Just awesome and amazing update! Lovely and fantastic writings!एक दिन पापा ने बैठकर हमें अपना प्लानिंग सुनाया और वो यह था कि हमें अब नया घर मिलने वाला था. जहां हम कम बजट में ही सिर्फ ऊपर एक कमरा बनाने वाले थे. वहीं अब पापा के अच्छे प्रमोशन के वजह से, ऊपर कमरा बनाने के साथ-साथ पूरे घर को भी रिनोवेट करने वाले थे. इस बात को लेकर हमारा पूरा परिवार खुश था.
क्योंकि घर का काम शुरू हो चुका था, हम कहीं बाहर भी नहीं जा सकते थे. सारा सामान हर जगह बिखरा हुआ पड़ा था और मजदूरों के आने जाने का भी रास्ता घर के अंदर से ही होकर गुजरता था. इसीलिए मैंने भी अपने मन को वश में रखा. हालांकि की जब मुझे मौका मिलता तो कभी मम्मी को तो कभी संगीता को चुम्मा ले ही लेता था. यहां पर सब्र रखना जरूरी था और कहते हैं ना सब्र का फल मीठा होता है.
और देखते ही देखते हमारा नया घर बनकर तैयार हो गया था जैसा कि हमने सोच रखा था. पापा की पूरी मेहनत और लगन के कारण यह सब हो पाया.
घर बनने के बाद हमने घर का पूजा किया और फिर गृह प्रवेश. उस वक्त बहुत सारे लोग आए हुए थे. तनुश्री आंटी भी थी. क्योंकि अब तनुश्री आंटी भी खेल में शामिल थी, वो मुझसे दूरियां बनाए रखती थी कि किसी को एक रत्ती भी शक ना हो जाए. मुझे तो आज भी याद है जब मैंने अपना लंड पहली बार उनके गांड में डाला था. कैसे उसकी गद्देदार गांड ठोकर खा-खाकर लाल हो गई थी.
इसके बाद ऐसे ही कई दिनों तक संगीता और मम्मी के साथ चूदाइ का सिलसिला चलता रहा. एक दिन मम्मी को कुछ काम था ब्लाउज की सिलाई का इसीलिए वह पास ही में रहने वाली एक आंटी के घर गई थी जो सिलाई का काम करती थी. संगीता नहाने जा रही थी. मुझे और संगीता को पहली बार मौका मिला दिन में करीब आने का. मम्मी के जाते ही मैंने संगीता को पकड़ लिया पीछे से.
संगीता: क्या बात है मेरे भैया? आज दिन में भी नहीं रहा जा रहा, रात को कर लेना.
मैं: नहीं मेरा तो अभी मूड हो रहा है.
संगीता: क्या-क्या करोगे?
उसके यह कहते ही मैंने लिविंग रूम के सोफा पर उसे गोद में उठा कर बैठा दिया. फिर उसके पैंट के हुक को खोलते हुए नीचे की ओर सरका दिया. मैंने देखा संगीता ने इस बार कोई पैंटी नहीं पहनी थी. उसका वही मखमली सा गुलाबी चूत मेरी आंखों के सामने था. उसके पैर को अच्छे से फैलाया और अपना होंठ उसकी चूत के होठों पर रख दिया. उसकी गुलाबी चूत के होठों को फिर से अपनी जीभ से अलग करने लगा.
पता नहीं कैसे पर हमें बिल्कुल होश नहीं था कि हम यह सब दिन में कर रहे थे. उसे भी मजा आने लगा और आहें भरने लगी. मैं भी अपने मुलायम गीले जीभ को उसके होठों पर चलाना शुरु किया. गीलेपन के कारण जीभ उसकी चूत पर ऐसे फिसल रहा था जैसे किसी मलाई को चाट रहा हो. वो भी मेरे बालों को सहला रही थी, तभी मैंने एक उंगली भी उसकी चूत में अंदर बाहर डालना शुरू कर दिया जिससे उसका आनंद और बढ़ गया.
अब वो एक हाथ से मेरे सर को सहलाते हुए दूसरे हाथ से अपनी चूचियां दबा रही थी. मैं भी उसकी चूत के दाने पर जीभ गोल-गोल घूमता हुआ उंगली अंदर बाहर किया जा रहा था. मैंने एक और उंगली घुसाने की कोशिश की तो देखा वह उंगली भी अंदर चली गई. अब संगीता दो उंगलियों से चूदाइ करवा रही थी और अब उसकी आहें गहरी होती गई.
मेरी नजर उसके गांड के छेद पर पड़ी जो सिकुड़ी हुई थी. मैं यही सोच रहा था उसे देखकर कि जब तनुश्री आंटी जैसी उम्र वाली औरत का गांड मारवा कर इतना बुरा हाल हो गया था पहली बार तो फिर संगीता का क्या होगा? मैंने अपना अंगूठा नीचे की तरफ करते हुए उसके गांड के छेद को भी सहलाने लगा. यह संगीता के लिए नया था. और जितना मेरा मुलायम अंगूठा उसके छेद को सहलाए है जा रहा था, उतना उसकी गांड का छेद सिकुड़ा जा रहा था. मानो वो इजाजत नहीं देना चाहता था कि उसे कोई छेड़े.
थोड़ी देर और सहलाने पर मैंने देखा उसकी गांड की छेद का मुंह अंदर बाहर होने लगा. मेरी दोनों उंगलि अभी भी उसकी चूत में थी. तभी मैंने अपने अंगूठे को उसकी चूत के पानी से गिला करके फिर से गांड की छेद को सहलाने लगा.
संगीता: आह्ह्ह… भैया यह क्या है?
मैं: तुम्हें अच्छा लग रहा है?
संगीता: हां बहुत अच्छा...
गीले अंगूठे ने उसके गांड के छेद को खुलने पर मजबूर कर दिया. उसका मुहाना हल्का सा उभर आया. क्या गजब का लाल छेद था मेरी बेहन का. जी तो कर रहा था बस अपना लंड निकालूं और गांड को चोदना शुरू कर दूं. लेकिन यह मुश्किल था क्योंकि संगीता को इस चीज के लिए बहुत मनाना पड़ता. मैंने सोचा फिलहाल उंगली से ही काम चला लेते हैं. ऐसे करते-करते मैंने एक और ऊंगली उसकी चूत में बढ़ा दिया. अब संगीता को तीन उंगलियां चोद रही थी और चौथा अंगूठा जो उसकी गांड को टटोल रहा था.
संगीता की चूत भी इस काबिल हो गई थी की तीन उंगलियों को झेल सकती थी. लेकिन वो तीसरी उंगली डालने पर बहुत टाइट महसूस हो रहा था. उसकी चूत की मांसपेशियों का एक-एक हिस्सा दबाने की कोशिश कर रहा था. उसे चूत के सुरंग में जैसे मलाई भरा हो. मैं उसी गरम मलाई में अपनी उंगली डुबोते हुए उसकी चूत को फैलाता रहा था. धीरे से अंगूठे का अगला हिस्सा उसकी गांड में घुसाने की कोशिश कर रहा था. क्योंकि उसकी गांड का छेद भी अब गीला हो चुका था अंगूठे का अगला हिस्सा आधे इंच अंदर घुस गया.
संगीता: ऊऊह्ह्ह्ह...नहीं भैया दर्द हो रहा है...क्या कर रहे हो?
मैं: कुछ नहीं होगा, तुम बस आराम करो.
वो करने को तैयार नहीं थी और अपने हाथ से कोशिश कर रही थी कि मैं अपना अंगूठा उसकी गांड के छेद में से निकाल लूं. लेकिन अभी तो एक इंच ढंग से अंदर नहीं गया था. मैंने दूसरे हाथ से उसके हाथ को पकड़ लिया और हाथ से उसका हाथ दबाकर यह इशारा किया कि कुछ गलत नहीं होगा, बस वो मुझ पर भरोसा रखें.
वो मेरे हाथ को पकड़ी रही और मेरा दूसरे हाथ से खेल शुरू था. तीन उंगलियां चूत के हर चिकनी दीवारों को अंदर से उत्सुक कर रही थी और बाहर अंगूठे का आधा इंच उसकी गांड के छेद में था. मैं थोड़ा दबाव डालकर अंगूठा और गांड के अंदर घुसाने की कोशिश की तभी उसने मेरे हाथ को और जोर से पकड़ा.
संगीता: नहीं...ऊऊह्ह्ह्ह... भैया मान जाओ...यह मत करो.
उसकी गांड का छेद बहुत गर्म था.
मैं: ठीक है गुड़िया अब इससे आगे नहीं करूंगा, तुम बस मजे लो.
मैं उसे परेशान ना कर उसे आनंद में डुबाना चाहता था. मैंने तीन उंगलियां से ही उसकी चूत को चोदना जारी रखा और अंगूठा 1 इंच उसके गांड में. बीच-बीच में अपनी जीभ को उसकी चूत के होठों पर चलाए जा रहा था. वाह! क्या एहसास था. वाकई में गजब का एहसास था, उसकी गरम-गरम चूत को सुबह-सुबह अपनी उंगली पर महसूस करना और अपने जीभ पर वही नशीले चूत को चखना.
हम दोनों हवस के नशे में चूर थे कि अचानक दरवाजा खुला. हम दोनों सन्न रह गए. सामने कोई और नहीं बल्कि मम्मी खड़ी थी. हमने इतनी बड़ी बेवकूफी कर दी की दरवाजा बंद करना ही भूल गए.
हम दोनों की घबराहट के मारे मानो जान ही निकल गई.
संगीता ने जल्दी से अपने आप को तोलिए से ढका. मम्मी कांपते हुए आवाज में,
मम्मी: हे...हे... भगवान, यह क्या किया तुम लोगों ने???
मैं: (घबराता हुआ) मम्मी...मम्मी...मम्मी, मेरी बात सुनो...
मम्मी: छी...यही देखना बाकी रह गया था...
संगीता डर के मारे बिना हरकत कि वैसे ही पड़ी रही उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था कि वो अब क्या करें. और दूसरी तरफ मम्मी के आंखों में आंसू था. मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं. मम्मी ने हाथ से सामान फेंकते हुए गुस्से में आकर संगीता को और मुझे झापड़ मारा.
मैं: मेरी बात तो सुनो.
मम्मी: तू चुप कर. बहुत अच्छा किया तुम लोगों ने, आज के बाद तुम लोग मुझसे बात मत करना और ना तो तुम दोनों को एक साथ सोने की जरूरत है. तू आज से नीचे सोएगा इधर हॉल में.
बोलकर गुस्से से मम्मी अपने कमरे में चली गई. मैं और संगीता भी उसके पीछे भागे उसे समझाने के लिए. लेकिन मैंने संगीता को बाहर रुकने का इशारा किया क्योंकि मैं जानता था कि उसे मैं ही समझा सकता हूं.
मम्मी: तुझे होश भी है तूने क्या किया?
मैं: माँ, मैंने...
मम्मी: चुप! और किसको चोदना है? भाई बेहन होने का कुछ मतलब होता है, वो बीवी नहीं है तेरी!
मैं: मम्मी, मेरी बात सुनो—
मम्मी: नहीं! आज मैं तेरी एक बात नहीं सुनूँगी.
मैंने देर ना करते हुए ऐसी बात बोल दी कि उसे मजबूर होकर मुझे सुनना ही पड़ा.
मैं: अगर मैं नहीं यह करता तो आपकी बेटी प्रिया के साथ गुल खिला रही होती.
मम्मी: (हैरानी से) क्या?
मैं: वो एक समलैंगिक सेक्स की तरफ आगे बढ़ रही थी. मैं क्या करता मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था.
मम्मी: तो उसे समझाना एक तरीका था ना कि उसके साथ सेक्स करना.
मैं: उसके मन का क्या अगर उसका मन नहीं भरा तो वो मेरी बात भी नहीं समझती.
मम्मी: तूने पहले मुझे क्यों नहीं बताया?
मैं: क्योंकि मुझे लगा मैं खुद संभाल लूँगा.
मम्मी: और उसी कोशिश में तूने अपनी बेहन, उसके साथ सारी हदें पार कर दिया.
मैं: आप उसे डांटना मत
मम्मी: तेरी चिंता मुझे समझ आ रही है, लेकिन एक बात याद रख—किसी को गलत रास्ते से वापस लाने के लिए पहले उसे भरोसा दिलाना पड़ता है. जा बुलाकर ला उसे.
मैं: मतलब आप उसका साथ दोगी?
मम्मी: अगर अपनी बेटी को किसी गलत रास्ते से बचाने के लिए उसे प्यार देना पड़े तो क्यों नहीं! जैसे मैंने तुझे बचाया था शराब पीने से. लेकिन एक चीज कान खोल कर सुन ले यह बात हम तीनों के अलावा कहीं बाहर नहीं जानी चाहिए. क्योंकि आज जैसी गलती तूने की है ऐसा कभी मत करना. मेरे जगह अगर तेरे पापा ने दरवाजा खोल होता तो?
यह सब सुन सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई की मम्मी हम दोनों के लिए इस हद तक गुजरने को तैयार है. मैं तुरंत संगीता के पास गया. मुझे देखते ही वो रोने लगी.
मैं: रोना बंद करो. मेरी बात सुनो, मम्मी बुला रही है तुम्हें. बस उसकी बातों में हां मैं हां मिलना है. मैंने वो प्रिया वाली बात का बहाना करते हुए मामले को संभाल लिया है. मम्मी को ऐसा लग रहा था कि शायद तुम गलत राह पर जा रही हो इसीलिए मेरे साथ यह सब कर लिया.
संगीता समझदार थी वो मेरी बातों को अच्छी तरह समझ गई और चुपचाप वैसे ही अर्ध नग्न हालत में कमरे में आकर खड़ी हुई. मम्मी ने उसे नीचे से पैर तक ध्यान से देखा.
मम्मी: बैठो इधर.
संगिता चुपचाप मम्मी के बगल में बैठ गई और मैं मम्मी के दूसरी तरफ, जिससे संगीता का चेहरा साफ़ दिखे और मैं इशारा कर पाऊँ.
मम्मी: तुमने प्रिया के साथ यह सब गलत काम करते हुए एक बार भी नहीं सोचा? मुझसे बात तो करती.
संगिता: मुझे डर लग रहा था. आपसे इस बारे में बात करने में.
मम्मी: लेकिन आज तुम्हें डर नहीं लगा.
संगिता: मुझे माफ कर दो मम्मी.
मम्मी: संगीता में जानती हूं तुम भी बड़ी हो गई हो लेकिन ऐसे मौके पर तुम्हें अपने आप को संभालना चाहिए. कोई बात अगर बाहर गई तो बहुत बदनामी होगी, बातें घर में रहे तो ही सही है.
यह कहते हुए मम्मी ने संगीता की जांघों पर अपना हाथ रख और हल्के हाथों से सहलाने लगी. इससे संगीता को एक झटका लगा और उसने मेरी तरफ आंखें बड़ी करते हुए देखा. मैं भी उसे इशारा किया, "जो हो रहा है होने दो".
मेरे इशारे के बाद संगीता भी अपने होठों को दबाए हुए मम्मी का वो सहलाना देख रही थी.
मम्मी: क्या हुआ? लड़की की चाहत है तुम्हें अगर यह मैं कर दूं तब तो किसी और लड़की पर ध्यान नहीं दोगी ना?
उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि यह सब उसकी माँ कह रही है. संगीता ने नहीं कहते हुए सर हिलाया. और उसकी भी हिम्मत थोड़ी बढ़ी. वो मम्मी के करीब आई और उसके होठों को चूमने लगी. यह सीन एक माँ बेटी के समलैंगिक रिश्ते को दर्शाता था. इस तरह से चूमते हुए धीरे-धीरे मम्मी ने भी अपना मुंह खोलना शुरू किया और संगीता भी उसे बड़े प्यार से चूम रही थी. मैंने देखा संगीता के लिए यह एहसास किसी सपने से कम नहीं था.
उन दोनों को इस तरह से चूमता हुआ देख मुझे रहा नहीं गया मैं भी तुरंत संगीता के सामने ही मम्मी के दोनों गालों को पकड़ उसके होंठ को चूसने लगा. मैं यह भूल गया कि संगीता तो हम लोगों के बारे में कुछ नहीं जानती.
संगीता का दिल जोरो से धड़क रहा था यह देखकर. कांपते हुए आवाज में,
संगीता: भैया आप भी और मम्मी...?
मेरे संग मम्मी भी थोड़ी मुस्कुराई.
मम्मी: श्श्श्श...क्यों जब तुम दोनों कर सकते हो तो मैं क्यों नहीं? यह राज इस चार दिवारी के अंदर ही रहना चाहिए.
मम्मी ने हम दोनों को सीने से लगा लिया. हम दोनों उसके सीने से सटे हुए थे, सीने से दबे होने के कारण मम्मी मेरा चेहरा तो नहीं देख सकती थी लेकिन संगीता जरूर मेरा चेहरा देख सकती थी. मैंने उसे इशारा करते हुए मम्मी के ब्लाउज का हुक खोलने को कहा. उसने आंखें बड़ी करते हुए नहीं कहा. संगीता बहुत डर रही थी इस बात से कि वो हिम्मत कैसे करें यह सब करने की.
भले ही उसने प्रिया के साथ चुम्मा-चाटी किया था. लेकिन संगीता को लेस्बियन सेक्स का कुछ पता नहीं था. और मम्मी का भी मुझे पता नहीं पर यहां मेरी जिम्मेदारी थी इन दोनों को सही तरीके से मंजिल तक पहुंचाना.
तभी मैंने उसके सामने ही मम्मी के ब्लाउज पर हाथ लगाया और पहले हुक को खोल दिया. संगीता हैरान रह गई यह देखकर. मैंने उसे फिर इशारा किया हुक खोलने को, वो डर के मारे फिर भी नहीं मानी. मैंने दूसरा हुक भी खोल दिया. संगीता चौक कर अपनी नज़रें उठा मम्मी की तरफ देखने लगी. उसने देखा उसकी मम्मी के चेहरे पर हल्की शर्मिंदगी भरी मुस्कान थी. पहली बार संगीता किसी औरत साथ ऐसी हालत में थी और वो कोई नहीं, उसकी खुद की मां. संगीता के पास भी अपने मम्मी के बदन को छानबीन करने का यह पहला मौका था. उसकी बेचैनी बढ़ गई. फिर क्या था संगीता को भी हिम्मत आ गई उसने भी मम्मी के आखरी हुक खोलते हुए ब्लाउज को अलग कर दिया.
मम्मी के चूचियां देख संगीता यकीन ही नहीं कर पा रही थी कि उसकी आंखों के सामने उसकी मम्मी की चूचियां है. मम्मी भी संगीता के बाल को सहला रही थी और मैंने मम्मी के पीठ पर हाथ लगाते हुए ब्रा का हुक खोल दिया. मैं भी धीरे से संगीता के आंखों के सामने ही मम्मी की ब्रा को नीचे उतारता गया और जैसे-जैसे मम्मी की निप्पल दिखाई देने लगे, संगीता के मुंह में भी पानी आ गया. मम्मी ने हम दोनों को अपनी चूचियों की तरफ इशारा किया. हमने भी अपनी माँ का कहना मानकर अपना सर झुकाया और संगीता ने अपने मुंह में एक निप्पल दबा लिया और दूसरा निप्पल मैंने. हम दोनों मम्मी के निप्पल को चूसने लगे. यह पल मम्मी के लिए बहुत गर्व भरा था क्योंकि उसके दोनों बच्चे उसका दूध फिर से एक साथ पी रहे थे. मम्मी गहरी सांसे भरने लगी, अब तक उसने दोनों निप्पल को एक साथ नहीं चुस्वाया था.
निप्पल चूसते वक्त संगीता की नजरे मुझसे मिली, उसके आंखों में फिर से नशा दिख रहा था. मैंने उसका उत्साह बढ़ाते हुए अपना हाथ नीचे ले जाकर मम्मी के पेटीकोट में डाल दिया. यह देख संगीता उसके निप्पल को और जोर से चूसने लगी. मम्मी भी जोर-जोर से आहें भरने लगी और अपने बदन को ढीला छोड़ते हुए बिस्तर पर लेट गई. हम भी उसकी चूचियों को चूसना नहीं छोड़े.
मम्मी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…बेटा…आह्ह्ह…आह्ह्ह… आह्ह्ह्हह…….उम्म् मम्म्म.
मैंने उसकी साड़ी निकलना शुरू कर दिया. जैसे ही संगीता के सामने मम्मी की साड़ी खुली तो उसने देखा कि मम्मी अब सिर्फ सिर्फ पेटीकोट में थी. संगीता ने भी नाडा खींचते हुए पेटीकोट को ढीला कर दिया और देखा तो मम्मी ने बहुत सुंदर सी लाल रंग की पैंटी पहनी थी.
इस दौरान मैं कैसे शांत रह सकता था मैंने भी अपना हाथ संगीता की टॉवल में फंसा कर उसे खोल दिया.
संगीता पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी और मम्मी सिर्फ पैंटी मे थी.
मैंने भी एक साथ दोनों की चुचियों का दर्शन किया- उन दोनों की चूचियों को देखकर फर्क साफ था की मम्मी की चूची और मोटे आम जैसी रसीली थी बल्कि संगीता की चूची मध्यम संतरे जैसी मुलायम. मम्मी की चूचियों को चूसने का मजा ज्यादा था वही संगीता की चूचियों को काटने का. क्योंकि वो बहुत नाजुक थी हल्के से कटने से भी पूरी लाल हो जाती थी.
संगीता के खुशी का ठिकाना नहीं था ऐसा लग रहा था उसने अपने आप को मम्मी के आगे समर्पित कर दिया है. मैंने धीरे से मम्मी के कान में कहा कि वो संगीता की चूत के तरफ आगे बढ़े और संगीता की चूत को जाकर चाटे. मम्मी ने अपने होठों को दांतों से दबाते हुए इशारा किया कि उसकी हिम्मत नहीं हो रही है. मैंने उसका हौसला बढ़ाते हुए मम्मी का मुंह संगीता की चूत के पास ले गया. मम्मी अपनी बेटी की चूत को इतने करीब से देख रही थी, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वो कैसे उसे चाटे. मैंने आंखों से फिर इशारा करते हुए कहा कि वो आगे बढ़े, डरे नहीं. आखिर वो कैसे करती उसने कभी पहले चूत नहीं चाटा था दूसरी तरफ संगीता ने अपने आंखों पर हाथ रख लिया था उसे यहां थोड़ी शर्म आ रही थी. तभी मैंने देखा मम्मी हिम्मत दिखाते हुए अपना जीभ थोड़ा बाहर निकाल कर संगीता की चूत के दाने पर लगाया और एक हल्का सा चुम्मा दिया. संगीता सिहर उठी, उसके शरीर में जैसे फिर से करंट लग रहा था. उसने नीचे की तरफ देखा अपनी माँ को चूत चाटते हुए और एक सुकून भरी सांस ली क्योंकि यह एक माँ बेटी का मिलन था.
संगीता: आअह्ह्ह्ह...मम्मी...इश्श्श्शश्
यह देखकर, मेरा तो लंड तन के खड़ा हो गया. मैंने भी तुरंत संगीता की चुचियों को चूसना शुरू कर दिया. मम्मी ने बस कुछ ही देर मे अपना तजुर्बा दिखाते हुए संगीता के दोनों जांघों को कसकर थाम लिए और जलती हुई चूत में जीभ घुसाकर चूसने लगी. जवान चूत के नमकीन रस की धारा ने उसकी जीभ का स्वागत किया. संगीता ने अपनी जांघे खोल दी जिससे मम्मी के मुंह को चूसने में आसानी हो. साथ ही साथ मेरे निप्पल चूसने की वजह से
उधर संगीता की वासना भड़की हुई थी. अब मैं भी अपने आप को नंगा करते हुए लंड बाहर निकाल दिया.
संगीता ने देर ना करते हुए अपना हाथ आगे बढाकर मेरे लंड को पकड़ लिया और मुस्कुराते हुए सहलाने लगी.
मेरा लंड खड़ा होकर पत्थर की तरह हो गया था इन दो हसीन औरतों के बीच. मैंने देखा यह सही मौका है, अब कुछ कहना और पूछना बाकी नहीं रह गया है. मैं थोड़ा उठ कर बैठा और संगीता की चूत से सटाकर लंड उसके मुंह पर रख दिया. मम्मी ने एक नजर मुझे देखा और बड़े प्यार से मेरे लंड को पकड़ कर सुपाडे को चूमना शुरू किया. मैंने आंखें बंद कर ली मैं उसके चुंबन को महसूस कर सकता था मेरे लैंड के चारों ओर. देखते ही देखते मैंने महसूस किया जैसे किसी अत्यधिक कोमल
मक्खन सी नर्म चीज ने मेरे लंड को जकड़ रखा है. मैं नीचे की तरफ देखा, मम्मी अपना मुंह मेरे लंड पर बखूबी चलाने लगी.
वो अपनी जीभ को मेरे लंड पर रगड़ रही थी. मम्मी को ऐसा करते देखा तो मेरी टांगे कंपकपायीं और मैंने दोनों हाथों से उसका सर पकड़ लिया. मम्मी के चेहरे पर खुशी दिखाई देने लगी जिसके लिए वह इतनी मेहनत कर रही थी. मैंने भी लंड से मम्मी का मुंह चोदना शुरू कर दिया. अब मैं पूरा लंड मेरी जान से प्यारी मम्मी के गले के नीचे तक उतार रहा था. ‘गल्प गल्प’ की आवाज आनी शुरू हो गई और मेरी मम्मी का मुंह लाल होना शुरू हो गया.
तभी मम्मी की मदद करते हुए संगीता ने अपना हाथ बढ़ाया और लपक के मेरे लंड को अपने मुंह में भर लिया.
उसने लंड के सिरे को मुंह में ले कर उसके टोपे के इर्दगिर्द अपनी जीभ घुमा फिरा कर उसको चाटना शुरू किया. उसके ऐसा करने से उत्तेजना के मारे मैं पलंग पर ही मचलने लगा.
मैं: आह्ह्ह्हह…….मम्मी...अहह...संगीता...ओह!!!
दोनों बारी-बारी से मेरा लंड चूसने लगी और साथ ही साथ मेरे आंड को भी सहलाई जा रही थी. मुझे ऐसा लगा इन दोनों के मुंह की चूदाइ करने के चक्कर में कहीं मेरा पानी न निकल जाए.
मैंने मम्मी को सीधा लेटने को कहा और अब संगीता मम्मी का चूत चाटने वाली थी. संगीता को भी हिचकीचाहट थी. वो मेरे तरफ हैरत भरी नजरों से देख रही थी कि भला वो कैसे मम्मी की चूत को चाट सकती है. मैंने संगीता को रास्ता दिखाते हुए मम्मी की चूत के पास ले गया. अपनी माँ की चूत को संगीता पहली बार देख रही थी वो भी इतने करीब से.
मम्मी: राहुल तू कुछ मत बता, उसे खुद सीखने दे.
अब सब कुछ संगीता के ऊपर था. संगीता ने हिम्मत दिखाते हुए अपनी जीभ लंबी निकाली और मम्मी की चूत से रगड़ दिया.
मम्मी: उन्हह...आहा...हाँ...बस ऐसे ही.
मैं: बहुत अच्छा कर रही हो.
फिर संगीता ने एक बार अपने जीभ से मम्मी के पूरे चूत को रगड़ते हुए चूत की होठों को फैला दिया. और अब हर दिशा में वो अपने जीभ को चलाने लगी. मैं संगीता के पीछे जाकर उसकी कमर से पकड़ा और अपना लंड उसकी चूत के मुहाने पर रखकर अंदर पेलने लगा. संगीता के पैर थरथराहट से कांप रहे थे क्योंकि एक तरफ तो उसके मुंह में अपनी माँ का चूत था तो पीछे से उसकी चूत में घुसता हुआ मेरा लंड. मैं भी झटका देना शुरू किया थपकियों की आवाज आनी शुरू हो गई. और एक ही कमरे में अब मम्मी की आहें और संगीता की सिसकारियां एक साथ जुगलबंदी कर रही थी. मैं भी संगीता को जोर-जोर से चोदने लगा इतना जोर से शायद मैंने उसे कभी नहीं चोदा था.
संगीता: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…भैय्याआआ...…..थोड़ा धीरे...आअह्ह्ह्ह
मम्मी: अहह...उन्ह...हम्म...आहा
मेरे झटके पूरी रफ्तार से संगीता की चूत को चोद रहे थे. उसकी गांड पीछे से ठोकर खाकर लाल हो गई थी. थपकियों की आवाज कमरे में गूंज रही थी.
संगीता अपना मुंह मम्मी की चूत पर रखे हुए,
संगीता:धीरे...भैय्याआआ...आअह्ह्ह्ह...आअह्ह्ह्ह
मम्मी: हाँ बेटा...धीरे चोद गुड़िया को!!!
मैं: आज मत रोको मम्मी. गुड़िया को जी भर कर चोदने दो.
संगीता: ओह...भैया बहुत मोटा है आपका...
8 से 10 झटके और मारकर मैंने संगीता की चूत से अपना लंड निकाला और मम्मी को थोड़ा आगे की ओर खींच लिया. संगीता अभी मम्मी के ऊपर ही थी. मैं फिर से उसी रफ्तार से अब मम्मी को चोदना शुरू कर दिया. इस बीच संगीता और मम्मी चुम्मा ले रही थी एक दूसरे को. लेकिन उनके सिसकारियों का तरीका बदल गया.
मम्मी: अहह उन्ह हम्म....उम्म् मम्म्म
आखिर मम्मी की रसीली चूत संगीता जैसी नहीं थी. मम्मी को तेज झटको को सहने की आदत थी, ज्यादा दर्द तो नहीं हो रहा था लेकिन उसे मजा बहुत आ रहा था. मैं मम्मी और संगीता को बारी-बारी से चोदा रहा था. इन दोनों ने भी अपना सहयोग पूरी तरह से दिया. जब मैं मम्मी को चोदता तो संगीता मम्मी की चूचियां चूसने लगती और जब संगीता को चोदता तो मम्मी उसकी चूचियों की चुस्कियां लेती. उस बंद कमरे में सिर्फ आह...ऊऊह्ह्ह्ह की आवाज गूंज रही थी और जोर-जोर से लगती थपकियां. दोनों को दो-दो राउंड चोदने के बाद मेरे लंड ने पानी छोड़ दिया. मम्मी के सामने ही मैंने अपना सारा वीर्य संगीता के नाभि पर गिरा दिया.
सच में आज बहुत मजा आया. हम तीनों में, अब ना कोई शर्म बची थी और नाही कोई हया. इतना मेहनत करने के बाद, हम वैसे ही बिस्तर में कुछ देर के लिए सोए हुए रहे की तभी,
मम्मी: संगीता उठो जाओ नहा लो जाकर. राहुल तू भी उठ, संगीता नहा कर आ जाए फिर तू भी नहा लेना.
मैं: और आप?
मम्मी: मैं तो सुबह नहा कर ही गई थी.
मैं: सुनो, क्यों ना हम तीनों साथ में नहाए?
मम्मी: अभी भी मन नहीं भरा तेरा?
मैं: आप दोनों से मन कैसे भर सकता है.
संगीता: हां भैया और कितना चोदना है हमें?
मम्मी: चुप करो, थोड़ा तो लिहाज रखा करो संगीता. कैसे बात करती हो.
संगीता: मम्मी अब कुछ लिहाज रखने जैसा हम तीनों में क्या रह गया है.
मम्मी: फिर भी अगर यह आदत रहा तो कहीं बाहर किसी के सामने ऐसा मुंह से ना निकल जाए.
संगीता: नहीं नहीं ऐसा कभी नहीं होगा. अभी तो बस हम लोगों के आपस की बातें हैं.
मैं: छोड़ो ना यह सब चलो नहाते हैं बहुत मजा आएगा.
संगीता: हां मम्मी चलो ना.
मम्मी: ओ... नहीं मानोगे तुम लोग? ठीक है चलो.
आखिरकार मम्मी भी तैयार हो गई है सबके साथ नहाने के लिए. जिंदगी का असली मजा तो अब आ रहा था. बाथरूम में जाकर हमने एक दूसरे को चूमना शुरू कर दिया. संगीता और मम्मी ने थोड़ा शर्म लिहाज दिखाते हुए पेटिकोट को अपने सीने पर बांध रखा था. धीरे-धीरे हम सब पूरी तरह से, फिर एक बार नंगे हो गए. उस
बहते हुए शावर के पानी में मैं उन दोनों की चूत को फिर से चाटा और उन लोगों ने भी मेरे लंड से खुलकर अपना मुंह और अपनी चूत चूदवाई.
अब मेरे पास चूत और गांड की कोई कमी नहीं थी. मैं जब चाहे तब अपने मां-बहन को तो चोद ही सकता था. साथ ही अगर मेरा मन गांड मारने का करें तो उसके लिए मेरे पास तनुश्री आंटी भी थी.
एक दिन पापा ने बैठकर हमें अपना प्लानिंग सुनाया और वो यह था कि हमें अब नया घर मिलने वाला था. जहां हम कम बजट में ही सिर्फ ऊपर एक कमरा बनाने वाले थे. वहीं अब पापा के अच्छे प्रमोशन के वजह से, ऊपर कमरा बनाने के साथ-साथ पूरे घर को भी रिनोवेट करने वाले थे. इस बात को लेकर हमारा पूरा परिवार खुश था.
क्योंकि घर का काम शुरू हो चुका था, हम कहीं बाहर भी नहीं जा सकते थे. सारा सामान हर जगह बिखरा हुआ पड़ा था और मजदूरों के आने जाने का भी रास्ता घर के अंदर से ही होकर गुजरता था. इसीलिए मैंने भी अपने मन को वश में रखा. हालांकि की जब मुझे मौका मिलता तो कभी मम्मी को तो कभी संगीता को चुम्मा ले ही लेता था. यहां पर सब्र रखना जरूरी था और कहते हैं ना सब्र का फल मीठा होता है.
और देखते ही देखते हमारा नया घर बनकर तैयार हो गया था जैसा कि हमने सोच रखा था. पापा की पूरी मेहनत और लगन के कारण यह सब हो पाया.
घर बनने के बाद हमने घर का पूजा किया और फिर गृह प्रवेश. उस वक्त बहुत सारे लोग आए हुए थे. तनुश्री आंटी भी थी. क्योंकि अब तनुश्री आंटी भी खेल में शामिल थी, वो मुझसे दूरियां बनाए रखती थी कि किसी को एक रत्ती भी शक ना हो जाए. मुझे तो आज भी याद है जब मैंने अपना लंड पहली बार उनके गांड में डाला था. कैसे उसकी गद्देदार गांड ठोकर खा-खाकर लाल हो गई थी.
इसके बाद ऐसे ही कई दिनों तक संगीता और मम्मी के साथ चूदाइ का सिलसिला चलता रहा. एक दिन मम्मी को कुछ काम था ब्लाउज की सिलाई का इसीलिए वह पास ही में रहने वाली एक आंटी के घर गई थी जो सिलाई का काम करती थी. संगीता नहाने जा रही थी. मुझे और संगीता को पहली बार मौका मिला दिन में करीब आने का. मम्मी के जाते ही मैंने संगीता को पकड़ लिया पीछे से.
संगीता: क्या बात है मेरे भैया? आज दिन में भी नहीं रहा जा रहा, रात को कर लेना.
मैं: नहीं मेरा तो अभी मूड हो रहा है.
संगीता: क्या-क्या करोगे?
उसके यह कहते ही मैंने लिविंग रूम के सोफा पर उसे गोद में उठा कर बैठा दिया. फिर उसके पैंट के हुक को खोलते हुए नीचे की ओर सरका दिया. मैंने देखा संगीता ने इस बार कोई पैंटी नहीं पहनी थी. उसका वही मखमली सा गुलाबी चूत मेरी आंखों के सामने था. उसके पैर को अच्छे से फैलाया और अपना होंठ उसकी चूत के होठों पर रख दिया. उसकी गुलाबी चूत के होठों को फिर से अपनी जीभ से अलग करने लगा.
पता नहीं कैसे पर हमें बिल्कुल होश नहीं था कि हम यह सब दिन में कर रहे थे. उसे भी मजा आने लगा और आहें भरने लगी. मैं भी अपने मुलायम गीले जीभ को उसके होठों पर चलाना शुरु किया. गीलेपन के कारण जीभ उसकी चूत पर ऐसे फिसल रहा था जैसे किसी मलाई को चाट रहा हो. वो भी मेरे बालों को सहला रही थी, तभी मैंने एक उंगली भी उसकी चूत में अंदर बाहर डालना शुरू कर दिया जिससे उसका आनंद और बढ़ गया.
अब वो एक हाथ से मेरे सर को सहलाते हुए दूसरे हाथ से अपनी चूचियां दबा रही थी. मैं भी उसकी चूत के दाने पर जीभ गोल-गोल घूमता हुआ उंगली अंदर बाहर किया जा रहा था. मैंने एक और उंगली घुसाने की कोशिश की तो देखा वह उंगली भी अंदर चली गई. अब संगीता दो उंगलियों से चूदाइ करवा रही थी और अब उसकी आहें गहरी होती गई.
मेरी नजर उसके गांड के छेद पर पड़ी जो सिकुड़ी हुई थी. मैं यही सोच रहा था उसे देखकर कि जब तनुश्री आंटी जैसी उम्र वाली औरत का गांड मारवा कर इतना बुरा हाल हो गया था पहली बार तो फिर संगीता का क्या होगा? मैंने अपना अंगूठा नीचे की तरफ करते हुए उसके गांड के छेद को भी सहलाने लगा. यह संगीता के लिए नया था. और जितना मेरा मुलायम अंगूठा उसके छेद को सहलाए है जा रहा था, उतना उसकी गांड का छेद सिकुड़ा जा रहा था. मानो वो इजाजत नहीं देना चाहता था कि उसे कोई छेड़े.
थोड़ी देर और सहलाने पर मैंने देखा उसकी गांड की छेद का मुंह अंदर बाहर होने लगा. मेरी दोनों उंगलि अभी भी उसकी चूत में थी. तभी मैंने अपने अंगूठे को उसकी चूत के पानी से गिला करके फिर से गांड की छेद को सहलाने लगा.
संगीता: आह्ह्ह… भैया यह क्या है?
मैं: तुम्हें अच्छा लग रहा है?
संगीता: हां बहुत अच्छा...
गीले अंगूठे ने उसके गांड के छेद को खुलने पर मजबूर कर दिया. उसका मुहाना हल्का सा उभर आया. क्या गजब का लाल छेद था मेरी बेहन का. जी तो कर रहा था बस अपना लंड निकालूं और गांड को चोदना शुरू कर दूं. लेकिन यह मुश्किल था क्योंकि संगीता को इस चीज के लिए बहुत मनाना पड़ता. मैंने सोचा फिलहाल उंगली से ही काम चला लेते हैं. ऐसे करते-करते मैंने एक और ऊंगली उसकी चूत में बढ़ा दिया. अब संगीता को तीन उंगलियां चोद रही थी और चौथा अंगूठा जो उसकी गांड को टटोल रहा था.
संगीता की चूत भी इस काबिल हो गई थी की तीन उंगलियों को झेल सकती थी. लेकिन वो तीसरी उंगली डालने पर बहुत टाइट महसूस हो रहा था. उसकी चूत की मांसपेशियों का एक-एक हिस्सा दबाने की कोशिश कर रहा था. उसे चूत के सुरंग में जैसे मलाई भरा हो. मैं उसी गरम मलाई में अपनी उंगली डुबोते हुए उसकी चूत को फैलाता रहा था. धीरे से अंगूठे का अगला हिस्सा उसकी गांड में घुसाने की कोशिश कर रहा था. क्योंकि उसकी गांड का छेद भी अब गीला हो चुका था अंगूठे का अगला हिस्सा आधे इंच अंदर घुस गया.
संगीता: ऊऊह्ह्ह्ह...नहीं भैया दर्द हो रहा है...क्या कर रहे हो?
मैं: कुछ नहीं होगा, तुम बस आराम करो.
वो करने को तैयार नहीं थी और अपने हाथ से कोशिश कर रही थी कि मैं अपना अंगूठा उसकी गांड के छेद में से निकाल लूं. लेकिन अभी तो एक इंच ढंग से अंदर नहीं गया था. मैंने दूसरे हाथ से उसके हाथ को पकड़ लिया और हाथ से उसका हाथ दबाकर यह इशारा किया कि कुछ गलत नहीं होगा, बस वो मुझ पर भरोसा रखें.
वो मेरे हाथ को पकड़ी रही और मेरा दूसरे हाथ से खेल शुरू था. तीन उंगलियां चूत के हर चिकनी दीवारों को अंदर से उत्सुक कर रही थी और बाहर अंगूठे का आधा इंच उसकी गांड के छेद में था. मैं थोड़ा दबाव डालकर अंगूठा और गांड के अंदर घुसाने की कोशिश की तभी उसने मेरे हाथ को और जोर से पकड़ा.
संगीता: नहीं...ऊऊह्ह्ह्ह... भैया मान जाओ...यह मत करो.
उसकी गांड का छेद बहुत गर्म था.
मैं: ठीक है गुड़िया अब इससे आगे नहीं करूंगा, तुम बस मजे लो.
मैं उसे परेशान ना कर उसे आनंद में डुबाना चाहता था. मैंने तीन उंगलियां से ही उसकी चूत को चोदना जारी रखा और अंगूठा 1 इंच उसके गांड में. बीच-बीच में अपनी जीभ को उसकी चूत के होठों पर चलाए जा रहा था. वाह! क्या एहसास था. वाकई में गजब का एहसास था, उसकी गरम-गरम चूत को सुबह-सुबह अपनी उंगली पर महसूस करना और अपने जीभ पर वही नशीले चूत को चखना.
हम दोनों हवस के नशे में चूर थे कि अचानक दरवाजा खुला. हम दोनों सन्न रह गए. सामने कोई और नहीं बल्कि मम्मी खड़ी थी. हमने इतनी बड़ी बेवकूफी कर दी की दरवाजा बंद करना ही भूल गए.
हम दोनों की घबराहट के मारे मानो जान ही निकल गई.
संगीता ने जल्दी से अपने आप को तोलिए से ढका. मम्मी कांपते हुए आवाज में,
मम्मी: हे...हे... भगवान, यह क्या किया तुम लोगों ने???
मैं: (घबराता हुआ) मम्मी...मम्मी...मम्मी, मेरी बात सुनो...
मम्मी: छी...यही देखना बाकी रह गया था...
संगीता डर के मारे बिना हरकत कि वैसे ही पड़ी रही उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था कि वो अब क्या करें. और दूसरी तरफ मम्मी के आंखों में आंसू था. मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं. मम्मी ने हाथ से सामान फेंकते हुए गुस्से में आकर संगीता को और मुझे झापड़ मारा.
मैं: मेरी बात तो सुनो.
मम्मी: तू चुप कर. बहुत अच्छा किया तुम लोगों ने, आज के बाद तुम लोग मुझसे बात मत करना और ना तो तुम दोनों को एक साथ सोने की जरूरत है. तू आज से नीचे सोएगा इधर हॉल में.
बोलकर गुस्से से मम्मी अपने कमरे में चली गई. मैं और संगीता भी उसके पीछे भागे उसे समझाने के लिए. लेकिन मैंने संगीता को बाहर रुकने का इशारा किया क्योंकि मैं जानता था कि उसे मैं ही समझा सकता हूं.
मम्मी: तुझे होश भी है तूने क्या किया?
मैं: माँ, मैंने...
मम्मी: चुप! और किसको चोदना है? भाई बेहन होने का कुछ मतलब होता है, वो बीवी नहीं है तेरी!
मैं: मम्मी, मेरी बात सुनो—
मम्मी: नहीं! आज मैं तेरी एक बात नहीं सुनूँगी.
मैंने देर ना करते हुए ऐसी बात बोल दी कि उसे मजबूर होकर मुझे सुनना ही पड़ा.
मैं: अगर मैं नहीं यह करता तो आपकी बेटी प्रिया के साथ गुल खिला रही होती.
मम्मी: (हैरानी से) क्या?
मैं: वो एक समलैंगिक सेक्स की तरफ आगे बढ़ रही थी. मैं क्या करता मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था.
मम्मी: तो उसे समझाना एक तरीका था ना कि उसके साथ सेक्स करना.
मैं: उसके मन का क्या अगर उसका मन नहीं भरा तो वो मेरी बात भी नहीं समझती.
मम्मी: तूने पहले मुझे क्यों नहीं बताया?
मैं: क्योंकि मुझे लगा मैं खुद संभाल लूँगा.
मम्मी: और उसी कोशिश में तूने अपनी बेहन, उसके साथ सारी हदें पार कर दिया.
मैं: आप उसे डांटना मत
मम्मी: तेरी चिंता मुझे समझ आ रही है, लेकिन एक बात याद रख—किसी को गलत रास्ते से वापस लाने के लिए पहले उसे भरोसा दिलाना पड़ता है. जा बुलाकर ला उसे.
मैं: मतलब आप उसका साथ दोगी?
मम्मी: अगर अपनी बेटी को किसी गलत रास्ते से बचाने के लिए उसे प्यार देना पड़े तो क्यों नहीं! जैसे मैंने तुझे बचाया था शराब पीने से. लेकिन एक चीज कान खोल कर सुन ले यह बात हम तीनों के अलावा कहीं बाहर नहीं जानी चाहिए. क्योंकि आज जैसी गलती तूने की है ऐसा कभी मत करना. मेरे जगह अगर तेरे पापा ने दरवाजा खोल होता तो?
यह सब सुन सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई की मम्मी हम दोनों के लिए इस हद तक गुजरने को तैयार है. मैं तुरंत संगीता के पास गया. मुझे देखते ही वो रोने लगी.
मैं: रोना बंद करो. मेरी बात सुनो, मम्मी बुला रही है तुम्हें. बस उसकी बातों में हां मैं हां मिलना है. मैंने वो प्रिया वाली बात का बहाना करते हुए मामले को संभाल लिया है. मम्मी को ऐसा लग रहा था कि शायद तुम गलत राह पर जा रही हो इसीलिए मेरे साथ यह सब कर लिया.
संगीता समझदार थी वो मेरी बातों को अच्छी तरह समझ गई और चुपचाप वैसे ही अर्ध नग्न हालत में कमरे में आकर खड़ी हुई. मम्मी ने उसे नीचे से पैर तक ध्यान से देखा.
मम्मी: बैठो इधर.
संगिता चुपचाप मम्मी के बगल में बैठ गई और मैं मम्मी के दूसरी तरफ, जिससे संगीता का चेहरा साफ़ दिखे और मैं इशारा कर पाऊँ.
मम्मी: तुमने प्रिया के साथ यह सब गलत काम करते हुए एक बार भी नहीं सोचा? मुझसे बात तो करती.
संगिता: मुझे डर लग रहा था. आपसे इस बारे में बात करने में.
मम्मी: लेकिन आज तुम्हें डर नहीं लगा.
संगिता: मुझे माफ कर दो मम्मी.
मम्मी: संगीता में जानती हूं तुम भी बड़ी हो गई हो लेकिन ऐसे मौके पर तुम्हें अपने आप को संभालना चाहिए. कोई बात अगर बाहर गई तो बहुत बदनामी होगी, बातें घर में रहे तो ही सही है.
यह कहते हुए मम्मी ने संगीता की जांघों पर अपना हाथ रख और हल्के हाथों से सहलाने लगी. इससे संगीता को एक झटका लगा और उसने मेरी तरफ आंखें बड़ी करते हुए देखा. मैं भी उसे इशारा किया, "जो हो रहा है होने दो".
मेरे इशारे के बाद संगीता भी अपने होठों को दबाए हुए मम्मी का वो सहलाना देख रही थी.
मम्मी: क्या हुआ? लड़की की चाहत है तुम्हें अगर यह मैं कर दूं तब तो किसी और लड़की पर ध्यान नहीं दोगी ना?
उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि यह सब उसकी माँ कह रही है. संगीता ने नहीं कहते हुए सर हिलाया. और उसकी भी हिम्मत थोड़ी बढ़ी. वो मम्मी के करीब आई और उसके होठों को चूमने लगी. यह सीन एक माँ बेटी के समलैंगिक रिश्ते को दर्शाता था. इस तरह से चूमते हुए धीरे-धीरे मम्मी ने भी अपना मुंह खोलना शुरू किया और संगीता भी उसे बड़े प्यार से चूम रही थी. मैंने देखा संगीता के लिए यह एहसास किसी सपने से कम नहीं था.
उन दोनों को इस तरह से चूमता हुआ देख मुझे रहा नहीं गया मैं भी तुरंत संगीता के सामने ही मम्मी के दोनों गालों को पकड़ उसके होंठ को चूसने लगा. मैं यह भूल गया कि संगीता तो हम लोगों के बारे में कुछ नहीं जानती.
संगीता का दिल जोरो से धड़क रहा था यह देखकर. कांपते हुए आवाज में,
संगीता: भैया आप भी और मम्मी...?
मेरे संग मम्मी भी थोड़ी मुस्कुराई.
मम्मी: श्श्श्श...क्यों जब तुम दोनों कर सकते हो तो मैं क्यों नहीं? यह राज इस चार दिवारी के अंदर ही रहना चाहिए.
मम्मी ने हम दोनों को सीने से लगा लिया. हम दोनों उसके सीने से सटे हुए थे, सीने से दबे होने के कारण मम्मी मेरा चेहरा तो नहीं देख सकती थी लेकिन संगीता जरूर मेरा चेहरा देख सकती थी. मैंने उसे इशारा करते हुए मम्मी के ब्लाउज का हुक खोलने को कहा. उसने आंखें बड़ी करते हुए नहीं कहा. संगीता बहुत डर रही थी इस बात से कि वो हिम्मत कैसे करें यह सब करने की.
भले ही उसने प्रिया के साथ चुम्मा-चाटी किया था. लेकिन संगीता को लेस्बियन सेक्स का कुछ पता नहीं था. और मम्मी का भी मुझे पता नहीं पर यहां मेरी जिम्मेदारी थी इन दोनों को सही तरीके से मंजिल तक पहुंचाना.
तभी मैंने उसके सामने ही मम्मी के ब्लाउज पर हाथ लगाया और पहले हुक को खोल दिया. संगीता हैरान रह गई यह देखकर. मैंने उसे फिर इशारा किया हुक खोलने को, वो डर के मारे फिर भी नहीं मानी. मैंने दूसरा हुक भी खोल दिया. संगीता चौक कर अपनी नज़रें उठा मम्मी की तरफ देखने लगी. उसने देखा उसकी मम्मी के चेहरे पर हल्की शर्मिंदगी भरी मुस्कान थी. पहली बार संगीता किसी औरत साथ ऐसी हालत में थी और वो कोई नहीं, उसकी खुद की मां. संगीता के पास भी अपने मम्मी के बदन को छानबीन करने का यह पहला मौका था. उसकी बेचैनी बढ़ गई. फिर क्या था संगीता को भी हिम्मत आ गई उसने भी मम्मी के आखरी हुक खोलते हुए ब्लाउज को अलग कर दिया.
मम्मी के चूचियां देख संगीता यकीन ही नहीं कर पा रही थी कि उसकी आंखों के सामने उसकी मम्मी की चूचियां है. मम्मी भी संगीता के बाल को सहला रही थी और मैंने मम्मी के पीठ पर हाथ लगाते हुए ब्रा का हुक खोल दिया. मैं भी धीरे से संगीता के आंखों के सामने ही मम्मी की ब्रा को नीचे उतारता गया और जैसे-जैसे मम्मी की निप्पल दिखाई देने लगे, संगीता के मुंह में भी पानी आ गया. मम्मी ने हम दोनों को अपनी चूचियों की तरफ इशारा किया. हमने भी अपनी माँ का कहना मानकर अपना सर झुकाया और संगीता ने अपने मुंह में एक निप्पल दबा लिया और दूसरा निप्पल मैंने. हम दोनों मम्मी के निप्पल को चूसने लगे. यह पल मम्मी के लिए बहुत गर्व भरा था क्योंकि उसके दोनों बच्चे उसका दूध फिर से एक साथ पी रहे थे. मम्मी गहरी सांसे भरने लगी, अब तक उसने दोनों निप्पल को एक साथ नहीं चुस्वाया था.
निप्पल चूसते वक्त संगीता की नजरे मुझसे मिली, उसके आंखों में फिर से नशा दिख रहा था. मैंने उसका उत्साह बढ़ाते हुए अपना हाथ नीचे ले जाकर मम्मी के पेटीकोट में डाल दिया. यह देख संगीता उसके निप्पल को और जोर से चूसने लगी. मम्मी भी जोर-जोर से आहें भरने लगी और अपने बदन को ढीला छोड़ते हुए बिस्तर पर लेट गई. हम भी उसकी चूचियों को चूसना नहीं छोड़े.
मम्मी: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…बेटा…आह्ह्ह…आह्ह्ह… आह्ह्ह्हह…….उम्म् मम्म्म.
मैंने उसकी साड़ी निकलना शुरू कर दिया. जैसे ही संगीता के सामने मम्मी की साड़ी खुली तो उसने देखा कि मम्मी अब सिर्फ सिर्फ पेटीकोट में थी. संगीता ने भी नाडा खींचते हुए पेटीकोट को ढीला कर दिया और देखा तो मम्मी ने बहुत सुंदर सी लाल रंग की पैंटी पहनी थी.
इस दौरान मैं कैसे शांत रह सकता था मैंने भी अपना हाथ संगीता की टॉवल में फंसा कर उसे खोल दिया.
संगीता पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी और मम्मी सिर्फ पैंटी मे थी.
मैंने भी एक साथ दोनों की चुचियों का दर्शन किया- उन दोनों की चूचियों को देखकर फर्क साफ था की मम्मी की चूची और मोटे आम जैसी रसीली थी बल्कि संगीता की चूची मध्यम संतरे जैसी मुलायम. मम्मी की चूचियों को चूसने का मजा ज्यादा था वही संगीता की चूचियों को काटने का. क्योंकि वो बहुत नाजुक थी हल्के से कटने से भी पूरी लाल हो जाती थी.
संगीता के खुशी का ठिकाना नहीं था ऐसा लग रहा था उसने अपने आप को मम्मी के आगे समर्पित कर दिया है. मैंने धीरे से मम्मी के कान में कहा कि वो संगीता की चूत के तरफ आगे बढ़े और संगीता की चूत को जाकर चाटे. मम्मी ने अपने होठों को दांतों से दबाते हुए इशारा किया कि उसकी हिम्मत नहीं हो रही है. मैंने उसका हौसला बढ़ाते हुए मम्मी का मुंह संगीता की चूत के पास ले गया. मम्मी अपनी बेटी की चूत को इतने करीब से देख रही थी, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वो कैसे उसे चाटे. मैंने आंखों से फिर इशारा करते हुए कहा कि वो आगे बढ़े, डरे नहीं. आखिर वो कैसे करती उसने कभी पहले चूत नहीं चाटा था दूसरी तरफ संगीता ने अपने आंखों पर हाथ रख लिया था उसे यहां थोड़ी शर्म आ रही थी. तभी मैंने देखा मम्मी हिम्मत दिखाते हुए अपना जीभ थोड़ा बाहर निकाल कर संगीता की चूत के दाने पर लगाया और एक हल्का सा चुम्मा दिया. संगीता सिहर उठी, उसके शरीर में जैसे फिर से करंट लग रहा था. उसने नीचे की तरफ देखा अपनी माँ को चूत चाटते हुए और एक सुकून भरी सांस ली क्योंकि यह एक माँ बेटी का मिलन था.
संगीता: आअह्ह्ह्ह...मम्मी...इश्श्श्शश्
यह देखकर, मेरा तो लंड तन के खड़ा हो गया. मैंने भी तुरंत संगीता की चुचियों को चूसना शुरू कर दिया. मम्मी ने बस कुछ ही देर मे अपना तजुर्बा दिखाते हुए संगीता के दोनों जांघों को कसकर थाम लिए और जलती हुई चूत में जीभ घुसाकर चूसने लगी. जवान चूत के नमकीन रस की धारा ने उसकी जीभ का स्वागत किया. संगीता ने अपनी जांघे खोल दी जिससे मम्मी के मुंह को चूसने में आसानी हो. साथ ही साथ मेरे निप्पल चूसने की वजह से
उधर संगीता की वासना भड़की हुई थी. अब मैं भी अपने आप को नंगा करते हुए लंड बाहर निकाल दिया.
संगीता ने देर ना करते हुए अपना हाथ आगे बढाकर मेरे लंड को पकड़ लिया और मुस्कुराते हुए सहलाने लगी.
मेरा लंड खड़ा होकर पत्थर की तरह हो गया था इन दो हसीन औरतों के बीच. मैंने देखा यह सही मौका है, अब कुछ कहना और पूछना बाकी नहीं रह गया है. मैं थोड़ा उठ कर बैठा और संगीता की चूत से सटाकर लंड उसके मुंह पर रख दिया. मम्मी ने एक नजर मुझे देखा और बड़े प्यार से मेरे लंड को पकड़ कर सुपाडे को चूमना शुरू किया. मैंने आंखें बंद कर ली मैं उसके चुंबन को महसूस कर सकता था मेरे लैंड के चारों ओर. देखते ही देखते मैंने महसूस किया जैसे किसी अत्यधिक कोमल
मक्खन सी नर्म चीज ने मेरे लंड को जकड़ रखा है. मैं नीचे की तरफ देखा, मम्मी अपना मुंह मेरे लंड पर बखूबी चलाने लगी.
वो अपनी जीभ को मेरे लंड पर रगड़ रही थी. मम्मी को ऐसा करते देखा तो मेरी टांगे कंपकपायीं और मैंने दोनों हाथों से उसका सर पकड़ लिया. मम्मी के चेहरे पर खुशी दिखाई देने लगी जिसके लिए वह इतनी मेहनत कर रही थी. मैंने भी लंड से मम्मी का मुंह चोदना शुरू कर दिया. अब मैं पूरा लंड मेरी जान से प्यारी मम्मी के गले के नीचे तक उतार रहा था. ‘गल्प गल्प’ की आवाज आनी शुरू हो गई और मेरी मम्मी का मुंह लाल होना शुरू हो गया.
तभी मम्मी की मदद करते हुए संगीता ने अपना हाथ बढ़ाया और लपक के मेरे लंड को अपने मुंह में भर लिया.
उसने लंड के सिरे को मुंह में ले कर उसके टोपे के इर्दगिर्द अपनी जीभ घुमा फिरा कर उसको चाटना शुरू किया. उसके ऐसा करने से उत्तेजना के मारे मैं पलंग पर ही मचलने लगा.
मैं: आह्ह्ह्हह…….मम्मी...अहह...संगीता...ओह!!!
दोनों बारी-बारी से मेरा लंड चूसने लगी और साथ ही साथ मेरे आंड को भी सहलाई जा रही थी. मुझे ऐसा लगा इन दोनों के मुंह की चूदाइ करने के चक्कर में कहीं मेरा पानी न निकल जाए.
मैंने मम्मी को सीधा लेटने को कहा और अब संगीता मम्मी का चूत चाटने वाली थी. संगीता को भी हिचकीचाहट थी. वो मेरे तरफ हैरत भरी नजरों से देख रही थी कि भला वो कैसे मम्मी की चूत को चाट सकती है. मैंने संगीता को रास्ता दिखाते हुए मम्मी की चूत के पास ले गया. अपनी माँ की चूत को संगीता पहली बार देख रही थी वो भी इतने करीब से.
मम्मी: राहुल तू कुछ मत बता, उसे खुद सीखने दे.
अब सब कुछ संगीता के ऊपर था. संगीता ने हिम्मत दिखाते हुए अपनी जीभ लंबी निकाली और मम्मी की चूत से रगड़ दिया.
मम्मी: उन्हह...आहा...हाँ...बस ऐसे ही.
मैं: बहुत अच्छा कर रही हो.
फिर संगीता ने एक बार अपने जीभ से मम्मी के पूरे चूत को रगड़ते हुए चूत की होठों को फैला दिया. और अब हर दिशा में वो अपने जीभ को चलाने लगी. मैं संगीता के पीछे जाकर उसकी कमर से पकड़ा और अपना लंड उसकी चूत के मुहाने पर रखकर अंदर पेलने लगा. संगीता के पैर थरथराहट से कांप रहे थे क्योंकि एक तरफ तो उसके मुंह में अपनी माँ का चूत था तो पीछे से उसकी चूत में घुसता हुआ मेरा लंड. मैं भी झटका देना शुरू किया थपकियों की आवाज आनी शुरू हो गई. और एक ही कमरे में अब मम्मी की आहें और संगीता की सिसकारियां एक साथ जुगलबंदी कर रही थी. मैं भी संगीता को जोर-जोर से चोदने लगा इतना जोर से शायद मैंने उसे कभी नहीं चोदा था.
संगीता: आह...ऊऊह्ह्ह्ह…भैय्याआआ...…..थोड़ा धीरे...आअह्ह्ह्ह
मम्मी: अहह...उन्ह...हम्म...आहा
मेरे झटके पूरी रफ्तार से संगीता की चूत को चोद रहे थे. उसकी गांड पीछे से ठोकर खाकर लाल हो गई थी. थपकियों की आवाज कमरे में गूंज रही थी.
संगीता अपना मुंह मम्मी की चूत पर रखे हुए,
संगीता:धीरे...भैय्याआआ...आअह्ह्ह्ह...आअह्ह्ह्ह
मम्मी: हाँ बेटा...धीरे चोद गुड़िया को!!!
मैं: आज मत रोको मम्मी. गुड़िया को जी भर कर चोदने दो.
संगीता: ओह...भैया बहुत मोटा है आपका...
8 से 10 झटके और मारकर मैंने संगीता की चूत से अपना लंड निकाला और मम्मी को थोड़ा आगे की ओर खींच लिया. संगीता अभी मम्मी के ऊपर ही थी. मैं फिर से उसी रफ्तार से अब मम्मी को चोदना शुरू कर दिया. इस बीच संगीता और मम्मी चुम्मा ले रही थी एक दूसरे को. लेकिन उनके सिसकारियों का तरीका बदल गया.
मम्मी: अहह उन्ह हम्म....उम्म् मम्म्म
आखिर मम्मी की रसीली चूत संगीता जैसी नहीं थी. मम्मी को तेज झटको को सहने की आदत थी, ज्यादा दर्द तो नहीं हो रहा था लेकिन उसे मजा बहुत आ रहा था. मैं मम्मी और संगीता को बारी-बारी से चोदा रहा था. इन दोनों ने भी अपना सहयोग पूरी तरह से दिया. जब मैं मम्मी को चोदता तो संगीता मम्मी की चूचियां चूसने लगती और जब संगीता को चोदता तो मम्मी उसकी चूचियों की चुस्कियां लेती. उस बंद कमरे में सिर्फ आह...ऊऊह्ह्ह्ह की आवाज गूंज रही थी और जोर-जोर से लगती थपकियां. दोनों को दो-दो राउंड चोदने के बाद मेरे लंड ने पानी छोड़ दिया. मम्मी के सामने ही मैंने अपना सारा वीर्य संगीता के नाभि पर गिरा दिया.
सच में आज बहुत मजा आया. हम तीनों में, अब ना कोई शर्म बची थी और नाही कोई हया. इतना मेहनत करने के बाद, हम वैसे ही बिस्तर में कुछ देर के लिए सोए हुए रहे की तभी,
मम्मी: संगीता उठो जाओ नहा लो जाकर. राहुल तू भी उठ, संगीता नहा कर आ जाए फिर तू भी नहा लेना.
मैं: और आप?
मम्मी: मैं तो सुबह नहा कर ही गई थी.
मैं: सुनो, क्यों ना हम तीनों साथ में नहाए?
मम्मी: अभी भी मन नहीं भरा तेरा?
मैं: आप दोनों से मन कैसे भर सकता है.
संगीता: हां भैया और कितना चोदना है हमें?
मम्मी: चुप करो, थोड़ा तो लिहाज रखा करो संगीता. कैसे बात करती हो.
संगीता: मम्मी अब कुछ लिहाज रखने जैसा हम तीनों में क्या रह गया है.
मम्मी: फिर भी अगर यह आदत रहा तो कहीं बाहर किसी के सामने ऐसा मुंह से ना निकल जाए.
संगीता: नहीं नहीं ऐसा कभी नहीं होगा. अभी तो बस हम लोगों के आपस की बातें हैं.
मैं: छोड़ो ना यह सब चलो नहाते हैं बहुत मजा आएगा.
संगीता: हां मम्मी चलो ना.
मम्मी: ओ... नहीं मानोगे तुम लोग? ठीक है चलो.
आखिरकार मम्मी भी तैयार हो गई है सबके साथ नहाने के लिए. जिंदगी का असली मजा तो अब आ रहा था. बाथरूम में जाकर हमने एक दूसरे को चूमना शुरू कर दिया. संगीता और मम्मी ने थोड़ा शर्म लिहाज दिखाते हुए पेटिकोट को अपने सीने पर बांध रखा था. धीरे-धीरे हम सब पूरी तरह से, फिर एक बार नंगे हो गए. उस
बहते हुए शावर के पानी में मैं उन दोनों की चूत को फिर से चाटा और उन लोगों ने भी मेरे लंड से खुलकर अपना मुंह और अपनी चूत चूदवाई.
अब मेरे पास चूत और गांड की कोई कमी नहीं थी. मैं जब चाहे तब अपने मां-बहन को तो चोद ही सकता था. साथ ही अगर मेरा मन गांड मारने का करें तो उसके लिए मेरे पास तनुश्री आंटी भी थी.