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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

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Iron Man

Try and fail. But never give up trying
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#204.

कैश्वर का जन्म:
(23.01.2002, बुधवार, निर्माणशाला, अराका द्वीप)

निर्माणशाला अराका द्वीप को वो भाग था, जिसमें पहले कैस्पर और अब कैश्वर, बैठकर तिलिस्मा के सभी द्वारों का निर्माण करता था।

यह निर्माणशाला अराका द्वीप के गर्भ में स्थित थी, पहले इसके बारे में कैस्पर और मैग्ना के सिवा कोई नहीं जानता था।

परंतु कुछ दिन पहले व्योम, एक व्हेल का पीछा करते हुए इस स्थान को देख चुका था और अलबर्ट भी इसी स्थान से होकर तिलिस्मा में प्रवेश कर चुका था।

कैस्पर को यहां से गये 18 दिन बीत गये थे। अब इस पूरे क्षेत्र पर कैश्वर का अधिकार था।

कैश्वर एक वर्चुअल प्रोग्राम था, जो अपने कम्प्यूटर के ज्ञान से कैस्पर की बनाई सभी चीजों को नियंत्रित करता था।

इस समय निर्माणशाला के एक कक्ष में, बहुत सी स्क्रीने ऑन थीं। सभी पर कुछ ना कुछ डेटा चल रहा था।

उस कक्ष के बीचो बीच एक 6 फुट का काँच का कैप्सूल रखा था, जिससे निकलकर बहुत से तार, व पाइप, कक्ष में मौजूद कुछ मशीनों और स्क्रीनों से जुड़ी हुई थीं।

उस काँच के कैप्सूल में एक स्टील का, मानव आकृति लिये, हड्डियों का ढांचा रखा था। कैप्सूल के अंदर की ओर बहुत सी लेजर गन फिट थीं।

इस पूरे सेटअप के सामने 2 बड़ी सी स्क्रीन लगीं थीं, एक स्क्रीन पर पीले और एक स्क्रीन पर नीले रंग के जाल से 2 चेहरे बने दिखाई दे रहे थे, जो कि एक कम्प्यूटर प्रोग्राम की तरह से महसूस हो रहे थे।

कैप्सूल के बाहरी ओर एक टाइमर लगा था, जिस पर 15 मिनट का समय सेट था। अब पीले रंग वाली स्क्रीन से एक स्टार्ट की आवाज आई, इसी के साथ कैप्सूल के बाहर लगा टाइमर, कांउटडाउन की तरह से चलने लगा।

कांउटडाउन के शुरु होते ही, कुछ मशीनों में लगे पाइपों के द्वारा, अलग-अलग रंग के द्रव निकलकर कैप्सूल में प्रवेश करने लगे।

लगभग 8 मिनट के बाद पूरा कैप्सूल विभिन्न रंगों के द्रवों से पूरा भर गया। द्रव के भरते ही एक दूसरी मशीन ने कैप्सूल के ऊपर अलग-अलग किरणों की बौछार कर दी।

किरणों की बौछार की वजह से अब वह पूरा द्रव सूखना शुरु हो चुका था। लगभग 3 मिनट में ही उन किरणों ने पूरे द्रव को सुखाकर ठोस बना दिया।

अब कैप्सूल के अंदर स्थित लेजर गन ने उस ठोस भाग को काटकर आकार देना शुरु कर दिया।

कैप्सूल से निकला सारा वेस्ट, संक्शन पंप के द्वारा खिंचकर एक वेस्ट के डिब्बे में जा रहा था। कुछ ही देर में कांउटडाउन का टाइमर समाप्त हो गया, पर अब उस कैप्सूल में एक मानव शरीर दिखाई देने लगा था।

अब वह कैप्सूल खड़ा होकर खुल गया और छत पर लगे कुछ मशीनी हाथों ने, उस मानव शरीर को उठा कर दूसरी मशीन के आगे खड़ा कर दिया।

दूसरी मशीन में लगी ड्रिल्स ने उस मानव शरीर के चेहरे पर आँख, कान, नाक आदि फिट करना शुरु कर दिया।

एक मशीन ने उसके शरीर पर कुछ कपड़े फिट कर दिये। अब वह एक पूर्ण मानव शरीर दिख रहा था।

मशीनी हाथों ने एक बार फिर उस मानव शरीर को उठाया और इस बार उसे पीले रंग वाली स्क्रीन के सामने खड़ा कर दिया।

स्क्रीन के सामने खड़े होते ही, पीली स्क्रीन से एक तेज तरंगें निकलीं और उस मानव शरीर में समा गईं। अब वह मानव शरीर पूर्णरुप से जीवित हो गया था।

अब वह मानव शरीर नीली वाली स्क्रीन के पास पहुंचा और फिर धीरे से बोला- “मेरा नया रुप कैसा लग रहा है ज़ेनिक्स?"

“अद्भुत!” तुम्हारा नया रुप मुझे बहुत पसंद आया कैश्वर।” ज़ेनिक्स ने कहा- “अब तुम दिखने में पूरे मनुष्य के समान दिख रहे हो।

"कुछ भी कहो जेनिक्स, पर यह सब तुम्हारे बिना संभव नहीं हो पाता" कैश्वर ने कहा- “मेरे पास क्षमताएं तो बहुत थीं, पर मैं अपने निर्माता कैस्पर का कभी विरोध नहीं कर सकता था। तुम्हीं ने मुझसे तिलिस्मा का नियंत्रण अपने हाथ में लेने को कहा। तुम्हारे ही कहने पर मैंने उस जीव को अंतरिक्ष में सिग्नल भेजने को कहा। मुझे लगता है कि तुम्हारा भेजा मैसेज, फेरोना के राजा एलान्का को मिल गया होगा? अब वह दिन दूर नहीं जब हमारा स्वयं का एक ग्रह होगा और हमारे ग्रह के सभी लोगों का निर्माण हमने स्वयं से किया होगा। अब बस फीलींग वाली मशीन से सभी जीवों में अहसास देने की जरूरत है बस, इसके बाद हमारा सपना जरूर पूरा हो जायेगा।”

“हमारा सपना जरूर पूरा होगा कैश्वर, अब बस तुम पृथ्वी पर एक मजेदार तमाशा देखने के लिये तैयार रहो बस।" ज़ेनिक्स ने कहा।

“वैसा ही तमाशा, जैसा कि 6 दिन पहले अराका युद्ध के समय हुआ था?” कैश्वर ने भी मजा लेते हुए कहा।

“हां...बिल्कुल वैसा ही...देखना, एक दिन सभी आपस में ही लड़ पड़ेंगे। अच्छा अब तुम तिलिस्मा पर ध्यान दो और मुझे भी ब्लैकून को संभालने दो। कहीं ओरस ने समय से पहले संरक्षिका को देख लिया, तो मुश्किल हो जायेगी?....जल्दी ही फिर मिलेंगे कैश्वर।" इतना कहकर ज़ेनिक्स स्क्रीन से गायब हो गई।

पर अब कैश्वर, भविष्य के सपने बुनने में लग गया था।


अमर कथा:
(5010 वर्ष पहले...... कैलाश पर्वत)

श्वेत हिम से आच्छादित कैलाश पर्वत, सूर्य के स्वर्णिम प्रकाश में स्वर्ण के समान चमचमा रहा था। चहुं ओर स्निग्ध सा वातावरण था।

ऐसे बर्फीले वातावरण में एक ऊंची सी चट्टान पर रखी सिंहछाल पर, देव विराजमान थे। उनके चेहरे पर सौम्यता स्पष्ट नजर आ रही थी। उनके माथे पर स्थित चंद्र, अपनी अद्भुत छटा बिखेर रहा था।

देव की जटाओं से पंचतरणी, उन्मुक्त होकर बह रहीं थीं। उनके कंठ मे अनेकों सिर वाले वासुकि विद्यमान थे, जो अपने जिह्वा का प्रदर्शन, हर कुछ क्षणों के अंतराल में कर रहे थे।

देव की बलिष्ठ भुजाओं में रुद्राक्ष की माला के बीच कुछ पिस्सू विचरण कर रहे थे।

देव के नेत्र इस समय ध्यान की मुद्रा में थे। उनसे कुछ दूरी पर नंदी बैठकर देव के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी उस स्थान पर देवी का आगमन हुआ, जिनके साथ गणे… भी थे।

यह देख नंदी ने खड़े हो कर अपने गले को जोर से हिलाया। नंदी के ऐसा करते ही नंदी के गले में बंधा घंटा, जोर से बज उठा, जो देवी के आगमन का संकेत था।

घंटे की आवाज सुन, देव ने अपने नेत्रों को खोल दिया। पा…ती को आता देख देव ने चट्टान पर गिरी भभूत को अपने हाथों से साफ कर दिया।

देवी आकर देव के समीप बैठ गईं। ग…श उनसे कुछ दूरी बनाकर, बर्फ पर ही बैठ गये और बर्फ के गोलों से खेलने लगे।

"बताइये देवी, आपके इस प्रकार आगमन का क्या उद्देश्य है?” देव ने देवी को देखते हुए पूछा।

"क्यों बिना उद्देश्य के हम आपके पास नहीं आ सकते क्या?" देवी ने कहा।

“आप बिना किसी उद्देश्य के भी हमारे पास सदैव आ सकती हैं, आखिर आप हमारी अर्धांगिनी हैं। परंतु आपके मस्तक पर पड़ी सिलवटें बताती हैं, कि आज आपके यहां आगमन का कोई विशेष ही उद्देश्य है?" देव ने देवी पारती के चेहरे की ओर देखते हुए कहा।

“आप तो ब्रह्मांड के समस्त जीवों के मन की बात जानते हैं स्वामी, फिर आपसे किसी बात को छिपाने का क्या मतलब?” देवी ने उलझे-उलझे भावों से कहा- “मैं पिछले कुछ दिनों से एक बात को लेकर संदेह में हूं स्वामी, कि आप तो अजर-अमर हैं, परंतु मुझे क्यों बार-बार जन्म लेकर, आपको प्राप्त करने के लिये फिर से तप करना पड़ता है। मैं अमर क्यों नहीं हूं?"

“यह सब अमरकथा का प्रसाद है देवी, जिस दिन आप अमरकथा का श्रवण कर लोगी, आप भी हमारी तरह से अमरत्व को प्राप्त कर लोगी।” देव ने कहा।

"तो फिर हे देव, आप मुझे अमरकथा का दान दीजिये, मैं उस दिव्यकथा का श्रवण करना चाहती हूं। पा..र्ती ने कहा।

“देखो देवी, उस कथा को सुनाने के लिये एक शांत वातावरण चाहिये। उस स्थान पर किसी भी जीव को नहीं होना चाहिये। अब तुम तो जानती हो कि इस मनोरम कैलाश पर तो सदैव पक्षियों का कलरव गूंजता रहता है, इसलिये वह कथा हम किसी और दिन सुनायेंगे आपको? पहले उसके लिये हमें उचित स्थान का चुनाव भी तो करना पड़ेगा।” देव ने देवी को टालने वाले अंदाज में कहा।

"ये आप क्या कह रहे हैं देव? क्या आपको भी इस धरती पर किसी शांत स्थान को चुनने के लिये समय चाहिये? आप तो महानदेव हैं, आँख बंद करते ही कोई ना कोई पवित्र स्थान अवश्य ढूंढ लेंगे? पर मुझे आज ही आपसे वह अमरकथा सुननी है।” पा..रती ने किसी बालक की तरह से हठ करते हुए कहा।

महानदेव समझ गये कि आज देवी को टाल पाना असंभव है, अतः वह अपने हथियार डालते हुए उठ खड़े हुए। देवी उन्हें उठता देखकर अत्यंत प्रसन्न हो गईं।

देव को खड़ा होता देख, नंदी और गमणेश भी देव के पास आ गये। देव सभी को आकाशमार्ग से लेकर ऐसे स्थान की खोज में चल दिये, जो कि पवित्र भी हो और शांत भी।

आखिरकार देव को धरती पर एक ऐसा स्थान दिख ही गया, जो पूर्ण रुप से हिम से ढका हुआ था। उस स्थान पर अत्यंत ठंड होने की वजह से जीव भी कम ही दिखाई दे रहे थे। उस स्थान का नैसर्गिक सौंदर्य अपार था।

कुछ आगे जाकर देव ने नंदी को वहीं रुकने का आदेश दिया।

“तुम इसी स्थान पर रुक जाओ नंमदी....इसके आगे हम स्वयं जायेंगे, परंतु तुम्हारे इस स्थान पर रुकने के कारण, यह स्थान बैल गाँव (पहलगाम का पूर्व नाम) के नाम से जाना जायेगा।"

देव का आदेश मान नमदी उस स्थान पर ही रुककर देव की प्रतीक्षा करने लगे।

अब देव आगे बढ़ चुके थे। लगभग 8 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद देव फिर से एक स्थान पर रुक गये। अब उन्होंने चंद्रमा को निकालकर उन्हें वहीं रुकने का आदेश दिया। उस स्थान पर चंद्रमा के रुकने के कारण वह स्थान चंदनबाड़ी कहलाया।

देव को आगे एक भयानक घाटी दिखाई दी, जो एक नदी के किनारे बनी हुई थी।

देव ने अपने शरीर पर मौजूद पिस्सू को उस घाटी में छोड़ दिया, जिसके कारण वह घाटी पिस्सू घाटी कहलाई।

पिस्सूघाटी पार करने के बाद, एक पर्वत श्रृंखला थी, जिसकी चढ़ाई अत्यंत कठिन थी। परंतु देव की यह यात्रा निरंतर जारी थी। पर्वत पर चढ़ने के बाद देव को उन पर्वतों के बीच एक सुंदर सी झील दिखाई दी, जिसका नीला जल, स्वच्छ और निर्मल लग रहा था।

नीली झील में आसमान का प्रतिबिंब बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा था। उस दृश्य को देखकर ऐसा महसूस हो रहा था कि मानो आकाश, धरा पर उतर आया हो।

इस स्थान पर देव ने अपने गले से अनेकों सिर वाले नाग को छोड़ दिया, जिसके कारण इस स्थान का नाम शेषनाग पड़ा।

देव फिर से आगे बढ़ चले। शेषनाग से और आगे चलने के बाद, पर्वत की एक ऊंची चोटी दिखाई दी। इस स्थान पर देव ने गमणेश को भी छो दिया, जिसके कारण यह स्थान महा गुणास चोटी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

देव की यह अमरयात्रा अभी भी पूर्ण नहीं हुई थी। उनका चलना निरंतर जारी था। आगे चलने पर देव को ऊंची-ऊंची चोटियां दिखाई दीं। यह स्थान काफी मनोरम और ठंडा था। महादेव ने इस स्थान पर देवी गंगा और अपने पंचमहाभूतों (जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि व आकाश) को छोड़ दिया, जिसके कारण यह स्थान पंचतरणी कहलाया।

अत्यंत ठंड की वजह से इस स्थान पर ठीक से श्वांस भी नहीं लिया जा रहा था। पंचतरणी से 8 किलो मीटर और आगे चलने पर देव को एक विशाल गुफा दिखाई दी, जिसका क्षेत्रफल लगभग 300 मीटर का था।

उस दिव्य गुफा में वायु के चलने की वजह से 'ऊँ' की दिव्य ध्वनि उत्पन्न हो रही थी। यह देख देव, देवी पारती के संग उस गुप्त गुफा में प्रवेश कर गये।

गुफा में प्रवेश कर देव ने अपने चारो ओर देखा और फिर एक जोर की हुंकार भर, अपने शरीर से कालाग्नि को निकाला। कालाग्नि, देव का एक गण था, जो अपने मुंह से काल के समान अग्नि फेंक लेता था।

“कालाग्नि, इस गुफा के चारो ओर जितने भी जीवित जीव है, उन्हें यहां से दूर कर दो।” देव ने कहा।

आदेश मान कालाग्नि गुफा से बाहर निकला और उसने गुफा के चारो ओर अपने मुख से अग्नि प्रज्वलित कर दी। कालाग्नि की इस अग्नि से वहां उपस्थित सभी जीवों में भय व्याप्त हो गया और वह वहां से भा ग गये।

“देवी पारती, मैं जानता हूं कि आप इस दुष्कर यात्रा से अत्यंत थकान अनुभव कर रही होंगी, ऐसी स्थिति में निद्रा का आना स्वभाविक है, इसलिये मैं चाहता हूं कि जब मैं इस अमरकथा का पाठ शुरु करूं, तो आप कथा के बीच-बीच में हुंकारी भरते जाना, जिससे हमें पता रहे कि आप जाग रही हैं।“

देव के वचन सुन देवी ने अपना सिर हिलाकर अपन स्वीकृति दे दी। अब देव ने सिंहछाल पर बैठकर अमरकथा का पाठ शुरु कर दिया। देवी हर कुछ देर के बाद हुंकारी भरती रहीं।

उस दिव्य गुफा में एक तोते का घोंसला भी था, जिसमें एक तोते का अंडा रखा हुआ था। चूंकि अंडे को जीवित की श्रेणी में नही माना जाता, इसलिये कालाग्नि का ध्यान उस तोते के अंडे पर नहीं गया था।

अब जैसे ही देव ने अमरकथा का पाठ शुरु किया, वह तोता अपने अंडे से बाहर आ गया और देव की अमरकथा का पान करने लगा।

आधी कथा के बाद देवी को जोर से निद्रा आ गई और वह निद्रा की गोद में सो गईं। परंतु वह तोते का छोटा सा बच्चा, देवी के स्थान पर हुंकारी भरता रहा।

देव इस दिव्य घटना से अंजान अमरकथा का पाठ करते रहे। जब अमरकथा का पाठ पूर्ण हो गया, तो देव की निगाहें उस तोते के बच्चे और सो रही पार्वती पर पड़ी, यह देख देव अत्यंत क्रोध में आ गये।

देव ने अपना त्रिशूल उठाकर उस तोते को मारना चाहा, तभी वह तोता बोल उठा- “क्षमा करें देव, परंतु मैंने आपकी अमरकथा का पूर्ण श्रवण कर लिया है, अब अगर आप मृत्युदंड देंगे, तो आपकी इस कथा पर, लोगों को संदेह उत्पन्न होगा। इसलिये इस पूरी घटना को एक साधारण घटना समझ मुझे अभयदान दीजिये।"

तोते की बात सुनकर देव रुक गये। कुछ भी हो, पर उस तोते की बात अत्यंत असरकारक थी।

“परंतु मैं तुम्हें इस प्रकार अमरकथा सुनने के बाद जाने की आज्ञा भी नहीं दे सकता।” देव ने उलझन भरे शब्दों में कहा।

"तो हे महानदेव, आप मेरी स्मृति का हरण कर लीजिये। इससे मैं उस कथा को भूल भी जाऊंगा और जीवित भी रहूंगा।" तोते ने कहा।

देव को तोते का यह विचार अत्यंत ही प्रभावी लगा, अतः देव ने उस नन्हें तोते की स्मृति को विलोप कर दिया। अब वह तोता वहां से उड़ता हुआ कैलाश पर्वत की ओर चल दिया।

कैलाश पर्वत तक तोते को पहुंचने में सुबह हो गई थी। तोते को अब अमरकथा के बारे में कुछ नहीं पता था। वह तोता आसमान में ऊंचा उड़ता हुआ कैलाश पर्वत के शिखर पर जाकर बैठ गया।

तभी तोते को हवा में उड़ता हुआ 2 सफेद घोड़ों का रथ दिखाई दिया। उस रथ पर एक लड़का और एक लड़की सवार थे।

रथ कैलाश पर्वत के ऊपर आकर उतर गया। रथ के रुकते ही आर्यन और शलाका के साथ सुयश भी तेजी से रथ से नीचे उतर आया।

सुयश को पर्वत के ऊपर कुछ भी विचित्र नजर नहीं आया। तभी आर्यन ने एक जगह पहुंचकर जमीन पर पड़ी बर्फ को धीरे से थपथपाते हुए कुछ कहा।

आर्यन के ऐसा करते ही उस स्थान की बर्फ एक तरफ खिसक गयी और उसकी जगह जमीन की तरफ जाने वाली कुछ सीढ़ियां नजर आने लगीं। आर्यन, शलाका और सुयश उन सीढ़ियों से उतरकर नीचे की ओर चले गये।

यह देख वह तोते का बच्चा भी उस रास्ते से अंदर की ओर प्रवेश कर गया। तोता लगातार उड़ता हुआ जमीन के नीचे बनी उस सुरंग की ओर जा रहा था।

जिस स्थान पर वह सुरंग समाप्त हुई, वहां एक द्वार था। तोता उस द्वार को पारकर, देवलोक में पहुंच गया। वहां हर तरफ प्रकाश ही प्रकाश दिख रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे जमीन के नीचे कोई दूसरा सूर्य उग आया हो।

तोते ने इतनी खूबसूरत जगह कभी देखी नहीं थी। अतः वह अपने पंख फैलाकर ऊंचे और ऊंचे उड़ने लगा। ऊंची-ऊंची शानदार भव्य इमारतें, हर तरफ साफ-सुथरा वातावरण, सुंदर उद्यान, झरने और जगह-जगह लगे हुए फव्वारे तोते को आकर्षित कर रहे थे। तभी तोते को आसमान में उड़ता एक बाज दिखाई दिया, जो तीव्र गति से उसी की ओर आ रहा था।

इधर आर्यन की निगाहें भी, उसी समय आसमान की ओर गयीं, जहां बाज उस नन्हें तोते को मारने के लिये उसके पीछे पड़ा था।

"लगता है उस तोते की जान खतरे में है।“आर्यन ने कहा।

“अरे इधर हमें धेनुका का स्वर्णदुग्ध लेने जाना है।... हम इस समय प्रतियोगिता में हार रहे हैं और तुम्हें एक पक्षी की चिंता लगी है।“ शलाका ने कहा।

"अगर हम प्रतियोगिता नहीं जीतेंगे तो ज्यादा से ज्यादा क्या हो जायेगा?" आर्यन ने उस तोते की ओर देखते हुए कहा- “पर अगर हम उस पक्षी की जान नहीं बचायेंगे तो वह मर जायेगा। यह कहकर आर्यन उस दिशा में बढ़ गया जिधर वह पक्षी गिर रहा था।

शलाका ने एक क्षण के लिये भागते हुए आर्यन को देखा और फिर होंठों ही होंठों में बुदबुदायी- “यही तो वजह है तुमसे प्यार करने की।...क्यों कि तुम दूसरों का दर्द भी महसूस कर सकते हो और ऐसा व्यक्ति ही 'ब्रह्मकण' का सही उत्तराधिकारी होगा।

शलाका के चेहरे पर आर्यन के लिये ढेर सारा प्यार नजर आ रहा था। सुयश ने शलाका के शब्दों को सुना और उसके चेहरे के भावों को भी पहचान गया। शलाका ने भी अब सुयश के पीछे दौड़ लगा दी।

अपनी जान बचाने के लिये वह तोता, एक पार्क में मौजूद, आधी बनी गाय की मूर्ति के मुंह में छिप गया।

बाज उस मूर्ति के मुंह में अपना पंजा डालकर उस तोते को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। तभी आर्यन वहां पहुंच गया। उसने पास में पड़ा एक लकड़ी का डंडा उठाया और जोर से चिल्लाकर बाज को डराने लगा।

बाज आर्यन को देख डर गया और वहां से उड़कर गायब हो गया। आर्यन ने गाय की मूर्ति के मुंह में हाथ डालकर उस तोते को बाहर निकाल लिया।

उधर सुयश की नजर जैसे ही उस तोते पर गयी, वह हैरान रह गया। वह तोता ऐमू था। एक पल में ही सुयश को समझ में आ गया कि क्यों ऐमू, सुयश को अपना दोस्त बोल रहा था?

उस तोते ने नन्हीं आँखों से आर्यन को देखा। आर्यन ने उसके सिर पर हाथ फेरा और धीरे से उसे ऊपर उछाल दिया। उस तोते ने आसमान में अपने पंख फड़फड़ाये और फिर आकर आर्यन के कंधे पर बैठ गया।

यह देख शलाका मुस्कुरा उठी- “लगता है यह तुम्हें अपना दोस्त मानने लगा है और अब यह तुम्हारे ही साथ रहना चाहता है।"

"अरे वाह! ये तो और भी अच्छी बात है। ऐसे में मुझे भी एक दोस्त मिल जायेगा।“ आर्यन ने कहा- “पर इसका नाम क्या रखू?"

तभी सुयश ने आर्यन के कान में धीरे से फुसफुसाकर कहा- “ऐमू!"

और आर्यन बोल उठा- “ऐमू नाम कैसा रहेगा?"

“ऐमू....ये कैसा नाम है? और ऐसा नाम तुम्हारे दिमाग में आया कैसे?" शलाका ने आर्यन से पूछा।

"पता नहीं.......पर मुझे ऐसा लगा जैसे यह नाम किसी ने मेरे कान में फुसफुसाया हो।“ आर्यन ने अजीब सी आवाज में कहा।

यह सुन सुयश हैरान रह गया- “क्या मेरी आवाज आर्यन को सुनाई दी है? तो क्या ऐमू का नाम मैंने रखा था।

अब चाहे जो हो, पर उस तोते का नामकरण हो चुका था- “ऐमू अमरकथा का श्रवण करने वाला ऐमू जिसे अब स्वयं नहीं पता था कि वह क्या है? और कौन है? वह तो बस अपने ही अंदाज में हवा में आर्यन के आसपास उड़ रहा था।


जारी रहेगा_____✍️
Shaandar update
 

Raj_sharma

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#186 अराका युद्ध

100 मीटर लम्बा यान अपने एयरबस 380 से भी करीब 40 प्रतिशत बड़ा होता है -- मतलब बहुत बड़ा!
ओ तेरी - ये अंतरिक्ष यात्री भी अंग्रेजी लिपि का प्रयोग करते हैं! हेहेहेहे!

जैगन की अपना आकार घटाने बढ़ाने की शक्ति का भी पता चल गया! यार ऐसे नहीं होता - जब मन किया, कुछ भी लिख दिया! एक पे रहना - या तो घोड़ा या फिर चतुर!

2.5 मिलियन प्रकाश वर्ष की दूरी, 3 दिन में पूरी करने के लिए यान को प्रकाश से 304 मिलियन गुणा तेज गति से चलना पड़ेगा - जो भौतिकी सिद्धांतों में संभव नहीं है। वर्महोल जैसी काल्पनिक अवधारणाएँ ही इस तरह की यात्रा को संभव बना सकते हैं।

“एलात्रा के शरीर से नीले रंग का खून निकलकर, समुद्र के पानी में मिक्स होने लगा” -- ये तो पूरी तरह से blue blooded जीव हैं! सब नीला - शरीर, कपड़े, खून…।

यह लड़ाई तो चुटकी बजाते ख़तम हो गई।


#187

आँखों का मायाजाल बढ़िया था। लेकिन सच में - यह नक्षत्रा कुछ अधिक ही पहुँची हुई चीज़ है।
यह केवल AI नहीं है, बल्कि इसमें और भी क्षमताएँ हैं।


#188

शलाका के कमरे में जो भी आया हो, वो मित्र ही लग रहा है - शत्रु नहीं। शायद आर्यन का मेटा-फिजिकल रूप?
या फिर वही दिव्य बालक? इस कहानी में सब संभव है।


#189

विज्ञान की शक्तियाँ ही दिव्य शक्तियाँ होती हैं। बाकी सब कपोल कल्पना।

देवोम -- यही है वो दिव्य बालक!


#190

“तुम बताना शैफाली कि तुमने किस स्कूल से पढ़ाई की है, मैं ऑस्ट्रेलिया चलकर, उसी स्कूल में एडमिशन लूंगा।” -- हाँ, ऑस्ट्रेलिया के स्कूल बेहतरीन हैं।

इन पहेलियों को पढ़ कर बचपन में “डोगा” के किसी कॉमिक्स में ‘काल पहेलिया’ की याद आ गई।


#191

आँख का तिलिस्म टूट ही गया लगभग!
But पूरा ENT विभाग खुल गया लगता है। 😂
 

Raj_sharma

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#205.

चैपटर-11
मौत का सफर:
(तिलिस्मा 5.42)

सड़क काफी साफ-सुथरी थी, इसलिये रथ बिना रुके सरपट दौड़ा चला जा रहा था। सुयश, जेनिथ, क्रिस्टी और शैफाली पिछली सीट पर बैठे आसपास का दृश्य देख रहे थे।

तभी क्रिस्टी को आगे सड़क एक पहाड़ी दर्रे के बीच से जाती हुई दिखाई दी।

“कैप्टेन, आगे से पहाड़ी क्षेत्र शुरु होने वाला है, और हमें मीठे क्षेत्र से चले हुए भी 8 किलोमीटर हो गया है। क्रिस्टी ने कहा- “मुझे लगता है कि हमारा अगला कार्य आने ही वाला है, इसलिये हमें अब सावधान रहने की जरुरत है।"

क्रिस्टी की बात सुन सभी अब आगे की ओर देखने लगे। थोड़ी ही देर में रथ 2 पहाड़ी के बीच, एक दर्रे से निकलने लगा। दर्रे का रास्ता इतना संकरा भी नहीं था।

पर जैसे ही रथ दर्रे में घुसा, अचानक से चारो ओर की रोशनी बहुत कम नजर आने लगी। रथ अब घने पेड़ों के मध्य से गुजर रहा था। चारो ओर एक निस्तब्ध सन्नाटा सा छाया था।

“कैप्टेन अंकल मुझे यह वातावरण बहुत ही रहस्यमई नजर आ रहा है।" शैफाली ने कहा- “शायद कोई मुसीबत आने वाली है?"

तभी रथ के चारो घोड़े तेजी से हिनहिना कर रुक गये। सभी की नजर तुरंत रथ के आगे सड़क की ओर गई। सड़क पर आगे अंधेरे में कोई मानवाकृति जैसा साया दिखाई दिया।

“यह कौन हो सकता है?” सुयश ने धीरे से सारथि से पूछा।

“यह इस जंगल की काली शक्ति है, वैसे तो यह कभी किसी को आज तक दिन में नहीं दिखाई दी, आज पता नहीं कैसे यह दिन में भी दिख रही है? हमें कैसे भी इससे बचते हुए शाम होने से पहले इस क्षेत्र को पार करना होगा?” सारथि ने कहा।

अब सारथि ने कसकर घोड़े की लगाम को पकड़ लिया था। सारथि के मुंह से एक तेज घोड़े जैसी आवाज निकली, उसकी आवाज सुन अचानक घोड़ों ने फिर से सरपट सड़क पर दौड़ लगा दी।

घोड़े दौड़ते हुए इस प्रकार उस रहस्यमय साये के पार निकल गये, जैसे कि वह वहां हो ही ना?

एक बार फिर रथ सड़क पर तेजी से दौड़ रहा था। सभी की निगाह अब भी पीछे की ओर थी क्यों कि वह रहस्यमय साया अब हवा में तैरते हुए रथ का पीछा कर रहा था।

"रथ को थोड़ा और तेज चलाओ, वह रहस्यमय साया हमारे पीछे है।” सुयश ने चिल्लाकर सारथि को खतरे से आगाह किया।

सारथि अब रथ को और तेज भगा रहा था। धीरे-धीरे रथ और उस रहस्यमय साये के बीच की दूरी घटती जा रही थी।

तभी उस रहस्यमय साये के हाथ से एक तेज लाल रंग की किरण निकली और उस रथ से जा टकराईं।

पर उस किरण से रथ की गति में कोई परिवर्तन नहीं आया। लेकिन अब वह रहस्यमय साया दिखना बंद हो गया था। यह देखकर सभी ने राहत की साँस ली।

"काफी हॉरर जैसी फील आ रही है इस जंगल से..उस रहस्यमय साये को देख मेरी तो लग रहा था कि जान ही निकल जायेगी?" क्रिस्टी ने कहा।

"बस अब यह दर्रा कुछ ही देर में खत्म होने वाला है।” सुयश ने सामने की ओर देखते हुए कहा- “वह देखो, 300 मीटर आगे, अब उजाला दिखाई देने लगा है।"

तभी शैफाली की नजर सारथि के हाथों की ओर गई। सारथि के नाखून धीरे-धीरे बढ़ रहे थे।

शैफाली ने सुयश को सारथि के नाखूनों की ओर इशारा करते हुए, चुप रहने का इशारा किया।

सारथि के नाखून के साथ ही अब उसके शरीर की त्वचा में भी परिवर्तन आने लगा था।

तभी सारथि ने एकदम से रथ को रोक दिया। रथ के रुकते ही सारथि ने पलटकर पीछे देखा। अब उसके आँखों की जगह 2 लाल अंगारे से दिख रहे थे।

सुयश 1 सेकेण्ड में ही समझ गया कि सारथि का यह हाल उस रहस्यमय साये की लाल किरणों ने किया है। सुयश ने रथ के पीछे रखा एक धातु का डंडा पहले से ही हाथ मे पकड़ लिया था।

सुयश ने उस डंडे को तेजी से घुमाकर उस सारथि के चेहरे पर दे मारा। इतनी तेज प्रहार से सारथि रथ के नीचे जा गिरा।

उसके नीचे गिरते ही सुयश कूदकर उसके स्थान पर पहुंच गया और घोड़ों की लगाम अपने हाथ में ले, उसे तेजी से फटकारा, पर सुयश के ऐसा करने से भी घोड़े अपने स्थान से हिले तक नहीं।

यह देख सुयश ने आश्चर्य से घोड़ों की ओर देखा, अब घोड़े की आँखें भी लाल रंग की दिखने लगीं थीं।

यह देख सुयश ने चिल्ला कर कहा- “सभी लोग उतरकर दर्रे से बाहर की ओर भागो, मैं इन्हें संभालता हूं।
यह कहकर सुयश उस डंडे को लेकर रथ से नीचे की ओर कूद गया।

तभी घोड़ों का आकार भी बदलने लगा, अब वह लाल रंग के विशाल कीड़ों में परिवर्तित होने लगे थे।

सुयश की आवाज सुन शैफाली, क्रिस्टी और जेनिथ तेजी से रथ से नीचे उतर गये, पर भागने के स्थान पर उन्होंने वहां पड़े कुछ पत्थर व डंडे उठा लिये और तेजी से लाल कीड़ों पर प्रहार करने लगे।

“सॉरी कैप्टेन, हम आज ही 2 लोगों को खो चुके हैं, अब आपको भी नहीं खोना चाहते, हम सब एक साथ रहेंगे, मरें या जियें।" क्रिस्टी ने चीखकर कहा।

इधर सुयश भी तब तक 3-4 डंडे सारथि को मार चुका था। तभी एक लाल कीड़े ने उछलकर जेनिथ के हाथ पर काट लिया। जेनिथ दर्द से बिलबिला उठी।

"हम इनसे लड़कर इन्हें मार नहीं सकते दोस्तों।" सुयश ने चिल्लाकर कहा- “हमें कैसे भी इनसे बचते हुए इस दर्रे को जल्दी से जल्दी पार करना होगा? मुझे नहीं लगता कि यह हमारे साथ-साथ दर्रे से बाहर जायेंगे।"

सुयश का यह विचार सभी को सही लगा। सभी अब धीरे-धीरे पीछे हटते हुए उन कीड़ों और सारथि से बचने की कोशिश कर रहे थे।

तभी एक लाल कीड़ा फिर हवा में उछला और इस बार उसने सुयश के पैर पर काट लिया। सुयश को भी तेज दर्द का अहसास हुआ। सुयश ने अपने हाथ में पकड़ा डंडा उस कीड़े के सिर पर मार दिया।

तेज प्रहार से वह कीड़ा वहीं जमीन पर गिर गया। अब 3 कीड़े और बचे थे। तभी सारथि ने सुयश का ध्यान कीड़े की ओर देख, सुयश के हाथ पर काट लिया। यह दर्द पिछले वाले से भी ज्यादा था।

अब सभी तेजी से पलटकर दर्रे से बाहर की ओर भागे। तभी लाल कीड़े उछल-उछलकर सभी को काटने लगे, परंतु इस बार कोई भी उन्हें मारने के लिये रुका नहीं। वह सभी अब भागते ही जा रहे थे।

कुछ ही देर में सभी दर्रे से बाहर उजाले की ओर आ गये। उन्हें उजाले में जाता देख कीड़ा व सारथि वहीं दर्रे में ही रुक गये। शायद वह उजाले में आने से डर रहे थे। यह देख सबने राहत की साँस ली।

कुछ आगे इन्हें लहराता हुआ समुद्र दिखाई दे रहा था। सभी अब समुद्र के किनारे पड़ी रेत पर बैठ गये।

"सबसे पहले सब लोग ये देखो, कि उन लाल कीड़ों ने कितनी जगह पर काटा है?” सुयश यह कहकर तीनों लड़कियों से थोड़ा दूर चला गया।

सुयश अब अपने शरीर की ओर देखने लगा। उन लाल कीड़ों ने सुयश के 3 जगह पर पैरों में और 1 जगह पर हाथ पर काटा था।

जिस जगह पर उन लाल कीड़ों ने काटा था, उस जगह के आसपास बिल्कुल लाल पड़ गया था।
कुछ इसी प्रकार का हाल शैफाली और क्रिस्टी का था।

जेनिथ के शरीर को नक्षत्रा ने पूरी तरह से सही कर दिया था। अपने-अपने शरीर को चेक करने के बाद सभी फिर एक जगह पर एकत्रित हो गये।

“कैप्टेन अंकल, मुझे लग रहा है कि वह लाल कीड़े जहरीले थे। उन्होंने जिस स्थान पर काटा है, वहां के आसपास का खून गाढ़ा होकर जम सा गया है, हमें कैसे भी करके उस स्थान के खून को बाहर निकालना होगा, नहीं तो शरीर का वह भाग काम करना बंद कर देगा।“ शैफाली ने सुयश को देखते हुए गंभीरता से कहा।

"पर अगर हम उस जगह को काटकर, वहां का खून बाहर निकालेंगे, तो वहां काफी बड़ा घाव हो जायेगा और ऐसी स्थिति में हमारा चलना भी मुश्किल हो जायेगा।" क्रिस्टी ने कहा।

बड़ी ही विकट स्थिति थी, अगर खून नहीं निकालते तो भी परेशानी थी और अगर खून निकालते तो भी।

“मेरे हिसाब से हमें समुद्र के किनारे-किनारे, कुछ आगे तक इसी हालत में बढ़ने की कोशिश करनी होगी, फिर जब ज्यादा मुश्किल होने लगेगी, फिर देखेंगे कि क्या करना है?” सुयश ने कहा- “और वैसे भी हमारे पास इस स्थान पर कुछ भी ऐसा नहीं है, जिससे हम अपने शरीर के उस भाग को काट सकें?"

सुयश की बात सुन सभी धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ने लगे। एक ओर समुद्र की तेज आवाज करती लहरें और दूसरी ओर भयावह जंगल, फिर भी सभी धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ते जा रहे थे।

“ये कैश्वर भी ना पूरा ड्रैक्यूला बन गया है, किसी ना किसी प्रकार से, हर द्वार में हम लोगों का खून पी रहा है।” क्रिस्टी ने गुस्साते हुए कहा।

क्रिस्टी की बात सुन एकाएक सुयश को झटका लगा।

“क्या हुआ कैप्टेन?” जेनिथ ने सुयश को हैरान होते देख पूछ लिया। पर सुयश ने इस समय जेनिथ की बात का जवाब नहीं दिया, अब वह तेजी से कुछ सोच रहा था।

“तुम लोग यहीं पर रुको, मैं अभी आया।” यह कहकर सुयश बिना किसी को कुछ बताये, जंगल के अंदर घुस गया।

"ये कैप्टेन बिना बताये कहां चले गये?” क्रिस्टी ने अजीब से भाव से देखते हुए कहा।

“मुझे लगता है कि अवश्य ही उन्हें कुछ याद आया है? इसलिये ही वह बिना बताये चले गये।” जेनिथ ने कहा- “हमें यहीं रुककर उनका इंतजार करना चाहिये।" यह कहकर तीनों वहीं जमीन पर बैठ गये, पर बैठते ही शैफाली व क्रिस्टी कराहकर उठ गये।

“क्या हुआ?” जेनिथ ने दोनों से पूछा।

“यहां जमीन पर रेत नहीं बल्कि नमक पड़ा है, जो कि शायद इस समुद्र के पानी से बना है, वही जब लाल पड़े शरीर पर लगा, तो तेज दर्द हुआ। इसीलिये हम उठकर खड़े हो गये थे।” क्रिस्टी ने कहा- “पर कोई परेशानी की बात नहीं है, हम लोग खड़े होकर ही कैप्टेन का इंतजार कर लेंगे।

क्रिस्टी की बात सुन जेनिथ को अच्छा महसूस नहीं हुआ, इसलिये वह भी उठकर, उन दोनों के पास खड़ी हो गई।

लगभग 10 मिनट के पश्चात् सुयश जंगल से बाहर आया। सुयश के हाथ में केले का एक बड़ा सा पत्ता था, जिस पर बहुत से काले रंग के जोंक चिपके हुए थे।

"क्या आप ये जोंक को लेने के लिये जंगल गये थे?" क्रिस्टी ने आश्चर्य से सुयश को देखते हुए कहा- “पर इसका हमारे पास क्या काम?"

"क्रिस्टी क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में बहुत से लोग 'आर्थराइटिस' का इलाज जोंक के द्वारा भी करते हैं। सुयश ने क्रिस्टी को समझाते हुए कहा। (आर्थराइटिसः एक प्रकार का रोग, जिसमें शरीर के किसी भी भाग में खून जम जाता है, इसे गठिया रोग भी कहते हैं)

“सॉरी कैप्टेन, मुझे इस बारे में कोई आइडिया नहीं है।" क्रिस्टी ने कहा।

“आर्थराइटिस रोग में जब खून एक स्थान पर जम जाता है, तो जोंक को उस स्थान से चिपका दिया जाता है। जोंक उस जगह के गंदे खून को जब पी लेता है, तो उसे हटा दिया जाता है। इस प्रकार से बिना किसी ऑपरेशन के ही आर्थराइटिस का इलाज किया जाता है।” सुयश ने क्रिस्टी को समझाते हुए कहा- “अब जब तुमने कैश्वर के खून पीने की बात कही तो मुझे एकाएक जोंक का ध्यान आ गया, जो हमारे शरीर के लाल पड़े भाग को सही कर सकता था। अब मुझे बस ये सोचना था कि जोंक मिल कहां सकता है। तभी मुझे याद आया कि जोंक हमेशा किसी रुके हुए पानी में मिलता है, बस उसी की खोज में मैं जंगल में चला गया था।"

यह कहकर सुयश ने एक जोंक को अपने पैर के उस स्थान पर चिपका दिया, जो कि कीड़े काटने की वजह से लाल पड़ गया था। सुयश को ऐसा करता देख शैफाली और क्रिस्टी ने भी जोंक को अपने शरीर पर चिपका लिया।

सुयश की तरकीब काम कर गई। अब बिना शरीर के उस भाग को काटे, शरीर का सारा विष भरा गंदा खून निकलता जा रहा था।

कुछ ही देर में जोंक ने पूरा गंदा खून समाप्त कर दिया। पर जैसे ही शरीर के उस भाग से गंदा खून समाप्त हुआ, क्रिस्टी के मुंह से चीख निकल गई।

“कैप्टेन, गंदा खून खत्म होने के बाद, यह जोंक अब हमारा साफ खून भी पीते जा रहे हैं।” क्रिस्टी ने चीखकर जोंक को हटाने की कोशिश की, पर क्रिस्टी का यह प्रयास बेकार हो गया, जोंक ने क्रिस्टी के शरीर को नहीं छोड़ा।

लेकिन इससे पहले कि सुयश क्रिस्टी को कुछ बता पाता, शैफाली ने जमीन पर पड़े नमक को उठाकर क्रिस्टी के शरीर पर मौजूद जोंक पर डाल दिया।

शैफाली के ऐसा करते ही जोंक ने मात्र 1 सेकेण्ड में ही क्रिस्टी का शरीर छोड़ दिया।

“नमक, जोंक का दुश्मन होता है, जोंक को हटाने के लिये नमक का इस्तेमाल करो क्रिस्टी।" शैफाली ने कहा।

शैफाली की बात सुन सुयश और क्रिस्टी ने भी अपने शरीर पर नमक को डालना शुरु कर दि या।

कुछ ही देर में सभी के शरीर से सारे जोंक हट गये थे। पर हटते-हटते भी जोंक शरीर के कुछ भागों पर घाव बना चुके थे और नमक की वजह से उन घावों पर तेज जलन हो रही थी।

किसी प्रकार से तीनों ने कुछ पत्ते तोड़कर, उससे अपने घावों को साफ कर लिया। पत्तों के साफ करने की वजह से घाव तो नहीं भरे, परंतु सभी अब आगे चलने लायक स्थिति में आ गये थे। सभी अब फिर से धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे।

तभी क्रिस्टी को समुद्र के किनारे एक जगह पर लगा हुआ बोर्ड दिखाई दिया- “द्वितीय विश्राम, तिलिस्मा 5.4, दूरी 20 किलोमीटर, उत्तर दिशा।

“यह क्या दूसरा कार्य तो आया ही नहीं?” क्रिस्टी ने कहा।

“अब कितने कार्य करोगी?" जेनिथ ने मुस्कुराते हुए कहा- “मीठे के बाद नमकीन क्षेत्र आना था, पर अभी जो तुमने समुद्र का नमक अपने शरीर पर लगाया, वही नमकीन स्वादेन्द्रिय थी। यानि की एक बाधा और पार हो चुकी है। अब स्वादेन्द्रिय में खट्टा और कड़वा स्वाद बचा है।"

"हे भगवान, अगर नमकीन स्वाद ऐसा था, तो कड़वा कैसा होगा?" क्रिस्टी ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा।

अब सभी फिर से आगे की ओर बढ़ चले। काफी देर तक चलते रहने के बाद बहुत दूर, जमीन पर कुछ बहुत बड़ी सी आकृतियां बनी दिखाई देने लगीं।

कुछ ही देर में वह सभी उन आकृतियों के पास पहुंच गये। सबसे आगे एक बड़ी सा नारंगी रंग का गोला था, फिर उसके बाद उससे कुछ छोटा, पीले रंग का गोला, फिर कई सारी लाल रंग की त्रिभुजाकार आकृति और फिर एक विशाल पेड़ था, जिसकी बहुत सी शाखाएं थीं।

"यह सब तो किसी ग्रह के समान दिख रहे हैं।' जेनिथ ने एक नारंगी रंग की गोल आकृति को देखते हुए कहा।

“यह ग्रह नहीं हैं, बल्कि फल और सब्जियां हैं।" शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा- “जिनमें विटामिन 'C' पाया जाता है। दोस्तों इस समय हम सभी किसी विशाल डाइनिंग टेबल पर हैं, जिस पर कुछ फल और सब्जियां रखीं हैं। जैसे कि यह नारंगी रंग का गोला संतरा है, उससे छोटा पीला गोला नींबू, उसके बाद कुछ स्ट्राबेरी रखीं हैं और फिर यह बड़ा सा दिखने वाला पेड़ असल में ब्रोकली है।"

"और यह बड़ा सा पीले रंग का पहाड़ और यह स्वीमिंग पूल क्या है?" जेनिथ ने आश्चर्य से चारो ओर देखते हुए पूछा।

“यह पीले रंग का पहाड़ किसी छिले हुए संतरे का छिलका है और यह स्वीमिंग पूल नहीं बल्कि संतरे के रस से भरा कटोरा है।” सुयश ने कहा।

“यह सब चीजें तो साधारण हैं, मतलब हमें किसी भी तरह से इस टेबल रुपी मुसीबत को पार करना होगा?" क्रिस्टी ने कहा।

तभी शैफाली जूस के कटोरे में अपने पैर लटका कर कुछ देखने लगी। शैफाली ने जब संतरे के जूस से अपना पैर बाहर निकाला, तो उसके पैर के सभी घाव भर चुके थे।

यह देख शैफाली ने खुश होते हुए सभी को आवाज लगाई- “सभी लोग यहां आकर संतरे के पानी से अपने घाव को साफ कर लो। संतरे के जूस में हीलींग पॉवर होती है और इससे त्वचा बहुत साफ और स्वस्थ हो जाती है।"

शैफाली की बात सुन क्रिस्टी व सुयश के साथ जेनिथ भी वहां आ पहुंची। संतरे के जूस से अपना शरीर साफ करते ही सभी के शरीर पर बने सारे घाव भर गये। अब सभी टेबल पर आगे की ओर बढ़ गये।

कुछ आगे बढ़ते ही सभी को एक तेज भिनभिनाहट की आवाज सुनाई दी। सभी यह तेज आवाज सुन घबराकर ऊपर की ओर देखने लगे।

“बाप रे, यह तो कोई मक्खी है, जो हमारी ओर ही आ रही है।” जेनिथ ने घबराकर कहा।

"हमारे नार्मल आकार में यह मक्खी थी, अभी तो हमारे लिये यह डाइनासोर की माँ है। हमें किसी भी हाल में इससे बचना होगा?” क्रिस्टी ने कहा।

“हमारे शरीर पूरी तरह से संतरे के जूस से भीगे हैं, इसी की खुशबू सूंघकर वह हमारी ओर आकर्षित हो रही है।” शैफाली ने कहा।

तभी उस मक्खी ने सुयश के ऊपर हमला कर दिया। सुयश ने झुककर किसी तरह से अपने को बचाया।
मक्खी सुयश के ऊपर से होती हुई आगे निकल गई, पर कुछ आगे जाते ही वह पलटी और फिर सुयश की ओर लपकी।

पर सुयश और मक्खी के बीच इस बार क्रिस्टी आ गई। क्रिस्टी ने अपना हाथ लहराते हुए मक्खी का ध्यान अपनी ओर लगाया।

“कैप्टेन, जब तक आप लोग इस मक्खी से निपटने का कोई उपाय सोचो, तब तक मैं इसे उलझाकर रखती हूं।” यह कह क्रिस्टी मक्खी की ओर दौड़ पड़ी।

क्रिस्टी को उल्टा अपनी ओर आते देख मक्खी टेबल पर एक स्थान पर रुक गई। क्रिस्टी मक्खी से कुछ दूरी पर रुक गई और मक्खी के अगले कदम का इंतजार करने लगी।

तभी मक्खी ने अपने आगे वाले दोनों हाथों को अच्छे से साफ किया और फिर क्रिस्टी की ओर एक उड़ान भरी।

क्रिस्टी ध्यान से मक्खी के उड़ने की गति देख रही थी। मक्खी जैसे ही आगे को आई, क्रिस्टी अपनी जगह पर हवा में उछली।

मक्खी क्रिस्टी के नीचे से होती हुई आगे निकल गई। यह वार भी खाली जाते देख मक्खी को इस बार गुस्सा आ गया।

अब वह पलटकर बिजली की तेजी से क्रिस्टी की ओर लपकी। मक्खी को लग रहा था कि क्रिस्टी फिर उछलेगी, इसलिये क्रिस्टी के पास पहुंचते ही मक्खी ने थोड़ा ऊपर से उड़ान भरी।

पर इस बार क्रिस्टी ने अपने घुटनों को मोड़ते हुए, फिसलकर अपना बचाव किया।

अब मक्खी समझ गई थी कि क्रिस्टी से लड़ने की जगह, किसी और शिकार पर ध्यान दे तो ज्यादा अच्छा रहेगा।

यह सोच इस बार वह शैफाली की ओर लपकी, पर शैफाली पहले से ही मक्खी के लिये तैयार थी। जैसे ही मक्खी पास आयी, शैफाली ने संतरे के छिलके को उस मक्खी की आँख में निचोड़ दिया।

संतरे के छिलके का रस सीधा मक्खी के आँख पर पड़ा और वह लहराकर टेबल से दूर जा गिरी।
मक्खी को नीचे गिरता देख अब सभी ने राहत की साँस ली।

सभी अब एक बार फिर से टेबल पर आगे की ओर बढ़ चले। नींबू और स्ट्राबेरी को पार करने के बाद सभी अब ब्रोकली के पेड़ के पास पहुंच गये।

तभी जेनिथ का पैर किसी चीज में उलझा और वह पेड़ के पास नीचे गिर गई। जेनिथ की नजर नीचे की ओर गई। जेनिथ का पैर एक मकड़ी के जाले में उलझा था।

तभी जाने कहां से एक विशाल मकड़ी प्रकट हुई और उसने जेनिथ के चारो ओर जाल बनाना शुरु कर दिया।

"हे भगवान, एक मुसीबत गई नहीं कि दूसरी आ गई।” क्रिस्टी ने कहा- “अब इस मुसीबत से कैसे निपटा जाये?" मकड़ी अब पूरी तरह से जेनिथ को अपने जाल में लपेट चुकी थी।

तभी सुयश की नजर टेबल पर रखे एक प्लास्टिक के चिमटे पर गई। सुयश के हिसाब से चिमटा काफी बड़ा था।

तब तक मकड़ी ने जेनिथ के एक पैर में अपना डंक चुभो दिया। डंक का वार इतना खतरनाक था, कि जेनिथ के मुंह से तेज चीख निकल गई।

"क्रिस्टी, इस चिमटे के निचले भाग पर संतरे के छिलके का रस लगाओ....जल्दी करो।” सुयश ने क्रिस्टी से चिल्लाकर कहा।

क्रिस्टी की समझ में नहीं आया कि सुयश आखिर करना क्या चाहता है? पर उसने सुयश की बात मान तेजी से चिमटे के अंदर की ओर संतरे के छिलके का रस डालना शुरु कर दिया था।

अब चिमटे पर काफी ज्यादा रस लग चुका था। यह देख सुयश, मकड़ी के जाल के पास आ गया और अपने मुंह से तेज आवाज निकाल कर, मकड़ी का ध्यान अपनी ओर खींचने लगा।

सुयश को पता था कि मकड़ी की आदत, पहले ज्यादा से ज्यादा खाना अपने पास इकठ्ठा करने की होती है और ऐसी स्थिति में मकड़ी अपने जाल में फंसे शिकार को सबसे आखिर में खाती है।

सुयश का सोचना बिल्कुल सही सिद्ध हुआ। मकड़ी अब जेनिथ को छोड़ सुयश की ओर बढ़ने लगी।
मकड़ी अब सुयश के पास आ पहुंची थी। मकड़ी को देख सुयश चिमटे के अंदर की ओर आ गया।

मकड़ी भी आगे बढ़ी, तभी सुयश ने अपना हाथ चिमटे के उस जगह पर रखा, जिधर क्रिस्टी ने छिलके का रस डाला था।

सुयश ने जल्दी-जल्दी अपना हाथ 3-4 बार उस चिमटे पर रखकर उठाया। अब सुयश के हाथ और उस चिमटे के बीच बहुत सारा मकड़ी के जाल जैसा दिखाई देने लगा।

सुयश ने इस जाल को अब चारो ओर फैलाना शुरु कर दिया।

अब मकड़ी जैसे ही सुयश के पास पहुंची, वह सुयश के बनाये जाल में फंस गई। सबको अपने जाल में फंसाने वाली मकड़ी आज संतरे के छिलके के रस से बने जाल में फंस गई थी।

अब मकड़ी उससे जितना छूटने की कोशिश कर रही थी, उतना ही वो ज्यादा उसमें फंसती जा रही थी।
कुछ देर में मकड़ी, पूरी की पूरी जाल में फंसकर मिश्र की ममी नजर आने लगी।

यह देख सुयश सहित सभी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। कुछ ही देर में ब्रोकली की एक डंडी की मदद से जेनिथ को भी मकड़ी के जाले से छुड़ा लिया।

“कैप्टेन, आपने संतरे के छिलके के रस से वह जाल कैसे बनाया?" जेनिथ ने पूछा।

“पहले मुझे यह बताओ कि मकड़ी अपने जाल में स्वयं क्यों नहीं फंसती?” सुयश ने उल्टा जेनिथ से ही सवाल कर लिया।

जेनिथ के बोलने के पहले ही शैफाली बोल उठी “मकड़ी अपने शरीर से गाढ़ा चिपचिपा पदार्थ निकालती है, जो हवा के संपर्क में आते ही सूख जाता है। मकड़ी जाल पर चलते समय कभी भी अपना शरीर जाल पर नहीं रखती। वो ऐसा इसलिये करती है क्यों कि अगर उसने अपना शरीर जाल पर रखा, तो वह स्वयं उस जाल में चिपक जायेगी। इसलिये मकड़ी अपने पैर के द्वारा अपने जाल पर चलती है। मकड़ी के पैर में बहुत सारे अलग प्रकार के बाल पाये जाते हैं, जो उसे अपने जाल में चिपकने से बचाते हैं।

“बिल्कुल ठीक।” सुयश ने शैफाली की तारीफ करते हुए कहा- “मैं भी यही बात सोच रहा था कि तभी मुझे मेरे बचपन का एक खेल याद आ गया, जो हम स्कूल में करते थे। स्कूल में हम ऐसे ही संतरे के छिलके के रस को, अपने हाथ पर लगाकर प्लास्टिक की स्केल से जाले बनाते थे। अब इस क्रिया का वैज्ञानिक कारण तो मुझे भी नहीं पता, पर जैसे ही मुझे यह क्रिया याद आई, मेरे दिमाग में ये ख्याल आया कि मकड़ी को भी उस जाल में फंसाया जा सकता है। बस मैंने वैसे ही किया और तुम लोगों ने देखा कि मेरा प्रयोग सफल रहा।

“सही कहा आपने कैप्टेन, एक बार फिर आपने मुझे बचा लिया।” जेनिथ ने सुयश को धन्यवाद देते हुए कहा - “अब हमें तुरंत आगे बढ़ जाना चाहिये कैप्टेन। नहीं तो यहां पर फिर कोई मुसीबत आ जायेगी?"

जेनिथ की बात एकदम सही थी, इसलिये सभी उस स्थान से आगे की ओर बढ़ गये।

जारी रहेगा_____✍️
 

kas1709

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#205.

चैपटर-11
मौत का सफर:
(तिलिस्मा 5.42)

सड़क काफी साफ-सुथरी थी, इसलिये रथ बिना रुके सरपट दौड़ा चला जा रहा था। सुयश, जेनिथ, क्रिस्टी और शैफाली पिछली सीट पर बैठे आसपास का दृश्य देख रहे थे।

तभी क्रिस्टी को आगे सड़क एक पहाड़ी दर्रे के बीच से जाती हुई दिखाई दी।

“कैप्टेन, आगे से पहाड़ी क्षेत्र शुरु होने वाला है, और हमें मीठे क्षेत्र से चले हुए भी 8 किलोमीटर हो गया है। क्रिस्टी ने कहा- “मुझे लगता है कि हमारा अगला कार्य आने ही वाला है, इसलिये हमें अब सावधान रहने की जरुरत है।"

क्रिस्टी की बात सुन सभी अब आगे की ओर देखने लगे। थोड़ी ही देर में रथ 2 पहाड़ी के बीच, एक दर्रे से निकलने लगा। दर्रे का रास्ता इतना संकरा भी नहीं था।

पर जैसे ही रथ दर्रे में घुसा, अचानक से चारो ओर की रोशनी बहुत कम नजर आने लगी। रथ अब घने पेड़ों के मध्य से गुजर रहा था। चारो ओर एक निस्तब्ध सन्नाटा सा छाया था।

“कैप्टेन अंकल मुझे यह वातावरण बहुत ही रहस्यमई नजर आ रहा है।" शैफाली ने कहा- “शायद कोई मुसीबत आने वाली है?"

तभी रथ के चारो घोड़े तेजी से हिनहिना कर रुक गये। सभी की नजर तुरंत रथ के आगे सड़क की ओर गई। सड़क पर आगे अंधेरे में कोई मानवाकृति जैसा साया दिखाई दिया।

“यह कौन हो सकता है?” सुयश ने धीरे से सारथि से पूछा।

“यह इस जंगल की काली शक्ति है, वैसे तो यह कभी किसी को आज तक दिन में नहीं दिखाई दी, आज पता नहीं कैसे यह दिन में भी दिख रही है? हमें कैसे भी इससे बचते हुए शाम होने से पहले इस क्षेत्र को पार करना होगा?” सारथि ने कहा।

अब सारथि ने कसकर घोड़े की लगाम को पकड़ लिया था। सारथि के मुंह से एक तेज घोड़े जैसी आवाज निकली, उसकी आवाज सुन अचानक घोड़ों ने फिर से सरपट सड़क पर दौड़ लगा दी।

घोड़े दौड़ते हुए इस प्रकार उस रहस्यमय साये के पार निकल गये, जैसे कि वह वहां हो ही ना?

एक बार फिर रथ सड़क पर तेजी से दौड़ रहा था। सभी की निगाह अब भी पीछे की ओर थी क्यों कि वह रहस्यमय साया अब हवा में तैरते हुए रथ का पीछा कर रहा था।

"रथ को थोड़ा और तेज चलाओ, वह रहस्यमय साया हमारे पीछे है।” सुयश ने चिल्लाकर सारथि को खतरे से आगाह किया।

सारथि अब रथ को और तेज भगा रहा था। धीरे-धीरे रथ और उस रहस्यमय साये के बीच की दूरी घटती जा रही थी।

तभी उस रहस्यमय साये के हाथ से एक तेज लाल रंग की किरण निकली और उस रथ से जा टकराईं।

पर उस किरण से रथ की गति में कोई परिवर्तन नहीं आया। लेकिन अब वह रहस्यमय साया दिखना बंद हो गया था। यह देखकर सभी ने राहत की साँस ली।

"काफी हॉरर जैसी फील आ रही है इस जंगल से..उस रहस्यमय साये को देख मेरी तो लग रहा था कि जान ही निकल जायेगी?" क्रिस्टी ने कहा।

"बस अब यह दर्रा कुछ ही देर में खत्म होने वाला है।” सुयश ने सामने की ओर देखते हुए कहा- “वह देखो, 300 मीटर आगे, अब उजाला दिखाई देने लगा है।"

तभी शैफाली की नजर सारथि के हाथों की ओर गई। सारथि के नाखून धीरे-धीरे बढ़ रहे थे।

शैफाली ने सुयश को सारथि के नाखूनों की ओर इशारा करते हुए, चुप रहने का इशारा किया।

सारथि के नाखून के साथ ही अब उसके शरीर की त्वचा में भी परिवर्तन आने लगा था।

तभी सारथि ने एकदम से रथ को रोक दिया। रथ के रुकते ही सारथि ने पलटकर पीछे देखा। अब उसके आँखों की जगह 2 लाल अंगारे से दिख रहे थे।

सुयश 1 सेकेण्ड में ही समझ गया कि सारथि का यह हाल उस रहस्यमय साये की लाल किरणों ने किया है। सुयश ने रथ के पीछे रखा एक धातु का डंडा पहले से ही हाथ मे पकड़ लिया था।

सुयश ने उस डंडे को तेजी से घुमाकर उस सारथि के चेहरे पर दे मारा। इतनी तेज प्रहार से सारथि रथ के नीचे जा गिरा।

उसके नीचे गिरते ही सुयश कूदकर उसके स्थान पर पहुंच गया और घोड़ों की लगाम अपने हाथ में ले, उसे तेजी से फटकारा, पर सुयश के ऐसा करने से भी घोड़े अपने स्थान से हिले तक नहीं।

यह देख सुयश ने आश्चर्य से घोड़ों की ओर देखा, अब घोड़े की आँखें भी लाल रंग की दिखने लगीं थीं।

यह देख सुयश ने चिल्ला कर कहा- “सभी लोग उतरकर दर्रे से बाहर की ओर भागो, मैं इन्हें संभालता हूं।
यह कहकर सुयश उस डंडे को लेकर रथ से नीचे की ओर कूद गया।

तभी घोड़ों का आकार भी बदलने लगा, अब वह लाल रंग के विशाल कीड़ों में परिवर्तित होने लगे थे।

सुयश की आवाज सुन शैफाली, क्रिस्टी और जेनिथ तेजी से रथ से नीचे उतर गये, पर भागने के स्थान पर उन्होंने वहां पड़े कुछ पत्थर व डंडे उठा लिये और तेजी से लाल कीड़ों पर प्रहार करने लगे।

“सॉरी कैप्टेन, हम आज ही 2 लोगों को खो चुके हैं, अब आपको भी नहीं खोना चाहते, हम सब एक साथ रहेंगे, मरें या जियें।" क्रिस्टी ने चीखकर कहा।

इधर सुयश भी तब तक 3-4 डंडे सारथि को मार चुका था। तभी एक लाल कीड़े ने उछलकर जेनिथ के हाथ पर काट लिया। जेनिथ दर्द से बिलबिला उठी।

"हम इनसे लड़कर इन्हें मार नहीं सकते दोस्तों।" सुयश ने चिल्लाकर कहा- “हमें कैसे भी इनसे बचते हुए इस दर्रे को जल्दी से जल्दी पार करना होगा? मुझे नहीं लगता कि यह हमारे साथ-साथ दर्रे से बाहर जायेंगे।"

सुयश का यह विचार सभी को सही लगा। सभी अब धीरे-धीरे पीछे हटते हुए उन कीड़ों और सारथि से बचने की कोशिश कर रहे थे।

तभी एक लाल कीड़ा फिर हवा में उछला और इस बार उसने सुयश के पैर पर काट लिया। सुयश को भी तेज दर्द का अहसास हुआ। सुयश ने अपने हाथ में पकड़ा डंडा उस कीड़े के सिर पर मार दिया।

तेज प्रहार से वह कीड़ा वहीं जमीन पर गिर गया। अब 3 कीड़े और बचे थे। तभी सारथि ने सुयश का ध्यान कीड़े की ओर देख, सुयश के हाथ पर काट लिया। यह दर्द पिछले वाले से भी ज्यादा था।

अब सभी तेजी से पलटकर दर्रे से बाहर की ओर भागे। तभी लाल कीड़े उछल-उछलकर सभी को काटने लगे, परंतु इस बार कोई भी उन्हें मारने के लिये रुका नहीं। वह सभी अब भागते ही जा रहे थे।

कुछ ही देर में सभी दर्रे से बाहर उजाले की ओर आ गये। उन्हें उजाले में जाता देख कीड़ा व सारथि वहीं दर्रे में ही रुक गये। शायद वह उजाले में आने से डर रहे थे। यह देख सबने राहत की साँस ली।

कुछ आगे इन्हें लहराता हुआ समुद्र दिखाई दे रहा था। सभी अब समुद्र के किनारे पड़ी रेत पर बैठ गये।

"सबसे पहले सब लोग ये देखो, कि उन लाल कीड़ों ने कितनी जगह पर काटा है?” सुयश यह कहकर तीनों लड़कियों से थोड़ा दूर चला गया।

सुयश अब अपने शरीर की ओर देखने लगा। उन लाल कीड़ों ने सुयश के 3 जगह पर पैरों में और 1 जगह पर हाथ पर काटा था।

जिस जगह पर उन लाल कीड़ों ने काटा था, उस जगह के आसपास बिल्कुल लाल पड़ गया था।
कुछ इसी प्रकार का हाल शैफाली और क्रिस्टी का था।

जेनिथ के शरीर को नक्षत्रा ने पूरी तरह से सही कर दिया था। अपने-अपने शरीर को चेक करने के बाद सभी फिर एक जगह पर एकत्रित हो गये।

“कैप्टेन अंकल, मुझे लग रहा है कि वह लाल कीड़े जहरीले थे। उन्होंने जिस स्थान पर काटा है, वहां के आसपास का खून गाढ़ा होकर जम सा गया है, हमें कैसे भी करके उस स्थान के खून को बाहर निकालना होगा, नहीं तो शरीर का वह भाग काम करना बंद कर देगा।“ शैफाली ने सुयश को देखते हुए गंभीरता से कहा।

"पर अगर हम उस जगह को काटकर, वहां का खून बाहर निकालेंगे, तो वहां काफी बड़ा घाव हो जायेगा और ऐसी स्थिति में हमारा चलना भी मुश्किल हो जायेगा।" क्रिस्टी ने कहा।

बड़ी ही विकट स्थिति थी, अगर खून नहीं निकालते तो भी परेशानी थी और अगर खून निकालते तो भी।

“मेरे हिसाब से हमें समुद्र के किनारे-किनारे, कुछ आगे तक इसी हालत में बढ़ने की कोशिश करनी होगी, फिर जब ज्यादा मुश्किल होने लगेगी, फिर देखेंगे कि क्या करना है?” सुयश ने कहा- “और वैसे भी हमारे पास इस स्थान पर कुछ भी ऐसा नहीं है, जिससे हम अपने शरीर के उस भाग को काट सकें?"

सुयश की बात सुन सभी धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ने लगे। एक ओर समुद्र की तेज आवाज करती लहरें और दूसरी ओर भयावह जंगल, फिर भी सभी धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ते जा रहे थे।

“ये कैश्वर भी ना पूरा ड्रैक्यूला बन गया है, किसी ना किसी प्रकार से, हर द्वार में हम लोगों का खून पी रहा है।” क्रिस्टी ने गुस्साते हुए कहा।

क्रिस्टी की बात सुन एकाएक सुयश को झटका लगा।

“क्या हुआ कैप्टेन?” जेनिथ ने सुयश को हैरान होते देख पूछ लिया। पर सुयश ने इस समय जेनिथ की बात का जवाब नहीं दिया, अब वह तेजी से कुछ सोच रहा था।

“तुम लोग यहीं पर रुको, मैं अभी आया।” यह कहकर सुयश बिना किसी को कुछ बताये, जंगल के अंदर घुस गया।

"ये कैप्टेन बिना बताये कहां चले गये?” क्रिस्टी ने अजीब से भाव से देखते हुए कहा।

“मुझे लगता है कि अवश्य ही उन्हें कुछ याद आया है? इसलिये ही वह बिना बताये चले गये।” जेनिथ ने कहा- “हमें यहीं रुककर उनका इंतजार करना चाहिये।" यह कहकर तीनों वहीं जमीन पर बैठ गये, पर बैठते ही शैफाली व क्रिस्टी कराहकर उठ गये।

“क्या हुआ?” जेनिथ ने दोनों से पूछा।

“यहां जमीन पर रेत नहीं बल्कि नमक पड़ा है, जो कि शायद इस समुद्र के पानी से बना है, वही जब लाल पड़े शरीर पर लगा, तो तेज दर्द हुआ। इसीलिये हम उठकर खड़े हो गये थे।” क्रिस्टी ने कहा- “पर कोई परेशानी की बात नहीं है, हम लोग खड़े होकर ही कैप्टेन का इंतजार कर लेंगे।

क्रिस्टी की बात सुन जेनिथ को अच्छा महसूस नहीं हुआ, इसलिये वह भी उठकर, उन दोनों के पास खड़ी हो गई।

लगभग 10 मिनट के पश्चात् सुयश जंगल से बाहर आया। सुयश के हाथ में केले का एक बड़ा सा पत्ता था, जिस पर बहुत से काले रंग के जोंक चिपके हुए थे।

"क्या आप ये जोंक को लेने के लिये जंगल गये थे?" क्रिस्टी ने आश्चर्य से सुयश को देखते हुए कहा- “पर इसका हमारे पास क्या काम?"

"क्रिस्टी क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में बहुत से लोग 'आर्थराइटिस' का इलाज जोंक के द्वारा भी करते हैं। सुयश ने क्रिस्टी को समझाते हुए कहा। (आर्थराइटिसः एक प्रकार का रोग, जिसमें शरीर के किसी भी भाग में खून जम जाता है, इसे गठिया रोग भी कहते हैं)

“सॉरी कैप्टेन, मुझे इस बारे में कोई आइडिया नहीं है।" क्रिस्टी ने कहा।

“आर्थराइटिस रोग में जब खून एक स्थान पर जम जाता है, तो जोंक को उस स्थान से चिपका दिया जाता है। जोंक उस जगह के गंदे खून को जब पी लेता है, तो उसे हटा दिया जाता है। इस प्रकार से बिना किसी ऑपरेशन के ही आर्थराइटिस का इलाज किया जाता है।” सुयश ने क्रिस्टी को समझाते हुए कहा- “अब जब तुमने कैश्वर के खून पीने की बात कही तो मुझे एकाएक जोंक का ध्यान आ गया, जो हमारे शरीर के लाल पड़े भाग को सही कर सकता था। अब मुझे बस ये सोचना था कि जोंक मिल कहां सकता है। तभी मुझे याद आया कि जोंक हमेशा किसी रुके हुए पानी में मिलता है, बस उसी की खोज में मैं जंगल में चला गया था।"

यह कहकर सुयश ने एक जोंक को अपने पैर के उस स्थान पर चिपका दिया, जो कि कीड़े काटने की वजह से लाल पड़ गया था। सुयश को ऐसा करता देख शैफाली और क्रिस्टी ने भी जोंक को अपने शरीर पर चिपका लिया।

सुयश की तरकीब काम कर गई। अब बिना शरीर के उस भाग को काटे, शरीर का सारा विष भरा गंदा खून निकलता जा रहा था।

कुछ ही देर में जोंक ने पूरा गंदा खून समाप्त कर दिया। पर जैसे ही शरीर के उस भाग से गंदा खून समाप्त हुआ, क्रिस्टी के मुंह से चीख निकल गई।

“कैप्टेन, गंदा खून खत्म होने के बाद, यह जोंक अब हमारा साफ खून भी पीते जा रहे हैं।” क्रिस्टी ने चीखकर जोंक को हटाने की कोशिश की, पर क्रिस्टी का यह प्रयास बेकार हो गया, जोंक ने क्रिस्टी के शरीर को नहीं छोड़ा।

लेकिन इससे पहले कि सुयश क्रिस्टी को कुछ बता पाता, शैफाली ने जमीन पर पड़े नमक को उठाकर क्रिस्टी के शरीर पर मौजूद जोंक पर डाल दिया।

शैफाली के ऐसा करते ही जोंक ने मात्र 1 सेकेण्ड में ही क्रिस्टी का शरीर छोड़ दिया।

“नमक, जोंक का दुश्मन होता है, जोंक को हटाने के लिये नमक का इस्तेमाल करो क्रिस्टी।" शैफाली ने कहा।

शैफाली की बात सुन सुयश और क्रिस्टी ने भी अपने शरीर पर नमक को डालना शुरु कर दि या।

कुछ ही देर में सभी के शरीर से सारे जोंक हट गये थे। पर हटते-हटते भी जोंक शरीर के कुछ भागों पर घाव बना चुके थे और नमक की वजह से उन घावों पर तेज जलन हो रही थी।

किसी प्रकार से तीनों ने कुछ पत्ते तोड़कर, उससे अपने घावों को साफ कर लिया। पत्तों के साफ करने की वजह से घाव तो नहीं भरे, परंतु सभी अब आगे चलने लायक स्थिति में आ गये थे। सभी अब फिर से धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे।

तभी क्रिस्टी को समुद्र के किनारे एक जगह पर लगा हुआ बोर्ड दिखाई दिया- “द्वितीय विश्राम, तिलिस्मा 5.4, दूरी 20 किलोमीटर, उत्तर दिशा।

“यह क्या दूसरा कार्य तो आया ही नहीं?” क्रिस्टी ने कहा।

“अब कितने कार्य करोगी?" जेनिथ ने मुस्कुराते हुए कहा- “मीठे के बाद नमकीन क्षेत्र आना था, पर अभी जो तुमने समुद्र का नमक अपने शरीर पर लगाया, वही नमकीन स्वादेन्द्रिय थी। यानि की एक बाधा और पार हो चुकी है। अब स्वादेन्द्रिय में खट्टा और कड़वा स्वाद बचा है।"

"हे भगवान, अगर नमकीन स्वाद ऐसा था, तो कड़वा कैसा होगा?" क्रिस्टी ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा।

अब सभी फिर से आगे की ओर बढ़ चले। काफी देर तक चलते रहने के बाद बहुत दूर, जमीन पर कुछ बहुत बड़ी सी आकृतियां बनी दिखाई देने लगीं।

कुछ ही देर में वह सभी उन आकृतियों के पास पहुंच गये। सबसे आगे एक बड़ी सा नारंगी रंग का गोला था, फिर उसके बाद उससे कुछ छोटा, पीले रंग का गोला, फिर कई सारी लाल रंग की त्रिभुजाकार आकृति और फिर एक विशाल पेड़ था, जिसकी बहुत सी शाखाएं थीं।

"यह सब तो किसी ग्रह के समान दिख रहे हैं।' जेनिथ ने एक नारंगी रंग की गोल आकृति को देखते हुए कहा।

“यह ग्रह नहीं हैं, बल्कि फल और सब्जियां हैं।" शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा- “जिनमें विटामिन 'C' पाया जाता है। दोस्तों इस समय हम सभी किसी विशाल डाइनिंग टेबल पर हैं, जिस पर कुछ फल और सब्जियां रखीं हैं। जैसे कि यह नारंगी रंग का गोला संतरा है, उससे छोटा पीला गोला नींबू, उसके बाद कुछ स्ट्राबेरी रखीं हैं और फिर यह बड़ा सा दिखने वाला पेड़ असल में ब्रोकली है।"

"और यह बड़ा सा पीले रंग का पहाड़ और यह स्वीमिंग पूल क्या है?" जेनिथ ने आश्चर्य से चारो ओर देखते हुए पूछा।

“यह पीले रंग का पहाड़ किसी छिले हुए संतरे का छिलका है और यह स्वीमिंग पूल नहीं बल्कि संतरे के रस से भरा कटोरा है।” सुयश ने कहा।

“यह सब चीजें तो साधारण हैं, मतलब हमें किसी भी तरह से इस टेबल रुपी मुसीबत को पार करना होगा?" क्रिस्टी ने कहा।

तभी शैफाली जूस के कटोरे में अपने पैर लटका कर कुछ देखने लगी। शैफाली ने जब संतरे के जूस से अपना पैर बाहर निकाला, तो उसके पैर के सभी घाव भर चुके थे।

यह देख शैफाली ने खुश होते हुए सभी को आवाज लगाई- “सभी लोग यहां आकर संतरे के पानी से अपने घाव को साफ कर लो। संतरे के जूस में हीलींग पॉवर होती है और इससे त्वचा बहुत साफ और स्वस्थ हो जाती है।"

शैफाली की बात सुन क्रिस्टी व सुयश के साथ जेनिथ भी वहां आ पहुंची। संतरे के जूस से अपना शरीर साफ करते ही सभी के शरीर पर बने सारे घाव भर गये। अब सभी टेबल पर आगे की ओर बढ़ गये।

कुछ आगे बढ़ते ही सभी को एक तेज भिनभिनाहट की आवाज सुनाई दी। सभी यह तेज आवाज सुन घबराकर ऊपर की ओर देखने लगे।

“बाप रे, यह तो कोई मक्खी है, जो हमारी ओर ही आ रही है।” जेनिथ ने घबराकर कहा।

"हमारे नार्मल आकार में यह मक्खी थी, अभी तो हमारे लिये यह डाइनासोर की माँ है। हमें किसी भी हाल में इससे बचना होगा?” क्रिस्टी ने कहा।

“हमारे शरीर पूरी तरह से संतरे के जूस से भीगे हैं, इसी की खुशबू सूंघकर वह हमारी ओर आकर्षित हो रही है।” शैफाली ने कहा।

तभी उस मक्खी ने सुयश के ऊपर हमला कर दिया। सुयश ने झुककर किसी तरह से अपने को बचाया।
मक्खी सुयश के ऊपर से होती हुई आगे निकल गई, पर कुछ आगे जाते ही वह पलटी और फिर सुयश की ओर लपकी।

पर सुयश और मक्खी के बीच इस बार क्रिस्टी आ गई। क्रिस्टी ने अपना हाथ लहराते हुए मक्खी का ध्यान अपनी ओर लगाया।

“कैप्टेन, जब तक आप लोग इस मक्खी से निपटने का कोई उपाय सोचो, तब तक मैं इसे उलझाकर रखती हूं।” यह कह क्रिस्टी मक्खी की ओर दौड़ पड़ी।

क्रिस्टी को उल्टा अपनी ओर आते देख मक्खी टेबल पर एक स्थान पर रुक गई। क्रिस्टी मक्खी से कुछ दूरी पर रुक गई और मक्खी के अगले कदम का इंतजार करने लगी।

तभी मक्खी ने अपने आगे वाले दोनों हाथों को अच्छे से साफ किया और फिर क्रिस्टी की ओर एक उड़ान भरी।

क्रिस्टी ध्यान से मक्खी के उड़ने की गति देख रही थी। मक्खी जैसे ही आगे को आई, क्रिस्टी अपनी जगह पर हवा में उछली।

मक्खी क्रिस्टी के नीचे से होती हुई आगे निकल गई। यह वार भी खाली जाते देख मक्खी को इस बार गुस्सा आ गया।

अब वह पलटकर बिजली की तेजी से क्रिस्टी की ओर लपकी। मक्खी को लग रहा था कि क्रिस्टी फिर उछलेगी, इसलिये क्रिस्टी के पास पहुंचते ही मक्खी ने थोड़ा ऊपर से उड़ान भरी।

पर इस बार क्रिस्टी ने अपने घुटनों को मोड़ते हुए, फिसलकर अपना बचाव किया।

अब मक्खी समझ गई थी कि क्रिस्टी से लड़ने की जगह, किसी और शिकार पर ध्यान दे तो ज्यादा अच्छा रहेगा।

यह सोच इस बार वह शैफाली की ओर लपकी, पर शैफाली पहले से ही मक्खी के लिये तैयार थी। जैसे ही मक्खी पास आयी, शैफाली ने संतरे के छिलके को उस मक्खी की आँख में निचोड़ दिया।

संतरे के छिलके का रस सीधा मक्खी के आँख पर पड़ा और वह लहराकर टेबल से दूर जा गिरी।
मक्खी को नीचे गिरता देख अब सभी ने राहत की साँस ली।

सभी अब एक बार फिर से टेबल पर आगे की ओर बढ़ चले। नींबू और स्ट्राबेरी को पार करने के बाद सभी अब ब्रोकली के पेड़ के पास पहुंच गये।

तभी जेनिथ का पैर किसी चीज में उलझा और वह पेड़ के पास नीचे गिर गई। जेनिथ की नजर नीचे की ओर गई। जेनिथ का पैर एक मकड़ी के जाले में उलझा था।

तभी जाने कहां से एक विशाल मकड़ी प्रकट हुई और उसने जेनिथ के चारो ओर जाल बनाना शुरु कर दिया।

"हे भगवान, एक मुसीबत गई नहीं कि दूसरी आ गई।” क्रिस्टी ने कहा- “अब इस मुसीबत से कैसे निपटा जाये?" मकड़ी अब पूरी तरह से जेनिथ को अपने जाल में लपेट चुकी थी।

तभी सुयश की नजर टेबल पर रखे एक प्लास्टिक के चिमटे पर गई। सुयश के हिसाब से चिमटा काफी बड़ा था।

तब तक मकड़ी ने जेनिथ के एक पैर में अपना डंक चुभो दिया। डंक का वार इतना खतरनाक था, कि जेनिथ के मुंह से तेज चीख निकल गई।

"क्रिस्टी, इस चिमटे के निचले भाग पर संतरे के छिलके का रस लगाओ....जल्दी करो।” सुयश ने क्रिस्टी से चिल्लाकर कहा।

क्रिस्टी की समझ में नहीं आया कि सुयश आखिर करना क्या चाहता है? पर उसने सुयश की बात मान तेजी से चिमटे के अंदर की ओर संतरे के छिलके का रस डालना शुरु कर दिया था।

अब चिमटे पर काफी ज्यादा रस लग चुका था। यह देख सुयश, मकड़ी के जाल के पास आ गया और अपने मुंह से तेज आवाज निकाल कर, मकड़ी का ध्यान अपनी ओर खींचने लगा।

सुयश को पता था कि मकड़ी की आदत, पहले ज्यादा से ज्यादा खाना अपने पास इकठ्ठा करने की होती है और ऐसी स्थिति में मकड़ी अपने जाल में फंसे शिकार को सबसे आखिर में खाती है।

सुयश का सोचना बिल्कुल सही सिद्ध हुआ। मकड़ी अब जेनिथ को छोड़ सुयश की ओर बढ़ने लगी।
मकड़ी अब सुयश के पास आ पहुंची थी। मकड़ी को देख सुयश चिमटे के अंदर की ओर आ गया।

मकड़ी भी आगे बढ़ी, तभी सुयश ने अपना हाथ चिमटे के उस जगह पर रखा, जिधर क्रिस्टी ने छिलके का रस डाला था।

सुयश ने जल्दी-जल्दी अपना हाथ 3-4 बार उस चिमटे पर रखकर उठाया। अब सुयश के हाथ और उस चिमटे के बीच बहुत सारा मकड़ी के जाल जैसा दिखाई देने लगा।

सुयश ने इस जाल को अब चारो ओर फैलाना शुरु कर दिया।

अब मकड़ी जैसे ही सुयश के पास पहुंची, वह सुयश के बनाये जाल में फंस गई। सबको अपने जाल में फंसाने वाली मकड़ी आज संतरे के छिलके के रस से बने जाल में फंस गई थी।

अब मकड़ी उससे जितना छूटने की कोशिश कर रही थी, उतना ही वो ज्यादा उसमें फंसती जा रही थी।
कुछ देर में मकड़ी, पूरी की पूरी जाल में फंसकर मिश्र की ममी नजर आने लगी।

यह देख सुयश सहित सभी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। कुछ ही देर में ब्रोकली की एक डंडी की मदद से जेनिथ को भी मकड़ी के जाले से छुड़ा लिया।

“कैप्टेन, आपने संतरे के छिलके के रस से वह जाल कैसे बनाया?" जेनिथ ने पूछा।

“पहले मुझे यह बताओ कि मकड़ी अपने जाल में स्वयं क्यों नहीं फंसती?” सुयश ने उल्टा जेनिथ से ही सवाल कर लिया।

जेनिथ के बोलने के पहले ही शैफाली बोल उठी “मकड़ी अपने शरीर से गाढ़ा चिपचिपा पदार्थ निकालती है, जो हवा के संपर्क में आते ही सूख जाता है। मकड़ी जाल पर चलते समय कभी भी अपना शरीर जाल पर नहीं रखती। वो ऐसा इसलिये करती है क्यों कि अगर उसने अपना शरीर जाल पर रखा, तो वह स्वयं उस जाल में चिपक जायेगी। इसलिये मकड़ी अपने पैर के द्वारा अपने जाल पर चलती है। मकड़ी के पैर में बहुत सारे अलग प्रकार के बाल पाये जाते हैं, जो उसे अपने जाल में चिपकने से बचाते हैं।

“बिल्कुल ठीक।” सुयश ने शैफाली की तारीफ करते हुए कहा- “मैं भी यही बात सोच रहा था कि तभी मुझे मेरे बचपन का एक खेल याद आ गया, जो हम स्कूल में करते थे। स्कूल में हम ऐसे ही संतरे के छिलके के रस को, अपने हाथ पर लगाकर प्लास्टिक की स्केल से जाले बनाते थे। अब इस क्रिया का वैज्ञानिक कारण तो मुझे भी नहीं पता, पर जैसे ही मुझे यह क्रिया याद आई, मेरे दिमाग में ये ख्याल आया कि मकड़ी को भी उस जाल में फंसाया जा सकता है। बस मैंने वैसे ही किया और तुम लोगों ने देखा कि मेरा प्रयोग सफल रहा।

“सही कहा आपने कैप्टेन, एक बार फिर आपने मुझे बचा लिया।” जेनिथ ने सुयश को धन्यवाद देते हुए कहा - “अब हमें तुरंत आगे बढ़ जाना चाहिये कैप्टेन। नहीं तो यहां पर फिर कोई मुसीबत आ जायेगी?"

जेनिथ की बात एकदम सही थी, इसलिये सभी उस स्थान से आगे की ओर बढ़ गये।

जारी रहेगा_____✍️
Nice update....
 
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