- 497
- 655
- 94
नियति से बंधी नीतू - Part 3
वहाँ दीवार से सटकर रो रही नीतू के पास बसव आया और उसे जल्दी से वहाँ से चलने को कहा। उसने उसे उतावलेपन से नीचे की मंजिल पर लाया। उस पल नीतू को न जाने क्यों ऐसा नहीं लगा कि वह केवल लहंगे और ब्लाउज में बसव के सामने है, न उसे शर्मिंदगी हुई और न ही खुद पर गुस्सा आया। उसने बसव के हाथ से अपनी साड़ी ली और पहन ली। बसव ने उसका बैग उठाया और उसके साथ इमारत के बाहर आया, फिर उसे अपनी बाइक के पास ले गया। बाइक पर चढ़कर स्टार्ट करने के बाद उसने नीतू को बैठने को कहा। नीतू के बैठने के बाद वह सीधे नीतू के घर के पास आकर बाइक रोक दी। नीतू उतरी, बसव से अपना बैग लिया और उसे अंदर आने के लिए बुलाया। नीतू ने घर का ताला खोला और अंदर कदम रखते ही बसव के सामने हाथ जोड़कर उसके पैरों पर गिर पड़ी। बसव तुरंत पीछे हटा और बोला, "यह क्या कर रही हैं आप?" नीतू ने कहा, "अगर आप सही समय पर नहीं आते, तो आज उस पापी ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी होती। आपका यह ऋण मैं सात जन्मों में भी नहीं चुका सकती।" बसव बोला, "आप ऋण, मदद वगैरह की बातें न करें, यह मेरा कर्तव्य ही था। अगर आज आपको कुछ हो जाता, तो मैं यहाँ आकर भी आपको नहीं बचा पाता, इस मलाल में शायद मेरी जान ही चली जाती।" नीतू बसव की बातों से कृतज्ञता भरी मुस्कान बिखेरते हुए उसकी ओर देख रही थी, तभी उसकी नजर बसव की बाँह पर पड़ी, जहाँ मजदूर के चाकू के वार से हुआ घाव था। नीतू तुरंत कमरे से मेडिकल बॉक्स लाई और पहले बसव के घाव को रुई से साफ किया, फिर उस पर क्रीम लगाई, पाउडर डाला, रुई रखकर पट्टी बाँध दी। बसव को बैठे रहने को कहकर वह उसके लिए शरबत ले आई। बसव ने पूछा, "यह सब क्यों?" तो नीतू ने नकली गुस्से से कहा, "चुपचाप पिएँ, कुछ मत बोलें।" बसव ने उससे जूस लिया और उसकी आँखों में देखते हुए एक ही घूँट में जूस पी लिया। फिर गिलास नीचे रखते हुए बोला, "मैं अब चलता हूँ।" नीतू ने फिर से धन्यवाद दिया और कहा कि कल जब दूध लाएँ, तो यहीं नाश्ता करके जाना। बसव हँसते हुए बोला, "जैसा आप कहें, वरना आप गुस्से में मुझे ही पीट देंगी।" नीतू भी चेहरे पर कई भावों के साथ मुस्कुराई।
उस रात सोते समय नीतू ने अपने पति को दिन की घटना बताई, लेकिन यह छिपा लिया कि उस पर बलात्कार की कोशिश हुई थी। उसने कहा, "एक नशेड़ी ने रास्ते में रोककर बदतमीजी की, तभी हमारे घर दूध देने वाला व्यक्ति आ गया और उसने उसे सबक सिखाकर मेरी मदद की और मुझे घर तक छोड़ गया।" हरीश एक पल के लिए डर और घबराहट में बोला, "तुझे कुछ नहीं हुआ न?" उसने नीतू का चेहरा और हाथ देखकर जाँच शुरू की। नीतू ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, "मुझे कुछ नहीं हुआ, मैं ठीक हूँ। तुम व्यर्थ घबराओ मत। सही समय पर दूध वाला आ गया।" हरीश ने राहत की साँस लेते हुए कहा, "फिलहाल तुझे कुछ नहीं हुआ, यही काफी है। कल रविवार है, मैं यहाँ ट्रेनिंग रूम में ही रहूँगा। जब दूध वाला आए, उसे घर में बिठाकर मुझे फोन करना, मैं उसे धन्यवाद देना चाहता हूँ।" नीतू ने कहा, "ठीक है, अब तुम सो जाओ, मुझे भी नींद आ रही है।" फिर वह पति की ओर पीठ करके खुली आँखों से दिन की भयावह घटनाओं को याद करने लगी। कैसे उस मजदूर ने आसानी से उसकी साड़ी और लहंगा उतार दिया और उसके स्तनों को जोर से दबा दिया। अगर दूध वाला सही समय पर न आता, तो मजदूर उसकी कच्छी उतारने में भी कामयाब हो जाता। बसव ने जिस तरह उसकी रक्षा की, उसे याद करते हुए नीतू के होंठों पर हल्की मुस्कान उभरी। अनजाने में उसका बायाँ हाथ उसकी जाँघों के मिलन स्थल, यानी काम पुष्प को नाइटी के ऊपर से सहलाने लगा और वह सो गई।
सुबह उठकर नित्य कर्म पूरे करने के बाद नीतू नाश्ता तैयार करने गई। उसे याद आया कि उसने आज दूध वाले को यहीं नाश्ता करने का न्योता दिया है, इसलिए उसने हमेशा से थोड़ा ज्यादा बनाया। जब सभी नाश्ते के लिए बैठे, तो छोटे बेटे ने पूछा, "मम्मी, आज गाजर का हलवा बनाया है, क्या खास है?" नीतू ने कहा, "कुछ नहीं सूरी, तुझे पसंद है इसलिए बनाया, बस।" पति और बच्चों को विदा करने के बाद, जो नीतू कभी इंतज़ार नहीं करती थी, वह आज दूध वाले का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी। थोड़ी देर बाद "दूध" की आवाज़ सुनकर वह दौड़कर आई और मुस्कुराते हुए उसका स्वागत किया। उसने उसे अंदर आने का न्योता दिया। घर में आए बसव को उसने कहा, "हाथ-पैर धो लीजिए, नाश्ता करेंगे।" उसने बाथरूम दिखाया। जब बसव वहाँ गया, तो नीतू भी हल्की मुस्कान के साथ नाश्ता लाने रसोई की ओर गई। बाथरूम में हाथ-पैर धोते समय बसव की नज़र वहाँ हेंगर पर लटक रहे भूरे रंग के ब्रा पर पड़ी। बाथरूम का दरवाज़ा बंद होने के कारण उसने ब्रा को हाथ में लिया और पहले उसे नाक के पास लाकर उसकी खुशबू सूँघी, जो उसकी सपनों की रानी के वक्ष स्थल की थी। उस सुगंध ने उसके पुरुषत्व के प्रतीक को सिर उठाने पर मजबूर कर दिया। बसव ने ब्रा के कप्स को फैलाकर देखा और सोचा, "यही मेरी रानी के स्तनों को बाँधे रखते हैं।" उसने ब्रा के कप्स को चूमा और उसे वापस हेंगर पर टांगकर बाहर आ गया।
नीतू पिछले कुछ दिनों से दो मोटी किताबें रोज़ दो-दो बार पढ़ रही थी और पुरुष शरीर के हर पहलू को अच्छी तरह समझ चुकी थी। जब बसव बाहर आया, तो नीतू की नज़र उसके चेहरे से नीचे सरकी। उसे उसकी कमर से थोड़ा नीचे कुछ ऐसा दिखा जैसे कोई बड़ा डंडा रखा हो। अगले ही पल उसे समझ आ गया कि वह क्या है और शर्म से उसने सिर झुका लिया। नीतू ने बसव को नाश्ता परोसा और डाइनिंग टेबल पर उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठकर उससे हर बात पूछकर जानने लगी। बसव ने बताया, "घर में बेटा और पत्नी के साथ रहता हूँ, माता-पिता स्वर्गवासी हो चुके हैं। घर में चालीस गायें हैं, जिनमें से पंद्रह गायों का दूध मैं चुनिंदा घरों में सप्लाई करता हूँ। पच्चीस गायों का दूध मेरा बेटा रोज़ शहर की डेयरी में डालता है। बाकी पाँच गायों के दूध से घर के लिए जरूरत भर दूध रखकर बचा हुआ दूध मेरी पत्नी मक्खन निकालने के लिए इस्तेमाल करती है।" उसने आगे बताया, "गाँव में दस एकड़ का बगीचा है, जिसमें नारियल, आम, अनार, चीकू, केला और थोड़ी ज्यादा मात्रा में सब्जियाँ और साग उगाते हैं। बेटा कुछ मजदूरों के साथ उसकी देखभाल करता है। मैं सिर्फ शहर की दुकानों में उनकी बिक्री का ध्यान रखता हूँ।" नीतू खुशी से बोली, "तो फिर हमें आपके बगीचे की सब्जियाँ और फल लेने के लिए दुकान पर ही जाना होगा?" बसव ने सिर खुजाया, नाश्ता आधा छोड़कर बाहर गया और एक बड़ा बैग लेकर लौटा, जिसे उसने नीतू को थमा दिया। नीतू ने बैग खोलकर देखा तो उसमें नारियल, सब्जियाँ, साग, कुछ चीकू, अनार और केले थे। नीतू ने आश्चर्य से बसव की ओर देखकर पूछा, "इसे आप शहर की दुकान में देने के बजाय मुझे क्यों दे रहे हैं?" बसव ने नाश्ता खाते हुए कहा, "यह दुकान के लिए नहीं, आपके लिए लाया हूँ।" नीतू ने कहा कि उसे इसका पैसा लेना होगा, लेकिन बसव ने साफ मना कर दिया और कहा, "यह मुमकिन नहीं। मैं किसी के घर सप्लाई नहीं करता। यह सिर्फ आपके लिए लाया हूँ। अगर आप मना करेंगी, तो मुझे दुख होगा। पैसों की बात किसी भी हाल में बीच में नहीं लानी है।" नीतू हँसते हुए बैग को रसोई में रखकर लौट आई।
वहाँ दीवार से सटकर रो रही नीतू के पास बसव आया और उसे जल्दी से वहाँ से चलने को कहा। उसने उसे उतावलेपन से नीचे की मंजिल पर लाया। उस पल नीतू को न जाने क्यों ऐसा नहीं लगा कि वह केवल लहंगे और ब्लाउज में बसव के सामने है, न उसे शर्मिंदगी हुई और न ही खुद पर गुस्सा आया। उसने बसव के हाथ से अपनी साड़ी ली और पहन ली। बसव ने उसका बैग उठाया और उसके साथ इमारत के बाहर आया, फिर उसे अपनी बाइक के पास ले गया। बाइक पर चढ़कर स्टार्ट करने के बाद उसने नीतू को बैठने को कहा। नीतू के बैठने के बाद वह सीधे नीतू के घर के पास आकर बाइक रोक दी। नीतू उतरी, बसव से अपना बैग लिया और उसे अंदर आने के लिए बुलाया। नीतू ने घर का ताला खोला और अंदर कदम रखते ही बसव के सामने हाथ जोड़कर उसके पैरों पर गिर पड़ी। बसव तुरंत पीछे हटा और बोला, "यह क्या कर रही हैं आप?" नीतू ने कहा, "अगर आप सही समय पर नहीं आते, तो आज उस पापी ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी होती। आपका यह ऋण मैं सात जन्मों में भी नहीं चुका सकती।" बसव बोला, "आप ऋण, मदद वगैरह की बातें न करें, यह मेरा कर्तव्य ही था। अगर आज आपको कुछ हो जाता, तो मैं यहाँ आकर भी आपको नहीं बचा पाता, इस मलाल में शायद मेरी जान ही चली जाती।" नीतू बसव की बातों से कृतज्ञता भरी मुस्कान बिखेरते हुए उसकी ओर देख रही थी, तभी उसकी नजर बसव की बाँह पर पड़ी, जहाँ मजदूर के चाकू के वार से हुआ घाव था। नीतू तुरंत कमरे से मेडिकल बॉक्स लाई और पहले बसव के घाव को रुई से साफ किया, फिर उस पर क्रीम लगाई, पाउडर डाला, रुई रखकर पट्टी बाँध दी। बसव को बैठे रहने को कहकर वह उसके लिए शरबत ले आई। बसव ने पूछा, "यह सब क्यों?" तो नीतू ने नकली गुस्से से कहा, "चुपचाप पिएँ, कुछ मत बोलें।" बसव ने उससे जूस लिया और उसकी आँखों में देखते हुए एक ही घूँट में जूस पी लिया। फिर गिलास नीचे रखते हुए बोला, "मैं अब चलता हूँ।" नीतू ने फिर से धन्यवाद दिया और कहा कि कल जब दूध लाएँ, तो यहीं नाश्ता करके जाना। बसव हँसते हुए बोला, "जैसा आप कहें, वरना आप गुस्से में मुझे ही पीट देंगी।" नीतू भी चेहरे पर कई भावों के साथ मुस्कुराई।
उस रात सोते समय नीतू ने अपने पति को दिन की घटना बताई, लेकिन यह छिपा लिया कि उस पर बलात्कार की कोशिश हुई थी। उसने कहा, "एक नशेड़ी ने रास्ते में रोककर बदतमीजी की, तभी हमारे घर दूध देने वाला व्यक्ति आ गया और उसने उसे सबक सिखाकर मेरी मदद की और मुझे घर तक छोड़ गया।" हरीश एक पल के लिए डर और घबराहट में बोला, "तुझे कुछ नहीं हुआ न?" उसने नीतू का चेहरा और हाथ देखकर जाँच शुरू की। नीतू ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, "मुझे कुछ नहीं हुआ, मैं ठीक हूँ। तुम व्यर्थ घबराओ मत। सही समय पर दूध वाला आ गया।" हरीश ने राहत की साँस लेते हुए कहा, "फिलहाल तुझे कुछ नहीं हुआ, यही काफी है। कल रविवार है, मैं यहाँ ट्रेनिंग रूम में ही रहूँगा। जब दूध वाला आए, उसे घर में बिठाकर मुझे फोन करना, मैं उसे धन्यवाद देना चाहता हूँ।" नीतू ने कहा, "ठीक है, अब तुम सो जाओ, मुझे भी नींद आ रही है।" फिर वह पति की ओर पीठ करके खुली आँखों से दिन की भयावह घटनाओं को याद करने लगी। कैसे उस मजदूर ने आसानी से उसकी साड़ी और लहंगा उतार दिया और उसके स्तनों को जोर से दबा दिया। अगर दूध वाला सही समय पर न आता, तो मजदूर उसकी कच्छी उतारने में भी कामयाब हो जाता। बसव ने जिस तरह उसकी रक्षा की, उसे याद करते हुए नीतू के होंठों पर हल्की मुस्कान उभरी। अनजाने में उसका बायाँ हाथ उसकी जाँघों के मिलन स्थल, यानी काम पुष्प को नाइटी के ऊपर से सहलाने लगा और वह सो गई।
सुबह उठकर नित्य कर्म पूरे करने के बाद नीतू नाश्ता तैयार करने गई। उसे याद आया कि उसने आज दूध वाले को यहीं नाश्ता करने का न्योता दिया है, इसलिए उसने हमेशा से थोड़ा ज्यादा बनाया। जब सभी नाश्ते के लिए बैठे, तो छोटे बेटे ने पूछा, "मम्मी, आज गाजर का हलवा बनाया है, क्या खास है?" नीतू ने कहा, "कुछ नहीं सूरी, तुझे पसंद है इसलिए बनाया, बस।" पति और बच्चों को विदा करने के बाद, जो नीतू कभी इंतज़ार नहीं करती थी, वह आज दूध वाले का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी। थोड़ी देर बाद "दूध" की आवाज़ सुनकर वह दौड़कर आई और मुस्कुराते हुए उसका स्वागत किया। उसने उसे अंदर आने का न्योता दिया। घर में आए बसव को उसने कहा, "हाथ-पैर धो लीजिए, नाश्ता करेंगे।" उसने बाथरूम दिखाया। जब बसव वहाँ गया, तो नीतू भी हल्की मुस्कान के साथ नाश्ता लाने रसोई की ओर गई। बाथरूम में हाथ-पैर धोते समय बसव की नज़र वहाँ हेंगर पर लटक रहे भूरे रंग के ब्रा पर पड़ी। बाथरूम का दरवाज़ा बंद होने के कारण उसने ब्रा को हाथ में लिया और पहले उसे नाक के पास लाकर उसकी खुशबू सूँघी, जो उसकी सपनों की रानी के वक्ष स्थल की थी। उस सुगंध ने उसके पुरुषत्व के प्रतीक को सिर उठाने पर मजबूर कर दिया। बसव ने ब्रा के कप्स को फैलाकर देखा और सोचा, "यही मेरी रानी के स्तनों को बाँधे रखते हैं।" उसने ब्रा के कप्स को चूमा और उसे वापस हेंगर पर टांगकर बाहर आ गया।
नीतू पिछले कुछ दिनों से दो मोटी किताबें रोज़ दो-दो बार पढ़ रही थी और पुरुष शरीर के हर पहलू को अच्छी तरह समझ चुकी थी। जब बसव बाहर आया, तो नीतू की नज़र उसके चेहरे से नीचे सरकी। उसे उसकी कमर से थोड़ा नीचे कुछ ऐसा दिखा जैसे कोई बड़ा डंडा रखा हो। अगले ही पल उसे समझ आ गया कि वह क्या है और शर्म से उसने सिर झुका लिया। नीतू ने बसव को नाश्ता परोसा और डाइनिंग टेबल पर उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठकर उससे हर बात पूछकर जानने लगी। बसव ने बताया, "घर में बेटा और पत्नी के साथ रहता हूँ, माता-पिता स्वर्गवासी हो चुके हैं। घर में चालीस गायें हैं, जिनमें से पंद्रह गायों का दूध मैं चुनिंदा घरों में सप्लाई करता हूँ। पच्चीस गायों का दूध मेरा बेटा रोज़ शहर की डेयरी में डालता है। बाकी पाँच गायों के दूध से घर के लिए जरूरत भर दूध रखकर बचा हुआ दूध मेरी पत्नी मक्खन निकालने के लिए इस्तेमाल करती है।" उसने आगे बताया, "गाँव में दस एकड़ का बगीचा है, जिसमें नारियल, आम, अनार, चीकू, केला और थोड़ी ज्यादा मात्रा में सब्जियाँ और साग उगाते हैं। बेटा कुछ मजदूरों के साथ उसकी देखभाल करता है। मैं सिर्फ शहर की दुकानों में उनकी बिक्री का ध्यान रखता हूँ।" नीतू खुशी से बोली, "तो फिर हमें आपके बगीचे की सब्जियाँ और फल लेने के लिए दुकान पर ही जाना होगा?" बसव ने सिर खुजाया, नाश्ता आधा छोड़कर बाहर गया और एक बड़ा बैग लेकर लौटा, जिसे उसने नीतू को थमा दिया। नीतू ने बैग खोलकर देखा तो उसमें नारियल, सब्जियाँ, साग, कुछ चीकू, अनार और केले थे। नीतू ने आश्चर्य से बसव की ओर देखकर पूछा, "इसे आप शहर की दुकान में देने के बजाय मुझे क्यों दे रहे हैं?" बसव ने नाश्ता खाते हुए कहा, "यह दुकान के लिए नहीं, आपके लिए लाया हूँ।" नीतू ने कहा कि उसे इसका पैसा लेना होगा, लेकिन बसव ने साफ मना कर दिया और कहा, "यह मुमकिन नहीं। मैं किसी के घर सप्लाई नहीं करता। यह सिर्फ आपके लिए लाया हूँ। अगर आप मना करेंगी, तो मुझे दुख होगा। पैसों की बात किसी भी हाल में बीच में नहीं लानी है।" नीतू हँसते हुए बैग को रसोई में रखकर लौट आई।