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Romance फ़िर से [चित्रमय]

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avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
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दोस्तों - इस अपडेट सूची को स्टिकी पोस्ट बना रहा हूँ!
लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि केवल पढ़ कर निकल लें। यह केवल आपकी सुविधा के लिए है। चर्चा बंद नहीं होनी चाहिए :)

अपडेट 1; अपडेट 2; अपडेट 3; अपडेट 4; अपडेट 5; अपडेट 6; अपडेट 7; अपडेट 8; अपडेट 9; अपडेट 10; अपडेट 11; अपडेट 12; अपडेट 13; अपडेट 14; अपडेट 15; अपडेट 16; अपडेट 17; अपडेट 18; अपडेट 19; अपडेट 20; अपडेट 21; अपडेट 22; अपडेट 23; अपडेट 24; अपडेट 25; अपडेट 26; अपडेट 27; अपडेट 28; अपडेट 29; अपडेट 30; अपडेट 31; अपडेट 32; अपडेट 33; अपडेट 34; अपडेट 35; अपडेट 36; अपडेट 37; अपडेट 38; अपडेट 39; अपडेट 40; अपडेट 41; अपडेट 42; अपडेट 43; अपडेट 44; अपडेट 45; अपडेट 46; अपडेट 47; अपडेट 48; अपडेट 49; अपडेट 50; अपडेट 51; अपडेट 52; अपडेट 53; अपडेट 54; अपडेट 55; अपडेट 56; अपडेट 57; अपडेट 58; अपडेट 59; अपडेट 60; अपडेट 61; अपडेट 62; अपडेट 63; अपडेट 64; अपडेट 65; अपडेट 66; अपडेट 67; अपडेट 68; अपडेट 69; अपडेट 70; अपडेट 71; अपडेट 72; अपडेट 73; अपडेट 74; अपडेट 75; अपडेट 76; अपडेट 77; अपडेट 78; अपडेट 79; अपडेट 80; अपडेट 81; अपडेट 82; अपडेट 83; अपडेट 84;
 
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avsji

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जिसका डर था वही हुआ, मुझे लगा ही था रुचि को कोई गंभीर बीमारी है।
खैर यही प्रकृति की ताकत है, वो बैलेंस बनाना जानती है।
चाहे कोई कुछ भी कर ले कितना ही ताकतवर हो अमीर हो
सबके जीवन में हमेशा सुख ही सुख और दुख ही दुख हो ही नहीं सकते।
अजय इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं सबकुछ जानते हुए भी कुछ नहीं कर पाया।
Thank for update

Waiting for next update ❣️

जी भाई - प्रकृति अवश्य ही संतुलन बनाना चाहती भी है, और जानती भी है।
लेकिन अजय के जीवन में दुःख ही दुःख हुए हैं और उसने अभी तक अपने लिए लाभ का एक पैसा नहीं लिया है।
जो कुछ उसने अभी तक किया है, अन्य लोगों के लिए किया है।
हाँलाकि मैंने अभी तक सोचा नहीं है कि कहानी किस ओर चलेगी, लेकिन अजय का जीवन असंतुलित ही रहा है अभी तक।

देखते हैं कि कलम क्या लिखवाती है :)

साथ बने रहें!
 

avsji

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बढ़िया

जैसा सबको अंदेशा था, रुचि को एक गंभीर बीमारी है।

पर डॉ देशपांडे ने कहा है कि अजय को उसका इलाज पता है, भले ही अवचेतन मन में। लेकिन कैसे?

क्योंकि अजय का पाला तो कभी भी साइंस से नहीं था पिछले जन्म में?

सभी ने सही अंदेशा दिखाया, रिकी भाई।
आपके प्रश्न का उत्तर अवश्य मिलेगा। लेकिन फिलहाल कहानी किस दिशा में निकले, समझ नहीं आ रहा है।
कहानी के एक संस्करण में मैंने लिखा है कि रूचि नहीं रहती, और दूसरे संस्करण में वो बच जाती है।
पहले संस्करण में अजय को जीवन की मार पड़ती रहती है - जो न्याय संगत नहीं है।

कुछ समय लगेगा। देखते हैं क्या लिखवाती है कलम।
मुश्किल विषय है "प्राकृतिक संतुलन" पर कुछ भी लिख पाना।

क्या हाल हैं? फ़ोरम इतना चू*या छाप क्यों लगने लगा है आज कल?
मेरी समझ में बस एक ही ढंग की कहानी है अभी -- राज भाई की सुप्रीम। और कुछ पढ़ने योग्य है क्या?
 
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dhparikh

Well-Known Member
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तीन दिन बाद सभी वापस डॉक्टर देशपाण्डे के सामने थे।

अजय दिल थामे बैठा हुआ था - इस उम्मीद में कि वो कहें कि रूचि को कोई परेशानी नहीं है। जब से उसको पता चला था कि रूचि को ब्रेन ट्यूमर की सम्भावना है, तब से उसकी नींद उड़ गई थी। वो वाक़ई जानना चाहता था कि रूचि पूरी तरह से निरोगी है। अजय की ही तरह बाकी लोगों के मन में भी उद्विग्नता थी, क्योंकि उनको नहीं पता था कि क्या सुनने को मिलेगा।

डॉक्टर देशपाण्डे ने सभी का अभिवादन कर के उनको बैठने को कहा।

अजय ने उनकी तरफ़ देखा। साफ़ दिख रहा था कि डॉक्टर साहब बड़े असमंजस में थे। लेकिन उनका चेहरा देख कर अजय समझ गया कि क्या सुनने को मिलेगा। पक्की बात थी कि रूचि को ब्रेन कैंसर था!

“रूचि,” डॉक्टर देशपाण्डे ने हिचकिचाते हुए कहना शुरू किया, “देयर इस नो ईज़ी वे टू से दिस… बट द पेन इन योर हेड इस बिकॉज़ ऑफ़ अ ट्यूमर! इट इस रफ़ली द साइज़ ऑफ़ टू सेन्टीमीटर्स… एंड इस मेलिग्नेंट,”

“मतलब डॉक्टर साहब,” किरण जी की आवाज़ काँप रही थी।

“मतलब… रूचि हैस कैंसर… ब्रेन कैंसर,”

ये सुनते ही किरण जी की एक दुःखभरी आह निकल गई, और अगले ही पल वो पल रोने लगीं।

शोभा जी तो जैसे पत्थर की हो गईं। न तो उनके कोई आवाज़ निकली और न ही आँसू।

“लेकिन डॉक्टर साहब,” अशोक जी अविश्वास से बोले, “बिटिया की अभी उम्र ही क्या है? ऐसे में कैंसर! कैसे?”

“सर, आई अंडरस्टैंड! और यह बात अच्छी है,”

“अच्छी बात है? कैसे डॉक्टर?” रवि जी ने पूछा।

“प्लीज़ लेट मी एक्सप्लेन। रूचि इस यंग, एंड हर बॉडी कंस्टीटूशन इस गुड… अच्छी हेल्थ है। … डिड आई टेल यू दैट इट इस एट अर्ली स्टेज?”

इस तथ्य से भी किसी को संतोष नहीं हुआ।

अजय ने इतनी देर में पहली बार रूचि को देखा।

और जो उसने देखा, वो देख कर उसको अचम्भा हुआ - रूचि के चेहरे पर भय का कोई चिह्न नहीं था।

रूचि और अजय साथ ही बैठे थे, और दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था। पिछले तीन दिनों से रूचि महसूस कर रही थी कि अजय जितना दिखा रहा, उससे कहीं अधिक उसको पता था। स्कैन करवा कर जब वो वानप्रस्थ अस्पताल से निकली थी, तभी से अजय के हाव भाव पढ़ कर वो समझ गई थी कि उसको कोई गंभीर रोग हो गया था। एक पल को उसको डर भी लगा; लेकिन फिर उसने सोचा कि अजय ने साक्षात परमब्रह्म को छुआ था और उसने अजय को! ईश्वर की जो भी कृपा अजय को मिली हुई थी, उसमें से कुछ तो उस पर भी आई होगी न? इसलिए डरने की क्या बात है? वैसे भी, मृत्यु तो संसार का अटल सत्य है - कभी न कभी मरना है ही। लेकिन उसको यकीन था कि अगर उसके जीवन में अजय के साथ रहना लिखा है, तो वो बदलेगा नहीं। कोई न कोई मार्ग ज़रूर निकलेगा। ऐसे में डरने का कोई मतलब ही नहीं!

डॉक्टर देशपाण्डे ने बताया, “देखिए, मैं डिटेल में बताता हूँ। रूचि को ग्लिओब्लास्टोमा ट्यूमर है, जो एक बहुत ही अग्रेसिव ब्रेन ट्यूमर होता है। यह ब्रेन की ग्लियल सेल्स में होता है, इसीलिए इसको ग्लिओब्लास्टोमा कहते हैं।”

सभी दुःखी से, लेकिन पूरी तरह से ध्यान दे कर सुन रहे थे।

“इसे ग्रेड फोर एस्ट्रोसाइटोमा में कटेगोराइज़ किया गया है, जो शायद सबसे घातक ब्रेन ट्यूमर्स में से एक है।” डॉक्टर कह रहे थे, “ये बहुत तेजी से बढ़ता है और जल्दी ही अपने आस पास के ब्रेन टिश्यू में फैल जाता है! इसलिए देर करने से इसका ट्रीटमेंट मुश्किल हो जाता है।”

किरण जी इसकी घातकता के बारे में सुन कर और भी रोने लगीं।

“वैसे तो ग्लिओब्लास्टोमा ब्रेन के किसी भी हिस्से में हो सकता है। रूचि को फ्रंटल लोब में हुआ है। इसीलिए उसको आँखों के पास में इतना पेन होता है।”

रवि जी ने पूछा, “सर, इसका ट्रीटमेंट क्या है?”

“जी, इसके मल्टीपल कोर्स होते हैं। सबसे पहला तो है सर्जरी... हमारी कोशिश रहेगी कि जितना पॉसिबल हो, उतना ट्यूमर हटा दिया जाए... बिना हेल्दी टिश्यू को नुकसान पहुँचाए। ट्यूमर अभी छोटा है, और फैला नहीं है। इसलिए दैट शुड बी इजी।”

सभी ने समझते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“कैंसर सेल्स को केवल ऑपेरशन कर के पूरी तरह निकालना इम्पॉसिबल है। इसलिए सर्जरी के बाद, एक्सटर्नल बीम रेडिएशन थेरेपी दी जायेगी। इससे ट्यूमर की बची हुई सेल्स को डिस्ट्रॉय करेंगे। ये क़रीब छः से सात सप्ताह चलेगा। अगर ज़रुरत पड़ी, तो स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी करनी पड़ेगी।”

अजय के मुँह से निकल गया, “सर, कीमोथेरेपी भी होती है?”

“हाँ, लेकिन वो हेल्दी टिश्यू पर भी असर डालती है, और बॉडी को वीक करती है। मैं अपनी रिसर्च में यही कोशिश कर रहा हूँ कि कैसे लेस टैक्सिंग (कम नुक़सान पहुँचाने वाला) ट्रीटमेंट बनाया जाए,”

कह कर डॉक्टर देशपाण्डे ने अर्थपूर्वक दृष्टि अजय पर डाली।

अजय का दिल अभी भी काँप रहा था।

“सर, बचने के क्या चांस हैं? … मतलब रूचि ठीक तो हो जायेगी न?”

“अजय, आई विल बी ट्रुथफुल हियर,” डॉक्टर साहब अपनी कुर्सी पर कसमसाते हुए बोले, “ग्लिओब्लास्टोमा के पेशेंट्स की प्रोग्नोसिस सीरियस होती है। क्योंकि यह ट्यूमर बहुत अग्रेसिव होता है। जनरली, पोस्ट ट्रीटमेंट सर्वाइवल एक्सपेक्टेशन ट्वेल्व टू एटीन मंथ्स होती है।”

यह सुन कर शोभा जी का चेहरा भय से सफ़ेद पड़ गया,

'बस एक डेढ़ साल! अभी उनकी बेटी ने कौन से सुख देखे हैं?'

लेकिन रूचि के चेहरे पर अभी भी शिकन की एक लकीर भी नहीं थी।

बट,” डॉक्टर ने इस शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा, “बट, रूचि अभी अपने टीन्स में है, हेल्दी है… इसलिए शी कैन बी बेटर! मुझे लगता है कि वो पूरी तरह से ठीक हो सकती है। मैं अभी कोई प्रॉमिस नहीं दे सकता, लेकिन मेरी पूरी कोशिश बस यही रहेगी कि रूचि को दुबारा यह रोग न आए।”

रूचि मुस्कुराई।

“यू मस्ट नो, ट्रीटमेंट का ऑब्जेक्टिव न केवल लाइफ को प्रोलांग करना होता है, बल्कि क्वालिटी ऑफ़ लाइफ को बेहतर करना भी होता है।”

कमरे में गहरी निःस्तब्धता छा गई।

कुछ देर तक किसी से कुछ कहा ही नहीं गया।

“कब शुरू करना है सर?” पूरे वार्तालाप में पहली बार रुचि ने कुछ कहा था, “ऑपेरशन कब कर सकते हैं?”

“जितना जल्दी हो सके,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “फिलहाल ट्यूमर निकालना सबसे ज़रूरी है।”

“ओके,” रूचि ने पूछा, “इसके ऑपेरशन से मेमोरी या अन्य क्षमताओं पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ता?”

“रूचि बेटा, असर हो तो सकता है। लेकिन ये बहुत से फैक्टर्स पर डिपेंड करता है। अच्छी बात ये है कि अभी ट्यूमर छोटा है। और हमारे पास ट्रीटमेंट के अडवांस्ड मेथड्स हैं। इसलिए ब्रेन डैमेज मिनिमल होने की पॉसिबिलिटी है।” डॉक्टर ने बताया, “मेमोरी फंक्शन्स पर इम्पैक्ट नहीं आना चाहिए क्योंकि ये फ्रंटल लोब में है। लेकिन स्पीच, मोटर स्किल्स - मतलब मूवमेंट, बैलेंस, और कोऑर्डिनेशन में शायद कोई समस्या हो सकती है। अभी सब बता पाना मुश्किल है! ट्यूमर ऑक्सिपिटल लोब के पास नहीं है, इसलिए विज़न में कोई प्रॉब्लम नहीं आनी चाहिए। यू में नॉट नोटिस इट, लेकिन तुम्हारे लोगों को तुम्हारी पर्सनालिटी और बिहैवियर में थोड़े चेंजेस दिखाई दे सकते हैं।”

यह सुन कर रूचि के चेहरे पर पहली बार परेशानी वाले भाव दिखाई दिए।

“लेकिन हम बहुत की केयरफुल हो कर ऑपरेशन करेंगे। माय कलीग, डॉक्टर नारायण, हैस अ गुड एंड लॉन्ग एक्सपीरियंस इन परफार्मिंग ब्रेन सर्जरी… इसलिए चिंता न करो। आई ऍम होपफ़ुल… क्योंकि जहाँ पर ये ट्यूमर है, थैंकफुली, वहाँ टिश्यू रिमूवल से ये डैमेज बहुत कम होने चाहिए,”

“ओके देन…” वो बोली, “लेट्स डू इट,”

फिर सभी को देख कर वो आगे बोली, “कमऑन… मम्मी पापा… आप लोग सभी ऐसे क्यों हैं?”

किरण जी ने अपनी अश्रुपूरित आँखों से रूचि को देखा - इतनी प्यारी सी बच्ची को अगर कुछ हो गया तो? यह विचार उनको अंदर से खाए जा रहा था। रूचि की रौनक के बगैर अब वो अपने घर के बारे में सोच भी नहीं पा रही थीं।

उनको ऐसे देख कर रूचि अपने सामान्य, खुशनुमा अंदाज़ में चुहल करते हुए बोली,

“क्या माँ! आप भी न! ऐसे क्यों रो रही हैं आप? मैं तो अभी भी हूँ न!” उसने किरण जी के आँसू पोंछे, “मुझे कुछ नहीं होगा! अभी तो आपको मेरी और अज्जू की शादी करानी है… फिर हमारे बच्चों के संग खेलना है… मैं आपको बिना ये सारी ख़ुशियाँ दिए कहीं नहीं जाने वाली!”

किरण जी उस बच्ची की हिम्मत भरी बातें सुन कर आश्चर्यचकित थीं। उनको भी थोड़ा दिलासा मिला।

फिर रूचि उनके कानों के फ़ुसफ़ुसाते हुए बोलती है, “… और मुझे आपका खूब सारा दुद्धू पीना है… बहुत सालों तक!”

इस आखिरी बात पर रोते रोते भी, अनायास ही किरण जी के होंठों पर मुस्कान आ ही गई।

“दैट्स लाइक माय प्यारी सी माँ,”

फिर उसने शोभा जी को देखा, और हँसते हुए बोली, “मम्मी, आप भी रोना बंद करेंगी, या आपको भी समझाऊँ,”

“ओह मेरी बच्चे,” कह कर उन्होंने रूचि को अपने आलिंगन में भर लिया।

अशोक जी और रवि जी भी एक दूसरे को हाथ पकड़ कर सम्बल दे रहे थे। मर्द थे, इसलिए दोनों अपनी पीड़ा सबके सामने दिखा नहीं पा रहे थे। लेकिन अंदर ही अंदर उनके दिलों में जैसे नश्तर चुभ रहा था। एक अभूतपूर्व टीस बार बार उठ रही थी। लेकिन चाहे जो भी हो, मुश्किल की इस घड़ी में यह पूरा परिवार उस मुश्किल का सामना करने के लिए एक जुट था।

डॉक्टर देशपाण्डे भी इस भावनात्मक रूप से गहरे हो चले माहौल को देख रहे थे और मन ही मन वो भी द्रवित हो रहे थे। सच में, ऐसे प्यारे से परिवार का नुकसान नहीं होना चाहिए - रूचि जैसी प्यारी सी बच्ची के रूप में तो बिल्कुल ही नहीं।

“इफ यू आर ओके,” डॉक्टर देशपाण्डे बोले, “देन व्ही कैन परफॉर्म द ऑपरेशन नेक्स्ट वीक,”

रवि जी ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए कहा, “जैसा आप ठीक समझें डॉक्टर साहब,”

छोटी मोटी औपचारिक बातें करने के बाद जब सभी वहाँ से निकल रहे थे, तब डॉक्टर देशपाण्डे ने इशारे से अजय को दो मिनट रुकने को कहा।

“अजय,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “डिड यू नोटिस वन थिंग?”

“क्या सर?”

“रूचि को वही कैंसर हुआ है, जिसका सलूशन तुम उस दिन बेहोशी की हालत में बता रहे थे?”

“व्हा…” अजय को यकीन ही नहीं हुआ।

डॉक्टर देशपाण्डे ने ‘हाँ’ में सर हिलाया, “एंड ऐस आई प्रॉमिस्ड, मैं रूचि का इलाज़ पूरी तरह से फ्री में करूँगा। लेकिन तुमको भी मेरी मदद करनी होगी! … सोचो, इस खतरनाक बीमारी का इलाज़ मिलने से कितने लोगों को फायदा पहुँचेगा!”

“आई नो सर, एंड थैंक यू!”

“अजय, तुम सभी चिंता मत करो!” डॉक्टर देशपाण्डे ने पूरे विश्वास से कहा, “न जाने क्यों, मुझे यकीन है कि रूचि पूरी तरह से ठीक हो जाएगी… वो भी जल्दी ही!”

**
Nice update....
 

Sushil@10

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प्रशांत और पैट्रिशिया अपनी शादी के एक सप्ताह बाद वापस अमेरिका लौट गए।

इतने समय में सभी की दिनचर्या बेहद धीमी रफ़्तार में वापस सामान्य हो रही थी। कमल और माया की दिनचर्या तो बहुत बदल गई थी और होनी भी चाहिए थी। उधर रूचि भी अब अधिकतर समय अजय के घर में ही बिता रही थी। अक्सर ही रात में वो वहीं रुक जाती। अजय के माता पिता ने रूचि के माता पिता - रवि और शोभा जी से इस बात की आज्ञा ले ली थी। किरण जी और अशोक जी को अपनी बहू रूचि का अपने सामने रहना बहुत भाता। उनको माया के अपने ससुराल जाने की कमी खलती, उससे पहले ही रूचि ने वो कमी पूरी कर दी थी। रूचि की सौम्यता, हँसी, और भोली शरारतों से उनके घर में रौनक रहती। रवि और शोभा जी भी समझ रहे थे कि बहुत जल्दी ही अजय और रूचि की भी शादी हो जाएगी। ऐसे में अनावश्यक ही इस नवोदित सम्बन्ध को जटिल बनाने की कोई आवश्यकता नहीं थी।

और तो और, रूचि को वो अपने से अलग भी न मानते थे। इसलिए आज जब रूचि को डॉक्टर को दिखाने की बात आई, तो न केवल रूचि के माता पिता, बल्कि अजय और उसके माता पिता भी आए हुए थे।

“हेल्लो रूचि,” डॉक्टर देशपाण्डे ने बड़ी गर्मजोशी से रूचि से हाथ मिलाते हुए उसका अभिवादन किया, “हाऊ आर व्ही टुडे?”

“आई ऍम गुड, सर” रूचि ने भी उनका अभिवादन गर्मजोशी से किया, “हाऊ आर यू?”

“वैरी वेल... थैंक यू!” फिर उसके माता पिता का अभिवादन करते हुए बोले, “हेल्लो मिस्टर एंड मिसेज़ गुप्ता!”

“नमस्ते डॉक्टर साहब,” रवि जी और शोभा जी ने भी डॉक्टर देशपाण्डे का अभिवादन किया।

डॉक्टर देशपाण्डे ने अजय के माता पिता का अभिवादन करते हुए बोले, “हेल्लो मिस्टर एंड मिसेज़ ठाकुर!”

डॉक्टर देशपाण्डे द्वारा दोनों का इस तरह ‘साथ’ में अभिवादन सुन कर रूचि के होंठों पर एक शरारती मुस्कान आ गई। अजय ने आँखें तरेर कर उसको चुप रहने का इशारा किया।

“एंड हाऊ इस माय फ़ेवरिट यंग मैन?”

अजय ने डॉक्टर देशपाण्डे से हाथ मिलाते हुए कहा, “गुड मॉर्निंग सर! आई ऍम गुड! हाऊ आर यू?”

डॉक्टर देशपाण्डे बोले, “फैंटास्टिक! भई, आप सभी को यूँ साथ में देख कर बहुत अच्छा लगा… बहुत कम ऐसे परिवार देखें हैं जिनमें इस तरह से… जो बड़ी मोहब्बत से रहते हैं। आप लोग जब भी आते हैं, तो साथ में आते हैं… और मज़बूती से एक दूसरे के संग खड़े रहते हैं।”

“डॉक्टर साहब,” अशोक जी बोले, “रूचि भी तो हमारी बेटी है,”

“सो तो है… सो तो है,” वो बोले, फिर रूचि की तरफ़ मुखातिब हो कर, “नाऊ रूचि, प्लीज़ टेल मी, व्हाट इस एलिंग यू?”

“सर,” उसने बताना शुरू किया, “आई समटाइम्स एक्सपीरियंस शूटिंग पेन इन माय हेड।”

“हाऊ आफ्टेन?”

“वीक में कभी कभी... लेकिन कभी कभी एक दिन में दो बार भी एक्सपीरियंस किया है।”

“इंटेंसिटी कितनी होती है - से ऑन अ स्केल ऑफ़ टेन?”

“युसुअलि सिक्स सेवेन...”

“इन मॉर्निंग्स?”

“हाँ! कभी कभी। लेकिन सुबह का पेन अधिक... पेनफुल होता है।”

“ओके! प्लीज डोंट बी अलार्मड, व्हेन आई आस्क यू दिस... बट डू यू एक्सपीरियंस सीज़र्स?”

“मतलब?”

“मतलब कभी बॉडी में अनयुसुअल झटका महसूस हुआ हो कभी?”

“एक बार हुआ था,” रूचि ने चिंतित स्वर में कहा, “एक बार हुआ था... जस्ट वन लिटिल जॉल्ट!”

“हम्म... टायर्डनेस?”

“होती ही है,”

“नहीं, जनरल टायर्डनेस नहीं... हमेशा रहती है क्या?”

“नो... लेकिन कभी कभी पेन के कारण ठीक से सो नहीं पाती, जिसके कारण अगली सुबह थोड़ा सुस्ती रहती है।

“व्हेन डिड यू गेट योर प्रिस्क्रिप्शन ग्लासेस?”

“रीसेंटली... बट दे आर नॉट हेल्पिंग। इन फैक्ट, आई थिंक इनके कारण और दिक्कत हो गई है।”

“टिनिटस (कभी कभी ऐसा होता है कि कानों के अंदर सीटी बजने जैसी आवाजें सुनाई देती हैं, चाहे आप किसी शांत जगह पर ही क्यों न बैठे हों)?”

“नो... उम्, वेल, वो तो सभी को होता है।”

“यस यस... मेरा मतलब अनयूसुअल?

“नो,”

“मितली होती है?”

“क्या हो गया डॉक्टर साहब? आप इतने सारे क्वेश्चंस क्यों पूछ रहे हैं?” रूचि के पिता, रवि गुप्ता जी ने बेहद चिंतित होते हुए पूछा।

“देखिए मिस्टर गुप्ता, आप ऐसे घबराइए नहीं। ये सब क्वेश्चंस मैं एक बेसलाइन इस्टैब्लिश करने के लिए पूछ रहा हूँ। सिम्प्टंप्स ठीक से पता होंगे, तभी कोर्स ऑफ़ एक्शन डिसाइड हो पाएगा।”

“पापा... इट्स ओके! डोंट वरी! ... नहीं सर, कोई मितली नहीं होती है।”

“डू यू टू मेक लव?” डॉक्टर देशपाण्डे ने अचानक से ही शरारतपूर्वक पूछ लिया।

“व्हाट!” अजय अविश्वनीय तरीके से चौंक गया।

“नहीं डॉक्टर साहब,” किरण जी ने कहा, “हमारे बच्चे बहुत अच्छे हैं... इनमें अभी भी भोलापन है!”

किरण जी की बात से रूचि के माता पिता को बड़ी राहत हुई - ख़ास कर उसकी माँ शोभा जी को। उनको तो यही लग रहा था कि दोनों ने अब तक कई बार सेक्स कर लिया होगा। लेकिन किरण जी के मुँह से यह सुन कर उनको अच्छा लगा और राहत हुई। अपनी बेटी की बातों (रूचि हमेशा ही उनसे कहती थी कि वो और अजय बहुत क़रीब हैं, लेकिन वो दोनों सेक्स नहीं करते) पर उनको और भी अधिक विश्वास हो गया, और साथ ही अजय और रूचि की मोहब्बत पर गुमान भी!

“ओके! गुड,” डॉक्टर देशपाण्डे मुस्कुराते हुए बोले, “हाऊ आर योर स्टडीज़? एनी प्रॉब्लम्स विद योर मेमोरी?”

“नो सर,”

“ऑन द कंट्रेरी सर,” अजय बोला, “शी इस द टॉपर... एंड आई ऍम श्योर दैट शी विल बी दिस ईयर्स मेरिट लिस्ट टॉपर ऐस वेल,”

अजय हँसते हुए बताया।

“आई ऍम श्योर! रूचि इस अ शार्प एंड इंटेलीजेंट गर्ल... एंड यू आर अ लकी मैन!”

“दैट आई ऍम,” अजय ने हँसते हुए स्वीकारा, “थैंक यू सर,”

“रूचि बेटे, मैंने पहले से ही आपके लिए एमआरआई स्कैनिंग की बुकिंग कर दी है।”

“सर कोई प्रॉब्लम है क्या?”

“वही बता रहा हूँ,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “एमआरआई स्कैनिंग की रिपोर्ट्स के बाद मैं आपको ठीक ठीक बता सकूँगा!”

“कब तक आ जाएगी रिपोर्ट्स?”

“थ्री डेज़... आई विल कॉल यू विद ऐन अपॉइंटमेंट,” डॉक्टर ने कहा, “अभी आप लोग रूचि का हेड स्कैन करवा लें!”

सभी लोग स्कैन रूम की तरफ़ जाने लगे तो डॉक्टर देशपाण्डे ने अजय से बात करने की गरज़ से उसको दो पल के लिए रोका।

“अजय, तुम कैसे हो?”

“फर्स्ट क्लास, सर!” अजय बोला, “... सर एक बात बताइए? रूचि को कोई सीरियस परेशानी तो नहीं है?”

“अजय... मैं तुमको कोई झूठा दिलासा नहीं दूँगा। सबके सामने कुछ कह नहीं पाया, लेकिन रूचि तुम्हारी मंगेतर है, इसलिए तुमको मेरा इनिशियल असेसमेंट जानने का पूरा हक़ है।” डॉक्टर देशपाण्डे ने गहरी साँस भरी, “आई सस्पेक्ट कि रूचि के ब्रेन में ट्यूमर है,”

“व्हाट?” ट्यूमर शब्द सुनते ही अजय का दिमाग सुन्न हो गया।

कुछ पलों तक उसको समझ ही नहीं आया कि वो क्या कहे। लेकिन फिर स्वयं को समेट कर उसने डॉक्टर देशपाण्डे जो कह रहे थे, वो समझने को कोशिश करी।

डॉक्टर ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए बताया, “रूचि ब्रेन ट्यूमर के क्लासिक, लेकिन इनिशियल सिम्पटम्स डिस्प्ले कर रही है... आई थिंक अभी शुरू ही हुआ है। ... सर का दर्द ब्रेन ट्यूमर का सबसे कॉमन सिम्पटम है। ट्यूमर के कारण ब्रेन में प्रेशर बनता है, जिसको इंट्राक्रैनियल प्रेशर कहते हैं। उसके कारण हेडेक (सरदर्द) होता है। रूचि के बाकी सिम्पटम्स या तो एब्सेंट हैं या वीक! इसीलिए मैंने कहा कि ट्यूमर अभी शुरू हुआ है,”

“इसका इलाज तो होगा न सर?”

“जैसे बाकी कैंसर्स बहुत टाइप के होते हैं, वैसे ही ब्रेन कैंसर्स में भी वैरायटी होती है। ... एमआरआई स्कैन से क्लैरिटी आएगी कि रूचि को क्या है। उसी के बाद सॉलूशन निकलेगा।”

“ओह गॉड,”

“अजय... प्लीज! ऐसे अपना दिल न हारो। ... यू मस्ट नो दैट इफ डिटेक्टेड अर्ली ऑन, कैंसर ट्रीटमेंट सक्सेस रेट इस वैरी हाई,”

अजय ने समझते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“रूचि अभी छोटी है; हेल्दी है; उसका बॉडी कंस्टीटूशन अच्छा है। आई ऍम श्योर वो पूरी तरह ठीक हो जाएगी!”

अजय सुन भी रहा था, और नहीं भी!

रूचि को ऐसा रोग हो गया लगता है जिसका नाम भी लेने में लोग काँप जाते हैं। किसी के संग सुखपूर्वक जीवन जीने की अभिलाषा क्या हुई, मानो गुनाह हो गया! कहीं ऐसा तो नहीं कि वो अच्छे जीवन जीने की अभिलाषा में स्वार्थी हो गया? तो उसी बात का दण्ड मिल रहा है? लेकिन फिर उसके अपराध का दण्ड किसी अन्य को क्यों मिले? नहीं नहीं... ईश्वर ऐसे निष्ठुर तो नहीं हो सकते! वैसे भी, उन्होंने कुछ सोच कर ही उसको ‘वापस’ भेजा है। माया दीदी और कमल दोनों का कुछ भला हुआ उसके वापस आने से। प्रशांत भैया और पैट्रिशिया भाभी का जीवन भी पटरी पर है। शायद पापा भी सही रहें!

तो क्या... तो क्या... रूचि को इस क्षति से बचाने का निमित्त भी अजय ही है?

संभव है न?

उसने दिमाग पर ज़ोर लगाया।

पिछले जीवन में कॉलेज के बाद उसको रूचि के बारे में पता ही क्या था? कुछ भी तो नहीं। शायद, पिछली ज़िन्दगी में उसको वो स्मृतियाँ कभी याद रही हों? लेकिन अब? अब तो बिल्कुल भी याद नहीं।

संभव है कि पिछले समयकाल में यह ब्रेन कैंसर रूचि को लील गया हो। लेकिन अगर वो वापस आया है, तो वो रूचि को बचाने के लिए जो भी बन पड़ेगा वो करेगा।

“... अजय? क्या हुआ? कहाँ खो गए?”

“कुछ नहीं सर! ... जो भी हो, जस्ट प्लीज़ लेट मी नो?” अजय की आवाज़ में एक तरह की हिम्मत सुनाई दे रही थी।

“बिल्कुल... मुझे सही लगा था कि तुममें बड़ी हिम्मत है। यू आर नॉट आवर जनरल टीनएजर... तुम अलग हो!”

अजय ने एक फीकी मुस्कान दी।

“अजय... दिल न हारो। रूचि को सम्हालने का काम तुम्हारा है। उसको खुश रखो। आगे की ज़िन्दगी के सपने बुनो। ... होप (आशा) बहुत बड़ी चीज़ होती है ऐसे रोगों को हराने में। होप मत छोड़ना! और फिर मैं तो हूँ ही न! आई विल डू माय बेस्ट... आई विल डू एवरीथिंग इन माय पॉवर टू ट्रीट रूचि बैक टू अ परफेक्ट हेल्थ!”

अजय ने गहरी साँस भरी।

हाँ वो भी सब कुछ करेगा रूचि को बचाने की!

उसके होंठों पर एक हल्की सी, लेकिन आशाभरी मुस्कान आ गई।

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अपडेट 77


तीन दिन बाद सभी वापस डॉक्टर देशपाण्डे के सामने थे।

अजय दिल थामे बैठा हुआ था - इस उम्मीद में कि वो कहें कि रूचि को कोई परेशानी नहीं है। जब से उसको पता चला था कि रूचि को ब्रेन ट्यूमर की सम्भावना है, तब से उसकी नींद उड़ गई थी। वो वाक़ई जानना चाहता था कि रूचि पूरी तरह से निरोगी है। अजय की ही तरह बाकी लोगों के मन में भी उद्विग्नता थी, क्योंकि उनको नहीं पता था कि क्या सुनने को मिलेगा।

डॉक्टर देशपाण्डे ने सभी का अभिवादन कर के उनको बैठने को कहा।

अजय ने उनकी तरफ़ देखा। साफ़ दिख रहा था कि डॉक्टर साहब बड़े असमंजस में थे। लेकिन उनका चेहरा देख कर अजय समझ गया कि क्या सुनने को मिलेगा। पक्की बात थी कि रूचि को ब्रेन कैंसर था!

“रूचि,” डॉक्टर देशपाण्डे ने हिचकिचाते हुए कहना शुरू किया, “देयर इस नो ईज़ी वे टू से दिस… बट द पेन इन योर हेड इस बिकॉज़ ऑफ़ अ ट्यूमर! इट इस रफ़ली द साइज़ ऑफ़ टू सेन्टीमीटर्स… एंड इस मेलिग्नेंट,”

“मतलब डॉक्टर साहब,” किरण जी की आवाज़ काँप रही थी।

“मतलब… रूचि हैस कैंसर… ब्रेन कैंसर,”

ये सुनते ही किरण जी की एक दुःखभरी आह निकल गई, और अगले ही पल वो पल रोने लगीं।

शोभा जी तो जैसे पत्थर की हो गईं। न तो उनके कोई आवाज़ निकली और न ही आँसू।

“लेकिन डॉक्टर साहब,” अशोक जी अविश्वास से बोले, “बिटिया की अभी उम्र ही क्या है? ऐसे में कैंसर! कैसे?”

“सर, आई अंडरस्टैंड! और यह बात अच्छी है,”

“अच्छी बात है? कैसे डॉक्टर?” रवि जी ने पूछा।

“प्लीज़ लेट मी एक्सप्लेन। रूचि इस यंग, एंड हर बॉडी कंस्टीटूशन इस गुड… अच्छी हेल्थ है। … डिड आई टेल यू दैट इट इस एट अर्ली स्टेज?”

इस तथ्य से भी किसी को संतोष नहीं हुआ।

अजय ने इतनी देर में पहली बार रूचि को देखा।

और जो उसने देखा, वो देख कर उसको अचम्भा हुआ - रूचि के चेहरे पर भय का कोई चिह्न नहीं था।

रूचि और अजय साथ ही बैठे थे, और दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था। पिछले तीन दिनों से रूचि महसूस कर रही थी कि अजय जितना दिखा रहा, उससे कहीं अधिक उसको पता था। स्कैन करवा कर जब वो वानप्रस्थ अस्पताल से निकली थी, तभी से अजय के हाव भाव पढ़ कर वो समझ गई थी कि उसको कोई गंभीर रोग हो गया था। एक पल को उसको डर भी लगा; लेकिन फिर उसने सोचा कि अजय ने साक्षात परमब्रह्म को छुआ था और उसने अजय को! ईश्वर की जो भी कृपा अजय को मिली हुई थी, उसमें से कुछ तो उस पर भी आई होगी न? इसलिए डरने की क्या बात है? वैसे भी, मृत्यु तो संसार का अटल सत्य है - कभी न कभी मरना है ही। लेकिन उसको यकीन था कि अगर उसके जीवन में अजय के साथ रहना लिखा है, तो वो बदलेगा नहीं। कोई न कोई मार्ग ज़रूर निकलेगा। ऐसे में डरने का कोई मतलब ही नहीं!

डॉक्टर देशपाण्डे ने बताया, “देखिए, मैं डिटेल में बताता हूँ। रूचि को ग्लिओब्लास्टोमा ट्यूमर है, जो एक बहुत ही अग्रेसिव ब्रेन ट्यूमर होता है। यह ब्रेन की ग्लियल सेल्स में होता है, इसीलिए इसको ग्लिओब्लास्टोमा कहते हैं।”

सभी दुःखी से, लेकिन पूरी तरह से ध्यान दे कर सुन रहे थे।

“इसे ग्रेड फोर एस्ट्रोसाइटोमा में कटेगोराइज़ किया गया है, जो शायद सबसे घातक ब्रेन ट्यूमर्स में से एक है।” डॉक्टर कह रहे थे, “ये बहुत तेजी से बढ़ता है और जल्दी ही अपने आस पास के ब्रेन टिश्यू में फैल जाता है! इसलिए देर करने से इसका ट्रीटमेंट मुश्किल हो जाता है।”

किरण जी इसकी घातकता के बारे में सुन कर और भी रोने लगीं।

“वैसे तो ग्लिओब्लास्टोमा ब्रेन के किसी भी हिस्से में हो सकता है। रूचि को फ्रंटल लोब में हुआ है। इसीलिए उसको आँखों के पास में इतना पेन होता है।”

रवि जी ने पूछा, “सर, इसका ट्रीटमेंट क्या है?”

“जी, इसके मल्टीपल कोर्स होते हैं। सबसे पहला तो है सर्जरी... हमारी कोशिश रहेगी कि जितना पॉसिबल हो, उतना ट्यूमर हटा दिया जाए... बिना हेल्दी टिश्यू को नुकसान पहुँचाए। ट्यूमर अभी छोटा है, और फैला नहीं है। इसलिए दैट शुड बी इजी।”

सभी ने समझते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“कैंसर सेल्स को केवल ऑपेरशन कर के पूरी तरह निकालना इम्पॉसिबल है। इसलिए सर्जरी के बाद, एक्सटर्नल बीम रेडिएशन थेरेपी दी जायेगी। इससे ट्यूमर की बची हुई सेल्स को डिस्ट्रॉय करेंगे। ये क़रीब छः से सात सप्ताह चलेगा। अगर ज़रुरत पड़ी, तो स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी करनी पड़ेगी।”

अजय के मुँह से निकल गया, “सर, कीमोथेरेपी भी होती है?”

“हाँ, लेकिन वो हेल्दी टिश्यू पर भी असर डालती है, और बॉडी को वीक करती है। मैं अपनी रिसर्च में यही कोशिश कर रहा हूँ कि कैसे लेस टैक्सिंग (कम नुक़सान पहुँचाने वाला) ट्रीटमेंट बनाया जाए,”

कह कर डॉक्टर देशपाण्डे ने अर्थपूर्वक दृष्टि अजय पर डाली।

अजय का दिल अभी भी काँप रहा था।

“सर, बचने के क्या चांस हैं? … मतलब रूचि ठीक तो हो जायेगी न?”

“अजय, आई विल बी ट्रुथफुल हियर,” डॉक्टर साहब अपनी कुर्सी पर कसमसाते हुए बोले, “ग्लिओब्लास्टोमा के पेशेंट्स की प्रोग्नोसिस सीरियस होती है। क्योंकि यह ट्यूमर बहुत अग्रेसिव होता है। जनरली, पोस्ट ट्रीटमेंट सर्वाइवल एक्सपेक्टेशन ट्वेल्व टू एटीन मंथ्स होती है।”

यह सुन कर शोभा जी का चेहरा भय से सफ़ेद पड़ गया,

'बस एक डेढ़ साल! अभी उनकी बेटी ने कौन से सुख देखे हैं?'

लेकिन रूचि के चेहरे पर अभी भी शिकन की एक लकीर भी नहीं थी।

बट,” डॉक्टर ने इस शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा, “बट, रूचि अभी अपने टीन्स में है, हेल्दी है… इसलिए शी कैन बी बेटर! मुझे लगता है कि वो पूरी तरह से ठीक हो सकती है। मैं अभी कोई प्रॉमिस नहीं दे सकता, लेकिन मेरी पूरी कोशिश बस यही रहेगी कि रूचि को दुबारा यह रोग न आए।”

रूचि मुस्कुराई।

“यू मस्ट नो, ट्रीटमेंट का ऑब्जेक्टिव न केवल लाइफ को प्रोलांग करना होता है, बल्कि क्वालिटी ऑफ़ लाइफ को बेहतर करना भी होता है।”

कमरे में गहरी निःस्तब्धता छा गई।

कुछ देर तक किसी से कुछ कहा ही नहीं गया।

“कब शुरू करना है सर?” पूरे वार्तालाप में पहली बार रुचि ने कुछ कहा था, “ऑपेरशन कब कर सकते हैं?”

“जितना जल्दी हो सके,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “फिलहाल ट्यूमर निकालना सबसे ज़रूरी है।”

“ओके,” रूचि ने पूछा, “इसके ऑपेरशन से मेमोरी या अन्य क्षमताओं पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ता?”

“रूचि बेटा, असर हो तो सकता है। लेकिन ये बहुत से फैक्टर्स पर डिपेंड करता है। अच्छी बात ये है कि अभी ट्यूमर छोटा है। और हमारे पास ट्रीटमेंट के अडवांस्ड मेथड्स हैं। इसलिए ब्रेन डैमेज मिनिमल होने की पॉसिबिलिटी है।” डॉक्टर ने बताया, “मेमोरी फंक्शन्स पर इम्पैक्ट नहीं आना चाहिए क्योंकि ये फ्रंटल लोब में है। लेकिन स्पीच, मोटर स्किल्स - मतलब मूवमेंट, बैलेंस, और कोऑर्डिनेशन में शायद कोई समस्या हो सकती है। अभी सब बता पाना मुश्किल है! ट्यूमर ऑक्सिपिटल लोब के पास नहीं है, इसलिए विज़न में कोई प्रॉब्लम नहीं आनी चाहिए। यू में नॉट नोटिस इट, लेकिन तुम्हारे लोगों को तुम्हारी पर्सनालिटी और बिहैवियर में थोड़े चेंजेस दिखाई दे सकते हैं।”

यह सुन कर रूचि के चेहरे पर पहली बार परेशानी वाले भाव दिखाई दिए।

“लेकिन हम बहुत की केयरफुल हो कर ऑपरेशन करेंगे। माय कलीग, डॉक्टर नारायण, हैस अ गुड एंड लॉन्ग एक्सपीरियंस इन परफार्मिंग ब्रेन सर्जरी… इसलिए चिंता न करो। आई ऍम होपफ़ुल… क्योंकि जहाँ पर ये ट्यूमर है, थैंकफुली, वहाँ टिश्यू रिमूवल से ये डैमेज बहुत कम होने चाहिए,”

“ओके देन…” वो बोली, “लेट्स डू इट,”

फिर सभी को देख कर वो आगे बोली, “कमऑन… मम्मी पापा… आप लोग सभी ऐसे क्यों हैं?”

किरण जी ने अपनी अश्रुपूरित आँखों से रूचि को देखा - इतनी प्यारी सी बच्ची को अगर कुछ हो गया तो? यह विचार उनको अंदर से खाए जा रहा था। रूचि की रौनक के बगैर अब वो अपने घर के बारे में सोच भी नहीं पा रही थीं।

उनको ऐसे देख कर रूचि अपने सामान्य, खुशनुमा अंदाज़ में चुहल करते हुए बोली,

“क्या माँ! आप भी न! ऐसे क्यों रो रही हैं आप? मैं तो अभी भी हूँ न!” उसने किरण जी के आँसू पोंछे, “मुझे कुछ नहीं होगा! अभी तो आपको मेरी और अज्जू की शादी करानी है… फिर हमारे बच्चों के संग खेलना है… मैं आपको बिना ये सारी ख़ुशियाँ दिए कहीं नहीं जाने वाली!”

किरण जी उस बच्ची की हिम्मत भरी बातें सुन कर आश्चर्यचकित थीं। उनको भी थोड़ा दिलासा मिला।

फिर रूचि उनके कानों के फ़ुसफ़ुसाते हुए बोलती है, “… और मुझे आपका खूब सारा दुद्धू पीना है… बहुत सालों तक!”

इस आखिरी बात पर रोते रोते भी, अनायास ही किरण जी के होंठों पर मुस्कान आ ही गई।

“दैट्स लाइक माय प्यारी सी माँ,”

फिर उसने शोभा जी को देखा, और हँसते हुए बोली, “मम्मी, आप भी रोना बंद करेंगी, या आपको भी समझाऊँ,”

“ओह मेरी बच्चे,” कह कर उन्होंने रूचि को अपने आलिंगन में भर लिया।

अशोक जी और रवि जी भी एक दूसरे को हाथ पकड़ कर सम्बल दे रहे थे। मर्द थे, इसलिए दोनों अपनी पीड़ा सबके सामने दिखा नहीं पा रहे थे। लेकिन अंदर ही अंदर उनके दिलों में जैसे नश्तर चुभ रहा था। एक अभूतपूर्व टीस बार बार उठ रही थी। लेकिन चाहे जो भी हो, मुश्किल की इस घड़ी में यह पूरा परिवार उस मुश्किल का सामना करने के लिए एक जुट था।

डॉक्टर देशपाण्डे भी इस भावनात्मक रूप से गहरे हो चले माहौल को देख रहे थे और मन ही मन वो भी द्रवित हो रहे थे। सच में, ऐसे प्यारे से परिवार का नुकसान नहीं होना चाहिए - रूचि जैसी प्यारी सी बच्ची के रूप में तो बिल्कुल ही नहीं।

“इफ यू आर ओके,” डॉक्टर देशपाण्डे बोले, “देन व्ही कैन परफॉर्म द ऑपरेशन नेक्स्ट वीक,”

रवि जी ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए कहा, “जैसा आप ठीक समझें डॉक्टर साहब,”

छोटी मोटी औपचारिक बातें करने के बाद जब सभी वहाँ से निकल रहे थे, तब डॉक्टर देशपाण्डे ने इशारे से अजय को दो मिनट रुकने को कहा।

“अजय,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “डिड यू नोटिस वन थिंग?”

“क्या सर?”

“रूचि को वही कैंसर हुआ है, जिसका सलूशन तुम उस दिन बेहोशी की हालत में बता रहे थे?”

“व्हा…” अजय को यकीन ही नहीं हुआ।

डॉक्टर देशपाण्डे ने ‘हाँ’ में सर हिलाया, “एंड ऐस आई प्रॉमिस्ड, मैं रूचि का इलाज़ पूरी तरह से फ्री में करूँगा। लेकिन तुमको भी मेरी मदद करनी होगी! … सोचो, इस खतरनाक बीमारी का इलाज़ मिलने से कितने लोगों को फायदा पहुँचेगा!”

“आई नो सर, एंड थैंक यू!”

“अजय, तुम सभी चिंता मत करो!” डॉक्टर देशपाण्डे ने पूरे विश्वास से कहा, “न जाने क्यों, मुझे यकीन है कि रूचि पूरी तरह से ठीक हो जाएगी… वो भी जल्दी ही!”

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अपडेट 2


अजय ने अपनी कलाई की घड़ी को देखा, “इमरजेंसी सर्विस न जाने कब आएगी!”

“आ जाएगी बच्चे!” प्रजापति ने मुस्कुरा कर अपनी टूटी फूटी दर्द-भरी आवाज़ में कहा, “... मैं बहुत बोल नहीं पाऊँगा... तकलीफ़ होती है। तुम ही सब कहो! अपने बारे में बताओ कुछ...”

“क्या है बताने को अंकल जी? कुछ भी नहीं!”

“अरे! ऐसे न कहो बेटे! अपने रक्षक के बारे में जानने का कुछ तो हक़ है न मुझे?”

“हा हा हा... रक्षक! क्या अंकल जी!” अजय ने हँसते हँसते कहा, “ठीक है, कहता हूँ!”

“हम दिल्ली में रहते थे... हम, मतलब मेरे मम्मी पापा... मैं... और मेरे काका ताई!” अजय ने बताना शुरू किया, “पापा का बिज़नेस था, जो उन्होंने मम्मी के साथ शुरू किया था। मम्मी तब चल बसीं जब मैं पंद्रह साल का था। ... एक्चुअली, एक रोड एक्सीडेंट में माँ और काका चल बसे।”

प्रजापति ने सहानुभूति में सर हिलाया।

“फिर पापा ने ख़ुद को काम में झोंक दिया। ... लेकिन उनकी किस्मत ऐसी ख़राब निकली कि कई सालों तक बिज़नेस में उनको नुक़सान उठाना पड़ा। बहुत टेंशन में थे वो... एक दिन उसी के चलते उनको हार्ट अटैक हुआ और वो चल बसे!”

“आई ऍम सो सॉरी बेटे... इतनी कम उम्र में माँ बाप को खोना...” प्रजापति ने सर हिलाते हुए कहा, “और तुम?”

“जी कुछ भी ख़ास नहीं! बस, ऍमसीए करने के बाद छोटी मोटी नौकरियाँ करता रहा हूँ... अभी भी स्ट्रगल चल रहा है! घर में बस ताई जी हैं... तो वो ही मेरा परिवार हैं!”

“उनके बच्चे हैं?”

“एक बेटा है उनका... अमेरिका में! लेकिन वो अपने में ही खुश हैं!”

“शादी?”

“हाँ... उनकी शादी हो गई है!”

बूढ़ा बहुत मुश्किल से मुस्कुराया, “नहीं... तुम्हारी...”

अजय ने फ़ीकी हँसी हँसते हुए कहा, “हाँ... हुई थी शादी... लेकिन उसकी याद न ही करूँ तो बेहतर!”

“क्या हुआ?”

“होना क्या है अंकल जी... वही जो आज कल हर रोज़ हज़ारों आदमियों के साथ हो रहा है! ... उसने ताई जी और मुझ पर दहेज़ और डोमेस्टिक वायलेंस का झूठा केस लगा दिया!”

कहते हुए उसके मन में कड़वी यादें ताज़ा हो गईं!

रागिनी... उसकी पत्नी -- नहीं, भूतपूर्व पत्नी... एक्स वाइफ... के साथ बिताया गया एक एक पल जैसे नश्तर पर चलने के समान था। विदा हो कर आते ही उसने गिरगिट की तरह रंग दिखाने शुरू कर दिए थे। परिवार को तोड़ने की हर कला में निपुण थी वो! ऊपर से देश का कानून - दफ़ा 498A की बलि-वेदी पर अनगिनत भारतीय पुरुषों की बलि चढ़ चुकी है... एक उसकी भी सही!

“ऐसे में कोई कुछ सुनता थोड़े ही है! ... उसके चलते हम दोनों को तीन साल जेल में रहना पड़ा। न कोई सुनवाई न कुछ! ... डिवोर्स के सेटलमेंट में पापा का घर उसने हड़प लिया। ... बाद में दहेज़ का केस झूठा साबित हुआ... वायलेंस का भी... लेकिन तब तक हमारा सब कुछ बर्बाद हो गया था। वो सब होने से पहले वो पापा का घर भी बेच कर, सब कुछ सफ़ाचट कर के चम्पत हो गई... पुलिस को उसको ढूंढने में कोई इंटरेस्ट नहीं था। ... बस... इस तरह पीछे रह गए बस माँ और मैं!”

यह सब याद कर के अजय का मन खट्टा हो गया, “... जेल जाने के कारण जो छोटे मोटे काम मिलते थे, वो भी बंद हो गए। अब बस जैसे तैसे दो जून की रोटी का जुगाड़ हो पाता है, बस!”

प्रजापति ने निराशा में अपना सर झुका लिया, “क्या हो गया है समाज को... संसार को! हर तरफ़ बस नीचता ही नीचता!”

“हा हा! समाज और संसार को हम बदल तो नहीं सकते न अंकल जी!”

“तो क्या बदलना चाहते हो?” प्रजापति ने पूरी सहानुभूति से पूछा, “अगर उस लड़की... मतलब तुम्हारी बीवी से फिर से मुलाक़ात हो जाए, तो बदला लोगे उससे?”

“आपको क्या लगता है? इतना कुछ हो जाने के बाद मैं उसकी शक्ल भी देखना चाहूँगा?”

“फ़िर?”

“नहीं अंकल जी... मैं वैसी ज़हरीली सी लड़की फ़िर कभी भी अपनी ज़िन्दगी में देखना नहीं चाहूँगा... न ही कभी देखना और न ही कभी मिलना! कम से कम ये तो होना ही चाहिए!”

प्रजापति ने मुस्कुराते हुए कहा, “वो भी ठीक बात है! फिर क्या चाहते हो?”

“अंकल जी,” अजय ने कुछ देर सोचते हुए कहा, “एक मौका चाहता हूँ बस... एक मौका कि जो कुछ जानता हूँ, काश उसका एक बेहतर तरीक़े से इस्तेमाल कर सकता... काश कि अपने पापा, अपनी मम्मी के लिए कुछ कर सकता! ताई माँ को एक बेहतर ज़िन्दगी दे सकता...”

“अपनी ताई माँ को एक बेहतर ज़िन्दगी तो अभी भी दे सकते हो!”

इस बात पर अजय चुप रहा, और ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“... तो सच में... क्या चाहते हो?”

“अपने पापा को थोड़ी ख़ुशी देना चाहता हूँ, अंकल जी... मैं यह अक्सर ही सोचता हूँ कि काश एक मौका मिल जाए कि उनको थोड़ी खुशियाँ दे सकूँ... उन्होंने बहुत कुछ किया मेरे लिए, लेकिन मैं ही कुछ न कर सका...”

बहुत कुछ कहना चाहता था अजय, लेकिन शब्द मौन हो गए। इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती। लेकिन उसने जब ठहर कर सोचा, तो बस इतना ही तो चाहता था वो!

“बीता हुआ समय वापस नहीं आता न बेटे,” प्रजापति ने जैसे समझाते हुए कहा।

“जी अंकल जी... बीता हुआ समय वापस नहीं आता!”

अजय ने एक गहरा निःश्वास छोड़ते हुए कहा।

उसी समय एम्बुलेंस की आवाज़ आती हुई सुनाई देने लगी। अजय ने अपनी घड़ी में देखा,

“अंकल जी, एम्बुलेंस आने ही वाली है! आप घबराइएगा नहीं। सब ठीक हो जाएगा!”

प्रजापति मुस्कुराए, “तुम बहुत अच्छे हो, अजय बेटे! ... अपनी अच्छाई बनाए रखना!” कह कर उन्होंने अपना झुर्रियों से भरा हाथ अजय के सर पर फिराया, “... और अपना ध्यान रखना बेटे... अपने पथ से डिगना मत! जो सोचा हुआ है, वो करना... और मतिभ्रम न होने देना...!” प्रजापति की आवाज़ धीमी पड़ रही थी - लेकिन उनकी आँखों की चमक बरक़रार!

“थैंक यू अंकल जी,” अजय मुस्कुराते हुए बोला, “लेकिन आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे कि आप मुझे बाय बाय कर रहे हैं! ऐसे नहीं छोड़ूँगा आपको... हॉस्पिटल चल रहा हूँ आपके साथ, और आपको देखने रोज़ आता रहूँगा...”

इतना कह कर अजय अपनी जगह से उठ कर सड़क के किनारे खड़ा हो गया, और हाथ हिलाने लगा, जिससे कि आती हुई एम्बुलेंस उसको देख सके।

कोई मिनट भर में ही एम्बुलेंस उसके सामने आ खड़ी हुई। एक नर्स और एक पैरामेडिक तेजी से एम्बुलेंस से उतरे, और उनकी तरफ़ बढ़े। अजय को राहत हुई... समय व्यय हुआ, लेकिन कम से कम प्रजापति जी को समुचित चिकित्सा तो मिल ही सकती है। अजय ने इशारा कर के नर्स और पैरामेडिक को मरीज़ की तरफ़ जाने को कहा।

पैरामेडिक ने स्टेथोस्कोप लगा कर प्रजापति जी की हृदयगति नापी और बड़ी विचित्र दृष्टि से अजय की तरफ़ देखा।

“क्या हुआ?” अजय ने आशंकित होते हुए पैरामेडिक से पूछा।

“ही इस नो मोर...”

“क्या?!” अजय इस खुलासे पर चौंक गया, “... लेकिन आप लोगों के आने के एक मिनट पहले तक ही तो मैं इनसे बात कर रहा था! ऐसे कैसे...?” वो भाग कर प्रजापति जी के पास पहुँचा।

उसने देखा कि प्रजापति जी वाक़ई बड़े सुकून से अपनी चिर-निद्रा को प्राप्त हो गए थे।

“मतलब इतना सब किया वो सब बेकार गया!” वो बड़बड़ाया।

“जी?” पैरामेडिक ने पूछा।

“जी, मैंने इनको सीपीआर दिया था...” अजय की आँखों में आँसू आ गए, “हमने कुछ देर तक बातें भी करीं! ... मुझे तो लगा था कि...”

“आई ऍम सॉरी,” पैरामेडिक ने सहानुभूतिपूर्वक कहा, “लेकिन इतनी एडवांस्ड एज में कुछ भी हो सकता है... इन्होने आपको कुछ बताया? कोई रिलेटिव या कोई और... जिनको हम इत्तला दे सकते हैं?”

“बता रहे थे कि इनके बच्चे विदेश में रहते हैं... कहाँ, वो मुझको बताया नहीं।”

“इनके पर्सनल इफेक्ट्स में कोई इन्फॉर्मेशन मिल सकती है,” कह कर उसने प्रजापति जी की कार की तलाशी लेनी शुरू कर दी।

कुछ देर बाद उसने निराश हो कर कहा, “... फ़ोन भी नहीं है!”

फिर उनका बटुआ निकाल कर बोला, “विश्वकर्मा प्रजापति... पुणे में रहते हैं... थे...”

कुछ देर तक वो प्रशासनिक काम करता रहा, फिर अजय से बोला, “आप अपना कांटेक्ट दे दीजिए... वैसे तो आपको कांटेक्ट करने की कोई ज़रुरत नहीं पड़ेगी, लेकिन अगर पुलिस को कोई ज़रुरत हुई, तो आपको कांटेक्ट करेंगे!”

“ठीक है...” अजय ने कहा, और अपना नाम पता और फ़ोन नंबर लिखवाने लगा।

इस पूरे काम में बहुत समय लग गया था, और मीटिंग के लिए पहुँचने में बहुत देर लगने वाली थी। अब मुंबई जाने का कोई मतलब नहीं था। इसलिए अजय वापस पुणे की तरफ़ हो लिया।


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