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Incest एक अनोखा बंधन - पुन: प्रारंभ (Completed)

Rockstar_Rocky

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बहुत ही शानदार अपडेट है अभी तक संगीता जी का डर गया नही है manu भाई संगीता जी को खुश करने की पूरी कोशिश कर रहे है संगीता जी की वजह से सभी दुखी हैं संगीता जी की लेखनी बहुत अच्छी है

बहुत-बहुत धन्यवाद मित्र! :thank_you: :dost: :hug: :love3:

कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की!
 

Rockstar_Rocky

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Rockstar_Rocky

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छब्बीसवाँ अध्याय: दुखों का ग्रहण
भाग - 4


अब तक पढ़ा:


"माँ हम सब रात का show देखने जाएंगे और आते-आते हमें ग्यारह बज जाएँगे|" मैंने नकली मुस्कान लिए हुए माँ को देखते हुए कहा| माँ ने मेरे चेहरे पर आई नकली मुस्कान को मेरी ख़ुशी मान लिया और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए उठ कर चली गईं| उन्हें तसल्ली थी की मेरा मन अब दुखी नहीं है, जबकि मैं इस वक़्त अब भी इनसे सामना करने से डरी हुई थी क्योंकि इनके नजदीक होते हुए मेरे से अपना प्यार व्यक्त कर पाना मुश्किल हो जाता| ये घर से निकलते ही मुझसे अपना प्यार व्यक्त करते और मुझे सब कुछ जानते-बूझते खामोश रहना था जो की मेरे अनुसार बहुत-बहुत गलत था! फिर मैं ये भी नहीं चाहती थी की ये मेरा मन पढ़ लें क्योंकि मेरा मन पढ़ कर इन्हें मेरे मन की व्यथा समझ आ जाती तथा ये और भी टूट जाते!


अब आगे:


इधर मुझे जो मौका चाहिए था वो मुझे माँ के कारण मिल चूका था| अब बारी थी संगीता का दिल जीतने की, ओह wait संगीता तो पहले से ही मुझसे बहुत प्यार करती है तो दिल जीतने की बात कहाँ से आई?! असल में तब मैं इतना परेशान था की, मैं अपनी ही पत्नी जो पहले ही मुझसे इतना प्यार करती थी उसका दिल जीतने की सोच रहा था! खैर, मैं संगीता के मन में मची हुई उथल-पुथल को महसूस कर पा रहा था| मुझे ये जान कर बहुत दुःख हो रहा था की संगीता क्यों खुद को मेरे सामने व्यक्त नहीं कर रही? मैं उसका पति हूँ कोई गैर नहीं तो मुझसे छुपाना कैसा?



मैंने बच्चों को बाहर पिक्चर देखने और खाना खाने के बारे में बताया तो दोंनो बच्चे बहुत खुश हुए| नेहा ने उत्साह से भरते हुए मुझे अपने कपडे ला कर दिखाने शुरू कर दिए, वो चाहती थी की मैं उसके लिए कपडे पसंद करूँ जो वो आज बाहर जाते समय पहनने वाली थी| मेरी पसंद के कपड़े पहन कर नेहा ख़ुशी से चहक रही थी, वहीं आयुष ने अपने दादाजी के पसंद के कपड़े पहने और मुझे दिखाने आया| उधर संगीता ने माँ-पिताजी को खाना खिलाया और तब जा कर वो चलने के लिए तैयार हुई| हम चारों साढ़े सात बजे के आस-पास, माँ-पिताजी का आशीर्वाद ले कर निकले| अब बच्चों ने गाडी में आगे बैठने की जिद्द की, मैंने बच्चों को समझाया और संगीता को आगे बैठने के लिए कहा तथा बड़े बेमन से संगीता आगे बैठ गई| मैंने आगे बढ़ कर उसकी seatbelt लगाई और उसे देख कर मुस्कुराया मगर संगीता के चेहरे पर बस एक नक़ली मुस्कान ही आई!

भूख लग आई थी इसलिए हम mall के parking lot में गाडी पार्क कर के सीधा Yo China पहुँचे| Chinese खाने के नाम पर संगीता और बच्चों ने बस चाऊमीन ही खाई थी, नया खाना खाने की चाह हम चारों में थी| हम चारों एक family table पर बैठ गए, जहाँ मैं menu card देखने में लगा था वहीं बच्चे और संगीता आस-पास बैठे लोगों को देखने में लगे थे| आस-पास जितने भी लोग थे सभी chopstick से खाना खा रहे थे और ये दृश्य देख बच्चे और संगीता परेशान हो रहे थे! Menu में authentic chinese food था, अब न तो मैंने authentic chinese खाया था और न ही मुझे chopstick से खाना आता था, मगर कुछ नया try करने का उत्साह मुझ में जरूर था|

मैं: बाबू, relax! मैं ऐसा कुछ भी order नहीं करूँगा जो आपको chop stick के साथ खाना पड़े|

मैंने संगीता की चिंता भाँपते हुए कहा|

संगीता: हम्म्म!

संगीता ने फिर नकली मुस्कान के साथ कहा और मुझसे नजरें चुराते हुए इधर-उधर देखने लगी| वो सोच रही थी की वो मुझसे अपने जज्बात छुपा लेगी मगर मैं उसकी सारी होशियारियाँ समझ पा रहा था| दोनों बच्चे मेरी ओर बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे की मैं खाने के लिए क्या मँगाने वाला हूँ;

मैं: नेहा बेटा, आप को मिर्ची वाला खाना पसंद है न? तो आप के लिए...म्म्म्म्म्म...schezwan fried rice मँगाते हैं, okay?

नेहा को dish का नाम समझ में नहीं आया था इसलिए उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थी;

नेहा: हम्म्म्म!

नेहा ने dish के नाम से थोड़ा डरते हुए कहा| वहीं आयुष को तो dish के नाम से कुछ फर्क नहीं पड़ता था| उसे बस बिना मिर्ची वाला खाना चाहिए था;

आयुष: पापा जी मैं मिर्ची वाला खाना नहीं खाऊँगा!

जिस भोलेपन से आयुष ने कहा था उसे देख नेहा अपने मुँह पर हाथ रख कर हँसने लगी मगर संगीता उखड़ी हुई थी इसलिए वो बीच में बोल पड़ी;

संगीता: क्या सब के लिए अलग -अलग खाना माँगा रहे हो?! एक ही dish मँगा लो हम चारों खा लेंगे!

कोई और दिन होता तो मैं, संगीता को झाड़ देता क्योंकि मुझे खाना खाते समय टोका-टोकी पसंद नहीं मगर आज मैंने सबर से काम लिया तथा उसे प्यार से समझाया;

मैं: यार बच्चों को भी था enjoy कराना चाहिए न?!

ये सुन संगीता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और फिर से मुझसे नजरें चुरा कर इधर-उधर देखने लगी|



हम चारों कुछ इस प्रकार बैठे थे, संगीता मेरे सामने बैठी थी, आयुष मेरी बगल में और नेहा अपनी मम्मी की बगल में बैठी थी| मैंने सब के लिए खाना order कर दिया था, खाना आने तक मैंने दोनों बच्चों को बातों में लगा दिया और साथ ही बच्चों के जरिये संगीता को भी बातों में लगा दिया| हम चारों के लिए मैंने अलग-अलग variety के fried rice order कर दिए तथा साथ में दो gravy items भी| जब खाना आया तो हमें चम्मच की जगह fork दिया गया था| मैं चाहता तो चम्मच मँगा सकता था मगर मैंने जानबूझ कर नहीं मँगाया क्योंकि मैं आज अपने बीवी-बच्चों को एक नया अनुभव कराना चाहता था| मैंने खुद सबके लिए खाना परोसा मगर किसी ने भी तक अपनी plate को नहीं छुआ था क्योंकि fork से चावल खाना किसी को नहीं आता था| मैंने पहल करते हुए fork से चावल उठाये और बड़े प्यार से संगीता की ओर fork बढ़ाया| चावल का वो कौर अपने नजदीक देख संगीता ने झिझकना शुरू कर दिया?!

मैं: Hey? खाओ न?

मैंने भोयें सिकोड़ कर संगीता को देखते हुए कहा| मैं बहुत हैरान था की संगीता यूँ अजीब बर्ताव क्यों कर रही है? ये पहलीबार तो नहीं की मैं बाहर किसी restaurant में संगीता को अपने हाथ से खाना खिला रहा हूँ? आज पहलीबार मुझे संगीता पर खाना खाने के लिए दबाव डालना पड़ रहा था! बेमन से संगीता ने अपना मुँह खोला और मेरे हाथ से कौर खाया, बहरहाल मैंने अपने जज्बातों पर काबू किया और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी|



अब अगलीबारी नेहा की थी, जब मैंने fork से चावल उठा कर उसे खिलाया तो नेहा ने फ़ट से चावल खा लिए| अब बारी थी आयुष की, वो मेरी बगल में बैठा था और अपना मुँह खोले प्रतीक्षा कर रहा था| उसने भी नेहा की तरह बड़े चाव से चावल खाये और ख़ुशी से अपनी गर्दन दाएँ-बाएँ हिलाने लगा! बच्चों और संगीता को fork से चवल खाना आ गया था, वहीं चूँकि संगीता मेरे हाथ से खाने में झिझक रही थी इसलिए मैंने अपनी चतुराई दिखाते हुए बच्चों को आगे कर दिया| दोनों बच्चों ने बारी-बारी से मुझे और संगीता को अपने हाथों से खिलाना शुरू कर दिया| बच्चों के लिए मुझे और संगीता को खाना खिलाना एक खेल के समान था जिसे दोनों बच्चे बड़े प्यार से खेल रहे थे| बच्चों के इस खेल के दबाव में आ कर संगीता को भी उनके साथ खेलना पड़ रहा था मगर वो मुझसे दूरी बनाये हुए थी|

संगीता अब भी मायूस थी और मैं हिम्मत नहीं हारना चाहता था| मुझे लगा चूँकि हम restaurant में हैं जहाँ हमारे अलावा बहुत से लोग हैं शायद इसलिए संगीता खुल कर अपना प्यार व्यक्त नहीं कर रही है| मैंने सोचा की theatre के अंदर अँधेरा होगा और वहाँ संगीता मुझसे अपना प्यार व्यक्त करने में नहीं शर्माएगी| खाना खा कर हम चारों theatre पहुँचे और अपनी-अपनी seats पर बैठ गए| मैं और संगीता साथ बैठे तथा दोनों बच्चे मेरी बगल में बैठे थे| Ads चल रहीं थीं और दोनों बच्चों ने अपनी मस्ती शुरू कर दी थी, जबकि मेरा ध्यान संगीता पर था| मैं उम्मीद कर रहा था की वो अब मेरा हाथ पकड़ेगी, अब मेरे कँधे पर हाथ रखेगी…लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ| संगीता हाथ बाँधे हुए परदे पर ads देखने में व्यस्त थी! मैंने सोचा की क्यों न मैं ही पहल करूँ और शायद संगीता पिघल जाए इसलिए मैंने अपना हाथ संगीता के पीछे से ले जाते हुए कँधे पर रख दिया और उम्मीद करने लगा की शायद संगीता मेरी ओर झुक जाए, मुझसे कस कर लिपट जाए...लेकिन नहीं! संगीता बिना हिले-डुले, बिना मेरी ओर देखे चुप-चाप बैठी रही! मैंने भी हताश हो कर अपना हाथ संगीता के कँधे पर से हटा लिया और चुप-चाप बैठ गया|

इनके साथ आज पिक्चर देखते हुए मेरे जहन में पुरानी यादें ताज़ा हो गईं! पुरानी यादों से मेरा मतलब ये नहीं था की आज हम दोनों बहुत सालों बाद पिक्चर देखने आये थे बल्कि मुझे वो दिन याद आने लगे थे जब पिक्चर देखते समय मैं romantic हो जाया करती थी और इनके कन्धों पर अपना सर रख कर पिक्चर देखा करती थी| लेकिन आज जब मैं पिक्चर देखते समय इनसे दूर बैठी हूँ तो मुझे बहुत दुःख हो रहा था| मैं इनका प्यार महसूस कर पा रही थी मगर मैं इनका प्यार reciprocate नहीं कर पा रही थी| जब इन्होने मेरे कंधे पर हाथ रखा था वो इनका एक इशारा था की मैं इनमें सिमट जाऊँ पर मैं अब भी डरी हुई थी की कहीं ये मेरा मन न पढ़ लें तथा उदास न हो जाएँ इसीलिए मैं इनसे दूरी बनाये हुए थी...emotionally and physically! And believe me when I say, it was not easy to stay away from my own husband who I love so much! इनके लिए आज तक मेरा प्यार कभी कम नहीं हुआ लेकिन उस समय मैं अपना प्यार जता नहीं पा रही थी और जानबूझ कर बिना किसी गलती के इन्हें सज़ा दे रही थी!

उनके साथ इस तरह पिक्चर के लिए बैठे हुए पुरानी यादें ताजा होने लगीं| पुरानी यादों से मेरा मतलब ये नहीं की बहुत साल बाद हम पिक्चर देखने आये थे...पर वो एहसास याद आया जब मैं इनके साथ पिक्चर देखने आया करती थी और हमेशा इनके कन्धों पे सर रख के पिक्चर enjoy किया करती थी| आज जब मैं इनसे दूर बैठ रही हूँ तो मुझे बहुत बुरा लग रहा था| इनका मेरे कंधे पे हाथ रखना इशारा था की मैं इनमें सिमट जाऊँ पर ......दर रही थी की कहीं ये मेरा मन पढ़ लेंगे तो depressed हो जायेंगे| इसलिए मैं इनसे दूर रही! और believe me when I say it was not easy! इनके लिए मेरे मन में प्यार कम नहीं हुआ था पर मैं उसे जतानहीं पा रही थी| बिना किसी गलती के उनको सजा दे रही थी!

हमने पिक्चर देखी, पता नहीं बच्चों को दुबारा वही पिक्चर देखना अच्छा लगा या नहीं मगर वो खुश बहुत थे! चलो हम दोनों मियाँ-बीवी न सही बच्चे तो खुश थे! घर लौटते समय, गाडी में आगे बैठने के लिए दोनों भाई-बहन ने आपस में साँठ-गाँठ कर ली थी| नेहा आगे बैठी थी और आयुष पीछे बैठा था, लेकिन पीछे बैठकर भी उसे चैन नहीं था| दोनों बच्चों ने गाडी में उधम मचा रखा था मगर संगीता एकदम खामोश बैठी थी और खिड़की से बाहर देख रही थी|

घर पहुँच कर मैंने अपनी चाभी से दरवाजा खोला तो देखा की माँ-पिताजी दोनों जाग रहे हैं और बैठक में बैठे टी.वी. देख रहे हैं|

मैं: माँ...पिताजी...आप सोये नहीं?

मैंने तो आस्चर्यचकित होते हुए पुछा क्योंकि घडी में सवा ग्यारह होने को आये थे और माँ-पिताजी इतनी देर तक जागते नहीं थे|

पिताजी: नहीं बेटा, तेरी माँ को CID देखना था तो मैंने सोचा की आज मैं भी देखूँ की ACP प्रद्युमन ‘कुछ तो गड़बड़ है’ कैसे बोलता है? पर देखो सीरियल खत्म होने को आया पर अभी तक इसने कुछ भी नहीं कहा?!

पिताजी हँसते हुए बोले| उनकी बात सुन माँ और बच्चे हँस पड़े मगर हम दोनों मियाँ-बीवी के भाव जस के तस थे!

मैं: चलिए, अब सब सो जाते हैं|

मैंने बात बदलते हुए कहा|

आयुष: पापा जी, मैं आपके पास सोऊँगा|

आयुष उत्साह से कूदते हुए बोला|

मैं: हम्म्म्म!

मैंने नक़ली मुस्कान लिए हुए कहा|

पिताजी: क्यों भई, आज दादा की कहानी नहीं सुननी?

पिताजी मुस्कुराते हुए आयुष से बोले|

आयुष: दादा जी कहानी मैं कल सुनुँगा और वो भी दो!

आयुष तपाक से बोला|

पिताजी: पर बेटा आपको सोने के लिए जगह कम पड़ेगी?

पिताजी आयुष को प्यार से समझाते हुए बोले|

मैं: कोई बात नहीं पिताजी, हो जाएगा|

मैंने फिर नकली मुस्कान लिए हुए कहा|

पिताजी: कल carpenter को बुला के तेरा पलंग बड़ा करवा देते हैं! हा..हा..हा...हा!!!

पिताजी मज़ाक करते हुए बोले मगर मेरे चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं आई|

मैं: जी!

मैंने दोनों बच्चों को अपने कमरे की ओर मोड़ते हुए कहा|



माँ-पिताजी को शुभरात्रि बोल हम चारों कपड़े बदल कर रजाई में घुस गए| आयुष और नेहा ने बिस्तर के बीचों-बीच अपना कब्जा जमा लिया था, आयुष मेरी तरफ लेटा था तथा नेहा अपनी मम्मी की तरफ लेटी थी लेकिन दोनों बच्चों ने मेरी ओर करवट की हुई थी| मैंने भी बच्चों की ओर करवट की मगर संगीता नजाने क्यों दूसरी ओर करवट कर के लेटी थी?

बच्चों ने कहानी सुनने की माँग की और कहानी सुनते-सुनते दोनों बच्चे मुझसे लिपट कर सो चुके थे, परन्तु मेरी नींद उड़ चुकी थी! मैं चाहता था की बच्चे आराम से सो जाएँ इसलिए मैं बच्चों की पीठ थपथपा रहा था|



भले ही संगीता दूसरी ओर मुँह कर के लेटी थी और मेरे हाथों की पहुँच से दूर थी मगर मेरा मन चाह रहा था की वो चैन से सो जाए| उस समय मेरे दिमाग में एक गाना आ रहा था;

'राम करे ऐसा हो जाये...

मेरी नींदिया तोहे मिल जाये

मैं जागूँ तू सो जाए....

मैं जागूँ तू सो जाये!!!'

दो घंटे बाद मेरे मन में गाये इस गाने का असर हुआ, मैं दबे पाँव ये देखने के लिए उठा की संगीता जाग रही है या सो रही है तो मैंने पाया की संगीता इत्मीनान से सो रही है और उसे यूँ इत्मीनान से सोते देख मेरे दिल को बहुत सुकून मिला| मैं जहाँ खड़ा था वहीं दिवार से टेक लगा कर संगीता को सोते हुए निहारने लगा| सोते हुए संगीता इतनी प्यारी लग रही थी की मन किया उसके गुलाबी होठों को चूम लूँ! लेकिन फिर मैंने खुद को रोक लिया क्योंकि मैं संगीता की नींद नहीं तोडना चाहता था! सोते हुए संगीता के मस्तक पर जो सुकून था, यही सुकून मैं हमेशा उसके चेहरे पर देखना चाहता था| "ऐ खुदा, मैंने कुछ ज्यादा तो नहीं माँगा था तुझसे?" मैं मन ही मन भगवान से संगीता की ख़ुशी माँगने लगा|

उधर आयुष की नींद कच्ची हो गई थी और वो बिस्तर पर अपने हाथ फेर कर मुझे टटोलने लगा था| मैं पुनः अपनी जगह लेट गया और आयुष के सर पर हाथ फेर कर उसे चैन की नींद सुला दिया| आधे घंटे बाद आयुष चैन से सो चूका था मगर मुझे एक पल को नींद नहीं आई| मेरा मन बार-बार यही कह रहा था की मैं कैसा पति हूँ जो अपनी पत्नी का ख्याल नहीं रख सकता? मैं ऐसा क्या करूँ की संगीता के मन से डर हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाए? 'धिक्कार है तुझ पर!' मेरी अंतरात्मा चीखते हुए बोली| मन में ग्लानि भरने लगी थी और इस ग्लानि ने मुझे खुद को दंड देने के लिए मजबूर कर दिया!



मैं टी-शर्ट और पजामा पहने सोता था और इन्हीं कपड़ों में मैं ऊपर छत पर आ गया| जनवरी का महीना था, सर्दी का मौसम था उस पर मैं इतने कम कपड़ों में मैं छत पर खड़ा था| ठंडी-ठंडी हवा जब बदन को छूती तो ऐसा लगता मानो किसी ने गर्म-गर्म गाल पर खींच कर ठंडे हाथों से तमाचा मारा हो! हाथ बाँधे हुए, ठंडी हवा के थपेड़े झेलते हुए मैं चुपचाप खड़ा अपनी छत से दूर घरों को देख रहा था| मेरे जिस्म के भीतर जितनी गर्मी थी वो मुँह से धुआँ बन कर निकल रही थी| उस समय मेरे लिए खुद को ये सजा देने का तरीका सही लग रहा था, मेरा मन बार-बार कह रहा था; 'you deserve this'! मेरे मन के भीतर और बाहर आसमान में घना कोहरा छाया हुआ था| दस मिनट हुए नहीं थे की मेरी कँप-कँपी छूटने लगी थी और मेरी हालत खराब होने लगी थी! तभी मुझे किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी, मैंने फ़ौरन पलट कर देखा तो पता चला की कोई नहीं है! मुझे डर लग रहा था की कहीं कोई चोर तो पड़ोसियों की छत पार कर के मेरे घर में घुस तो नहीं गया? मैं फ़ौरन दबे पाँव नीचे आया और सारा घर छान मारा पर मुझे कोई नहीं मिला! मैंने रहत की साँस ली और सोचने लगा की ये जर्रूर मेरा वहम होगा! मैं अपने कमरे में लौट आया और इधर से उधर चक्कर काटने लगा, इतने में आयुष फिर से पलंग पर मेरी मौजूदगी टटोलने लगा, मैं दुबारा अपनी जगह लेट गया और आयुष की पीठ थपथपाते हुए उसे सुला दिया| धीरे-धीरे आयुष भी नेहा की तरह मेरे जिस्म की गर्मी को महसूस करने के लिए व्यकुल रहता था, उसे भी अब नेहा की तरह मेरा सारा प्यार चाहिए था!

कुछ देर बाद आयुष की नींद टूट गई और वो जागते हुए बोला;

आयुष: पापा जी...बाथरूम...जाना है!

आयुष आधी नींद में बोला| मैंने आयुष को गोदी लिया और bathroom ले गया| मैंने आयुष को bathroom के बाहर छोड़ा, जब आयुष bathroom से निकला तो मैं उसे गोदी में ले कर वापस पलंग पर आ गया| इतने में नेहा जाग गई और पलंग पर खड़ी हो गई क्योंकि उसे भी bathroom जाना था| मैंने नेहा को गोदी में लिया और bathroom के बाहर तक छोड़ा| अंत में मैं नेहा को भी गोदी में ले कर पलंग पर लौट आया| नेहा तो लेट गई मगर आयुष उठ कर बैठ गया, मेरे लेटते ही आयुष आ कर मेरी छाती पर चढ़ गया और मेरे सीने पर सर रख कर मुझसे लिपट गया| नेहा ने भी मेरी ओर करवट ली और मुझसे लिपट गई| दोनों बच्चों ने मुझे कस कर जकड़ लिया था, ऐसा लगता था मानो मेरे दोनों बच्चे मेरे दिल में उठी बेचैनी महसूस कर रहे थे, मानो जैसे वो जानते थे की मैं खुद को सज़ा दे रहा हूँ!



मैंने दोनों बच्चों को अपनी बाहों में जकड़ लिया और दोनों के सर चूमने लगा| तभी मुझे संगीता की चूड़ियों की खनक सुनाई दी, मुझे लगा की वो जाग रही है;

मैं: सोये नहीं?

मैंने संगीता की तरफ देखते हुए पुछा| संगीता अब भी मेरी ओर पीठ किये हुए थी और बिना मेरी ओर देखे ही बोली;

संगीता: आप भी तो नहीं सोये?

संगीता उखड़ी हुई आवाज में बोली| मेरे सवाल का जवाब देने की बजाए संगीता ने मुझसे सवाल पूछा था, दरअसल वो बस मुझसे बात न करने का बहाना बना रही थी| खैर, मैंने जानकर संगीता के सवाल का कोई जवाब नहीं दिया| मुझे लगा था की शायद मेरे जवाब न देने से संगीता थोड़ी नरम पड़ जाए और मेरे नजदीक खिसक आये!

संगीता ने पलट कर मुझे देखा, उसने मेरी मनोदशा देख और पढ़ ली थी मगर बजाए मेरे नजदीक खिसक आने के वो आयुष को समझाने लगी;

संगीता: आयुष, बेटा पापा को आराम से सोने दो, क्यों तंग करते हो?!

आयुष पर अपनी मम्मी की बात का कोई असर नहीं पड़ा और वो बड़े तपाक से बोला;

आयुष: नहीं मम्मी, मैं तो यहीं सोऊँगा|

आयुष की न सुन संगीता उसे घूर कर देखने लगी, अब मुझे आयुष का बचाव करना था;

मैं: सोने दो, खुद तो नजदीक आती नहीं और अब बच्चों को भी मेरे नजदीक नहीं आने दे रही हो?

मैंने प्यार से संगीता को ताना मारते हुए कहा| संगीता मेरा मतलब समझ गई और मैं एक बार फिर उम्मीद करने लगा की वो अब आकर मेरे से लिपट जाएगी पर ऐसा नहीं हुआ! संगीता ने फिर से मेरी ओर पीठ कर के करवट ली और सोने लगी|

मुझे चिंता हो रही थी की संगीता सोइ है या नहीं मगर मैं ये देखने के लिए उठ नहीं सकता था क्योंकि दोनों बच्चों ने मुझे जकड़ रखा था! बच्चों की पीठ थपथपाते हुए और बार-बार बच्चों को चूमते हुए में जागता रहा!



आज 4 तरीक थी और जो company वाला ठेका हमने (मैंने और पिताजी) ने उठाया था वो कल रात संतोष की देखरेख में पूरा हो चूका था और वो भी हमारे सोचे गए समय से एक दिन पहले! आज ठंड बहुत ज्यादा थी इसलिए पिताजी की हिदायत थी की सुबह सब अपने कमरे में रहें क्योंकि बाहर बैठक में बहुत ज्यादा ठंड थी| बच्चों ने माँ-पिताजी के कमरे में अपने खिलौनों से खेलना शुरू कर दिया और अपनी प्यारी-प्यारी बातों में अपने दादा-दादी जी का मन लगा लिया था| पिताजी की तबियत थोड़ी नासाज़ थी इसलिए माँ पिताजी के पास थीं| इधर मैं और संगीता अपने कमरे में थे, संगीता कपडे इस्त्री कर रही थी और मैं पलंग पर टेक लगा कर बैठा चाय पी रहा था| तभी मेरे फ़ोन की घंटी बजी, ये call संतोष का था;

मैं: हाँ संतोष बोल?

संतोष का call किस लिए था मैं जानता था और इस वक़्त मैं घर से बाहर नहीं जाना चाहता था इसीलिए मेरी आवाज में थोड़ी सी चिढ थी!

संतोष: Good morning भैया, वो company वाले आज काम देखने आ रहे है, अगर आप आ जाते तो अच्छा होता, आप check भी ले लेते!

संतोष ने आराम से बात की जिससे मुझे मेरी चिढ का एहसास हुआ|

मैं: Sorry यार, मैं नहीं आ पाउँगा| काम तो बढ़िया हो चूका है, तू ही मिल ले और check ले के company account में डाल दे|

मैंने बड़ी हलीमी से बात कही| संगीता ने मेरी बात सुन ली थी और उसे मेरा यूँ काम के प्रति ढीला पढ़ना अच्छा नहीं लग रहा था|

संतोष: जी ठीक है|

जैसे ही मैंने फोन काटा, संगीता ने बिना मेरी तरफ देखे उखड़े स्वर में कहा;

संगीता: कब तक मेरी वजह से अपनी रोज़ी से मुँह मोड़ के बैठे रहोगे?

संगीता की ये बात मुझे बहुत चुभी! ऐसा लगा मानो किसी ने गर्म लोहे की सलाख ने मेरे माँस को जला कर राख कर दिया हो! वो गर्म लोहे की सलाख की जलन मुझसे बर्दाश्त न हुई! यही बात अगर संगीता मुझे प्यार से समझाती तो मैं समझ जाता और मुझे इतना बुरा नहीं लगता लेकिन संगीता के बात करने का लहजा बहुत बुरा था! मैं फटाफट उठा और गुस्से से भरकर कपड़े बदले, फिर मैंने संगीता को सुनाते हुए संतोष से बात की कि मैं आ रहा हूँ| संगीता ने मेरी बात सुनी मगर कुछ नहीं कहा!



सुबह के दस बजे थे और बाहर कोहरा छट चूका था, माँ-पिताजी नाश्ते के लिए dining table पर बैठ चुके थे तथा संगीता ने भी नाश्ते कि तैयारी शुरू कर दी थी|

मैं: पिताजी, मैं company वाले ठेके का check लेने जा रहा हूँ|

मुझे तैयार देख पिताजी ने कुछ नहीं कहा और अपना मोबाइल मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले;

पिताजी: अच्छा ये मेरा मोबाइल ले, वो राजू का फ़ोन आया था की आज check ले लेना| अब तू जा ही रहा है तो उससे check लेता आईओ|

मैं: जी ठीक है पर मैं आपके मोबाइल का क्या करूँ?

मैंने पिताजी का फ़ोन ले जाने से मना करते हुए कहा| दरअसल पिताजी का फ़ोन बहुत बजा करता था, उनके दोस्त-मित्र बहुत कॉल करते रहा करते थे और मेरा दिमाग पहले ही हिला हुआ था इसलिए मैं किसी से बात करना नहीं चाहता था|

पिताजी: अरे बेटा, तुझे तो पता है राजू का! न उसके पास तेरा नंबर है, ऊपर से वो फ़ोन कर-कर के मेरी जान खा जाता है| अब मेरी तबियत थोड़ी खराब है, नाश्ता कर के मैं सो जाऊँगा| फ़ोन तेरे पास होगा तो तू उससे अपने आप बात कर लियो|

मैंने पिताजी से फ़ोन ले लिया और नकली मुस्कान लिए बोला;

मैं: जी ठीक है, मैं दोनों check ले कर जमा करा दूँगा|

इतना कह मैं निकलने लगा मगर पिताजी मुझे टोकते हुए बोले;

पिताजी: बेटा, नाश्ता तो कर ले?!

पिताजी की बात सुनते ही संगीता मुझे देखने लगी, उसकी आँखों में मुझे तड़प दिखी मगर उसने मुझे रोकने की कोई कोशिश नहीं की!

मैं: पिताजी गुड़गाँव जाना है, नाश्ता करने बैठा तो देर हो जाएगी!

मैंने बहाना बनाते हुए कहा|

पिताजी: ठीक है बेटा पर गाडी सँभाल कर चलाइओ!

मैं: जी!

मैंने नकली मुस्कान के साथ कहा और घर से निकल गया|



मैं company वाली site पर पहुँचा और मेरी मुलाक़ात company के senior management में director Mr. John से हुई| Conference room समय से पहले और उम्मीद से बढ़िया तैयार हुआ था, Mr. John बहुत खुश हुए और मुझे उन्होंने final payment का check जिसमें 5,000/- रुपये ज्यादा थे खुद दिया! जब मुझे check मिला तो मेरा ध्यान संगीता पर था इसलिए मैं कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दे पाया|

Mr. John: Manu are'nt you happy?

Mr. John अपनी British accent में बोले|

मैं: Oh...I’m sorry sir! Actually, I was thinking something!

मैंने नकली मुस्कान लिए हुए कहा|

Mr. John: Oh really, what were you thinking?

Mr. John हँसते हुए बोले|

मैं: That when’s the next time we’ll get a contract from you?

मैंने अपनी बात सँभालते हुए कहा और नकली हँसी हँसने लगा, उधर Mr. John ने भी हँसते हुए बात टाल दी|



Check लेने के बाद मैंने मैंने बहुत सोचा, कल रात से ही मैं हार मान चूका था मगर मेरा मन मुझे हार नहीं मानने दे रहा था! 'मैं हार नहीं मानने वाला! Hell, I'm gonna confront her today! HELL YEAH!!! TEAM MANU GO FOR IT!!!!' मेरा मन उत्साह से बौराते हुए बोला| ये उत्साह इसलिए था क्योंकि मेरा मन कह रहा था की संगीता का सामना कर मैं उसे समझा सकता हूँ?!

मेरा दिमाग खराब हो चूका था और काम करना बंद कर चूका था! मेरा अंतर्मन मुझे गाली दिए जा रहा था क मैं मैं किसी गलती के अपने पति को सजा दिए जा रही थी! मुझे खुद पर कोफ़्त हो रही थी, खुद से घिन्न आ रही थी की मैं सब कुछ जानते-बूझते इनके साथ ऐसे पेश आ रही हूँ जैसे की ये कोई अनजान आदमी हो! अरे कोई किसी अनजान आदमी से भी ऐसे पेश नहीं आता जैसे मैं इनके साथ बर्ताव कर रही थी! ये मुझे इतना चाहते हैं, इतना प्यार करते हैं, मुझे हँसाने के लिए, मुझे मनाने के लिए, मेरी ख़ुशी के लिए इतना सब कुछ करते हैं और वो भी सिर्फ इसलिए नहीं की मैं माँ बनने वाली हूँ बल्कि इसलिए क्योंकि इनका दिल बस मेरे लिए ही धड़कता है! सीधे शब्दों में कहूँ तो मुझे इनकी कोई कदर ही नहीं!

लेकिन वाक़ई में क्या मैं ऐसी हूँ? या इन बीते कुछ दिनों के हालातों ने मुझे ऐसा बना दिया है? मुझे आज अपनी कोई सफाई नहीं देनी क्योंकि इस सब के लिए मैं ही जिम्मेदार हूँ! मैंने खुद को अलग-थलग कर लिया था, मुझे किसी से भी कुछ कहने का मन नहीं था| शायद इसीलिए मैंने अपने पिताजी को फ़ोन कर के यहाँ आने से मना किया था|



इस वक़्त मुझे मेरे किये इनपर सभी अत्याचार एक-एक कर याद आ रहे थे;

  • चार साल पहले का मेरा इनसे दूर रहने का फैसला और पिछले 48 घंटों से जो मैं इनका तिरस्कार कर रही थी इसके लिए मैं कभी खुद को माफ़ नहीं कर सकती! कभी नहीं!
  • मेरे इस उखड़े बर्ताव के कारन आज ये बिना कुछ खाये, घर से खाली पेट चले गए और अभी दो बजने को आ रहे हैं लेकिन इनका कोई अता-पता नहीं| मैं जानती हूँ की मेरे इस रूखे बर्ताव के कारण इन्होने अभी तक कुछ खाया भी नहीं होगा|
  • कल रात भी मेरे इसी उखड़ेपन के कारण ये सर्दी में छत पर खड़े थे और मुझे कभी पता न चलता अगर मैं इन्हें ढूँढती हुई ऊपर छत पर न जाती तथा इन्हें सिगरेट पीते हुए न देखती! मेरे ही कारण इन्हें सिगरेट पीने की लत पड़ चुकी थी, पहले मैंने इन्हें खुद से दूर कर शराब पीने की लत लगाई थी और अब इनसे बात न कर के, अपना प्यार व्यक्त न कर के सिगरेट की भी लत लगा दी थी! कैसी पत्नी हूँ मैं?!
  • इनके भीतर मैंने खुद को सजा देने की भावना महसूस की थी मगर सब कुछ जानते हुए भी मैं पत्थर बनी हुई इन्हें ठंड में ठिठुरता हुआ देख रही थी! उस वक़्त मैं खुद को बेबस और लाचार महसूस कर रही थी!
  • इस सब की कसूरवार, बस मैं थी! बस खुद को दोष देने के अलावा मैं कुछ नहीं कर सकती थी|


मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी हिम्मत इकठा की और फैसला किया की मैं इन्हें फ़ोन कर सबसे पहले इनसे माफ़ी माँग लूँ और इन्हें कुछ खाने के लिए अपनी कसम से बाँध दूँ मगर एक पापी इंसान की खुदा भी नहीं सुनता इसलिए मेरे लगातार 5 बार फ़ोन मिलाने पर भी इन्होने फ़ोन नहीं उठाया! इस वक़्त मेरा मन घबराने लगा था, मुझे डर लग रहा था की कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया?!

{QUOTE} मेरा दिमाग खराब हो चूका था.....काम ही नहीं कर रहा था| बिना किसी गलती के उनको सजा दिए जा रही थी| खुद से घिन्न आ रही थी..... एक ऐसा इंसान जो मुझे इतना चाहता है.....मैं उसके साथ ऐसा पेश आ रही थी की जैसे वो कोई ......stranger हो..... अरे कोई ऐसे Stranger से भी पेश नहीं आता...एक इंसान जो आपको प्यार करता हो....आपको हँसाने के लिए....आपके दिल को खुश करने के लिए.....और सिर्फ इसलिए नहीं की मैं प्रेग्नेंट हूँ बल्कि इसलिए क्योंकि वो मुझे प्यार करते हैं| सीधे शब्दों में कहें तो "मुझे उनकी कदर ही नहीं थी|" पर वाकई में क्या मैं ऐसी ही हूँ? या हालात ने मुझे ऐसा बना दिया? मैं अपनी सफाई में कुछ नहीं कहूँगी क्योंकि मैं खुद को GUILTY मानती हूँ| आठ साल पीला का मेरा इनसे दूर रहने का फैसला और पिछले 48 घंटों से जो मैं इनके साथ कर रही थी ये....इससब के लिए मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर सकती| मेरे इस बर्ताव के कारन ये बिना नाश्ता खाए घर से चले गए और अभी दो बजने को आ रहे थे पर इनका कोई पता नहीं था.और जहाँ तक मैं जानती हूँ इन्होने मेरी वजह से दोपहाक का lunch भी नहीं खाया होगा| कल रात भी ये छत पे cigarette पीने गए थे और ठण्ड में खड़े रह कर खुद को सजा दे रहे थे| सबकुछ जानते हुए भी मैं पत्थर की तरह कड़ी उन्हें ठण्ड में ठिठुरता देख रही थी...बेबस और लाचार......मेरे कारन इन्हें cigarette की लत पद चुकी थी और ये सब मेरी वजह से ...सिर्फ और सिर्फ मेरी वजह से! मैंने फोन उठाया और इनको मिलाया की कम से कम SORRY बोल दूँ और उन्हें कुछ खाने को बोल दूँ| पर लगातार 5 बार फ़ोन मिलाने पर भी इन्होने फोन नहीं उठाया! मन घबराने लगा की कहीं कुछ गलत तो नहीं होगया? {/QUOTE}


दोनों पार्टियों से check ले कर मैं bank में जमा कर रहा था जब संगीता के call आने लगे, मैं चूँकि बैंक के भीतर था इसलिए मैं उसका फ़ोन नहीं उठा सकता था| Check जमा कर जैसे ही मैं bank से बाहर निकला की तभी पिताजी के फ़ोन पर call आया| मैंने बिना देखे फ़ोन उठाया ही था की एक भारी भरकम आवाज मेरे कानों में पड़ी, ये आवाज जानी-पहचानी थी;

बड़के दादा: हेल्लो!

बड़के दादा की भारी-भरकम आवाज सुन मैं दंग रह गया!

मैं: पाँयलागी दादा!

मेरी आवाज सुन बड़के दादा एक पल के लिए खामोश हुए, फिर उन्होंने सीधे मुद्दे की बात की;

बड़के दादा: तोहार पिताजी कहाँ हैं?

बड़के दादा ने कड़क आवाज में पुछा|

मैं: जी वो घर पर हैं और मैं bank आया हूँ|

मैंने सादी सी आवाज में जवाब दिया|

बड़के दादा: कलिहाँ हम पंचायत बैठाये हन और तू दुनो जन का आयेक है!

बस इतना कह बड़के दादा ने फ़ोन काट दिया|

अब ये तो मैं जानता ही था की ये पंचायत क्यों बिठाई गई है मगर मैं इस सब में पिताजी को नहीं खींचना चाहता था| पंचायत में जा कर छीछालेदर होना था और मैं अपनी पिताजी की बेइज्जती नहीं होने देना चाहता था इसलिए मैंने झूठ बोलने की सोची| पिताजी वाली site पर architect के साथ मेरी meeting थी इसलिए मैं सीधा site पर पहुँचा| चूँकि मैं संगीता का फ़ोन नहीं उठा रहा था इसलिए उसने माँ का सहारा लिया और मुझे फ़ोन करके खाने पर आने को कहा| मैंने busy होने का बहाना बनाया और काम में व्यस्त हो गया|

शाम 5 बजे मैं घर पहुँचा और गाँव में पंचायत वाली बात सभी से छुपाई| मैंने अपनी चपलता दिखाते हुए झूठा बहाना बनाया;

मैं: पिताजी, मुझे कल कानपुर जाना है|

मैंने सोफे पर बैठते हुए अपनी बात शुरू की|

पिताजी: कानपुर? पर किस लिए बेटा?

मैं: मेरा एक दोस्त है उसने मुझे एक ठेके के बारे में बताया है, उसी के सिलसिले में मैं जा रहा हूँ|

मैंने अपने झूठ को पुख्ता करते हुए कहा|

पिताजी: दोस्त?

पिताजी मुझे भोयें सिकोड़ कर देखते हुए बोले|

पिताजी: लेकिन बेटा, बहु को इस हालत में छोड़ कर तू जाने की कैसे सोच सकता है?

पिताजी के सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था इसलिए मैं खामोश हो गया और कोई बहाना सोचने लगा|

पिताजी: ऐसा कर बच्चों को हम (माँ-पिताजी) सँभाल लेंगे और तुम दोनों (मैं और संगीता) कानपुर हो आओ|

पिताजी की बात सही थी मगर मेरे झूठ के तहत संगीता को साथ ले जाना नामुमकिन था|

मैं: नहीं पिताजी, बच्चे नहीं मानेंगे और संगीता भी नहीं मानेगी| फिर मुझे तो बस एक दिन का काम है, कल रात तक मैं वापस आ जाऊँगा|

बच्चे हमारे (मेरे और संगीता के) अकेले जाने के लिए कभी नहीं मानते, हाँ मैंने संगीता के जाने से मना कर देने की बात झूठ कही थी क्योंकि मैं जानता था की वो शायद मान जाती|

पिताजी: जैसा तुझे ठीक लगे बेटा, लेकिन अगर बहु को साथ ले जाता तो उसका मन बहल जाता|

पिताजी ने आखरी कोशिश करते हुए कहा|

मैं: फिर कभी अच्छी जगह चले जाएँगे पिताजी|

मैंने नकली मुस्कान के साथ कहा|

इनकी वो नकली मुस्कान मैं पढ़ चुकी थी, भले ही माँ-पिताजी कुछ न समझ पाएँ हों पर मैं तो इनकी अर्धांग्नी हूँ, मैं तो इनके दिल के दर्द को साफ़ महसूस कर सकती हूँ! 'ये सब मेरी वजह से हो रहा है, मेरी ही वजह से ये घर से दूर जा रहे हैं! मैंने खुद को इस कदर अलग-थलग कर लिया की इनका मन उचाट हो गया है! मेरी कड़वी बातों को इन्होने अपने दिल से लगा लिया है! मुझे इनसे माफ़ी माँगनी होगी मगर पहले मैं इन्हें कुछ खिला दूँ क्योंकि सुबह से अभी तक इन्होने कुछ खाया नहीं होगा!' ये सब सोचते हुए मेरे मन फिर से ग्लानि भरने लगी थी|

मैंने फटाफट परांठें सेंके और प्लेट में परोस कर कमरे में पहुँची| ये उस समय दरवाजे की ओर पीठ कर के अपने कपड़े बदल रहे थे, मैंने खाने की प्लेट टेबल पर रखी जिससे ये पलट कर मेरी ओर देखने लगे| इनसे नजरें मिलते ही मेरी हिम्मत जवाब दे गई, मन बुज़दिल हो चला था मगर मुझे माफ़ी तो माँगनी ही थी इसलिए मन ने मुझे इनसे गले लग कर दिल ही दिल अपनी माफ़ी माँगने की बात कही लेकिन अभी भी कोई अदृश्य शक्ति थी जो मुझे इनके नजदीक जाने से रोक रही थी| मैंने एक बार फिर हिम्मत बटोरी लेकिन मैं कुछ कुछ कह पाती उससे पहले ही मुझे महसूस हुआ की ये कुछ कहना चाहते हैं| मेरे डरे हुए मन के लिए ये मौका एक बहाने के समान था जो मुझे बोलने नहीं दे रहा था| मैं इतनी क्रूर नहीं थी, दिल में इनके लिए बैठे प्यार ने गुहार लगाई और मुझे गलत रास्ते पर भटकने नहीं दिया| मुझे इन्हें और low feel नहीं कराना था इसीलिए मुझे आज कैसे भी इनसे माफ़ी माँगनी थी!

ये सब मेरी वजह से हो रहा था....मेरी वजह से वो दूर जा रहे थे| मेरी बात को इन्होने इतना serious ले लिया? मुझे इनसे माफ़ी मांगनी ही होगी पर पहले इन्हें कुछ खिला तो दूँ| मैंने फटाफट परांठे सेंके और कमरे में ले आई| मैंने प्लेट टेबल पे रखी, ये उस समय अपने कपडे change कर रहे थे| मन तो किया की जाके इनके गले लग जाऊं पर नजाने वो क्या चीज थी जो मुझे इनके पास जाने से रोक रही थी| इससे पहले की मैं कुछ बोलती या हिम्मत जूता पाती इन्होने मेरी आँखों में देखा और मुझे लगा की अब ये कुछ न कुछ कहेंगे? मैंने सोच लिया की मैं इन्हें और LOW feel नहीं करवाउंगी और आज कैसे भी माफ़ी जरूर माँग लूँगी|

मैं: बैठो|

मैंने संगीता को पलंग पर बैठने का इशारा करते हुए कहा| उसकी आँखों में मैं ग्लानि देख रहा था और मुझे वो ग्लानि चुभ रही थी!

संगीता: आप पहले कुछ खा लो, सुबह से आपने कुछ नहीं खाया!!!

संगीता की बात में मेरे लिए चिंता झलक रही थी, परन्तु मुझे इस वक़्त संगीता का सामना करना था;

मैं: वो बाद में, पहले तुम बैठो मुझे तुमसे कुछ बात करनी है|

मैंने जबरदस्ती संगीता का हाथ पकड़ा और उसे अपने सामने बिठाया तथा मैं कुर्सी ले कर संगीता के सामने बैठ गया| मैं उस वक़्त संगीता से ये सब कहना चाहता था;

‘जान, तुम्हें क्या हो गया है? क्यों तुम मुझसे ऐसे पेश आ रही हो जैसे तुम मुझसे प्यार नहीं करती? क्यों मुझसे तुम किसी अनजान आदमी की तरह पेश आ रही हो? मैं जानता हूँ की तुम आयुष को ले कर डरी हुई हो लेकिन अगर तुमने मेरे प्रति अपना प्यार व्यक्त करना बंद कर दिया तो मैं तुमसे वादा करता हूँ की मैं उस हरामजादे को (चन्दर) जान से मार दूँगा!

मैंने आज तक तुमसे कुछ नहीं माँगा मगर आज मैं तुमसे कुछ माँगना चाहता हूँ| मुझे नहीं पता की तुम ये सब कैसे करोगी मगर मुझे मेरी पुरानी संगीता वापस चाहिए! मुझे बस मुझसे प्यार करने वाली संगीता वापस चाहिए! मुझे किसी की कोई परवाह नहीं, मुझे बस तुम्हारी परवाह है और अगर मुझे मेरी पुरानी वाली संगीता नहीं मिली तो तुम मुझे खो दोगी...हमेशा-हमेशा के लिए!’

मेरा मन ये सब बातें संगीता से कहना चाहता था, परन्तु मैंने ये बातें संगीता से नहीं कही क्योंकि आज मेरे खाना न खाने से उसे तकलीफ हुई थी! वैसे पति के खाना न खाने पर पत्नी को तकलीफ होना वाज़िब बात थी मगर मेरे लिए ये पिछले 48 घंटों में एक नई उपलब्धि के समान थी| संगीता ने अपने प्यार को मेरे प्रति व्यक्त करने से रोका हुआ था ऐसे में उसे अभी तकलीफ होना मेरे लिए एक शुभ संकेत था| मेरा मन कह रहा था की जब संगीता को मेरी इतनी चिंता होने लगी है तो जल्द ही मेरी पुरानी संगीता वापस आ जाएगी, बेकार में अगर मैंने उसके साथ अपनी बातों से कोई जबरदस्ती की तो कहीं बात न बिगड़ जाए?! इस वक़्त मैं संगीता के साथ बिलकुल नई शुरुआत करने को तैयार था इसीलिए मैं खामोश रहा!

ये मुझे बस टकटकी बाँधे देख रहे थे, मुझे लगा की ये कुछ कहेंगे परन्तु ये खामोश रहे| अपने पति की ये ख़ामोशी देख मेरा मन अंदर से कचोटने लगा था, मेरे ही कारन आज ये इस तरह चुप हो गए थे| ये दृश्य देख मेरे भीतर इनसे प्यार करने वाली संगीता ने आज साँस ली, मेरे मन में जो इनके प्रति चिंता थी आज वो बाहर आ ही गई| मैंने हिम्मत कर के प्लेट उठाई और एक कौर इन्हें खिलाया, इन्होने भी बड़े प्यार से कौर खाया| इनको अपने हाथ से खाना खिला कर दिल में प्रसन्नत्ता भरने लगी और मैंने बड़ी हिम्मत कर के इनसे पूछ लिया; "मैं...भी...कानपुर...चलूँ?" मेरा कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं था, मैं तो बस इनकी ख़ुशी के लिए जाना चाहती थी| मेरा सवाल सुन ये धीमे से मुस्कुराये और बोले; "जान, मैं बस एक दिन के लिए ही जा रहा हूँ| एक दिन में तुम वहाँ कुछ भी नहीं देख पाओगी, वापस आ कर मैं कहीं घूमने जाने का plan बनाता हूँ फिर हम दोनों कहीं अच्छी जगह घूम कर आएंगे| Okay?" इनकी मुस्कान देख मैंने रहत की साँस ली की ये मुझसे नाराज नहीं हैं| मन में भरी ग्लानि जाती रही और इनसे माफ़ी माँगने की हिम्मत जवाब दे गई, बड़ी मुश्किल से मैंने मुस्कुराते हुए "हम्म" कह बात खत्म की|

मेरे अंदर जो दबी हुई संगीता थी...वो संगीता जो उन्हें प्यार करती थी....आज उसने फिर से साँस ली| मेरे मन में उनके लिए जो चिंता थी वो आज बाहर आई पर मुझे लगा था की ये कुछ कहेंगे ...पर ये तो चुप हो गए? मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैंने ही पूछा; "क्या हुआ? क्या बात करनी है?" तो ये कुछ नहीं बोले ...अब तो मन और कचोटने लगा की मेरी वजह से ये इतना upset हैं! मैंने फिर से हिम्मत की और सबसे पहले परांठे वाली प्लेट उठाई और इन्हें एक कौर खिलाया और इन्होने भी बिना किसी हिचकिचाट के खा लिया और तब मैंने बात आगे बढ़ाई; "मैं भी चलूँ कानपुर?" इन्होने मुस्कुराते हुए कहा; "जान....मैं बस एक दिन के लिए जा रहा हूँ| एक दिन में वहाँ कुछ नहीं देख पाओगी| मैं जल्दी कोई घूमने का प्लान बनाउँगा और फिर हम एक साथ जायेंगे| okay?" बहुत ताकत लगी मुझे "मुस्कुराने में" और मैंने; "हम्म……" कहा|

मैंने संगीता के मेरे साथ कानपुर जाने की बात हँस कर टाल दी, शायद संगीता को बुरा लगा हो मगर मैं उसे अपने साथ नहीं ले जा सकता था| मुझे एक बात की ख़ुशी थी और वो ये की संगीता के जिस प्यार को मैं महसूस करना चाहता था वो आज मुझे महसूस हुआ था क्योंकि संगीता मुझे आज बड़े प्यार से अपने हाथों से खाना खिला रही थी| मैं जानता था की संगीता ने भी अभी तक कुछ नहीं खाया होगा इसलिए मैंने भी उसे बड़े प्यार से अपने हाथों से खाना खिलाया| वैसे एक बात तो है, संगीता के हाथ से आज खाना खाने में आज अलग ही मज़ा आ रहा था!

थोड़ी देर में बच्चे उठ गए और मुझे ढूँढ़ते हुए, फुदकते हुए कमरे में आ गए| दोनों बच्चों ने मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया और ख़ुशी से कहकहाने लगे! नेहा ने मुझे खींच कर बिस्तर पर गिराया और फिर आयुष ने मुझे गुदगुदी करना शुरू कर दिया| मैंने भी दोनों बच्चों को गुदगुदी करना शुरू कर दिया| बच्चों के साथ थोड़ी मस्ती करने के बाद मैंने उन्हें पढ़ने में लगा दिया और मैंने चुपचाप लखनऊ आने-जाने की plane की ticket book कर दी|



बच्चों को मेरे कानपुर जाने का पता चला तो दोनों ने फिर मुझे घेर लिया;

मैं: बेटा मुझे कुछ काम से जाना है और तबतक है न आप दोनों को यहाँ सब का ध्यान रखना है|

बच्चों ने सर हाँ में हिलाया और बड़े गर्व से मेरे द्वारा दी गई जिम्मेदारी ले ली| मेरी flight कल सुबह की थी और रात बच्चों को मेरे साथ गुजारनी थी| खाना खा कर सोते समय दोनों बच्चों ने मुझे कल रात की तरह अपनी बाहों से जकड़ लिया और कहानी सुनते-सुनते सो गए| संगीता आज भी कल रात की ही तरह मुझसे दूर सोई, मुझे बुरा तो लगा मगर उतना नहीं जितना कल लग रहा था| मैं धीरे-धीरे नई शुरुआत करने के लिए राज़ी था|

अगली सुबह घर से निकलते समय नेहा ने अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा थामा और मुझे हिदायत देती हुई बोली;

नेहा: पापा जी, अपना ख्याल रखना| किसी अनजान आदमी से बात मत करना, मुझे कानपूर पहुँच कर फ़ोन करना, lunch में मुझे फ़ोन करना और रात को flight में बैठने से पहले फ़ोन करना और दवाई लेना मत भूलना|

नेहा को मुझे यूँ हिदायतें देता देख माँ मुस्कुराते हुए बोलीं;

माँ: अरे वाह मेरी बिटिया! तू तो बिलकुल मेरी तरह अपने पापा को सीखा-पढ़ा रही है!

माँ ने हँसते हुए कहा और उनकी बात सुन सब हँस पड़े, संगीता भी मुस्कुराना चाह रही थी मगर उसकी ये मुस्कान घुटी हुई थी|

मैं: बेटा, सारी हिदायतें आप ही दोगे या फिर कुछ अपनी मम्मी के लिए भी छोड़ोगे?!

मैंने कुटिल मुस्कान लिए हुए संगीता की ओर देखते हुए कहा|

संगीता: बेटी ने अपनी मम्मी के मन की कह ही दी तो अब क्या मैं दुबारा सारी बातें दोहराऊँ?!

संगीता ने कुटिलता से नकली मुस्कान लिए हुए जवाब दिया| संगीता की कुटिलता देख मैं भी मुस्कुरा दिया और उसे कमरे में जाने का इशारा किया| कमरे में आ कर मैंने संगीता को अपना ख्याल रखने को कहा ओर संगीता ने भी अपना सर हाँ में हिलाते हुए संक्षेप में जवाब दिया|

जारी रहेगा भाग - 5 में...
 

Aakash.

ɪ'ᴍ ᴜꜱᴇᴅ ᴛᴏ ʙᴇ ꜱᴡᴇᴇᴛ ᴀꜱ ꜰᴜᴄᴋ, ɴᴏᴡ ɪᴛ'ꜱ ꜰᴜᴄᴋ & ꜰᴜᴄᴋ
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I understood everything after reading the update but I don't understand what to write in the review, both Manu and Bhabhi Ji are fighting the battle within self, It will take time but everything will be alright, lets see what happens in the panchayat.
As always the update was great, You are writing very well, Now let's see what happens next, Till then waiting for the next part of the story.
Thank You...
🖤🖤🖤
 

Akki ❸❸❸

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छब्बीसवाँ अध्याय: दुखों का ग्रहण
भाग - 4


अब तक पढ़ा:


"माँ हम सब रात का show देखने जाएंगे और आते-आते हमें ग्यारह बज जाएँगे|" मैंने नकली मुस्कान लिए हुए माँ को देखते हुए कहा| माँ ने मेरे चेहरे पर आई नकली मुस्कान को मेरी ख़ुशी मान लिया और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए उठ कर चली गईं| उन्हें तसल्ली थी की मेरा मन अब दुखी नहीं है, जबकि मैं इस वक़्त अब भी इनसे सामना करने से डरी हुई थी क्योंकि इनके नजदीक होते हुए मेरे से अपना प्यार व्यक्त कर पाना मुश्किल हो जाता| ये घर से निकलते ही मुझसे अपना प्यार व्यक्त करते और मुझे सब कुछ जानते-बूझते खामोश रहना था जो की मेरे अनुसार बहुत-बहुत गलत था! फिर मैं ये भी नहीं चाहती थी की ये मेरा मन पढ़ लें क्योंकि मेरा मन पढ़ कर इन्हें मेरे मन की व्यथा समझ आ जाती तथा ये और भी टूट जाते!


अब आगे:


इधर मुझे जो मौका चाहिए था वो मुझे माँ के कारण मिल चूका था| अब बारी थी संगीता का दिल जीतने की, ओह wait संगीता तो पहले से ही मुझसे बहुत प्यार करती है तो दिल जीतने की बात कहाँ से आई?! असल में तब मैं इतना परेशान था की, मैं अपनी ही पत्नी जो पहले ही मुझसे इतना प्यार करती थी उसका दिल जीतने की सोच रहा था! खैर, मैं संगीता के मन में मची हुई उथल-पुथल को महसूस कर पा रहा था| मुझे ये जान कर बहुत दुःख हो रहा था की संगीता क्यों खुद को मेरे सामने व्यक्त नहीं कर रही? मैं उसका पति हूँ कोई गैर नहीं तो मुझसे छुपाना कैसा?



मैंने बच्चों को बाहर पिक्चर देखने और खाना खाने के बारे में बताया तो दोंनो बच्चे बहुत खुश हुए| नेहा ने उत्साह से भरते हुए मुझे अपने कपडे ला कर दिखाने शुरू कर दिए, वो चाहती थी की मैं उसके लिए कपडे पसंद करूँ जो वो आज बाहर जाते समय पहनने वाली थी| मेरी पसंद के कपड़े पहन कर नेहा ख़ुशी से चहक रही थी, वहीं आयुष ने अपने दादाजी के पसंद के कपड़े पहने और मुझे दिखाने आया| उधर संगीता ने माँ-पिताजी को खाना खिलाया और तब जा कर वो चलने के लिए तैयार हुई| हम चारों साढ़े सात बजे के आस-पास, माँ-पिताजी का आशीर्वाद ले कर निकले| अब बच्चों ने गाडी में आगे बैठने की जिद्द की, मैंने बच्चों को समझाया और संगीता को आगे बैठने के लिए कहा तथा बड़े बेमन से संगीता आगे बैठ गई| मैंने आगे बढ़ कर उसकी seatbelt लगाई और उसे देख कर मुस्कुराया मगर संगीता के चेहरे पर बस एक नक़ली मुस्कान ही आई!

भूख लग आई थी इसलिए हम mall के parking lot में गाडी पार्क कर के सीधा Yo China पहुँचे| Chinese खाने के नाम पर संगीता और बच्चों ने बस चाऊमीन ही खाई थी, नया खाना खाने की चाह हम चारों में थी| हम चारों एक family table पर बैठ गए, जहाँ मैं menu card देखने में लगा था वहीं बच्चे और संगीता आस-पास बैठे लोगों को देखने में लगे थे| आस-पास जितने भी लोग थे सभी chopstick से खाना खा रहे थे और ये दृश्य देख बच्चे और संगीता परेशान हो रहे थे! Menu में authentic chinese food था, अब न तो मैंने authentic chinese खाया था और न ही मुझे chopstick से खाना आता था, मगर कुछ नया try करने का उत्साह मुझ में जरूर था|

मैं: बाबू, relax! मैं ऐसा कुछ भी order नहीं करूँगा जो आपको chop stick के साथ खाना पड़े|

मैंने संगीता की चिंता भाँपते हुए कहा|

संगीता: हम्म्म!

संगीता ने फिर नकली मुस्कान के साथ कहा और मुझसे नजरें चुराते हुए इधर-उधर देखने लगी| वो सोच रही थी की वो मुझसे अपने जज्बात छुपा लेगी मगर मैं उसकी सारी होशियारियाँ समझ पा रहा था| दोनों बच्चे मेरी ओर बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे की मैं खाने के लिए क्या मँगाने वाला हूँ;

मैं: नेहा बेटा, आप को मिर्ची वाला खाना पसंद है न? तो आप के लिए...म्म्म्म्म्म...schezwan fried rice मँगाते हैं, okay?

नेहा को dish का नाम समझ में नहीं आया था इसलिए उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थी;

नेहा: हम्म्म्म!

नेहा ने dish के नाम से थोड़ा डरते हुए कहा| वहीं आयुष को तो dish के नाम से कुछ फर्क नहीं पड़ता था| उसे बस बिना मिर्ची वाला खाना चाहिए था;

आयुष: पापा जी मैं मिर्ची वाला खाना नहीं खाऊँगा!

जिस भोलेपन से आयुष ने कहा था उसे देख नेहा अपने मुँह पर हाथ रख कर हँसने लगी मगर संगीता उखड़ी हुई थी इसलिए वो बीच में बोल पड़ी;

संगीता: क्या सब के लिए अलग -अलग खाना माँगा रहे हो?! एक ही dish मँगा लो हम चारों खा लेंगे!

कोई और दिन होता तो मैं, संगीता को झाड़ देता क्योंकि मुझे खाना खाते समय टोका-टोकी पसंद नहीं मगर आज मैंने सबर से काम लिया तथा उसे प्यार से समझाया;

मैं: यार बच्चों को भी था enjoy कराना चाहिए न?!

ये सुन संगीता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और फिर से मुझसे नजरें चुरा कर इधर-उधर देखने लगी|



हम चारों कुछ इस प्रकार बैठे थे, संगीता मेरे सामने बैठी थी, आयुष मेरी बगल में और नेहा अपनी मम्मी की बगल में बैठी थी| मैंने सब के लिए खाना order कर दिया था, खाना आने तक मैंने दोनों बच्चों को बातों में लगा दिया और साथ ही बच्चों के जरिये संगीता को भी बातों में लगा दिया| हम चारों के लिए मैंने अलग-अलग variety के fried rice order कर दिए तथा साथ में दो gravy items भी| जब खाना आया तो हमें चम्मच की जगह fork दिया गया था| मैं चाहता तो चम्मच मँगा सकता था मगर मैंने जानबूझ कर नहीं मँगाया क्योंकि मैं आज अपने बीवी-बच्चों को एक नया अनुभव कराना चाहता था| मैंने खुद सबके लिए खाना परोसा मगर किसी ने भी तक अपनी plate को नहीं छुआ था क्योंकि fork से चावल खाना किसी को नहीं आता था| मैंने पहल करते हुए fork से चावल उठाये और बड़े प्यार से संगीता की ओर fork बढ़ाया| चावल का वो कौर अपने नजदीक देख संगीता ने झिझकना शुरू कर दिया?!

मैं: Hey? खाओ न?

मैंने भोयें सिकोड़ कर संगीता को देखते हुए कहा| मैं बहुत हैरान था की संगीता यूँ अजीब बर्ताव क्यों कर रही है? ये पहलीबार तो नहीं की मैं बाहर किसी restaurant में संगीता को अपने हाथ से खाना खिला रहा हूँ? आज पहलीबार मुझे संगीता पर खाना खाने के लिए दबाव डालना पड़ रहा था! बेमन से संगीता ने अपना मुँह खोला और मेरे हाथ से कौर खाया, बहरहाल मैंने अपने जज्बातों पर काबू किया और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी|



अब अगलीबारी नेहा की थी, जब मैंने fork से चावल उठा कर उसे खिलाया तो नेहा ने फ़ट से चावल खा लिए| अब बारी थी आयुष की, वो मेरी बगल में बैठा था और अपना मुँह खोले प्रतीक्षा कर रहा था| उसने भी नेहा की तरह बड़े चाव से चावल खाये और ख़ुशी से अपनी गर्दन दाएँ-बाएँ हिलाने लगा! बच्चों और संगीता को fork से चवल खाना आ गया था, वहीं चूँकि संगीता मेरे हाथ से खाने में झिझक रही थी इसलिए मैंने अपनी चतुराई दिखाते हुए बच्चों को आगे कर दिया| दोनों बच्चों ने बारी-बारी से मुझे और संगीता को अपने हाथों से खिलाना शुरू कर दिया| बच्चों के लिए मुझे और संगीता को खाना खिलाना एक खेल के समान था जिसे दोनों बच्चे बड़े प्यार से खेल रहे थे| बच्चों के इस खेल के दबाव में आ कर संगीता को भी उनके साथ खेलना पड़ रहा था मगर वो मुझसे दूरी बनाये हुए थी|

संगीता अब भी मायूस थी और मैं हिम्मत नहीं हारना चाहता था| मुझे लगा चूँकि हम restaurant में हैं जहाँ हमारे अलावा बहुत से लोग हैं शायद इसलिए संगीता खुल कर अपना प्यार व्यक्त नहीं कर रही है| मैंने सोचा की theatre के अंदर अँधेरा होगा और वहाँ संगीता मुझसे अपना प्यार व्यक्त करने में नहीं शर्माएगी| खाना खा कर हम चारों theatre पहुँचे और अपनी-अपनी seats पर बैठ गए| मैं और संगीता साथ बैठे तथा दोनों बच्चे मेरी बगल में बैठे थे| Ads चल रहीं थीं और दोनों बच्चों ने अपनी मस्ती शुरू कर दी थी, जबकि मेरा ध्यान संगीता पर था| मैं उम्मीद कर रहा था की वो अब मेरा हाथ पकड़ेगी, अब मेरे कँधे पर हाथ रखेगी…लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ| संगीता हाथ बाँधे हुए परदे पर ads देखने में व्यस्त थी! मैंने सोचा की क्यों न मैं ही पहल करूँ और शायद संगीता पिघल जाए इसलिए मैंने अपना हाथ संगीता के पीछे से ले जाते हुए कँधे पर रख दिया और उम्मीद करने लगा की शायद संगीता मेरी ओर झुक जाए, मुझसे कस कर लिपट जाए...लेकिन नहीं! संगीता बिना हिले-डुले, बिना मेरी ओर देखे चुप-चाप बैठी रही! मैंने भी हताश हो कर अपना हाथ संगीता के कँधे पर से हटा लिया और चुप-चाप बैठ गया|

इनके साथ आज पिक्चर देखते हुए मेरे जहन में पुरानी यादें ताज़ा हो गईं! पुरानी यादों से मेरा मतलब ये नहीं था की आज हम दोनों बहुत सालों बाद पिक्चर देखने आये थे बल्कि मुझे वो दिन याद आने लगे थे जब पिक्चर देखते समय मैं romantic हो जाया करती थी और इनके कन्धों पर अपना सर रख कर पिक्चर देखा करती थी| लेकिन आज जब मैं पिक्चर देखते समय इनसे दूर बैठी हूँ तो मुझे बहुत दुःख हो रहा था| मैं इनका प्यार महसूस कर पा रही थी मगर मैं इनका प्यार reciprocate नहीं कर पा रही थी| जब इन्होने मेरे कंधे पर हाथ रखा था वो इनका एक इशारा था की मैं इनमें सिमट जाऊँ पर मैं अब भी डरी हुई थी की कहीं ये मेरा मन न पढ़ लें तथा उदास न हो जाएँ इसीलिए मैं इनसे दूरी बनाये हुए थी...emotionally and physically! And believe me when I say, it was not easy to stay away from my own husband who I love so much! इनके लिए आज तक मेरा प्यार कभी कम नहीं हुआ लेकिन उस समय मैं अपना प्यार जता नहीं पा रही थी और जानबूझ कर बिना किसी गलती के इन्हें सज़ा दे रही थी!



हमने पिक्चर देखी, पता नहीं बच्चों को दुबारा वही पिक्चर देखना अच्छा लगा या नहीं मगर वो खुश बहुत थे! चलो हम दोनों मियाँ-बीवी न सही बच्चे तो खुश थे! घर लौटते समय, गाडी में आगे बैठने के लिए दोनों भाई-बहन ने आपस में साँठ-गाँठ कर ली थी| नेहा आगे बैठी थी और आयुष पीछे बैठा था, लेकिन पीछे बैठकर भी उसे चैन नहीं था| दोनों बच्चों ने गाडी में उधम मचा रखा था मगर संगीता एकदम खामोश बैठी थी और खिड़की से बाहर देख रही थी|

घर पहुँच कर मैंने अपनी चाभी से दरवाजा खोला तो देखा की माँ-पिताजी दोनों जाग रहे हैं और बैठक में बैठे टी.वी. देख रहे हैं|

मैं: माँ...पिताजी...आप सोये नहीं?

मैंने तो आस्चर्यचकित होते हुए पुछा क्योंकि घडी में सवा ग्यारह होने को आये थे और माँ-पिताजी इतनी देर तक जागते नहीं थे|

पिताजी: नहीं बेटा, तेरी माँ को CID देखना था तो मैंने सोचा की आज मैं भी देखूँ की ACP प्रद्युमन ‘कुछ तो गड़बड़ है’ कैसे बोलता है? पर देखो सीरियल खत्म होने को आया पर अभी तक इसने कुछ भी नहीं कहा?!

पिताजी हँसते हुए बोले| उनकी बात सुन माँ और बच्चे हँस पड़े मगर हम दोनों मियाँ-बीवी के भाव जस के तस थे!

मैं: चलिए, अब सब सो जाते हैं|

मैंने बात बदलते हुए कहा|

आयुष: पापा जी, मैं आपके पास सोऊँगा|

आयुष उत्साह से कूदते हुए बोला|

मैं: हम्म्म्म!

मैंने नक़ली मुस्कान लिए हुए कहा|

पिताजी: क्यों भई, आज दादा की कहानी नहीं सुननी?

पिताजी मुस्कुराते हुए आयुष से बोले|

आयुष: दादा जी कहानी मैं कल सुनुँगा और वो भी दो!

आयुष तपाक से बोला|

पिताजी: पर बेटा आपको सोने के लिए जगह कम पड़ेगी?

पिताजी आयुष को प्यार से समझाते हुए बोले|

मैं: कोई बात नहीं पिताजी, हो जाएगा|

मैंने फिर नकली मुस्कान लिए हुए कहा|

पिताजी: कल carpenter को बुला के तेरा पलंग बड़ा करवा देते हैं! हा..हा..हा...हा!!!

पिताजी मज़ाक करते हुए बोले मगर मेरे चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं आई|

मैं: जी!

मैंने दोनों बच्चों को अपने कमरे की ओर मोड़ते हुए कहा|



माँ-पिताजी को शुभरात्रि बोल हम चारों कपड़े बदल कर रजाई में घुस गए| आयुष और नेहा ने बिस्तर के बीचों-बीच अपना कब्जा जमा लिया था, आयुष मेरी तरफ लेटा था तथा नेहा अपनी मम्मी की तरफ लेटी थी लेकिन दोनों बच्चों ने मेरी ओर करवट की हुई थी| मैंने भी बच्चों की ओर करवट की मगर संगीता नजाने क्यों दूसरी ओर करवट कर के लेटी थी?

बच्चों ने कहानी सुनने की माँग की और कहानी सुनते-सुनते दोनों बच्चे मुझसे लिपट कर सो चुके थे, परन्तु मेरी नींद उड़ चुकी थी! मैं चाहता था की बच्चे आराम से सो जाएँ इसलिए मैं बच्चों की पीठ थपथपा रहा था|



भले ही संगीता दूसरी ओर मुँह कर के लेटी थी और मेरे हाथों की पहुँच से दूर थी मगर मेरा मन चाह रहा था की वो चैन से सो जाए| उस समय मेरे दिमाग में एक गाना आ रहा था;

'राम करे ऐसा हो जाये...

मेरी नींदिया तोहे मिल जाये

मैं जागूँ तू सो जाए....

मैं जागूँ तू सो जाये!!!'

दो घंटे बाद मेरे मन में गाये इस गाने का असर हुआ, मैं दबे पाँव ये देखने के लिए उठा की संगीता जाग रही है या सो रही है तो मैंने पाया की संगीता इत्मीनान से सो रही है और उसे यूँ इत्मीनान से सोते देख मेरे दिल को बहुत सुकून मिला| मैं जहाँ खड़ा था वहीं दिवार से टेक लगा कर संगीता को सोते हुए निहारने लगा| सोते हुए संगीता इतनी प्यारी लग रही थी की मन किया उसके गुलाबी होठों को चूम लूँ! लेकिन फिर मैंने खुद को रोक लिया क्योंकि मैं संगीता की नींद नहीं तोडना चाहता था! सोते हुए संगीता के मस्तक पर जो सुकून था, यही सुकून मैं हमेशा उसके चेहरे पर देखना चाहता था| "ऐ खुदा, मैंने कुछ ज्यादा तो नहीं माँगा था तुझसे?" मैं मन ही मन भगवान से संगीता की ख़ुशी माँगने लगा|

उधर आयुष की नींद कच्ची हो गई थी और वो बिस्तर पर अपने हाथ फेर कर मुझे टटोलने लगा था| मैं पुनः अपनी जगह लेट गया और आयुष के सर पर हाथ फेर कर उसे चैन की नींद सुला दिया| आधे घंटे बाद आयुष चैन से सो चूका था मगर मुझे एक पल को नींद नहीं आई| मेरा मन बार-बार यही कह रहा था की मैं कैसा पति हूँ जो अपनी पत्नी का ख्याल नहीं रख सकता? मैं ऐसा क्या करूँ की संगीता के मन से डर हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाए? 'धिक्कार है तुझ पर!' मेरी अंतरात्मा चीखते हुए बोली| मन में ग्लानि भरने लगी थी और इस ग्लानि ने मुझे खुद को दंड देने के लिए मजबूर कर दिया!



मैं टी-शर्ट और पजामा पहने सोता था और इन्हीं कपड़ों में मैं ऊपर छत पर आ गया| जनवरी का महीना था, सर्दी का मौसम था उस पर मैं इतने कम कपड़ों में मैं छत पर खड़ा था| ठंडी-ठंडी हवा जब बदन को छूती तो ऐसा लगता मानो किसी ने गर्म-गर्म गाल पर खींच कर ठंडे हाथों से तमाचा मारा हो! हाथ बाँधे हुए, ठंडी हवा के थपेड़े झेलते हुए मैं चुपचाप खड़ा अपनी छत से दूर घरों को देख रहा था| मेरे जिस्म के भीतर जितनी गर्मी थी वो मुँह से धुआँ बन कर निकल रही थी| उस समय मेरे लिए खुद को ये सजा देने का तरीका सही लग रहा था, मेरा मन बार-बार कह रहा था; 'you deserve this'! मेरे मन के भीतर और बाहर आसमान में घना कोहरा छाया हुआ था| दस मिनट हुए नहीं थे की मेरी कँप-कँपी छूटने लगी थी और मेरी हालत खराब होने लगी थी! तभी मुझे किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी, मैंने फ़ौरन पलट कर देखा तो पता चला की कोई नहीं है! मुझे डर लग रहा था की कहीं कोई चोर तो पड़ोसियों की छत पार कर के मेरे घर में घुस तो नहीं गया? मैं फ़ौरन दबे पाँव नीचे आया और सारा घर छान मारा पर मुझे कोई नहीं मिला! मैंने रहत की साँस ली और सोचने लगा की ये जर्रूर मेरा वहम होगा! मैं अपने कमरे में लौट आया और इधर से उधर चक्कर काटने लगा, इतने में आयुष फिर से पलंग पर मेरी मौजूदगी टटोलने लगा, मैं दुबारा अपनी जगह लेट गया और आयुष की पीठ थपथपाते हुए उसे सुला दिया| धीरे-धीरे आयुष भी नेहा की तरह मेरे जिस्म की गर्मी को महसूस करने के लिए व्यकुल रहता था, उसे भी अब नेहा की तरह मेरा सारा प्यार चाहिए था!

कुछ देर बाद आयुष की नींद टूट गई और वो जागते हुए बोला;

आयुष: पापा जी...बाथरूम...जाना है!

आयुष आधी नींद में बोला| मैंने आयुष को गोदी लिया और bathroom ले गया| मैंने आयुष को bathroom के बाहर छोड़ा, जब आयुष bathroom से निकला तो मैं उसे गोदी में ले कर वापस पलंग पर आ गया| इतने में नेहा जाग गई और पलंग पर खड़ी हो गई क्योंकि उसे भी bathroom जाना था| मैंने नेहा को गोदी में लिया और bathroom के बाहर तक छोड़ा| अंत में मैं नेहा को भी गोदी में ले कर पलंग पर लौट आया| नेहा तो लेट गई मगर आयुष उठ कर बैठ गया, मेरे लेटते ही आयुष आ कर मेरी छाती पर चढ़ गया और मेरे सीने पर सर रख कर मुझसे लिपट गया| नेहा ने भी मेरी ओर करवट ली और मुझसे लिपट गई| दोनों बच्चों ने मुझे कस कर जकड़ लिया था, ऐसा लगता था मानो मेरे दोनों बच्चे मेरे दिल में उठी बेचैनी महसूस कर रहे थे, मानो जैसे वो जानते थे की मैं खुद को सज़ा दे रहा हूँ!



मैंने दोनों बच्चों को अपनी बाहों में जकड़ लिया और दोनों के सर चूमने लगा| तभी मुझे संगीता की चूड़ियों की खनक सुनाई दी, मुझे लगा की वो जाग रही है;

मैं: सोये नहीं?

मैंने संगीता की तरफ देखते हुए पुछा| संगीता अब भी मेरी ओर पीठ किये हुए थी और बिना मेरी ओर देखे ही बोली;

संगीता: आप भी तो नहीं सोये?

संगीता उखड़ी हुई आवाज में बोली| मेरे सवाल का जवाब देने की बजाए संगीता ने मुझसे सवाल पूछा था, दरअसल वो बस मुझसे बात न करने का बहाना बना रही थी| खैर, मैंने जानकर संगीता के सवाल का कोई जवाब नहीं दिया| मुझे लगा था की शायद मेरे जवाब न देने से संगीता थोड़ी नरम पड़ जाए और मेरे नजदीक खिसक आये!

संगीता ने पलट कर मुझे देखा, उसने मेरी मनोदशा देख और पढ़ ली थी मगर बजाए मेरे नजदीक खिसक आने के वो आयुष को समझाने लगी;

संगीता: आयुष, बेटा पापा को आराम से सोने दो, क्यों तंग करते हो?!

आयुष पर अपनी मम्मी की बात का कोई असर नहीं पड़ा और वो बड़े तपाक से बोला;

आयुष: नहीं मम्मी, मैं तो यहीं सोऊँगा|

आयुष की न सुन संगीता उसे घूर कर देखने लगी, अब मुझे आयुष का बचाव करना था;

मैं: सोने दो, खुद तो नजदीक आती नहीं और अब बच्चों को भी मेरे नजदीक नहीं आने दे रही हो?

मैंने प्यार से संगीता को ताना मारते हुए कहा| संगीता मेरा मतलब समझ गई और मैं एक बार फिर उम्मीद करने लगा की वो अब आकर मेरे से लिपट जाएगी पर ऐसा नहीं हुआ! संगीता ने फिर से मेरी ओर पीठ कर के करवट ली और सोने लगी|

मुझे चिंता हो रही थी की संगीता सोइ है या नहीं मगर मैं ये देखने के लिए उठ नहीं सकता था क्योंकि दोनों बच्चों ने मुझे जकड़ रखा था! बच्चों की पीठ थपथपाते हुए और बार-बार बच्चों को चूमते हुए में जागता रहा!



आज 4 तरीक थी और जो company वाला ठेका हमने (मैंने और पिताजी) ने उठाया था वो कल रात संतोष की देखरेख में पूरा हो चूका था और वो भी हमारे सोचे गए समय से एक दिन पहले! आज ठंड बहुत ज्यादा थी इसलिए पिताजी की हिदायत थी की सुबह सब अपने कमरे में रहें क्योंकि बाहर बैठक में बहुत ज्यादा ठंड थी| बच्चों ने माँ-पिताजी के कमरे में अपने खिलौनों से खेलना शुरू कर दिया और अपनी प्यारी-प्यारी बातों में अपने दादा-दादी जी का मन लगा लिया था| पिताजी की तबियत थोड़ी नासाज़ थी इसलिए माँ पिताजी के पास थीं| इधर मैं और संगीता अपने कमरे में थे, संगीता कपडे इस्त्री कर रही थी और मैं पलंग पर टेक लगा कर बैठा चाय पी रहा था| तभी मेरे फ़ोन की घंटी बजी, ये call संतोष का था;

मैं: हाँ संतोष बोल?

संतोष का call किस लिए था मैं जानता था और इस वक़्त मैं घर से बाहर नहीं जाना चाहता था इसीलिए मेरी आवाज में थोड़ी सी चिढ थी!

संतोष: Good morning भैया, वो company वाले आज काम देखने आ रहे है, अगर आप आ जाते तो अच्छा होता, आप check भी ले लेते!

संतोष ने आराम से बात की जिससे मुझे मेरी चिढ का एहसास हुआ|

मैं: Sorry यार, मैं नहीं आ पाउँगा| काम तो बढ़िया हो चूका है, तू ही मिल ले और check ले के company account में डाल दे|

मैंने बड़ी हलीमी से बात कही| संगीता ने मेरी बात सुन ली थी और उसे मेरा यूँ काम के प्रति ढीला पढ़ना अच्छा नहीं लग रहा था|

संतोष: जी ठीक है|

जैसे ही मैंने फोन काटा, संगीता ने बिना मेरी तरफ देखे उखड़े स्वर में कहा;

संगीता: कब तक मेरी वजह से अपनी रोज़ी से मुँह मोड़ के बैठे रहोगे?

संगीता की ये बात मुझे बहुत चुभी! ऐसा लगा मानो किसी ने गर्म लोहे की सलाख ने मेरे माँस को जला कर राख कर दिया हो! वो गर्म लोहे की सलाख की जलन मुझसे बर्दाश्त न हुई! यही बात अगर संगीता मुझे प्यार से समझाती तो मैं समझ जाता और मुझे इतना बुरा नहीं लगता लेकिन संगीता के बात करने का लहजा बहुत बुरा था! मैं फटाफट उठा और गुस्से से भरकर कपड़े बदले, फिर मैंने संगीता को सुनाते हुए संतोष से बात की कि मैं आ रहा हूँ| संगीता ने मेरी बात सुनी मगर कुछ नहीं कहा!



सुबह के दस बजे थे और बाहर कोहरा छट चूका था, माँ-पिताजी नाश्ते के लिए dining table पर बैठ चुके थे तथा संगीता ने भी नाश्ते कि तैयारी शुरू कर दी थी|

मैं: पिताजी, मैं company वाले ठेके का check लेने जा रहा हूँ|

मुझे तैयार देख पिताजी ने कुछ नहीं कहा और अपना मोबाइल मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले;

पिताजी: अच्छा ये मेरा मोबाइल ले, वो राजू का फ़ोन आया था की आज check ले लेना| अब तू जा ही रहा है तो उससे check लेता आईओ|

मैं: जी ठीक है पर मैं आपके मोबाइल का क्या करूँ?

मैंने पिताजी का फ़ोन ले जाने से मना करते हुए कहा| दरअसल पिताजी का फ़ोन बहुत बजा करता था, उनके दोस्त-मित्र बहुत कॉल करते रहा करते थे और मेरा दिमाग पहले ही हिला हुआ था इसलिए मैं किसी से बात करना नहीं चाहता था|

पिताजी: अरे बेटा, तुझे तो पता है राजू का! न उसके पास तेरा नंबर है, ऊपर से वो फ़ोन कर-कर के मेरी जान खा जाता है| अब मेरी तबियत थोड़ी खराब है, नाश्ता कर के मैं सो जाऊँगा| फ़ोन तेरे पास होगा तो तू उससे अपने आप बात कर लियो|

मैंने पिताजी से फ़ोन ले लिया और नकली मुस्कान लिए बोला;

मैं: जी ठीक है, मैं दोनों check ले कर जमा करा दूँगा|

इतना कह मैं निकलने लगा मगर पिताजी मुझे टोकते हुए बोले;

पिताजी: बेटा, नाश्ता तो कर ले?!

पिताजी की बात सुनते ही संगीता मुझे देखने लगी, उसकी आँखों में मुझे तड़प दिखी मगर उसने मुझे रोकने की कोई कोशिश नहीं की!

मैं: पिताजी गुड़गाँव जाना है, नाश्ता करने बैठा तो देर हो जाएगी!

मैंने बहाना बनाते हुए कहा|

पिताजी: ठीक है बेटा पर गाडी सँभाल कर चलाइओ!

मैं: जी!

मैंने नकली मुस्कान के साथ कहा और घर से निकल गया|



मैं company वाली site पर पहुँचा और मेरी मुलाक़ात company के senior management में director Mr. John से हुई| Conference room समय से पहले और उम्मीद से बढ़िया तैयार हुआ था, Mr. John बहुत खुश हुए और मुझे उन्होंने final payment का check जिसमें 5,000/- रुपये ज्यादा थे खुद दिया! जब मुझे check मिला तो मेरा ध्यान संगीता पर था इसलिए मैं कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दे पाया|

Mr. John: Manu are'nt you happy?

Mr. John अपनी British accent में बोले|

मैं: Oh...I’m sorry sir! Actually, I was thinking something!

मैंने नकली मुस्कान लिए हुए कहा|

Mr. John: Oh really, what were you thinking?

Mr. John हँसते हुए बोले|

मैं: That when’s the next time we’ll get a contract from you?

मैंने अपनी बात सँभालते हुए कहा और नकली हँसी हँसने लगा, उधर Mr. John ने भी हँसते हुए बात टाल दी|



Check लेने के बाद मैंने मैंने बहुत सोचा, कल रात से ही मैं हार मान चूका था मगर मेरा मन मुझे हार नहीं मानने दे रहा था! 'मैं हार नहीं मानने वाला! Hell, I'm gonna confront her today! HELL YEAH!!! TEAM MANU GO FOR IT!!!!' मेरा मन उत्साह से बौराते हुए बोला| ये उत्साह इसलिए था क्योंकि मेरा मन कह रहा था की संगीता का सामना कर मैं उसे समझा सकता हूँ?!

मेरा दिमाग खराब हो चूका था और काम करना बंद कर चूका था! मेरा अंतर्मन मुझे गाली दिए जा रहा था क मैं मैं किसी गलती के अपने पति को सजा दिए जा रही थी! मुझे खुद पर कोफ़्त हो रही थी, खुद से घिन्न आ रही थी की मैं सब कुछ जानते-बूझते इनके साथ ऐसे पेश आ रही हूँ जैसे की ये कोई अनजान आदमी हो! अरे कोई किसी अनजान आदमी से भी ऐसे पेश नहीं आता जैसे मैं इनके साथ बर्ताव कर रही थी! ये मुझे इतना चाहते हैं, इतना प्यार करते हैं, मुझे हँसाने के लिए, मुझे मनाने के लिए, मेरी ख़ुशी के लिए इतना सब कुछ करते हैं और वो भी सिर्फ इसलिए नहीं की मैं माँ बनने वाली हूँ बल्कि इसलिए क्योंकि इनका दिल बस मेरे लिए ही धड़कता है! सीधे शब्दों में कहूँ तो मुझे इनकी कोई कदर ही नहीं!

लेकिन वाक़ई में क्या मैं ऐसी हूँ? या इन बीते कुछ दिनों के हालातों ने मुझे ऐसा बना दिया है? मुझे आज अपनी कोई सफाई नहीं देनी क्योंकि इस सब के लिए मैं ही जिम्मेदार हूँ! मैंने खुद को अलग-थलग कर लिया था, मुझे किसी से भी कुछ कहने का मन नहीं था| शायद इसीलिए मैंने अपने पिताजी को फ़ोन कर के यहाँ आने से मना किया था|



इस वक़्त मुझे मेरे किये इनपर सभी अत्याचार एक-एक कर याद आ रहे थे;


  • चार साल पहले का मेरा इनसे दूर रहने का फैसला और पिछले 48 घंटों से जो मैं इनका तिरस्कार कर रही थी इसके लिए मैं कभी खुद को माफ़ नहीं कर सकती! कभी नहीं!
  • मेरे इस उखड़े बर्ताव के कारन आज ये बिना कुछ खाये, घर से खाली पेट चले गए और अभी दो बजने को आ रहे हैं लेकिन इनका कोई अता-पता नहीं| मैं जानती हूँ की मेरे इस रूखे बर्ताव के कारण इन्होने अभी तक कुछ खाया भी नहीं होगा|
  • कल रात भी मेरे इसी उखड़ेपन के कारण ये सर्दी में छत पर खड़े थे और मुझे कभी पता न चलता अगर मैं इन्हें ढूँढती हुई ऊपर छत पर न जाती तथा इन्हें सिगरेट पीते हुए न देखती! मेरे ही कारण इन्हें सिगरेट पीने की लत पड़ चुकी थी, पहले मैंने इन्हें खुद से दूर कर शराब पीने की लत लगाई थी और अब इनसे बात न कर के, अपना प्यार व्यक्त न कर के सिगरेट की भी लत लगा दी थी! कैसी पत्नी हूँ मैं?!
  • इनके भीतर मैंने खुद को सजा देने की भावना महसूस की थी मगर सब कुछ जानते हुए भी मैं पत्थर बनी हुई इन्हें ठंड में ठिठुरता हुआ देख रही थी! उस वक़्त मैं खुद को बेबस और लाचार महसूस कर रही थी!
  • इस सब की कसूरवार, बस मैं थी! बस खुद को दोष देने के अलावा मैं कुछ नहीं कर सकती थी|


मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी हिम्मत इकठा की और फैसला किया की मैं इन्हें फ़ोन कर सबसे पहले इनसे माफ़ी माँग लूँ और इन्हें कुछ खाने के लिए अपनी कसम से बाँध दूँ मगर एक पापी इंसान की खुदा भी नहीं सुनता इसलिए मेरे लगातार 5 बार फ़ोन मिलाने पर भी इन्होने फ़ोन नहीं उठाया! इस वक़्त मेरा मन घबराने लगा था, मुझे डर लग रहा था की कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया?!

{QUOTE} मेरा दिमाग खराब हो चूका था.....काम ही नहीं कर रहा था| बिना किसी गलती के उनको सजा दिए जा रही थी| खुद से घिन्न आ रही थी..... एक ऐसा इंसान जो मुझे इतना चाहता है.....मैं उसके साथ ऐसा पेश आ रही थी की जैसे वो कोई ......stranger हो..... अरे कोई ऐसे Stranger से भी पेश नहीं आता...एक इंसान जो आपको प्यार करता हो....आपको हँसाने के लिए....आपके दिल को खुश करने के लिए.....और सिर्फ इसलिए नहीं की मैं प्रेग्नेंट हूँ बल्कि इसलिए क्योंकि वो मुझे प्यार करते हैं| सीधे शब्दों में कहें तो "मुझे उनकी कदर ही नहीं थी|" पर वाकई में क्या मैं ऐसी ही हूँ? या हालात ने मुझे ऐसा बना दिया? मैं अपनी सफाई में कुछ नहीं कहूँगी क्योंकि मैं खुद को GUILTY मानती हूँ| आठ साल पीला का मेरा इनसे दूर रहने का फैसला और पिछले 48 घंटों से जो मैं इनके साथ कर रही थी ये....इससब के लिए मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर सकती| मेरे इस बर्ताव के कारन ये बिना नाश्ता खाए घर से चले गए और अभी दो बजने को आ रहे थे पर इनका कोई पता नहीं था.और जहाँ तक मैं जानती हूँ इन्होने मेरी वजह से दोपहाक का lunch भी नहीं खाया होगा| कल रात भी ये छत पे cigarette पीने गए थे और ठण्ड में खड़े रह कर खुद को सजा दे रहे थे| सबकुछ जानते हुए भी मैं पत्थर की तरह कड़ी उन्हें ठण्ड में ठिठुरता देख रही थी...बेबस और लाचार......मेरे कारन इन्हें cigarette की लत पद चुकी थी और ये सब मेरी वजह से ...सिर्फ और सिर्फ मेरी वजह से! मैंने फोन उठाया और इनको मिलाया की कम से कम SORRY बोल दूँ और उन्हें कुछ खाने को बोल दूँ| पर लगातार 5 बार फ़ोन मिलाने पर भी इन्होने फोन नहीं उठाया! मन घबराने लगा की कहीं कुछ गलत तो नहीं होगया? {/QUOTE}


दोनों पार्टियों से check ले कर मैं bank में जमा कर रहा था जब संगीता के call आने लगे, मैं चूँकि बैंक के भीतर था इसलिए मैं उसका फ़ोन नहीं उठा सकता था| Check जमा कर जैसे ही मैं bank से बाहर निकला की तभी पिताजी के फ़ोन पर call आया| मैंने बिना देखे फ़ोन उठाया ही था की एक भारी भरकम आवाज मेरे कानों में पड़ी, ये आवाज जानी-पहचानी थी;

बड़के दादा: हेल्लो!

बड़के दादा की भारी-भरकम आवाज सुन मैं दंग रह गया!

मैं: पाँयलागी दादा!

मेरी आवाज सुन बड़के दादा एक पल के लिए खामोश हुए, फिर उन्होंने सीधे मुद्दे की बात की;

बड़के दादा: तोहार पिताजी कहाँ हैं?

बड़के दादा ने कड़क आवाज में पुछा|

मैं: जी वो घर पर हैं और मैं bank आया हूँ|

मैंने सादी सी आवाज में जवाब दिया|

बड़के दादा: कलिहाँ हम पंचायत बैठाये हन और तू दुनो जन का आयेक है!

बस इतना कह बड़के दादा ने फ़ोन काट दिया|

अब ये तो मैं जानता ही था की ये पंचायत क्यों बिठाई गई है मगर मैं इस सब में पिताजी को नहीं खींचना चाहता था| पंचायत में जा कर छीछालेदर होना था और मैं अपनी पिताजी की बेइज्जती नहीं होने देना चाहता था इसलिए मैंने झूठ बोलने की सोची| पिताजी वाली site पर architect के साथ मेरी meeting थी इसलिए मैं सीधा site पर पहुँचा| चूँकि मैं संगीता का फ़ोन नहीं उठा रहा था इसलिए उसने माँ का सहारा लिया और मुझे फ़ोन करके खाने पर आने को कहा| मैंने busy होने का बहाना बनाया और काम में व्यस्त हो गया|

शाम 5 बजे मैं घर पहुँचा और गाँव में पंचायत वाली बात सभी से छुपाई| मैंने अपनी चपलता दिखाते हुए झूठा बहाना बनाया;

मैं: पिताजी, मुझे कल कानपुर जाना है|

मैंने सोफे पर बैठते हुए अपनी बात शुरू की|

पिताजी: कानपुर? पर किस लिए बेटा?

मैं: मेरा एक दोस्त है उसने मुझे एक ठेके के बारे में बताया है, उसी के सिलसिले में मैं जा रहा हूँ|

मैंने अपने झूठ को पुख्ता करते हुए कहा|

पिताजी: दोस्त?

पिताजी मुझे भोयें सिकोड़ कर देखते हुए बोले|

पिताजी: लेकिन बेटा, बहु को इस हालत में छोड़ कर तू जाने की कैसे सोच सकता है?

पिताजी के सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था इसलिए मैं खामोश हो गया और कोई बहाना सोचने लगा|

पिताजी: ऐसा कर बच्चों को हम (माँ-पिताजी) सँभाल लेंगे और तुम दोनों (मैं और संगीता) कानपुर हो आओ|

पिताजी की बात सही थी मगर मेरे झूठ के तहत संगीता को साथ ले जाना नामुमकिन था|

मैं: नहीं पिताजी, बच्चे नहीं मानेंगे और संगीता भी नहीं मानेगी| फिर मुझे तो बस एक दिन का काम है, कल रात तक मैं वापस आ जाऊँगा|

बच्चे हमारे (मेरे और संगीता के) अकेले जाने के लिए कभी नहीं मानते, हाँ मैंने संगीता के जाने से मना कर देने की बात झूठ कही थी क्योंकि मैं जानता था की वो शायद मान जाती|

पिताजी: जैसा तुझे ठीक लगे बेटा, लेकिन अगर बहु को साथ ले जाता तो उसका मन बहल जाता|

पिताजी ने आखरी कोशिश करते हुए कहा|

मैं: फिर कभी अच्छी जगह चले जाएँगे पिताजी|

मैंने नकली मुस्कान के साथ कहा|

इनकी वो नकली मुस्कान मैं पढ़ चुकी थी, भले ही माँ-पिताजी कुछ न समझ पाएँ हों पर मैं तो इनकी अर्धांग्नी हूँ, मैं तो इनके दिल के दर्द को साफ़ महसूस कर सकती हूँ! 'ये सब मेरी वजह से हो रहा है, मेरी ही वजह से ये घर से दूर जा रहे हैं! मैंने खुद को इस कदर अलग-थलग कर लिया की इनका मन उचाट हो गया है! मेरी कड़वी बातों को इन्होने अपने दिल से लगा लिया है! मुझे इनसे माफ़ी माँगनी होगी मगर पहले मैं इन्हें कुछ खिला दूँ क्योंकि सुबह से अभी तक इन्होने कुछ खाया नहीं होगा!' ये सब सोचते हुए मेरे मन फिर से ग्लानि भरने लगी थी|

मैंने फटाफट परांठें सेंके और प्लेट में परोस कर कमरे में पहुँची| ये उस समय दरवाजे की ओर पीठ कर के अपने कपड़े बदल रहे थे, मैंने खाने की प्लेट टेबल पर रखी जिससे ये पलट कर मेरी ओर देखने लगे| इनसे नजरें मिलते ही मेरी हिम्मत जवाब दे गई, मन बुज़दिल हो चला था मगर मुझे माफ़ी तो माँगनी ही थी इसलिए मन ने मुझे इनसे गले लग कर दिल ही दिल अपनी माफ़ी माँगने की बात कही लेकिन अभी भी कोई अदृश्य शक्ति थी जो मुझे इनके नजदीक जाने से रोक रही थी| मैंने एक बार फिर हिम्मत बटोरी लेकिन मैं कुछ कुछ कह पाती उससे पहले ही मुझे महसूस हुआ की ये कुछ कहना चाहते हैं| मेरे डरे हुए मन के लिए ये मौका एक बहाने के समान था जो मुझे बोलने नहीं दे रहा था| मैं इतनी क्रूर नहीं थी, दिल में इनके लिए बैठे प्यार ने गुहार लगाई और मुझे गलत रास्ते पर भटकने नहीं दिया| मुझे इन्हें और low feel नहीं कराना था इसीलिए मुझे आज कैसे भी इनसे माफ़ी माँगनी थी!




मैं: बैठो|

मैंने संगीता को पलंग पर बैठने का इशारा करते हुए कहा| उसकी आँखों में मैं ग्लानि देख रहा था और मुझे वो ग्लानि चुभ रही थी!

संगीता: आप पहले कुछ खा लो, सुबह से आपने कुछ नहीं खाया!!!

संगीता की बात में मेरे लिए चिंता झलक रही थी, परन्तु मुझे इस वक़्त संगीता का सामना करना था;

मैं: वो बाद में, पहले तुम बैठो मुझे तुमसे कुछ बात करनी है|

मैंने जबरदस्ती संगीता का हाथ पकड़ा और उसे अपने सामने बिठाया तथा मैं कुर्सी ले कर संगीता के सामने बैठ गया| मैं उस वक़्त संगीता से ये सब कहना चाहता था;

‘जान, तुम्हें क्या हो गया है? क्यों तुम मुझसे ऐसे पेश आ रही हो जैसे तुम मुझसे प्यार नहीं करती? क्यों मुझसे तुम किसी अनजान आदमी की तरह पेश आ रही हो? मैं जानता हूँ की तुम आयुष को ले कर डरी हुई हो लेकिन अगर तुमने मेरे प्रति अपना प्यार व्यक्त करना बंद कर दिया तो मैं तुमसे वादा करता हूँ की मैं उस हरामजादे को (चन्दर) जान से मार दूँगा!

मैंने आज तक तुमसे कुछ नहीं माँगा मगर आज मैं तुमसे कुछ माँगना चाहता हूँ| मुझे नहीं पता की तुम ये सब कैसे करोगी मगर मुझे मेरी पुरानी संगीता वापस चाहिए! मुझे बस मुझसे प्यार करने वाली संगीता वापस चाहिए! मुझे किसी की कोई परवाह नहीं, मुझे बस तुम्हारी परवाह है और अगर मुझे मेरी पुरानी वाली संगीता नहीं मिली तो तुम मुझे खो दोगी...हमेशा-हमेशा के लिए!’

मेरा मन ये सब बातें संगीता से कहना चाहता था, परन्तु मैंने ये बातें संगीता से नहीं कही क्योंकि आज मेरे खाना न खाने से उसे तकलीफ हुई थी! वैसे पति के खाना न खाने पर पत्नी को तकलीफ होना वाज़िब बात थी मगर मेरे लिए ये पिछले 48 घंटों में एक नई उपलब्धि के समान थी| संगीता ने अपने प्यार को मेरे प्रति व्यक्त करने से रोका हुआ था ऐसे में उसे अभी तकलीफ होना मेरे लिए एक शुभ संकेत था| मेरा मन कह रहा था की जब संगीता को मेरी इतनी चिंता होने लगी है तो जल्द ही मेरी पुरानी संगीता वापस आ जाएगी, बेकार में अगर मैंने उसके साथ अपनी बातों से कोई जबरदस्ती की तो कहीं बात न बिगड़ जाए?! इस वक़्त मैं संगीता के साथ बिलकुल नई शुरुआत करने को तैयार था इसीलिए मैं खामोश रहा!

ये मुझे बस टकटकी बाँधे देख रहे थे, मुझे लगा की ये कुछ कहेंगे परन्तु ये खामोश रहे| अपने पति की ये ख़ामोशी देख मेरा मन अंदर से कचोटने लगा था, मेरे ही कारन आज ये इस तरह चुप हो गए थे| ये दृश्य देख मेरे भीतर इनसे प्यार करने वाली संगीता ने आज साँस ली, मेरे मन में जो इनके प्रति चिंता थी आज वो बाहर आ ही गई| मैंने हिम्मत कर के प्लेट उठाई और एक कौर इन्हें खिलाया, इन्होने भी बड़े प्यार से कौर खाया| इनको अपने हाथ से खाना खिला कर दिल में प्रसन्नत्ता भरने लगी और मैंने बड़ी हिम्मत कर के इनसे पूछ लिया; "मैं...भी...कानपुर...चलूँ?" मेरा कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं था, मैं तो बस इनकी ख़ुशी के लिए जाना चाहती थी| मेरा सवाल सुन ये धीमे से मुस्कुराये और बोले; "जान, मैं बस एक दिन के लिए ही जा रहा हूँ| एक दिन में तुम वहाँ कुछ भी नहीं देख पाओगी, वापस आ कर मैं कहीं घूमने जाने का plan बनाता हूँ फिर हम दोनों कहीं अच्छी जगह घूम कर आएंगे| Okay?" इनकी मुस्कान देख मैंने रहत की साँस ली की ये मुझसे नाराज नहीं हैं| मन में भरी ग्लानि जाती रही और इनसे माफ़ी माँगने की हिम्मत जवाब दे गई, बड़ी मुश्किल से मैंने मुस्कुराते हुए "हम्म" कह बात खत्म की|



मैंने संगीता के मेरे साथ कानपुर जाने की बात हँस कर टाल दी, शायद संगीता को बुरा लगा हो मगर मैं उसे अपने साथ नहीं ले जा सकता था| मुझे एक बात की ख़ुशी थी और वो ये की संगीता के जिस प्यार को मैं महसूस करना चाहता था वो आज मुझे महसूस हुआ था क्योंकि संगीता मुझे आज बड़े प्यार से अपने हाथों से खाना खिला रही थी| मैं जानता था की संगीता ने भी अभी तक कुछ नहीं खाया होगा इसलिए मैंने भी उसे बड़े प्यार से अपने हाथों से खाना खिलाया| वैसे एक बात तो है, संगीता के हाथ से आज खाना खाने में आज अलग ही मज़ा आ रहा था!

थोड़ी देर में बच्चे उठ गए और मुझे ढूँढ़ते हुए, फुदकते हुए कमरे में आ गए| दोनों बच्चों ने मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया और ख़ुशी से कहकहाने लगे! नेहा ने मुझे खींच कर बिस्तर पर गिराया और फिर आयुष ने मुझे गुदगुदी करना शुरू कर दिया| मैंने भी दोनों बच्चों को गुदगुदी करना शुरू कर दिया| बच्चों के साथ थोड़ी मस्ती करने के बाद मैंने उन्हें पढ़ने में लगा दिया और मैंने चुपचाप लखनऊ आने-जाने की plane की ticket book कर दी|



बच्चों को मेरे कानपुर जाने का पता चला तो दोनों ने फिर मुझे घेर लिया;

मैं: बेटा मुझे कुछ काम से जाना है और तबतक है न आप दोनों को यहाँ सब का ध्यान रखना है|

बच्चों ने सर हाँ में हिलाया और बड़े गर्व से मेरे द्वारा दी गई जिम्मेदारी ले ली| मेरी flight कल सुबह की थी और रात बच्चों को मेरे साथ गुजारनी थी| खाना खा कर सोते समय दोनों बच्चों ने मुझे कल रात की तरह अपनी बाहों से जकड़ लिया और कहानी सुनते-सुनते सो गए| संगीता आज भी कल रात की ही तरह मुझसे दूर सोई, मुझे बुरा तो लगा मगर उतना नहीं जितना कल लग रहा था| मैं धीरे-धीरे नई शुरुआत करने के लिए राज़ी था|

अगली सुबह घर से निकलते समय नेहा ने अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा थामा और मुझे हिदायत देती हुई बोली;

नेहा: पापा जी, अपना ख्याल रखना| किसी अनजान आदमी से बात मत करना, मुझे कानपूर पहुँच कर फ़ोन करना, lunch में मुझे फ़ोन करना और रात को flight में बैठने से पहले फ़ोन करना और दवाई लेना मत भूलना|

नेहा को मुझे यूँ हिदायतें देता देख माँ मुस्कुराते हुए बोलीं;

माँ: अरे वाह मेरी बिटिया! तू तो बिलकुल मेरी तरह अपने पापा को सीखा-पढ़ा रही है!

माँ ने हँसते हुए कहा और उनकी बात सुन सब हँस पड़े, संगीता भी मुस्कुराना चाह रही थी मगर उसकी ये मुस्कान घुटी हुई थी|

मैं: बेटा, सारी हिदायतें आप ही दोगे या फिर कुछ अपनी मम्मी के लिए भी छोड़ोगे?!

मैंने कुटिल मुस्कान लिए हुए संगीता की ओर देखते हुए कहा|

संगीता: बेटी ने अपनी मम्मी के मन की कह ही दी तो अब क्या मैं दुबारा सारी बातें दोहराऊँ?!

संगीता ने कुटिलता से नकली मुस्कान लिए हुए जवाब दिया| संगीता की कुटिलता देख मैं भी मुस्कुरा दिया और उसे कमरे में जाने का इशारा किया| कमरे में आ कर मैंने संगीता को अपना ख्याल रखने को कहा ओर संगीता ने भी अपना सर हाँ में हिलाते हुए संक्षेप में जवाब दिया|


जारी रहेगा भाग - 5 में...
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