ गया ताकि पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी दूर न हो। किंतु पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने होठों को हटाकर अब अपनी चालाक उंगलियों को युद्ध में उतारा।


उंगलियों ने राजकुमारी शुभदा की गर्दन पर होठों से छाती तक एक रेखा बनाई। राजकुमारी शुभदा की सांसे तेज होने लगी और उनके ऊपरी वस्त्र में से दो लुभावने बिंदु उभर आए।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के ऊपरी वस्त्र में से उभरे बिन्दुओं को अपनी उंगलियों से परिक्रमा करके अपनी उंगलियों को कसे हुए पेट की गहरी नाभि तक लाया। राजकुमारी शुभदा की पीठ हल्के से उठ गई पर उंगलियों ने नाभि की परिक्रमा कर नीचे की ओर बढ़ना जारी रखा।


उंगलियों ने धोती को छूते ही पैरों के जोड़ को अनछुआ छोड़ बाएं पैर पर से चलना शुरू किया। बायां पैर थोड़ा उठकर उंगलियों को नीचे उतरने से रोकने लगा पर उंगलियों ने घुटने से उतरकर पैरों की उंगलियों से मिलने तक चलना जारी रखा।
राजकुमारी शुभदा के होठों ने निकली निराशा की ऊंह को आश्चर्य की आह से बदला गया जब बाएं पैर की उंगलियों को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की सांसों की गर्मी महसूस हुई।



पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने बचने की कोशिश करती राजकुमारी शुभदा के पैरों की उंगलियों को हल्के से चूमा फिर सबसे छोटी ऊंगली को अपने होठों में पकड़ कर चूमा।


राजकुमारी शुभदा की हथेलियों ने शय्या पर बिछे नए सूती वस्त्र को मुट्ठियों में भींच कर अपने होठों को कस कर दबाया। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गरम सांसे राजकुमारी शुभदा के रोमांचित बदन को जलाते हुए ऊपर की ओर बढ़ी।


धोती के ऊपर से सांसों का एहसास कम हुआ तो होठों का दबाव महसूस होता रहा। लज्जा असहाय होने से राजकुमारी शुभदा बाईं ओर मूड कर सोती रही।


होठों ने कमर को छू कर जलाते हुए राजकुमारी शुभदा की पीठ की ओर मोर्चा बनाया। ऊपरी वस्त्र की पहली गांठ खुल गई तो राजकुमारी शुभदा अपनी आह को दबा नहीं पाईं पर उन्होंने अगली दो गांठें खुलते हुए अपने होठों को कस कर पकड़ते हुए अपने निद्रा में होने को बनाए रखा।


राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को अपने कंधे पर से ऊपरी वस्त्र को सरकाते हुए महसूस किया जिस से उसकी सख्त बैरियों को रात्रि के शीतल पवन ने छेड़ा। राजकुमारी शुभदा ने अपने आप को आवाज करने से रोके रखा पर…


राजकुमारी शुभदा, “मां…”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के दांतों ने राजकुमारी शुभदा के दाएं कंधे पर हल्की चोट पहुंचाते हुए राजकुमारी शुभदा की उत्तेजना को अनेक गुना बढ़ाया था। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को जैसे यह पता नहीं चला और वह सोती हुई राजकुमारी शुभदा का चीरहरण करते रहे। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के ऊपरी वस्त्र को उनके बाएं हाथ में फंसा छोड़ दिया पर अपने हाथ को ऊपर उठाते हुए अपने खुर्तरे हाथ को शुभ्र मुलायम स्तनों पर रगड़ते हुए ले गए।


राजकुमारी शुभदा ने अनजाने में गहरी सांस लेकर अपने दूधिया गोलों को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के खुर्तरे हाथ पर लगाया पर वह हाथ रुके बगैर अपने मार्ग पर धीरे धीरे बढ़ता रहा।


राजकुमारी शुभदा को एहसास हुआ कि पंडित ज्ञानदीप शास्त्री उनके पीछे लेट गए थे और अब उनका खुरतरा हाथ राजकुमारी शुभदा के कसे हुए पेट पर से नाभि की ओर बढ़ रहा था। यदि पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का हाथ ऐसे ही बढ़ता रहा तो वह राजकुमारी शुभदा की धोती की गांठ तक पहुंच जाएगा।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के दाएं हाथ ने राजकुमारी शुभदा के सर को अपने ऊपर लेते हुए अपने सीने को राजकुमारी शुभदा की नग्न पीठ से सटा लिया। राजकुमारी शुभदा अपने आप को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी में पिघलता महसूस कर रही थी जब उसकी धोती की गांठ खुलने लगी।


राजकुमारी शुभदा चुपके से, “आ…
अं…
अं…
ई…”


चोर की सावधानी से धोती को राजकुमारी शुभदा के बदन से चुराया गया। राजकुमारी शुभदा की कोमल जांघों को पीछे से पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के पैरों के खुरतरी बाल महसूस हुए और वह अपने आप को उस गर्मी पर दबाने लगी।


अश्व के संचालन और नृत्य से सुडौल बने नितंब अंतर्वस्त्र छोड़ अब खुले में थे। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी को महसूस करते राजकुमारी शुभदा के नितंबों को अंतर्वस्त्र के दोनों तरफ से धधकती ज्वाला की छड़ की ऊष्मा महसूस हुई।


राजकुमारी शुभदा प्रथम रात्रि की पीड़ा को याद कर दूर होने लगी तभी पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की मजबूत हथेली ने उनकी दाहिनी जांघ को पकड़ कर अपने पैरों पर रख दिया।


राजकुमारी शुभदा की सांस गले में अटक गई पर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने एक पल में उसके अंतर्वस्त्र को छुड़ा कर उड़ा दिया। राजकुमारी शुभदा अपनी आह को दबा नहीं पाई जब उसके यौन फूल की कोमल पंखुड़ियों पर एक जलता लोह का खंबा टकराया।


राजकुमारी शुभदा ने अपनी सांसे रोक ली ताकि जब लोह उसकी मधु को जलाए तब वह पीड़ा की चीख को राके रखे। परंतु पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने लोह को राजकुमारी शुभदा की मधु से गीली पंखुड़ियों से कसे हुए नितंबों में छुपे बंद गुदा तक घुमाना शुरू किया।


राजकुमारी शुभदा के अंदर भड़कती ज्वाला लोह पिघलाने को तैयार थी जब पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की दाहिनी हथेली नाभि पर से सरकते हुए राजकुमारी शुभदा के यौन केशों पर से घूमती हुई प्यासी गीली पंखुड़ियों पर पहुंची। राजकुमारी शुभदा ने अपनी कमर को लोह पर रगड़ते हुए पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने और हथेली के बीच आगे पीछे होना शुरू किया।


राजकुमारी शुभदा को लोह से भय था क्योंकि इतना मोटा धधकता खंबा उसके फूल को जला कर रहेगा पर अंदर से बहता मधु उसी ज्वाला को अपने अंदर बुझाना चाहता था।


राजकुमारी शुभदा चौंक कर, “आह!!…”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की विद्वान उंगलियों ने फूल की पंखुड़ियों के जोड़ में छुपे केंद्र बिंदु को अपने आवरण से निकाल कर प्रेम से छेड़ना शुरू किया। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का अंगूठा केंद्र को घुमाता और राजकुमारी शुभदा का बदन उसी बिंदु के साथ पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के अंगूठे भर के इशारे पर नाचता झूमता और अपने आप को रगड़ता।


राजकुमारी शुभदा ने अपने होठों को अपनी आंखों की तरह कस कर बंद रखते हुए नींद में अपने आप को रखा पर…


राजकुमारी शुभदा, “दीप!!…”


दीप की लंबी उंगली अंगूठे के ताल पर नाचते हुए मधु की संकरी नलिका में गोता लगाने लगी थी।


दीप कान में, “हां, शुभा।”


शुभा, “दीप…”


दीप, “बोलो न शुभा।”


शुभा सिसकते हुए, “दीप…”


उंगली पर नलिका कस गई और यौन मधु की धारा से हथेली भीग गई। शुभा की कोमल काया झंझावत में फंसे पत्ते की तरह दीप के लोह, उंगली और अंगूठे पर कांपते हुए थरथराने लगी।


राजकुमारी शुभदा के होठोंसे निकली, “दीप!!…” की चीख पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के होठों ने पी ली।


राजकुमारी शुभदा ने यौन संतुष्टि से अपनी थकी हुई आँखें खोली और पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को मुस्कुराकर देखता पाया।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “राजकुमारी जी, निद्रा उड़ गई हो तो पुत्र प्राप्ति क्रिया शुरू करें?”
Bahut hi sundar likh rahe hai or lekhan shayli bhi bahut hi umda hai ….

👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
 
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RagVi Singh welcome to the story

Please let me know what you think about the story
 

Ajju Landwalia

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एक घटिका बीत चुकी थी जब स्नानगृह की भूमि का एक पत्थर हिला। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने वहां से बाहर आते ही उस पत्थर को अपनी योग्य जगह पर रखा और राजकुमारी शुभदा के शयनगृह की ओर बढ़ा। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने चुपके से अंदर झांक कर देखा तो पाया कि राजकुमारी शुभदा शय्या पर गहरी निद्रा में थीं। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने नजदीक जाकर देखा तो राजकुमारी शुभदा के चेहरे पर कुछ तनाव था पर वह हल्के खर्राटे ले रही थी।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री मुस्कुराकर अपने आप से, “राजकुमारी ने खर्राटे पिछली बार तो नहीं लिए थे। कहीं उन्हें ज्वर तो नहीं हो रहा?”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के बगल में बैठते हुए उनके माथे को अपनी हथेली से सहलाया। राजकुमारी शुभदा के बदन ने हल्के से थरथराते हुए सांस छोड़ी और उनके खर्राटे रुक गए।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को विश्वास हो गया की राजकुमारी शुभदा लज्जा कर निद्रा का नाटक कर रहीं थी। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के गालों को अपने होठों से छू लिया और वह सिहर उठी।


होठों ने दूर होते ही राजकुमारी शुभदा का अंग कुछ उठ गया ताकि पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी दूर न हो। किंतु पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने होठों को हटाकर अब अपनी चालाक उंगलियों को युद्ध में उतारा।


उंगलियों ने राजकुमारी शुभदा की गर्दन पर होठों से छाती तक एक रेखा बनाई। राजकुमारी शुभदा की सांसे तेज होने लगी और उनके ऊपरी वस्त्र में से दो लुभावने बिंदु उभर आए।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के ऊपरी वस्त्र में से उभरे बिन्दुओं को अपनी उंगलियों से परिक्रमा करके अपनी उंगलियों को कसे हुए पेट की गहरी नाभि तक लाया। राजकुमारी शुभदा की पीठ हल्के से उठ गई पर उंगलियों ने नाभि की परिक्रमा कर नीचे की ओर बढ़ना जारी रखा।


उंगलियों ने धोती को छूते ही पैरों के जोड़ को अनछुआ छोड़ बाएं पैर पर से चलना शुरू किया। बायां पैर थोड़ा उठकर उंगलियों को नीचे उतरने से रोकने लगा पर उंगलियों ने घुटने से उतरकर पैरों की उंगलियों से मिलने तक चलना जारी रखा।
राजकुमारी शुभदा के होठों ने निकली निराशा की ऊंह को आश्चर्य की आह से बदला गया जब बाएं पैर की उंगलियों को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की सांसों की गर्मी महसूस हुई।



पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने बचने की कोशिश करती राजकुमारी शुभदा के पैरों की उंगलियों को हल्के से चूमा फिर सबसे छोटी ऊंगली को अपने होठों में पकड़ कर चूमा।


राजकुमारी शुभदा की हथेलियों ने शय्या पर बिछे नए सूती वस्त्र को मुट्ठियों में भींच कर अपने होठों को कस कर दबाया। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गरम सांसे राजकुमारी शुभदा के रोमांचित बदन को जलाते हुए ऊपर की ओर बढ़ी।


धोती के ऊपर से सांसों का एहसास कम हुआ तो होठों का दबाव महसूस होता रहा। लज्जा असहाय होने से राजकुमारी शुभदा बाईं ओर मूड कर सोती रही।


होठों ने कमर को छू कर जलाते हुए राजकुमारी शुभदा की पीठ की ओर मोर्चा बनाया। ऊपरी वस्त्र की पहली गांठ खुल गई तो राजकुमारी शुभदा अपनी आह को दबा नहीं पाईं पर उन्होंने अगली दो गांठें खुलते हुए अपने होठों को कस कर पकड़ते हुए अपने निद्रा में होने को बनाए रखा।


राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को अपने कंधे पर से ऊपरी वस्त्र को सरकाते हुए महसूस किया जिस से उसकी सख्त बैरियों को रात्रि के शीतल पवन ने छेड़ा। राजकुमारी शुभदा ने अपने आप को आवाज करने से रोके रखा पर…


राजकुमारी शुभदा, “मां…”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के दांतों ने राजकुमारी शुभदा के दाएं कंधे पर हल्की चोट पहुंचाते हुए राजकुमारी शुभदा की उत्तेजना को अनेक गुना बढ़ाया था। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को जैसे यह पता नहीं चला और वह सोती हुई राजकुमारी शुभदा का चीरहरण करते रहे। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के ऊपरी वस्त्र को उनके बाएं हाथ में फंसा छोड़ दिया पर अपने हाथ को ऊपर उठाते हुए अपने खुर्तरे हाथ को शुभ्र मुलायम स्तनों पर रगड़ते हुए ले गए।


राजकुमारी शुभदा ने अनजाने में गहरी सांस लेकर अपने दूधिया गोलों को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के खुर्तरे हाथ पर लगाया पर वह हाथ रुके बगैर अपने मार्ग पर धीरे धीरे बढ़ता रहा।


राजकुमारी शुभदा को एहसास हुआ कि पंडित ज्ञानदीप शास्त्री उनके पीछे लेट गए थे और अब उनका खुरतरा हाथ राजकुमारी शुभदा के कसे हुए पेट पर से नाभि की ओर बढ़ रहा था। यदि पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का हाथ ऐसे ही बढ़ता रहा तो वह राजकुमारी शुभदा की धोती की गांठ तक पहुंच जाएगा।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के दाएं हाथ ने राजकुमारी शुभदा के सर को अपने ऊपर लेते हुए अपने सीने को राजकुमारी शुभदा की नग्न पीठ से सटा लिया। राजकुमारी शुभदा अपने आप को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी में पिघलता महसूस कर रही थी जब उसकी धोती की गांठ खुलने लगी।


राजकुमारी शुभदा चुपके से, “आ…
अं…
अं…
ई…”


चोर की सावधानी से धोती को राजकुमारी शुभदा के बदन से चुराया गया। राजकुमारी शुभदा की कोमल जांघों को पीछे से पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के पैरों के खुरतरी बाल महसूस हुए और वह अपने आप को उस गर्मी पर दबाने लगी।


अश्व के संचालन और नृत्य से सुडौल बने नितंब अंतर्वस्त्र छोड़ अब खुले में थे। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी को महसूस करते राजकुमारी शुभदा के नितंबों को अंतर्वस्त्र के दोनों तरफ से धधकती ज्वाला की छड़ की ऊष्मा महसूस हुई।


राजकुमारी शुभदा प्रथम रात्रि की पीड़ा को याद कर दूर होने लगी तभी पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की मजबूत हथेली ने उनकी दाहिनी जांघ को पकड़ कर अपने पैरों पर रख दिया।


राजकुमारी शुभदा की सांस गले में अटक गई पर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने एक पल में उसके अंतर्वस्त्र को छुड़ा कर उड़ा दिया। राजकुमारी शुभदा अपनी आह को दबा नहीं पाई जब उसके यौन फूल की कोमल पंखुड़ियों पर एक जलता लोह का खंबा टकराया।


राजकुमारी शुभदा ने अपनी सांसे रोक ली ताकि जब लोह उसकी मधु को जलाए तब वह पीड़ा की चीख को राके रखे। परंतु पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने लोह को राजकुमारी शुभदा की मधु से गीली पंखुड़ियों से कसे हुए नितंबों में छुपे बंद गुदा तक घुमाना शुरू किया।


राजकुमारी शुभदा के अंदर भड़कती ज्वाला लोह पिघलाने को तैयार थी जब पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की दाहिनी हथेली नाभि पर से सरकते हुए राजकुमारी शुभदा के यौन केशों पर से घूमती हुई प्यासी गीली पंखुड़ियों पर पहुंची। राजकुमारी शुभदा ने अपनी कमर को लोह पर रगड़ते हुए पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने और हथेली के बीच आगे पीछे होना शुरू किया।


राजकुमारी शुभदा को लोह से भय था क्योंकि इतना मोटा धधकता खंबा उसके फूल को जला कर रहेगा पर अंदर से बहता मधु उसी ज्वाला को अपने अंदर बुझाना चाहता था।


राजकुमारी शुभदा चौंक कर, “आह!!…”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की विद्वान उंगलियों ने फूल की पंखुड़ियों के जोड़ में छुपे केंद्र बिंदु को अपने आवरण से निकाल कर प्रेम से छेड़ना शुरू किया। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का अंगूठा केंद्र को घुमाता और राजकुमारी शुभदा का बदन उसी बिंदु के साथ पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के अंगूठे भर के इशारे पर नाचता झूमता और अपने आप को रगड़ता।


राजकुमारी शुभदा ने अपने होठों को अपनी आंखों की तरह कस कर बंद रखते हुए नींद में अपने आप को रखा पर…


राजकुमारी शुभदा, “दीप!!…”


दीप की लंबी उंगली अंगूठे के ताल पर नाचते हुए मधु की संकरी नलिका में गोता लगाने लगी थी।


दीप कान में, “हां, शुभा।”


शुभा, “दीप…”


दीप, “बोलो न शुभा।”


शुभा सिसकते हुए, “दीप…”


उंगली पर नलिका कस गई और यौन मधु की धारा से हथेली भीग गई। शुभा की कोमल काया झंझावत में फंसे पत्ते की तरह दीप के लोह, उंगली और अंगूठे पर कांपते हुए थरथराने लगी।


राजकुमारी शुभदा के होठोंसे निकली, “दीप!!…” की चीख पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के होठों ने पी ली।


राजकुमारी शुभदा ने यौन संतुष्टि से अपनी थकी हुई आँखें खोली और पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को मुस्कुराकर देखता पाया।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “राजकुमारी जी, निद्रा उड़ गई हो तो पुत्र प्राप्ति क्रिया शुरू करें?”

Bahut hi adhbhud update he Lefty69 Bro

Kitne sunder shabdo ka pryog kiya he aapne........

Gazab Bro...............Keep posting
 

Luckyloda

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एक घटिका बीत चुकी थी जब स्नानगृह की भूमि का एक पत्थर हिला। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने वहां से बाहर आते ही उस पत्थर को अपनी योग्य जगह पर रखा और राजकुमारी शुभदा के शयनगृह की ओर बढ़ा। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने चुपके से अंदर झांक कर देखा तो पाया कि राजकुमारी शुभदा शय्या पर गहरी निद्रा में थीं। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने नजदीक जाकर देखा तो राजकुमारी शुभदा के चेहरे पर कुछ तनाव था पर वह हल्के खर्राटे ले रही थी।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री मुस्कुराकर अपने आप से, “राजकुमारी ने खर्राटे पिछली बार तो नहीं लिए थे। कहीं उन्हें ज्वर तो नहीं हो रहा?”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के बगल में बैठते हुए उनके माथे को अपनी हथेली से सहलाया। राजकुमारी शुभदा के बदन ने हल्के से थरथराते हुए सांस छोड़ी और उनके खर्राटे रुक गए।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को विश्वास हो गया की राजकुमारी शुभदा लज्जा कर निद्रा का नाटक कर रहीं थी। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के गालों को अपने होठों से छू लिया और वह सिहर उठी।


होठों ने दूर होते ही राजकुमारी शुभदा का अंग कुछ उठ गया ताकि पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी दूर न हो। किंतु पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने होठों को हटाकर अब अपनी चालाक उंगलियों को युद्ध में उतारा।


उंगलियों ने राजकुमारी शुभदा की गर्दन पर होठों से छाती तक एक रेखा बनाई। राजकुमारी शुभदा की सांसे तेज होने लगी और उनके ऊपरी वस्त्र में से दो लुभावने बिंदु उभर आए।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के ऊपरी वस्त्र में से उभरे बिन्दुओं को अपनी उंगलियों से परिक्रमा करके अपनी उंगलियों को कसे हुए पेट की गहरी नाभि तक लाया। राजकुमारी शुभदा की पीठ हल्के से उठ गई पर उंगलियों ने नाभि की परिक्रमा कर नीचे की ओर बढ़ना जारी रखा।


उंगलियों ने धोती को छूते ही पैरों के जोड़ को अनछुआ छोड़ बाएं पैर पर से चलना शुरू किया। बायां पैर थोड़ा उठकर उंगलियों को नीचे उतरने से रोकने लगा पर उंगलियों ने घुटने से उतरकर पैरों की उंगलियों से मिलने तक चलना जारी रखा।
राजकुमारी शुभदा के होठों ने निकली निराशा की ऊंह को आश्चर्य की आह से बदला गया जब बाएं पैर की उंगलियों को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की सांसों की गर्मी महसूस हुई।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने बचने की कोशिश करती राजकुमारी शुभदा के पैरों की उंगलियों को हल्के से चूमा फिर सबसे छोटी ऊंगली को अपने होठों में पकड़ कर चूमा।


राजकुमारी शुभदा की हथेलियों ने शय्या पर बिछे नए सूती वस्त्र को मुट्ठियों में भींच कर अपने होठों को कस कर दबाया। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गरम सांसे राजकुमारी शुभदा के रोमांचित बदन को जलाते हुए ऊपर की ओर बढ़ी।


धोती के ऊपर से सांसों का एहसास कम हुआ तो होठों का दबाव महसूस होता रहा। लज्जा असहाय होने से राजकुमारी शुभदा बाईं ओर मूड कर सोती रही।


होठों ने कमर को छू कर जलाते हुए राजकुमारी शुभदा की पीठ की ओर मोर्चा बनाया। ऊपरी वस्त्र की पहली गांठ खुल गई तो राजकुमारी शुभदा अपनी आह को दबा नहीं पाईं पर उन्होंने अगली दो गांठें खुलते हुए अपने होठों को कस कर पकड़ते हुए अपने निद्रा में होने को बनाए रखा।


राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को अपने कंधे पर से ऊपरी वस्त्र को सरकाते हुए महसूस किया जिस से उसकी सख्त बैरियों को रात्रि के शीतल पवन ने छेड़ा। राजकुमारी शुभदा ने अपने आप को आवाज करने से रोके रखा पर…


राजकुमारी शुभदा, “मां…”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के दांतों ने राजकुमारी शुभदा के दाएं कंधे पर हल्की चोट पहुंचाते हुए राजकुमारी शुभदा की उत्तेजना को अनेक गुना बढ़ाया था। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को जैसे यह पता नहीं चला और वह सोती हुई राजकुमारी शुभदा का चीरहरण करते रहे। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा के ऊपरी वस्त्र को उनके बाएं हाथ में फंसा छोड़ दिया पर अपने हाथ को ऊपर उठाते हुए अपने खुर्तरे हाथ को शुभ्र मुलायम स्तनों पर रगड़ते हुए ले गए।


राजकुमारी शुभदा ने अनजाने में गहरी सांस लेकर अपने दूधिया गोलों को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के खुर्तरे हाथ पर लगाया पर वह हाथ रुके बगैर अपने मार्ग पर धीरे धीरे बढ़ता रहा।


राजकुमारी शुभदा को एहसास हुआ कि पंडित ज्ञानदीप शास्त्री उनके पीछे लेट गए थे और अब उनका खुरतरा हाथ राजकुमारी शुभदा के कसे हुए पेट पर से नाभि की ओर बढ़ रहा था। यदि पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का हाथ ऐसे ही बढ़ता रहा तो वह राजकुमारी शुभदा की धोती की गांठ तक पहुंच जाएगा।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के दाएं हाथ ने राजकुमारी शुभदा के सर को अपने ऊपर लेते हुए अपने सीने को राजकुमारी शुभदा की नग्न पीठ से सटा लिया। राजकुमारी शुभदा अपने आप को पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी में पिघलता महसूस कर रही थी जब उसकी धोती की गांठ खुलने लगी।


राजकुमारी शुभदा चुपके से, “आ…
अं…
अं…
ई…”


चोर की सावधानी से धोती को राजकुमारी शुभदा के बदन से चुराया गया। राजकुमारी शुभदा की कोमल जांघों को पीछे से पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के पैरों के खुरतरी बाल महसूस हुए और वह अपने आप को उस गर्मी पर दबाने लगी।


अश्व के संचालन और नृत्य से सुडौल बने नितंब अंतर्वस्त्र छोड़ अब खुले में थे। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की गर्मी को महसूस करते राजकुमारी शुभदा के नितंबों को अंतर्वस्त्र के दोनों तरफ से धधकती ज्वाला की छड़ की ऊष्मा महसूस हुई।


राजकुमारी शुभदा प्रथम रात्रि की पीड़ा को याद कर दूर होने लगी तभी पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की मजबूत हथेली ने उनकी दाहिनी जांघ को पकड़ कर अपने पैरों पर रख दिया।


राजकुमारी शुभदा की सांस गले में अटक गई पर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने एक पल में उसके अंतर्वस्त्र को छुड़ा कर उड़ा दिया। राजकुमारी शुभदा अपनी आह को दबा नहीं पाई जब उसके यौन फूल की कोमल पंखुड़ियों पर एक जलता लोह का खंबा टकराया।


राजकुमारी शुभदा ने अपनी सांसे रोक ली ताकि जब लोह उसकी मधु को जलाए तब वह पीड़ा की चीख को राके रखे। परंतु पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपने लोह को राजकुमारी शुभदा की मधु से गीली पंखुड़ियों से कसे हुए नितंबों में छुपे बंद गुदा तक घुमाना शुरू किया।


राजकुमारी शुभदा के अंदर भड़कती ज्वाला लोह पिघलाने को तैयार थी जब पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की दाहिनी हथेली नाभि पर से सरकते हुए राजकुमारी शुभदा के यौन केशों पर से घूमती हुई प्यासी गीली पंखुड़ियों पर पहुंची। राजकुमारी शुभदा ने अपनी कमर को लोह पर रगड़ते हुए पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने और हथेली के बीच आगे पीछे होना शुरू किया।


राजकुमारी शुभदा को लोह से भय था क्योंकि इतना मोटा धधकता खंबा उसके फूल को जला कर रहेगा पर अंदर से बहता मधु उसी ज्वाला को अपने अंदर बुझाना चाहता था।


राजकुमारी शुभदा चौंक कर, “आह!!…”


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की विद्वान उंगलियों ने फूल की पंखुड़ियों के जोड़ में छुपे केंद्र बिंदु को अपने आवरण से निकाल कर प्रेम से छेड़ना शुरू किया। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का अंगूठा केंद्र को घुमाता और राजकुमारी शुभदा का बदन उसी बिंदु के साथ पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के अंगूठे भर के इशारे पर नाचता झूमता और अपने आप को रगड़ता।


राजकुमारी शुभदा ने अपने होठों को अपनी आंखों की तरह कस कर बंद रखते हुए नींद में अपने आप को रखा पर…


राजकुमारी शुभदा, “दीप!!…”


दीप की लंबी उंगली अंगूठे के ताल पर नाचते हुए मधु की संकरी नलिका में गोता लगाने लगी थी।


दीप कान में, “हां, शुभा।”


शुभा, “दीप…”


दीप, “बोलो न शुभा।”


शुभा सिसकते हुए, “दीप…”


उंगली पर नलिका कस गई और यौन मधु की धारा से हथेली भीग गई। शुभा की कोमल काया झंझावत में फंसे पत्ते की तरह दीप के लोह, उंगली और अंगूठे पर कांपते हुए थरथराने लगी।


राजकुमारी शुभदा के होठोंसे निकली, “दीप!!…” की चीख पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के होठों ने पी ली।


राजकुमारी शुभदा ने यौन संतुष्टि से अपनी थकी हुई आँखें खोली और पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को मुस्कुराकर देखता पाया।


पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “राजकुमारी जी, निद्रा उड़ गई हो तो पुत्र प्राप्ति क्रिया शुरू करें?”
अति उत्तम शब्दों से आपने सम्भोग कार्यक्रम को भी ऐसा बना दिया जैसे हिन्दी साहित्य के किसी महान कृति को padh रहें हैं.....



हमेशा की तरह ही शानदार प्रदर्शन किया है आपने....


अगले अंक की परिकल्पना से ही शरीर में अजीब सा रोमांच महसूस हो रहा है..
 

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अति उत्तम शब्दों से आपने सम्भोग कार्यक्रम को भी ऐसा बना दिया जैसे हिन्दी साहित्य के किसी महान कृति को padh रहें हैं.....



हमेशा की तरह ही शानदार प्रदर्शन किया है आपने....


अगले अंक की परिकल्पना से ही शरीर में अजीब सा रोमांच महसूस हो रहा है..
Thank you for your prompt reply and appreciation
 
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