Akki ❸❸❸
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Bdiya update gurujii, bhabhi jiछब्बीसवाँ अध्याय: दुखों का ग्रहण
भाग - 3
अब तक पढ़ा:
उधर पिताजी बाहर dining table पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे, मैं चाय बना कर उनके पास रखते हुए उनके पाँव छू आशीर्वाद लेने लगी| पिताजी ने मुझसे मेरा हाल-चाल पुछा मगर मैंने बिना कुछ कहे सर झुका कर और हाथजोड़ कर उनसे मूक माफ़ी माँगी! पिताजी मुझे यूँ माफ़ी माँगते देख खामोश हो गए, वो मेरी माफ़ी माँगने का कारण समझ गए थे! पिताजी ने माँ को आवाज दी और उनसे मेरा हाल-चाल पुछा| माँ भी मायूस होते हुए बोलीं; "कल से बहु एक शब्द नहीं बोली है! मुझे उसकी बहुत चिंता हो रही है!" माँ की बात सुनते ही पिताजी अपना फ़ोन उठाते हुए बोले; "मैं अभी मानु को फ़ोन करता हूँ|" लेकिन इससे पहले की पिताजी इनको फ़ोन खनकाते ये खुद ही आ गए|
अब आगे:
सारी रात संगीता के बारे में सोचता रहा और उसके मुख से प्यार भरे अलफ़ाज़ सुनने को तरसता रहा| आमतौर पर मैं site से सुबह 7-8 बजे तक घर लौटता था, लेकिन आज संगीता को देखने को मन इतना प्यासा था, मन में इतनी बेचैनी थी की मैं सुबह 6 बजे ही घर आ धमका! दरवाजे की घंटी बजाई और माँ दरवाजा खोलते हुए मुझे देख कर पिताजी से बोलीं;
माँ: लो, ये (मैं) तो आ गया?
मैंने माँ के पाँव छू कर आशीर्वाद लिया और भीतर आया| फिर मेरी नजर संगीता पर पड़ी, वो अब भी वैसी की वैसी खामोश थी! मुझे देखते ही वो मुझसे नजरें चुराते हुए रसोई में घुस गई और मेरे लिए चाय बनाने लगी| इधर पिताजी ने मेरा हाथ पकड़ मुझे कहा;
पिताजी: बैठ बेटा!
मैंने पिताजी के पाँव छुए और उनका आशीर्वाद ले कर उनके सामने बैठ गया|
पिताजी: बेटा, कल से बहु एकदम खामोश है! उसने अभी तक एक शब्द भी नहीं बोला है, तेरी माँ ने मुझे सुबह बताया की वो रात भर सोई भी नहीं है! तू उससे बात कर और कैसे भी उससे कुछ बुलवा क्योंकि अगर वो इसी तरह सहमी रहेगी तो उसके दिल में डर बैठ जाएगा!
पिताजी ने अपनी बात धीमी आवाज में कही ताकि कहीं संगीता न सुन ले! पिताजी की बातों से उनकी चिंता झलक रही थी|
मैं: पिताजी, मैं उससे (संगीता से) बात करूँगा| अगर जर्रूरत पड़ी तो उसे डॉक्टर सुनीता के पास भी ले जाऊँगा|
मैंने एक गहरी साँस छोड़ते हुए कहा| संगीता की ये ख़ामोशी हम सभी की चिंता का सबब बनी हुई थी! मुझे संगीता से बात करने के लिए एकांतवास चाहिए था जिसकी व्यव्य्स्था माँ ने कर दी थी;
माँ: बेटा अभी बच्चे सो कर उठेंगे तो मैं और तेरे पिताजी उन्हें लेके मंदिर चले जायेंगे, तब तू बहु से इत्मीनान से बात करिओ|
माँ ने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा|
मैं: जी|
मैंने संक्षेप में उत्तर दिया| संगीता ने चाय बनाई और dining table पर मेरे आगे रख कर जाने लगी, मैंने उसे इशारे से कहा की अपनी चाय ले कर मेरे पास बैठो| संगीता ने अपनी चाय ली और मेरे बगल में सर झुका कर बैठ गई| हम दोनों खामोशी से चाय पीने में लगे हुए थे, माँ-पिताजी से हमारी ये खामोशी सहन नहीं हो रही थी इसलिए वे उठ कर सोफे पर बैठ कर टी.वी. देखने लगे| तभी दोनों बच्चे जाग गए और आँख मलते-मलते बहार आये| मुझे देख दोनों के चेहरों पर ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और दोनों दौड़ते हुए मेरे पास आ गए| मैंने दोनों बच्चों को उठाया और अपने सामने dining table पर बिठा दिया, दोनों बच्चों ने मुझे सुबह की good morning वाली पप्पी दी और मैंने उन्हें अपने सीने से चिपका लिया| बच्चों के दिल में पनपा डर कमजोर पड़ने लगा था और ये महसूस कर मुझे लग रहा था की मैं आधी जंग जीत चूका हूँ! मैंने दोनों बच्चों के सर चूमे और इससे पहले मैं कुछ कहता उससे पहले ही नेहा बोल पड़ी;
नेहा: पापा जी, मुझे आपके बिना नींद नहीं आती! दादा जी ने...
इसके आगे नेहा से कुछ भी कहना मुश्किल था| नेहा धीमी आवाज में बोली ताकि कहीं उसके दादा जी न सुन लें! मैं उसके मन की बात समझ गया की पिताजी ने नेहा को सँभालने की बहुत कोशिश की होगी मगर वो उसे सँभालने में कामयाब नहीं हुए|
मैं: बेटा, आप मेरे सबसे बाहदुर बच्चे हो! आपके दादा-दादी जी हम सभी को सँभालने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, हमें भी अपनी कोशिश करनी चाहिए और अपने डर से लड़ना चाहिए ताकि हमारे माता-पिता को हम पर गर्व हो!
ये बात मैंने थोड़ी ऊँची आवाज में कही ताकि सभी ये बात सुन लें| ये बात मैंने नेहा की ओर देखते हुए कही थी मगर ये बात थी संगीता के लिए| संगीता ने मेरी बात सर झुका कर सुनी मगर उसने अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी| वहीं आयुष मेरी बात समझते हुए मुस्कुराया और अपनी शेखी बघारते हुए बोला;
आयुष: बिलकुल मेरी तरह न पापा जी?
आयुष का भोलापन देख मेरे चेहरे पर मुस्कान नहीं आई मगर माँ-पिताजी के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी|
माँ: अरे मेरा पोता बहुत बहादुर है, तभी तो आज मैं अपने पोते को chocolate खिलाऊँगी|
माँ सोफे पर से बैठे हुए आयुष की तारीफ करते हुए बोलीं| फिर उन्होंने मुझे और संगीता को हँसाने के लिए पिताजी को प्यार से कोहनी मारी और बोलीं;
माँ: आज हमार मुन्ना (आयुष) खातिर एक ठो चॉक्लेट का बड़ा डब्बा लाये दिहो, हम हूँ आपन पोते संगे chocolate खाब!
ये सुन पिताजी मुस्कुराये और माँ को छेड़ते हुए बोले;
पिताजी: कहाँ से खाय पैहो, दाँत तो हैं नाहीं!
ये सुन माँ शर्मा गईं और आयुष अपनी दादी को सहारा देने के लिए पहुँच गया|
आयुष: दादी जी, मैं न चॉकलेट पिघला दूँगा तब आप चॉकलेट चम्मच से खा लेना|
आयुष का बचपना देख माँ-पिताजी ठहाका मर कर हँस पड़े! वहीं हम मियाँ-बीवी के चेहरे पर मुस्कान की एक महीन सी रेखा खींच गई!
इधर नेहा फिर से मेरे सीने से लिपट गई और मैं उसे दुलार करने में लग गया| रात भर जागने से मेरा शरीर बिलकुल थका हुआ था मगर बच्चों के प्यार के आगे मैं उस दर्द को भुला बैठा था और dining table वाली कुर्सी पर बैठा हुआ था| आखिर माँ ने ही बात शुरू की और बोलीं;
माँ: अच्छा बच्चों, चलो आप दोंनो जल्दी से तैयार हो जाओ मैं और आपके दादा जी आपको मंदिर ले जाएंगे|
मंदिर जाने के नाम से नेहा तो एकदम से तैयार हो गई क्योंकि मेरी ही तरह उसमें भी भक्ति भाव थे मगर आयुष मेरे साथ रहना चाहता था| अब माँ ने उसे लालच देते हुए कहा;
माँ: बेटा, मंदिर जाओगे तो आपको मीठा-मीठा प्रसाद मिलेगा!
प्रसाद खाने का लालच सुन आयुष भी मेरी तरह एकदम से तैयार हो गया!
माँ-पिताजी और बच्चे मंदिर जाने के लिए तैयार हुए और तब तक मैं dining table पर बैठा रहा| बच्चों ने मुझे साथ चलने को पुछा तो पिताजी ने उन्हें कह दिया की मैं थका हुआ हूँ इसलिए मुझे आराम करना है, बच्चे मान गए और अपने दादा-दादी जी का हाथ पकड़ कर चल दिए| जैसे ही सब लोग बाहर गए और दरवाजा बंद होने की आवाज आई मैंने संगीता की तरफ देखा और कहा;
मैं: Can we talk...please!
मैंने बड़े प्यार से संगीता से बात करने के लिए 'गुजारिश' की! वैसे ये पहलीबार था की मुझे संगीता से बात करने के लिए उसे 'please' कहना पड़ा हो!
खैर मैं उठ कर अपने कमरे में आ गया और संगीता भी मेरे पीछे-पीछे सर झुकाये हुए आ गई| मैंने संगीता का हाथ पकड़ा और उसे पलंग पर बिठाया तथा मैं उसके सामने अपने दोनों घुटनों पर आते हुए हुए संगीता का हाथ अपने हाथों में लिए हुए बोला:
मैं: पिछले 24 घंटे से मैं हर मिनट तुम्हारी आवाज सुनने के लिए मरा हूँ! मैं जानता हूँ तुम्हारे भीतर क्या चल रहा है, तुम किस डर से जूझ रही हो लेकिन तुम्हें अपना वो डर मुझसे बात कर के बाहर निकालना होगा! मैंने तुम्हें इतना समय बस इसीसलिए दिया था ताकि तुम खुद को सँभाल सको और अपने इस डर से बाहर आ सको, लेकिन अब मेरे सबर की इन्तहा हो चुकी है! अगर तुम अब भी कुछ नहीं बोली तो....तो इस बार मैं टूट जाऊँगा! मैं...मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता!
मैंने ये सब बातें संगीता की आँखों में देखते हुए कहीं थीं लेकिन संगीता के भीतर मैंने कोई बदलाव महसूस नहीं किया| वो अब भी डरी हुई थी और कुछ भी कहने से खुद को रोक रही थी| अपने मन की बात साफ़ शब्दों में कह कर और संगीता के कोई प्रतिक्रिया न देने पर मैंने हार मान ली थी! मुझसे उसका वो दुखी चेहरा नहीं देखा जा रहा था, इसलिए मैं खड़ा हुआ और कमरे से बाहर निकलने को पलटा| तभी संगीता ने मुझे पीछे से अपनी बाहों में जकड़ लिया और मेरी पीठ में अपना चेहरा धँसा कर संगीता बिलख-बिलख कर रोने लगी|
जब इन्होने मेरी आँखों में आँखें डालकर अपनी बात कही तो मैं समझ गई की मेरे कुछ न बोलने से अब ये टूट जायेंगे और अगर ये टूट गए तो मेरे इस परिवार का क्या होगा? दिमाग में उठे इस सवाल ने मेरे शरीर में हरकत पैदा कर दी थी, मैंने खुद को कुछ बोलने के लिए सज किया और अपने आपको रोने से कोशिश करने लगी| लेकिन मेरे दिल बहुत कमजोर हो चला था, उसे बस रोना था और जैसे ही ये कमरे से बहार जाने को मुड़े मेरे जिस्म में फुर्ती आ गई और मैंने इन्हें पीछे से अपनी बाहों में जकड़ लिया और रोने लगी!
वहीं मेरा रोना सुन इनके दिल में टीस उठी जिसे मैंने भी साफ़ महसूस किया था! लेकिन इन्होने जैसे-तैसे खुद को सँभाला और मेरी तरफ मुड़े तथा मेरे माथे को चूम कर मुझे कस कर अपने गले लगा लिया! इनका वो आलिंगन मेरे लिए ऐसा था मानो मैंने मोक्ष प्राप्त कर लिया हो! कल रात से जो मैं इनके बदन के स्पर्श को पाने के लिए तड़प रही थी वो तड़प इनके सीने से लग कर खत्म होने लगी! इनके भीतर मेरी आवाज सुनने की अग्नि और तीव्र हो कर जल रही थी जिसका सेंक मुझे महसूस हो रहा था! मैंने खुद को बहुत कोसा की मैंने अपने पति को इतनी छोटी सी चीज के लिए इतना तरसाया! उस पर कल से अभी तक अपने माता-पिता (सास-ससुर जी) की मुझे कुछ काम करने से रोकने की आज्ञा की अवहेलना कर उनकी न कादरी भी की थी!
परन्तु, अभी मुझ कहना था, कुछ बोलना था जिससे मेरे पति के भीतर उनकी सब कुछ सहने की, सब कुछ सँभालने की सहनशक्ति क़ायम रहे और वो कहीं मेरी तरह टूट न जाएँ! इस वक़्त एक पत्नी का प्यार इस कदर उमड़ आया था की उसने मेरी अंतरात्मा को जगा दिया था| मेरी अंतरात्मा जाएगी और मेरे मुँह से ये बोल फूटे; "I...love...you...जानू!" मुझ में इनसे नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं थी इसलिए मैं इनके सीने में अपना चेहरा छुपाये इनकी बाहों में सिमटी रही, इसलिए मैं इनके चेहरे पर आये भाव भी न देख पाई!
24 घंटे बाद जब मैंने संगीता की आवाज सुनी तो ऐसा लगा जैसे किसी खामोश कमरे में किसी ने छन से पायल खनका दी हो! संगीता की आवाज सुन जहाँ एक तरफ मुझे ख़ुशी हुई थी, वहीं उसके भीतर छुपा हुआ डर भी मुझे महसूस हुआ था!
मैं: I love you too! अब बस और रोना नहीं है! मैं हूँ न तुम्हारे पास, फिर घबराने की क्या जर्रूरत है?
मैंने संगीता की पीठ पर हाथ फेरते हुए उसे शांत किया|
मैं: अब बताओ की तुम इतना डरी हुई क्यों हो? क्यों खुद को मुझसे काटे बैठी हो?
मेरे सवाल सुन, संगीता ने अपना रोना काबू किया| वहीं मैं बेसब्री से उसके जवाब का इंतजार करने लगा|
अब समय आ गया था कुछ कहने का, मुझे लग रहा था की मुझे अब इन्हें सब सच कह देना चाहिए| कल शाम से मैं जिस कवच में बंद थी, उसमें कल रात की माँ द्वारा कही बातों से दरार पड़ गई थी और अभी जब मैं इनके सीने से लिपट कर रोइ थी तो वो कवच टूट कर चकना चूर हो चूका था! मैं अब आजाद थी; 'और अब मैं इनसे कुछ नहीं छुपाऊँगी, पिछले 24 घंटों से जो भी बातें मुझे खाये जा रहीं हैं वो सब मैं इन्हें अब बता दूँगी!' मैं मन ही मन बुदबुदाई और हिम्मत कर के अपने मन की सारी बात इनकी आँखों में आँखें डाल के इनके सामने रखने लगी; "कल...जो हुआ उसे देख मैं बहुत डर गई थी, अपने लिए नहीं बल्कि आपके के लिए, हमारे बच्चों के लिए और हमारे इस परिवार के लिए! जब आपने उस जानवर की गर्दन पकड़ी हुई थी तो मुझे लग रहा था की आप गुस्से में उसकी जान ले लोगे! ये दृश्य मेरे लिए बहुत डरावना था और...और हमारे बच्चों के लिए तो और भी डरावना था, इतना डरावना की वो भी बेचारे सहम गए थे!" इतना कह मेरी आँखों में फिर से डर झलकने लगा था, वो ठंडा एहसास जिसने मेरी रूह तक को झिंझोड़ कर रख दिया था! मेरी आगे कही बात हताशा भरी थी, ऐसी काली बात जिसमें नेश मात्र भी उम्मीद की रौशनी नहीं थी; "आपने उसे पीट-पीट कर भगा तो दिया मगर मेरा दिल कहता है की खतरा अभी टला नहीं है! वो वापस आएगा...जैसे हर बार आता था...वो...आएगा...जर्रूर आएगा...आयुष के लिए...हमारे बेटे के लिए! ...और वो आयुष...आयुष को...हम से छीन लेगा...पक्का छीन लेगा...जरूर छीन लेगा...और हम...हम कुछ नहीं कर पाएंगे...कुछ भी नहीं!" इन्होने मेरी ये निराशा और भय से भरी हुई बातें अपनी भोयें सिकोड़ कर मुझे घूरते हुए सुनी| इन्हें विश्वास नहीं हो रहा था की मैं इस कदर तक हार मान चुकी हूँ की मुझ में अपने ही बेटे को अपने पास रोकने तक की ताक़त नहीं बची है!
मैं: सँभालो खुद को!
मैंने संगीता के कँधे पकड़ उसे झिंझोड़ते हुए कहा| संगीता इतनी निराश, इतनी हताश, इतना हारा महसूस कर रही थी इसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी! मेरा काम उसे हिम्मत बँधाना था, उसे विश्वास दिलाना था की मेरे रहते हुए उसे कोई छू नहीं सकता!
मैं: वो (चन्दर) कुछ नहीं कर सकता क्योंकि मैं आयुष को कुछ नहीं होने दूँगा! वो मेरा बेटा है, मेरा खून है और मैं उसे कभी खुद से दूर नहीं जाने दूँगा! हमारा बेटा आयुष हमेशा हमारे पास रहेगा!
मैंने जोश और आत्मविश्वास से अपनी बात कही ताकि संगीता के दिलों-दिमाग में ये बात हमेशा-हमेशा के लिए घर कर जाए! लेकिन संगीता का आत्मबल बहुत कमजोर था इसलिए उसने फिर से निराशाजनक बात कही;
मेरे पति मुझे हिम्मत बँधा रहे थे मगर मेरा नाजुक डरा हुआ दिल मुझे मेरे पति की बात मानने से रोक रहा था! "नहीं....वो (चन्दर) उसे (आयुष को) ले जाएगा...हम सब से दूर...बहुत दूर! ये सब मेरी वजह से हुआ ...मैं ही कारण हूँ...मेरी वजह से वो (चन्दर) आपको...माँ-पिताजी को...बच्चों को...सबको...नुक्सान पहुँचायेगा! आप सब की मुसीबत का कारन मैं हूँ! न मैं आपकी जिंदगी में दुबारा आती ना ये सब होता .....please मुझे माफ़ कर दो!" मेरा दिल मुझे चन्दर के दुबारा लौटने को ले कर डरा रहा था| मेरे लिए इन सभी बातों का बस एक ही शक़्स दोषी था और वो थी मैं!
संगीता रोते हुए बोली और उसको यूँ रोता देख मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था जिस कारण मेरे दिल में टीस उठ रही थी! संगीता बेवजह खुद को दोषी मान चुकी थी और उसके भीतर मौजूद ग्लानि उसे खुलकर साँस नहीं लेने दे रही थी!
मैं: बाबू...सँभालो खुद को!
मैंने बहुत प्यार से संगीता की आँखों में देखते हुए कहा| मैं जोश से संगीता को पहले समझा चूका था और अब बारी थी संगीता को प्यार से समझाने की|
मैं: क्यों इस तरह खुद को दोष दे रही हो?! तुम्हारी कोई गलती नहीं, तुमने कुछ नहीं किया!
ये कहते हुए मैंने संगीता के सर से दोष की टोकरी उतार कर अपने ऊपर रख ली;
मैं: अगर कोई कसूरवार है तो वो मैं हूँ क्योंकि शादी का प्रस्ताव तुम्हारे आगे मैंने रखा था! तुम्हारे divorce के papers गाँव मैं ले कर गया था और चन्दर को डरा-धमका कर उसके sign मैंने लिए थे इसलिए अगर कोई कसूरवार है तो वो मैं हूँ, तुम नहीं!
सच बात ये थी की मेरे लिए संगीता के सामने शादी का प्रस्ताव रखना कोई गलती नहीं थी मगर अपनी पत्नी के मन की शान्ति के लिए मैंने इसे गलती कहा था ताकि उसके भीतर से ग्लानि का भाव खत्म हो सके| इधर, मैंने जब खुद को दोषी कहा तो संगीता ने अपनी गर्दन न में हिलानी शुरू कर दी!
जब इन्होने खुद को दोषी कहा तो मैं जान गई की ये बस मुझे खुद को दोषी कहने से रोक रहे हैं| मैंने अपनी गर्दन न में हिलाई और खुद का रोना काबू करने लगी, कम से कम अपने रोने को काबू कर के इनके कलेजे को छलनी तो न करूँ! "नहीं...अगर मैं दुबारा आपकी जिंदगी में ही न आती तो ये सब होता ही नहीं न?" मैंने इनसे बहस करते हुए कहा|
ये संगीता के भीतर मौजूद ग्लानि बोल रही थी जो की मुझे न ग्वार थी!
मैं: जानती हो अगर तुम मेरी जिंदगी में दुबारा नहीं आती तो मैं वही शराब पीने वाला मानु बन कर रह जाता| जो न हँसता था, न खेलता था, न किसी से बात करता था, बस एक चलती-फिरती लाश के समान जीये जा रहा था| तुम्हारे बिना मैं नई शुरुआत नहीं कर पा रहा था, तुम्हें भूल नहीं पा रहा था और भूलता भी कैसे, मेरी आत्मा का एक टुकड़ा तुम्हारे पास जो रह गया था!
मेरी बातों से संगीता खामोश हो गई थी, मेरे जवाब ने संगीता के सवाल का वजूद खत्म कर दिया था! अब मुझे संगीता को हँसाना था;
मैं: तुम्हें पता है, तुम्हारे प्यार ने मुझे उस लड़की का नाम भी भुला दिया जिसके प्रति मैं आकर्षित था!
जैसे ही मैंने उस लड़की का जिक्र किया तो संगीता के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान खिल गई! संगीता के चेहरे पर आई मुस्कान ऐसी थी मानो सूरज की किरण पड़ने पर कोई नन्ही सी कली मुस्कुराई हो!
मैं संगीता को पलंग पर ले आया और दिवार से पीठ टिका कर बैठ गया तथा संगीता मेरे सीने से अपना सर टिका कर बैठ गई और हमने रजाई ओढ़ ली| संगीता को अपने पहलु में समेटे हुए मैंने उससे अपना एक डर साझा करनी की सोची, ऐसा डर जिसने मुझे कल रात बहुत सताया था;
मैं: जानती हो, कल रात मैं कितना परेशान था? तुम्हारा एकदम खामोश हो जाना, मुझसे बात न करने से मैं डर गया था, मुझे लग रहा था की कहीं तुम अपनी निराशा में कोई गलत कदम न उठा लो! याद है गाँव में जब मैं दिल्ली वापस आ रहा था तो तुम कितनी उदास थी? उस रात अगर मैं तुम्हारे पास न होता तो तुम उस दिन अनर्थ कर देती! उसी अनर्थ का डर मुझे कल रात को हो रहा था और इसीलिए मैं सुबह जल्दी घर लौट आया था!
मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी की मैं संगीता के सामने आत्महत्या या खुदखुशी जैसा शब्द इस्तेमाल कर सकूँ इसलिए मैंने अपनी बात थोड़ी घुमा कर कही थी, परन्तु संगीता ने जो जवाब दिया उसे सुन कर मैं अवाक रह गया!
जब इन्होने मुझे वो दिन याद दिलाया जब गाँव में मुझे इनके दिल्ली वापस लौटने की खबर रसिका ने मिर्च-मसाला लगा कर बताई थी, वो दिन याद कर के मुझे अपनी खुदखुशी करने की बात याद आ गई| उस रात मेरी मनोस्थिति बहुत-बहुत कमजोर थी, तभी मैंने उस रात आत्महत्या करने की कोशिश की थी! अगर उस रात ये न होते तो मैं सच में अपनी जान दे चुकी होती! लेकिन अभी मुझे इन्हें सच बताना था; "I...I’m sorry….पर कल...रात मैं इतना depressed हो गई थी की मेरे मन में खुदखुशी करने की इच्छा जन्म लेने लगी थी!" काँपते हुए होठों से मैंने अपनी मन की बात कही और बड़ी हिम्मत जुटा कर इनकी आँखों में देखने लगी|
संगीता की बात सुन के मेरी जान मेरी हलक़ में अटक गई! संगीता इस कदर निराश थी की वो अपनी हिम्मत हार चुकी थी! उसकी ख़ुदकुशी करने की बात ने मुझे बहुत डरा दिया था!
मैं: What?
मैंने काँपती हुई आवाज में संगीता को आँखें फाड़े देखते हुए कहा| मेरे चेहरे से अपनी पत्नी को खो देने का डर झलक रहा था और मेरा ये डर देख संगीता को सुई के समान चुभ रहा था!
मैंने इनकी आँखों में मुझे खोने का डर देख लिया था और मैं नहीं चाहती थी की इनके भीतर कोई डर रहे क्योंकि बस एक ये ही थे जो हमारे परिवार को सँभाले हुए थे इसलिए मैंने इन्हें आश्वस्त करने के लिए सच कहा; "I'm sorry! ये ख्याल मेरे दिमाग में आया था पर मैंने ऐसा-वैसा कुछ करने की नहीं सोची क्योंकि मैं जानती थी की अगर मुझे कुछ हो गया तो आप टूट जाओगे...इसलिए मैंने कुछ भी नहीं किया|" मैंने कह तो दिया मगर मेरी आवाज में वो वजन, वो अस्मिता नहीं थी जो की होनी चाहिए थी|
मैं: तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो?!
मैंने संगीता को गुस्से से डाँटते हुए पुछा| लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ की मेरे गुस्से का संगीता पर कोई असर नहीं होगा इसलिए मैंने उसे फिर प्यार से समझाते हुए कहा;
मैं: जान...तुम्हें पता है, कल जो मैंने तुम्हारी और बच्चों की हालत देखि थी उसके बाद मेरा खून खौलने लगा था! उस हरामजादे की गर्दन मेरे हाथ में थी और एक बार को मन कर रहा था की उसकी गर्दन तोड़ दूँ लेकिन मैंने उसे छोड़ दिया...जानती हो क्यों? क्योंकि मैं जानता था की अगर मैंने उस कुत्ते को जान से मार दिया तो मैं तुमसे और अपने परिवार से हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो जाऊँगा! और तुम...तुम खुदखुशी के बारे में सोच रही थी?!
मैंने बड़े प्यार से अपनी पत्नी को भावुक करते हुए उससे बड़े प्यार से तर्क किया था| अब समय था अपनी अंतिम प्यारभरी चाल का जिससे मैं संगीता के दिल से आत्महत्या जैसे बुरे ख्याल को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करने वाला था;
मैं: शायद मेरे ही प्यार में कोई कमी रह गई थी इसीलिए तुम्हें ये सब सोचना पड़ा!
मेरी आवाज में हताशा भरी पड़ी थी और मैं जानता था की मेरी पत्नी मुझे हताश होते हुए कभी नहीं देख सकती|
इनकी कही अंतिम बात की इनके प्यार में कोई कमी रह गई थी, मुझे बहुत चुभी! इतनी चुभी की मेरा दिल रो पड़ा और मेरे दिल के साथ मैं भी रो पड़ी; "नहीं...ऐसा नहीं है! मैं...मैं जानती हूँ की मैं गलत थी! मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए था, लेकिन मैं इतना डर चुकी थी की नहीं जानती थी की मैं जो (खुदखुशी की) सोच रही हूँ वो सही है या गलत! अब...अब मुझे आप पर भरोसा है..."
संगीता के शब्द उसकी आवाज से मेल नहीं खा रहे थे! मेरी कोशिशें नाकमयाब हो रहीं थीं और मुझे अब गुस्सा आने लगा था;
मैं: अगर तुम कुछ गलत कर लेतीं या तुम्हें कुछ हो जाता तो मैं उस हरामजादे (चन्दर) के टुकड़े-टुकड़े कर देता!
अगर संगीता को कभी कुछ होता तो मैंने उस बहनचोद चन्दर की जान ले लेनी थी! वहीं जब संगीता ने मेरी गुस्से से भरी बात सुनी तो वो डर के मारे काँप गई!
इनके मुँह से मरने-मारने की बातें सुन कर मैं घबरा गई थी, मैं जानती थी की इनके गुस्से का असली कारन मैं ही हूँ, मैं ही इन्हें अपनी बातों पर विश्वास नहीं दिल पा रही की मैं अब कभी भी खुदखुशी करने की बात नहीं सोचूँगी! जब मैं अपने पति को विश्वास न दिला पाई तो सिवाए उन्हें अपनी कसम से बाँधने के मेरे पास कोई चारा नहीं रह गया था; "नहीं...आपको मेरी कसम है! आप ऐसा कुछ भी नहीं करोगे!" मैंने इन्हें चन्दर की जान लेने से मना करते हुए अपनी कसम से बाँध दिया| "मैं पहले ही बहुत टूट चुकी हूँ अब और नहीं टूटना चाहती! इन पिछले 24 घंटों में मैंने बहुत से पाप किये हैं जिसके लिए मुझे सबसे माफ़ी माँगनी है, आप से...माँ से...पिताजी से और बच्चों से!” मेरे भीतर ग्लानि भरी पड़ी थी और वो अब बहार आने लगी थी|
संगीता की ग्लानि से भरी बातें सुन मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं उसे कैसे सम्भालूँ?!
मैं: क्यों खुद को इस तरह दोष दिए जा रही हो? क्यों खुद को इतना हरा हुआ महसूस कर रही हो? क्यों खुद को इस तरह बाँध कर रखे हुए हो? क्या तुमने हमारे होने वाले बच्चे के बारे में सोचा? जानती हो तुम्हारी ये मायूसी हमारे होने वाले बच्चे पर कितनी भारी पड़ सकती है?! बोलो...है तुम्हें इसका अंदाजा?
नेहा को देखो, मुझे गर्व है मेरी बेटी पर! उस नन्ही सी जान ने कल से अकेले आयुष को सँभाला हुआ है इसलिए उस छोटी सी बच्ची से सबक लो! तुम्हें आखिर किस बात की कमी है? क्या मेरे माँ-पिताजी तुमसे प्यार नहीं करते? क्या मैं तुम्हें प्यार नहीं करता? आखिर किस बात का डर है तुम्हें? हमने सीना चौड़ा कर के प्यार किया और शादी की है तो क्यों किसी से घबराना?!
मेरे सवालों ने संगीता पर गहरा प्रभाव छोड़ा था! संगीता की नजरें मुझ पर थीं और वो मेरे सवालों के जवाब मन ही मन दिए जा रही थी तथा मेरे लिए ये ऐसा था मानो संगीता एक नई शुरुआत करने जा रही हो! अब मुझे बस संगीता को आश्वस्त करना था;
मैं: रही आयुष की बात तो तुम्हें उसकी चिंता करने को कोई जर्रूरत नहीं है, माँ-पिताजी को आने दो मैं उनसे बात करता हूँ| तुम्हें बस मुझ पर भरोसा रखना है!
मैंने संगीता का दायाँ हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा|
इनके सवालों ने मुझे झिंझडो दिया था, इनकी कही बात सच्ची थी बस एक मैं ही बेवकूफ थी जो इतना डरे जा रही थी! "एक आप ही का तो सहारा है, वरना मैं कब का बह चुकी होती!" ये शब्द अनायास ही मेरे मुख से निकले थे!
लेकिन मेरा ये जवाब सुनते ही इन्होने मुझे प्यार से डाँटा;
मैं: यार फिर वही बात?! अगर आज के बाद तुम मुझे इस तरह हताश दिखी न तो मैं ...मैं तुम से कभी बात नहीं करूँगा?!
संगीता की हताशा से भरी बात सुन मैंने उसे प्यार से धमकाया, हालाँकि मेरी धमकी पूरी तरह से बिना सर पैर की थी जो की संगीता भी जानती थी तभी उसके चेहरे पर मुस्कान की एक रेखा खिंच आई थी!
"Sorry! This won't happen again!" संगीता ने अपनी मुस्कान को छुपाते हुए नजरें झुकाते हुए कहा|
संगीता पिघल रही थी और खुद को सुधारने की कोशिश कर रही थी और मैं ये देख कर खुश था! मैंने संगीता को अपने सीने से लगा लिया और उसके सर को चूमने लगा| मैं जानता था की संगीता अंदर से बहुत जख्मी है और भले ही वो मुझे अपने जख्म न दिखाए मगर मुझे पूरा यक़ीन है की मैं उसके ये जख्म अपने प्यार से जल्द ही भर दूँगा|
इनसे दिल खोलकर बात करने से मेरा मन हल्का हो चूका था लेकिन मुझे मेरा डर अब भी सता रहा था, हाँ भीतर मौजूद ग्लानि काफी हद्द तक कम हो चुकी थी| सबसे पहले मुझे माँ-पिताजी से कल दिन भर बात न करने की और उन्हें बेस्वाद तथा बिना नमक का खिलाने की माफ़ी माँगनी थी! ये मेरी जिंदगी की पहली और आखरी भूल थी जिसका मुझे प्रायश्चित करना था!
संगीता ख़ामोशी से मेरे सीने से लगी हुई कुछ सोच रही थी, वो अधिक न सोचे इसलिए मैंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा;
मैं: अच्छा अब आप आराम करो, कल रात से आप आराम से सोये नहीं हो|
मैंने संगीता के सर को चूमते हुए बड़े प्यार से कहा|
संगीता: लेकिन, मुझे अभी खाना बनाना है!
संगीता उठते हुए बोली, मैं उसे रोकता उससे पहले ही पिताजी का फ़ोन आ गया;
मैं: जी पिताजी|
मैंने संगीता का हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया और फ़ोन अपने कान पर लगाते हुए बोला|
पिताजी: बेटा, मैं और तेरी माँ बच्चों को ‘घुम्मी’ करा रहे हैं| तो हम चारों दोपहर तक आएंगे और खाना भी यहीं से लेते आएंगे, तुम लोग तब तक आराम करो|
बच्चे उदास थे और उनको खुश करने के लिए पिताजी ने घुमाने की सोची थी और उनके इस plan से हम मियाँ-बीवी को भी एक साथ समय व्यतीत करने का थोड़ा समय मिल गया था|
मैं: जी ठीक है|
मैंने फोन रखा और संगीता की तरफ देखा तो वो मुझसे नजरें चुराते हुए फिर कुछ सोच रही थी|
मैं: पिताजी का फोन था, वो, माँ और बच्चे दोपहर तक लौटेंगे तथा खाना अपने साथ लेते हुए आएंगे| तब तक हम दोनों को आराम करने का आदेश मिला है|
मैंने प्यार से संगीता को अपने सीने से लगाते हुए कहा|
संगीता: कल मैंने सब को बिना नमक का खाना खिलाया था न इसीलिए पिताजी बाहर से खाना ला रहे हैं!
संगीता निराश होते हुए बोली|
मैं: जान, ऐसा नहीं सोचते! माँ-पिताजी जानते हैं की बच्चों के यहाँ रहते हुए हमें एकांत नहीं मिलेगा इसलिए वो (माँ-पिताजी) बस हमें एक साथ गुजारने के लिए थोड़ा समय देना चाहते हैं|
मैंने संगीता के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए कहा|
संगीता: हम्म्म!
संगीता बस इतना बोली| मैंने उसे थोड़ा हँसाना चाहा और बोला;
मैं: तो चलो रजाई में!
हम दोनों को रजाई में प्यार करने में मज़ा आता था और मैंने ये बात बस संगीता के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए कही थी मगर मेरी कही बात का कोई असर नहीं हुआ|
मैं उठा और कपडे बदल कर लेट गया, संगीता ने मेरे दाहिने हाथ को अपना तकिया बनाया और मेरे सीने पर हाथ रख कर मुझसे लिपट गई| मैंने भी संगीता के बालों में अपनी उँगलियाँ फिरानी शुरू कर दी ताकि वो आराम से सो जाए, लेकिन मुझे महसूस हुआ की वो सो नहीं रही बल्कि आँखें खोले फिर से दीवारें देख रहीं है|
मैं: बाबू...छो जाओ!
मैंने जानबूझ कर तुतलाते हुए कहा ताकि संगीता मुस्कुराये...पर नहीं!
मैं: आज के बाद तुम कभी उदास नहीं होओगी, वरना इसका बुरा असर हमारे बच्चे पर पड़ेगा| ठीक है?
मैंने प्यार से कहा तो संगीता दबी हुई आवाज में बोली;
संगीता: हम्म्म...मैं पूरी कोशिश करुँगी|
मैं: तो अब सो जाओ, कल रात से आप जाग रहे हो|
मैंने संगीता की पीठ थपथपाते हुए कहा| संगीता को मनाने के लिए मैंने हमारे होने वाले बच्चे का सहारा लेना शुरू कर दिया था, चलो इसी रास्ते संगीता मेरी बात तो मान रही थी| खैर, पिताजी के आने तक हम दोनों एक दूसरे की बाँहों में लिपटे हुए सोते रहे|
मैं इनके आगोश में समा चुकी थी और जो करार मुझे मिल रहा था उसे बता पाना मेरे लिए सम्भव नहीं था| मेरा सर इनके सीने पर था और मैं इनके दिल की धड़कन साफ़ सुन पा रही थी| आज मैंने इनके दिल में मेरे लिए, हमारे होने वाले बच्चे के लिए, नेहा के लिए, आयुष के लिए पनप रहे डर को महसूस कर लिया था| मैं जानती हूँ की इन्हें मेरी कितनी फ़िक्र है, परन्तु मैं ये सोचती थी की ये सब सह लेंगे और मुझे तथा हमारे पूरे परिवार को सँभाल लेंगे लेकिन आज जब मैंने इनकी धड़कन सुनी तो मुझे एहसास हुआ की मेरी ही तरह इनके भीतर भी एक डर पनप चूका है जिस कारन ये बहुत बेचैन हैं! और एक तरह से मैं...मैं ही इनकी इस बेचैनी का कारण हूँ! 'मुझे इनकी ताक़त बनना था न की कमजोरी?!' मेरे अंतर्मन ने ये कहते हुए मुझे झिंझोड़ा| 'जो इंसान तुझ से इतना प्यार करता है, तेरी एक ख़ुशी के लिए सब कुछ करता है, सबसे लड़ पड़ता है, तू उसकी कमजोरी बन रही है! भले ही ये तुझसे कुछ न कहें मगर तुझे तो खुद तो समझना चाहिए न? आखिर तू इनके शरीर का आधा अंग है!' मेरे अंतर्मन की कही इस बात से मैं सतर्क हो गई थी| मुझे खुद पर काबू रखना था और जल्द से जल्द सँभलना था परन्तु मेरे जज्बात मुझे मायूसी की राह से मुड़ने नहीं दे रहे थे| देखते ही देखते मेरे मन के भीतर एक जंग छिड़ गई, एक तरफ मन का वो हिस्सा था जो इन्हें बहुत प्यार करता था और दूसरी तरफ वो हिस्सा जो की कल के हादसे से डरा हुआ था! मेरे मन का डरा हुआ हिस्सा फिर से हावी होने लगा था, मेरा डर मुझे दबाये जा रहा था और मुझे लग रहा था की मैं हार जाऊँगी लेकिन कहते हैं न ऊपर वाला हमेशा हमारे साथ होता है! मेरे मन में चल रही इस जंग के बारे में ये जान चुके थे तभी इन्होने अचानक से मेरे सर को चूमा और इनके इस एक चुंबन ने मेरे मन के भीतर चल रही लड़ाई का रुख मोड़ दिया! मेरा खुद को बदलने का आत्मविश्वास लौट आया था, इनका प्यार जीत गया था और मेरा डर हार चूका था लेकिन वो (मेरा डर) जाते-जाते भी मुझे नुक्सान पहुँचा गया था| मेरा डर अपने साथ पुरानी, इनसे प्यार करने वाली संगीता को ले जा चूका था! अब यहाँ जो संगीता रह गई थी, उसकी पहली प्राथमिकता इस परिवार को सँभालने की थी! मैं दिल से इनसे अब भी प्यार करती थी लेकिन मैं अपना ये प्यार जाहिर नहीं करना चाहती थी!
दोपहर के ढाई बज रहे थे और कल रात से कुछ न खाने के कारण पेट में चूहे दौड़ रहे थे, मैं उठा और मेरे उठते ही संगीता की नींद भी खुल गई! ठीक तभी दरवाजे की घंटी बजी, मैंने दरवाजा खोलने जाने लगा तो सनगीता ने मुझे रोक दिया और वो खुद दरवाजा खोलने गई| सावधानी बरतते हुए मैं भी संगीता के पीछे-पीछे बाहर आ गया| दरवाजा खुलते ही दोनों बच्चे दौड़ते हुए अंदर आये और मेरी टाँगों से लिपट गए, दोनों बच्चों के चेहरे खिले हुए थे क्योंकि अपने दादा-दादी जी के साथ घुम्मी कर के वो बहुत खुश थे! उधर संगीता ने दरवाजा खोलते ही माँ-पिताजी के पैर छुए उनसे माफ़ी माँगने लगी;
संगीता: माँ...पिताजी...मुझे माफ़ कर दीजिये! कल मैंने आपका बहुत अपमान किया आपसे बात न कर के, आपकी बातों का जवाब न दे कर, बिना नमक का खाना खिला कर आपके साथ बदसलूकी की!
संगीता ने हाथ जोड़कर अपनी नजरें शर्म से नीची करते हुए कहा|
माँ: बहु, ये तू क्या कह रही है?! हम समझ सकते हैं की तू किस दौर से गुजर रही है! और खाने में नमक जैसी छोटी सी बात पर तुझे लगा की हम तुझसे नराज हैं?! माँ-बाप कभी अपने बच्चों से इन छोटी-छोटी बातों पर नाराज होते हैं?! तू भी तो माँ है, क्या तू कभी नेहा और आयुष से इन छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो सकती है?
माँ ने संगीता को बड़े प्यार से समझाते हुए पुछा तो संगीता ने सर न में हिला दिया|
पिताजी: बेटी, इन छोटी-मोटी बातों को अपने दिल से न लगाया कर और जो कुछ हुआ उसे भूल जा!
पिताजी मुस्कुराते हुए बोले, जिससे संगीता के ऊपर से दबाव थोड़ा कम हुआ| फिर पिताजी ने मुझे देखा और मुझे आदेश देते हुए बोले;
पिताजी: और तू लाड साहब, वहाँ खड़ा-खड़ा क्या कर रहा है, चल सबको खाना परोस?
मैं: जी|
मैंने मुस्कुराते हुए कहा और रसोई से डोंगे निकालने घुसा की तभी संगीता भी मेरे पीछे-पीछे आ गई और एकदम से बोली;
संगीता: आप बाहर बैठो, मैं खाना परोसती हूँ|
संगीता की आवाज बड़ी सूखी सी थी, जबकि आमतौर पर वो इतने प्यार से बोलती थी की मुझे उस पर बहुत प्यार आता था, लेकिन आज उसकी आवाज में बदलाव था...एक अजब सी खुश्की थी! ऐसा लगता था मानो जैसे संगीता चाहती ही नहीं की मैं डोंगे निकालने की तकलीफ करूँ! क्या डोंगे निकलना, खाना परोसना इतना मेहनत वाला काम था? मुझे समझ नहीं आ रहा था की आखिर संगीता मेरे साथ ऐसा अजीब सा सलूक क्यों कर रही है? मैं उससे कुछ पूछता उससे पहले ही बाहर से माँ बोली;
माँ: अरे ला भई, खाना परोसने में कितना टाइम लेगा?
मैंने संगीता की बात को दरगुज़र किया और बाहर आ कर dining table पर बैठ गया| संगीता ने सब को खाना परोसा और फिर वो भी अपना खाना ले कर माँ की बगल में बैठ गई|
खाना खाने के दौरान आज सब चुप थे, बच्चे भी आज चुपचाप अपनी-अपनी थाली में खाना खा रहे थे और माँ-पिताजी एक दूसरी शक़्लें देखते हुए खाना खाने में लगे थे| आमतौर पर हम सभी खाना खाते समय कुछ न कुछ बातें करते थे परन्तु आज सन्नाटा पसरा हुआ था! आखिरकर पिताजी ने ही बातचीत शुरू करते हुए कहा;
पिताजी: बेटा तुम चारों कहीं घूमने चले जाओ| बहु का और बच्चों का मन बदल जायेगा|
मैं: जी ठीक है|
मैंने संक्षेप में पिताजी की बात का जवाब दिया, लेकिन तभी संगीता मेरी बात को काटते हुए बोली;
संगीता: पर पिताजी, अभी-अभी तो हम घूम कर आये हैं, फिर घूमने चले जाएँ? इन्हें (मुझे) काम भी तो देखना है!
माँ: बेटी, तू काम की चिंता मत कर, वो तो होता रहेगा| अभी जर्रुरी ये है की तुम दोनों (मैं और संगीता) खुश रहो|
माँ ने संगीता को समझाते हुए कहा|
संगीता: लेकिन माँ, मैं बिना आप लोगों के कहीं नहीं जाऊँगी|
संगीता ने अपनी बात साफ़ कर दी थी| मैं संगीता का डर महसूस कर चूका था, उसे लगता था की हमारी गैरमौजूदगी में चन्दर दुबारा आएगा और माँ-पिताजी से लड़ाई-झगड़ा करेगा|
मैं: रहने दो माँ, हम यहीं घूम आएँगे|
मैंने बात सँभालते हुए कहा| एक बार फिर सभी खामोश हो गए थे, खाना खाने के बाद मैंने दोनों बच्चों को अपने पास बुलाया;
मैं: नेहा...आयुष, बेटा आप दोनों कमरे में जाओ और अपना holiday homework पूरा करो|
नेहा ने मेरी बात सुनी और आयुष का हाथ पकड़ कर उसे अपने साथ कमरे में ले गई|
अब समय था माँ-पिताजी के सामने संगीता का डर रखने का ताकि वो भी संगीता को प्यार से सँभाल सकें|
मैं: पिताजी, मुझे आपसे और माँ से एक बात करनी थी|
मैंने बात की शुरुआत करते हुए कहा|
माँ: हाँ बोल बेटा|
मैं: माँ, संगीता को डर है की चन्दर फिर वापस आएगा और आयुष को अपने साथ ले जायेगा|
मैंने अपनी बात सीधे शब्दों में कही| मेरी बात सुन संगीता का सर शर्म से झुक गया|
माँ: ऐसा कुछ नहीं होगा बेटी, तू ऐसा मत सोच?
माँ ने संगीता की पीठ पर हाथ रखते हुए संगीता को होंसला देते हुए कहा|
संगीता: माँ ....वो जर्रूर आएगा|
संगीता घबराते हुए सर झुका कर अपनी बात दोहराते हुए बोली| माँ ने संगीता का कंधा रगड़ते हुए उसे हिम्मत देने लगीं|
मैं: माँ...पिताजी ...संगीता के डर का निवारण करना जर्रुरी है| मैंने इसे (संगीता को) बहुत समझाया, विश्वास दिलाया की ऐसा कुछ नहीं होगा मगर संगीता के दिल को तसल्ली नहीं मिल रही है, इसलिए मैं सोच रहा था की क्यों न हम अपनी तरफ से थोड़ी सावधानी बरतें, जैसे बच्चों को स्कूल लाना-लेजाना अब से हम ही करेंगे| मैं बच्चों के स्कूल में जा कर बात कर लूँगा की वो बिना हमारी आज्ञा के बच्चों को किसी और के साथ जाने न दें|
माँ-पिताजी मेरे सुझाव से बहुत खुश हुए थे मगर संगीता के चेहरे पर मुझे अब भी चिंता की रेखाएँ दिख रहीं थीं|
पिताजी: तेरा सुझाव बिलकुल सही है, सावधानी बरतने में कोई बुराई नहीं|
पिताजी मेरे समर्थन में बोले, लेकिन तभी संगीता ने फिर मेरी बात का काट कर दिया!
संगीता: लेकिन पिताजी, आप ही बताइये की क्या बच्चों को बंदिशों में बाँधने से उनके बचपन पर असर नहीं पड़ेगा?
संगीता की कही बात ने सभी को चुप करा दिया था, तभी माँ संगीता के समर्थन में आ गई और बोलीं;
माँ: बिलकुल सही कहा बेटी, इस तरह तो बच्चे डर में जीने लगेंगे|
संगीता का डर हमें आगे बढ़ने नहीं दे रहा था और सारी बात वापस वहीं की वहीं आ चुकी थी| मुझे समझ नहीं आ रहा था की संगीता का डर खत्म कैसे करूँ? ऊपर से संगीता के बार-बार मेरी बात काटने से और उसके डर को न भगा पाने के कारण मैं झुंझुला उठा और संगीता को गुस्से से देखते हुए बोला;
मैं: You want me to kill him (Chander)? Huh? Just say the word and I promise I'll kill that bastard!
मेरी आँखों में गुस्सा था ऐसा गुस्सा जिसे देख संगीता सहम चुकी थी!
संगीता: आप ये क्या कह रहे हो?
संगीता भोयें सिकोड़ कर मेरी ओर डर के मारे देखते हुए बोली, उसका डर और भी गहराता जा रहा था| उधर चूँकि मैंने अपनी बात अंग्रेजी में कही थी इसलिए माँ-पिताजी को मेरी बात बिलकुल समझ नहीं आई थी मगर संगीता की आँखों में डर देख वो समझ गए थे की बात बहुत गंभीर है!
पिताजी: ये...क्या कह रहा है ये बहु?
पिताजी ने चिंतित होते हुए संगीता से पुछा|
संगीता: ये...ये...
संगीता से मेरे द्वारा कहे शब्द दोहराये नहीं जा रहे थे इसलिए उसकी आवाज काँपने लगी थी! वहीं मैं जोश में भरा हुआ था सो मैंने गुस्से में कही अपनी बात दोहरा दी;
मैं: मैंने कहा की मैं उसका (चन्दर का) खून कर दूँगा?
पिताजी: क्या? तेरा दिमाग खराब हो गया है?
पिताजी गुस्से में मुझ पर चीखे|
पिताजी: जानता है आस-पड़ोस वाले क्या कहते हैं?...कहते हैं की भाईसाहब आपके लड़के को क्या हो गया है? जिसने आज तक किसी को गाली नहीं दी वो कल अपने ही चचेरे भाई को इतनी बुरी तरह पीट रहा था और उसकी जान लेने पर आमादा था! अब बता, क्या जवाब दूँ मैं उन्हें?
पिताजी को मेरा गुस्सा जायज नहीं लग रहा था| वहीं संगीता के चेहरे पर अब भी डर दिख रहा था जिससे मेरा गुस्सा उबलते-उबलते बाहर आ गया और मैंने dining table पर जोर से हाथ पटकते हुए कहा;
मैं: तो क्या करूँ मैं? कल ही उसे जान से मार देता मगर मैं अपने परिवार से दूर नहीं होना चाहता था इसीलिए मैंने उसे छोड़ दिया! अब संगीता के दिल में डर बैठा हुआ है तो आप ही बताओ मैं क्या करूँ?
जब पिताजी ने मुझे एक पिता नहीं बल्कि पति की नजर से देखा तब जाकर पिताजी को मेरा गुस्सा जायज लगा|
पिताजी: बेटा, इस समस्या का हल उसकी (चन्दर की) जान लेना तो नहीं है?!
इतना कहते हुए पिताजी ने मेरे कँधे पर हाथ रखा|
मैं: जब किसी के घर में कोई जंगली जानवर घुस आता है तब इंसान पहले अपने परिवार को बचाने की सोचता है न की ये की वो एक जीव हत्या करने जा रहा है!
मैंने बड़े ही कड़े शब्दों में अपनी बात रखी थी जो सब समझ गए थे|
पिताजी: बेटा, मैं तेरा गुस्सा समझ सकता हूँ लेकिन इस वक़्त ये कोई उपाय नहीं है इसलिए बेटा ठन्डे दिमाग से काम ले!
पिताजी मेरी पीठ थपथपाते हुए बोले|
माँ: बेटा शांत हो जा, देख बहु कितना सहम गई है|
माँ ने संगीता की तरफ इशारा करते हुए कहा| संगीता को इस तरह सहमा हुआ देख मैं खामोश हो गया और अपना सर पकड़ कर बैठ गया| इस समय मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था की मैं क्या करूँ? संगीता को मैंने प्यार से, गुस्से से, हर तरह से समझा कर देख लिया था मगर उसका डर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था| मैं चाहे कुछ भी कहूँ संगीता पर कोई असर नहीं होने वाला था, इसलिए मेरे भीतर गुस्सा भभकने लगा था! मन तो मेरा संगीता पर चिल्लाने का था मगर माँ-पिताजी के सामने ऐसा कर पाना नामुमकिन था!
संगीता के आने से पहले जब भी मैं कभी दोराहे पर खड़ा होता था तो मैं दारु पीने निकल जाता था, दारु पीने से मेरा दिमाग शांत होता था और मुझे कोई रास्ता सूझ जाया करता था| लेकिन अब मैं अपने वचन से बँधा था इसलिए शराब तो पी नहीं सकता था इसलिए मैंने किसी दूसरे नशे की ओर जाने की सोची! मैं घर से निकला और सीधा पानवाले के पास पहुँच गया, मैंने आज तक कभी सिगरेट नहीं पी थी क्योंकि मुझे लगता था की सिगरेट की लत मुझसे कभी नहीं छूटेगी पर इस बार मैं बहुत हताश महसूस कर रहा था और इस (सिगरेट) बला को अपने होठों से लगाने को मजबूर था! मैंने एक छोटी gold flake ली, पहले सोचा वहीं पी लेता हूँ लेकिन फिर ख्याल आया की सिगरेट का पहला कश लेते ही मैं खाँसने लगूँगा और ये नजारा देख आस-पास के लोग हँस पड़ेंगे! सब कहेंगे की अगर झिलती नहीं है तो पीता क्यों है?! अपनी किरकिरी होने से बचाने के लिए मैं सिगरेट ले कर घर पहुँचा और छत पर आ कर सिगरेट सुलगाई मगर इससे पहले की मैं पहला कश खींचता संगीता आ गई और मेरे होठों से सिगरेट खींच कर फेंक दी!
"ये आप क्या कर रहे हो?" मैंने गुस्से से इनके होठों से सिगरेट खींचते हुए पुछा| सवाल तो मैंने पूछ लिया लेकिन इन्होने मुझे कोई जवाब नहीं दिया बस चुप-चाप टकटकी बाँधें मुझे देखने लगे| इनकी आँखें मुझसे सवाल कर रहीं थीं और मेरे पास उन सवालों का कोई जवाब नहीं था! आज जिंदगी में पहलीबार मुझे इनकी आँखें चुभ रहीं थीं और ये चुभन मेरे दिल में टीस बन कर उठ रही थी! आज मैंने इन्हें हताश महसूस किया था और इनकी इस हताशा का कारण मैं ही थी! मैं ही इन्हें चाह कर वो प्यार नहीं दे पा रही थी जिस पर इनका हक़ था! मेरे ही कारण आज ये इतना हताश हो गये, इतना तड़प उठे की इन्होने सिगरेट को छुआ, जबकि मैं दावे से कह सकती हूँ की इन्होने आजतक कभी सिगरेट नहीं पी और ना ही आगे कभी पीयेंगे!
आमतौर पर अगर ऐसा कुछ हुआ होता या कभी मैंने इनकी चोरी पकड़ी होती तो मैं इन्हें इनकी गलती का एहसास दिलाने के लिए इनके गले लग जाया करती और उतने भर से ही ये पिघल जाया करते तथा कान पकड़ कर बड़े प्यार से बोलते; Sorry जान, आगे से ऐसा कभी नहीं करूँगा!" लेकिन आज हालात कुछ और थे, मैं अब वो पहले वाली संगीता नहीं रही थी जो इन पर अपना प्यार जाहिर किया करती थी! मुझसे इनकी नजरों की वो चुभन बर्दाश्त नहीं हो रही थी इसलिए मैं बिना कुछ और कहे, सर झुका कर नीचे आ गई तथा बच्चों का homework कराने में खुद को व्यस्त कर लिया| कुछ देर बाद ये भी नीचे आ गए, मुझे लगा की ये मुझपर अपनी नाराजगी जाहिर करेंगे...पर नहीं, इन्होने ऐसा कुछ भी नहीं किया| बल्कि इन्होने आके मुझसे बड़े प्यार से पूछा; "जान, पिक्चर चलना है?" इनके इस मीठे से सवाल पर मैंने अपनी बर्बरता दिखते हुए सर न में हिलाया और बाहर आ कर dining table पर रात के खाने के लिए सब्जी काटने बैठ गई|
संगीता की पिक्चर जाने के लिए न सुन के मैं सोच में पड़ गया की मेरी संगीता को क्या हो गया है? मेरी उस संगीता को जिसे मैं प्यार करता हूँ, जो मेरी पत्नी है, मेरे बच्चों की माँ है, मेरे होने वाले बच्चे की माँ है; आखिर उसे हुआ क्या है? वो कहाँ चली गई? क्या मेरा प्यार कम पड़ गया है या शायद अब मेरे प्यार में वो ताकत नहीं जो उसे फिर से हँसा दे, उसका हर गम भुला दे?! मेरी हर बात मानने वाली मेरी पत्नी कहाँ चली गई? मैं ऐसा क्या करूँ की वो फिर से हँस पड़े ताकि इस घर में जो ग़म का सन्नाटा फैला है वो संगीता की हँसी सुन कर खत्म हो जाए! मेरा घर संगीता की किलकारियाँ सुनने को तरस गया था, मुझे लगा था की शायद पिक्चर जाने के बहाने संगीता थोड़ा सँभल जाए, थोड़ा romantic हो जाए या फिर मैं थोड़ा romantic हो जाऊँ मगर यहाँ भी बदनसीबी ने दरवाजा मेरे मुँह पर दे मारा! ठीक है..."ऐ किस्मत कभी तू भी मुझ पे हँस ले, बहुत दिन हुए मैं रोया नहीं!"
खैर, अब बारी थी बच्चों की जिन्हें मैंने कल से समय नहीं दिया था और मेरा मानना था की उन्हें अभी से सब पता होना चाहिए वरना आगे चल के वो मुझे तथा संगीता को गलत समझेंगे| नेहा तो लगभग सब जानती थी, समझती थी पर आयुष सब कुछ नहीं जानता था और मैं इस वक़्त इतना निराश महसूस कर रहा था की मेरा मन कर रहा था की आयुष को अभी से सब कुछ पता होना चाहिए!
मैं: आयुष...नेहा...बेटा इधर आओ, पापा को आप से कुछ बात करनी है|
बच्चों का मन पढ़ाई करने का था नहीं, मेरी बात सुनते ही दोनों ने अपनी किताब फ़ट से बंद कर दी और मेरे पास आ गए| मैं पलंग पर अपनी पीठ टिका कर बैठ गया, दोनों बच्चे मेरी अगल-बगल बैठ गए और मैंने हम तीनों पर रजाई खींच ली! नेहा मेरी दाहिनी तरफ बैठी थी और आयुष मेरी बाईं तरफ, दोनों बच्चे मुझसे सट कर बैठे थे|
मैं: बेटा, मुझे आप दोनों को कुछ बातें बतानी है|
इतना कह मैंने एक गहरी साँस ली और अपनी बात आगे बढ़ाई;
मैं: बेटा, आज जो बातें मैं आपको बताने जा रहा हूँ ये बातें आपको पता होनी चाहिए क्योंकि कल जो भी कुछ हुआ वो इन्हीं बातों के कारण हुआ|
बच्चे मेरी इतनी बात सुनकर मेरी ओर उत्सुकता से देख रहे थे|
मैं: बेटा, मैं आपकी मम्मी से बहुत प्यार करता हूँ और वो भी मुझे बहुत प्यार करती हैं| आपकी मम्मी की शादी मुझसे पहले उस आदमी (चन्दर) से हुई थी जो कल आया था!
चन्दर का ख्याल आते ही मेरा गुस्सा फिर उबलने लगा था, लेकिन तभी नेहा ने उत्सुकता से मेरी बात काट दी;
नेहा: वो...पुराने पापा?
उस आदमी को अपना पापा कहते हुए नेहा को बहुत तकलीफ हुई थी और उसके चेहरे पर दर्द झलकने लगा था|
मैं: हाँ जी बेटा|
मैंने नेहा के सर पर हाथ रखते हुए बड़े भारी मन से कहा| अब मैंने अपना ध्यान दोनों बच्चों की ओर किया और बोला;
मैं: लेकिन आपकी मम्मी उस आदमी से नहीं बल्कि मुझसे प्यार करती हैं क्योंकि वो बहुत गन्दा इंसान है!
ये सुन कर आयुष घबराने लगा था| मैंने अपना ध्यान नेहा पर केंद्रित किया और बोला;
मैं: नेहा बेटा, आप तो जानते हो?
नेहा ने मेरे सवाल का जवाब अपना सर हाँ में हिला कर दिया| मैंने वापस अपना ध्यान दोनों बच्चों पर केंद्रित किया और बोला;
मैं: बेटा वो आदमी शराब पीता है, आपकी मम्मी के साथ मार-पीट करता था इसीलिए आपकी मम्मी ने कभी उससे प्यार नहीं किया| जब आपकी मम्मी की उससे शादी हुई थी और हम दोनों (मैं और संगीता) पहलीबार मिले थे तब ही से आपकी मम्मी मुझे प्यार करने लगीं थीं मगर उन्होंने (संगीता ने) मुझे कभी बताया नहीं| मैं भी उस वक़्त कच्ची उम्र का था और प्यार क्या होता है ये नहीं जानता था|
बच्चों का डर अब मिटने लगा था| मैंने अब बारी-बारी बच्चों से बात करनी शुरू की;
मैं: फिर एक दिन आपकी मम्मी यहाँ आईं...
इतना कह मैंने आयुष की तरफ देखा और बोला;
मैं: तब नेहा बिलकुल आपकी उम्र की थी, उस दिन आपकी मम्मी ने मुझे बताया की वो मुझसे कितना प्यार करतीं हैं| उस दिन मुझे भी अपने भीतर मौजूद आपकी मम्मी के लिए प्यार का एहसास हुआ था, लेकिन उस वक़्त मैं इतना बड़ा नहीं हुआ था की मैं आपकी मम्मी से शादी कर सकूँ! हमारा प्यार इसी तरह धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा और फिर वो दिन आया जब मैं गाँव आया| उन दिनों में मैं और आपकी मम्मी बहुत नजदीक आ गए, इतना आजदीक आये की हम एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते थे| हमारा प्यार सब बंधन तोड़ चूका था और तब...
इतना कह मैंने आयुष के गाल को सहलाया और अपनी बात कही;
मैं: बेटा (आयुष) आप अपनी मम्मी के पेट में आये|
मैंने आयुष के दोनों कँधे पकड़र और उसकी आँखों में देखते हुए बोला;
मैं: आयुष बेटा, आप मेरा खून हो! आप मेरे बेटे हो!
मेरी आवाज में आत्मविश्वास झलक रहा था और मेरा ये आत्मविश्वास देख कर आयुष का डर काफूर हो चूका था| चूँकि मेरा ध्यान आयुष पर था तो इस कारण नेहा अकेला महसूस करने लगी थी;
नेहा: और पापा जी, मैं?
अब मैंने अपना ध्यान नेहा की ओर केंद्रित किया और बोला;
मैं: बेटा आप को तो मैं सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ! क्या आपको लगा की मैं आपसे प्यार नहीं करता?
मैं नेहा से ये नहीं कहना चाहता था की वो मेरा खून नहीं है इसलिए मैंने बात थोड़ा घुमा दी| नेहा ने मेरे सवाल के जवाब में सर न में हिलाया और मुस्कुराते हुए बोली;
नेहा: पापा जी, मैं जानती हूँ की आप सबसे ज्यादा मुझसे प्यार करते हो!
नेहा खुद पर गर्व करती हुई बोली| अब जा कर नेहा का चेहरा पहले की तरह खिल गया था| मैंने आयुष की ओर फिर से देखा और उसके भीतर जोश भरते हुए बोला;
मैं: बेटा उस आदमी (चन्दर) को लगता है की आप उसके बेटे हो, मगर आप तो मेरे बेटे हो इसलिए वो आपको जबरदस्ती अपने साथ ले जाना चाहता था|
इतना सुनते ही आयुष जोश से भर उठा और अपनी हिम्मत बुलंद कर बोला;
आयुष: मैं उसके साथ नहीं जाऊँगा!
मैं: बिलकुल नहीं जाओगे! आप मेरे बेटे हो और जब तक मैं आपके पास हूँ आपको मुझसे कोई अलग नहीं कर सकता!
आयुष ने मेरी बात सुनी और मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथ पंखों के समान खोल दिए तथा मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया| अब समय था नेहा की बहादुरी की सराहना करने का, मैंने आयुष की ओर देखा और बोला;
मैं: बेटा, कल आपने देखा की आपकी दीदी ने अपने बड़े होने का कैसे फ़र्ज़ निभाया?! आप बहुत तंग करते हो न अपनी दीदी को और कल देखो उन्होंने (नेहा ने) न केवल आपको बल्कि आपकी मम्मी को भी अकेला संभाला!
अपनी तारीफ सुन नेहा शर्माने लगी और सर झुका कर बैठ गई! मैंने नेहा की ओर देखा और उसे अपने पास बुलाते हुए बोला;
मैं: I’m proud of you मेरा बच्चा!
ये सुनते ही नेहा मेरे सीने से लग गई, उसे आज खुद पर बहुत गर्व हो रहा था!
आयुष: I love you दीदी!
आयुष मुस्कुराते हुए नेहा से बोला और उसके जवाब में नेहा भी आयुष से मुस्कुराते हुए बोली;
नेहा: I love you too आयुष!
दोनों बच्चे मेरे सीने से कस कर चिपके हुए थे, मैंने बारी-बारी दोनों के सर को चूमते हुए उन्हें खूब प्यार किया|
अब जा कर दोनों बच्चों का मन हल्का हुआ था और वो ख़ुशी से चहकने लगे था| दोनों ने मेरे साथ pillow fight करने की पेशकश की और मैंने भी ख़ुशी-ख़ुशी हाँ कह दी| दोनों बच्चे एक ही team में हो लिए और अपने-अपने तकिये से मुझे मारने लगे| दोनों बच्चों ने मुझे पलंग पर चित्त लिटा दिया, आयुष छोटा था तो वो मेरी छाती पर चढ़ गया और नेहा मेरे सिरहाने बैठ गई| फिर दोनों बच्चों ने मुझे तकिये से मारना शुरू किया, मेरे पास तकिया नहीं था इसलिए मैंने उन्हें गुदगुदी करना शुरू कर दिया| पूरे घर में बच्चों की हँसी गूँजने लगी थी, ऐसा लगता था मानो जैसे किसी खंडर में कोई आवाजों का शोर गूँजने लगा हो! बच्चों की इस किलकारी ने मेरे भीतर एक अजब सा आत्मविश्वास जगा दिया था तथा मैंने फैसला कर लिया था की मैं सनगीता को हँसा कर रहूँगा, बस जर्रूरत थी तो एक मौके की… और कुछ ही देर में वो मौका खुद मेरे पास आ गाया!
मेरी और बच्चों की हँसी कहकहा सुन माँ मेरे कमरे में आईं और मुझे अपना फोन देते हुए बोलीं;
माँ: बेटा तेरा फ़ोन नहीं मिल रहा था इसलिए तेरे पिताजी ने मुझे कॉल किया, उनसे ज़रा बात कर ले|
मैंने पिताजी से बात की तो पता चला की वो किसी party के पास बैठे हैं तथा कल के लिए कुछ काम बता रहे हैं| उनसे बात कर मैंने फ़ोन माँ को दिया तो पाया माँ अपने चेहरे पर आस लिए हुए मुझे देख रहीं हैं| उन्होंने अपना फ़ोन लिया और बोलीं;
माँ: बेटा, आज बच्चों को यूँ हँसता-खेलता देख मेरा दिल भर आया! इन्हें (बच्चों को) तो तूने हँसा दिया, अब जरा बहु को भी हँसा दे!
माँ की आसभरी बात सुन मैंने उनके भीतर उम्मीद जगाते हुए कहा;
मैं: मैंने संगीता से पिक्चर जाने को कहा तो उसने मना कर दिया! आप उसे तैयार करो बाकी मुझ पर छोड़ दो, वादा करता हूँ की वो हँसती हुई वापस आएगी|
मैंने जोश में भरते हुए कहा|
माँ: मैं अभी बात करती हूँ|
माँ उम्मीद की रौशनी लिए हुए बाहर चली गईं| इधर मैंने बच्चों को homework करने में लगा दिया और मैं अपने laptop पर कुछ reports बनाने में लग गया|
कमरे से आ रही इनकी और बच्चों की हँसने की आवाज से मैं मन्त्र मुग्ध हो गई थी| वो हँसी, वो किलकारियाँ मेरे लिए किसी मधुर संगीत के समान थीं जिन्हें सुनते हुए मेरा मन प्रसन्न हो गया था! आज 24 घंटों बाद मुझे घर में फिर से हँसी- ठहाका सुनाई दिया था और मेरी ख़ामोशी से जो सन्नाटा पसरा हुआ था वो अब खत्म हो चूका था! इन्हें बच्चों के साथ मस्ती करते सुन मेरा भी मन कर रहा था की काश मैं भी वहाँ इनके साथ होती, मगर मैं ये सोच कर संतुष्ट हो गई की चलो मैं न सही लेकिन मेरे पति, मेरे बच्चे तो खुश हैं! वैसे भी मुझ में अब अपनी ख़ुशी व्यक्त करने की ताक़त नहीं रही थी!
मैंने इनके और बच्चों की किलकारियों को सुनते हुए खुद को मटर छीलने में व्यस्त कर लिया| तभी माँ मेरे पास आ कर बैठ गईं और उनके चेहरे पर भी घर में गूँज रही हँसी को सुनके मुस्कान फैली हुई थी| माँ ने बड़े प्यार से मेरे गाल को सहलाया और बोलीं; "बहु, देख बाहर जायेगी तो थोड़ी हवा-बयार लगेगी और तेरा मन बदलेगा, साथ ही मानु को भी अच्छा लगेगा|" माँ की प्यार से कही बात को मैं कैसे टालती? हलाँकि माँ चाहतीं थीं की मैं खुश रहूँ मगर मेरा मन तो बस अपने पति और अपने बच्चों की ख़ुशी चाहता था|
मैं, माँ का दिल रखने के लिए नकली मुस्कान के साथ उठी और हमारे कमरे में आई, दोनों बच्चे computer table पर बैठे हुए अपनी पढ़ाई कर रहे थे तथा ये लैपटॉप में अपना काम कर रहे थे| "क्या मैं laptop use कर सकती हूँ?" मैंने नकली मुस्कान लिए हुए कहा, मेरे पति मुझसे इतना प्रेम करते हैं की वो मेरे सारे जज्बात समझ जाते हैं इसलिए इन्होने इस वक़्त मेरी ये नकली मुस्कान भी पकड़ ली थी| इन्होने laptop मेरी ओर बढ़ाते हुए कुछ कहना चाहा, परन्तु मैंने इन्हें कहने का कोई मौका नहीं दिया, पता नहीं क्यों पर मुझ में इनका सामना करने की हिम्मत नहीं थी! खैर, laptop ले कर मैं बाहर dining table पर आ गई और माँ के सामने बैठ कर bookmyshow का page खोला और उसमें PK फिल्म की ticket book करने लगी| बीते कुछ दिनों में मैंने इनसे बहुत कुछ सीखा था, जैसे internet पर खरीदारी करना, ticket book करना, vpn चलाना आदि| बहरहाल, pk film के सारे show या तो शुरू हो चुके थे या फिर housefull थे, बस रात के shows ही बाकी थे| मेरे दिमाग के लिए ये एक बहाना था मगर मेरा मन इनकी और बच्चों की ख़ुशी चाहता था इसलिए मैंने माँ से रात के show के लिए जाने की इज्जाजत माँगी; "माँ, अभी तो सारे show booked है, बस रात के show खाली हैं?" इतना कह मैंने अपना सवाल अधूरा छोड़ दिया जो माँ ने एकदम से पकड़ लिया; "तो बेटी रात को पिक्चर चले जाओ, इसमें पूछने की क्या बात है? बच्चों की छुट्टियाँ चल रहीं हैं तो तेरे साथ-साथ उनका भी दिल बहाल जाएगा| हाँ लेकिन मानु से कहियो की गाडी ध्यान से चलाये|" माँ ने बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए मुझे इजाजत दे दी| अच्छा ही हुआ जो माँ ने बच्चों को साथ ले जाने को कहा जिससे इनका ध्यान अब बच्चों पर ज्यादा होता और मैं अपने ख्यालों को इनके पढ़ने से बचा पाती|
"जी माँ" मैंने बड़े संक्षेप में उत्तर दिया और 4 tickets book कर दी| अब मुझे इनको बताना था की मैंने पिक्चर जाने के लिए tickets book कर दी हैं, पर मुझ में हिम्मत नहीं थी इसलिए मैंने booking page confirmation वाला page खोले हुए ही इन्हें laptop ले जा कर दे दिया| इन्होने सीधा booking conformation page देखा और मुस्कुरा उठे| मैं पलट कर कमरे से बाहर जा रही थी जब इन्होने पीछे से अपना सवाल पुछा; "जान, रात का खाना बाहर खाएँ?" इनका सवाल सुन मैं ठिठक कर रुक गई और मुड़ कर इन्हें देखा, मुझ में कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी इसलिए बड़ो मुश्किल से मैं अपनी हिम्मत जुटाते हुए बोली; "जी"! इतना बोल मैं फिर बाहर वापस आ कर dining table पर बैठ कर मटर छीलने लगी|
"माँ हम सब रात का show देखने जाएंगे और आते-आते हमें ग्यारह बज जाएँगे|" मैंने नकली मुस्कान लिए हुए माँ को देखते हुए कहा| माँ ने मेरे चेहरे पर आई नकली मुस्कान को मेरी ख़ुशी मान लिया और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए उठ कर चली गईं| उन्हें तसल्ली थी की मेरा मन अब दुखी नहीं है, जबकि मैं इस वक़्त अब भी इनसे सामना करने से डरी हुई थी क्योंकि इनके नजदीक होते हुए मेरे से अपना प्यार व्यक्त कर पाना मुश्किल हो जाता| ये घर से निकलते ही मुझसे अपना प्यार व्यक्त करते और मुझे सब कुछ जानते-बूझते खामोश रहना था जो की मेरे अनुसार बहुत-बहुत गलत था! फिर मैं ये भी नहीं चाहती थी की ये मेरा मन पढ़ लें क्योंकि मेरा मन पढ़ कर इन्हें मेरे मन की व्यथा समझ आ जाती तथा ये और भी टूट जाते!
जारी रहेगा भाग - 4 में...

तुझे मेरी तारीफ नहीं करनी न कर...................
मगर बहाना तो अच्छा मारा कर

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