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Erotica नियति से बंधी नीतू

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Neetu Story
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नियति से बंधी नीतू - Part 127

गुरुवार और शुक्रवार

गुरुवार और शुक्रवार दोनों दिन रश्मि ने अपनी माँ से झूठ बोला कि वह कॉलेज जा रही है, लेकिन कॉलेज जाने के बजाय वह राजेश के घर चली गई और सुबह से शाम तक उसके साथ कामुक खेल में मशगूल रही। रश्मि ने अपनी चूत की आग को राजेश के लंड से शांत किया, खुद आनंद लिया और उसे भी भरपूर मजा दिया। राजेश के सामने अपनी सारी शर्म छोड़कर रश्मि ने कई बार उसके सामने पेशाब करके पूरा शो दिखाया। रश्मि लंड चूसने में इतनी निपुण हो गई थी कि वह किसी भी मर्द को अपने मुँह से चूसकर अद्भुत सुख दे सकती थी। राजेश को भी अपनी कॉलेज की ब्यूटी क्वीन रश्मि की चूत से स्वर्गीय सुख मिल रहा था, लेकिन उसे उसकी गांड मारना सबसे ज्यादा पसंद था। रश्मि भी उसकी इच्छा पूरी करने के लिए हर बार उसके साथ मिलकर अपनी गांड मरवाती और राजेश का वीर्य कई बार पी जाती।

शनिवार और रविवार

शनिवार और रविवार को रजनी अपनी सहेलियों के घर गई और रश्मि को भी अपने साथ ले गई, जिसके कारण उसे राजेश के घर जाने का मौका नहीं मिला। रश्मि ने अपनी चूत की आग शांत करने के लिए कई बार अपनी उंगलियों से खेला, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। फिर उसने इंटरनेट पर खोजकर हस्तमैथुन का तरीका सीखा। रात को माँ के सोने के बाद रश्मि ने किचन से एक बैंगन लिया और बाथरूम में जाकर अपनी चूत में डालकर हस्तमैथुन किया। इस दौरान उसे गोविंद का नौ इंच का लंड याद आ रहा था। उसकी याद में उसने दो बार हस्तमैथुन करके अपनी चूत की आग को कुछ हद तक शांत किया।

शनिवार सुबह

शनिवार सुबह नीतू जल्दी उठकर तैयार हो गई। अनुषा भी तैयार होकर आ गई, जबकि निशा अभी भी सो रही थी। शीला ने कहा कि उसकी बेटी बार-बार गदर मचाती है। यह सुनकर शीला ने अपनी सहेली की कान खींचते हुए कहा, "मेरी प्यारी बेटी को गदर कहेगी, तो तुझे चार थप्पड़ मारूँगी। जा, अपने काम कर।" दीदी-बहन दोनों फैक्ट्री की ओर निकल गईं। वहाँ पहुँचने पर गिरी ने उन गाँव वालों को लाया था, जिनकी जमीन साहूकार ने धोखे से हड़प ली थी। नीतू ने अनुषा को निर्देश दिया कि वह लोगों से अच्छे से पूछताछ करे और उनकी आईडी देखकर ही जमीन के दस्तावेज लौटाए। उसने गिरी और बस्या को भी मदद करने को कहा और साहूकार के घर की ओर निकल गई।

हरीश और अशोक दोनों नहा-धोकर बाहर सोफे पर बैठे थे। उन्होंने साहूकार को भी बाथरूम भेजा था। नीतू जब घर पहुँची, तो बाहर खड़े बस्या के दो साथियों को उनके घर जाने को कहा और अंदर कदम रखा। उसने दोनों पतियों को घर जाकर नहाने और खाना खाकर फैक्ट्री पर अनुषा की मदद करने को कहा। फिर घर का दरवाजा बंद करके वह इस निश्चय के साथ आई थी कि आज साहूकार की कहानी खत्म कर देगी। वह उस कमरे में घुसी, जहाँ साहूकार था।

नहाकर बाहर आया साहूकार नीतू को मंच पर बैठे देखकर डर गया। डर में उसका तौलिया कमर से खिसककर जमीन पर गिर गया। उसका लंड ढीला होने पर भी छह इंच का था और बहुत मोटा था। नीतू की नजर उस पर पड़ी, तो वह हैरान रह गई। साहूकार ने देखा कि नीतू उसका लंड टकटकी लगाकर देख रही है। इससे उसमें कामवासना जागने लगी और उसका लंड खड़ा होने लगा। साहूकार ने धोखे और ठगी से कमाए पैसों से देश-विदेश के वैद्यों और आयुर्वेद पंडितों से दवाइयाँ लेकर अपने लंड को मजबूत और ताकतवर बनाया था। उसने गाँव की सैकड़ों मासूम लड़कियों और कई औरतों की इज्जत इसी कमरे में लूटी थी। उसका लंड कुछ ही सेकंड में बारह इंच की विशाल लंबाई और मोटाई के साथ खड़ा हो गया। यह देखकर नीतू की चूत से रस टपकने लगा।

नीतू जैसी रति-रूपी सुंदरी का सुख भोगने की इच्छा से साहूकार मंच के पास आया और उसके सामने अपना ताकतवर लंड लहराया। नीतू अपना मकसद भूलकर साहूकार के लंड को आश्चर्य से देखती रही। जब साहूकार ने अपना लंड उसके होंठों पर रगड़ा, तो नीतू की चूत में काम की आग भड़कने लगी और उसने आँखें बंद कर लीं। जैसे ही उसने अनायास अपना मुँह खोला, साहूकार का लंड उसके मुँह में घुस गया और वह उसे चूसने लगी। नीतू अपने इरादे भूलकर साहूकार के ताकतवर लंड को बड़े कौशल से चूसने लगी। पाँच मिनट बाद साहूकार ने नीतू को मंच से उठाकर खड़ा किया और उसकी साड़ी खींचकर उतार दी। फिर उसने ब्लाउज के हुक खोलकर अलग किया और लहंगा-लहड़ी खींचकर उतार दिया। अब नीतू सिर्फ पीली-काली मिक्स्ड ब्रा और पिंक पैंटी में थी, अपने यौवनमय शरीर को साहूकार के सामने पेश करते हुए उसकी कामपिपासा का शिकार होने को तैयार थी। ब्रा और पैंटी भी उतारकर नीतू के नंगे शरीर को मंच पर धकेलकर साहूकार ने उसके जांघों के बीच जगह बनाई और अपनी चूत में उसका लंड घुसेड़ दिया। नीतू की चूत की सख्ती साहूकार को बहुत पसंद आई। उसने तीन मिनट में अपने बारह इंच के लंड को पूरी तरह उसकी चूत में घुसेड़ दिया। काम की आग में जल रही नीतू ने साहूकार का पूरा साथ दिया, अपनी गांड उठा-उठाकर उसके तेज प्रहारों का जवाब देती रही। साहूकार नीतू के रसीले नंगे सौंदर्य का आनंद लेते हुए एक घंटे तक उसकी चूत को बिना रुके चोदता रहा। उसने तीन सौ से ज्यादा औरतों को पैसे देकर, डराकर या बलात्कार करके चोदा था, लेकिन नीतू की रसीली चूत का मजा उसे पहले कभी नहीं मिला था। नीतू ने नौ बार अपनी चूत का रस साहूकार के लंड पर छोड़ दिया था। एक घंटे तक उसकी चूत का मक्खन मथने के बाद साहूकार ने अपना वीर्य उसकी गर्भाशय में भर दिया और पूरा सुख लिया।

साहूकार के बारह इंच के लंड से चूत चुदवाकर नीतू आँखें बंद करके लेटी थी। वह मन में सोच रही थी, "क्या मैंने सही किया? कल रात गिरी ने फोन करके बताया था कि इस साहूकार ने तीन गाँवों की कई लड़कियों और औरतों की इज्जत लूटी है। फिर भी मैंने उसका लंड देखते ही खुद को भूलकर उससे चुदवाने को तैयार हो गई। मैंने वही किया, जो मुझे नहीं करना चाहिए था। अब आगे की सोचनी होगी। इसने गाँव के घर में इतना नकद रखा है, तो शहर के घरों में कितना रखा होगा? मुझे इसका पता लगाना है। इसके लिए मुझे इस साहूकार को अपनी चूत का गुलाम बनाना होगा, तभी सारी बातें पता चलेंगी। हाँ, ऐसा ही करूँगी।"

उसके बगल में लेटा साहूकार मन में हँस रहा था, "क्या चूत वाली रंडी, कल तूने मेरे गाल पर थप्पड़ मारा और सबके सामने बेइज्जत किया। अब देख, मैंने तेरी चूत चोदकर तुझे अपनी रंडी बना लिया। मैं तुझे अपने लंड का गुलाम बनाकर शहर के घर ले जाऊँगा और अपने दोस्तों के साथ भी सुलाऊँगा। वे तेरी चूत चोदते हुए वीडियो बनाएँगे और उसे पूरे गाँव में बाँटकर तेरी इज्जत नीलाम कर दूँगा।"

दोनों अपने-अपने मन में योजनाएँ बना रहे थे। साहूकार नीतू के नंगे शरीर पर चढ़ गया और दूसरी बार उसकी सवारी करके तृप्त हुआ। शाम को साहूकार के घर से निकलने से पहले नीतू ने छह बार उससे अपनी चूत चुदवाई। उसे विदा करते हुए साहूकार ने कहा कि कल फिर आए।

नीतू जब घर पहुँची, तो देखा कि उनकी गली में सैकड़ों लोग जमा हैं। वह डर गई कि कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हुई। कार से उतरकर वह घर की ओर दौड़ी। हरीश, अशोक, शीला, अनुषा और तीनों बच्चे घर के बाहर खड़े थे। यह देखकर उसने राहत की साँस ली। शीला ने अपनी सहेली को देखकर भीड़ से कहा, "लो, जिसका तुम सब इंतजार कर रहे थे, वह आ गई।" नीतू कुछ समझ नहीं पाई और सबके चेहरों को देखने लगी।

अनुषा ने कहा, "दीदी, इन सबकी जमीनें साहूकार ने धोखे से हड़प ली थीं। आज जब इन्हें अपनी जमीन के दस्तावेज मिले, तो इन्हें तुम्हारे बारे में पता चला। तुमने इनके जीवन का अंधेरा दूर करके नया उजाला दिया। इसलिए ये तुमसे मिलकर धन्यवाद देना चाहते हैं।"

नीतू ने भीड़ की ओर मुड़कर हाथ जोड़े। गाँव के बुजुर्गों ने उसे आशीर्वाद दिया, जबकि युवा उसके पैरों पर गिरकर नमस्कार करने लगे। लोग नीतू की खुले दिल से तारीफ कर रहे थे और उसके और उसके परिवार के सुख-समृद्धि की कामना कर रहे थे। सिर्फ गली के लोग ही नहीं, कॉलोनी के कई लोग भी यह सब देख रहे थे। हरीश को अपनी पत्नी पर गर्व हो रहा था और उसने उसे गले लगाया। गाँव वालों ने एक बार फिर नीतू को धन्यवाद दिया, तीनों बच्चों को आशीर्वाद दिया, निशा को दृष्टि उतारी और गाँव की औरतों ने लोकगीत गाकर नीतू की विदाई की।

सबको विदा करके घर के अंदर आने पर...

हरीश ने पूछा, "नीतू, साहूकार अभी भी घर में है?"

नीतू ने कहा, "हाँ, अभी वह घर में ही है। उससे अभी बहुत काम बाकी है। सब पूरा होने के बाद उसके बारे में सोचेंगे। जी, मैं सोमवार को किसी काम से xxxx शहर जा रही हूँ। अभी मत पूछो क्यों, मैं बता नहीं सकती। लौटने के बाद सब बताऊँगी। अब चलो, समय हो गया, खाना खाते हैं।"

शीला ने कहा, "आज तुमने जो काम किया, उसके लिए गाँव की औरतों ने मिलकर खास खाना बनाकर भेजा है। आओ, गाँव के प्राकृतिक स्वाद का आनंद लें।"

साहूकार के घर

नीतू के जाने के बाद साहूकार अपनी बेइज्जती के बारे में सोचकर गुस्से से उबल रहा था, लेकिन मन के एक कोने में नीतू के रति-रूपी सौंदर्य और उसके यौवनमय शरीर का सुख लेने की संतुष्टि भी थी। उसने घर में अपनी संपत्ति के दस्तावेज खोजे, तो पाया कि सोने के बिस्किट और करोड़ों रुपये भी गायब हैं। उसे समझ आ गया कि यह सब नीतू का काम है। उसका गुस्सा और भड़क गया। उसने सोचा कि किसी भी तरह नीतू से अपनी संपत्ति के दस्तावेज वापस लेगा, उन्हें बेचकर मिलने वाले पैसे और शहर के घर में रखे पैसे लेकर किसी और शहर में चला जाएगा। लेकिन उससे पहले वह नीतू को अपने दोस्तों के हवाले करके उसका वीडियो बनवाएगा और उसे सार्वजनिक करके उसकी इज्जत मिट्टी में मिला देगा।

रविवार सुबह

नीतू अकेले साहूकार के घर गई। साहूकार ने पहले उसे मंच पर लिटाकर अच्छे से चोदा, फिर अपनी संपत्ति के दस्तावेजों के बारे में पूछा। नीतू ने कहा कि सब उसके पास सुरक्षित हैं। साहूकार बोला, "सोचकर देख, उन दस्तावेजों को रखने से तुझे कोई फायदा नहीं होगा। अगर तू उन्हें लौटा दे, तो मैं सारी संपत्ति बेचकर तुझे उसका हिस्सा दूँगा। तूने अपनी रसीली चूत से मुझे इतना सुख दिया है, इसके लिए मैं तुझे कितना भी पैसा दूँ, कम है।"

दोनों ने इस पर खूब चर्चा की और तय किया कि अगले दिन सुबह वे दोनों संपत्ति के दस्तावेज लेकर शहर जाएँगे, उसे बेचेंगे और उस पैसे में से नीतू को 25% हिस्सा देकर साहूकार बाकी पैसे लेकर कहीं और चला जाएगा।

नीतू ने कहा, "ठीक है, मैं घर जाकर कल के लिए तैयारी करके आती हूँ।"

साहूकार ने उसका हाथ पकड़कर कहा, "रुक, चूत की रानी, इतनी जल्दी क्यों? अभी तेरी एक और गांड का छेद बाकी है।" यह कहकर उसने नीतू की गोल-मटोल गांड को सहलाया और उसकी गांड की दरार में उंगली डाली।

साहूकार ने नीतू की मुलायम गांड को जोर से मसला और उसे घुटनों के बल बैठने को कहा। उसने उसकी गांड को फैलाकर अपने लंड को उसके छोटे से गांड के छेद के सामने रखा। नीतू की गांड का छेद उसकी चूत से भी ज्यादा टाइट था, जिससे साहूकार को बहुत आनंद मिल रहा था। जोरदार प्रहारों के साथ उसने अपने बारह इंच के लंड को नीतू की गांड के छेद में पूरी तरह घुसेड़ दिया और उसकी कमर पकड़कर तेजी से उसकी गांड मारने लगा। एक घंटे से ज्यादा समय तक वह नीतू की गांड मारता रहा और अंत में उसमें अपना वीर्य भरकर संतुष्ट हुआ।

साहूकार से गांड मरवाने के बाद नीतू घर लौटी और अगले दिन के लिए सारी तैयारी की। उसने अपने कपड़ों की तह में एक बंदूक और मैगजीन छिपाकर रखी। रविवार दोपहर के बाद नीतू ने अपने परिवार के साथ समय बिताया। निशा तारेली कर रही थी, लेकिन नीतू चुप रही। निशा हैरानी से अपनी माँ को देख रही थी। रात को खाना खाने के बाद नीतू ने निशा को अपनी छाती पर सुलाया और अपनी सोच में डूबी रही, लेकिन अपनी प्यारी बेटी की गोद में नींद में खो गई।
 

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नियति से बंधी नीतू - Part 128 - नीतू का गैंग बैंग

सुबह जल्दी उठकर नीतू तैयार हो गई और अपने परिवार से कहा कि वह चार-पांच दिन तक नहीं आएगी, लेकिन किसी को घबराने की जरूरत नहीं है। वह हर दिन एक बार फोन जरूर करेगी। यह कहकर उसने अपनी एस.यू.वी. साहूकार के घर की ओर दौड़ा दी।

नीतू की गाड़ी में ही साहूकार शहर के अपने घर की ओर निकला। वहाँ पहुँचते-पहुँचते शाम के चार बज गए। दोनों ने यात्रा की थकान मिटाने के लिए पहली मंजिल के कमरे में आराम किया। कुछ देर बाद साहूकार ने पक्का कर लिया कि नीतू सो रही है और चुपके से कमरे से बाहर निकल गया। स्वामीजी द्वारा दी गई औषधि के कारण नीतू के परिवार को कितना भी काम करने या थकाऊ यात्रा करने पर थकान नहीं होती थी। नीतू ने आँख के कोने से साहूकार को बाहर जाते देखा और सोने का नाटक करती रही। जैसे ही वह बाहर गया, नीतू भी उसके पीछे चली गई। साहूकार पहली मंजिल के एक कमरे में गया और दीवार में छिपे एक बड़े लॉकर को खोलने लगा। नीतू ने वेंटिलेटर के जरिए देखा कि वह कौन से नंबर डालकर लॉकर खोल रहा है। जब लॉकर खुला, तो उसमें मौजूद नजारा देखकर नीतू दंग रह गई। गाँव के घर के लॉकर की तुलना में यहाँ पाँच गुना ज्यादा नोटों की गड्डियाँ और सोने के बिस्किट का भारी भंडार था। साहूकार ने पैसे और सोने की सुरक्षा देखकर राहत की साँस ली और लॉकर बंद करने से पहले नीतू चुपके से अपने कमरे में लौट आई, फिर से सोने का नाटक करने लगी। रात को बाहर से खाना मँगवाकर खाने के बाद साहूकार ने नीतू को बिस्तर पर लिटाकर दो बार उसकी चूत चोदी और एक बार उसकी गांड मारकर सुख लिया।

अगली सुबह

नीतू के जागने से पहले ही साहूकार तैयार हो चुका था। उसने पिछले दिन ही अपने दोस्तों को एक जगह बुलाया था और वहाँ के लिए निकल गया। नीतू ने तरोताजा होने के बाद घर में साहूकार को न पाकर फोन किया, तो पता चला कि उसे लौटने में अभी दो घंटे लगेंगे। नीतू तुरंत लॉकर वाले कमरे में गई, उसे खोला और पैसे व सोने का जायजा लिया, मन ही मन हिसाब लगाने लगी।

उसने लॉकर की कंपनी को फोन किया और कहा, "गुड मॉर्निंग सर, हमारे घर में आपकी कंपनी का xxxx मॉडल का सेफ लॉकर है। कुछ कारणों से इसका कोड बदलना जरूरी हो गया है। कृपया इस बारे में जानकारी देकर मदद करें।" कंपनी ने बताया कि दिए गए कोड डालने के बाद नया नंबर डालकर कोड बदल सकते हैं। नीतू ने कंपनी के निर्देशानुसार डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर नंबर डाले और पाँच मिनट में लॉकर का कोड बदलकर उसे सुरक्षित कर लिया।

जब साहूकार अपने दो दोस्तों के साथ घर लौटा, तो वह उन्हें शहर की अपनी संपत्तियों के दस्तावेज दिखाकर बेचने की बात कर रहा था। नीतू कमरे के दरवाजे के पीछे छिपकर उनकी बातें सुन रही थी। आए हुए लोग दस्तावेज देखकर दो बड़े मल्टीफ्लोर कॉम्प्लेक्स, चार बंगले और आठ साइट्स के लिए कुल 360 करोड़ देने को तैयार हुए। दो-तीन घंटे की लंबी चर्चा के बाद साहूकार ने 390 करोड़ में सौदा पक्का किया और सारा पैसा नकद माँगा। दोनों खरीदार सहमत हुए और अगले दिन सुबह दस बजे तक पैसा घर पर देने और रजिस्ट्री ऑफिस जाकर संपत्ति का रजिस्ट्रेशन करने का फैसला हुआ। साहूकार खुश था कि सारा पैसा उसके हाथ आएगा, जबकि नीतू को जल्दबाजी में बिक्री के कारण सिर्फ 150 करोड़ मिल रहे थे, जिसमें से उसे 35 करोड़ देने की बात थी। नीतू को सब पहले से पता था, फिर भी वह साहूकार के सामने नाटक करती रही और उसे धन्यवाद देती रही, लेकिन मन ही मन सोच रही थी, "रजिस्ट्रेशन हो जाए, फिर तेरा मारिहब्बा देखती हूँ।" उस दिन नीतू ने साहूकार की हर इच्छा पूरी की और कई तरह से उसका लंड अपनी चूत में लेकर उसे सुख दिया।

अगली सुबह

जागने पर नीतू ने देखा कि साहूकार ने उसे नंगी हालत में बाहों में जकड़ा हुआ है और उसकी गांड की दरार में उंगली डालकर सो रहा है। उसने उसे धकेलकर अलग किया और उठ गई। दोनों ने तरोताजा होने के बाद होटल से मँगवाया नाश्ता किया। नीतू ने कहा, "आज तुम्हारी संपत्ति का रजिस्ट्रेशन होगा और पैसा भी मिल जाएगा। मेरे हिस्से के 35 करोड़ दे दो, मैं अपने गाँव लौट जाऊँगी।"

साहूकार बोला, "अरे, इतनी जल्दी क्यों? दो-चार दिन और रुक जा। तेरे सुंदर कोमल जिस्म का रस पीने का मौका मुझे मिलेगा। मैं तेरी चूत का रेट तो दे रहा हूँ, लेकिन पैसे लेने वाली सड़कछाप रंडी को भी तो कुछ इज्जत रखनी चाहिए। दो दिन और रुक, मेरे लंड को अच्छे से सुख दे, फिर गाँव जा।"

नीतू गुस्से से बोली, "मैं कोई रंडी नहीं हूँ, ये बात याद रख।"

साहूकार हँसते हुए बोला, "गुस्सा मत कर, सच हमेशा कड़वा होता है। तुझे पति और बच्चे हैं, फिर भी तीन-चार दिन से मेरे लंड के नीचे लेटकर चुदवा रही है। ऊपर से पैसे लेने की जल्दी भी है। अब तुझे रंडी न कहूँ तो क्या पतिव्रता कहूँ?"

नीतू ने जवाब नहीं दिया और गुस्से से उसे घूरती रही। साहूकार ने आगे कहा, "मैंने जिंदगी में अनगिनत औरतों का स्वाद चखा, लेकिन तेरी चूत और गांड के छेद का मजा मुझे पहले कभी नहीं मिला। वाह, क्या रस है तेरी चूत का, अमृत से भी मीठा। तेरी गांड मारते वक्त ऐसा लगता है जैसे किसी गर्म गुफा में घुस गया हूँ। तेरे गोल-मटोल चूचों को चूसने का मन करता है कि सारा दिन मुँह में डालकर दबाता रहूँ। इन सब से बढ़कर तेरा लंड चूसना, वाह! कोई तेरे जैसा नहीं चूस सकता। ऐसा लगता है जैसे किसी दूसरी दुनिया में तैर रहा हूँ। दो दिन और रुक, अपने यौवन से मेरे लंड को तृप्त कर।"

नीतू की खामोशी को साहूकार ने उसकी सहमति समझ लिया।

सुबह दस बजे संपत्ति खरीदने वाले दो लोग पाँच बड़े बैगों में नोटों की गड्डियाँ लेकर आए और साहूकार को सौंप दीं। साहूकार ने गड्डियाँ गिनकर सब सही पाया और उन्हें कमरे में सुरक्षित रखकर नीतू को तैयार होकर रजिस्ट्री ऑफिस चलने को कहा। नीतू ने गोवा से पहले खरीदा हुआ बुरखा पहन लिया, ताकि उसका चेहरा किसी को न दिखे, और साहूकार के साथ रजिस्ट्री ऑफिस चली गई। वहाँ दस्तावेजों की जाँच और रजिस्ट्रेशन का काम पूरा होने तक दोपहर के तीन बज गए। लौटते वक्त साहूकार ने आठ-दस बोतल विदेशी ब्रांड का व्हिस्की खरीदा और कहा, "आज शाम मेरे कुछ दोस्त आएँगे। संपत्ति बिकने की खुशी में और दूर के शहर जाने से पहले मैं उन्हें पार्टी दे रहा हूँ।"

साहूकार ने कहा, "मेरी कोई बीवी-बच्चे नहीं हैं। आज की पार्टी में तू मुख्य मेहमान होगी। मेरे दोस्तों के सामने तुझे बहुत सेक्सी दिखना है। चल, एक अच्छी साड़ी खरीदते हैं।"

दोनों साड़ी की दुकान गए। नीतू ने बुरखा पहना हुआ था। साहूकार के कहने पर वहाँ की कर्मचारी ने काले रंग की बहुत पतली, पारदर्शी साड़ी, लहंगा और ब्लाउज दिखाया। साड़ी और ब्लाउज इतने पतले थे कि अंदर की ब्रा और पैंटी साफ दिखती थी। नीतू ने मना किया, लेकिन साहूकार ने वही साड़ी पैक करवाई और नीतू के साइज की काली ब्रा और पैंटी भी खरीदी। घर पहुँचते ही उसने कहा कि उसके दोस्त शाम सात बजे आएँगे, तब तक नीतू को हाई-क्लास रंडी की तरह तैयार होना है। सुबह से साहूकार के मुँह से "रंडी" और "सड़कछाप" जैसे शब्द सुनकर नीतू का गुस्सा उबल रहा था, लेकिन उसने खुद को संभाला।

शाम सात बजे

साहूकार के नौ दोस्त घर आए और तैयारियों के साथ आए थे। साहूकार के चेहरे पर क्रूर विजयी मुस्कान थी। दस दोस्त व्हिस्की पी रहे थे, तभी नीतू काली पारदर्शी साड़ी पहनकर आई। वह बहुत सुंदर और उससे भी ज्यादा सेक्सी लग रही थी। साड़ी और ब्लाउज इतने पतले थे कि काली ब्रा और पैंटी साफ दिख रही थी।

साहूकार ने नीतू को अपने पास बिठाकर उसकी कमर सहलाते हुए कहा, "दोस्तों, यही वो माल है, जिसके बारे में मैंने बताया था। इसका नाम नीतू है, मेरी निजी रंडी।" नीतू का खून खौल गया, लेकिन वह चुप रही।

साहूकार के दोस्तों ने नीतू को ऊपर से नीचे तक नजरों से चोदा और कहा, "तेरी रखैल तो कमाल है, क्या ये वैसा ही सुख देती है?"

साहूकार हँसते हुए बोला, "सुख की बात मत करो, ये इतना मजा देती है कि बिस्तर पर कोई इसके जैसा नहीं। इसकी चूत का रस अमृत से भी मीठा है। इसकी गांड का छेद इतना टाइट है कि जिंदगी भर उसमें डूबे रहने का मन करता है। इसके गोल चूचे चूसते वक्त दुनिया भूल जाती है। अगर इनमें दूध होता, तो और मजा आता। सबसे बढ़कर इसका लंड चूसना, वाह! ऐसा चूसती है कि दूसरी दुनिया में तैरने का अहसास होता है।"

साहूकार की बातों पर उसके दोस्त जोर-जोर से हँसे और अपनी पैंट में उभरे लंड को ठीक करने लगे। नीतू गुस्से से सबको घूर रही थी, लेकिन चुप रही। साहूकार ने उसे कोक से भरा गिलास दिया और सबके साथ पीने को कहा।

एक दोस्त बोला, "ये तो अन्याय है। हम सब इतने करीबी दोस्त हैं, और तू इस माल को अकेले चोद रहा है। हमें भी एक मौका दे, इसकी जवानी के तालाब में डुबकी लगाकर मजा लें।"

नीतू गुस्से से साहूकार की ओर मुड़ी, लेकिन उसने आँखों से चुप रहने का इशारा किया और बोला, "नहीं मेरे दोस्तों, इसकी चूत में घुसने का सौभाग्य सिर्फ मुझे है। तुम सब इसे चोदने की इच्छा छोड़ दो।"

नीतू गुस्से में कोक पी रही थी। हर पल के साथ उसका शरीर हल्का और चूत से रस टपकने लगा। गिलास खाली होने के पाँच मिनट बाद नीतू का शरीर गर्मी से तपने लगा। साहूकार और उसके दोस्त उसकी हालत देख रहे थे और उनके चेहरों पर कुटिल मुस्कान थी। साहूकार ने उसका कंधा सहलाते हुए पूछा, "क्या हुआ डार्लिंग?" नीतू बोली, "पता नहीं, शरीर हल्का और बहुत गर्मी लग रही है।" साहूकार ने एक और गिलास कोक भरकर उसे पिलाया। उसने पहले से ही अपने डॉक्टर दोस्त से कामोत्तेजक दवा मँगवाई थी और उसे नीतू के कोक में मिलाकर पिला दिया था। पंद्रह मिनट में नीतू की कामवासना इतनी बढ़ गई कि वह सड़क पर कपड़े उतारकर किसी के भी लंड के नीचे लेटने को तैयार थी।

साहूकार के इशारे पर उसके दोस्तों ने नीतू को उठाकर कमरे में ले गए और उसकी साड़ी खींचकर उतार दी। पारदर्शी काले लहंगे और ब्लाउज में उसकी ब्रा और पैंटी साफ दिख रही थी। सभी के लंड खड़े हो गए। नीतू के कपड़े उतरते ही वह सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी। साहूकार के तीन दोस्त हाई-क्वालिटी डिजिटल कैमरे से सब कुछ रिकॉर्ड कर रहे थे। साहूकार कुर्सी पर बैठकर नीतू का सामूहिक गैंग बैंग देख रहा था। बाकी छह दोस्तों ने कपड़े उतारकर नंगे होकर नीतू की ब्रा और पैंटी फाड़ दी और उसके नंगे जिस्म पर टूट पड़े। एक ने उसके होंठ चूसकर रस पिया, दो ने उसके चूचे दबाकर चूसने शुरू किए, चौथा उसकी लंबी पीठ और कमर सहला रहा था, पाँचवाँ उसकी रसीली चूत को चाट रहा था, और छठा उसकी गोल-मटोल गांड को मसलकर उसकी गांड के छेद में उंगली डाल रहा था। आधे घंटे तक छह लोग नीतू के नंगे जिस्म को मसलते, चूसते, और दाँतों से काटकर निशान बनाते रहे। बाकी तीन लोग हर कोण से उसका ब्लू फिल्म रिकॉर्ड कर रहे थे।

आधे घंटे तक छह मर्दों द्वारा लगातार मसले और चाटे जाने के बावजूद नीतू की कामवासना दवा के असर से और बढ़ रही थी। साहूकार ने दोस्तों को हटाकर नीतू के मुँह में अपना खड़ा लंड डाला और उसे चुसवाया। दस मिनट बाद वह हटा, तो उसके दोस्त ने अपना लंड नीतू के मुँह में डाल दिया। इस तरह सभी दस दोस्तों ने बारी-बारी से नीतू को लंड चुसवाया, फिर उसे बिस्तर पर लिटाकर उसकी टाँगें फैलाईं। नीतू की टाँगें पूरी तरह फैल गईं, और तीनों कैमरों में उसकी गोरी चूत स्पष्ट दिख रही थी। साहूकार के दोस्तों में से डॉक्टर ने नीतू की जाँघों के बीच जगह बनाई और कैमरे के लिए अपना खड़ा लंड उसकी चूत के सामने रखकर धीरे से अंदर डाला। कामोत्तेजक दवा के असर से नीतू कामवासना के सागर में डूबी थी। वह नहीं जानती थी कि कौन उसकी चूत में लंड डाल रहा है, लेकिन उसने अपनी गांड उठाकर उसके लंड को अपनी चूत की गर्म गुफा में जगह दी। डॉक्टर ने नीतू की रसीली चूत में पूरा लंड डालकर जोर-जोर से चोदना शुरू किया। नीतू ने उसकी पीठ सहलाकर उसे पूरा मजा दिया और अपनी चूत की आग बुझाने के लिए उसके लंड से जमकर चुदवाया। नीतू की चूत ने दो बार रस छोड़ा, और डॉक्टर ने अपने वीर्य से उसकी चूत भर दी। वह संतुष्ट होकर हट गया। नीतू की चूत से रस और वीर्य का मिश्रण टपक रहा था, जिसे तीनों कैमरों ने रिकॉर्ड किया।

डॉक्टर के बाद साहूकार का बैंक मैनेजर दोस्त नीतू की जाँघों के बीच आया और उसकी चूत चोदकर पूरा मजा लिया। तीसरे व्यक्ति ने भी नीतू की चूत चोदी। चौथे ने उसकी पहले से चुद चुकी चूत को छोड़कर उसे उल्टा किया। नीतू की गोल, गोरी, मुलायम गांड को कई कोणों से रिकॉर्ड किया गया। तीन दोस्तों ने उसकी गांड को जोर-जोर से मसला और दाँतों से काटकर निशान बनाए। नीतू की गोल गांड को फैलाकर उसकी गांड के हल्के भूरे छेद को जूम करके रिकॉर्ड किया गया। एक दोस्त ने अपनी उंगली नीतू की गांड में डाली, जिसे भी रिकॉर्ड किया गया। नीतू कामवासना के सागर में डूबी थी और अनजाने में अपनी ही ब्लू फिल्म में शानदार अभिनय कर रही थी। चौथा व्यक्ति नीतू की कमर पकड़कर अपना खड़ा लंड उसकी गांड के छेद पर रखकर जोरदार प्रहारों से अंदर डालने लगा। नीतू जोर से "आह…हाँ…अम्मा…हाँ…आह…" चिल्लाई और उसकी गांड ने उसके लंड को जगह दी। वह उसकी गांड को तेजी से मारने लगा। तीनों ने नीतू की गांड में लंड जाते हुए और उसके चोदने को स्लो मोशन में रिकॉर्ड किया। एक-एक करके सभी ने नीतू की चूत या गांड में अपने लंड डालकर जमकर चोदा और मजा लिया। आखिरी में साहूकार ने पैंतालीस मिनट तक नीतू की चूत और गांड मारी। पाँच घंटे के मैराथन चोदन के बाद दसों दोस्तों ने नीतू को हर तरह से भोगा और फुल एच.डी. क्वालिटी में ब्लू फिल्म बनाई। फिर वे एक राउंड व्हिस्की पीने बैठ गए।

आधे घंटे बाद दो-दो पैग व्हिस्की पीने के बाद तीन दोस्त नीतू के नंगे जिस्म पर फिर टूट पड़े। एक बलिष्ठ दोस्त बिस्तर पर लेट गया और नीतू को अपनी गोद में खींचकर उसकी चूत में लंड डालकर नीचे से धक्के मारने लगा। दूसरा उसकी गांड फैलाकर उसकी गांड के छेद में लंड डालकर चोदने लगा। तीसरा नीतू के मुँह में लंड डालकर चुसवाने लगा। हरीश और अशोक के बाद पहली बार नीतू की चूत, गांड और मुँह में एक साथ तीन लंड घुसे। उसका गैंग बैंग पूरे अर्थ में बिना किसी रुकावट के चल रहा था। तीन दोस्त मंच के चारों ओर चक्कर लगाकर हर कोण से नीतू के गैंग बैंग की ब्लू फिल्म रिकॉर्ड कर रहे थे।

जब तीनों ने नीतू की चूत, गांड और मुँह में वीर्य डाला और हट गए, तो तीन और लोग उसके जिस्म पर चढ़ गए और दूसरा राउंड शुरू हुआ। तीन घंटे तक नीतू का ट्रिपल धमाका गैंग बैंग चला। इसके बाद वह लड़खड़ाते हुए बाथरूम में गई। तीन दोस्त कैमरों के साथ उसके पीछे गए। नीतू वेस्टर्न कमोड पर बैठी थी, और उसकी चूत से सोने जैसी पेशाब की धार निकल रही थी, जिसे जूम करके रिकॉर्ड किया गया। दोस्तों ने उसे नहाने को कहा। नीतू के शरीर में अभी भी कामोत्तेजक दवा का असर था, और वह अनजाने में तीनों के सामने शावर के नीचे नहाते हुए अपनी बाथिंग ब्लू फिल्म बनवाने में सहयोग दे रही थी। ठंडे पानी से नहाते ही दवा का असर कम होने लगा और उसकी मानसिक स्थिति सामान्य होने लगी। जब दवा का असर 90% कम हुआ, तो नीतू ने देखा कि तीन लोग उसका नंगा शरीर रिकॉर्ड कर रहे हैं। उसने जल्दी से नहाना पूरा किया, शरीर पोंछा और बाहर आई। घड़ी में सुबह साढ़े सात बजे थे। उसने कमरे का जायजा लिया। उसकी साड़ी फर्श पर बिखरी थी, लहंगा और ब्लाउज कोने में पड़े थे, और ब्रा-पैंटी फटी हुई थी। तीनों लोग जो उसका नहाना रिकॉर्ड कर रहे थे, वे भी नंगे थे। कमरे में साहूकार और उसके दोस्त भी नंगे होकर व्हिस्की पी रहे थे। कमरे की हालत और सबके नंगे होने से नीतू को समझ आ गया कि रातभर उसे इस कमरे में चोदा गया है। उसे गुस्सा आया।

साहूकार का एक दोस्त नशे में लड़खड़ाता हुआ उसके पास आया और उसका हाथ पकड़कर बोला, "आ जा डार्लिंग, मेरा लंड मुरझा गया है, जल्दी चूसकर इसे खड़ा कर। तेरी रसीली चूत में फिर से घुसना चाहता हूँ।" नीतू का गुस्सा फट पड़ा। उसने दोनों हाथों से उसके माथे पर जोरदार तमाचा मारा। नशे में धुत उस शख्स का सिर चकराया और वह धड़ाम से गिरकर बेहोश हो गया। बाकी नौ लोग गुस्से से नीतू पर टूट पड़े, लेकिन वह भी जवाब देने को तैयार थी। वह कमरे में इधर-उधर भागने लगी और हर आने वाले के सिर और लंड पर जोरदार प्रहार किए। पाँच मिनट में सभी नरकते हुए जमीन पर गिर गए। नीतू कमरे से बाहर निकली, दरवाजे को बाहर से ताला लगाया और पूरे घर में घूमकर रस्सियाँ ढूँढ लाई। वह फिर कमरे में आई और साहूकार समेत सभी के हाथ-पैर रस्सियों से बाँध दिए। किसी को चिल्लाने का मौका न मिले, इसलिए उसने दो लोगों के मुँह में अपनी फटी ब्रा और बाकियों के मुँह में उनकी चड्डी ठूँस दी।

नीतू किचन में गई और वहाँ से मोमबत्ती और माचिस लाकर कमरे में जलाई। साहूकार के एक दोस्त के सामने बैठकर उसने कहा, "तुम सबने मुझे धोखे से कामोत्तेजक दवा पिलाकर चोदा, अब इसका परिणाम भुगतो। यही लंड तूने मेरी चूत में डालकर चोदा था।" यह कहकर उसने मोमबत्ती की आग उसके लंड के सिरे पर लगाई। वह चिल्ला भी नहीं सका और दर्द से उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। नीतू ने साहूकार और उसके सभी दोस्तों के लंड और अंडकोष को आग से जलाकर नरक यातना दी। सभी दर्द से कराह रहे थे। नीतू ने उनकी टाँगें फैलाकर खड़े होकर कहा, "आओ, यही चूत है, जिसमें तुम सबने रातभर अपने लंड डाले। अब आकर चोदो।" उनके हाथ-पैर बँधे होने से वे कुछ कर नहीं सके और नीतू की यातना सहते रहे।

नीतू ने उनकी बनाई ब्लू फिल्म के डिजिटल कैमरे उठाए और अपने बैग में रखे। उसने अपने साथ लाई ब्रा, पैंटी और चूड़ीदार पहनी, फिर बैग से स्वामीजी द्वारा दी गई कार्कोटक विष की बोतल निकाली और हर मर्द के मुँह में चार बूँदें डालकर उनकी इस लोक की यात्रा खत्म कर दी। साहूकार को उसने कोई सजा नहीं दी थी, सिर्फ उसके हाथ-पैर बाँधे थे। साहूकार ने अपने दोस्तों को मरते देखा और नीतू के अवतार से डरकर काँपने लगा। नीतू हल्के से मुस्कुराई और उसे खींचकर अपने कमरे में ले गई, फिर बिस्तर पर धकेल दिया।

कमरे के ऑडियो सिस्टम में गाना चलाकर नीतू कामुक नृत्य करने लगी। उसने अपने चूड़ीदार और ब्रा-पैंटी उतारी और साहूकार के लंड को मुँह में लेकर चूसकर खड़ा कर दिया। उसके मुँह से अपनी पैंटी निकालकर साहूकार बोला, "प्लीज नीतू, मुझे छोड़ दे। घर का सारा पैसा ले जा, लेकिन मुझे मत मार। मुझे मरना नहीं है।"

नीतू हँसते हुए बोली, "तुझे छोड़ने से पहले बता, तूने क्या प्लान किया था। तब तेरी जान बचाने के बारे में सोचूँगी। लेकिन पहले मेरी रसीली चूत में तेरा लंड घुसने को तैयार है, उसे शांत करना है।" यह कहकर वह उसकी कमर पर बैठ गई और उसका बारह इंच का लंड अपनी चूत में डालकर ऊपर-नीचे उछलने लगी।

साहूकार डर के मारे दस मिनट में ही झड़ गया। नीतू बोली, "छी, छह दिन से तू एक घंटे तक मुझे चोदता था, और आज तेरा लंड इतनी जल्दी क्यों झड़ गया? इसका मतलब तू अब एक तरह का गांडू हो गया है। अब ये लंड हो या न हो, क्या फर्क पड़ता है?" यह कहकर उसने पास के टेबल से ब्लेड उठाया और साहूकार के लंड को कई बार काट दिया। साहूकार चिल्लाने के लिए मुँह खोलने लगा, तो नीतू ने फिर से अपनी पैंटी उसके मुँह में ठूँस दी। आधे घंटे तक उसे यातना देने के बाद उसने पैंटी निकाली और कहा, "बता, तूने क्या प्लान किया था?"

साहूकार दर्द से अर्धमृत हो चुका था। उसने बताया कि उसने नीतू की ब्लू फिल्म बनाकर उसे हर जगह फैलाने और उसकी इज्जत मिट्टी में मिलाने की योजना बनाई थी। नीतू ने एक पल भी गंवाए बिना उसके मुँह में विष की बूँदें डालकर उसे भी उसके दोस्तों के पीछे परलोक भेज दिया।
 
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नियति से बंधी नीतू - Part 129 - नीतू का बदला और धन की व्यवस्था

नीतू ने साहूकार और उसके दोस्तों के शवों को मकान की मंजिल से नीचे खींचकर लिविंग हॉल में एक जगह इकट्ठा किया और घर में मौजूद बेडशीट और अन्य कपड़ों को उनके शवों के ऊपर ढक दिया। सेफ लॉकर वाले कमरे से साहूकार की संपत्ति बिक्री के बाद आए पैसे के बैगों को उसने अपनी एस.यू.वी. में ले जाकर रखा। फिर लॉकर खोलकर उसमें मौजूद नोटों की गड्डियों और सोने के बिस्किटों को अपने गाँव से लाए बैगों में भरा। सारा पैसा और सोना गाड़ी में लादने के बाद नीतू ने समय देखा, तो दोपहर के तीन बज रहे थे। उसने अपने मोबाइल को यहाँ पहुँचने से पहले ही सुरक्षा के लिए बंद कर रखा था और अब भी उसे चालू नहीं किया। उसने साहूकार के मोबाइल से ही घर के इलेक्ट्रिक सर्किट में शॉर्ट सर्किट करने की जानकारी देखकर समझ ली। रात के अंधेरे के साथ, नीतू ने किचन के तीन गैस सिलेंडरों की सेफ्टी पिन तोड़कर गैस लीक होने दी, ताकि पूरा घर उसमें भर जाए। इससे पहले उसने अपने यहाँ आने के सभी सबूत नष्ट कर दिए थे। घर से निकलने से पहले, नीतू ने साहूकार और उसके दोस्तों के मोबाइल भी बंद करके अपने पास रख लिए। फिर, पहले सीखे हुए तरीके से घर की वायरिंग में शॉर्ट सर्किट करवाया और गाड़ी में सवार होकर वहाँ से निकल गई।

एक किलोमीटर दूर जाते ही, साहूकार और उसके दोस्तों के मरे हुए शरीरों वाले घर में गैस सिलेंडरों में आग लगी और दिल दहलाने वाली आवाज के साथ एक बड़ा धमाका हुआ। यह सुनकर नीतू के होंठों पर हल्की मुस्कान उभरी। साहूकार का बंगला आग की लपटों में घिर गया और तेजी से जलने लगा। नीतू द्वारा शवों पर ढके गए कपड़ों के ढेर के कारण किसी भी शव की पहचान नहीं हो सकी और वे पूरी तरह जलकर राख हो गए।

नीतू ने गाड़ी चलाते हुए सोचा कि कामाक्षीपुर पहुँचने में कम से कम सात-आठ घंटे ड्राइव करना होगा। इसके बजाय, उसने अपने गाँव की ओर, जो ज्यादा नजदीक था, गाड़ी दौड़ा दी। नीतू की एस.यू.वी. देखते ही अशोक के घर का वॉचमैन गेट खोलकर उसे सलाम करने लगा। नीतू ने घर की घंटी बजाई, तो अशोक ने दरवाजा खोला। चार दिनों से फोन बंद रखने वाली अपनी दूसरी पत्नी को रात बारह बजे घर पर देखकर वह घबराहट में उसे गले लगा लिया। नीतू ने अपने पति की पीठ सहलाते हुए कहा, "मैं ठीक हूँ, आपको घबराने की जरूरत नहीं है। चलिए, अंदर चलते हैं।" रजनी भी कमरे से बाहर आई और नीतू को गले लगाकर बोली, "कहाँ चली गई थी? फोन भी बंद कर रखा था। हमें कितनी चिंता हुई थी, पता है? जल्दी बता, क्या हुआ, लेकिन उससे पहले..." उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

रजनी ने तुरंत हरीश को फोन करके नीतू के आने की खबर दी और उसे नीतू से बात करने को कहा। अगले आधे घंटे तक हरीश, शीला और अनुषा ने चार दिनों से संपर्क में न रहने वाली नीतू की खैरियत पूछी। नीतू ने उन्हें बताया कि वह सुरक्षित है और अगले दिन गाँव लौट आएगी। रवि भी जागकर बाहर आया और अपनी बहन को गले लगाकर उसकी सलामती देखकर उसकी आँखें नम हो गईं। नीतू ने भैया को आश्वासन दिया कि उसे कुछ नहीं हुआ और वह ठीक है। उसने कहा, "कल सुबह बात करते हैं," और रवि को सोने भेज दिया। अशोक के कमरे में जाकर नीतू ने उसे कॉफी और कुछ खाने को लाने को कहा और रजनी को भेजकर खुद फ्रेश होने बाथरूम चली गई। रजनी द्वारा लाई गई कॉफी और स्नैक्स लेने के बाद नीतू बोली, "मैं पाँच घंटे ड्राइव करके आई हूँ, बहुत थक गई हूँ। जो भी बात है, सुबह करेंगे। अब मैं सोने जा रही हूँ। हाँ, साहूकार का खेल खत्म हो गया, अब उसके बारे में सोचने की जरूरत नहीं। सुबह मुझे जगाने मत आना।" यह कहकर उसने अशोक के होंठों पर एक चुम्बन देकर सो गई। अशोक और रजनी भी बिना कुछ कहे उसके पास सो गए।

सुबह

नीतू सुबह उठकर नहा-धोकर बाहर आई, तो रश्मि कमरे में उसका इंतजार कर रही थी। उसे देखते ही रश्मि दौड़कर आई और रोते हुए उसे गले लगा लिया। नीतू ने उसके माथे पर चुम्बन देकर कहा, "क्यों रो रही है, मेरी छोटी? देख, मैं सही-सलामत आ गई हूँ।"

रश्मि ने रोते हुए कहा, "मम्मी, सोमवार से आपका फोन बंद था। हमें बहुत डर लग रहा था। आप कहाँ गई थीं? क्या हमें एक बार भी याद नहीं आया? चिन्नी भी बहुत उदास थी। वह ठीक से खेल भी नहीं रही थी। शीला आंटी उसे जबरदस्ती खाना खिलाती थीं।"

नीतू को अहसास हुआ कि चार दिन तक किसी से संपर्क न करना उसकी गलती थी, लेकिन अब वह कुछ कर भी नहीं सकती थी। दोनों कमरे से बाहर आए, तो रवि और अशोक टीवी पर न्यूज़ देख रहे थे, जिसमें पिछले दिन xxxx शहर में नीतू द्वारा किए गए काम की खबर दिखाई जा रही थी। रवि ने नीतू से कहा, "देख, xxxx शहर में शॉर्ट सर्किट से एक घर में आग लग गई और नौ लोग जिंदा जल गए। उनकी पहचान अभी तक नहीं हो पाई है।" नीतू ने संक्षेप में जवाब दिया, "हाँ, है ना?" अशोक उसे घूर रहा था, तो नीतू ने उसकी ओर देखकर आँख मार दी और मुस्कुराई। अशोक को कुछ समझ नहीं आया और वह चुपचाप बैठा रहा। रजनी ने सबको नाश्ते के लिए बुलाया, तभी हरीश का वीडियो कॉल अशोक के मोबाइल पर आया।

नीतू ने फोन अपने सामने लिया, तो स्क्रीन पर अपनी प्यारी बेटी का चेहरा देखकर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उधर, चार दिन बाद मम्मी को देखकर खुश हुई निशा जोर-जोर से "मम्मी... मम्मी..." चिल्लाते हुए फोन को गले लगाने की कोशिश कर रही थी। नीतू ने आँसू पोंछकर कहा, "चिन्नी, थोड़ी देर में मम्मी आ रही है। मत रो, मेरी सोनी।" उसने बेटी को चुम्बन देकर फोन काट दिया। नाश्ते के बाद नीतू ने कहा, "चलो, गाँव चलते हैं।" रवि ने ऑफिस के जरूरी काम के कारण न आने की बात कही और चला गया। रजनी और रश्मि तैयार होने गईं, तो अशोक ने नीतू को गले लगाकर पूछा, "चार दिन तक संपर्क में क्यों नहीं थी?" नीतू ने कहा, "उसके बारे में गाँव में आराम से बात करेंगे। पहले मुझे अपनी बेटी से मिलना है।"

अशोक ने अपने ड्राइवर को फोन करके कामाक्षीपुर में गाड़ी लाने को कहा और खुद एस.यू.वी. चलाने बैठ गया। नीतू ने रश्मि को अशोक के पास बैठाया और खुद रजनी के साथ पीछे की सीट पर बैठ गई। गाड़ी के पीछे ढेर सारे बैग देखकर रजनी ने पूछा, "इतने सारे बैग में क्या है?" नीतू ने कहा, "गाँव पहुँचकर बात करेंगे।" घर के बाहर शीला के साथ इंतजार कर रही निशा ने गाड़ी रुकते ही "मम्मी... मम्मी..." चिल्लाते हुए गेट की ओर दौड़ पड़ी। नीतू ने अपनी बेटी को गोद में उठाया, तो निशा ने उसे कसकर गले लगाया और अपनी टूटी-फूटी आवाज में "होबेला... होबेला (मत जाओ)" कहने लगी। नीतू ने अपनी प्यारी बेटी को सीने से लगाया, तो उसकी आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे। वह उसे प्यार करते हुए घर के अंदर चली गई। निशा माँ की गोद से नीचे नहीं उतरी और कोई कितना भी बुलाए, माँ को छोड़कर दूर नहीं गई।

शीला ने कहा, "अब बता, xxxx शहर में कोई काम था, ऐसा कहकर गई थी। एक फोन तक नहीं किया और फोन भी बंद रखा।"

नीतू ने जवाब दिया, "जरा शांत हो जा। इतना उत्तेजित होने की जरूरत नहीं। अपनी सेहत का भी ध्यान रख, नहीं तो बच्चे पर बुरा असर पड़ेगा। सब कुछ बताऊँगी। हरीश के आने के बाद शाम को बात करेंगे। अनुषा कहाँ है?"

शीला बोली, "वह फैक्ट्री के पास काम के लिए जल्दी चली गई। उसे तेरे आने की खबर भी नहीं है। मैंने अभी फोन किया था, लेकिन वह काम छोड़कर नहीं आ सकती।"

अशोक कॉफी पीकर फैक्ट्री के लिए निकल गया। नीतू ने रश्मि और निशा को उसके साथ भेजते हुए कहा, "लौटते वक्त निशा के लिए आइसक्रीम लेते आना।" घर में अब तीन सहेलियाँ रह गईं।

शीला ने पूछा, "अब बता, कोई नहीं है। क्या बात है? कहाँ गई थी? फोन क्यों बंद रखा?"

नीतू बोली, "सुबह तुमने न्यूज़ देखा होगा। xxxx शहर में शॉर्ट सर्किट से एक घर में आग लगी और दस लोग मरे।"

रजनी ने कहा, "वह बात छोड़। उससे हमें क्या फायदा? तू कहाँ थी, वह बता।"

नीतू ने जवाब दिया, "वह मेरे से ही जुड़ा है। उस घर में शॉर्ट सर्किट मैंने करवाया था। वे दस लोग गाँव के साहूकार और उसके नौ दोस्त थे।"

शीला ने घबराते हुए कहा, "क्या? तू कह रही है कि तूने उन सबको मार डाला?"

रजनी ने पूछा, "दस लोगों को जिंदा जलाया? उसकी क्या जरूरत थी?"

नीतू ने कहा, "तुम सबने जैसा समझा, वैसा नहीं है। वे लोग आग लगने से पहले ही इस दुनिया से बहुत दूर जा चुके थे। उसके बाद ही घर में आग लगी।"

रजनी बोली, "कणे, गोवा में नीग्रो लोग बम धमाके करके अराजकता फैलाते थे, इसलिए उन्हें मारना सही था। लेकिन साहूकार और उसके दोस्तों ने ऐसा क्या किया था? यह समझ नहीं आ रहा।"

नीतू ने बताया, "साहूकार को फैक्ट्री के मामले में हुई बेइज्जती से गुस्सा था। उसने मुझे यहीं मारने की योजना बनाई थी, लेकिन आखिरी पल में उसने योजना बदल दी। वह गाँव से जगह खाली करके शहर की अपनी सारी संपत्ति बेचकर उस पैसे के साथ किसी दूसरे शहर में भागने वाला था। शनिवार को बस्या ने मुझे साहूकार के बारे में सब बताया कि उसने गाँव की कई लड़कियों को डराकर-धमकाकर उनका शोषण किया था। मैंने तभी उसे मारने का फैसला कर लिया था, लेकिन जो हुआ, वह कुछ और था। साहूकार के दोस्तों ने खुद अपनी मौत की ओर कदम बढ़ाए, तो मैं उन्हें क्यों रोकती?"

नीतू ने शनिवार से साहूकार के घर जाने, उसके साथ बिस्तर साझा करने से लेकर शहर में हुई हर घटना को अपनी दोनों सहेलियों को विस्तार से बताया।

शीला ने चौंककर कहा, "साहूकार और उसके दोस्तों ने तुझे...!!!"

नीतू ने कहा, "हाँ, कणे। उन्होंने जूस में कामोत्तेजक दवा मिलाकर पूरी रात दस लोगों ने मिलकर मेरा सामूहिक शोषण किया। कौन, कैसे, और किस तरह से मुझे भोगा, मुझे अब तक कुछ पता नहीं। वह कैमरा देखने पर ही सब समझ आएगा। लेकिन अभी मुझे उसे देखने का मूड नहीं है। सोमवार के बाद फुर्सत में देखेंगे। मैंने उसे तुरंत लॉकर में रख दिया।"

रजनी ने कहा, "कणे, तू xxxx शहर से हमारे घर तक 580 करोड़ रुपये अकेले ले आई। रास्ते में कुछ हो जाता, तो?"

शीला बोली, "वही तो मैं कह रही हूँ। इसने जो खेल खेला, वह हमारी गलती थी। अब से तू गाँव से बाहर जाने की बात करे, तो तुझे तमाचा मारूँगी।"

नीतू हँसते हुए बोली, "फिलहाल तो मेरा कहीं जाने का मन नहीं है। लेकिन भाग्य में क्या लिखा है, कौन जानता है? साहूकार को ही देख लो। हमें उसका कोई परिचय नहीं था, फिर भी वह हमारे जीवन में आया और जो हुआ, वह तुम्हें बता ही चुकी हूँ।"

रजनी ने कहा, "ऐसी जटिल स्थिति में तू अकेले जोखिम मत ले। मैं तेरे साथ हूँ। यह आखिरी बार था। अब से तू अकेले ऐसे साहसिक काम मत करना। मैंने भी स्वामीजी का दिया हुआ द्रव ले रखा है। परिवार की भलाई के लिए मैं हर कदम पर तेरे साथ रहूँगी।"

शीला बोली, "इतने सारे पैसे का क्या करेंगे? मेरी जानकारी के अनुसार, यह सारा काला धन है। इसे हमारे खाते में रखना भी मुश्किल होगा।"

नीतू ने कहा, "कल से मैं भी यही सोच रही हूँ, लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा। इसके अलावा, तीन बड़े बैगों में सैकड़ों किलो सोने के बिस्किट हैं। उनका क्या करें, यह भी एक सिरदर्द है।"

अचानक एक आवाज आई, "पैसे और सोने के बारे में सोचने की जरूरत नहीं। हर समस्या का हल खुद-ब-खुद मिल जाएगा।"

तीनों सहेलियाँ दरवाजे की ओर मुड़ीं, तो स्वामीजी घर में आ रहे थे। तीनों ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। स्वामीजी को सोफे पर बिठाकर तीनों ने उनके चरण स्पर्श किए। शीला उनके लिए फलाहार लाने गई। स्वामीजी ने उसे सिर्फ फल और एक गिलास दूध लाने को कहा। फिर उन्होंने नीतू का सिर सहलाते हुए कहा, "तू अपने तीसरे गंडांत से भी बच निकली। अब दो और गंडांतों से पार पाना है। फिर सब कुछ सुखमय होगा। तेरी छोटी बेटी कहाँ है?"

नीतू ने कहा, "गुरुजी, वह थोड़ी देर पहले रश्मि और अशोक के साथ फैक्ट्री के पास गई है। मैं अभी फोन करके बुलाती हूँ।"

स्वामीजी बोले, "नहीं, बेटी। उसे स्वतंत्र रूप से घूमने दे। तू भी उसे डाँटने या रोकने मत जा। वह बच्ची जितनी आजादी से बढ़ेगी, उतना उसके भविष्य के लिए अच्छा है। वह कोई गलत काम नहीं करेगी, इसलिए उसे रोक मत। इस घर में लक्ष्मी की कृपा तेरी बेटी के कदमों से आई है। उसे बिना डर के निडर होकर बढ़ने दे। इससे सबका भला होगा।"

शीला ने स्वामीजी के लिए फल और दूध लाकर रखा और कहा, "मैं भी यही कहती हूँ। आश्रम में वह इतनी चुप रहती थी कि उसका रोना भी सुनाई नहीं देता था। यहाँ आने के बाद ही वह अपने बचपन को जी रही है। तुम इसे समझाओ कि अपनी बेटी को न डाँटे।"

स्वामीजी ने कहा, "नीतू, तू इस परिवार का आधारस्तंभ है और तेरी बेटी तुम सबकी सुरक्षा कवच है। वह जो भी करे, उसे मत रोक। साथ ही, तुम सब मिलकर उसे भगवान की भक्ति और अच्छी कहानियाँ सुनाओ। उसे जितना समझ आए, उतना काफी है।"

स्वामीजी ने रजनी से कहा, "रजनी, मैंने जो काम बताया था, वह अभी पूरा नहीं हुआ। रवि की अकेलापन दूर करने की कोशिश अभी सफल नहीं हुई। चिंता मत कर। यह फल सिर्फ उसे खिलाना। फिर सब ठीक हो जाएगा। नीतू, तुम सब इस घर में आए धन के बारे में चिंता मत करो। इसे स्वाभाविक रूप से उपयोग करने का रास्ता बन जाएगा। तेरे जीवन में एक व्यक्ति का प्रवेश होने वाला है। तू उससे एक बार मिल चुकी है। दोबारा मिलने पर तुझे उसका संकेत मिलेगा। मैं बस इतना कह सकता हूँ कि वह दूसरे धर्म का व्यक्ति है।"

स्वामीजी ने आगे कहा, "निशा इस घर का सुरक्षा चक्र और भाग्यदेवता है, और रश्मि इस घर की महालक्ष्मी है। कल तुम दोनों को यहाँ से लगभग सौ किलोमीटर दूर एक प्राचीन शिव मंदिर में ले जाओ। वहाँ दोनों से पूजा करवाओ। मंदिर के पुजारी को बता देना कि मैं, देवानंद स्वामी, तुम्हें भेज रहा हूँ। वे पूजा में हर तरह से मदद करेंगे। पूजा के बाद घर लौटकर रात में निशा और रश्मि को एक-दूसरे के पास सुलाना। अगले दिन रजनी, अपनी बेटी के साथ अपने गाँव लौट जाना। शिवरात्रि तक इस घर की दोनों लड़कियाँ एक-दूसरे से नहीं मिलें। यह बहुत जरूरी है। शिवरात्रि के दिन सुबह 4:47 बजे शुभ मुहूर्त में पूजा शुरू होगी। निशा अपनी भावी अत्तिया की गोद में बैठकर पूजा शुरू करे। दोनों का जन्म विपरीत नक्षत्रों में हुआ है, इसलिए यह करना जरूरी है। इससे उनके भविष्य में कोई रुकावट नहीं आएगी। किसी भी हाल में शिवरात्रि तक दोनों का मिलना नहीं चाहिए। यह ईश्वर की इच्छा है। मेरा फलाहार हो गया। मैं अब जाता हूँ। कल पूजा पूरी करके आना। शिवरात्रि के दिन सुबह तीन बजे मैं अपने शिष्यों के साथ यहाँ आऊँगा। यहाँ पूजा सामग्री की लिस्ट है, ले लो। इसमें लिखी हर चीज उसी मात्रा में लानी है। शिवरात्रि पर महारुद्राभिषेक और होम भी करना है। तुम सबको शुभ हो।"

स्वामीजी ने आगे कहा, "नीतू, जब निशा आश्रम में थी, वहाँ के चार कर्मचारी उसका बहुत प्यार और ध्यान रखते थे। उनका तुझ पर ऋण है। रजनी अकेले उस ऋण को चुकाने की कोशिश कर रही है, लेकिन तूने एक बार भी इसके बारे में नहीं सोचा। इस पर विचार कर।"

स्वामीजी ने नीतू को बाहर बुलाकर कुछ और बातें बताईं और उसका नमस्कार स्वीकार कर आशीर्वाद देकर चले गए। उनके जाने के बाद, तीनों सहेलियों ने उनके बताए गए निर्देशों पर खूब चर्चा की और फैसला किया कि सोमवार से शिवरात्रि तक रश्मि अपने गाँव में रहेगी और निशा यहाँ। किसी भी हाल में दोनों का मिलना नहीं चाहिए। तीनों ने मिलकर एस.यू.वी. में साहूकार के शहर वाले घर से लाए गए पैसे और सोने के बैगों को अशोक के घर में सुरक्षित रखा।

अशोक ने फैक्ट्री जाने से पहले निशा को दो कोन आइसक्रीम दी थी। निशा दोनों हाथों में आइसक्रीम लिए खुशी-खुशी फैक्ट्री की इमारत के आसपास घूम रही थी। अनुषा उसके पास आई और उसे गोद में उठाकर बोली, "चिन्नी, तू अकेले धूप में ऐसे घूम रही है? चल, हम दोनों रश्मि दीदी के साथ छाँव में बैठते हैं।" अशोक ने काम देखने के बाद कहा, "अनु, इन दोनों को लेकर घर चली जा। यहाँ का काम मैं देख लूँगा। तेरी दीदी भी तुझे पूछ रही थी।" अनुषा और रश्मि एक्टिवा पर बातें करते हुए निकल गईं, जबकि निशा उनके सामने खड़ी होकर बेफिक्र होकर रास्ते में आइसक्रीम खाती रही। घर पहुँचकर अनुषा ने अपनी दीदी को गले लगाया और उसकी कुशलता पूछी। निशा अपने दोनों हाथों और मुँह के आसपास आइसक्रीम लगाए घर में आई। सबने उसकी हालत देखकर हँस दिया। निशा ने रजनी की ओर हाथ बढ़ाकर उन्हें धोने को कहा।

शाम को हरीश स्कूल से लौटा और नीतू को देखकर खुशी से उसे जोर से गले लगा लिया। सुरेश भी अपनी माँ को बगल से गले लगाकर खड़ा हो गया। रश्मि के साथ खेल रही निशा ने देखा कि पापा और भैया मम्मी को गले लगा रहे हैं, तो वह भी दौड़कर आई और मम्मी की टाँगों से लिपट गई।

नीतू ने कहा, "जी, अपनी बेटी को देखो। तुम दोनों मुझे गले लगा रहे हो, तो यह मेरे पैरों से लिपट गई, जैसे कह रही हो कि मुझे मत छोड़ो।"

हरीश ने बेटी को गोद में उठाकर प्यार करते हुए कहा, "मेरी बेटी सबसे पहले, फिर तुम सब, है ना, चिन्नी?" निशा ने कुछ समझे बिना "हाँ" कहकर सिर हिलाया।

हरीश ने कहा, "नीतू, चार दिन से तू कहाँ थी? फोन क्यों बंद रखा? हमें कितनी चिंता हुई, तुझे पता है? इतना जरूरी काम क्या था?"

नीतू बोली, "जी, उस बारे में रात को बात करेंगे। अभी बच्चे हैं, उनके सामने यह बात नहीं करनी चाहिए। थोड़ा धैर्य रखो, रात को सब बताऊँगी।"

हरीश ने कहा, "चार दिन से धैर्य से ही इंतजार कर रहा हूँ। तू कहीं भी जा, मैं कभी रोकता नहीं। लेकिन इस तरह संपर्क से बाहर रहने पर मैं क्या करूँ? तुझे चार दिन न देखकर, न बात करके मेरी क्या हालत थी, यह मुझे ही पता है। बेटी 'मम्मी... मम्मी' कहकर रो रही थी, उसे देखकर मेरा दिल टूट रहा था।"

नीतू ने कहा, "जी, मुझे माफ कर दो। आगे से ऐसा नहीं होगा। लेकिन मेरी स्थिति ऐसी थी। अगर मैंने फोन चालू रखा होता, तो मेरे लिए बड़ा गंडांत तैयार था। इसके बारे में रात को बताऊँगी। अब जाओ, फ्रेश होकर आओ। ट्यूशन के लिए देर हो रही है।"

हरीश बोला, "आज ट्यूशन की छुट्टी दी है। तू जल्दी तैयार हो। तू सकुशल लौटी है, इसलिए मंदिर जाकर पूजा करवाने का मन था। बेटी को भी तैयार कर।"

शीला ने कहा, "नीतू, तू तैयार हो जा। चिन्नी को रजनी तैयार कर देगी। जी, रात के खाने से पहले घर लौटते वक्त कुछ मिठाई लेते आना।"

निशा पापा से पहले तैयार होकर कार के पास जाने की बजाय पापा की पल्सर के सामने खड़ी होकर चढ़ने की कोशिश कर रही थी। हरीश ने बेटी को गोद में उठाकर बाइक पर आगे बिठाया और निकल गया। कॉलेज से लौटे गिरीश ने अपनी माँ से कुछ देर बात की। नीतू ने निशा को पीछे आने को कहा, लेकिन वह "ना बल्ला" कहकर पापा के सामने टैंक पर बैठकर रास्ते में इधर-उधर देखते हुए खुशी से चिल्ला रही थी। हरीश ने पत्नी और बेटी को मंदिर ले जाकर परिवार के नाम से पूजा करवाई। निशा से पुजारी को दक्षिणा दिलवाकर आशीर्वाद लिया। दोनों ने निशा के लिए जरूरी कपड़े और सामान खरीदे और परिवार के लिए मिठाई लेकर घर लौटे। पापा के साथ बाइक पर घूमने की खुशी में निशा उछल-कूद रही थी और अपनी टूटी-फूटी आवाज में दीदी और भैया को अपनी सैर की कहानी सुना रही थी।
 
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नियति से बंधी नीतू - Part 130

रात के खाने के बाद...

शीला: तुम सब जाओ और बात कर लो, मैं यहाँ बच्चों के साथ रहूँगी।

सुरेश: अम्मा, कल स्कूल की छुट्टी है। सब लोग सामने अशोक अंकल के घर जा रहे हैं, ना? हम भी चलें, ना?

शीला: तू ज्यादा बात मत कर, चुपचाप जाकर सो जा। चिन्नी, तू भी दीदी के साथ कमरे में चल। हम सब सोने जा रहे हैं। अप्पा और अम्मा बात करके आते हैं।

शीला के कहते ही निशा ने रश्मि का हाथ पकड़ा और कमरे की ओर चली गई, जबकि सुरेश और गिरीश भी अपने कमरे में चले गए। नीतू के साथ हरीश, अशोक, रजनी, और अनुषा सामने वाले घर में गए। नीतू ने सबको बैठने को कहा और रजनी के साथ कमरे में रखे दस बैगों को बाहर लाई।

हरीश: नीतू, ये सब क्या है? उस दिन साहूकार के घर से सिर्फ चार बैग लाई थीं, वो भी इतने बड़े नहीं थे। ये बैग कहाँ से आए?

नीतू ने अपने पति के सवाल का जवाब देने के बजाय सारे बैग खोले। अंदर नोटों की गड्डियों को देखकर हरीश, अशोक, और अनुषा ऐसे चौंक गए जैसे उनके पास बम फटा हो।

नीतू: जी, मैं सोमवार को साहूकार का पीछा करते हुए उसके शहर वाले घर गई थी। वहाँ पास में रहकर उस पर नजर रख रही थी। मैंने खिड़की से देखा कि उसने शहर की सारी संपत्ति बेचकर नकदी में पैसा लिया। अगले दिन उसने नौ लोगों को घर बुलाया और हमारे बारे में बताया। उसने कहा कि अगर हमारी फैमिली को न भूलने वाला सदमा दे दिया तो पचास करोड़ देगा। मुझे बहुत डर लगा कि साहूकार अगर अपनी योजना में कामयाब हो गया तो हमारे बच्चों को नुकसान हो सकता है। अनुषा अकेले फैक्ट्री जाती है। अगर मैं उसके साथ होती, तो घर में निशा और शीला अकेले रहते। सुरेश अगर आपके साथ स्कूल में होता, तो गिरीश और रश्मि अकेले कॉलेज जाते। रजनी भी घर में अकेली रहती। हम कितने दिन सावधान रह सकते हैं, आप ही बताइए। एक दिन चूक भी हो जाए तो पचास करोड़ की लालच में लोग कुछ भी कर सकते हैं। इसलिए मैंने उसी पल साहूकार और उन नौ लोगों को दुनिया से मुक्त करने का फैसला कर लिया। आज सुबह तुम सबने टीवी पर खबर देखी होगी—xxxx शहर में शॉर्ट सर्किट से घर में आग लगी और दस लोग जिंदा जल गए। लेकिन आग लगने से पहले ही वो सब मर चुके थे। मैंने उन्हें मारने के बाद घर में शॉर्ट सर्किट करवाया और गैस खोल दी थी। ये सारा पैसा साहूकार के घर से लाया है, करीब 580 करोड़। सोने का हिसाब मुझे भी नहीं पता। पुलिस को मेरे मोबाइल की लोकेशन न पता चले, इसलिए मैंने फोन बंद रखा था। यही चार दिन की कहानी है।

नीतू ने जो कहने का फैसला किया था, वही सबको बताया और चुपचाप बैठ गई। सारी सच्चाई जानने वाली रजनी शांत बैठी रही। हरीश और अशोक को समझ नहीं आया कि क्या कहें, और वो नीतू को ही देखते रहे। अनुषा अपनी दीदी के पास आई और उसे गले लगा लिया।

अनुषा: दीदी, तुमने जो किया, वो सब हमारे परिवार के भले के लिए था। मैं इसे मानती हूँ। लेकिन अगर तुम्हें कुछ हो जाता, तो हम कैसे जीते? क्या तुमने इसके बारे में सोचा?

हरीश: हाँ, नीतू। शादी के बाद से हमने एक दिन भी बिना बात किए नहीं बिताया। इन चार दिन तू संपर्क में नहीं थी, मेरी क्या हालत थी! बस बुरे-बुरे ख्याल आ रहे थे।

अशोक: हमारा परिचय कुछ महीनों का ही है, लेकिन हमारा रिश्ता जन्म-जन्मांतर का लगता है। आगे से ऐसी जोखिम भरी हरकत मत करना। अगर ऐसी स्थिति आए, तो पहले मुझे या हरीश को सब बता और हमें साथ ले जा।

नीतू: तुम सब बेकार में डर रहे हो। मुझे कुछ नहीं होगा। स्वामीजी ने पहले ही इस तरह के खतरे की चेतावनी दी थी, लेकिन ये साहूकार के रूप में आएगा, ये नहीं सोचा था। ऐसी मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने के लिए ही स्वामीजी ने हमें वो खास शक्ति वाला द्रव दिया था। मेरी जिंदगी में अभी अपनी बेटी के साथ खेलना, उसे बड़ा होते देखना, उसकी शादी करना, और उसके बच्चे को गोद में खिलाना बाकी है। तब जाकर मुझे मुक्ति मिलेगी। इसलिए तुम सबको अब इस तरह डरकर नहीं जीना चाहिए। जो भी आए, हिम्मत से सामना करना चाहिए। यही तुम सबको सीखना है, समझे? मैं अपनी बेटी के साथ सोने जा रही हूँ। तुम लोग इन बैगों को ध्यान से रखो और आ जाओ, या यहीं सो जाओ। कुछ दिन आराम से रहूँगी, फिर इस पैसे का क्या करना है, सोचूँगी। चल, रजनी, तू भी चल। अनु, हम सोने जा रहे हैं। यहाँ का काम तुम्हारे भैया लोग देख लेंगे।

शीला और रश्मि के बीच सोई निशा को नींद में भी अपनी माँ के आने का अहसास हुआ। उसने रश्मि को पार करके अपनी माँ के ऊपर चढ़कर उसकी छाती से चिपककर सो गई। नीतू को भी अपनी बेटी के प्यार भरे आलिंगन में अच्छी नींद आ रही थी। माँ-बेटी सुबह तक सोती रहीं, जब बाकी लोग नहा-धोकर तैयार हो चुके थे। हरीश अपनी पत्नी को जगाने आया, तो निशा ने आँखें खोलकर पापा को मुस्कान दी और फिर माँ से लिपटकर सो गई। किसी ने भी माँ-बेटी को जगाने की कोशिश नहीं की। दोनों दस बजे उठीं और आलस्य के साथ लिविंग हॉल के सोफे पर आकर बैठ गईं। शीला और रजनी ने बाकियों को स्वामीजी के आने और उनकी बातों के बारे में बताया। रश्मि ने उदासी से कहा: आंटी, क्या मैं और चिन्नी दो महीने तक नहीं मिल सकते?

शीला ने उसका सिर सहलाते हुए कहा: हाँ, कणम्मा। स्वामीजी जो कहते हैं, वो हमारे भले के लिए ही होता है। कल तुझे चिन्नी को गोद में बिठाकर शिवजी की पूजा करनी है। फिर रात को तुम दोनों एक साथ सोओ। इसके बाद शिवरात्रि तक तुम्हें मिलना नहीं है। बुरा मत मान, बस दो महीने की बात है। फिर तू यहीं रहेगी।

रश्मि: ठीक है, आंटी। जैसा आप कह रही हैं, वैसा करूँगी। लेकिन चिन्नी के साथ न खेलना और उसे न देखना मन को बहुत उदास करता है।

शीला: मुझे समझ में आता है, प्यारी। लेकिन स्वामीजी के कहे अनुसार चलना होगा। दो महीने तक तुझे इस घर में न आने की तकलीफ होगी। लेकिन इसका भी उपाय है। दो हफ्ते बाद गिरीश को कॉलेज में इम्तिहान की पढ़ाई के लिए छुट्टी मिलेगी। तब उसे एक हफ्ते के लिए तुम्हारे गाँव भेजूँगी। तुम दोनों वहाँ पढ़ाई कर सकते हो।

रश्मि शरमाते हुए: ठीक है, आंटी। जैसा आप कहें।

दोनों बात करके कमरे से बाहर आए, तो नीतू और निशा अभी भी नींद के नशे में सोफे पर बैठे थे।

रजनी: क्यों, माँ-बेटी इतनी देर सोने के बाद भी नींद में ही हो? जल्दी तैयार हो, नाश्ता करें।

नीतू: दस बज गए और अभी तक किसी ने नाश्ता नहीं किया?

रजनी: मैं और शीला छोड़कर बाकी सबने कर लिया। तुम दोनों महारानियाँ इतनी देर तक सो रही थीं, इसलिए तुम्हारा इंतजार कर रहे थे। तू तैयार हो, तो हम भी खा लें। चल, चिन्नी, मैं तुझे नहलाती हूँ।

नीतू: शीला, तू समय पर नाश्ता और खाना खा। अब से घर का कोई काम मत कर। आज ही गिरी को कहूँगी कि उनके गाँव में कोई नौकरानी मिले, तो सब ठीक हो जाएगा। अनु, फैक्ट्री में काम के लिए आए गाँव के लड़कों को आईडी कार्ड और एडवांस पैसे दिए?

अनुषा: दीदी, सबको आईडी कार्ड दे दिए। मैं और अशोक भैया ने सोमवार को ही बाँट दिया। लेकिन तुम्हारे आने तक किसी ने एडवांस पैसे लेने से मना कर दिया। दीदी, अगर तुम आज आ रही हो, तो मैं अभी बस्या को फोन करके उन सबको बुलाने को कहती हूँ।

नीतू: आज नहीं, कणम्मा। बस्या को कह दे कि सोमवार को सबको बुलाएँ, उसी दिन पैसे दे देंगे। आज मुझे और काम हैं। तू और तेरा भैया फैक्ट्री गए? जी, अशोक, उन लड़कों को ट्रेनिंग देने वालों से बात हुई? उन्होंने कब से ट्रेनिंग शुरू करने को कहा?

अशोक: हाँ, उनसे सब बात हो गई। अगले महीने की पहली तारीख से ट्रेनिंग शुरू होगी। दो महीने में उन्हें फैक्ट्री के लिए जरूरी सारी स्किल्स की ट्रेनिंग दी जाएगी। चल, अनु, हम चलते हैं। नीतू, तुझे कौन सी गाड़ी चाहिए?

नीतू: अभी मैं और हरीश कल की पूजा के लिए फूल, फल, भगवान के लिए साड़ी और शिवजी के वस्त्र खरीदने जा रहे हैं। तुम इनोवा छोड़कर चले जाओ, वो हमारे लिए सुविधाजनक है। जी, तुमने अपने भाई प्रताप को कल के लिए बस बुक करने को कहा था या भूल गए?

हरीश: कल के लिए बस बुक कर दी है। शीला ने जो नाश्ता-खाने की व्यवस्था बताई थी, वो भी रसोइए से कह दिया है। तू तैयार हो, तो हम मार्केट जाएँ। लेकिन बस क्यों? हम इतने लोग हैं?

नीतू ने सबके चेहरे देखे: आगे तुम्हें खुद पता चलेगा। मैं अभी तैयार होकर आती हूँ।

नीतू ने नहाकर, नाश्ता करके बेटी को दीदी-भैया के साथ खेलने को कहा और पति के साथ मार्केट चली गई।

नीतू: जी, पहले सुकन्या के घर चलते हैं। कल उसे भी मंदिर ले चलें।

दोनों सुकन्या के घर पहुँचे। वहाँ उसका पति भी था और दोनों का आत्मीय स्वागत किया। नीतू ने आने का कारण बताया और कल मंदिर आने को कहा। दंपति खुशी से मान गए। हरीश सुकन्या के पति से बात करने लगा, तो नीतू किचन में कॉफी बना रही सुकन्या के पास गई और उसके नरम नितंबों को दबाते हुए बोली:

नीतू: क्या टीचर मैडम, अपने मास्टर के साथ रासलीला कैसी चल रही है? कोई मीठी खबर?

सुकन्या हँसते हुए: अभी तो एक महीना भी नहीं हुआ। अगले हफ्ते चेक करूँगी। अगर कोई अच्छी खबर हुई, तो सबसे पहले तुझे बताऊँगी। आखिर तू ही तो इसका कारण है।

नीतू: चिंता मत कर, पक्का अच्छी खबर होगी। फिर क्या, तुम्हारा मास्टर तुझे अपनी बाँहों में लेना बंद तो नहीं करेगा?

सुकन्या: छी... छी... ऐसा कैसे हो सकता है? इस जन्म में हरीश जी ही मेरे असली पति हैं। उन्हें न देना कैसे संभव है?

नीतू: चल, अब हम सविता मैडम के घर चलते हैं। उन्हें भी कल मंदिर के लिए बुलाएँ और उनके मन की तकलीफ के बारे में बात करके कोई हल निकालें।

सुकन्या: ठीक है, पहले कॉफी पी, फिर चलते हैं।

नीतू ने वहाँ से निकलते वक्त सुकन्या को अपने साथ ले जाने की बात उसके पति से कही। उसने कहा: मैडम, जरूर ले जाइए। आपके घर आने-जाने के बाद से मेरी पत्नी बहुत खुश रहती है। पहले मैंने अपनी माँ की बात मानकर इसके साथ बहुत अन्याय किया। अब मुझे अपराध बोध होता है। सुकन्या, कल के लिए कपड़े ले ले। आज रात वहीं रहना और कल वहीं से निकलना। मैं सुबह पाँच बजे तक आपके घर पहुँच जाऊँगा।

हरीश: कल जरूर आना, लेकिन आज रात हमारे साथ खाना खाने भी मत भूलना। इंतजार करेंगे।

तीनों वहाँ से निकले और सविता मैडम के घर की ओर मुड़े। हरीश ने अपनी पत्नी की ओर देखा और बिना कुछ कहे वहाँ पहुँचकर पूछा कि वे यहाँ क्यों आए हैं।

नीतू: यहाँ क्यों आए, ये बाद में बताऊँगी। अभी चलो, कल की पूजा के लिए सविता को भी साथ ले जाना है।

सविता ने नीतू और सुकन्या का हँसते हुए स्वागत किया। हरीश को देखकर उसके चेहरे पर चमक आ गई, जिसे नीतू ने गौर किया।

सविता: सर, आइए। बहुत दिनों बाद आप हमारे घर आए। ये बहुत खुशी की बात है।

नीतू: सविता मैडम, सिर्फ आपके सर ही नहीं, हम भी आए हैं। हमें तो देख ही नहीं रही।

सविता हड़बड़ाते हुए: ऐसा नहीं है, मैडम। वो... वो... मैं...

नीतू हँसते हुए: मैं तो मजाक कर रही थी। घबराइए मत। कल आप और आपके घरवाले फ्री रहकर हमारे साथ मंदिर चलें। एक पूजा करवा रहे हैं, इसलिए आपको बुलाने आए। साथ में फैमिली आउटिंग भी हो जाएगी।

सविता: मैडम, मेरे पति ऑफिस के काम से बेंगलुरु गए हैं। मैं तो आ सकती हूँ, लेकिन घर पर बच्चे अकेले रह जाएँगे।

नीतू: अरे, बच्चों को घर पर क्यों छोड़ेंगी? मैंने तो पूरी फैमिली को कहा, जिसमें आपके बच्चे भी शामिल हैं। हमारे बच्चे भी तो आ रहे हैं। वैसे, आपने अपने बच्चों को हमारे घर की पूजा में भी नहीं लाया था।

सविता: अभी दोनों अपनी नानी के घर गए थे। एक मिनट, मैं उन्हें आप सब से मिलवाती हूँ। सुकन्या को तो पहले से ही उनसे अच्छी जान-पहचान है।

सविता अपने दोनों बच्चों को कमरे से लाई: ये मेरे बच्चे हैं। ये बड़ी बेटी निकिता, दूसरी पीयू में पढ़ती है। ये छोटी बेटी नमिता, पहली पीयू में है।

नमिता: नमस्ते, आंटी। मैंने आपको उस दिन कॉलेज के पास देखा था। आप गिरीश की माँ हैं, ना?

नीतू: हाँ, कणम्मा। तू बहुत प्यारी है। तुझे गिरीश से जान-पहचान है?

नमिता: हाँ, मैं और गिरीश क्लासमेट्स हैं। दीदी हमारी सीनियर है। हम दोनों उसी कॉलेज में पढ़ते हैं। गिरीश बहुत होशियार है, आंटी। पढ़ाई में मेरी बहुत मदद करता है।

नीतू: तुझे इतनी जान-पहचान है, फिर भी तू हमारे घर एक बार भी नहीं आई। बहुत बुरा किया। निकिता, तू तो कुछ बोल ही नहीं रही?

नमिता: आंटी, दीदी फुल साइलेंट मोड में रहती है। इसलिए उसकी बातें भी मैं ही बोलती हूँ। गिरीश ने कई बार घर आने को कहा, लेकिन मेरे पास साइकिल नहीं है और स्कूटी चलाना नहीं आता। मैं रोज दीदी के पीछे बैठकर कॉलेज जाती-आती हूँ। बस यही मेरा काम है।

नीतू हँसते हुए: ठीक है, अब से जब तुझे घर आने का मन हो, मैं गिरीश को यहाँ भेजूँगी। तू उसके साथ आ जाना। कल तुम दोनों हमारे साथ xxxx पहाड़ी के मंदिर चलने को तैयार हो?

निकिता: हाँ, आंटी। उस मंदिर के बारे में मेरे दोस्तों ने बहुत बताया है। मैंने पापा से वहाँ ले जाने को कहा था, लेकिन उनके पास ऑफिस के काम की वजह से समय ही नहीं मिलता।

नीतू: यहाँ आ, निकिता। तू जब बोलती है, तो सुनते रहने का मन करता है। तेरा कंठ बहुत मधुर है। हमारे साथ तो कुछ बोल।

सविता: मैडम, ये बचपन से बहुत शांत रही है। सिर्फ अपने पापा के साथ खूब बोलती है। इसलिए छोटी उसकी बातें भी बोलती है।

नीतू: सविता, पहले तुम मुझे मैडम कहना बंद करो। जैसे मैं तुम्हें नाम से बुलाती हूँ, तुम भी मुझे वैसा बुलाओ। अब तुम तीनों हमारे साथ हमारे घर चलो। रात वहीं रुको और कल सुबह मंदिर चलें। मुझे भी खुशी होगी।

सविता कुछ कह पाती, उससे पहले नमिता बोली: चल, अम्मा। मैंने गिरीश का घर भी तो नहीं देखा। जल्दी पापा को फोन कर, उन्हें बता कि हम जा रहे हैं। मैं और दीदी तैयार होकर आते हैं। आंटी, आपके घर में छोटी सी प्यारी बच्ची है, ना? आप कहते थे कि वो गुड़िया जैसी है। मैं उसे भी देखना चाहती हूँ। जल्दी फोन कर, अम्मा।

सविता हँसते हुए: ठीक है, तुम दोनों तैयार हो। मैं तुम्हारे पापा को बता देती हूँ और तैयार हो जाती हूँ।

सब लोग वहाँ से निकले और मंदिर के लिए जरूरी फूल, फल, पूजा सामग्री, और भगवान के वस्त्र खरीदे। सविता के मना करने के बावजूद नीतू ने दोनों लड़कियों के लिए सुंदर चूड़ीदार खरीदे और कल पूजा में पहनने को कहा। हरीश ने रास्ते में सबके लिए मिठाई और निशा के लिए उसकी पसंदीदा आइसक्रीम खरीदी, फिर घर की ओर रवाना हुए। घर पहुँचते ही कांपाउंड में निशा एक डंडा लिए सुरेश के पीछे उसे मारने दौड़ रही थी। माँ को देखते ही वो उसकी ओर दौड़ी। माँ की बाँहों में चढ़कर निशा ने सुरेश भैया की ओर इशारा करते हुए अपनी भाषा में उसकी शिकायत करने लगी। निकिता और नमिता निशा को गुड़िया से भी ज्यादा प्यारी देख रही थीं। निशा ने उन्हें देखकर माँ का गाल थपथपाया और उनकी ओर इशारा किया।

नीतू: ये दोनों दीदी हैं, चिन्नी। हैलो बोल।

माँ की बाँहों में बैठी निशा ने आगे झुककर दोनों के गालों पर चुम्मी दी और किलकिलाकर हँसी। निकिता ने उसे गोद में लेकर प्यार किया और अपनी बहन के साथ गिरीश के पास जाकर सुरेश और रश्मि से परिचय करवाया। फिर निशा के साथ खेलने लगीं।

प्रताप घर आते ही बोला: भैया, कल सुबह साढ़े पाँच बजे बस घर के सामने होगी। रास्ते में रसोइए के घर से नाश्ते-खाने के कैरियर ले लेंगे। शीला अत्तिया ने कहा कि सुबह के नाश्ते के लिए उप्पीट्टू, चटनी, खारा पोंगल, गोज्जू, और कैरट हलवा, और दोपहर के लिए वेजिटेबल पुलाव, दही, दही पचड़ी, पकौड़ा, और ड्राई फ्रूट्स हलवा। पानी के लिए तीन कैन ले लेंगे।

नीतू: कैन नहीं, प्रताप। उससे ढोने की तकलीफ होगी। उसकी जगह बिसलरी बोतलें लें, वो बेहतर है। एक मिनट रुको, मैं अभी अनु को फोन करके बता देती हूँ कि फैक्ट्री से लौटते वक्त क्या-क्या लाना है।

हरीश: नीतू, वो दोनों वहाँ का काम देख लें। मैं ले आता हूँ। प्रताप, तुझे अब स्टेशन जाना है?

प्रताप: हाँ, भैया। कल नहीं रहूँगा, इसलिए सबको काम बाँटकर आना है।

नीतू: प्रताप, पाँच मिनट बैठ। रसोइए ने खाना भेज दिया है। खाना खाकर जा। जी, आप सुकन्या को साथ ले जाइए।

सुकन्या खुशी-खुशी हरीश के साथ निकल गई। सविता मन ही मन सोच रही थी कि सर और इसके बीच कुछ चल रहा है, लेकिन समझ नहीं आ रहा। प्रताप ने खाना खाया और एक घंटे बाद हरीश और सुकन्या ढेर सारी बिसलरी बोतलें, बिस्किट, स्नैक्स, जूस, और अन्य खाने की चीजें लेकर लौटे, जो नीतू ने बताए से भी ज्यादा थीं। निशा पापा के पीछे घर में दौड़ी, उनकी गोद में चढ़ी, गाल पर चुम्मी दी, और आइस... आइस... कहकर हाथ बढ़ाया। दोपहर का खाना खाने के बाद नीतू और हरीश कॉलोनी में नए आए श्रीधर-रुक्मी दंपति के घर गए और उन्हें कल की पूजा के लिए बुलाया। साथ ही रात के खाने के लिए घर आने को कहा। अपनी गली के पाँच परिचित परिवारों को भी बुलाया और रात के भोजन के लिए आमंत्रित किया। आर्किटेक्ट रमेश ने रिश्तेदार की शादी में जाने की वजह से मना किया, और बसव के परिवार को भी एक शादी में जाना था। शाम छह बजे रवि भी गाँव से लौटा। उसने निशा और रश्मि के लिए नए कपड़े लाए थे। निशा मामा की गोद में चढ़कर उनसे चॉकलेट लेकर खेलने चली गई। रात को सबने खुशी से गपशप की और रसोइए के भेजे बिसी बेले बाथ, दही वड़ा, और मिठाई खाई। अगली सुबह मिलने की बात कहकर सब चले गए। छह बच्चे और चार पुरुष सामने वाले घर में सोए, जबकि औरतें यहाँ सो गईं।

सुबह चार बजे नींद में डूबी निशा ने माँ को जगाने के लिए एक बार घूरा। फिर तीन दीदियों को तैयार होते देखकर उसके होंठों पर मुस्कान आ गई। घर के सामने लग्जरी बस आई, तो प्रताप की गोद में बैठी निशा छटपटाकर बस की ओर दौड़ी और उसे चारों ओर घूमकर देखने लगी। सुकन्या का पति भी समय पर आ गया। 35-40 लोग बस में चढ़े और रास्ते में रसोइए के घर से कैरियर लेकर अपनी यात्रा शुरू की।

मंदिर पहुँचकर नीतू ने पुजारी को आने का उद्देश्य बताया और कहा कि उन्हें देवानंद स्वामीजी ने भेजा है। पुजारी ने स्वामीजी का नाम सुनते ही सबका खुशी से स्वागत किया और रश्मि की गोद में निशा को बिठाकर उससे पूजा शुरू करवाई। निशा रश्मि की गोद से शीला की गोद में, फिर नीतू, रजनी, और अंत में अनुषा की गोद में गई। थककर वो वहीं सो गई। दो घंटे की लंबी पूजा पूरी हुई, फिर नीतू ने अपनी बहन से बेटी को जगाने को कहा और महा मंगल आरती में शामिल हुए। पूजा के बाद प्रसाद बाँटा गया। सब बाहर पहाड़ी के समतल हिस्से में चटाई बिछाकर बैठ गए। प्रसाद खाने के बाद निशा फिर रवि की गोद में सो गई। शीला ने उसे जगाया: चिन्नी, देख, भैया-दीदी खरगोशों के साथ खेल रहे हैं। तू भी जा।

निशा ने आँखें मलते हुए खरगोशों को देखा और मुस्कुराते हुए रवि की गोद से उतरकर उनकी ओर दौड़ी। खरगोश, जो किसी के पास नहीं जाते थे, निशा के पास आकर उसे घेर लिया। निशा जमीन पर बैठकर उनके सिर सहलाने लगी। कुछ खरगोश उसकी गोद में कूदकर प्यार दिखा रहे थे। मंदिर के पुजारी ने कहा: इस बच्ची में कोई दैवीय शक्ति लगती है। मैंने आज तक खरगोशों को किसी के पास यूँ जाते नहीं देखा। आज देखा, बहुत खुशी हुई। इस बच्ची को प्यार और ध्यान से पालो। इसे किसी भी वजह से डाँटना मत। ये बहुत प्यारी है। नीलकंठ तुम सबका भला करे।

पुजारी ने आशीर्वाद देकर विदा ली। नीतू ने निशा के हाथ में कैरट हलवा दिया। खरगोशों ने उसके हाथ से खाया और चटखारे लेने लगे। निशा खुशी से हँसते हुए मम्मी... पप्पा... आती... कहकर सबको बुलाकर खरगोश दिखाने लगी।

नीतू के इशारे पर सुकन्या सविता को घूमने के लिए ले गई। नीतू भी उनके पीछे चली गई। सब से दूर जाने पर नीतू उनके पास आई और बोली:

नीतू: सविता मैडम, मुझे लगता है आपको यहाँ आकर खुशी हुई। खासकर आपके साथ बात करने के लिए ही मैंने आपको यहाँ बुलाया। मेरी बात का बुरा मत मानना, लेकिन जब भी आप हरीश को देखती हैं, आपके चेहरे की चमक दोगुनी हो जाती है और एक अजीब सी खुशी दिखती है। इसका कारण जानने की उत्सुकता है। मैं सीधे पूछती हूँ—क्या आप हरीश को पसंद करती हैं या प्यार करती हैं?

नीतू के सवाल से सविता एक पल के लिए स्तब्ध रह गई। उसे पहले से अंदाजा था कि ऐसा मौका आएगा।

सविता: नीतू, तुम्हारे सीधे सवाल का मैं भी सीधा जवाब दूँगी। मैं और मेरे पति खुश हैं और मैं उनसे बहुत प्यार करती हूँ। लेकिन अपनी दोनों बेटियों से भी ज्यादा प्यार करती हूँ। उतना ही प्यार मुझे हरीश जी पर भी है। सात साल पहले मेरे पति को प्रमोशन मिला। तब से वो घर से ज्यादा ऑफिस के काम के लिए बाहर रहते हैं। तीस की उम्र पार करने के बाद औरत को अपने पति या प्रेमी की कितनी जरूरत होती है, ये मुझे नहीं बताना, तुम जानती हो। मैं जानती थी कि मेरे पति परिवार और बच्चों के भविष्य के लिए मेहनत कर रहे हैं, फिर भी उनके साथ निजी समय न बिता पाने की वजह से मैं मानसिक रूप से टूट रही थी। तभी हरीश जी का अच्छा स्वभाव, बर्ताव, समझदारी, और दूसरों से सम्मान के साथ बात करने का तरीका मुझे उनकी ओर खींचने लगा। इसे प्यार, मोह, या कामुकता कुछ भी कह सकते हो, लेकिन उनकी बाँहों में बँधकर अपना तन-मन उनके साथ बाँटने की चाहत दिन-ब-दिन बढ़ रही है। मेरी प्यारी सहेली सुकन्या भी बिना बच्चों के और अपने पति के उस सामर्थ्य न होने की वजह से बहुत दुखी थी। उसे देखकर मैंने हरीश जी के बारे में अच्छा राय बनवाया और कहा कि अगर उनके साथ तेरा बच्चा हुआ, तो उनके गुण उसमें आएँगे। हाँ, नीतू, मैं हरीश जी से प्यार करती हूँ। इसके लिए तुम जो भी सजा दोगी, मैं सहने को तैयार हूँ, क्योंकि तुम उनकी धर्मपत्नी हो।

नीतू मुस्कुराते हुए: सजा तो जरूर मिलेगी। वो सजा दर्द के साथ-साथ संतुष्टि भी देगी। वो क्या है, सुकन्या से पूछ लो। अगर तुम्हें भी ऐसी सजा भोगने का मन है, तो बता। मैं हर तरह से कोशिश करूँगी। सुकन्या, अपनी मैडम को बताओ कि सजा कैसी है। फिर सविता, तुम खुद तय करो कि तुम्हें वो सजा चाहिए या नहीं। तुम दोनों बात करो, मैं अभी आती हूँ।

नीतू वहाँ से चली गई। सविता को समझ नहीं आया कि नीतू ने क्या कहा। वो और सुकन्या एक-दूसरे को देखती रहीं। सुकन्या ने सविता को हरीश के साथ अपने प्रेम और नीतू की मदद की सारी बातें विस्तार से बताईं।

सविता ने सहेली के कंधे पर मुक्का मारते हुए: कमाल की चालाकी है, कणम्मा। तू मुझसे पहले हरीश को पटा चुकी है। बिलकुल मेरी तरह ही तू भी उनके साथ बिस्तर पर चढ़ चुकी है। चल, मैं नीतू से कहूँगी कि मैं भी सजा भोगने को तैयार हूँ। अब हरीश से दूर रहना मेरे लिए असंभव है। तूने जो बताया, उसे सुनकर मैं भी कल्पनाओं में खो गई और मेरी चूत भी गीली हो गई। ये सब तेरी वजह से, चोरनी। [सहेली को गले लगाते हुए] तुम दोनों की बात सुनकर बहुत खुशी हुई। जल्दी हमें अच्छी खबर देना।

दोनों सबके पास लौटीं। निशा खरगोशों के झुंड में घूम रही थी। नीतू प्लेट लेकर उसकी पीछे-पीछे उसे खाना खिलाने को दौड़ रही थी। निशा को खाना खिलाकर लौटी नीतू के कानों में सविता ने कहा कि वो भी सजा भोगने को तैयार है। नीतू हँसकर बोली: तुम अपनी कोशिश में लगी रहो। मैं भी तुम दोनों को मिलाने की पूरी कोशिश करूँगी।

इधर सुरेश, गिरीश, रश्मि, निकिता, नमिता, और नीतू की गली की तीन लड़कियाँ मिलकर आँखमिचौली खेलने लगीं। पहले सुरेश को बकरा बनाकर उसे ढूँढने को कहा और सब छिपने चले गए। रश्मि की एक ही दिन में करीबी दोस्त बन चुकी नमिता उसके साथ छिपने गई, और गली की तीनों लड़कियाँ भी उनके साथ थीं। गिरीश और निकिता चट्टानों की ओट में छिपे थे। एक मेंढक निकिता के पैर पर कूदा, तो वो डरकर गिरीश से चिपक गई। निकिता की मादक खुशबू और उसके गोल-मटोल स्तनों का उसके सीने से टकराना गिरीश के लंड को पूरी तरह खड़ा कर गया। उसका लंड निकिता की चूत के ऊपरी हिस्से को चूड़ीदार के ऊपर से छू रहा था। कुछ पल तक आलिंगन में रही निकिता को लगा कि कोई सख्त डंडा उसकी चूत को चुभ रहा है। पीछे हटकर देखा, तो गिरीश का लंड पूरी तरह तना हुआ था। वो शरमाकर सिर झुका लिया। गिरीश की कामवासना चरम पर थी। उसने जवानी की दहलीज पार कर चुकी निकिता को फिर से बाँहों में लिया और उसकी पीठ सहलाते हुए गले पर एक प्यार भरा चुम्बन दिया। निकिता को जीवन में पहली बार पुरुष के चुम्बन का अनुभव हुआ। उसका हर अंग उल्लास से भर गया और उसने भी गिरीश को कसकर गले लगाया। कुछ पल तक दोनों आलिंगन में रहे। गिरीश ने निकिता को थोड़ा पीछे हटाया और उसके कांपते हुए लाल होंठों पर अपने होंठ रखकर उसे जीवन का पहला रसभरा चुम्बन दिया। जैसे ही उनके होंठ मिले, निकिता की चूत में छोटा सा बाढ़ आ गया और रतिरस रिसने लगा, जिससे उसकी चड्डी गीली हो गई। गिरीश निकिता के होंठों का मधुर रस चूस रहा था। उसका हाथ पीठ से नीचे सरककर निकिता के गोल और नरम नितंबों तक पहुँचा और उनकी कोमलता को परखने लगा। अब तक किसी लड़के को पास न फटकने देने वाली निकिता ने आज अपने जूनियर गिरीश को न सिर्फ अपने होंठों का रस चखने दिया, बल्कि अपनी गांड को मसलने की इजाजत भी दी।

नमिता आँखमिचौली में पहले आउट हो गई थी। सुरेश बाकियों को ढूँढने निकला। नमिता को पेशाब की जरूरत पड़ी। चट्टानों की ओट में काम निपटाने के बाद उसे एक औरत की सिसकारी की आवाज सुनाई दी। उत्सुकता से उस दिशा में गई और छिपकर देखा, तो दृश्य देखकर दंग रह गई। गिरीश की उंगलियाँ निकिता की नरम गांड को मसल रही थीं और वो उसकी चूड़ीदार के ऊपर से एक स्तन को मुँह में लेकर चूस रहा था। अपनी शांत और लड़कों से दस फीट दूर रहने वाली दीदी का ये नया अवतार देखकर नमिता हैरान थी। उससे भी ज्यादा हैरानी इस बात की थी कि ये सौभाग्य उसके पक्के दोस्त गिरीश को मिला था। गिरीश ने निकिता की लेगिंग्स नीचे सरकाई। निकिता को बहुत शर्मिंदगी हुई, लेकिन उसने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। गिरीश ने निकिता का टॉप कमर तक उठाया और काली चड्डी को रतिरस से गीला देखकर मुस्कुराया। उसने चड्डी के ऊपर से उसकी चूत पर एक चुम्बन दिया। निकिता के मुँह से “आह... हाँ...” की आवाज निकली। गिरीश ने उसकी चड्डी को घुटनों तक खींच दिया। उसकी आँखों के सामने निकिता की रेशम से भी मुलायम, काले छोटे-छोटे बालों से घिरी, अभी खिली न हुई कली जैसी गोरी चूत दिखी, जिसके होंठ आपस में चिपके थे। गिरीश ने उसकी चूत की ओर झुका और उसकी मादक सुगंध सूँघते हुए रस रिसती चूत पर एक चुम्बन दिया। गिरीश के होंठों के स्पर्श से निकिता की चूत से रस की धारा बही और उसने गिरीश को पिलाया। निकिता अपने जीवन के पहले स्खलन के सुख में आकाश में तैर रही थी और साँसें छोड़ रही थी। गिरीश अपनी जीभ से उसकी चूत को चाटकर उसका रस पी रहा था। नमिता ने देखा कि सुरेश बाकियों को ढूँढते हुए इधर आ रहा है। उसने जोर से आवाज करके दोनों को कामलोक से वापस धरती पर लाने की कोशिश की और छिपकर खड़ी रही। दोनों ने आवाज सुनी और अपने होश में आए। निकिता ने जल्दी से चड्डी और लेगिंग्स ऊपर खींची और गिरीश से दूर हट गई। इससे पहले कि वो पूरी तरह संभल पाएँ, सुरेश वहाँ आया और चिल्लाया: भैया, निकिता दीदी, आउट! वो दौड़ गया और नमिता भी वहाँ से चली गई। गिरीश का हाथ पकड़कर निकिता बोली:

निकिता: गिरीश, ये बात किसी को मत बताना, प्लीज। मेरे लिए ये पहला अनुभव है।

गिरीश: तू फिक्र मत कर। मुझे पता है तू कैसी लड़की है। तेरी इज्जत को ठेस पहुँचाने वाला काम मैं मरने से पहले नहीं करूँगा।

निकिता ने उसका मुँह बंद करते हुए: प्लीज, ऐसे मत बोल। मन को दुख होता है।

गिरीश ने निकिता के होंठों पर चुम्बन दिया: सॉरी, गलती से बोल गया। माफ कर दे। अब कभी ऐसा नहीं बोलूँगा। निकिता, तेरे होंठ बहुत मीठे हैं और तेरा रस अमृत जैसा स्वादिष्ट था। मुझे फिर से पीने की इच्छा है। तू मौका देगी?

निकिता शरमाते हुए: सब कुछ तुझी के लिए है। लेकिन अभी नहीं। कोई आ गया, तो मुश्किल होगी। आगे मौका मिलने पर देखेंगे।

वो वहाँ से दौड़ गई और गिरीश हँसते हुए उसके पीछे चला गया।

रजनी ने खेल रहे बच्चों को खाने के लिए बुलाया और सबको अडक के पत्तों पर पुलाव और ड्राई फ्रूट्स हलवा परोसा। नीतू की गली के पाँच परिवारों में से दो में ही बच्चे थे, बाकी तीन नए दंपति थे। उन दो परिवारों में तीन लड़कियाँ थीं और सबकी नजर गिरीश पर थी। उनमें सबसे बड़ी सोनी इंजीनियरिंग के पहले साल में थी। उसकी छोटी बहन मोनी दूसरी पीयू में थी और निकिता की सहपाठी थी, लेकिन अलग क्लास की वजह से ज्यादा परिचय नहीं था। पूजा भी दूसरी पीयू में थी और मोनी की क्लासमेट थी। तीनों की नजरें गिरीश के कट्टे-मस्त शरीर और उसकी मुस्कान पर थीं। वे उस पर फिदा हो चुकी थीं। निकिता तो पहले ही गिरीश को अपनी चूत दिखा चुकी थी और उसका रस पिला चुकी थी।

निशा को खरगोशों का बड़ा झुंड मिल गया था। वो उनके पीछे-मुंदे घूम रही थी और वो उससे दूर नहीं हट रहे थे। नीतू अपनी बेटी को खाना खिलाने के लिए उसके पीछे दौड़ रही थी। निशा हर किसी के पास जाकर अपने साथ आए खरगोशों को दिखाकर किलकारी मारकर हँस रही थी। हरीश और अशोक उसकी खुशी देखकर अपने कैमरों से ढेर सारी तस्वीरें ले रहे थे।

उस दिन सबने एक साथ समय बिताया और खुश रहे। निशा अपने नए दोस्त खरगोशों के साथ मस्ती में अपने ही लोक में थी। शाम होने पर सब वापस जाने को तैयार हुए। खरगोश निशा को घेरकर जैसे कह रहे हों कि फिर आना। नीतू ने बेटी से खरगोशों को फल और बिस्किट खिलवाए और टाटा करके बस में चढ़ गए। माँ की गोद में बैठी निशा खरगोशों की बातें करती रही और सुबह से कूदने की थकान से सो गई। बड़े-छोटे सब दो ग्रुप में बँटकर अंताक्षरी खेलने लगे। सुकन्या का पति, सविता का परिवार, श्रीधर दंपति, और गली के पाँच परिवार—सबको एक साथ समय बिताने की खुशी थी। बस घर के पास पहुँची, तो हरीश ने सुबह जैसा कहा था, रसोइए ने खाने की व्यवस्था करके रखी थी। सबने खाना खाया और विदा लेते हुए बातें कीं। सोनी, मोनी, और पूजा की नजरें गिरीश पर थीं। सुकन्या और उसका पति बाइक से चले गए। सविता और उसकी दोनों बेटियों को छोड़ने के लिए हरीश तैयार था। सविता ने नीतू को गले लगाकर कहा: बहुत-बहुत धन्यवाद कि तुमने हमें अपनी खुशी में शामिल होने का मौका दिया। निकिता अपनी आँखों से गिरीश को अपनी प्रेम की फुहार दे रही थी।
 
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नियति से बंधी नीतू - Part 131

नीतू ने कमरे में सो रही बेटी को जगाते हुए कहा, "चिन्नी, उठ, खाना खा ले, प्यारी!" और उसका गाल सहलाया। नींद के नशे में डूबी निशा ने आँखें खोलकर माँ को एक प्यारी मुस्कान दी और फिर आँखें बंद करके दोबारा सो गई।

हरीश: नीतू, उसे सोने दे। आज उसने खरगोशों के साथ बहुत खेला है, बेचारी थक गई होगी। उसे अच्छे से नींद लेने दे। वैसे, तुमने सविता मैडम और उनके बच्चों को बुलाने का मकसद मुझे समझ नहीं आया।

नीतू: समय आने पर तुम्हें सब बताऊँगी। अभी चलो, यहाँ चिन्नी के साथ रश्मि को सोना चाहिए। मुझे भी नींद आ रही है। अरे, जी, एक मिनट! मैं तुम्हें एक जरूरी बात बताना भूल गई। स्वामीजी ने जाने से पहले मुझे बुलाकर कहा कि हमें चिन्नी को लेकर वाराणसी जाना है और वहाँ ज्योतिर्लिंग की विशेष पूजा करवानी है। उनके मुताबिक, चिन्नी के जन्म में एक छोटा सा दोष है, जिसे शिवरात्रि से पहले दूर करना होगा। साथ ही, उन्होंने वहाँ किसी से मिलने और उनका फोन नंबर भी दिया है। अब तुम बताओ, हमें कब जाना चाहिए? मैंने इस बारे में अभी तक किसी से बात नहीं की है।

हरीश: मेरी बेटी को दोष है? स्वामीजी ने इसके बारे में और कुछ नहीं बताया?

नीतू: उन्होंने बस इतना कहा कि चिन्नी के जन्म के कारण माता-पिता के दोष का असर उस पर भी है। हमें जल्द से जल्द इसका निवारण करवाना होगा।

हरीश: अगर ऐसा है, तो इसी हफ्ते चलते हैं। बेटी के मामले में एक पल की भी देरी नहीं करनी चाहिए। पूजा करवाकर दोष का निवारण करके लौट आते हैं। कौन-कौन जाएगा?

नीतू: स्वामीजी ने कहा कि सिर्फ हम दोनों चिन्नी को लेकर जाएँ।

हरीश: ठीक है, चलो, सबको बता देते हैं और उनके सुझाव के अनुसार व्यवस्था करते हैं।

पति-पत्नी हॉल में आए। नीतू ने रश्मि को चिन्नी के साथ सोने के लिए कहा और दोनों बच्चों को कमरे में भेज दिया। फिर उसने स्वामीजी द्वारा बताए गए चिन्नी के दोष के बारे में सबके सामने बात रखी।

शीला: स्वामीजी ने जब जन्म के दोष की बात कही है, तो देरी करने का कोई मतलब नहीं। तुम दोनों जल्द से जल्द जाओ और पूजा करवाकर लौट आओ।

रवि: हरीश, ट्रेन से डेढ़ दिन लगेगा। उससे बेहतर है कि तुम फ्लाइट से जाओ।

रजनी: सोमवार को शिवजी की पूजा के लिए शुभ दिन है। उस दिन वहाँ पहुँचने की व्यवस्था करनी चाहिए।

रवि: बेंगलुरु से दिल्ली और फिर वहाँ से वाराणसी जाना सबसे अच्छा होगा। थोड़ा घूमकर जाना पड़ेगा, लेकिन वहाँ हर दिन फ्लाइट उपलब्ध है। दिल्ली भी घूम सकते हो।

नीतू: भैया, दिल्ली घूमने के लिए अगले साल हम सब एक साथ जाएँगे। अभी वाराणसी में पूजा पूरी करके लौट आना है।

हरीश: ठीक है, तो शनिवार को चलते हैं। रविवार को स्वामीजी ने जिससे पूजा करवाने को कहा है, उनसे मिल सकते हैं। साथ में चिन्नी को गंगा दर्शन भी करवा देंगे।

अशोक: बेंगलुरु से दिल्ली और फिर वाराणसी के लिए एक ही दिन में फ्लाइट मिले, तो बुकिंग करनी चाहिए। वरना दिल्ली में रुकना पड़ेगा।

अनुषा: कल सब चेक करके बुकिंग कर लेते हैं।

अशोक: इतनी दूर सिर्फ तुम दोनों जा रहे हो, और चिन्नी भी साथ होगी। सावधान रहना।

रजनी: तीनों में हमारी लेडी बॉन्ड भी तो है, फिर डर कैसा?सब हँसने लगे।

अगले दिन जब अशोक, रजनी, और रश्मि गाँव के लिए निकले, तो रश्मि निशा को गले लगाकर रोने लगी। निशा ने उसकी आँखों से बहते आँसुओं को पोंछा और उसके गाल पर चुम्मी देकर टाटा किया। नीतू और अनुषा ने हरीश के साथ बैठकर दिल्ली और वाराणसी की फ्लाइट्स चेक कीं। शनिवार को यात्रा के लिए टिकट बुक किए और वाराणसी के पाँच सितारा होटल में कमरा रिजर्व किया। जब बच्चे स्कूल और कॉलेज के लिए निकल गए, तो नीतू बीस लाख नकद लेकर अनुषा के साथ बाहर निकली। तभी आर्किटेक्ट रमेश मंजिल वाले घर की सेंटरिंग हटवाकर साफ करवा रहे थे।

नीतू: रमेश सर, क्या आज से प्लास्टरिंग शुरू हो रही है?

रमेश: नहीं, मैडम। उससे पहले इलेक्ट्रिकल और प्लंबिंग पाइप्स लगाने की तैयारी कर रहे हैं। गुरुवार से प्लास्टरिंग शुरू होगी। आज इलेक्ट्रिकल पाइप्स लगवाएँगे, और कल से प्लंबिंग वाले पाइप्स लगवाएँगे। जल्दी खत्म करने के लिए मैंने कई कुशल कारीगर रखे हैं। अगले शनिवार तक प्लास्टरिंग का काम पूरा हो जाएगा। इस शुक्रवार या शनिवार को ग्रेनाइट और टाइल्स आने वाले हैं। आपने तय किया कि किन दीवारों पर क्या लगेगा?

नीतू: अगर शनिवार को टाइल्स आती हैं, तो मैं शहर में नहीं रहूँगी। मेरी बहन अनुषा यहाँ होगी। उससे पैसे ले लेना और पेमेंट कर देना। टाइल्स कहाँ-कहाँ लगानी हैं, ये तय हो चुका है, लेकिन अभी मैं फैक्ट्री जा रही हूँ। कल इस बारे में बात करते हैं। चिन्नी, तुम नीचे ही रहना, ऊपर मत जाना, शीला मम्मी को तकलीफ होगी।

निशा ने माँ की बात पर ध्यान न देते हुए, उसकी ओर बिना देखे, खड़ी-खड़ी टाटा किया और अपनी नजरें मंजिल की ओर टिका दीं। नीतू ने सोचा कि बेटी जरूर मंजिल पर जाने की कोशिश करेगी, और शीला की गर्भावस्था में उसे अकेले छोड़ना ठीक नहीं। इसलिए उसने निशा को उठाकर कार में बिठाया और दरवाजा बंद कर दिया। उत्सुकता से मंजिल की ओर देख रही निशा ने, जब माँ ने उसे अचानक उठाकर कार में अनुषा आँटी की गोद में बिठा दिया, तो माँ की ओर देखकर मुँह फुलाकर बैठ गई। तीनों फैक्ट्री के पास पहुँचे, जहाँ काम करने के लिए तैयार गाँव के युवक पहले से ही आ चुके थे। बस्या और उसकी टीम युवकों को कतार में खड़ा करके एक-एक करके भेज रही थी, और अनुषा पहले से तैयार रजिस्टर में उनकी साइन लेकर एंट्री कर रही थी। नीतू ने बेटी का गुस्सा कम करने के लिए फैक्ट्री के मजदूरों को उसके हाथों से अग्रिम राशि दिलवाकर उसे सक्रिय रखा। सभी मजदूरों को पैसे देने के बाद...

नीतू: अगले साल फरवरी की पहली तारीख से आप सभी के लिए दो महीने की ट्रेनिंग की व्यवस्था xxxx शहर में की जा रही है। वहाँ सभी के लिए खाना और रहने की सुविधा होगी। आप सभी इसके लिए तैयार रहें।सभी ने एक स्वर में सहमति जताई।

बस्या ने मना करने के बावजूद नीतू ने उसके हाथ में पचास हजार रुपये दिए और बाकी साथियों को दो-दो हजार रुपये देने को कहा। फिर इमारत की प्रगति की जाँच करने के बाद, नीतू अपनी बहन और बेटी के साथ घर लौटी, रास्ते में कुछ मिठाइयाँ, शीला के लिए जरूरी दवाइयाँ, और फल भी खरीदे।

जैसे ही निशा ने गेट के अंदर कदम रखा, मंजिल वाले घर से मशीन और हथौड़े की आवाजें सुनाई दीं। वह आश्चर्य से ऊपर देखते हुए खड़ी हो गई। अनुषा के पास आने पर उसने "आँटी... आँटी..." कहकर मंजिल की ओर इशारा किया। अनुषा ने उसे गोद में उठाकर कहा, "पहले खाना खा लो, फिर वहाँ चलेंगे।" निशा को भूख के बावजूद ऊपर जाने की जल्दी थी, इसलिए उसने शीला के हाथों से जल्दी-जल्दी खाना खाया और अनुषा का हाथ पकड़कर खींचने लगी।

शीला: अनु, इसे लेकर मंजिल पर चली जा। जब तक ये वहाँ का काम नहीं देख लेती, इसे चैन नहीं मिलेगा।

नीतू और शीला ने कुछ देर बातचीत की, सहेली के स्वास्थ्य के बारे में पूछा और वाराणसी की यात्रा के बारे में चर्चा शुरू की। आधे घंटे तक मंजिल का काम देखकर खुश हुई निशा, अनुषा के साथ लौटकर सो गई। नीतू अपने लैपटॉप और साहूकार के शहर वाले घर से लाए तीन डिजिटल कैमरों के साथ सामने अशोक के घर में चली गई।

पहला कैमरा कनेक्ट करके खोला, तो...

सीन 1: साहूकार का एक दोस्त नीतू के होंठों को चूस रहा था और उसकी गांड को मसल रहा था। फिर उसने नीतू को दूसरे की ओर धकेला। उसने भी नीतू के शरीर को रगड़ा और मसला, फिर उसे तीसरे की ओर धकेला। इस तरह दस लोग नीतू के शरीर को अपनी मर्जी से मसलते और दबाते हुए दिखाए गए।

सीन 2: नीतू सिर्फ ब्रा और पैंटी में बिस्तर पर बैठी थी। साहूकार का दोस्त उसका लंड उसके मुँह में डालकर चुसवा रहा था, जबकि दो अन्य लोग उसकी ब्रा के ऊपर से ही उसके स्तनों को दबा और चूस रहे थे। साहूकार और उसके नौ दोस्तों के लंड को चूसने के बाद, नीतू ने अपनी ब्रा उतारी और उसकी पैंटी को धीमी गति में नीचे खींचने का दृश्य फिल्माया गया था।

सीन 3: नीतू का चेहरा, स्तन, जाँघें, गोरी चूत, गोल गांड, और हल्की भूरी गांड का छेद स्पष्ट रूप से दिखाया गया। फिर उनमें से एक ने उसकी जाँघों के बीच जाकर उसकी चूत में लंड डाला। यह दृश्य बहुत ही स्पष्टता से शूट किया गया था।

नीतू ने फास्ट-फॉरवर्ड किया, तो तीन पुरुष उसे बिस्तर पर उठाकर रगड़ रहे थे। एक पुरुष बिस्तर पर लेटा था और नीतू को अपनी ओर खींचकर उसकी चूत में लंड डाला। दूसरा पुरुष पीछे से उस पर चढ़ा और उसकी गांड को फैलाकर उसकी गांड के छेद में लंड डालकर दोनों मिलकर उसे चोद रहे थे। नीतू की चूत और गांड के छेद में लंड के अंदर-बाहर होने का दृश्य बहुत स्पष्टता से जूम करके फिल्माया गया था। तीसरा पुरुष उसका लंड नीतू के मुँह में डालकर चुसवा रहा था। यह देखकर नीतू ने सोचा कि उस रात सभी ने मिलकर उसका गैंग बैंग किया था।

चार पुरुषों ने नीतू के मुँह में वीर्य डालकर पिलाया, और उसकी चूत से बहता वीर्य भी स्पष्ट रूप से फिल्माया गया था। नीतू ने सब देखने के बाद कैमरों के वीडियो अपने लैपटॉप में ट्रांसफर किए और कैमरों से वीडियो डिलीट कर दिए। कैमरों को कमरे के लॉकर में रखकर लैपटॉप के साथ घर लौटते समय वह अपने गैंग बैंग के बारे में सोच रही थी। तभी स्कूल से लौटे हरीश के पीछे छोटा बेटा सुरेश एक बड़ा बोर्ड पकड़े हुए था। नीतू ने पूछा कि यह क्या है। सुरेश ने जवाब देने के बजाय कहा, "अम्मा, अंदर चलो, पापा ने कोई सरप्राइज लाया है, बहुत अच्छा है!" और घर के अंदर भाग गया।

पिछले दिन जब बेटी पहाड़ी पर खरगोशों के साथ खेल रही थी, तब खींची गई कई तस्वीरों में से दो को चुनकर हरीश ने उन्हें बड़ा करवाया और सुंदर फ्रेम में सजाकर लाया था। शीला और नीतू उसे देख रही थीं, तभी नींद से जागकर अनुषा से मुँह धुलवाकर आई निशा ने अपनी तस्वीरें देखीं और खुशी से उछलने-कूदने लगी। हरीश ने दो बड़े-बड़े फोटो को दीवार पर लगे एलईडी के बगल में टाँगा। निशा ने गिरीश भैया का हाथ पकड़कर खींचा और उन्हें तस्वीरें दिखाकर खुश हो रही थी। वीडियो कैमरा टीवी से जोड़ा गया और प्ले करने पर स्क्रीन पर खुद को खरगोशों के साथ खेलते देख निशा चिल्लाकर खुशी से कूदने लगी। वह सबको उंगली दिखाकर अपनी खुशी जाहिर कर रही थी। सभी उसकी खुशी देखकर आनंदित हो रहे थे, और शीला ने बेटी की नजर उतारी। नीतू ने अपने सास-ससुर को फोन करके कुछ देर बात की। गिरीश और सुरेश ने भी नानी-नाना से बात की। अपनी तस्वीरें देखकर खुशी से झूम रही निशा, जब नानी-नाना की बात हुई, तो माँ के पास दौड़कर गई और अपनी टूटी-फूटी भाषा में कुछ कहते हुए तस्वीरों की ओर इशारा करने लगी। नीतू ने समझ लिया कि बेटी क्या कहना चाह रही है और कॉल काटकर वीडियो कॉल के जरिए उसे तस्वीरें दिखाईं। निशा ने नानी-नाना का चेहरा देखकर चिल्लाकर अपनी खुशी जताई।

इधर, घर लौटने के बाद रश्मि पूरे दिन दुखी रही कि वह शिवरात्रि तक कामाक्षीपुरम नहीं जा सकती और निशा से भी नहीं मिल सकती। रजनी ने बेटी को सांत्वना दी, "प्यारी, बस दो महीने की बात है। फिर हम सब वहाँ एक साथ रहेंगे। स्वामीजी ने ये सब तुम्हारे और निशा के भले के लिए ही कहा है। हमें उनका पालन करना चाहिए। उदास मत हो।"

सोमवार को घर पर बिताने के बाद रश्मि ने अपनी उदासी काफी हद तक कम कर ली थी। रात को सोते समय उसकी चूत में खुजली शुरू हुई। उसने चूत में उंगली डालकर कोशिश की, लेकिन संतुष्टि न मिलने पर सुबह राजेश के घर जाकर चुदवाने का फैसला किया। माँ को दोस्त के घर जाने की बात कहकर, नाश्ते के बाद ऑटो से राजेश के घर पहुँची। लेकिन दरवाजे पर ताला देखकर उसे निराशा हुई। पहले से दुखी रश्मि और उदास होकर घर लौटी और बाथरूम में जाकर चूत में उंगली डालकर थोड़ी राहत पाई।

अगले दिन हरीश ने स्कूल के प्रिंसिपल से मुलाकात की और उन्हें निशा के जन्म नक्षत्र के दोष के बारे में बताया। साथ ही, दोष निवारण के लिए पूजा करवाने हेतु उसे वाराणसी ले जाने की बात कही।

प्रिंसिपल: हरीश, पहले उसे वाराणसी ले जाओ। अपनी कक्षाओं की चिंता मत करो। तुमने बच्चों के सारे पाठ पूरे कर लिए हैं और एक चक्कर का रिवीजन भी कर लिया है। ऐसे संवेदनशील मामले में देरी नहीं करनी चाहिए। छुट्टी की चिंता मत करो, मैं सब संभाल लूँगा। तुम एक अर्जी दे दो। अगर सीनियर अधिकारी आए, तो उन्हें दिखाकर छुट्टी स्वीकृत करवा लूँगा। वरना तुम लौटने के बाद हाजिरी लगा देना, छुट्टी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

हरीश: सर, ये गलत नहीं होगा? आप रजिस्टर में छुट्टी ही दर्ज करें।

प्रिंसिपल: हमारी प्यारी गुड़िया निशा के मामले में कुछ भी गलत नहीं। जैसा मैं कह रहा हूँ, वैसा करो।

हरीश ने सहमति जताई और स्टाफ रूम में जाकर सहकर्मी शिक्षकों को बात बताई। सभी ने जल्द से जल्द पूजा करवाकर लौटने की सलाह दी और कहा कि उनकी कक्षाएँ खाली रहने वाले शिक्षक संभाल लेंगे। निशा के दोष की बात सुनकर सभी शिक्षक दुखी हुए, लेकिन सुकन्या और सविता सबसे ज्यादा उदास थीं। दोनों ने शाम को स्कूल खत्म होने के बाद ऑटो से हरीश के घर जाकर नीतू से दोष के बारे में बात की। तब तक मंजिल के मजदूरों के साथ रहकर उन्हें तंग करके खुश रही निशा, अनुषा आँटी के साथ नीचे उतरी। उसने घर आए दोनों आँटियों को अपनी प्यारी मुस्कान दी और खरगोशों के साथ अपनी तस्वीरें दिखाकर खुशी जताई। कुछ देर वहाँ रहने के बाद जब दोनों जाने लगीं, तो नीतू ने कहा कि वह खुद उन्हें छोड़ देगी। माँ के बाहर आने से पहले ही निशा ने चप्पल पहनकर गेट के पास जाकर खड़ी हो गई।

हाल ही में निशा ने गौर किया था कि वह चाहे कितना भी शरारत करे, माँ उसे डाँटती नहीं। इससे उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। सुबह उठते ही वह पापा और भाइयों के साथ उछल-कूद करती। उनके स्कूल-कॉलेज जाने के बाद वह सामने की सीढ़ियों के पास खड़ी हो जाती। निशा चुपके से मंजिल पर जाने की कोशिश करती, लेकिन वहाँ रास्ते में लकड़ियाँ लगी थीं। छोटी होने के कारण वह उन्हें पार नहीं कर पाती और खड़े-खड़े मजदूरों को बुलाकर ऊपर ले जाने को कहती। नीतू या अनुषा में से कोई एक उसे मंजिल पर ले जाता, तो वह इंजीनियर की तरह कमर पर हाथ रखकर उनके काम को देखती रहती।

बुधवार सुबह रश्मि ने माँ को सहेली के घर जाने की बात कहकर राजेश के घर पहुँची। दरवाजा खुला देखकर वह खुशी से अंदर गई। वहाँ राजेश के साथ पाँच अनजान लड़के थे। रश्मि चुपचाप खड़ी रही। राजेश ने उसे देखकर खुशी से गले लगाया और सबके सामने उसके होंठों पर गहरा चुम्बन देकर उसकी गांड को सहलाया।

राजेश: कहाँ चली गई थी, डार्लिंग? चार-पाँच दिन से मेरी हालत खराब हो रही थी। अब कहीं बाहर मत जाना। ये सब मेरे गाँव से आए करीबी दोस्त हैं। तीन-चार दिन यहाँ रुककर जाएँगे। लो, बच्चों, मैं बता रहा था न, मेरी स्वीटहार्ट रश्मि, ये वही है। गजब की है न?

रश्मि का सुंदर चेहरा, उसका सौंदर्य और यौवन भरा शरीर देखकर राजेश के पाँचों दोस्तों के लंड खड़े हो गए। राजेश ने पहले ही उन्हें बताया था कि उसने रश्मि को कैसे-कैसे चोदा है। वे उसे एक तरफ ले गए और बोले कि उन्हें भी रश्मि को चोदने का मौका दे। पहले तो राजेश ने मना किया, लेकिन बचपन के दोस्तों के दबाव में वह मान गया और बोला, "मैं उससे बात करता हूँ। अगर वह मान जाए, तो हम सब मिलकर चोदेंगे, वरना तुम खिड़की से देख लेना।" फिर उसने रश्मि को बगल के कमरे में ले जाकर कहा...

रश्मि: राजेश, तुमने अपने दोस्तों के सामने मुझे ऐसे चूमा, क्या वे मुझे ढीली लड़की नहीं समझेंगे?

राजेश: अरे, डार्लिंग, ये चुम्बन तो आम बात है। मैं तुम्हें उनके सामने ही चोदना चाहता हूँ। तुम तैयार हो?

रश्मि: नहीं... नहीं... उनके सामने मैं नंगी नहीं हो सकती।

राजेश: रश्मि, तुम्हारा सौंदर्य देखकर वे सब पागल हो गए हैं। मैंने उन्हें बताया था कि मैंने तुम्हें कैसे-कैसे चोदा है। वे भी तुम्हें चोदना चाहते हैं। अगर तुम मान जाओ, तो आज तुम्हें छह लंडों का सुख मिलेगा।

रश्मि: क्या कह रहे हो, राजेश?

राजेश: रश्मि, हम प्रेमी-प्रेमिका तो हैं नहीं। मुझे लंड की खुजली है, तुम्हें चूत की। इसलिए हम चुदाई करते हैं। जरा सोचो, मेरे एक लंड से तुम्हें इतना सुख मिलता है, तो छह लंडों से कितना मजा आएगा। मान जाओ।


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नियति से बंधी नीतू - Part 132

रश्मि कुछ देर तक "नहीं... नहीं... मैं नहीं मानूँगी" कहकर नखरे करती रही, लेकिन आखिरकार राजेश और उसके दोस्तों के साथ चुदवाने के लिए राजी हो गई। राजेश ने कमरे का दरवाजा खोला और अपने दोस्तों को अंदर बुलाया। जैसे ही सब अंदर आए, रश्मि ने पाँचों को गौर से देखा। उनमें से दो अच्छी-खासी कद-काठी वाले थे, जबकि बाकी तीन बलिष्ठ, पहलवान जैसे दिखते थे। जैसे ही राजेश ने बताया कि रश्मि ने उनसे भी चुदवाने के लिए हामी भर दी है, उनमें से एक बलिष्ठ दोस्त तुरंत रश्मि के पास आया, उसे कसकर गले लगाया और उसके होंठों पर होंठ रखकर लिपलॉक कर लिया। उसकी जल्दबाजी देखकर बाकी दोस्त हँसने लगे, लेकिन वह रश्मि के होंठों को चूसता रहा, अपनी जीभ उसके मुँह में घुमाकर और उसकी नरम गांड को मसलने लगा। यह सब देखकर बाकी लोग अपने कपड़े उतारने लगे और सिर्फ चड्डी में रहकर रश्मि को घेर लिया। उन्होंने उसके शरीर को सहलाना और मसलना शुरू कर दिया। आधे घंटे तक रश्मि के शरीर को सहलाकर और मसलकर मजे लेने के बाद, राजेश ने अपने दोस्तों को हटाकर रश्मि को बिस्तर पर बिठाया और अपनी चड्डी से लंड निकालकर उसके चेहरे के सामने हिलाने लगा। रश्मि ने सबको एक बार देखा, फिर राजेश के लंड को सहलाकर उसकी नोक पर चुम्मी दी और मुँह खोलकर उसे अंदर ले लिया और चूसने लगी। राजेश के दोस्तों ने रश्मि को लंड चूसते देखा और खुद भी अपनी चड्डियाँ उतारकर नंगे हो गए। उनके लंड देखकर रश्मि हैरान रह गई। दो कद-काठी वाले लड़कों के लंड सात से साढ़े सात इंच लंबे थे, जबकि तीन बलिष्ठ लड़कों के लंड भी उतने ही लंबे थे, लेकिन बाकियों से ज्यादा मोटे थे। एक दोस्त ने राजेश को पीछे खींचा और अपना लंड रश्मि के मुँह में डालकर चुसवाने लगा, जबकि दूसरा उसकी पीठ सहलाते हुए उसकी चूड़ीदार की जिप को कमर तक खींच ले गया।

जब रश्मि की हरी चूड़ीदार को पीछे से हटाया गया, तो उसके गोरे शरीर पर चिपकी काली ब्रा की पट्टियाँ दिखाई दीं। उसे देखकर उस लड़के के मुँह में पानी आ गया और वह जीभ से उस हिस्से को चाटने लगा। रश्मि अपने मुँह में काले लंड को चूस रही थी और अपनी पीठ दो लोगों से चटवाकर "हूँ... हूँ..." की आवाजें निकाल रही थी। लंड चुसवाने वाला युवक पीछे हटा, तो पीठ चाटने वाले दोनों ने मिलकर रश्मि के शरीर से चूड़ीदार का टॉप उतारकर फर्श पर फेंक दिया। टॉप हटते ही रश्मि के गोरे शरीर पर संतरे के आकार के स्तनों को ढक रही गहरी काली ब्रा सबके सामने आई। राजेश को छोड़कर बाकी पाँचों लड़कों की आँखें रश्मि के काली ब्रा में बंद स्तनों को देखकर चमक उठीं। दो दुबले-पतले लड़के उसके दोनों तरफ बैठ गए और ब्रा के ऊपर से उसके स्तनों को सहलाने और दबाने के बाद ब्रा समेत उन्हें मुँह में लेकर चूसने लगे। रश्मि के मुँह से "आह... हाँ... आह..." जैसी उन्माद भरी आवाजें निकलने लगीं। अपने स्तनों को चुसवाते हुए रश्मि ने सामने खड़े लड़के के लंड की नोक पर जीभ फेरी और उसे मुँह में ले लिया। छह लड़कों ने बारी-बारी से रश्मि को अपने लंड चुसवाए, फिर उसे बिस्तर से उठाकर उसकी लेगिंग्स नीचे खींच दी। अब रश्मि काली ब्रा और पीली पैंटी में छह कामुक लड़कों के सामने खड़ी थी।

रश्मि को बिस्तर पर लिटाकर उसके पैर फैलाए गए, तो कामोन्माद के कारण उसकी चूत से निकले रति रस से पीली पैंटी का अगला हिस्सा गीला हो गया था, जो सभी लड़कों को साफ दिख रहा था। एक बलिष्ठ लड़के ने रश्मि की जाँघों के मिलन बिंदु की ओर झुककर उसकी चूत की खुशबू को नाक में खींचा और बोला, "आह, भाई, क्या मस्त खुशबू है इसकी चूत की! तेल से मालिश करने से भी ज्यादा किक दे रही है।" उसकी बात सुनकर बाकी चारों ने रश्मि की चूत को पैंटी के ऊपर से सूँघा और बोले, "उफ, क्या किक है! इसकी चूत को सूँघते ही नशा चढ़ रहा है। अब इसका स्वाद भी चखना पड़ेगा।" पाँचों दोस्त रश्मि की चूत को पैंटी के ऊपर से कुत्तों की तरह चाटने लगे। यह देखकर कुर्सी पर बैठा राजेश हँस रहा था। पाँचों ने मिलकर रश्मि को उलट दिया और उसकी गोल, नरम गांड को सहलाकर उस पर चुम्मियों की बौछार की और मसलने लगे। पैरों से लेकर गर्दन तक एक भी जगह नहीं छोड़ी और सब चाट डाला। एक ने काली ब्रा के हुक खोलकर रश्मि को फिर से पीठ के बल लिटाया और ढीली ब्रा को उसके शरीर से हटा दिया। ब्रा हटते ही बाहर उछले दो संतरे के आकार के गोरे स्तनों को देखकर दो लड़कों ने उन्हें मसलकर चूसना शुरू कर दिया, जबकि तीसरा पैंटी के इलास्टिक में उंगली डालने लगा। पीली पैंटी को नीचे खींचने पर वह सिकुड़कर नीचे सरक गई। उसे पैरों से निकालकर फर्श पर फेंका गया और पैर फैलाए गए, तो जाँघों के बीच की सबसे रसीली गुलाबी चूत खुलकर सामने आई, जिसे देखकर सभी मंत्रमुग्ध हो गए।

पाँचों में से दो उसके स्तनों को चूस रहे थे, जबकि एक का सिर रश्मि की जाँघों के बीच था और वह जीभ से उसकी चूत के आसपास चाट रहा था। रश्मि कामोन्माद में डूबकर कराह रही थी, अपने स्तनों को चूसने वालों के सिर सहलाने लगी और चूत चाटने वाले के बालों में उंगलियाँ फिराकर उसका मुँह अपनी चूत पर जोर से दबाने लगी। उसकी चूत की पंखुड़ियों को फैलाकर जीभ अंदर डालने वाले दुबले-पतले लड़के को रश्मि के रति रस का स्वाद मन को आनंद दे रहा था। उसे हटाकर एक बलिष्ठ लड़के ने रश्मि की चूत पर चुम्मियों की बौछार की और चाट-चाटकर उसका स्वाद लिया। पाँचों ने अपनी जगहें बदल-बदलकर रश्मि के स्तनों को चूसा और उसकी चूत का स्वाद चखा। फिर एक ने उसे उलटकर उसकी नरम गांड को चाटा, मसला और पूरी तरह फैलाया। रश्मि की गोल गांड को फैलाने पर उसका छोटा सा लाल रंग का गांड का छेद दिखा, जिसके सौंदर्य को देखकर सभी हैरान रह गए और उसमें भी जीभ फेरने लगे। एक घंटे से ज्यादा समय तक रश्मि के शरीर के हर इंच को चाटकर और मसलकर छह लड़कों ने उसके सारे रस को चूस लिया।

एक दुबले-पतले लड़के ने सबको बिस्तर से उतरने को कहा और बोला, "भाईयो, सब ठीक है। अब इस मस्त फिगर की चूत में भैया का लंड सवारी करेगा।" उसने रश्मि के पैर फैलाए और उसकी जाँघों के बीच जाकर अपने साढ़े सात इंच के खड़े लंड को उसकी चूत की पंखुड़ियों पर रगड़ने लगा। रश्मि को जैसे ही उसकी चूत पर लंड का स्पर्श हुआ, उसकी चूल सीमा लाँघ गई। उसने उसे खींचकर उसके होंठों को चूसा और बोली, "कम ऑन, फक मी... हाँ... आह... अब और बर्दाश्त नहीं होता। जल्दी मेरी चूत में लंड डालकर चोदो। कम ऑन, बेबी, फक, फक मी..." कहते हुए उसने अपनी कमर ऊपर उठाई। वह हँसते हुए रश्मि के स्तनों को चूसने लगा, उसके निप्पलों को हल्के से काटा और पूरी ताकत लगाकर तेजी से धक्का मारा। उसका लंड रश्मि की चूत की पंखुड़ियों को फैलाकर तीन इंच अंदर घुस गया। रश्मि कामोन्माद में चिल्लाई, "आह... अम्मा... पूरा डालकर चोदो, मेरी चूत में बहुत चूल है। तुम सब मिलकर भी चोदो, तो शायद न बुझे। आओ, मेरी चूत को रगड़ दो..." और नीचे से अपनी गांड उठा-उठाकर देने लगी। सात-आठ धक्कों में उसकी तंग चूत में उस दिन सातवाँ लंड घुस गया। वह हर धक्के का मजा लेते हुए अपनी गांड उठाकर उस दुबले-पतले लड़के से चुदवाने लगी। बीस मिनट तक रश्मि के होंठों को चूमते, स्तनों को चूसते और निप्पलों को हल्के से काटते हुए वह नीचे कमर को तेजी से हिलाकर रश्मि की चूत को चोद रहा था। उसके लंड के धक्कों से रश्मि को भी बहुत मजा आ रहा था। उसने तीन बार अपने रति रस से उसके लंड को नहलाया। फिर उसने अपने वीर्य की हर बूंद को रश्मि की गर्भाशय में भर दिया और उसे अविस्मरणीय कामसुख देकर खुद भी तृप्त हो गया।

वह बोला: उफ, क्या मजा देती है ये, भाई! अब तक मैंने पाँच-छह औरतों की चूत चोदी, लेकिन इसकी रसीली तंग चूत के सामने सब चम्मच से हांडी हिलाने जैसी थीं। रश्मि, खाना खाने के बाद एक और राउंड में तुझे चोदूँगा। तब तक मेरे बाकी दोस्तों के लंड भी तेरी चूत का स्वाद चख लें।

रश्मि उसकी तारीफ से शरमाते हुए छह लड़कों के सामने नंगी लेटी थी। वह नखरे दिखाकर मुस्कुराई। पहला लड़का हटा, तो दूसरा दुबला-पतला लड़का उसकी जाँघों के बीच आया और रश्मि की चूत के सामने अपना लंड रखा। रश्मि ने उसे भी पूरा सहयोग दिया, उसके होंठों को चूसा, उसे उत्तेजित किया और उसके धक्कों के साथ अपनी कमर हिलाने लगी। दूसरे लड़के का लंड भी रश्मि की चूत में घुस गया और पूरे जोश में उसे चोदकर मजा लेने लगा। रश्मि भी अपने सामूहिक चुदाई को याद करके चूत से रस की सुनामी छोड़ रही थी और कामसुख के आकाश में तैर रही थी।

दूसरे के बाद तीसरा, फिर चौथा और पाँचवाँ, राजेश के दोस्तों के सभी लंड रश्मि की चूत में घुसकर उसे चोदकर मजा लेने और सुख अनुभव करने लगे। आखिर में राजेश बिस्तर पर चढ़ा और रश्मि के स्तनों को चूसने लगा। दस मिनट तक उसके स्तनों को चूसकर और हल्के से काटकर उसने रश्मि को उलटकर बैठने को कहा। रश्मि उसकी इच्छा समझ गई और हँसते हुए उठकर घुटनों के बल बैठ गई, हथेलियाँ बिस्तर पर रखकर कुत्ते की तरह पोज बनाया। राजेश के दोस्त उत्सुकता से देख रहे थे कि आगे क्या होगा। राजेश ने रश्मि की नरम गांड को सहलाया, हथेली से चार बार जोर से मारा। रश्मि के "आह... आह..." चिल्लाने पर वह हँसते हुए उसकी गांड को फैलाया और उसकी छोटी सी लाल गांड के छेद के सामने अपना लंड रखकर बिना घुसाए रगड़ने लगा, उसे तड़पाने लगा।

रश्मि ने सब्र खोकर कहा: राजेश, तुम और किसका इंतजार कर रहे हो? तुमने जैसा कहा, मैं वैसी बैठकर इंतजार कर रही हूँ। इतना क्यों तड़पा रहे हो? कम ऑन, बेबी, फक मी।

राजेश: अरे, फक मी, वो भी इंग्लिश में? हमारी शुद्ध कन्नड़ में मुझे तड़पाकर रिक्वेस्ट कर, फिर देखता हूँ।

रश्मि: राजेश, मत तड़पाओ, प्लीज। मुझे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा। ठीक है, जैसा तुमने कहा, कन्नड़ में ही कहूँगी। आ, राजेश, जल्दी मुझे चोद। ठीक है न?

राजेश, उसे पूरी तरह शर्मिंदा करने के लिए: नहीं, तुमने जो कहा, वो मजा नहीं आया।

रश्मि ने चूल के कारण सारी शर्म छोड़ दी और बोली: राजेश, जल्दी अपना लंड मेरी गांड के छेद में डालकर जोर-जोर से चोद। मैंने वही कहा जो तुम सुनना चाहते थे। अब और देर क्यों कर रहे हो? जल्दी डालो।

**रश्मि की इस बेशर्मी को सुनकर राजेश के पाँचों दोस्त हैरान रह गए और दोनों को देखने लगे। राजेश ने एक जोरदार धक्के के साथ रश्मि की गांड के छेद को फैलाकर अपना लंड घुसा दिया। रश्मि को अपनी गांड भी चुदवाते देखकर उसके दोस्त हैरान रह गए। राजेश ने छह-सात धक्कों में अपना लंड पूरी तरह उसकी गांड में घुसा दिया। रश्मि को भयंकर दर्द हुआ, लेकिन उसने अपनी जिंदगी की पहली चुदाई में गोवा के समुद्र तट की रेत पर निहाल के लंड से अपनी गांड का उद्घाटन करवाया था, इसलिए उसे गांड चुदवाना बहुत पसंद था। राजेश रश्मि की गांड को जोर-जोर से चोदने लगा, बीच-बीच में उसकी नरम गांड को मसलता और कई बार जोर से थप्पड़ मारता। रश्मि अपनी गांड को पीछे धकेलकर पूरी तरह चुदाई में शामिल थी और बोली, "हाँ... राजेश, ऐसे ही, और जोर से चोदो। बहुत मजा आ रहा है। उफ... आह... अम्मा... राजेश... फक मी... फक मी..." वह गांड चुदवाने के आनंद के सागर में डूब गई। राजेश ने आधे घंटे तक रश्मि की गांड चोदी और मजा लिया। जब वीर्य छोड़ने का समय नजदीक आया, तो वह पीछे हटा और उसका लंड रश्मि के मुँह में डाल दिया। रश्मि ने बिना नखरे किए उसके लंड को चूसा और उससे निकले वीर्य की हर बूंद को अपने मुँह में भरकर सबको दिखाया, फिर पी गई। राजेश के दोस्त यह देखकर दंग रह गए कि रश्मि इतनी बेशर्म लड़की है। राजेश बोला, "देखा, मेरा आइटम कितना मजा देता है? अभी शो खत्म नहीं हुआ, बाकी बचा है। पहले खाना मंगवाते हैं।"

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नियति से बंधी नीतू - Part 133

राजेश अपने दो कट्टम-कट्ट दोस्तों के साथ खाना लाने गया, तो बाकी तीन बलिष्ठ दोस्तों ने रश्मि को बिस्तर पर लिटा लिया। एक उसकी चूत चाट रहा था, दूसरा उसके स्तनों को चूस रहा था, जबकि रश्मि ने खुद तीसरे बलिष्ठ के लंड को अपने मुँह में डालकर चूसना शुरू कर दिया। जब तक राजेश और उसके दो दोस्त वापस आए, रश्मि ने तीनों बलिष्ठ दोस्तों के लंड से अपनी गांड चुदवा ली थी और तीनों को उसकी गांड के छेद का मजा लेने का मौका दिया था।

सब खाने बैठे, तब भी राजेश ने रश्मि को अपनी गोद में अपने लंड पर बिठा रखा था। उसने अपनी चूत में उसका लंड डालकर रखा और दोनों ने उसी तरह खाना खाया। खाने के बाद कुछ देर सबने आराम किया और फिर रश्मि को चोदने के लिए तैयार हो गए। इस बार एक-एक करके सभी ने उसकी गांड के छेद को ही चोदा। तीन बलिष्ठ दोस्तों को तो जैसे किस्मत खुल गई थी, क्योंकि उन्हें दो-दो बार रश्मि की गांड चोदने का सौभाग्य मिला। शाम छह बजे तक राजेश और उसके दो कट्टम-कट्ट दोस्तों ने दो बार उसकी चूत चोदी और एक बार उसकी गांड, जबकि तीन बलिष्ठ दोस्तों ने रश्मि की चूत में सिर्फ एक बार प्रवेश किया, लेकिन उसकी गांड को तीन बार रगड़ा। जाने से पहले राजेश के कहने पर रश्मि ने सबके सामने कुत्ते की तरह बैठकर अपनी चूत से स्वादिष्ट पेशाब की धार छोड़ी और सबको मुफ्त का शो दिखाया। रश्मि ने कपड़े पहने और जाने के लिए तैयार हुई, तो पाँचों दोस्तों ने उसे गले लगाया, मसलकर उसकी गांड को सहलाया और अगले दिन फिर आने को कहा। रश्मि को भी छह लोगों के साथ सामूहिक चुदाई बहुत सुखद लगी थी, और उसने कहा कि वह जरूर आएगी। फिर वह राजेश के साथ घर की ओर निकल गई।

निशा गहरी नींद में डूबी थी। नीतू ने अपनी बेटी का सिर सहलाया, उसके गाल पर चुम्मी दी और अनुषा के साथ फैक्ट्री की ओर निकल गई। सुबह दस बजे तक सो रही निशा जागी और अपने पास कोई न देखकर "मम्मी... मम्मी..." चिल्लाने लगी। कमरे में आई शीला ने कहा, "उठ गई मेरी चिन्नी बंगारी? चल, जल्दी फ्रेश होकर नहा ले, तुझे नाश्ता करवाना है। बहुत देर हो गई है।" उसने निशा को नहलाकर तैयार किया। शीला के लाए उप्पीट्टु और केसरीभात को देखकर निशा का चेहरा खिल गया। उसे केसरीभात बहुत पसंद था, इसलिए उसने ज्यादा खाया, लेकिन शीला के जोर देने पर थोड़ा उप्पीट्टु भी खा लिया। नाश्ते के बाद निशा पूरे घर में घूमने लगी। उसे अपनी मम्मी नहीं दिखी, तो वह फिर किचन में आई और शीला की साड़ी पकड़कर खींचते हुए "मम्मी लिल्ल" कहकर हाथ हिलाने लगी। शीला ने उसकी गाल पर चुम्मी दी और उसे सोफे पर बिठाकर बोली, "चिन्नी, मम्मी अनु आँटी के साथ गई हैं। तू अपना फेवरेट कार्टून देख, तब तक मैं खाना बनाकर आती हूँ।" शीला ने टीवी में पेन ड्राइव लगाकर टॉम एंड जेरी कार्टून चालू किया और किचन में चली गई। निशा बहुत खुश होकर ताली बजाने लगी, जोर-जोर से चिल्लाकर कार्टून देखने लगी।

गुरुवार को पास के पार्क में राजेश उसे लेने आया, लेकिन रश्मि ने कहा कि उसे आज अपनी मम्मी के साथ कहीं और जाना है, इसलिए वह नहीं आ सकती। उस दिन भी रश्मि की गांड चोदने का सपना देख रहे तीन बलिष्ठ दोस्तों को उसका न आने का पता चला, तो वे निराश हो गए। लेकिन जब राजेश ने बताया कि वह अगले दिन आएगी, तो उनके चेहरों पर संतुष्टि छा गई और वे अगले दिन उसे कैसे-कैसे चोदना है, इस पर चर्चा करने लगे।

इधर नीतू, शीला, और अनुषा अपनी बेटी को साथ लेकर वाराणसी के लिए जरूरी सामान खरीदने निकलीं। नीतू की गोद में बैठी निशा का ध्यान सामने की दुकान में रखी डांसिंग डॉल पर था। उसने मम्मी के गाल को थपथपाकर उसकी ओर इशारा किया और उसे लेने को कहा। सारा सामान खरीदने के बाद नीतू अपनी बेटी की इच्छा पूरी करने के लिए खिलौनों की दुकान गई और डांसिंग डॉल के साथ-साथ निशा को पसंद आए कई और खिलौने खरीद दिए। घर पहुँचने पर मंजिल के निर्माण कार्य का शोर सुनाई दे रहा था, लेकिन निशा ने उस ओर ध्यान न देकर अपने नए खिलौनों को हॉल में बिखेरकर खेलना शुरू कर दिया।

शुक्रवार को राजेश के घर पहुँचते ही दरवाजे पर इंतजार कर रहे उसके बलिष्ठ दोस्त ने रश्मि को गले लगाया, लिप किस किया और उसकी गांड मसलने लगा। रश्मि की जींस खोलने के लिए उसने हाथ डाला, तभी रजनी ने पिछले दिन दिया हुआ मोबाइल बजने लगा। रश्मि बाहर आई और फोन रिसीव किया। दूसरी ओर से नीतू बोली, "कहाँ है, पुट्टि? मैं यहाँ तुम्हारे घर तुमसे मिलने आई हूँ। तुम कहीं दोस्त के घर गई हो। जल्दी आ, मुझे फिर गाँव लौटना है।" रश्मि ने कहा, "अभी आ रही हूँ, मम्मी," और फोन काटकर बोली, "राजेश, मुझे तुरंत घर जाना है। जल्दी मुझे घर के पास छोड़ दो।" उसने बाकियों को बाय कहा और निकल गई। उस दिन भी रश्मि जैसी सुंदर लड़की को चोद न पाने की निराशा में पाँचों दोस्तों ने व्हिस्की की बोतल खोली और सुबह-सुबह ही पीने बैठ गए। राजेश घर लौटा और बोला...

राजेश: अरे, भाई, सुबह-सुबह क्यों पी रहे हो?

दोस्त 1: क्या करें, इतनी सारी उम्मीदें थीं, कई सारे प्लान बनाए थे, सब पानी में बह गया। आज रश्मि को कैसे-कैसे चोदना है, उसकी प्रैक्टिस भी की थी, लेकिन पटाखा फुस्स हो गया।

दोस्त 2: राजेश, वह कल तो आएगी न?

राजेश: अगले तीन दिन वह नहीं आएगी। शायद सोमवार के बाद आएगी। वह अपने मम्मी-पापा के साथ कहीं बाहर जा रही है।

दोस्त 4: हम सब रविवार को गाँव लौट रहे हैं। अब क्या करें? रश्मि जैसी खूबसूरत लड़की को फिर से चोदने का मौका चूक जाएगा।

दोस्त 5: तुम लोग गाँव जाओ, मैं तो रश्मि की गांड चोदकर ही गाँव लौटूँगा।

दोस्त 3: मैं भी यही करूँगा। मेरा फैसला पक्का है। चाहे कुछ भी हो, रश्मि की गांड में ही मुझे स्वर्ग मिलेगा।

दोनों बलिष्ठ दोस्तों की बात से तीसरा बलिष्ठ भी सहमत हो गया, लेकिन दोनों कट्टम-कट्ट दोस्तों ने सोचा कि अगर वे गाँव नहीं गए, तो घर में हंगामा होगा। इसलिए वे बहुत निराश होकर गाँव लौटने का फैसला कर चुके थे।

**इधर, रश्मि घर पहुँचकर नीतू को गले लगाई और बोली, "मम्मी, आप कब आईं? चिन्नी कैसी है?"

नीतू: चिन्नी एकदम ठीक है, खेल रही है। कल हमें वाराणसी जाना है, इसलिए तुम सबसे बात करने और विदा लेने आई हूँ।

अशोक: मैं भी वहाँ आने वाला था, लेकिन गुरुजी ने कहा है कि चिन्नी और रश्मि का आमना-सामना नहीं होना चाहिए, इसलिए चुप रह गया।

नीतू: कल हम बेंगलुरु जाएँगे, फिर तुम लोग कामाक्षीपुरम आ जाना। जी, कल टाइल्स और ग्रेनाइट्स आने वाले हैं, उसका पेमेंट और बाकी सब तुम ही देख लेना। साथ ही फैक्ट्री और फूड यूनिट के निर्माण कार्य भी एक चरण तक पहुँच गया है। बेचारी अनुषा अकेली दोनों जगह दौड़ रही है। तुम गए, तो अच्छा होगा। और शीला गर्भवती है, तो रजनी के साथ रहने से मुझे भी हिम्मत मिलेगी।

रजनी: तू इसकी चिंता मत कर, कणे। हमने पहले ही तय कर लिया है। चिन्नी भी गाँव में नहीं होगी, तो रश्मि वहाँ आ सकती है। हम कल सुबह ही कामाक्षीपुरम के लिए निकल जाएँगे। घर की चिंता मत कर, मैं सब संभाल लूँगी।

अशोक: वह फ्लाइट कितने बजे की है?

नीतू: कल दोपहर 12 बजे बेंगलुरु से दिल्ली, फिर वहाँ से वाराणसी शाम पाँच बजे। इसलिए हमने तय किया है कि आज शाम को हरीश स्कूल से लौटने के बाद बेंगलुरु निकल जाएँ। वरना कल सुबह चार बजे घर से निकलना पड़ेगा, जो तकलीफदेह होगा।

अशोक: शाम को बेंगलुरु जाने के लिए मैं अपने ड्राइवर के साथ भेजता हूँ। वह तुम्हें ड्रॉप करके लौट आएगा।

नीतू: जानी ने भी ड्रॉप करने को कहा था, लेकिन मैंने मना कर दिया। फैक्ट्री का सिक्योरिटी वाला बस्या सब देख लेता है। मैंने उसे ही कहा है कि इनोवा से हमें बेंगलुरु ड्रॉप करके लौट आए। फिर वह दोबारा एयरपोर्ट आएगा, तो कोई टेंशन नहीं। तुम भी तैयार होकर शाम को ही निकल आना। हमारा पैकिंग हो गया है, बस निकलना बाकी है। मैं अभी आती हूँ।

रश्मि: मम्मी, चिन्नी को ध्यान रखना। हैप्पी जर्नी।

रजनी: हाँ, कणे, मेरी बेटी की चिंता तुम दोनों रखना। नई जगह है, सावधान रहना।

नीतू: ठीक है, कणे, मैं अभी आती हूँ।

नीतू ने तीनों से विदा ली और SUV के पास आई, तो अशोक ने अपनी दूसरी पत्नी के हाथ में पाँच सौ के दो बंडल दिए। नीतू हँसते हुए उसे अपने वैनिटी बैग में रख लिया, तीनों को गले लगाया और गाँव की ओर निकल गई। नीतू जब घर लौटी, तो शीला अपनी बेटी को गोद में बिठाकर उसे मम्मी-पापा के साथ रहने, इधर-उधर न भागने की नसीहत दे रही थी। निशा को कितना समझ आया, कितना नहीं, लेकिन वह शीला की बातें ध्यान से सुनकर सिर हिला रही थी। बस्या घर आया और पहले इनोवा को धोकर साफ किया, फिर नीतू के कहे हुए सामान को गाड़ी में रखकर इंतजार करने लगा। हरीश स्कूल से लौटा, तो उसके साथ सुकन्या और सविता भी आईं। नीतू उनसे बात करते हुए वहाँ के कामकाज का ब्यौरा दे रही थी। गिरीश और सुरेश अपनी प्यारी बहन को बीच में बिठाकर उसे समझा रहे थे कि वहाँ ज्यादा उछल-कूद न करे। निशा अपने भाइयों की हर बात पर सिर हिलाकर "हूँ" कह रही थी। अनुषा सबके लिए कॉफी और नाश्ता लाई और बस्या को भी घर के अंदर बुलाया। बस्या संकोच करते हुए बोला, "मैडम, यहीं दे दीजिए, मैं बाहर ही पी लूँगा।" नीतू ने डाँटते हुए कहा, "चुपचाप अंदर आकर बैठ। तू कोई हमारा नौकर नहीं है। यह समझ ले। तू फैक्ट्री की सिक्योरिटी की जिम्मेदारी संभालने वाला इंसान है। तुझे भी इज्जत है।" बस्या ने मन ही मन घरवालों के सम्मान की कदर की और नाश्ता-कॉफी ले लिया। गिरीश घर आया और अपने दोस्त बस्या को विश किया। उसने अपने साथ लाई लड़की को नीतू और शीला से मिलवाया।

गिरीश: आँटी, ये रमा हैं, हमारे गाँव की। आपके घर में काम करने के लिए लाया हूँ। कल सुबह दूध देने आने पर मैं इन्हें ड्रॉप कर दूँगा।

नीतू: रमा, खाना-नाश्ता हम खुद बनाएँगे। तू बस मदद कर देना। कपड़े धोने के लिए वॉशिंग मशीन है। बाकी काम तू देख लेना। बर्तन धोना, घर की सफाई, और जब मैं न रहूँ, तो मेरी इस प्यारी बेटी का ध्यान रखना। शाम तक रहने में कोई दिक्कत तो नहीं?

रमा: नहीं, मैडम। शाम साढ़े छह बजे मेरे पति काम से गाँव जाते हैं, तो वे मुझे ले जाएँगे। तब तक जो भी काम होगा, मैं करूँगी।

नीतू: ठीक है, कल गिरी के साथ आ जाना। ये दो हजार रख ले। बाकी मैं लौटकर आने पर बात करूँगी। यहाँ आने से तेरे घर-बच्चों का क्या?

रमा: घर में मेरे पति की दीदी हैं, वे सब देख लेंगी। इसलिए कोई परेशानी नहीं। बच्चे भी थोड़े बड़े हो गए हैं।

गिरीश और रमा के जाने के बाद नीतू ने शीला और अनुषा को इशारा करके कमरे में बुलाया और शीला को एक चाबी दी। "ये सामने वाले घर के कमरे की चाबी है। वहाँ सारा पैसा और सोना रखा है। कल रमा आए, तो उस घर को भी साफ करवा देना। अनु फैक्ट्री जाएगी, लेकिन रजनी तेरे साथ होगी। कमरे के अंदर सफाई मत करवाना। उसे अनु या रजनी देख लेंगी। अनु, तेरी दीदी गर्भवती है, तो इसका ध्यान रखना। रात तक अशोक, रजनी, और रश्मि आ जाएँगे। मैं रोज फोन करूँगी।

रवि ने भी हरीश को फोन करके यात्रा की शुभकामनाएँ दीं और अपनी बहन को निशा का ध्यान रखने को कहा। निशा के साथ भी बात की। निशा ने अपने भाइयों से गले मिलकर, उनके गालों पर चुम्मी दी, सुकन्या और सविता से भी प्यार लिया और अनु आँटी को जोर से गले लगाया। शीला की आँखों से बहते आँसुओं को पोंछकर निशा ने उसे चुम्मी दी और सबको टाटा करने लगी। हरीश ने भी जाने से पहले शीला को अपनी सेहत का ध्यान रखने को कहा और उसकी जिम्मेदारी अनुषा को सौंपी। दोनों बच्चों को घर में शरारत न करने और बात मानने की हिदायत दी। नीतू जब यह सब समझा रही थी, तभी विश करने आए ASI प्रताप को हरीश ने घर का ध्यान रखने की हिदायत दी। निशा अपने पापा की गोद में चढ़ गई और खिड़की से सबको टाटा करती रही। इनोवा शुरू हुई और बेंगलुरु की ओर निकल गई।

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नियति से बंधी नीतू - Part 134

बेंगलुरु हवाई अड्डे के पास एक सुव्यवस्थित होटल में पहुँचते ही हरीश ने बस्या को पाँच हज़ार रुपये दिए, लेकिन उसने इसे लेने से मना कर दिया। नीतू के डाँटने के बाद अनमने मन से उसने पैसे लिए और कहा कि वह गाँव लौटेगा, लेकिन दिल्ली से वापस जाने से पहले उसे फोन करने को कहा ताकि वह हवाई अड्डे पर आ सके। वह कामाक्षीपुरम की ओर निकल गया। रास्ते भर माँ की गोद में सिर रखकर और पिता के ऊपर पैर फैलाकर सो रही निशा अब भी पिता की बाहों में सो रही थी। हरीश ने बुक किया हुआ कमरा की चाबी ली और अगले दिन सुबह नौ बजे हवाई अड्डे जाने के लिए टैक्सी की व्यवस्था करने को होटल के कर्मचारियों से कहा। कमरे में पहुँचते ही निशा जाग गई, आँखें मलते हुए माँ के साथ फ्रेश हुई और पिता की गोद में चढ़कर "आइस... आइस..." माँगने लगी। बाथरूम से कपड़े बदलकर आई नीतू ने कहा, "चिन्नी, हम अब घर पर नहीं हैं, बहुत दूर आ गए हैं। जब तक घर नहीं लौटते, तू आइसक्रीम नहीं माँगेगी, वरना डॉक्टर आँटी से एक इंजेक्शन लगवाऊँगी।" माँ के इंजेक्शन की बात सुनते ही निशा आइसक्रीम की बात भूल गई और कमरे की बालकनी में जाकर खड़ी हो गई, बाहर देखते हुए माँ को कुछ दिखाने लगी। हरीश ने घर पर फोन करके बताया कि वे बेंगलुरु पहुँच गए हैं। तब रात के दस बज रहे थे, और अशोक का परिवार भी कामाक्षीपुरम पहुँच चुका था। होटल आने से पहले रास्ते में खाना खा चुके थे, इसलिए नीतू ने अपनी बेटी को अपने और पति के बीच सुलाकर, उसे थपथपाते हुए उसके साथ सो गई।

सुबह तैयार होकर कमरे में नाश्ता मँगवाकर खाया और नीचे उतरते ही टैक्सी तैयार थी, जो उन्हें हवाई अड्डे तक ले जाने वाली थी। तीनों ने हवाई अड्डे पर पहुँचकर पहले से बुक किए टिकटों से बोर्डिंग पास लिया। निशा हवाई अड्डे को बहुत आश्चर्य से देख रही थी, और नीतू व हरीश के लिए भी यह पहला अनुभव था। हरीश ने सामान दिल्ली जाने वाली विमान कंपनी के काउंटर पर सौंपा और सिक्योरिटी चेकिंग के लिए गए। नीतू के साथ चल रही निशा ने महिला सिक्योरिटी गार्ड के हाथ में मेटल डिटेक्टर की "कुँय... कुँय..." की आवाज़ सुनी और उसे पकड़ने की कोशिश की, तो गार्ड ने भी बच्ची के साथ मज़ाक किया। हरीश ने बेटी को गोद में उठाकर बोर्डिंग एरिया की ओर ले जाकर पास में उड़ते विमानों को दिखाया, तो निशा के साथ नीतू भी आश्चर्य से देख रही थी। विमान में चढ़ते समय माँ-बेटी दोनों उत्साह से इधर-उधर देख रही थीं और अपनी सीट पर बैठकर खिड़की से बाहर झाँक रही थीं। एयर होस्टेस ने नीतू से बच्चे के लिए विशेष बेल्ट की ज़रूरत पूछी, तो हरीश ने कहा कि इसकी ज़रूरत नहीं, वे खुद संभाल लेंगे। विमान धीरे-धीरे चलने लगा और फिर तेज़ी से उड़ान भरी। माँ-बेटी दोनों उत्साह से खिड़की से बाहर देख रही थीं, और हरीश अपनी पत्नी और बेटी को देखकर मुस्कुरा रहा था। दस मिनट तक खिड़की से बाहर देखने के बाद निशा वैसे ही सो गई, तो माँ-बाप ने उसे बीच की सीट पर आराम से सुला दिया। पति-पत्नी कई विषयों पर बात करते हुए, एयर होस्टेस के लाए कॉफी पीते हुए चर्चा कर रहे थे।

शनिवार सुबह दस बजे कामाक्षीपुरम पहुँची कार और ट्रक सीधे हरीश के घर की कॉलोनी के गेट पर रुके। कार में बैठे आरीफ हुसैन ने कॉलोनी के गार्ड्स से बात की, लेकिन कोई सूचना न होने के कारण उन्होंने अंदर जाने की अनुमति नहीं दी और घर के मालिक से बात करने को कहा। नीतू का नंबर नॉट रीचेबल था, तो निराश होकर आरीफ ने अशोक को फोन करके बताया कि वह आ चुका है। अशोक ने तुरंत कॉलोनी सिक्योरिटी से बात करके उन्हें अंदर भेजने को कहा। हफ्तों बाद नीतू को फिर से देखने की खुशी में आरीफ घर की ओर निकला। घर के सामने अशोक के साथ तीन बच्चे और आर्किटेक्ट रमेश भी खड़े थे। आरीफ के खुद आने से दोनों हैरान थे। आरीफ ने दोनों को handshake दिया और मजदूरों को टाइल्स व ग्रेनाइट उतारने का निर्देश देकर बच्चों से उनके बारे में पूछा और हँसते-हँसते उनसे मज़ाक किया।

आरीफ: अशोक सर, मुझे भी इस शहर में कुछ काम था, इसलिए मैं खुद आ गया, वरना दो दिन पहले ही सामान भेज देता। आपने जितना ऑर्डर किया था, उतने ही ग्रेनाइट और टाइल्स मैंने खुद डैमेज चेक करके लाए हैं। आप भी एक बार जाँच लीजिए।**

अशोक: आपका आना बहुत खुशी की बात है। जब तक सामान उतरता है, घर आकर हमारा आतिथ्य स्वीकार कीजिए। रमेश, आप भी आइए। मजदूरों को बता दीजिए कहाँ उतारना है, वे सब कर लेंगे।**

आरीफ घर में आया, तो रजनी, शीला, और अनुषा से परिचय करवाया गया। उसने तीनों को नमस्ते किया और आँखों से नीतू को ढूँढ रहा था।

आरीफ: सर, नीतू मैडम दिखाई नहीं दे रही हैं?**

अशोक: वह गाँव में नहीं है, आरीफ। कुछ काम से दिल्ली गई हैं। चार-पाँच दिन में लौटेंगी।**

आरीफ निराश हुआ, लेकिन नहीं दिखाया। "वह हमारी छोटी सी क्यूटी कहाँ है? क्या वह भी माँ के साथ गई है?"**

अशोक हँसते हुए: हाँ, आरीफ। वाराणसी में उसकी पूजा थी, इसलिए नीतू, उसका पति हरीश, और क्यूटी तीनों गए हैं।**

टाइल्स और ग्रेनाइट उतरने तक तीनों सामाजिक बातें करते रहे। काम पूरा होने पर अशोक ने चेक दिया, लेकिन आरीफ ने उसे लेने से मना कर दिया।

आरीफ: सर, नीतू मैडम भी एक बार जाँच लें कि सब ठीक है। मैं बाद में आकर पैसे ले लूँगा।**

अशोक: अरे, आपको क्यों तकलीफ लेनी? रमेश ने सब जाँच लिया है। सब ठीक है। अब तो पैसे ले सकते हैं।**

आरीफ: बिल्कुल नहीं, सर। मेरा एक सिद्धांत है कि जिससे ऑर्डर लेता हूँ, उसी से पैसे लेता हूँ। उस दिन ऑर्डर कॉपी पर नीतू मैडम ने हस्ताक्षर किए थे, इसलिए मैं उनसे ही पैसे लूँगा। एक हफ्ता हो या एक महीना, आप चिंता न करें। मैं खुद आकर पैसे लूँगा। मुझे इस शहर में भी काम है। अगर टाइल्स की कमी हो या कुछ डैमेज हो, तो फोन करें। मैं तुरंत बदलवाने की व्यवस्था करूँगा। क्या लेयरिंग के लिए मजदूर भेजूँ?**

रमेश: नहीं, आरीफ। मेरे पास कुशल टाइल्स मजदूर हैं। इसलिए उस दिन भी हमने लेयरिंग के लिए नहीं कहा था।**

आरीफ ने सबको नमस्ते किया। नीतू को देखने की उसकी इच्छा पूरी नहीं हुई, लेकिन उसने पैसे न लेकर फिर से नीतू से मिलने का मौका ज़रूर बना लिया।

दिल्ली हवाई अड्डे पर विमान उतरते ही नीतू ने बेटी को जगाया और तीनों कतार में खड़े होकर उतरने लगे। विमान के दरवाजे पर यात्रियों को नमस्ते कह रही एयर होस्टेस ने नीतू की गोद में बैठी निशा के गाल सहलाए और चॉकलेट दी। निशा ने खुशी-खुशी उसे लिया, मुस्कुराकर उन्हें चुम्मी दी और टाटा किया। हवाई अड्डे पर खड़े कई विमानों को देखकर पति-पत्नी आश्चर्य में थे, और निशा भी उत्साह से सब देख रही थी, अपनी भाषा में माँ को कुछ बता रही थी। हरीश ने सामान लिया और काशी की फ्लाइट का बोर्डिंग पास लेकर सामान वहाँ के काउंटर पर सौंप दिया। दिल्ली के सुसज्जित हवाई अड्डे को देखकर...

नीतू: जी, मैंने कभी नहीं सोचा था कि जीवन में विमान से यात्रा करूँगी। मेरी बेटी की कृपा से यह भी पूरा हुआ। अगर सुरेश और गिरीश होते, तो उन्हें भी खुशी होती।**

हरीश: शादी के इतने सालों में मैंने समय बर्बाद किया। तुम्हारी इच्छाओं के बारे में नहीं सोचा। अब ऐसा नहीं होगा। गर्मी की छुट्टियों में हम सब कहीं घूमने जाएँगे। शिवरात्रि की पूजा में तुम्हारे मम्मी-पापा, भैया-भाभी भी आएँगे। उनके साथ भी एक छोटा सा ट्रिप कैसा रहेगा?**

नीतू: जी, आप पुरानी बातें याद करके दुखी न हों। मैं आपसे शादी करके तब भी खुश थी, अब भी खुश हूँ। आपका ट्रिप का विचार अच्छा है, लेकिन शीला की सेहत के बारे में भी सोचना होगा। यह ज़रूरी है।**

हरीश: देखते हैं। अगर डॉक्टर और स्वामीजी इजाज़त दें, तो जाएँगे। वैसे, अनुषा और प्रताप की शादी के बाद उन्हें हनीमून के लिए कहीं भेजने के बारे में सोचा है? हम तो नहीं गए, कम से कम वे तो जाएँ।**

नीतू: घर लौटने के बाद अपनी दीदी से बात करूँगी। उसे कहाँ जाना है, यह पूछकर उसी जगह की व्यवस्था कर देंगे।**

हवाई अड्डे पर घूम रहे लोगों को देख रही निशा ने पहले अनु आँटी के सिखाए तरीके से माँ का हाथ खींचकर अपनी छोटी उंगली दिखाई। नीतू हँसते हुए बेटी के साथ बाथरूम की ओर गई। तीनों ने हवाई अड्डे के रेस्तराँ में थोड़ा नाश्ता किया और वाराणसी की फ्लाइट में चढ़ गए। शाम सात बजे काशी पहुँचकर हरीश ने देवदास स्वामीजी के दिए नंबर पर फोन किया और अपना परिचय देकर बताया कि वे उनके कहने पर आए हैं। दूसरी ओर से सब सुनकर उन्होंने कहा कि वे होटल के पास आएँगे। हवाई अड्डे से टैक्सी लेकर बुक किए पंचतारा होटल की ओर निकले। नीतू ने गाँव फोन करके बताया कि वे वाराणसी पहुँच गए हैं और कमरे में पहुँचकर बात करेंगी। होटल में बुक किया कमरा की चाबी लेकर फ्रेश होने तक देवानंद स्वामीजी के परिचित व्यक्ति ने फोन करके बताया कि वह होटल पहुँच गया है। हरीश उसे कमरे में लाया। लगभग 70 साल के बुजुर्ग को देखकर नीतू ने नमस्ते किया, और निशा ने भी उसी तरह नमस्ते किया। आचार्य ने उन्हें आशीर्वाद दिया और निशा को पास बुलाकर उसके चेहरे की चमक और तेज को देखा, फिर उसकी हस्तरेखाएँ सूक्ष्मता से देखने लगे।

आचार्य: जैसा देवदासजी ने कहा, इस बच्ची पर माँ आदिशक्ति की विशेष कृपा है। कल सुबह पाँच बजे ब्रह्म मुहूर्त में आपकी पूजा का कार्य पूरा करवाऊँगा। आपको चार बजे तक दशाश्वमेध घाट पहुँचना होगा। पहले गंगा स्नान करें, फिर गंगा माता की पूजा के बाद काशी विश्वनाथ के सन्निधान में बच्ची के नाम की पूजा संपन्न करेंगे।**

हरीश: गुरुजी, हम यहाँ पहली बार आए हैं। सुबह इतनी जल्दी घाट कैसे पहुँचेंगे? आप ही कुछ सुझाएँ।**

आचार्य: इसकी चिंता न करें। मैं अपने परिचित को सुबह साढ़े तीन बजे होटल भेजूँगा। वह आपको फोन करेगा। आप उसके साथ कार से घाट पहुँच सकते हैं। पूजा के लिए ज़रूरी सामग्री मैं पहले से तैयार करके घाट पर इंतज़ार करूँगा। आपको कुछ लाने की ज़रूरत नहीं। पूजा और अन्य खर्चे का ब्यौरा कल पूजा के बाद बताऊँगा। अब आराम करें, कल जल्दी उठना है। सुबह मिलते हैं।**

आचार्य के साथ पिता हिंदी में बात कर रहे थे, और निशा को कुछ समझ नहीं आया। वह आँख-मुँह खोलकर दोनों को घूर रही थी। आचार्य के जाने के बाद खाना ऑर्डर किया और वीडियो कॉल से घरवालों से बात की। नीतू ने रश्मि से अकेले बात की। निशा को देखकर बात न कर पाने के दुख से रश्मि की आँखों में आँसू आ गए। नीतू ने उसे सांत्वना दी और कहा कि कल फिर फोन करेगी। तीनों ने खाना खाया, फिर नीतू ने अपने माता-पिता की जगह लेने वाले सास-ससुर से बात की। उन्हें अपनी नातिन से बात करने की इच्छा थी, लेकिन निशा तब तक पिता की छाती पर सो चुकी थी।

सुबह जल्दी उठकर दंपति ने नित्यकर्म पूरे किए और बेटी को जगाकर फ्रेश करवाया। होटल की लॉबी में पहुँचते ही आचार्य के भेजे व्यक्ति का इंतज़ार था। उसकी कार से दशाश्वमेध घाट पहुँचे, जहाँ आचार्य ने गंगा पूजा की सारी तैयारी की थी। उन्होंने तीनों को गंगा में स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनकर आने को कहा। हरीश पहले पानी में उतरा और बेटी को गोद में लेकर उसे पानी में डुबाने की कोशिश की। सुबह की ठंड में गंगा का ठंडा पानी छूते ही निशा काँपने लगी और चिल्लाने लगी। हरीश ने बहुत सावधानी से बेटी को तीन बार पानी में डुबाया और ऊपर उठाकर पत्नी को सौंप दिया, फिर खुद स्नान करने लगा। निशा माँ से बदन पोंछवाते हुए ठंड से काँप रही थी, लेकिन पिता के पानी में डुबाने की शिकायत माँ से कर रही थी। नीतू ने बेटी को सांत्वना दी, उसे गर्म कपड़े पहनाए, सिर बाँधकर दो छोटी-छोटी चोटियाँ बनाईं और तैयार किया। पति का स्नान पूरा होने पर उसे तौलिया और कपड़े दिए। नीतू भी गंगा में डूबकी लगाकर महिलाओं के कमरे में गई, रेशमी साड़ी पहनकर तैयार होकर आई। तब तक हरीश ने बेटी का गुस्सा शांत कर लिया था और उसे नदी दिखा रहा था। नीतू के आने के बाद आचार्य ने दंपति और निशा से गंगा माता की पूजा करवाई और उन्हें विश्वनाथ के सन्निधान की ओर ले गए।

मंदिर परिसर में बैग, मोबाइल और अन्य सामान ले जाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए आचार्य के घर में सामान रखकर तीनों विश्वनाथ के सन्निधान पहुँचे। आचार्य के कहे अनुसार हरीश ने बेटी को गोद में बिठाकर पत्नी के साथ पूजा के विधि-विधान पूरे किए। निशा भी हर चीज़ को उत्साह से देख रही थी। आधे घंटे में निशा के दोष निवारण के लिए पूजा पूरी हुई। आचार्य ने प्रसाद दिया और उन्हें अपने घर ले गए। पूजा के दौरान रखे तीन छोटे सीलबंद कलश दंपति को देते हुए कहा, "इन कलशों के पानी को शिवरात्रि पूजा के बाद जहाँ-जहाँ देवदास स्वामीजी कहें, वहाँ विसर्जन करें। शाम को दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती के समय आएँ। यह बहुत अद्भुत होगा। आप सबको शुभ हो, जाइए।" हरीश ने पूजा और कार के किराए के लिए बीस हज़ार देने चाहे, लेकिन आचार्य ने सिर्फ़ ग्यारह हज़ार लिए और उन्हें विदा किया।

काशी विश्वनाथ के सन्निधान में पूजा करने से हरीश और नीतू प्रसन्न थे। निशा को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन वह भी पिता की गोद में खुशी से चिल्ला रही थी। तीनों आचार्य के घर से निकले और कार में चढ़ने से पहले निशा ने गरम-गरम जलेबी देखकर उसी की ओर इशारा किया और जीभ से होंठ चाटने लगी। हरीश हँसते हुए पत्नी और बेटी के साथ उस होटल गए, जलेबी के साथ पूरी खाई और कार से होटल लौट गए। निशा सुबह तीन बजे से जागी थी, फिर नदी स्नान और पूजा से थक गई थी। कमरे में पहुँचते ही बिस्तर पर चढ़कर सो गई। बेटी के सोने के बाद नीतू फ्रेश होने गई, और हरीश ने गाँव फोन करके अपनी दूसरी पत्नी शीला को दिन के बारे में बताया। नीतू ने भी दोस्त, फिर रजनी, अनुषा, और अशोक से बात की, बच्चों से बात की और मोबाइल पति को लौटाया। सास-ससुर को रिपोर्ट दी। नीतू ने देखा कि पति अभी भी फोन पर बात कर रहा है, तो वह बेटी के साथ सो गई।

माँ-बेटी दोपहर ढाई बजे तक सोईं। हरीश तब तक जाग चुका था और शीला से बात कर रहा था। पत्नी और बेटी के फ्रेश होने तक उसने रिसेप्शन से खाना मँगवाया और तीनों ने खाया।

हरीश: माँ-बेटी यहाँ क्या सोने आई हैं? जल्दी तैयार हो। पहले काल भैरवेश्वर मंदिर जाएँगे, फिर गंगा नदी में नाव की सवारी करेंगे और रात को गंगा आरती देखकर लौटेंगे। नीतू, कल हमारी रिटर्न फ्लाइट कब है?**

नीतू: जी, कल सुबह नौ बजे यहाँ से दिल्ली की फ्लाइट है, फिर वहाँ से बेंगलुरु दोपहर दो बजे। चाहे कुछ भी हो, गाँव पहुँचते-पहुँचते मध्यरात्रि हो जाएगी। मैं बस्या को फोन करके बता दूँगी कि बेंगलुरु हवाई अड्डे पर कब आना है। आप अशोक को फोन करके बता दीजिए।**

फोन का काम खत्म करके तीनों तैयार हुए और काल भैरव मंदिर में पूजा करके गंगा नदी के किनारे गए। नाव पर चढ़ी निशा माँ की गोद में बैठकर इधर-उधर देख रही थी, खुशी से ताली बजा रही थी और चिल्लाकर नाव में मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी। शाम को दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती में शामिल हुए। दंपति ने उस अद्भुत दृश्य को आँखों में भरा, और निशा भी दूसरों को देखकर "जय जय" चिल्लाते हुए ताली बजा रही थी। तीनों ने पास के दो और घाट देखे और घूमते हुए लौटने तक रात नौ बज गए। घाट के पास पाँच गुंडे [राउडी] रास्ता रोककर खड़े हो गए।

राउडी 1 [हिंदी में]: अरे, तुम्हारे पास जो पैसा और गहने हैं, सब दे दो, तो जान बख्श देंगे, वरना...**

राउडी 4: देखो, इस मस्त माल को। कितनी हॉट है! जवानी से लबालब। हम भी इसके जवानी के तालाब में तैरकर मज़ा लें।**

राउडी 3 ने अपने साथी की बात सुनकर नीतू को सिर से पाँव तक देखा: आइटम ज़बरदस्त है। मस्त मज़ा देगी। अरे, अपनी चिनकुरली बेटी को लेकर रास्ता खाली कर, हम तेरी बीवी का स्वाद लेकर छोड़ देंगे।**

नीतू को बहुत गुस्सा आया, लेकिन वह धैर्य से देख रही थी कि पति क्या करता है। उसके चेहरे पर आश्चर्य के साथ प्रशंसा की मुस्कान उभरी, क्योंकि अब तक चुप रहे हरीश ने सामने खड़े गुंडे के सिर पर एक मुक्के से तेज़ प्रहार किया। स्वामीजी के दिए द्रव्य के प्रभाव से हरीश पहले से ज़्यादा ताकतवर था। उसके एक ही प्रहार से गुंडे का सिर फट गया, खून गंगा नदी की तरह बहने लगा और वह उसी पल परमात्मा के चरणों में जा पहुँचा। बाकी चार को समझने का मौका मिलने से पहले ही हरीश उन पर टूट पड़ा और उन्हें भागने का मौका भी नहीं दिया। उसने रुद्र तांडव शुरू कर दिया। पिता की फाइटिंग देखकर माँ की गोद में बैठी निशा भी हाथ-पैर हिलाकर माँ के साथ फाइटिंग करने लगी। पाँच मिनट में हरीश के रणभयंकर प्रहारों से पाँचों गुंडे कहीं नहीं ठहरे और सीधे शिव के चरणों में जा पहुँचे। पिता के पास आते ही निशा उसकी बाहों में चढ़ गई, हँसते हुए चिल्लाने लगी। नीतू बहुत प्रशंसा के साथ पति का हाथ पकड़कर होटल की ओर निकल गई।

होटल पहुँचकर खाना खाया और बेटी को सुलाकर नीतू ने देखा कि पति अभी भी गुस्से में है। वह उसके पास गई और गले लगी।

नीतू: जी, शांत हो जाइए। आप अभी भी गुस्से में क्यों हैं? उनके पापों की वजह से ही उनका नाश हुआ। अब तो आपको समझ आना चाहिए कि मैं क्यों हमारे परिवार को नुकसान पहुँचाने वालों को खत्म करती हूँ।**

हरीश: जैसे ही उन्होंने तेरे बारे में गंदा बोला, पता नहीं मुझे क्या हुआ। इतना गुस्सा आया, जितना कभी नहीं आया। जो हुआ, सो हुआ। इसे भूलकर सो जाएँ। गाँव में इसके बारे में किसी को मत बताना। वहाँ पहुँचकर बताएँगे।**

अगले दिन वाराणसी से दिल्ली, फिर बेंगलुरु पहुँचे। हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही बस्या उनका इंतज़ार कर रहा था। नीतू को रजनी ने फोन करके बताया कि वे सब सामने वाले घर में सो रहे हैं और वे आराम से अपने घर में सोएँ। रात ग्यारह बजे के बाद घर पहुँचे, तो अनुषा और गिरीश बाहर खड़े थे, और रजनी व रश्मि भी इंतज़ार कर रही थीं। बस्या ने इनोवा रोकी, सामान घर में रखा और अपनी बाइक लेकर चला गया। नीतू ने सो रही बेटी को कमरे में सुलाकर दरवाज़ा बंद किया और गिरीश को सामने के घर से रश्मि को बुलाने भेजा। रश्मि ने आकर अपनी मम्मी को गले लगाया और पास बैठी। नीतू ने काशी की पूजा और निशा के खेल के बारे में बताया। बच्चों को सोने भेजा, तो रश्मि ने कहा कि उसे अकेले रहना है और गिरीश को अपने साथ ले गई। रात ढाई बजे तक काशी की घटनाओं पर चर्चा हुई। गुंडों की बात बताने पर रजनी और शीला डर गईं, लेकिन अनुषा ने हरीश का हाथ पकड़कर कहा, "भैया बहुत स्ट्रॉन्ग हैं, पाँच लोगों को मिट्टी चटाई!" इससे सब हँसी के समंदर में डूब गए।

सामने वाले घर में पहुँचकर दरवाज़ा बंद करके रश्मि ने गिरीश को गले लगाया और उसे कमरे में खींच ले गई। रश्मि ने खुद उसके होंठ चूसे, नाइटी उतारी, ब्रा-पैंटी फेंकी और नंगी हो गई। उसका खूबसूरत नंगा बदन देखकर गिरीश भी नंगा हुआ और अगले 40 मिनट तक रश्मि की चूत की सवारी की। पहले सात-आठ लड़कों के लंड झेल चुकी रश्मि की गांड के छेद में गिरीश ने पहली बार प्रवेश किया और इस रसभरी रात में उसकी गांड चोदकर मज़ा लिया। रश्मि ने अपनी अजीब इच्छा बताई कि वह गिरीश का पेशाब पीना चाहती है। गिरीश हैरान हुआ, लेकिन उसकी इच्छा पूरी करने के लिए दोनों बाथरूम में गए। गिरीश के लंड से निकली पेशाब की धार को रश्मि ने एक बूँद भी बर्बाद किए बिना पिया और हँसते हुए कहा, "बहुत स्वादिष्ट है," और शरमा गई। रजनी और अशोक के लौटने से पहले एक और बार चुदाई का सुख लिया और अलग-अलग कमरों में सो गए।

सुबह छह बजे से पहले अशोक और रजनी गाँव जाने के लिए तैयार हुए। उन्होंने सो रही निशा के गाल सहलाए और रश्मि को न देख पाने के दुख के साथ सबको विदा देकर गाँव की ओर निकल गए। तीन दिन की लगातार यात्रा, पूजा और घूमने से थकी निशा आराम से सो रही थी।

गिरीश: माँ, चिन्नी अभी तक नहीं जागी? रात को आने पर भी सो रही थी, अब भी सो रही है। कॉलेज जाने से पहले उससे बात करके जाऊँगा।**

नीतू: तू ही जाकर जगा। मैं गई, तो तुम्हारे पापा डाँटेंगे।**

भैया-भाई दोनों ने छोटी बहन के गाल सहलाकर जगाया। निशा ने आँखें खोलीं, लेकिन अभी भी नींद में थी। अपने भाइयों को मुस्कुराकर टाटा किया और फिर आँखें बंद करके सो गई।

हरीश: उसे थकान है। तुम लोग निकलो, देर हो रही है। शाम को घर लौटने के बाद जितना चाहे खेल लेना।**

पति ने बच्चों को विदा किया। नीतू ने शीला और अनुषा को काशी की सारी बातें बताईं और गंगा में निशा को डुबाने का दृश्य रोचक तरीके से बयान किया। नीतू ने मोबाइल में लिया वीडियो दिखाया। आँखें मलते हुए कमरे से बाहर आई निशा ने वीडियो देखा और शीला को मोबाइल की ओर इशारा करके पिता की शिकायत करने लगी।

शीला: पापा ने तुझे पानी में डुबा दिया, चिन्नी? [निशा ने "हूँ" कहकर सिर हिलाया।] शाम को पापा घर आएँ, तो मैं और तू मिलकर पापा को अच्छे से पीटेंगे। अब चल, नहाकर नाश्ता कर।**

अनुषा फैक्ट्री जाने के लिए उठी, तो नीतू ने छोटी दीदी को बिठाकर कहा, "अशोक ने जाते वक्त कहा था कि आज कोई खास काम नहीं है। रमेश वहाँ हैं, वे सब संभाल लेंगे। तू घर पर ही रह।"

घर का काम कर रही रमा को बुलाकर नीतू ने उससे विस्तार से बात की और उसे महीने का छह हज़ार देने की बात कही। खुश होकर रमा ने नीतू के पैर छुए। नीतू ने उसे उठाकर कहा, "रमा, मेरे पैर छूने की ज़रूरत नहीं। तू मन से सारा काम कर और ईमानदारी से रह, यही हमारा सम्मान है। अगर कोई समस्या हो, तो बिना संकोच हमें बता। हम जो कर सकते हैं, ज़रूर करेंगे।"

रमा: भगवान की कृपा से कोई समस्या नहीं है, मैडम। गिरी ने मुझे आपके जैसे अच्छे लोगों के घर काम दिलवाया। मैं भगवान से उसके लिए हमेशा अच्छा होने की प्रार्थना करती हूँ।**

नीतू: ठीक है, अपना काम देख। सब खत्म होने के बाद उस छोटे कमरे में थोड़ा आराम कर ले। हम आज घर पर ही हैं, तो बेटी का ध्यान रखने की ज़रूरत नहीं। [उसे भेजकर वह अपनी छोटी दीदी से बात करने बैठ गई।]**

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नियति से बंधी नीतू - Part 135

निशा जब साफ-सुथरे कपड़े पहनकर माँ से नाश्ता खा रही थी, तब वह शीला और अनुषा के पास जाकर पापा द्वारा उसे पानी में डुबाने की शिकायत कर रही थी। बेटी की शिकायत देखकर नीतू हँस रही थी, जबकि शीला ने उसे सांत्वना देते हुए कहा कि शाम को जब पापा आएँ, तो दोनों मिलकर उन्हें अच्छे से पीटेंगे।

नीतू: अनु, बाहर ग्रेनाइट्स आए हैं ना, क्या तुम्हारे भैया ने उनका पेमेंट कर दिया?

अनुषा: नहीं दीदी, ग्रेनाइट शोरूम का मालिक आरीफ हुसैन खुद आया था। भैया ने पैसे देने की कोशिश की, लेकिन उसने मना कर दिया और कहा कि वह आपसे ही पैसे लेगा।

नीतू (आश्चर्य से): ऐसा क्यों?

अनुषा: उसका कहना था कि उसका एक नियम है कि जिससे ग्रेनाइट का ऑर्डर लिया, उसी से पैसे लेता है। साथ ही उसने कहा कि जब आप गाँव लौटेंगी, तो फोन करें, वह खुद आएगा।

नीतू (सोचते हुए): ठीक है, छोड़ो। अभी मूड नहीं है। शाम को मैं खुद फोन करके बात करूँगी। अभी तैयार हो, शीला को डॉक्टर के पास ले जाना है। कल ही जाना था ना। वहाँ तुम चिन्नी को गोद में रखना, क्योंकि अस्पताल देखते ही वह डर जाएगी कि उसे इंजेक्शन लगवाने ले आए हैं।

तीनों घर से निकले। निशा अपनी मर्जी से बड़बड़ा रही थी। अनुषा उसे गोद में लेकर अस्पताल की ओर बढ़ी, तो निशा का डर बढ़ गया और वह इधर-उधर देखने लगी। उसे लगा कि माँ उसे इंजेक्शन लगवाने ले आई है। उसने अनुषा को कसकर पकड़ लिया और आँखें बंद करके बाहर ले जाने की जिद करने लगी।

अनुषा (पीठ सहलाते हुए): चिन्नी, मत डर, छोटी। देख, तुम्हारी तरह ही छोटे-छोटे बच्चे रो रहे हैं। क्या तुम्हें भी लगता है कि तुम्हें इंजेक्शन लगाएँगे?

निशा ने "हूँ" कहकर सिर हिलाया। अनुषा हँसते हुए बोली, "नहीं चिन्नी, तुम्हें कोई इंजेक्शन नहीं लगाएगा। आज सिर्फ शीला मम्मी को डॉक्टर आँटी इंजेक्शन लगाएँगी। चल, हम बाहर जाकर कार में बैठते हैं।"

अनुषा उसे लेकर अस्पताल से बाहर आई और कार में बैठी, तब जाकर निशा को सुकून मिला। उसे यकीन हो गया कि कोई उसे इंजेक्शन नहीं लगाएगा। वह खुशी से आँटी के साथ बड़बड़ाने लगी।

शीला का चेकअप करवाकर कार में लौटी नीतू बोली, "आज मेरी बेटी फुल हँस रही है, खुश है। इंजेक्शन के डर से नहीं डरी ना?"

अनुषा (हँसते हुए): दीदी, वो सब तो हो गया। मैं उसे बाहर कार में लाने तक वह इंजेक्शन के डर में थी। बाद में ही पहले की तरह खेलने लगी। डॉक्टर ने क्या कहा, शीला दीदी का स्वास्थ्य कैसा है?

नीतू: हाँ कण, शीला पूरी तरह स्वस्थ है। कोई परेशानी नहीं है। डॉक्टर ने कुछ दवाएँ दी हैं। अब तुम ही कार चलाओ। दवाओं के साथ कुछ फल और ड्राई फ्रूट्स खरीदकर ले चलें।

सब कुछ खरीदने के बाद, माँ की गोद में बैठी निशा अपनी फ्रॉक पर रखे सूखे अंगूर खाने में मग्न थी। वह इतनी मस्त थी कि उसे घर पहुँचने का भी पता नहीं चला।

गाँव पहुँचने के बाद, अशोक ऑफिस चले गए। फिर रजनी को आश्रम की सुधा ने फोन किया और जोर देकर कहा कि उसका पति दो दिन तक गाँव में नहीं है, इसलिए वह तुरंत आए। पिछले एक हफ्ते से सिर्फ अशोक के साथ समय बिता रही रजनी को भी आश्रम के चार लोगों के साथ सामूहिक रतिक्रीड़ा की इच्छा थी। वह तैयार होकर आश्रम की ओर निकल गई।

रजनी: छोटी, तुम घर पर रहोगी या अपनी दोस्त के घर जाओगी?

रश्मि: नहीं मम्मी, मैं घर पर ही रहूँगी। आज दोस्त के घर जाने का मूड नहीं है।

रजनी: मुझे थोड़ा काम है। मैं शाम तक लौट आऊँगी। खाना तैयार है, तुम खा लेना और पढ़ाई करना। मैं जाकर आती हूँ।

रजनी के जाने के बाद, रश्मि मोबाइल में कुछ देख रही थी। तभी दरवाजे पर खटखट की आवाज आई। उसने सोचा, अब ये कौन आ गया? खिड़की से देखा तो बाहर दीपक खड़ा था। रश्मि ने दरवाजा खोला और उसे अंदर बुलाया। दीपक ने पूछा, "आँटी कहाँ हैं?" रश्मि ने जवाब दिया कि घर में कोई नहीं है। यह सुनते ही दीपक ने उसे गले लगाया और मुख्य दरवाजे पर सिटकनी चढ़ा दी।

दीपक: रश्मि, कितने दिन हो गए तुम्हें देखे हुए। मैं कई बार तुम्हारे घर के पास आया, लेकिन हर बार आँटी ने बताया कि तुम किसी दोस्त के घर गई हो। परसों-नरसों आया तो वॉचमैन ने कहा कि घर में कोई नहीं है।

रश्मि: हाँ, मैं मम्मी-पापा के साथ गाँव गई थी, इसलिए कोई नहीं था।

रश्मि के गले पर चुम्मी देते हुए और जीभ से चाटते हुए दीपक ने उसके कूल्हों को मसलते हुए कहा, "चल रश्मि, तुम्हारे कमरे में चलें। तुम्हारी चूत देखे हुए बहुत दिन हो गए।"

रश्मि (हँसते हुए): इसलिए आते ही आँटी कहाँ हैं, ये पूछा?

दीपक: हाँ, और क्या। एक हफ्ते से ज्यादा हो गया तुम्हारी रसभरी चूत का स्वाद लिए। जल्दी कमरे में चलो, मुझसे रुका नहीं जा रहा। मेरा लंड तो उछल-उछलकर बाहर आने को बेताब है।

रश्मि खिलखिलाकर हँसते हुए अपने कमरे की ओर बढ़ी। उसके हिलते हुए कूल्हों को देखकर रोमांचित दीपक ने नाइटी के पैंट के ऊपर से उन्हें सहलाया। कमरे में घुसते ही दीपक ने दरवाजे की सिटकनी चढ़ाई और सामने खड़ी कामकन्या रश्मि को गले लगाकर लिपलॉक किया और उसके होंठ चूसने लगा। रश्मि भी उसका साथ देती हुई उसकी पीठ सहलाने लगी। पाँच मिनट तक होंठ चूसने के बाद दोनों अलग हुए। दीपक ने फटाफट अपने कपड़े उतारे और नंगा हो गया। अपना निगुरा हुआ लंड हिलाते हुए उसने उसे रश्मि के मुँह में डाला और चुसवाना शुरू किया। रश्मि ने भी मजे से लंड चूसा, उसके अंडकोषों को सहलाया और उसे मजा दिया। फिर उसने अपनी टी-शर्ट उतारी और बिस्तर पर रख दी। पीछे हटे दीपक ने रश्मि का नाइट पैंट पकड़कर नीचे खींच दिया। अब रश्मि उसके सामने पीले-काले रंग की ब्रा और गुलाबी कच्छी में थी, जिसका आगे का हिस्सा उसकी रस से भीगा हुआ था। रश्मि को लेटने को कहकर दीपक ने उसके पैर फैलाए और जाँघों के बीच मुँह डालकर कच्छी समेत उसकी चूत पर मुँह लगाया। रश्मि की रस से भीगी कच्छी को चाटने के बाद दीपक ने उसे थोड़ा साइड किया, तो गुलाबी रंग की चमकती हुई चूत दिखाई दी। रश्मि की कच्छी उतारकर फेंकते हुए दीपक ने उसकी नरम चूत को खुशी से चाटना शुरू किया और उंगली डालकर आगे-पीछे करने लगा। रश्मि कामोन्माद में डूबकर उसके बालों में उंगलियाँ फिराते हुए चूत पर दबाव डालकर चटवाने लगी। दस मिनट बाद रश्मि ने चीखते हुए रतिरस छोड़ा, जिसकी हर बूँद को दीपक ने चाट-चाटकर पिया और बोला, "सकत स्वाद है रश्मि, तुम्हारी चूत का रस अमृत जैसा है।" यह सुनकर रश्मि शरमाते हुए आँखें बंद कर लेती है।

रश्मि की ब्रा भी जमीन पर फेंककर दीपक ने उसके स्तनों को मसला, चूसा, फिर पेट तक चाटते हुए उसे उल्टा करके घुटनों के बल बिठाया। रश्मि के गोल-मटोल गोरे कूल्हों को सहलाकर फैलाया, तो छोटा सा लाल रंग का गांड का छेद दिखा। दीपक ने अपनी जीभ रश्मि की गांड में डालकर उसका स्वाद लिया, फिर उसकी जाँघों के बीच आकर उसकी गीली चूत में लंड डाला। छह-सात जोरदार धक्कों से दीपक ने रश्मि की चूत के साथ अपने लंड का मिलन करवाया और तेजी से धक्के मारने लगा। रश्मि भी अपने कूल्हों को ऊपर-नीचे करके उससे चुदवाने लगी। आधे घंटे तक रश्मि की चूत को लगातार चोदने के बाद दीपक ने वीर्य छोड़ने से पहले लंड बाहर निकाला और रश्मि के मुँह में डालकर सारा वीर्य पिलाकर संतुष्ट हुआ।

शाम पाँच बजे तक रश्मि के कमरे में उसके ही बिस्तर पर उसे नंगा करके दीपक ने दो बार उसकी चूत चोदी। रश्मि की छोटी सी गांड के छेद को हमेशा पूजने वाला दीपक उस दिन चार बार उसमें लंड डालकर संतुष्ट हुआ। रश्मि से हर तरह का कामसुख लेकर वह पूरी तरह तृप्त हो गया। जब भी रश्मि पेशाब करने जाती, दीपक उसके साथ जाता और उसकी गुलाबी चूत से निकलने वाली पानी की धार को करीब से देखता, फिर उसकी चूत चाटकर उसका पेशाब भी पी लेता। रश्मि ने दीपक की इच्छा के अनुसार उसके लंड को पकड़कर जब वह पेशाब करने लगा, तो उसे हिलाकर अपने मुँह में डाला और चूसा, लेकिन एक बूँद भी नहीं पी।

दीपक: रश्मि, अगर कल भी आँटी न हों तो मैं आऊँगा। तुम फोन करना। घर जाने का मन ही नहीं कर रहा। हमेशा तुम्हारी चूत में ही घुसा रहना चाहता हूँ।

रश्मि (हँसते हुए): अब चलो, मम्मी आने वाली होंगी। कल से मम्मी घर पर होंगी, तो कोई चांस नहीं। आगे समय मिले तो देखते हैं।उसके बाद उसने दीपक को विदा किया और चुदाई के सुख में स्नान करके तरोताजा हो गई।

घर पहुँचने से पहले नीतू ने अपनी बेटी को आगे की सीट पर बिठाया और उसकी फ्रॉक पर कुछ सूखे अंगूर रख दिए, फिर पीछे शीला के साथ बातों में मग्न हो गई। अनुषा ने एसयूवी को घर के सामने रोका। नीतू और शीला नीचे उतरकर अंदर गईं, तो देखा कि बगल की सीट पर बैठी निशा अभी भी सूखे अंगूर खाने में मग्न थी और मुस्कुरा रही थी।

अनुषा: चिन्नी, तुम्हें अंगूर इतने पसंद आ गए? यहीं बैठी रहोगी या घर के अंदर आओगी?

निशा ने सिर उठाकर आँटी को देखा और घर पहुँचने का अहसास होने पर अपनी बाहें फैलाकर उसे उठाने को कहा।

नीतू: अनु, हमारी महारानी क्या कर रही थी? तुम लोगों को आने में इतना वक्त क्यों लगा?

अनुषा: दीदी, आपने जो अंगूर दिए थे, चिन्नी उन्हें खाने में इतनी मस्त थी कि उसे घर पहुँचने का भी पता नहीं चला।

इतने में निशा ने माँ के दिए सारे अंगूर खा लिए और और माँगने के लिए माँ के सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई। नीतू मुस्कुराते हुए बेटी को अपनी जाँघ पर बिठाकर उसे एक खजूर दिया। निशा ने उसकी चिपचिपाहट देखकर मुँह बनाया कि ये नहीं चाहिए। नीतू ने खजूर उसके होंठों पर लगाया, तो उसका मीठा स्वाद निशा को बहुत पसंद आया और वह माँ के हाथ से उसे छीनकर चाटने लगी।

नीतू फ्रेश होने के बाद ग्रेनाइट्स की दुकान के मालिक आरीफ हुसैन को फोन किया।

आरीफ: नमस्ते मैडम, आप कैसी हैं? ट्रिप में कोई परेशानी तो नहीं हुई? सारे ग्रेनाइट्स और टाइल्स देख लिए? मैंने खुद हर एक को चुनकर भेजा था। अगर कुछ भी डैमेज हो तो बता दीजिए, मैं दूसरा भिजवा दूँगा।

नीतू: आपको धन्यवाद कैसे दूँ, समझ नहीं आ रहा। फिर भी बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने खुद सारी चीजें चुनकर यहाँ पहुँचाई हैं, तो डैमेज होने की संभावना कम ही है। लेकिन आपने पैसे लिए बिना जाना ठीक नहीं किया।

आरीफ: पैसे की क्या बात मैडम, आज नहीं तो कल ले लूँगा। सबसे जरूरी है कि आप जैसे कस्टमर्स इतनी दूर से हमारे पास ग्रेनाइट्स खरीदने आए। अगर मैं आपको अच्छी चीजें दूँ, तो मेरे लिए वो करोड़ों रुपये के बराबर है।

नीतू: आपकी बात सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन आपके यहाँ काम करने वालों को सैलरी और खर्चों के लिए पैसे तो चाहिए ना? इस तरह 'कल ले लेंगे' कहकर हमें छोड़कर जाना ठीक नहीं। अपना अकाउंट डिटेल्स दीजिए, मैं अभी पैसे ट्रांसफर कर देती हूँ।

आरीफ: मैडम, उसकी कोई जरूरत नहीं। अगले हफ्ते मैं खुद कामाक्षीपुरम आ रहा हूँ। आपके घर आकर पैसे ले लूँगा। और हाँ, आपने कहा था कि खाना खाकर ही जाऊँ, वो भी याद है।

नीतू: हमारे घर में आपका स्वागत है, लेकिन पहले की तरह बिना फोन किए नहीं आना। पहले बता दीजिएगा, तो मैं भी घर पर रहूँगी।

आरीफ: सॉरी मैडम, आपने पहले ही कहा था कि आने से पहले फोन करूँ, लेकिन मैंने सोचा कि ग्रेनाइट्स के साथ सरप्राइज दूँ। लेकिन यहाँ आकर आप गाँव में नहीं थीं, तो आपने ही मुझे सरप्राइज दे दिया।

नीतू (जोर से हँसते हुए): ठीक है, आप आने से पहले फोन करना। मैं इंतजार करूँगी। इस बार खाना खाकर ही जाना, पहले की तरह चुपके से नहीं भागना। मैं आपको जाने नहीं दूँगी।

नीतू ने फोन रखा और सोचा कि बेटी की कोई आवाज क्यों नहीं आ रही? इतनी शांति कैसे? वह हैरान होकर कमरे से बाहर आई, लेकिन घर में कहीं भी निशा नहीं दिखी। वह बाहर निकली, तो देखा कि निशा घर के बगल की बरामदे में घास पर बैठी थी और दस-बारह चिड़ियों को अपने पास बुलाकर उन्हें दाने खिला रही थी। वह खुशी से मग्न थी। शीला और अनुषा भी निशा और चिड़ियों का खेल देखकर बैठी थीं। नीतू भी उनके साथ बैठ गई। निशा ने माँ की ओर देखकर चिड़ियों को दिखाते हुए "मम्मी... मम्मी..." कहकर अपनी खुशी जताई। तभी ऊपरी मंजिल से आर्किटेक्ट रमेश नीचे आया।

रमेश: नीतू मैडम, आप एक बार भी ऊपर आकर नहीं देखीं। मैं नया डिजाइन वाला प्लास्टरिंग करवा रहा हूँ। आप देख लेतीं, तो अच्छा होता।

नीतू: सॉरी सर, सुबह आपने कहा था, लेकिन मैं भूल गई। चलिए, चिन्नी, तुम भी ऊपर चलोगी?

चिड़ियों को दाने खिलाने में व्यस्त निशा ने माँ की ओर बिना देखे सिर हिलाकर मना कर दिया। नीतू और रमेश ऊपरी मंजिल पर गए और प्लास्टरिंग देखने लगे।

रमेश: ये नया डिजाइन वाला प्लास्टरिंग है। इसके ऊपर कुछ डार्क शेड की पेंटिंग करवाएँ, तो कैसा रहेगा?

नीतू: ये तो जैसे कैनवास की तरह है। इसे ऐसे ही छोड़ दीजिए। मेरे बड़े बेटे को अच्छी पेंटिंग्स करने आती हैं, ये आपको भी पता है। अगर उसके दिमाग में कोई नया आइडिया हो, तो उससे पूछ लेते हैं।

दोनों घर में घूमकर काम देख रहे थे। रमेश नीतू को सब समझा रहा था, लेकिन उसकी नजर नीतू की लाल चूड़ी टॉप के नीचे सफेद स्किन-टाइट लेगिंग्स में दिख रही बैंगनी कच्छी की छाप पर टिकी थी। बीस मिनट बाद रमेश से रहा नहीं गया। तीसरी मंजिल पर कोई मजदूर नहीं था, यह जानकर उसने नीतू को खींचकर गले लगाया, होंठों पर होंठ रखकर चूसने लगा और उसके कूल्हों को सहलाकर धीरे-धीरे मसलने लगा। नीतू को भी पता था कि रमेश के साथ उसने कामक्रीड़ा किए हुए काफी दिन हो गए। उसने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया और उसके चुम्बन का जवाब देते हुए अपने होंठ खोलकर उसे चूसने में साथ दिया। पाँच मिनट के चूमने, सहलाने और मसलने के बाद दोनों अलग हुए।

नीतू: यहाँ इसे आगे बढ़ाना ठीक नहीं। आप अपने कमरे में जाइए, मैं आधे घंटे में वहाँ आती हूँ।

रमेश: मुझसे अब रुका नहीं जाता। चलिए, दोनों साथ में चलते हैं। आज अगर आपको अनुभव नहीं किया, तो पता नहीं मेरा क्या होगा।

नीतू (हँसते हुए): आपको कुछ नहीं होने दूँगी। कार के पास इंतजार कीजिए, मैं घरवालों से कहकर आती हूँ।

दोनों नीचे उतरे। रमेश सीधे अपनी कार में चला गया। नीतू ने निशा का खेल देख रही शीला से कहा, "देख, मैं रमेश के साथ फूड प्रोसेसिंग यूनिट तक जाकर आती हूँ। चिन्नी, तुम खेलो, मम्मी जल्दी लौट आएगी।" उसने बेटी के गाल पर चुम्मी दी। चिड़ियों को सूखे अंगूर खिला रही निशा ने माँ को चुम्मी दी और टाटा किया। अनुषा अंदर खाने की तैयारी में रमा से सब्जियाँ कटवा रही थी, उसे नीतू के जाने का पता नहीं चला।

रमेश के कमरे में पहुँचते ही उसने नीतू को कसकर गले लगाया, होंठ चूसने लगा और उसके कूल्हों को जोर से मसलने लगा। कुछ देर होंठों का रस पीने के बाद रमेश ने अपने कपड़े उतारे और सिर्फ चड्डी में खड़ा हो गया। उसकी जल्दबाजी देखकर नीतू हँस पड़ी। रमेश ने मुस्कुराती हुई कामदेवी नीतू को उल्टा किया और उसकी लाल चूड़ी टॉप की जिप को कमर तक खींचकर साइड किया। नीतू की चिकनी, गोरी, लंबी पीठ पर चुम्मी देते हुए सहलाने लगा। उसकी काली ब्रा की स्ट्रैप खींचकर छोड़ी, तो "फट... फट..." की आवाज के साथ नीतू के मुँह से "आह..." की कामुक आवाज निकली। तीन-चार बार ब्रा खींचकर छोड़ने के बाद रमेश ने चूड़ी टॉप को जमीन पर डाला और ब्रा समेत एक स्तन को मुँह में लेकर चूसने लगा, जबकि दूसरे को मसलने लगा। नीतू के गोल, गोरे स्तनों को ढक रही काली ब्रा की कप्स रमेश की लार से पूरी तरह गीली हो गईं और चूड़ी टॉप के साथ जमीन पर गिर गईं। रमेश ने नीतू को बिस्तर पर लिटाया और उस पर चढ़कर उसके स्तनों को मसला, चूसा और निप्पल्स को हल्के से दाँतों से खींचा। नीतू बोली, "आह... रमेश, आज आप बहुत जोश में हैं।" उसने उसका सिर सहलाकर अपने स्तनों पर दबाया। रमेश ने नीतू के स्तनों को जी भरकर मसला और चूसा, फिर बोला, "हाँ, तुम्हारे शरीर को छूए हुए बहुत दिन हो गए। इसलिए मेरे अंदर इतना जोश है।" उसने नीतू की लेगिंग्स पकड़ी।

रमेश ने नीतू की सफेद पतली लेगिंग्स को नीचे खींचना शुरू किया। नीतू ने कमर उठाकर उसे उतारने में मदद की। लेगिंग्स जमीन पर गिरी, तो बैंगनी कच्छी में छिपी नीतू की रसभरी चूत हल्के से उभरी हुई थी और आँखों को लुभा रही थी। रमेश ने नीतू के पैर फैलाए और जाँघों के बीच मुँह डालकर कच्छी के ऊपर से ही चूत पर कई चुम्मियाँ दीं। कच्छी में जमा सुगंध को सूँघने के बाद उसने आगे का हिस्सा साइड किया, तो नीतू की दूधिया, मनमोहक चूत दिखाई दी। रमेश के होंठों ने चूत के आसपास अपनी मधुर छाप छोड़ी, फिर उसने उंगली से चूत के द्वार को फैलाया और जीभ डालकर चाटने लगा। नीतू की चूत से टपक रहे रस को चाटते हुए रमेश को ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी और दुनिया में विचरण कर रहा हो। वह मंत्रमुग्ध होकर चूत का स्वाद ले रहा था। दस मिनट तक नीतू की चूत चाटने के बाद रमेश ने अपनी चड्डी उतारी और निगुरे हुए लंड को कच्छी उतारे बिना सिर्फ आगे का हिस्सा साइड करके चूत के प्रवेश द्वार पर रखा और तेजी से धक्का मारा। नीतू के मुँह से "आह..." की कामुक आवाज निकली। रमेश का लंड नीतू की चूत में प्रवेश कर गया। एक के बाद एक धक्कों से वह पूरी तरह कामसुख के गड्ढे में समा गया। नीतू के स्तनों को मसलते और होंठ चूसते हुए रमेश कमर को आगे-पीछे करके उसकी चूत चोद रहा था। नीतू को भी कच्छी पहने हुए चुदवाना नया अनुभव था। उसने रमेश का पूरा साथ दिया, अपने कूल्हों को ऊपर-नीचे करके चुदवाया और उसे कामसुख की अनुभूति दी।

चालीस मिनट तक लगातार नीतू की चूत चोदने के बाद रमेश ने नीतू के रतिरस से पाँच बार अपने लंड का अभिषेक करवाया। फिर उसने कई दिनों से जमा वीर्य को नीतू की चूत में भरकर तृप्ति पाई। नीतू ने भी कई दिनों बाद चुदाई का सुख लिया और रमेश की इच्छा के अनुसार उसे पूरा मजा देकर संतुष्ट किया। नीतू के शरीर पर लेटकर कुछ देर सुस्ताने के बाद रमेश फिर से उसके स्तनों को चूसने और मसलने लगा। नीतू ने उसे रोका और कहा, "अब बहुत समय हो गया। ऐसा लग रहा है जैसे आप दिनभर मेरे शरीर का आनंद लेंगे।" वह उठ खड़ी हुई। रमेश ने कच्छी उतारे बिना ही साइड करके चोदा था, इसलिए नीतू की चूत से बह रहा वीर्य और रतिरस का मिश्रण उसकी कच्छी को पूरी तरह गीला और गंदा कर गया। नीतू हँसते हुए अपनी गीली कच्छी पर चूत को एक बार सहलाकर कपड़े पहने और घर की ओर निकल गई।

निशा चिड़ियों के साथ खेल रही थी, उन्हें चावल, दाने और अंगूर खिला रही थी। वह खुद को भूल चुकी थी। अनुषा ने उसे खाना खिलाया। चिड़ियाँ उड़ जाने के बाद निशा ने देखा कि उसने सारे अंगूर चिड़ियों को खिला दिए और अब उसके पास खाने को कुछ नहीं बचा। वह घर के अंदर दौड़ी और अनुषा के सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई।

अनुषा: क्या चाहिए, मम्मा चिन्नी?

निशा को समझ नहीं आया कि क्या कहे। वह "चूची... चूची..." कहने लगी। अनुषा को समझ नहीं आया कि वह क्या कह रही है। उसने निशा को गोद में उठाकर रसोई में ले गई और सब कुछ दिखाया। निशा ने शेल्फ पर रखी कटोरी में सूखे अंगूर देखे और उसी की ओर इशारा किया। अनुषा हँसते हुए उस कटोरी में और अंगूर डाले और दे दिए। निशा बहुत खुश होकर एक-एक करके अंगूर खाने लगी और सोफे के सामने अपने खिलौने बिखेरकर खेलने बैठ गई। अनुषा ऊपरी मंजिल पर काम कर रहे लोगों को कॉफी देने गई। जब तक वह लौटी, निशा ने सारे अंगूर खा लिए और और माँगने के लिए कटोरी लेकर अनुषा के सामने खड़ी हो गई।

अनुषा (कुछ डिब्बों में ढूँढते हुए): चिन्नी, सुबह जो अंगूर लाए थे, वो खत्म हो गए। छोटी, शाम को पापा आएँ, तो हम दुकान से ढेर सारे अंगूर लाएँगे।

निशा को अंगूर खत्म होने की बात सुनकर मायूसी हुई। वह रसोई से बाहर आई और सोफे पर रखे छोटे-छोटे तकियों को जमीन पर बिखेर दिया। अपने खिलौनों को भी इधर-उधर फेंककर वह सोफे के नीचे घुस गई और दीवार की ओर मुँह करके लेट गई।

रमेश के लंड को अपनी रसभरी चूत से संतुष्टि का सुख देकर लौटी नीतू ने लिविंग हॉल की हालत देखी और रसोई में शाम के लिए सेवई बना रही अनुषा को पुकारा।

नीतू: अनु, ये सब क्या है? ये किसने किया? रमा कहाँ है?

अनुषा: दीदी, रमा की बेटी की तबीयत थोड़ी खराब है, इसलिए वह उसे अस्पताल दिखाने जल्दी चली गई। ये सब शायद चिन्नी ने किया होगा। थोड़ी देर पहले वह मुझसे सूखे अंगूर माँग रही थी। मैंने जो दिए, वो खा लिए और और माँगने के लिए कटोरी लेकर खड़ी हो गई। लेकिन अंगूर खत्म हो गए थे, शायद इसलिए गुस्से में उसने ये सब बिखेर दिया।

नीतू ने चार-पाँच बार बेटी को पुकारा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। दीदी-बहन ने घर में उसे ढूँढना शुरू किया। कमरे में शीला अकेली सो रही थी, वहाँ भी बेटी का कोई सुराग नहीं मिला। बाहर आई नीतू को स्कूल से लौटे हरीश और सुरेश मिले।

हरीश: मेरी बेटी कहाँ है? गाड़ी की आवाज सुनते ही बाहर दौड़कर आती थी। अभी भी सो रही है?

नीतू: तुम्हारी बेटी को गुस्सा आया है। देखो, सोफे की तकियों और खिलौनों को कैसे बिखेर दिया। शायद कहीं मुँह फुलाकर बैठी होगी।

हरीश: तुमने उसे कुछ डाँटा क्या? मेरे बंगारी को गुस्सा क्यों आया?

अनुषा: भैया, दीदी तो घर पर थीं ही नहीं।फिर उसने अंगूर वाली पूरी कहानी बताई।

सुरेश ने सोफे के नीचे झाँका, तो देखा कि निशा उनकी बातें सुन रही थी और अपनी छोटी आँखें पलकझपक कर रही थी।

सुरेश: मम्मी, देखो, वह सोफे के नीचे घुस गई है।

हरीश ने सोफे के नीचे से बेटी को बाहर निकाला, लेकिन निशा अभी भी मुँह फुलाए थी और बिना कुछ बोले सबको देख रही थी।

हरीश: चल चिन्नी, हम दोनों अभी दुकान चलते हैं और ढेर सारे अंगूर लाते हैं। किसी को मत देना, तुम अकेली खाना।

पापा की बात सुनकर निशा का चेहरा खिल गया और होंठों पर मुस्कान आ गई। यह देखकर नीतू बोली, "जी, तुम्हारी बेटी इस तरह मुँह फुलाकर अपनी सारी बातें मनवाती है। चिन्नी, ऐसा हठ नहीं करना, कंद।"

माँ की बात से बेटी का चेहरा फिर से मुरझा गया। यह देखकर हरीश बोला, "अरे, वह कोई गलत चीज तो नहीं माँग रही। बस अंगूर ही तो माँगे हैं। ये तो उसके स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। देख, फिर से उदास हो गई।"

नीतू: जी, आप तैयार होकर ट्यूशन के लिए निकलो। मैं इसे ले जाकर घर का कुछ सामान और अंगूर भी खरीद लूँगी। चिन्नी, पापा को ट्यूशन जाने दे, फिर मैं और तुम दुकान चलेंगे। तब तक भैया के साथ खेल।यह कहकर उसने बेटी को सुरेश के साथ भेज दिया।

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नियति से बंधी नीतू - Part 136

निशा, जो अपनी माँ और गिरीश भैया के साथ खरीदारी के लिए आई थी, भैया के कंधों पर बैठकर माँ द्वारा चुने जा रहे नाश्ते और खाने की चीजों को ध्यान से देख रही थी। नीतू अपने तीनों बच्चों के लिए कुछ फल, बिस्किट, हॉर्लिक्स और कॉम्प्लान ले रही थी, साथ ही घर के लिए रोजमर्रा की जरूरी चीजें भी खरीद रही थी। भैया के कंधों पर बैठी निशा की नजर एक चॉकलेट पर पड़ी, और उसे लेने की इच्छा हुई, लेकिन माँ के डाँटने के डर से उसने भैया की गाल सहलाते हुए चॉकलेट की ओर इशारा किया। यह सब देख रही नीतू हँसते हुए अपनी बेटी की पसंदीदा चॉकलेट ले आई और उसे दे दी। निशा खुशी से भैया के कंधों से उतरकर माँ के कंधों पर चढ़ गई। कामाक्षीपुरम के सबसे बड़े सुपरमार्केट में घर के लिए जरूरी सभी सामान खरीदकर जब वे कार की ओर बढ़े, तो निशा ने दो छोटे बच्चों को आइसक्रीम खाते देखा। नीतू को पता था कि बेटी को भी आइसक्रीम खाने की इच्छा है, लेकिन उसे डॉक्टर के इंजेक्शन का डर भी है। इसलिए, उसने दोनों बच्चों को कार में बिठाया और सभी के लिए आइसक्रीम का पार्सल ले आई। जैसे ही कार चलाने की तैयारी हुई, नीतू ने सामने से आ रही सविता और उसके दो बच्चों को देखा और कार से उतरकर उन्हें पुकारा।

नीतू: सविता, बच्चों के साथ खरीदारी करने आई हो?

सविता: हाँ, दोनों के लिए कपड़े लेने थे, इसलिए आए। अब घर की ओर जा रहे हैं। तुम अकेली हो?

नीतू: नहीं, गिरीश के साथ हमारी छोटी शैतान भी आई है, कार में है। चल, मैं तुम सबको घर तक छोड़ दूँगी।

नमिता: आँटी, बार्बी डॉल (निशा) आई है? मैं उसे गोद में ले लूँ?

नीतू (हँसते हुए): पहले कार में चढ़, फिर उसके साथ खेलना।

सविता ने कहा कि वे ऑटो से चले जाएँगे, लेकिन नीतू ने नहीं माना और तीनों को कार में बिठा लिया।

आगे की सीट पर भैया के पास बैठी निशा मजे से चॉकलेट चूस रही थी। उसने सविता और उसके बच्चों को देखकर मुस्कुराया और फिर चॉकलेट पर ध्यान दे दिया। गिरीश को देखकर निकिता के मन में खुशी की लहर दौड़ी और उसने मुस्कुराकर नजरें मिलाईं। नमिता ने चॉकलेट खाती निशा को गोद में उठा लिया और उसे प्यार करने लगी। सविता के घर पहुँचकर सभी अंदर गए। नमिता के साथ बाथरूम गई निशा ने उसके साथ हाथ धोए और तरोताजा होकर लौटी। तब तक सविता ने सभी के लिए कॉफी और निशा के लिए हॉर्लिक्स ला दिया।

निकिता: आँटी, मुझे कॉलेज के प्रोजेक्ट का काम है। उसे पूरा करने के लिए अपनी दोस्त के घर जाना है।

नीतू: तुम अपनी दोस्त के साथ मिलकर प्रोजेक्ट कर रही हो?

निकिता: नहीं आँटी, हम सबको अलग-अलग प्रोजेक्ट दिए गए हैं। हमारे घर का कंप्यूटर कुछ दिनों से खराब है, और पापा शहर में नहीं हैं, इसलिए रिपेयरमैन को बुला नहीं पाए। अगर मेरी दोस्त का प्रोजेक्ट पूरा हो गया हो, तो मैं उसके कंप्यूटर पर अपना प्रोजेक्ट पूरा कर लूँगी।

नीतू: तुम सिर्फ कंप्यूटर के लिए दोस्त के घर जा रही हो?

निकिता: हाँ आँटी, यहाँ आसपास कोई सेंटर भी तो नहीं है। इसलिए अगर उसका प्रोजेक्ट पूरा हो गया हो, तो मैं उसके कंप्यूटर पर काम कर लूँगी।

नीतू: तो फिर तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं। हमारे घर चल, आज वहीं रहकर अपना प्रोजेक्ट पूरा कर ले। हमारे घर में चार लैपटॉप हैं, तुम गिरीश का लैपटॉप ले लेना और प्रोजेक्ट पूरा करना। बाद में मैं तुम्हें घर छोड़ दूँगी।

सविता: नहीं नीतू, इससे तुम लोगों को तकलीफ होगी।

नीतू: चुप रहो। बच्चों की सुविधा हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। जब हमारे घर में लैपटॉप है, तो उसे अपनी दोस्त के घर जाकर क्यों परेशान होना पड़े? निकिता, तुम कुछ मत सोचो, अपने कपड़े ले लो। प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद मैं तुम्हें घर छोड़ दूँगी।

नमिता: आँटी, मैं भी चलूँगी। यहाँ अकेले मुझे बोरियत होगी। वहाँ मैं अपनी बार्बी डॉल के साथ मजे से खेल सकती हूँ।

सविता: अरे, मैं तो तेरे साथ हूँ ना। तुझे अकेले कहाँ रहना पड़ रहा है? तेरी दीदी अपने प्रोजेक्ट के लिए जा रही है, तुझे क्या जरूरी काम है? वहाँ जाकर आँटी को परेशान करेगी।

नीतू: बेचारी बेटी को क्यों डाँट रही हो? देख, कितनी प्यारी है। नमिता, तुम भी तैयार हो जाओ, मैं तुम्हारी माँ को समझा लूँगी।

जब दीदी-बहन कमरे में गईं, तो निशा भी उनके पीछे दौड़ी। नीतू ने सविता को रसोई में ले जाकर पूछा, "आज रात तुम्हारा पति नहीं आएगा ना?"

सविता: नहीं कण, उन्हें कोई ऑफिस का काम है। इसलिए पाँच दिन के लिए चेन्नई गए हैं, अगले हफ्ते लौटेंगे।

नीतू: अच्छा हुआ। चल, आज रात मैं हरीश को तुम्हारे घर भेज दूँ?

नीतू की बात सुनकर सविता का दिल तेजी से धड़कने लगा, और उसकी चूत की पंखुड़ियाँ थरथराने लगीं।

सविता: क्या वे आएँगे? तुम सच कह रही हो?

नीतू: देख, ये सही मौका है। तुम्हारा पति शहर में नहीं है, दोनों बच्चे हमारे घर पर हैं। इससे बेहतर अवसर तुझे नहीं मिलेगा। मैं कोई बहाना बनाकर हरीश को तुम्हारे घर भेज दूँगी, बाकी तुझे खुद संभालना होगा। क्या कहती है?

सविता: उन्हें भेज दो, मैं ताउम्र तुम्हारी आभारी रहूँगी। आज रात मैं किसी भी तरह हरीश को मना लूँगी।

"मम्मी... मम्मी..." कहते हुए रसोई में दौड़कर आई बेटी को गोद में उठाते हुए नीतू ने कहा, "हम अभी आ रहे हैं, तुम भी तैयार रहो।" निकिता भी घर जा रही थी, इसलिए गिरीश का लंड चड्डी में निगुरकर खड़ा हो गया।

घर लौटने पर निशा चिल्लाते हुए उछल-कूद रही थी। नमिता भी उसके साथ बच्ची बनकर खेल रही थी और उसकी हरकतों में साथ दे रही थी।

नीतू (हँसते हुए): शीला, पहले तो मैं एक तुरल को संभाल रही थी, अब इसके साथ एक और छोटी बच्ची भी जुड़ गई है। अब तू ही इन्हें संभाल।

नमिता के साथ पूरी तरह घुलमिल चुकी निशा उछल-कूदकर अपने खिलौने दिखा रही थी और उसके साथ खेलने बैठ गई।

नीतू: ये दोनों तुरल तुम्हें प्रोजेक्ट नहीं करने देंगी, निकिता। इसलिए तुम गिरीश के साथ सामने वाले घर में जाओ और वहाँ प्रोजेक्ट पूरा करो। वो भी हमारा ही घर है। ये दोनों यहाँ खेल लें।

निकिता: आँटी, नमिता को भी पढ़ने के लिए कहें, वरना ये निशा से भी ज्यादा बच्ची बनकर खेलती रहेगी।

नमिता: दीदी, तुम प्रोजेक्ट करने आई हो, मैं अपनी बार्बी डॉल के साथ खेलने। मैंने तो किताबें भी नहीं लाईं। तुम जाओ और पढ़ो, हमें डिस्टर्ब मत करो।

उसकी बात पर सब हँस पड़े। शीला ने कहा, "निकिता, तुम जाओ और प्रोजेक्ट पूरा करो। वहाँ कोई तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करेगा। गिरीश, तुम इसे खाने के समय ले आना।"

गिरीश ने अपना लैपटॉप निकिता को देते हुए कहा, "इसमें प्रिंटर पहले से कनेक्ट है। जो भी कॉपी चाहिए, कमांड दे दो। दोनों घरों में हाई-स्पीड वाई-फाई है, कोई दिक्कत नहीं होगी।"

गिरीश के साथ सामने वाले घर में आई निकिता को एक कमरा दिखाकर उसने प्रोजेक्ट करने को कहा और खुद बाहर पढ़ने बैठ गया। लैपटॉप और हाई-स्पीड वाई-फाई की वजह से निकिता ने तीन दिन से बाकी पड़ा प्रोजेक्ट दो घंटे में पूरा कर लिया और कई कॉपियाँ प्रिंट करने का कमांड देकर कमरे से बाहर आई। लिविंग हॉल में टीवी देखते हुए सोफे पर पैर फैलाकर आँखें मूँदे बैठे गिरीश को देखकर निकिता को उनके बीच की पुरानी घटना याद आई, और उसकी चूत में उत्तेजना की लहर दौड़ गई। जैसे कठपुतली खींची गई हो, वह गिरीश के पास गई और उसके ऊपर झुककर उसके होंठों पर एक छोटा-सा चुम्बन दे दिया। पीछे हटने से पहले ही गिरीश ने उसका हाथ खींचकर उसे अपनी गोद में बिठा लिया। निकिता छुड़ाने की कोशिश कर रही थी, तभी गिरीश ने उसका एक संतरे जैसा स्तन पकड़कर हल्के से दबाया, तो उसके मुँह से "अम्मा..." की आवाज निकली। दोनों एक-दूसरे की आँखों में देखते हुए करीब आए, और आखिरकार गिरीश के होंठ निकिता के होंठों से पूरी तरह मिल गए। गिरीश ने निकिता के रसभरे होंठों को भूखे की तरह चूसा, और उसके हाथ उसके नरम कूल्हों को मसलते हुए उसकी कामवासना को जगा रहे थे। दो मिनट की इस उत्तेजना में निकिता चरम पर पहुँच गई और उसकी चूत से कुछ बूँदें रतिरस की निकलकर उसकी कच्छी को गीला कर गईं। निकिता पीछे हटी और खड़ी हो गई। गिरीश ने उसे सवालिया नजरों से देखा, तो उसने कहा, "देर हो रही है, चलो घर चलें, सब हमारा इंतजार कर रहे होंगे।"

गिरीश: अभी तो मजा शुरू हुआ था, और तुम घर चलने की बात कर रही हो? अभी तो साढ़े आठ बजे हैं, हम नौ बजे खाना खाते हैं। चल, कमरे में चलते हैं।

निकिता: नहीं... नहीं... अगर किसी को पता चल गया, तो आँटी मेरे बारे में क्या सोचेंगी? कि मैंने उनके मासूम बेटे को अपनी जवानी से ललचाकर फँसा लिया।

गिरीश (हैरान): तुम और तुम्हारे विचार! माँ ऐसा कुछ नहीं सोचेगी, क्योंकि मैंने पहले ही दरवाजे-खिड़कियाँ बंद कर स्क्रीन लगा दी है। बाहर कुछ नहीं दिखेगा। चल, जैसा तुम कह रही हो, घर चलते हैं। लेकिन घर पर कहना कि तुम्हारा प्रोजेक्ट अभी पूरा नहीं हुआ, कुछ बाकी है, और रात को पूरा कर लोगी। आज रात मुझे तुम्हारी चूत का रस पीना है। बोल, निक्की, मुझे तुम्हारा रस पिलाओगी?

निकिता का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसे समझ नहीं आया कि क्या कहे। उसने बस "हूँ..." कहा और दरवाजा खोलकर सामने वाले घर की ओर दौड़ पड़ी।

शाम सात बजे तक ट्यूशन खत्म करके लौटे हरीश ने अपनी प्यारी बेटी की चहक सुनकर खुशी महसूस की, लेकिन नमिता को उसके साथ खेलते देखकर हैरानी हुई और पत्नी से पूछा, "ये यहाँ किसके साथ आई है?" नीतू ने नखरे से जवाब दिया, "अपनी दूसरी बीवी से जाकर पूछ लो," और कूल्हे मटकाते हुए रसोई में चली गई। अगले आधे घंटे तक शीला ने पति को सविता की मानसिक स्थिति, हरीश के प्रति उसका प्यार और मोह सब कुछ विस्तार से बताया और उसे रात को सविता की इच्छा पूरी करने के लिए राजी कर लिया। फिर उसे सविता के घर भेज दिया।

इधर, सविता ने दोनों बच्चों के नीतू के साथ जाने के बाद रात की संभावित कामक्रीड़ा के बारे में सोचकर रोमांचित हो रही थी। उसने कई दिनों से साफ न किए गए घने बालों को मुलायम करवाया और अपनी गोरी चूत पर लोशन लगाया। जब नीतू ने बताया कि हरीश उसके घर के लिए निकल चुके हैं, तब से सविता उत्साह में थी। उसने मिठाई बनाकर रखी और दो साल पहले खरीदी, लेकिन कभी न पहनी गई काली पारदर्शी साड़ी पहनकर तैयार हो गई। वह हरीश का बेसब्री से इंतजार कर रही थी।

निकिता के सामने वाले घर से अपने घर जाने के बाद गिरीश ने घर में ताला लगाया और कॉलोनी के बाहर अपनी इलेक्ट्रिक स्कूटर से निकल गया। एक मेडिकल स्टोर पर पहुँचकर उसने एक सेफ्टी जेल ट्यूब, दर्द की गोली और गर्भनिरोधक गोलियाँ खरीदीं। इन्हें लेकर निकलते समय उसे यह नहीं पता था कि जॉनी उसे देख रहा था। जॉनी ने अपने शिष्य के मर्द बनने पर गर्व महसूस किया और सोचने लगा कि इस बारे में नीतू से बात करनी चाहिए या नहीं। रास्ते में गिरीश ने अपनी बहन के लिए कुछ चॉकलेट खरीदीं और मेडिकल स्टोर से लाई चीजें सामने वाले घर में रखकर अपने घर की ओर बढ़ा।

अनुषा: गिरी, तुम इतनी देर कहाँ गए थे? निकिता तो कब की आ चुकी है।

गिरीश (हड़बड़ाते हुए): सॉरी आँटी, मैं चिन्नी के लिए चॉकलेट लेने पास की दुकान गया था, इसलिए देर हो गई।

गिरीश: आँटी, अंकल अभी तक नहीं आए? दिख नहीं रहे।

नीतू मन ही मन सोच रही थी, "तुझे कैसे बताऊँ, छोटी, कि तुम्हारे अंकल तुम्हारी माँ के दिन-ब-दिन बढ़ते शारीरिक तापमान को शांत करने गए हैं।"

नीतू: नहीं छोटी, अंकल आज किसी काम से दूसरे शहर गए हैं, इसलिए रात को नहीं आएँगे। तुम्हारा प्रोजेक्ट पूरा हुआ?

गिरीश की ओर देखते हुए निकिता ने कहा, "नहीं आँटी, अभी आधा बाकी है। अगर आप इजाजत दें, तो आज रात इसे पूरा कर लूँ।"

शीला: इसे अपना घर समझ, निकी। पढ़ाई से संबंधित किसी चीज के लिए इजाजत लेने की जरूरत नहीं। गिरी, तुम वहाँ उसकी देखभाल के लिए रुक जाना।

निकिता मन ही मन हँसते हुए सोच रही थी, "आँटी, मुझे तो आपकी गिरीश से रक्षा करनी चाहिए, और आप उसे ही मेरा रखवाला बना रही हैं।" वह अपनी सोच पर खुद ही हँस पड़ी।

नमिता के साथ खेलते-कूदते थक चुकी निशा सोफे पर लेटकर रसोई की ओर देख रही थी कि माँ कब उसे खाना खिलाएगी। सुरेश भी नमिता के साथ अच्छे से घुलमिल गया था और दीदी की तरह उससे बात करते हुए सभी के साथ खाने बैठा। शीला को थाली लिए आते देख निशा फटाक से उठकर बैठ गई और उसने खाना खिलाया। फिर माँ ने दी हुई आइसक्रीम को खुशी-खुशी खाया। नमिता ने भी खाना खाया और निशा को हाथ पकड़कर कमरे में ले गई। निशा उसके पास लेटकर सो गई। शीला ने अंदर आकर नमिता को उठने से रोका और कहा, "तू भी यहीं सो जा, छोटी। हमारी चिन्नी तुझसे बहुत घुलमिल गई है। तू भी बहुत प्यारी है।" उसने नमिता के माथे पर चुम्मी दी और सोने को कहा। गिरीश, निकिता के साथ सामने वाले घर में गया और दरवाजा बंद करते ही उसे खींचकर गले लगाया, उसके होंठ चूसने लगा और उसके नरम कूल्हों को मसलने लगा।

जैसे ही कॉलिंग बेल बजी, सविता का दिल तेजी से धड़कने लगा, और उसकी चूत रात की संभावित कामक्रीड़ा के विचार से रस की बूँदें छोड़ रही थी। सविता ने दरवाजा खोला, तो बाहर खड़े हरीश ने उसे देखकर सोचा, "क्या ये वही सविता है, जो स्कूल में मेरे साथ पढ़ाती है?" वह हैरान रह गया। रसभरे आम की तरह भरी हुई सविता का गोरा, आकर्षक शरीर और काली पारदर्शी साड़ी उसे और भी सेक्सी बना रही थी। दोनों एक-दूसरे को देखते हुए पाँच मिनट तक खड़े रहे। फिर सविता ने शर्माते हुए हरीश को अंदर बुलाया। सविता के उत्तेजक शरीर को देखकर हरीश पहले ही पिघल चुका था। उसने मुख्य दरवाजा बंद किया और सविता को कसकर गले लगा लिया। हरीश की बाहों में आने की वर्षों की चाहत रखने वाली सविता की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए।

हरीश ने आँसू देखकर घबराते हुए पीछे हटकर कहा, "सॉरी... सॉरी... मैडम, मुझे नहीं पता क्या हुआ, मैंने आपको गले लगा लिया। प्लीज माफ करें।"

हरीश की बात पूरी होने से पहले ही सविता ने उसकी होंठों पर उँगली रख दी और बोली, "आपको नहीं पता, सर, मैं इस पल के लिए कितने सालों से इंतजार कर रही थी। आपने कोई गलती नहीं की, माफी माँगने की जरूरत नहीं। मैं पूरे मन से आपकी बाहों में बंधना चाहती हूँ। मुझे नहीं पता कब से मैं आपकी ओर आकर्षित हूँ और आपके लिए तरस रही हूँ। मैंने अपना तन-मन आपको समर्पित कर दिया है और आपके साथ एक होना चाहती हूँ। कृपया आज रात मेरे सपनों को सच करें, मेरे प्यार को स्वीकार करें और मुझे पूरा करें।"

सविता की आँखों में चाहत थी, लेकिन चेहरे पर अपार प्रेम और समर्पण की भावना थी। हरीश ने उसे गले लगाकर जवाब देने के बजाय उसके होंठों को अपने होंठों से मिला लिया। उस पल सविता को लगा कि उसका वर्षों का सपना सच हो रहा है। उसकी आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे। वह 21 साल के वैवाहिक जीवन में पहली बार अपने पति के अलावा किसी परपुरुष को अपना शरीर सौंपने और कामसुख के सागर में तैरने के लिए तैयार थी।

सविता ने अपने होंठों का मधुर रस चखने के बाद पीछे हटकर कहा, "पहले खाना खा लें, हमारे पास पूरी रात बाकी है।" हरीश ने उसे गले लगाकर कहा, "चलो, हम दोनों एक ही थाली में खाएँ।" हरीश की इच्छा के अनुसार सविता एक थाली में खाना लाई। हरीश ने उसे अपनी गोद में बिठाया और पहला कौर उसे खिलाया। सविता ने प्रेम भरे भाव से उसे देखा और फिर उसे भी खिलाया। दोनों नवविवाहित जोड़े की तरह सरस बातें करते हुए भोजन का स्वाद लिया। खाना खत्म होने के बाद सविता ने बर्तन रसोई में रखे और एक गिलास बादाम वाला दूध लेकर हरीश को अपने बेडरूम में ले गई। सविता ने पहले ही अपने और हरीश के पहले मिलन को यादगार बनाने के लिए बेड पर नई चादर बिछाई थी, गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखेरी थीं और कमरे में सुगंधित स्प्रे छिड़का था।

हरीश (सब देखकर): ये सुगंध भी तुम्हारे शरीर से निकलने वाली खुशबू के सामने फीकी है।

सविता: ये सब मैंने अपनी मन की तृप्ति के लिए किया। मेरी इच्छा थी कि आज रात हमारा मिलन अनैतिक न हो, बल्कि प्रेम से भरा हो। हरीश, मैं इस दिन के लिए कई सालों से इंतजार कर रही थी, लेकिन मेरे पास इतनी हिम्मत नहीं थी कि आपसे कह सकूँ। और आप भी किसी आकर्षण में नहीं पड़ते थे।

हरीश: इसमें मेरी ही गलती है, सविता। मैं पहले सामाजिक रूप से सिर्फ पढ़ाई की बातें करता था, उससे ज्यादा किसी से घुलता-मिलता नहीं था। पत्नी और बच्चों को मैं अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य समझकर उनकी जरूरतें पूरी करता था, लेकिन उनकी इच्छाएँ क्या हैं, ये मैंने कभी नहीं समझा। फिर तुम्हारी ओर ध्यान कैसे जाता? लेकिन अब मैं तुम्हारे निस्वार्थ प्रेम को नजरअंदाज करने का पाप नहीं करूँगा। आज रात मैं तुम्हारे मिलन की सारी यातना को दूर करके तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा।

दोनों के होंठ एक-दूसरे से मिलकर चूस रहे थे। शीला को टक्कर देने वाले सविता के मोटे, गोल कूल्हों पर हरीश के हाथ कब्जा जमाए हुए थे और जोर से मसल रहे थे। सविता ने हरीश की शर्ट उतारी और उसके मजबूत शरीर को देखकर उसकी गाल, गर्दन और सीने पर चुम्मियों की माला पहना दी। हरीश ने सविता की साड़ी का पल्लू खींचा, जो पिन न होने की वजह से कंधे से सरक गया। उसके गोल, आकर्षक स्तनों को बंधे हुए काले पारदर्शी ब्लाउज और काली ब्रा साफ दिख रही थी। हरीश ने सविता की साड़ी खींचकर उतारी और उसे बिस्तर पर लिटाकर उसके पास बैठ गया। उसने सविता की चिकनी पेट को सहलाया और गहरी नाभि के चारों ओर चुम्मियाँ दीं, फिर उसमें जीभ डालकर चाटा। हरीश की कामुक हरकतों से सविता कराह रही थी, और उसकी चूत रतिरस की बूँदें छोड़ रही थी। हरीश ने एक-एक करके काले ब्लाउज के हुक खोले। सविता उसकी आँखों में देखते हुए अपनी इच्छा पूरी होने की खुशी और प्रेम से मुस्कुरा रही थी। उसका चमकदार सौंदर्य और निर्मल प्रेम हरीश को घायल कर रहा था। ब्लाउज के सारे हुक खोलकर हटाने पर काली ब्रा में बंधे सविता के गोरे, यौवन भरे स्तनों को देखकर हरीश एक पल के लिए स्तब्ध रह गया। वह सविता के चेहरे की ओर झुका, उसके होंठों को चूमा, गालों को चाटा, और गर्दन को प्यार करते हुए नीचे सरका। जैसे ही उसकी जीभ सविता के स्तनों के बीच की दरार को छूई, सविता के मुँह से "आह..." की उन्माद भरी आवाज निकली। हरीश के दोनों हाथ सविता के स्तनों को पकड़कर मसल रहे थे, और वह लगातार कामोन्माद की आवाजें निकाल रही थी। जब हरीश ने सविता के एक स्तन को ब्रा के ऊपर से दाँतों से काटा, तो वह हल्के से हँसते हुए हरीश के बालों में उंगलियाँ फिराने लगी और बोली, "सब आपका है। मैंने अपने आपको आपके प्रेम के लिए समर्पित किया है। आप जैसा चाहें मुझे भोगें, आपके पास मुझ पर पूरा अधिकार है।"

उसकी बात से उत्साहित हरीश ने कहा, "सविता, तुम कोई भोगने की वस्तु नहीं हो, ये पहले समझ लो। मैं तुम्हें सिर्फ प्यार करूँगा, भोगना मुझे बहुत नीच लगता है।"

सविता: यही आपका गुण है, जिसके लिए मैंने आपको प्यार किया। आखिरकार मेरे जीवन का पहला प्यार आज मुझे फल दे रहा है।

हरीश ने सविता की हरी लहंगे की डोरी खींचकर नीचे सरकाई और उतार दी। उसकी हल्की नीली कच्छी में उसकी चूत पूरी तरह उभरी हुई थी और कच्छी का अगला हिस्सा काफी गीला था। हरीश ने सविता के पैर फैलाए और उसकी जाँघों के बीच मुँह डालकर कच्छी के ऊपर से ही चूत पर कई चुम्मियाँ दीं। सविता "हाँ... आह..." कहकर कराहने लगी और फिर से चार-पाँच बूँद रतिरस छोड़कर अपनी खुशी जाहिर की। हरीश ने सविता को उल्टा किया, तो शीला को टक्कर देने वाले उसके मोटे, गोल, गोरे कूल्हे नीली कच्छी में प्रदर्शित हो रहे थे। हरीश ने उन्हें सहलाया और मसला, तो सविता कामोन्माद के सागर में डूब गई। हरीश ने सविता के कूल्हों पर अपना मुँह रगड़ा और ऊपर सरककर ब्लाउज उतारा, ब्रा का हुक खोला, और उसकी चिकनी पीठ पर चुम्मियों की बौछार की। फिर उसे पलटकर लिटाया। पहली बार अपने पति के अलावा किसी पुरुष को अपने यौवन भरे स्तन दिखाने में सविता को जरा भी शर्मिंदगी नहीं हुई। क्योंकि उसके मन में हरीश के अच्छे गुणों ने गहरी छाप छोड़ी थी। अपने दूर रहने वाले पति की वजह से उसने मन ही मन हरीश को अपनी प्रेमिका, भक्त, रखैल, और पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था। सविता ने खुद अपनी ब्रा उतारी और अपने स्तनों को प्रदर्शित करते हुए हरीश को उन्हें मसलने और चूसने का न्योता दिया। दस मिनट तक हरीश ने सविता के गोल, गोरे स्तनों को मसला, काले, तने हुए निप्पलों पर जीभ फिराई, दाँतों से हल्के से काटकर खींचा, और उसकी कामाग्नि को और भड़काया। हरीश बिस्तर से उतरा और पैंट उतारकर सिर्फ चड्डी में खड़ा हो गया। सिर्फ नीली कच्छी में बैठी सविता भी उठकर बैठ गई।

हरीश: तुम्हारे सारे कपड़े मैंने उतारे। अब सिर्फ तुम्हारी कच्छी बाकी है। अगर तुम मेरी चड्डी उतारो, तो हमारे मिलन में भी समानता रहेगी।

सविता: हरीश, मैं आपके लिए और हमारे मिलन के लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ। आपने जो कहा, वो तो छोटी-सी बात है।

सविता ने जैसे ही हरीश की चड्डी नीचे खींची, वह चौंककर पीछे हट गई। सुकन्या ने पहले ही हरीश के दस इंच के लंड का वर्णन किया था, लेकिन सविता ने इसे अतिशयोक्ति समझा था। लेकिन जब उसने अपनी आँखों के सामने चड्डी से निकलकर उछलते हुए लंड को देखा, तो वह दंग रह गई। एक मिनट तक उसे घूरने के बाद सविता ने लंड को हाथ में पकड़ा, उसका वजन लिया, और अपने जीवन का पहला लिंग चुम्बन हरीश के लंड को ही दिया। 21 साल के वैवाहिक जीवन में अपने पति के पाँच इंच के लंड को मुट्ठी भर बार छूने के अलावा कुछ न करने वाली सविता ने इस पल हरीश के लंड को मुँह में लिया और बच्चों की तरह लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी।

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