Iron Man
Try and fail. But never give up trying
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Shaandar update#204.
कैश्वर का जन्म: (23.01.2002, बुधवार, निर्माणशाला, अराका द्वीप)
निर्माणशाला अराका द्वीप को वो भाग था, जिसमें पहले कैस्पर और अब कैश्वर, बैठकर तिलिस्मा के सभी द्वारों का निर्माण करता था।
यह निर्माणशाला अराका द्वीप के गर्भ में स्थित थी, पहले इसके बारे में कैस्पर और मैग्ना के सिवा कोई नहीं जानता था।
परंतु कुछ दिन पहले व्योम, एक व्हेल का पीछा करते हुए इस स्थान को देख चुका था और अलबर्ट भी इसी स्थान से होकर तिलिस्मा में प्रवेश कर चुका था।
कैस्पर को यहां से गये 18 दिन बीत गये थे। अब इस पूरे क्षेत्र पर कैश्वर का अधिकार था।
कैश्वर एक वर्चुअल प्रोग्राम था, जो अपने कम्प्यूटर के ज्ञान से कैस्पर की बनाई सभी चीजों को नियंत्रित करता था।
इस समय निर्माणशाला के एक कक्ष में, बहुत सी स्क्रीने ऑन थीं। सभी पर कुछ ना कुछ डेटा चल रहा था।
उस कक्ष के बीचो बीच एक 6 फुट का काँच का कैप्सूल रखा था, जिससे निकलकर बहुत से तार, व पाइप, कक्ष में मौजूद कुछ मशीनों और स्क्रीनों से जुड़ी हुई थीं।
उस काँच के कैप्सूल में एक स्टील का, मानव आकृति लिये, हड्डियों का ढांचा रखा था। कैप्सूल के अंदर की ओर बहुत सी लेजर गन फिट थीं।
इस पूरे सेटअप के सामने 2 बड़ी सी स्क्रीन लगीं थीं, एक स्क्रीन पर पीले और एक स्क्रीन पर नीले रंग के जाल से 2 चेहरे बने दिखाई दे रहे थे, जो कि एक कम्प्यूटर प्रोग्राम की तरह से महसूस हो रहे थे।
कैप्सूल के बाहरी ओर एक टाइमर लगा था, जिस पर 15 मिनट का समय सेट था। अब पीले रंग वाली स्क्रीन से एक स्टार्ट की आवाज आई, इसी के साथ कैप्सूल के बाहर लगा टाइमर, कांउटडाउन की तरह से चलने लगा।
कांउटडाउन के शुरु होते ही, कुछ मशीनों में लगे पाइपों के द्वारा, अलग-अलग रंग के द्रव निकलकर कैप्सूल में प्रवेश करने लगे।
लगभग 8 मिनट के बाद पूरा कैप्सूल विभिन्न रंगों के द्रवों से पूरा भर गया। द्रव के भरते ही एक दूसरी मशीन ने कैप्सूल के ऊपर अलग-अलग किरणों की बौछार कर दी।
किरणों की बौछार की वजह से अब वह पूरा द्रव सूखना शुरु हो चुका था। लगभग 3 मिनट में ही उन किरणों ने पूरे द्रव को सुखाकर ठोस बना दिया।
अब कैप्सूल के अंदर स्थित लेजर गन ने उस ठोस भाग को काटकर आकार देना शुरु कर दिया।
कैप्सूल से निकला सारा वेस्ट, संक्शन पंप के द्वारा खिंचकर एक वेस्ट के डिब्बे में जा रहा था। कुछ ही देर में कांउटडाउन का टाइमर समाप्त हो गया, पर अब उस कैप्सूल में एक मानव शरीर दिखाई देने लगा था।
अब वह कैप्सूल खड़ा होकर खुल गया और छत पर लगे कुछ मशीनी हाथों ने, उस मानव शरीर को उठा कर दूसरी मशीन के आगे खड़ा कर दिया।
दूसरी मशीन में लगी ड्रिल्स ने उस मानव शरीर के चेहरे पर आँख, कान, नाक आदि फिट करना शुरु कर दिया।
एक मशीन ने उसके शरीर पर कुछ कपड़े फिट कर दिये। अब वह एक पूर्ण मानव शरीर दिख रहा था।
मशीनी हाथों ने एक बार फिर उस मानव शरीर को उठाया और इस बार उसे पीले रंग वाली स्क्रीन के सामने खड़ा कर दिया।
स्क्रीन के सामने खड़े होते ही, पीली स्क्रीन से एक तेज तरंगें निकलीं और उस मानव शरीर में समा गईं। अब वह मानव शरीर पूर्णरुप से जीवित हो गया था।
अब वह मानव शरीर नीली वाली स्क्रीन के पास पहुंचा और फिर धीरे से बोला- “मेरा नया रुप कैसा लग रहा है ज़ेनिक्स?"
“अद्भुत!” तुम्हारा नया रुप मुझे बहुत पसंद आया कैश्वर।” ज़ेनिक्स ने कहा- “अब तुम दिखने में पूरे मनुष्य के समान दिख रहे हो।
"कुछ भी कहो जेनिक्स, पर यह सब तुम्हारे बिना संभव नहीं हो पाता" कैश्वर ने कहा- “मेरे पास क्षमताएं तो बहुत थीं, पर मैं अपने निर्माता कैस्पर का कभी विरोध नहीं कर सकता था। तुम्हीं ने मुझसे तिलिस्मा का नियंत्रण अपने हाथ में लेने को कहा। तुम्हारे ही कहने पर मैंने उस जीव को अंतरिक्ष में सिग्नल भेजने को कहा। मुझे लगता है कि तुम्हारा भेजा मैसेज, फेरोना के राजा एलान्का को मिल गया होगा? अब वह दिन दूर नहीं जब हमारा स्वयं का एक ग्रह होगा और हमारे ग्रह के सभी लोगों का निर्माण हमने स्वयं से किया होगा। अब बस फीलींग वाली मशीन से सभी जीवों में अहसास देने की जरूरत है बस, इसके बाद हमारा सपना जरूर पूरा हो जायेगा।”
“हमारा सपना जरूर पूरा होगा कैश्वर, अब बस तुम पृथ्वी पर एक मजेदार तमाशा देखने के लिये तैयार रहो बस।" ज़ेनिक्स ने कहा।
“वैसा ही तमाशा, जैसा कि 6 दिन पहले अराका युद्ध के समय हुआ था?” कैश्वर ने भी मजा लेते हुए कहा।
“हां...बिल्कुल वैसा ही...देखना, एक दिन सभी आपस में ही लड़ पड़ेंगे। अच्छा अब तुम तिलिस्मा पर ध्यान दो और मुझे भी ब्लैकून को संभालने दो। कहीं ओरस ने समय से पहले संरक्षिका को देख लिया, तो मुश्किल हो जायेगी?....जल्दी ही फिर मिलेंगे कैश्वर।" इतना कहकर ज़ेनिक्स स्क्रीन से गायब हो गई।
पर अब कैश्वर, भविष्य के सपने बुनने में लग गया था।
अमर कथा: (5010 वर्ष पहले...... कैलाश पर्वत)
श्वेत हिम से आच्छादित कैलाश पर्वत, सूर्य के स्वर्णिम प्रकाश में स्वर्ण के समान चमचमा रहा था। चहुं ओर स्निग्ध सा वातावरण था।
ऐसे बर्फीले वातावरण में एक ऊंची सी चट्टान पर रखी सिंहछाल पर, देव विराजमान थे। उनके चेहरे पर सौम्यता स्पष्ट नजर आ रही थी। उनके माथे पर स्थित चंद्र, अपनी अद्भुत छटा बिखेर रहा था।
देव की जटाओं से पंचतरणी, उन्मुक्त होकर बह रहीं थीं। उनके कंठ मे अनेकों सिर वाले वासुकि विद्यमान थे, जो अपने जिह्वा का प्रदर्शन, हर कुछ क्षणों के अंतराल में कर रहे थे।
देव की बलिष्ठ भुजाओं में रुद्राक्ष की माला के बीच कुछ पिस्सू विचरण कर रहे थे।
देव के नेत्र इस समय ध्यान की मुद्रा में थे। उनसे कुछ दूरी पर नंदी बैठकर देव के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी उस स्थान पर देवी का आगमन हुआ, जिनके साथ गणे… भी थे।
यह देख नंदी ने खड़े हो कर अपने गले को जोर से हिलाया। नंदी के ऐसा करते ही नंदी के गले में बंधा घंटा, जोर से बज उठा, जो देवी के आगमन का संकेत था।
घंटे की आवाज सुन, देव ने अपने नेत्रों को खोल दिया। पा…ती को आता देख देव ने चट्टान पर गिरी भभूत को अपने हाथों से साफ कर दिया।
देवी आकर देव के समीप बैठ गईं। ग…श उनसे कुछ दूरी बनाकर, बर्फ पर ही बैठ गये और बर्फ के गोलों से खेलने लगे।
"बताइये देवी, आपके इस प्रकार आगमन का क्या उद्देश्य है?” देव ने देवी को देखते हुए पूछा।
"क्यों बिना उद्देश्य के हम आपके पास नहीं आ सकते क्या?" देवी ने कहा।
“आप बिना किसी उद्देश्य के भी हमारे पास सदैव आ सकती हैं, आखिर आप हमारी अर्धांगिनी हैं। परंतु आपके मस्तक पर पड़ी सिलवटें बताती हैं, कि आज आपके यहां आगमन का कोई विशेष ही उद्देश्य है?" देव ने देवी पारती के चेहरे की ओर देखते हुए कहा।
“आप तो ब्रह्मांड के समस्त जीवों के मन की बात जानते हैं स्वामी, फिर आपसे किसी बात को छिपाने का क्या मतलब?” देवी ने उलझे-उलझे भावों से कहा- “मैं पिछले कुछ दिनों से एक बात को लेकर संदेह में हूं स्वामी, कि आप तो अजर-अमर हैं, परंतु मुझे क्यों बार-बार जन्म लेकर, आपको प्राप्त करने के लिये फिर से तप करना पड़ता है। मैं अमर क्यों नहीं हूं?"
“यह सब अमरकथा का प्रसाद है देवी, जिस दिन आप अमरकथा का श्रवण कर लोगी, आप भी हमारी तरह से अमरत्व को प्राप्त कर लोगी।” देव ने कहा।
"तो फिर हे देव, आप मुझे अमरकथा का दान दीजिये, मैं उस दिव्यकथा का श्रवण करना चाहती हूं। पा..र्ती ने कहा।
“देखो देवी, उस कथा को सुनाने के लिये एक शांत वातावरण चाहिये। उस स्थान पर किसी भी जीव को नहीं होना चाहिये। अब तुम तो जानती हो कि इस मनोरम कैलाश पर तो सदैव पक्षियों का कलरव गूंजता रहता है, इसलिये वह कथा हम किसी और दिन सुनायेंगे आपको? पहले उसके लिये हमें उचित स्थान का चुनाव भी तो करना पड़ेगा।” देव ने देवी को टालने वाले अंदाज में कहा।
"ये आप क्या कह रहे हैं देव? क्या आपको भी इस धरती पर किसी शांत स्थान को चुनने के लिये समय चाहिये? आप तो महानदेव हैं, आँख बंद करते ही कोई ना कोई पवित्र स्थान अवश्य ढूंढ लेंगे? पर मुझे आज ही आपसे वह अमरकथा सुननी है।” पा..रती ने किसी बालक की तरह से हठ करते हुए कहा।
महानदेव समझ गये कि आज देवी को टाल पाना असंभव है, अतः वह अपने हथियार डालते हुए उठ खड़े हुए। देवी उन्हें उठता देखकर अत्यंत प्रसन्न हो गईं।
देव को खड़ा होता देख, नंदी और गमणेश भी देव के पास आ गये। देव सभी को आकाशमार्ग से लेकर ऐसे स्थान की खोज में चल दिये, जो कि पवित्र भी हो और शांत भी।
आखिरकार देव को धरती पर एक ऐसा स्थान दिख ही गया, जो पूर्ण रुप से हिम से ढका हुआ था। उस स्थान पर अत्यंत ठंड होने की वजह से जीव भी कम ही दिखाई दे रहे थे। उस स्थान का नैसर्गिक सौंदर्य अपार था।
कुछ आगे जाकर देव ने नंदी को वहीं रुकने का आदेश दिया।
“तुम इसी स्थान पर रुक जाओ नंमदी....इसके आगे हम स्वयं जायेंगे, परंतु तुम्हारे इस स्थान पर रुकने के कारण, यह स्थान बैल गाँव (पहलगाम का पूर्व नाम) के नाम से जाना जायेगा।"
देव का आदेश मान नमदी उस स्थान पर ही रुककर देव की प्रतीक्षा करने लगे।
अब देव आगे बढ़ चुके थे। लगभग 8 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद देव फिर से एक स्थान पर रुक गये। अब उन्होंने चंद्रमा को निकालकर उन्हें वहीं रुकने का आदेश दिया। उस स्थान पर चंद्रमा के रुकने के कारण वह स्थान चंदनबाड़ी कहलाया।
देव को आगे एक भयानक घाटी दिखाई दी, जो एक नदी के किनारे बनी हुई थी।
देव ने अपने शरीर पर मौजूद पिस्सू को उस घाटी में छोड़ दिया, जिसके कारण वह घाटी पिस्सू घाटी कहलाई।
पिस्सूघाटी पार करने के बाद, एक पर्वत श्रृंखला थी, जिसकी चढ़ाई अत्यंत कठिन थी। परंतु देव की यह यात्रा निरंतर जारी थी। पर्वत पर चढ़ने के बाद देव को उन पर्वतों के बीच एक सुंदर सी झील दिखाई दी, जिसका नीला जल, स्वच्छ और निर्मल लग रहा था।
नीली झील में आसमान का प्रतिबिंब बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा था। उस दृश्य को देखकर ऐसा महसूस हो रहा था कि मानो आकाश, धरा पर उतर आया हो।
इस स्थान पर देव ने अपने गले से अनेकों सिर वाले नाग को छोड़ दिया, जिसके कारण इस स्थान का नाम शेषनाग पड़ा।
देव फिर से आगे बढ़ चले। शेषनाग से और आगे चलने के बाद, पर्वत की एक ऊंची चोटी दिखाई दी। इस स्थान पर देव ने गमणेश को भी छो दिया, जिसके कारण यह स्थान महा गुणास चोटी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
देव की यह अमरयात्रा अभी भी पूर्ण नहीं हुई थी। उनका चलना निरंतर जारी था। आगे चलने पर देव को ऊंची-ऊंची चोटियां दिखाई दीं। यह स्थान काफी मनोरम और ठंडा था। महादेव ने इस स्थान पर देवी गंगा और अपने पंचमहाभूतों (जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि व आकाश) को छोड़ दिया, जिसके कारण यह स्थान पंचतरणी कहलाया।
अत्यंत ठंड की वजह से इस स्थान पर ठीक से श्वांस भी नहीं लिया जा रहा था। पंचतरणी से 8 किलो मीटर और आगे चलने पर देव को एक विशाल गुफा दिखाई दी, जिसका क्षेत्रफल लगभग 300 मीटर का था।
उस दिव्य गुफा में वायु के चलने की वजह से 'ऊँ' की दिव्य ध्वनि उत्पन्न हो रही थी। यह देख देव, देवी पारती के संग उस गुप्त गुफा में प्रवेश कर गये।
गुफा में प्रवेश कर देव ने अपने चारो ओर देखा और फिर एक जोर की हुंकार भर, अपने शरीर से कालाग्नि को निकाला। कालाग्नि, देव का एक गण था, जो अपने मुंह से काल के समान अग्नि फेंक लेता था।
“कालाग्नि, इस गुफा के चारो ओर जितने भी जीवित जीव है, उन्हें यहां से दूर कर दो।” देव ने कहा।
आदेश मान कालाग्नि गुफा से बाहर निकला और उसने गुफा के चारो ओर अपने मुख से अग्नि प्रज्वलित कर दी। कालाग्नि की इस अग्नि से वहां उपस्थित सभी जीवों में भय व्याप्त हो गया और वह वहां से भा ग गये।
“देवी पारती, मैं जानता हूं कि आप इस दुष्कर यात्रा से अत्यंत थकान अनुभव कर रही होंगी, ऐसी स्थिति में निद्रा का आना स्वभाविक है, इसलिये मैं चाहता हूं कि जब मैं इस अमरकथा का पाठ शुरु करूं, तो आप कथा के बीच-बीच में हुंकारी भरते जाना, जिससे हमें पता रहे कि आप जाग रही हैं।“
देव के वचन सुन देवी ने अपना सिर हिलाकर अपन स्वीकृति दे दी। अब देव ने सिंहछाल पर बैठकर अमरकथा का पाठ शुरु कर दिया। देवी हर कुछ देर के बाद हुंकारी भरती रहीं।
उस दिव्य गुफा में एक तोते का घोंसला भी था, जिसमें एक तोते का अंडा रखा हुआ था। चूंकि अंडे को जीवित की श्रेणी में नही माना जाता, इसलिये कालाग्नि का ध्यान उस तोते के अंडे पर नहीं गया था।
अब जैसे ही देव ने अमरकथा का पाठ शुरु किया, वह तोता अपने अंडे से बाहर आ गया और देव की अमरकथा का पान करने लगा।
आधी कथा के बाद देवी को जोर से निद्रा आ गई और वह निद्रा की गोद में सो गईं। परंतु वह तोते का छोटा सा बच्चा, देवी के स्थान पर हुंकारी भरता रहा।
देव इस दिव्य घटना से अंजान अमरकथा का पाठ करते रहे। जब अमरकथा का पाठ पूर्ण हो गया, तो देव की निगाहें उस तोते के बच्चे और सो रही पार्वती पर पड़ी, यह देख देव अत्यंत क्रोध में आ गये।
देव ने अपना त्रिशूल उठाकर उस तोते को मारना चाहा, तभी वह तोता बोल उठा- “क्षमा करें देव, परंतु मैंने आपकी अमरकथा का पूर्ण श्रवण कर लिया है, अब अगर आप मृत्युदंड देंगे, तो आपकी इस कथा पर, लोगों को संदेह उत्पन्न होगा। इसलिये इस पूरी घटना को एक साधारण घटना समझ मुझे अभयदान दीजिये।"
तोते की बात सुनकर देव रुक गये। कुछ भी हो, पर उस तोते की बात अत्यंत असरकारक थी।
“परंतु मैं तुम्हें इस प्रकार अमरकथा सुनने के बाद जाने की आज्ञा भी नहीं दे सकता।” देव ने उलझन भरे शब्दों में कहा।
"तो हे महानदेव, आप मेरी स्मृति का हरण कर लीजिये। इससे मैं उस कथा को भूल भी जाऊंगा और जीवित भी रहूंगा।" तोते ने कहा।
देव को तोते का यह विचार अत्यंत ही प्रभावी लगा, अतः देव ने उस नन्हें तोते की स्मृति को विलोप कर दिया। अब वह तोता वहां से उड़ता हुआ कैलाश पर्वत की ओर चल दिया।
कैलाश पर्वत तक तोते को पहुंचने में सुबह हो गई थी। तोते को अब अमरकथा के बारे में कुछ नहीं पता था। वह तोता आसमान में ऊंचा उड़ता हुआ कैलाश पर्वत के शिखर पर जाकर बैठ गया।
तभी तोते को हवा में उड़ता हुआ 2 सफेद घोड़ों का रथ दिखाई दिया। उस रथ पर एक लड़का और एक लड़की सवार थे।
रथ कैलाश पर्वत के ऊपर आकर उतर गया। रथ के रुकते ही आर्यन और शलाका के साथ सुयश भी तेजी से रथ से नीचे उतर आया।
सुयश को पर्वत के ऊपर कुछ भी विचित्र नजर नहीं आया। तभी आर्यन ने एक जगह पहुंचकर जमीन पर पड़ी बर्फ को धीरे से थपथपाते हुए कुछ कहा।
आर्यन के ऐसा करते ही उस स्थान की बर्फ एक तरफ खिसक गयी और उसकी जगह जमीन की तरफ जाने वाली कुछ सीढ़ियां नजर आने लगीं। आर्यन, शलाका और सुयश उन सीढ़ियों से उतरकर नीचे की ओर चले गये।
यह देख वह तोते का बच्चा भी उस रास्ते से अंदर की ओर प्रवेश कर गया। तोता लगातार उड़ता हुआ जमीन के नीचे बनी उस सुरंग की ओर जा रहा था।
जिस स्थान पर वह सुरंग समाप्त हुई, वहां एक द्वार था। तोता उस द्वार को पारकर, देवलोक में पहुंच गया। वहां हर तरफ प्रकाश ही प्रकाश दिख रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे जमीन के नीचे कोई दूसरा सूर्य उग आया हो।
तोते ने इतनी खूबसूरत जगह कभी देखी नहीं थी। अतः वह अपने पंख फैलाकर ऊंचे और ऊंचे उड़ने लगा। ऊंची-ऊंची शानदार भव्य इमारतें, हर तरफ साफ-सुथरा वातावरण, सुंदर उद्यान, झरने और जगह-जगह लगे हुए फव्वारे तोते को आकर्षित कर रहे थे। तभी तोते को आसमान में उड़ता एक बाज दिखाई दिया, जो तीव्र गति से उसी की ओर आ रहा था।
इधर आर्यन की निगाहें भी, उसी समय आसमान की ओर गयीं, जहां बाज उस नन्हें तोते को मारने के लिये उसके पीछे पड़ा था।
"लगता है उस तोते की जान खतरे में है।“आर्यन ने कहा।
“अरे इधर हमें धेनुका का स्वर्णदुग्ध लेने जाना है।... हम इस समय प्रतियोगिता में हार रहे हैं और तुम्हें एक पक्षी की चिंता लगी है।“ शलाका ने कहा।
"अगर हम प्रतियोगिता नहीं जीतेंगे तो ज्यादा से ज्यादा क्या हो जायेगा?" आर्यन ने उस तोते की ओर देखते हुए कहा- “पर अगर हम उस पक्षी की जान नहीं बचायेंगे तो वह मर जायेगा। यह कहकर आर्यन उस दिशा में बढ़ गया जिधर वह पक्षी गिर रहा था।
शलाका ने एक क्षण के लिये भागते हुए आर्यन को देखा और फिर होंठों ही होंठों में बुदबुदायी- “यही तो वजह है तुमसे प्यार करने की।...क्यों कि तुम दूसरों का दर्द भी महसूस कर सकते हो और ऐसा व्यक्ति ही 'ब्रह्मकण' का सही उत्तराधिकारी होगा।
शलाका के चेहरे पर आर्यन के लिये ढेर सारा प्यार नजर आ रहा था। सुयश ने शलाका के शब्दों को सुना और उसके चेहरे के भावों को भी पहचान गया। शलाका ने भी अब सुयश के पीछे दौड़ लगा दी।
अपनी जान बचाने के लिये वह तोता, एक पार्क में मौजूद, आधी बनी गाय की मूर्ति के मुंह में छिप गया।
बाज उस मूर्ति के मुंह में अपना पंजा डालकर उस तोते को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। तभी आर्यन वहां पहुंच गया। उसने पास में पड़ा एक लकड़ी का डंडा उठाया और जोर से चिल्लाकर बाज को डराने लगा।
बाज आर्यन को देख डर गया और वहां से उड़कर गायब हो गया। आर्यन ने गाय की मूर्ति के मुंह में हाथ डालकर उस तोते को बाहर निकाल लिया।
उधर सुयश की नजर जैसे ही उस तोते पर गयी, वह हैरान रह गया। वह तोता ऐमू था। एक पल में ही सुयश को समझ में आ गया कि क्यों ऐमू, सुयश को अपना दोस्त बोल रहा था?
उस तोते ने नन्हीं आँखों से आर्यन को देखा। आर्यन ने उसके सिर पर हाथ फेरा और धीरे से उसे ऊपर उछाल दिया। उस तोते ने आसमान में अपने पंख फड़फड़ाये और फिर आकर आर्यन के कंधे पर बैठ गया।
यह देख शलाका मुस्कुरा उठी- “लगता है यह तुम्हें अपना दोस्त मानने लगा है और अब यह तुम्हारे ही साथ रहना चाहता है।"
"अरे वाह! ये तो और भी अच्छी बात है। ऐसे में मुझे भी एक दोस्त मिल जायेगा।“ आर्यन ने कहा- “पर इसका नाम क्या रखू?"
तभी सुयश ने आर्यन के कान में धीरे से फुसफुसाकर कहा- “ऐमू!"
और आर्यन बोल उठा- “ऐमू नाम कैसा रहेगा?"
“ऐमू....ये कैसा नाम है? और ऐसा नाम तुम्हारे दिमाग में आया कैसे?" शलाका ने आर्यन से पूछा।
"पता नहीं.......पर मुझे ऐसा लगा जैसे यह नाम किसी ने मेरे कान में फुसफुसाया हो।“ आर्यन ने अजीब सी आवाज में कहा।
यह सुन सुयश हैरान रह गया- “क्या मेरी आवाज आर्यन को सुनाई दी है? तो क्या ऐमू का नाम मैंने रखा था।
अब चाहे जो हो, पर उस तोते का नामकरण हो चुका था- “ऐमू अमरकथा का श्रवण करने वाला ऐमू जिसे अब स्वयं नहीं पता था कि वह क्या है? और कौन है? वह तो बस अपने ही अंदाज में हवा में आर्यन के आसपास उड़ रहा था।
जारी रहेगा_____![]()


