Nice update....#206.
वीर: (24.01.2002, गुरुवार, रुद्रलोक, हिमालय)
नीलाभ को सर्वप्रथम वीरमभद्र से आशीर्वाद प्राप्त करना था। नीलाभ अब वहीं हिमालय की बर्फ पर, आँख बंद कर बैठ गया और अपने अंतर्ज्ञान रुपी चक्षु से वीरमभद्र के बारे में जानकारी निकालने लगा।
वीरमभद्र जन्म कथा- ब्र..देव के मानस पुत्र, प्रजापति की बहुत सी पुत्रियां थीं। सभी पुत्रियां गुणवान और विलक्षण थीं। फिर भी प्रजापति को संतोष नहीं था वह चाहते थे कि उनके घर में एक सर्वशक्तिमान पुत्री का जन्म हो।
इसके लिये वह शक्ति स्वरुप माँ आद्या की पूजा करने लगे। माँ आद्या ने प्रकट हो कर दक्ष से, उनकी पुत्री के रुप में जन्म लेने का वचन दिया। इसी तप के फलस्वरुप माँ आद्या ने 'सती' के रुप में राजा दक्ष के घर जन्म लिया।
सती, बचपन से ही बहुत विलक्षण और बुद्धिमान थीं। जब वह बड़ी हो गईं, तो दक्ष ने उनका विवाह करने के बारे में सोचा। दक्ष ने इसके लिये ब्रह्देव से परामर्श लिया। देव ने कहा कि सती, आद्या की ‘आदिशक्ति' स्वरुप हैं और महानदेव 'आदि पुरुष' हैं, इसलिये सती का विवाह देव के साथ ही होना चाहिये। ब्र…देव की बात मान दक्ष ने सती का विवाह देव के साथ कर दिया।
एक बार ब्र…देव ने धर्म के प्रसार के लिये, एक भव्य सभा का आयोजन किया, जिसमें सभी एकत्रित हुए। जब सभा में प्रजापति का आगमन हुआ, तो सभी देवता उनके स्वागत में खड़े हो गये, परंतु देव ने ऐसा नहीं किया।
यह देख दक्ष मन ही मन बहुत क्रोधित हुए, उन्होंने देव से इस अपमान का बदला लेने का विचार किया। इस विचार के फलस्वरुप दक्ष ने भी एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया।
दक्ष ने इस यज्ञ में सभी देओं और ऋषियों को बुलाया, परंतु म…देव को ईर्ष्यावश आमंत्रित नहीं किया। अतएव देव ने उस यज्ञ में जाने से मना कर दिया। परंतु सती अपने पितृभाव से वशीभूत होकर, उस यज्ञ में जाने की हठ करने लगीं।
ज्यादा हठ करने से देव ने सती को नंदी के साथ उस यज्ञ में जाने की आज्ञा दे दी। यज्ञ से पूर्व सभी देओं के लिये यज्ञाहुति का एक भाग निकाला जाना था। परंतु दक्ष ने ईर्ष्यावश महानदेव का भाग यज्ञाहुति में नहीं निकाला, जिससे सती बहुत अपमानित महसूस करने लगीं।
सती को अब देव के वचन बार-बार याद आ रहे थे, अतः अपमान की पराकाष्ठा को देख सती उस यज्ञ के जलती ज्वाला के मध्य कूद गईं। अग्नि की भयानक लपटों ने सती के शरीर को जलाना शुरु कर दिया।
उधर जैसे ही यह समाचार देव को प्राप्त हुआ, वह अत्यंत क्रोध से भर गये।
"क्रुद्धः सुदष्टष्ठपुट: स धूर्जटिर्जटां तडिद्व ह्निस टोग्ररो चिषम्।
उत्कृत्य रुद्रः सहसोत्थि तो हसन् गम्भीरना दोविससर्जतां भुवि।।
ततोऽतिकाय स्तनुवा स्पृशन्दिवं।"
अर्थात सती के प्राण त्यागने से दुखी, देव ने उग्र रूप धारण कर, क्रोध में अपने होंठ चबाते हुए, अपनी एक जटा उखाड़ ली, जो बिजली और अग्नि की लपट के समान दीप्त हो रही थी। सहसा खड़े होकर उन्होंने गंभीर अठ्ठास के साथ जटा को पृथ्वी पर पटक दिया। इसी से महाभयंकर वीरभद्र प्रगट हुए।
देव ने वीरभद्र को दक्ष के यज्ञ का विध्वंश करने भेज दिया। जहां पर वीरभद्र ने व…ष्णु से भी युद्ध करते हुए दक्ष का सिर काटकर यज्ञ की अग्नि को भेंट कर दिया।
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नीलाभ को अब वीरभद्र के बारे मे सबकुछ पता चल गया था। नीलाभ अब अपने स्थान से खड़ा हुआ। अब उसके हाथों में एक धारदार चाकू दिखाई देने लगा था।
नीलाभ ने उस चाकू से अपने हाथ को जरा सा काटा और अपने रक्त के एक बूंद को हवा में उछाल दिया।
नीलाभ के ऐसा करते ही, हवा में फैली रक्त की बूंद से, एक नीले रंग की छोटी सी, परंतु सुंदर चिड़िया प्रकट हुई, जो हवा में अपने पंख बहुत तेजी से हिला रही थी।
“नीलिमा, तुम मुझे देव वीरभद्र के पास ले चलो।' नीलाभ ने कहा।
नीलाभ का आदेश मान, नीलिमा नामक वह छोटी चिड़िया उड़कर एक दिशा की ओर चल दी। नीलाभ अब नीलिमा का पीछा कर रहा था।
नीलिमा उड़ती हुई अनेकों पर्वतों और पठारों को पार करती हुई, एक ऐसे बर्फीले स्थान पर पहुंची, जहां पर एक बहुत ऊंची सी पहाड़ी की चोटी थी। नीलिमा उस चोटी के पास जमीन पर जाकर बैठ गई और उस चोटी की बर्फ को अपनी चोंच से हटाने की कोशिश करने लगी।
यह देख नीलाभ भी उस स्थान की बर्फ को साफ करने लगा। कुछ देर के बाद नीलाभ को उस बर्फ के पीछे किसी विशाल मूर्ति के होने का अहसास हुआ।
अब नीलाभ ने नीलिमा को पीछे किया और अपनी शक्ति से, उस स्थान की बर्फ को, एक झटके में साफ कर दिया।
उस विशाल हिमखण्ड के नीचे म..देव की कंधे तक बनी विशाल मूर्ति थी। यह देख नीलाभ नीलिमा को देखने लगा।
शायद वह नीलिमा से पूछना चाह रहा था कि वह उसे यहां क्यों लेकर आई है? पर तभी नीलाभ को देव की मूर्ति के बाल बिल्कुल असली जैसे लगे, जो कि तेज हवा चलने की वजह से, मंद-मंद लहरा रहे थे।
अब नीलाभ को याद आया कि वीरभद्र की उत्पत्ति देव के बालों से ही तो हुई थी। यह सोच अब वह देव के बालों को ध्यान से देखने लगा।
तभी कहीं से हवा के एक तेज झोंका आया और देव के सिर का एक बाल टूटकर हवा में उड़ गया।
यह देख नीलाभ बिना कुछ सोचे-समझे उस बाल के पीछे दौड़ पड़ा।
देव का वह बाल, हवा में ऊंचे और ऊंचे उड़ता जा रहा था। उस बाल के पीछे दौड़ रहे नीलाभ को पूर्ण विश्वास था कि यह बाल ही वीरभद्र हो सकते हैं।
तभी देव का बाल एक शि..लिंग के समान बने, गोल पत्थर से जाकर लिपट गया। नीलाभ दौड़ता हुआ उस पत्थर के पास पहुंच गया। देव का बाल किसी रस्सी की भांति उस पत्थर से लिपटा हुआ था।
नीलाभ ने हाथ बढ़ाकर देव के बाल को पकड़ा और जोर से खींच लिया। अब वह बाल तो नीलाभ के हाथ में आ गया, पर जोर से खींचने की वजह से, जिस पत्थर से वह बाल लिपटा था, वह गोल-गोल घूमकर किसी लटू की भांति जमीन में समा गया।
अब नीलाभ कभी अपने हाथों में थमे उस बाल को, तो कभी वहां बर्फ में मौजूद गड्ढे को ध्यान से देख रहा था।
तभी नीलाभ के हाथ में पकड़ा वह बाल, एक भयानक सर्प में परिवर्तित हो गया और नीलाभ के हाथों से निकलकर उसी गड्ढे में समा गया।
नीलाभ बहुत देर तक उस गड्ढे को देखता रहा और फिर उसने उस गड्ढे में छलांग लगा दी।
नीलाभ उस अंतहीन गड्ढे में फिसलता ही जा रहा था। उसे फिसलते हुए लगभग 10 मिनट बीत गये थे, पर वह गड्ढा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। उस गड्ढे में बिल्कुल धुप्प अंधेरा था।
आखिरकार वह गड्ढा, एक प्राचीन मं..दि. के पास जाकर समाप्त हुआ। नीलाभ उस प्राचीन मं..दर के प्रांगण में जाकर गिरा। उस स्थान पर पूर्ण उजाला था, इसलिये सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा था।
मं..दर की दीवारें काफी पुराने पत्थरों से निर्मित प्रतीत हो रहीं थीं। तभी नीलाभ की नजरें मंद..र के अंदर की ओर गईं, जहां की छत, जमीन और दीवार सभी जगह पर सर्प ही सर्प दिखाई दे रहे थे।
नीलाभ ने अपनी पूरी जिंदगी में, कभी एक साथ इतने सारे सर्प नहीं देखे थे। इसलिये वह आश्चर्य से चारो ओर देखने लगा। नीलाभ को डर था कि कहीं उसे कोई सर्प डंस ना ले।
ऐसा नहीं था कि नीलाभ पर किसी सर्प के जहर असर होता, बल्कि उसे डर था कि यदि किसी भी सर्प ने उसे डंसा, तो वह सर्प मारा जायेगा।
कुछ सोचने के बाद नीलाभ उस मं..दर में प्रवेश कर गया। अब नीलाभ अपने मुंह से, हवा में धीरे-धीरे बहुत कम मात्रा में जहर छोड़ने लगा।
नीलाभ के जहर के प्रभाव से सभी सर्यों को अपना दम घुटता सा प्रतीत हुआ, इसलिये सभी नीलाभ के लिये रास्ता छोड़ने लगे।
नीलाभ अपने लिये रास्ता बनता देख अंदर की ओर चल पड़ा। अंदर पहुंचने पर नीलाभ को एक विशाल सर्प की मूर्ति अपना मुंह खोले हुए बनी दिखाई दी।
सर्प का मुंह इतना विशाल था कि उसके मुंह में अंदर जाने के लिये एक रास्ता भी बना हुआ था।
नीलाभ ने ध्यान से सर्पमुख समान गुफा को देखा और उसकी ओर चल दिया। तभी नीलाभ के रास्ते में देवी भद्र…ली प्रकट हो गईं।
श्यामवर्ण, मुख पर ज्वाला समान तेज, सुर्ख लाल बाहर निकली जीभ, एक हाथ में रक्त का प्याला और दूसरे हाथ में कृपाण लिये, नरमुंडों की माला पहने, त्रिनेत्र वाली देवी साक्षात काल लग रहीं थीं।
भद्र…ली को देख, नीलाभ तुरंत घुटनों के बल बैठ, उन्हें नमन करने लगा।
“तुम यहां क्यों आये हो नीलाभ?” तेज आवाज वातावरण में उभरी।
“मैं यहां देव वीरभद्र से आशीर्वाद लेने आया हूं माता।” नीलाभ ने भद्…ली से बिना नजरें मिलाए कहा।
“वीरभद्र से मिलने से पहले तुम्हें मुझे प्रसन्न करना होगा नीलाभ, अन्यथा तुम यहां से आगे कदापि नहीं बढ़ पाओगे।”
“कृपया मुझे बताइये माता कि आप किस प्रकार प्रसन्न होंगी?” नीलाभ ने भद्…ली से पूछा।
“बहुत दिनों से मेरी जिह्वा प्यासी है नीलाभ। क्या तुम मुझे रक्तपान करा सकते हो?" भद्र..ली ने आग्नेय नेत्रों से नीलाभ को देखते हुए कहा।
"जैसी आपकी आज्ञा माता।” भद्र…ली के मुख से इतना निकलते ही, नीलाभ ने बिना कुछ सोचे समझे भद्रकाली के हाथ से कृपाण लिया और एक झटके से अपना बांया हाथ काट दिया।
नीलाभ के हाथ से रक्त की धारा बह निकली। परंतु नीलाभ को तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था, उसने भद्रकाली के हाथ से खप्पर ले, उसे अपने रक्त से भर दिया।
नीलाभ ने अब वह रक्त का प्याला भद्र..ली के हाथ में दे दिया। अब भद्र..ली के चेहरे पर सौम्यता नजर आने लगी थी। उन्होंने नीलाभ के कटे हुए हाथ की ओर देखा और सर्पमुखी गुफा के सामने से हट गईं।
"तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” भद्र…ली ने कहा और रोशनी के एक तेज झमाके से वह गायब हो गईं।
नीलाभ उसी प्रकार अपना कटा हाथ लिये उस सर्पमुखी गुफा में प्रविष्ठ हो गया।
गुफा की दीवारों पर जगह-जगह कुछ चमकीले रत्न लगे थे, जिससे तेज रोशनी प्रस्फुटित हो रही थी।
उस रोशनी के कारण, पूरी गुफा जगमगा रही थी। नीलाभ लगातार उस गुफा में आगे बढ़ता जा रहा था।
तभी उसे रास्ते में बहुत से जलते अंगारे दिखाई दिये। अब उस स्थान से आगे बढ़ने के लिये उन अंगारों पर से ही होकर जाना पड़ता। यह देख नीलाभ वहीं पर रुक गया।
तभी नीलाभ को अंगारों के अंत में धुनि रमाए, आसन की मुद्रा में, कोई बैठा दिखाई दिया। उस स्थान पर ज्यादा उजाला नहीं था, इसलिये बैठे हुए व्यक्ति का पूरा चेहरा नहीं दिखाई दे रहा था।
लेकिन इससे पहले कि नीलाभ कुछ और सोच पाता, वातावरण में एक भारी सी आवाज गूंजी- “तुम रुक क्यों गये नीलाभ? तुम तो मेरा आशीर्वाद लेने आये हो ना तो फिर आगे बढ़कर मेरे पास आओ नीलाभ।"
आवाज को सुन नीलाभ जान गया कि यह आवाज यकीनन वीरभद्र की है। अतः वह अंगारों पर पैर रखकर वीरभद्र की ओर चल पड़ा।
पर जैसे ही नीलाभ के पैर अंगारों पर पड़े, उसे अपना पैर ही नहीं अपितु पूरा शरीर जलता हुआ सा महसूस हुआ।
पर ऐसी मुश्किलों से नीलाभ घबराने वाला नहीं था। वह निरंतर अंगारों पर चलता आगे बढ़ रहा था।
धीरे-धीरे अंगारों ने नीलाभ के पैर में आग पकड़ ली, अब वह आग तेजी से नीलाभ के शरीर के ऊपर की ओर बढ़ने लगी।
नीलाभ को ऐसा महसूस हो रहा था कि वह जितना भी आगे बढ़ रहा है, वीरभद्र उतना ही आगे जा रहे हैं।
नीलाभ के अथक प्रयास के बाद भी नीलाभ, वीरभद्र तक नहीं पहुंच पा रहा था।
अंगारों की अग्नि अब नीलाभ के सीने तक पहुंच गई थी। नीलाभ के पैरों का मांस पूरी तरह से जल चुका था, जिसकी वजह से अब पैरों के स्थान पर चमकती हड्डियां दिखाई देने लगीं थीं।
“अगर मुझ तक नहीं पहुंच पा रहे हो नीलाभ, तो अभी भी समय है। स्वयं को यातना देने की जगह, वापस लौटकर अपना सुखमय जीवन व्यतीत करो नीलाभ।" वीरभद्र ने कहा।
“मेरा जन्म ही मनुष्यों की भलाई के लिये हुआ है देव, अगर यह शरीर उनकी भलाई के लिये किसी कार्य की भेंट चढ़ रहा है, तो यह मेरे लिये कष्ट की नहीं, अपितु प्रसन्नता की बात है। इसलिये आज या तो मैं आपसे आशीर्वाद लेकर जाऊंगा, या फिर इन्हीं अंगारों में अपने शरीर को नष्ट कर, दूसरा जन्म लेकर फिर आपके पास आऊंगा देव।” नीलाभ ने अपने दर्द को पीते हुए वीरभद्र से कहा।
“तुम बहुत हठी लगते हो।” वीरभद्र ने कहा- “ठीक है कोशिश करते रहो।"
वीरभद्र की बात सुन, नीलाभ फिर से अंगारों पर आगे बढ़ने लगा। कुछ ही देर में नीलाभ का पूरा शरीर, अंगारों की अग्नि में जल गया। अब सिर्फ उसका सिर ही बचा था, फिर भी नीलाभ प्रयासरत था।
वीरभद्र की नजरें लगातार नीलाभ पर बनी हुईं थीं। आखिरकार अब नीलाभ की शक्ति जवाब देने लगी, अब आग उसके चेहरे पर भी लग गई थी । अचानक नीलाभ का शरीर हवा में लहराया और अंगारों के ऊपर गिरने लगा।
तभी वीरभद्र ने नीलाभ के शरीर को हवा में ही थाम लिया और उसे लेकर अंगारों के दूसरी ओर आ गये।
वीरभद्र ने लगभग निष्प्राण हो चुके नीलाभ के शरीर को वहीं जमीन पर लिटाया और अपने कमण्डल से जल लेकर, कुछ मंत्र पढ़ते हुए, उस जल को नीलाभ के शरीर पर फेंक दिया।
नीलाभ के शरीर पर जल पड़ते ही नीलाभ का पूरा शरीर बिल्कुल ठीक हो गया। नीलाभ ने अब कराह कर अपनी आँख खोली और वीरभद्र को देख उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया। अब नीलाभ का वह कटा हाथ भी सही हो गया था, जो उसने भद्र…ली के लिये काटा था।
“तुम अद्भुत हो नीलाभ।” वीरभद्र ने कहा- “जो व्यक्ति शिव के लिये शव बनने के लिये तैयार हो जाये, उससे बड़ा देव का भक्त कोई नहीं होगा। जाओ नीलाभ, मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। जाकर मनुष्यों का कल्याण करो।" यह कहकर वीरभद्र ने अपने हाथ को वरमुद्रा में कर लिया।
वीरभद्र के हाथों से तेज प्रकाश निकलकर नीलाभ पर पड़ा और जब नीलाभ की आँखें खुलीं, तो वह उसी बर्फ की चोटी के पास जमीन पर पड़ा था, जहां उसे देव की प्रतिमा दिखाई दी थी।
इस समय नीलिमा, नीलाभ के सिर के पास बैठी 'चीं-चीं कर रही थी। नीलाभ बर्फ से खड़ा हुआ और नीलिमा को अपने कंधे पर बैठाकर देव के दूसरे अवतर 'भैरव' को ढूंढने के लिये निकल पड़ा।
जारी रहेगा_____![]()

