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बलदेव जब अपनी माँ से आँख लडा कर कमला के आने के बाद महल से बाहर निकला तो उसके दिमाग में वैध जी का ध्यान आया । उसे याद आया दादी के पैरो के इलाज के लिए उन्हें बुलवाना था। वह-वह सैनिक को आदेश देता है कि उस जंगल की ओर जाना है तैयारी करे, कुछ देर में दो सैनिक एक काले रंग का घोड़ा ले कर आते हैं जिस पर बड़े आसनी से सवार हो कर उन दोनों सैनिको के साथ बलदेव जंगल की ओर चल पड़ता है। घंटो के सफर के बाद एक कुटिया के पास वह सब रुकते है।
दोनों सैनिको को कुटिया के बाहर रहने का आदेश दे कर वह खुद दबे पाव कुटिया के भीतर प्रवेश करता है वह देखता है वैध जी योग आसन में बैठ ध्यान कर रहे। वह उन्हें प्रणाम कर चुपचाप वही उनके पास बैठा जाता है, कुछ देर बलदेव बैठा रहता हैं और फिर वैध जी आखे खोलते है।
वैधः बोलो बालक! कौन हो तुम?
बलदेव: वैध जी प्रणाम! मेरा नाम बलदेव सिंह है। मैं घटकराष्ट्र का राजकुमार हूँ।
वैध: आयुष्मान भव! बालक वही घाटराष्ट्र जो राज्य जंगलो और पहाड़ों से छुपा हुआ है और कोई राजाओ चाह कर भी वहा का रास्ता नहीं खोज सका है, इसलिए वहा किसी ने आक्रमण नहीं किया है । मैंने सुना है वहा बहुत सुकून है, वह कभी खून नहीं बहा है।
बलदेव: आप सही कह रहे हैं । वैध जी, आपके बारे में मुझे आचार्य जी ने बताया और उन्हें कहा था कि "तुम्हे संसार की सारी विद्या प्राप्त कर ली हैं और शरीर से शक्तिशाली हो गए हो पर आत्मा से और मन से शक्तिशाली बस वैध जी बना सकते हैं।"
वैध: ये तो उनका बदप्पन है, मैं ये समझता हूँ के जीवन को अच्छे से जीने के लिए शास्त्र की नहीं मन की शांति होनी अनिवर्या है।
बलदेव: आप की सोच को प्रणाम गुरु जी और उनके चरण स्पर्श कर के बैठ जाता है।
बलदेव: गुरु जी! मेरा निवेदन है आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।
वैध: हम तुम अपना शिष्य स्विकार करते हैं और वचन देते हैं तुम्हे हम अपनी हर कला से मलमाल कर देंगे और अपने आत्मा से खुश रहना सीख जाओगे।
बलदेवः धन्यवद गुरु जी। आप हमारे साथ हमारे महल चलिये और यदि आपको अच्छे लगे तो आप वही महल में रह सकते हैं।
वैध: नहीं बलदेव में महल में कतई नहीं रह सकता, वहाँ मैं अपनी साध्ना नहीं कर पाऊँगा / अगर मझे घाटराष्ट्र का वातावरण अनुकूल लगा तो भी मैं वहाँ कुटिया में ही रहूँगा।
बलदेव: जैसी आपकी इच्छा वैसी मेरी दादी महारानी जीविका अपने पैरो की बिमारी से मजबूर है उनको भी आपकी सहायता की आवश्यकता है।
वैध: ठीक है फिर हमें अति शीघ्र निकालना चाहिए।
फिर वह घोड़ो पर बैठ कर घाटराष्ट्र की ओर निकल पडते है, घाटराष्ट्र पहुचते-पहुचते संध्या हो जाती है और ऊँचे पहाड़ पर पहुच कर घोडा ज़ोर से हिनहिनता है और वैध निचे का नज़ारा देखते हैं।
वैध: वाह! क्या सुंदर दृश्य है घाटराष्ट्र दियो से जग मग कर रहा है इतनी रोशनी है ऐसा लग रहा है दिन है । हर जगह लालटेन और दिए जल रहे।
घोडे की आवाज़ सुन कर सीमा के सिपाही अपने लालटेन ले कर देखते हैं कि वहाँ कौन है और युवराज को देख फिर अपने स्थान पर जा कर खड़े हो जाते हैं।
इधर अपने कक्ष में लेटी हुई देवरानी के कानो में जैसे ही उन घोडो के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई देती है, देवरानी जो पेट के बल लेटी हुई थी तुरत उठ जाती है।
देवरानी: आ गया मेरा घोड़ा! (युवराज बलदेव) और फिर देवरानी मुस्कुरा देती है।
पहाड़ से उतर कर बलदेव वैध जी को अतिथि गृह के तरफ ले कर जाता है।
राजकुमार बलदेव: गुरूजी आज आप इस अतिथि गृह में विश्राम करें कल सुबह आपके लिए कुटिया की व्यवस्था कर दी जाएगी और बलदेव घोडे से उतर कर स्वयं वैध जी का सारा सामान उठा कर अंदर रखता है।
बलदेव: गुरूजी! अब आप विश्राम करे में पिता जी से मिल कर आता हूँ फिर आप को मैं दादीजी के पास ले कर चलता हूँ।
वैध: ठीक है।
instagram url download बलदेव सृष्टि यानी बड़ी माँ के भवन की ओर जाता है देखता है महाराज राजपाल और सृष्टि अभी दरबार से आ कर, अपना मुकुट सर से निकल कर, रख रहे हैं। राजा राजपाल का मुकुट कई रंग के जवाहरत के बना और सुसज्जित था जबकि महारानी शुष्टि का मुकुट सिर्फ सफेद रंग के हीरे के बना था, शुष्टि का मुकुट देख कर बलदेव को अपनी माँ की याद आती है।
बलदेव: प्रणाम पिता जी! और अपने पिता के चरण स्पर्श करता और फिर अपने बड़ी माँ के चरण स्पर्श करता है।
बलदेव: पिताजी मैं दादी के इलाज के लिए वैध जी को लाने गया था, मुझे लगता है वह ठीक हो सकती है।
राजपाल: तुम्हारे तुम पर गर्व है बेटा! इतनी छोटी-सी उमर में तुमने जिमेदारी लेना सीख लिया है ।, अगर तुम चाहो तो, राजा रतन की मदद से मैं तुम्हे आगे की शिक्षा ग्रहण करने हेतू विदेश भी भेज सकता हूँ।
बलदेव: पिता जी मैंने अभी आगे का नहीं सोचा है, पहले में घर की मुश्किल हल करना चाहता हूँ और घाटराष्ट्र का और खास हमारे परिवार के दुख को दूर करना चाहता हूँ। ये कह कर वह पिता से आज्ञा ले कर फिर वैध के पास चला जाता है।
देवरानी अपने कक्ष में बैठ कर ताली बजाती है और ताली सुनते ही कमला अंदर आती है।
कमला: हुकम महारानी।
देवरानी: सैनिको से पता करो बलदेव आया है तो अभी कहाँ है?
कमला चली जाती है और पता लगा कर वापस आती है।
कमला: महारानी युवराज को आए अभी कुछ समय हुआ हैं वह वैध को लाए हैं। उनको भोजन करवा कर अपने पिता से मिलवाया । फिर वह वैध को ले कर महारानी जीविका को दिखाने ले जा रहे हैं।
देवरानी (मन में अब अपने प्रेमी से दूरी एक पल भी बर्दाश्त नहीं होती और कहती है पाप है। ये अनुचित है, वह है, महारानी तू तो प्रेम में धस्ती जा रही है और तुझे ये खुद ही नहीं पता है।)
महारानी: (मन में) आने दो इस घोड़े को बताती हूँ उसके लिए मेरे से ज्यादा महत्त्व अपने पिता का हो गया है। मैं दिन भर उसका इंतजार करती रही और वह मुझे छोड़ बाकी सब से मिलने चला गया ।
बलदेव इधर वैध जी को ले कर दादी के कक्ष में गया जहाँ वैध जी दादी के पैरो पर दासियो द्वारा लेप लगवते है और कहते हैं कि वह कल बैसाखिया बना कर देंगे जिनकी सहायता से राजमाता जीविका चल सकेंगे।
उधर इन्तजार करती हुई रानी देवरानी का संयम टूट जाता है और वह महल से निकल कर अतिथि गृह की तरफ जाती है। वहा कोई नहीं होता, तो वही बैठ जाती है कि कुछ समय में उसका पुत्र आएगा। तभी उसे सामने एक पोटली दिखती है जिसे वह हाथ लगाती है तो उसे ये समझते देर नहीं लगती कि उससे पुस्तके है। देवरानी ऊपर से दो किताब खींचती है और पोटली को पुनः बाँध देती है और वही कुर्सी पर बैठती है जैसे वह पहली पुशतक का पन्ना पलटती है उसमे एक पन्ने पर योग के आसन के चित्र और उसके सामने के पन्ने में आसन की विशेषताये लिखी हुई थी। फिर वह दूसरी पुस्तक को खोलती है। पुष्तक खोलते ही उसका मुंह खुला का खुला रह जाता है क्योंकि इस पुशतक में एक महिला और पुरुष नंगी अवस्था में चित्रित थे।
पुरुष खड़ा हुआ था और उसका लिंग महिला की योनि में घुसा हुआ था जो उसके सर को पकड़ कर पुरुष की गोद में बैठी हुई थी।
ये देख कर देवरानी के माथे पर एक पसीना आ जाता है और वह चित्र के और उस आसन का विशेषण और विशेषताएँ पढ़े बिना दोनों पुस्तकों को ले कर अपने महल में तेजी से लौट जाती है, पर जैसे वह-वह अपने कक्ष में जाती है कमला की नजर उसके हाथ में पुश्ताको पर पड़ जाती है पर न तो कमला और नाही देवरानी इस बारे में कुछ कहती है।
इधर वैध जी जीविका का इलाज कर के सैनिको के साथ वापस महल से बाहर अतिथि गृह में आ जाते हैं परन्तु बलदेव अभी भी दादी के पास बैठा हुआ था।
बलदेव: अब आपको कैसा महसूस हो रहा है दादी मां?
दादी: बहुत अच्छा। बहुत आराम मिल रहा है पुत्र! बलदेव । तुम्हारा धन्यवाद पुत्र!
बलदेव: कल से आप बैसाखी की मदद से चलने लगोगी और मैं आपको झील भी दिखाने ले कर जाउंगा।
दादी: आखो में आसू ले कर तेरे हृदय में कितना प्रेम है पुत्र!
बलदेव: आप मुझे बता सकती हैं प्रेम क्या है।
दादी: जो तू मेरे लिय कर रहा है, मेरी खुशी के लिए कर रहा है, वह ही प्रेम है!
बलदेव: दादी माँ! तो क्या किसी को खुश करना प्रेम है?
दादी: अपने प्रेमी की खुशी से खुश होना भी प्रेम ही है पुत्र!
बलदेव: दादी तो क्या तुम्हें कभी प्रेम हुआ है?
दादी: (हस्ते हुए) जरूर हुआ बेटा तेरे दादा जी मेरे प्रेमी थे! जिसके वजह से आज तुम सब हो और तुम्हे भी तुम्हारी राजकुमारी मिलेगी! जिस से तुमको प्रेम होगा और तुम उसकी हर खुशी के लिए अपनी जान की बाजी लगा दोगे। तुम्हें उसका चलना, उसका बोलना, हसना, सब कुछ पुरी दुनिया से अलग लगेगा। जिसे पाकर तुम्हारा तन मन प्रसन्न होगा और मुझे भरोसा है तुम्हारा हृदय ऐसा है जो तुम्हारी राजकुमारी होगी वह भी पूरे तन मन से तुमसे प्रसन्न रहेगी और तुम्हे बहुत प्रेम करेगी।
बलदेव: तो क्या प्रेम किसी से भी हो सकता है। दादी!
दादी: हाँ पुत्र! किसी से भी, प्रेम कोई बंधन मर्यादा जाति या रंग नहीं देखता। बस हो जाता है, जब उसे देख कर और देखने का मन हो! और तुम्हे लगे दुनिया के ऊपर उड़ रहे हो तो समझो प्रेम है।
बलदेव को सुबह का अपने माँ देवरानी को देखना याद आता है और वह मुस्कान देता है!
दादी: प्रयास, उसके बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता! बस कोशिश से ही मिलता है प्रेम।
बलदेव: अगर समाज और धर्म प्रेम में बढ़ा बन जाए तो?
दादी: धर्म और ग्रंथ अनेक है! मनुष्यो के लिए नियम अनेक है! पर मनुष्य एक है। प्रेम एक है! इसलिए सभी नियम धरे के धरे रह जाते हैं। अगर समाज और मनुष्य खुश ना हो तो, अपने दिल की सुनो और दिल को खुश रखोगे तो खुद खुश रहेंगे। हमेशा!
बलदेव: धन्यवाद दादी माँ (मन में: मुझे मेरा उत्तर मिल गया दादी मां!)
इधर देवरानी आकर उन दो पुश्तको को अपने पलंग के गद्दे के नीचे छुपा देती है तभी कमला अंदर आ जाती है।
कमला: आपने भोजन किया महारानी!
देवरानी: नहीं कमला।
कमला: पता है महारानी मेरी बहन की बेटी किसी के साथ भाग गई।
देवरानी: कहा भाग गई?
कमला: लो अब कर लो बात! अगर पता होता तो पकड़ न लेते हम!
देवरानी: मतलब क्या है?
कमला: महारानी आप न कुछ नहीं जानती! भागने का अर्थ ये है कि उसका किसी से प्रेम था! और वह उसके साथ घाटराष्ट्र छोड़ के चली गई।
देवरानी: क्या दंड मिलना चाहिए ऊसे? उसे दर नहीं लगा पकडे गए तो का होगा!
कमला: अरे महारानी प्रेम होता ही ऐसा है, दंड क्या? संसार भर से युद्ध कर लेते हैं लोग प्रेम पाने के लिए।
देवरानी: हाँ कमला तुम्हें सही कहा, मुझे प्रेम का क्या पता होगा! इतनी कम उमर में विवाह कर यहा आगयी और उसके बाद का तो तुम जानती ही हो।
कमला: प्रेम आपको पता हो या ना हो फिर भी आपको हो सकता है और हो सकता है हो भी गया हो, पर आपको पता ही ना हो, प्रेम वह होता जब एक औरत को एक मर्द की एक पल की दूरी भी बर्दाश्त नहीं होती। वह हर तरह से मर्द को खुश रखना चाहती है चाहे उसे कितना भी दर्द हो तकलीफ हो, जिसे देख कर दिल कांपने लगे और हाथ की जोड़ी ढीली पड़ जाए वह प्रेम होता है। महारानी!
देवरानी आज सुबह की बात याद करने लगी । कैसे आज सुबह उसका दिल ज़ोरो से धड़क रहा था और उसे एक अलग-सा एहसास हुआ था और अपने मन में सोचती है।
देवरानी: (मन में) क्या यही प्यार है? अच्छा कमला अब तुम जाओ! अब में आराम करूंगी।
दादी से बात कर के बलदेव सीधा अपनी माँ देवरानी के कक्ष
की ओर जाता है और जैसे ही वह कक्ष के अंदर जाता है सामने से कमला बाहर आ रही होती है, बलदेव को देख कमला हाथ जोड़ कर साइड में खड़ी हो जाती है और कहती है "युवराज!" और युवराज बलदेव पास में खड़ी माँ को एक सफ़ेद आभूषण पहने देख वही खड़ा देखता रह जाता है।
बलदेव: (मन में) वाह कितनी सुंदर हो तुम।
ये सब देख कर कमला अपने नीचे होठ दबा कर मुस्कुराने लगती है, तभी देवरानी भी मुड़ कर बलदेव को देखती है।
देवरानी: (मन में) वाह! कितना सुंदर है कुमार! इसे देखते हैं मेरा दिल शांत हो गया।
बलदेव अपने हाथो से कमला को जाने का इशारा करता है और कमला शर्मा कर और खुशी के मारे जल्दी से कक्ष से बाहर निकलने लगती है पर उसका दिल नहीं मानता और रुक कर दरवाजे पर परदे के पीछे खड़ी होकर छूप कर देखने लगती है।
बलदेव: धीर धीरे माँ के आखो में देखते हुए माँ के करीब जाता है और वह उसको अपने आलिंगन में पीछे से ले लेता है।
बलदेव: माँ। ।
देवरानी: बेटा। । कितनी देर लगा दी तुमने?
बलदेव: कहीं नहीं!
देवरानी: झूठा!
बलदेव: आपने मुझे अपने दिल में नहीं खोजा मां, मैं आपको वहीँ मिल जाता।
देवरानी ये बात सुन कर मुस्कुरा कर बलदेव को जोर से अपनी बाहों में जकड लेती है।
देवरानी: बेटा!
देवरानी के बड़े दूध बलदेव के कठोर छाती से चिपक जाती है और दोनों को बेहिसाब गरमी का एहसास होता है।
वही दूर खड़ी कमला "महारानी और युवराज तो प्रेम में पागल होते देख रही थी और सोचती है ये अगर ऐसे ही लापरवाही करेंगे तो इनका प्रेम शुरू होने से पहले खत्म हो जाएगा। ऐसे तो ये महाराज दुवारा ये जल्द ही पकडे जाएंगे, कुछ करना पड़ेगा!" और वह अपने घर जाने के लिए महल से बाहर आ जाती है।
देवरानी और बलदेव एक दूसरे को बाहो में ले कर बाते करते रहते हैं और बलदेव देवरानी को अपनी पुरी दिन चर्या बताता हैं और ये भी बताता है कि उसे इतनी देर क्यों हुई।
देवरानी: बेटा! तुझे मेरी तो चिंता ही नहीं है। सब से आखिरी में मेरे पास आया।
बलदेव: चिंता है इसे तो तुम मेरी बाहो में हो और यही मेरा असली स्थान है चाहे में पूरा संसार घूम लू आखिरी में मुझे तो यही आकर सुकून मिलना है।
बलदेव की बात सुन कर वह अपना सर उसके कांधे पर रख कर शर्माते हुये मुस्कुराती है।
देवरानी: अब खाना खाते हैं।
बलदेव: हाँ खाना खाते हैं।
देवरानी: चलो।
बलदेव: हाँ।
देवरानी: बेटा।
बलदेव: जी मां।
देवरानी: तू मुझे छोड़ेगा तभी हम खाना खा सकते हैं ना!
ये सुन कर बलदेव झट से अपनी माँ को बंधन से मुक्त कर के मुस्कान देता है और देवरानी बलदेव की बेवकुफी पर हंसती है, देवरानी को हसता देख बलदेव भी हंसने लगता है, फिर दोनों साथ खाना खाकर अपने कक्ष में सोने चले जाते है।
नई सुबह बलदेव कोयल की कूको से उठता है और अपनी दादी की कही हुई बात और अपना हाल को मिलाते हुए समझने कि कोशिश करता है के क्या यही प्यार है और अंत में मान लेता है कि वह अपने माँ को एक स्त्री के रूप में देखने लगा है, फिर वह इस प्रेम से आने वाले तूफ़ान का सोचता है क्या वह उन सब से मुक़ाबला कर पायेगा? फिर उसे दादी की बात याद आती है और वह निर्णय करता है के वह अपने दिल की सुनेगा और अपने प्रेम को पा कर वह रहेगा।
बलदेव: (मन में) दुनिया के सारे नियम प्रेम से बढ़ कर नहीं है और हमारी खुशी से बढ़ कर कुछ भी नहीं है। "और बलदेव प्रतिज्ञा लेता है और कहता है" मैं यानी के महाराजा बलदेव सिंह अपना प्रेम हासिल करूंगा औरअपनी प्रेमिका यानी की रानी देवरानी को महारानी देवरानी बनाऊंगा और मेरी हर बात पत्थर की लकीर है। " और बलदेव की आंखो के नसें लाल पड़ जाती हैं।
आज बलदेव थोड़ी देरी से उठा था और वैध जी सवेरे ही उठ कर अपनी विद्या की कलाकारी दिखा कर महारानी जीविका को वैसाखी ला कर दे देते हैं, जिसे ले कर वह खुशी से फूली नहीं-नहीं समाती और कहती है " में सबसे पहले इस वैसाखी से चल कर अपने पोते से मिलने जाऊंगी जिस्के वजह से आज में कई वर्षो के बाद चल सकती हु और वह बलदेव के कक्ष के पास पहुँच जाती है जैसे ही वह राजकुमार बलदेव के कक्ष के पास पहुँचती है तो उसके कान में बलदेव की प्रतिज्ञा सुनाई देती है।
अपनी पोते के मुख से अपनी बहू को अपनी महारानी बनाने की बात सुन कर उन्हें ऐसा लगता है जैसे आसमान फट गया हो और वह चुपके से अपने कक्ष में लौट आती है।
उधर देवरानी अपने बिस्तर पर उठती उसके बदन की ख़ुमारी में पलट कर तकिए को अपने सीने से लगाए सोचने लगती है।
देवरानी: (मन में) अगर कमला की बात मानी जाए तो मेरे बेटे मेरे प्रेम की शुरुआत हो गई है और उसमें मैं इसे चाह कर भी नहीं रोक नहीं सकती हूँ। पर अगर ये खबर राज दरबार में पहुच गई तो यहाँ के नियम के हिसाब से मुझे और मेरे पुत्र को मौत के घाट उतार दिया जाएगा, पर मैं क्या करूं? वह मेरे पुत्र है! में उसे भूल भी नहीं सकती। मुझे पहली बार प्रेम हुआ है, तो क्या दो जानो को खतरे में डालना सही है? अगर सिर्फ मेरी जान की बात होती तो कोई बात नहीं थी क्योंकि मैं तो मरी जैसी हूँ। इस प्रेम में मैं मेरे युवराज से जी भर के प्रेम करती और उसके लिए ख़ुशी से अपने प्राण त्याग देती पर इसमे तो बलदेव की जान को भी खतरा है, में ऐसा नहीं होने दे सकती, अगर वासना की भूख ने इस प्रेम को जन्म दिया है तो मैं किसी ना किसी से सम्बंध बना लुंगी और तब हो स्कता है मेरे हृदय से ये प्रेम निकल जाए, मुझे इस बारे में कमला से बात करनी चाहिए.
आज राज परिवार कुश्ती का खेल देखने जा रहा था सब तैयार हो कर देवरानी का इंतजार कर रहे थे तभी राजा राजपाल कहते हैं।
राजा राजपाल: कमला जाओ देवरानी को बुला कर लाओ!
कमला: जी महाराज।
कमला जैसे वह देवरानी के कक्ष में जाती है उसे सामने से तैयार हो कर एक हरे रंग की साड़ी में आती हुई दिखती है। वह साडी ऐसी थी जिसमे उसके छाती तो छिपी हुई थी पर उसके दोनों नितम्ब हिलते हुए साफ दिख रहे-रहे थे।
कमला: आइये महारानी सब आपका इन्तजार कर रहे हैं।
देवरानी: कमला और एक बात करनी थी तुम से।
कमलाः बोलिए महारानी।
देवरानी: मझे लगता है तम सही कहती हो मुझे कोई ऐसा ढूँढ लेना चाहिए जो मेरी इच्छा पूरी करें और मैं तुमपे सबसे ज्यादा भरोसा करती हूँ क्या तुम मेरे लिए कोई ऐसा ढूँढ सकती हो? और मुस्कुराती है।
कमला: (मन में-कामिनी प्यार का खेल किसी और से और इच्छा किसी और से पूरी करने की सोच रही है पर मैंने युवराज का आंखो में सच्चा प्यार देखा है।)
देवरानी: कुछ कहा तुमने कमला?
कमला: नहीं तो। । मैं पक्का एक कसाई ढूँढूंगी जो आपकी बोटी-बोटी को खा जाए और हसने लगती है।
देवरानी: देख लो पर मझे पसंद आना चाहिए।
कमला: आपको पसंद आएगा! ...
कमला बोल तो देती है पर मन ही मन रानी को कोसती हैं। (ये करमजलि है युवराज का प्यार छोड़ किसी और को देख रही है पर में युवराज के साथ ऐसा धोखा होने नहीं दूंगी)
सब महल से निकल कर बारी-बारी से रथ में बैठने लगते हैं, जब देवरानी की बैठने की बारी आती है तो राजकुमार बलदेव आगे बढ़ कर उसके दोनों हाथो से पकड़ कर देवरानी को ऊपर खीचता है और वह भी रथ में बैठ जाती है। ये सब कमला और खासकर के बलदेव की दादी देख रही थी और उसके चेहरे का रंग भी उड़ जाता है।
रास्ते भर बलदेव और देवरानी एक दूसरे से चिपकाने की कोशिश करते रहते हैं और आखिरी कर एक बड़े मैदान के पास रथ रोका जाता है जहाँ पर चारो ओर से लोग ekहोते हैं और एकत्रित थे और कुर्सिया रखी हुई थी। राज परिवार जा कर कुर्सियों पर विराजमान हो जाता है। इस बार भी देवरानी की बगल में राजकुमार बलदेव जा कर बैठ जाता है और उसका बायीं हथेली पर अपना दाया हाथ रख कर सहलाते हुए कुश्ती का मज़ा लेने लगता है। उनकी इन सब हरकतों पर बलदेव की दादी की नजर होती है, फिर कुश्ती खत्म होती है और विजेताओं को उपहार देकर सब राज महल वापस लौट आते हैं।
कुश्ती देख कर राज घराना अति प्रसन्न था और हो भी क्यू न आज राजा की माँ ने भी तो फिर से वैसाखी से चलना शुरू कर दिया था। सभी लौट कर महल आते हैं और अपने-अपने कक्ष में विश्राम करने चले जाते हैं। देवरानी अपने ककसक में आए कर स्नान गृह में घुस जाति है।
उनके पीछे-पीछे कमला उनके कक्ष में जाती है तो उसे बिस्तर का एक कोना कुछ-कुछ उठा हुआ लगता है। वह बिस्तर को जैसे ही हटाती है उसके नीचे से उसे वह पुस्तक मिलती है जैसे ही वह किताब खोल कर देखते ही उसके कान खड़े हो जाते हैं और वह पुस्तक देख हैरान हो जाती है और स्तब्ध हो उस चित्रों को देखने में तल्लीन हो जाती हैं। " हाये राम! महारानी ये कामसूत्र के आसन देख रही थी और पढ़ रही थी। उस दिन इन्हे ही जल्दी में छुपाने आई थी।
अभी कमला कुछ और सोचतीपर उससे पहले उसे एक और झटका लगता है । उसके सामने से बलदेव उसके पास वही आ रहा था। उसे आते देख कमला हडबड़ा जाती है, कुछ हो पलो में राजलुमार बलदेव उसके सामने खड़ा था और कमला उस नग्न चित्रों वाली कामसूत्र की किताब खोले हुए वहीँ खड़ी हुई थी । उस पुस्तक पर बलदेव की नजर पड़ती है तो चित्रों को देख उसे ये समझने में देर नहीं लगती के कौन-सी पुस्तक है और वह वो क्रोध में कहता है ।
बलदेव: ये क्या है कमला
कमला: जी कुमार वो। ।वह!
कमला: तुम ये सब। में उस कमरे में बलदेव की जोरदार आवाज गूंजती है और फिर स्नान घर से देवरानी की आवाज आती है कौन है?
कमला: महारानी! मैं और युवराज ही!
केवल कमला की मैं सुन कर देवरानी अपने बालो को संवारते हुए अपने वस्त्र जो वह सोने के समय पहनती थी पहनती थी या नहाने के समय पहने हुए थे वही पहन कर बाहर निकल आयी ।
सामने से देवरानी को स्नान घर से बाहर आते देख दोनों अपनी बातें भूल जाते हैं। देवरानी के छोटे अंग वस्त्र में उसके वक्ष समा नहीं पा रहे थे और बाहर झांक रहे थे । उसकी गहरी नाभी और सपाट पेट के साथ अर्धनग्न देवरानी उस समय स्वयं कामसूत्र में चित्रित किसी स्त्री से अभी अधिक कामुक लग रही थी और कहर बरपा रहे थे। कमला ने बड़ी चालकी से वह पुस्तक को जैसे हे देवरानी की आवाज़ सुनी थी चुपके से बिस्तर के नीचे वापिस रख दी थी।
देवरानी:-क्या हुआ तुम दोनों क्या बाते कर रहे हो?
कमला: महारानी वह युवराज कह रहे थे की उनको भोजन में क्या-क्या चाहिए!
देवरानी चलती रहती है और अपने कपड़ों की अलमारी की तरफतरफ बढ़ने लगती है, रानी ने अपने वस्त्र बदले और राजकुमार उन्हें वस्त्र बदलते हुए देख्ता रहा । जब वह बलदेव और कमला को पीछे छोड़ अपने कक्ष में जाने लगती है तो उसे देख बलदेव का हालत खराब हो जाती है और उसे ये सब देख इतनी उत्तेजना होती है कि उसका लिंग उसके पायजामा में साफ ऊपर उठ जाता है और टेंट नजर आने लगता हैं ।
बलदेव की आँख भी हलकी-सी बंद हो जाती है और उसके सामने खड़ी कमला की नजर सीधे उसके हलब्बी लौड़े दे पर जाती है और उसकी आखे दुगनी हो खुल जाती है।
कमला: (मन में) है राम ये लौडा है के खूटा?
बलदेव: ये क्या हो रहा था कमला?
तभी देवरानी की आवाज़ फिर से आती है "मुझे भूख लगी है में भोजन कक्ष में जाती हूँ तम दोनों वहा क्या कर रहे? जल्दी आ जाओ!" और देवरानी अपने कक्ष से निकल कर खाना खाने भोजन कक्ष में आ जाती है जहाँ पर सभी बैठ के भोजन खा रहे थे।
बलदेवः कैसी पुस्तक थी वो?
(कमला जानती थी कुमार उस पर हावी होने है प्रयास कर रहा था । पर वह इतनी आसानी से ऐसा होने देने वाली नहीं थी ।)
कमला: क्या-क्या ये क्या हो रहा था?
कमला की इस बात के अर्थ को-को समझ बलदेव नीचे देखता है तो उसे पता लगता है कि उसका लौड़ा पूरा तन तनया हुआ पायजामे से साफ़ झलक रहा था।
कमला: अरे ये महारानी को आते जाते देख ऐसा क्यों हो गया है, ये कैसी हरकत है?
अब खेल कमला के पाले में था।
बलदेव: अरे वह तो यू ही।
कमला: यू ही! मैंने देखा तुम्हारी नज़र महरानी पर थी और ये हरकत हुई और आपने एक बार मुस्कुराते हुए आँख भी बंद की थी।
अपनी चोरी पकड़ने जाने पर बलदेव चुप चाप वहीँ एक कुर्सी पर बैठ गया अब वह और क्या कहे ये सोचने लगा।
कमला: अब पूछिए युवराज किसी पुस्तक थी । कमला अब समझ गई के युवराज के बस की नहीं अब कुछ और बोले।
कमला: सुनिए युवराज मेने आपको बचपन से खिलाया है, पाला पोसा है और आप इस बात की चिंता बिलकुल न करे। मैं आपके अपमान के बारे में सोच भी नहीं सकती हूँ।
बलदेव: हम्म।
कहानी जारी रहेगी
कमला: युवराज अभी भोजन करने चलें। आप मुझे शाम में झील के पास मिलिए मुझे आपसे कुछ बात करनी है।
और दोनों जाने लगते हैं तभी थोड़ी दूर जा कर कमला कहती है और हाँ युवराज आपको जानना था ना उस पुस्तक के बारे में। तो वह पुस्तक आपकी प्रिया माँ की है" और मुस्कुरा कर भाग जाती है और बलदेव स्तब्ध हो वही खड़ा का खड़ा रह जाता है।
कमला: युवराज अभी भोजन करने चलें। आप मुझे शाम में झील के पास मिलिए मुझे आपसे कुछ बात करनी है।
उस शाम सूर्य ढलते ही बलदेव ये सोचते हुए पता नहीं कमला क्या बात करना चाहती है, कहीं वह मेरे इज्जत और सम्मान को बचाये रखने के बदले में कुछ मांग तो नहीं करेगी? वह जा कर झील किनारे बैठ जाता है और प्रतीक्षा करने लगता है। हलका अँधेरा छाने लगा था। सूर्यस्त देखते-देखते उसे पता ही नहीं चलता की उसके बगल में कमला आ कर बैठ गयी है। ये पहली बार था जब युवराज के बराबर में कमला बैठी थी। फिर बलदेव उसे देख कर पूछता है ।
बलदेव: मुर्झाया-सा मुह ले कर "तुम कब आई?"
कमला: आप किसके याद में थे जो आपको मेरे आने का पता नहीं चला?
बलदेवः किसी की नहीं।
कमला: कहीं महारानी की याद में तो नहीं?
बलदेव हल्का क्रोधित हो कर कमला को देखता है।
"बोलो क्यों बुलाया क्या काम है?"
कमला: जब मैंने पहली बार आपको और महारानी को देखा था तभी समझ गई थी कि आप दोनों में कुछ खिचड़ी पक रही है"जैसे आप दोनों एक दुसरे को घूर रहे थे फिर आप दोनों का गले लगना। सहलाना।"
बलदेव: इसमें माँ की कोई गलती नहीं है। वह तो मैं ही बेहक गया था।
कमला: बड़ी चिंता है माँ की। पूरा दोष अपने ऊपर ले रहे हो।
बलदेव: हम्म!
कमला: देखे युवराज में अपने आप से ज्यादा महारानी को चाहती हूँ। मैं उनको दुख में बिलकुल नहीं देख सकती।
बलदेव: हम्म!
कमला: मैंने आप दोनों में सच्चे प्यार का दिया जलता हुआ देखा है और मुझे इस से कोई आपत्ति भी नहीं है।
अब बलदेव के सांस में सांस आती है।
कमला: पिछले 18 साल में कभी उन्हें इतना खुश और चैन कि नींद सोते हुए नहीं देखा है जितना अब देख रही हूँ, मैंने उनको खून के आसु रोते देखा है, उन्हें ना पति का प्यार मिला ना, उनके भाई या बाप का, ना ससुराल वालों का, सबने उनका सिर्फ समय-समय पर इस्तेमाल ही किया है।
उन्होंने अपने पति के प्यार के बिना इतने साल गुजारे हैं सिर्फ तुम्हारा मुह देख कर, नहीं तो किसी औरत के बस की बात नहीं कि वह अपने आप पर, अपनी इच्छाऔ पर काबू कर ले और महाराज को तुम्हारी बड़ी माँ ने तुम्हारी माँ के साथ मिलन से रोक दिया। फिर महाराज ने भी तुम्हारी माँ से ऐसी दूरी बना ली जैसी कि वह दुनिया की सब से बदसूरत औरत हो।
कमला: बोलिए युवराज आप मेरे बेटे जैसे है "क्या आपको देवरानी पसंद है"।
बलदेव चुप चाप एक गहरी सोच में डूबा था कि वह क्या कहे और करे"।
बलदेव: मैं क्या कहू मेरे पास उत्तर नहीं है।
कमला: वही जो आपका दिल कहे।
बलदेव: हाँ में उनसे प्रेम करने लगा हूँ! उनकी बोली से, उनके अंदाज से, उनकी सोच से, मेरा प्रेम सिर्फ शरीर तक सिमित नहीं है, मेरी आत्मा में बस चुकी है वो।
कमला: (हल्का मुस्कुराते हुए) हा-हा मैं समझ सकती हूँ दिन में महारानी की ऐसी प्रस्तुति के बाद आप फिसल गए और उनका शरीर ही ऐसा है कि कोई भी उन्हें ऐसे देख कर फिसल जाए।
बलदेव: हाँ वह तो है में तो उनके सामने कुछ भी नहीं हूँ।
कमला: नहीं युवराज आप जैसा भी कोई नहीं है। महारानी जैसी शरीर की मलिकिन के उपयुक्त आपका शरीर ही है।
बलदेव इस बत पर हल्का मुस्कुरा देता है और अपनेमूछ पर ताव देता है।
कमला: इतना भी नहीं है आपको संयम बरतने और व्यवहार के बारे में अभी बहुत कुछ सीखना होगा। महारानी के जिम्मेदरी उठाने लायक बनने के लिए भी अभी आपको बहुत कुछ सीखना है।
बलदेव: तो क्या करें हम कमला जी।
कमला: अब तो सब ठीक है पर आज एक नया मोड़ आ गया है वह नहीं बताया आपको।
बलदेव: कैसा मोड।
कमला: थोड़ा चिन्तित होते हुए, बात ये है कि महारानी आज मुझे मिलीतो उन्होंने मुझे कुछ कहा। और उसके बाद युवराज को वह सब बात बता दी जो महारानी ने सुबह की थी।
ये सून के उसकी माँ अपनी प्यास बुझाने के लिए कोई और पुरुष ढूँढ रही है बलदेव की आँख भर आई।
बलदेव: शायद वह अभी मुझे एक पुरुष के रूप में नहीं देखती।
कमला: नहीं ऐसा नहीं उनकी सेहन शक्ति हम से कोई गुना ज्यादा है और इतने सालो सब कुछ सहन करती आई है, वह इतनी संस्कारी है कि वह चाहते हुए भी समाज विरुद्ध नहीं जा सकती। जिस स्त्री ने इतने सालो से कभी गैर मर्द की ख्वाहिश नहीं की, मुझे लगता है कि वह किसी और से सम्बंध रख कर, आपके के लिए अपने प्यार को दबाना चाहती है।
बलदेव: अगर ऐसा न हुआ तो और वह सच में उन्हें मैं नहीं चाहिए और वह सचमुच किसी अन्य पुरुष से सम्बंध रखना चाहती है, ना कि मेरे प्यार को दबाने के लिए फिर?
कमला: तुम्हारा दिल क्या कहता है? जैसे हमारे सामने दिन में आधी नंगी आ गई जैसे तुमसे चिपकती है। वह सब क्या है? क्या एक बेटे से ऐसा करते हैं?
बलदेव: दिल तो कहता है कि उसे भी प्यार है पर दिमाग नहीं मानता।
कमला: दिल की सुनो और वैसे भी एक बारी प्रयास कर देखो पता लगा लो कि आखिर वह चाहती क्या है?
बलदेव: हाँ ये ठीक रहेगा।
कमला: अगर सब कुछ सही रहा तो महारानी का भार संभलने के लिए त्यार रहो, विशेष तौर पर वैसे जैसे उस पुस्तक के चित्र में था।
बलदेव: याद करते हुए उस चित्र जिस्मे स्त्री को पुरुष खड़े-खड़े अपने गोद में बैठा अपना लैंड पेल रहा था उसके चेहरे पर एक मुस्कान फ़ैल जाती है "नहीं कमला वह सब कला है ऐसा सच में नहीं होता है"।
कमला: होता है, युवराज होता है> जब उतनी उर्जा हो तब होता है और मझे यकीन है आप वह कर लोगे और हसने लगती है।
बलदेव शर्मा के मारे अपना सर झुका देता है।
बलदेव: वह छोड़ो ये बताओ अब आगे क्या करना है?
कमला: में महारानी के कहे अनुसर उसके लिए एक पुरुष ढूँढूंगी।
बलदेव: (विचलित हो कर) क्या?
कमला: पूरी बात सुनिये युवराज, वह पुरुष कोई और नहीं तुम ही हो। मैं उनके पास पत्र पहुँचाउंगी की कोई उनसे प्रेम करता है। तुम्हे बस अपना नाम बदल कर पत्र देना है फिर आप दोनों पत्र के द्वारा बात आगे बढ़ाओ।
बलदेव: फिर?
कमला: आगे की बात आगे बताऊंगी।
कल पत्र दे देना और हा अपना नाम शेर सिंह लिख देना। आज में उन्हें बताउंगी कि कोई शेर सिंह ने कुश्ती मैदान में उन्हें देखा था और वह उनको देख कर पागल हो गया है, समझ गए न तुम? उन्हें पटाओ पर किसी और नाम का प्रयोग करो।
बलदेव: ठीक है कमला जासूस। करते हैं ।
फिर दोनों उठ जाते हैं कमला देवरानी की ओर चली जाति है और बलदेव वैध जी कक्ष में चला जाता है।
युवराज बलदेव सीधा वैध जी के पास जाता है जहाँ पर वैध जी अपने कक्ष में बैठ कर योग कर रहे थे।
बलदेवः प्रणाम गुरु देव!
वैध: आओ बालक, तुम भी बैठो और आसन करो।
बलदेव वैध के सामने बैठ कर अपनी टाँगे मोड़ के आसान करने लगता है । दोनों कुछ देर योग करने के बाद डोनो उठ कर कुर्सी पर बैठते हैं और वैध जी बलदेव को कुछ आसन और जड़ी बूटी की ज्ञान देने के बाद वैध जी उसे कुछ बूटीया खाने को देते हैं।
वैध: लो बालक इस से तुमहारी उर्जा में बहुत वृद्धि होगी।
कमला देवरानी के कक्ष में पहुँचती है तो देखती है कि वह अपने कक्ष में बने छोटे से मंदिर के सामने हाथ जोड़ कर पूजा कर रही है।
कमला भी चुप चाप उसके पीछे खड़े हो कर उसके भजन सुनने लगती है, इतने मधुर आवाज में देवरानी गा रही थी की पूजा खतम होते ही प्रसाद ले कर देवरानी कमला को देती है और फिर खुद खाती है।
कमला: कृष्ण कन्हैया। आपकी बरसों की तपस्या से खुश हो गए हैं महारानी।
देवरानी: तुमहे कैसे पता।
कमला: क्योंकि में एक ऐसी खबर ले कर आई हूँ जिसे सुन कर आप खुशी से पागल हो जाएंगी।
देवरानी: बोलो फिर।
कमला: (कमला झूटी कहानी बनाने लगी।) बात ये है कि आज में झील के पास जा रही थी तभी वहा पर एक घोडे से एक लंबा ऊंचा कद का कोई राजा आया और मुझे देख कर बोला, सुनो तुम रानी देवरानी की दासी हो ना। मेने कहा।
कमला: जी हाँ आप कौन हो।
उसने अपना नाम शेर सिंह बताया।
शेर सिंह: मेरा नाम शेर सिंह है। कमला मझे तुमसे जरूरी काम है।
कमला: बोलो क्या काम है।
शेर सिंह: मुझे तुम्हारी रानी देवरानी पसंद आ गई है और मैं उन्हें कल अपना पत्र देना चाहता हूँ तुम उन्हें बता देना और कल इसी समय यहाँ आजाना।
कमला: पर तुम हो कौन और महारानी को कैसे देखा।
शेरसिंह: मैं पड़ोस का राजा हूँ और देवरानी को मैंने कुश्ती मैदान में देखा था जहाँ में भी उपस्थित था।
इतना कह कर वह अपना घोड़ा दौड़ाते हुए वापस चला गया।
देवरानी: वैसे दिखने में कैसा था? क्या कोई पागल लग रहा था?
कमला: बहुत ही बलवान, मैं तो कहूंगी महारानी आप ये मौका न छोड़ो।
देवरानी: पर कुछ उल्टा हो गया तो!
कमला: भगवान ने उसे तुम्हारे पास तुम्हारी खुशियाँ ले कर भेजा है।
देवरानी: हम्म! ठीक है देखती हूँ ये शेर सिंह क्या चीज है और कल तुम जा कर उसका पत्र ले आओ और अंदर ही अंदर उसे शर्म भी आ रही थी कि आज वह किस मोड़ पर है, फिर कमला चली जाती है।
देवरानी तुरंत अपना दरवाजा बंद कर के अपने बिस्तर के नीचे से कामसूत्र के पुस्तक निकल कर चित्र देखने लगती है और पढ़ने लगती है।
"हाए! ये कैसा मिलन है ये स्त्री लिंग पर बैठी है और पुरुष सीधा लेटा हुआ है"
फिर पन्ने को पलटती है तो देखती है
"ये स्त्री तो अपनी योनी को पुरुष के मुह में दे कर बैठी है" ,
और
"इसमें तो इस्त्री लिंग को अपना मुह में भरा है" ये लोग ऐसे कैसे कर रहे हैं। विचित्र है। आज तक मैंने ऐसा तो सुना भी नहीं है
upload "इसमें तो कुत्ते की तरह चोद रहा है" और वह एक हाथ ले जा कर अपनी बुर पर रगड़ती है।
इधर सृष्टि महारानी महाराज राजपाल को अपने आलिंगन में ले कर उनसे चिपकी हुई थी।
सृष्टि: महाराज आप क्या सोच रहे हैं।
राजपाल: यही के राजा रतन का फिर पत्र आया है और उन्हें अंदेशा है कि उनके राज्य पर फिर आक्रमण हो सकता है इसलिए हमें तैयार रहने को कहा है, हमें कभी भी उनके पास जाना होगा।
शिष्टि: जब जाना होगा तब आप चले जाना । आज क्यों इस बारे में इतना सोचना।
और रानी सृष्टि अपनी टाँगे महाराज की टांगो पर बंद कर लेती है और अपना बड़े-बड़े वक्ष को महाराज के कंधे से रागदने लगती है। महाराज एक हाथ से उसके वक्ष को दबाते हुए दुसरे से उसका उभरा हुआ पेट सेहला रहे थे, तब रानी सृष्टि राजा राजपाल के ऊपर बैठ जाती है और अपना ब्लाउज़ और साड़ी खोल कर अपने वक्ष राजपाल के मुँह पर रगड़ती है। फिर उसकी धोती को खोल उसका 2 इंच का लिंग जो सोया था उसे हाथ से थपथपाकर जगाने की कोशिश करती है, बहुत मुश्किल के बाद लिंग हल्का-सा खड़ा होता है और अब वह सिर्फ 4 इंच का हो गया था। अब सृष्टि एक हाथ से लंड पकड कर धीरे से अपनी योनि में सटा कर बैठ जाती है और राजा का लंड योनि में घुस जाता है, वह अभी दो बार ही ऊपर निचे अभी हुई की राजा राजपाल के हाथ पैर ठन्डे पड़ जाते है और वह अपनी आँखे मूँद लेता है।
सृष्टि: अब आप महाराज ऊपर आ जाईये।
राजपाल: जी और सृष्टि को नीचे लिटा कर खुद उसके ऊपर आ जाता है और लंड योनि में डाल कर दो धक्के लगाता है और झड़ जाता है। सृष्टि जो अभी 49 वर्ष की भी नहीं हुई थी राजपाल से ठंडी और संतुष्ट नहीं हो पाती थी और उसकी आंखों के आसूं उसकी आंखों में ही सूख गए थे और इस 60 वर्षीय बूढ़े से और उम्मीद भी क्या की जा सकती थी इसलिए वह अपना मन मार कर लेट जाती है।
इधर वैध जी अपने कक्ष में अपने पूरे बदन की मालिश कर रहे थे और तेल मल रहे थे। अब वह तेल अपने लिंगपर मल रहे थे पर उनको ध्यान नहीं रहा कि उनके कक्ष की खिड़की खुली हुई है जहाँ से कोई भी उन्हें देख सकता था और हो भी ऐसा ही रहा था। कमला जो महारानी जीविका की औषधि खत्म होने पर और औषधि लेने आई थी। उसकी दोनों आँखे वही जम गई थी, जब उसने वैध जी को आपने लिंग का मर्दन करते हुए देखा।
वैध जी निरंतर अपने लिंग को जड़ी बूटीयो के तेल से मलिश किये जा रहे थे और अब उनका लिंग खड़ा हो कर लगभाग 7 इंच का हो गया था जिसे देख कमला के मुह से "हाय राम! इतने बूढ़े में ऐसी शक्ति" और फिर उसने अपने मुह पर हाथ रख लिया ।
कमला की आयु अभी 50 वर्ष की थी पर काम काज करते रहने से उसका बदन गठीला था और उसकी लम्बाई सिर्फ 5. 4 की थी। लम्बाई के हिसाब से उसे वक्ष इतने बड़े थे के नाभी तक लटक जाते थे। उसके पति को मरे पूरे तीन साल हो गए थे।
कमला कुछ सोच कर वापस जाने लगती है फिर उसके दिल में कुछ आता है और वह मुस्कान के साथ वैध जी के कक्ष के दरवाजे पर जा कर दरवाजा खटखटा देती है जो की बंद था।
वैध जी तुरंत अपना धोती पहने हैं और दरवाजा खोलते हैं।
वैध: कहो क्या काम है।
कमला: अंदर से मुस्कुराए हुए "वो महारानी जीविका की औषधि खत्म हो गई थी।"
वैध: अच्छा अंदर आओ।
कमला अंदर आती है पर उसकी नज़र सिर्फ धोती पहनने वैध पर थी। उनका बदन तेल से चमकते हुए देखने से कमला की नज़र नहीं हट रही थी, जिसे वैध भांप लेता है।
वैध: ये पलंग के निचे बरतन में जो औषधि हैं उसे ले जाओ।
कमला वैध के सामने झुकती है और अपनी बड़ी गांड को निकाल कर वैध के लिंग से रगड़ती हुई निचे बैठती है और औषधि उठा कर फिर उठाते समय पुनः अपनी गांड उनके लिंग से रगड़ती है इस बार खड़े कंद को जोर से रगड़ने के कारण कमला कर मुह से "आह" निकल जाती है।
कमला औषधि ले कर जाने लगती है और दरवाजा पर जा कर मुड़ती है और मुस्कुरा कर बोलती है "बाबाजी ये खिड़की बंद कर लिया करो ठंडी हवा चल रही है।"
बदले में वैध भी एक मुस्कान देता है और कमला खिलखिलाकर जल्दबाजी में चलो जाती है।
वैध जी को समझते हुए देर नहीं लगती के इसने मेरा लौड़ा देख लीया है क्योंकि ये खिड़की खुली हुई थी। इसी लिए ये खिड़की बंद करने के लिए कह कर गई है और वह अंदर ही अंदर कमला की गांड से जमीन रगड़ कर खुश था।