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महल वापस आ कर बलदेव अपने मंत्री के साथ बात करने लगता है और देवरानी अपने कक्ष में आ कर उल्टा लेट जाती है।
देवरानी का रोम-रोम आग में जल रहा था और दिल में बेहद खुशी थी। पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि इसे वह वासना समझे या प्रेम? बलदेव उसे दिन बा दिन अपनी ओर खीचे जा रहा था और वह भी ना चाहते हुए भी उसकी तरफ खीची चली जा रही थी।
पलंग पर लेटे हुए देवरानी सोच रही थी "हे राम ! में ये किस चक्कर में पड़ गई हूँ एक तरफ मेरा बेटा है जो मुझे हर तरह से खुश रखता है और शायद अंदर ही अंदर वह मुझे एक स्त्री के रूप में देखने लगा है और दूसरी तरफ मेरा दीवाना शेर सिंह है जो मुझे अपनी रानी बनाना चाहता है।"
"अगर में शेर सिंह के साथ चली जाती हूँ तो पूरे राज्य में लोग क्या कहेंगे? राज परिवार की क्या इज्जत रहेगी और तो और मेरी अपने पुत्र से भी जीवन भर के लिए दूरी बन जाएगी और वह भी मुझसे घृणा करेगा। मैं अपने बेटे बलदेव के वजह से ही तो आज तक जीवित हूँ। जब मेरे पास जीने की कोई वजह नहीं थी तो उसने मेरे जीवन में आ कर मुझे एक नई दिशा दी, सिर्फ अपना शरीर की प्यास बुझाने के लिए उसे भला में कैसे छोड़ सकती हूँ?"
"और दूसरी तरफ अगर में शेर सिंह के साथ नहीं जाती हूँ तो कहीं बलदेव और मेरे बीच कुछ बहुत नीच कर्म न हो जाए. जिस तरह से वह मेरे पीछे पड़ा है और जितना मेरे दिल में उसके लिए स्नेह है और कहीं में उसे रोक ना पाई तो अनर्थ हो जाएगा और में अधर्मी बन जाऊंगी, ये समाज के लोग तो मुझे और मेरे बलदेव को मार ही देंगे। तो क्या में बलदेव के मरने की वजह बनू?"
देवरानी उठ कर अपने कक्ष में ही बने मंदिर के पास घुटने के बल बैठ जाती है।
देवरानी: भगवान! मुझे शक्ति दे के में इस दुविधा से बाहर निकल सकू । में दस दिन का व्रत रखूंगी प्रभु कुछ ऐसा करो की मैं उस इस मुश्किल से निकल जाऊँ और मेरे जान सम्मान और मेरे पुत्र बलदेव की जान और सम्मान बचा रहे, और मैं अपने जीवन भर किसी गरीब को अपने दरवाजे से खाली हाथ नहीं भेजूंगी। हर एक गरीब मजबूर का सहारा बनूंगी।
"पर कुछ ऐसा करो भगवान की बलदेव और मेरे सम्मान और जान को क्षती नहीं पहुचे और मेरी हर मनोकामना भी पुरी हो और मेरे पुत्र की भी मनोकामना पूरी हो! रक्षा करो! , कृपा करो!"
वो उठ कर छोटी-सी घण्टी बजाती है जो वही रखी हुई थी और फिर अपने आँखों से आसु पूंछ कर मुह धो कर भोजन की तयारी में जुट जाती है।
रसोई में कमला और देवरानी काम में लगे थे।
कमला: ये राधा कभी रसोई में कोई काम नहीं करती।
देवरानी: उसको छोड़ो कमला! वह महारानी सृष्टि की दासी है। हमें क्या?
कमला: हम्म! परन्तु हम ही जिम्मेदार हैं सबको भोजन समय पर देने के लिए ।
देवरानी: छोड ना! कमला!
कमला देवरानी का मन भाप कर।
कमला: आज आप उदास हो! किसी बात की चिंता खाए जा रही है आपको?
देवरानी: कमला तुम्हें तो पता ही है। के आज के बाद सिर्फ 4 दिन बाकी है मेरे और शेर सिंह के मिलने के लिए!
कमला: हाँ मुझे पता है।
देवरानी: में क्या करूं मुझे समझ नहीं आ रहा? मैं क्या करूं, कमला?
कमला: आप अपने दिल पर हाथ रख कर सोचो और जो आपका दिल करे वही करो!
देवरानी: अगर दिल कुछ ऐसा कहता हो जिसे समाज और धर्म कभी स्वीकार नहीं कर सकते । तो?
कमला: अच्छा तो ये बात है, महारानी आपको पता है में एक स्त्री हूँ और समाज के नियमो के अनुसार मेरा कोई हक नहीं के में अपने जिस्म की प्यास बुझाउ! और प्रेम पाउ!
कमला: पर मेरा दिल नहीं मानता । ये दिल जब नहीं माना तो मैं अपने धर्म और समाज के विरुद्ध उस वैध के गोद में जा बैठी, क्योंकि इस समाज को मेरे दिल का, मरी भावनाओ की कोई परवाह नहीं और उनका कोई अहसास नहीं है ।
अब मैं खूब मजे कर रही हूँ और खुश हूँ। किसी को पता नहीं चलता, पर जिस दिन पता चला उस दिन के लिए भी मैं और वैध जी तैयार है। हम समाज के सामने झुकेंगे नहीं।
अब हम स्त्रीयो को अपने हक के लिए लड़ना होगा। अपनी खुशी के लिए, अपने हिस्से के लिए तब हम इस समाज और इनकी पुरानी परंपराये जिस्मे लोग खून के आसु रो कर अपनी जिज्ञासा और अपने हक़ भुला कर मर जाते हैं, उस समाज से अपना हिस्सा ले पाएंगे ।
देवरानी: पर
कमला: महारानी आप तो खुद रानी हो आपको भला में कैसे लड़ना आपको सीखा सकती हूँ पर अगर आपको कुछ पाना है तो अपनी खुशी के लिए आपको लड़ना पड़ेगा।
देवरानी: शायद तुम सही कह रही हो!
कमला: हाँ ये लोग तो इसे अनातिक ही कहेंगे, आप अपनी इच्छा को देखो । ये अधर्मी कहेंगे, आप अपने खुशी को देखो ।
देवरानी: (मन में) बात तो ये सही कह रही है। ऐसे समाज और उसकी नैतिकता का क्या, जिसमे हम स्त्रीया खुश नहीं रह सकती ।
खाना बनने के बाद सब लोग भोजन करते हैं और बारी-बारी से सब अपने कक्ष में जा कर सो जाते हैं।
देवरानी के आखो से नींद कोसो दूर थी वह कुर्सी पर बैठी हुई थी और कमला की कहीं हुई बातो को सोचे जा रही थी।
बलदेव देवरानी के कक्ष पर आ कर खटखटा ता है "माँ! क्या तुम जाग रही हो?"
देवरानी झट से उठ कर दरवाजे पर जा कर दरवाजा खोलती है और बलदेव अंदर आ जाता है।
देवरानी: इतने देर रात गए, यहा?
बलदेव: बस आप को खाने के समय चिन्तित देख कर आप से इसका कारण पूछने आया हूँ ।
देवानी: अच्छा!
बलदेव: अभी तक आप सोयी नहीं? आधी रात हो गई! मुझे लगा था के आप सो गयी हो।
देवरानी: नहीं बेटा बस आज नींद नहीं आ रही है ।
बलदेव: क्या सोच रही है, मेरी प्यारी मां, जो उसे नींद नहीं आ रही है ।
देवरानी: बस कभी-कभी ये कक्ष खाने को दौड़ता है। जब तुम छोटे थे तो यही मेरे साथ होते थे, जैसे ही तुम 7 वर्ष के हुए तुम्हें अलग कर दिया गया।
बलदेव: तो माँ को अकेलापन मेहसूस हो रहा है।
"आओ मेरा हाथ पकड़ो" और बलदेव देवरानी को अपना हाथ पकड़ा कर उसे ले कर बिस्तर पर बैठ जाता है।
बलदेव: माँ! अब बताओ आपको चिंता क्यू हो रही है? जब तक में जीवित हूँ आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
देवरानी: हम्म! "बलदेव क्या इस समाज से लड़ने की शक्ति है मेरे अंदर?"
बलदेव: हाँ बहुत शक्तिशाली हो आप।
देवरानी: क्या में कोई बड़ा निर्णय लेने योग्य हूँ?
बलदेव: आप के अंदर हर एक योग्यता है। माँ आप को किसी और की सलाह की आवश्कयता नहीं है और इस समाज ही क्या, आप पूरी दुनिया से लड़ सकती है और जीत भी सकती है।
देवरानी को ये सुन कर अच्छा लगता है और उसका मन थोड़ा शांत होता है।
देवरानी: पर में अकेली हूँ।
बलदेव: ऐसा कभी न कहना, मैं सदैव, अपने आखिरी दम तक आपके साथ हूँ।
देवरानी: पर तुम्हें कोई अच्छी रानी मिल जाएगी तो फिर तुम उससे विवाह कर लोगे और मुझे तो भूल ही जाओगे।
बलदेव: मैं अपनी जान दे सकता हूँ पर कभी आपकी जान को तकलीफ में नहीं देख सकता। आपको कभी भी भूल नहीं सकता।
देवरानी: वादा करो के तुम कभी भी मेरा साथ नहीं छोड़ोगे।
बलदेव अपना हाथ देवरानी के हाथ पर रख देता है "मैं वादा करता हूँ माँ का आपका साथ कभी नहीं छोड़ूंगा।"
बलदेव: माँ आपकी आंखे लाल हो रही है आप सो जाए।
देवरानी बलदेव का हाथ पकड़ अपना सर बलदेव के सीने पर रख बात कर रही थी।
देवरानी सो जाउंगी । आज इस कक्ष में वर्षो बाद में कोई मुझसे वार्तालाप कर रहा है, मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।
बलदेव अपना एक हाथ देवरानी के सर पर रख के थोड़ा पीछे से पलंग पर टेक लगा लेता है।
देवरानी: बेटा तुम्हें पता है पिछले 5 साल में जब तुम शिक्षा ग्रहण करने आचार्य जी के यहाँ गए थे, मेंने तुम्हें दिन रात याद किया।
बलदेव: हाँ माँ मुझे याद है जिस दिन मैं गया था तुम उस दिन बहुत रो रही थी।
देवरानी: तब तुम केवल 13 वर्ष के और मेरे लिए तुम्हें वन में भेजना बहुत मुश्किल था।
बलदेव: हाँ माँ पर वह भी तो मेरे लिए जरूरी था, जीवन अच्छे जीने के लिए शिक्षा तो लेनी ही पड़ती है।
देवरानी: हाँ पुत्र! अब तो मेरा पुत्र बड़ी-बड़ी बात करने लगा है विद्वानों वाली बड़ी-बड़ी बाते! एक बच्चा अब इतना बड़ा हो गया है।
बलदेव: माँ ऐसी बात नहीं है। आपके लिए तो मैं सदा आपका बच्चा ही रहूँगा!
देवरानी: ऐसी ही बात है जब तुम गए थे तो एक दम दुबले पतले थे और आज किसी घोड़े की तरह मजबूत हो गए हो और हमे इतने मान हैं तुम्हारे शरीर पर।
बलदेव: ये सब खाने पीने और व्यायाम का नतीजा है।
देवरानी: ऐसा नतीजा ... इन 5 वर्ष में ना सिर्फ तुम जवान हो गए बल्कि तुम ऐसे जवान हुए के तुम्हें देख तुम्हे सब 30 वर्ष का पुरुष कहते हैं। क्यूकी तुम इतने मांसल शरीर वाले और परिपाकव भी दिखते हो और बाते भी ऐसी ही करते हो।
बलदेव: हाँ माँ ये सब आचार्य जी के बदौलत हुआ है।
देवरानी: मैं आचार्य जी का धन्यवाद कहना चाहूंगी।
बलदेव: माँ में तो बदल गया पर माँ तुम आज भी वैसी ही हो जैसी मैं तुम्हे बचपन से देखते आ रहा हूँ।
देवरानी: हम्म!
बलदेव: तुम्हारे चेहरों की लाली अब भी उतनी ही है।
देवरानी: (मन में-इस लाली को चुसने वाला कोई भवरा नहीं था, जो इस फूल को चुस के इसको खिला दे।)
बलदेव: तुम आज भी 20 से 25 वर्ष की कन्या लगती हो।
देवरानी: हर बार तू ये झूठ बोल कर मुझे मत बहला देता है (जान बुझ कर नखरा करती है।)
बलदेव: माँ तुम्हें पता है जब मैं आचार्य जी पास था तो मैं हर दिन तुम्हें याद किया करता था और अपने दोस्तों को भी बताता था कि मेरी माँ कितनी अच्छी है। मेरे मित्र जो भी बने उनमे से सब से अच्छे मित्र बद्री और श्याम हैं, वह दोनों तो जिद कर रहे हैं आपसे मिलने के लिए ।, आप कहे तो उन्हें बुलवा लू?
बलदेव अपनी माँ को चुप पा कर उन्हें देखता है तो पाता है उसकी माँ तो सो चुकी थी।
बलदेव: माँ भी न, कब सोई, पता ही नहीं चला।
बलदेव के सीने पर सर रखे पैर आधे मोड देवरानी सो रही थी और बलदेव पलंग पर अपनी पीठ टिकाये बैठा था उसे समझ नहीं आरा था के वह उठे या बैठा रहे। फिर वह एकटक देवरानी के मासूम चेहरों को देखता है।
बलदेव: कितनी मासूम चेहरा है इनका!
फिर बलदेव ऐसे ही बैठा रह जाता है और देवरानी सोती रहती है
सुबह 5 बजे देवरानी की आँख खुलती है तो पाती है, के वह अब भी बलदेव की बाहो में बाहे डाल अपने सर को बलदेव के सीने पर रखे हुए सो रही थी और उसका बेटा आँखे खोल झपकी ले रहा था।
देवरानी: (मन में) हे भगवान! ये तो सारी रात ऐसे ही बैठा रहा और सोया भी नहीं, मेरी कितनी परवाह करता है ये लड़का!)
देवरानी थोड़ा उचक कर अपने होते धीरे से बलदेव के माथे को चुम लेती है।
"मेरी जान बलदेव!"
अधखुली आँख खोल कर बलदेव: "मां तुम उठ गई!"
देवरानी: तुम ऐसे ही बैठे रहे सोये नहीं?
बलदेव: अब मैं आपको छोड़ कर कैसे जाता और में हटता तो कहीं आपकी नींद टूट जाती तो!
देवरानी: बलदेव! ...बेटा तूने अपने माँ के लिए रात भर जग के सवेरा कर दिया।
और बड़े प्यार से बलदेव को देखती है।
बलदेव: जी माँ!
देवरानी: अब जाओ और अपने कक्ष में आराम से सो जाओ!
फिर देवरानी बलदेव से अलग होती है। बलदेव उठ कर खड़ा हो जाने लगता है।
देवरानी: अरे हा तुम रात भर जागे हो, सोने से पहले वैध जी द्वारा दी गयी जड़ी बूटी खाना मत भुलना, फिर सोना! (देवरानी ये कह कर मुस्कुरा देती है।)
बलदेव नींद में खोया था और उसके दिमाग में ये प्रश्न आता है।
बलदेव मन में: ये माँ को वैध जी की जड़ी बूटी का कैसे पता है?
पर नीद जोरो से आने के वजह से उनके कक्ष से बाहर निकल जाता है जैसे वह-वह अपने कक्ष की सीढ़ियों से ऊपर जाने को होता है उसे उसकी दादी जीविका दिखती है।
हुआ ये की हर बार की तरह, वैध के कहने अनुसार, जीविका सुबह अपने बैसाखी ले कर चल रही थी और उसे सामने देवरानी के कक्ष से बाहर आता हुआ बलदेव दिखाई दिया।
जीविका: ये इतनी सुबह सवेरे बलदेव देवरानी के कक्षा से क्यों आ रहा है, इसका मतलब पूरी रात वह देवरानी के साथ था,
फिर जैसे ही जीविका की नजर बलदेव के लाल आंखो पर पड़ती है।
जीविका (मन में) : है राम इसके आखे लाल हैं मतलाब सारी रात देवरानी के साथ उसके कक्ष में जगा हुआ था । इसका साफ मतलब है कि लोग अपने जिस्म की भूख मिटा रहे थे और जीविका को ये सब देख आपनी आंखो पर विश्वास नहीं हो रहा था।
बलदेव झट से दादी के पैर छूता है।
जीविका: बलदेव जीते रहो पुत्र!
बलदेव: दादी मुझे नींद आ रही हैं। में जाता हूँ।
जीविका: (मन में) रात भर कार्यकर्म अपने माँ के साथ किया और दादी को कह रहा है नींद आ रही है सुबह सवेरे, शर्म बेच कर खा गए हो बलदेव तुम!
दोपहर को बलदेव उठता है और खाना खाने के लिए कमला को आवाज देता है।
कमला: क्या युवराज अभी तक सो रहे हो?
बलदेव: हाँ कमला कल थोडा।
बीच में बात काटते हुए
कमला: कल रात कुछ ऊंच-नीच तो नहीं कर थे महारानी के साथ, जो सो नहीं पाए!
बलदेव: अभी तक तो नहीं, पर तुम्हारी महारानी के साथ कुछ ऊंच नीच दोनों अवश्य करूंगा।
कमला: बड़े प्रेम पुजारी बन रहे हों।
बलदेव: हाँ! तुम्हारी महारानी है ही ऐसी मुझे जैसे को भी पिघला दी उसने!
कमला: इतना प्रेम करते हो?
बलदेव: हद से ज्यादा!
कमला: पर महारानी को पाना इतना आसन नहीं, बहुत पापड़ बेलने पड़ेंगे ।
बलदेव: हर पापड़ बेलूंगा पर आखिरी में तल कर तुम्हारी महारानी को मैं ही खाऊंगा और हसता है।
कमला: हाय दया, तुम भुलना मत आज चौथा दिन है दो दिन बाद उसकी शेर सिंह से मिलने की बात है।
बलदेव: मुझे अपने प्यार पर भरोसा है।
कमला: अगर वह सही में शेर सिंह से मिलने नदी तक पहुँच जाती है तो?
बलदेव: तो फिर जैसे वह-वह मेरे घोड़े पर बैठेगी इस राज्य को और मुझे छोड़ने के लिए, मैं थोडी दूर घुडसावरी करने के बाद उसे एक गुफा में ले जाऊंगा जहाँ पर पहले से एक आदमी होगा ।जिसे में कोई बहाना बना कर वहीं कहीं छुप जाऊंगा और वह आदमी उस घोड़े की कमान संभाल लेगा और माँ को ले जाएगा।
कमला: हाय दया वह आदमी कौन है और तुम ये क्या कह रहे हो?
बलदेव: कमला मैंने पता लगाया हमारे देश घाटराष्ट्र के बगल में एक राज्य है जहाँ पर एक आदमी है जिसका नाम शेर सिंह है और वह उस राज्य का युवराज है, उसकी आयु करीब 40 वर्ष है।
अपने मित्र के मदद से उसे गुफा में बुलवा लूंगा माँ को ले जाने के लिए ।
कमला: तुम पागल हो, अगर हम आदमी ने महारानी के साथ जबरदस्ती की।
बलदेव: मैंने मेरे मित्र बद्री के मदद से इस आदमी का चयन किया है, बद्री उज्जैन का युवराज है जिसके टुकड़ो पर शेर सिंह का राज्य चलता है। "हम उसे कहेंगे तुम्हें मौका है अगर तुमने माँ का दिल जीत लिया तो जो चाहे वह करना उसके पहले कुछ नहीं ।"
कमला: पर ऐसा हुआ तो राज्य में बड़ा हंगामा होगा, सब कहेंगे देवरानी अनजान पुरुष के साथ भाग गई ।
बलदेव: तों कमला प्राथना करो के उस दिन वह उस दिन, जब मैं घोड़े पर शेर सिंह बन के बैठूं तो वह घोड़े पर मेरे साथ नहीं आए । ...
कमला: तो क्या तुम खुश रह पाओगे युवराज बलदेव /
बलदेव: मैं जीते जी मर जाऊंगा अगर वह किसी और की हुई!
बलदेव: पर कमला हमने माँ को झूठ कहा है और अगर माँ खुद चाहती है और निर्णय ले लेती है कि उन्हें बाहर के पुरुष के साथ सम्बंध रखना है तो मेरा बेटे होने का फ़र्ज़ है कि उनके इस दुख भरे जीवन से आज़ादी दिलाऊँ और उनकी खुशी के लिए सब कुछ करू।
कमला: तू कितना सच्चा और अपनी माँ के लिए कितनी अच्छी सोच रखता है, ये वासना नहीं है, यही तो प्रेम है सच्चा प्यार है।
या बलदेव की आँखे भर जाती हैं
कमला: रोना नहीं तुम मेरे बच्चे जैसे हो। बचपन से मैंने तुम्हें देखा है, मेरे रहते हुए महारानी कभी गलत निर्णय नहीं ले सकती।
अब देवरानी और शेरसिंह के मिलने के लिए केवल 3 दिन थे जिसमे बलदेव अपनी पूरी कोशिश कर रहा था कि वह अपनी माँ को अपने प्यार का। अपनी मौजुदगी का अहसास दिला दे और किसी और पुरुष के साथ जाने से रोक ले। यदी शेर सिंह बने बलदेव के साथ रविवार की रात को देवरानी चली जाति है तो बलदेव ने अपने मित्र के मदद से एक राजा खोज लिया था जिसका नाम सच में शेर सिंह था उसके साथ छोड़ देगा और बलदेव ने शेर सिंह नमक राजा को अपने मित्र द्वारा ये समझा दिया था के जब तक के रानी तुमसे विवाह करने तैयार नहीं हो तुम कुछ कर नहीं सकते । बद्री ने उसे ऐसी सख्त हिदायत दे दी थी ।
अब देखना ये था कि बलदेव अपनी माँ की कुर्बानी देता है या वह अपनी माँ का प्यार जीत लेता है और अगर जीत भी लेता है तो उसके बाद अपने प्यार को कैसे सब के नजरों से बचा पाएगा!
बलदेव को ये खबर नहीं थी के पहले ही उसकी दादी जीविका और रानी सृष्टि और उसकी दासी राधा देवरानी के हर एक कदम पर नजर रख रही थी की आखिर देवरानी की खुशी का राज क्या है?
इन सब से बेखबर राज राजपाल कुबेरी में अपने मित्र रतन सिंह के साथ अय्याशी में लगा हुआ था और उनको गुप्तचरो से सूचना प्राप्त होती है के दिल्ली के बादशाह शाहज़ेब कभी भी कुबेरी या घाटराष्ट्र पर हमला कर सकते हैं। पारस के सुल्तान मीर वाहिद और शमशेरा के लिए दूरी के वजह से घाटराष्ट्र या कुबेरी पर हमला करना नामुमकिन था।
राजपाल: रतन सिंह मुझे अपने राज्य की याद सता रही है।
रतन: वहा पर ऐसा क्या है जो यहाँ पर नहीं है मित्र?
राजपाल: हाँ वहा तो बस एक चूत मारता हूँ यहा तो हजारो मिल जाती है और दिन रात अय्याशी करता हूँ और माँ जीविका भी नहीं जो मुझे डांटे ।
या दोनों हसने लगते हैं।
घाटराष्ट्र में सब लोग भोजन की तैयारी कर रहे हैं इतने में महल के दरवाजे पर से दरबान आता है।
दरबान: युवराज बलदेव!
बलदेव झट से दरबान को अंदर आने को कहता है।
बलदेव: कहो क्या बात है।
दरबान: सूचना मिली है के दो राजा कुछ सैनिको के साथ घाटराष्ट्र की सीमा लांघ चुके है।
ये सुनते ही बलदेव खुश हो जाता है।
दरबान: क्या हुआ आप खुश हो रहे हैं?
बलदेव: घबराने की बात नहीं है वह दोनों मेरे मित्रगण हैं। मैंने ही उन्हें न्योता दिया है सबतक ये बात पहुचा दे कि राज दरबार में उनका धूम धाम से स्वागत हो!
दरबान: जी युवराज! जैसी आपकी आज्ञा!
बलदेव: (मन में) आखिरकार बद्री और श्याम आ ही गए!
बलदेव रसोई में अंदर जाता है और सबको कहता है।
बलदेव: आज जितने हो सके अच्छे पकवान बनाओ. मेरे दोनों परम मित्र पधार रहे हैं।
फिर बलदेव भी तैयार हो कर राज दरबार की ओर चल देता है और उन दोनों की प्रतीक्षा करने लगता है।
बद्री और श्याम दोनों ही राजकुमार बलदेव के आयु के थे । जहाँ राजकुमार बद्री जी की सांवला था वह उज्जैन का युवराज था और गोरा चिट्टा राजकुमार श्याम मेवाड़ का युवराज था ।
तेज़ गति से दो घुससावर राज दरबार के सामने आ कर रुक जाते हैं तथा उनके सैनिक पीछे वही रुक जाते हैं।
दासियो चारो ओर खड़ी उनके घोडे से उतारते ही उनपर फूलों की बारिश कर देती है और एक दासी उनके स्वागत में घाटराष्ट्र का मंगल गीत गाती है ।
बद्री या श्याम मस्कुरते हुए उनका धन्यवाद करते हैं फिर एक दासी उनका स्वागत कर बोलती है
दासी: आप दोनों का स्वागत है! आप दोनों यहाँ आसन ग्रहण करे ।
दोनो को एक आसान पर बिठाकर के उनके पैरो के नीचे पानी से भरी थाली रख देते हैं फिर दोनों को उनके चरण थाली में रखने के लिए कहते हैं। दोनों जब अपने चरण वहाँ रख देते हैं तो उनके चरण शुद्ध खुशबुदार जल धोते है। फिर दोनों अपनी जूती पहन कर राज दरबार में चलने लगते हैं । उनके पीछे घाटराष्ट्र के सैनिक बल धीमी गति से चल रहे थे।
राजभवन के दरबार में सब मंत्री गण के साथ-साथ बलदेव, देवरानी, महारानी सृष्टि भी बैठे थे।
जैसे वह बलदेव को दोनों आते हुए दिखाते हैं वह खड़ा हो जाता है उसके साथ ही सभी मंत्री गण भी खड़े हो जाते हैं।
बलदेव: स्वागत है आप दोनों युवराजो का घाटराष्ट्र के इस पवित्र धरती पे। आप दोनों से भेट कर मुझे बहुत प्रसनत्ता हो रही है ।
बद्री: धन्यवाद मित्र! तुम से यही आशा थी। हमे भी आपसे मिल कर अच्छा लग रहा है । मित्र!
श्याम: बहुत हे खूबसूरत भवन है! और हाँ! बलदेव! इतने भव्य स्वागत की क्या आवश्यकता थी हमें तो मित्र है!
बलदेव: ये मेरा प्रेम है तुम दोनों के लिए! आ जाओ मित्र!
बलदेव अपनी बाहे फेलाता है और तीनो मित्र एक दूसरे से मिलते हैं फिर बलदेव अपने साथ उन दोनों को बैठने को कहता है।
सृष्टि: स्वागत है युवराज आप दोनों का!
देवरानी: आपका स्वागत है बद्री और श्याम!
बलदेव: ये मेरी बड़ी माँ सृष्टि है या ये माँ देवरानी है।
श्याम और बद्री उन दोनों का हाथ जोड़ कर प्रणाम करते है।
अब राज दरबार की करवाई शुरू होती है और सब अपने-अपने दुख, समस्याएँ और राज्य की दिक्कत महारानी सृष्टि के सामने रखते हैं।
अभी कुछ देर बाद बलदेव बद्री और श्याम को इशारा करता है।
बलदेव: माँ शुष्टि मैं इन दोनों को इनके कक्ष में ले जाता हूँ। ये लम्बी यात्रा के बाद थक गए होंगे। आज्ञा दीजिए!
शुरू: ठीक है बलदेव तुम लोग जा सकते हो। आप दोनों अब विश्राम कीजिये!
बलदेव: जी बड़ी मां!
बलदेव उन दोनों को ले कर अपने कक्ष के बगल में उनके कक्ष में ले जाता है।
बलदेव: ये रहा तुम दोनों का कक्ष।
श्याम: मित्र! ऐसा लगता है यहाँ पर कई वर्षो से कोई नहीं आया है ।
बलदेव: ऊपर के एक कक्ष में सिर्फ में रहता हूँ बाकी सब कक्ष खाली है। वैसे भी मैं अकेला ही रहता हूँ तो तुम दोनों जहाँ चाहो वहाँ रह सकते हो।
श्याम: अकेले क्यू हो दुकेले हो जाओ!
बलदेव हसकर बोलता है चल हट! नटखट!
बद्री: श्याम सही तो कह रहा है । तुमने शरीर हाथी जैसा बना लिया है। तुम्हारे सामने तो हम बच्चे ही लगते हैं।
बलदेव: इसका क्या मतलब है
बद्री: इसका अर्थ ये है कि अब आप शादी कर ले युवराज!
या तीनो हसने लगते हैं।
बलदेव उन दोनों के लिए भोजन का प्रबंध करवाता है।
श्याम और बद्री स्नान कर के अपने लाये हुए वस्त्रो में वस्त्र पहन कर भोजन कक्ष में आ कर भोजन करने के लिए सब के साथ बैठते है।
श्याम: क्या स्वादिष्ट पनीर है।
बद्री: हाँ मैंने तो आज तक इतना स्वादिष्ठ पनीर कभी नहीं खाया है ।
बलदेव: ये सब माँ देवरानी ने बनाया है।
श्याम और बद्री देवरानी जो रसोई में थी उनको धन्यवाद बोलते हैं ।
श्याम और बद्री: "धन्यवाद महारानी! आपने हमारे लिए इतना स्वादिष्ट व्यंजन बनाया!"
देवरानी बस मुस्कुरा के रह जाती है।
ऐसे ही श्याम और बद्री को पूरा महल दिखाते हुए रात हो जाति है। बलदेव या देवरानी को आपस में मिलने का समय बिलकुल मिल नहीं पाटा । देवरानी बलदेव से मिलने के लिए अंदर ही अंदर तड़प रही थी। आखिरी कार हार कर। वह सोने की तयारी करने लगती है।
युवराज बलदेव अपने मित्रो के साथ समय गुजार कर और बाते कर के बहुत खुश था।
श्यामः मित्र! याद है जब हम छुप-छुप कर कामसूत्र और सेक्स कहानियो की पुस्तके पढ़ते थे।
बद्री: आर हाँ एक दिन तो मैं पुस्तक को छुपाना ही भूल गया था । ये तो अच्छा हुआ की आचार्य जी ने नहीं देखा, नहीं तो!
बलदेव: नहीं तो हमें उसी दिन वहा से निकाल दिया जाता ।
बद्री: बलदेव तुम तो इस विषय पर बात ही मत करो रात-रात भर जग के पढ़ते थे।
श्यामः हाँ और महाराज सुबह में उठ भी जाते थे और फिर सब हसने लगते हैं।
बद्री: ये बलदेव तो बस सम्बन्धियों से सेक्स की कहानीया अधिक पढ़ता था।
बलदेव: श-श श मित्रो! ये वन में आचार्य की पाठशाला नहीं बल्कि ये महल है और दीवारों के भी कान होते हैं!
बद्री: अच्छा छोड़ो, तुम ये दुसरो के विवाह करवाने के लिए कब से आतुर हो गए, कोई नया व्यवसाय शुरू किया है क्या!
श्याम हस देता है।
बलदेव: बात ये है कि किसी को दुख है उसे बस मुक्ति प्रद्दन करनी है।
बद्री: पर वह है कौन जिसे तुम मेरे सम्बंधी राजा शेर सिंह के पास छोड़ कर आओगे।
क्या उसे भी ये ज्ञात है?
बलदेव: उस स्त्री को बस इतना पता है कि वह अपने पापी पति को छोड़ कर किसी की शरण में जाएगी अगर वह उससे सही बर्ताव करता है तो वह शायद उससे विवाह कर ले।
बद्री: हाँ मैंने उसे तैयार रहने को कहा था और चेतावनी दे दी के उसकी मर्जी के बिना तुम उसे छू भी नहीं सकते।
बलदेव: धन्यवाद बद्री!
बद्री: पर वह है कौन जिसे घाटराष्ट्र छोड़ कर जाना है?
बलदेव: समय आने पर पता चल जाएगा और हाँ उस स्त्री को अभी आखिरी निर्णय लेना है।
अब तुम दोनों सो जाओ लम्बी यात्रा के बाद तक गए होंगे! मैं भी जा कर विश्राम करता हूँ । सुबह आप दोनों से पुनः भेंट होगी ।
बलदेव ये कह कर अपने कक्ष से नीचे उतारता है और देवरानी के कक्ष में घुस जाता है। आज फिर उसे देवरानी के कक्ष में जाते हुए उसकी दादी जीविका देख लेती है।
देवरानी सोच में डूबी हुई थी।
बलदेव: माँ!
देवरानी चुप रहती है।
बलदेव: माँ क्या हुआ कुछ तो बोलो।
देवरानी अभी भी चुप थी।
बलदेव जा कर देवरानी का हाथ पकड़ कर "क्या हुआ है माँ"
देवरानी: तुम जाओ! मुझसे बात मत करो!
बलदेव: क्यू ना करू?
देवरानी: तुम्हारा कोई हक नहीं है।
बलदेव: सब हक है मेरा।
देवरानी: जाओ अपने मित्रो के पास।
बलदेव: तो ये बात है, क्षमा कर दो माँ आज मेरे मित्रो के कारण से आपको समय नहीं दे पाया।
देवरानी का गुस्सा थोड़ा ठंडा होता हैऔर वह बलदेव को देख कहती है ।
देवरानी: बलदेव तुम कहते हो, जीवन भर साथ रहोगे । लेकिन तुम तो आज ही मुझे भूल गए और सुबह से अब अपना मुह दिखा रहे हो!
बलदेव: माँ आपको पता है। मेरे मित्र पधारे है । ये श्याम और बद्री तो मुझे छोड़ नहीं रहे थे । मैंने बहुत प्रयास किया और रही भुलने की बात। तो मेरी हर सांस में तुम बसती हो।
देवरानी ये बात सुन कर बलदेव से गले लग जाती है।
देवरानी: (मन में) मेरे लाल! मैं तुम्हें कैसे बताउ की में किस दुविधा में हूँ?
बलदेव (मन में) माँ! मुझे पता है के तुम कि हाल से गुजर रही हो।
देवरानी: आज के बाद मुझे कभी नजर अंदाज किया तो?
बलदेव: तो आपकी चप्पल मेरा सर!
देवरानी हस देती है।
बलदेव: आपको मेरे मित्र कैसे लगे?
देवरानी: कैसे लगेंगे बच्चे है!
बलदेव: वह मेरे ही आयु के है।
देवरानी: पर तुम जैसेतो नहीं हैं वो।
बलदेवः मैं कैसा हूँ?
देवरानी बलदेव का आंखो में देखती है ।
देवरानी: तुम...उनसे बहुत बड़े लगते हो।
बलदेव: इतने भी नहीं है मां!
देवरानी: चुप कर मुझे पता है कितने बड़े हो ।
बलदेव हस देता है।
देवरानी: अगर उन दोनों को हमारे साथ खड़े कर दो तो वह हमारे बच्चे लगेंगे ।
ये सुन कर बलदेव अपनी आंखे चौडी कर देवरानी को देखता है।
अब देवरानी भी अपने कही हुए बात को समझ कर लजा जाती है।
देवरानी: मेरे कहने का अर्थ...
बलदेव: अर्थ को छोड़ो माँ होता है। जो बात सही है वह है।
देवरानी: और वैसे भी हम अब माँ बेटे बढ़ कर मित्र है।
बलदेवः ये मित्रता कब हुई?
ये सुन कर देवरानी बलदेव की मोटी बाजू पर एक थप्पड़ मारती है।
बलदेव: माँ में मजाक कर रहा था।
देवरानी: लो मित्रता भी नहीं है और अपनी माँ से मजाक कर रहे हो।
अब लजाने की बारी बलदेव की थी।
देवरानी: कल शुक्रवार है बलदेव!
बलदेव: हाँ मां!
देवरानी: में सूर्य पूजन के लिए नदी के तट पर जाना चाहती हूँ।
बलदेव: तुम कितना पूजा पाठ करती हो मां!
देवरानी: ऐसा नहीं कहते भगवान को बुरा लगता है।
बलदेव: भगवान ने तुम्हें दुख ही दुःख दिया है । क्या उन्हें इतने सालों का तुम्हारा बलिदान भगवान को नहीं दिखता है, इस बलिदान से क्या मिला आपको मां!
देवरानी: बेटा बलदेव मेरे जीवन में कुछ नहीं है पर तुम तो हो मेरे तुम्हारे लिए वह जीवित हूँ या तुम्हारे सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिए.
बलदेव ये सुन कर माँ को गले लगा लेता है।
बलदेव: (मन में) माँ मैं तुम्हारा हर दुख सुख में बदल दूंगा।
देवरानी: (मन में) कल शुक्रवार है फिर शनिवार फिर रविवार, इन्हीं तीन दिनों में मुझे तुम में से या शेरसिंह में से एक का चयन करना है, और मैंने तुम्हारे आंखों में वह प्रेम देख लिया है। अगर मैं तुम्हें चुनती हूँ तो भी अधर्मी कहलाउंगी जिसने समाज के नियम तोड़े हैं। अगर शेर सिंह के साथ जाती हूँ तो भी लोग वही बात कहेंगे, इसलिए किसी भी रूप से मेरे आगे वाले जीवन में भुचाल तो आने ही वाला है।
फिर बलदेव अपनी माँ को शुभ रात्री कह कर चला जाता है।
घाटराष्ट्र में कोयल की मधुर आवाज़ से सुबह हुई और सूर्य उदय से पहले ही किसान अपने खेत पर काम करने लगे, बलदेव की आँख खुलती है। तो देखता है उसकी माँ उसके पास ही पलंग के कोने में बैठी है।
बलदेव उठ कर जाता है और जैसे ही अपनी बाहो में भरने का प्रयास करता है। वह गिर-सा जाता है।
बलदेव: (मन में) अरे ये क्या मुझे हुआ मुझे लगा यहाँ माँ है। ये तो मेरा भरम था।
और मुस्कराते हुए उसके मुह से निकला।
बलदेव: क्या यही प्यार है।
बलदेव उठ कर जा कर स्नान करता है। उसे याद था आज सूर्य पूजन के लिए माँ को नदी के तट पर ले जाना है।
देवरानी उठती है और स्नान गृह में घुस जाती है और एक छोटा-सा कपड़ा पहन करने लगती है।
ज्यो ज्यो उसके जिस्म पर पानी के बूँदे गिरती हैं। उसके जिस्म से धुये जैसा भाप निकलता है। जैसे किसी ने आग पर पानी के छींटे मार दिये हो।
अपने जलते बदन पर हाथ फरते हुये ।
देवरानी: (मन में) मेरे दूध को देखते हुये बलदेव कैसे कह रहा था वह आम दबा-दबा कर चुस कर खाएगा?
क्या सच में उसके पास इतना बड़ा गन्ना है कि वह मेरे खरबूजो को फोड़ के रस निकल दे? "
हाये राम! ये में क्या सोच रही हूँ, पर ये बलदेव के गन्ने की चुभन तो मुझे दिन रात सताये जा रही है। मुझे रात भर ऐसा मेहसूस होता है जैसे वह मेरे पीछे खड़ा अपना गन्ना मेरे चूतड़ों में लगा रहा है। "
वासना से देवरानी का दोनों आँख बंद हो जाती है। उसके कानो में आवाज गूंजती है। "माँ! कहाँ हो?"
बलदेव कक्ष में आ गया था और उसे पुकार रहा था।
देवरानी तूरंत अपने आखे खोलती है। अपने कपड़े ढूंढ़ने लगती है। पस उसे वहाँ अपना कोई वस्त्र नहीं मिलता तो वह पास में रखे एक साडी के टुकड़े से अपने जिस्म पर किसी भी तरह से ढक लेती है।
देवरानी: हे भगवान! आज में साडी अंदर लाना भूल गई । अब मैं ऐसी अवस्थ में बलदेव के सामने कैसे जाऊ?
कुछ सोच कर ।
देवरानी: बेटा आई में नहा रही हूँ।
वो उस सफ़ेद साडी से अपने आप को सुखाने की कोशिश कर रही थी । क्यू के उसके गीले बड़े बड़े वक्ष और उसके भरे चुतड उस सफ़ेद साडी में साफ पता चल रहे थे ।
देवरानी अपने आप को आईने में देख का मन में बोली बलदेव तो मुझे ऐसा देख आंखों से पी ही जाएगा ।
फिर भी देवरानी हिम्मत कर के स्नान गृह से बाहर आती है और अपने कक्ष के साथ छोटे से कक्षा में दखिल होने के लिए फुर्ती दिखाती है। आहट सुन कर और देवरानी को तेजी से चलते हुए देख।
बलदेव: माँ!
और देवरानी पलट कर बलदेव को देखती है और फिर कुछ समय के लिए अपने कदम रोक लेती है।
जिसे देख बलदेव की सांसे रुक जाती है। , देवरानी का भरी गंड पतले से कपड़े में चिपकी हुई साफ दिख रही थी और उसके दूध पर बंधे कपडे से दिख रहे उसके स्तन थान किसी गाये के थनो से कम नहीं थे।
देवरानी: मैं अभी आई. पुत्र!
और तेज गति से अपने कक्ष में घुस जाती है।
बलदेव उसके चूतड़ों की थिरकान देख सहम जाता है।
बलदेव: तुम सचमच काम देवी हो, तुम्हारा अंग-अंग इस बात की गवाही दे रहा है।
बलदेव अपने खड़े लंड को हाथ से सहला कर "धैर्य! सब मिलेगा !"
देवरानी अंदर जा कर अपनी साँसों पर काबू पाती है और साडी पहनने लगती है।
" हाये राम! कसम से आज तो खा जाने वाली नज़र से देख रहा था । अगर थोड़ी देर वैसी ही वहा रह जाती तो बलदेव तो मेरे साथ जबरदस्ती भी कर सकता था फिर वह आपको-आपको संवारती है।
"जरा अपने आपको देख" देवरानी तू है ही ऐसी की कोई भी प्यासा तेरे जैसा कुवा देख अपनी बाल्टी डाल के पानी निकाल कर प्यास बुझाने जरूर आएगा। "
वो अब तैयार हो जाती है और अपने कक्ष से बाहर निकलती है।
lower case converter बलदेव सजी संवरी अपने बालो के लटो को सुलझती देवरानी को देखता रह जाता है और उसका पहले से खड़ा लौड़ा फूलने लगता है।
देवरानी अदा से चलती हुई आती है और देखती है कि बलदेव उसे घूरे जा रहा है।
बलदेव के पास जा कर !
देवरानी: क्या हुआ लल्लू?
बलदेव: तुमने क्या कहा?
देवरानी: मैंने कहा लल्लू अपना मुह बंद करो! मछर घुस जाएगा!
और मुस्कुराने लगती है!
बलदेव रुको अभी बताता है। कौन है? लल्लू! और देवरानी चहकते हुए वह से भागती है और देवरानी उसे छेड़ने के बाद दूर जाने लगती है।
भागते हुए देवरानी के डोनो बड़े थन मस्ती में झूल रहे थे और कमर के नीचे की लचक ऐसी थी की दोनों चुतडो की दरार के बीच अगर कुछ आ जाए तो पिस जाएगा और चूर-चूर हो जाएगा !
बलदेव देवरानी के पीछे-पीछे भागता रहा । भागते-भागते आखिर कार देवरानी थक जाती है और एक जगह रुक जाती है और बलदेव उसे पीछे से आकर पकड़ लेता है।
बलदेव अपना हाथ देवरानी की कमर पर रख कर देवरानी को अपना ओर दबाता है। फिर अपने हाथ को उसके स्तन के नीचे के हिस्से पर ले जाता है। जहाँ पर देवरानी उसका हाथ अपने हाथों से रोक लेती है। अब बलदेव का हाथ देवरानी के दोनों वक्ष के नीचे था और उसके हाथ के ऊपर देवरानी का हाथ था और देवराबी अपने हाथ से बलदेव के हाथ को सहला रही थी।
ये देख कर की देवरानी ने उसका हाथ अपने दूध तक जाने नहीं दिया!
बलदेव: (मन में) "सयानी घोड़ी!"
अब बलदेव अपना लौड़ा देवरानी की गांड पर गोल-गोल घुमाता है और देवरानी एक दम एक अलग ही नशा महसूस करती है।
बलदेव: (मन मैं) "वाह क्या माल है! और ऐसा माल जो दिन रात चोदने लायक है। ऐसे माल को मेरे पिता राजपाल जैसा मुर्ख ही ऐसे छोड़ सकता है।" कितनी तड़पी है। इतने बरसों से ये घोड़ी। "
बलदेव: अब बोलो कौन है। लल्लू!
और उसकी गांड पर, अपने लौड़े से एक बार हल्का झटका देता है।
देवरानी: उह! ओह! तुम नहीं हो, तुम तो बली हो!
बलदेव को याद आता है। के वह मेले में खुद को बली और माँ को रानी और दोनों को पति पत्नी बताया था।
बलदेव खुश हो कर ।
बलदेव: हाँ अगर में बली हूँ तो तुम रानी हो!
देवरानी एक झटके से उससे छूटती है।
देवरानी: बड़ा आया रानी बनाने वाला, एक दिन याद रखता है। दूसरे दिन भूल जाता है।
बलदेवः तुम्हें रानी नहीं महारानी बनाऊंगा!
देवरानी: देखेंगे! वह तो वक्त ही बताएगा! अभी चलो!
देवरानी आज शुक्रवार का सूर्य पूजन करने नदी तट पर जाने के लिए अपनी पूजा की सामग्री ले लेती है। और अपने बेटे के साथ जाने लगती है।
सूर्य की पहली किरण के साथ नदीतट पर देवरानी अपनी पूजा में लग जाती है और भजन गाने लगती है। फिर श्लोक पढ़ कर दिया जल अपर्ण कर सूर्य देवता की पूजा करती है।
कुज 20 मिनट तक पूजा चलती है। पूजा समाप्त होने पर देवरानी बलदेव को बुलाती है। जो थोड़ी दूर पर बैठा देख रहा था।
देवरानी: इधर आजाओ!
बलदेव: आया माँ!
बलदेव नदी के तट पर देवरानी के पास जाता है और देवरानी उसके माथे पर एक तिलक लगाती है। फिर अपने माथे पर भी हल्का सिंदूर डालती है।
बलदेव वापस आकार नदी के तट से थोड़ा दूरी पर बैठ जाता है और देवरानी जा कर नदी में डबकी लगाने लगती है।
बलदेव: (मन में) मेरा पिता जैसा मुर्ख कोई नहीं होगा जो ऐसे माल को छोड़ कुबेरी में रतन सिंह के साथ अय्याशी कर रहा है।
बलदेव: (ज़ोर से) तुम बहुत सुंदर हो! जैसे मेले में किया था वैसे ही एक बार फिर नृत्य कर के दिखाओ!
देवरानी वैसे ही अपना पल्लू ऊपर करती है और खड़ी रहती है।
देवरानी: पर वहाँ गीत और संगीत भी था।
बलदेव: मैं गा देता हूँ ना मां!
देवरानी: तुम्हे मेरा नृत्य इतना पसंद आया।
बलदेव: सिर्फ निर्त्य नहीं तुम भी उतनी ही पसंद हो (ज़ोर से चिल्लाता है।)
ये बात इतने ज़ोर से बोले जाने पर देवरानी हस पड़ती है।
देवरानी: बड़े गीतकर बन गए हो!
बलदेव: तुमने बना दिया है।
बलदेव: चलो में गाता हूँ!
"तोरा ई दो रस गगरी तड़पावे मुझे बेदर्दी!" और देवरानी के भीगे हुए ब्लाउज में फसे उसके दोनों थनो को निहारता है।
देवरानी जान बूझ के अपने दूध नृत्य करने के बहाने आगे को करती है। जिसे देख बलदेव से रहा नहीं जाता और वह भी पानी में उतर जाता है।
देवरानी तुरंत अपना पल्लू ठीक करने लगती है। पर बलदेव उसका पल्लू अपने हाथ से पकड़कर !
आज शुक्रवार का दिन था और फिर देवरानी अपने बेटे के साथ सूर्य पूजन कर के महल लौट आई, देवरानी के पास अब शनिवार ही बचा था क्यों की शेर सिंहने रविवार को उनका मिलने का दिन तय किया था।
श्याम: ये बलदेव आपने माँ को क्यों ऐसे दबोच रहा है।
बद्री: पता नहीं, ये तो ऐसे प्यार कर रहे हों जैसे माँ बेटा नहीं प्रेमी प्रेमिका हो।
श्याम: हाँ मित्र! दाल में जरूर कुछ काला है।
बद्री: हमें किसी भी निर्णय पर जाने के लये एक बार इस बारे में अच्छे से छान बीन करनी होगी।
फिर दोनों महल वापस आ जाते हैं। जहाँ बलदेव उनसे मिल कर पूछता है।
बलदेव: तुम दोनों कहाँ गए थे।
श्याम: अरे भाई। वह हमने पता किया की तुम महल में नहीं ही तो हम भी पास के उद्यान में टहलने चले गए।
श्याम बलदेव से झूट बोलता है कि वह उद्यान में गए थे कजब्कि असल में दोनों नदी पर गए थे।
बलदेव: मित्र आपको किसी सैनिक को साथ ले जाना चाहिए था ।तुम दोनों के लिए ये राज्य नया है।
बद्री: हम इतने भी कमजोर नहीं हैं युवराज बलदेव!
तीनो मिल कर नाश्ता करने बैठ जाते हैं और देवरानी गरम-गरम नाश्ता और जलेबी ला कर दे रही थी।
श्यामः यार बलदेव! तुम्हें विवाह कर लेना चाहिए।
बलदेव: क्यू भाई। तुम्हें क्यो नहीं करनी चाहिए।
श्याम: अरे मित्र! अगर तुम्हारी होगी तो हमारे पिता भी बिना समय गवाए हमारी भी शादी करवा देंगे।
ये सुन कर देवरानी जो की खाना परोस रही थी कहती है।
देवरानी: क्यों श्याम को शादी की बहुत जल्दी है।
श्यामः तुम्हें कैसी लड़की चाहिए, बलदेव?
ये सुन कर बलदेव एक नजर देवरानी की ओर देखता है।
देवरानी ये देख कर थम जाती है और हल्का आंखों को नीचे कर लेती है।
बलदेव: (मन में) अब तुम लोगों को क्या पता तुम्हारी भाभी तुम्हारे सामने ही है।
देवरानी: (मन में) ये बलदेव ऐसे घूर रहा है। जैसे अभी सात फेरे ले लेगा और लज्जा जाती है।
श्याम: चुप क्यू हो बलदेव?
देवरानी: बोलो जल्दी कैसी चाहिए हम वैसी ही लड़की तुम्हारे लिए ढूँढेंगे। (चुटकी लेते हुए।)
बलदेव: मुझे संस्कारी पत्नी चाहिए जो मेरे घरवाले का ख्याल रखे जैसा के आप रखती हो मां। भगवान के लिए उसके दिल में श्रद्धा हो। खूब सजने वाली हो। थोड़ी मस्तीखोर हो। वह शरीर से मजबूत हो और प्यार करने से थके नहीं।
देवरानी: अपना जीभ अपने होठ पर फेर कर "प्यार करने से थकती है या नहीं वह तो तुम्हें प्यार कर के मालूम होगा।"
श्याम अरे कोई भी लड़की वाला बलदेव को ऐसे एक दिन में ये जांचने के लिए तो अपनी लड़की नहीं देगा।
बलदेव: पर में अगर लड़की को जनता हूँ तो।
अब देवरानी से सुन कर तो मूरत-सी बन जाती है।
श्याम: हाँ तब हो सकता है। कुछ काम।
बद्री: (मन में) ये साला तो अपनी माँ पर नजर रखे हुए है। क्योंकि इस ने ये सारे गुण तो अपनी माँ के ही गिनाये है।
बद्री: वैसे मित्र हमे अपने विवाह पर न्योता दोगे या नहीं।
देवरानी अब उस फिर रसोई में जाती है।
बलदेव: क्यों नहीं दूंगा मित्र? इसमें कोई शक नहीं है। मित्र विवाह के बाद जितने दिन मन में हो तुम यही रहना।
श्यामः पर विवाह के बाद तुम हमें कहाँ मिलेंगे तुम तो अपनी पत्नी के पल्लू से बंधे रहोगे।
बलदेव: (धीरे से दोनों को कहता है।) पत्नी तो ऐसी दिमाग में है कि विवाह के बाद दो दिन लगतार उसे प्यार करूंगा तब वह शांत होगी।
पर देवरानी अपना कान लगाये सब सुन रही थी और वह बात सुन कर के वह समझ गयी की बलदेव उसके बारे में ही बात कर रहा है। वह अपने दांतो तले उन्गली दबा लेती है।
फिर दुपहर को भी कुछ ऐसी ही छेड़ छाड़ की बाते कर भोजन कर के अपने-अपने कक्ष में जा कर आराम करते है और बलदेव भी आराम कर रहा था।
उसे समय पारस देश मे.
कुछ घोड़ों की फौज एक राज महल की तरफ बढ़ रही थी जिसे देख राज सिंहासन पर बैठा राजा उठ खड़ा होता है। उस फ़ौज में से हवा से तेज़ घुड़सवारी कर तेजी से सबसे आगे राज दरबार की ओर चलने वाला कोई और नहीं शमशेरा था।
सिंहासन पारस के छोटे से राज्य का था जिसका कार्यभार देवराज के कांधे पर था और वह ही वहाँ का राजा था। वह देवराज ही था जो सिंहासन से उठा खड़ा हुआ था। पारस के साथ उन तमाम मुल्को के सुल्तान मीर वाहिद के बेटे शमशेरा के स्वागत के लिए उठा देवराज ही देवरानी का एकलौता भाई था।
देवराज: आईये युवराज प्रणाम! आपका स्वागत है।
शमशेरा: सलाम देवराज जी।
देवराज अपनी सिंहासन की बगल में शमशेरा को बैठाता है।
देवराज: कहिए में आपकी कैसे सेवा करूं।
शमशेरा: हम सुल्तान का पैगाम ले कर आए हैं।
देवराज: क्या संदेश है? युवराज!
शमशेरा: हमें एक ऐसे राज्य का पता चलता है। जो सोने और चांदी से भरा है।
देवराज: कहाँ का राज्य? कौन-सा राज्य?
शमशेरा: ये हिंद का एक राज्य है। कुबेरी!
देवराज: कही ये घटकराष्ट्र के पास वाला राज्य कुबेरी तो नहीं।
शमशेरा: तुमने बिलकुल ठीक पकड़ा।
देवराज: तो क्या करना है।
शमशेरा: देखो अब्बा हुजूर तुम पर बहुत ऐतबार करते हैं। देवराज! और वह ये भी कह रहे थे की हिंद पर फतेह करना देवराज से बेहतर कोई नहीं जानता।
देवराज: पर हमारी तो उनसे कोई शत्रुता नहीं।
शमशेरा: सवाल धन का है, अगर हमने पहले नहीं लूटा उस राज्य को, तो दिल्ली का सुलतान शाहजेब लूट ले जाएगा।
देवराज: शाहजेब से तो मुझे भी मेरे पिता की मृत्यु का बदला लेना है।
शमशेरा: सोच लो अगर तुम कुबेरी राज्य को लूट लेते हो तो शाहज़ेब को तुम बहुत बड़ा झटका दोगे और हो सकता है तुम घाटराष्ट्र को भी उसके साथ ही लूट सको।
देवराज: घाटराष्ट्र पर वहा मेरी बहन देवरानी की विवाह हुआ है।
शमशेरा: मुझे पता है। वह हमेशा तुम्हारे लिए दुआ करती है और तुमसे मिलना भी चाहती है।
देवराज: तुम्हें कैसे पता।
शमशेरा: में उससे मिल कर आया हूँ और घबराओ नहीं हमारी सेनाये देवरानी को कोई नुक्सान नहीं मिलेगी और सुना है तुम्हारा एक भांजा भी है।
देवराज: हं सुना तो मैंने भी है।
शमशेरा: वह अब बड़ा हो गया और वो, तुम से कम शक्तिशाली नहीं है!
देवराज: आपकी जासूसी का कोई तोड़ नहीं है।
शमशेरा: शुक्रिया देवराज। तो तय रहा आप जल्द ही हमारे यहाँ आएंगे फिर हम सब मिल कर हमले की तैयारी करेंगे।
देवराज: जी जरूर!
शमशेरा फिर से अपने घोड़े पर बैठ हवा से बात करते हुए अपने घुड़सवारों की सेना के साथ अपने महल की ओर चल पड़ता है।
एक शानदार महल के आगे अपने घोडे को रोक वह घोडे से कूद कर राज दरबार की यात्रा करता है। जहाँ पर बहुत भीड़ थी, वह अपनी तलवार निकाल कर अपनी सेना को देता है।
शमशेरा: (सैनिक से) जरा इसपर धार लगा कर लाना।
सैनिक: जी हुजूर।
सामने शमशेरा के पिता बैठे थे।
शमशेरा: अस्सलामु अलैकुम सुल्तान!
मीर वाहिद: बेटा शमशेरा आओ।
शमशेराः सर झुका कर सुल्तान का इकबाल बुलंद हो।
मीर वाहिद उठ कर शमशेर को गले से लगा लेता है।
शमशेरा: अब्बा हज़ूर!
मीर वाहिद: बैठो यहाँ मेरे लाल, कैसा रहा सफर।
शमशेरा: बहुत अच्छा।
मीर वाहिद: क्या कहा देवराज ने?
शमशेरा: वह हमारी बात मान गया । वह बहुत जल्दी हमारे यहा आ जायेगा।
"बेटा शमशेरा" ये उसकी माँ थी जो अपने बेटे का आने कीखबर मिलने पर आई थी।
शमशेरा ने मुड़ कर करअपनी माँ को देखा।
जी हाँ यही थी 25 वर्ष शमशेरा की माँ जिसकी उमर 45 वर्ष थी और उसका नाम उसके हुस्न को देख कर रखा गया था हूर जहाँ और प्यार से सभी उसे हुरिया भी कहते थे, वह मिश्र से थी।
हुर जहाँ: बेटा साल भर जासूसी करते रहते हो अपने अब्बा के लिए. कुछ वक्त अपने महल में भी बिताया करो। जब देखो तब जंग की बाते और तयारी करते रहते हो।
शमशेरा: अस्सलामु अलैकुम अम्मी।
हुरिया: वालेकुमसालम! तुम दोनों बाप बेटे एक जैसे हो, जंगी जहाज के लूटेरे और यहाँ पर बैठे सब लोग हसते है।
मीर वाहिद: हाँ इसीलिए तो हम आपको मिश्र से चुरा कर ले आए! और अब फिर से सब हसते हैं।
हुरिया: बूढ़े हो गए पर अक्ल नहीं आई।
हुरिया: बेटा चलो में तुम्हें खाना खिलाती हूँ नहीं तो ये तुम्हारे अब्बा तुम्हें भुखा ही फिर से जंग पर भेज देंगे।
हुरिया अपने बेटे को ले कर अंदर चली जाती है उसे खाना खिलाने के लिए।
हुरिया अपने आप को आईने में देखती है। उसका लंबा बदन उसपे 42 की छाती और उसके 46 की गांड कयामत ढा रही थी और वह नहा कर एक अलग किस्म का हिजाब पहन लेती है।
फिर वह खुद को इबादत के लिए तैयार करने लगती है। बाहर हुरिया हमेशा हिजाब में ही जाती थी, हुरिया का चेहरा उसके दासियों और उसके परिवार के अलावा किसी ने नहीं देखा था।
घाटराष्ट्र में
शुक्रवार दोपहर के भोजन के बाद बद्री और श्याम के अपने घर वापसी की तैयारी होने लगती है।
देवरानी अपने राज्य के हर प्रसिद्ध चीज अपने पुत्र बलदेव के मित्रो को बाँध कर देने लगती है।
श्याम: अरे मौसी जी इतना कष्ट करने की क्या जरूरत है?
देवरानी: तुम लोग घाटराष्ट्र से जाओ और हम तुम्हे खाली हाथ भेज दे! ऐसा नहीं हो सकता!
बलदेव: (मन में) साले श्याम मौसी नहीं भाभी बोल देगा तो और ज्यादा मान दान होगा।
बद्री: पर फिर भी क्या इतना अधिक सामान हम अपने घोड़े पर ले जा सकेंगे।
देवरानी: आराम से चले जाएंगे, कृपया बहाने न बनाएँ।
बलदेव: (मन में) देखो ऐसे जबरदस्ती कर रही है, जैसे के ये दोनों इनके देवर ही हो!
देवरानी: तू उधर क्यू खड़ा है। बलदेव इधर आ कर मदद करो!
बलदेव: हाँ माँ!
श्याम: बलदेव देखो तुम्हारी माँ कितनी काम करती है। , अब इनकी ये भारी भरकम काम करने की उम्र नहीं है। तुम तो विवाह कर लो!
बलदेव: नहीं माँ इतनी कमजोर नहीं हुई है ।
बलदेव (मन में) अबे सालो तुम्हें क्या पता मैं इनसे ही विवाह करने के फिराक में हूँ और तुम्हारी भाभी देवरानी में इतनी शक्ति है, के तुम दोनों को एक साथ पछाड़ दे।
देवरानी मौक़े का फ़ायदा उठा के, बलदेव को चिढ़ाते हुए।
देवरानी: हाँ तुम दोनों, तुम्हारे राज्य में एक अच्छी-सी लड़की देखो इसके लिए (या हल्की मुस्कान देती है।)
बलदेव का ये सुन कर अपना मुह उतर जाता है और रूठ जाता है।
श्याम: क्यू नहीं हम तो यही कोशिश करेंगे के जैसी इसकी चाहत है, उसी अनुसार कोई कन्या मिल जाए।
बलदेव: ऐसी आज कल मिलनी मुश्किल है, मैं तो कहता हूँ तुम्हे वह नहीं मिलेगी ।
श्याम: भाई। हमें पता है। तुम्हें संस्कार के साथ-साथ नए सोच रखने वाली कन्या चाहिए।
बलदेव: हाँ ऐसे कन्याए एक दुक्की ही मिलती है।
फिर देवरानी की ओर देख कर बोलता है "या मिलती भी है। तो उनके हजार नखरे होते हैं।"
बद्री: भाई। अब तुम्हें वैसे तेवर वाली मजबूत लड़की चाहिए तो कुछ सहन तो करना ही पड़ेगा।
देवरानी इस बात पर चुटकी लेते हुए ।
देवरानी: हाँ बद्री और वैसी कन्या को संभाल लेना भी किसी ऐरे गैरे नाथू खैरे के बस की बात नहीं है ।
(वो बलदेव को देख मुस्कुराती है।)
बलदेव (जोश में आ कर) बद्री तुम तो जाने हो मेरे को में एक क्या ऐसी 10 को संभाल लूगा । ये एक किस खेत की मूली है।
अब देवरानी को ताना सुनने की बारी थी।
देवरानी इस बात पर बलदेव को ना देख, अंदर से खुश हो कर मुस्कुरा कर अपने को देखती है।
देवरानी: (मन में) इस मूली को खाने के लिए तुम्हें दिन रात ज़मीन की सिंचाईभी तो करनी पड़ेगी बलदेव और ये सोच कर देवरानी की चूत पनिया जाती है।
इन्हीं बातों के बीच सारी तैयारी हो जाती है और वह दोनों अपने-अपने घर को निकलते हैं।
बद्री और श्याम वादा करते हैं की जब भी बलदेव को किसी भी प्रकार की जरूरत होगी वह सहायता करेंगे और घाटराष्ट्र बहुत जल्दी वापस आएंगे।
पारस में
शाम के 4 बजे अपनी खुदा की इबादत कर हुरजहाँ अपने सुल्तान को खोजने निकालती है, उसकी दासी उसे कहती है के वह बैठे कोई किताब पढ़ रहे हैं। हुरिया वहा पहुँचती है।
हुरिया: सुल्तान!
मीर वाहिद: आईये मोहतरमा!
हुरिया: आपने आज इबादत की या बस?
हुरियाः तुम्हारे जैसे इबादतगर बीवी के रहते हुए भला सुल्तान की क्या मजाल के वह इबादत में हिस्सेदारी ना ले।
हुरिया: खुदा आप पर अपनी रहमत बनाए रखे।
सुल्तान: तो बतायें मल्लिका ए जहाँ । ये सुल्तान मीर वाहिद आपकी क्या खिदमत कर सकता है।
हुरिया: आज कल मेरे सुल्तान जंग में मशरूफ होते है। मल्लिका ए जहान को भला कौन पूछता है।
सुल्तान: आप के हुस्न के तो हम अब भी कायल हैं और जब आप देखे काले हिजाब में खुद को ढक कर आई थी तब भी जब हमने आपकी लचकती हुई इस बड़ी गांड को देखा और आपको हिलते दूध को देखा तो मेरा बुरा हाल हो गया था।
हुरिया: बुढे हो गए हो आप अब से 60 के ऊपर हो गए हो ।
सुल्तान: पर मेरी बीवी तो जवान है।
सुल्तान हुरिया के करीब जा कर खड़ा होता है।
45 वर्ष हुरिया मिश्र की रानी थी जिसे मीर वाहिद ने मिश्र फतेह करने के बाद अपने साथ लाया था ।
सुल्तान अपने दहिने हाथ से उसके बड़े ने दूध को पकड़ लेता है और सहलाता है।
हुरिया: सच में आपको मुझे देख कुछ करने का दिल हुआ तो आप मुझे इशारा कर देते, मैं कहीं कोने में ही आप से मिल लेती।
सुल्तान: कोई बात नहीं अभी सारी कसर निकल देता हूँ और सुलतान उसके दूध को जोर से दबाने लगा।
सुल्तान: आह तुम्हारे ये दूध कितने बड़े और शानदार हैं। हुरिया बेगम!
हुरिया सुल्तान का हाथ पकड़ कर अपने हाथ से दूध को दबवाने लगती है।
कुछ देर खूब अच्छे से दोनों बड़े गेंदो को अच्छे मसलने के बाद सुल्तान से रहा नहीं जाता और वह अपने कपडे उतार फेंकता है।
सुल्तान: अब जल्दी करो हुरिया जान!
हुरिया झट से नीचे बैठ के सुल्तान के आधे खड़े लंड को मुह में ले कर पहले उसके टोपी को चाटती है। फिर उसे अपने मुह में ले लेती है।
सुल्तान: आआह हुरिया! आआ! ऐसे ही चूसो!
हुरिया: उहम्म-उहम्म उहम्म!
सुल्तान अब हुरिया को उठाता है और ऊपर से उसकी कमीज को उठा कर उसके भारी स्तनों को नंगा कर देता है और उन्हें दबोच लेता हैं।
सुल्तान: क्या कसे हुए और भारी मम्मे है। तुम्हारे मेरी जान!
हुरिया: आप इसे दबा के दबा के सख्त से नरम कर दो।
अब सुल्तान हुरिया को नीचे कर के हुरिया के दूध के बीच अपने लौड़े को डाल उसके भारी मम्मे चौदने लगता है।
सुल्तान: आह हुरिया!
सुल्तान अब अपना लौड़ा अपने हाथ से पकड़ कर ज़ोर से एक दूध पर लौड़ा "थप" से मारता है।
हुरिया आखे बंद कर "आह सुल्तान!"
अब सुल्तान पास में राखी मेज के ऊपर हुरिया को झुकने का इशारा करता है और हुरिया अपनी बड़ी गांड को हिला कर झुक जाती है।
सुल्तान: उसकी गांड पर एक लप्पड़ मरता है। "क्या मोटी गांड है। तुम्हारी मल्लिका ए जहान"
हुरिया: आह! नहीं सुल्तान...!
सुल्तान: इस पर फतेह कर के मुझे जितना मजा आया उतना तो मुझे पूरी दुनिया पर फतेह कर के नहीं आया!
अब सुल्तान अपना लंड झुकी हुई हुरिया की चूत में डाल देता है।
सुल्तान: ये लो अब बूढ़े का लंड!
हुरिया: आआआह" सुल्तान धीरे!
हुरिया: आआह बास सुल्तान धीरे से करो! मुझे बहुत दर्द हो रहा है।
सुल्तान: तो सीधा लेट जा मेरी जान!
हुरिया अब पलट जाती है।
हुरिया के दूध हवा में किसी बड़े गेंद की तरह हिल रहे थे और सुल्तान एक बार फिर से अंदर घुसा कर धक्का लगाना शुरू करता है।
हुरिया: इस्श्श आह सुल्तान!
सुल्तान और ले, ये ले, और "फच फच" कर लौड़ा पेलते जाता है।
हुरियाः नहीं सुल्तान अभी मत पानी छोडना आराम से करो, करते रहो 1
हुरिया समझ जाती है की सुल्तान का पानी निकालने वाला है।
उनकी ये सब हरकत इन मिया बीवी के अलावा कोई और भी देख रहा था । वह था उनका शहज़ादा शमशेरा! जो अपनी माँ के ये रूप देख वही रुक गया था दरसल वह अपने अब्बा से किसी जंगी किताब को लेने आया था पर जैसे वह वहा पहुचा तो उसकी माँ हुरिया चिल्ला रही थी।
हुरिया मिन्नते कर रही थी पानी न छोड़ना पर 6 7 धक्के लगा कर सुल्तान निढाल हो जाता है।
हुरिया: आह! नहीं सुल्तान!
फिर वह नीचे सुल्तान के लौडे को देखती है। जो अब मुरझाने लगा था।
शमशेरा: अपनी माँ के बड़ी गांड और दूध देख पागल हो गया था।
"अम्मी जान इतनी इबादतगर होने के बाद भी कैसे अपने शौहर से बिना डरे दिन में ही चुदवा रही है और बचपना के बाद, मैंने आज तक कभी अम्मी को बिना हिजाब नहीं देखा था । और आज इनके बड़े दूध और गांड देख यकीन नहीं होता के इतने बड़ी चीज अम्मी ने कैसे छुपा रखी थी।" और शमशेरा वह से चुपचाप निकल जाता है।
घाटराष्ट्र मे
रात के भोजन के बाद देवरानी जा कर स्नान करती है और खूब सजती संवरती है। फिर अपने कक्ष के मंदिर से थोड़ा सिंदूर उठा कर लगाती है और अपना मंगल सूत्र पहन लेती है।
देवरानी: (मन में) आज तो बलदेव तो मुझे देख पागल हो जाएगा, दिन में बहुत बक-बक कर रहा था ना।
बलदेव अपने कक्ष से निकल कर देवरानी की कक्ष की ओर जा रहा था।
बलदेव: (मन में) ये मेरे मित्र भी ऐसे समय पर आगये जब में उनकी भाभी को उनके लिए तैयार कर रहा हूँ। ये दो दिन बद्री और श्याम के वजह से खराब हो गए ।
बलदेव तेजी में चल रहा था कि उसके कानो में आवाज आती है।
जीविका: बलदेव!
बलदेव: दादी आप !
जीविका: हाँ कहा जा रहे हो पुत्र!
बलदेव: वह माँ कक्ष में!
जीविका: क्यू!
बलदेव के पास इसका जवाब नहीं था और जीविका घूर कर बलदेव को देख रही थी।
बलदेव: वह दादी कुछ राज्य की स्थिति के बारे में कुछ बात करनी थी ।
जीविका: अच्छा बेटा (मन में राज्य की या तुम्हारे अपने दिल की) ।
बलदेव: ठीक है। दादी आशीर्वाद दो!
जीविका: जीते रहो ।
बलदेव: (मन में) कोई ना कोई आ ही जाता है। काम में बाधा बनने, पर कोई बात नहीं ।आज सारी कसर निकल लूंगा इस देवरानी की ।
बलदेव देवरानी का कक्ष में आता है।
देवरानी मेज़ पर रखे आम को काट उसका रस बना रही थी । बलदेव की आहट उसे समझ में आ जाती है।
बलदेव देखता है। उसकी माँ हल्का-सा झुक कर कुछ काट रही है।
बलदेव: मन में) आज तो माँ दुल्हन की तरह तैयार जैसे ये आज मेरी सुहागरात हो और उसकी गांड को निहारता है।
देवरानी को दरवाजा की चिटकनी लगने की आवाज कानो में आती है और वह पीछे मुड़ कर देखती है।
बलदेव उसके गांड को खा जाने वाली नजरो से देख रहा था जिसे देख देवरानी की चुत में चींटिया दौड़ने लगती है।
देवरानी: तुमने ये चिटकनी क्यू लगा दी बलदेव?
बलदेव: वह बस हम दोनों को थोड़ा-सा एकांत जगह चाहिए और वैसे भी दो दिनों से हमने ढंग से बातचीत नहीं की हैं।
देवरानी: बेटा बलदेव में तुम्हारी माँ हूँ, पत्नी नहीं, जो बातचीत करने के लिए एकांत जगह चाहिए और तुमने ये चिटकनी लगा दी। (मुस्कुराती है।)
बलदेव: माँ दिन में तुम ही कह रही थी न विवाह करना है। मेरी समझ से में पत्नी के साथ रहने का अभ्यास कर रहा हूँ ।
देवरानी: मैं आम रस बना लू।
और देवरानी झुकती हैऔर बलदेव अपनी माँ से जा कर चिपक जाता है।
देवरानी: तुम पियोगे न आम रस।
बलदेव: हाँ पहले दबाऊंगा फिर निचोड़कर रस पीउंगा।
देवरानी: अगर में तुम्हें बिना मेहनत किए रस निकल के दू।
बलदेव: तो आपका रस भी पीउंगा ।
बलदेव अब अपना लंड देवरानी की गांड पर टिका देता है और मजे लेने लगता है।
बलदेव: (मन में) हाय! क्या गद्देदार गांड है।
देवरानी: आह! " और उसकी आँखे बंद हो जाती है।
देवरानी अपने आप पर काबू कर किसी भी तरह आम रस बना लेती है और घूम कर बलदेव को देती है।
दोनो पास में सोफे पर बैठ आमरस खाते हैं।
देवरानी: कैसा लगा आम रस ?
बलदेव: क्या ये दशहरी आम है और देवरानी के दूध की तरफ देखता। देवरानी के दूध के बीच मंगलसूत्र लटक रहा था जिससे उसके उभार और अधिक सुंदर लग रहे थे।
देवरानी: नहीं ये मालदा आम का रस है।
बलदेव के आखो में झाक के-
बलदेव: अगर मालदा का आम रस ऐसा है। तो दशहरी का कैसा होगा।
बलदेव देवरानी के चुचो को मस्ती से देख देवरानी के कान के पास जा कर उसके कान में बोलता है ।
"माँ ये दोनों तो दशहरी से भी बड़े हैं।"
या फिर अपने माँ के दूध के तरफ इशारा करता है।
देवरानी: हलके से उसके कांधे पर चांटा मारती है। "हट बदमाश ।"
और उठ कर जाने लगती है, बलदेव उसका हाथ पकड कर ।
"माँ मैंने सच कहा है।"
देवरानी: सिस्की लेते हुए "बलदेव !"
बलदेवः छुपाए नहीं छुपते मां।
ये सुनना था के देवरानी के दूध पर से उसका दुपट्टा हट जाता है और उसकी बाहो को पकड़कर बलदेव उसे थाम लेता है।
देवरानी: (मुस्कुरा कर) तू सच नहीं कहता तू झूठा है।
और जब वह बलदेव अब भी उसके दूध को ताड़ते देखती है तो फिर लज्जा कर अपना सर झुका लेती है।
बलदेव मौके का फायदा उठा का देवरानी को अपने गोद में उठाता है और बिस्तर की ओर चलने लगता है।
बलदेव: माँ क्या कहा था तुम्हे दिन में के सब के बस की बात नहीं के संभाल ले!
देवरानी: हम्म मैंने ये तुम्हारी पत्नी के लिए कहा था।
बलदेव: देखो में तुम्हें संभाले खड़ा हूँ और तुम किसी बच्चे की तरह लटकी हुई हो । क्या फ़ायदा तुम्हारे इस भारी शरीर का?
देवरानी उसके छाती पर मुक्का मारती है।
"बड़े महाबली बनते हो ।"
बलदेव: माँ अगर में तुम्हें संभल सकता हूँ तो सोच लो किसी को भी संभल सकता हूँ।
देवरानी: हाँ बाबा तुम ने मुझे जैसी भारी भरकम को संभल लिया तो किसी को भी संभल लोगे ।
बलदेवः पर मुझे किसी और को नहीं संभलना।
देवरानी: तो किस को संभलना है। जबकि इस समय तक देवरानी की चूत पानी छोड-छोड कर लाल हो गई थी। फिर अपनी गांड के निचेले हिस्से पर उसे बलदेव का लंड भी मेहसूस हो रहा था।
बलदेव: बस तुम्हें संभलना है।
देवरानी: सोच लो।
बलदेव: सोच लिया।
देवरानी: भारी पड़ सकता है।
बलदेव: मैं सब सहने के लिये त्यार हूँ।
इतने में बलदेव देवरानी को पलंग पर लिटाता है।
जीविकाः बलदेव ओ बलदेव!
बलदेव गुस्सा होता है और चिढ कर ।
"जी दादी !"
देवरानी हस देती है।
देवरानी: मन में) बड़ा आया बच्चे की तरह चिढ गया जैसे मैं इसकी पत्नी हूँ और इसके कार्यक्रम के बीच में कोई विघ्न आ गया हो ।
देवरानी को हस्ते हुए देख !
बलदेव: तुन्हे तो मैं बाद में देख लूंगा
बलदेव: आया दादी !
फिर बलदेव देवरानी को छोड़ दादी के पास चला जाता है...।
इधर देवरानी उल्टी हो अपनी चुत को दबाये हुए लेटी हुई थी ।
रानी देवरानी: हे भगवान मेरी बूर फट जाएगी अब इतनी जलन हो रही है। "आह!" इतनी तडप! "हाय" ये बलदेव भी ना हमेशा खेल-खेल में, आग सुलगा के चला जाता है ।"
अपने छूट को मसलते हुए तड़पते हुए देवरानी सो जाती है, कुछ देर में बलदेव भी दादी का काम निपटा कर आता है और देवरानी का दरवाजा पर आकर बोलता है "माँ दरवाजा खोलो ।"
जब दरवाजा नहीं खुलता तो युवराज बलदेव बेतहास दरवाजा पीटता है पर उसकी माँ तो घोडे बेच कर सो रही थी।
युवराज बलदेव भी जा कर सो जाता है। शनिवार सुबह सब उठते है और अपने-अपने कार्य पर लग जाते हैं।
देवरानी आज जल्दी उठ जाती है और रोज़ की तरह पहले पूजा अर्चना करती है। फिर अपना योग कर कुछ जड़ बूटीया खाती है।
युवराज बलदेव को कल रात अच्छी नींद नहीं मिली थी और अभी भी अपनी माँ के छुवन की खुमारी में अब भी डूबा हुआ था।
कमला: हे युवराज अब उठ जाओ सूरज सर के ऊपर आ गया है ।
युवराज बलदेव "हमम।" और उठता है।
कमला: लगता है प्यार में दिन रात समझ नहीं आता है युवराज को।
युवराज बलदेव: अब तुम्हारे महारानी से पूछो सब उसकी गलती है।
कमला: ओहो! प्यार में डूबे तुम और गलती महारानी की!
युवराज बलदेव: अपने महारानी से कहो वह अपने हुस्न का जलवा न ऐसे दिखायें!
कमला: अब उनके रूप में ऐसी ही बात है तो वह क्या करें?
युवराज बलदेव: सिर्फ रूप की बात ही नहीं है ।
कमला; और क्या?
युवराज बलदेव; और अंग भी!
कमला: हाय महारानी के अंग सुंदर होना भी उनकी गलती नहीं है ।
युवराज बलदेव: चुप कर! साली! और हसता है ।
कमला ये सुन कर एक दम चौंक जाती है
कमला का मुरझाया हुआ चेहरा देख बलदेव मुस्कान देता है।
युवराज बलदेव: कमला तुम माँ को अपनी बहन मानती हो ना!
कमला: जी! युवराज!
युवराज बलदेव: तो पत्नी की बहन कौन हुई? साली!
कमला: हाय ! और मुस्कुरा देती है।
युवराज बलदेव: और साली भी तो आधी घरवाली होती है।
कमला: चुप करो युवराज ऐसा मत कहो!
युवराज बलदेव कमला को ताड़ते हुए बोला वैसे तुम भी अपने बहनो से कम नहीं हो! साली जी!
कमला: युवराज! ऐसे वैसे ना देखो, नहीं तो मैं अपनी बहन का कान भर के, तुम्हारा पत्ता काट दूंगी!
युवराज बलदेव मुसकुराता है।
कमला "हुह! बड़े आए आधी घर वाली बनाने वाले" और चली जाती है।
युवराज बलदेव स्नान कर तैयार हो कर राज सभा में जाता है जहाँ महारानी सृष्टि प्रजा की बातों को सुन रही थी और समस्याऔ का समाधान दे रही थी।
मंत्री: आईये युवराज! पधारिये!
सृष्टि आसान ग्रहण करो! बलदेव!
बलदेव प्रणाम कर के महारानी सृष्टि की बगल में आसन ग्रहण करता है।
मंत्री: युवराज सेनापति का संदेश आया है हमारे सीमा पर घुसपैठ होने की संभावना है।
शुरुष्टि: हाँ ये सही बात है युवराज बलदेव और हम चाहते हैं कि आज से घाटराष्ट्र की सीमा तुम्हारी निगरानी में रहे।
बलदेव: (मन में) इसका अर्थ तो ये है के मुझे दिन रात कभी भी राष्ट्र की सीमा की सुरक्षा के लिए जाना होगा।
शुरुआत: तुम सही सोच रहे हो युवराज, दिन हो या रात तुम्हें वही पहरा देना है।
बलदेव: पर मां!
शुरू: तुम्हारा महल में आना जाना लगा रहेगा पर तुम सीमा की सुरक्षा में कोई कोताही नहीं बरतनी है।
बलदेव: जो आज्ञा महारानी!
सृष्टि के कान में राधा आ कर कुछ कहती है जिसे बलदेव सुन लेता है।
राधा: महारानी! ये तो आ गया पर इसकी माँ नहीं दिख रही है।
महारानी सृष्टि अपने सिंहासन से उठ का सभा समाप्त करते हुए राधा के साथ जाने लगती है।
बलदेव: मैं या मेरी माँ तुम सब की इतना आदर करते हैं परंतु बड़ी माँ तुम तो अपनी दासी से मेरी माँ की बेज्जती करवा रही हो।
बलदेव और मंत्री सैनिको से बात करते हैं और बलदेव सैनिकों को ले कर सीमा पर चला जाता है।
पारस में
शनिवार सुबह सब सो ही रहे थे पर पारस की महारानी हूरजहाँ उठ कर बागीचे की ओर जाने लगती है। शमशेरा अभी सो कर उठा था तथा वह अपनी खिड़की के पास कुर्सी रख कर बैठ जाता है।
शमशेरा के कमरे से महल के पास का बगीचा साफ नजर आ। रहा था ।
शमशेरा बैठा ताजा हवा ले रहा था के वह दूर किसी को बाग में देखता है और उसे पहचानने का प्रयास करता है और समझ जाता है कि वह कोई या नहीं उसकी माँ हुरिया है।
हुर जहाँ जो एक मज़हबीऔर बड़े सख्त मिजाज़ की औरत थी जिसका तालुक मिश्र (इजीप्ट) से था। कम उमर में शादी हो कर पारस आई हुरिया आज भी किसी हूर जैसी दिखती थी, वह आज 45 साल की थी पर उसके चेहरों पर अब भी सेबो जैसी लाली थी, चेहरा एक दम दूधा-सा गोरा और लंबाई चौड़ाई ऐसी के हिजाब में भी उसके बड़ी गांड और दूध छिपाये नहीं छिपते थे। हुरिया का जीवन तो खुशियों से भरा था पर कुछ सालो से उसका शौहर मीर वाहिद पूरी दुनिया के दौरे पर रहता था और उसकी जिनसी कमजोरी से हुरिया थोड़ी-सी फिकरमंद थी।
वैसे हुरिया की ख्वाइश उमर ढलने के साथ बढ़ रही थी पर सुल्तान मीर वाहिद की जिन्सी ख्वाहिशे कम हो रही थी, हुरिया की गांड कम अज काम 46 की थी और उसके दूध 40 के थे ।
शमशेरा जिसने अपनी माँ को बचपन में ही बिना हिजाब के सिर्फ सूट सलवार या राजसी पोशाक में ही में देखा था, कल दिन में बिना डरे अपने अब्बू को अम्मी को नंगी कर चुदाई करते देख थोड़ा हैरान था ।
शमशेरा: (मन मैं) आह! क्या गांड है आपकी अम्मी जान!
शमशेरा को याद आता है कि कल इस गांड को नंगी कर के सुल्तान कैसे तड़ातड़ पेल रहा था।
शमशेरा: (मन में) देखो अब कितनी शरीफ बन रही है ये और कल अपनी गांड कैसे उचक-उचक कर चुदवा रही थी ।
हुरिया के बड़े गोल बिताम अब जल्दी में चलने से ऊपर नीचे हो रहे थे ।
शमशेरा का हाथ खुद बा खुद अपने लंड पर चला जाता है और उसे मसलने लगता है।
हुरिया अपनी मस्ती से चल रही थी । उसे क्या पता था कि उसका अपना बेटा उसकी गांड को खा जाने वाली नज़र से देख रहा है ।
तभी हुरिया एक गुलाब का फूल तोडने के लिए थोड़ा रुकी और उसके रुकने से उसका हिजाब थोड़ा-सा उसकी बड़ी गांड की दरार में घुस जाता है।
शमशेरा अब अपना लंड ज़ोर से हिलाने लगता है और उसकी आखे बंद हो जाती है फिर वह जैसे ही आंखे खोलता है तो हुरिया को एक दूसरे फूल की तरफ जाते हुए देखता है तो की शमशेर की तरफ था ।
जैसे ही वह शमशेरा की तरफ मुड़ती है। शमशेर उसके दोनों फुटबॉल साइज के मम्मे हवा में लहराते हुए हिलते डुलते देखता है।
शमशेरा: आआह! अम्मी जान। " और वह पच्च से पानी छोड़ देता है।
वो महल बनाने वाले का शुक्रीया करता है जिसने बाग़ साथ में बनाया था जिसके कारण वह अपनी माँ की मटकती गांड और हिलते हुए स्तनों को देख मजे ले पाया था ।
शमशेरा उठ कर नहा धो कर अपनी माँ की ख्वाबगाह में जाता है।