• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Romance फ़िर से [चित्रमय]

avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
4,591
25,056
189
दोस्तों - इस अपडेट सूची को स्टिकी पोस्ट बना रहा हूँ!
लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि केवल पढ़ कर निकल लें। यह केवल आपकी सुविधा के लिए है। चर्चा बंद नहीं होनी चाहिए :)

अपडेट 1; अपडेट 2; अपडेट 3; अपडेट 4; अपडेट 5; अपडेट 6; अपडेट 7; अपडेट 8; अपडेट 9; अपडेट 10; अपडेट 11; अपडेट 12; अपडेट 13; अपडेट 14; अपडेट 15; अपडेट 16; अपडेट 17; अपडेट 18; अपडेट 19; अपडेट 20; अपडेट 21; अपडेट 22; अपडेट 23; अपडेट 24; अपडेट 25; अपडेट 26; अपडेट 27; अपडेट 28; अपडेट 29; अपडेट 30; अपडेट 31; अपडेट 32; अपडेट 33; अपडेट 34; अपडेट 35; अपडेट 36; अपडेट 37; अपडेट 38; अपडेट 39; अपडेट 40; अपडेट 41; अपडेट 42; अपडेट 43; अपडेट 44; अपडेट 45; अपडेट 46; अपडेट 47; अपडेट 48; अपडेट 49; अपडेट 50; अपडेट 51; अपडेट 52; अपडेट 53; अपडेट 54; अपडेट 55; अपडेट 56; अपडेट 57; अपडेट 58; अपडेट 59; अपडेट 60; अपडेट 61; अपडेट 62; अपडेट 63; अपडेट 64; अपडेट 65; अपडेट 66; अपडेट 67; अपडेट 68; अपडेट 69; अपडेट 70; अपडेट 71; अपडेट 72; अपडेट 73; अपडेट 74; अपडेट 75; अपडेट 76; अपडेट 77; अपडेट 78; अपडेट 79; अपडेट 80; अपडेट 81; अपडेट 82; अपडेट 83; अपडेट 84;
 
Last edited:

avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
4,591
25,056
189
फोरम पर उपस्थित मेरे सभी पाठकों को नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं। मेरी सभी को यही शुभकामनाएं हैं कि सभी मित्र अपने अपने साथियों के साथ रोमांटिक जीवन जीएं या फिर जीना शुरू करें

grok-image-xlzcpat

रही बात कहानी की - तो जल्दी ही कहानी "फ़िर से" शुरू होगी 😊
 

KinkyGeneral

Member
348
659
108
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामाएं, भैया।🌸
 
  • Love
Reactions: avsji

avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
4,591
25,056
189
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामाएं, भैया।🌸

आपको और आपके परिवार को भी नए साल की शुभकामनाएं मेरे भाई ❤️
 

avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
4,591
25,056
189
अपडेट 78


जब से रूचि के ब्रेन ट्यूमर और ऑपरेशन की बात सामने आई थी, तब से दोनों घरों में सभी का मूड ऑफ हो गया था। समय तो ऐसा लग रहा था कि वो जैसे ठहर सा गया हो। घड़ी की सुईयाँ गतिमान रहतीं, लेकिन सबके दिलों के भीतर की भावनाएँ ठहरी रहतीं - बातचीत होती थी, योजनाएँ बनती थीं, डॉक्टरों के नाम लिए जाते थे… लेकिन हर बात - हर वाक्य के पीछे एक ही मौन डर छुपा रहता - अगर नहीं बची तो? हर क्षण में यह डर की तलवार सभी के ऊपर लटकती रहती थी!

अंदर ही अंदर सभी घबराए हुए थे - अपने किसी स्वजन के साथ ऐसा कुछ हो जाए, तो घर में सभी का दिल बैठना स्वाभाविक ही है! न केवल शोभा जी, बल्कि किरण जी भी बहुत उदास हो गई थीं। घर के पुरुष ऊपर से कुछ नहीं दिखा रहे थे, लेकिन उन तीनों - रवि जी, अशोक जी, और अजय - का भी दिल बैठ गया था। शायद रूचि को खोने का डर सबसे ज़्यादा इन्ही तीनों में था। रवि जी अपनी एकलौती बेटी को ले कर बेहद चिंतित थे - एक ही संतान थी उनकी, लिहाज़ा, पूरा जीवन उन्होंने केवल उसी को प्रेम किया। एक तरह से उनका जीवन अपनी बेटी को ही समर्पित कर दिया था उन्होंने। ऐसे में उसको खो देने की सम्भावना के कारण उनका दिल बैठ गया था। कहाँ बस कुछ ही दिनों पहले वो अपनी बेटी और होने वाले दामाद को ले कर बेहद प्रसन्न थे, और कहाँ यह नई मुसीबत! रवि जी रूचि और शोभा जी के सामने सामान्य बने रहते, पर अकेले में उनका शरीर उन्हें धोखा देने लगा था - उनकी नींद टूट जाती… हाथ काँप जाते।

उधर अशोक जी का हाल कहें तो अवश्य ही वो रूचि के पिता नहीं थे, लेकिन उनके मन में रूचि का स्थान बिलकुल अपनी बेटी माया जैसा ही था। अपने घर में रूचि की उपस्थिति की अब उनको आदत हो गई थी। रूचि के कारण घर में रौनक रहती थी। लिहाज़ा, वो भी रूचि के जाने की आशंका के कारण व्याकुल थे। रूचि अब उनके घर की धड़कन बन चुकी थी, जिसकी चुप्पी की सम्भावना उन्हें डरा रही थी। भविष्य के लिए न जाने क्या-क्या प्लान बनाए हुए थे उन्होंने - लेकिन अब वो सब छोड़ कर बस एक ही बात पर सभी का ध्यान था, और वो यह कि कैसे रूचि पूरी तरह से स्वस्थ हो जाए।

अजय का क्या ही कहें! कितना सोचा था उसने कि वो इस बार किसी से दिल नहीं लगाएगा! कभी मोहब्बत नहीं करेगा। रूचि से भी नहीं। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है? न ही केवल रूचि में उसका दिल लगा, बल्कि दोनों की मोहब्बत भी बड़ी तेजी से परवान चढ़ गई थी। रूचि उसके जीवन का अटल सत्य बन गई थी। रूचि जिस तरह उसको पूरी शिद्दत से चाहती थी, वैसे ही वो भी उसको चाहता था। साथ में दोनों के भविष्य के सपने बुन गए थे! और अब यह! अजय के मन में बस एक ही बात थी - वो किसी तरह से रूचि को बचा लेना चाहता था, भले ही इसके लिए उसको अपने प्यार की कुर्बानी ही क्यों न देनी पड़े! उसके मन में एक बात अवश्य आती थी कि शायद उसकी समय-यात्रा के कारण उसके हिस्से के दुःख रूचि को झेलने पड़ रहे हैं। उसके भीतर अपराधबोध किसी ज़हर की तरह फैल रहा था। उसे बार-बार लगता कि समय को दूसरी बार छूने का दंड शायद कोई और चुका रहा है। यह अच्छी अनुभूति नहीं थी।

कहते हैं न, दुख की घड़ी में एक दूसरे का सहारा और मजबूत हो जाता है। तो उन दोनों परिवारों के संग वही हो रहा था। अशोक और किरण जी ने शोभा और रवि जी से कई बार आग्रह किया कि कितना अच्छा हो अगर वो तीनों रूचि के ऑपरेशन और उसके बाद, जब तक वो घर आने योग्य स्वस्थ न हो जाए, उन्हीं के संग रहें। इतना बड़ा घर है और अब तो दोनों परिवार भी एक ही हैं। इसलिए इस विचार में कोई बुराई नहीं है - इसी बहाने कम से कम दोनों तरफ के लोग अपने अपने दुःख बाँट तो सकेंगे! विचार अच्छा था - रवि और शोभा जी को अच्छा भी लगा। लेकिन शोभा जी ने फिलहाल के लिए उनको आदरपूर्वक मना कर दिया। कभी कभी मन होता है कि दुःख की घड़ी में आपको अकेला ही छोड़ दिया जाए। लेकिन उन्होंने आश्वासन भी दिया कि वो जरूर आएँगे - क्योंकि बिना किरण जी और अशोक जी के साथ के वो दोनों इतनी बड़ी चुनौती का सामना नहीं कर पाएंगे। अशोक और किरण जी यह बात समझ रहे थे। इसलिए उन्होंने इस बारे में कोई अनावश्यक ज़िद नहीं करी। लेकिन उनका मन बिना रूचि के मान नहीं रहा था। पुरुषों का जैसे तैसे चल गया - ऑफ़िस में व्यस्त रहने के कारण दुःख कम महसूस हो रहा था।

लेकिन सबसे कठिन समय स्त्रियों का था - ख़ास कर किरण और शोभा जी की। पहले किरण जी की बात करते हैं। इतने बड़े घर में वो नितांत अकेली थीं। इसीलिए वो चाहती थीं कि रूचि और उसके मम्मी पापा - सभी उनके साथ ही रहने को आ जाएँ! मनोहर भैया से वो कितनी ही देर बातें करतीं? फ़ोन कर के उन्होंने सरिता जी और माया से बात करी। जान कर उनको अच्छा लगा कि सरिता जी स्वस्थ थीं और अपनी गर्भावस्था के दूसरे ट्राईमेस्टर में वो अच्छा महसूस कर रही थीं। माया भी बढ़िया थी - कमल और उसका वैवाहिक जीवन सुख और आनंद से शुरू हो गया था। हाँ - उन दोनों से बात कर के बहुत अच्छा तो लगा लेकिन कितनी देर बातें करतीं? दोनों से बातचीत आधे घण्टे से अधिक नहीं चल पाई। अकेले घर में बैठे रह कर जैसे समय ही उनको खाए जा रहा था। जब मन नहीं माना, तो वो पास ही के मंदिर चली गईं। इस समय भीड़ लगभग न के समान थी, इसलिए उनको वहाँ जा कर संतोष मिला। कुछ देर वहाँ उन्होंने ध्यान लगाया - तब जा कर उनके चित्त को थोड़ी शान्ति हुई।

उधर शोभा जी ने भी आज बहुत कोशिश करी, लेकिन उनका आज ऑफिस में मन नहीं लगा। उनका दिल बैठा जा रहा था; इसलिए आधे दिन की छुट्टी का आवेदन डाल कर वो घर आ गईं। लेकिन घर पर न तो रवि जी थे और न ही रूचि। दोनों क्रमशः अपने ऑफिस और कॉलेज में थे। घर का सूनापन अब उनको काट खाने को दौड़ रहा था। इससे बेहतर तो वो अपने दफ्तर में ही थीं। अगर रूचि अजय के घर नहीं जाती थी, तो तीन बजे तक वापस आ जाती थी। मन खराब सा लग रहा था, इसलिए वो रसोई जा कर खाना पकाने लगीं। खाना पकाना उनके लिए हमेशा से ही एक रचनात्मक और लाभकारी क्रिया रही थी। साथ ही उनको लग रहा था कि शायद आज रूचि समय पर आ जाएगी। संभव है कि आज लंच उसके साथ ही खाने को मिले। रूचि की पसंद का खाना बना कर जब वो वापस बैठीं, तो उन्होंने घड़ी में समय देखा - अभी केवल दो ही बजा था। उन्होंने गहरी साँस भरी।

उनका किसी बात में मन नहीं लग रहा था, इसलिए वो परिवार की तस्वीरों वाली एल्बम उठा कर ले आईं। एल्बम खोलते समय उन्हें यह डर नहीं था कि यादें दर्द देंगी। डर यह था कि कहीं यादें ही सब कुछ न बन जाएँ। वो रूचि की बचपन की तस्वीरें देखने लगीं, और पुरानी मनपसंद यादों में खो गईं। तस्वीरें देखते-देखते शोभा जी भावनाओं के सागर की गहराइयों में उतरने लगीं। एल्बम देखते हुए शोभा जी की आँखें एक श्वेत-श्याम तस्वीर पर ठहर गईं - यह तस्वीर रूचि के पहले जन्मदिन की थी। उस रोज़ उसने एक खूब घेरे वाली, गुलाबी रंग की फ्रॉक पहने हुए थी। उस तस्वीर में वो रंग दिखाई नहीं दे रहे थे, लेकिन ऐसी यादें भूलती नहीं! रूचि उस तस्वीर में टेबल पर बैठ कर, केक के सामने हँस रही थी। शोभा जी को मानों कल की ही तरह याद था कि इस तस्वीर को खींचने के ठीक बाद रूचि ने अपने नन्हे हाथों से केक को मसल कर उसका भरता बना दिया था, और रवि जी ने हँसते हुए उसे गोद में उठा लिया था। सभी लोग कितना हँसे थे और रूचि एकदम भोला सा चेहरा बना कर सभी को ताक रही थी कि ऐसा क्या हो गया कि सभी हँस रहे हैं! वो भी खिलखिला कर सभी की हँसी में सम्मिलित हो गई थी। उस पल को याद कर के शोभा जी का मन भर आया! रूचि के अंदर आज भी वैसी ही मासूमियत थी! एक अन्य तस्वीर में वो केवल कच्छी पहन कर ठुमका लगा रही थी। उस चित्र ने शोभा जी के मन में भावनाओं के ज्वार भाटे एक साथ उठा दिए। लिहाज़ा, उनकी हँसी और रुलाई दोनों छूट पड़ीं।

इतनी प्यारी सी, नटखट सी, और मासूम सी उनकी बेटी... और अब वही बेटी इतनी बड़ी चुनौती का सामना कर रही थी। ये कोई उम्र है ब्रेन कैंसर जैसी बीमारी का सामना करने की? अरे, अभी तो उसकी ज़िन्दगी ही शुरू नहीं हुई। निराशा के मारे उनके मन में बार बार यही विचार आ रहे थे कि आखिर उनकी बेटी ने ऐसा क्या गुनाह कर दिया था, कि उसको ऐसी खतरनाक बीमारी का सामना करना पड़ रहा था। फिर उनके विवेकी पहलू ने उनके भावनात्मक पहलू पर विजय प्राप्त कर ली। रोग में गुनाह या बेगुनाह वाली कोई बात नहीं होती - यह तो शरीर की प्रणाली पर निर्भर करता है। शरीर एक मशीन है और मशीन की किसी प्रणाली में कभी भी, कोई भी नुक़्स आ सकता है। अच्छी बात यह है कि विज्ञान अब इतना उन्नत है कि ऐसी परेशानियों का डट कर मुकाबला किया जा सकता है। उनके मन में बस एक ही सवाल उठ रहा था - क्या उनकी बेटी फिर से वैसी ही बेफ़िक्र हँसी हँस पाएगी? क्या वो वैसी ही बेफ़िक्र ज़िन्दगी जी पाएगी?

अचानक से कॉल बेल बजी।

उसकी आवाज़ सुन कर शोभा जी चौंक कर वापस वर्तमान के धरातल पर उतर आईं। आँखें स्वयं ही घड़ी पर चली गईं - ढाई बज रहे थे।

रूचि शायद आ गई थी।
 

avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
4,591
25,056
189
अपडेट 79


उन्होंने दरवाज़ा खोला। सामने रूचि ही थी।

“अरे मम्मी,” रूचि ने अपनी माँ को देखा तो आश्चर्य से बोली, “आप ठीक हैं? इतनी जल्दी ऑफ़िस से वापस?”

शोभा जी ने कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुरा दीं और उसको अपने अपने आलिंगन में भर कर चूमने लगीं। इतना कस कर कि शायद खुद को यह यक़ीन दिला सकें कि रूचि अभी भी यहीं है - उनके साथ।

“क्या हुआ मम्मी?” इतना लाड़ पार कर रूचि भी उनसे कस कर लिपटती हुई बोली, “सब ठीक है न?”

“कुछ नहीं बेटे! सब ठीक है - बस, ऑफिस में मन नहीं लग रहा था, इसलिए जल्दी चली आई।” शोभा जी ने बताया।

“खूब अच्छा किया मम्मी!” रूचि खुश हो कर बोली, “मैंने तो सोचा था कि आज अकेले रहना होगा!”

“क्यों... अज्जू बेटा कहाँ है?”

ये अक्सर ही होता था - या तो रूचि अजय के यहाँ चली जाती थी, या फिर अजय उसके यहाँ। लेकिन वो आज उसके साथ नहीं आया था; उसको घर छोड़ने भी नहीं। अजय ने रूचि को बताया नहीं, लेकिन वो इस समय डॉक्टर देशपाण्डे के पास बैठा हुआ था, और अपनी याद से उनको सब कुछ बताने की कोशिश कर रहा था, जो सब उन्होंने उसकी बेहोशी के आलम में रिकॉर्ड किया था। अचानक से ही उसकी याददाश्त बेशक़ीमती हो गई थी।

“कह रहा था कि उसको कुछ काम है! कुछ तो बात है कि आज किसी का भी मन नहीं लग रहा है मम्मी,”

“ओह बिटिया रानी मेरी,” शोभा जी की आवाज़ में हमेशा के मुकाबले एक अतिरिक्त प्रेम और स्नेह का भाव था, जो शायद रूचि को खो देने के डर के कारण उभर आया था।

“क्या मम्मी! आप तो ऐसे बोल रही हैं कि जैसे मैं अभी से मर गई हूँ!” रूचि ने एक मीठी शिकायत करी।

लेकिन, उसका इतना कहना ही था कि शोभा जी ने बड़ी मुश्किल से अपने दिल में जिस बाँध को बना कर अपनी भावनाओं को रोक रखा था, वो बाँध टूट गया। वो फूट-फूट कर रोने लगीं। ऐसे जैसे माँ रोती है!

“मम्मी,” कह कर रूचि शोभा जी के आलिंगन में और भी अधिक समां गई, “क्या हो गया आपको!”

उसने दुलारते हुए शोभा जी से कहा।

माँ बाप के दिल का हाल बच्चे क्या समझेंगे? अपने ही अंश को खो देने का भय बहुत ही हृदय-विदारक होता है। अपने बच्चों को ले कर माता-पिता बहुत रक्षात्मक होते हैं। ख़ुद का कुछ भी हाल हो - लेकिन बच्चों को कुछ भी नहीं होने देना चाहते।

“ऐसे मत रोओ,” उसने शोभा जी के आँसू पोंछते हुए, बड़े ही दुलार से कहा, “... तुम तो मेरी सबसे अच्छी मम्मी हो न?”

“और कौन है रे तेरी मम्मी?” शोभा जी का गला रोने के कारण रुंध गया।

“और कोई भी नहीं है, मम्मी!” रूचि ने हँसते हुए परिस्थिति को सामान्य बनाने की कोशिश की, “... वैसे, आपके अलावा मुझे माँ भी खूब प्यार करती हैं,”

उसकी बात पर रोते हुए भी शोभा जी के होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई।

उन्होंने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए कहा, “तुझे तो सभी खूब प्यार करते हैं… तू है ही इतनी प्यारी!”

“तो फिर मम्मी,” रूचि ने कहा, “अगर सभी मुझको इतना प्यार करते हैं… इतना चाहते हैं, तो मुझे कुछ कैसे हो सकता है? सोचो न? आप सभी लोग बिना वजह ही न जाने क्या-क्या सोच कर दुःखी हुए जा रहे हैं!”

“तू सही कहती है!” शोभा जी ने अपने आँसू पोंछते हुए मुस्कुराने की कोशिश की, “कुछ नहीं होगा मेरी बच्ची को!”

“हाँ… ऑलवेज कीप दैट इन माइंड,” रूचि ने अपने हँसमुख अंदाज़ में कहा।

रूचि की बात हँसमुख अंदाज़ में अवश्य रही हो, लेकिन शोभा जी ने महसूस किया कि रूचि की बातों में एक अलग सी ताकत - एक अलग सी ही हिम्मत थी! वो जानती थीं, कि जब से रूचि और अजय - दोनों एक दूसरे के प्रेम में पगे थे, तब से रूचि का अंदाज़ भी बदल गया था। जीवन को ले कर उसके अंदर एक अलग ही जज़्बा आ गया था। वो ख़ुश रहने लगी थी। चहकने लगी थी। अजय उसकी ज़िन्दगी में एक सकारात्मक शक्ति बन कर आया था। दोनों के बीच बहुत मोहब्बत थी। दोनों अंतरंग भी होते थे - लेकिन उसमें भी एक शालीनता थी, एक मासूमियत थी। शोभा जी को यह बात भी बहुत अच्छी लगती थी कि रूचि उनसे अपनी लव-लाइफ के बारे में कुछ नहीं छुपाती थी - उनको सब कुछ बताती थी। जब अजय रूचि की ज़िन्दगी में नहीं था, तब वो थोड़ी अंतर्मुखी थी। इसलिए शोभा जी को अजय बहुत भाता था - मन ही मन उनको पता था कि अजय जैसा दामाद ढूंढना उनके या रवि जी के बस में नहीं था।

इन सब बातों के साथ एक और बात उन्होंने देखी थी - रूचि अब बहुत हिम्मती भी हो गई थी। यही बात वो इस समय भी महसूस कर रही थीं। उनको रूचि की बातें सुन कर लगा कि उनकी बेटी, इतनी कम उम्र में, न केवल इतनी बड़ी मुसीबत का सामना ही कर रही थी, बल्कि उनको हिम्मत भी दे रही थी। रूचि की आँखों में डर नहीं, बल्कि एक जिद थी - जीने की, लड़ने की! शोभा जी ने सोचा, अगर उनकी बेटी इतनी हिम्मत दिखा रही है, तो वो क्यों पीछे रहें? उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि वो हर कदम पर रूचि का साथ देंगी, चाहे जो हो जाए।

“हाँ मेरी बिट्टो... हाँ,” शोभा जी ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, “नहीं भूलूँगी कभी,”

रूचि मुस्कुराई, फिर अल्बम देख कर बोली, “अरे मम्मी… ये फ़ोटो कब की है?”

वह फोटो तब की थी जब रूचि मुश्किल से छः महीने की हुई होगी। उसमें शोभा जी रूचि को स्तनपान करा रही थीं - रूचि अपने मुँह को बड़ा सा खोल कर शोभा जी का चूचक लेने की कोशिश कर रही थी। जब रूचि हुई थी तब रवि जी तेईस साल के, और शोभा जी साढ़े इक्कीस साल की थीं। उस लिहाज़ से वो दोनों अभी भी छोटे ही थे, लिहाज़ा, माता पिता बनने पर भी दोनों का बचपना गया नहीं था! ऐसे ही बचपने और शरारत में रवि जी ने वो तस्वीर चुपके से उतार ली थी। मज़े की बात यह थी कि वो तस्वीर बेहद क्यूट आई थी! तस्वीर क्यूट तो थी, लेकिन उसमें शोभा जी के दोनों स्तन उघड़े हुए थे। लिहाज़ा शोभा जी के अंग-प्रदर्शन के कारण वो उस तस्वीर को सार्वजनिक नहीं कर सके थे। इसलिए लम्बे समय तक उस तस्वीर को छुपा कर रखा गया था। लेकिन अब अंततः उसको अल्बम में स्थान मिल गया था।

“तू तब पाँच छः महीने की रही होगी!” शोभा जी ने ममतामई अंदाज़ में उसको देखा, “मेरी प्यारी सी गुड़िया,”

“इतने समय से इसको क्यों छुपा रखा था मम्मी?”

“अरे कोई देख लेता, तो क्या कहता?” शोभा जी हँसने लगीं, “तेरे पापा ने बदमाशी में यह फोटो खींची थी। सोच, अगर तेरे दादा दादी या कोई और इसको देख लेता, तो?”

“तो? तो क्या?”

“अरे… सब दिख रहा है इसमें,”

“तो क्या हुआ मम्मी? आप मुझे दूधू ही तो पिला रही थीं! कोई गुनाह थोड़े ही कर रही थीं!”

“हा हा हा! कोई गुनाह नहीं बच्चे,”

रूचि ने अपने चुलबुले अंदाज़ में आगे कहा, “मम्मी... ये फोटो देख कर बहुत भूख लग गई है,”

“तेरी पसंद का ही खाना बनाया है बच्चे... तू हाथ-मुँह धो ले, मैं खाना लगा देती हूँ! साथ में खाते हैं,” उन्होंने कहा और सोफ़े से उठने लगीं।

“हाँ... बट... यू नो!” रूचि ने खींस निपोर कर उनको वापस बैठाते हुए कहा, “वो वाली भूखू नहीं... दुद्धू वाली!”

“अभी?”

रूचि ने ‘हाँ’ में सर हिलाया, और शोभा जी की ब्लाउज़ के बटन खोलने लगी।

शोभा जी को समझ नहीं आ रहा था, कि पिछले कुछ दिनों से रूचि को ऐसा क्या शौक चढ़ा था कि वो उनके स्तन पीने लगी थी। उनको इस बात का एक प्रमुख कारण समझ में आता था… और वो यह कि उनके अंतरंग क्षणों में शायद अजय भी रूचि के स्तनों को चूसता होगा। इतना तो उनको पता ही था कि दोनों एक दूसरे के सामने नंगे हो जाते हैं - हाँ, दोनों अभी तक सेक्स नहीं करते, यह बात किरण दीदी ने खुद ही बता दी थी। तो संभव है कि इसी कारण से, उत्सुकतावश, रूचि भी यह अनुभव लेना चाहती हो! लेकिन फिर उनको यह भी याद आया कि जब उनको नौकरी के लिए पहली बार अपने मम्मी-पापा का घर छोड़ना पड़ा था, तब वो भी शुरू शुरू में कैसे अपनी माँ के गले लगने के बहाने चुपके से उनके स्तनों के बीच अपना चेहरा छुपा लेती थीं। अतः यह भी हो सकता है कि शायद रूचि को अपने संभावित विवाह के कारण उनसे होने वाले बिछोह के कारण उनका स्तनपान करने का मन होने लगा हो? शायद वो अपनी माँ से भावनात्मक सांत्वना चाहती हो!
 
Last edited:

avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
4,591
25,056
189
अपडेट 80


शुरू में शोभा जी को समझ नहीं आया कि वो कैसे रिएक्ट करें; फिर उन्होंने सोचा कि रिएक्ट करना ही क्यों है? हाँ ठीक है - रूचि एक वयस्क लड़की है; लेकिन है तो उनकी ही बेटी न! उन्होंने बचपन में उसको स्तनपान कराया ही है। हाँ - वो बड़ी हो गई है, लेकिन ऐसी भी कोई बड़ी नहीं हुई है। व्यवहार से तो अभी भी बच्ची ही है। जो भी है, अपनी संतान को अगर वो किसी भी तरह से भावनात्मक सम्बल दे सकती हैं, तो उनको उसमें कोई बुराई नहीं लगी। ख़ास कर इस दुःख और विपदा की घड़ी में!

जिस रोज़ पहली बार रूचि ने रवि जी के सामने शोभा जी का स्तनपान किया था, उसी रात शोभा जी ने अपने पति, रवि जी से रूचि को स्तनपान कराने के बारे में विस्तार में बात करी थी। आश्चर्यजनक रूप से रवि जी ने भी इसका समर्थन ही किया। मज़ाक मज़ाक में उन्होंने उनसे यह इच्छा भी जाहिर करी कि काश शोभा जी के स्तनों में फिर से दूध बनने लगे। जिन वर्षों में शोभा जी रूचि को स्तनपान करा रही थीं, उन वर्षों में उन दोनों की सेक्स लाइफ बड़ी ही आनंददायक और मनोरंजक रही थी। इस बात पर शोभा जी ने उनको समझाया था कि ऐसा होने के लिए उनको फिर से गर्भवती होना पड़ेगा। इस विचार पर रवि जी ने शरारतपूर्वक कहा था कि वो भी समझते हैं इस बात को! दबी ढँकी ही सही, उन दोनों की ही एक संतान पाने की इच्छा अवश्य थी। इसलिए, उस रात उन दोनों ने जब सम्भोग किया था तब रवि जी ने जान-बूझ कर निरोध का इस्तेमाल नहीं किया। और उस रात से ले कर अब तक वो दोनों बिना किसी गर्भ-निरोधक के ही सम्भोग कर रहे थे।

वो बातें याद कर के शोभा जी के होंठों पर एक हल्की सी, लज्जा भरी मुस्कान आ गई।

शोभा जी ने देखा - रूचि बड़ी हसरत से उनके ब्रा में ढँके हुए स्तनों को देख रही थी। उस पल में उनके हृदय में ममता उमड़ पड़ी। हाल ही में ऐसी ऐसी घटनाएँ घट गई थीं, कि वो स्वयं अपनी बेटी को ऐसी जगह ले जाना चाहती थीं जहाँ वो पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर सके। उन्होंने कुछ कहा नहीं, बस अपनी ब्रा को ऊपर उठा कर, अपने एक स्तन को बाहर निकाल लिया। वो खुद अपनी बेटी को माँ की देह से मिलने वाला वह आश्वासन देना चाहती थीं, जो अधिकतर बेटों को ही देर तक मिलता है। रूचि बड़े आनंद से उस स्तन से स्तनपान करने लगी। शोभा जी रूचि की बच्चों जैसी हरकत देख कर मुस्कुरा दीं।


Ruchi-Breastfeeding1

“तू इतने मजे से पीती है कि जैसे इनमें से वाक़ई दूध उतर रहा हो,” दस सेकंड बाद शोभा जी बोलीं।

इस पर रूचि ने मनुहार करते हुए कहा, “मम्मी, दूध नहीं उतर रहा है, वही तो दिक्कत है... प्लीज़ इनमें दूध आने का बंदोबस्त कर दो न आप!”

“ले...”

शोभा जी कुछ कहने को हुईं कि रूचि ने बीच में ही उनकी बात को काटते हुए कहा, “आई नो... आप कोई न कोई एक्सक्यूज़ दे देंगी अभी! लेकिन थोड़ा सोचिये न... मेरे जाने के बाद आप दोनों कितना अकेले हो जाएँगे!”

“कहाँ जा रही है तू?” शोभा जी थोड़ा उद्विग्न हो कर बोलीं - कहते कहते उनका गला रूँध गया।

उनके चेहरे पर बदलते हुए भावों को पढ़ते हुए रूचि ने स्पष्टीकरण दिया, “अरे मम्मी... मेरा मतलब है, जब मैं शादी कर के अज्जू के यहाँ रहने लगूँगी, तब आप दोनों अकेले हो जाएँगे न!”

“अरे! तो क्या? तुम दोनों तो रहोगे ही न,” शोभा जी बोलीं, “शादी के बाद दोनों रहोगे तो दिल्ली में ही न!”

“क्या पता? सोचिए, अगर हम यूएसए चले गए तो?”

“एक बात कहूँ बेटू?”

“हाँ मम्मी, कहिये न?”

“अब मेरा मन नहीं होता कि तुम दोनों अमेरिका जाओ! यहाँ भी तो कितने अच्छे अच्छे कॉलेज हैं… दिल्ली में ही आईआईटी है!”

“हाँ है, लेकिन उसमें जाना मुश्किल भी तो है न मम्मी! कितना कम्पटीशन है!”

“हाँ… वो भी है!” वो बोलीं, “लेकिन तुम दोनों कोई कम थोड़े ही हो! और, कोई ज़रूरी थोड़े ही है कि तुम दोनों इंजीनियरिंग ही करो। और भी बहुत सी डिग्रीज़ हैं… कुछ अलग पढ़ो! सभी को इंजीनियर बनने की कोई जबरदस्ती है? बाकी ट्रेड्स में भी तो अच्छे पैसे मिलते हैं और अच्छी लाइफ जी जा सकती है।”

“हम्म्म,” रूचि सोचती हुई बोली, “अच्छा ठीक है! चलो मान लें कि हम दोनों यहीं रह जाते हैं। फिर भी... लेकिन नेक्स्ट ईयर आपका या पापा का ट्रांसफर होना तय है। ... यहाँ दिल्ली में चार साल हो गए हैं; पाँच साल से अधिक तो एक जगह पर नहीं रहने वाले आप दोनों,” रूचि ने समझाते हुए कहा, “... अगर आप प्रेग्नेंट हो जाती हो, तो ट्रांसफर भी रुक सकता है,”

“लेकिन बच्चे, ये कोई गुड्डे-गुड़िया लाने वाली बात है क्या?” शोभा जी ने कहा, “तू अब सयानी हो गई है... कल को तेरी और अज्जू की शादी होगी; तुम दोनों के बच्चे होंगे... ऐसे में मैं... कैसे? और अब तो चालीस की हो गई हूँ,”

“तो?”

“तो? अरे इस उम्र में ये सब क्या अच्छा लगता है?”

“क्यों नहीं अच्छा लगता? और सबसे बड़ी बात यह है कि आपकी और मेरी लाइफ अलग अलग है, मम्मी? है न? और वैसे भी, आप फर्टाइल हैं... सुन्दर हैं, सेक्सी हैं,” रूचि ने आँख मारते हुए कहा, “... और तीस पैंतीस के आस पास तो आज कल कितनी लेडीज़ शादी कर रही हैं, उनके बच्चे खुद लेट हो रहे हैं! ... और मैं कहाँ कह रही हूँ कि ये गुड्डे गुड़िया लाने वाली बात है... इसीलिए तो आपसे इतनी मनुहार करनी पड़ रही है न मम्मी!” रूचि ने खिलवाड़ वाले अंदाज़ में कहा।

“बदमाश है तू,”

“बदमाश हूँ, लेकिन आप सोच कर कहिए कि मेरी बात लॉजिकल और रीज़नेबल है या नहीं,”

“सच में तू चाहती है कि इनमें दूध आने लगे?”

“हाँ न! ... पर मेरी असली इच्छा यह है कि आप फिर से मम्मी बनें!” रूचि ने कुरेदा, “आई नो कि बहुत समय से आपका भी मन है फिर से माँ बनने का!”

“कहीं तू इसलिए तो यह सब नहीं सोच रही है कि तुझे डर है कि…”

“कोई डर नहीं है माँ!” रूचि ने दृढ़ विश्वास से कहा, “मैं ज़िंदा रहूँगी… हेल्दी रहूँगी, और बहुत साल जियूँगी भी!”

“हम्म... तो तू मुझसे प्रॉमिस कर कि तू पूरी तरह से ठीक हो जाएगी! … और ये जो कैंसर है न, तू उससे पूरी तरह से डिफीट कर के उससे छुटकारा पाएगी!”

“आई प्रॉमिस मम्मी! मैं पूरी तरह से ठीक हो कर, हट्टी-कट्टी हो कर दिखाऊँगी! एंड आई विल लिव टू बिकम वैरी ओल्ड एस वेल! हाँ… आप देख लेना!” रूचि ने खुश होते हुए कहा।

शोभा जी भी मुस्कुराए बिना न रह सकीं, “तो फिर ठीक है! मैं भी प्रॉमिस करती हूँ कि मैं तेरे पापा से कह कर फिर से प्रेग्नेंट होने की कोशिश करूँगी!”

“सच में मम्मी?” रूचि को विश्वास ही नहीं हुआ!

शोभा जी ने मुस्कुराते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया, और थोड़ा शर्माते हुए बोलीं, “... एक्चुअली, हमने कोशिश शुरू भी कर दी है! तुम्हारे पापा अब प्रोटेक्शन यूज़ नहीं करते,”

“येएएएएएए…” रूचि यह सुन कर खुशी के मारे किलकारियाँ मारने लगी।

शोभा जी के मन में रूचि की ख़ुशी देख कर एक अद्भुत सी राहत आ गई! रूचि को उस पल इतना खुश देख कर उन्हें लगा जैसे उनके घर में फिर से सामान्य समय वाली रौनक लौट आई हो। जब सफ़र कठिन होने लगता है, तो व्यक्ति खुशियों की तलाश करने लगता है। एक और संतान करना एक बड़ी प्रतिबद्धता होती है। लेकिन शोभा जी ने सोचा, कि अगर बच्चा आने से उनकी बेटी को इतनी खुशी मिल सकती है, तो वो इसके लिए हर संभव कोशिश करेंगी। क्या पता - गर्भवती होने की ख़ुशख़बरी से ही रूचि के और उनके स्वयं के भीतर की सकारात्मकता और भी बलवती हो जाए! उन्होंने जो वायदा रूचि से किया, वो सिर्फ रूचि के लिए नहीं, बल्कि उनके अपने दिल को सुकून देने के लिए भी था।

“अज्जू ठीक है?” उन्होंने रूचि के बाल की लटों को सहलाते हुए पूछा।

रूचि ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए कहा, “हाँ... बट मम्मी, ही इज प्रीटी शुक-अप! किसी को दिखाता नहीं है… मुझे भी नहीं... सोचता है कि अगर वो मुझे अपना डर दिखाएगा, तो मुझ पर नेगेटिव इम्पैक्ट आएगा। बट आई नो… वो बहुत डर गया है,”

“बेचारा बच्चा! प्यारा सा बेटा है मेरा… कितने छोटे भी तो हो तुम दोनों! और कितनी हिम्मत एक्सपेक्ट करें तुम दोनों से!”

शोभा जी की बात पर रूचि को अजय की असली उम्र की याद आ गई।

वो मुस्कुराई, “मम्मी, वो छोटा ज़रूर है, लेकिन मेंटली बहुत टफ़ है वो,”

अजय के लिए रूचि के मुँह से ऐसे सुन कर शोभा जी को अच्छा लगा, “बहुत चाहता है न तुमको?”

रूचि मुस्कुराई, “बहुत! … ही इस द बेस्ट! आप दोनों के बाद ही इस द बेस्ट थिंग दैट हैपेंड टू मी! थैंक यू फॉर अग्रींग फ़ॉर आवर रिलेशनशिप मम्मी,”

“तुम्हारे पापा और मैं बाकी पैरेंट्स की तरह नहीं हैं। हमको अपने बच्चों की ख़ुशियाँ चाहिए... बस!”

“आई नो मम्मी! एंड आई ऍम सो थैंकफुल टू गॉड कि आप दोनों मेरे मम्मी पापा हैं! आई मस्ट हैव बीन वैरी लकी फॉर इट!”

“तुम भी तो चाहती हो न उसको!”

“बहुत,” रूचि अभी भी मुस्कुरा रही थी।


**
 

avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
4,591
25,056
189

Suraj13796

💫THE_BRAHMIN_BULL💫
335
3,033
138
जिस तरह से अजय और रुचि ने हिम्मत दिखाई है उस से काफी आसार है कि रुचि ठीक हो जायेगी, पर इसका परिणाम क्या होगा?

पिछले अपडेट फिर से पढ़ने पड़ेंगे ताकि फिर से कहानी कनेक्ट कर पाऊं

अपडेट के लिए धन्यवाद, आशा है कि अगला अपडेट जल्दी पढ़ने को मिलेगा
 
  • Love
  • Like
Reactions: avsji and Riky007
Top