अपडेट 79
उन्होंने दरवाज़ा खोला। सामने रूचि ही थी।
“अरे मम्मी,” रूचि ने अपनी माँ को देखा तो आश्चर्य से बोली, “आप ठीक हैं? इतनी जल्दी ऑफ़िस से वापस?”
शोभा जी ने कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुरा दीं और उसको अपने अपने आलिंगन में भर कर चूमने लगीं। इतना कस कर कि शायद खुद को यह यक़ीन दिला सकें कि रूचि अभी भी यहीं है - उनके साथ।
“क्या हुआ मम्मी?” इतना लाड़ पार कर रूचि भी उनसे कस कर लिपटती हुई बोली, “सब ठीक है न?”
“कुछ नहीं बेटे! सब ठीक है - बस, ऑफिस में मन नहीं लग रहा था, इसलिए जल्दी चली आई।” शोभा जी ने बताया।
“खूब अच्छा किया मम्मी!” रूचि खुश हो कर बोली, “मैंने तो सोचा था कि आज अकेले रहना होगा!”
“क्यों... अज्जू बेटा कहाँ है?”
ये अक्सर ही होता था - या तो रूचि अजय के यहाँ चली जाती थी, या फिर अजय उसके यहाँ। लेकिन वो आज उसके साथ नहीं आया था; उसको घर छोड़ने भी नहीं। अजय ने रूचि को बताया नहीं, लेकिन वो इस समय डॉक्टर देशपाण्डे के पास बैठा हुआ था, और अपनी याद से उनको सब कुछ बताने की कोशिश कर रहा था, जो सब उन्होंने उसकी बेहोशी के आलम में रिकॉर्ड किया था। अचानक से ही उसकी याददाश्त बेशक़ीमती हो गई थी।
“कह रहा था कि उसको कुछ काम है! कुछ तो बात है कि आज किसी का भी मन नहीं लग रहा है मम्मी,”
“ओह बिटिया रानी मेरी,” शोभा जी की आवाज़ में हमेशा के मुकाबले एक अतिरिक्त प्रेम और स्नेह का भाव था, जो शायद रूचि को खो देने के डर के कारण उभर आया था।
“क्या मम्मी! आप तो ऐसे बोल रही हैं कि जैसे मैं अभी से मर गई हूँ!” रूचि ने एक मीठी शिकायत करी।
लेकिन, उसका इतना कहना ही था कि शोभा जी ने बड़ी मुश्किल से अपने दिल में जिस बाँध को बना कर अपनी भावनाओं को रोक रखा था, वो बाँध टूट गया। वो फूट-फूट कर रोने लगीं। ऐसे जैसे माँ रोती है!
“मम्मी,” कह कर रूचि शोभा जी के आलिंगन में और भी अधिक समां गई, “क्या हो गया आपको!”
उसने दुलारते हुए शोभा जी से कहा।
माँ बाप के दिल का हाल बच्चे क्या समझेंगे? अपने ही अंश को खो देने का भय बहुत ही हृदय-विदारक होता है। अपने बच्चों को ले कर माता-पिता बहुत रक्षात्मक होते हैं। ख़ुद का कुछ भी हाल हो - लेकिन बच्चों को कुछ भी नहीं होने देना चाहते।
“ऐसे मत रोओ,” उसने शोभा जी के आँसू पोंछते हुए, बड़े ही दुलार से कहा, “... तुम तो मेरी सबसे अच्छी मम्मी हो न?”
“और कौन है रे तेरी मम्मी?” शोभा जी का गला रोने के कारण रुंध गया।
“और कोई भी नहीं है, मम्मी!” रूचि ने हँसते हुए परिस्थिति को सामान्य बनाने की कोशिश की, “... वैसे, आपके अलावा मुझे माँ भी खूब प्यार करती हैं,”
उसकी बात पर रोते हुए भी शोभा जी के होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई।
उन्होंने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए कहा, “तुझे तो सभी खूब प्यार करते हैं… तू है ही इतनी प्यारी!”
“तो फिर मम्मी,” रूचि ने कहा, “अगर सभी मुझको इतना प्यार करते हैं… इतना चाहते हैं, तो मुझे कुछ कैसे हो सकता है? सोचो न? आप सभी लोग बिना वजह ही न जाने क्या-क्या सोच कर दुःखी हुए जा रहे हैं!”
“तू सही कहती है!” शोभा जी ने अपने आँसू पोंछते हुए मुस्कुराने की कोशिश की, “कुछ नहीं होगा मेरी बच्ची को!”
“हाँ… ऑलवेज कीप दैट इन माइंड,” रूचि ने अपने हँसमुख अंदाज़ में कहा।
रूचि की बात हँसमुख अंदाज़ में अवश्य रही हो, लेकिन शोभा जी ने महसूस किया कि रूचि की बातों में एक अलग सी ताकत - एक अलग सी ही हिम्मत थी! वो जानती थीं, कि जब से रूचि और अजय - दोनों एक दूसरे के प्रेम में पगे थे, तब से रूचि का अंदाज़ भी बदल गया था। जीवन को ले कर उसके अंदर एक अलग ही जज़्बा आ गया था। वो ख़ुश रहने लगी थी। चहकने लगी थी। अजय उसकी ज़िन्दगी में एक सकारात्मक शक्ति बन कर आया था। दोनों के बीच बहुत मोहब्बत थी। दोनों अंतरंग भी होते थे - लेकिन उसमें भी एक शालीनता थी, एक मासूमियत थी। शोभा जी को यह बात भी बहुत अच्छी लगती थी कि रूचि उनसे अपनी लव-लाइफ के बारे में कुछ नहीं छुपाती थी - उनको सब कुछ बताती थी। जब अजय रूचि की ज़िन्दगी में नहीं था, तब वो थोड़ी अंतर्मुखी थी। इसलिए शोभा जी को अजय बहुत भाता था - मन ही मन उनको पता था कि अजय जैसा दामाद ढूंढना उनके या रवि जी के बस में नहीं था।
इन सब बातों के साथ एक और बात उन्होंने देखी थी - रूचि अब बहुत हिम्मती भी हो गई थी। यही बात वो इस समय भी महसूस कर रही थीं। उनको रूचि की बातें सुन कर लगा कि उनकी बेटी, इतनी कम उम्र में, न केवल इतनी बड़ी मुसीबत का सामना ही कर रही थी, बल्कि उनको हिम्मत भी दे रही थी। रूचि की आँखों में डर नहीं, बल्कि एक जिद थी - जीने की, लड़ने की! शोभा जी ने सोचा, अगर उनकी बेटी इतनी हिम्मत दिखा रही है, तो वो क्यों पीछे रहें? उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि वो हर कदम पर रूचि का साथ देंगी, चाहे जो हो जाए।
“हाँ मेरी बिट्टो... हाँ,” शोभा जी ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, “नहीं भूलूँगी कभी,”
रूचि मुस्कुराई, फिर अल्बम देख कर बोली, “अरे मम्मी… ये फ़ोटो कब की है?”
वह फोटो तब की थी जब रूचि मुश्किल से छः महीने की हुई होगी। उसमें शोभा जी रूचि को स्तनपान करा रही थीं - रूचि अपने मुँह को बड़ा सा खोल कर शोभा जी का चूचक लेने की कोशिश कर रही थी। जब रूचि हुई थी तब रवि जी तेईस साल के, और शोभा जी साढ़े इक्कीस साल की थीं। उस लिहाज़ से वो दोनों अभी भी छोटे ही थे, लिहाज़ा, माता पिता बनने पर भी दोनों का बचपना गया नहीं था! ऐसे ही बचपने और शरारत में रवि जी ने वो तस्वीर चुपके से उतार ली थी। मज़े की बात यह थी कि वो तस्वीर बेहद क्यूट आई थी! तस्वीर क्यूट तो थी, लेकिन उसमें शोभा जी के दोनों स्तन उघड़े हुए थे। लिहाज़ा शोभा जी के अंग-प्रदर्शन के कारण वो उस तस्वीर को सार्वजनिक नहीं कर सके थे। इसलिए लम्बे समय तक उस तस्वीर को छुपा कर रखा गया था। लेकिन अब अंततः उसको अल्बम में स्थान मिल गया था।
“तू तब पाँच छः महीने की रही होगी!” शोभा जी ने ममतामई अंदाज़ में उसको देखा, “मेरी प्यारी सी गुड़िया,”
“इतने समय से इसको क्यों छुपा रखा था मम्मी?”
“अरे कोई देख लेता, तो क्या कहता?” शोभा जी हँसने लगीं, “तेरे पापा ने बदमाशी में यह फोटो खींची थी। सोच, अगर तेरे दादा दादी या कोई और इसको देख लेता, तो?”
“तो? तो क्या?”
“अरे… सब दिख रहा है इसमें,”
“तो क्या हुआ मम्मी? आप मुझे दूधू ही तो पिला रही थीं! कोई गुनाह थोड़े ही कर रही थीं!”
“हा हा हा! कोई गुनाह नहीं बच्चे,”
रूचि ने अपने चुलबुले अंदाज़ में आगे कहा, “मम्मी... ये फोटो देख कर बहुत भूख लग गई है,”
“तेरी पसंद का ही खाना बनाया है बच्चे... तू हाथ-मुँह धो ले, मैं खाना लगा देती हूँ! साथ में खाते हैं,” उन्होंने कहा और सोफ़े से उठने लगीं।
“हाँ... बट... यू नो!” रूचि ने खींस निपोर कर उनको वापस बैठाते हुए कहा, “वो वाली भूखू नहीं... दुद्धू वाली!”
“अभी?”
रूचि ने ‘हाँ’ में सर हिलाया, और शोभा जी की ब्लाउज़ के बटन खोलने लगी।
शोभा जी को समझ नहीं आ रहा था, कि पिछले कुछ दिनों से रूचि को ऐसा क्या शौक चढ़ा था कि वो उनके स्तन पीने लगी थी। उनको इस बात का एक प्रमुख कारण समझ में आता था… और वो यह कि उनके अंतरंग क्षणों में शायद अजय भी रूचि के स्तनों को चूसता होगा। इतना तो उनको पता ही था कि दोनों एक दूसरे के सामने नंगे हो जाते हैं - हाँ, दोनों अभी तक सेक्स नहीं करते, यह बात किरण दीदी ने खुद ही बता दी थी। तो संभव है कि इसी कारण से, उत्सुकतावश, रूचि भी यह अनुभव लेना चाहती हो! लेकिन फिर उनको यह भी याद आया कि जब उनको नौकरी के लिए पहली बार अपने मम्मी-पापा का घर छोड़ना पड़ा था, तब वो भी शुरू शुरू में कैसे अपनी माँ के गले लगने के बहाने चुपके से उनके स्तनों के बीच अपना चेहरा छुपा लेती थीं। अतः यह भी हो सकता है कि शायद रूचि को अपने संभावित विवाह के कारण उनसे होने वाले बिछोह के कारण उनका स्तनपान करने का मन होने लगा हो? शायद वो अपनी माँ से भावनात्मक सांत्वना चाहती हो!