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Fantasy देवत्व - एक संघर्ष गाथा

ashish_1982_in

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अध्याय - 4

परंतु अब याग्नेश कोई मानव नहीं दरिंदा बन गया था। उसने उस कन्या के सारे वस्त्र बड़ी निर्दयता पूर्वक फाड़ दिए और उसे पूरा निर्वस्त्र कर दिया उस कन्या ने एक हाथ से अपने स्तन और दूसरे हाथ से अपनी योनि को ढक कर अपनी लाज बचाने का प्रयास किया , परंतु याग्नेश के इरादे कुछ और थे ।

अब आगे--------



याग्नेश ने अपनी मजबूत बांहों से उस कन्या को उठाकर वहां बड़े क्रिस्टल के ऊपर लोहे के एक बड़े से हुक में उल्टा लटका दिया ।

लोहे के उस पैने हुक के शरीर मे धसते ही, वह कन्या छटपटाने लगी जोर जोर से चीखने लगी ,

याग्नेश ने उसकी गर्दन को पकडकर स्थिर कि फिर उसकी आंखों में देखकर कुछ बुबुदबुदाया न जाने कोई मंत्र शक्ति थी या कोई सम्मोहन , वह कन्या एकदम स्थिर हो गई।


याग्नेश ने अब वहां पड़ा एक बड़ा सा खंजर उठाया उस क्रिस्टल के आगे घुटनों पर बैठकर उसने उस खंजर को अपने पति से लगाया और कुछ मंत्र पढ़े और वह खंजर लेकर खड़ा हो गया।

बाएं हाथ के उसने उस कन्या के बाल पकड़े और दाहिने हाथ से अभिमंत्रित किया हुआ खंजर उसने उस कन्या की गर्दन पर चला दिया, धीरे-धीरे गर्दन काटता हुआ वह कुछ मंत्र बुदबुदाने लगा ।

उस कन्या की गर्दन से रिस्ता हुआ लाल रक्त काले बड़े क्रिस्टल पर गिरने लगा , अब गर्दन उसके धड़ से अलग हो चुकी थी ,

उसके सिर कटे हुए धड़ से तेज रक्त प्रवाह उस क्रिस्टल को भिगो रहे थे जैसे-जैसे रक्त उस क्रिस्टल पर पड रहा था वह क्रिस्टल एक बैंगनी रंग के प्रकाश से जगमगाने लगा ।
याग्नेश थोड़ी देर उस क्रिस्टल के आगे 1 आसन पर बैठकर कुछ मंत्र पढ़ने लगा , जब उसने देखा कि उस कन्या का सारा रक्त उस क्रिस्टल पर गिर चुका है तो वो खंजर लेकर एक बार फिर खड़ा हुआ ।

वहां आश्चर्य की एक बात और हुई कि उस कन्या के शरीर से इतना इतना रक्त बहा कि वहां चारों तरफ रक्त होना चाहिए था, परंतु वहां उस कन्या के रक्त की एक भी बूंद नजर नहीं आ रही थी । सारा रक्त वह क्रिस्टल अपने भीतर सोख चुका था।

याग्नेश एक बार फिर खड़ा हुआ उसने वह खंजर उस कन्या के धड़ के पेड़ से लेकर सीने तक चलाया और पूरा चीर डाला, उसने उस कन्या की सारी पेट की आंतडियां बाहर निकाल ली फिर उन आंतडियों का हार बना कर उसने उस क्रिस्टल को पहना दिया ।

उसके बाद उसने उस कन्या के सीने में हाथ घुसा कर उसका ह्रदय भी बाहर निकाला और उस हृदय को अपने हाथों से निचोड़ कर उसमें बचा कुचा रक्त भी उसने उस क्रिस्टल पर चढ़ा दिया ऐसा करते ही उस क्रिस्टल का बैंगनी प्रकाश और ज्यादा बढ़ गया और एक अजीब सी आवाज वहां गूंजने लगी जिसको यदि कोई और सुन ले तो उसकी रीढ़ की हड्डी तक सिरहन दौड़ जाए परंतु उस आवाज को सूनकर याग्नेश की प्रसन्नता का कोई ठीकाना न था ,

यह आवाज थी अंधेरे के राजा शैतान इब्लीस की ।

याग्नेश -- ए मेरे मालिक , अंधेरों के राजा परम शक्तिशाली इब्लीस मेरा आपको कोटि-कोटि नमन, आज आपको इतने वर्षों बाद अपने समक्ष पाकर मैं धन्य हो गया ।

इब्लीस -- कहो मुझे क्यों याद किया।


याग्नेश -- ए मेरे आका , इतने वर्षों से मैंने लगातार आप की आराधना की है , मैंने अपने भीतर की मानवता को मार कर हर वह काम किया है जो आपको प्रिय हो , परंतु अभी मैं आपकी शक्तियों से दूर हूं ।
एक अदना सा देवदूत भी मुझे आकर धमका कर चला जाता है और मैं कुछ नहीं कर पाता हूं, ऐसा क्यों ??

आखिर क्या कमी रह गई मेरी आराधना में, आज मेरे शत्रु प्रबल है, वह मेरी गुफा को और मेरी पूजा स्थल को तहस-नहस करके चले गए , मेरे अनुयायियों को निर्ममता पूर्वक मौत के घाट उतार दिया और मैं विवश शक्तिहीन उनका कुछ भी बिगाड़ने में असमर्थ हूं , कृपया मेरी सहायता करें मेरे मालिक ।


इब्लीस -- इसका कारण भी तुम ही हो याग्नेश। तुम अब तक दो नावों पर सवारी करते आए हो जो कभी भी मंजिल तक नहीं पहुंचा सकती। एक और तो तुम देवताओं की भी शक्ति प्राप्त करना चाहते हो और दूसरी ओर मेरी काली शक्तियां भी ।

तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिए अंधेरा और उजाला कभी एक साथ नहीं रह सकता , तुमने सफेद क्रिस्टल में मेरी शक्तियों से भरपूर काले क्रिस्टल को मिलाने का प्रयत्न किया जिसके फलस्वरूप मेरा वह काला क्रिस्टल भी शक्तिहीन हो गया यदि तुम मेरी काली शक्तियां प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हें मेरे प्रति संपूर्ण समर्पण करना होगा अपनी आत्मा मुझे समर्पित करनी होगी।

याग्नेश -- क्षमा करें मेरे मालिक क्षमा करें , मैंने विचार किया था कि यदि देवताओं की शक्ति और आपकी काली शक्तियां दोनों मुझे प्राप्त हो जाए तो मैं इस संसार कर सर्वशक्तिमान बन जाऊंगा इसी विचार से मैं इतने वर्षों तक यह गलतियां करता रहा।


इब्लीस - देवताओं की शक्तियां भी तुम प्राप्त कर सकते हो उसके लिए अभी समय है । उससे पहले तुम्हे मेरी काली शक्तियां अपने भीतर समानी होगी , जब तुम पूर्णतया मेरी शक्तिया प्राप्त कर लोगे तब देवताओ की शक्तियां प्राप्त करने का मार्ग भी तुम्हे प्राप्त हो जाएगा । तूम्हे यह याद रखना होगा एक समय पर एक ही रास्ते पर चलकर अपनी मंजिल तक पहुंचा जा सकता है।

याग्नेश -- मेरे पुर्व के सारे अपराध क्षमा करें मेरे मालिक अब मैं अपने आप को और अपनी आत्मा को , आप के सुपुर्द करता हूं , इसे स्वीकार करें।।

इतना कहकर याग्नेश ने खंजर उठाया और अपने सीने पर जहां दिल होता है ठीक उसी जगह प्रहार किया उसके ह्रदय में वो खंजर घुस गया और बहने लगी लाल रक्त की एक धारा
अपनी असहनीय पीड़ा को सहते हुए, ह्रदय में खंजर धसा होने के बावजूद भी , याग्नेश ने अपनी पूरी शक्ति एकत्रित करके आपने अंजलि में हृदय से बहते हुए रक्त को लिया और उस काले क्रिस्टल पर चढ़ा दिया, इसी के साथ याग्नेश का शरीर एक और लुढ़क गया।

जैसे ही याग्नेश का शरीर एक और लुढ़क गया उसी समय काले क्रिस्टल से एक बैंगनी रंग का प्रकाश याग्नेश के शरीर में प्रवेश करने लगा और आश्चर्यजनक रूप से देखते ही देखते उसके ह्रदय में धंसा हुआ खंजर अपने आप बाहर निकल आया। उसके घाव भरने लगे उसका शरीर पहले से और ज्यादा ताकतवर और सुदृढ़ बनने लगा । धीरे धीरे याग्नेश की आंखें खोल दी उसकी आंखों का रंग अब बिल्कुल काला हो गया था ।

बाहर गुफा के ऊपर घने बादलों की गर्जना और बिजली कड़कने की भयंकर आवाज से वातावरण और भी भयावह हो गया था वन के पशु सभी न जाने सभी ना जाने किस अनिष्ट की आशंका से शोर मचा रहे थे और वहां तहखाने के भीतर याग्नेश अब पूरी तरह होश में आ गया था ।

अब वह पहले वाला याग्नेश नहीं रहा था , इब्लीस ने उसे पृथ्वी पर मौजूद सभी काली शक्तियों का स्वामी बना दिया था अब उसकी आत्मा इब्लीस से जुड़ चुकी थी , याग्नेश ने अपने दोनों हाथ जोड़े और अपना सिर नीचे करके उस क्रिस्टल के आगे बैठ गया।

इब्लीस -- पुत्र अब तुम मेरा अंश बन चुके हो तुम्हारे भीतर अब वह असीम शक्ति समा गई है , जिसका संसार में कोई भी सामना नहीं कर सकता। परंतु ध्यान रहे तुम्हें केवल खतरा उसी से है जो तुम्हारा ही कोई अंश होगा और उसने अच्छाई और बुराई दोनों शक्तियों का संतुलन बना लिया हो।


कितना कहकर इब्लीस वहां से चला गया। इब्लीस के जाने के बाद याग्नेश इब्लीस के अंतिम शब्दों पर गौर करने लगा कि उसका ही कोई अंश उसके लिए खतरा बन सकता है।

उसका अंश यानी उसका पुत्र जिसको उसकी आंखों के सामने नगर वालों ने उसके सारे परिवार के साथ जलाकर राख कर दिया था ।

याग्नेश ने सिर झटक कर इन सब विचारों को छोड़ा , अब उसका प्रथम कार्य था प्रतिशोध अपने भीतर प्रलय को समेटे हुए याग्नेश तहखाने से बाहर निकला और अपने घोड़े पर बैठकर अपनी मंजिल की ओर चल पड़ा।

बिजली की सी तेज गति से याग्नेश अपने घोड़े को दौड़ाते हुए नगर के बाहरी दीवार तक पहुंच गया उसने अपना घोड़ा वही एक पेड़ से बांध दिया नगर की ऊंची दीवार को एक ही छलांग में पार करके नगर के भीतर प्रवेश कर गया, वह अब नगर के खुले चौक में पहुंचे।

अंधेरा अभी भी बहुत घना था, इस समय रात के कोई 3 बज रहे होंगे , चौक और गलियां पूरी तरह सुनसान थी घनी अंधेरी काली और सर्द रात्रि में सभी अपने अपने घरों में आराम से सोए हुए थे याग्नेश आराम से चौक से होते हुए नगर के मध्य स्थित मुख्य आश्रम जहां कभी वह आचार्य था के द्वार तक पहुंचा।

याग्नेश ने आश्रम के द्वार को देखा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ के द्वार पर कोई भी रक्षक नहीं था । अपनी शक्तियों का प्रयोग करके उसने द्वार के भीतर देखा तो वहां भी आश्रम का कोई भी योद्धा या सैनिक नहीं था।

उसने विचार किया कि यदि यहां के नए आचार्य और उनके योद्धाओं ने उसकी गुफा में तबाही मचाई है , तो उन्हें अंदेशा होना चाहिए के याग्नेश यहां पर प्रतिशोध लेने जरूर आएगा , फिर भी उसे रोकने के लिए इस समय यहां आश्रम के योद्धाओं की सेना उसे रोकने के नही थी ।

फिर उसके मन में दूसरा विचार भी आया के हो सकता है उसे फंसाने के लिए यह कोई जाल हो सभी विचारों को झटक ते हुए वह आश्रम के बंद द्वार की ओर बढ़ा उसके नेत्रों से निकलती हुई बैंगनी किरणों ने आश्रम के विशाल द्वार को पल भर में ध्वस्त कर दिया द्वार टूटने की आवाज इतनी ज्यादा थी के आश्रम में सोए हुए लगभग सभी अनुयाई और कर्मचारी जाग गए थे।

आश्रम के योद्धा किसी अनहोनी की आशंका से तुरंत अपने कक्षो से निकलकर द्वार की तरफ दौड़े , उन्हें वहां याग्नेश आश्रम के भीतर आता हुआ नजर आया । लंबे काले वस्त्रों , सर्द चेहरा और बैंगनी प्रकाश से चमकते ही उसकी आंखें कुल मिलाकर वह आज कोई मौत का दूत नजर आ रहा था ।

आश्रम के योद्धा उसे देख कर पंक्ति बद्ध तरीके से उसके आगे खड़े हो गए। उन्हें अपना रास्ता रोके देख कर याग्नेश का क्रोध और बढ़ गया।।


याग्नेश -- हट जाओ मेरे रास्ते से , वरना तुम सब के सब मारे जाओगे , आज मेरे और तुम्हारे आचार्य के बीच जो भी आएगा वह बहुत बुरी तरह मारा जाएगा, यदी अपने प्राण बचाना चाहते हो तो आखरी बार कह रहा हुं हट जाओ।।

योद्धाओं का प्रमुख -- हम तुम्हें किसी भी कीमत पर भीतर नहीं जाने दे सकते आप हमारे लिए आदरणीय हो इसलिए अभी तक हमने आप पर कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाया परंतु जब हमारे आचार्य की रक्षा की बारी आएगी तब हम आप पर भी वार करने से नहीं चुकेंगे , इसलिए कहते हैं कृपया यहां से चले जाइए।।

याग्नेश -- तो तुम सब ऐसे नहीं मानोगे , अब अपनी मृत्यु के लिए सब तैयार हो जाओ , आज मुझे कोई भी नहीं रोक सकता ।
इतना कहकर याग्नेश ने अपने हाथ को उन योद्धाओं की तरफ कर दिए , जिस से निकलती हुई बैंगनी किरणों ने किसी पाश की तरह उन सारे योद्धाओं को एक साथ बांध दिया , उसने उन सब को समाप्त करने के लिए अपनी तलवार निकाली ही थी कि वहां एक गंभीर आवाज उभरी जो यहां के मौजूद आचार्य विजयानंद की थी , जो किसी समय याग्नेश का प्रिय शिष्य हुआ करता था।।


आज के लिए इतना ही , अगला प्रकरण बहुत जल्द ही प्रकाशित होगा ।
आप सभी पाठकों का बहुत-बहुत धन्यवाद 🙏🙏 ऐसे ही अपना साथ बनाए रखें और अपने सुझाव और प्रतिक्रिया देते रहें ।स्वस्थ रहे खुश रहे ।।


आपका अपना मित्र -- अभिनव🔥
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अध्याय -- 5

याग्नेश ने उन सब को समाप्त करने के लिए अपनी तलवार निकाली ही थी कि वहां एक गंभीर आवाज उभरी जो यहां के मौजूद आचार्य विजयानंद की थी , जो किसी समय याग्नेश का प्रिय शिष्य हुआ करता था।।

अब आगे --


विजयानंद - रुक जाईये गुरुदेव , इन्हें क्षमा कर दीजिए , यह तो केवल मेरी रक्षा का अपना दायित्व निभा रहे थे ।आप यहां मुझे अपना शत्रु मान कर आए हुए हो, तो लिजीए मैं आज आपके सामने प्रस्तुत हूं , परंतु कृपया इन्हें छोड़ दीजिए।

विजयानंद को अपने सामने देखकर याग्नेश ने सभी योद्धाओं को अपने पाश से मुक्त कर दिया , अपने आचार्य का इशारा पाकर आश्रम के सभी योद्धा एक तरफ हट गए याग्नेश ने देखा के वीजयानंद उसके समक्ष अपने यह दोनों हाथ जोड़े हुए खड़ा है।

याग्नेश -- बंद करो अपना यह झूठा दिखावा विजय , मैं खूब जानता हूं , एक तरफ तो तुम अपने हाथ जोड़ कर मुझे अपना गुरुदेव कह रहे हो और दूसरी तरफ अपने योद्धाओं के साथ मेरे निवास स्थान को तहस-नहस करके आए हो अब तुम्हारा यह अच्छाई का मुखौटा मुझे भ्रमित नहीं कर सकता।

विजयानंद -- गुरुदेव , आप क्या कह रहे हैं मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा ।आप किस घटना का यहां उल्लेख कर रहे हो ,उसमें मेरा तनिक भी हाथ नहीं है । आशा है क्या आप मुझे अपनी बात रखने का अवसर प्रदान करेंगे। परंतु पहले भीतर चलिए
क्योंकि जिस तरह आपने बताया मुझे किसी षड्यंत्र का अंदेशा हो रहा है , इसलिए इस बारे में बात करना यहां उचित नहीं है कृपया करके भीतर चले, यदि आपको मेरी बात सुनने के बाद भी ऐसा लगे इस घटना में मेरा कोई भी हाथ है तो निसंदेह आप मेरा वध कर देना।


याग्नेश को भी विजयानंद की बात उचित लगी और वह भीतर आश्रम के आचार्य के लिए बने विशेष कक्ष की तरफ चल दिया।

यह वही का स्थान था जहां वह अपने दादा से मिलने कई बार आता था , इसी कक्ष में उसने अपने दादा का क्षत-विक्षत मृत देह देखा था । आचार्य बनने के पश्चात इसी कक्षा में रहकर उसने इस नगर के वासियों की बहुत सहायता की थी । कक्ष के भीतर पहुंचकर विजयानंद ने याग्नेश को आसन पर बिठाया और खुद उनके सामने एक आसन पर बैठ गया।


विजयानंद -- अब बताइए गुरुदेव आप किस घटना के बारे में बता रहे थे कृपया करके मुझे विस्तार से बताएं।।

याग्नेश -- यह तुम मुझे बार-बार गुरुदेव कहना बंद करो , मैं कोई तुम्हारा गुरु नहीं रहा , अब हमारे रास्ते भिन्न है और यह बात जितना शिघ्र समझ जाओ उतना अच्छा है ।।
ये अच्छा बनने का दिखावा भी मेरे सामने मत करो , मैं आज तक कभी तुम्हारे रास्ते में नहीं आया , परंतु तुमने मेरी गुफा मेरे निवास स्थान को तहस-नहस करके और मेरे अनुयायियों को आहत करके मुझे अपना शत्रु बना लिया है , अभी तक मैं यह तुम्हारा सारा आश्रम ध्वस्त कर देता, परंतु मैंने अपना बचपन यहां गुजारा है इसलिए तुम्हें अपनी सफाई का एक मौका देना चाहता हूं।।


विजयानंद -- चाहे हमारे मार्ग भीन्न हो गए हो , परंतु मैं यह कैसे भूल सकता हूं आज मैं जो कुछ भी हूं, जो कुछ भी जानता हूं वह सब कुछ आप ही की देन है । आप मेरे गुरु हो मेरे पिता समान हो इसलिए गुरुदेव कहने का अधिकार कृपया मुझसे ना छीने ।
आप जिस घटना के बारे में बता रहे हैं मैं अपने आराध्य , अपने देवता गजेंद्र की शपथ लेकर कहता हूं उस घटना में मेरे आश्रम के किसी भी योद्धा का कोई हाथ नहीं है । यह कोई बहुत बड़ा षड्यंत्र प्रतीत होता है जो आपके ही किसी शत्रु ने रचाया है। गुरुदेव मैं इस आश्रम में आचार्य के पद पर आसीन हूं, इसलिए मैं अपनी देवता गजेंद्र की झूठी शपथ कभी नहीं खाऊंगा यदि फिर भी आपको मेरी बात पर जरा भी संदेह है तो लिजीए मेरा सिर आपके सामने समर्पित है।।


याग्नेश -- यदि यह बात सत्य है तो मैं इस बात का पता आवश्य लगा लूंगा । परंतु यदि तुम्हारा या इस आश्रम के किसी भी सदस्य का इसमें कोई हाथ होगा तो सावधान , तुम्हारा यह आश्रम मैं पल भर में राख के ढेर में बदल दूंगा और तुम्हारा देवता गजेंद्र भी मेरा कुछ भी बिगाड़ नहीं पाएगा।।

इतना कहकर याग्नेश जाने के लिए खड़ा हुआ परंतु खुद सोच कर फिर रुक गया और विजयानंद की तरफ देख कर बोला

याग्नेश -- यदि तुम मेरा इतना ही आदर करते हो , तो मैं तुम्हें जाते-जाते एक सलाह देता हूं कि छोड़ दो यह सत्यता का मार्ग इस गजेंद्र की उपासना इससे तुम्हें कुछ हासिल ही नहीं होगा । यह सदैव अपने मानने वालों को ही दुख प्रदान करता है आज मैं जिस परिस्थिति में हूं यदि तुम इस परिस्थिति में नहीं आना चाहते तो इस देवता और आश्रम का साथ छोड़ के मेरे साथ आ जाओ।

विजयानंद -- क्षमा करें गुरुदेव मैं आपके ही सिखाये हुए पाठ और सीख पर चल रहा हूं , और जानता हूं कि सत्यता का मार्ग बड़ा कठिन है इसका पालन करने वालो बहुत से त्याग और बलिदान देने पड़ते हैं , और मै इसके लिए प्रस्तुत भी हुं ।।
मानवता का भी यही धर्म है और यही धर्म सबसे श्रेष्ठ है । यही मार्ग हैं आत्मोन्नति का और मुक्ति का साधन है ।। छोटा मुंह बड़ी बात मैं तो आपसे भी कह रहा हूं कि आप यह पापूर्ण मार्ग का त्याग करें प्रायश्चित करें और लौट आए गुरुदेव ।। आपको पुनः अपनी शक्तियां और पद प्राप्त हो जाएगा।।


याग्नेश -- तुम मुझे ज्ञान देने का प्रयत्न ना करो विजयानंद , यदि तुम्हें अपने देवता गजेंद्र पर इतना ही विश्वास है तो मैं तुम्हें पूर्ण 1 वर्ष देता हूं । इस 1 वर्ष में तुम अपने देवता की शक्ति जितनी प्राप्त करना चाहते हो प्राप्त कर लो फिर 1 वर्ष के पश्चात तुम्हारा सामना मुझसे होगा यदि तुम उस समय हार गए तो तुम्हारा सारा आश्रम सारे अनुयायी और नगरवासी सब मेरे मालिक को ही अपना भगवान मानेंगे , क्या तुम मेरी इस चुनौती को स्वीकार करते हो।। यदि तुम्हें अपने देवता गजेंद्र पर इतना विश्वास और श्रद्धा है तो अवश्य तुम मेरी चुनौती को स्वीकार करोगे , क्योंकि यदि मैं हार गया तो मैं प्रायश्चित भी करूंगा और जो भी तुमको कहोगे वह सब मैं कर लूंगा।।

विजयानंद -- मैं तैयार हूं गुरुदेव। मैं आपकी चुनौती स्वीकार करता हूं , परंतु यह आप भी जानते हैं कि मेरे पास देवता का दिव्य क्रिस्टल नहीं है , जो अनेक दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण था और श्वेत उर्जा का स्रोत था , वह तो क्रिस्टल आप ले गए थे, फिर भी मैं प्रयत्न करूंगा, सत्य के पथ पर मेरा सर्वस्व न्योछावर हो जाए तो भी मुझे प्रसन्नता ही होगी ।।

याग्नेश अपनी जेब से सफेद क्रिस्टल निकालते हुए विजय आनंद की ओर बढ़ा देता है

याग्नेश -- हा हा हा हा ( जोर से हसते हुए ) तुम क्या सोचते हो कि तुम मुझे इस सफेद क्रिस्टल की शक्तियों से मुझे हरा दोगे तो यह लो अपना क्रिस्टल भी तुम ही रख लो अब मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है।।

विजयानंद क्रिस्टल को दोनों हाथों से थाम लेता है और अपने माथे से लगाकर उसे देखता है

विजयानंद -- धन्यवाद गुरुदेव । जो आज आपने इस आश्रम की धरोहर वापस की है , जानता हूं कि इस समय यह क्रिस्टल पूर्ण रूप से शक्तिहीन हो गया है, परंतु मुझे अपने देवता गजेंद्र पर पूर्ण विश्वास है शीघ्र ही में अपने तप और आराधना से इस क्रिस्टल को पूर्ववत दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण कर दुंगा। इतना कहकर विजयानंद यग्नेश को प्रणाम करता है ।।

याग्नेश एक नजर विजयानंद को देखता है , उसे आज भी उस में कहीं ना कहीं वह छोटा विजय नजर आता हैं, जो कभी बाबा बाबा कहते हुए नहीं थकता था । याग्नेश भी उसे बहुत अधिक प्रेम करता था एक गहरी सांस छोड़ कर विजय को देखकर उमड़े हुए भावनाओं के वेग को अपने भीतर दबाए याग्नेश मुड़ गया और तेज कदमों से आश्रम के बाहर निकल गया।।

याग्नेश आश्रम से निकलकर चौक से होते हुए नगर के पूर्व दिशा की ओर बढ़ गया , यहां था नगर के राजा सुजान सिंह का विशाल राज भवन ।

याग्नेश को उसके मरते हुए अनुयाई ने गुफा के हमलावरों की जो पहचान बताई थी उसके अनुसार उसे यह तो पता हो गया था की वह हमलावर आश्रम के ही किसी सेना ने किया था यदि इस हमले में विजयानंद का कोई हाथ नहीं था तो आश्रम की ही दूसरी टुकड़ी जो राजा सुजान सिंह आदेशों पर , काम करती थी जिसका निर्माण आश्रम को बाहरी हमलों से बचाने के लिए हुआ था ।

विजयानंद की बातें सुनकर याग्नेश को पूर्ण रूप से विश्वास हो गया था उसकी गुफा में हुए हमले के पीछे सुजान सिंह का ही हाथ है । हो ना हो सुजान सिंह के कहने पर ही उस दूसरी टुकड़ी ने उसके निवास स्थान को तहस-नहस कर दिया था ।

आज याग्नेश जिस परिस्थिति में था उसमे बहुत बड़ा हाथ राजा सुजान सिंह का था । जो अपने लोभ के कारण आश्रम की अकूत संपत्ति और दिव्य वस्तुएं को प्राप्त करना चाहता था। राजा सुजान सिंह ने याग्नेश और उसके परिवार के विरुद्ध कौन सा षड्यंत्र रचा था यह सब आगे कहानी में पता चलेगा
याग्नेश सुजान सिंह के रचे हुए षड्यंत्र को अब भलीभांति जान चुका था।।

यह राज महल नगर के पूर्व दिशा में स्थित था। राज महल के चारों ओर ऊंची ऊंची दीवारें और विशाल द्वार उसकी शोभा बढ़ाते हैं । राज महल के भीतर किसी कक्ष में राजा अपने मंत्रियों के साथ बैठा अपने षड्यंत्र के अंतिम चरण पर विचार कर रहा था।

राजा सुजान सिंह -- हा हा हा हा अब बहुत ही शीघ्र मेरा वर्षों का सपना पूरा होने जा रहा है अब आश्रम की संपूर्ण संपत्ति और नगर इन सब पर केवल हमारी ही सत्ता होगी।
हमारे पूर्वजों द्वारा जो गलती हुई थी , उसे हम सुधरेंगे नगर का राजा होने के पश्चात भी यहां के आधे से ज्यादा अधिकार आश्रम के पद आसीन आचार्य के पास होते थे । परंतु अब ऐसा नहीं होगा, अब ना होगा कोई आश्रम और ना होगा कोई आचार्य , अब नगर की संपूर्ण सत्ता केवल हमारे ही हाथों में होगी।

अब तक तो आचार्य विजयानंद याग्नेश के हाथों मारा जा चुका होगा । विजयानंद के बाद आचार्य के पद को संभालने योग्य हमने कोई योग्य शिष्य छोड़ा ही नहीं इस परिस्थिति में अब आश्रम के संपूर्ण अधिकार हमारे होंगे।

आइए जानते हैं राजा सुजान सिंह के मंत्रिमंडल और कुछ विश्वास पात्रों के बारे में जिनका इस कहानी के भूतकाल वर्तमान काल और भविष्य काल में महत्वपूर्ण भूमिका होगी


राजा सुजान सिंह -- एक ऐसा राजा जो अपनी महत्वकांक्षा, लोभ और अहंकार की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इसे शुरू से ही आश्रम के गद्दी खटकती थी यह किसी भी प्रकार आश्रम की परंपरा को समाप्त करके इस नगर पर अपना एक छत्र राज्य चाहता था।।

सेनापति समर सिंह -- एक ऐसा ही योद्धा जो शूरवीर , नेक दिल और मातृभूमि के लिए कुछ भी कर गुजरने की भावना रखता था। सेनापति समर सिंह राज महल की सेना के साथ साथ आश्रम की सेना के भी सेनानायक थे ।

सेनानायक के साथ-साथ यह आश्रम के योद्धाओं को और विद्यार्थियों को युद्ध कला और शस्त्र विद्या की भी शिक्षा देते थे याग्नेश को भी हर प्रकार की युद्ध कला और शस्त्र विद्या की शिक्षा देने वाले समर सिंह ही थे एक तरह से कहा जाए समर सिंह याग्नेश के शास्त्र विद्या के गुरु थे ।।


राजगुरु विद्याधर -- ये इस राज परिवार के राजगुरु थे , अपने से ज्यादा सम्मान और अधिकार आश्रम के आचार्य को प्राप्त होता देखकर इनके भीतर ईर्ष्या और जलन ने जन्म लिया जिसके कारण इन्होंने सुजान सिंह के अहंकार को अपनी कुटिल बुद्धि और षड्यंत्र की हवा दी सुजान सिंह के द्वारा किए गए सारे षड्यंत्र के पीछे मुख्य हाथ और मस्तीष्क राजगुरु विद्याधर का ही था।

महामंत्री विरुपाक्ष -- यह एक ऐसा पात्र है जो बहुत ही कुटिल चालाक चापलूस और गिरगिट की तरह रंग बदलने वाला है

विक्रम सिंह -- जिसकी बली कहानी के प्रथम अध्याय में याग्नेश के द्वारा दी गई इसका संबंध याग्नेश के भूतकाल से है जो कहानी मैं आगे पता चलेगा।


युद्धवीर सिंह -- विक्रम सिंह का बेटा जो स्वभाव से अति क्रूर और कामवासना से भरा हुआ था

इस कहानी में और भी अनेक पात्र है जिनका विवरण जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ेगी वैसे-वैसे होगा

राजा की बातें राजगुरु पूरी गंभीरता पूर्वक सुनते हुए कुछ विचार कर रहा था राजा की बात समाप्त होते ही राजगुरु बोल पड़ा

राजगुरु महाराज -- यदि आप से अभय प्राप्त हो तुम्हें एक बात आपके सामने रखना चाहता हूं।।

सुजान सिंह -- कहो क्या कहना चाहते हो।

राजगुरु -- महाराज आपकी चाल तो अति उत्तम है परंतु यदि याग्नेश ने विजयानंद पर कोई वार ना किया और उसे हमारी सच्चाई पता चली तब उस स्थिति में हमें क्या करना चाहिए इस पर भी हमें विचार करना होगा।।

सुजान सिंह -- राजगुरु तुम मुझे क्या समझते हो , इन सब बातों पर मैं पहले ही विचार कर चुका हूं । यदि याग्नेश को हमारी चाल का पता भी लग गया और वह यहां पर हमसे अपना प्रतिशोध लेने आया तो उसका भी प्रबंध हमने कर दिया है यहां उसका सामना होगा उसके अपने ही गुरु से यदि वो उससे भी बच गया तो उसके लिए हमने और भी जाल बिछाए हैं जिन से आज तक कोई बच नहीं पाया आज किसी भी प्रकार से हमें याग्नेश नाम के इस कांटे को निकालना ही हैं और रही बात विजयानंद की तो उसके लिए भी हमने कुछ सोच रखा है ध्यान रहे राजगुरु जहां शत्रुओं की सोच समाप्त होती है वैसे हमारी सोच शुरू होती है

युद्धवीर सिंह तुम शीघ्र ही समर सिंह से जाकर मिलो और उन्हें तैयार रहने को बोलो , आज किसी भी कीमत पर याग्नेश यहां से बचकर नहीं जाना चाहिए

युद्धवीर सिंह -- जी महाराज, मैं भी याग्नेश को शीघ्र ही समाप्त करना चाहता हूं । जिसने अंधविश्वास के नाम पर मेरे पिता की बलि चढ़ाई है और मेरी बहन को न जाने कहां छुपा रखा है इतना कहकर युद्धवीर सिंह अपने आसन से खड़ा हुआ और सुजान सिंह को प्रणाम करते हुए समर सिंह की ओर निकल पड़ा।।

महामंत्री विरुपाक्ष -- वाह महाराज वाह आपने क्या खूब जाल बिछाया है , आज तो उस याग्नेश की कहानी खत्म आपके रची हुए व्यू का सामना याग्नेश तो क्या संसार का बड़े से बड़ा योद्धा भी नहीं कर सकता , इसलिए तो मैं कहता हूं कि आप ही हमारे भगवान हैं सर्वश्रेष्ठ हो।।

अभी यहां यह लोग बातें कर ही रहे थे के ताभी महल के मुख्य द्वार से एक जोरदार धमाके की आवाज आई
ऽऽधडाम् 💥💥💥💥💥


आज के लिए इतना ही , अगला अध्याय शीघ्र ही आशा करता हूं यह कहानी आपको अच्छी लग रही हो
आप सभी पाठकों का साथ देने के लिए ह्रदय से धन्यवाद, खुश रहें स्वस्थ रहें।
आपका
मित्र 👉 अभिनव🔥
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अध्याय -- 6

महामंत्री विरुपाक्ष -- वाह महाराज वाह आपने क्या खूब जाल बिछाया है , आज तो उस याग्नेश की कहानी खत्म आपके रची हुए व्यू का सामना याग्नेश तो क्या संसार का बड़े से बड़ा योद्धा भी नहीं कर सकता , इसलिए तो मैं कहता हूं कि आप ही हमारे भगवान हैं सर्वश्रेष्ठ हो।।

अभी यहां यह लोग बातें कर ही रहे थे के ताभी महल के मुख्य द्वार से एक जोरदार धमाके की आवाज आई
ऽऽधडाम् 💥💥💥💥💥

अब आगे --------------


वहां महल के द्वार के भीतर काले वस्त्रों में हजारो सशस्त्र सैनिकों की दो दुकड़िया किसी भी प्रकार के हमले के लिए सज्ज थी उन दो टुकड़ियों की अगवाई दो घुड़सवार सेनानायक कर रहे थे।

यहां याग्नेश जब महल के द्वार पर पहुंचा तब उसने सबसे पहले काली शक्तियों के कवच से अपने आप को सुरक्षित कर लिया।

उसके पश्चात उसने अपने भीतर की शक्तियों को जागृत करके अपने नेत्र खोलें , उसके नेत्रों से नीले रंग की तीव्र किरणें निकली जिसके लगते ही महल का मुख्य प्रवेश द्वार एक बड़े धमाके के साथ ध्वस्त हो गया।

द्वार के साथ-साथ उसके निकट खड़े हुए द्वार पर तैनात सैनिकों के भी परखच्चे उड़ गए।

याग्नेश ने मुख्य प्रवेश द्वार के ध्वसत होते ही जैसे अपना पहला पग भीतर रखा वैसे ही वहां का मौसम अचानक बदलने लगा तारों से टीमटीमाता आकाश भयंकर काले मेघो से भर गया बिजलिया चमकने लगी और घोर गर्जना होने लगी जिससे वहां का मौसम और भी भयावह हो गया।


अचानक आए हुए मौसम में इस बदलाव को देखकर और टूटे हुए द्वार की और वहां पहरे पर मौजूद सैनिकों की दुर्दशा देखकर सेना की दोनों टुकड़ियों में भय उत्पन्न हो गया उनकी नजर सामने खड़े काले चोंगे खड़े आचार्य याग्नेश पर पड़ी जो आज किसी मृत्यु दूत की भांति लग रहा था।

सैनिकों के भीतर पनपते डर को देखकर उनके सेनानायक ने अपने सेना ढाढस बंधाने के लिए जोर से गर्जना करते हुए कहा

सेनानायक -- देव नगर के सेना के शूरवीरो इस माया को देखकर घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है , मत भूलो कि तुमने अपने पिछले युद्धो मे ऐसे कई परिस्थितियों का सामना वीरता पूर्वक किया है, मत भूलो कि हमारे देवता गजेंद्र का आशीर्वाद सदैव हम पर है इस हत्यारे याग्नेश के छोटे मोटे जादू के प्रयोग देखकर भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

आज हम अपने देवता गजेंद्र के अपराधी को दंड देकर उसका शीश काटकर अपने देवता को अर्पण करेंगे इसलिए सज्ज हो जाओ और घेर लो इसे----

अपने सेनानायक की बात सुनकर सभी सैनिकों के भीतर का डर चला गया और दोनों सेना की टुकड़ियों ने याग्नेश को घेर लिया।

अपने आप को उन सैनिकों द्वारा घेरे जाने को देखकर याग्नेश गोर गर्जना करते हुए बोला

याग्नेश-- हट जाओ तुम सब तुम सब से मेरी कोई शत्रुता नहीं है यदि अपने प्राणों की रक्षा करना चाहते हो मेरे सामने से हट जाओ यह मेरी तुम सबके लिए अंतिम चेतावनी है।

सेनानायक -- लगता है अपने समक्ष मृत्यु को देखकर तुम भयभीत हो गए हो याग्नेश, इसीलिए व्यर्थ का प्रलाप कर रहे हो अब अपनी मृत्यु के लिए सज्ज हो जाओ।

सैनिकों देख क्या रहे हो समाप्त कर दो इसे आक्रमण-----

सेनानायक के इतना कहते ही दोनों टुकड़ियों के प्रथम श्रेणी में खड़े हुए सारे सैनिक अपने शस्त्र लिए याग्नेश की ओर दौड़ पड़े।

उन्हें अपनी ओर बढ़ते हुए देखकर याग्नेश के चेहरे पर एक क्रुर मुस्कान उमर आई

याग्नेश - मेरी चेतावनी को प्रलाप समझने वालो अब तूम सब मृत्यु के लिए तैयार हो जाओ


इतना कहते हुए याग्नेश ने अपने दोनों हाथ आगे कर दिए जिनमें से एक साथ सैकड़ों नुकीली चकरिया निकाल करो 9 सैनिकों के शरीर में प्रवेश कर गई और इसके साथ ही उन सब की दर्दनाक चीखें वहां गूंजने लगी देखते ही देखते हम सैनिकों के शरीर के टुकड़े कट कट कर जमीन पर गिरने लगे

अपने साथियों सैनिकों की यह दुर्दशा देखकर पीछे खड़े सभी सैनीक भय के मारे कांपने लगे

अपने सैनिकों की मना स्थिति को समझते हुए दूसरा सेनानायक सैनिकों का ढाडस बंधाते हुए बोला

" इस प्रकार भयभीत होने से कुछ नहीं होने वाला मत भूलो कि तुम इस समय युद्ध भूमि में हो अपनी उर्जा को एकत्रित करो और वार करो"

इतना कहकर उस सेनानायक ने अपने सैनिकों की तरफ कुछ इशारा किया जिसे वह बखुबी समझ गये

सभी सैनिकों ने अपनी उर्जा को एकत्रित किया और अपने शस्त्रों को याग्नेश की ओर कर दिया याग्नेश अभी कुछ समझ पाता तभी उन सभी सैनिकों के शस्त्रों से उर्जा कीरणे निकलकर एक हो गई और बड़ी तीव्रता के साथ याग्नेश को जाकर लगी

याग्नेश को उन सैनिकों से इस प्रकार के हमले की कोई आशंका नहीं थी यह सब कुछ ही पलों में हुआ जिससे याग्नेश को संभलने का मौका नहीं मिला और वह ऊर्जा किरण बड़ी तीव्रता के साथ याग्नेश के सीने में जाकर लगी।


काली शक्तियों के कवच के कारण यह वार याग्नेश का ज्यादा कुछ तो नहीं बिगाड़ पाया परंतु इसकी तीव्रता के कारण वह पीछे की ओर कुछ कदम लड़खड़ा या परंतु फिर संभल कर खड़ा हो गया।

यहां सैनिक फिर से अपने अगले वार करने की तैयारी में लग गए और फिर एक बार ऊर्जा किरण चमकी और याग्नेश की तरफ बढ़ी याग्नेश ने उस वार को रोकने के लिए अपने हाथ आगे किए

अभी वह इस बार को रोकता के तभी किले की दीवार पर तैनात धनुर्धर ओके धनुष से एक साथ सैकड़ों तीर साए साए करते हुए याग्नेश की तरफ बढ़े


यह दो तरफा हमला जितनी तीव्रता के साथ हुआ था यदि याग्नेश की जगह कोई और होता तो उसकी जीवन लीला यहीं समाप्त हो जाती

परंतु याग्नेश भी कोई कम नहीं था उसने एक हाथ से अपनी ऊर्जा प्रकट करके सैनिकों की उर्जा के वार को रोक दिया था और दूसरे हाथ की ऊर्जा से उन तीरों का रुख शत्रु सेना की ओर ही मोड़ दिया जिससे सैकड़ों चीखें एक बार फिर वहां गुंजायमान होने लगी।


धनुर्धर द्वारा किए गए वार को समझने और रोकने के लिए याग्नेश को जितना समय लगा इतने समय में कुछ तीर याग्नेश को भी आकर लगे काली शक्ति की उर्जा के घेरे में होने के कारण वह तेरी अग्नेश का ज्यादा कुछ तो नहीं बिगाड़ पाए परंतु फिर भी हल्के हल्के घाव तो दे ही गये।

याग्नेश के लिए एक आश्चर्य की बात थी के उन साधारण धनुर्धर ओके तीर उसके काली शक्ति की उर्जा के घेरे को कैसे भेज सकते हैं परंतु अभी समय सोचने का नहीं था वार करने का था

याग्नेश ने अपने दोनों हाथ आकाश की ओर उठाएं और कुछ मंत्र बुदबुदाया इसके साथ ही उसकी आंखें चमकने लगी और आकाश से बिजली की तरंगे उन सैनिकों पर पड़ने लगी उनकी दर्दनाक चीखें एक बार फिर वहां गूंजने लगी।

अपने सैनिकों की ऐसी दुर्दशा देखकर एक सेनानायक ने अपने घोड़े को संपूर्ण गति के साथ याग्नेश की ओर दौडाया, वायु की सी गति के साथ याग्नेश की दाई ओर जोर से टकराया ।

याग्नेश का ध्यान पूरी तरह से सैनिकों पर था। टक्कर का वेग इतना था कि याग्नेश को संभलने का मौका नहीं मिला और वह दाई और कुछ दूर जाकर गिरा।


परंतु इससे वह सेनानायक और उसका घोड़ा बच नही पाये, वहा याग्नेश की विद्युत उर्जी के कारण पूरी तरह से झुलस गये ।

इस अप्रत्याशित हमले के कारण याग्नेश का क्रोध अब बहुत बढ़ गया था उसकी आंखें अंगार उगलने लगी थी अब तक इस युद्ध को वह सहजता से ले रहा था।

परंतु अब नहीं--- उसने अपने दोनो हाथ आकाश की ओर फैलाए और काली शक्ति के प्रचंड समूल प्रणांनतक ऊर्जा का आह्वान करने लगा यह एक ऐसा वार था, जो वहां उपस्थित संपूर्ण जीवधारी चाहे वह जीव जंतु हो या आकाश में उड़ने वाले पंछी सभी को पल भर में राख के ढेर में बदलने की क्षमता रखता था।

वहीं दूसरी ओर महल के भीतर जब राजा सुजान सिंह अपने मंत्रियों के साथ मंत्रणा कर रहे थे उसी समय मुख्य द्वार के ध्वस्त होने की ध्वनि ने उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

उस ध्वनि से राजा इतना तो समझ गया था मुख्य द्वार ध्वस्त हो गया है और उसका सबसे बड़ा शत्रु याग्नेश जिसके आने की वह प्रतीक्षा कर रहा था वह आ चुका है।

सुजान सिंह को अपनी योजना पर पूरा भरोसा था उसे यकीन था के आज वह याग्नेश नाम के इस कांटे को जड़ से उखाड़ फेंकेगा।

सुजान सिंह -- चलो साथियों जिस पल की हमें प्रतीक्षा थी वह सन्मुख है चलो जरा अपने बाल सखा का स्वागत तो कर ले
सेनापति जी, युद्धवीर सिंह, राजगुरु जी चलो अपनी योजना को मूर्त रूप देने का समय आ गया है परंतु ध्यान रहे जरा सी भी चूक भयंकर परिणाम को निमंत्रण दे सकती है।


इतना कहकर राजा सुजान सिंह और साथ ही साथ सभी महल से निकलकर मुख्य द्वार की दिशा में बढ़ चले जहां से अभी सैनिकों की दर्दनाक चीखें सुनाई दे रही थी।

यहां याग्नेश लगभग प्रणांतक ऊर्जा का आह्वान कर चुका था, जिसका असर उसके प्रयोग करने से पूर्व ही सैनिकों पर दिखाई देने लग गया था , उस अस्त्र के प्रभाव से कई दुष्ट आत्माए वहां प्रकट हो गई थी जो अस्त्र के प्रयोग होते ही वहां मौजूद सभी शरीर धारियों के प्राणों को सोख लेने के लिए तत्पर थी उनकी डरावनी आवाजें वहां के वातावरण को और भी भयावह बना रही थी।


युद्ध भूमि में अपने साथियों के कटे हुए शव और बहते हुए रक्त को देखकर सैनिक पहले ही भयभीत थे अपने किसी भी वार का याग्नेश पर कोई भी असर ना होता हुआ देखकर हताश भी थे और रही सही कसर इस भयंकर अस्त्र के आवाहन से प्रगट हुई दुष्ट प्रेत आत्माओं की ध्वनि ने पूरी कर दी अब उन सब को अपनी मृत्यु स्पष्ट नजर आने लगी थी।

याग्नेश ने एक नजर बची हुई शत्रु सेना पर डाली और अपने आव्हान किए हुए अस्त्र का प्रयोग करने ही वाला था के एक श्वेत ऊर्जा का बड़ा सा गोला उस अस्त्र की काली शक्तियों की ओर जा से टकराया और देखते ही देखते जितने भी दुष्ट आत्माएं वहां प्रकट हुई थी सभी पल भर में लुप्त हो गई।

अपने इस भयंकर अस्त्र को विफल होते हुए देखकर याग्नेश को बड़ा आश्चर्य हुआ और साथ ही मेघ की गर्जना की तरह जानी पहचानी एक आवाज उभरी

" रुक जाओ इन साधारण सैनिकों पर अपनी प्रचंड काली शक्तियों की ऊर्जा का प्रयोग करते हुए तूने लज्जा नहीं आई क्या यही है तुम्हारी वीरता या इन काली शक्तियों ने तुम्हें अंदर से खोखला कर दिया है "


इस जानी पहचानी आवाज को सुनकर और आवाज की दिशा में खड़े व्यक्ति को देखकर याग्नेश के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई

आज के लिए इतना ही -----अगला अपडेट शीघ्र ही-------
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अध्याय - 7

अपने इस भयंकर अस्त्र को विफल होते हुए देखकर याग्नेश को बड़ा आश्चर्य हुआ और साथ ही मेघ की गर्जना की तरह जानी पहचानी एक आवाज उभरी
" रुक जाओ इन साधारण सैनिकों पर अपनी प्रचंड काली शक्तियों की ऊर्जा का प्रयोग करते हुए तूने लज्जा नहीं आई क्या यही है तुम्हारी वीरता या इन काली शक्तियों ने तुम्हें अंदर से खोखला कर दिया है "

इस जानी पहचानी आवाज को सुनकर और आवाज की दिशा में खड़े व्यक्ति को देखकर याग्नेश के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई।

अब आगे ------


यह आवाज थी सेनापति समर सिंह की जो किसी समय में याग्नेश के युद्ध कला के गुरु रह चुके थे

समर सिंह--- मुझे दुख होता है यह सोच कर कि तुम जैसा व्यक्ति कभी मेरा शिष्य था , मैंने कभी सोचा नहीं था के तुम अधर्म के मार्ग चुनोगे और उस पर चलकर इतना आगे निकल जाओगे , अभी भी समय है याग्नेश, यह पाप पूर्ण मार्ग त्याग दो।

याग्नेश-- प्रणाम गुरुदेव , सर्वप्रथम आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें इतने समय पश्चात आपको देखकर बहुत अच्छा लगा आखिर किसी समय मैंने आपको अपने पिता तुल्य माना था।

समर सिंह-- मत कहो तुम मुझे अपना गुरुदेव तुम वह अधिकार खो चुके हो अभी भी समय है पुत्र तुम वापस लौट आओ यह पाप का मार्ग त्याग दो और अपने कर्मों का प्रायश्चित करो।

याग्नेश-- यह पाप पुण्य धर्म अधर्म का मुझे ज्ञान मत दो गुरुदेव मैं यह सब जानता हूं धर्म के मार्ग ने और मेरे पूर्वजों द्वारा पुण्यों ने आखिर दिया ही क्या है, आप मेरे लिए पूजनीय हैं इसलिए आप मेरे मार्ग से हट जाइए क्योंकि मैं नहीं चाहता क्यों मेरे द्वारा यहां होने वाले विनाश मैं मरने वालों मैं आपका भी नाम हो मुझे बहुत दुख होगा।

समर सिंह-- ठीक है तुम युद्ध ही चाहते हो तो युद्ध ही सही जरा देखे तो जादुई विद्याओं का प्रयोग करते करते युद्ध कला तो नहीं भूल गए

इतना कहकर सेनापति समर सिंह ने अपनी मयान से अपनी तलवार बाहर निकाल ली और उधर याग्नेश भी अपनी तलवार के साथ समर सिंह से युद्ध के लिए सज्ज हो गया
दोनों गुरु शिष्य युद्ध के मैदान में अब आमने-सामने थे जहां सेनापति ने सभी को दोनों के युद्ध में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया नहीं याग्नेश ने बिना काली शक्तियों के प्रयोग और उसके कवच के बिना युद्ध करने का निर्णय लिया।

राजा सुजान सिंह समेत वहां मौजूद सभी योद्धा इन दोनों के युद्ध के परिणाम को देखने के लिए उत्सुक थे।

समर सिंह ने आगे बढ़कर अपनी तलवार का प्रथम और भरपूर वार याग्नेश के सिर की तरफ किया और वही याग्नेश ने भी बड़ी फुर्ती के साथ अपनी तलवार से उस वार को रोककर साथ ही साथ अपनी तलवार घुमाकर समर सिंह के तलवार को झटका दिया और दूसरे हाथ से समर सिंह के सीने पर जोर से मुक्का मारा जिसके प्रभाव से वह कुछ कदम पीछे हटा।

समर सिंह-- बहुत खूब ! बहुत खूब ! दिख रहा है के तलवारबाजी का हुनर तुम भूले नहीं हो लो संभालो मेरे अगले बार को

इतना कहकर समर सिंह ने विद्युत किसी गति के साथ सीधी तलवार से याग्नेश के पेट की तरफ वार किया, परंतु याग्नेश ने भी इतनी फुर्ती के साथ अपनी तलवार को गोलाकार घुमाते हुए समर सिंह के वार को विफल किया और चकरी की तरह घूम कर समर सिंह के पीछे पहुंचकर अपने पैर से एक बार पुरवार उनकी कमर पर किया। यह सब इतनी तेजी के साथ हुआ था समर सिंह को संभलने का मौका नहीं मिला आगे जाकर मुंह के बल गिरा।

याग्नेश--- जब गुरु आपके जैसा सक्षम हो तो तलवारबाजी का हुनर मैं कैसे भूल सकता हूं परंतु लगता है कि आप अपना हुनर भूल गए हो खड़े हो जाइए गुरुदेव और सामना करिए।
याग्नेश की बात सुनकर समर सिंह बड़ी तेजी के साथ उठ खड़ा हुआ वह समझ गया था याग्नेश के साथ युद्ध करना इतना आसान नहीं है समर सिंह ने अपना ध्यान केंद्रित किया अपने संपूर्ण इंद्रियों को सजग किया जिससे वह याग्नेश के हर बार को समझ सके

समर सिंह--- यू मुझे बार-बार गुरुदेव मत कहो तुम्हारे जैसा नीच, अधर्मी , पापी और हत्यारा मेरा शिष्य नहीं हो सकता , अरे तुमने तो अपने पुर्वजो के आदर्शों की भी लाज नहीं रखी । अपने स्वार्थवश न जाने कितने बेगुनाहों की हत्या की।

समर सिंह के द्वारा कहे गए कटु वचनों को सुनकर याग्नेश को बहुत क्रोध आया जिससे वह अपना संतुलन खो बैठा यही तो समर सिंह भी चाहता था।

क्रोध के आवेग में याग्नेश ने समर सिंह को समाप्त करने के लिए छलांग लगाकर अपनी तलवार का वार समर सिंह के गर्दन की तरफ किया परंतु यहां समर सिंह भी पूरी तरह सचेत था कितनी गति से वार हुआ था उतनी ही गति से वह एक ओर हट गया और याग्नेश भूमि पर जोर से गिरा, समर सिंह याग्नेश को समझने का मौका नहीं देना चाहता था वह बड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ा इससे पहले कि याग्नेश संभल पाता उसने जोरदार ठोकर याग्नेश की पसलियों में मारी जिससे याग्नेश वहा से उडकर पीछे जा गीरा।

समर सिंह शरीर से बहुत बलिष्ठ था शारीरिक बल के मामले में वह याग्नेश से दुगना शक्तिशाली था इस प्रकार से याग्नेश की पसलियों में तेज दर्द हुआ परंतु वह अपने दर्द को भूल कर इससे पहले कि समर सिंह उस तक पहुंचता वह फुर्ती के साथ खड़ा हुआ।
याग्नेश तेजी से समर सिंह की ओर बढ़ा और तलवार को विद्युत गति से घुमाता हुआ प्राण घातक वार करने लगा उसके प्रत्युत्तर में समर सिंह एकाग्रचित मन के कारण उसकी हर बार को सहजता से विफल कर रहा था दोनों योद्धाओं की तलवारों की टंकार वातावरण में गूंज रही थी बाकी सभी योद्धा अपनी सांस थामे देख रहे थे।

अति व्यग्रता और क्रोध के कारण याग्नेश का हर वार विफल हो रहा था , के तभी
समर सिंह ने तेजी से घूम कर याग्नेश के बाजू पर तलवार से वार किया जिससे बाई बाजू जख्मी हो गई।

इसी घाव के साथ याग्नेश को अपनी भूल का अंदाजा हो गया की व्यग्रता के साथ लड़ा गया कोई भी युद्ध जीत तक नहीं ले जाता अब उसने भी अपने मन को एकाग्र किया अपनी इंद्रियों को संयत करके अपने घाव के दर्द को भुलाकर वह किसी चक्कर की तरह घूमता हुआ और साथ ही साथ अपनी तलवार को घुमाता हुआ समर सिंह की और बढा।

याग्नेश में आए हुए इस बदलाव को देखकर समर सिंह के चेहरे पर मुस्कान उभर आई वह भी अपनी तलवार लेकर याग्नेश के वार का प्रत्युत्तर देने लगा।

तभी समर सिंह ने नीचे झुक कर अपनी तलवार का भरपूर वार याग्नेश के पैरों की तरफ किया याग्नेश ने भी छलांग लगाकर उस वार से अपना बचाव किया और साथ ही साथ समर सिंह के हाथ पर जोरदार ठोकर मारी जिसे समर सिंह की तलवार भूमि पर गिर गई।

तलवार के भूमि पर गिरते ही इससे पहले कि याग्नेश अपना अगला वार करता समर सिंह ने भी हवा में उछल कर कलाबाजी या खाता हुआ याग्नेश के दाई और से उसकी कलाई पर प्रहार किया जिससे याग्नेश की भी तलवार भूमि पर गिर गई।


अब दोनों योद्धा मल्ल युद्ध करने लगे एक दूसरे पर लात घूसों के दाव पेच आजमाने लगे दोनों किसी मतवाली हाथी की तरह एक दूसरे से टकरा रहे थे।

अभी दोनो लड ही रहे थे के अचानक कड़क की आवाज के साथ किसी की चीखने की भी आवाज आई यह आवाज की समर सिंह की।

हुआ यूं के मल्लयुद्ध के दौरान समर सिंह ने जैसे ही जोरदार मुक्का याग्नेश के सीने में मारना चाहा तब याग्नेश ने बड़ी फुर्ती के साथ समर सिंह की कलाई पकडी और पूरी वेग के साथ घुमा दी जिससे समर सिंह हवा में घूमता हुआ भूमि पर आ गिरा उसके हाथ की हड्डी टूट चुकी थी समर सिंह की भूमि पर गिरते ही याग्नेश ने एक जोरदार ठोकर समर सिंह की पसलियों में मारी जिससे उसकी कई पसलियां टूट गई अब समर सिंह हिलने की भी हालत में नहीं रहा, और मूर्झीत हो गया।

समर सिंह को धराशाई होता हुआ देखकर राजा सुजान सिंह सभी योद्धा और सैनिक जो इस द्वंद्व को देख रहे थे वह सचेत हो गए क्योंकि वह जानते थे के याग्नेश को रोकना बहुत कठिन होगा।

समर सिंह के धराशाई होते ही याग्नेश ने सुजान सिंह की ओर देखा।

याग्नेश सुजान सिंह अब अपने किए हुए हर अपराध का दंड भुगतने के लिए तैयार हो जाओ आज तुम्हें मेरे हाथों से कोई नहीं बचा सकता तुम्हारा सेनापति तो धराशाई हो गया अब और कोई बचा है जो मेरा सामना कर सके तो उन्हें भी भेजो

इतना कहकर याग्नेश अपनी तलवार संभाल कर सुजान सिंह की और बढा जब सुजान सिंह के अंगरक्षको ने याग्नेश को अपने राजा की ओर बढ़ता हुआ देखा जो गिनती में लगभग 100 के बराबर थे उनमें से लगभग 50 योद्धाओं ने राजा के चारों तरफ एक घेरा बना लिया और बाकी बचे 50 अपने शस्त्र लिए याग्नेश की ओर दौड़ पड़े।


उधर यागनेश भी किसी चक्र की मानिंद घूमता हुआ और तलवार घुमाता हुआ आगे बढ़ा और देखते ही देखते कुछ ही पल में आगे आ रहे दो अंग रक्षकों के सिर भूमि पर उसकी तलवार से कट कर गिर चुके थे , तब तक याग्नेश के पीछे चार अंगरक्षक पहुंच गए थे और उन्होंने एक साथ उसके ऊपर वार किया।

इंद्रियों के सजग रहने के कारण याग्नेश को इस बार का पता चल गया और उसने नीचे बैठकर अपनी तलवार ऊपर उठा दिया और उनके वारो को रोक दिया और साथ ही साथ बड़ी फुर्ती से घूम कर उन चारों के पैर काट दिए , पैरों के कटते हैं कि वो चारों किसी कटे हुए वृक्ष की भांति वह चारों धड़ाम से धरती पर आकर गिरे।

अपने साथियों की ऐसी हालत देखकर बाकी बचे हुए सभी योद्धाओ ने एक साथ याग्नेश के ऊपर छलांग लगा दी, इतने योद्धाओं के एक साथ टकराने से याग्नेश अपना संतुलन खो बैठा और भूमि पर जा गिरा सभी योद्धाओं ने मिलकर याग्नेश को अपने नीचे दबा दिया था, वहां मानो मानव शरीर का एक छोटा सा टीला सा बन गया था।

इस दृश्य को देखकर सुजान सिंह बड़ा प्रसन्न हुआ और वह आगे बढ़ने वाला था यह तभी उस मानव टीले के नीचे जहां याग्नेश दबा पड़ा था, एक तेज नीली रोशनी चमकी और देखते ही देखते वो सभी योद्धा जो याग्नेश को अपने नीचे दबाए हुए पड़े थे वह हवा में तैरते हुए भूमि पर गिर पड़े मानो घास के तिनको को हवा के झोंके ने उड़ा कर फेंक दिया हो।

याग्नेश अब अपने कपड़ों को झाड़ता हुआ खड़ा हो गया , उसकी आंखें क्रोध की अधिकता के कारण लाल हो गई थी अपने चारों तरफ गिरे हुए सुजान सिंह के अंगरक्षको को समाप्त करने के लिए उसने उन सभी को विद्युत पाश में बांध दिया और उनके प्राणों को सोखने लगा के , तभी एक सशक्त उर्जा पाश ने उसे जकड लिया।
वह अदृश्य ऊर्जा पाश याग्नेश के शरीर पर पूरी तरह कस गया था, उस ऊर्जा पाश ने याग्नेश के हाथ पैरों को पूरी तरह बांध दिया था उस अदृश्य ऊर्जा पाश के बंधन में जकड़ा हुआ याग्नेश अब घुटनों के बल भूमि पर बैठ गया था---- के तब ही-----

आज के लिए इतना ही अगला अध्याय शिघ्र ही🙏 -----
सभी पाठकों से नम्र निवेदन है कि वह इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया और अपने सुझाव अवश्य दें 🙏🙏🙏🙏-----
आप सभी के प्रेम और साथ का अभिलाषी 💐💐💐💐

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याग्नेश अब अपने कपड़ों को झाड़ता हुआ खड़ा हो गया , उसकी आंखें क्रोध की अधिकता के कारण लाल हो गई थी अपने चारों तरफ गिरे हुए सुजान सिंह के अंगरक्षको को समाप्त करने के लिए उसने उन सभी को विद्युत पाश में बांध दिया और उनके प्राणों को सोखने लगा के , तभी एक सशक्त उर्जा पाश ने उसे जकड लिया।
वह अदृश्य ऊर्जा पाश याग्नेश के शरीर पर पूरी तरह कस गया था, उस ऊर्जा पाश ने याग्नेश के हाथ पैरों को पूरी तरह बांध दिया था उस अदृश्य ऊर्जा पाश के बंधन में जकड़ा हुआ याग्नेश अब घुटनों के बल भूमि पर बैठ गया था---- के तब ही-----

अब आगे -----


ऊर्जा पाश में बंधा हुआ याग्नेश अपने आप को छुड़ाने का प्रयत्न कर रहा था, उसे आश्चर्य हो रहा था यह इतना शक्तिशाली ऊर्जा पाश जो उस की काली शक्तियों के कवच को भी भेद सकता है यह किसके द्वारा प्रयोग किया गया है । के तभी सामने से आते हुए युद्धवीर सिंह क्यों पर उसकी दृष्टि पड़ी।

युद्धवीर सिंह को देखकर याग्नेश के मुख पर व्यंगात्मक मुस्कान उभरी

याग्नेश-- ओह ! तो युद्धवीर सिंह तुम भी यहां उपस्थित हो अच्छा है , तुम्हारे पिता विक्रम सिंह को तो मैं यमलोक भेज चुका हूं अब तुम भी यमलोक में उनके पास जाने के लिए सज्ज हो जाओ।

युद्धवीर सिंह -- हा हा हा ! मेरे पिता की हत्या करके तुम क्या सोचते हो मेरी भी हत्या कर दोगे , यह इतना आसान नहीं है याग्नेश। प्रतिशोध तो मैं लूंगा तुमसे अपने पिता की हत्या का , मेरी बहन के अपहरण का। कुछ जादुई शक्तियों का उपयोग करके तुम अपने आप को शक्तिशाली समझ रहे हो देखो मेरे छोटे से पास में तुम्हारी क्या दशा कर दी अब अपनी मृत्यु के लिए तैयार हो जाओ।

इतना कहकर युद्धवीर सिंह अपनी तलवार लेकर याग्नेश की और बड़ा ही था कि याग्नेश ने अपने हाथों को झटका दिया और ऊर्जा पाश से मुक्त हो गया । इससे पहले कि युद्धवीर सिंह याग्नेश पर कोई वार करता याग्नेश ने तेजी से उसे उठाकर दूर फेंक दिया


याग्नेश -- बच्चे हो तुम मेरे सामने अभी युद्धवीर सिंह ! तुम क्या सोचते थे कि यह ऊर्जा पाश मुझे बान्ध सकता है , याग्नेश हूं मै , यह छोटे मोटे पाश मेरा कुछ नही बीगाड सकतें , मैं तो बस तुम्हे सामने लाने के लिए बन्ध गया था ।

इतना कहकर याग्नेश ने नीले रंग के प्रकाश का एक गोला युद्धवीर सिंह की ओर फेंका, परंतु युद्धवीर सिंह भी कोई कम नहीं था उसने उतनी ही तेजी दिखाकर अपने स्थान से छलांग लगाकर याग्नेश के वार से बच गया और साथ ही साथ एक श्वेत ऊर्जा का गोले से याग्नेश पर प्रहार किया।

याग्नेश ने उस उर्जा के गोले के प्रहार को अपनी उर्जा से काट दिया और साथ ही साथ अपने दोनों हाथ युद्धवीर सिंह की ओर झटके जिससे असंख्य छोटे-छोटे चक्र तेजी से घूमते हुए युद्धवीर सिंह की ओर बढ़े ।
इधर युद्धवीर सिंह ने भी अपने दोनों हाथों को घुमा कर वायु का एक बड़ा गोला तैयार किया और चक्रों की दिशा में प्रहार किया, वायु का वह गोला उन सारे चक्रों को अपने में समाता हुआ याग्नेश की और बड़ा और बड़ी तेजी से टकराया।


वह चक्र याग्नेश की ही काली ऊर्जा से निर्मित थे , इस कारण उन चक्रों के टकराव से याग्नेश का कवच कई जगह से फट गया और उसके शरीर पर काफी घाव हो गए।
युद्धवीर सिंह का इस प्रकार उसके किए गए वार का प्रतिकार करना याग्नेश के लिए आश्चर्यजनक था याग्नेश युद्धवीर सिंह केबल और शक्ति के बारे में जानता था परंतु उसका सामना आज जिस युद्धवीर सिंह से हो रहा था वह सर्वथा भिन्न था।

याग्नेश जानता था कि यह समय विचार करने का नहीं युद्ध करने का है इसलिए अपने मन में आ रहे सभी विचारों को शांत करके एक बार फिर याग्नेश युद्ध के लिए सज्ज हो गया।
परंतु इतनी देर में युद्धवीर सिंह ने अपना अगला वार कर दिया था याग्नेश युद्धवीर सिंह की और बड़ा ही था की एक विद्युत किरण उसके सीने से टकराई जिसके प्रभाव से वह कुछ दुर पीछे गिरा।

परंतु याग्नेश भी कोई साधारण योद्धा नहीं था गिरते-गिरते भी उसने बड़ी तीव्रता के साथ अपनी उर्जा का प्रहार युद्धवीर सिंह की ओर किया।
अपने किए गए प्रहार की सफलता देखकर युद्धवीर सिंह प्रसन्न हो ही रहा था के याग्नेश की उर्जा उसके सीने से टकराई और एक धमाका हुआ जिससे वह उड़ते हुए दूर जा गिरा।

याग्नेश के इस वार से युद्धवीर सिंह बुरी तरह से घायल हो गया था , उसके सारे शरीर में भयंकर पीड़ा होने लगी थी।

अपने दर्द पर काबू पाता हुआ वह लड़खड़ाते हुए कदमों से खड़ा हुआ ही था के
युद्धवीर सिंह को समाप्त करने के लिए याग्नेश ने अपना अगला वार कर दिया ।

अनेक प्रकार के अस्त्र तीव्र गति से युद्धवीर सिंह की ओर बढ़ रहे थे, घायल अवस्था में भी युद्धवीर सिंह पूरी तरह से सजग था, अपनी ओर आते हुए अनेक घातक शस्त्रों को रोकने के लिए युद्धवीर सिंह ने अपना हाथ आगे करके एक मोटी सी ऊर्जा की ढाल बनाई । वह सारे शस्त्र उस उर्जा की परत से आकर टकराई।


युद्धवीर सिंह उन शस्त्रों को अपनी पूरी ऊर्जा लगाकर रोक रहा था, जब उसे अंदाजा हुआ के वह श्वेत ऊर्जा द्वारा इन घातक अस्त्रों को ज्यादा देर तक नहीं रोक सकता तब उसने अपनी आंखें बंद कर ली और कुछ बुदबुदाने लगा , कुछ ही पलों में उसने अपनी आंखें खोली अब उसकी आंखों का संपूर्ण रंग काला हो गया था।

उसके शरीर से गहरे नीले रंग की उर्जा किरणे निकलने लगी थी । उस ऊर्जा की किरणों का उन घातक अस्त्रों के साथ संपर्क होते ही वह सारे अस्त्र दूर से झीटक कर गिर गए ।
उस गहरे नीले रंग की उर्जा के प्रभाव से अब वीर सिंह के सारे घाव अब ठीक हो चुके थे। जिसे देखकर याग्नेश के आश्चर्य की सीमा नहीं रही क्योंकि वह उस नीले रंग की ऊर्जा को पहचानता था, क्योकि यह उर्जा किसी देवता की नही उसके मालिक जिसकी वह उपासना करता था उस ईब्लिस की थी।


अब युद्धवीर सिंह ने अपनी उसी उर्जा का वार याग्नेश पर किया, याग्नेश ने भी बड़ी तीव्रता के साथ इस वार का प्रत्युत्तर दिया और उसके वार को नष्ट किया,

अब दोनों ओर से काली शक्तियों की ऊर्जा के प्रहार हो रहे थे, दोनों में से कोई किसी से कम नजर नहीं आ रहा था , सतत दोनो ओर से काली उर्जाओ के टकराने से वहां की सारी सकारात्मक उर्जाएं नष्ट हो रही थी।

वहां चारों ओर नकारात्मक शक्ति फैलने लगी थी। जिसका प्रभाव वहां खड़े हुए योद्धाओं के मन पर पढ़ रहा था।
वहां खड़े योद्धा और सैनिक जो याग्नेश और युद्धवीर सिंह दोनों काली शक्तियों के धारक के टकराव को देख रहे थे , उन में अब दो दल बन गए थे

जहां एक दल शोर मचा कर याग्नेश का समर्थन कर रहा था वही दूसरा दल युद्धवीर सिंह के जयकारे लगाकर समर्थन कर रहा था।

जैसे-जैसे दोनों का युद्ध और गहरा होता जा रहा था वैसे वैसे वहांकि नकारात्मकता भी बढती जा रही थी , जिसके प्रभाव के कारण उन दोनों दलों की व्यग्रता भी बढ़ती जा रही थी ।

उस प्रभाव में आकर वह दोनों सैनिको के दल आपस में ही भिड़ गए और एक दूसरे को मारने लगे, एक-एक करके वह सभी मृत्यु की आगोश में जा रहे थे उनके शरीर के कटे हुए अंग और बहता हुआ रक्त उनकी वह चीख पुकार वहां के वातावरण को और भयावह बना रही थी।


अब तक के युद्ध से याग्नेश इस बात को जान गया था कि केवल काली शक्तियों के प्रहार से वह युद्धवीर सिंह से नहीं जीत सकता , इसलिए अब उसने अपने पिता द्वारा सिखाई गई पंच तत्वों की उर्जा का काली शक्तियों के साथ सम्मीश्रण करके प्रयोग करने का निर्णय लिया।

आचार्य पद के जाने के बाद याग्नेश ने अपने पिता द्वारा सिखाए गए श्वेत ऊर्जा और पंच तत्व के प्रयोग की कलाओं को याग्नेश ने त्याग दिया था क्योंकि यह सब सात्विक प्रयोग थे।

काली शक्तियों का धारक होने के कारण वह श्वेत ऊर्जा का प्रयोग तो नहीं कर सकता था , परंतु पंचतत्व की ऊर्जा का अवश्य प्रयोग कर सकता था , क्योंकि सभी शरीर धारी पंचतत्व की उर्जा के धारक होते हैं जहां यह ऊर्जा समाप्त होती है वही जीवन भी समाप्त हो जाता है।

याग्नेश ने अब वायु जल और पृथ्वी तत्व और अब सम्मिलित उर्जा का प्रयोग करके एक विशाल चक्रवात का निर्माण किया जिसमें उसने विद्युत तरंगों का भी प्रयोग किया।
वह चक्रवात तेजी से आगे बढ़ता हुआ युद्धवीर सिंह को अपने में समा गया,

युद्धवीर सिंह ने उस चक्रवात से निकलने का भरसक प्रयास किया , परंतु उसके सभी प्रयास विफल हो गए।


उस तेजी से घूमते हुए चक्रवात में भूमि तत्वों से निर्मित विशाल शिलाखंड और जल तत्व और वायु तत्व के सहयोग से बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े टकराने से युद्धवीर सिंह का शरीर कई जगह से घायल हो गया था।

अत्यंत पीड़ा का अनुभव करते हुए और उस चक्रवात में घूमते हुए युद्धवीर सिंह मृत:प्राय हो गया था।

उसकी सांसे बहुत धीमी गति से चलने लगी कुछ ही क्षणों में वह निर्जीव सा हो गया और देखते ही देखते हुए चक्रवात भी शांत हो गया ।
चक्रवात के शांत होते ही युद्धवीर सिंह का शरीर धड़ाम से भूमि पर आकर गिरा युद्धवीर सिंह के शरीर को क्षत विक्षत अवस्था में भूमि पर अचेत अवस्था में पड़ा देखकर , याग्नेश के चेहरे पर मुस्कान उभर आई उसे मृत समझकर याग्नेश अपने अगले शत्रु राजा सुजान सिंह की ओर बढ़ गया।

राजा के अंगरक्षक पहले ही याग्नेश और युद्धवीर सिंह के काली शक्तियों के प्रयोग से उत्पन्न होनेवाली नकारात्मक ऊर्जा की भेंट चढ़ गए थे ।

याग्नेश को अपनी और बढ़ता हुआ देखकर सुजान सिंह भय के मारे थर-थर कांपने लगा। उसने अपनी मदद की आशा से चारों ओर नजर दौड़ाई ,परंतु निराशा ही हाथ लगी , क्योंकि वह इस समय अकेला ही सही सलामत युद्ध भूमी पर खड़ा था।


एक ओर सेनापति समर सिंह अभी भी मूर्छित अवस्था में भूमि पर पड़े थे , तो दूसरी ओर युद्धवीर सिंह भी मृतप्राय अवस्था में भूमि पर अचेत पड़ा हुआ था । उसके सारे सैनिक और अंगरक्षक एक दूसरे को समाप्त कर चुके थे, उसके महामंत्री और राजगुरु का दूर-दूर तक पता नहीं था , शायद मृत्यू के भय से पलायन कर गये हो । चारों ओर लाशों के ढेर और रक्त के कीचड़ के बीच में सुजान सिंह अकेला खड़ा था।

सुजान सिंह को भय के मारे थरथर कांपता हुआ देखकर याग्नेश जोर से ठहाका लगाकर हंसने लगा , उसकी वह भयावह हंसी सुनकर सुजान सिंह का रंग पीला पड़ गया।

याग्नेश -- सुजान सिंह ! देखो अपने चारों ओर है कोई जो तुम्हारी रक्षा करने वाला हो, अब अपने किए गए अपराधों का दंड भुगतने के लिए तैयार हो जाओ।

सुजान सिंह -- मुझे क्षमा कर दो याग्नेश ! तुम जैसा बोलोगे वैसा ही मैं करूंगा, तुम चाहो तुम मेरा सारा धन ले लो परंतु मुझे जीवनदान दे दो, मैं अपने किये अपराधों का प्रायश्चित करना चाहता हूं । कृपया मुझे बस एक अवसर देदो।

याग्नेश -- क्षमा कर दो ! तुम्हें लज्जा नहीं आई सुजान सिंह क्षमा मांगते हुए , मेरे पिता तुम्हें भी अपने पुत्र के समान मानते थे, उनके प्रति किए गए विश्वासघात के लिए तो मैं क्षमा कर दूं ?
मेरे दादाजी की मृत्यु के लिए तो मैं क्षमा कर दूं ? मेरे कुल का सर्वनाश का कारण बनने के लिए क्षमा कर दूं ?

आज मैं जहां खड़ा हूं उसका केवल एक ही व्यक्ति जिम्मेदार है और वह हो तुम इसलिए अपना दंड पाने के लिए सज्ज हो जाओ।
और इस प्रकार क्षमा दान मांग कर अपने गुरु और मेरे पिता की दी हुई शिक्षा को कलंकित मत करो संभालो अपनी तलवार और मेरा सामना करो।


इतना कहकर याग्नेश में अपने तलवार का भरपूर वार सुजान सिंह की गर्दन की तरफ किया, जिसे सुजान सिंह ने अपनी तलवार से रोकने का प्रयास किया, याग्नेश का प्रहार इतना जोरदार था उसके प्रभाव के कारण सुजान सिंह की तलवार भूमि पर गिर गई और अगले ही पाल सुजान सिंह का कटा हुआ सिर भूमि पर गिर पड़ा ।

सुजान सिंह को मरते हुए देखकर याग्नेश खुशी से झूम उठा के-----


मित्रों आज के लिए इतना ही ---अगला अपडेट जल्दी ही-----

आप सभी पाठको से अनुरोध है के इस कहानी पर अपने सुझाव और प्रतिक्रिया अवश्य दें 🙏🙏,

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अध्याय - 9

इतना कहकर याग्नेश में अपने तलवार का भरपूर वार सुजान सिंह की गर्दन की तरफ किया, जिसे सुजान सिंह ने अपनी तलवार से रोकने का प्रयास किया, याग्नेश का प्रहार इतना जोरदार था उसके प्रभाव के कारण सुजान सिंह की तलवार भूमि पर गिर गई और अगले ही पाल सुजान सिंह का कटा हुआ सिर भूमि पर गिर पड़ा । सुजान सिंह को मरते हुए देखकर याग्नेश खुशी से झूम उठा था के-----------

अब आगे ---------


देखते ही देखते सुजान सिंह का शरीर धुएं में परिवर्तित होने लगा । याग्नेश अभी कुछ समझता के इससे पहले उस धूए ने उसे चारों ओर से घेर लिया । अब वह धूआ लोहे की मजबूत पिंजरे में बदल चुका था ।
जिसमें याग्नेश कैद हो चुका था , इस प्रकार की अद्भुत माया याग्नेश पहली बार देख रहा था।

इस प्रकार की अद्भुत माया कौन हो सकता है इस बारे में याग्नेश सोच ही रहा था कि उसे किसी के हंसने की आवाज सुनाई दी। पिंजरे में कैद याग्नेश में जब सामने की ओर देखा तो उसे राजा सुजान सिंह महामंत्री विरूपाक्ष और राजगुरु विद्याधर को आते हुए दिखे

उन तीनों को सामने से आता हुआ देखकर याग्नेश का क्रोध और बढ़ गया और वह उस पिंजरे को तोड़ने का प्रयत्न करने लगा परंतु जैसे ही वह उस पिंजरे को तोड़ने का प्रयास करता उसे तेज झटके लगते।

सुजान सिंह - हंसी आती है मुझे याग्नेश तुम्हारी दशा देखकर , देखो किस प्रकार कैद में किसी पंछी की भांति फड़फड़ा रहे हो। तुम कितनी भी कोशिश कर लो इस कैद से बाहर नहीं आ पाओगे क्या सोचा था तुमने फिर तुम मुझे इतनी सरलता से मार दोगे मत भूलो मैं सुजान सिंह हूं देव नगर का राजा, कोई साधारण सैनिक नही जीसे तुम आसानी से मार दोगे।

याग्नेश - सुजान सिंह तुम्हारा यह मायावी पिंजरा मुझे ज्यादा देर तक कैद नहीं रख सकता अच्छा हुआ तुम तीनों एक साथ मेरे सामने आ गए , बचपन की मित्रता को याद करते हुए मैंने सोचा था कि तुम्हें सरल नंबर क्यों दूं परंतु अब नहीं और अच्छा हुई हुआ फिर तुम अपने साथ राजगुरु को भी ले आए।

राजगुरु विद्याधर -- कैसे ना आता मेरे बच्चे ! तुम्हें अंतिम विदाई देने के लिए तो आना ही था । आखिर तुम मेरे प्यारे विग्नेश के पुत्र जो ठहरे , मुझे बहुत दुख हो रहा है तुम्हें इस दशा में देखकर । चिंता मत करो तुम्हें अब शीघ्र ही इस असहनीय दु:ख से मुक्ति मिलने वाली है।


याग्नेश -- मत लो अपने गंदी जुबान से मेरे पिता का नाम । मेरे दादा ने तुम्हें अपना भाई माना था मेरे पिता भी आपको अपने पिता तुल्य मानते थे। ना जाने क्या क्यों और कैसे आपने मेरे परिवार के साथ विश्वासघात किया , परंतु अब तक इतना मैं जान चुका हूं, मेरे परिवार की दुर्दशा मैं सबसे बड़ा हाथ आपका ही है। जितनी पीडा तुम तीनो ने मुझे दी है उससे कई गुना अधिक पीडा मै तूम तीनो को दूंगा।

राजगुरु - ऐसा मत कहो पुत्र मुझे सच में तुम्हारे परिवार के लिए दुख होता है , परंतु अब तुम्हारे सारे दुखों के समाप्त होने का समय आ गया ।

इतना कहकर राजगुरु ने एक इशारा किया और इसके साथ ही वहां 10 धनुर्धर आ गए राजा सुजान सिंह का इशारा पाते ही सभी धनुर्धरोंने याग्नेश की और अपने तीरो की बरसात कर दी अभी वह तीर याग्नेश तक पहुंच पाते एक धमाके के साथ लोहे के पिंजड़े के चिथड़े उड़ गए जो सामने धनुरधरों से इतनी तीव्रता के साथ टकराए के वे दसों धनुर्धर वहीं ढेर हो गए ।

याग्नेश को इतनी सहजता के साथ पिंजरे से मुक्त हुआ होता हुआ देखकर सुजान सिंह राजगुरु और महामंत्री को बड़ा आश्चर्य हुआ मायावी पिंजरे के धमाके मैं नष्ट होने से जो धुआं उठा था उसके छटते ही उन तीनो ने याग्नेश को देखा इस समय याग्नेश की आंखें नीले प्रकाश से चमक रही थी उसके शरीर से निकलता हुआ नीला प्रकाश उसके चारों ओर एक घेरा बना रहा था

याग्नेश -- क्यों सुजान सिंह क्या हुआ इस तरह मुझे आंखें फाड़ फाड़ कर क्या देख रहे हो और राजगुरु तुमने क्या सोचा था कि आपने इस तरह के छोटे-मोटे जादुई प्रयोग करके तुम मुझे कैद कर लोगे, हा हा हा (हसते हुए) यदि और भी कोई प्रयोग करना हो तो कर लो क्योंकि अब ज्यादा समय तुम्हारे पास नहीं रहा।


इतना कहकर याग्नेश तीव्र गति से सुजान सिंह की और बढ़ा , इससे पहले कि सुजान सिंह अपनी रक्षा के लिए कुछ कर पाता याग्नेश ने उसे गर्दन से उठाकर जोर से जमीन पर पटक दिया , यह सब इतनी तेजी से हुआ और सुजान सिंह भूमी पर इतनी तीव्र गति से टकराया था के एक पल तो उसे समझ ही नही आया के अचानक क्या हुआ । उसके शरीर मे भयंकर पीडा हो रही थी ।
उसे समाप्त करने के लिए याग्नेश ने अपने मयान से तलवार बाहर निकाल ली और सुजान सिंह को समाप्त करने के लिए जैसे ही उसने तलवार हवा में उठाई, उसी पल एक भाला तीव्र गति से आकर उसकी पीठ से टकराया।


इस समय याग्नेश की सारी काली शक्तियां जागृत थी , इसलिए वह भाला याग्नेश की पीठ में प्रवेश नहीं कर पाया।
चुपके से वार करने वाला कौन है , यह देखने के लिए याग्नेश ने पलट कर देखा कौन से वहां थोड़ी ही दूर पर महामंत्री विरुपाक्ष नजर आया

याग्नेश को अपनी ओर देखते हुए देखकर विरुपाक्ष भय से कांप गया उसे अपनी मृत्यु सामने साक्षात नजर आने लगी वह तुरंत घूम कर वहां से भागने लगा, परंतु याग्नेश उसे भागने नहीं देना चाहता था याग्नेश उसी का फेंका हुआ भाला उठाया और निशाना साधा और महामंत्री विरुपाक्ष पर फेंक दिया। वह भाला तीव्र गति से जाकर महामंत्री विरुपाक्ष के पीठ से होकर सीने से आर पार हो गया और एक भयंकर चीख के साथ महामंत्री विरुपाक्ष वही धराशाई हो गया।

महामंत्री विरुपाक्ष को मौत के घाट उतारने के पश्चात याग्नेश सुजान सिंह की ओर मुड़ गया, तब तक सुजान सिंह भी संभाल कर खड़ा हो चुका था। इतनी आसानी से हार मानने वालो मे सुजान सिहं नही था , वह शारीरिक बल और युद्ध कला में याग्नेश से किसी भी तरह कम नही था ।

सुजान सिंह को संभल कर खड़े होते हुए देखकर याग्नेश मुस्कुराया

याग्नेश -- संभालो अपनी तलवार सुजान सिंह और मेरा सामना करो मैं एक निहत्थे असहाय कि हत्या नहीं करना चाहता, तुम्हें मारते वक्त मुझे भी ऐसा लगना चाहिए कि मैं एक दयनीय असहाय व्यक्ति का नहीं देव नगर के राजा का वध कर रहा हूं।

सुजान सिंह ने भी अब तक अपनी तलवार मयान से बाहर निकाल ली थी दोनों योद्धा अपनी अपनी तलवार लेकर एक दूसरे से भिड़ गए।

जहां सुजान सिंह ने अपनी तलवार का भरपूर वार याग्नेश की गर्दन की तरफ किया, तो वही याग्नेश ने भी बड़ी सरलता से उस वार को अपनी तलवार पर रोक दिया और साथ ही साथ घुमाते हुए सुजान सिंह को पीछे की ओर धक्का दिया,

याग्नेश ने भी सुजान सिंह के पेट की ओर अपनी तलवार से वार किया , तो वही सुजान सिंह ने भी कलाबाजियां खाकर बड़ी तीव्रता के साथ याग्नेश की कलाई पर वार किया जिससे काली शक्तियों के कवच के कारण याग्नेश पर कोई असर नही हुआ ।

अब याग्नेश भी अपनी तलवार को किसी चक्र की मांनींद तीव्र गति से सुजान सिंह की ओर बढ़ा और बडी फुर्ती से उसके वार से बचते हुए एक वार उसकी बाजू पर और दूसरा उसके पीठ पर कीया जिससे सुजान सिंह घायल हो गया।


अपने किसी भी प्रहार का काली शक्तियों के कवच के कारण याग्नेश पर ना होता हुआ देखकर सुजान सिंह अपनी तलवार नीचे किए घुटने के बल जमीन पर बैठ गया, सुजान सिंह को इस प्रकार अपने हथियार डाल कर जमीन पर बैठा हुआ देखकर याग्नेश मुस्कुराया।

याग्नेश -- बस इतना ही जोर था तुममे सुजान सिंह ! तुम अपने आप को देवनगर का राजा कहते हो , इतना कमजोर राजा जो मेरे सामने थोड़ी देर भी टिक नहीं पाया।

सुजान सिंह -- बल और युद्ध कौशल में मैं किसी भी प्रकार तुम से कम नहीं हूं , यह तुम भी अच्छी प्रकार जानते हो, तुम मुझे कह रहे हो परंतु सच तो यह है कि तुम्हें अपने बल और युद्ध कौशल पर विश्वास नहीं है , इसलिए तुमने अपने आपको काली शक्तियों के कवच से सुरक्षित कर रखा है, इस प्रकार का युद्ध करने का क्या लाभ जब सामने वाला तुम्हारी किसी भी प्रहार से आहत ना हो ।
इसलिए लो मैं तुम्हारे सामने प्रस्तुत हूं कर दो मेरी हत्या यही तो तुम भी चाहते हो मुकाबले का अवसर देना तो बस तुम्हारा एक दिखावा है।


ऐसा कहकर सुजान सिंह ने याग्नेश के अहंकार पर चोट की और निशाना भी सही लगा सुजान सिंह की बात सुनकर याग्नेश ने अब अपना काली शक्तियों का कवच हटा दिया।

याग्नेश -- तुम्हें हराने के लिए मुझे इस कवच की कोई आवश्यकता नहीं है , लो अब मैंने कवच हटा दिया अब सामना करो मेरा।
याग्नेश के द्वारा कवच के हटाए जाने पर सुजान सिंह एक बार फिर अपनी तलवार लेकर सज्ज हो गया दोनों योद्धा किसी मतवाले हाथी की तरह एक दूसरे से भीड गए थे, ना कोई किसी से कम ना कोई किसी से ज्यादा ।

यहां दूसरी ओर राजगुरु विद्याधर अब तक समझ चुके थे सुजान सिंह अकेले याग्नेश का सामना ज्यादा देर तक, नहीं कर सकते और यदी वो राजा की सहायता करने जाता है तो ऐसी स्थिती में याग्नेश भी अपनी काली शक्तियों का प्रयोग करेगा अब तक राजगुरु याग्नेश की शक्तियों को देखकर इतना तो समझ ही चुके थे कि वह उसकी शक्तियों का अकेले सामना नहीं कर सकते

राजगुरू जानते थे के युद्धवीर सिंह की सहायता के बीना वो इस समय याग्नेश को नहीं रोक सकते ।

इसीलिए राजगुरु उस ओर चल पड़ा जहां अभी भी युद्धवीर सिंह भूमि पर पड़ा था, युद्धवीर सिंह को भी अब तक होश आ गया था वह बड़ी कठिनाई से उठने का प्रयत्न कर रहा था , युद्धवीर सिंह को जीवित देखकर राजगुरु की जान में जान आई उसने आगे बढ़ कर युद्धवीर सिंह को सहारा देकर बैठा दिया

राजगुरु -- शुक्र है युद्धवीर सिंह कि तुम सही सलामत हो , तुम्हारी सहायता के बिना याग्नेश को रोकना संभव है।


युद्धवीर सिंह -- राजगुरु यहां मैं खड़ा होने में भी असमर्थ हो रहा हूं और आप कह रहे हो कि मैं याग्नेश का सामना करो , क्षमा करें राजगुरु परंतु अब मैं इस स्थिति में नहीं हूं क्या आपकी कोई सहायता कर सकूं। परंतु आपको मै इस परिस्थिति से निकलने का रास्ता बता सकता हूं जो शायद आप भूल गए हो।

राजगुरु -- कैसा रास्ता , इस समय यूं पहेलीयों मे बात मत करों , स्पष्ट कहो क्या कहना चाहते हो , जरा विस्तार से बताओ।

युद्धवीर सिंह -- राजगुरु आप शायद छोटी रानी को भूल गए हो, एक वही है जो इस समय राजा की रक्षा कर सकती है।

राजगुरु -- बात तो तुम्हारी ठीक है परंतु छोटी रानी तो वर्षों पहले अपने नन्हे कुमार के साथ महल को छोड़कर चली गई थी और वह अब इस समय कहां है किसी को नहीं पता।

युद्धवीर सिंह -- यही तो फर्क है आप में और मुझ में राजगुरु, जीवन मे सफल होने के लिए दुरदर्शीता होना आवश्यक हैं । मुझे पहले ही पता था के इस प्रकार की परिस्थिति सामने आ सकती हैं , इसलिए मैंने पहले ही उन्हें ढूंढ निकाला है, इसलिए अब ज्यादा देर मत करो और शीघ्र जाओ महल के तहखाने में स्थित कैद में तुम्हें वह मिल जाएगी।

युद्धवीर सिंह की बात सुनकर राजगुरु ने तुरंत महल की ओर दौड़ लगा दी।



यहां सुजान सिंह और याग्नेश का युद्ध अपने चरम सीमा पर था, दोनों इस युद्ध में बुरी तरह घायल हो चुके थे याग्नेश के प्रभावशाली वार को सहते सहते सुजान सिंह के शरीर की शक्ति कम हो गई थी, वह बुरी तरह थक चूका था, और इसी बात का फायदा उठाकर याग्नेश ने अपनी शक्ति एकत्रित करके अपनी जगह से उछलकर अपने दोनों पैरों का वार सुजान सिंह के सीने पर किया जिससे सुजान सिंह भूमि पर गिर गया।

याग्नेश ने अपना अंतिम वार करने के लिए सुजान सिंह के सीने पर पैर रखा हर तलवार हवा में उठाई ही थी की इससे पहले कि वह सुजान सिंह पर वार करता राजगुरु की आवाज वहां गूंज उठी।

राजगुरु -- रुक जाओ याग्नेश सुजान सिंह को मारने से पहले जरा एक बार यहां देख लो कहीं ऐसा ना हो कि बाद में तुम्हें पछताना पड़े।

राजगुरु की बात सुनकर जब याग्नेश ने उस ओर देखा , तो सामने खड़े व्यक्ति को देखकर वह स्तब्ध सा हो गया उसके नेत्रों से अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी , होंठ मानो सिल गए हो, वह बहुत कुछ कहना चाह रहा था परंतु शब्द उसका साथ नही दे रहे थे।

आज के लिए इतना ही अगला अध्याय शीघ्र ही ---
आप सब पाठकों से नम्र निवेदन है कि इस कहानी के प्रति अपने सुझाव एवं प्रतिक्रिया अवश्य दें ।🙏🙏💐💐💐💐
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सुजान सिंह -- राजगुरु शत्रुओं का समूल नाश ही हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करती है । अब इन दोनों का मेरे लिए कोई उपयोग नहीं है , समाप्त कर दो दोनों को, जीते जी तो नहीं परंतु मरने के बाद ही सही मेरा मित्र याग्नेश अपनी बहन और भांजे से मिल तो सकेगा। अब मैं इतना निष्ठुर तो नहीं हो सकता के बिछडे परिवार का मीलन ना करवाऊं । हा हा हा हा ।

अब आगे --



सुजान सिंह का आदेश मिलते ही राजगुरु ने कुमार की हत्या करने के लिए जैसे ही तलवार हवा में उठाई , इसके पहले कि वह कुमार का कुछ अहित कर सके, उसका हाथ कट कर भूमि पर गिरा , यह इतना तेजी से हुआ था, के पहले तो उसे समझ नहीं आया कि क्या हुआ , परंतु जब उसने अपना कटा हुआ हाथ भूमि पर पड़े देखा और उसकी कटी बाजू से रक्त का फावारा निकलते हुए देखा तो एक जोरदार चीख के साथ वह वही मूर्छित हो गया।

राजगुरु की चीख सुनकर सुजान सिंह और युद्धवीर सिंह का ध्यान उस ओर जब गया तब उन्होंने समर सिंह को वहां राजगुरु के रक्त से सनी हुई तलवार लेकर खड़े हुए पाया।

हुआ यूं था होश में आने के पश्चात समर सिंह ने जब युद्धवीर सिंह को चोरी-छिपे घायल याग्नेश पर वार करते हुए देखा और दूसरी तरफ राजगुरु के कब्जे में छोटी रानी और कुमार को देखा तो उसे कुछ-कुछ षड्यंत्र का अंदाजा हो गया था और रही सही कसर सुजान सिंह और युद्धवीर सिंह की बातों ने कर दिया था, जब वह विजयानंद को समाप्त करने की योजना पर बात कर रहे थे।

इनकी बातों से समर सिंह को अंदाजा हो गया था कि छोटी रानी और कुमार का जीवन पर संकट आ सकता है , इसलिए वह जमीन पर रेंगते रेंगते ही राजगुरु के समीप तक पहुंच गया और जैसी सुजान सिंह ने राजगुरु को छोटी रानी श्रुति और कुमार को समाप्त करने का आदेश दिया , तो समर सिंह अपनी तलवार संभाल कर सजग हो गया और जैसे ही राजगुरु ने कुमार को समाप्त करने के लिए अपनी तलवार उठाई उसी समय बड़ी फुर्ती के साथ समर सिंह ने राजगुरु का हाथ काट दिया।


समर सिंह को इस प्रकार अपने आदेश के विरुद्ध जाता हुआ देखकर सुजान सिंह को बहुत क्रोध आया

सुजान सिंह -- यह क्या किया अपने सेनापति समर सिंह ! आप तो स्वामी भक्ति की मिसाल थे राजगुरु पर वार करके आपने मेरे आदेश की अवहेलना की है मुझे आपसे ऐसी आशा नहीं थी क्या यही है आपकी स्वामी भक्ति।

समर सिंह -- स्वामी भक्ति की बात आप ना ही करें महाराज । मेरे लिए मेरी स्वामी हैं मेरी मातृभूमि ।
आपकी और युद्धवीर सिंह की बातों से मैं इतना तो समझ चुका हूं कि याग्नेश को इस परिस्थिति में पहुंचाने वाले आप ही थे । इतने से भी आपका मन नहीं भरा तो आप विजयानंद को भी समाप्त करने की योजना बनाने लगे , आप भूल रहे हो महाराज कि हमारे नगर की नींव गजेंद्र का वह मंदिर और आश्रम ही है और आप उससे ही नष्ट करना चाहते हो मैं आपको ऐसा नहीं करने दूंगा चाहे इसके लिए मुझे आपके विरुद्ध भी जाना पड़े ।


वहीं दूसरी ओर राजगुरु की भूमि पर गिरते ही कुमार दौड़ कर अपनी मां श्रुति के पास पहुंचा, युद्ध भूमि में अब तक जो कुछ भी हो रहा था उसके कारण भय और दुख दोनों उसके नेत्रों में झलक रहे थे अपनी माता को इस प्रकार भूमि पर मूर्छित देखकर उसके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी।

कुमार नीचे बैठ गया और अपनी माता का सिर अपनी गोदी में रखकर प्रेम से अपनी माता को पुकारने लगा उसके नेत्रों से गिरते हुए अश्रु उसकी माता श्रुति के चेहरे पर पड़ रहे थे।

कुमार -- उठो ना मां ! उठो देखो मुझे अब मैं बिल्कुल सुरक्षित हूं मां , उठो ना ! मैं आपको इस प्रकार नहीं देख सकता मां।

अपनी मां को उठाने के लिए कुमार उसे पुकारता हुआ सतत प्रयास करने लगा एक मां किस प्रकार अपने पुत्र की पुकार को अनसुना कर सकती थी श्रुति को अब होश आ गया था उसने अपने नेत्र खोलकर कुमार की और देखा और एक हाथ से उसके अश्रु पहुंचकर उसके गालों को सहलाया और उठ कर बैठ गई ।

श्रुति -- मत रो मेरे लाल ! मत रो । देखो मैं बिल्कुल ठीक हूं इतना कहकर श्रुति ने अपने पुत्र को अपने कंठ से लगा लिया और उसे चुप कराने लगी ।
तभी उसे मूर्छित होने से पहले की घटना याद आई तो वह किसी अनर्थ की आशंका से तुरंत अपने पुत्र को अलग कर दिया और उस ओर दौड़ी जहां याग्नेश भूमि पर पड़ा हुआ था ।
अपने नेत्रों के आगे याग्नेश पर घातक प्रहार होते हुए देख कर भी उसका मन कह रहा था कि उसका भाई जीवित है ईश्वर इतना निष्ठुर नहीं हो सकता कि इतने वर्षों बाद मिले हुए उसके भाई को इस प्रकार छीन ले।

कुमार को पहले ना तो सुजान सिंह के बारे में पता था और ना ही याग्नेश के बारे में परंतु अब तक की बातों से उसे सब पता चल गया था अपनी मां को भूमि पर पड़े हुए अपने मामा की ओर दौड़ते हुए देखकर कुमार भी श्रुति के पीछे दौड़ पड़ा।

समर सिंह जानता था के सुजान सिंह कुछ भी कर सकता है श्रुति और कुमार के प्राणों को संकट में देखकर समर सिंह भी दोनों के पीछे हो लिया।


श्रुति याग्नेश तक पहुंची ही थी कि सुजान सिंह ने उसे बालों से पकड़ लिया अपनी माता को इस प्रकार प्रताड़ित होता हुआ देखकर कुमार को बहुत क्रोध आया वह क्रोध में भरकर सुजान सिंह पर छलांग लगाने वाला था कि पीछे से समर सिंह ने उसे पकड़ लिया।

कुमार -- छोड़ दो मुझे मैं आज इस राजा को नहीं छोडूंगा जिसने मेरे मां का जीवन दुखो से भर दिया , छोड़ दो मुझे।

सुजान सिंह -- वाह बेटे वाह ! तू मुझे समाप्त करेगा , मानना पड़ेगा तेरे साहस को। आखिर क्यों ना हो तेरे धमनियों में मेरा ही तो रक्त दौड़ रहा है। तुम्हे मारने मे मुझ बहुत दु:ख होगा, परंतु क्या करे मेरी वीवशता हैं।

राजगुरु -- छोड़ दो महाराज ! छोटी रानी को । आप एक राजा हो इस प्रकार किसी स्त्री पर हाथ उठाना आपको शोभा नहीं देता। छोड़ दो छोटी रानी को अपने पद को कलंकित मत करो।

सुजान सिंह -- तुम तो चुप ही रहो राजगुरु मुझे शिक्षा देने की तुम्हारी हैसियत नहीं है।


श्रुति -- छोड़ दीजिए छोड दिजीए , बस एक बार मिलने दीजिए मुझे अपने भाई से ।
आखिर हमने आपका क्या बिगाड़ा था जो आपने हमारे परिवार के साथ विश्वासघात किया । जिसने किसी समय आपके प्राणों की रक्षा की थी उसी के पीठ में खंजर घोप दिया, अब अपनी संतान को भी मारने पर तुले हो इतना कैसे गिर सकते हो आप। घृणा होती है मुझे अपने आप से के किसी समय मैने आपसे प्रेम किया था।


सुजान सिंह - घृणा ! घृणा तो मैं करता था तुम्हारे भाई से । मैंने तो कभी उसे अपना मित्र माना ही नहीं एक राजा का बेटा होने के पश्चात भी तुम्हारे इस भाई के कारण मुझे आश्रम में वह सम्मान कभी प्राप्त नहीं हुआ जो प्राप्त होना था, तुम्हारा भाई तो मारा गया ।
यदि मैं तुम्हें जीवीत छोड़ दूं तो कल को तुम या तुम्हारा बेटा मेरे लिए खतरा बन सकता है इसलिए तुम दोनों का मरना मेरे लिए जरूरी है।

अपनी विवशता देखकर श्रुति अपने भाई याग्नेश को पुकारने लगी , उसे पूर्ण विश्वास था कि उसकी पुकार उसका भाई जरूर सुनेगा-----

श्रुति -- उठ जाओ , भाई उठ जाओ ! इतने वर्षों पश्चात मिलकर आप इस प्रकार मुझे छोड़कर नहीं जा सकते, उठो भाई उठो आपके बिना यहां मेरी और मेरे पुत्र की रक्षा करने वाला कोई नहीं।

श्रुति स सतत् याग्नेश को पुकारने लगी , इस आशा के साथ के उसका भाई उसकी पुकार जरुर सुनेगा -----

सुजान सिंह ने श्रुति को मारने के लिए अपने तलवार उठाई ही थी के तभी , नीले रंग के प्रकाश का एक चक्र बड़ी तीव्र गति से आकर उसके सीने से टकराया और एक बड़ा सा छेद करते हुए पार हो गया एक दर्दनाक चीख के साथ सुजान सिंह वही धराशाई हो गया और किसी कटे वृक्ष की भांति भूमि पर गिर गया।

युद्धवीर सिंह जो अभी सुजान सिंह की ओर देख ही रहा था अचानक से हुए इस हमले को एक पल तो वह समझ ही नहीं पाया , परंतु जैसे ही उसे वस्तुस्थिति का ज्ञान हुआ उसने तुरंत पीछे पलट कर देखा तो उसकी आंखें हैरत से फटी की फटी रह गई ।

वहां याग्नेश सही सलामत खड़ा था। उसके नेत्र किसी जलते हुए अंगारे की भांति लग रहे थे शरीर से नीले रंग की उर्जा निकल रही थी वह सामने खड़ा किसी मृत्यु दूत की भांति लग रहा था।

हुआ यूं के याग्नेश ने अपनी आत्मा का एक अंश इब्लिस को समर्पित कर दिया था । जिसके कारण कोई भी साधारण अस्त्र उसे मार नहीं सकता था।
युद्धवीर सिंह के द्वारा किए गए वार से वह कुछ देर के लिए अचेत आवश्य हो गया था, उसकी सांसे थमने लगी थी। तभी उसके भीतर इब्लिस की शक्ति जागृत हो उठी उसकी चेतना फिर लौट आई जब उसने अपने नेत्र खोल कर सामने देखा तो सुजान सिंह उसकी प्यारी छोटी बहन श्रुति के बाल पकड़कर खड़ा था और हत्या करने ही वाला था के जिसे देखकर याग्नेश का क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया और उसने तुरंत प्राणघातक ऊर्जा का प्रयोग सुजान सिंह पर कर दिया जिसके फलस्वरूप सुजान सिंह मारा गया।

अपने सीने में धंसे हुए भाले को बाहर निकालकर उसने युद्धवीर सिंह की ओर फेंक दिया परंतु तब तक युद्धवीर सिंह ने उसे देख लिया था, उसने तुरंत अपनी जगह से हटकर अपने प्राणों की रक्षा की। इससे पहले कि याग्नेश अपना अगला वार करता युद्धवीर सिंह ने वहां एक धुएं का गुबार प्रकट किया और याग्नेश की नजरों से बचकर वहां से भाग गया और जाते-जाते अपने साथ राजगुरु को भी ले गया।

युद्धवीर सिंह का पीछा करने से ज्यादा जरूरी इस समय याग्नेश का अपनी बहन और भांजे से मिलना था।

अपने भाई को सही सलामत सामने खड़ा देख श्रुति दौड़कर याग्नेश के गले लग गई ।बरसों से ह्रदय में छिपे हुए दुख दर्द अश्रु और रुदन द्वारा बाहर निकलने लगे।
जहां श्रुति अपने भाई के सीने से लग कर आंसू बहा रही थी वही याग्नेश भी प्रेम से अपने बहन के सिर पर हाथ फिरता हुआ उसे अपने गले से लगाए अश्रु बहा रहा था। दोनों में से कोई कुछ भी बोल नहीं रहा था परंतु उनके नेत्रों से बहती अविरल अश्रु धारा सब कुछ कह रही थी ।

दूर खड़ा कुमार भी इस मिलन को देखकर अत्यंत भावुक हो रहा था , उसमें कभी अपनी मां के सिवा और किसी अपने को नहीं देखा था । आज अपने मामा को देखकर वह भी बहुत भावुक हो गया था । याग्नेश ने कुमार की और देखा और उसे अपनी और आने का इशारा किया, कुमार भी बस इसी प्रतीक्षा में खड़ा था, वह तुरंत दौड़कर याग्नेश के गले लग गया।

इस युद्ध में संपूर्ण रात्रि बीत चुकी थी, पूर्व दिशा की लालिमा सूर्योदय होने की सूचना दे रही थी । वही दूर खड़ा सेनापति समर सिंह याग्नेश को उसकी बहन और भांजे से मिलता हुआ देख रहा था।

इस नए सूर्योदय के साथ देवनगर का नया अध्याय किस दिशा की ओर जाएगा इसी सोच के साथ समर सिंह ने अपनी दृष्टि आकाश की और उठाई।


आज के लिए इतना ही , अगला अपडेट शीघ्र ही ----
आप सभी पाठकों से नम्र निवेदन है कि आप इस कहानी पर अपने सुझाव एवं प्रतिक्रिया अवश्य दें--
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Hello everyone.

We are Happy to present to you The annual story contest of XForum


"The Ultimate Story Contest" (USC).

Jaisa ki aap sabko maloom hai abhi pichhle hafte hi humne USC ki announcement ki hai or abhi kuch time pehle Rules and Queries thread bhi open kiya hai or Chit Chat thread toh pehle se hi Hindi section mein khula hai.

Well iske baare mein thoda aapko bata dun ye ek short story contest hai jisme aap kisi bhi prefix ki short story post kar sakte ho, jo minimum 700 words and maximum 7000 words tak ho sakti hai. Isliye main aapko invitation deta hun ki aap is contest mein apne khayaalon ko shabdon kaa roop dekar isme apni stories daalein jisko poora XForum dekhega, Ye ek bahot accha kadam hoga aapke or aapki stories ke liye kyunki USC ki stories ko poore XForum ke readers read karte hain.. . Isliye hum aapse USC ke liye ek chhoti kahani likhne ka anurodh karte hain.

Aur jo readers likhna nahi chahte woh bhi is contest mein participate kar sakte hain "Best Readers Award" ke liye. Aapko bas karna ye hoga ki contest mein posted stories ko read karke unke upar apne views dene honge.

Winning Writers ko Awards k alawa Cash prizes bhi milenge jinki jaankaari rules thread mein dedi gayi hai, Total 7000 Rupees k prizes iss baar USC k liye diye jaa rahe hain, sahi Suna aapne total 7000 Rupees k cash prizes aap jeet shaktey hain issliye derr matt kijiye or apni kahani likhna suru kijiye.

Entry thread 7th February ko open hoga matlab aap 7 February se story daalna shuru kar sakte hain or woh thread 28th February tak open rahega is dauraan aap apni story post kar shakte hain. Isliye aap abhi se apni Kahaani likhna shuru kardein toh aapke liye better rahega.

Aur haan! Kahani ko sirf ek hi post mein post kiya jaana chahiye. Kyunki ye ek short story contest hai jiska matlab hai ki hum kewal chhoti kahaniyon ki ummeed kar rahe hain. Isliye apni kahani ko kayi post / bhaagon mein post karne ki anumati nahi hai. Agar koi bhi issue ho toh aap kisi bhi staff member ko Message kar sakte hain.


Rules Check karne ke liye is thread ka use karein — Rules & Queries Thread

Contest ke regarding Chit Chat karne ke liye is thread ka use karein — Chit Chat Thread



Prizes
Position Benifits
Winner 3000 Rupees + Award + 5000 Likes + 30 days sticky Thread (Stories)
1st Runner-Up 1500 Rupees + Award + 3000 Likes + 15 day Sticky thread (Stories)
2nd Runner-UP 1000 Rupees + 2000 Likes + 7 Days Sticky Thread (Stories)
3rd Runner-UP 750 Rupees + 1000 Likes
Best Supporting Reader 750 Rupees Award + 1000 Likes
Members reporting CnP Stories with Valid Proof 200 Likes for each report



Regards :- XForum Staff
 

jaggi57

Abhinav
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अध्याय - 12

याग्नेश को इसी समय काल में छोड़कर आइए अब हम चलते हैं समय के उस कालखंड में जगदेव नगर का निर्माण भी नहीं हुआ था जानते हैं देव नगर के देवता गजेंद्र और भूमि के इस भूभाग के कुछ रहस्य के बारे में।

बात उस समय की है जब दक्ष प्रजापति के यज्ञ में माता सती द्वारा अपने प्राणों का परित्याग करने के पश्चात भगवान भोलेनाथ संसार से विरत होकर पृथ्वी के ऐसे भूभाग में गए जहां अब तक कोई गया नहीं था।

निर्विघ्न रूप से अपने मूल स्वरूप में स्थित होने के लिए उनकी समाधि में कोई व्यवधान ना हो इस कारण उन्होंने उस भूखंड को ऐसे ऊर्जा कवच आच्छादित कर दिया कोई भी देवता या बाहरी जीव इस क्षेत्र में ना तो प्रवेश कर पाए और ना ही देख पाए ।

पृथ्वी का यह भूखंड चारों तरफ से पर्वतों से घिरा हुआ था विभिन्न प्रकार के सरोवर और झरने यहां की सुंदरता को और बढ़ा रहे थे हर प्रकार की वनस्पतियों के पौधे एवं वृक्षों के घने जंगलों से आच्छादित दिव्य सुगंध से परिपूर्ण या क्षेत्र अद्भुत था।

इस प्रकार संसार से विलग होकर हजारों वर्ष भोलेनाथ ने यहां ध्यान किया ध्यान का उद्देश्य पूर्ण होने के पश्चात भोलेनाथ वापस कैलाश लौट गए ।

समाधि अवस्था मे भोलेनाथ के शरीर से निकलती हुई दिव्य ऊर्जा उस भूमि में समा गई थी , शिवतेज से परिपूर्ण वह भूखंड अब एक अलग ही शक्ति से आच्छादित हो गया।
उसी समय पाताल लोक मे असुरो का राजा अनलासुर तपस्यारत था । एक पैर पर खडा होकर पिछले 100 वर्षों से ब्रह्मा जी के कठिन तप कर रहा था उसके अद्भुत तप को देखकर देवताओं ने कई बार विघ्न उपस्थित करने का प्रयास किया , क्योंकि वह जानते थे के यदि इसकी तपस्या पूर्ण हुई तो सर्वप्रथम देवलोक और तत्पश्चात मानव लोक भारी संकट में आजाएंगे। परंतु अनलासूर के तेज के आगे देवताओं के संपूर्ण प्रयास विफल रहे उसके तप के प्रभाव से आखिर में ब्रह्मा जी को आना ही पड़ा

ब्रह्मा जी - नेत्र खोलो पुत्र ! मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूं कहो क्या कारण है, इस घोर तपस्या का, क्या चाहते हो मुझसे कहो।

ब्रह्मा जी के तेज का अनुभव कर और उनकी वाणी सुनकर अनलासूर ने अपने नेत्र खोलें , सामने अपने इष्ट को देखकर दोनों हाथ जोड़कर प्रथम उनके चरणों में प्रणाम किया फिर बोला

अनलासूर - प्रभु आपके दर्शन कर मैं अभिभूत हुआ । मैं तो केवल असुरों के न्याय के लिए तपस्यारत था , आप तो सृष्टि कर्ता है । एक पिता के लिए उसके सभी पुत्र समान होने चाहिए परंतु असुरों के लिए यह भेदभाव क्यों हम असूर किसी भी प्रकार से देवताओं से कम नहीं है , फिर क्यों देवताओं को स्वर्ग और हमें पताल लोक में नर्क जैसा जीवन व्यतीत करना पड़ता है।

ब्रह्मा जी - पुत्र इस संसार में जिसको जो भी प्राप्त होता है वह उसके कर्मानुसार ही प्राप्त होता है । असुर सदैव पाप कर्म और हिंसा में लिप्त रहते हैं इसी कारण उन्हें पाताल लोक प्राप्त हुआ है । उसी कर्म विधान के कारण तुम्हारे उत्तम तप के फल स्वरुप मैं यहां तुम्हें वांछित फल देने के लिए उपस्थित हुआ हूं।

अनलासुर - कर्म विधान प्रभु क्या कभी देवताओं ने कोई अपराध नहीं किया कोई पाप कर्म नहीं किया देवताओं के हर कर्म पर उन्हें पुरस्कार प्राप्त होता है और हम असुरों को मृत्युदंड अब सृष्टि में मैं ऐसा अन्याय नहीं होने दूंगा इसलिए है प्रभु आप मुझे ऐसा वर दो जिससे मेरी मृत्यु ना हो मैं सबके लिए अवध्य रहूं।

ब्रह्मा जी - पुत्र मृत्यु तो अटल है इस संसार में जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित हुई है तुम उसी के समकक्ष कोई और वरदान मांग लो।

अनलासुर - ठीक है प्रभु तो यह वरदान दीजिए कि मैं त्रिदेवो तथा त्रीदेवीओं द्वारा देवताओं द्वारा और आपकी सृष्टि के किसी भी जीव द्वारा अवध्य रहूं।

ब्रह्मा जी तथास्तु कहकर वरदान देकर अपने लोक चले गए।
ब्रह्मा जी से वरदान पाकर अपने बल और सामर्थ्य के मद में चूर अनलासूर ने अपनी असुर सेना एकत्रित कर स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी ।
उस के बल और सामर्थ्य के आगे देवता टिक नहीं पाए , और उन्हे स्वर्ग से निष्कासित होना पड़ा । संपूर्ण त्रिलोकी पर विजय प्राप्त कर अनलासुर ने अपना एकछत्र शाषन स्थापित किया । उसने सब जगह धर्म कार्य यज्ञ देव पूजन इत्यादि ऐसा कोई भी अनुष्ठान जिससे देवताओं को बल मिले सभी बंद करवा दिए ।
ब्रह्माजी द्वारा उसने कर्मों के सिद्धांत को सुन रखा था के दुष्कर्म का प्रभाव हमेशा ही व्यक्ति के जीवन पर दुष्प्रभाव करता है। इसलिए उसने तीनों लोगों में कर्म सिद्धांत और न्याय की स्थापना की, परंतु वह यह भूल गया कि अपने सिद्धांत लागू करने में और धर्म कार्य बंद करवाने में कितने ही निर्दोषों की उसने हत्या करवाई थी कितना अत्याचार और कितनी निर्ममता अपनाई थी।

वहीं दूसरी ओर अपनी समस्या का कोई समाधान ना पाकर देवता छुपते छुपते दर-दर भटक रहे थे। उस समय भोलेनाथ भी सृष्टि से विरत होकर अज्ञात स्थान पर तप कर रहे थे जैसे ही भोलेनाथ कैलाश वापस आए सभी देवता अपने समाधान हेतु कैलाश पहुंचे भगवान भोलेनाथ को अपने सम्मुख पाकर सभी प्रसन्ना हुए।

देवराज इंद्र ने भोलेनाथ को प्रणाम कर सभी देवताओं की समस्या का वर्णन किया

भोलेनाथ - हे देवताओं ! तुम्हारी समस्या से मैं अवगत हूं , परंतु ब्रह्मा जी के वरदान के कारण मैं सीधे-सीधे तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता परंतु तुम्हारी समस्या के समाधान का मार्ग आवश्य बता सकता हूं।

तुम सभी देवता पृथ्वी के उस भूखंड में जाओ जहां मैं तपस्यारत था। उस भूमि में समाई मेरी उर्जा द्वारा तुम्हें तुम्हारी समस्या का समाधान प्राप्त हो जाएगा।

उस भूखंड को मैंने एक ऊर्जा परत से आच्छादित कर दिया है इस कारण वह क्षेत्र किसी बाहरी व्यक्ति के लिए अदृश्य है।
वहां तुम सब असुरों की दृष्टि से भी सुरक्षित रहोगे और बिना व्यवधान अपना कार्य संपन्न कर सकोगे।

वहां तुम सब जाकर तप करो , तप ही एकमात्र ऐसा साधन है जिससे हर समस्या का समाधान प्राप्त हो सकता है। इतना कहकर भगवान भोलेनाथ ने सभी देवताओं को उसी जगह पहुंचा दिया जहां वह समाधि में थे।

उस अद्भुत भूखंड पर पहुंचते ही देवताओं का मन शांत हो गया वहां उन्हें भोलेनाथ की उर्जा का भी अनुभव हुआ ।

सभी देवता वहां अपने लिए उचित स्थान बनाकर तपस्या करने के लिए बैठ गए, तप करते हुए उन्हें वहा कई वर्ष बीत गए
तप करते हुए उनके शरीर से ऊर्जा निकलने लगी उन सबकी उर्जा वहां एक स्थान पर जहां भगवान भोलेनाथ का तेज समाया हुआ था उस जगह समाने लगी शिवतेज और देवताओं का तेज मिलकर एक दिव्य तेज पुंज मैं परिवर्तित हो गया।

अग्नि देव वायु देव और वरुण देव के तेज ने जैसे ही उस भूमि से स्पर्श किया उस तेज पुंज ने एक बालक का आकार धारण करना शुरू किया धीरे-धीरे वह आकार 5 वर्ष की अवस्था वाले एक दिव्य बालक के रूप में परिवर्तित हो गया।
उस बालक का रूप बड़ा ही दिव्य था , सुनहरे बाल , श्वेत धवल रंग, मस्तक पर दिव्यतेज, कोमल भुजाएं और सब को अपनी ओर आकर्षित करने वाले नीले नेत्र ।

उस बालक ने जब अपने नेत्र खोलें तो अपने चारों ओर देखा तत्पश्चात अपने आपको देखा , सर्वप्रथम उसके मन में प्रश्न प्रकट हुआ के मैं कौन हूं ? कौन मेरे माता-पिता है ? किस कारण मेरी उत्पत्ति हुई है ? ऐसे अनेकों प्रश्न इस बालक के मन में उठने लगे।

अपने प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए उसने चारों और देखा तो वहां उसे देवता ध्यान की अवस्था में बैठे हुए नजर आए। उत्सुकता वश और अपने प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए बालक जैसे ही उन देवताओं की और बढा तो उसे वहां पास की ही झाड़ियों के पीछे से वृक्षों के गिरने का और अनेक पंछियों का स्वर सुनाई दिया ।

बाल सुलभ उत्सुकता वश वह बालक स्वर की दिशा में चल दिया जैसे ही वह उन बड़ी-बड़ी झाड़ियों के उस पार पहुंचा तो उसने वहां अनेक सुंड वाला श्वेत रंग का एक विशाल हाथी देखा जो वहां के वृक्षों को उखाड़ उखाड़ कर उन वृक्षों के फलों का रसास्वादन कर रहा था , जिस कारण उन वृक्षों पर स्थित अनेक पंछियों के घोंसले नष्ट हो गए थे उन पंछियों का करुण क्रंदन सुनकर उस बालक ने उस विशाल हाथी को रोकने का निश्चय किया।

बालक - हे रुको! तुम इस प्रकार इस वन को नुकसान नहीं पहुंचा सकते, रुक जाओ !!

उस बालक की आवाज सुनकर गजराज ने एक बार मुड़ कर देखा और फिर वापस अपने काम में लग गया।

अपनी बात का उस गजराज पर कुछ भी असर ना होता हुआ देखकर उस बालक को क्रोध आ गया , जहां वाणी से कार्य ना हो वहां बल से ही कार्य संपन्न करना पड़ता है यह बात सोच कर बालक आगे बढ़ा और उसने उस गजराज की झूलती हुई पूछ को पकड़कर पीछे खींचा ।
दिखने में तो वह बालक कोमल एवं बहुत छोटा सा दिखता था परंतु उसकी हल्के से खींचने मात्र से ही वह विशाल गजराज पीछे की और घसीटता हुआ चला गया।

पुंछ के खींचे जाने और पिछे घसीटने के कारण उस गजराज को अत्यन्त क्रोध आया, वह बालक की ओर मुड़ गया और उसकी ओर देखकर जोर-जोर से चींघाड़ने लगा।

बालक उस गजराज की ओर देखकर अपना एक हाथ ऊपर उठाकर उसके नेत्रों में झांकते हुए उसे शांत रहने का इशारा किया।

उस बालक के नेत्रों में ना जाने क्या वशिकरण था के उस गजराज का चिंघाड़ना बंद हो गया वह गजराज उस बालक की ओर घूर घूर कर देखने लगा।

बालक - तुम इस प्रकार इस वन को नुकसान नहीं पहुंचा सकते । देखो तुमने अपने स्वार्थ के लिए वृक्षों पर रहने वाले कितने पंछियों के घरोंदो को उजाड़ दिया है। यदि फल ही खाने हैं तो नीचे देखो कितने पके हुए फल गिरे पड़े हैं यदि ताजे फल खाने हैं तो वृक्षों को हल्का सा हिलाने मात्र से ही वह फल तुम्हें प्राप्त हो जाएंगे उसके लिए इन्हें उखाड़ कर नष्ट करने की आवश्यकता नहीं है।

उस बालक के सम्मोहन में बंधा हुआ गजराज अब तक उसकी बातें शांति से सुन रहा था , परंतु उस वन के सुगंधित फलों की मनमोहक सुगंध ने उसका ध्यान फिर से अपनी और आकर्षित किया , जिससे गजराज का सम्मोहन टूट गया उसने अपने सिर को एक बार झटका और चिंघाडते हुए इस बालक की और उसे मारने के लिए दौड़ा।

उस बालक ने जब उस विशाल गजराज को अपनी तरफ आते हुए देखा तो वह भी अपनी आत्मरक्षा के लिए सज्ज हो गया जैसे ही वह गजराज उस बालक से टकराने वाला था तभी उस बालक ने बड़ी फुर्ती के साथ हाथी की सूंड को पकड़कर एक झटका दिया जिससे वह हाथी भूमि पर गिर पड़ा ।

एक नन्हे से बालक के द्वारा भूमि पर गिराए जाने को देखकर वह गजराज और भी क्रोध में भर आया भूमि से उठकर एक बार फिर उस बालक को रोकने के लिए उसकी और दौड़ा अपनी तरफ आते हुए गजराज को देखकर बालक ने छलांग लगाई और वह गजराज के सिर के ऊपर पहुंच गया, अपने नन्हे नन्हे हाथों से उसने उसने गजराज के सिर पर एक प्रहार किया उस प्रहार का प्रभाव इतना था वह गजराज वहीं रुक गया और पीड़ा के कारण जोर जोर से चिंघाडने लगा।

वह गजराज और कोई नहीं देवराज इंद्र का वाहन ऐरावत था उसके जोर-जोर से चिंघाड़ने की ध्वनि देवताओं तक पहुंची जिस कारण उन सभी देवताओं का ध्यान उस ओर आकर्षित हुआ। अपने प्यारे ऐरावत का ऐसा स्वर सुन देवराज को लगा कि उनका वाहन ऐरावत आवश्य किसी संकट में फस गया है ।
कहीं कोई असुर तो यहां तक नहीं पहुंच गए , ऐसा विचार आते ही सभी देवता ऐरावत की ध्वनि की दिशा में चल पड़े तब तक ऐरावत की ध्वनि आना भी बंद हो गई थी ।

सभी देवता जब झाड़ियों के उस पार पहुंचे उन्होने ने अद्भुत नजारा देखा। उन्होंने देखा कि एक बालक ऐरावत के सिर पर अपना हाथ रखे उसके ऊपर बैठा है।

उस बालक को इस प्रकार अपने ऐरावत पर बैठा हुआ देखकर देवराज के मन में शंका उत्पन्न हुई कि कहीं ये कोई असुरी माया तो नहीं यह बालक यहां कहां से आया ? और कौन है ? कहीं कोई असुर ही तो नहीं जो इस बालक का रूप धारण करके यहां आया हो।

देवराज इंद्र - कौन हो तुम और यहां कैसे आए और क्यों इस गजराज को प्रताड़ित कर रहे हो। मैं जानता हूं कि तुम कोई असुर हो इसलिए चुपचाप अपने वास्तविक स्वरूप में आ जाओ तो हो सकता है मैं तुम्हें यहां से जीवित जाने दूं।

बालक - आप कौन हो जो इस प्रकार मुझे आदेश दे रहे हो और यह क्या कह रहे हो वास्तविक स्वरूप यही मेरा वास्तविक स्वरूप है मैं कोई असुर नहीं और रही बात इस गजराज की तो आप स्वयं देखो इसने यहां कैसा उत्पात मचा रखा है , यदि मैं इसे ना रोकता यह संपूर्ण वन को नष्ट कर देता । प्रकृति हमारा पोषण करती है हमें उसका संरक्षण करना चाहिए उसके लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

देवराज - यह व्यर्थ का ज्ञान हमें ना दो तुरंत हमारे एरावत से नीचे उतर आओ और अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट करो अन्यथा तुम्हारे लिए बहुत बुरा होगा।

देवराज की बात सुनकर उस बालक ने गजराज के सिर पर हल्की सी थपकी देकर कुछ इशारा किया , वह इशारे को समझ कर वह गजराज नीचे बैठ गया और बड़ी सावधानी से उस बालक को अपने सिर के ऊपर से भूमि पर उतार दिया । अपने ऐरावत को उस बालक के इशारे को समझकर कार्य करते हुए देखकर देवराज बड़े आश्चर्यचकित हो गए।

बालक - मैं पहले ही कह चुका हूं कि मैं कोई असर नहीं हूं , आप क्यों बार-बार मुझे असुर कह कर संबोधित कर रहे हो मैं कौन हूं कहां से आया हूं यह सब नहीं जानता हूं।

देवराज - तुम इस प्रकार नहीं मानोगे , यह स्थान भगवान शिव के द्वारा सुरक्षित है या कोई भी नहीं आ सकता तो एक बालक किस प्रकार यहां आ गया । आवश्य तुम कोई मायावी असुर हो मेरे इतना कहने पर भी तुम अपने वास्तविक स्वरूप में प्रगट नही हुए तुमने मुझे अपने बल का प्रयोग करने पर विवश कर दिया है।

इतना कहकर देवराज इंद्र ने बालक पर प्रहार करने के लिए अपना वज्र उठाया , तभी वहां आकाश में प्रकाश उत्पन्न हुआ और
आकाशवाणी हुई -
हे देवराज इंद्र !! आप जिस समस्या के समाधान के हेतु यहां तपस्या कर रहे थे , यह बालक उसी समस्या का समाधान है ।यह बालक आपके तथा संपूर्ण देवता के और शिव जी के तेज से उत्पन्न हुआ है इस कारण यह आप सब का पुत्र है।

आकाशवाणी सुनकर वहां उपस्थित सभी देवगण आश्चर्यचकित हो गए आकाशवाणी के शब्द उस बालक ने भी सुने थे जिससे वह कुछ कुछ तो समझ गया था , के उसकी उत्पत्ति इन्हीं देवताओं द्वारा हुई है ।

वहीं दूसरी ओर देवराज ने भी अपना वज्र नीचे कर लिया था और उस बालक को बड़े स्नेहा से देखने लगे थे ।

आकाशवाणी द्वारा उन्हें पता चल गया था के यह बालक उन सब का पुत्र है देवराज इंद्र ने उस बालक को इशारे से अपनी और बुलाया, देवराज इंद्र का इशारा पाते ही वह बालक धीरे-धीरे उनकी और पहुंचा और देवराज इंद्र के चरणों में प्रणाम किया।

अपने चरणों में प्रणाम करते हुए उस बालक को देखकर देवराज ने स्नेहा से अपना हाथ उसके सिर पर रखा एक बालक के सिर पर हाथ रखते ही देवराज इंद्र के नेत्रों के आगे उस बालक की उत्पत्ति के संपूर्ण रहस्य उजागर हो गए।

आज के लिए इतना ही ----------- अगला अध्याय जल्द ही ।
स्वस्थ रहे और प्रसन्न रहें।
 

Ajju Landwalia

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अध्याय - 12

याग्नेश को इसी समय काल में छोड़कर आइए अब हम चलते हैं समय के उस कालखंड में जगदेव नगर का निर्माण भी नहीं हुआ था जानते हैं देव नगर के देवता गजेंद्र और भूमि के इस भूभाग के कुछ रहस्य के बारे में।

बात उस समय की है जब दक्ष प्रजापति के यज्ञ में माता सती द्वारा अपने प्राणों का परित्याग करने के पश्चात भगवान भोलेनाथ संसार से विरत होकर पृथ्वी के ऐसे भूभाग में गए जहां अब तक कोई गया नहीं था।

निर्विघ्न रूप से अपने मूल स्वरूप में स्थित होने के लिए उनकी समाधि में कोई व्यवधान ना हो इस कारण उन्होंने उस भूखंड को ऐसे ऊर्जा कवच आच्छादित कर दिया कोई भी देवता या बाहरी जीव इस क्षेत्र में ना तो प्रवेश कर पाए और ना ही देख पाए ।

पृथ्वी का यह भूखंड चारों तरफ से पर्वतों से घिरा हुआ था विभिन्न प्रकार के सरोवर और झरने यहां की सुंदरता को और बढ़ा रहे थे हर प्रकार की वनस्पतियों के पौधे एवं वृक्षों के घने जंगलों से आच्छादित दिव्य सुगंध से परिपूर्ण या क्षेत्र अद्भुत था।

इस प्रकार संसार से विलग होकर हजारों वर्ष भोलेनाथ ने यहां ध्यान किया ध्यान का उद्देश्य पूर्ण होने के पश्चात भोलेनाथ वापस कैलाश लौट गए ।

समाधि अवस्था मे भोलेनाथ के शरीर से निकलती हुई दिव्य ऊर्जा उस भूमि में समा गई थी , शिवतेज से परिपूर्ण वह भूखंड अब एक अलग ही शक्ति से आच्छादित हो गया।
उसी समय पाताल लोक मे असुरो का राजा अनलासुर तपस्यारत था । एक पैर पर खडा होकर पिछले 100 वर्षों से ब्रह्मा जी के कठिन तप कर रहा था उसके अद्भुत तप को देखकर देवताओं ने कई बार विघ्न उपस्थित करने का प्रयास किया , क्योंकि वह जानते थे के यदि इसकी तपस्या पूर्ण हुई तो सर्वप्रथम देवलोक और तत्पश्चात मानव लोक भारी संकट में आजाएंगे। परंतु अनलासूर के तेज के आगे देवताओं के संपूर्ण प्रयास विफल रहे उसके तप के प्रभाव से आखिर में ब्रह्मा जी को आना ही पड़ा


ब्रह्मा जी - नेत्र खोलो पुत्र ! मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूं कहो क्या कारण है, इस घोर तपस्या का, क्या चाहते हो मुझसे कहो।

ब्रह्मा जी के तेज का अनुभव कर और उनकी वाणी सुनकर अनलासूर ने अपने नेत्र खोलें , सामने अपने इष्ट को देखकर दोनों हाथ जोड़कर प्रथम उनके चरणों में प्रणाम किया फिर बोला

अनलासूर - प्रभु आपके दर्शन कर मैं अभिभूत हुआ । मैं तो केवल असुरों के न्याय के लिए तपस्यारत था , आप तो सृष्टि कर्ता है । एक पिता के लिए उसके सभी पुत्र समान होने चाहिए परंतु असुरों के लिए यह भेदभाव क्यों हम असूर किसी भी प्रकार से देवताओं से कम नहीं है , फिर क्यों देवताओं को स्वर्ग और हमें पताल लोक में नर्क जैसा जीवन व्यतीत करना पड़ता है।

ब्रह्मा जी - पुत्र इस संसार में जिसको जो भी प्राप्त होता है वह उसके कर्मानुसार ही प्राप्त होता है । असुर सदैव पाप कर्म और हिंसा में लिप्त रहते हैं इसी कारण उन्हें पाताल लोक प्राप्त हुआ है । उसी कर्म विधान के कारण तुम्हारे उत्तम तप के फल स्वरुप मैं यहां तुम्हें वांछित फल देने के लिए उपस्थित हुआ हूं।

अनलासुर - कर्म विधान प्रभु क्या कभी देवताओं ने कोई अपराध नहीं किया कोई पाप कर्म नहीं किया देवताओं के हर कर्म पर उन्हें पुरस्कार प्राप्त होता है और हम असुरों को मृत्युदंड अब सृष्टि में मैं ऐसा अन्याय नहीं होने दूंगा इसलिए है प्रभु आप मुझे ऐसा वर दो जिससे मेरी मृत्यु ना हो मैं सबके लिए अवध्य रहूं।

ब्रह्मा जी - पुत्र मृत्यु तो अटल है इस संसार में जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित हुई है तुम उसी के समकक्ष कोई और वरदान मांग लो।

अनलासुर - ठीक है प्रभु तो यह वरदान दीजिए कि मैं त्रिदेवो तथा त्रीदेवीओं द्वारा देवताओं द्वारा और आपकी सृष्टि के किसी भी जीव द्वारा अवध्य रहूं।

ब्रह्मा जी तथास्तु कहकर वरदान देकर अपने लोक चले गए।

ब्रह्मा जी से वरदान पाकर अपने बल और सामर्थ्य के मद में चूर अनलासूर ने अपनी असुर सेना एकत्रित कर स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी ।
उस के बल और सामर्थ्य के आगे देवता टिक नहीं पाए , और उन्हे स्वर्ग से निष्कासित होना पड़ा । संपूर्ण त्रिलोकी पर विजय प्राप्त कर अनलासुर ने अपना एकछत्र शाषन स्थापित किया । उसने सब जगह धर्म कार्य यज्ञ देव पूजन इत्यादि ऐसा कोई भी अनुष्ठान जिससे देवताओं को बल मिले सभी बंद करवा दिए ।

ब्रह्माजी द्वारा उसने कर्मों के सिद्धांत को सुन रखा था के दुष्कर्म का प्रभाव हमेशा ही व्यक्ति के जीवन पर दुष्प्रभाव करता है। इसलिए उसने तीनों लोगों में कर्म सिद्धांत और न्याय की स्थापना की, परंतु वह यह भूल गया कि अपने सिद्धांत लागू करने में और धर्म कार्य बंद करवाने में कितने ही निर्दोषों की उसने हत्या करवाई थी कितना अत्याचार और कितनी निर्ममता अपनाई थी।

वहीं दूसरी ओर अपनी समस्या का कोई समाधान ना पाकर देवता छुपते छुपते दर-दर भटक रहे थे। उस समय भोलेनाथ भी सृष्टि से विरत होकर अज्ञात स्थान पर तप कर रहे थे जैसे ही भोलेनाथ कैलाश वापस आए सभी देवता अपने समाधान हेतु कैलाश पहुंचे भगवान भोलेनाथ को अपने सम्मुख पाकर सभी प्रसन्ना हुए।

देवराज इंद्र ने भोलेनाथ को प्रणाम कर सभी देवताओं की समस्या का वर्णन किया

भोलेनाथ - हे देवताओं ! तुम्हारी समस्या से मैं अवगत हूं , परंतु ब्रह्मा जी के वरदान के कारण मैं सीधे-सीधे तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता परंतु तुम्हारी समस्या के समाधान का मार्ग आवश्य बता सकता हूं।

तुम सभी देवता पृथ्वी के उस भूखंड में जाओ जहां मैं तपस्यारत था। उस भूमि में समाई मेरी उर्जा द्वारा तुम्हें तुम्हारी समस्या का समाधान प्राप्त हो जाएगा।

उस भूखंड को मैंने एक ऊर्जा परत से आच्छादित कर दिया है इस कारण वह क्षेत्र किसी बाहरी व्यक्ति के लिए अदृश्य है।
वहां तुम सब असुरों की दृष्टि से भी सुरक्षित रहोगे और बिना व्यवधान अपना कार्य संपन्न कर सकोगे।

वहां तुम सब जाकर तप करो , तप ही एकमात्र ऐसा साधन है जिससे हर समस्या का समाधान प्राप्त हो सकता है। इतना कहकर भगवान भोलेनाथ ने सभी देवताओं को उसी जगह पहुंचा दिया जहां वह समाधि में थे।

उस अद्भुत भूखंड पर पहुंचते ही देवताओं का मन शांत हो गया वहां उन्हें भोलेनाथ की उर्जा का भी अनुभव हुआ ।

सभी देवता वहां अपने लिए उचित स्थान बनाकर तपस्या करने के लिए बैठ गए, तप करते हुए उन्हें वहा कई वर्ष बीत गए
तप करते हुए उनके शरीर से ऊर्जा निकलने लगी उन सबकी उर्जा वहां एक स्थान पर जहां भगवान भोलेनाथ का तेज समाया हुआ था उस जगह समाने लगी शिवतेज और देवताओं का तेज मिलकर एक दिव्य तेज पुंज मैं परिवर्तित हो गया।

अग्नि देव वायु देव और वरुण देव के तेज ने जैसे ही उस भूमि से स्पर्श किया उस तेज पुंज ने एक बालक का आकार धारण करना शुरू किया धीरे-धीरे वह आकार 5 वर्ष की अवस्था वाले एक दिव्य बालक के रूप में परिवर्तित हो गया।

उस बालक का रूप बड़ा ही दिव्य था , सुनहरे बाल , श्वेत धवल रंग, मस्तक पर दिव्यतेज, कोमल भुजाएं और सब को अपनी ओर आकर्षित करने वाले नीले नेत्र ।

उस बालक ने जब अपने नेत्र खोलें तो अपने चारों ओर देखा तत्पश्चात अपने आपको देखा , सर्वप्रथम उसके मन में प्रश्न प्रकट हुआ के मैं कौन हूं ? कौन मेरे माता-पिता है ? किस कारण मेरी उत्पत्ति हुई है ? ऐसे अनेकों प्रश्न इस बालक के मन में उठने लगे।


अपने प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए उसने चारों और देखा तो वहां उसे देवता ध्यान की अवस्था में बैठे हुए नजर आए। उत्सुकता वश और अपने प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए बालक जैसे ही उन देवताओं की और बढा तो उसे वहां पास की ही झाड़ियों के पीछे से वृक्षों के गिरने का और अनेक पंछियों का स्वर सुनाई दिया ।

बाल सुलभ उत्सुकता वश वह बालक स्वर की दिशा में चल दिया जैसे ही वह उन बड़ी-बड़ी झाड़ियों के उस पार पहुंचा तो उसने वहां अनेक सुंड वाला श्वेत रंग का एक विशाल हाथी देखा जो वहां के वृक्षों को उखाड़ उखाड़ कर उन वृक्षों के फलों का रसास्वादन कर रहा था , जिस कारण उन वृक्षों पर स्थित अनेक पंछियों के घोंसले नष्ट हो गए थे उन पंछियों का करुण क्रंदन सुनकर उस बालक ने उस विशाल हाथी को रोकने का निश्चय किया।


बालक - हे रुको! तुम इस प्रकार इस वन को नुकसान नहीं पहुंचा सकते, रुक जाओ !!

उस बालक की आवाज सुनकर गजराज ने एक बार मुड़ कर देखा और फिर वापस अपने काम में लग गया।

अपनी बात का उस गजराज पर कुछ भी असर ना होता हुआ देखकर उस बालक को क्रोध आ गया , जहां वाणी से कार्य ना हो वहां बल से ही कार्य संपन्न करना पड़ता है यह बात सोच कर बालक आगे बढ़ा और उसने उस गजराज की झूलती हुई पूछ को पकड़कर पीछे खींचा ।
दिखने में तो वह बालक कोमल एवं बहुत छोटा सा दिखता था परंतु उसकी हल्के से खींचने मात्र से ही वह विशाल गजराज पीछे की और घसीटता हुआ चला गया।


पुंछ के खींचे जाने और पिछे घसीटने के कारण उस गजराज को अत्यन्त क्रोध आया, वह बालक की ओर मुड़ गया और उसकी ओर देखकर जोर-जोर से चींघाड़ने लगा।

बालक उस गजराज की ओर देखकर अपना एक हाथ ऊपर उठाकर उसके नेत्रों में झांकते हुए उसे शांत रहने का इशारा किया।

उस बालक के नेत्रों में ना जाने क्या वशिकरण था के उस गजराज का चिंघाड़ना बंद हो गया वह गजराज उस बालक की ओर घूर घूर कर देखने लगा।

बालक - तुम इस प्रकार इस वन को नुकसान नहीं पहुंचा सकते । देखो तुमने अपने स्वार्थ के लिए वृक्षों पर रहने वाले कितने पंछियों के घरोंदो को उजाड़ दिया है। यदि फल ही खाने हैं तो नीचे देखो कितने पके हुए फल गिरे पड़े हैं यदि ताजे फल खाने हैं तो वृक्षों को हल्का सा हिलाने मात्र से ही वह फल तुम्हें प्राप्त हो जाएंगे उसके लिए इन्हें उखाड़ कर नष्ट करने की आवश्यकता नहीं है।

उस बालक के सम्मोहन में बंधा हुआ गजराज अब तक उसकी बातें शांति से सुन रहा था , परंतु उस वन के सुगंधित फलों की मनमोहक सुगंध ने उसका ध्यान फिर से अपनी और आकर्षित किया , जिससे गजराज का सम्मोहन टूट गया उसने अपने सिर को एक बार झटका और चिंघाडते हुए इस बालक की और उसे मारने के लिए दौड़ा।

उस बालक ने जब उस विशाल गजराज को अपनी तरफ आते हुए देखा तो वह भी अपनी आत्मरक्षा के लिए सज्ज हो गया जैसे ही वह गजराज उस बालक से टकराने वाला था तभी उस बालक ने बड़ी फुर्ती के साथ हाथी की सूंड को पकड़कर एक झटका दिया जिससे वह हाथी भूमि पर गिर पड़ा ।

एक नन्हे से बालक के द्वारा भूमि पर गिराए जाने को देखकर वह गजराज और भी क्रोध में भर आया भूमि से उठकर एक बार फिर उस बालक को रोकने के लिए उसकी और दौड़ा अपनी तरफ आते हुए गजराज को देखकर बालक ने छलांग लगाई और वह गजराज के सिर के ऊपर पहुंच गया, अपने नन्हे नन्हे हाथों से उसने उसने गजराज के सिर पर एक प्रहार किया उस प्रहार का प्रभाव इतना था वह गजराज वहीं रुक गया और पीड़ा के कारण जोर जोर से चिंघाडने लगा।

वह गजराज और कोई नहीं देवराज इंद्र का वाहन ऐरावत था उसके जोर-जोर से चिंघाड़ने की ध्वनि देवताओं तक पहुंची जिस कारण उन सभी देवताओं का ध्यान उस ओर आकर्षित हुआ। अपने प्यारे ऐरावत का ऐसा स्वर सुन देवराज को लगा कि उनका वाहन ऐरावत आवश्य किसी संकट में फस गया है ।

कहीं कोई असुर तो यहां तक नहीं पहुंच गए , ऐसा विचार आते ही सभी देवता ऐरावत की ध्वनि की दिशा में चल पड़े तब तक ऐरावत की ध्वनि आना भी बंद हो गई थी ।

सभी देवता जब झाड़ियों के उस पार पहुंचे उन्होने ने अद्भुत नजारा देखा। उन्होंने देखा कि एक बालक ऐरावत के सिर पर अपना हाथ रखे उसके ऊपर बैठा है।


उस बालक को इस प्रकार अपने ऐरावत पर बैठा हुआ देखकर देवराज के मन में शंका उत्पन्न हुई कि कहीं ये कोई असुरी माया तो नहीं यह बालक यहां कहां से आया ? और कौन है ? कहीं कोई असुर ही तो नहीं जो इस बालक का रूप धारण करके यहां आया हो।

देवराज इंद्र - कौन हो तुम और यहां कैसे आए और क्यों इस गजराज को प्रताड़ित कर रहे हो। मैं जानता हूं कि तुम कोई असुर हो इसलिए चुपचाप अपने वास्तविक स्वरूप में आ जाओ तो हो सकता है मैं तुम्हें यहां से जीवित जाने दूं।

बालक - आप कौन हो जो इस प्रकार मुझे आदेश दे रहे हो और यह क्या कह रहे हो वास्तविक स्वरूप यही मेरा वास्तविक स्वरूप है मैं कोई असुर नहीं और रही बात इस गजराज की तो आप स्वयं देखो इसने यहां कैसा उत्पात मचा रखा है , यदि मैं इसे ना रोकता यह संपूर्ण वन को नष्ट कर देता । प्रकृति हमारा पोषण करती है हमें उसका संरक्षण करना चाहिए उसके लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

देवराज - यह व्यर्थ का ज्ञान हमें ना दो तुरंत हमारे एरावत से नीचे उतर आओ और अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट करो अन्यथा तुम्हारे लिए बहुत बुरा होगा।

देवराज की बात सुनकर उस बालक ने गजराज के सिर पर हल्की सी थपकी देकर कुछ इशारा किया , वह इशारे को समझ कर वह गजराज नीचे बैठ गया और बड़ी सावधानी से उस बालक को अपने सिर के ऊपर से भूमि पर उतार दिया । अपने ऐरावत को उस बालक के इशारे को समझकर कार्य करते हुए देखकर देवराज बड़े आश्चर्यचकित हो गए।

बालक - मैं पहले ही कह चुका हूं कि मैं कोई असर नहीं हूं , आप क्यों बार-बार मुझे असुर कह कर संबोधित कर रहे हो मैं कौन हूं कहां से आया हूं यह सब नहीं जानता हूं।

देवराज - तुम इस प्रकार नहीं मानोगे , यह स्थान भगवान शिव के द्वारा सुरक्षित है या कोई भी नहीं आ सकता तो एक बालक किस प्रकार यहां आ गया । आवश्य तुम कोई मायावी असुर हो मेरे इतना कहने पर भी तुम अपने वास्तविक स्वरूप में प्रगट नही हुए तुमने मुझे अपने बल का प्रयोग करने पर विवश कर दिया है।

इतना कहकर देवराज इंद्र ने बालक पर प्रहार करने के लिए अपना वज्र उठाया , तभी वहां आकाश में प्रकाश उत्पन्न हुआ और
आकाशवाणी हुई -

हे देवराज इंद्र !! आप जिस समस्या के समाधान के हेतु यहां तपस्या कर रहे थे , यह बालक उसी समस्या का समाधान है ।यह बालक आपके तथा संपूर्ण देवता के और शिव जी के तेज से उत्पन्न हुआ है इस कारण यह आप सब का पुत्र है।

आकाशवाणी सुनकर वहां उपस्थित सभी देवगण आश्चर्यचकित हो गए आकाशवाणी के शब्द उस बालक ने भी सुने थे जिससे वह कुछ कुछ तो समझ गया था , के उसकी उत्पत्ति इन्हीं देवताओं द्वारा हुई है ।

वहीं दूसरी ओर देवराज ने भी अपना वज्र नीचे कर लिया था और उस बालक को बड़े स्नेहा से देखने लगे थे ।

आकाशवाणी द्वारा उन्हें पता चल गया था के यह बालक उन सब का पुत्र है देवराज इंद्र ने उस बालक को इशारे से अपनी और बुलाया, देवराज इंद्र का इशारा पाते ही वह बालक धीरे-धीरे उनकी और पहुंचा और देवराज इंद्र के चरणों में प्रणाम किया।


अपने चरणों में प्रणाम करते हुए उस बालक को देखकर देवराज ने स्नेहा से अपना हाथ उसके सिर पर रखा एक बालक के सिर पर हाथ रखते ही देवराज इंद्र के नेत्रों के आगे उस बालक की उत्पत्ति के संपूर्ण रहस्य उजागर हो गए।

आज के लिए इतना ही ----------- अगला अध्याय जल्द ही ।
स्वस्थ रहे और प्रसन्न रहें।

Itni achchi story kaafi samay se band padi thi...................Kaafi samay baad is thread par update aaya he................umeed he aage chalkar updates regular rahenge

Keep posting Bhai
 
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