अपडेट 77
तीन दिन बाद सभी वापस डॉक्टर देशपाण्डे के सामने थे।
अजय दिल थामे बैठा हुआ था - इस उम्मीद में कि वो कहें कि रूचि को कोई परेशानी नहीं है। जब से उसको पता चला था कि रूचि को ब्रेन ट्यूमर की सम्भावना है, तब से उसकी नींद उड़ गई थी। वो वाक़ई जानना चाहता था कि रूचि पूरी तरह से निरोगी है। अजय की ही तरह बाकी लोगों के मन में भी उद्विग्नता थी, क्योंकि उनको नहीं पता था कि क्या सुनने को मिलेगा।
डॉक्टर देशपाण्डे ने सभी का अभिवादन कर के उनको बैठने को कहा।
अजय ने उनकी तरफ़ देखा। साफ़ दिख रहा था कि डॉक्टर साहब बड़े असमंजस में थे। लेकिन उनका चेहरा देख कर अजय समझ गया कि क्या सुनने को मिलेगा। पक्की बात थी कि रूचि को ब्रेन कैंसर था!
“रूचि,” डॉक्टर देशपाण्डे ने हिचकिचाते हुए कहना शुरू किया, “देयर इस नो ईज़ी वे टू से दिस… बट द पेन इन योर हेड इस बिकॉज़ ऑफ़ अ ट्यूमर! इट इस रफ़ली द साइज़ ऑफ़ टू सेन्टीमीटर्स… एंड इस मेलिग्नेंट,”
“मतलब डॉक्टर साहब,” किरण जी की आवाज़ काँप रही थी।
“मतलब… रूचि हैस कैंसर… ब्रेन कैंसर,”
ये सुनते ही किरण जी की एक दुःखभरी आह निकल गई, और अगले ही पल वो पल रोने लगीं।
शोभा जी तो जैसे पत्थर की हो गईं। न तो उनके कोई आवाज़ निकली और न ही आँसू।
“लेकिन डॉक्टर साहब,” अशोक जी अविश्वास से बोले, “बिटिया की अभी उम्र ही क्या है? ऐसे में कैंसर! कैसे?”
“सर, आई अंडरस्टैंड! और यह बात अच्छी है,”
“अच्छी बात है? कैसे डॉक्टर?” रवि जी ने पूछा।
“प्लीज़ लेट मी एक्सप्लेन। रूचि इस यंग, एंड हर बॉडी कंस्टीटूशन इस गुड… अच्छी हेल्थ है। … डिड आई टेल यू दैट इट इस एट अर्ली स्टेज?”
इस तथ्य से भी किसी को संतोष नहीं हुआ।
अजय ने इतनी देर में पहली बार रूचि को देखा।
और जो उसने देखा, वो देख कर उसको अचम्भा हुआ - रूचि के चेहरे पर भय का कोई चिह्न नहीं था।
रूचि और अजय साथ ही बैठे थे, और दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था। पिछले तीन दिनों से रूचि महसूस कर रही थी कि अजय जितना दिखा रहा, उससे कहीं अधिक उसको पता था। स्कैन करवा कर जब वो वानप्रस्थ अस्पताल से निकली थी, तभी से अजय के हाव भाव पढ़ कर वो समझ गई थी कि उसको कोई गंभीर रोग हो गया था। एक पल को उसको डर भी लगा; लेकिन फिर उसने सोचा कि अजय ने साक्षात परमब्रह्म को छुआ था और उसने अजय को! ईश्वर की जो भी कृपा अजय को मिली हुई थी, उसमें से कुछ तो उस पर भी आई होगी न? इसलिए डरने की क्या बात है? वैसे भी, मृत्यु तो संसार का अटल सत्य है - कभी न कभी मरना है ही। लेकिन उसको यकीन था कि अगर उसके जीवन में अजय के साथ रहना लिखा है, तो वो बदलेगा नहीं। कोई न कोई मार्ग ज़रूर निकलेगा। ऐसे में डरने का कोई मतलब ही नहीं!
डॉक्टर देशपाण्डे ने बताया, “देखिए, मैं डिटेल में बताता हूँ। रूचि को ग्लिओब्लास्टोमा ट्यूमर है, जो एक बहुत ही अग्रेसिव ब्रेन ट्यूमर होता है। यह ब्रेन की ग्लियल सेल्स में होता है, इसीलिए इसको ग्लिओब्लास्टोमा कहते हैं।”
सभी दुःखी से, लेकिन पूरी तरह से ध्यान दे कर सुन रहे थे।
“इसे ग्रेड फोर एस्ट्रोसाइटोमा में कटेगोराइज़ किया गया है, जो शायद सबसे घातक ब्रेन ट्यूमर्स में से एक है।” डॉक्टर कह रहे थे, “ये बहुत तेजी से बढ़ता है और जल्दी ही अपने आस पास के ब्रेन टिश्यू में फैल जाता है! इसलिए देर करने से इसका ट्रीटमेंट मुश्किल हो जाता है।”
किरण जी इसकी घातकता के बारे में सुन कर और भी रोने लगीं।
“वैसे तो ग्लिओब्लास्टोमा ब्रेन के किसी भी हिस्से में हो सकता है। रूचि को फ्रंटल लोब में हुआ है। इसीलिए उसको आँखों के पास में इतना पेन होता है।”
रवि जी ने पूछा, “सर, इसका ट्रीटमेंट क्या है?”
“जी, इसके मल्टीपल कोर्स होते हैं। सबसे पहला तो है सर्जरी... हमारी कोशिश रहेगी कि जितना पॉसिबल हो, उतना ट्यूमर हटा दिया जाए... बिना हेल्दी टिश्यू को नुकसान पहुँचाए। ट्यूमर अभी छोटा है, और फैला नहीं है। इसलिए दैट शुड बी इजी।”
सभी ने समझते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया।
“कैंसर सेल्स को केवल ऑपेरशन कर के पूरी तरह निकालना इम्पॉसिबल है। इसलिए सर्जरी के बाद, एक्सटर्नल बीम रेडिएशन थेरेपी दी जायेगी। इससे ट्यूमर की बची हुई सेल्स को डिस्ट्रॉय करेंगे। ये क़रीब छः से सात सप्ताह चलेगा। अगर ज़रुरत पड़ी, तो स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी करनी पड़ेगी।”
अजय के मुँह से निकल गया, “सर, कीमोथेरेपी भी होती है?”
“हाँ, लेकिन वो हेल्दी टिश्यू पर भी असर डालती है, और बॉडी को वीक करती है। मैं अपनी रिसर्च में यही कोशिश कर रहा हूँ कि कैसे लेस टैक्सिंग (कम नुक़सान पहुँचाने वाला) ट्रीटमेंट बनाया जाए,”
कह कर डॉक्टर देशपाण्डे ने अर्थपूर्वक दृष्टि अजय पर डाली।
अजय का दिल अभी भी काँप रहा था।
“सर, बचने के क्या चांस हैं? … मतलब रूचि ठीक तो हो जायेगी न?”
“अजय, आई विल बी ट्रुथफुल हियर,” डॉक्टर साहब अपनी कुर्सी पर कसमसाते हुए बोले, “ग्लिओब्लास्टोमा के पेशेंट्स की प्रोग्नोसिस सीरियस होती है। क्योंकि यह ट्यूमर बहुत अग्रेसिव होता है। जनरली, पोस्ट ट्रीटमेंट सर्वाइवल एक्सपेक्टेशन ट्वेल्व टू एटीन मंथ्स होती है।”
यह सुन कर शोभा जी का चेहरा भय से सफ़ेद पड़ गया,
'बस एक डेढ़ साल! अभी उनकी बेटी ने कौन से सुख देखे हैं?'
लेकिन रूचि के चेहरे पर अभी भी शिकन की एक लकीर भी नहीं थी।
“बट,” डॉक्टर ने इस शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा, “बट, रूचि अभी अपने टीन्स में है, हेल्दी है… इसलिए शी कैन बी बेटर! मुझे लगता है कि वो पूरी तरह से ठीक हो सकती है। मैं अभी कोई प्रॉमिस नहीं दे सकता, लेकिन मेरी पूरी कोशिश बस यही रहेगी कि रूचि को दुबारा यह रोग न आए।”
रूचि मुस्कुराई।
“यू मस्ट नो, ट्रीटमेंट का ऑब्जेक्टिव न केवल लाइफ को प्रोलांग करना होता है, बल्कि क्वालिटी ऑफ़ लाइफ को बेहतर करना भी होता है।”
कमरे में गहरी निःस्तब्धता छा गई।
कुछ देर तक किसी से कुछ कहा ही नहीं गया।
“कब शुरू करना है सर?” पूरे वार्तालाप में पहली बार रुचि ने कुछ कहा था, “ऑपेरशन कब कर सकते हैं?”
“जितना जल्दी हो सके,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “फिलहाल ट्यूमर निकालना सबसे ज़रूरी है।”
“ओके,” रूचि ने पूछा, “इसके ऑपेरशन से मेमोरी या अन्य क्षमताओं पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ता?”
“रूचि बेटा, असर हो तो सकता है। लेकिन ये बहुत से फैक्टर्स पर डिपेंड करता है। अच्छी बात ये है कि अभी ट्यूमर छोटा है। और हमारे पास ट्रीटमेंट के अडवांस्ड मेथड्स हैं। इसलिए ब्रेन डैमेज मिनिमल होने की पॉसिबिलिटी है।” डॉक्टर ने बताया, “मेमोरी फंक्शन्स पर इम्पैक्ट नहीं आना चाहिए क्योंकि ये फ्रंटल लोब में है। लेकिन स्पीच, मोटर स्किल्स - मतलब मूवमेंट, बैलेंस, और कोऑर्डिनेशन में शायद कोई समस्या हो सकती है। अभी सब बता पाना मुश्किल है! ट्यूमर ऑक्सिपिटल लोब के पास नहीं है, इसलिए विज़न में कोई प्रॉब्लम नहीं आनी चाहिए। यू में नॉट नोटिस इट, लेकिन तुम्हारे लोगों को तुम्हारी पर्सनालिटी और बिहैवियर में थोड़े चेंजेस दिखाई दे सकते हैं।”
यह सुन कर रूचि के चेहरे पर पहली बार परेशानी वाले भाव दिखाई दिए।
“लेकिन हम बहुत की केयरफुल हो कर ऑपरेशन करेंगे। माय कलीग, डॉक्टर नारायण, हैस अ गुड एंड लॉन्ग एक्सपीरियंस इन परफार्मिंग ब्रेन सर्जरी… इसलिए चिंता न करो। आई ऍम होपफ़ुल… क्योंकि जहाँ पर ये ट्यूमर है, थैंकफुली, वहाँ टिश्यू रिमूवल से ये डैमेज बहुत कम होने चाहिए,”
“ओके देन…” वो बोली, “लेट्स डू इट,”
फिर सभी को देख कर वो आगे बोली, “कमऑन… मम्मी पापा… आप लोग सभी ऐसे क्यों हैं?”
किरण जी ने अपनी अश्रुपूरित आँखों से रूचि को देखा - इतनी प्यारी सी बच्ची को अगर कुछ हो गया तो? यह विचार उनको अंदर से खाए जा रहा था। रूचि की रौनक के बगैर अब वो अपने घर के बारे में सोच भी नहीं पा रही थीं।
उनको ऐसे देख कर रूचि अपने सामान्य, खुशनुमा अंदाज़ में चुहल करते हुए बोली,
“क्या माँ! आप भी न! ऐसे क्यों रो रही हैं आप? मैं तो अभी भी हूँ न!” उसने किरण जी के आँसू पोंछे, “मुझे कुछ नहीं होगा! अभी तो आपको मेरी और अज्जू की शादी करानी है… फिर हमारे बच्चों के संग खेलना है… मैं आपको बिना ये सारी ख़ुशियाँ दिए कहीं नहीं जाने वाली!”
किरण जी उस बच्ची की हिम्मत भरी बातें सुन कर आश्चर्यचकित थीं। उनको भी थोड़ा दिलासा मिला।
फिर रूचि उनके कानों के फ़ुसफ़ुसाते हुए बोलती है, “… और मुझे आपका खूब सारा दुद्धू पीना है… बहुत सालों तक!”
इस आखिरी बात पर रोते रोते भी, अनायास ही किरण जी के होंठों पर मुस्कान आ ही गई।
“दैट्स लाइक माय प्यारी सी माँ,”
फिर उसने शोभा जी को देखा, और हँसते हुए बोली, “मम्मी, आप भी रोना बंद करेंगी, या आपको भी समझाऊँ,”
“ओह मेरी बच्चे,” कह कर उन्होंने रूचि को अपने आलिंगन में भर लिया।
अशोक जी और रवि जी भी एक दूसरे को हाथ पकड़ कर सम्बल दे रहे थे। मर्द थे, इसलिए दोनों अपनी पीड़ा सबके सामने दिखा नहीं पा रहे थे। लेकिन अंदर ही अंदर उनके दिलों में जैसे नश्तर चुभ रहा था। एक अभूतपूर्व टीस बार बार उठ रही थी। लेकिन चाहे जो भी हो, मुश्किल की इस घड़ी में यह पूरा परिवार उस मुश्किल का सामना करने के लिए एक जुट था।
डॉक्टर देशपाण्डे भी इस भावनात्मक रूप से गहरे हो चले माहौल को देख रहे थे और मन ही मन वो भी द्रवित हो रहे थे। सच में, ऐसे प्यारे से परिवार का नुकसान नहीं होना चाहिए - रूचि जैसी प्यारी सी बच्ची के रूप में तो बिल्कुल ही नहीं।
“इफ यू आर ओके,” डॉक्टर देशपाण्डे बोले, “देन व्ही कैन परफॉर्म द ऑपरेशन नेक्स्ट वीक,”
रवि जी ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए कहा, “जैसा आप ठीक समझें डॉक्टर साहब,”
छोटी मोटी औपचारिक बातें करने के बाद जब सभी वहाँ से निकल रहे थे, तब डॉक्टर देशपाण्डे ने इशारे से अजय को दो मिनट रुकने को कहा।
“अजय,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “डिड यू नोटिस वन थिंग?”
“क्या सर?”
“रूचि को वही कैंसर हुआ है, जिसका सलूशन तुम उस दिन बेहोशी की हालत में बता रहे थे?”
“व्हा…” अजय को यकीन ही नहीं हुआ।
डॉक्टर देशपाण्डे ने ‘हाँ’ में सर हिलाया, “एंड ऐस आई प्रॉमिस्ड, मैं रूचि का इलाज़ पूरी तरह से फ्री में करूँगा। लेकिन तुमको भी मेरी मदद करनी होगी! … सोचो, इस खतरनाक बीमारी का इलाज़ मिलने से कितने लोगों को फायदा पहुँचेगा!”
“आई नो सर, एंड थैंक यू!”
“अजय, तुम सभी चिंता मत करो!” डॉक्टर देशपाण्डे ने पूरे विश्वास से कहा, “न जाने क्यों, मुझे यकीन है कि रूचि पूरी तरह से ठीक हो जाएगी… वो भी जल्दी ही!”
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