-दील का हाल , बेहाल....!!
अपडेट -- 4
राजू नहाने धोने के बाद, वो गांव की तरफ नीकल जाता है........गांव के स्कूल पर बैठा राजू , सोनू और दो लड़के अपने नौटकीं के बारे में बात कर रहे थे.......!
'बात करते - करते अंधेरा हो जाता है तो वो सब लोग अपने - अपने घर की तरफ नीकल जाते है!!
राजू जैसे ही घर पहुचा......तो बाहर ही खाना बन रहा था ! क्यूकीं गर्मीयों में गावं के लोग ज्यादातार बाहर ही खाना बनाते थे.....!
'चारो तरफ चांद की रौशनी बीखरी थी.....ठंढ़ी - ठंढ़ी हवायें चल रही थी ......घर के बाहर दुवारे पर खाट बीछी थी......एक खाट पर राजू का बाप लेटा था , और वही बगल साहब लाल के दुवार पर वो खाट लगाकर लेटा था!
' मीट्टी के तीन चुल्हे जल रहे थे , एक तो सुनीता अपना घुघंट काढ़े अपने दुवार पर खाना बना रही थी , और दुसरा ओसार के बाहर दुवारे दाहीने तरफ राजू की मां और उसकी........बहन दीपा खाना बना रही थी, और ओसार बांये तरफ दुवार पर रमती और उसकी बेटी आंचल खाना बना रही थी!!
चांद की रौशनी में बाहर खाट पर लेटे राजू के पापा और साहब लाल आपस मे बात कर रहे थे......सुगना भी साहब लाल के बगल ही खाट पर बैठी बात कर रही थी.......
तभी राजू भी वंहा पहुचं जाता है.......उसने देखा की उसका बाप और साहब लाल अपनी बचपन की बाते करते हुए हंसी मजाक कर रहे है तो वो भी ओसार में जाकर एक खाट उठाकर बाहर लेकर आया और बीछा कर लेट गया.......
दुवार के सामने थोड़ी सी दूरी पर मीट्टी के तीन चार कमरे बने थे.....जीसमें राजू और रमती की गाय , भैसं बांधी जाती थी....
''राजू खाट पर लेटा था उसे तबांकू खाने की तलब उठी.....तो वो सुनीता की तरफ उठ कर चल दीया,
सुनीता बाहर खाना बना रही थी.......सुनीता के पास पहुच कर.....
राजू - भाभी......बड़े पापा ने तबाकूं की डीबीया कहा रखी है??
सुनीता (रोटी सेकते हुए) - अच्छा देवर जी , जब काम पड़ता है तो ही भाभी की याद आती है , क्यूं?
राजू - अरे.....ऐसा नही है भाभी, मैं तो तुम्हे हमेशा याद करता हूं.....!
राजू ......के अंदर एक अलग ही जोश आ गया....उसे अब सीर्फ बुर की तलाश थी, और वो अब सुनीता को फांसना चाहता था......उसने आज ये इरादा कर लीया था की , अब वो भी भाभी से खुलकर बात करेगा.....!
सुनीता - चलो जाओ......मस्का मत लगाओ!!
राजू - अरे भाभी......समझा करो, बहुत तलब लगी है.....!
सुनीता - कीस चीज की तलब लगी है....देवर जी!!
राजू अपनी भाभी की बात सुनकर....समझ जाता है की भाभी कीस तलब के बारे में पुछ रही है.....
राजू - फीलहाल तो तबाकूं की तलब लगी है....कीसी और चीज की तलब लगेगी तो मै तूझे बोल दूगां भाभी.....
सुनीता चुल्हे में से रोटी सेकतें हुए बोली--
सुनीता - अरे......देवर जी, तबाकूं की तलब तो मैं दूर कर दूगीं.....और रही कीसी और चीज की तलब तो वो तो दीपा से जाकर दूर कर लो..!
अपनी भाभी की बात सुनकर , राजू धीरे - धीरे गरम होने लगा......
राजू - अब भाभी तूझे तो पता है की मै कीतना बड़ा छीनरा हुं....
सुनीता - वो तो तुम हो ही देवर जी......
राजू - तो फीर मेरी तलब तो तुम ही हो......भाभी,,
राजू के मुह से ऐसी बात सुनकर......सुनीता खुश हो जाती है।
सुनीता (मन में ) - ये पगलेठ को मैं कब से इशारा दे रही थी......इसे आज समझ में आया ॥ चलो थोड़ा और तड़पाती हूं इसे.....
सुनीता - हाय राम.......ये क्या कह रहे हो देवर जी, मैं तुम्हारी भाभी हूं.....अपनी ये तलब जा कर दीपा से पूरा कर लो......मेरे साथ नही!!
राजू और सुनीता बहुत धीरे - धीरे बात कर रहे थे......और वैसे भी राजू को सब सीधा समझते थे, इसलीये कोयी शक भी नही खाता था..... हालाकी राजू बहुत सीधा - साधा था, एक पल के लीये तो सुनीता भी यही मान ली थु की......ये भोला है , ये हाथ नही आयेगा और आज तो वो अचम्भीत रह गयी थी राजू का ये रुप देखकर!!
राजू - अरे जब इतनी मस्त भाभी है, तो बहनो पर भला क्यूं नज़र गड़ाना....
सुनीता - नही.....बाबा , मुझे नही करना ये सब......!
राजू अपना एक हाथ धीरे से ले जाकर.....सुनीता की चुचीयों को ब्लाउज के उपर से ही पकड़ लेता है......
सुनीता - हाय रे.......देवर जी, ये तुम क्या कर रहे हो.....छोड़ दो, ये गलत है....सब यही बैठे है,
'राजू को पता था की, उन दोनो का मुह घर की दीवाल की तरफ है.....और वो दोनो एक-एक इट रखकर नीचे जमीन पर बैठे थे......उन लोग को सब लोग देख तो सकते थे , लेकीन राजू क्या हरकत कर रहा है.....ये देखना मुश्कील था!!
सुनीता की चुचीयां एक दम कसी-कसी थी....और ये पहली बार था , जब राजू कीसी औरत की चुचींयो को छुवा था.....और उसे अपनी भाभी की चुचीयों को पकड़े हुए इतना मजा आ रहा था की, उसका लंड फनफना कर खड़ा हो गया.......
राजू ने अपने हाथो में सुनीता की चुचीयों को धीरे-धीरे मसलने लगता है......
सुनीता को बहुत अच्छा लग रहा था......जीस तरह से राजू उसके चुचीयों के साथ खेल रहा था , वो तो पागल सी हो गयी......
सुनीता - हाय रे देवर जी........आह........छोड़ दो......कोयी देख लेगा!!
राजू - तेरी चुचीयां तो बहुत कसी - कसी है भाभी......कसम से बहुत मजा आ रहा है।
और ये बोलते हुए राजू , थोड़ी और जोर - जोर से सुनीता की चुचीयां दबाने लगता है.....
सुनीता की तो साँसे तेज होने लगती है.......उसकी मजे में हालत खराब होने लगती है, वो ठीक से रोटी भी नही बना पा रही थी।
सुनीता - आ.....ह, देवर जी.....बस करो, कीतना दबाओगे.......आह, तुम बहुत गंदे हो।
सुनीता तो अँदर ही अँदर बहुत खुश थी......और यही हाल राजू का भी था। सुनीता मस्ती में मस्त होकर अपनी चुचींया दबवा रही थी......और मजे ले रही थी, सूनीता इतनी गरम हो चुकी थी की, उसकी बुर फुदकने लगी.....!
तभी .............अभी तेरा खाना नही बना महारानी......देख सबका बन गया!!
सुनीता अपने सास सुगना की आवाज़ सुनकर......होश में आती है, और इधर राजू भी घबरा कर उसकी चुचींया छोड़ देता है!!
और अच्छा हुआ , सुगना ने आवाज लगाया क्यूंकीं दीपा इन लोग की तरफ ही आ रही थी......
दीपा - चलो......भैया, खाना खा लो.....
दीपा की आवाज सुनकर......राजू खड़ा हो जाता है, और सुनीता भी खाना समेट कर उठते हुए बोली-
सुनीता - क्या बात है, ननद जी.....बहुत अपने भैया को खीला रही हो....!
दीपा- हां तो भाई है मेरा......क्यूं नही खीलाउगीं??
......तभी रीतेश वंहा से हटते हुए खाट पर आकर बैठ जाता है....
रीतेश (मन में) - आरे यार......मजा ही आ गया, अगर भाभी की चचीयां दबाने में इतना मजा है तो, चाची की चुचीयां तो और मस्त है.....मजा आयेगा.....पहले तो भाभी को जी भर कर चोद-चोद कर मजा लेता हूं.....रही बात चाची की तो मुझे तो नही लगता की ये चुदवायेगी , लेकीन फीर भी कोशीश करता हू......
......ये ले बेटा खाना खा ले......। रजनी खाना ले कर राजू के पास खड़ी थी.....!
राजू खाना लेकर खाने लगता है......और पास वाली खाट पर उसका बाप खा रहा था!!
राजू.......खाना खाने के बाद, हाथ मुह धोता है ॥ उसे तबांकू की तलप लगती है......उसने देखा सब खाना खा रहे थे ! वो सुनीता के घर में घुस जाता है......
अंदर , सुगना खाना खा रही थी और सुनीता पास में बैठकर पंखा डोला रही थी!
राजू को देखते ही.....सुनीता थोड़ी शरमा जाती है.....!
राजू - बड़की अम्मा थोड़ा सुरती दे ना.....!
सुगन- जा , जा कर अंदर आलमारी में से नीकाल ले ......!
राजू अंदर कमरे की तरफ बढ़ते हुए.....सुनीता को कमरे में आने का इशारा करता है.....!
राजू अंदर जाकर , आलमारी में तबांकू ले कर घीसने लगता है। कुछ देर में जब सुनीता नही आयी तो.....
राजू - बड़की अम्मा कहां रखा है..? नही मील रहा है!
राजू की आवाज़ सुनकर , सुनीता समझ जाती है की......राजू का ये बहाना है, मुझे बुलाने का!
सुगना - जा रे .....जा कर दे उसको!
सुगना की बात सुनकर.....सुनीता उठ कर राजू के पास जाने लगती है!! सुनीता का बुर फुदकने लगती है ये सोचकर की अब राजू उसे फीर से मसलेगा!!
अँदर कमरे में पहुचँ कर.....सुनीता ने देखा की राजू तो तबांकू ले कर मल रहा है!!
.......सुनीता राजू के पास आकर , शरारती अदांज में राजू का एक कान पकड़कर खीचते हुए धीरे से फुसफुसा कर बोली ताकी आवाज उसकी सास तक ना पहुचें-
सुनीता - बदमाश.......कहीके!
....राजू ने बीना देर कीये, सुनीता को अपनी बाहों में कस लेता है..... सुनीता भी उसकी आगोश में समा जाती है.....लेकीन नाटक करते हुए बोली-
सुनीता - बड़े बदमाश हो देवर जी.....छोड़ो ना मुझे!
राजू ने झटके से सुनीता का पीठ......अपनी तरफ चीपकाते हुए उसकी चुचीयों को अपने दोनो हाथो में पकड़ कर.....जोश में जोर से दबाने लगता है!
.........सुनीता की चुचीयों में वो दर्द उठा की , उसके मुह से जोर की चीख नीकल पड़ी!!
सुनीता - आ........आ...........आ.......
सुनीता की इतनी जोर चीख सुनकर......सुगना घबरा गयी....!
सुगना - क्या हुआ??
राजू भी घबरा गया की , लगता है अब फंस जाउगा लेकीन तभी......
सुनीता - क.......कुछ नही अम्मा चूहा था......डर गयी!
सुगना - धत तेरी के.......एक चुहे से डर गयी!
सुनीता की समझदारी देखकर , राजू सुनीता को देखते हुए मुस्कुरा देता है.......राजु को मुस्कुराता देख सुनीता भी मुस्कुराते हुए बोली-
सुनीता - हाय रे देवर जी......इतना जोर से कोयी दबाता है क्या??
राजू हल्के - हल्के सुनीता की चुचींया मसलते हुए बोला-
राजू - क्यूं दर्द हुआ क्या??
सुनीता - हा तो दर्द होगा नही......बेरहमी से मसलोगे तो.....!
राजू - तूझे तो ऐसे ही मसलूगा......मेरा जैसा मन करेगा वैसा मसलूगा!!
आज रात जब मैं टी वी देखने आउगा , तब तूझे अच्छे से मसलूगा.......!
सुनीता अपनी बांहो को......राजू के गले में डालते हुए बोली--
सुनीता - मेरे देवर जी.......तुम्हारा हक, बस उपर - उपर है, उस चीज का सपना मत देखो...
और ये कहते हुए......वो राजू को एक धक्का देती है और मुस्कुरात हुए वंहा से चली जाती है!! राजू भी तंबाकू लेकर कमरे से बाहर आ जाता है!!
राजू एक बार......सुनीता को देखता है, और फीर एक आंख मारते हुए वंहा से बाहर आ जाता है!!
''राजू बाहर खाट पर लेटा था.......सब खाना खा चुके थे......!
राजू ओसार से......होते हुए , अँदर आगन में आ जाता है......!
आगन भी उपर से खुला था......आगंन में भी चांद की रौशनी फैली हुई थी......और ठंढ़ी हवायें चल रही थी!
आगंन में 5 खाट बीछी थी.......एक पर दीपा लेटी थी , ऐक खाट पर रजनी , बीच वाली खाट राजू की थी.....उसके बाद थोड़ी सी दूरी पर रमती की खाट थी और फीर उसकी बेटी आंचल की खाट थी!!
' राजू का कुछ ठीक नही था.......वो कभी आँगन में सो लेता तो कभी बाहर दुवारे अपने पापा , चाचा , और बड़े पापा के पास खाट बीछा कर सो जाता तो कभी वो अपने बड़े पापा के घर में टी वी देखते - देखते ही सो जाता ,!
सुगना के घर में आगंन नही था तो, वो गर्मी के दीन में बाहर दुवारे ही सोती , और सुनीता अंदर एक पखां लगाकर सो जाती !
'राजू के पास बहुत अच्छा मौका था.....क्यूकीं वो अपने बड़े पापा के घर में टी वी देखने जाता था तो वही सो जाता ......टी वी सुगना के कमरे में था ......और अंदर वाले कमरे में सुनीता सोती !!
'राजू के उपर कभी कोयी शक भी नही करता, क्यूकीं वो सालो से टी वी देखते जाता था और वही सो भी जाता था.......
''खैर सब खा पीकर लेट गये थे......लेकीन राजू लाइट के इतजांर में था की, कब लाइट आये...... और वो टी वी देखने जाये !!
.......लाइट का इतंजार करते - करते वो नीदं की आगोश में चला जाता है.......